Wednesday, July 14, 2010

'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१)-PART III



डा. शंकरदेवझा
मिथिलाक विस्मृत राजधनी देवकुली


       मध्यकालमे मिथिलामे बहुतो नगरक स्थापना भेल तँ बहुतो नगर विभिन्न कारणसँ उजड़ैत चल गेल । तथापि एहि नगर सभक ध्वंशावशेष आइयो मिथिलाक ताहि दिनुक समृ(कि गौरव-गाथाक गान क रहल अछि । ओइनिवार राजवंशक शासन कालमे एहि वंशक राजा लोकनि अपन अन्य कतोक महत्त्वपूर्ण कार्य ओ उपलब्ध्कि संग-संग कतेको नगरहुक स्थापना कयलनि । प्रशासनिक दृष्टिकोण ओ सुरक्षाके ँ ध्यानमे राखि क एहि वंशक राजा लोकनिक बसाओल अनेकशः नगर आइयो अवशिष्ट रूपमे वर्त्तमान अछि । एही कोटिक एकटा प्राचीन नगर अछिµ देकुली । ई देकुली दरभंगा जिला मुखयालय लहेरियासरायसँ मुश्किलसँ तीन-चारि किलोमीटर दच्छिन-पूब दिसामे लहेरियासराय-हथौड़ी सड़कक पूबमे स्थित अछि । ¯कवदन्ती ओ पुरातात्त्विक महत्त्वक वस्तुसँ युक्त ई गाम कहियो मिथिलाक राजधनी छल जकर स्थापना ओइनिवार वंशीय नरेश देवसिंह तेरहम-चौदहम शताब्दीक संगम कालमे कयने छलाह ।
       ओइनिवार राजवंशक पूर्व राजधनी ओइनीमे छल । मुदा ओइनिवार वंशमे अपनामे मिथिला राज्यक बँटवारा दू भागमे भेलाक कारणे राजधनी ओइनीमे दूनू शाखाक एके संगे रहब सम्भव नहि रहि गेल ते ँ ओइनिवार वंशक संस्थापक कामेश्वरठाकुरक जेठ पुत्रा भोगीश्वरक राजधनी ओइनियेमे रहलनि । मुदा दोसर पुत्रा भवेश्वर प्रसि( भवसिंह अपन राजधानी दरभंगासँ दच्छिन बागमती नदीक तटपर स्थिर कयलनि ।१ भवसिंहक पुत्रा ओ हुनक उत्तराधिकारी देवसिंह जखन राजा भेलाह तखन ओ अपन राजधानी एहि ठामसँ किछु पूब हटि क बसौलनि जकर नामकरण ओ देवकुली कयलनि ।२ देवसिंहके ँ अपन पितासँ उत्तराध्किारमे समस्त मिथिला राज्य प्राप्त भेलनि । किएक तँ ओइनी स्थित भोगीश्वरक पौत्रा राजा कीर्त्तिसिंह निःसन्तान भेलथिन । अतः हुनको हिंस्साक राज्य भवसिंहके ँ भेटलनि । अतएव देवसिंहके ँ समग्र मिथिलाक शासनसूत्रा सम्हारबाक सौभाग्य प्राप्त भेलनि । देवसिंहक विरुद 'गरुड़नारायण' छलनि ।३ देवसिंह सम्भवतः देवकुली राजधनीक अतिरिक्तो अपना नामपर तीन गोट औरो देवकुली नामसँ उपनगरी बसौलनि । बिरौल प्रखंड अन्तर्गत बहेड़ी-सिंघिया मुखयपथपर एकटा हाँसी देकुली अछि जे 'धम' नामसँ प्रसि( अछि ।४ ध्यातव्य अछि जे देवसिंहक पत्नीक नाम हाँसिनी वा हंसिनी छलनि । हाँसी विशेषण वस्तुतः हुनके नामक कारणे अछि । दोसर, दरभंगा-बहेड़ा मुखयपथमे दच्छिन दिस कमला नदीक पश्चिमी तटपर अवस्थित अछि से सम्प्रति देकुली चट्‌टी नामसँ खयात अछि ।५ तेसर देकुली सीतामढ़ी जिलामे अवस्थित अछि जत भुवनेश्वरनाथ महादेवक प्राचीन मन्दिर छनि । एकर अतिरिक्त एत एकटा प्राचीन गढ़ीक अवशेष अछि जकरा सम्बन्ध्मे किंवदन्ती छैक जे ई महाभारतकालीन राजा द्रुपदक गढ़ थिकनि ।६ अस्तु मिथिलामे देकुली नामक एखन ध्रि जे कोनो स्थान दृष्टिपथपर आयल अछि ताहिठाम प्राचीन नगर, भवन, मन्दिर आदिक प्रचुर अवशेष विद्यमान अछि । उनैसम शताब्दीक उत्तरार्(मे लिखित आइना-ए-तिरहुतमे सेहो तीन गोट देकुलीक उल्लेख भेल अछि जकर प्रसि(ि शिवतीर्थस्थानक रूपमे कहल गेलैक अछि । एहि पोथीक अनुसार एकटा देकुली, विवरा परगनामे अछि जाहिठाम एकटा महादेवक मन्दिर अछि । दोसर देकुली, परगना जखलपुरक अन्तर्गत अछि जाहिठाम द्रव्येश्वरनाथ महादेवक मन्दिर छलनि जे ध्वस्त भ गेल छल । तथापि मन्दिरक खंडहर विद्यमाने छलैक । लेखकक अनुसारे ँ एहि मन्दिरक चौखटिमे एकटा अभिलेख उत्कीर्ण छल जाहिमे एकर निर्माताक नाम सुखदेव साहु अंकित छल संगहि एकर निर्माता द्वारा तेरह बीघा जमीन शिवोत्तरक रूपमे मौजा पिपरामे देल जयबाक सूचना सेहो अंकित छल । आइना-ए-तिरहुतक अनुसार तेसर देकुलीक अवस्थिति परगना-बसारामे छैक जाहि ठाम वृ( वाणेश्वर महादेवक मन्दिर छनि । लेखकक अनुसार वाचस्पतिमिश्र नामक एकटा मैथिल ब्राह्मणक भाय भालिवाणमिश्र एहि महादेवक स्थापना कयने रहथि । हुनका अनुसारे ँ मन्दिर चारि सय वर्ष पुरान अछि । संक्रान्तिक अवसरपर एत बड़ पैघ मेला लगैत छैक ।७
       आइना-ए-तिरहुतमे देल गेल उपर्युक्त तीनू देकुलीमे दूटा देकुली कोन अछि से अनुसन्धनक विषय थिक, मुदा तेसर देकुली जाहिठाम वृ( वाणेश्वर महादेव स्थान होयबाक उल्लेख भेल अछि से सम्भवतः आलोच्य देकुलीसँ
सन्दर्भित लगैत अछि । यद्यपि एकर लेखकके ँ महादेवक नाम ओ परगना आदिक सम्बन्ध्मे पूर्ण सूचना नहि भेटि सकलनि ते ँ भ्रमवश एकर परिचय देबामे गलती भेलनि । किएक तँ एहू देकुलीक प्रसि(ि एकटा शिवतीर्थक रूपमे अछि । एहि ठाम अभिनव वर्(मान उपाध्याय द्वारा स्थापित एकटा शिवलिंग अछि जे हुनकहि नामपर वर्(मानेश्वर स्थानक नामसँ खयात अछि । सम्भवतः एकरे आइना-ए-तिरहुतमे वृ( वाणेश्वर कहि देल गेल अछि ।
       दरभंगा जिलामे परगना पूरब भीगोक अन्तर्गत मौजा ओ गाम दुहू नामसँ देकुली अछि जकर रकबा ५२५ बीघाक कहल जाइत छैक । ब्राह्मण सहित विभिन्न जातिक लगभग छओ हजार आबादीवला ई गाम कतेक प्राचीन अछि से देखलहिसँ ज्ञात होइत अछि । लहेरियासराय-बहेड़ी सड़कक पूब दिस अवस्थित एहि गाममे प्रवेश करितहिँ प्रतीत होअ लगैत अछि जे कोनो प्राचीन नगरमे प्रवेश क रहल होइ । सम्पूर्ण गाम कोनो पुरान डीहपर अवस्थित बुझाइत अछि । गाममे देकुलीक प्राचीनता ओ ओइनिवार राजवंशकालीन घटनासँ सम्ब( कतोक ¯कवदन्ती सब प्रचलित अछि जकर सम्पुष्टि गाममे यत्रा-तत्रा छिड़िआयल प्राचीन राजचिर् ओ पुरावशेष सबसँ होइत अछि ।
       देकुली ओइनिवार वंशक राजधनी छल जकरा देवसिंह बसौने रहथि एहि बातक समर्थन मिथिला इतिहासक आद्य संग्राहक चन्दाझा ;१८३१-१९०७द्ध८, म.म. परमेश्वरझा ;१८५६-१९२४द्ध९, म.म. मुकुन्दझा बखशी ;१८६९-१९०७द्ध१०, रायबहादुर श्यामनारायणसिंह११, पी.सी. रायचौध्ुरी१२, डा. उपेन्द्रठाकुर१३ प्रभृति इतिहासकारलोकनि कयलनि अछि । स्वभावतः ई जिज्ञासा भ सकैत अछि जे राजधनीक हेतु देवसिंह एहि परिसरक चुनाव किएक कयलनि । एहि जिज्ञासाक उत्तर एहि परिसरक भौगोलिक बनाबट दैत अछि । पूर्वमे एहि गामक उत्तर, पच्छिम ओ दच्छिन होइत एकटा नदी बहैत छल जकरा सम्प्रतिमे कृष्णमंगला कहल जाइत छैक । एहि नामक नदीक सम्भवतः एखन ध्रि कतहु उल्लेख नहि भेटैत अछि । नदी आब मृत भ चुकल अछि, मुदा एकर सिरखार एखनहुँ विद्यमाने छैक । ई नदी एहि परिसरके ँ तीन दिससँ प्रायद्वीप जकाँ घेरने छैक । सम्भवतः ई नदी बागमतीक पुरान धर छल जकर चिर् लहेरियासराय शहरमे एखनहुँ छैके जे कबिलपुर ओ डरहार होइत आगाँ जा क दच्छिन मुहे ँ घुमि गेल आ ओहिठामसँ देकुलीक सीमामे पहूँचि पुनः पच्छिम दिस घुमैत आगू जाय दच्छिन-पूब मुँहे घुमैत कमलामे जा क मिलि जाइत अछि । देवकुली नगरक सुरक्षाक लेल एहि नदीक उपयोगिता ओ नदी तटवर्त्ती परिसर देखिए क देवसिंह एकरा राजधनी बनौने होयताह । ओना देकुलीसँ पूब एकटा प्राचीन स्थान अछि जे सकरी डीहक नामसँ जानल जाइत अछि । झिटुका, ईंट आदिसँ भरल एहि डीहक सम्बन्ध्मे कहल जाइछ जे ई ओइनिवारसँ पूर्व मिथिलापर शासन कयनिहार कर्णाटवंशीय राजा शक्तिसिंह ¯कबा शक्रसिंहक डीह छलनि । तात्पर्य यैह जे देकुली परिसर पूर्वहिसँ निवास स्थानक योग्य बुझल जाइत रहल अछि । देकुलीक उत्तरमे कृष्णमंगला नदीक कछेड़पर एकटा ऊँचगर डीह सन जमीन अछि जकरा स्थानीय लोक नरेना बाध् कहैत छैक । ई नरेना शब्द कदाचित्‌ ओइनिवारवंशीय राजा लोकनिक विरुद नारायणक विकृत रूप हो तँ कोनो आश्चर्य नहि । नरेना पर सघन खड़होरि अछि ।
       गामक लोकक कहब छनि जे देकुलीमे जे मुखय डीह अछि ताहिमेसँ अनेक बेर पाथरक जाँत, उक्खरि आदि बहरायल । पुरान ईंटक देवालक अवशेष सभ छल जकरा लोक नष्ट क देलक । डीहक एकटा अंशके ँ हथिसार कहल जाइत अछि । गाममे कतोक प्रस्तर स्तम्भ खण्ड सब यत्रा-तत्रा पड़ल अछि । सम्भवतः एकर उपयोग भवन निर्माणमे कयल गेल होयत । गामक उत्तरपूर्व अर्थात्‌ ईशान कोणमे जे प्राचीन वर्(मानेश्वर स्थान अछि ताहिमे दूटा कारी रंगक शिल्पित खण्डित प्रस्तर स्तम्भ पड़ल अछि । एकटा एहने तरासल, खत बनायल प्रस्तर खण्ड रामललाझा अधिवक्ताक बारीमे आ दोसर पूर्व मुखिया राजाबलीझाक घरमे बन्द राखल अछि । गाममे कमसँ कम सातटा पोखरि अछि जाहिमे सबसँ पुरान ओ गहींर पोखरि गामक दच्छिनमे अछि जकरा पतोरिया पोखरि कहल जाइत छैक । गामक लोकक अनुसार एहि पोखरिमे एक बेर पानि कम भेला उत्तर एकटा विशाल शिलाखंड देखल गेल छलैक जकरा कतबो प्रयास कयलोपर बहार नहि कयल जा सकल । पहिने एहि पोखरिक मोहार ततेक ऊँच छलैक जे नीचाँसँ पोखरि नहि देखाइत छलैक । वर्त्तमानमे मोहारक माटि काटि क हटा देल गेलैक अछि । ¯कवदन्ती अछि जे देकुली डीह नामसँ बीच गाममे जे स्थान खयात अछि ओत पहिने राजभवन छलैक आ राजभवनसँ पतोरिया पोखरि ध्रि एकटा सुरंग बनल छल । राजपरिवारक महिला लोकनि ओही सुरंग होइत पोखरिमे स्नान करबाक हेतु अबैत छलीह ।
       निश्चित रूपसँ देकुलीमे प्राचीनताक बहुतो चिर् विद्यमान अछि । देवसिंहक राजधनी होयबाक कारणे ई मानल जयबाक चाही जे एही नगरमे ओ स्वर्णतुला महादान ओ गजरथ महादान सन प्रसि( अनुष्ठानक आयोजन कयने होयताह ।१४ ईहो मानल जयबाक चाही जे शिवसिंहक राज्यारोहण एही नगरीमे भेल होयतनि । संगहि ईहो कहबामे तारतम्य नहि जे महाकवि विद्यापतिक चरण एहि नगरीमे पड़ले होयतनि । एहि नगरीमे रहि विद्यापति अपन कोमलकान्त पदावलीक बहुतो अंशक रचना कयने होयताह । शिवसिंहसँ पहिने देवसिंहक आश्रयमे रहल विद्यापति अपन कतोक पदमे देवसिंहहुक नाम लेने छथि । प्रमाणस्वरूप देखल जा सकैत अछि विद्यापतिक किछु पदक भनिता अंशµ
भने कवि विद्यापति,
अरे वर जउवति
मध्ुकरे पाउलि मालति पुफलली
हासिनि देवि पति
देवसिंह नरपति
गरुड नरा×ोन रघर्ैें भुलली ॥१५
विद्यापति भूपरिक्रमा नामक ग्रन्थ देवसिंहहिक आगासँ लिखने छलाह ।१६ देवसिंहक राजत्वकालक समयमे तिरहुतपर दिल्ली ओ बंगालक मुसलमान शासक द्वारा संयुक्त रूपसँ हमला कयल गेल छल । एहि यु(क नेतृत्व शिवसिंह कयने रहथि, से विवरण विद्यापति रचित कीर्त्तिपताकासँ प्राप्त होएत अछि । एहि आकमर्णसँ देकुली राजधनी पर कोन तरहक प्रभाव पड़ल ¯कवा ई यु( कत लड़ल गेल से सूचना नहि भेटैत अछि । मुदा ओ यु( कतेक भीषण छथि ओ देवसिंहक सैन्य शक्ति कतेक सबल ओ संगठित छलनि तकर विस्तृत वर्णन कीर्त्तिपताकामे भेल अछि ।१७ कीर्त्तिपताकामे पक्ष-विपक्षक कुल एकासी गोट ऐतिहासिक व्यक्तिक नामोल्लेख भेल अछि । जाहिसँ समकालीन राजनीतिमे ओइनिवार राजवंशक पराक्रम ओ ओकर राजनधनी देवकुलीक गरिमापर प्रकाश पड़ैत अछि । संगहि ओहि यु(मे तिरहुतक विजय भेल छल । ओ दिल्ली तथा बंगालक सेना अपन समस्त शक्ति गमा पीठ देखा मैदानसँ भागि गेल छल । अपना समयमे अपराजेय बूझल जायवला दिल्लीक सुल्तान ओ ओकर सहयोगी बंगालक शासक अपमानजनक पराजय एकटा आश्चर्यजनक घटनाक रूपमे इतिहासक पृष्ठमे अंकित भ गेल । विद्वालपतिक पुरुष परीक्षाक अन्तमे तथा विद्यापतिके ँ देल गेल विस्पफी ताम्रपत्रामे गजनी ओ गौड़ ;बंगालद्धक शासकके ँ परास्त कयनिहार विजेताक रूपमे शिवसिंहक प्रशस्ति कयल गेल अछि ।१८ निश्चित रूपसँ एहि ऐतिहासिक तथ्य सबसँ जानल जा सकैछ जे अपना समयमे मिथिलाक राजधनी देवकुली कतेक उतार-चढ़ावके ँ देखलक, कतेक घटनाक ओ साक्षी बनल ।
       देकुलीक ऐतिहासिक महत्त्व तँ अछिहे संगहि एकर महत्त्व धर्मिक दृष्टिएँ सेहो अछि । तकर कारण अछि एहि गामक उत्तर-पूर्वमे अवस्थित प्रसि( वर्(मानेश्वर स्थान । गामक लोकमे ¯कवदन्ती प्रचलित अछि जे ई वर्(मानेश्वर महादेव अंकुरित शिवलिंग थिकाह । ओइनिवार राजवंशक आश्रित एकटा वर्(मान नामक राजपंडितके ँ एहि शिवलिंगक दर्शन भेलनि । ते ँ हुनके नामपर एकर वर्(मानेश्वर नामकरण भेल ।
       के छलाह ई वर्(मान ? ई जिज्ञासा स्वाभाविक रूपसँ होइत अछि । मिथिलामे दूटा वर्(मान भेल छथि । पहिल जनिका वृ( वर्(मान कहल जाइत छनि से सरिसबे छाजन मूलक गंगेश उपाध्यायक पुत्रा ओ प्रसि( नैयायिक रहथि । हिनक स्थिति काल तेरहम शताब्दी मानल जाइत छनि ।१९ दोसर वर्(मान उपाध्याय छलाह बेलौ ँचय मूलक ब्राह्मण जनिक पिताक नाम भवेश ओ माताक नाम गौरी छलनि । र्ध्मशास्त्राक पंडित एहि वर्(मानक विशेषण अभिनव छनि ।२० अभिनव वर्(मान र्ध्मशास्त्रा विषयक अनेक ग्रन्थक रचना कयलनि जाहिमे गंगाकृत्य विवेक, गया प(ति, दण्ड विवेक, द्वैत विवेक, परिभाषा विवेक, श्रा( प्रदीप, स्मृति तत्वामृत अथवा स्मृति तत्त्व विवेक, स्मृति तत्त्वामृत सारो(ार, स्मृति परिभाषा, जलाशयादि वस्तुविध्ि इत्यादि प्रसि( छनि ।२१ अभिनव वर्(मान विद्यापतिये जकाँ दीर्घजीवी भेलाह । ओइनिवार वंशक राजादेवसिंहसँ लक भैरवसिंह पर्यन्त ध्रि ई र्ध्माध्किरणिक ;न्यायाध्किारीद्ध पदके ँ सुशोभित कयलनि ।२२ यैह अभिनव वर्(मान उपाध्याय राजधानीक रूपमे देवकुली नगरी बसलाक बाद वर्(मानेश्वर महादेवक स्थापना कयलनि । सम्भव थिक जे वर्(मान एही देवकुली राजधनीमे रहि अपन धर्मशास्त्रा विषयक कतोक ग्रन्थक रचना कयने होथि । एहि वर्(मानक खुनाओल एकटा पोखरि नारी-भदौन गाममे एखनहुँ विद्यमान अछि । मठियाही नामसँ प्रसि( एहि पोखरिक पनिझाओ तेरह बीघामे छल । पोखरिक संग वर्(मान एकटा विष्णुक मन्दिर सेहो बनबौलनि जे कालान्तरमे ध्वस्त भ गेल ।२३ ओहि मन्दिरक एकटा प्रस्तर स्तम्भ पूर्वमे हाटी कोठीमे राखल छल जकरा पछाति उठा क लक्ष्मीश्वर सिंह संग्रहालय, दरभंगामे आनि क राखल गेलैक । एहि स्तम्भमे तिरहुतामे दू पाँतीमे एकटा अभिलेख उत्कीर्ण अछिµ
जातो वंशे विल्वप×चाभिधने धर्म्माध्यक्षो वर्(मानो भवेशात्‌
देवस्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रारूढ़ं कृत्या स्थापयद्वैनतेयम्‌
       पन्द्रहम शताब्दीमे मिथिलाक राजधनी देवकुलीमे स्थापित वर्(मानेश्वर महादेवक मन्दिर कोन रूपक बनल छल होयतनि तकर कोनो प्रमाण नहि अछि । मुदा उनैसम-बीसम शताब्दीक सन्ध्किालमे देकुली ओ वर्(मानेश्वर स्थानक स्थिति कोन तरहक छल तकर विवरण म.म. परमेश्वरझा निम्नरूपक देने छथिµ देवसिंह अपना समयमे...दड़िभंगा कोटसँ दक्षिण एक कोशसँ किच्छु उपर देवकुली ;देकुलीद्ध नामक राजधनी बसौलन्हि ओहिठाम एखन पर्यन्त अत्यन्त उच्च डीह अछि जाहिपर साध्रण बस्ती सम्प्रति बसल अछि ओह बस्तीक ईशानकोण स्थानमे स्मार्त्त निबन्ध्कर्त्ता र्ध्माध्किारी अभिनव वर्(मान उपाध्यायक स्थापित महादेव 'वर्(मानेश्वर' नामक छथि हुनक मन्दिरमे प्राचीन समयक जे एक-दुइटा पाथरक खण्ड पड़ल अछि से देखैक योग्य अछि यद्यपि प्राचीन मन्दिर तँ भग्न भय गेल परन्तु अपरपर केओ धर्मिक ओकर जीर्णो(ार करौलन्हि अछि एहि स्थानमे मकर शिवरात्रिामे मेला होइत अछि ।२४
       परमेश्वरझा मन्दिरक जे विवरण देलनि अछि से मन्दिर आब नहि अछि । तिरहुत स्थापत्य शैलीमे गुम्बदाकार गर्भगृह ओ गजपीठाकार बरामदावला मन्दिर १९८८क भूकम्पमे क्षतिग्रस्त भ गेल । पश्चात्‌ ओहि मन्दिरके ँ तोड़ि ओहि स्थानपर वर्त्तमानमे नवीन मन्दिर बनाओल गेल अछि जे १२८ पफीट ऊँच अछि तथापि ओहिमे स्थापत्यक ने तँ कोनो चमत्कारे अछि आ ने देशज शिल्प आ सौन्दर्ये । जेना परमेश्वरझा अपन विवरणमे एहि मन्दिरमे एक-दूटा पाथरक खण्ड राखल होयब लिखलनि अछि से औखन पर्यन्त मन्दिरमे विद्यमान अछि । एकटा शिल्पित पाथर खण्ड मन्दिरक भीतरमे अछि जकर पूजा कयल जाइत अछि । दोसर एकटा नमहर स्तम्भ खण्ड मन्दिरक पूब दिस परिक्रमामे राखल अछि । मन्दिरमे मध्यमे जलढरी सहित कारी पाथरक एकटा शिवलिंग स्थापित अछि जे पफर्शसँ लगभग डेढ़ पफीट नीचाँ कुण्डमे अछि । शिवलिंगक शीर्ष भाग खण्डित अछि । बुझना जाइत अछि जे एहिपर कहियो  कोनो धरदार अश्त्रासँ प्रहार क एकरा विकृत क देल गेल हो । मन्दिरमे दू गोट औरो शिवलिंग बिना जलढरीक स्थपित अछि जे रंग ओ आकार-प्रकारमे प्रधन शिवलिंगक सदृशहि अछि । मन्दिरक भीतर पुबरिया देबालसँ सटा क पाथरक नन्दी समेत कतोक टूटल-भाघल मूर्त्ति सभ पतियानीसँ राखल अछि । मन्दिरक उतरवरिया देवालमे तीनटा खाना बनल अछि आ तीनूमे तीनटा प्रस्तर मूर्त्ति जड़ल अछि । कारी पाथरसँ बनल एहि तीनू मूर्त्तिक अवलोकन कयला उत्तर देखल जाइछ जे पहिल मूर्त्ति गणेशक थिकनि जकर आकार तीन ग डेढ़ पफीट अछि । प्रतिमा अलंकृत ओ समानुपतिक अछि । गणेशक आयुध् ओ वाहन इत्यादि स्पष्ट छनि । मूर्त्तिक सूँढ़ खण्डित अछि । दोसर मूर्त्ति भगवतीक थिकनि जकर आकार अढ़ाइ ग डेढ़ पफीट छैक । इहो मूर्त्ति आकर्षक अछि, तथापि एकरहु अंग-भंग भेल छैक । तेसर मूर्त्ति सूर्यक थिकनि जकर आकार दू ग सवा पफीट छैक । ई मूर्त्ति अभग्न अछि । सात घोड़ासँ युक्त रथपर ठाढ़ सूर्य, पैरमे बूटदार जूता, माथपर ईरानी टाइपक टोपनुमा मुकुट, सारथी अरुण, उषा ओ प्रत्युषा आदि अपन समस्त सहयोगी, आयुध् ओ उपकरणसँ सुसज्जित । एहि तीनू मूर्त्तिक गढ़नि ओ शिल्प पाल ओ कर्णाट शैलीसँ किछु भिन्न देखना जाइछ जकरा ओइनिवार शैलीक नाम देल जाय तँ कोनो अनुचित नहि होयत ।
       उपरिवर्णित तीनू मूर्त्ति एहि शिव मन्दिरमे कोना आ कतसँ आयल तँ एहि सम्बन्ध्मे देकुली ग्रामवासीक कहब छनि जे एक बेरक बड़का रौदीमे गामक सबटा पोखरि सुखा गेल रहैक । ताही क्रममे गामसँ दच्छिन स्थित पतरिया पोखरिक उड़ाहीक क्रममे गणेश, भगवती, सूर्यक प्रतिमाक संग-संग बहुतो टूटल-भाँगल मूर्त्ति सब बहरायल छल जकरा सबके ँ  आनि क वर्(मानेश्वर स्थानमे राखि देल गेलैक । विभिन्न देवी-देवताक एहि मूर्त्ति सबके ँ देखलासँ मिथिलाक पऋचदेवोपासनाक परम्पराक स्मरण होइत अछि । मिथिलामे कोनो यज्ञकर्मक आरम्भमे पऋचदेवताक पूजा कयल जाइत छनि । ई पऋचदेवता छथिμ गणेश, सूर्य, भगवती, विष्णु ओ महादेव । दिनमे जँ पूजा भेल तँ सूर्यादि पऋचदेवता कहि सूर्यक प्रतिमा भगवतीक प्रतिमा गणेशक प्रतिमा वऋक आ रातिमे गणपत्यादि ×चदेवता कहि क । मिथिलाक अपन एही समन्वयवादी परम्पराक अनुसार एहि क्षेत्रामे प×चायतन मन्दिरक प्रचलन रहलैक अछि । अर्थात्‌ उपर्युक्त पाँचो देवताक मूर्त्तिक स्थापना कयल जाइत रहलैक अछि । निश्चित रूपसँ देवकुली राजधनीमे कहियो प×चायतन मन्दिर रहल होयत जाहिमेसँ चारिटाक मूर्त्ति तँ भेटैत अछि, पाँचम देवता विष्णुक मूर्त्ति सेहो रहले होयत । वर्(मानेश्वर मन्दिरक पूब भागमे परिक्रमामे राखल पाथरक ढेरमे तकला पर विष्णु मूर्त्तिक पाद खण्ड भेटैत अछि, जाहिसँ एहू समस्याक समाधन भ जाइत अछि । विष्णु मूर्त्तिक ध्ड़ ¯कवा शिरोभाग एखनहुँ पतरिया पोखरिमे वा कतहु अन्यत्रो दबल पड़ल होयत । ग्रामीण लोकक कथन छनि जे जँ एहि अथाह पोखरिमे नीक जकाँ ताकल जाय तँ ओहि समयक औरो बहुमूल्य सामग्री सभ प्राप्त भ सकैत अछि । निश्चित रूपसँ एहि गाममे जत-तत शिल्पित प्रस्तर खण्ड सभ जे पड़ल अछि ताहिसँ अनुमान कयल जा सकैत अछि जे पूर्वमे एहि गाममे उपर्युक्त प×चदेवतालोकनिक भव्य मन्दिर रहल होयतनि । मन्दिरसँ सम्ब(  कोनो अभिलेख होयबाक सम्भावनाके ँ सेहो नकारल नहि जा सकैत अछि । ओ मन्दिर सब कोना ध्वस्त भ गेल, वर्(मानेश्वर समेत अन्य देवमूर्त्ति सभके ँ के खण्डित कयलक, ओकरा सबके ँ पोखरिमे के पफेकलक- एहि सब प्रश्नक उत्तर इतिहासहिमे तकलासँ भेटि जा सकैत अछि ।
       देवसिंह अपन राजधनी देवकुलीमे स्थिर कयलनि । देकुलीसँ दक्षिण ओ चन्दनपट्‌टीसँ पूब एकटा महदइ नामक विशाल सरोवर अछि । म.म. परमेश्वरझाक अनुसार ई देवसिंहक बहिन महादेवीक खुनाओल थिकनि ।२५ देवसिंहक पुत्रा शिवसिंह जखन स्वयं राजा भेलाह तँ देवकुलीके ँ विस्तारित करैत एहिसँ औरो दच्छिन हटि गजरथपुर नामक नगर बसौलनि । म.म. परमेश्वरझाक अनुसार वर्त्तमान समयमे जत लक्ष्मीपुर-आनन्दपुर डेउढ़ी अछि ततहि पूर्वमे गजरथपुर छल । यद्यपि ई शिवसिंहपुर नामसँ सेहो जानल जाइत छल, किन्तु शिवसिंह द्वारा अपन पराक्रमके ँ वृ(ि करैत जखन एहि स्थानके ँ सैन्य छावनीक रूप देल गेल, गजरथक स्थान एतहि नियत कयल गेल ते ँ ई नगर शिवसिंहपुरक संग-संग गजरथपुर नामसँ सेहो प्रसि( भेल ।२६ प्रत्युत्‌ एहि गजरथपुरक उल्लेख कतिपय तत्कालीन ग्रन्थक पाण्डुलिपि सबमे भेल अछि । लक्ष्मण संवत्‌ २९१मे विद्यापतिक आज्ञासँ खौआल मूलक देवशर्मा ओ बलिआसय मूलक प्रभाकर श्रीध्र रचित काव्यप्रकाश विवेक नामक पोथीक टीका ओ प्रतिलिपि एहि गजरथपुर नगरमे रहि क कयने छलाह । एहि पोथीक पुष्पिका वाक्य निम्न प्रकारक अछिµ
समस्त विरुदावली विराजमान महाराजाध्रिाज श्रीमत्‌
शिवसिंहदेवसंभुज्यमान तीरभूक्तौ श्रीगजरथपुरनगरे
सत्‌प्रक्रियसदुपाध्याय श्रीविद्यापतीनामज्ञया खौआलसं,
श्रीदेवशर्म बलियास सं. श्रीप्रभाकराभ्यां लिखितैषा
पुस्तो ल.स. २९१ कार्त्तिक वदि १० ।२७
       एहि गजरथपुरसँ ल.स. २९३मे महाराजाध्रिाज शिवसिंह द्वारा अपन प्रिय सखा विद्यापतिक नामसँ विस्पफी ताम्रपत्रा जारी कयल गेल छल । एहि ताम्रपत्रामे बागमती नदीक तटपर गजरथ आखयासँ प्रसि( पुरीक अवस्थितिक उल्लेख भेल अछिµ
वागवत्याः  सरितस्टते  गजरथेत्याखयाप्रसि(ेपुरे
दित्सोत्साह विबृ(वाहुपुलकः सभ्याय मध्येसभम्‌ ।२८
       निश्चित रूपसँ उपर्युक्त अभिलेख ई साबित करैत अछि जे शिवसिंहक समयमे देवकुली राजधानीक विस्तार  औरो दक्षिण ध्रि भेल । डा. रामदेवझाक मत छनि जे पश्चिममे बागमती नदीक पश्चिमी तटपर स्थित थलवार गामसँ लक पूबमे रामभद्रपुर ध्रि तथा उत्तरमे सिनुआरसँ लक दच्छिनमे सिधौली-सुरहाचट्‌टी ध्रिक परिसर शिवसिंहक समयमे राजधानी छल । एहि परिसरमे यद्यपि अनेक गाम अछि जकरा समेकित रूपसँ एकटा गजरथपुरक अभिधन देल गेल ।२९ वस्तुतः ई सम्पूर्ण परिसर पुरातात्त्विक सामग्री, प्राचीन मूर्त्ति, सरोवर, इनार आदि सबसँ परिपूर्ण अछि । एहि गजरथपुर राजधानीसँ शिवसिंह मिथिलाक स्वतन्त्राताक घोषणा कयलनि अपितु अपन मुद्रा सेहो चलौलनि ।३० दिल्लीक सुल्तान भारी पफौजक संग गजरथपुर राजधनीपर हमला कयलक । ओही हमलामे गजरथपुर उजड़ि गेल, ओकर ऐश्वर्य
विलुप्त भ गेलैक । कालक प्रवाहमे गजरथपुर नाम सेहो विलुप्त भ गेल । पछाति केवल एहि राजधनीक अन्तर्गत बसल गाम सब अपन पूर्व नामक संग शेष रहि गेल । एही मुसलमानी आक्रमणक आघात देवकुलीके ँ सेहो सह पड़ल होयतैक । वर्(मानेश्वर समेत सब देव मन्दिर ध्वस्त कयल गेल होयत जकर प्रमाण अछि देकुलीक भग्न मूर्त्ति ओ प्रस्तर खण्ड सभ ।
       शिवसिंहक तिरोधनक बाद हुनक उत्तराध्किारी लोकनि हुनक उजड़ल राजधनीके ँ पफेरसँ बसयबाक प्रयास नहि कयलनि । सम्भवतः सुल्तानक संग आयल मुस्लिम सैनिक सब एतहि बसि गेल । एखनहुँ चन्दनपट्‌टी, बाँकीपुर, जीवर आदिमे मुसलमानक सघन आबादी अछि । विर्ध्मी शत्राु सेनाक निवास भेलाक कारणे शिवसिंहक बादक ओइनिवार राजा लोकनि गजरथपुर छोड़ि अपन राजधानी मिथिलाक उत्तर भागमे स्थिर करैत रहलाह ।३१
       सम्भवतः देवकुली गाम बहुतो दिन ध्रि उजड़ले-उपटल रहल । एहि गामक वर्(मानेश्वर महादेव जनविहीन परिसरमे एकाकी रहबाक हेतु विवश भेलाह । पुनः ई गाम कहिया आबाद भेल से तँ निश्चित रूपसँ नहि कहल जा सकैत अछि मुदा कोना आबाद भेल से मौखिक स्रोतसँ बूझल होइत अछि । गामक एकटा वृ( पुरुष तृप्तिनारायणझा जे विवरण देलनि तदनुसार उजड़लाक बहुतो दिन बाद देकुली गाम एहिसँ उत्तर स्थित डरहारक कलिगामे-कलिगाम मूलक चौध्री उपनामधरी ब्राह्मण लोकनिक अध्ीन भ गेलनि । देकुली डरहारक संग जुड़ि गेल आ एहि मौजाक नवीन नाम पड़ल विसनपुर-महादेव । एहि नामकरणक पाछाँ कारण भेल देकुलीक प्रसि( वर्(मानेश्वर महादेव स्थान तँ दोसर दिस डरहार गामे एहने प्राचीन विष्णु मन्दिरक अवस्थिति । ई विष्णु मन्दिर एखनहुँ डरहारक पूर्वमे अछि । प्रायः एही कारणे ँ गामक नाम सेहो विष्णुपुर वा विसनपुर पड़ल । मुदा विसनपुर नाम अभिलेखे सबमे भेटैत अछि । एकर प्रचलित नाम डरहार छैक । एहि डरहार शब्दक की व्युत्पत्ति ओ एकर पाछाँ की इतिहास से अनुसन्ध्ेय अछि, मुदा डरहार एकटा मूलग्राम सेहो अछि । प×जीमे एकहरे डरहार नामक एकटा मूलक उल्लेख अछि ।३२ अस्तु, पुनः अपन विषयपर आबी । विद्यापतिक जन्मभूमि बिस्पफी लग उसौत नामक कोनो गाम अछि । ओहि गाममे वत्स गोत्राीय, परिवारे उसौत मूलक ब्राह्मणक निवास छलनि । ओही गामक एकटा पंडित युवक रहथि कामदेवझा । हुनक विद्वत्तासँ प्रभावित भ क डरहारक एकटा चौध्री जमिन्दार अपन कन्यासँ हुनक विवाह करौलथिन । तथाकथित अपनासँ छोट कुलक कन्यासँ विवाह करबाक कारणे ँ कामदेवझाके ँ अपन परिवारसँ बहिष्कृत क देल गेलनि । तखन कामदेवझाक ससुर अपन बेटी-जमायके ँ ५२५ बीघाक रकबावला सौंसे देकुली मौजा दक एही गाममे हुनका लोकनिके ँ बसौलथिन । अपितु बेटी-जमायक राजपाट सम्हारबाक हेतु आवश्यक जन-वरजन्ना, पौनी-पसारीक रूपमे पन्द्रहटा आनो-आन जातिक परिवारके ँ बजाय क बसौलथिन । वर्(मानेश्वर महादेवक सेवा-पूजा हेतु महिसी ;सहरसाद्धसँ पंडा ब्राह्मणके ँ बजाय ओकरो बसौलथिन । एतावता देकुली मैथिल ब्राह्मणक बिकौआ ओ कन्यादानी व्यवस्थाक अन्तर्गत पफेरसँ बसल । ओही परिवारे उसौत मूलक कामदेवझाक वंशज लोकनि आब एक-सँ एकैस भ चुकल छथि ।
       देकुली गाममे परिवार ;पल्लिवारद्ध मूलक ब्राह्मणक आगमन ओ निवासक सम्बन्ध्मे मौखिक स्रोत भने जे कहैत हो, विद्यापति रचित कीर्त्तिपताकासँ सेहो एहि सन्दर्भमे एकटा महत्त्वपूर्ण सूचना भेटैत अछि । देवसिंहक समयमे गजनी ओ गौड़क जे संयुक्त आक्रमण मिथिलापर भेल छल । तकर सामना देवसिंहक पुत्रा शिवसिंह अपन सैन्यबलक संग कयने छलाह । देवसिंहक सेनामे ब्राह्मण ओ क्षत्रिाय दुहू जातिक यो(ा छलनि ताही क्रममे पल्लिवार वंशक सेनाक सेहो उल्लेख भेल अछिµ
तह पल्लिवार धेरनि गरिट्‌ठ
सरजाले मारि कर समरध्टि्‌ठ ॥३३
       अर्थात्‌ पल्लिवारक वंशक सूरवीर लोकनि यु(भूमिमे डटल छथि । दृढ़तापूर्वक यु( करैत ओ लोकनि वाणक जालसँ समरभूमिके ँ आच्छादिक क देने छथि । वस्तुतः देवसिंहक सेनाक पल्ल्विार वंशीय सैनिक ओ हुनक राजधानी देवकुलीमे वसल  परिवारे उसौत मूलक ब्राह्मणक निवासक बीच कोनो ऐतिहासिक सम्बन्ध् तँ ने अछि, एहू दिशामे अनुसन्धानक प्रयोजन अछि ।
       मौखिक स्रोतक अनुसार १८९६मे जखन दरभंगा जिलाक कैडेस्ट्रल सर्वे सुरू भेल ताहिमे देकुलीके ँ बिसनपुर-महादेव मौजासँ पफराक क पुनः एकटा स्वतन्त्रा मौजाक रूप देल गेलैक । पुरना सर्वे-खतियान ओ नक्शामे एहि मौजाक नाम देवकली लिखल भेटैत अछि । नक्शामे वर्(मानेश्वर स्थानक जगह काटल अछि जाहिपर मन्दिरक रेखाचित्रा अंकित क शिवाला लिखल अछि । यैह वर्(मानेश्वर शिवालय एहि गामक प्राचीन गौरव-गाथाके ँ अक्षुण्ण रखने अछि । ¯कवदन्तीक अनुसार पहिने ई महादेव खढ़क खोपड़ीमे छलाह । प्रति वर्ष गाममे आगि लगैत छलैक । पछाति ईंटाक पक्का मन्दिर बनाओल गेलैक । वर्(मानेश्वर परिसरक अवलोकनसँ प्रतीत होइछ जेना एकर निर्माण ओ स्थापना कोनो तन्त्रा प(तिसँ भेल होइक । परिसरक आकार त्रिाभुज जकाँ छैक । परिसरक पूब ओ पच्छिम भुजामे दूटा सरोवर एखनहु विद्यमान छैक । सम्भवतः परिसरक दच्छिनवला भुजा दिससँ सेहो पूर्वमे कोनो सरोवर छल जे भथि गेल । किए तँ मन्दिरक सामने दच्छिनमे सड़कक कातवला जमीन एखनहुँ डोभी सन लगैत अछि ।
       वर्(मानेश्वर महादेवक खयाति जागन्त शिव-स्थानक रूपमे रहल अछि । अदौसँ माघी कमरथुआ लोकनिक विश्राम स्थलक रूपमे ई मान्य रहल अछि । पफागुन मासक मकर ओ शिवरात्रिाके ँ एत बड़ पैघ मेला लगैत अछि से आइयो चलि रहल अछि । वर्त्तमानमे एहि मन्दिरके ँ औरो बेसी जागृत करबाक प्रयासमे ग्रामीण लोकनि लागल छथि । नवीन मन्दिरक निर्माण कयल गेल अछि । शिवरात्रिाक अवसरपर पछिला किछु वर्षसँ भव्य आयोजन कयल जाय लागल अछि । तथापि आइ आवश्यकता अछि जे मिथिलाक एहि विस्मृत राजधनी देकुलीक ऐतिहासिक ओ पुरातात्त्विक गरिमाक रक्षा करैत एहि दिस अध्येता लोकनिक ध्यान आकृष्ट कयल जाय । एहि गामक गर्भमे दबल पड़ल इतिहासके ँ वैज्ञानिक ढंगसँ उत्खनन क सामने आनल जाय । यदा-कदा जे पुरातात्त्विक सामग्री सब भेटैत रहल अछि तकरा एकटा संग्रहालय बना क संरक्षित कयल जाय । महाकवि विद्यापतिक कर्मभूमिक रूपमे एहि गामके ँ चिन्हित कयल जाय । संगहि एहि गामक पुरातत्त्वक तुलना मिथिलाक अन्यान्य देकुली नामधरी गामक संग करैत नामक समरूपताक इतिहासक अन्वेषण कयल जाय । वर्(मानेश्वर स्थानक खयाति ओ प्राचीनताके ँ इतिहास ओ आध्यात्मिकताक  मानचित्रापर स्थापित कयल जाय । ई दायित्व देकुली ग्रामवासी लोकनिक संग-संग मिथिला निवासी समस्त प्रबु( जनक थिकनि ।

सन्दर्भ एवं टिप्पणीµ
१.   परमेश्वरझा, मिथिला तत्त्व विमर्श ;पूर्वार्(द्ध, तरौनी, दरभंगा, १९४९, पृ.- १५२
२.   चन्दाझा, पुरुष परीक्षा ;अनुवादद्ध, राज दरभंगा यन्त्राालय, शाके १८१०, पृ.- २५९
३.   उपेन्द्रठाकुर, मिथिलाक इतिहास, मैथिली अकादमी, पटना, १९८०, पृ.- १९०
४.   रामदेवझा, विद्यापतिसँ सम्ब( स्थान आ गजरथपुरक सन्धन, मंजुषा-२, विद्यापति सेवा संस्थान, आनन्दपुर, दरभंगा, २००९, पृ.- १४
५.   एस.एन. सत्यार्थी, दर्शनीय मिथिला-९, विस्मृत मिथिला प्रकाशन, दरभंगा- २००३, पृ.- ४१३-४२०
६.   रामप्रकाशशर्मा, मिथिला का इतिहास, के.एस.डी.एस.यू., दरभंगा, १९७९, पृ.- ४६३-४६४
७.   बिहारीलाल पिफतरत, आईना-ए-तिरहुत ;द्वि.सं.द्ध, महाराजाध्रिाज कामेश्वरसिंह कल्याणी पफांउडेशन, दरभंगा, २००१,
पृ.- १२५-१२७
८.   चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९
९.   परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५२
१०.  मुकुन्दझा बखशी, मिथिला भाषामय इतिहास, विद्याविलास प्रेस, बनारस सीटी, पृ.- ५१६
११.  श्यामनारायणसिंह, हिस्ट्री ऑपफ तिरहुत, बैप्टिस्ट मिशन प्रेस, कलकत्ता, १९२२, पृ.- ७२
१२.  पी.सी. रायचौध्री, बिहार डिस्ट्रिक्ट गजेटियर दरभंगा, सेक्रेटेरियट प्रेस, पटना, १९६४, पृ.- ३४
१३.  उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९१
१४.  परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५५
१५.  विद्यापति गीत संचय, साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, १९९९, ;भूमिका- रामदेवझाद्ध, पृ. २१, पद सं.- ४३
१६.  विद्यापति पदावली ;प्रथम भागद्ध, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्‌, पटना, १९६१, भूमिका, पृ.- ७७
    भूपरिक्रमाक आरम्भमे निम्न श्लोक अछिµ
                नत्वां गणपतिं साम्बं श्रीविष्णुं रविमम्बिकाम्‌
                भूपरिक्रमणग्रन्थं  लिखयते भुवि नैमिषे
                देवसिंहनिदेशाच्च       नैमिषारण्यवासिनिः
                शिवसिंहस्य पितुः सूनपीठनिवासिनः
१७.  कीर्त्तिपताका, शशिनाथझा ;अनु.द्ध नाग प्रकाशक, दिल्ली, १९९२, पृ.- २८-७१
१८.  चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५१ एवं २५३
१९.  परमेश्वरझा ;पूर्वोक्त-१द्ध, पृ.- १५१-१५२
२०.  चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९
२१.  श्यामनारायणसिंह ;पूर्वोक्त-११द्ध, पृ.- १७७-१७८
२२.  उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९२ ओ २०७
२३.  चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५९
२४.  परमेश्वरझा ;पूर्वोक्स-१द्ध, पृ.- १५२-१५३
२५.  उपर्युक्त, पृ.- १५४
२६.  उपर्युक्त, पृ.- १५८
२७.  उपर्युक्त, पृ.- १५८
२८.  चन्दाझा ;पूर्वोक्त-२द्ध, पृ.- २५३
२९.  रामदेवझा ;पूर्वोक्त-४द्ध, पृ.- १३-१४
३०.  उपेन्द्रठाकुर ;पूर्वोक्त-३द्ध, पृ.- १९७
३१.  विद्यापति पदावली ;पूर्वोक्त-१६द्ध, पृ.- २७
३२.  रमानाथझा, मैथिल ब्राह्मणों की पंजी व्यवस्था, दरभंगा- पृ.- ११
३३.  कीर्त्तिपताका ;पूर्वोक्त-१७द्ध, पृ.- ४७

सम्पर्क : कबिलपुर, लहेरियासराय
दरभंगा- ८४६००१
जितेन्द्र झा
1.काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा 2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि
1.काठमाण्डूमेँ कोहबर घर : वर ने कनिञा तैइयो बढिञा

 केवाडमेँ स्वागतम् । घरके भितमे वर कनिञाक चित्र, हाथीपर चढिकऽ गौर
पुजैत नवविवाहिता, डोली कहार सेहो ।
कोहबर घर मैथिली सँस्कृतिके एकटा अनुपम नमुना, गवाह नव दाम्पत्यक । वर
कनिञाक मिलनके साक्षी सेहो । ई कोहबर घर कोनो बर कनिञालेल नहि अछि, ई अछि
मिथिलासँस्कृतिक जीवैत नमुना । मैथिलीक समृद्ध परम्परा आ संस्कारके
चिनारी बनल अछि ई कोहबर घर ।

काठमाण्डूक कुपण्डोलस्थित महागुठी आर्ट ग्यालरीमेँ सजाओल कोहबर घर मैथिली
सँस्कृतिके बखान करैत अछि । एहि कोहबरमेँ रहल पाग, डोपटा, वियनि, डोला
कहार, गुआमाला जेहन चीजसभ आओर आकर्षक बना देने अछि । तहिना वियाहक विध सिन्दुरदान, मुँहदेखाइ, विदाइ के पेन्टिंगसभ सेहो कोहबर घर देखनिहारके
अपना दिस खिचैत अछि ।

हस्तकलाक समान उपलब्ध होबऽबला ई दोकान मेँ कोहबर घरके मिथिला पेन्टिंगके
उजागर करबाक प्रयास कएल गेल अछि । विवाहमेँ विधके क्रममे काज लागऽबला आ
मैथिली घरके प्रतीक उखरिसमाठ, कोठी जेहन वस्तु सेहो गमैया लुक दैत अछि
एहि कोहबर घरके ।

एत्तऽ एलासँ लगैत अछि जे कोनो मिथिलासंग्रहालयमेँ चलि एलहँु । मैथिली
सँस्कृतिके संरक्षणक नामपर बडका बडका भाषण केनिहारसभके एहि कोहबर घरसँ
किछु ज्ञान भेटि सकैत अछि ।
मिथिला पेन्टिंगके लोकप्रियता आ मैथिली सँस्कृतिके मौलिकता कारण ई
कृत्रिम कोहबर घर देश विदेशक कला प्रेमीके मोन मोहि लैत अछि ।
मिथिला पेन्टिंगके वाहक मात्र नहि समग्र संस्कृतिके परिचायक ई नमुना
कोहबर घर काठमाण्डूसँ देश विदेशक लोकके मैथिली संस्कृति दिस आकर्षित करैत
अछि ।
2.परम्पराके निरन्तरतामेँ प्रवास बाधक नहि

गामसँ कोशोदूर रहितोअपन परम्परा आ सँस्कारके बचाकऽ राखऽमें मैथिल महिलाक
बडका योगदान अछि । ग्रामीण परिवेशमेँ सहज रुपेँ पाबनि तिहार केनिहारि
महिलाक अपेक्षा शहर आ दूर देशमेँ रहल मैथिल महिलाके पाबनिक ओरिआओनपातीमेँ
दिक्कति त होइते छन्हि मुदा पाबनिपर एकर कोनो प्रभाव नहि परैत अछि ।

काठमाण्डूमेँ बरसाइत पाबनि केनिहारि अर्चना झाक कहब मानी त काठमाण्डूमेँ
रहियोकऽ कोनो दिक्कति नहि होइछन्हि एहि पाबनिमेँ । गाममेँ सभ महिला बडका
बरक गाछ तर जम्मा भऽ बरक पुजा करैत छथि त शहरमेँ गमलामेँ बरक गाछ राखिकऽ
बेगरता पुरा कएल जाइत अछि ।  बटसावित्री अर्थात बरसाइतमेँ अहिवात महिला
अपन पतिक लम्बा आयुक कामना करैत छथि, नव कनियाँकलेल इ पाबनि बेशी महत्व
रखैत अछि । नवकनियाँ सभकेँ प्रोढ महिला वरसाइतक विध विधान सिखाकऽ पुजामेँ
सहयोग कएल करैत छथिन्ह । काठमाण्डूमेँ महिला सभ सामुहिक रुपेँ एहन पाबनि
पुजल करैत  छथि । सामाजिक सदभाव आ एकदोसराके बुझबालेल सेहो शहरवासी मैथिल
महिलाक लेल एहन पाबनि निक अवसर भऽ गेल अछि । शरिर कतउ रहए मोनमें अपन
परम्परा आ सँस्कारप्रति श्रद्धा होएबाक चाही, अपन सँस्कृति आ परम्पराके
निरन्तरता देबामेँ प्रवास बाधक नहि होइत अछि ।
१.बीरेन्‍द्र कुमार यादव- कथा- हमर समाज २.जीवकान्‍त-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास- ‍मौलाइल गाछक फूल पर .धीरेन्‍द्र कुमार-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास- ‍मौलाइल गाछक फूल पर .राजदेव मंडल- कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक लेल पत्र

बीरेन्‍द्र कुमार यादव
ग्राम- घोघड़रि‍या, पोस्‍ट- मनोहपट्टी, भाया- नि‍र्मली, जि‍ला सुपौल
ग्राम- घोघड़रि‍या
पोस्‍ट- मनोहपट्टी
भाया- नि‍र्मली
जि‍ला सुपौल

कथा
हमर समाज
वि‍रेन्‍द्र कुमार यादव

     बि‍न्नू आ बीरू बालसंगी छलाह। दुनू गोटे कोशीक कछेर गाम घोघड़रि‍यामे मरूआक रोटी आ पोठी माछक चटनी जलखै खाइत छल। रेडि‍यो बाजि‍ रहल छल जे लि‍ंक रोड नि‍रमलीमे वि‍ष्‍णु महायज्ञ शुरू अछि‍, जहि‍मे गणेशजी महाराज लोक सभकेँ लड्डू दैत छथि‍न्‍ह‍।‍ ई सुनि‍तहि‍ बि‍न्नू अपन भजार बीरूकेँ कहलखि‍न- यार, घोर कलि‍युगमे गणेशजी लड्डू बटैत छथि‍।‍ एक दि‍न चलु आ अपनो सभ प्रसाद लए आबि‍।
     दुनू  भजार आश्‍चर्य करि‍तहुँ यज्ञ मेला देखवाक ि‍नश्‍चए कएलक। ओहि‍ बीच गामक ठकनी काकी मुँहमे पान गलठैत हाथमे बजैत रेडि‍यो नेने लगमे आबि‍ बजलीह- यौ बि‍न्नू बौआ, एहि‍ रेडीमे कहलक जे लि‍ंक रोड ईटहरीमे गणेश भगवान लड्डू बँटैत छथि‍न्‍ह, अपनो सभ चलेचलु गणेशक लडू लए आबि‍।‍
  बीरू बजलाह- गै काकी धैरज धर हम रेलगाड़ीक भॉंज करै छि‍यौ, गामक सभ गोटे रेलपर चढ़ि‍ गणेशजीक प्रसाद लेबाक लेल अवश्‍य जाएव।‍
  ठकनी काकी कने ठमकि‍ कऽ बजलीह- ‍रौ बकलेलहा, एहि‍ गाममे बस, मोटर चलबाक तँ रस्‍ते नहि‍ अछि‍, तोँ रेल मंगबैत छैँ।
     बीरू हँसैत बजलाह- गै काकी जहन माटि‍क मुरूत गणेशजी लड्डू बॉंटि‍ सकैत छथि‍। तखन बि‍नु पटरीक रेल कि‍एक नहि‍ आओत?
  बीरूक बात सुि‍न बि‍चहि‍मे बि‍न्नू कहलखि‍न- अहॉं सभ बकझक जुनि‍ करू, धर्मक काज देखबा, सुनवा आ कएलासँ स्‍वर्ग होइछ। हम सभ मि‍लि‍ देवी पूजा पाठ आ दर्शन करए एक दि‍न अवश्‍य जाएव।‍
     गामक पैघ आ देहोदशासँ भरि‍गर पंडि‍त कमलशेखर बावूसँ भेटि‍ कए दुनू भजार शुभ दि‍न तकौलक आ भाड़ाक बदलामे तेलपर परमाबावूक ट्रेक्‍टर भॉंज कएलक।
     जेठ मासक रौदमे ठकनी काकी, बीन्नू, बीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्‍टरसँ यज्ञमेला देखबाक लेल प्रस्‍थान कएलक। उबड़-खाबड़मे ट्रेक्‍टरक झोलामे झुलैत, रंग-वि‍रगक गप-सप्‍प करैत रज्ञ स्‍थल माने मेला पहुँच गेल।
     रज्ञ स्‍थलपर अनगि‍नि‍त लाउडस्‍पीकरक आवाजसँ भारी शोर-शराबा होइत छल। एहि‍ बीच साइकि‍ल स्‍टेंडसँ एगो चीकन युवती समतोला रंगक समीज सलवार पहि‍रने, ऑंखि‍पर रंगीन गोगुल्‍स धरौने, हाथक मोवाइलसँ फोटोग्राफी करैत ठकनी काकीपर नजरि‍ पड़ि‍तहि‍ बजलीह- मौसी अहॉं आबि‍ गेलहुँ, बढ़ि‍यॉं भेल, भेंट-मुलाकात भऽ गेल। हम तँ प्रचारे सुनि‍ अएलहुँ। एतेक लोकक भीड़ तँ एहि‍ठाम कॉंलेज परि‍सरमे देशक प्रधानमंत्री बाजपेयीजी आएल छलाह ओहूमे नहि‍ भेल छल। ई सोलह बरि‍सक बाला प्रेमलता जे हालहि‍मे पत्रकारि‍तासँ जुड़लीहेँ सएह छथि‍।
     एहि‍ यज्ञ मेलामे अनेको लोक-लुभावन कार्यक्रममे भोरूकवा रेडि‍यो स्‍टेशन एफ.एम ९२.८, राजवि‍राज (नेपाल)सँ आएल मैथि‍ली भाषी कलाकार सभ मैथि‍ली भाषाक वि‍कासक लेल आ समाजकेँ प्रगति‍मूलक शि‍क्षाक हेतू बढ़ि‍या कार्यक्रम देखौलक।
     ठकनी काकीक संगे प्रेमलता आ गामक लोक कार्यक्रमक आनंद लैत मुरूतक दर्शन करए आगू बाढ़लाह। सभसँ पहि‍ने धोर कलि‍युगमे सतयुगक कामधेनू गाए देखि‍तहि‍ प्रेमलता बजलीह- मौसी, कामधेनूक थनसँ चुबैत दूधक पान करू आ जि‍बतहि‍ स्‍वर्गक बदलामे माक्ष प्राप्‍त करू।‍
  प्रेमलताक एतेक सुि‍न बीरू बाजि‍ उठल- काकी कामधेनूक चारू दि‍स ऑंखि‍ खोलि‍ कऽ ताकू। ई बुद्धि‍क कमाल आ व्‍यवसायक धार्मिक तरीका छी। जाहि‍पर कोनो तरहेँ ऑंगुर नहि‍ उठए आ शांति‍सँ पाइक संचय हुअए। ई सभटा पाइ ि‍हन्‍दु धर्मक ठीकेदार बाबा आ पंडि‍तजीकेँ पाकि‍टमे जाएत, जाहि‍सँ बाबा आ पंडि‍तक जि‍नगी शान-शौकत आ भोगवि‍लासमे बीतत।‍
  ठकनी काकी लोकक एतेक भीड़ रहि‍तहुँ ठेलि‍-ठालि‍ कऽ अमृत पान कएलक आ लोको सभकेँ करौलक। बीनू कहलखि‍न- ओहि‍ठाम लाेकक बड्ड भीड़ छैक ओतए चलि‍ देखू कोन देवता की बॉंटैत छथि‍न्‍ह। सभ गोटे ओहि‍ भीड़क लग गेल। श्रद्धालू भक्रगण गणेश भगवानसँ टाका दए प्रसाद माने लड्डू लेबाक मुड़ कटबैत छल।‍
     प्रेमलता मुरूतक सजाओल दृश्‍यक फोटो खींचैत यज्ञशालाक बगलमे ठाढ़ दलीह आ मोनमे रहनि‍ जे कि‍छु श्रद्धालूजनसँ साक्षात्‍कार करी आ संवाद प्रेषि‍त करी। तावत काल माथपर भाेगारसँ उजरका आ सि‍नुरि‍या चानन घसल गेहुमा रंगक मोटगर लोक उजरका धोती पहि‍रने प्रेमलताक सोझाा आएल। प्रेमलता पूछि‍ देलखि‍न- पंडि‍तजी ई की भए रहल अछि‍।‍
  जोरसँ ठहाका दैत पंडि‍त जी बजलाह- ई धोर कलि‍युग बीत रहल अछि‍। मनुक्‍खक गप्‍प छोड़ू आब तँ देवता लोकनि‍ सेहो पाइक लेल दोकान खोलि‍ देलक। िहन्‍दु धर्मक चादरि‍ ओढ़ि‍ अधार्मिक, अनैति‍क काज करबा लेल हमरा समाजक प्रति‍ष्‍ठि‍त व्‍यक्‍ति‍ सभ कतेक तत्‍पर अछि‍ से सभ ऑंखि‍ खोलि‍ देखबाक लेल आएल छी। दुनि‍याँक लोक सभ चॉंदपर बसवाक लेल प्रयासरत अछि‍, आ हमरा समाजक लोकसभ साहुकार गणेशक लड्डू पाइ दए कऽ पबैत अछि‍।‍
     ठकनी काकी प्रेमलताक लग आबि‍ बजलीह- गै छौड़ी, केकरासँ गप्‍प करै छेँ चल एहि‍ठामसँ आब गामो जाएव।‍
  मौसीकेँ वि‍दा होइसँ पहि‍नहि‍ प्रेमलता वीरू दि‍स मुस्‍की दैत बजलीह- अपने कि‍छु कहब?” वरू झटसँ कहलखि‍न- कि‍एक नहि‍? सभ लोककेँ धार्मिक होएवाक ‍चाही, मुदा एहि‍ठाम जतेक आडम्‍बर कएल गेल अछि‍ से उचि‍त नहि‍। आजुक वैज्ञानि‍क युगमे ढ़ाइ-तीन लाख रूपैया खर्च कए एहि‍ तमाशासँ वातरवरणक शुद्धि‍, भक्‍ति‍मय माहौल आओर गामक नाम उँच केलक एकर अलावा की प्राप्‍त होएत? समाजक एतेक रास रकमक खर्च आधुनि‍क सोचसँ गरीबक बच्‍चाकेँ पढ़वा-लि‍खबामे, बि‍मारीसँ पि‍ड़ि‍त लोकक इलाज करएवामे, गामक वि‍कासमे होएवाक चाही। जाहि‍सँ हमरो समाजक धीया-पुताकेँ नोबेल पुरस्‍कार प्राप्‍त करबाक अवसर भेटय। धार्मिक कार्यक्रमक उद्देश्‍य बदलि‍ गेल अछि‍। सभटा खेला पाइ हँसोथबाक लेल भऽ रहल अछि‍। एना कएलासँ हमर समाज आगू नहि‍ बढ़ि‍ पएत। अपि‍तु पाछुए रहत। ई हमरा सभक लेल हास्‍यास्‍पद बात छी।
     प्रेमलता मुस्‍कुराइत हाथ आगू बढ़बैत बीरूसँ हाथ मि‍लाए मौसीसँ वि‍दा लेलनि‍। वीरू प्रेमलता दि‍स आ प्रेमलता वीरू दि‍स धुि‍र-धुि‍र तकैत चलि‍ गेल। वि‍न्नु भाय, अपन भजार वीरूक मुस्‍कुराइत चेहरा टुकुर-टुकुर तकि‍ते रहि‍ गेल। तत्‍पश्‍चात् ठकनी काकी वि‍न्नु, वीरू आ गामक लोक सभ ट्रेक्‍टरपर चढ़ि‍ गाम दि‍स वि‍दा भेल।
 2.
जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास मौलाइल गाछक फूल

जीवकान्‍त


गदीश प्रसाद मण्‍डलक पोथी ‍मौलाइल गाछक फूल‍‍ पढ़ि‍ गेलहुँ।  एकटा नव लेखक। एकटा नव भाव-भूमि‍।
     उपन्‍यास थि‍क। प्रमुख बात थि‍क गामक गरीबी, अशि‍क्षा आ खेतक वि‍षम वि‍तरण।
     आरंभसँ अन्‍त धरि‍ समाजवादक धारणा गनगनाइत अछि‍। तेँ पात्र सभ गौण भ‍ऽ जाइत अछि‍। पात्र सभ गरीबी लए क‍ऽ उपस्‍थि‍त होइत अछि‍, अपन दीनता, अपन संघर्ष अपन वि‍जय अभि‍यानक दि‍शा देखबैत अस्‍त भ‍ऽ जाइत अछि‍।
     गाम बदलतैक जखन बोनि‍हारकेँ भूस्‍वामी बना देल जएतैक, शि‍क्षा लेल स्‍कूल फुजतैक, दवाइ लेल डाक्‍टर आ दवाइ सुलभ हाेएतैक।
     से सभ एहि‍ ‍मौलाइल गाछ‍ (मि‍थि‍ला आ भारतक अवि‍कसि‍त आ कृषि‍-प्रधान गाम) मे भ‍ऽ जाइत छैक। भूमि‍क वि‍तरण भ‍ऽ जाइत छैक। स्‍कूल फुजैत छैक। दूटा कि‍शोर-कि‍शोरी मद्रास जा कए चि‍कि‍त्‍साक आरंभि‍क ज्ञान लए गाम आि‍ब जाइत छैक। गाममे पि‍रवर्तन होइत छैक। गामक स्‍वर्ण भूस्‍वामी डोमक नोत मानि‍ सोत्‍साह भोजमे सम्‍मि‍लि‍त हाेइत अछि‍। बोनि‍हारक बेटा गामक पैघ जोतदार (आब भूत पूर्व) लेल जर्मनीमे बनल रेडि‍ओ उपहार देवा लेल अनैत अछि‍।
     नव जागरण छैक। नया समाजवाद छैक। कतहु मारि‍-मोकदमा नहि‍। कतहु भोट-भॉंट नहि‍। सभ वस्‍तु आरामसँ स्‍वत: होइत गेल अछि‍। 
     एकठाम लाठी चललैक अछि‍। ि‍सति‍या आ ललबाबला प्रसंगमे। दू वर्गक लोक अछि‍। दुनूक वर्ग चरि‍त्र झलकैत छैक। पोथीमे उल्‍का जकॉं ई घटना अबैत अछि‍ आ मि‍झाइत अछि‍।
     वर्ग घृणा एकठाम छैक। सुबुध मास्‍टर नोकरी छोड़बा लेल त्‍यागपत्र फेकि‍ अबैत अछि‍। ओकर स्‍त्री घौना करैत अछि‍। घसवाहि‍नी सभ आेकर दुख ओकर जीवन-शैलीक चर्चा कए अपन घृणा प्रकट करैत अछि‍।
     गाममे एहेन परि‍वर्तन होएवाक चाही। से बात उपन्‍यासकार कहैत छथि‍। कथानकमे कोनो पार्टीक उपस्‍थि‍ति‍ नहि‍ छैक। मुदा पार्टीक एजेण्‍डा जकॉं सभ काज भए जाइत छैक। गाममे एन.जी.ओ. नहि‍ छैक, मुदा एन.जी.ओ.क उपस्‍थि‍ति‍ अभड़ैत छैक।
     मार्क्‍स, गॉंधी, लोहि‍या, वि‍नोवा इत्‍यादि‍क आहट सुनाइत छैक।
     एहेन परि‍वर्तन होएव तत्‍काल संभव नहि‍ छैक। शि‍क्षा प्रचारसँ आ समाजसेवी सभक सेवा आ श्रमसँ एना भए जाए तँ आश्चर्यक बात नहि‍।
     रमाकान्‍त जखन मद्राससँ घुरैत छथि‍, तखनसँ अन्‍त धरि‍ उपन्‍यास शि‍थि‍ल भए जाइत अछि‍। तकर वाद सभ घटनाक अन्‍दाज पाठककेँ भए जाइत छैक। उपन्‍यासमे अन्‍त-अन्‍त धरि‍ मोड़ अएवाक चाही, घटना सभमे आकस्‍मि‍ता होएवाक चाही, से नहि‍ छैक।
     पोथीक भाषा खाँटी लो‍कक भाषा थि‍क, कि‍ताबी भाषा नहि‍ थि‍क। सेहो एकटा वि‍शि‍ष्‍ट आ महत्‍वपूर्ण बनबैत छैक। साहि‍त्‍यमे एहेन घर-ऑंगनक पात्र नहि‍ आएल छल, से सभ प्रवेश कएलक अछि‍।
     भारतमे गरीबी वि‍शाल अछि‍। एकर नि‍यति‍ बदलतैक, मंद गति‍सँ बदलतैक। एकर उनटा एहि‍मे अछि‍।
     पोथी पढ़ि‍ गेलहुँ। से एकर सफलताक सूचक थि‍क।

डयोढ़
१० ०६ २०१०
3

धीरेन्‍द्र कुमार
(हि‍ंदी वि‍भाग, सी.एम. बी. कॉलेज, डेवढ़, मधुबनी)
 नि‍र्मली, सुपौल।

जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्‍यास- मौलाइल गाछक फूल पर

    

मैथि‍ली साहि‍त्‍यमे यथेष्‍ट सामग्री लऽ प्रवेश केनि‍हार उपन्‍यासकार/कथाकारमे यशस्‍वी एक लेखक छथि‍। २००२मे प्रवेश केनि‍हार मंडल जीक सामग्री सभकेँ आश्‍चर्यचकि‍त कऽ दैत छथि‍। एहन लगैत अछि‍ जे जीवनक चि‍ंतक, समाजक चि‍ंतन आ आस-पासक होइत घटनाक्रमपर सृजन-दृष्‍टि‍ हि‍नकर पहि‍नेसँ कार्यरत रहनि‍ आ शब्‍द-बद्ध करैत रहलाह आ अनुकूल समए भेटैत अंकुरि‍त भेलाह आ शीघ्रे एकटा गाछक पैघ स्‍वरूप धऽ लेलनि‍।
     प्रस्‍तुत कृति‍ ग्राम्‍य-परि‍वेशक ससक्‍त अभि‍व्‍यक्‍ति‍मे सफल अछि‍। ग्राम्‍य-जीवनक चि‍त्रणक कमी नै अछि‍ मुदा हि‍नकर चि‍त्रण आर सभसँ अलग अछि‍। गामक छोट-छि‍न मुद्दाकेँ पकड़ैमे यथास्‍थान प्रस्‍तुति‍करण, चि‍त्रणक सघनतामे मंडल जी सि‍द्धस्‍त छथि‍।
     मंडलजी हि‍न्‍दी साहि‍त्‍यसँ एम.ए. केने छथि‍। हि‍नका हि‍ंदी साहि‍त्‍यक कतेको उपन्‍यास-कथा पढ़बाक अवसर भेटल हेतनि‍। हि‍नक मौलाइल गाछक फूल उपन्‍यास पढ़लापर स्‍पष्‍ट प्रतीत होइत अछि‍ जे प्रेमचन्‍दसँ बेसी प्रभावि‍त छथि‍। गाम-घरमे रहि‍कए अनुखन समाजक कल्‍याणक भावना हि‍नकामे छनि‍। जाहि‍ कारणें रमाकांत उदारवादी पात्रक रूपमे प्रति‍ष्‍ठि‍त छथि‍। व्‍यक्‍ति‍गत रूपसँ परि‍पूर्ण छथि‍। केओ एकटा परि‍वारक पात्र एहन नहि‍ अछि‍ जे आदर्शवादी रमाकांतक व्‍यवहारक वि‍रोध केने होथि‍। गाम-घरसँ पढ़ि‍-लि‍खि‍ शहरमे नीक पदपर स्‍थापि‍त भऽ बेटा-कनि‍यॉं गामक संस्‍कारसँ परि‍पूर्ण अछि‍। आजुक व्‍यस्‍तता, पाइक महत्ता आ छद्म-मुखौटाधारी एकोटा पात्र रमाकांतक परि‍वारमे नै भेटत।
     उपन्‍यासकारक वि‍चार-दृष्‍टि‍ समाजमे मूल्‍य स्‍थापि‍त करब अछि‍ तेँ ओइ दृष्‍टि‍सँ उपन्‍यासकेँ देखक चाही। जे अछि‍ जे होइत अछि‍ ताहि‍ माध्‍यमसँ अबैत भवि‍ष्‍यकेँ सचेत नहि‍ कऽ मानवीय-दृष्‍टि‍सँ आदर्श समाजक स्‍थापनापर हि‍नकर वि‍स्‍वास छन्‍हि‍।
     भाषा हि‍नकर वि‍कासशील अछि‍। वि‍शेष वर्गमे स्‍थापि‍त भाषासँ अलग व्‍यवहारक शब्‍द आ भाषा हि‍नक उपन्‍यासमे छनि‍ ताहि‍ कारणे पाठककेँ अपन समाजक बोध होइत छनि‍।
     मंडल जीक उपन्‍यास और सेवासदनक आदर्श एक्‍के अछि‍। अपन जीवनकालमे मंडल जी मार्क्‍सवादसँ प्रभावि‍त छथि‍। एकर स्‍पस्‍ट दर्शन अपनेकेँ जमीन वि‍तरण प्रणालीमे अवस्‍से देखबामे आओत। कि‍छु लेखक जमीन छि‍नए लेल ठाढ़ समाजक चि‍त्रण केनि‍हार भेटताह मुदा, मंडल जीक पात्र रमाकांत अपन मोने प्रसन्‍न्‍ा मोने वि‍तरण करैत अछि‍।
     श्रृति‍ प्रकाशनसँ प्रकाशि‍त पोथि‍ सुन्‍दर आ छपाइक आकर्षक आवरणसँ युक्‍त अछि‍।

पोथि‍क नाम- मौलाइल गाछक फूल
उपन्‍यासकार- जगदीश प्रसाद मंडल
प्रकाशन- श्रृति‍ प्रकाशन, दि‍ल्‍ली
मूल्‍य- २५० टाका


१९. ०६. २०१०

 4.
राजदेव मंडल
कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक लेल पत्र-

प्रि‍य बन्‍धु,
   अहॉंक दीर्धकाय ग्रंथ ‍‍कुरूक्षेत्रम् अन्‍तर्मनक‍‍ पढ़बाक सुयोग प्राप्‍त भेल। कतेको साहि‍त्‍यि‍क कृति‍ (उपन्‍यास, कवि‍ता, कथा-गल्‍प संग्रह, नाटक, महाकाव्‍य, बाल नाटक, बाल कथा, बाल कवि‍ता, प्रबन्‍ध-नि‍बन्‍ध समालोचना आदि‍)केँ एकहि‍ं पुस्‍तकमे संग्रहि‍त कए अहॉं पाठकक लेल एकटा तेहेन पुष्‍पमाला बना देलि‍एक जाहि‍मे लगैत अछि‍ जे वि‍भि‍न्‍न रंगक पुष्‍प एकहि‍ं जगह गॉंथल हो। आ पाठक वृन्‍द साहि‍त्‍यक कोनहु स्‍वाद एहि‍ दीर्घ पोथीसँ प्राप्‍त कए सकैत छथि‍‍। नि‍श्‍चय अपनेक ई प्रयास साहि‍त्‍यक लेल नवीन अछि‍ संगहि‍ कर्मठताक साक्ष्‍य....।
     हम कोनहु पैघ समीक्षक नहि‍ छी तेँ समीक्षा करबाक दायि‍त्‍वपूर्ण कार्यक लेल अक्षम छी। तथापि‍ अहॉंक पुस्‍तक पढ़लाक उपरान्‍त मनमे जे वि‍चारक उद्भव होएत ताहि‍सँ अवगत करा देब एकटा दायि‍त्‍व सन बुझैत छी। तेँ कि‍छु अपन वि‍चार पठा रहल छी।
     बन्‍धु, प्रथमत: ई कहबामे हमरा कनि‍यो संकोच नहि‍ होएत अछि‍ जे मैथि‍ली साहि‍त्‍यक लेल जे अपने साहि‍त्‍य आन्‍दोलनक कार्य क‍ऽ रहल छी से साहि‍त्‍यक लेल तँ एति‍हासि‍क अछि‍ए। संगहि‍ मैथि‍ली प्रेमी, मि‍थि‍लावासी सेहो अहॉंक एहि‍ सुकार्यकेँ कहि‍यो नहि‍ भूलत-बि‍सरत।
    
बालकथा-
     अहॉं मि‍थि‍लांचलमे पसरल छोट-पैघ कथा सभकेँ नवीन रूपेँ संग्रहि‍त कएने छी। अहाँक एहि‍ प्रयाससँ वि‍लुप्‍त होइत कथा सभ पुन: जीवन्‍त भ‍ऽ उठल अछि‍। बगि‍याक गाछ बचपनावस्‍थामे दादीक मुँहसँ सुनने रही। आइ पुन: पढ़बाक अवसर भेटल।
     राजा सलहेस, महुआ घटवारि‍न, नैका-बनि‍जारा, जट-जटि‍न इत्‍यादि‍ कथ्‍ाा सभ पढ़लासँ लगैत अछि‍ जे एति‍हासि‍क बहुत गूढ़, तथ्‍यपूर्ण बात सभ सोझा अाएल अछि‍। क्षि‍प्रताक साथ अग्रसर होइतो सब बातक संकेत धरि‍ आबि‍ गेल अछि‍ आ ओहि‍ प्राचीण समएक दशा आ दि‍शाक ज्ञान सहजहि‍ं परि‍लक्षि‍त भ‍ऽ रहल अछि‍। सामाजि‍क जि‍नगीक क्रि‍या-कलापक वर्णन करैत अहॉं जे चि‍त्र उपस्‍थि‍त कएने छी। ताहि‍मे ओहि‍ काल वि‍शेषक प्रेम-घृणा, संयोग-वि‍योग, उन्‍नति‍-अवनति‍, बैर-प्रीत, शांि‍त-अशांति‍, वीरता-कायरता, मुर्खता-वि‍द्वता सबटा भि‍न्न-भि‍न्न रूपेँ प्रगट भेल अछि‍। पढ़ैत काल लगैत अछि‍ जे हम दोसर संसारमे प्रवेश कएने छी। ओहि‍ समएकेँ जँ एखुनका समएसँ तुलना करैत छी तँ बुझि‍ पड़ैत अछि‍ जे वि‍कास कते तीब्र गति‍सँ भ‍ऽ रहल अछि‍। आ एहि‍ पुरान भेल जि‍नगीक कथापर कलम चलौनाइ कोनो साधारण गप्‍प नहि‍ अछि‍। वि‍षए-वस्‍तु सभपर जे अहॉं संतुलन बनौने छी से समए आ परि‍स्‍थि‍ति‍क अनुकूल अछि‍।

संकर्षण-नाटक- अपाला आत्रेयी-दानवीर दधीची
     अपाला आत्रेयी आर दानवीर दधीची-एहि‍ दुनू बाल नाटकमे आहॉं कथा कि‍छु नव रूपे प्रकट कएने छी। से पात्रकेँ अनुरूपे अछि‍। कथोप-कथनमे प्रवाह अछि‍ आर छोट-छोट वाक्‍यक प्रयोग अछि‍। जे नाटकीयतामे प्रभाव उत्‍पन्न करैत अछि‍। जेना दानवीर दधीचि‍क एकटा कथोपकथन : ‍दधीची- इन्‍द्र। कुरूक्षेत्र लग एकटा जलाशय अछि‍ जकर नाम अछि‍, शर्यणा। अहॉं ओतय जाउ। ओतय घोड़ाक मुड़ी राखल अछि‍.....। ओहि‍सँ नाना प्रकारक शस्‍त्र बनाउ।‍
     बाल नाटक- बालकेँ ज्ञान बृद्धि‍क लेल सेहो उपयोगी अछि‍।

संकर्षण-
     नाटक एकटा नवीन चरि‍त्रसँ परि‍चि‍त करबैत अछि‍। जे गामक लोककेँ ठकनाइकेँ नीक बुझैत अछि‍। एि‍ह अवगुणकेँ प्रति‍भा बुझैत रहैत अछि‍।‍ अवगुणक प्रति‍फलपर कनेको वि‍चार नहि‍ करैत अछि‍। वएह बेकती जखन दि‍ल्‍ली सन महानगर जाइत अछि‍ तँ रास्‍तामे स्‍वगं ठका जाइत अछि‍। लालकि‍लामे जूता कि‍नबा काल ओकरा पता चलि‍ जाइत अछि‍ जे ओ ठक वि‍द्यामे कतेक पाछू अछि‍, उदाहरण रूपेँ एकटा कथोपकथन : ‍गोनर- अहॉंकेँ ठकि‍ लेलक। अहॉंक नाम तँ बुझनुक लोकमे अबैत अछि‍। संकर्षण- मि‍त्र की कहू‍?......। एहि‍ लालकि‍लाक चोर बजारक लोक सभ तँ कतेको महोमहापाध्‍यायक बुद्धि‍केँ गरदामे मि‍ला देतन्‍हि‍।‍
     छोट छीन कथोपकथन द्वारा व्‍यंग्‍य, हंसी आ गम्‍भीर बातकेँ सहज ढंगसँ कहि‍ देब अहॉं लेखनीक वि‍शेषता थीक। नाटककेँ आकार लघु अछि‍ जे नवीनताक सूचक अछि‍। तथा मि‍थि‍लामे पसरल बहुत रास बातकेँ समटबाक प्रयास नि‍श्‍चय सराहनीय अछि‍। मंचि‍त करबाक लेल दि‍शा नि‍र्देश नीक ढँगे कएल गेल अछि‍।
     नाटक पठनीयता संगे नाटकीयतासँ परि‍पूर्ण अछि‍। आर संकर्षण आकर्षणसँ भरल अछि‍।।

शेषांश आगू देल जाएत-
१.डॉ. शेफालिका वर्मा- एकटा  लघुकथा २.कथा-नन्‍द वि‍लाश राय-ऐना
डॉ. शेफालिका वर्मा
एकटा  लघुकथा

शैतान वृध्ह  भ गेल छल , अपन उत्तराधिकारी लेल सर्व्गुन्सम्पन्न शैतान खोजी रहल छल बेकल भय ; सभा बजाओल गेल. शैतान सभ से पुछलक 'के के कोन कोन काज आय धरि केने छी ?
दरबार में से केओ बजाक..हुजुर हम एतेक गोटे के खून केने छी जाकर हिसाब नहि ऐछ, केओ हम एतेक बच्चाक खून, केओ हम एतेक स्त्रीक संग बलात्कार केने छी , हम जते जते डकैती करय गेलों ,ओहिठाम केकरो जीवित नै छोढ़लों, हम गाम क गाम उजारी देने छी , हम कतेक अपहरण केने छी से कही नै सकैत छी.; जतेक मुंह ओतेक बात . मुदा , शैतानक माथ लाज से झुकि गेल , बाजल ===छिः छिः ,अहाँ सबहक काज देखि हमरा लाज भ रहल कोनो जोकरक अहाँ सब नहि छी. --परेसान जका चारू क़ात दरबार में ताकलक....... आर केओ छैक ?
एकटा प्रौढ़ , सभ्य ,शालीन व्यक्ति  उठि के ठाढ़ भेल ,माथ झुकोने विनम्रता से बाजल -----
हमरा ते लहास गिनवाक फुर्सत नहि  भेटल , मुदा ,हम जेकर जेकर खून केलों ओ अंत अंत धरि हमरा अपन दोस्त बूझैत रहल..                     
शैतान ख़ुशी से गद गद भ गेल ..ई थीक हमर राज्यक असली वारिस  .......


 
२.
कथा
 
नन्‍द वि‍लाश राय

ऐना


हम अपन सारक बेटाक वि‍आहमे गेल छलौंहेँ। हमर सारक बेटा रेलवेमे इंजीनि‍यर अछि‍। ओ अलीगढ़ मुस्‍लि‍म वि‍श्‍ववि‍द्यालसँ इंजीनि‍यरि‍ंगक डि‍ग्री लेने अछि‍। हमर सारक बेटाक नाम ललन थीक। ओ देखवा-सुनवामे वड्ड सुन्‍नर अछि‍। गोर वर्ण, पॉंच हाथक जवान। दोहरा कद-काठी। जेहने ओ सुन्‍नर अछि‍ तेहने ओ पढ़ैओ-लि‍खैओमे तेज छल।
     ललनक वि‍आह पॉंच लाख टाकामे बैरमा गामक वुच्‍चन ठाकुरक बेटीसँ तँइ भेल छल। बुच्‍चन ठाकुर मध्‍य वि‍द्यालकमे शि‍क्षक छथि‍न्‍ह। अपना बेटीकेँ इन्‍टर पास करौएने छथि‍न्‍ह। हमर सार महेशकेँ लड़की पसन्‍द भेल आ ओ ललनक वि‍आह बुच्‍चन ठाकुरक बेटीसँ पक्‍का कए लेलक। बुच्‍चन ठाकुरक चारि‍ लाख टका तँ हमर सार महेशकेँ दए देलक मुदा एक लाख टका वॉंकी रहि‍ गेल। बुच्‍चन ठाकुर कहलखि‍न- जेतेक टाका वॉंकी अछि‍ वि‍आहक दू दि‍न पहि‍ने भेट जाएत मुदा, वि‍आह दि‍न जखन टका नहि‍ पहुँचल तँ हमर सार हमरासँ कहलनि‍- पाहुन टका तँ बुच्‍चन बावू अखन तक नहि‍ भेजलक हेँ। कि‍ कएल जाए?”
  हम कहलअनि‍- आइ वि‍याह थीक। आव की कएल जाए सकैत अछि‍। वि‍आह तँ हेवे करत। भऽ सकैत अछि‍ जे बुच्‍चन बावूकेँ कोनो मजवूरी भऽ गेल होएतनि‍। चलू शुभ-शुभ कऽ वि‍आह करेवाक लेल।
     हमसब दुल्‍हा आ वरातीकेँ लऽ सात वजे सॉंझमे बैरमा गाम पहुँच गेलौं। वरातीकेँ सवेरे पहुँचलापर बैरमा गामक समाज आ बुच्‍चन बावूक सर-कुटुम सभ बड्ड प्रसन्‍न्‍ा भेलाह।
     बुच्‍चन बावू हमर सार महेशकेँ कातमे लऽ गेलाह संगमे हमहूँ छलहुँ। कहलखि‍न- हम समएपर टका नहि‍ भेज सकलहुँ ताहि‍ लेल अपने सभ लग लज्‍जि‍त छी। मुदा वादा करैत छी, कनि‍यॉं वि‍दागरीसँ पहि‍ने अहॉंक टका दऽ देव।
  हमर सार कि‍छु नहि‍ बजलाह। हम कहलयनि‍- ठीक छैक अहॉं अपना वादापर कायम रहव आ वि‍दागरीसँ पहि‍ने टका महेश बावूकेँ दए देवनि‍।
  बुच्‍चन बावू बजलाह- अवश्‍य-अवश्‍य।
 अवश्‍य-अवश्‍य बजैत ओ आंगन चलि‍ गेलाह आ हमसब वासा पर आवि‍ बैसलौं। जलखै-नाश्‍ता, चाह-पान आदि‍ सभ चलए लगल। संगहि‍ ति‍लकक ओरि‍ओन हुअए लगलैक।
     बरातीक स्‍वागत बड्ड नीक जकॉं भेल। खान-पानमे कोनो कमी नहि‍ भेल। शुभ-शुभ कऽ वि‍आहो सम्‍पन्‍न भेल। मुदा बुच्‍चन बावू अपन वादाक मुतावि‍क कनि‍यॉं वि‍दागरीसँ पहि‍ने वकि‍यौताबला एक लाख नहि‍ दऽ सकलाह। हमर सार महेशकेँ बड्ड दुख भऽ गेलैक। ओ बाजल तँ कि‍छु नहि‍ मुदा अवैतखान समधी मि‍लन नहि‍ केलक। हमरा ई गप्‍प नहि‍ पसीन भेल। हम समझेवाक प्रयास केलौं मुदा, ओ हमरा गप्‍प नहि‍ मानि‍ फटफटि‍यापर बैसि‍ कऽ चल गेलाह। हम कनि‍यॉंकेँ वि‍दागरी करा कऽ अपन सासुर मैलाम पहुँचलौं। हमरा अपना सारपर बड्ड तामस छल। हम हुनाका दरबज्‍जापर जाइते अपन संतुलन नहि‍ राखि‍ सकलौ आ महेशकेँ देखि‍ते कहलि‍यै- ......
क्रमश:    
  

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7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...