Sunday, July 04, 2010

'विदेह' ५९ म अंक ०१ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ५९)-PART III


भाग-  


खूब अन्हरगरे माने चारि बजे भोरेमे सुभद्रा शीलाकेँ उठवैत कहलखिन- कनियाँ, उठू। उठू झव दे उठू।
  सासुक धरफड़ाएल बोली सुनि शीला उठि कऽ वैसैत पुछलखिन- की भेलनि जे एेना अधनीनामे उठा देलनि?”
  असथिरसँ बाजू। अखन गामक लोक नहि उठल अछि। अपन काज आगू बढ़ाउ।
  कोन काज?”
  जखने एक्के-दुइये लोक सभ जागए लगत कि भूत सभ आबए लगत। अहाँ नव-नौताड़ि छी तहूमे शहर-बजारमे रहै छी। अहाँ गामक भूतकेँ नहि चिन्हवै बुरहा सभटा भूतकेँ चिन्हा देने छथि। अखन एतवे सुनू। नइ तँ जिनगी हूसि जाएत। बुरहा मरि गेलाह तेँ कि सभ ओहि लागल मरि जाएब। सभकेँ अपन-अपन दानी-पानी अछि। मुदा फेरि कहै छी? गप-सप्‍प करैले भरि दिन खालिये अछि। समाजक लोक सभसँ सभ बात पुछबनि आ बुझव। अखन जल्दी विस्कुटक डिब्बा निकालू आ चाह बनाउ। ताधरि हमहूँ बौआकेँ एकटा दतमनि दऽ अबै छिअनि। जावे अहाँकेँ चाहो नहि बनत ताबे ओ तैयार भऽ जाएत। चुल्हिमे तँ छाउर नहि अछि, माइटिये लऽ कऽ हाँइ-हाँइ कऽ दू घूसा दाँतमे दिऔ आ कुड़ुड़ कऽ पानि पीवि लिअ।
  कहि सुभद्रा देवनन्दनकेँ उठबैले दलानपर गेली। जहि जगहक चौकीपर रघुनन्दन सुतैत रहथि ओही अखड़े चौकीपर देवनन्दन सुतल रहथि। देहपर हाथ दऽ आस्तेसँ डोलवैत बजलीह- बाउ, बाउ। उठू। लिअ दतमनि। पहिने मुँह-हाथ धोइ लिअ।
  मृत्यु कर्मम वि‍धि‍ बुझि देवनन्दन किछु पुछलखिन नहि। सोलहन्नी मानि दतमनि करए लगलथि। अपनो मुँह धोय कुड़ुड़ कऽ सुभद्रो आंगनक ओसारपर वैसलीह। प्लेटमे चारिटा छोट साइजक विस्कुट आ गिलासमे पानि नेने शीला पतिकेँ दइले चललीह। शीलाक हाथमे गिलास-प्लेट देखि कहलखिन- पौआही पाँव-रोटी नहि अछि। तेँ बड़का डिब्वा चारि‍ साए ग्रामबला विस्कुटे दऽ अवियौक।
  शीला सएह केलनि। चाह पीवैत सुभद्रा कहए लगलखिन- अपना सभमे तँ तेरहे दिनमे सभ कर्म भऽ जाइत अछि मुदा, अपने गामक आन टोलमे ककरो पनरह तँ ककरो सत्तरह तँ ककरो महिना दिनपर कर्म सम्पन्न होइत अछि। हम किअए एते भोर उठा देलहुँ से बुझै छियै?” आइ एक्के बेरि वौआकेँ एक-मुक्त करए पड़तनि गोसाँइ लहसैत बुढ़ाकेँ पारस माने पातरि दैत खेताह। आब अहीं कहू जे जे-आदमी, बानर जेकाँ, किछु ने किछु सदिखन खाइत रहैत छथि ओ भरि दिन ओहिना माने निराधार कोना रहताह? बुरहा जिनगीक संगी छलाह मुदा, वौआकेँ दस मास पेटमे पालने छी। ओ पालब हम नै बुझवै ते पुरुखकेँ बुझव छियैक। अखन कियो नै अछि कहि दइ छी जे हमरा कोन, हरिवासयक साधल देह अछि मुदा, अहाँ दुनू परानी तँ से नहि छी। लोके भूत छी से बुझि लिअ। जखन अंगना खाली रहए आ खाइ-पीवैक मन हुअए तँ घरमे जा कऽ खा लेब। बुढ़हाक क्रिया-कर्मक जे विधान अछि आ समाजमे रहै छी ओ तँ समाजेक विचारानुसार हएत। मुदा इहो ने मनमे राखए पड़त जे एक तँ समांगक सोग मनमे अछि तइपर सँ खेनाइओ-पीनाइ छोड़ि देब तँ कि बुरहा लागल सभ चलि जाएब? जते काल जीवैत छलाह, सेवा-टहल केलिएनि वएह दायित्व भेल।
  एकटा खिस्सा कहै छी कनियाँ। खिस्सा नहि आँखिक देखल घटना....।
ओंगरीसँ टोलकेँ देखवैत- ....ओइ टोलमे फुसनाक घर छैक। बहुत दिन तँ नहि भेलैए मुदा, तइओ पच्चीस-तीस वर्ख भेल हेतइ। फुसनाक बावा मुइलै। ओ पेटबोनिया रहए। मुइलाक पराते अरगासन की देत आ अपने एक-भुक्त की करत? मुदा, तइओ ककरो-ककरोसँ पैंइच लऽ लऽ पार लगलै। मुदा बिना आमदनिये परिवार कोना चलतै। खाइ बेतरे धिया-पूता सभ टौआइ। चिन्तासँ दुनू परानी सेहो तरे-तर सुखए लगल। धिया-पूताक मुँह देखि बेचारीक फुसना माएकेँ करेज चहकि गेलइ। मरि गेलि वेचारी। फुसना गरदनिमे मायक उतरी आ बापक गरदनिमे बापक उतरी। तहिपर सँ वीसक दिन वाद मलेमास पड़ि गेल। दुनू आँखिसँ दहो-बहो नोर खसए लगलै। सुभद्रा आँखिसँ बहैत सरस्वतीक धारा देखि शीलाक मुँहसँ अनायास निकललनि- वाह रे धैर्य! अपना सोगे नोर नहि अनका सोगे धार।

     चाह पीबि पान खा पढ़ुआ भाय पत्नीकेँ कहलखिन- हमरा अवेरो भऽ सकैए। तहि बीच जँ कियो खोज करति तँ कहि देवनि जे देवनन्दन एहिठाम जिज्ञासा करए गेलाह।
  अखने किअए जाएव?”
  अहाँ जे सोचै छियै तहिसँ हटि कऽ सोचए पड़त। -कहि पढ़ुआ भाय डेग बढ़ौलाह।
  पत्नी पाछुसँ कहलखिन- अच्छा जाउ।
  रास्तामे पढ़ुआ भाय सोचए लगलथि जे अपने पढ़ल छी, किताबक बात वुझै छियैक। अनको कहै छियै। मुदा परिवारक जँ सभ नहि बुझत तँ अपन बुझलाहा अपने कतेक पइठ हएत। जाधरि आँखि तकै छी सोचै-विचारैक शक्ति अछि मात्र ताधरिक भार.......। जँ से नहि तँ कि शास्त्र ओकरा लेल नहि जकरा कियो अपन नहि छैक। मन ओझराए लगलनि। मुदा नजरि एहिठाम टिकि पत्नीक प्रश्नपर चलि गेलनि।
        माड़किन वस्त्रमे सजल असकरे देवनन्दन गुरुकूलक विद्यार्थी जेकाँ चौकीपर दछिन मुँहेँ विस्कुट खा पानि पीवि चाह पीविते रहति कि पत्नी-शीला सिगरेटक डिव्वा आ सलाइ नेने आवि आगूमे रखि खाली गिलास लइले ठाढ़ भऽ गेलीह। तीनि-चारि घोंट चाह गिलासमे रहवे करनि मुदा, मन जे जबदाह छलनि से आब हल्लुक भऽ गेल रहनि, शीला दिशि मुस्की दैत, डेढ़-बराह आँखिये तकलनि। शीलाक आँखि कऽ काजक बोझ दबने। पतिक मुस्की जेना मनक घुर कऽ एक मुट्ठी सुखलाहा खढ़मे सलाइ पजारि देलकनि। मुदा धधराक लपटकक संग काजे अगुआ गेल। बजलीह- आइसँ समाजक लोक काजक विषएमे पुछैले ऐबे करताह। हुनका सभकेँ खाइ पीवैले नहि देवनि से उचित हएत?”
  कथमपि नहि। देवनन्दन कहलखिन।
  मनक मुस्की, अपन नमहर ऋृण अदाए होइत देखि अठन्नियाँ हँसी बनि निकललनि। पुछलखिन- घरमे की सभ अछि?”
  चाह-पत्ती, चीनी, दूधक डिव्वा सिगरेट-सलाइ तँ अननहि छी आरो किछु जोगार करऽ पड़त से तँ नहि बुझल अछि।
  अपन भार उताड़ैत देवनन्दन कहलखिन- गामक सभ बात तँ हमहूँ नहिये बुझै छी। करियाकाका कऽ बजा पुछि लइत छिअनि।
  अच्छा होउ। कौवा डकल। झब दे सिगरेट पीबि लिअ। ने ते अनेरे सिगरेटक सुगंध चलत। लोक जागत।
  पत्नीक गतिगर गप्प बुझि गिलास हाथमे दैत, सिगरेट धरा पीवए लगलथि। मनमे एलनि, अपने दुनू परानी ने वहरबैया भेलहुँ मुदा, माए तँ सभ दिन गामेमे रहलीह। हुनका सभ विधि-वेवहार तँ वुझले छनि। तहि काल विस्कुटक मोनक्काक ढकार भेलनि। मुँह लाड़ए-चाड़ए लगलथि। सिगरेटक खुट्टी फेकितहि रहथि कि पढ़ुआ कक्कापर नजरि पड़लनि। नजरि पड़ितहि चौकियेपर सँ बजलाह- आशा।
  पतिक बात बुझि गेलखिन। गैस चुल्हिपर चाहक ओरियान करैत आशाकेँ कहलखिन- बुच्ची, दरबज्जाक कोनपर सँ देखने आबह जे कते गोटे छथि?”
  दौड़ल आबि पढ़ुआ बाबाकेँ बैसल देखि घुरि माएकेँ कहलक- बाबू लगा दू गोरे।
  पढ़ुआ काका आबि चुपचाप मौन धारण केलनि। दू मिनटक पछाति आँखि खोललनि कि आशाकेँ चाहक कप बढ़बैत देखि रेलमे कटल आदमीकेँ देखि बुइधिक फाटक बन्न भऽ जाइत, तहिना भेलनि। तहि बीच देखलनि जे देवनन्दन दू चुस्की मारि लेलनि। मनमे बिहारि उठलनि ओना तँ नह-केश कटेलाक उत्तरि, नहि तँ कमसँ कम छौरझप्पी धरि तँ शोक मनेवाक चाही। मुदा बूढ़क मृत्युमे शोक मनेवाक चाही कि हर्ष। जँ शोक मनाएव तँ कि प्रकृतिक संग छेड़-छाड़ नहि हएत। मुदा परम्परो तँ अपन महत्व रखैत अछि। अखन धरि कर्ताक संग परिवारो आ समाजोक संग किछु नियम बनल अछि। जेकर संचालक अपने सभ छियै। तहिठाम की कएल जाए, तहूमे नवकबरिया डॉक्टर छथि, मनमे कचोट लगतनि। आ मरैकालक तँ सीमा नहि होइत। बूढ़ो मरैत, जुआनो मरैत आ बच्चो मरैत। तखन तँ सभकेँ अपन-अपन जिनगीकेँ दीर्घायु बनबैक छैक। तहीले ने सभ अपन-अपन जिनगीकेँ लगौने रहैत अछि। मुदा असकरे कोनो काज करैसँ पहिने दोसरो गोटैकेँ पुछि लेब आवश्यक अछि। मुदा लगमे के अछि जकरासँ पुछबै। भरोसे रहब तँ चाहे दुइर भऽ जेतइ। मुदा देवनन्दनकेँ पीबैत देखि भरोस भेलनि। चाहक चुस्की लैत बजलाह- अपना सभक समाजमे तेरह दिनक कर्म डाहव -जरौनाइ- सँ लऽ कऽ द्वादसा कर्म धरि‍ अछि‍। जहिना घरसँ निकालि गाछी लऽ जाए गाछक संग कऽ देलिएनि। तहिना ओहिठाम काज सम्पन्न कऽ घरपर लऽ अनलिएनि। आब घरक काज शुरु हएत। फेरि मनमे उठलनि जे काजक दौरमे जिज्ञासो तँ होइत अछि? फेरि मन ओझरा लगलनि। तेरह दिन हिसाब जोड़ैत तँ ठीके वइसनि। मुदा जिज्ञासा तँ तखने से ने शुरु हएत जखन से आंगनमे लोह-पाथर छुबि लोग अपन-अपन घर चलि जाएत। समाजक तँ एक प्रक्रिया सम्पन्न भऽ गेल। ऐहनो तँ भऽ सकैत अछि जे जे समाज -समाजक- गाममे नहि छलाह। जरौलाक बाद ऐलाह। हुनका कखन सामाजिक काजमे संग कएल जाए। जँ छौड़झप्पीक पछाति कएल जाए तँ संस्कारक संगी माने जरबैक संगी मानल जएताह। मुदा, जहिना माटि खुनैत-खुनैत कतेको रंगक रंगक माटि धरतीमे मिलैत तहिना माथ खोधैत-खोधैत चिक्कन माटि भेटिलनि। छह-छह करैत पानियोसँ बेसी छिछलाहट। फुड़लनि। समाजकेँ माने मनुष्यकेँ समयक अनुकूल बना चलक चाही। जहिना अनेको कारणसँ वायुमंडल बदलैत तहिना जँ मनुष्यो नहि बदलत तँ गतिहीन भऽ जाएत। गतिहीन आ मृत्युमे की अन्तर छैक। जते पढ़ुआ काका सोचैत तते मन ओझराएल जाइत। बजलाह- बौआ, तीनि दिन धरि, जहिना बाधमे हरीयरी नहि रहने माल-जालकेँ बहटारि अपने गुल्ली डंटा खेलए लगैत तहिना छौड़झप्पीसँ पहिने मन बहटारए एलौं। एखन जाइ छी। फेरि आएब। मनमे चिन्‍ता नहि करब। समाज समुद्र छी जहिमे घोंघा-सितुआसँ लऽ कऽ बड़का-बड़का पानिक जानवर धरि प्रेम-भावसँ जीवन-यापन करैत अछि तहिना समाजो छी। सभ शक्ति समाजमे छैक। कहि रास्ता धेलनि।
     माथ उधारने, अधा देह वस्त्रसँ झाँपल गुदरी पाछू-पाछु आ डॉड़मे ठेहुनसँ उपर धोती, कान्हपर तौनी नेने आगू-आगू हुलन आबि देवनन्दनकेँ ओसारक निच्चाँ सँ प्रणाम केलकनि। शिष्टाचारकेँ देखैत डॉक्टर देवनन्दन चौकीपर सँ उठि ओसारक निच्चाँ आबि भुँइयेमे चुक्की-माली वैसि दुनू परानी हुलनकेँ सेहो वैइसेले कहलखिन। मुँह सकुचबैत हुलन कहलकनि- सरकार, अहाँ लग हम कना बैसब? हम ठारहे रहै छी। बजैत-बजैत दुनू परानीक आँखिसँ नोर टघरए लगलैक। गाल परक नोरक टघार पोछैत हुलन बाजल- गामक खूँटा उखड़ि गेला। काकाकेँ अछैत कहियो चिन्ता नै भेल जे समाजसँ बहार छी। मुदा आन जे अछि ओ सदिखन अगराहिये लगवैत रहैए।
  अच्छा गामक बात पाछु कहिह। पहिने अपन काज कहह।
  पति कऽ डटैत गुदरी- वौआ, डागडर बावू, अहाँ देवता छी। कोनो बात छिपाए कऽ नै राखब। हमरो काज बहुत अछि। एक दिन बीतिये गेलनि। दसे दिनपर नह-केश होइ छै। ओइसँ पहिने सभ बरतन बना कऽ दिअए पड़त। बीचमे आठे दिन समए बचलै। दुइये परानी काज करैबला छी। धिया-पूता सभ इसकूले जाइए।
  स्त्रीगणक बोली सुनि अंगनासँ सुभद्रो आ शीलो दरवज्जापर ऐलीह। दरबज्जापर अबितहि सुभद्रा गुदरीकेँ कलखिन- कनियाँ, ओजार-पाती नइ अनने छह? आब तँ सूपे-चालनिक काज पड़त। कनी ओकरा जोड़ि-जाड़ि दितिहक।
  नै काकी कहाँ किछो अनने छी। काल्हि बेरु पहर आबि कऽ कए देवनि। अखैन ते काजेक बरतन बुझैले एलौंहेँ।
 वेस-वेस। मुदा एकटा बात मन रखिहह जे जहिना बुरहा मेघडम्बरक सिनेही छलाह तेहने बनबिहह।
  मेघडम्बर नाम सुुनि मुस्कुराइत हुलन बाजल- काकी, जहिना भगवान विष्णु वामन रुपमे मेघडम्बर ओढ़ैत छलाह तहिसँ बीस कक्काक मेघडम्बर हेतनि। पाँच गोटेक परिवार तरमे अँटावेश कऽ सकैए।
  सुभद्रा देवनन्दनकेँ कहलखिन- वाउ, अपने तँ गामक किछु बुझै नै छह, हम स्त्रीगणे भेलहुँ। मरदा-मरदीक काज छी। करिया वौआकेँ बजा लहुन।
  सुभद्राक बात सुनितहि गुदरी करिया कक्काकेँ बजबै विदा भेलि।
  देवनन्दन हुलनकेँ पुछलखिन- कारोवार की सभ अछि?”
  कारोवारक नाओ सुनि हुलन हरा गेल। मन पड़लै अपन सुगर। भड़भड़ाएल स्वरमे कहए लगलनि- भाय, गरीबकेँ कियो नीक केनिहार नहि। देवस्थानमे दुहाहि दइले गरीब अछि। जहिना कतबो दुहाइ देनौ गहूमन साँपक बीख नै उतड़ैए तहिना दीनदयाल भजने की हेतइ। यएह गाम छी धनेसर ऐठीन भोज रहए। अपनो सभ अठि-काँठ समेटलौं आ अँइठारमे फेकल अँठि पातमे सुगरकेँ छोड़ि देलियै। तेहने धनेसरक बेटा सेतानक चरखी अछि जे चोरा कऽ पोखरिक माछ मारैले इन्डोसेल अनने रहए। ओहीमे पातपर छीटि देलकै। सभटा सुगर मरि गेल। तइ दिनसँ ने पूजी भेल आ ने फेरि दुआरपर पशु।
  हुलन आ देवनन्दन गप-सप्‍प करितहि रहथि। गुदरी करियाकाकाकेँ बजबैले विदा भेलि। देवनन्दन पुछलखिन- जखन खेतो ने अछि, सुगरो सभटा मरिये गेल तखन गुजर कोना चलैत अछि?”
  देवनन्दनक प्रश्न सुनि हुलनक मनक आशा फुटि कऽ निकलल। मुस्की दैत बाजल- डाकडर सहाएब, समाज जीवैत रहए....।
सुभद्रा दिशि देखि- ....भगवान काकीकेँ औरदा देथुन। काकीकेँ बुझले छनि जे बारहम-तेरहम मास हिनके दुनू परानीक असिरवाद से गुजर करै छी।
  हुलनक उत्तर सुनि देवनन्दनक मनमे सुनैक उल्लास जगलनि। भुखाएल जेकाँ पुछलखिन- से की, से की?”
  रेगहाए कऽ हुलन कहए लगलनि- बाउ गरीब लोकक लि‍ये आसीन-कातिक सबसे भारी होइए। मुदा, सभ साल काका हमरा दूटा बाँस शुरुहे आसीनमे दऽ दैत छथि। दुनू बाँस लऽ जाइ छी। ओकरा चिड़ि‍-फाँड़ि कऽ बरतन बनबए लगै छी। ओना कोनियो-छिट्टाक बि‍करी दोगा-दोगी हुअए लगैए। मुदा फुलडालीक संग आरो-आरो समानक विक्री हुअए लगैए। जइसे खूब नीक-नहॉति तँ नहिये मगर गुजर चलए लगैए। ई आशा अखनो अछिये। जावे काकी जीवैत रहती ताबे रहबे करत।
  हुलनक बात सुनि देवनन्दन चौंकि गेलाह। मनमे एलनि जे पिताक कएल कर्म-धर्म कऽ हम मेटा देब। कथमपि नहि। मुस्की दैत कहलखिन- बाबूक सभ किछु रहवे करतथि।
  देवनन्दन विचार सुनि हुलनक आशा बनले रहि गेल।
     करियाकाका बजार जाइक तैयारीमे रहथि पत्नी बुझा-बुझा कहैत रहनि जे अझुका एक-भुक्तक सभ सरंजाम देवनि। बारह-तेरह दिन तँ सभ कियो हुनके काजमे लगि जाएव तेँ आइये तेरह दिनक नोन-तेलक ओरियान नै कऽ लेब तँ बीचमे छुट्टी हएत।
  पत्नीक बात करियाकाका सुनवो करैत, समान अनैक झोरा-झोरी आ रुपैआक हिसाब सेहो मने-मन जोड़ैत रहथि। तहि बीच गुदरी डेढ़ियापर सँ सोर पाड़लकनि- कक्का, काका।
  टाटक दोगसँ मूड़ी उठा देखलनि तँ गुदरी-डोमिनकेँ देखलखिन। मनमे उठलनि- जतरा बिगड़ि खराव भऽ गेल। की हएत की नहि।
  मन खसलनि। दोहरवैत गुदरी बाजलि- काका ते अखैन काकीमे ओझराएल छथि तेँ अनकर बात किअए सुनथिन?”
  गुदरीक शब्द वाण करियाकाका छातीकेँ बोधि देलकनि। सान्त्वना दैत अंगनेसँ बजलाह- कनी काजमे लागल छी। लगिचा गेल। अबै छी।
  मुदा शब्द-वाण छाती बेधि कऽ मैल निकालि देलकनि। विचार जगलनि कोनो काजमे जाइसँ पहिने ककरो देखने ककरो जतरा किऐक भगंठि जेतइ। ई मनक मैल छी। आदमी अपन जिनगी आ कर्मक मालिक स्वंग छी। तखन ककरो दोख लगाएव कायरता छी। गुदरीकेँ सुनवैत पत्नीकेँ कहलखिन- आब अपन काज ठमकि गेल ताबे अहाँ झोरा, ओरिया कऽ रक्खू। डोमिनक बात बुझि लइ छियै।
  आंगनसँ निकलि करियाकाका दरवज्जापर आवि पुछलखिन- किअए एते हलचलाएल छी।
  मजवूरीक अवाजमे गुदरी- कक्का, हम तँ हिनके सबहक -समाजक- लऽ लऽ छी। ई तँ बुझिते छथिन जे सराधमे डोमिनक कते काज होइ छै। एक दिन बीतिये गेलनि। दसे दिनपर नह-केश होइ छै। नहे-केश दिन जँ सभ वरतन नै पहुँचा देवनि तँ येहे की कहताह?”
  विचित्र द्वन्द्वमे करियाकाका फँसि गेलाह। एकटा मन कहनि जे सराधक काज तँ सरझप्पी बाद शुरु हएत आइ कोना करब? फेरि दोसर मन कहनि जे भात झंकैले कमसँ कम चारिटा बड़का छिट्टा चीज वौस रखैइयोले आ परसइयोले बीस-पच्चीसटा चंगेरो बनबए पड़तै। तहिपर सँ श्राद्ध-क्रिया वरतन सेहो बनबए पड़तै। दिनो तँ गनले आठटा अछि। जहिमे बाँस काटबसँ लऽ कऽ घरपर पहुँचबै धरिक छैक। छोट लोकक तँ दुर्भाग्यो छैक जे दूटा जवानसँ तेसर एक-ठाम नहि रहए चाहत। भलेहीं बाप-माए होय कि बेटा-बेटी। फेरि मनमे एलनि सुआइत मौगी पुरुखाह आ पुरुख मौगियाह भऽ जाइए। मनमे हँसी एलनि। मुदा लगले पाकल जौ मे पाथर खसलनि। एकरा जखने साय देवइ -काज करैक बान्ह- तखने काज करैक अधिकार भेटि जेतइ। अधिकारमे बाधा देब अनुचित हएत। जँ अखने नहि साय दय देवैक तँ ने बेसी समांग छै जे हाथे-हाथ सम्हारि देतै। मनुक्ख तँ लोहाक मशीन नहि छी जे बटन दाबि देतइ आ ढेरक-ढेर बनवै लगत। कमसँ कम चारि बाँसक काज छैक। काटत, फारत। टोनत। कैमची बनौत। गाड़ा बनौत आरो कते करए पड़तैक। मौगी कतबो लट-लट करैए तँ पुरुख जेकाँ बाँस तँ नहि काटि सकैए। जँ काटियो लेत तँ झोंझमे सँ घीचल कोना हेतै। मन धोर-धोर हुअए लगलनि। आशा जगलनि। काज तँ देवनन्दनक छिअनि। हम समाज भेलहुँ। भलेहीं दुनू गोटेक परिवार जोट्टल आम जेकाँ वा जोटल फूल जेकाँ अछि। मुदा मनुष्य होइक नाते मनुक्खक बात नहि मानियै। समाजक संगे ई वेइमानी हएत। आँखि मूनि कोनो बात मानि लेव ओ खाधिमे खसाएत। मनुष्य दोहरा कऽ एहि धरतीपर नहि अबैत अछि भलेहीं लोक साए बेरि अबैक-जाइक बात बुझए। मुदा हमरा गरदनिसँ निच्चाँ नहि उतड़त। आगू-आगू फनकल गुदरी आ पाछु-पाछु करि‍याकाका असथिरसँ रास्ता धेलनि। कनिये आगू बढ़ि उनटि कऽ गुदरी आगूमे ठाढ़ भऽ कहए लगलनि- आब की इहो जुआने-जहान छथि जे नहि बुझथिन। काजक कते छिगरी-तान अछि से नइ बुझै छथिन। ओछाइनपर सँ उठै छी आ काजमे लगि जाइ छी। जलखै बेरिमे छौरसँ वा माटिसँ मुँह धोय पानि पीवै छी। धिया-पूताकेँ खुअबैत-पीअवैत, चरिया कऽ इस्कूल पठवैत गोसाँइ कान सोझे चलि अबैए। हमरा ले कि दोहरा कऽ दिन उगत।
  आगूमे ठाढ़ि बॉहि-फड़का-फड़का गुदरी करियाकाकाकेँ कहनि। अकछि कऽ कहलखिन- चलू .... बुझलियै...... जे अहाँक बात नहि मानता ओ काजक भार लेथिन। काजक बेरिमे वाय गौंगियाए लगै छन्हि आ हुकुम चलबै कालमे जएह मन फुड़त सएह बाजि‍ देब। जहिना कोनो घर बनवैमे रंग-विरंग काज, रंग-विरंगक समान, रंग-विरंगक ओजारसँ लऽ कऽ रंग-विरंगक बुद्धि लगैत तहिना मनुष्यक समाज बनवैक लेल मनुष्यकेँ बुझए पड़ैत अछि। दरबज्जापर अवितहि करियाकाका देवनन्दनकेँ पुछलखिन- किअए बजेलहुँ?” देवनन्दनकेँ बजैसँ पहिनहि हुलन कि‍छु कहए लगलनि मुदा, हुलनकेँ रोकैत करि‍याकाका कहलखिन- रघुनी भैयामे हमरो साँझी अछि। तेँ किनको बिगाड़ने हम हिस्सा दुरि‍ नहि हुअए देव। तोहर जे काज छह ओकर मालिक तों छह। जइ चीजक जरुरत हुअ ओ कहि दाए।
  हुलन बाजल- बाँस।
  वीट देखले छह। जते सँ काज हुअ काटि लिहह।
  विचहिमे सुभद्रा शीलाकेँ कहलनि- कनियाँ, साय दए दिऔक।
  आंगनसँ शीला पँचटकही आनि गुदरीक हाथमे दऽ देलखिन। रुपैया लैत गुदरी बाजलि- काल्हि बेरिमे आवि सुपा-चालनि बान्हि देवनि काकी।
  काज हल्लुक होइत करियाकाका मने-मन सोचलनि जे अधे घंटा ने देरी भेल कने रेसेसँ चलि जाएव। नै तँ कनी अबेरे हएत की ने। काजक दौरमे एहिना होइ छै। तहि बीच दुनू परानी हुलनकेँ दू लग्गा आगू आगू-पाछु जाइत देखलनि। गुदरीकेँ पति दिशि घुुमि हँसि कऽ किछु बजैत देखलनि। हुलन- किछु छियै तँ राज-दरवार छियै। मुँह माँगा। आब तँ नवका-नवका लोक सभ भऽ गेल किने। ने ते वाउ कहै जे रघुनी भायक बावा जे रहैनि से बेटीकेँ खोंछिमे पाँच बीघा खेत देने रहथिन। से जँ नइ देने रहितथिन्ह तँ बाल-विधवाकेँ की दशा होइतै।
  गुदरी अपना विचारमे ओझड़ाएल तेँ हुलनक बात सुनवे ने केलक। तहि बीच करियाकाका हुलनकेँ सोर-पाड़ि कहलखिन- सिदहा नेने जा। वेरु पहर बाँस लऽ जहिहह। काजमे विथूत ने होय।
  सुभद्रा उठि आंगन विदा भेलि। कि पाछुसँ शीलो गेलीह। हुलन दरवज्जाक आगूमे ठाढ़ रहल आ गुदरी सिदहा आनए आंगन गेलि। हुलन करियाकाकाकेँ कहलखिन- करिया काका, जावे जीवैत रहबै ताबे संबंध रहबे करत। ओना आब डॉक्टरो भाय बाहरे रहए लगलथि, हमरो सबहक धियापूता अपन व्यवसाय छोड़नहि जाऽ रहल अछि।
  हुलनक बातकेँ करियाकाका व्यवहारिक बुझलनि। मुदा देवनन्दनक नजरि अपन अगिला जिनगीपर पड़लनि। मने-मन सोचए लगलथि रैविये-रवि तँ नहि, मासो-मास आएव ओते जरुरी नहि अछि। मुदा तीनिटा जे मौसम- जार, गरम आ वरखा होइ छै ओहिमे आवि जँ मौसमी रोगक दवाइयोक आ इंजेक्शनो दऽ दिअए। तँ कि हमर सामाजिक संबंध बड़कराड़ रहत कि मरि जाएत। कि डॉक्टर भाय वुझि भैया, काका, बाबा, कहत। सामाजिक संबंधकेँ यएह डोर बान्हि कऽ रखैत अछि। जहिना साओन-भादोमे बावा वैजनाथक डोर कँवरियाकेँ लगि जाइत।
  परिवारक सिदहा आ जारन देखि गुदरी निचेन भऽ गप-सप्‍प पसारि देलक। घरक व्यवहार बुझल तेँ गुदरी चारि हाथक साड़ी फाड़ि कऽ बनौलहा टुकड़ा लइये कऽ आइलि छलि। जरनाक बोझक लेल बीरबाक जरुरत सेहो होइत। सुभद्राकेँ कहलकनि- काकी, हमरा सबहक अपलेशन डागडर वौआ करै छथिन?”
  गुदरीक बातकेँ मजाक वुझि सुभद्रा चुपे रहलीह। शीला बाजलि- केहेन अपरेशन?”
  आरो कोन अपलेशन। उहाए धिया-पूताबला।
  होइबला कि नहि होइबला?”
  अपलेशन केने धिया-पूता हेबो करै छै आ नहियो होइ छै।
  जहन अपलेशनसँ धिया-पूता होइ छै तहन पुरुखे लऽ कऽ की हेतइ।
  कहि उठि कऽ ठाढ़ होइत गुदरी बाजलि‍- काकी, आव तँ आवा-जाही लगले रहत। काजक अंगना छियै कते रंगक चीज-वौसक खगता हेतनि। नै कि‍छ ते देह तँ अछि। लोके-काज लोककेँ होइ छै। दुनू परानी मुस्कुराइत गाछी ठेकना सोझे विदा भेल। जहिना धारमे सुगरकेँ घाटक जरुरत नहि होइत मुदा, जाएत सोझे हिया कऽ, भलेहीं कतेको-बेरि घुरि-घुरि आबए पड़ै। तहिना सुगर पोसनिहारोक चालि। कोना नै रहतै जिनगी तँ सुगरे चड़वैक पाछु बीतलै।
     शीशोक झाँखियो आ मोट-मोट गोटनो देखि दुनू परानी आनन्दसँ बैसि गप-सप्‍प करए लागलि।
  गुदरी- कहुना तँ पनरह दिन चलवे करत।
  हुलन- सुखलो अछिये।

     करियाकाका उठि कऽ विदा होइक विचार करितहि रहथि कि कुसुमलाल पंडितकेँ धड़फड़ाएल अवैत देखते बुझि गेलखिन जे आब वजार गेल नै भेल। फड़िकेसँ कुसुमलालकेँ कहलखिन- आवह, आवह पंडित। तोरासँ बहुत बुझैक अछि। से तँ बुझिते छहक जे काजक अंगना छी।
  मुस्की दैत कुसुमलाल कहलकनि- हँ, से तँ छीहे?”
     अंगना दिशि बढ़ैत, मने-मन करियाकाका सोचैत जे कमसँ कम एक घंटा बजलाक बाद मन ठंढ़ेतै। भलेहीं कौल्हुके सभ गप किअए ने दोहरबै। पाँच गोटेकेँ एकठाम वैसार बनिते बजैक समए निर्धारित हुअए लगैत। कुसुमलालो तँ पाँच गोटेक वैसारमे रहैत अछि। तहूमे अखन तँ आरो फीरीसान रहैए। धरवालीक गट्टा टुटि गेल छै, एकटा बेटा भीने छै तेँ ओकर अधिकार -माए-वापक- कटि गेल छै। दोसर बेटा, जे साझी छैक, दिल्लीमे नोकरी करै छै। पुतोहूकेँ आठम मास। तीनू जमाए परदेशी तेँ अपन घर-दुआर छोड़ि कोना बेटी देखत। तइपर धनकटनी, गहूमक बौग संगे बड़दकेँ फाड़ लगि गेलै। मुदा तेँ कि कुसुमलालक मन खुशी नै रहै छै अपन दोख हटा बेटा-बेटीकेँ जानकारी दइये देने अछि। किअए परिवारक कियो दोख लगाओत। बीमारी रहितहुँ बुढ़वा घरकेँ थितमारि कऽ रखने छथि। सभ धान कटिये गेल। आब गहुमो वौग भइये जाएत। हमरो पलस्तर भइये गेल अछि। बीस दिन आओर बान्हल रहत तकर वाद तँ दुनू वाल्टीन उठेबे करब। हमरा कोन टूटल अछि अनका तँ जाँघ टुटि जाइ छै, छाती टुटि जाइ छै। फेरि ओकरा छुटै छै की नै? तेँ खुशी। भगलाहि पुतोहू कखनो अपन माए-बापकेँ गरियबैत तँ कखनो पतिकेँ। सासु अपने रोगी। एतेक रहलाक वादो कुसुमलालक मन सदिखन खुशी रहैत। जखन कतौ काज करए विदा होइत तँ पुतोहूक भगलपाना पर हँसैत तँ कखनो बेटीक दिन-दुनियाँपर खुशी होइत। एत्ते कम्मल ऊनी कपड़ा तँ बेटिऐ-जमाऐक देल छी। तखन तँ तीनू बहिनि आबि कऽ भेंटि-घाँट कइएे लेलकै। इलाजो लेल पँच-पँच सौ तीनू देबे केलकै। जावे थेहगर छी ताबे......।
     करियाकाका घुरि कऽ अंगनासँ आबि पुछलखिन- अच्छा पंडित, भनसियाक समाचार कहह?”
  बीसम दिन पलस्तर कटि जेतइ। मुदा अखैन हम औगताएल छी काजे भरि गप करु।
   तोहीं बाजह?”
   कर्मक बरतन तँ नापल अछि मुदा, सभसँ झनझटिया दहीक तौलाक अछि की ने। सरधुआ बरतनक दसम एगारहम दिन काज हएत। मुदा दही तँ तीनि-चारि दिन पहिने पौड़ल जाएत। एक दिन बीतिये गेल। पाँचम-छठम दिन तौलाक काज पड़ि जाएत। माटिक बनैमे तीनि दिन टेम लगै छै। तहिना पीटैइयो-सुखबैमे तीनि दिन लगिये जाइत छै। तखन एक दिन आवा लगत। आब हिसाब जोड़ि कऽ देखियौ जे आइसँ हाथ नै लगाएव तँ काज कोना सम्हरत।
  कुसुमलालक बात देवनन्दनकेँ ओजनगर बुझि पड़लनि। बजला किछु नहि। मुदा मूड़ी जे डोलवैत रहथिन से सुनैबला कि मानैबला, से कुसुमलालकेँ बुझवामे नहि अवैत।
  हँसैत करियाकाका कहलखिन- पंडित, तोहूँ जीवनीसँ अनाड़ी भऽ जाइ छह। रघू भैयाक काज अनकर वुझै छहक जे पूछैले ऐलह?”
  नाइ से तँ नहिये छियनि। तखन तँ फेरि काजे छियै। चारि गोटेमे चरचा भेने छुटल-बढ़ल सब बात सभकेँ नजरिपर आवि जाइ छै। अखैन जाइ छी....।
मुस्की दइत- ....काजक तेहेन छिगरी तान भऽ गेल अछि जे घरमे कड़ू कि समाजमे सबदिन सभ कियो एक-ठीन बैठि कऽ हाँ-हाँ हीं-हीं करै छी से आब अइ अवस्थामे छुटि जाय, केहेन हएत? अखनेसँ मुरदा बनि घरमे ओंझरा जाय। के खुट्टा गारि कऽ रहैले आएल अछि जे सभ दिन रहबे करत। तखैन ते जाबे घटमे परान ताबे अइ दुनियाँक लीला देखैए।
  करियाकाका- ऐँह, तूँ ते तेहेन गप पसारि देलह जे चाहो पीबि बिसरि गेलहुँ।
  करियाकाका इशारा पानिकेँ आगू बढाएव छलनि। मुदा पानिक गति तँ सदिखन निच्चे मुँहेँ चलैत अछि। देवनन्दन आशाकेँ सोर पाड़लखिन। आंगनमे शीला बुझि गेलखिन। आशाकेँ कहलखिन- वाउ, दरवज्जापर पापा शोर पाड़लनि, सेहो बुझि लेव आ काए गोटे छथि सेहो गनि कऽ आएव।
  दरवज्जाक कोनपर आशा गनिये रहलि छलि कि फाँड बन्हने, माथपर तौनी नेने राजेसरकेँ अवैत देखि करियाकाका जोरसँ बजलाह- आवह-आवह राजेसर। चाह छुटि जेतह?”
  चारि लग्गा फड़िक्केसँ राजेसर बाजल- करियाभैया, जहिना स्वाती नक्षत्रक अमृत रुपी जल सैकड़ो हाथ समुद्रक पानिमे टपैत सितुआक मुँहमे पहुँच मोती बनि जाइत अछि तहिना जइ अन्न-पानिमे हमर अंश चलि गेल अछि ओ घुमैत-फिड़ैत हमरे लग चलि आओत....।
हाथ उठवैत- ....दना-दानामे लिखल अछि खेनिहारक नाओ।
  अच्छा आवह। तोहर काज तँ आइ भोरे छेलह?” करियाकाका पुछलखिन।
  चानिपर उल्टा हाथ लैत राजेसर- भाय सहाएब, कते तिल अइ गामक खेने छियै से नहि कहि। लोको सभ तेहेन बिजकाठी भऽ गेल अछि जे झगड़ो कड़ू तँ दिन-राति कखनो छुट्टी नहि भेटत कियो कि एक्को मिनट चैनसँ ककरो रहए दिअए चाहै छै। घरसँ बाहर घरि एक्के रमा कठोला।
  अच्छा खिस्सा छोड़ह। काजक गप करह?”
  मुस्की दैत राजेसर कहए लगलनि- भाय, ऐना आन जेकाँ किअए बुझै छी। जखने माया-जालमे पड़ल छी तखने तँ तवाही रहवे करत की ने। तेँ कि समाजक काज छोड़ि देव। हमरा सबहक खूँटा जहिना रघु भाय छेलाह तहिना हुनकर अंति‍म काज सेहो खूँट्टे जेकाँ हेतनि।
  राजेसरक बात सुनि देवनन्दन चौंकि गेलाह। हिनका -पिता- सबहक दोहरी चालि जिनगीक छन्हि। जीवनक एक चालि छन्हि आ लोकक बीचक दोसर। जना सौँसे गामक ठकदरुआ ई सभ होथि आ हिनका सबहक ठकदरुआ सौँसे गाम होनि‍। मुदा साकांक्ष होइत तीनूक -करियाकाका, कुसुमलाल आ राजेसरक- गप-सप्‍प सुनए लगलथि। तखने शीला तस्तरीमे चारि कप चाह नेने पहुँचलीह। खाली चाह देखि कुसुमलाल मुस्की दैत बाजल- आँइ यौ करिया भैया, कुम्हारक टेमकेँ अहाँ एहिना बुझै छियै। जते काल चाहले वैसलौं तते कालमे तँ पाइ रखैबला बैंक कत्ते गढ़ि नेने रहितौं।
  कुसुमलालक इशारा बुझि शीला तस्तरीकेँ पतिक आगू चौकीपर रखि चोट्टे आंगन घुरि विस्कुटक पॉकेटक कागज फाड़ितहि दरवज्जापर पहुँचलीह। बिस्कुट देखि करियाकाका कहलखिन- कनियाँ, अहाँ पानि नेने आउ। हम बिस्कुट वाँटि लइ छी।
  सोलहो विस्कुटमे सँ पँच-पँचटा कुसुमलाल आ राजेसरकेँ देलखिन। तीनि-तीनिटा अपने दुनू गोटे देवनन्दन सहित लऽ दुनू गोटे दुनू गोटे दिस देखए लगलथि। स्वादिष्ट नमकीन विस्कुट मुँहमे चिबवैत राजेसर बाजल- चारि बजे भोरेसँ भाय खटै छी। खाइयोक छुट्टी नै भेल। मुदा भगवानो तेहने अहारो देलनि। भऽ गेल भरि दिनका कोइला-पानि‍। दस बजे राति घुमि कऽ तकैइयोक काज नै। एकटा विस्कुट खाए एक-गिलास पानि पीबि शीलाकेँ गिलासमे पानि भरैक इशारा करैत बाजल- कनियाँ एक दिनक खिस्सा छी। पानियो वाँटू आ खिस्सो सुनियौ। एक गोटेकेँ पता माने निमंत्रण दइले छह कोस पाएरे गेलहुँ। भिनसुरका चलल डेढ़-दू बजे दिनमे पहुँचलौं। थाकियो गेल रही आ भूखो लगि गेल रहए। मुदा बुढ़ी जे रहथिन से महा-सोभावी मुँहसँ मधु चुबैन। जाइते गेलहुँ कि अपने विछानपर वैइसैक इशारा करैत जजमान आ पसारीक गप पसारि देलनि। हमर मन तँ जरले रहए। तइओ घंटा भरि जी-जाति कऽ सुनलौं। तखन खिसिया कऽ कहलिएनि- हमरा घुमैमे अन्हार भऽ जाएत। जाइ छी।
  धड़फड़ा कऽ उठि पुतोहूकेँ कहलखिन- कहुना भेला तँ कुटुमक गामक नौआ भेलाह। चाहो-पान नहि खुएवनि-पीएवनि, से केहेन हएत?” मनेमे आएल जे ई सभ गामोमे परदेशिये छथि। शहरमे रहैत-रहैत मूस जेकाँ, समाजोक जालकेँ काटि रहल छथि। चाह पीबि-पान खा ओतै विचारि लेलहुँ। जे झाड़ा-झपटा कमले पेटमे करब। किरिण डूविते जे पूवरिया छहर टपि जाएब तँ दोसरि-तेसरि साँझ धरि गाम पहुँचिये जाएव। बटखरचा लेल पाँचटा रुपैया देने रहथि, भूखे छटपटी धेने रहए। कमला धारक ठंढ़ेलहा पानिमे जहाँ पएर देलियै कि पैखाना सटकि गेल। मुदा लघी लगि गेल। पूबरिया छहर टपि झंझारपुर वजारमे तीनि रुपैआक छोला-मुरही खेलौं पानि‍ पीलौं कि जानमे जान आएल।
  कोन गपमे बौआइ छह राजेसर भाय? काजक गप करह?” कुसुमलाल बाजल।
  विस्कुट खा पानि पीवि चाहक गिलास हाथमे लइते राजेसर शीलाकेँ कहलनि- कनियाँ, जँ विस्कुटे खुएबाक छलए तँ पहिने पानि विस्कुट अनितौं। एक तँ बेचारी अपने बेइज्जत भऽ चाहसँ पानि भऽ गेली। तहिपर सँ हमहूँ सभ कते बेइज्जत वेचारीकेँ करबै।
  राजेसरक बात सुनि एक लाड़नि चलवैत देवनन्दन बजलाह- बेइज्जतीक बोनमे तँ नम्हरे वेइज्जतक गाछक इज्जत होइत।
  काजकेँ देखैत करियाकाका गपक रास्ता बदलि कहलखिन- कनियाँ राजेसरकेँ भाँड़ी जेकाँ ऐहेन गिलासमे नहि पौआही गिलासमे चाह देवनि। अच्छा, राजेसर आइ तँ गाछियेमे कर्म हेतइ?”
  अपन काज अगुआएल देखि राजेसर बाजल- भाय, आँझुका गप कि कहू। एक तँ तेहेन-तेहन सिफलाहि मौगी सभ गाममे चलि आएल अछि जे होइए जे झब दऽ मरि जाय जे ऐहन-ऐहन मनुक्ख सभसँ पिण्ड छूटत।
  से की?”
  की पूछै छी। पहिलुके नीन रहए। करीब एगारह-बारह बजे राति रहए। गोपला घरमे आगि लगि गेलइ। ओकरे मिझवैमे दू-बाजि गेल। सौंसे देह थाल-कादो सेहो लगि गेल रहए। ओकरे धोइत-धाइत तीन बजि गेल। ओछाइनपर एलौं कि अझुका काज सभ मन पड़ल। छुतका बला केश कटैक अछि। खवरि दइले पुरहित-पात्र ऐठाम जाइक अछि। तहिपर सँ परसुए, जुगेसरा कहि देने रहए जे कनी केशो नीक जेकाँ छाँटि दिहह। आ बरिआतियो चलिहह।
  करियाकाका- अखन लगन कहाँ छै?”
  राजेसर- अहाँ कोन जुग-जमानाक गप्‍प बजै छी भाय। क्यो जे कोटमे विआह करैए से लगन देखि कऽ। तहूमे कि जुगेसराक विआह हेतै कि चुमौन करत।
  केहेन कनियाँ छै?”
  ऐह हद भेल भाय। कन्याँ बच्चोकेँ कहल जाय छै आ सासुरो बसनि‍हारि‍केँ। जुगेसराकेँ तेसर छिअए आ कनियाँ के चारिम।
  दुनू तँ उड़नबाजे बुझि पड़ैए?”
  भाय, मनुक्खमे सब गुण होइ छै। पालतुओ चिड़ै बोनाए जाइ छै आ बोनेलहो चिड़ैकेँ पकड़ि पोसा बना लैत अछि।
  चाहक गिलास हाथसँ पकड़ैत राजेसर शीलाकेँ कहलकनि- कनियाँ, काकाीकेँ सभ बुझले छनि। हुनका हमर नाओ कहि देवनि। डालीक ओरियान करतीह। जावे तक छौरझप्पी नै हएत ताबे तक गाछिये मे पुजौल जाएत।
  शीला आंगन जा सासुकेँ कहलनि। दरवज्जापर सभकेँ चुप देखि राजेसर डॉ. देवनन्दनकेँ कहलकनि- डाकडर सहाएव, हमर काज माने नौवाबला काज पहिले दिनसँ शुरु भऽ जाइए। काजो दोहरी। एक दिशि पूजवैक प्रक्रियामे डाली सजौनाइ दोसर दिस कठिआरीबला सभ परातेसँ केश कटबऽ लगैत अछि। ई तँ एकटा काज भेल। जँ गाममे एकटा काज हएत तखन। जँ दोहरा-तेहरा गेल तँ काजो दोहरा-तेहरा जाएत तइपर सँ जन्मौटी छुतका भिन्ने। कते दिनसँ मनमे होइए। जे एकटा नांङरि माने गाए-महीसि दुआरपर रखितौं से पारे लगनाइ कठिन अछि। इम्हर श्राद्ध कर्ममे हम छअ आना हिस्साक भागीदार छी तइमे हथ-उठाइ किछु कर्ताक निछुड़लाहा भेटैए। झलफाँफी धोती माटिक वरतन आ किछु हथ-उठाइ भऽ गेल।
  राजेसरक बात सुनि देवनन्दन तरे-तर सर्द हुअए लगलाह। आँखि उठा करियाकाकापर देलखिन। करियाकाका राजेसरक मुँह दिशि तकैत। जना रसगुल्ला खसतै आ लपकब। रसगुल्ला तँ नहि एलनि मुदा, रसगुल्लाक रस जरुर आवि गेलनि। मुस्की दैत कहलखिन- राजे, जे बेसी मनुक्ख लेल खटत आ कमसँ कममे अपन जिनगी चलाओत ओहिसँ बेसी इमानदार अइ घरतीपर के अछि?”
  धरमक एकटा बाट तँ इमानो छिअए।
  मने-मन देवनन्दन तइँ केलनि जे पिताक कर्म करौनाइ हमर जिम्मा छी। जे कोनो काज हएत ओकर नीक-अधलाक भागी के हेतै। गाममे जतऽ जे होइ छै होउ। मुदा अपना एहिठाम ऐहन अनुचित नहि हुअए देबैक। फेरि मनमे शंका उठलनि जे एहि बातकेँ पूरबासय कोना कएल जाय? पूर्वाशयक अर्थ की पूर्ब$आशय। समाजक जे अधिकांश लोकक कानमे रहैत छैक ओकरा की मानल जाय।
  रंग-विरंगक तर्ककेँ मनमे उठैत देखि सोचलनि जे दुनू पार्टीक माने पुरोहितक नौआक बीच काजक संबंध अछि। सझिया काजक फल तँ सझिया होइत। कते साँझी? तेकर की आधार। से नहि तँ दुनू गोटेमे करथि। सोझक जे निर्णए दुनू गोटे करता तँ हमरा मानैमे की लागत। मन असथिर भेलनि।
  चारिम दिन। गाछीमे सरझप्पी केला उत्तर कर्म सम्पन्न भऽ गेल। शिव शंकर गाछियेमे भोजन कऽ नेने रहथि। करियाकाका हाथमे कोदारि नेने आगू-आगू तहि पाछू शिव शंकर आ देवनन्दन। तहि पाछू परिवारक सभ। तीनू भाँइयो-वहीनि आ सासुओ-पुतोहू। आंगन अबितहि सभकेँ बुझि पड़लनि जे जना-आगूए-आगू रघुनन्दन आवि गेला। हुनके बनाओल घर-दुआर, पानिक चापाकल संग-संग सभ किछुमे सन्हिया गेल छथि। जँ हुनकर घरारी स्मारक बनै तँ सभ दिन ओहि स्मारकमे दर्शन दितथिन्ह। मने-मन पिताकेँ स्मरण करैत देवनन्दन संकल्प लेलनि जे पिताक देल जे किछु अछि ओ एहि समाजक छियै। हम तँ अपने तते कमाइ छी जे गामो अबैक छुट्टी नहि होइत अछि। बेटी सासुर जाएत। बेटो कतौ नोकरी करत। की बाप-दादाक देल सम्पत्ति हम आनठाम दऽ अविऐक? तखन गामक मनुक्ख अनतऽ जाए भलेहीं अपनाकेँ अगुआ लथि मुदा, गाम तँ तरका जाँत जेकाँ पड़ले रहि जाएत। चलत कहिया। की जँ दुनू चक्की मिलक चक्की जेका चलए लगए तँ कि गहुमक आटा नहि पीसल जाएत। जरुर पीसल जाएत। पिताक देल सम्पत्तिक जे आमदनी अछि ओकरा भोज आ अपना दिशिसँ गरीब बच्चाकेँ पाँच हजार रुपैयाक किताव, पाँच हजार रुपैयाक दवाइ समाजक बीच पिताक मृत्युक दिन उपहारस्वरुप देवइ। एहिसँ खुशीक बात ई होएत जे हुनका -पिताकेँ- जनमे दिनक तिथिकेँ दितिऐक। बच्चाक संग-संग किअए नहि खेलथि। किऐक हुनकर मृत्यु शरीरकेँ मृत्यु बुझिअनि? मुदा, हुनकर जन्म-कुण्डली तँ नहि भेटत? स्कूल गेबे नहि केलाह। तखन की करब?
  मनमे नव उत्साह जगितहि करियाकाकाकेँ कहलखिन- कक्का अहाँ सभ एक बतारी छी। हमरासँ बेसी देखने छलिएनि। अखने बैसि कऽ अगिला कर्मक विचार कइये लेब। शंकरो भाय छथिये।
  देवनन्दनक बात सुनि, अपन आमदनी शिव शंकर देखलनि। मनमे गुद-गुदी लगलनि। पानक पीत फैकैत बजलाह- बेजाए कोन? अखन सभ समटाएल छी फेरि समटैमे समए लागत। तते करियाकक्का ठेलि-ठेलि कऽ खुऔैलनि जे आराम करैक मन होइए।
  अपन चावसी सुनि करियाकाका नजरिमे नाचि उठलनि खेतक आँड़िपर वैसि गप्पक संग-संग तमाकुलो खाथि। मन पड़लनि गुनाक गीत। तहियाक छीतन आइयो संग-संग अछि। मन पड़लनि समाज। आइ जे समाज एक भऽ भाय-सहाएबकेँ विदाइ देलनि कि ई उचित होय जे लोक अपन-आन गामक जातिकेँ भोज खुअबैत आ अपन ओहन समाजक बच्चाकेँ कनैत सुनियै, जे बेरि-विपत्तिमे सदिखन लगमे रहैत अछि। जते खुशी शिव शंकरक बात सुनि भेलनि तहिसँ वेसी कचोट मनमे उपकि गेलनि। बजलाह- जखन तेरहे दिनक बीच काज नापल अछि तखन तँ अधिकसँ अधिक समाजक उपयोग होएव जरुरी अछि। हम सुन्दर भायकेँ बजौने अबै छिअनि?”
  करियाकाका बात सुनि देवनन्दन कहलखिन- अहाँ कोदारि पाड़ि कऽ एलहुँहेँ, आशाकेँ पठबै छिअए।
  देवनन्दनक बात सुनि करियाकाकाकेँ हँसी लगलनि। बजलाह- डॉक्टर सहाएव, आशा जा कऽ की कहतनि?”
  बजवै छथि।
  कथीले?”
  तखन चुप।
  जँ भैया बुझैत जे कोनो छोट-छीन काज अछि तँ अपन नमहर काजकेँ सम्हारि जाएब। तखन औताह? से नइ तँ अपने जाइ छी।
  करियाकाकाकेँ विदा होइतहि दयानन्द (देवनन्दनक वेटा) केँ कहलखिन- बाउ, एक लोटा पानि पीआउ। हमरो अहाँक परिवार कोनो बाँटल अछि अहाँक मात्रिक बरिआती हमहूँ गेल रही। अहाँ सभ तँ परदेशी भेलि जाइ छी। हमरा ओहिना मन अछि उपनयनसँ तीनि दिन पहिने दालि-भात, तड़ूआ तरकारी, दही-चीनी खेने रही। अहीं सबहक अन्नपर हमहूँ सभ ठाढ़ि छी.....।
पानि पीबी- .....अखन दुइये गोटे छी, तेँ कहै छी। पुजबैत-पुजबैत हमरा सबहक परिवार निच्चाँ मुँहेँ ससरि गेल। अपने बात कहै छी। राजविराजसँ तीनि कोस आगू तक बावूकेँ जजमनिका रहनि। जखन ओहि इलाका जाइ तँ मास-मास दिन परदेशे जेकाँ रहि जाइ। सेवा खूव हुअए। खेनाइ-पीनाइक कमी नहि। हमरा तँ एतऽ सँ नेपाल धरि ने धांगल अछि। अपना सभ तँ कनी हटल छी तेँ ने, नै तँ जना-जना उत्तर मुँहेँ जेवइ तेना-तना बाजव-भुकब, खेती-बाड़ी, माल-जाल मिलल-जुलल देखवै। कथा-कुटुमैती, भोज-काज अइपार ओइपार होइते अछि। सीमाकातमे अइ भागक लोक ओइ भाग जा हाट-बजार करैत अछि आ ओइ भागक अइपार। जना-जना आगू मुँहेँ बढ़बै तेना-तेना पानियो आ बोलियोमे अन्तर वुझाएत। तेकर कारण छैक उत्तरवरिया पहाड़। बावूकेँ खूब आमदनी होनि‍। भरि-भरि दिन भाँग-खाय दरवज्जापर बैसि तास खेलल करी। लघु-सिद्धान्तपढ़ैमे एगारह वर्ख लागल रहए। मुदा बावूक संग पूरैत-पूरैत अपन जीविकाक सभ लूरि भऽ गेल। पढ़ैमे मझिला भाए चन्सगर। खूब पढ़ि कऽ नीक नोकरी करै छथि। कहि देलनि जजमनिकासँ हमरा कोनो मतलब नहि हम मेहनत करब। मेहनतक अन्न खाएब। तखन धिया-पूताक संस्कार तेज हेतइ। सभसँ छोटका बकनाएल अछि। दिल्लीमे भाए नोकरीयो धड़ा देलकनि तँ तते कमाथि जे पेटो ने भरनि। मुदा समाजमे प्रतिष्ठा बनौने रहथि
  प्रतिष्ठाक नाओ सुनि दयानन्दक मनमे भेल जे एक दिशि कहै छथि जे बकना गेलाह आ प्रतिष्ठितो कहै छथिन। मनमे अचड़ज भेलैक आँखिमे आँखि गरा पुछलकनि- की प्रतिष्ठा?”
  दयानन्दक प्रश्नकेँ हल्लुक बुझि बजलाह- बौआ, अखनो अधिक खेनिहार लोककेँ प्रतिष्ठित मानल जाइत अछि। एत्ते दिन ई प्रतिष्ठा भोज-काजमे भेटैत छलैक आब घरे-घर भऽ गेलइ। हम कतेक रुपैआ खेनाइपर खर्च करै छी एहिक भीतर प्रतिष्ठा आवि गेल अछि। भलेहीं हजार रुपैया प्रतिदिन परिवारक भोजनमे खर्च किअए ने करथि मुदा समाजक लोक जँ डेरापर आबि जेताह तखन या तऽ गेट खोलि भेंटे नहि देवनि या तँ भेंटो देवनि तँ गामक- हालि-चालि पुछि कहवनि जे पत्नी नोकरीक ड्यूटीमे छथि तेँ डेरामे चाहो पीयाएव मोसकिल अछि। वेचारा हाले-चाल की कहतनि जे बेसी समयो लागत। ने जिनगीक भेंटि आ ने एकठाम रहैबला। हँ, तँ कहै छलहुँ अपन भाइयक विषएमे। साल भरिसँ महंथ भऽ गेल अछि। देखलिऐक तँ नहि मुदा, सुनै छी अपनो चिट्ठीमे कताक बेरि लिखिलकहेँ। ओना भाए छी आगि नहि उठेबै, नअ-दस माससँ लत्तो-कपड़ा आ हजार रुपैया महिनो पठबैए। मुदा आफद की एकटा अछि? साल करीब भऽ गेलनि। कनियाँ एतै छथिन। एकटा बच्चो छन्हि। फोन केलिये जे दसो दिनक लेल गाम आबि वालो-बच्चाकेँ असिरवाद दऽ दहक। आब तँ तोँ महंथ भऽ गेलह....।
  देवनन्दन दिस मुँह घुमा कऽ मुस्की दैत- ....भाय, की जबाव देलक से बुझिलिऐ, कहलक जे स्थानक की हमरा खातिआन बनल अछि। भरि दिन भरि राति कतौ रहू मुदा, साँझ-भिनसरकेँ घड़ी-घंट बजा आरती गवए पड़त। मुदा आब चढ़ौआ सभ सेहो हुअए लगलहेँ। भरि गाम-घरक स्त्रीगणसँ लऽ कऽ बजार धरिक जनिजाति सदिकाल अबिते रहैत अछि।
  देवनन्दन- भावोओकेँ ओतै पठा दिअनु?”
  शि‍व शंकर- से तँ अपनो लिखैए जे विदागरी कऽ कए नेने अबिअनु। मदुा एकटा आफत रहै तब ने आफतपर आफत अछि। एक तँ कनियाँ जाइले नहि गछैत छथि। कोना उपकैर कऽ घरसँ विदा कऽ दिअनि। मुदा बात सेहो नहि अछि दोसरो बात अछि। एक बेरि विवाह-पंचमीमे जनकपुर नैहरक संगी संगे गेलीह। लोकक ठठ्ठ, दिन-राति यात्री इम्हरसँ उम्‍हर नचिते। एक ठाम एकटा नंगा स्थान लग बिजली कटि गेलइ। जहाँ-तहाँ अपन-जोरी -संगी- छोड़ि यात्री सभमे हरा गेल। हमरो भावो हरा गेलीह। ले वङौड़ रौतुका हराएल दिनोमे ने गौँवा भेटलनि हिनका आ ने ई भेटलखिन गौँवाकेँ। मुदा हरेलखिन नहि। वौएलखिन सभ यात्री तँ अपने इलाकाक रहै की ने। नानी गामक संगी भेटिलनि। जहिना धारमे बाँस वा रस्सी पकड़ि-पकड़ि लोक धार टपैत तहिना बेचारी नानी गामसँ मेजमानी करैत सात दिनक पछाति गाम ऐलीह। से मन उड़ल छनि।
  देवनन्दन- सभ स्त्रीगण शहर जाए जाहैत अछि अहाँ उनटे कहै छी?”
  मुस्की दैत शि‍व शंकर- ऐह भाय, ओहूँ अनाड़ी जेकाँ बजै छी अपन जे मिथिलांचल अछि, एहि क्षेत्रमे कतौ लोक मैथिली बाजि जिनगी गुदस कऽ सकैत अछि। मुदा जहिठाम भाषाक दूरी, जीवन-शैलीक दूरी अछि तहिठाम कि गिरगिट जेकाँ सात बेेरि जिनगी बदलि सकैत अछि। रहल बात जीवाक उपायक? तँ कि जहिठाम मनुष्य रहत ओहिठाम कोनाे वस्तुक उत्पादनक जरुरत नहि अछि। की हमरा सभकेँ शिक्षा वा दवाइक जरुरत नहि अछि आकि भोजन-वस्त्रक। मनोरंजनक जरुरत नहि अछि आकि कला-संस्कृतक। मुदा ई के करत? जेकर छिअए से बोहू लऽ लऽ शहर घुमैए तँ कि सोझे सीते भूमि कहने अयोध्यासँ राम औताह। मुदा छोड़ू दुनियाँ-जहानकेँ। अखन जे काज सोझामे अछि पहिने तकरा देखू। हँ तँ जाधरि कारि‍याकाका आ सुन्दरकाका नहि पहुँचलाह तहि बीच एकटा आरो कहि दैत छी। राज-विराजसँ तीन कोस उत्तर धरि हमरा बावूकेँ जजमनिका छलनि। लोकोक धारणामे श्राद्ध-कर्मक महत्व छलनि। जहिसँ आमदनियो नीक छलनि। अखुनका जेकाँ जिनगियो फल्लर नहि छलैक। लोको विसवासू। आँखि देखा कऽ ककरो कियो वेइमानी नहि करैत। जहाँ-तहाँ बावूओ अपन समान -वरतन-कपड़ा- रखि देथिन कपड़ाक कते जरुरते परिवारमे रहैत छल। जहिसँ राजसी ठाढ़मे जीवन बितौलनि। जखन मुइलाह तखन चारु दिशिसँ भूत पकड़ि लेलक। भाय कहलनि जे नोकरिये करब। अपन परिवार लऽ कऽ चलि गेलाह। काजे-उद्यममे पाहुन जेकाँ अवैत छथि। दोसर भायक कहवे केलहुँ जे गामक फेदार मोरगंक दफेदार भऽ गेल। सुनै छी जे भरि-भरि दिन नानीक सिखैलहा खिस्सा सभ मौगी सभकेँ सुनवैत रहैए। खाएर, किछु करह। हमरो तँ कपार नहिये चटैत अछि। अखन की भऽ गेल अछि‍ जे अल्लापुरक सभ जाति अपने-अपने पुजबै लगल। जजमैनका घटि गेल। अल्लापुरक देखौंस सीमो-कातक गाम सभ करए लगलहेँ। रहैत-रहैत पाँच गाम बचल अछि। ओना आब नवका जजमान मारवाड़ी सेहो बढ़लहेँ। पाइबला पार्टी।
  देवनन्दन- ओ सभ अपन छोड़ि‍ देलक?”
  अपनो धेनहि अछि। मुदा ऐठाम तँ सभ वेपारी भऽ गेला। पुजेगरी कहाँ अछि। एक बेरि पान खुआउ। गामक खेल-तमाशा देखि मन कनैत रहैत अछि मुदा, तइओ जे ठोरपर पछवा लहकी देखै छिऐ तँ तामसो उठैत अछि। मुदा सभसँ भला चुप। ने किछु बजै छी आ ने ककरो किछु कहैत छिऐक।
पान मुँहमे लऽ कने काल गुलगुला कऽ पीत फेकैत पुन: बजलाह- भाय, छह माससँ निचेन भऽ गेलहुँ। मुदा दियाद-वादक जे दशा-दिशा देखै छियै तहिसँ होइत अछि जे भगवान हमरो उपरमे तकैत छथि।
  देवनन्दन- से की?”
  शि‍व शंकर- भाय-सहाएव सभ तेहेन रास्ता पकड़ि लेलनि जे चिन्ता मेटा देलनि। मझिला भाए जे नोकरी करैत छथि गामपर सबतूर आवि वलजोरी दुनू भाँइ (वेटा) केँ लऽ गेलखिन। की कहितिअनि? अपनो बुझै छी जे दिनानुदिन जीविका घटले जा रहल अछि। तहन तँ सभ ि‍दन समाजक बीच रहलौं तेँ आब अहि उमेरमे कतऽ जाएब। जाधरि समाज जीवैत अछि ताधरि कहुना नहि कहुना बहिते रहब। अपने तँ नहि मुदा, भावो अपन दियादिनी माने हमरा पत्नीकेँ कहलखिन- उसरागा खाि‍त-खाइत सभटा उसरन भेलि जाइए। हमरा की लोक नहि दुसत जे बाप-पिती बड़का हाकिम छथिन आ बेटा-भातीज दसखतो करै जोकर नहि भेलखिन। कहि दुनू भाँइकेँ लऽ जा अपने लग, अफसर सबहक जे स्कूल छैक तहिमे नाओ लिखा देलखिन। छोटका भाए सदिखन फोन करैत रहैत अछि जे हमरा तते चढ़ौआ होइए जे कतऽ कऽ राखब। उठा-उठा लऽ लऽ जाउ। मुदा गाड़ीमे चलैत डर होइए। तते छिना-झपटी, निशां-खुऔनी हुअए लागल अछि जे हमरा बुते तीस घंटा गाड़ीमे बैसि दिल्ली पहुँचल हएत। मुदा तइओ अनका-अनका दिया तते चीज पठबैत रहैत अछि जे कोनो चीजक कमी नहि अछि। संतोष एते भऽ गेल जे कियो अपन-बाप माएक किरिया-कर्म करैत अछि तहि बीच हम किअए डाक-डकौबलि करी। पूर्वज सभ तँ तीन श्रेणीक सराध कर्म तइयै कए गेल छथि। जकरा जहि तरहक विभव रहैत अछि ओ ओहि तरहक कर्म कऽ कए एकलोटा पानि तँ पूर्वजकेँ दइऐ दैत छथि। मुदा लोकोमे छल-प्रपंच छैक? जँ करै छी तँ श्रद्धापूर्वक करु नहि तँ ठकि कऽ पिंड कटौने नहि हएत। तहिना हमहूँ करै छलहुँ। दियाद बाद अखनो करिते छथि जहिसँ दशो तेहने भेलि जाइ छन्हि। गामेमे वेदान्ती काका छथि। वेचारा अपन जिनगी अपना ढंगसँ बना नेने छथि। ओना ओ लोअरे-प्राइमरी स्कूलमे गुरुवाइ करै छथि। गामेक स्कूलमे काजो करैत छथि। मुदा अपन क्रिया-कलाप छन्हि। जहिना किसान काजकेँ दू उखड़ाहा -भिनसरसँ बारह वजे आ दू बजेसँ सूर्यास्त धरि- बँटने छथि‍। तहिना स्कूलमे दुनू उखड़ाहा पढ़बै छथिन। दरमाहा भेटिलनि कि नहि तेकर कोनो चिन्ता नहि। किछु अफिसक किरानी ठकि कऽ खाइ छनि तँ किछु बैंकक। कहियो कियो नाङट देह आ बच्चाकेँ किताब-काेपी देखा मांगि लैत छनि तँ बैंकक चारु भाग मरड़ाइत लुच्चा सभ झोड़ा छीनि लैत छनि। मुदा ने कहियो काकी मुँह उठा हिसाब मंगै छन्हि आ ने अपने ककरो कहै छथिन। मन पुष्ट रहैत छनि अपनो तँ जीविते छी तहन अनेरे घरमे रखि कऽ की हेतइ। कातिक मास कार्तिक महात्म्य ब्रह्म स्थानमे सभ साल सात दिन समाजकेँ सुनवै छथिन तहिमे ततेक कपड़ा भऽ जाइत छन्हि जे सालो भरि दुनू परानी बिनु सुइया भिरौल कपड़ा पहिरैत छथि। दूध खाइले गाइये पोसने छथि। ओना खेती अपने नहि करैत छथि। गाममे दू कट्ठा बाड़ी छोड़ि घरारियेटा छेबो करनि। पिता जजमनिका पुजबैत छलथिन। गामे-गामे जे जजमान दानमे खेत आ आमक गाछ देने छनि वएह तते आबि जाइत छन्हि जे दू-सलिया-तीनि-सलिया चाउर सेहो पथ्य-पानिले रहैत छन्हि। अादतो  तेहेन रखने छथि जे ककरोसँ मंगैक काज नहि। आजुक छौँड़ा सभ जेकाँ नहि ने जे- बाबा, कने खैनी खुआउ। पचास गाछ तमाकुलक खेती अपने हाथे-बुद्धिये करै छथि। काकी गाइयेक पाछु बेहाल रहै छथिन। जहिना एक बहीन दोसर बहीनिक माथमे केश बिहिया-बिहिया ढीलो तकैत आ नीक-अधलाक गप्पो करैत तहिना गाइयक संग काकी। तमाकुलो अपने हाथे उपजवैत छथि आ चूनो तहिना अपनेसँ बनवैत छथि। दियादमे जखन हुनकापर नजरि पड़ैत अछि तँ नजरि निच्चाँ भऽ जाइत अछि। मुदा ओहीठाम दोसर छथि जिनका घरारी दुआरे एक्के अंगनामे सोड़ेक-सोड़े दिया-पूताक संग तीनि भाँइ छथिन। भोर होइते तीनू महाभारत शुरु कऽ दैत छथिन। तीनू दियादिनीयो तीनि परगनाक। एकटा अल्लापुरक छथिन दोसर भौरक। तेसर गंगा ओइ पारक मगहक छथिन। तीनू जे तीनि सूर-तानपर गाइरि‍क गीति गाएब शुरु करैत छथिन तखन बुझि पड़ैत अछि वृन्दावनमे छी आकि लंकाक पुष्प-वाटिकामे....।
  मुस्की दैत- ....कते कहब भाय, अपने लाज होइए। एकटा छौँड़ा अछि लक-लक पतरे। झोंटा जेकाँ केश रखने अछि। सब दिन मोछ-दाढ़ी कटैए। छींटि‍बला घुट्ठी लग तक अंगा सिऔने अछि। पाएरेमे सटल, चुस्त पैजामा पहिरैत अछि। एक गोटेक काज रहए, देखलियै तँ धोखासँ कहा गेल के छिऐँ गै। से की पुछै छी जना बिढ़नी छत्तामे गोला फेकि देने होइये तहिना गनगनाए कऽ मुँहे-काने की कहलक, तेकर ठेकान नहि। सभसँ चोट एकटा बातक लागल जे कहलक- मनुक्खक झर कहींकेँ।
  मुदा, लगले मुँहसँ हँसी फुटलनि बजलाह- आँखि उठा कऽ देखै छियै ने भाय तँ बुझि पड़ैत अछि जे सभटा बूड़ि मुँहा भसि‍ भसि गेल अछि। तेहेन-तेहन कुरेर सभ जन्म लऽ लेलकहेँ जे कुल-खानदानक नाक कटौत, की कान कटौत, की घरारीकेँ भट्टाक खेत बनाओत से नहि कहि। एक दियाद छथि जे लम्बाइ चारि फीट हेतनि चौराइयो तहिना मुदा, चंगेरा भरि चूड़ा, अधमन्नी तौला दही, एक्के सुरकानमे सीमा टपा दैत छथि। चूड़ा-दही तेहेन चुभुटि पेट कऽ पकड़ने छनि जे सदिखन पेटे टा सुझै छन्‍हि‍।  घर गिर पड़लनि। कते खुशामद कऽ कए इन्दिरा आवास दिआ देलिएनि। ले बङोर ओहो चाटि लेलनि आ अखन खिचड़ी खाइ छथि। कते कहब भाय।
  सुन्दरकाकाकेँ संग केने करियाकाका पहुँचलाह। तखनहि‍ लेलहा सेहो कुड़हरि लेमए आवि करियाकाकाकेँ कहलकनि- आब तँ तीनि दिन कोदारि, कुड़हरि, टेंगारी जहल कटलक। आवो छोड़वै की नै। साते दिनमे जारनकेँ सुखाएवो छै।
  लेलहा बात सुनि करियाकाका चुपे रहलाह। मुदा सुन्दरकाका लेलहाक मुँहक बात छिनैत कहलखिन- कारी, पढ़ुआ भायकेँ बजा अनिअनु। गाममे सभसँ वेसी गुल्ली पेंच वएह करै छथि‍।
     सुन्दर काकाक बात सुनि करियाकाका पढ़ुआ भाय एहिठाम विदा भेला। जखनसँ लेलहा सुन्दरकाका मुँहेँ गुल्ली-पेंच सुनलक, तखनसँ गुल्ली-पेंचक अर्थ बुझैले मन लुस-फुस करए लगलै। मुदा काजक गप सुनि अपन प्रश्नकेँ पेटमे दवने रहए। मुदा तइओ पेटमे उधकै। होइ जे कखन बाहर निकलब। बाँस भरि करियाकाका आगू बढ़लथि कि लेलहा पुछलक- सुनर काका, गुल्ली-पेंच ककरा कहै छै?”
  लेलहाक प्रश्न सुनि सुनरकक्काक पेट-गुंगुआए लगलनि मुदा, पहिले मुहराकेँ रोकैत शि‍व शंकर सम्हारि लेलनि। बजलाह- देवनन्दन भाय लेलहा (सभ) समाजक खूँटा छी। वेचाराकेँ एहि उमेरमे कहीं ऐहन देह रहितैक। जना बुझि पड़ैत अछि जे कोसी बाढ़िमे जहिना नव-गछुली कलम-गाछी सभ पतझार लऽ छुछे पतड़का-पतड़का डारि जेकाँ देहक हाड़ वुझि पड़ै छैक। समाज की? समाजरुपी घर की? समाजरुपी घर वएह जे सबहक सझिया होय। आब प्रश्न उठैत काजपर काज तँ ढेरो तरहक अछि, समाजक काज की बुझल जाय? एहि प्रश्नक उत्तर विकास-प्रक्रियामे अछि। मुदा मूल प्रश्न अछि सभ मनुष्य मनुष्य छी तेँ सबहक दुख-सुख सझिया हुअए।
     शि‍व शंकर बात सुनि सुन्दर काका उफनि पड़लाह। जहिना रौद लगिते ताड़ी घैलमे फेना-फेना निच्चाँ खसैत तहिना सुन्दर काका मुँहसँ खसए लगलनि-लेलहू, तूँ सभ लगले विसरि जाय छह मुदा, हमरा तँ युग-युगक बात मन अछि। श्याम सुन्दर माएक श्राद्धक भोजमे देखने रहक जे पच्चीस गामक पंच कोना दरवज्जापरसँ लऽ कऽ अपना अंगना धरि गरि-औलकनि। केकर केलहा रहए? वएह पढ़ुआ भाय भनसियाकेँ फुसला कऽ गांजा पीआ, हकिमानी करै लगलथि। तरकारी-दालिमे जखन नोन दैक बेरि भेलइ तखन बोरे देखा देलखिन।
  सुन्दर काकाक बात सुनि ठहाका मारि बाजल- हँ, यौ काका। पाछु हमहूँ बुझलौं।
  धुड़बूड़ि तेहेन छुछनरि छथि जे ओतवे केलनि। देखने रहक की नहि जे पुलकितक बेटी विआहमे केहेन मारि करा देने रहथिन। कोनो अनकर किरदानी रहए जे कि‍ वएह बीचमे घोघटाही साड़ीके दुसि देलखिन। हुनके बातपर ने जनि-जाति सभ झगड़ा ठाढ़ केलक। अन्तमे देखवे केलहक। तेँ ऐहन-ऐहन बुधि‍कनाह लोकसँ सम्हरिऐ कऽ रही। कखैन की कऽ देतह तेकर कोनो ठीक नही अछि। ऐहन-ऐहन लोक एतवो ने बुझैत अछि जे अपन काज अनको ले होय। सदिखन अनकर हिस्सा अपनवैमे लागल रहैत अछि। सोझेमे तँ कुल-पूज वैसले छथि। वएह बाजथु?”
  सुन्दर भायक प्रश्न सुनि शि‍व शंकर सकपकेलाह नहि असथिरसँ कहलखिन- देखू किछु दिन पहिने तक हमरो चालि ओहने छल मुदा, आब ओ सभ छोड़ि देलहुँ। ककरो चुगली चालि केने हमरा की भेटत? एतवे ने होइए जे नकलीसँ सावधान? मुदा, आब जत्ते कालमे नकलीसँ सावधान करब तते कालमे असलिएकेँ ने किअए आरो असली बनाएव। सुन्दर भाय, जहियासँ भाए सभ कुल-खनदानक घरारीकेँ चिन्हलक तहियासँ सभ दुख पड़ा गेल। किछु दिन पहिने धरि हमहूँ आन-आन श्राद्ध-कर्मक उदाहरण दऽ दऽ जजमानसँ अधिक डांड़ै छलहुँ, से सभ छोड़ि देलहुँ। सभ अपन-अपन भार उठा लेलनि जहिसँ हमहूँ उठि गेलहुँ। आब बुझै छी जे -जाधरि लोक मानैत अछि- जाबे कियो करै छथि अपन-बाप-मायक करै छथि तहिमे किऐक जोर दिअनि? जहियासँ विचार बदलल तहियासँ जिनगीयो बदलल। गारियो सुनव कमल। तेहेन-तेहेन झनाठी बच्छा सभकेँ दागि कऽ साँढ़ बनाओल गेल जे गाइयक खाढ़े माने जेनरेशन चौपट्ट भऽ गेल। जहिसँ ने नीक बच्छा आ ने नीक बाछी गाममे रहल। बाड़ी-झाड़ी चड़ैबला सॉढ़ भऽ गेल अछि। सदिखन लोक नाओ धऽ धऽ सोझोमे गरिअवैत अछि जे है-यएह शंकर बाबा पहुँच गेलाह। मुदा, रच्छ रहल जे जहिना-जहिना नवका-नवका लोक सभ भेलाह तहिना-तहिना नव-नव काजो कऽ रहला अछि। हिनके सबहक परसादे तँ ऐहेन-ऐहेन सुन्दरो आ दूधगरो गाए सभ गाममे आबि गेल। नवका-नवका मशीन सभ सेहो आबिये रहल अछि।
  देवनन्दन दयानन्दकेँ कहलखिन- वौआ, चाहो-ताहोक....।
  दयानन्द आंगन जाऽ माएकेँ कहलक पढ़ुआ काकाक संग करियाकाका पहुँचलाह। पढ़ुआ काकाकेँ शि‍व शंकर हाथक इशारासँ अपने लग बैइसैले कहलखिन। मुदा लेलहाकेँ अपन पैछला -बचपनक- बात मनमे नचए लगलै। बात ई जे गाछपर एकटा लुक्खी पकड़लक। जाधरि धड़ पकड़ने रहए ताधरि तँ लुक्खी हाथमे रहलै। मुदा नागड़ि पकड़ितहि लुक्खी पड़ा गेल। लेलहाक हाथमे नाङरिक रुइयाँटा बँचि गेलैक। मुदा अपना नजरियेपर शंका हुअए लगलै। कखनो वामा हाथसँ लेलहा आँखि मिड़ै तँ कखनो दहिना हाथसँ। मुदा तइओ मन मानवे ने करए जे पढ़ुआ काका भीतरसँ छथि कि उपरे-उपर छथि। मुदा मन बदललै। पाँच गोटेक बीच जखन रही तखन अपन बात दोसरकेँ कमसँ कम कही आ दोसराक बात बेसी सुनी।
  चाह आएल। सभ पीबए लगलथि। चाहक गिलास रखि पढ़ुआ काका शि‍व शंकर दिशि देखि कहए लगलखिन- भाय, आब कि पहिलुका किछु रहत? पहिने केहेन बढ़ियाँ सभ मिलि भोज-काजमे संगे करवो करैत छल आ संग मिलि सभ खेबो करैत छल। आब तँ दरभंगाक बेपारी आबि कऽ सराध विआहक ठिक्के लऽ लैत अछि।
  पढ़ुआ काकाक बात सुनि शि‍व शंकर कहलखिन- हम अपने बात कहै छी। देनिहार बुझैत छथि जे हजार रुपैआक बरतन देलिएनि मुदा, हम की ओकरा घरमे चुड़ि‍-चुड़ि खाएब। कतौसँ अनै छी दोकानमे जा कऽ अधोरमे बेचै छी। कहैले तँ एते भेटल मुदा, हाथ कते अबैत अछि। तहन तँ आब बुझए लगलियै जे मनुष्यक जिनगी मनुष्यताक योनि छी। सक्कत संकल्पक लेल कठिन आ दृढ़ताक जरुरत पड़ैत अछि। मुदा भऽ गेल छी पेटकनाह। बीति-भरि पेटक खातिर सभ चौपट भऽ गेल अछि। अपन हारल बोहूक मारल के ककरा कहै छैक। तहन हम यएह कहब जे पाँच गोटे विचारि कऽ डेग उठाउ।
     सभ कियो विचार विमर्श कऽ आगूक रास्ता धेलनि।
१.    घरवारी माने कर्ताकेँ जेना मन माननि ओहि अनुकूल कर्म    हुअए। झरखंडी बाछाकेँ दागि, साँढ़ बनौलासँ परहेज      कएल जाय।

२.    आन गामक पंच माने भोज खेनिहारसँ परहेज कए गामक     सभ जातिक पुरुष-स्त्रीगणकेँ खुऔल जाए। आन गामक कुटुम्ब, दोस्त, दियाद तँ रहवे करताह।

  अंतमे देवनन्दन बजलाह- जहिना पिताजीक शरीर नष्ट भेलनि मुदा, आत्मा तँ छन्‍हि‍ेँ। साले-साल हुनका निमित्ते यथासाध्य कल्याणकारी काज करैत रहब।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...