Sunday, July 04, 2010

'विदेह' ५९ म अंक ०१ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ५९)-PART IV


सभ दिन रहताह विद्यापति  : मायानंद मिश्र
प्रबोध सम्मान 2004 सँ सम्मानित मायानंद मिश्रसँ विनीत उत्पलक साक्षात्कार
 
विनीत उत्पल : अहाँक जन्म कोन ईस्वीमे भेल छल आ लालन-पालन कोना भेल?
मायानंद मिश्र : हमर सर्टिफिकेट जन्मतिथि 1934 ईस्वी थिक, मुदा कुंडलीमे अछि 1930 ईस्वी। माइक देहावसान बादे सन 1936-37 ईस्वीमे जखन हम पांचो-छओ वर्षक रही, मातृक सुपौल आनल गेल होएब। मुदा बीच-बीचमे गामो लऽ गेल जाइत रही तकर किछु-किछु खंडित स्मृति अछि। गामक स्मृति ओ ज्ञान क्रमश: सन 1940-41 ईस्वीसँ  होमऽ लागल जे हमरा एकटा छोट बहिनि सेहो अछि आ हमरा चारिटा पित्ती तथा दुइ टा पीसी सेहो छथि। हमर लालन-पालन छठमे-सातमे वर्षसँ  मातृकेमे होमऽ लागल छल आ छोट बहीनक गाममे।
 
विनीत उत्पल : कोशीक झमारल अहाँक परिवार रहए, तखन साहित्यसँ कोना जुड़ाव भेल?
 मायानंद मिश्र : जखन गाममे कोसी बाढ़िक उत्पातक कारण सन 1940-41 ईस्वीमे गाम छोड़िकेँ प्रतापगंज थानाक गोविंदपुर जा कऽ हमरा सभकेँ रहऽ पड़ल। ओतए ओहि मातृवत बहीनक अपन पतिकुलक किछु जमीन छल, जाहिसँ मात्र पेट टा भरल जा सकैत छल। एहि गोविंदपुरमे सन 1945-46 ईस्वीमे हमर प्राथमिक कवित्व प्रतिभाक अंकुरण भेल छल। जखन ओहि ठामक कालीस्थानक लेल सुपौलक कोने ग्रामोफोनक कोनो गीतक सुरमे भगवतीक अर्चना-गीत लिखने छलहुँ, जकरा हम स्वयं गाबितो छलहुँ कीर्तन मंडलीमे।
 
विनीत उत्पल : उच्च शिक्षा कतएसँ भेटल? विस्तारसँ बताऊ?
मायानंद मिश्र : सन 1950 ईस्वीमे सुपौलसँ मैट्रिक पास कएलाक बाद आगू पढ़बाक समस्या छल जाहिमे आर्थिक-समस्या मुख्य छल। उत्साह सभक छलनि जे हम आगू पढी विशेषत: ज्येष्ठ माम पंडित रामकृष्ण झा किशुनजी तथा पिताजी पंडित बाबू नन्दन मिश्रजीक। उत्साह एहि लेल सभक छलनि जे हमरा मैट्रिकमे सेकेंड डिवीजन भेल छल जे ताहि दिनमे बहुत कम होइत छलैक। अपन इच्छा छल पटना कालेजक। आवेदन सेहो कएल। नामांकनक स्वीकृति-सूचना सेहो भेटल। किंतु अंतिम कालमे किसुनजीक विचार बदलि गेलनि जे दरभंगे। दरभंगामे पंडित श्री चंद्रनाथ मिश्र अमरजी छथिन, हुनके अभिभावकत्वमे। सन 52 ईस्वीमे विवाह कारणे आई.ए. क परीक्षा नहि देल आ सन 54 ईस्वीमे आगराक मैथिली महासभाक कारणे बी.ए. क परीक्षा नहि दऽ सकलहुँ।

विनीत उत्पल : मैथिली साहित्य दिश कोन मन आएल?
मायानंद मिश्र : सन 50 ईस्वीमे सी.एम. कॉलेजमे नाम लिखाओल। श्री अमरजीक डेरापर अधिक काल साहित्यिक गोष्ठी, दरभंगासँ सुपौल-मुरलीगंज-कटिहार तथा मुजफ्फरपुरसँ जयनगर धरि विभिन्न स्थानपर कवि सम्मेलन, वैदेही-कार्यालय तथा गीत लेखन। भाङक लोटाक प्रकाशन। समए चलैत गेल, परिचय-परिधि बढ़ैत गेल। एहि बीच दरभंगामे राजकमलजीसँ परिचय भेल। फेर ललित-राजकमल-मायानंद क गोष्ठी सभ, साहित्यिक चर्चा सभ जाहिमे रामू अर्थात रमाकांत मिश्र ओ दिवानाथजीक निरंतर सहभागिता। सन 54 ईस्वीमे ललितजी सब-डिप्टी कलक्टर बनि दरभंगा चल गेलाह। राजकमलजी ता पटने छलाह। हमहूँ 56 ईस्वीक अंतमे रेडियो, पटना आबि गेलहुँ।

विनीत उत्पल : ओहिकालमे पटनामे साहित्यिक परिदृश्य केहन रहए ?
मायानंद मिश्र : पटनामे रेडियो स्टेशन, हास्य-व्यंग्य-सम्राट हरिमोहन बाबूक डेरा, पंडित जयनाथ बाबूक डेरा,  गोपेशजीक डेरा, प्रो. आनंद बाबूक डेरा, फणीश्वरनाथ रेणुक डेरा, मुरादपुर खादी भंडार, श्री रूपनारायण ठाकुरजीक कार्यकर्ता-निवासमे माछ-भातक मासिक भोज आ चेतना समिति, पुस्तक भंडारक रामायण-गोष्ठी, अभिव्यंजना-प्रकाशन, विभिन्न समए ओ विभिन्न स्थानपर घनघोर साहित्यिक चर्चा होइत छल। ओहि कालमे दक्षिण बिहारसँ मिथिलांचल धरि सभ जगह कवि सम्मेलनमे शामिल भेलहुँ।

विनीत उत्पल : पटनासँ सहरसा अएलहुँ, एतए केहन बीतल?
मायानंद मिश्र : एम.ए. क पश्चात सन 61 ईस्वीमे आबि गेलहुँ सहरसा कॉलेज, सहरसा। कॉलेज अध्ययन-अध्यापन, सघन-लेखन, बलुआसँ बम्बइ धरि विद्यापति  पर्व-समारोहमे मंच संचालन, भाषणो आ कविता पाठ सेहो, विभिन्न संस्थाक संगठनात्मक प्रक्रियाक अध्ययन, सहरसामे विभिन्न पर्व-समारोहक आयोजन, मैथिली चेतना परिषद, सहरसाक गठन, पटनामे मैथिली महासंघक संगठन, डाकबंगला चौक-जाम क कार्यक्रम, लेखन आ पाठन, प्राचीन इतिहासक सघन अध्ययन, पुन: प्रथम शैलपुत्री च, मंत्रपुत्र, पुरोहित आ स्त्रीधनक लेखन आ तकर हिन्दी आ॓ मैथिलीमे प्रकाशन, दिशांतर, अवांतर, चंद्रबिंदु क प्रकाशन। तकैत-तकैत सहरसा कॉलेज, सहरसा आ स्नातकोत्तर केंद्र, सहरसामे 33 वर्षक सेवा-काल समाप्त भऽ गेल आ 1994 ईस्वीमे अवकाश ग्रहण कऽ लेलहुँ।

विनीत उत्पल : अहाँक दृष्टिक विस्तार कोना भेल?
मायानंद मिश्र : दृष्टिक विस्तार वस्तुत: मामक रूपमे युगांतकारी मैथिली साहित्यकार पंडित रामकृष्ण झा किशुनद्वारा स्थापित मिथिला पुस्तकालयक कारणे भेल। ओहि ठाम 47 सँ 50 ईस्वीक बीचमे पढलहुँ जाहिमे प्रेमचंद, जैनेंद्र, इलाचंद्र जोशी, भगवतीचरण वर्मा, शरतचंद्र, बंकिम बाबू, रवींद्रनाथ ठाकुर तथा ताराशंकर वन्धोपाध्याय आदि प्रमुख छलाह। एहि समएमे किसुनजीक आदेश-निर्देशक विरूद्ध रातिकेँ चोरा कऽ चंद्रकांता ओ चंद्रकांता संतति संगहि शरलक होम्स सिरीज सेहो पढ़ि गेल रही। ओहि समएक मायासमकालीन नई कहानियांछल जे नियमित पढ़ैत रही।

विनीत उत्पल : पहिल रचना कोन छल?
मायानंद मिश्र : 49 ईस्वीमे हरिमोहन बाबूक प्रभावक प्रचंड प्रतापे, हम प्रथम-प्रथम मैथिलीमे हम रेल देखबनामक एकटा गद्य रचना कथात्मक शैलीमे लिखलहुँ जे हाइस्कूलक वार्षिक पत्रिकामे छपल। एहि प्रकाशन-प्रोत्साहनक कारणे भांगक लोटाक अधिकांश कथा, अही 49-50 ईस्वीमे लीखि गेलहुँ जकर प्रकाशन 51 ईस्वीमे प्रो. श्री कृष्णकांत मिश्रक वैदेही प्रकाशनक द्वारा भेल।

विनीत उत्पल : भांगक लोटा कतएसँ प्रकाशित भेल छल आ कहिया ?
मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक दुइ गोट अंतिम कथा मैट्रिक परीक्षाक बाद लिखने छलहुँ जकर प्रतिलिपि श्री अमरजी कृपापूर्वक देखि देलनि, मुदा ओहूसँ पैघ उपलब्धि हमरा लेल भेल जे आचार्य सुमनजी दुइ बिन्दु नामे आ॓कर भूमिका लीखि देलनि आ प्रो कृष्णकांत मिश्रजी ओकरा सन 51 ई.मे छापि देल वैदेही प्रकाशनक दिससँ, हमरासँ एक्कोटा टाका नहि लेलनि। अपितु एक गोट टाका देलनि, मना कएलाक उपरांतो, पंडित त्रिलोकनाथ मिश्रजी आ॓कर मूल्य, जे ओहिपर छपल छल।

विनीत उत्पल : भांगक लोटामे तँ हास्य छल, मुदा गंभीर लेखन दिश कोना घुरि गेलहुँ ?
 मायानंद मिश्र : भांगक लोटाक पश्चात हम हास्य कथा नहि लिखलहुँ। ई प्रकाशन प्रोत्साहन हमर कथा-लेखनक प्रेरणा अवश्य बनल जाहि कारणे , 51-52 ई सँ हास्य छोड़ि, सामाजिक जीवन-संघर्षपर आधारित मनोविज्ञानक गंभीर भावक कथा सभ लीखऽ लगलहुँ जाहिमे प्रमुख छल रूपिया, सुरबा, आगि मोम आ पाथर तथा सतदेवक कथा जे कालांतरमे, सन 60 ई.मे कलकत्ताक मैथिली प्रकाशनक दिससँ प्रकाशितआगि मोम आ पाथरनामक संग्रहमे संकलित अछि, जकर अधिकांश कथा 59-60 ई.क मिथिला दर्शनमे प्रति मास छपल छल। मुदा मंच-जीवनमे हमर प्रवेश कथा-लेखनसँ नहि अपितु काव्य रचना विशेषत: गीत-रचनासँ भेल छल।

विनीत उत्पल : साहित्यिक यात्रामे केकर लेखनसँ प्रभावित भेलहुँ ?
मायानंद मिश्र : 40-50 ई. धरि अबैत-अबैत नेपाली आ॓ बच्चन क गीत-रचनाक प्रभाव हमरापर बहुत छल। सन 59 ई सँ बहुत पूर्वहि अर्थात दरभंगे कालमे सी.एम. कॉलेजक हिन्दी प्रोफेसर श्री सुरेंद्र मोहनजीसँ अज्ञेय द्वारा संपादित प्रतीक आ॓ तार सप्तक दुइ भाग पढ़ने छलहुँ आ अतिशय प्रभावित भेल छलहुँ। क्लासमे पढ़ल प्रसाद-पंत-निराला-महादेवी वर्मासँ सर्वथा भिन्न छल ई काव्य धारा, जाहि पर टी. एस. इलियट- एजरा पाउंड सँ लऽ कऽ एलेन गिन्सबर्ग आ॓ एंग्रीजेनरेशन तथा ब्रिटेनक कवि लोकनिक प्रभाव छल। शरतचंद चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ ठाकुर, टालस्टॉयसँ प्रभावित रही।

विनीत उत्पल : अहाँ तँ हिन्दीमे किछु लिखने रहि?
मायानंद मिश्र : सन 49 ई मे किछु हिन्दी गीत लिखलहुँ, जकर तीन गोट मुखरा, पंक्ति एखनहुं मोन अछि, ‘अरमान मेरे दिल के सभी टूट चुके हैं’, ‘अधजली कामनाएं  लेकर अपलक मैं गगन निहार रहातथा मैं अंतर मे तूफान लिए चलता हूंमुदा, 50 .क मैथिलीमे रचित आ॓हि दिल छलहुँ हम भांग पीनेतथानोचनी तोर गुण कते गैबअत्यंत लोकप्रिय भेल। स्त्रीधननामक उपन्यास नेशनल बुक ट्रस्ट छापने अछि।

विनीत उत्पल : गीतनाद, स्वरसंधानकेँ कोना साधलिऐ?
मायानंद मिश्र : गीत गाबऽ लागल छलहुँ 1942-43 ईस्वीसँ सुपौलमे अपन मातामहक कीर्तन मंडलीमे। हमरा लगैत अछि जे हमरामे कंठ-स्वर, स्वर-संधान-प्रतिभा तथा सुरताल-ज्ञान आदि जकर अनेक प्रशंसा भेल-मातामह पंडित नागेश्वर झासँ आएल अछि। एना गुनगुना कऽ तँ किछु ने किछु गबैत छलाह आ तेँ कालान्तरमे जे हम गीत-रचना कएल से कोनो ने कोनो सुरतालमे रहैत छल। आ॓हि कारणे हम स्वयं सेहो गबैत छलहुँ तथा किछु गीत किछु गायक जाहिमे गायक चूड़ामणि पंडित रघु झाजी सेहो छथि, गबैत छलाह।

विनीत उत्पल : अहाँ गायन ज्ञान कतएसँ पेलिऐ ?
मायानंद मिश्र : सन 50 ई.क अंतिम चरणमे जखननभ आंगनमे पवनक रथ पर कारी-कारी बादरि आयलनामक गीत लिखलहुँ तँ गाबिये कऽ लिखलहुँ। यएह गायन-ज्ञान हमर छन्द-ज्ञान छल। जहाँ धरि आइयो मोन अछि, बिनु छन्द-ज्ञाने प्रारम्भोमे लिखल हमर गीत-रचनामे छन्द दोष, शास्त्रीय संगीत मर्मज्ञ पंडित कवि नै ईशनाथ झा ताकि सकलाह, जे एकर पहिल आधिकारिक श्रोता बनलाह आ ने आचार्य रमानाथ झा जे एहि गीतकेँ आई..क लेल संकलित कविता कुसुममे सर्वप्रथम संकलित कएलनि।

विनीत उत्पल : अहाँ जहि साल आई.. मे रही, ओहि साल पाठ्यक्रममे अहाँक लिखल कविता सेहो छल की?
मायानंद मिश्र : अत्यधिक प्रसन्नता भेल छल आ॓हि दिन, जाहि दिन सन 52 ई.मे आचार्य पंडित रमानाथ झा आई.. क पाठ्यग्रंथक रूपमे कविता कुसुमक संकलन-संपादन कएलनि तथा आ॓हिमे नभ आंगनमे पवनक रथपरनामक गीतकेँ स्थान दैत संकलित कएने छलाह। एना तँ कोनो संकलनमे स्थान भेटलासँ प्रसन्नता होइत किंतु एतए तँ स्वयं रमानाथ बाबू द्वारा संपादित ग्रंथक गप्प छल आ सेहो आई.. क पाठ्यग्रंथमे, जखन की हम ताधरि स्वयं आई.. पास नहि कएने छलहुँ।

विनीत उत्पल : आ॓हिकालमे अहाँ कोन-कोन पत्रिकामे लिखैत छलहुँ ?
मायानंद मिश्र : जहिना आ॓हि समएमे दरभंगासँवैदेहीप्रकाशित होइत छल, तहिना कलकत्तासँ मिथिलादर्शनआ॓ बादमे मैथिली दर्शन।ललित आ॓ राजकमल सामान्यत: वैदेहीमे अधिक लिखैत छलाह तथा हम स्वयं अपेक्षाकृत मिथिला दर्शनमे। नाटको लिखने छी, कथा-कविता सेहो लिखने छी।

विनीत उत्पल : अभिव्यंजनावादी काव्य की छल?
मायानंद मिश्र : 59 ई मे मैथिलीमे अनेक नवीन काव्यक लेखन प्रथम-प्रथम कएल, जकरा हम अभिव्यंजनावादी काव्य कहने छी तथा जकर प्रथम प्रकाशन सन 60 . क आरंभमे अभिव्यंजनानामक पत्रमे भेल अछि। संगहि अही 59 . मे हम एक वर्ष पूर्वक मैथिली पांडुलिपि माटिक लोकक आधारपर प्रथम-प्रथम माटी के लोक: सोने की नैयाक नामसँ हिन्दीमे लेखनारंभ कएने छलहुँ। आ जहिना सन 50 ई. मे एकटा मैथिली कृति प्रकाशित भेल छल, तहिना सन 60 ई मे दुइ गोट मैथिली कृतिबिहाड़ि पात आ पाथरतथा आगि मोम आ पाथरप्रकाशित भेल।

विनीत उत्पल : आ॓हि काल की सपना छल?
मायानंद मिश्र : हिंदीक आ॓हि अज्ञेयी नई कविता जकाँ मैथिलीमे नवीन काव्यान्दोलन ठाढ़ करबाक उद्देश्यसँ अभिव्यंजनाक प्रकाशन-योजना मोनमे आएल छल, जाहिमे मात्र नवीन काव्यटा रहत। आ ताहि लेल पहिने स्वयं किछु नवीन काव्य लिखल। आ ओ दू-चारि दिनपर हरिमोहन बाबूकेँ सुनाबी जे अभिव्यंजनामे हमरा एहने कविता चाही। आ  देबो केलनि जे अभिव्यंजनामे छपल छल। आधा 59 . क घोर व्यस्तताक फलस्वरूप सन 60 .क आरंभमे अभिव्यंजनाक प्रकाशन संभव भेल। प्रकाशनक खर्च ओ लोकार्पण समारोहक सभटा खर्च स्वयं पंडित जयनाथ मिश्र, एकटा अर्द्ध परिचित किशोर युवा संपादकक उत्कट उत्कंठा ओ महत्वपूर्ण महत्वाकांक्षापर द्रवित होइत, कयने छलाह। सन 60 ई हमर लेखकीय जीवनक लेल अति व्यस्ततापूर्ण रहल। एहि समएमे जँ एक दिस अनेक कथा लिखल तँ दोसर दिस अनेक नवीन काव्यक सेहो रचना कएल जे कालांतरदिशांतरमे संकलित अछि। तेसर दिस जँ अभिव्यंजनाक संपादन कएल तँ किछु समीक्षा सेहो एहि कालखंडमे लिखल, जाहिमे सँ किछु मिथिला दर्शन, वैदेही आ॓ कृष्णकांत बाबूक मैथिली सम्मेलनक रचना संग्रहमे अछि। ओहि काल एकटा काल्पनिक रेडियो नाटक सेहो लिखने छी- इतिहासक बिसरल।

विनीत उत्पल : कोन-कोन पैघ साहित्यकारसँ भेट भेल छल?
मायानंद मिश्र : दिनकरजी सँ हमर परिचय पंडित जयनाथे बाबू करौने छलाह मैथिली कवि ओ चौपाल स्वरक रूपमे। पहिल बेर दिनकरजी चौंकल छलाह आ चौपालक हमर स्वर आ॓ अभिव्यक्तिक अतिशय प्रशंसा कएने छलाह। रेणुजी सँ परिचय अति त्वरित गतिसँ अंतरंग आत्मीयतामे बदलि गेल छल। प्राय: नित्य रेडियो स्टेशनमे अथवा बुध दिनकेँ अधिक खन हुनका डेरापर सायंकालकेँ सांध्य गोष्ठीमे भेंट होइत रहल।

विनीत उत्पल : अहाँ जवाहरलाल नेहरू आ इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट कएने छलहुँ ?
मायानंद मिश्र : भारतक प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरूक चिर ऋणी रहब, जनिक विशेष आग्रहक कारणे, एतेक शीघ्र सन 65 ई मे मैथिलीकें देशक एकटा स्वतंत्र साहित्यिक भाषाक रूपमे साहित्य अकादमी मान्यता देलक। 73 ई मे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधीसँ सेहो भेंट भेल छल।

विनीत उत्पल : मैथिली चेतना परिषद संस्थानक निर्माण कोना कएलहुँ आ कोना कएलहुँ ?
मायानंद मिश्र : 62 ई. मे हम सहरसा मैथिली चेतना परिषद नामक संस्थाक निर्माण कएलहुँ पंडित श्री अमरेंद्र मिश्रजीक डेरापर। एहि संस्थाक तत्वावधानमे अभिव्यंजनाक प्रकशनक संगहि सन 62-63 ई मे प्रथम-प्रथम कविश्वर चंद्र प्रसिद्ध चंदा झाक जयंती समारोहक आयोजन कएने छलहुँ सहरसा परिसरमे। सहरसाक ई समारोह पूर्वांचल  मिथिलांचलक पहिल ओ आदिम समारोह तँ छलहे (प्राय:) संभव पिंडारूछ गामक पचासक दशक अनेक आयोजनक पश्चात ई दोसर स्थान छल, जाहि ठाम एहि प्रकारे हुनकर स्मरण कएल गेल। एहि स्मरण समारोहक एकटा कारणो हमरा मोनमे छल। हुनक मातृक बड़गाम छलनि, जतऽ हुनक प्रारंभिक शिक्षा भेल छलनि आ जे आधुनिक मैथिलीक सूत्रधार छलाह।
 
विनीत उत्पल : जीवनक एहि मोड़पर अहाँक जीवनदर्शन की अछि ?
मायानंद मिश्र : हम दर्शनक गप्प नहि करैत छी। किछु-किछु निष्काम कर्मक मर्म पढल अछि, किछु-किछु बुझलो अछि। की सभक जीवन-दर्शनक अनुकूल चलि पबैत अछि। माया चलऽ दैत अछि ? अनेक-अनेक प्रश्न अछि जे अनुत्तरिते रहि जाइत अछि तथापि जीवन-प्रवाह अछि जे प्रवाहित होइत चल जाइत अछि, चल जाइत रहत, अविरल, अविराम।

विनीत उत्पल : कालगतिकेँ की मानैत छी ?
मायानंद मिश्र : सर्वोपरि काल-गति। मुदा, मनुष्य गति तँ एकमात्र संघर्षक गाथा थिक। जखन-जखन समाजक ई गति ओ दुर्गति होइत अछि, तखन-तखन समाजमे पुनर्जागरण होइत अछि। युगक धाराकेँ मोड़ि समाजमे रचनात्मक परिवर्तन अबैत अछि, निश्चित अबैत अछि। अबैत रहल अछि, जकर साक्षी थिक इतिहास, मानव इतिहास। आब ओही इतिहासक प्रतीक्षा अछि। प्रतीक्षाक एकटा भिन्ने सुख होइत छैक।

विनीत उत्पल : एखुनका कालमे केकर रचना नीक लगैत अछि?
मायानंद मिश्र : मैथिलीमे नचिकेता, सुभाषचंद्र यादव, जयधारी सिंह आ डॉ महेंद्र झाक लिखल नीक लागैत अछि।

विनीत उत्पल : मैथिलीक भूत, वर्तमान आ भविष्यकेँ लऽ कऽ की सोचैत छी ?
मायानंद मिश्र : सभ दिन रहताह विघापति। मैथिलीक सौभाग्य अछि जे अंग्रेज एहि भाषाकेँ लोकक आगू आनलक। मैथिलीमे लोक पढ़ैत अछि, मुदा कीनए लागत तखन लेखक आओर प्रकाशक आगू आएत।

विनीत उत्पल : अहाँक परिवारमे के सभ अछि, ओ सभ की करैत छथि ?
मायानंद मिश्र : तीन लड़का, एक लड़की अछि। पैघ बेटा प्रो. विघानंद मिश्र जे पीजी सेंटर, सहरसामे इतिहासक प्रोफेसर अछि। दोसर डॉ. भवानंद मिश्र, राजेंद्र मिश्र कॉलेज मे इतिहासक प्रोफेसर अछि। छोट कामनानंद मिश्र दिल्लीमे हिन्दुस्तान अखबारक वेबसाइट संस्करणक इंचार्ज अछि। बेटी वंदना मिश्र जमशेदपुरमे रहैत अछि। दामाद स्टेट बैंक मे अफसर छथि।
बेचन ठाकुर
दोसर दृश्‍य- बेटीक अपमान

     (स्‍थान- दीपक चौधरीक आवास। दीपक आ वीणामे कि‍छु गप-सप्‍प होइत    अछि‍।)
दीपक-     मोहन माए, हम खेत जाइत छी। खेतमे हर बहैत अछि‍ आ दुटा जन           सेहो अछि‍। कने जलखै जल्‍दीए लेने आएब।
वीणा-      सुनू ने, तहन जाएब।
दीपक-     बाजू की कहैत छी?
वीणा-      की कहब? जारैनक इन्‍जाम तँ साफे नहि‍ छैक।
दीपक-     याए जारैन कीनि‍ देने रही। ओ सभटा सधि‍ गेल की?
वीणा-      सधि‍ नै गल तँ की। अहॉंकेँ बुझाए रहल अछि‍ जे हम खाए लेलहुँ।
दीपक-     हे मोहन माए, हमरा अबेर भऽ रहल अछि‍ कोनो जोगार कऽ जलखै            जल्‍दी लेने आएब।
वीणा-      कोन जोगार? कने बताए दि‍अ ने।
दीपक-     कहैत तँ लाज होइत अछि‍। मुदा कहि‍ दैत छी। नहि‍ होएत तँ एहि‍            कलमसँ कने पत्ते खरैर आनब।

वीणा-      नैहरमे खर्रा पथि‍या चि‍न्हबो नहि‍ केलहुँ। मुदा सासुरमे अहॉं की नहि‍            करेलहुँ। ऐँ यौ मोहन बाउ, आब वएह समए छैक जे जखैन तखैन           खर्रा-पथि‍या लऽ कऽ जाउ आ पत्ता खरैर आनू।
दीपक-     कोनो जोगार करब। हम जाए रहल छी। हरवाहा खेतमे की करैत             होएत की नहि‍।
वीणा-      सुनि‍ लि‍अ मोहन बाउ, हम जोगार करैत करैत थाकि‍ गेलहुँ। आब             हमरासँ कोनो जोगार नहि‍ होएत। जोगार करैत करैत हमरा दि‍शि‍ कि‍यो          ताकए नहि‍ चाहैत अछि‍। सभटा प्रति‍ष्‍ठा माटि‍मे मि‍लि‍ गेल।
दीपक-     अहॉं बड्ड प्रति‍ष्‍ठि‍त भए गेलहुँ?
वीणा-      हँ यौ तँ की। प्रति‍ष्‍ठा कोनो बजारमे बि‍काइत अछि‍ की। अपन               व्‍यवहारसँ प्रति‍ष्‍ठा आबैत अछि‍। अहॉंकेँ की प्रति‍ष्‍ठा अछि‍?
दीपक-     मोहन माए, अहॉं बड्ड चढ़ि‍ कऽ बाजि‍ रहल छी आ हमरा प्रति‍ष्‍ठाकेँ            उकटि‍ रहल छी आइ अहॉं खेत जलखै नहि‍ आनब, तहन बुझबैक।
वीणा-      यावत जारैनक जोगार नहि‍ कए देब, ताबत जलखै केर कोनो आशा            नहि‍। हम पत्ता खरैले नहि‍ जाएब। अहॉंकेँ जे करबाक हएत से            करब। हम अहॉंक पत्‍नी छी ने।
दीपक-     से बुझि‍ लेब। कोन बॉंसक दाहा होइत छैक।
वीणा-      अइँ यौ मोहान बाउ, नहि‍ बाजी तँ पीचने जाउ। ऐँ यौ, हमरा एहि‍ देहमे         कि‍छु अछि‍। ठाढ़े छी सएह बहुत। सौंसे देह उज्‍जर भऽ गेल अछि‍।               एक्‍को रत्ती खून देहमे नहि‍ अछि‍। खाली जनमाबै ले होइत अछि‍।              उपरेमे अल्‍हुआ फरैत छैक की? खाली बेटे चाही बेटे। चलु दरि‍भंगा।           अल्‍ट्रासाउण्‍ड करए लि‍अ आ बेटीकेँं हटाए दि‍औक बेटाकेँ रहए दि‍औक।         सफैया कराबैत-कराबैत आ गोटी-दवाइ खाइत-खाइत हमर देह गलल            जाए रहल अछि‍। आब हम नहि‍ बॉंचब। बेटा लेल तारमतोर सफैया               हमरा जाए मारि‍ देलक। देहसँ तारमतोर ओतेक-ओतेक खून बहनाइ               मामूली बात छैक। समाजमे बेटी दुश्‍मन अछि‍ की? हए नारायण बेटा-3

     (वीणा देवी दम तोि‍ड़ दैत छथि‍।)
दीपक-     (माथ पीटैत) मोहन माए यै मोहन माए। आब हम कोना रहबै यै मोहन               माए। मोहना रओ मोहना। सोहना रौ सोहना। गोपला रओ गोपला।            दौड़ै जाइ जो रओ बौआ सभ।
     (मोहन, सेाहन, आ गोपालक प्रवेश।
     तीनू बेसुमार कनि‍ रहल अछि‍)
तीनू-       माए गै माए, हम सभ कोना रहबै गै माए।
दीपक-     बौआ सभ रओ बौआ सभ। आब अपना सभ केना रहबै रओ बौआ             सभ। के खाइलए देतै रओ बौआ सभ। मोहन माए यै मोहन माए।              हमरे खाति‍र अहॉं मरलहुँ यै मोहन माए।
    
     (चारू बा-पूत कानैत-कनैत वीणाक देहपर मुरी रोइप दैत अछि‍। पटाक्षेप भऽ जाइत अछि‍। अन्‍दरसँ राम-नाम सत्‍यक आवाज सुनाइ पड़ैत अछि‍।)


दृश्‍य-  तेसर

क्रमश:
१.कामिनी कामायनी- कथा-कनिया पूतरा के विवाह २.निबन्ध-बिपिन झा-किछु पजरैत प्रश्न
कामिनी कामायनी
कनिया पूतरा के विवाह ।

बङका बङका अटैची. . .सूटकेस. . एसी .. टी वी . ..फ्रीज पलंग .. .अगङम बगङमकपैकिंग .. ओहिना बान्हल. . .राखल छलै . ओही बङका हॉल सॅ लऽ कओकर कोठरी आतीनो कातक बरान्डा धरि ।घरक बाहरि कंपाउंड में ललका चरपहिया ठाढ झक झक करैत छल .।लोकवेद के गेलोपरांत. . ओ अपन माथ सॅ घोघ हॅटौलक़ . .नथिया बङ भारी छलै ..नाक बथैत बथैत फूलिकघोंघा जकॉ गोल भगेल रहै .. ।नहुॅ नहुॅ ओकरा उतारि कड्रेसिंग टेबुल पराखि देलकै आछोटकी नथिया निकालय लेल निहुरि कअपन अटैची खोलि रहल छल कि कान में किछु अनसोंहात . . अप्रिय . . . पटुआ सन तीत .. .लोंगिया मिर्चे सन लेसैत. . किछु कटु वचन तीर जकॉ घुसिकह्दय प्रदेश में खलबल्ली मचा देलकै . ।क्रोधक लुत्ती जेना सम्पूर्ण काया के एकेबेर प्रज्ज्वल्लित करबा लेल बेकल. . .मुदा मजबूरी . . नब अपरिचित माहौल आपितृगृह के बिछौह . . .सब एके संग मिलकमोन के उद्विग्न करि देलकै .. .आडोका सन बङका बङका ऑखि में नोर डबडबा ककाजर समेत खसबा लेल बेकल भगेल छलै. . . ।अकस्मात नहिं जानि कोन देवयोग सॅ . ओकर स्मृति पटल के गुप्त खोह में व्यतीतक किछु .. . . .अन्हार आकास में बिजुरि जकॉ चमैकि उठलै .. आक्षण मात्र लेल बाढिकपानि सन प्रलय मचबय लेल उबडूब करैत. . .ऑखिक पानि ठामेठाम ज्यों के त्यों . . . .ओहिना थिर रहि गेल रहै. ..।ठोर प आयल स्मित मुस्की सॅ. . श्यामल मुख चान सन चमैक उठलै. . . आनोरक मध्य ठाढ भगेल छल .. .कनिया पुतरा के विवाह . . ।
ओ दिन . . . .छुट्टी चलि रहल छलै गरमी के . .. दूर. . .संथाल परगना के कठोर पथरैल .. .ललका जमीन के भीजैबा लेल . ..उमङैत घुमङैत .. .कारी खरकट बादरि . . नाचि नाचि ग .े तआबै. . .मुदा बरसऽ के नाम नै लै .. .खोंझा रहल हौ जेना सूखल टटैल .. .पियासल धरती के ।मेघ तलगले रहै सदिखन . . .कत्तो भरिसक बरसल सेहो हेतैक .. .तैं. . .मद्विम .. .तेज बहैत बसात . . .खिङकी दरवज्जा के परदा के उङबैत बङ सोहनगर लागि रहल छल ।
एहने सुखगर मौसमक दुपहरिया. . . ओकर कोठरी में होमए लागल कनिया के विवाहक ब्योंत. . .।लाल मोलायम . . रबङक गुङिया सब के साबुन सॅ नहा धो कएकबार पपसारि पंखा के नीचा सुखबा लेल राखि .. लाडो . . अडोस पडोस में अपन किछु संगी सब सॅ राय मसविरा करए चलि गेल . . ।आधे पौन घंटा में तघुरि आयल छल .कोठरी में पैसिते . . .ओ दृश्य देखि ओ ततेक कैस कचिकरल छल .. .जे दोसर कोठरी में विश्राम करैत दादी जे आइये गाम सॅ आयल छलीह झटकारैत बङका बङका डेग भरैत ओकरा लग आबि ठाढ भगेलीह .. देखि हुनको कोढ कॉपि गेलन्हि . ..मुॅह पदुखक भाव के संगे कंठ सॅ च्च .. च्च’ . .निकसि गेल छलैन्ह ।कोन मे बैसल दूनू अगिलका पएर सॅ दबने .. .टॉमी .. .लाल लाल गुङिया के हब्बर हब्बर चिबा रहल छल ।हाथ पएर छिङियाबैत. . . . औल बौल भेल . . .ओकर मुॅह सॅ गुङिया झिकऽ चाहै .. .तओ लाल टरेस ऑखि केने . . .नाक हिलबैत . . .सबटा दॉत देखाक’ ‘हूॅ.ऽ्््ऽऽ्ऽ्ऽकार करैत आर बेसी डरौन बनि गुर्रेऽ्् लागै ।
हेऽ््ऽहे. . .मार बाढिनिकहैत दादी के किछुओ नहि फूरैलन्हि तबरान्डा में राखल एक टा पैना उठौलन्हि .. . आकहुना करि क ओकरा मुॅह पमारने छलैथ ।एके डंटा मे गुङिया छोङि किकियाइत कोठरी सॅ पङाऽ गेल छल ।गुङिया के तदुर्गति दुर्गति चुकाल छल. . . मोहनजोदङो के खोदाय मे बहरैल मूर्ति सन. . .अंग भंग़ . .एक टा ऑखि निपट. . . . हाथ टूटल .. .गल मे छेदे छेद .. दुनू पएर चूसल चिबैल. . . .। “‘ई गुङिया पपा कत्तो बाहर सॅ अनने छलथि. . .आब कत्त भेटतै. . .ओकरा हिचुकि हिचुकि ककानैत खीझैत देखि दादी ओकरा गरा लगाकदुलारैत पुचकारैत बजलिह ई हो कोनो कनिया छै. . बिलैति मेम .. .एकर भला लोक की वियाह करतै .. . इ तअपने विवाह करै छै आछोङै छै .। ... . तोरा हम एहेन कनिया बना देबौ. . .जे खॉटी अपन देसक’. . एकरा सॅ हजार कच्छ नीक .. कनि जे सब कहै छियौ सबटा समान जुटा दे .. देखिहैं संगी सब मुॅह बेने के बेने रहि जेतौ .. . ।
निर्दोख बालपन . . .पितामही के आश्वासन मात्र सॅ क्षण भरि में अपन अपार क्षति बिसरि पुलकैत. . .नान्हि नान्हि हाथ सॅ अपन ऑखिक नोर पोछैत . . .दू बीतक लाडो. .. . फुद्दी जकॉ उङि गेल छल .।रूइया के बङका बंडल .. .बैंडेज . ..आलमीरा में राखल पपा के पुरना मलमल के कुरता . . .लाल. उजरा. . करिया ताग सुइया .. .कैंची . ..सूखल पातर पातर लकङी आनि अपन पलंगक कात ओछाओल पटिया पराखि देने छल ।
ओकर ऑखि खूजलै . . देबाल घङी में चा.रि बाजि रहल छल. . . एत्ते काल सुति रहलौंमने मन सोचैत .. . पलंग सॅ नीचा झकलक . . . . .तीन टा सुन्नर पुतला बनि कतैयार . .. करिया रेशमी ताग सॅ डाढ धरि लटकल . .कारी कारी केश. . पैघ ..पैघ ऑख़ि उपर में तीरछा भौं .. .ठाढ नाक़ . .लाल लाल ठोर .. .।एक टा पुतरा के जुट्टी गुथैत ओ माथ उठौने छलैथ .। आकरा देखि अहं भाव सॅ मुस्कैत फेर सॅ अपन काज में लागि गेली ।दियासलाय के डिब्बा सब जे ओ रेलगाङी बनबऽ लेल रखने रहै .. .दादी ओकर बङ दीव महफा बना कओहि में नव पुरान कतरन के ओहार लगा क’ . . .मोहक बना देने छलैथ . . .डिसपोजेबल सीरिंज के एक दोसर सॅ गोंद सॅ साटि कपंखा बनाओल गेल ।
आब सुरू भेल छल असल विवाहक तैयारी .. .कनिया के कपङा लत्ता गहना गुरिया. . . .मोती के छेद में सूइया नै घूसै. . .तसोनी अपन घर सॅ फूल काढ बला पतरका सुइया अनने छलै. . .कएक टा माला गॉथल गेल. ।. .मॉ के पुरना रेशमी . .सूती नूआ फाङि कबनल नूआ. . .घागरा पगोटा लगाओल गेल. . .टीन के चॉकलेट बाला डिब्बा सब में . .गुरिया के नूआ फट्टा .. .जेवरात . कीचन सेट टी सेट .. . .. एक टा डिब्बा में लट खूट समान राखल गेल. . .छोट छोट मैटिक चुकङी के कान पछेद करि कओकरा तराजू जकॉ बना ओही में चौर दालि .. .मखान. . .चीनी . . लमनचूस. . बिस्कुट . . .भार दौरक सब समान राखि एक गोट सम्पूर्ण नब गिरहस्थी के संसार सजैबाक पयत्न कएल गेल ।
संगी .. . संघतिया सॅ भरल बुद्वकदूपहरिया में बङ धूमधाम सॅ कनिया के विवाहक आयोजन भरहल छल ।गुड्रडा अ ित प्रिय सखी जया के छलै .. ।ओ अपन गुुड्डा के सजा धजा चाह वला बङका ट्रे में लत्ता बिछा . . ओही पओकरा चीत्ते सुता क’ . . .अपन माथ नेने चारि टा बरियाती संग आबि गेल छल ।
विवाह हेतै कोना .. . . ।लाडो तअडियल घोङा बनल . . . बिनु पंडितक कत्तो विवाह होइत छै .. ।सविता जे ओतए सबसॅ बूझनूक आउमिर में पैघ . . .करीब नौ बरखक छल. . .. अपन चारि बरखक लजकोटर भाय के परतारिक पंडित बनौलक . . . .ओ अनेरे लाजे मूॅह नुकौने . . . बम. . बम.करेत कनिया बर दूनू के एक हाथ सॅ कनेरक फूल के माला पहिरौलक आदोसर हाथ .के . .मुठ्ठी बन्हने पीठ क पाछॉ रखने ।जल्दी सॅ माला पहिराक दौगि कदोसर कोन में गेल आमुठ्ठी में राखल चोरूका टॉफी अपन मुॅह में झट दनी राखि नेने छल ।
लङकी बला के भोज भात करेनाय आवश्यक छलै. . ।किएक तओहो सब पैघ लोक संग क़त्तेको विवाह क पार्टी में गेल छल तखेनाय पिनाय सएह मुख्य गप होय। ओकरे बङाय वा हिनताय ।
भोजक व्यवस्थातओ अपने दम पकरि नेने .चूकिया फोङिकअठन्नी चौवन्नी के ढेर देखि सिंघाङा .. गुलाब जामून .. आजिलेबी तमीत्तू साह के दोकान सॅ मॅगा नेने रहै. . मॉ सेहो भनसिया के कहि पूङी आखीर बनवा देने रहैथ ।घरक बङका बरामदा पदरी चादरि बिछा लाडो सबके भरि पेट. . . पत्तल पखुऔने रहै. ।. देखी त ..हम अपन गुरिया के विवाह में केहेन हिय खोलिक भोज करि रहल छी .. . .आ इ सीमा जे केन्ो रहै. . .एकए क टा बिस्कूट खुआ देने रहै. . .. . . आ इ मा ला अपन गाछक लताम कएक एक टा फॉक पकङा देने रहै ।
खा पीब कसब गोटे गीत नादक कार्यक्रम में जूटल. . .चलनी के चालल दूल्हा अंखियो नै खोले है. .सॅ सुरू होइत बाबूल की दुआए लेती जाऽऽ््।प समाप्त भेलोपरांत कनिया के घघरा बदलि नबका नूआ पहिरा कबङका टा के घोघ तानि मोङ माङि ओही महॅफा में बैसाबऽ के कोरसीस करै .. तकखनो कनिया के माथ बाहर भजाए तकखनो पएर । .. . .हारिकमहफा के ऊपर कनिया के सूताकलाल डोरी सॅ बॉधि कविदा कराओल गेल ।पलंगक दोसर कोन में बिछल ललका दरी जया के अस्थाई बासा बनल .. . कनिया ओहि ठाम पहुॅचली ।
विदाइ के पछैति थाकि कचूर भेल सब कियो लूडो खेलय में लागि गेल छल. . .सविता के छोटका भाय सेहो ।

तेसर दिन जया आयल छल मूॅह बनौने . . दस ठाम सॅ नाक भौं कोंचियाति ई की. . . .हमर गुड्डा के ततू ठकि लेलही. . . नै औंठी . . नै .. गरा में चैन .. ।” .. लाडो त बकलेल जकॉ ओकर मुॅह ताकितै रहि गेलै. . ।ओ तअहि में ऐंठल छल जे एतेक खरीच करि कशान सॅ . . .अपन कनिया के विवाह केन्ो छल. .. . . एहेन भव्य समारोह तओही परोपट्टा में कियो नहिं केन्ो छल । ओकर मूङी मित्र मंडली में खूब उॅच भ गेल रहै ।अकस्मात इ आरोप सुनि मूहें भरे खसल इहो सब होय छै विवाह में . . .पहिने किएक नै बजलैं .. हम ओरियान करितौं।’ “हमरो कत्त बूझल छल. . .आय हमर नानी आयल छथि. . ओ कहलैन्ह .. लङका .के दान दहेज देल जाए छै. . .गुड्डा हमर एत्तेक नीक . . नै एको टा कपङा देलही नै बरतन जात. . ।केहेन विवाह गरीबहा जकॉ. . ।
ओकरा गेलोपरांत ओ गुमसुम बाहर कुरसी पबैसल रहै. . ।सांझ नहूॅ नहॅू भरियाय लगलै. . .।एना उदास. . .उदास देखि कंपाउंड में टहलैत दादी. . ओकरा लग आबि पूछलथि तओ अपन मोनक सबटा व्यथा उङिल देलकै. .।दादी बजली हे. . . लैह. . ओ कोठा सोफा बला बरक माए. . .ओ कत्त देलकौ तोहर कनिया के गहना गुरिया. . .नै नथिया नै टीका .. .नै नूआ .. नै लहठी. . एहनो कत्तो विवाह होय छै ..सासुरो सॅ भार दोर आबै छै .. .तौं तएत्तेक सामान देबे केलही .. .. . ओना तसासुर में राजा के बेटी के सेहो दूषै छै लोक़ . .जे हाथी तदेलथि मुदा ओकरा बान्हय लेल कङी तदेबै नहि केलथि ।मुदा ओकर कोन मूॅह छै दूसब के
इ सुनैत मातर लाडो के संपूर्ण शरीर में जेना सौसे ललका पिपरी लुधैक गेल होय . . . दौगल जया के घर ।

जया अपन कोठरी मे टांग पसारने बैसल कनिया पुतरा के पेटार खोलने असार पसार करैत . .चीज वोस्त सरिया ब्ऽ मे व्यस्त छल ।लाडो एकदम सॅ ननस्टॉप रेर्काड जकॉ सुरू गेलैहमर तपच्चीस टाका खरच भचुकल अछि. . तोहर कत्तेक पाय खर्च भेलौ. . .चुकिया हम्मर फुटल की तोहर . . ।अहि उकटा पैंची मे गप ततेक बढि गेलय जे जया गुङिया के क कैस कबजारि देलकै .. ले ल जो अपन गुङिया केआ तामसे किटकिटाकओकर हाथ मे अपन बीसो दॉत गङा देलकै. . ।लाडो दर्द सॅ बिलबिला उठल .. .हाथ छोङबैत ओ ओकर गुड्डा के अपन पएरक नीचा लतमर्दन करैत ओकर मुकुट .. .तोङि देलकै. . मुॅह पिचका देलकै. .एहने बर .. नै हाथ . .नै पएर ..कहैत. . तामसे आन्हर होइत. . जया के झोंट खींच कचारि मुक्का पीठ पमारैत. . लंक लगा कओत्त सॅ पङाऽ गेल छल ।
अहि घटना के उपरांत तदूनू मे तेहेन तनातनी जे एक दोसर के शोणित पीबए लेल उद्वत. .।नेना भुटका मे दू फॉङ भगेल रहै. .।किछु दूनू पख के धेने .. .नारदक कार्य संपन्न करबा मे लागल । ओही दिन मेघ बरसि गेल रहै . . .चारो कातक जमीन भीजल. त्त्. .. . . .जलखई करिकधिया पुत्ता के झूंड़ .. . . . पडोस मे .. . पछिला हफ्ता ट्रक सॅ . .उझिलल बौलक ढेर पर उछलम खूद करै .. पहुॅचल । . . .केकरो घर बनैत रहै. . कल्हुका बारीश सॅ बौल भींजल .. .ओकरा खोदि खोदिक ओही मे अपन पएर राखि घर बनाबए मे असीम उत्साह आ ऊर्जा सॅ जूटल छल . . कि तखने कोनो अगत्ती आबिक लाडो के कहलकै.हौआ अपन गाछक नीचा बनल चबूतरा पबैसल जया तोरा देखि कमुॅह बिचकाबै छौ. . आकिदुन किदुन बाजि ओहि चारू छौंङी सब संगे खूब ठहक्का मारै छौ. . ।ओकरा जेना बिरनी काटि लेलकै. . .अपन पएर पथोपल बालू के एक झटका मे फेंकैत ओ दौगल चबूतरा दिस .. . ।ओकरा पाछॉ आन धिया पुत्ता सेहो अपन अपन महल के धराशायी करैत. . .तूफान मेल बनल पहुॅचल
दुनू पाटी घरक पाछॉ वला इनरक कात के बङका चबूतरा प घों घें करैत फॉङ बन्हने .. .।इ वाक् युद्व. . .मल्ल युद्व में परिणत होमए लेल बेकल ।तखन दूनू .. क्रिकेट खेलैत अपन अपन छोट भायक हाथ सॅ बैट छीन नेने रहै. . .।धोबिनिया जे संजोगे सॅ कपङा नेने उम्हरसॅ आबैत रहै .. . .. दौगल लाडो के घर. . .चपरासी दौङा कओकरा पङबाक आनल गेल ।एतेक गरमागरमी देखि क मतारी सब अपन अपन वीर बॉकुङा के खूब थपङियेने रहैथ ।. . .सब कियो छगुन्ता मे डूबल . . . नेना भुटका के संसार मे कोना एतेक कडुआहठ भरि गेलय ।
तेकरा बाद तकनिया पुतरा के विवाहे बन्न ।सबहक घर सॅ इ आदेश खेलबैं तखेल . . मुदा विवाहदान किन्नौह नहि. . . ।
ओ त हॉस्टल चलि गेल छल चौदह बरखक बनवास मे . ।ओत्त सॅ पपाके ट्रन्सफर भेला के बाद खिस्से खतम .. इ मस्तिष्कक कोन गव्हर सॅ निकैल ओकर स्मृति पटल पचान सन चमैक उठले सेनहि जानि ।ओ तुच्छ सन बेकार खेल वास्तव मे असल जीनग्ी के खेल छल .. . जतए उत्साह उमंग आउल्लासक मध्य बङका काज प्रारंभ करैत लोक छोटका छोटका चीज मे उलझि अपन जीनगी नर्क बना लैत अछि । विदाइ के काल मॉ के बोल कान मे घुरय लगलै. . नैहर खूजल. . पढल किताब. . सब किछु स्पष्ट .. मुदा सासुर ..नब अपरिचित पोथी. . गुढ रहस्य सॅ भरल. . कत्तेको बरख लागै छै बॉचबा में . . किछु मगज मे घूसै छै .. मुदा सदिखन विवेक सॅ काज लेबए के पाठ पढबैत .. ।
ड्राइंग रूम सॅ एखनो धरि व्यंग .. आक्रोश सॅ भरल अचटि कुचटि कस्वर आबि रहल छलमोहनजी तगोनू झा के बाप निकलला .. जहिना कहलियैन्ह दू टा वस्त्र में कनिया चाही तहिना दू टा वस्त्र में पठा देलन्हि ।बङका पाग बला लोक ..’ ‘इजे छहौर महौर केलथि . . गाङी देलथि . .से तबेटिये के कमाए हेतैै न .. .एतेक दिन सॅ कमा रहल छै ’ ‘एहेन कंगाल कुटुम .. . कहु तवरक माय के एकटा डायमंडके सेट धरि नै देलकै ।कत्त फॅसा देलथि बज्रभूषण बाबू हमर बेटा के .. ।. जटाधारी बाबू केहेन नीक कथा देने छलैथ. . .इनकम टैक्स कमीश्नरक एकलौती संतान .. कतेक मकान . . .क तैक फारम हाउस. . .मुदा जो रे कपार. . ।
लाडो कऑखि मे थीर नोर भरभरा कखसय लगलै .. .मनुक्ख एसगरे बिन पैलवार के रहि नहि सकैत अछि .. .क़तबो पैर पठाढ . . भजाए .. .प्रगति के . . संपत्ति के सर्वोच्च शिखर पठाढ भजाए .. . .एकरा संग वा ओकरा संग .. .केकरो नै केकरो संग तचाहबै करी .. ।
संयम त्याग आबुद्वि के बल पपैलवार चलै छै. . ।अही अतकही बतकही में नहिं फॅसिकनब जीनगी के नीक जकॉ कोना जीबी तेकर सुरूआत करबाक चाही ।आखिर पढल गुनल अपन पएर पठाढ के मतलब की ।तोङनाय तएक क्षणक काज छै .. बना कराखब मे नकाबिलती ।व्यवहार सॅ अपन बनबय पङतै सबके ।घरक चारदीवारी सॅ बाहर . . . आफिसमे. . . कत्तेको तरहक गप सुनबाक . . सहबा के पङै छै. .. जौं घरे में सहि ली तअनर्थ की .. ।हॅ .. जखन जान पङि जायत तखन तसोचले जेतै .. ।अनेको तरहक सद विचार सॅ मन हल्लुक भ गेलै. . ।ऑखिक नोर पोछि लाडो कान मे इयर फोन लगा आइ पौड पगीत सुनए लागल छल ।
२.

बिपिन झा
किछु पजरैत प्रश्न
महात्मा कसाब केँ फाँसी सजा के घोषणा कऽ पश्चात मीडिया में जनसामान्य, बुद्धजीवी, सरकार सभक प्रतिक्रिया सूनि मन में हसी छटल। केयो श्रीमान एकराआतंकवाद पर गम्भीर प्रहार घोषित करै छलखिन्ह त केयो एकरा भारतीय सुरक्षा एजेंसी, भारतीय न्यायपालिका सभक विजय कहलथि मुदा अगर ई घटना केँ निष्पक्ष मूल्यांकन करीए त कतेक प्रश्न मन मे उठैत अछि।
ई चिन्तनीय प्रश्न अछि जे राष्ट्रीय-सुरक्षा- अखणडता पर की पर की सामान्य नीति हेबाक चाही ?  एहि सम्बन्धित कमजोर  राजनैतिक इच्छाशक्ति देखि जनसामान्य में कोनो प्रतिक्रिया कियान होइत अछि? राष्ट्रीय सुरक्षा विषयपर न्यायिक-प्राशासनिक-राजनैतिक शिथिलता-लापरवाहीअ कि अक्षम्य अपराधनहि अछि? आखिर ई अफजल-कसाब आदि स्वनामधन्य महात्मा के फाँसी सजा कहियातक क्रियान्वयित हेतन्हि?
ई अनुभव होइत अछि जे राष्ट्रक आत्मा कतौ हेरा गेलई राष्ट्रीय संवेदना कतौ सुसुप्त अवस्था में बैसल छै राष्ट्र कऽ रोइओप में भारत असफल भय गेल !
भय सकैत अछि जे ई तमाम उलझन निर्मूल मात्र साबित होई भविष्य में मुदा चिन्तन त अनिवार्य अछि नै? ई सत्युअ आ यथार्थ छी जे भारत बहुत शक्तिशाली अछि आ ई मोट झंझावातक सामना आसानी से कय सकैत अछि मुदा मात्र ई चीज रटि कें वर्तमान समस्या आ लापरवाही सँमूह नहि मोडि सकैत अछि।

अपन देशक राजनैतिक स्वरूप अनेक विकृति सँ आप्लावित अछि एतदर्थ एकाएक सुधार सम्भव नहिं मुदा बुद्धिजीवी जनसामान्य अपन लोकतान्तिक समाज में एते सशक्त  अछि जे ई कोनो परिवर्तन बड आसानी सँ आनि सकैत अछि।

समस्या अनन्त अछि राष्ट्रक समक्ष ! आब सभ व्यक्ति सबटा समस्या स परिचित छथि एतदर्थ आवश्युकता एहि कार्यक अछि जे एकटा सामान्य राष्ट्रीय जनचेतना जागृत होमय आ ई भ समस्या के समाधान हेतु अपन योगदान दथि।


ई बात स्मरणीय अछि जी बुद्धिजीवी समाज राष्ट्रक आधार स्तम्भ अछि अतः ओ नेतृत्व प्रशासन तन्त्र पर ओई तरहक हरसम्भव दबाब वनावथि जे राष्टीय सुरक्षा, विकास, प्रगति स सम्बन्धित सभटा लक्ष्य पूर्ण करि सकथि

ई विश्वास दृढ अछि जे भारत राष्ट्र अपन ऐतिहासिक यात्रा मे अनेक प्रश्नक उत्तर देलक। वर्तमान सम्मुख अछि आबि राष्ट्र कऽ एकटा व्यष्टि अंग रूप में अपनयोगदान दय अपन दायित्वक निर्वहण करी॥

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...