Sunday, July 04, 2010

'विदेह' ६० म अंक १५ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ६०)-PART III


  हँ। कन्‍ना नै ि‍वसवास हएत। कोनाे ि‍क झुठेसँ गोसाँइ खेलाइए।
जोगि‍नदरक बात सुि‍न मंगल मने-मन सोचए लगल जे एक िदस दोस्‍ती भेल आ दोसर दि‍स दुसमनीक रास्‍ता सेहो बनि‍ रहल अछि‍। अखन धरि‍ वएह ओझा-गुनी लोककेँ ओझरौने अछि‍, तइओ लोकक ि‍वसवास जमले छै। कोन जरूरी छलै जे ि‍बना कहनहि‍ सुननहि‍ अपने मने चलि‍ आएल। ठीके गोसॉंइ जी कहने छथि‍न जेभइ गति‍ सॉंप छुछुन्‍दर केरी।अगर भगतकेँ भगा देवइ तँ तेहन बवंडर करत जे पूजा पूजे रहि‍ जाएत। जँ नै भगेवै तँ गहबर बना बड़का तमाशा ठाढ़ करत। सोचैत-ि‍वचारैत मंगल पुछलक-तोहर अप्‍पन की वि‍चार होइ छह?”
  भाय, जँ अपना मने करैक रहि‍तए तँ तोरा ि‍कअए पुछि‍ति‍यह।
  जोगि‍नदक वि‍चार सुनि‍ मंगलक मन आरो ओझरा गेल। कनी काल गुम्‍म रहि‍ पुछलक-भाय, तू केते दान करए चाहै छह। दान-पुनक अनेको जगह अछि‍।
  जते दान-पुनक जगह देखै छि‍यै ओ लगले थोड़े हएत। जे लगले हएत वएह करब।
      मंगलक मनमे फेरि‍ शंका उठल जे हो न हो, ई इ ने कहि‍ दि‍अए जे ईंटाक गहबर बना देवइ। जँ से कहत तँ ने वि‍रोध करैत बनत आ ने समर्थन। चपाड़ा दैत कहलक-बड़ सुन्‍दर वि‍चार छह। हमहूँ यएह कहैले छेलि‍यह।
  मनमे होइए जे गाममे जते ि‍वधवा, नि‍:सहाय मसोमात अछि‍ ओकरा सभकेँ मदति‍ कऽ दि‍यै।
      मसोमातक नाओ सुनि‍ मंगलक मनमे खुशीक लहरि दौड़ि‍ गेल। हँसैत बाजल-बड़ ि‍चक्‍कन बात बजलह। मुदा, मसोमातक ि‍वषएमे कने वुझह पड़तह।
  की?”
  अपना ऐठाम दू तरहक मसोमात अछि‍। एक तरहक सरकारी अछि‍ आ दोसर तरहक समाजक अछि‍।
  नइ बुझलौं?”
  सरकारी मसोमात ओ छी जे सरकारक देल सभ सुवि‍धा पबैत अछि‍। आ समाजि‍क ि‍वधवा ओ छी जेकरा ने सरकार जनै छै आ ने ओ सरकारकेँ जनैत अछि‍। ि‍कछु गनल सरकारी मसोमात अछि‍ जे ओकर पोसुआ छी। जे कोनो सरकारी सुवि‍धा मसोमात सबहक लेल औत ओ ओकरे भेटि‍तै। अजीब खेल सरकारो आ मसोमातोक अछि‍। ओही पोसुआ मसोमातकेँ इन्‍दि‍रो आवासक घरो छै आ बाढ़ि‍-बरखामे घरखस्‍सीक रूपैआ सेहो भेटतै आ बाढ़ि‍सँ क्षति‍ फसलक क्षति‍पूर्तिक रूपैआ सेहो ओकरे भेटतै। ततबे नहि‍, वृद्धावस्‍था पेंशन सेहो ओकरे भेटतै आ रोजगार चलबैक नामपर सबसीडी सेहो भेटतै। तेँ सरकारी मसोमात छोड़ि‍ जे ि‍नरीह समाजक मसोमात अछि‍, जँ ओकरा जीवैक उपाए भऽ जाय तँ उपाय केनि‍हारकेँ अइसँ बेसी दान-पुनक फल कतऽ भेटतै। धन्‍यवाद ओहि‍ माए-दादीकेँ दी जे सत्तरि‍-अस्‍सी बर्ख ि‍बतौलाक बादो जेठक दुपहरि‍या, भादवक झॉंट आ माघक शीतलहरीमे, जी-जानसँ मेहनत करैत अछि‍। धन्‍यवाद ओहि‍ अस्‍सी बर्खक मैयाकेँ दी जे माथपर धान, गहूम, मकैक बोझ लऽ कऽ दुलकी चालि‍मे गीत गुनगुनाइत खेतसँ खरि‍हान अबैत छथि‍। तेँ, कहवह जे अखन तँ मेलाक धुमसाही अछि‍, मेलाक पछाि‍त सभकेँ अपन रोजगारक उपाय कऽ दि‍हक। काज करब अधलाह नहि‍ मुदा, ओ शरीरक शक्‍ति‍क अनुकूल काज होय। अखन तत्-खनात पॉंच दि‍नक मेला भरि‍क बुतात, मेला देखैक लेल ि‍कछु नगद, एक-एक जोड़ साड़ी आ आङी दऽ दहक। मुदा, बीचमे एकटा बात आराे छह। आ ओ हमर ि‍मथि‍लाक धरोहर सम्‍पत्ति‍ सेहो छी। ओ ई जे जे ि‍जनगीक चारू पायासँ हारि‍ चुकल अछि‍, दुखक पहाड़क तरमे पि‍चाइल अछि‍ मुदा, आत्‍मबल एत्ते सक्‍कत छैक जे दान लइसँ आना-कानी करतह। तेँ पहि‍ने जा कऽ ओहि‍ मैया सभकेँ गोड़ लाि‍ग कहि‍हक बाबी, समाजरूपी परि‍वारक अहूँ छी आ हमहूँ छी, तेँ कमाइबलाक ई दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍ जे परि‍वारमे बृद्ध आ बच्‍चाक सेवा इमानदारीसॅँ होय। हम अहॉंकेँ मदति‍ सेवाक रूपमे दऽ रहल छी। जरूर ओ वेचारी हँसि‍ कऽ लए असि‍रवाद देथुन।
      मंगलक ि‍वचार सोझे जोि‍गनदरक करेजमे घुसल। करेजमे घुसि‍तहि‍ ि‍तलमि‍ला गेल। जना ओि‍ह मसोमात सबहक हृदय जोगि‍नदक हृदयमे धक्‍का मारि‍ प्रवेश करए चाहैत होय। मन पसीज गेलै। ओना जइ गाममे जोि‍गनदक जनम भेल छलै ओि‍ह गाममे अनेको मसोमात पहि‍नहुँ छलि‍ मुदा, जे रूप आइ देखलक ओ पहि‍ने नहि‍ देखने छल। कँपैत मनसँ जोि‍गनदर बाजल-भाय, जे कहलह से अखने कऽ लइ छी। मुदा, अइसँ मन नै मानि‍ रहल अछि‍। मेलाक बाद नीक जेकॉं ि‍वचारि‍ ि‍कछु करब।
     
      प्रोफेसर दयानन्‍द, साइि‍कलसँ सोझे बँसपुरा वि‍दा भेला। गामक सीमा टपि‍तहि‍ देखलनि‍ जे एकटा शि‍क्षक (जेकर बहाली शि‍क्षा ि‍मत्रमे हजार रूपैयापर भेल) बीचे रस्‍तापर साइि‍कल लगा मोबाइल कानमे सटौने रहै। मुदा, ि‍कछु बजलाह नहि‍। मनमे भेलनि‍ जे एक तँ वहि‍ना अबेर भेल अछि‍ तहि‍पर सँ ि‍कछु कहबै अा रक्‍का-टोकी शुरू करत तँ अनेरे आरो समए लागत। मुदा, मन असथि‍र नहि‍ रहलनि‍। सोचए लगलाह जे अखन ने दरभंगा कओलेजमे छी, डेरो लगेमे अछि‍। मगर जखन एम.ए. पास केने रही तखन अपना साइि‍कलो ने रहए। पाएरे डेढ़ कोस चलि‍ कओलेज पढ़बैले जाय। जहन ि‍क देखै छी गामक शि‍क्षक गामक स्‍कूलमे काज करैत अछि‍ आ मोटर साइि‍कलसँ जाइत अछि‍। हजार रूपैयाक नोकरी केनि‍हार तीन हजारक अपन ि‍जनगी बनौने अछि‍। की ओहि‍ ि‍शक्षकसँ पूछि‍ सकै छि‍अनि‍ जे अहॉं अपन जि‍नगीक सीमा बुझै छी? जँ नहि‍ बुझै छी तँ अहॉं पढ़ेबै की? बच्‍चा सभ अहॉंसँ की सि‍खत? ई सभ सवाल मनमे उठि‍तहि‍ दयानन्‍दक मन उलझि‍ गेलनि‍। फेरि‍ मनमे उठलनि‍ जे जहि‍ना खढ़होरि‍मे पैसैक लेल दुनू हाथसँ खढ़ हटबए पड़ैत छैक तहि‍ना सभ उलझनकेँ मनसँ हटबैत बँसपुराक संबंधमे सोचै लगलाह।
      ि‍ससौनी बैसारक समाचार ि‍बरड़ो जेकॉं लगले चारू भागक गाम सभमे पहुँच गेल। बँसपुराक काली-पूजा समि‍ति‍क बैसारमे सेहो ि‍ससौनि‍एक चर्च चलैत। प्रो. दयानन्‍दकेँ देखि‍तहि‍ मंगलो आ देवनाथो उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ दुनू हाथ जोि‍ड़ प्रणाम केलकनि‍। प्रणाम कऽ मंगल दयानन्‍दक हाथसँ साइि‍कल पकड़ि‍-मंडपक बगलमे लगा देलक। साइि‍कल ठाढ़ कऽ मंगल दयाबाबूक हाथ पकड़ि‍ बैसारमे लऽ गेलनि‍। समि‍ति‍क ि‍बचहि‍मे एक साए एक रूपैया चंदा दऽ पुछलखि‍न-एकाएक अहॉं सबहक मनमे काली पूजा कोना आएल?”
  प्रोफेसर दयानन्‍दक प्रश्‍नमे रहस्‍य ि‍छपल छलनि‍। तेँ क्‍यो ि‍कछु उत्तर देबे ने केलकनि‍। सि‍सौनि‍एक दुर्गा-पूजाक घटनाक प्रति‍क्रि‍यास्‍वरूप भऽ रहल अछि‍। जइ बातकेँ छि‍पबैत ि‍कयो ि‍कछु नहि‍ बाजल। मुदा, दयानन्‍दक प्रश्‍न एहि‍सँ अलग छलनि‍। हुनकर प्रश्‍न छलनि‍ जे दुर्गा-पूजा -शक्‍ति‍क पूजा, संगठनक होइत- जहन ि‍क काली-पूजा कालक, समएक- होइत। प्रश्‍न उठैत जे शक्‍ति‍क संचयमे समएक की योगदान होइत। मुदा, अपन रहस्‍यमय ि‍वचारकेँ ि‍छपबैत दयानन्‍द कहलखि‍न-बड़ सुन्‍दर काज अहॉं सभ केलौं। एहि‍सँ समाजमे नव चेतनाक उदय होइत छैक। जे सभ समाजक लेल जरूरि‍ये अछि‍।
      प्रोफेसर दयानन्‍द आ बँसपुरा काली-पूजा समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच गप-सप्‍प चलि‍ते रहै ि‍क हुनका माने दयानन्‍दकेँ तकैत बरहरबाक प्रोफेसर कमलनाथ मोटर-साइि‍कलसँ पहुॅचलथि‍। प्रो. दयानन्‍दकेँ कनडेरि‍ये ऑंखि‍ये कमलनाथ नि‍च्‍चॉंसँ उपर माने पएरसँ माथ धरि‍ देखि‍ कहलखि‍न-दयाबावू, हम तँ अहींकेँ भजि‍अबैत घरपर होइत एलहुँहेँ।
      कमलनाथक बातक उत्तर नहि‍ दए दयानन्‍द मुस्‍की दैत कहलखि‍न-भाय सहाएव, कनि‍ये काल एहि‍ठाम देखि‍ लइ छी, तहन दुनू भॉंइ संगे चलब। अपने पढ़ाओल शि‍ष्‍य सभ पूजाक आयोजन कऽ रहल अछि‍।
  देवनाथो आ मंगलो, काओलेजमे दयानन्‍दसँ पढ़ने छल। तेँ दयानन्‍दकेँ ि‍वशेष ि‍सनेह रहनि‍। प्रोफेसर कमलनाथ सेहो ि‍वचहि‍मे बैसि‍ गप-सप्‍प सुनए लगलाह। पूजाक सभ व्‍यबस्‍था बुझि‍ दयानन्‍द मंगलकेँ कहलखि‍न-अखन तँ ओहि‍ना बुझै दुआरे आएल छलौं मुदा, राति‍मे सभ-परि‍वार सहि‍त- देखैले आएब। कनी काल आरो थम्‍हि‍तौं मुदा, भाय सहाएव कमलबावू आि‍ब गेल छथि‍। भाय सहाएबकेँ तोँ सभ नहि‍ चि‍न्‍हैत हेबहुन। हमर गुरू भाय छथि‍। चारि‍ बर्ख हि‍नकासँ पढ़ने छी। दस बर्ख पहि‍ने कओलेजसँ सेवा-नि‍वृत भेलि‍ छलाह। अपने परोसि‍या सेहो छथि‍। बरहरबे घर ि‍छअनि‍।
      प्रोफेसर दयानन्‍दो आ प्रोफेसर कमलनाथोक आगमनसँ देवनाथोक आ मंगलोक मनमे चारि‍-बर उत्‍साह बढ़ि‍ गेल। दुनूक मनमे खुशी आ नव शक्‍ति‍क संचार शरीरमे भऽ गेल। प्रोफेसर कमलनाथ एक साए एक्‍कैस रूपैया चंदा देलखि‍न। दुनू गोटेकेँ आग्रह करैत मंगल कहलखि‍न-गुरूदेव, आब अपने सभ कतए जाएव। रहि‍ये जाइऔ। केयो अओताह अहॉं सभ आएले छी।
      मंगलक बात सुि‍न प्रो. कमलनाथ कहलखि‍न-बौआ, अखन धरि‍ तू सभ नह ि‍चन्‍हैत छेलह। जहन ि‍क एक अरि‍या-पटि‍या छी। महि‍नामे कमसँ कम पॉंच बेरि‍ एि‍ह गाम होइत अबै-जाइ छी। औझुका संयोग नीक रहल जे सभसँ भेटि‍ भऽ गेल। ि‍सर्फ भेंटे नहि‍ चि‍न्‍हा-परि‍चए सेहो भऽ गेल। सभ एक्‍के अि‍रया-पटि‍या छी तेँ एकठाम बैि‍स सभ गामक उत्‍थानक लेल ि‍वचार-ि‍वमर्श कऽ आगू बढ़ैत रहब। ओना तँ हम बूढ़ भेलौं मुदा, तइओ दौनक मेहोता बड़द जेकॉं, जाधरि‍ जीबैत छी ताधरि‍ संग-साथ दैत रहबह। गामकेँ आगू बढ़बैक लेल दू तरहक काज करैक जरूरत अछि‍। पहि‍ल, मनुष्‍यकेँ जीबैक लेल मूल आवश्‍यकता की अछि‍ ओ बुि‍झ ओकर पूर्ति करैक आ दोसर पाछुसँ अबैत ि‍क्रया-कलापकेँ ढ़ंगसँ देखि‍ अधलाहकेँ छोि‍ड़ नीकक अनुशरण करैक। अखन तोहूँ सभ नमहर काजमे लागल छह ओकरा नीक-नहॉंति‍ सम्‍हारि‍ लाए तकर बाद बुझल जयतैक।
      कहि‍ कमलनाथ दयानन्‍दक संग ि‍कछु दुर हटि‍ गप-सप्‍प करए लगलाह। कमलनाथकेँ दयानन्‍द पुछलखि‍न-अपनेकेँ बड़ हलचल देखलौं। ि‍कछु खास बात छैक, की?”
  मुस्‍कुराइत कमलनाथ कहलखि‍न-खास बात तँ अहीं कहब। करीब साढ़े नओ बजे भाति‍ज आबि‍ कऽ कहलक जे दयाबावूक गाममे बैसार छलनि‍ जहि‍मे ि‍कछु गोटे हुनका गरि‍ऐबो केलकनि‍ आ मारबो केलकनि‍। से कहॉं धरि‍ की बात छि‍यैक?”
  कमलबावूक बात सुि‍न दयानन्‍द अवाक् भऽ गेलाह। मने-मन सोचए लगलाह जे बैसारमे तँ ि‍कयो आन गामक नहि‍ छल, तहन कोना बात उड़ि‍याएल। फेरि‍ भेलनि‍ जे इलाकाक सभ गाम एक-दोसरसँ जुड़ल अछि‍। कर-कुटुमैतीसँ लऽ कऽ आवाजाही, हाट-बजार धरि‍क संबंध रहैत अछि‍। परि‍वारक काज ने साधारण ढ़ंगसँ चलैत अछि‍ मुदा, सामाजि‍क काज तँ ि‍बरड़ो जेकॉं उड़ैत चलैत अछि‍। भरि‍सक सएह भेल। फेरि‍ मनमे उठलनि‍ जे जँ ि‍कछु अधलाह बात उड़बे कएल तँ ओहि‍ संग घटनो उड़ल हएत। जखने घटना उड़ल हएत तखने ि‍वरोध स्‍वरूप चर्चा भेल हएत। से तँ अधलाह नहि‍ भेल। ओ तँ नीके भेल। अन्‍यायक ि‍वरोध करब तँ धर्मक रक्षा करब थि‍क। जहि‍ना अन्‍यायक ि‍वरोध केलासँ रामायणि‍क बालि‍मे दोबर शक्‍ति‍क संचार भऽ जाइत छल तहि‍ना तँ भरि‍सक इहो भेल। अन्‍यायि‍क बीच जरूर दहसति‍ बढ़ल। ई तँ ि‍जनगीक लेल पैघ उपलब्‍धि‍ छी। मुस्‍की दैत दुर्गा-पूजाक घटल घटनाकेँ दोहरबैत कहलखि‍न-सभ गाममे दस-बीसटा लुच्‍चा-लम्‍पट रहि‍ते अछि‍। जे सदति‍काल ि‍कछु ने ि‍कछु उकठ समाजमे करि‍ते रहैत अछि‍। ताड़ी-दारू पीि‍ब अनेरे ककरो गरि‍अबैत रहैत अि‍छ। माए-बहीनि‍केँ देखि‍ पीहकारी भरैत रहैत अछि‍। झूठ-फुसि‍ ि‍सखा लकठी लगबैत रहैत अछि‍। ओहन-ओहन बृत्ति‍ केनि‍हारक वृत्ति‍केँ रोकब समाजक दायि‍त्‍व बनि‍ जाइत अछि‍। हमहूँ सएह ने केलहुँ जँ दुर्गा-पूजामे रामेश्‍वरम् नहि‍ गेल रहि‍तौं तँ ऐहन घटना थोड़े गाममे होइत। जइ गाममे हजारो बर्खसँ अनेको पीढ़ी-खुशीसँ रहैत आइल अछि‍ ओहि‍ गाममे ऐहन-ऐहन घटना भेने समाजमे आि‍ग लागत आि‍क शान्‍ति‍ रहत। जाधरि‍ समाज शान्‍ति‍सँ नहि‍ रहत ताधरि‍ आगू मुँहे ससरि‍ कोना सकैत अछि‍? यएह सभ सोचि‍ गाममे बैसार केलौं। बैसारेमे ि‍कछु चक-चुक भऽ गेलै। समाजोकेँ धन्‍यवाद दी जे गलत काजक ि‍वरोधमे एकजुट भऽ ठाढ़ भेल। मुदा, गलति‍यो केनि‍हार तँ बेवस्‍थेक फूल-फड़ छी, तेँ ओहो कमजोर नहि‍ये अछि‍।
      प्रो. दयानन्‍दक बात सुि‍न प्रो. कमलनाथ कहलखि‍न- देखि‍यौ, कोनो स्‍थानर पहुँचैक लेल रस्‍तो अनेक आ सबारि‍यो अनेक तरहक होइत अछि‍ मुदा, चलनि‍हार जँ यएह सोचैत रहि‍ जाए जे ई नीक ि‍क ओ, तहन ओ पहुँच कोना सकैत अछि‍। अपना इलाकाक दुर्भाग्‍य रहल अछि‍ जे ि‍वचारक क्षेत्रमे पैघ-पैघ ि‍वचार कऽ लइ छी मुदा, कर्मक बेरि‍मे शि‍थि‍ल भऽ जाइत छी। कोनो ि‍वचार ताधरि‍ महत्‍व नहि‍ बनौत जाधरि‍ कर्मरूपमे नहि‍ औत। कहैले तँ सभ ि‍कयो अपना बच्‍चाकेँ सि‍खबैत छथि‍ जे बौआ अधलाह काज नहि‍ करि‍हेँ मुदा, केला बाद गबदी मारि‍ दैत छथि‍। एहि‍सँ कोना अधलाह काज मेटाएत। खैर जे ि‍कछु, मुदा, अहॉं प्रसन्‍नतासँ हमहूँ प्रसन्‍न छी। आगूक बात हेतइ। चलू।

















जीबन संर्घष-  3

नीन टुटि‍तहि‍ ओछाइनेपर दुखनीक मनमे उपकल आइये दीयोबाती छी आ काली-पूजाक मेलो गाममे हएत। ऐना कऽ बेटी श्‍यामाकेँ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍नहि‍ धीया-पूताकेँ नेने अवि‍हेँ, से कहॉं आइलि‍। ओहो बेचारी की करत? अन्‍न-पानि‍ घरमे हेतै मुदा, तीनू तूर जे मेला देखत तइले तँ दसो-बीच रूपैया खर्च हेबे करतै। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे नइ होइ तेकरो इन्‍जाम ने करए पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरि‍यान नइ भेल होय। हँ, हँ, भरि‍सक सएह भेल हेतै। ओना आइ भरि‍ अबैक समए छै, बेरो धरि‍ ऐवे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैया नेने औत मुदा, जरना तँ नै आनत। अखन धरि‍ हमहूँ तँ जरनाक कोनो ओरि‍यान नहि‍ये केलौंहेँ। आब कहि‍या करब? भने मन पड़ि‍ गेल। सोचने छेलौं जे श्‍याम आउत तँ घर-अंगनाक काज सम्‍हारि‍ देत सेहो नहि‍ये भेल। भरि‍ये ि‍दनमे की सभ करब। घरो छछाड़ैले अछि‍, ओलति‍यो ओहि‍ना पड़ल अछि‍। कन्‍ना असकरे एते काज सम्‍हरत? ओलतीमे माटि‍ भरब, ि‍क घर छछाड़ब आि‍क जरना आनव। काज देखि‍ अबूह लगि‍ गेलइ। असकताइत मने वि‍छानसँ उठि‍ ओलती देखलक। मुदा रौदि‍याह समए रहने माटि‍ देव जरूरी नहि‍ वुझि‍ पड़लै। काज हल्‍लुक होइत देखि‍ मनमे खुशी एलै। ओलति‍येमे ठाढ़ भऽ ओसार ि‍हयासलक। कतौ चुबाट नहि‍ देखि‍ सोचलक जे छछाड़वो जरूरी नहि‍ये अछि‍। बाढ़नि‍सँ झोल-झाड़ झाड़ि‍ देवै। आरो मन हल्‍लुक भेलै। मन हल्‍लुक होइते बाढ़नि‍ लऽ घरो-ओसारक झोल-झार झाड़ि‍, अंगनो बहारलक। बाढ़नि‍ रखि‍ घैला नेने कलपर गेल। छउरेसँ मुँह धाेइ-कुड़ड़्ा कऽ घैल भरने आंगन आइलि‍। पानि‍ पीबि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ सोचलक जे एक जूम खाइयो लेब आ दू जूम बान्‍हि‍ कऽ बाधो नेने जाएव। सएह केलक।
      ओना दुखनी पहि‍ने तमाकुल नहि‍ खाति‍ छलि‍, हुक्‍का पीबैत छलि‍। मुदा जहि‍यासँ लबहदक ि‍मल बन्‍न भेल तहि‍यासँ छुआ भेटवे बन्‍न भऽ गेल। जहि‍सँ पीनी महग भऽ गेल। घर बन्‍न कऽ कान्‍हपर लग्‍गी नेने मारन बाध वि‍दा भेलि‍। बाधक अधा भाग नि‍च्‍चॉं दि‍स खेती होइत बाँकी उपर दि‍स गाछि‍ये कलम अछि‍। बड़बड़ि‍या आमक गाछक नि‍च्‍चॉंमे ठाढ़ि‍ भऽ सुखल ठौहरी सभ ि‍हयासए लागलि‍। रौदि‍याह समए रहने मनसम्‍फे जारन देखलक। जारन देखि‍ मन चपचपा गेलइ। आँचरक खूँट खोलि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ एक चुटकी मुँहमे लेलक आ फेरि‍ बान्‍हि‍ लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते मन पड़लै जे उक बनबैले खढ़ कहॉं अछि‍। आन साल लोक आसीन-काति‍कमे खढ़होरि‍ कटबै छलए ओइमे सँ दू मुठ्ठी रखि‍ लइ छेलौं। जइसँ सालो भरि‍ बाढ़नि‍यो भऽ जाइ छलए आ उको बना लेइ छेलौं। मुदा जेहन बाढ़नि‍ चड़ि‍काटूक होइए तेहन राड़ीक थोड़े होइए। हारल नटुआ की करत? तते ने लोक बकरी पोसि‍ नेने अछि‍ जे कतौ एकोटा चड़ि‍कॉंटू रहए दैत अछि‍। तहूमे तेहन रौदि‍याह समए भेल जे घसवाह सभ चोरा-चोरा घासेमे काटि‍ खरहोरि‍यो उपटा देलक। कथीक उको बनाएव? उक नै हएत तँ पावनि‍ कोना हएत। गाम ि‍क कोनो शहर-बजार छि‍यै जे ने लोक घरमे सीर-पाट रखैए आ ने उक फेड़ैए। सोझे छुड़छुड़ी-फटक्‍कासँ पावनि‍ करैए। नजरि‍ खि‍रा खढ़ भजि‍अवए लागलि‍। भजि‍अवैत गंगवापर नजरि‍ गेलइ। बुदवुदाइल-त: अनेने एते मन औनाइ छलए। घरे लग पोखरि‍क महारपर खढ़क जाक लगौने अछि‍। ओहीमे सँ लऽ आनब। मुँहमे खैनी घुलि‍तहि‍ थूक फेकलक। खढ़क ओरि‍यान देखि‍ मन सनठीपर गेलइ। ि‍बना सनठि‍ये उक कन्‍ना बनाएव? मनमे खौंझ उठलै। खौंझा कऽ बाजए लागलि‍-सभ खेतबला पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। आब अपनो उक बना लि‍अ। हमसब तँ सहजे गरीब छी अपना खेत-पथार नै अछि‍। मुदा खेतोबला उक फेड़ि‍ लि‍अ। माल-जालकेँ ठेका-गरदामी बना लि‍अ। आनह आब बजारसँ कीनि‍ कऽ प्‍लास्‍टि‍कक डोरी। अपने मालकेँ डोरीक रगड़ा लगतै, चमड़ी उड़तै माछी असाइ देतै, घा हेतै, मरतै। तखन बुझत जे पटुआ नै उपजेने केहन भेल।बजैत-बजैत दुखनीक तामस कमल। ि‍बनु सनठि‍ये जँ उक बनाइयो लेब तँ भोरमे सूप कथी लऽ कऽ बजाएव। लछमी ि‍दन छी जँ सूप बजा दरि‍दराकेँ नै भगाएव तँ ओ ि‍कन्‍नहुँ भागत। अपने गप-सप्‍प करै लागलि‍-कोनो की हमरेटा संठी नै हएत ि‍क गामेमे ककरो नै हेतै?”
  अनका भेने हमरा की? ि‍कयो अपन दरि‍दरा भगौत आि‍क दोसराक?”
  जँ कोनो जोगार कऽ सभ संठीक ओरि‍यान कऽ लेत आ हमरा नै हएत तखन तँ सबहक भागि‍ जेतै आ हमरे रहि‍ जाएत।‍
      दुनू हाथ माथपर लऽ संठीक चि‍न्‍तामे दुखनी डूबि‍ गेल। रसे-रसे हूबा टूटए लगलै। मन औनाए लगलै। जहि‍ना कोनो भारी चीज अांगुरपर पड़ि‍ गेलासँ छटपटाइत तहि‍ना संठीक सोगसँ मन छटपटाए लगलै। तरे-तर नजरि‍ गाममे टहलबए लागलि‍। एक बेरि‍ टहला कऽ देखलक तँ कतौ नहि‍ संठी अभरलै। फेरि‍ दोहरा कऽ टहलबए लागलि‍। फेरि‍ नहि‍ कतौ अभरलै। मन कहै जे ि‍बनु संठि‍ये उक अशुद्ध हएत। अशुद्ध उक गोसॉंइक आगूमे कन्‍ना फेड़ब। ओहो की बुझताह। फेरि‍ मनमे भेलै गरीब लोककेँ एहि‍ना सभ चीजक खगता रहै छै मुदा, कहुना तँ जीवि‍ये लइए। देवतो-पि‍तरकेँ बुत्ता नै छनि‍ जे अपनो पावनि‍-ति‍हारक ओि‍रयान करताह। संठी ताकब छोड़ि‍ डि‍हवार स्‍थानक भागवत मन पड़लै। भागवत मनमे अवि‍तहि‍ महाभारतक कृष्‍णकेँ कुरूक्षेत्रमे शंख फूकैत देखलक। मुदा जखन व्‍यासजी अर्थ बुझवए लगलथि‍न ि‍क तहि‍ काल खैनी खाइक मन भेलइ। ऑंचरक खूँटसँ खैनी नि‍काि‍ल चुनवए लागलि‍। अर्थ सुनबे ने केलक। भागवतक कम्‍मे बात रहै मनसँ नि‍कलि‍ गेलै। फेरि‍ संठि‍येपर मन आि‍ब गेलइ। पटुआक संठीक बदला चन्‍नी आ सनैपर नजरि‍ पहुँचलै। सनै आ चन्‍नीपर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मने-मन अपसोच करै लगल जे अनेरे ि‍गरहत सभकेँ दुसलि‍यै। पटुआक खेती तँ बेपारी सबहक दुआरे छोड़लक। मेहनतो आ लगतो लगा उपजबैत छलै आ बेपारी सभ गरदनि‍ कट्टी कऽ लैत छलै। नीक केलक जे पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। अपना जते डोरी-पगहाक काज होइ छै अो तँ सनइयो आ चन्‍नि‍योसँ कइये लैत अछि‍। मुदा बेपारि‍यो सभकेँ भाभन्‍स कहॉं भेलै। जहि‍ना ि‍गरहतक गरदनि‍ काटि‍ धन ढेरि‍औलक तहि‍ना प्‍लास्‍टि‍क आि‍ब सभटा खा गेलइ। बड़का-बड़का करखन्‍ना सभ ओहि‍ना ढ़न-ढ़न करै छै। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ दुखनीक मनमे खुशी उपकल। खूँटसँ तमाकुल नि‍कालि‍-मुँहमे लेलक। पटुओ संठीसँ मोट-मोट संठी चन्‍नीक होइ छै। सूपो बजबैमे नीक हएत। खूब जोरसँ बजाएव जे दोसरे ि‍दन दरि‍दरा पड़ा जाएत। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ घुरनापर नजरि‍ गेलइ। बान्‍हे कात खेतमे ओकरा खूब चन्‍नी भेलि‍ छलै। सोनो सुन्‍दर मुदा, पटुआक सोन जेकॉं सक्‍कत नइ होइ छै। खैर जे हौ काज तँ सम्‍हैर जाइ छै। घुरनाक घरवाली अछि‍यो बड़ आवेशी। जखने कहवै तखने बेसि‍ये कए कऽ देत। जेललबा बौहू जेकॉं धौंछ थोड़े अछि‍ जे सोझोक वस्‍तु लाथ कऽ लेत। अनकर चीज लइ बेरि‍मे धौंछीक मुँह केहेन मीठ भऽ जाइ छै जना मुँहसँ मौध चुवैत होय। भगवान करौ जे सभ चीज बि‍ला जाइ। तामसपर दुखनी सरापि‍ तँ देलक मुदा, लगले अफसोच करए लागलि‍ जे अनेरे ि‍कअए सरापि‍ देलि‍यै। कहुना भेलौं तँ माइये-पि‍ति‍आइन भेलौं ि‍क ने? माइये-बापक सराप ने धीया-पूताकेँ पड़ै छै। जेहेन चालि‍ रहतै तेहेन फल अपने हेतै। बीस बर्खसँ कहि‍यो थूको फेकए गेलि‍यै। अपना आि‍गये-पानि‍ये नि‍महै छी। आगि‍-पानि‍पर नजरि‍ अबि‍तहि‍ बेटी श्‍यामा मन पड़लै। ऐना कऽ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍ने चलि‍ अबि‍हें। अनका जेकॉं ि‍क तूँ असकरे छेँ। हाथी सनक सासु छेथुन तखन तोरा घरक कोन चि‍न्‍ता छौ। फेरि‍ मनमे उठलै लछमी पावनि‍ छी की ने। सभ ने अपना-अपना घरमे पूजा करत। भरि‍सक तही दुआरे नइ आइलि‍। तमाकुल खाइक मन भेलै। अँचराक खूँट खोलि‍ तमाकुल देखलक तँ एक्‍के जूम बुझि‍ पड़ल। एक्‍के जूम देखि‍ सोचलक जे एकरे दू जूम बना लेब। मुदा टूटल दॉंतक गहमे तँ हराइले रहत। एक्‍के जूम बना मुँहमे लेलक। तमाकुल लइते बेटापर मन गेलै। बेटा मन पड़ि‍ते दुखनी सोचए लगलि‍ जे सालो भरि‍ परदेशमे नइ रहत तँ कमाएत कतए? अंदाजे मनमे एलै जे चारि‍-पॉंच मास गेना भेल हेतै। मुदा चारि‍-पॉंच मास झुझुआन बुझि‍ पड़लै। फेरि‍ मन पाड़ि‍ ि‍हसाव जोड़ए लागलि‍। ठेकना कऽ मन पाड़लक जे आसीनमे गेल रहै। हँ, हँ आसि‍ने रहै। खानि‍-पीनि‍ चलैत रहै। हमहूँ पोखरि‍मे तेल-खैर चढ़ा कऽ आइल रही। अखैन काति‍क छी। ऐँ, तब तँ बरखोसँ बेसी भऽ गेलै। ओह नै, पैछला आसीन नै छी ि‍कऐक तँ ओकरा गेलापर नाइतक जनम भेल। ओहो छौँड़ा दौड़ैए। कहुना-कहुना दू बर्ख भेल हेतै। आंगुरपर ि‍हसाब जोड़ै लगल। दू बर्ख आ एक बर्ख तीन बर्ख ने भेल। तीन बर्ख मनमे अबि‍ते चौंि‍क गेल। ने एकोटा पाइ पठौलक आ ने एको बेर आएल। मनमे खुशी उपकलै। छौँड़ा फुटि‍ कऽ जुआन भऽ गेल हएत। कोनो ि‍क खाइ-पीबैक दुख हेतइ। आब तँ चि‍न्‍हलो ने जाएत। दाढ़ी-मोछ सेहो भऽ गेल हेतै। आओत तँ ि‍बआहो कइये देवइ। असकरे नीक नइ लगैए। ि‍बनु धि‍या-पूताक अंगना कोनो अंगना छी। लोके ने लछमी छी। मगन भऽ दुखनी ऑंखि‍ बन्‍न कऽ फड़ल-फुलाएल परि‍वार देखए लगलीह। जहि‍ना पोखरि‍मे नावपर चढ़ि‍ झि‍लहोि‍र खेला उतड़ि‍ कऽ महारपर अबैत तहि‍ना दुखनि‍योकेँ भेलि‍। तकि‍तहि‍ वि‍चार बदलि‍ गेलनि‍। मनमे उठलै जे जँ कहीं छौँड़ा ओनै वि‍याह-ति‍याह कऽ नेने हुअए आ गाम नै आबै तखन की करब। गामोमे तँ कते गोरेकेँ देखबे केलि‍यैहेँ। अखन धरि‍क खुशीक मनमे एकाएक पानि‍ पड़ि‍ गेलै। ि‍नराश मने सोचए लगलि‍ जे जुगे-जमाना तेहेन भऽ गेल जे केकरा के की कहतै। आब ककरो बेटा-बेटी थोड़े पॉंजमे रहै छै। जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। छौँड़ा सभ जहॉं बौहू देखलक ि‍क माए-बाप ि‍बसरि‍ जाइए। मने उनटि‍ जाइ छै। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलै। ऑंचरसँ नोर पाेछलक। नोर पोछि‍तहि‍ मनमे उठलै जाबे पैरूख अछि‍ ताबे तक ने ककरो पमौजी केलि‍यै आ ने करबै। जइ दि‍न पैरूख घटि‍ जाएत तइ दि‍न बुझल जेतइ। जि‍नगि‍यो तँ तहि‍ना अछि‍। कोनो ि‍क ठीक अछि‍ जे पैरूख घटलेपर मरब। पहि‍नहुँ मरि‍ सकै छी तइले सोगे की करब। बेटा जँ उड़हड़ि‍ये जाएत तँ उड़हरि‍ जौ। बेटापर सँ नजरि‍ हटि‍ बेटीपर गेलै। बेटीपर नजरि‍ परि‍तहि‍ मनमे आशाक उदय भेलै। आशा जगि‍तहि‍ मुँहमे हँसी एलै। सात घर दुश्‍मनोकेँ भगवान हमरा सन बेटी देथुन। साक्षात् लछमी छी। अपने फेरल नुआ ि‍कअए ने दि‍अए मुदा, कहि‍यो ओढ़ैसँ पहि‍रए धरि‍ वस्‍त्रक दुख अखैन तक भेलि‍हेँ। ओकरे परसादे तीनटा कम्‍मल घरोमे अछि‍। जमाइयो तेहने छथि‍ जे अपने माथपर उठाकेँ अन्‍नो-पानि‍ दइये जाइत छथि‍। आशा जगि‍तहि‍ दुखनी जारन तोड़ए उठल।
      ऑंखि‍ उठा गाछमे सुखल ठौहरी हि‍यासए लगलीह। रौदि‍याह समए भेने मनसम्‍फे सुखल ठौहरी गाछमे। जारन देि‍ख मन खुशीसँ नाचि‍ उठलै। मनमे गामक सुख नचए लगलै। अखनो गाम गामे छी। शहर बजारमे तँ लोक जरना कीनैत-कीनैत तबाह रहैए। मन पड़लै सि‍ंहेश्‍वर स्‍थानक मेला। एक्‍के सॉंझ भानस केलहुँ तहि‍मे दस रूपैया जरनेमे लगि‍ गेल। ई तँ गुन रहए जे सात-आठ गोरे रही जे सवे रूपैया ि‍हस्‍सा लागल। नइ तँ सवा रूपैयाक जरना चुल्‍हि‍ये पजारैमे लगि‍ जाइत। एक सूरे दुखनी दूटा गाछमे लग्‍गीसँ ठौहरी तोड़लक। जारन देखि‍ अबूह लगि‍ गेलै जे कहुना-कहुना तँ पॉंच बोझसँ बेसि‍ये भऽ जाएत। उगहौ पड़त ने। घरो ि‍क कोनो लगमे अछि‍। पॉंच बेरि‍ उघैत-उघैत दुपहर भऽ जाएत। मुदा भीड़ो हएत तँ कहुना-कहुना पनरह दि‍न नि‍चेनो रहब। फेरि‍ मनमे उठलै जे जँ कहीं अइ बीचमे श्‍यामा आि‍ब गेल हएत तँ अंगने-अंगने खोज-पुछाड़ि‍ करैत बौआइत हएत। मुदा छोड़ि‍यो कऽ कन्‍ना जाएव। सभटा लोक लइये जाएत। से नइ तँ सभटाकेँ बोझ बान्‍हि‍ लइ छी आ एकटा लऽ कऽ जाएव। देखि‍यो सुनि‍ लेबइ। जँ नइ आइलि‍ हएत तँ सभटा उघि‍ये लेब। ओना जँ आइलि‍ हएत तँ ि‍क ओहो मानत। दुनू माए-बेटी दुइये बेरि‍मे उघि‍ लेब। मन असथि‍र होइतहि‍ तमाकुल खाइक मन भेलै। ऑंचरक खूँटपर नजरि‍ पड़तहि‍ मन पड़लै जे तमाकुल तँ तखने सठि‍ गेल। मुदा पथार लागल जारन देखि‍ मनमे एलै जे पावनि‍क दि‍न छी। वेसी अंहोस-मंहोस करब तँ सभ काज दुरि‍ भऽ जाएत। अंगनोमे मारि‍ते रास काज अछि‍। जारन बि‍छैले उठल। गाछक चारू भाग नजरि‍ देलक तँ बीचमे एकटा घोरनक छत्ता सेहो खसल देखलक। छत्तासँ नि‍कलि‍-नि‍कलि‍ घोरन पसरि‍ गेल। पॉंखि‍बला धोरन देखि‍ दुखनी डरा गेल। बापरे ई तँ डकूबा घोरन छी दुइये टा काटत तँ पराने लऽ लेत। मुदा छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। से नइ तँ लग्‍गि‍येपर उठा कातमे फेि‍क जारन बीछब। मुदा छोटका सभ तँ सौँसे पसरि‍ गेल अछि‍। छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। जीबठ बान्‍हि‍ छत्ताकेँ कातमे फेि‍क जारन बीछए लागलि‍। फेरि‍ मनमे एलै जे ठौहरि‍यो तँ दू रंगक अछि‍। मोटको अछि‍ आ पतरको अछि‍। से नइ तँ दुनूकेँ फुटा-फुटा रखि‍ बोझ बान्‍हब। सएह करए लगल। ठौहरी बीछि‍ते रहै ि‍क मन पड़लै, हाय रे बा बान्‍हब कथीपर। जुना तँ अछि‍ये नहि‍। अगदि‍गमे पड़ि‍ गेल। पहि‍ने जे से मन पड़ैत तँ अंगनेसँ जुन्‍नो नेने अबि‍तौं मुदा, सेहो ने मन रहल। छोड़ि‍ देबइ तँ सभटा आने लऽ जाएत। एते बेरि‍ उठि‍ गेल ि‍कछु खेनौ ने छी। मुदा जारन देखि‍ मनमे खुशी होय जे कहुना-कहुना एक पनरहि‍या तँ चलबे करत। जँ दू-चारि‍ दि‍न आरो तोड़ि‍ लेब तँ भरि‍ जाड़क ओरि‍यान भऽ जाएत। ऑंखि‍ उठा घसबाहि‍नी सभ दि‍स तकलक जे कि‍यो भेटत तँ ओकरे हॉंसू लऽ कड़चि‍ये नइ तँ राड़ि‍ये काटि‍ जुन्‍ना बना लेब। मुदा सेहो नै ककरो देखै छि‍यै। ि‍हया कऽ करजान दि‍स ि‍वदा भेल। मुदा ओहो केराक सुखल डपोर तँ ि‍बना हँसुए काटल नहि‍ हएत। करजान पहुँचते देखलक जे करजानबला केरा घौड़ काटि‍ भालरि‍ आ थम्‍होकेँ काटि‍ छोड़ि‍ देने अछि‍। जुन्‍ना देखि‍ मनमे खुशी भेलइ। पान-सातटा जुन्‍ना लऽ आबि‍ बोझ बन्‍हलक। पॉंच बोझ। चारू बोझ गाछे लग छोड़ि‍ एकटा नेने आंगन आइलि‍।
      आंगन आबि‍ सोचए लगलि‍ जे ि‍कछु बना कऽ खा लइ छी। फेरि‍ मनमे भेले जे जखने आंगनक काजमे ओझड़ाएव तखने जारन बाधेमे रहि‍ जाएत। तत्-मत् करैत पानि‍ पीलक। घरसँ तमाकुल नि‍कालि‍ चुनबैत ि‍वदा भेल। पॉंचो बोझ उघि‍ लेलक। काठी जेकॉं डॉंड़ो आ गरदनि‍यो तानि‍ देलकै। देहो-हाथमे दर्द हुअए लगलै। हाथो-पएर नहि‍ धोय ओसारेपर भुँइयेमे ओंघरा गेलि‍। थाकल-ठहि‍आइल देह ओंघराइत नि‍न्‍न पड़ि‍ गेल।
      बेरि‍ टगि‍ गेल। घरक छाहरि‍ अंगनामे दू हाथ ससरि‍ गेल। डेढ़ि‍यापर सँ जोगि‍नदर सोर पाड़ए लगल-काकी, काकी।
  दुखनीक नि‍न्‍न नहि‍ टुटल। डेढ़ि‍यापर सँ ससरि‍ जोगि‍नदर आंगन गेल तँ देखलक जे भुँइयेमे नि‍न्‍न भेरि‍ सुतल अछि‍। फेरि‍ बाजल-काकी, काकी।
  ठाढ़ भेलि‍ जोगि‍नदरक मनमे उठल जे हमहूँ तँ पाइयेबला अइठीन रहलौं मुदा, सभ सुख-सुवि‍धा रहि‍तो ओकरा सभकेँ ऐहन नि‍न्‍न कहॉं होइ छै। देखै छी जे पेट खपटा जेकॉं खलपट छै, भरि‍सक खेवो केने अछि‍ ि‍क नहि‍। तहूमे पाएरो धुराइले देखै छि‍यै भरि‍सक कतौसँ काज कए कऽ आइलि‍ अछि‍। अखन जे घरक सभ कुछ उठा ि‍कयो लऽ जाय तँ बुझवो ने करत। एकरा सबहक कोन दुनि‍यॉं छै। जहि‍ना चीनीक कीड़ाकेँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाए तँ ओ मरि‍ जाएत। जे स्‍वभावि‍के छैक। मुदा ि‍क मि‍रचाइक कीड़ा चीनीमे जीबि‍ सकत। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍ति‍ जोगि‍नदरक मनमे उठि‍ गेल। मुदा काजक धुमसाही, वि‍चारक दुनि‍यॉंसँ खींचि‍, ओकरा हड़वड़ा देलक। फेरि‍ काकी, काकीक आवाज देलक। मुदा नि‍न्‍न नहि‍ टुटल देखि‍ कपड़ाकेँ ओसारेपर रखि‍ दुखनीक घुट्ठी दाबए लगल। घुट्ठी दबि‍तहि‍ दुखनीक नि‍न्‍न टूटल। ऑंखि‍ मुननहि‍ बाजलि‍-अयँ गे सामा (श्‍यामा) काल्‍हि‍ ि‍कअए ने ऐलै?”
      दुखनीक अवाज सुि‍न जोगि‍नदरक मनमे भेल जे भरि‍सक काकी सपनाइए। घुट्ठीकेँ ि‍हलबैत बाजल-काकी, काकी....।
  ऑंखि‍ खोलि‍ दुखनी उठि‍ कऽ बैसि‍ गेल। हाफी कऽ जोगि‍नदर ि‍दस तकलक। मुदा ि‍कछु बाजलि‍ नहि‍। मोटरी खोलि‍ जोगि‍नदर जोड़ भरि‍ साड़ी, साया, एकटा आंगीक संग दसटा दसटकही आगूमे रखि‍ बाजल-अखैन धरि‍ काकी अहॉं नहेबो ने केलहुँहेँ।
  जहि‍ना आम बीछि‍नि‍हार गाछक नि‍च्‍चॉंमे खसल आम देखि‍ उजगुजा जाइत तहि‍ना दुखनी उजगुजा गेलि‍। बाजलि‍-बौआ, जारनि‍ नइ छलै वएह तोड़ए भि‍नसरे चलि‍ गेलौं। ओकरे सम्‍हारैत-सम्‍हारैत दुपहर भऽ गेल। ि‍कछु खेबो ने केने छी। अराम करए लगलौं ि‍क ऑंखि‍ लगि‍ गेल।
  दुखनीक बात सुि‍न जोगि‍नदर बाजल-काकी, अखैन अगुताइल छी तेँ नै अँटकब। पूजा उसरला बाद नि‍चेनसँ आि‍ब आरो गप्‍पो करब आ कोनो कारोबार करैले मदति‍ सेहो कऽ देब। अखैन मेला देखैले कपड़ो आ रूपैइयो देलौंहेँ। जाइ छी।
      जोगि‍नदर उठि‍ कऽ ि‍वदा भऽ गेल। मने-मन दुखनी ि‍हसाब जोड़ए लागलि‍ जे अधा रूपैया कऽ चाउर कीनि‍ लेब आ अधा हाथ-मुट्ठीमे रखि‍ लेब। मेला-ढेलाक समए छी कखैन कोन भूर फूटि‍ जाइत। फेरि‍ मनमे एलै जे श्‍यामो तँ अबि‍ते हएत। ओहो चाउर अनबे करत। जखन अनदि‍नो नेने अबैए, अखन तँ सहजे पाबैनि‍ये छी। दुनू नाइत-नाति‍न सेहो ऐबे करत। ओकरो हाथकेँ दू-चारि‍ रूपैया नइ देवइ से केहन हएत। हम कतबो गरीब ि‍कअए ने छी मुदा, नानी तँ छि‍यै। साड़ी खोलि‍ दुखनी देखए लागलि। साड़ी देखि‍ बुदबुदाइल-ऐहेन साड़ीक कोन काज अछि‍। कोनो ि‍क नव-नौतारि‍ छी जे ऐहेन छपुआ पहि‍रब। अइसँ नीक तँ तीन काजू मरकीन दैत जे कतबो मारि‍-धुसि‍ कऽ पहि‍रतौं तइओ साल भरि‍ चलबे करैत। सायाक कोन काज अछि‍। आब तँ सहजहि‍ बुढ़ि‍ भेलौं। जहि‍या जुआन छलौं तहि‍यो तँ डेढ़ि‍ये पहि‍रैत छलौं। कोनो ि‍क मंगैले गेल छेेलि‍यै, मुदा जखैन घर पैसि‍ दऽ गेल तखैन तँ जे देलक सएह नीक। बेटी ऐबे करत अोकरे पुरना लऽ लेब आ ई दऽ देबै।
  साड़ी-साया, आंगी समेटि‍ कऽ रखि‍ दुखनी रूपैया गनए लागलि‍। फेर बुदबुदाइल-सभटा दस टकहि‍ये छी। दसटा अछि‍। दसटा दसटकही काए बीस भेल। दू-दू टा कऽ फुटा-फुटा रखि‍ गनलक। पॉंच बीस भेल। मनमे खुशी एलै। फेर लगले मनमे एलै जे आइ पावनि‍क दि‍न छी अखन धरि‍ खेलौंहेँ कहॉं। सभ दि‍न खैहह पाबनि‍ दि‍न ललैहह। मुदा भि‍नसरसँ तँ गाछि‍ये-ि‍बरछीमे रहलहुँ। सारा-गाड़ा नंघलौं। ि‍बना नहेने कोना भानस करब? सूर्य दि‍स तकलक। माथसँ ि‍नच्‍चॉं देखि‍ सोचलक आइ उपासे कऽ लेब। जाबे नहा कऽ भानस करए लगब ताबे तँ साँझे पड़ि‍ जाएत। सॉंझमे लछमी पूजा करब ि‍क अपने खाए-पीबए लगब। तहूमे अखन धरि‍ ने खढ़ अनलौं आ ने संठी। जाबे से नहि‍ आनब ताबे उक कन्‍ना बनाएव। ि‍दआरि‍यो बनबए पड़त। करू तेलो आनए पड़त। घरमे जे तेल अछि‍ ओ अँइठ भऽ गेल अछि‍ कन्‍ना ि‍दयारीमे देवइ। काज देखि‍ दुखनीकेँ अबूह लागि‍ गेल। पावनि‍क सभ ि‍कछु ि‍बसरि‍ गेल। नजरि‍ बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजरि‍ पहुँचते मनमे खौंझ उठले। बाजलि‍-ऐना कऽ समाद पठौलि‍यै से ि‍कअए ने आइलि‍।
  असमंजसमे पड़ि‍ गेल।
  तहि‍ बीच नवानीवाली बान्‍हेपर सँ सोर पाड़ि‍ बाजलि‍-काकी, काकी, दैया आगू अबैले कहलकनि‍हेँ। उत्तरवरि‍या पोखरि‍पर दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍यो लऽ बैसल छन्‍हि‍।
  दैयाक नाओ माने श्‍यामा दऽ सुनि धड़फड़ा कऽ उठि‍ घरमे कपड़ा रखि‍ ऑंचरमे रूपैया बान्‍हि‍ ि‍वदा भेलि‍। तीनि‍-चारि‍टा धि‍या-पूता सेहो संग लगि‍ गेलनि‍। बेटी लग पहुँचते श्‍यामा उठि‍ कऽ गोड़ लगलक। गोड़ लगि‍तहि‍ तरंगि‍ कऽ दुखनी बाजलि‍-अँइ गे, तोरा जानक काज नइ छौ जे एते लदने ऐलेहेँ।
      माइक बातकेँ अनसून करैत श्‍यामा दुनू बच्‍चाकेँ कहलक-नानीकेँ गोड़ लाग।
  बच्‍चाकेँ देखि‍ दुखनी हरा गेलि‍। सभ बात वि‍सरि‍ गेलि‍। ऑंचरक रूपैया नि‍कालि‍ एक-एक टा दस टकही दुनू बच्‍चाकेँ हाथमे दऽ बॉंकी अस्‍सि‍यो रूपैया श्‍यामा दि‍शि‍ बढ़ौलक। रूपैया देखि‍ श्‍यामाक मनमे उठल। भरि‍सक बौआ पठौलकेहेँ। मुस्‍की दैत माएकेँ पुछलक-की सभ बौआ पठौलकौहेँ?”
  बौआक नाओ सुि‍न दुखनीक मन फेरि‍ औनाए गेल। नजरि‍ बेटापर गेलइ। बेटापर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मनमे तामस उठलै। बाजलि‍-कतए छौड़ा हराएल-ढराएल अछि‍ तेकर कोन ठेकान अछि‍। अखन धरि‍ ने कहि‍यो चि‍ट्ठी-पुरजी पठौलक आ ने एक्कोटा छि‍द्दी। ओम्‍हरे कतौ कोनो मौगी सने उढ़ढ़ि‍ गेल ि‍क की। से ि‍क कोनो पता अछि‍।
  माइक बात रोकैत श्‍यामा बाजलि‍-ऐना ि‍कअए बजै छेँ। माए छीही कनी ठर-ठेकानसँ बजमे से नै।
      बेटीक बात सुि‍न मायक मन बेटासँ हटि‍ बेटीपर पुन: आबि‍ गेल। बाजलि‍-दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍योकेँ कन्‍ना आनल भेलौ?”
  मुस्‍कुराइत श्‍यामा बाजलि‍-अपने एतऽ तक पहुँुचा गेलखि‍न।
  जमाए दऽ सुि‍न दुखनी बाजलि‍-एक डेग आगू घर नै देखल छलनि‍ जे जइतथि‍।
  गाममे मेलो होइ छै आ पावनि‍यो छि‍यै तेँ कहलखि‍न जे घरपर गेने ओझरा जाएब। चारि‍ थान माल असकरे माए बुते सम्‍हारल नै ने हेतै। परसू ऐथुन।

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"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...