Wednesday, July 14, 2010

'विदेह' ६१ म अंक ०१ जुलाइ २०१० (वर्ष ३ मास ३१ अंक ६१)-PART II



रमानन्द झा "रमण"
मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर मैथिली लाके गीतक अवस्था/जनकपुर
नेपाल प्रज्ञा प्रतिष्ठान एवं रामानन्द युवा क्लव, जनकपुरधामक
संयुक्त तत्त्वावधानमे मैथिली लोक संस्कृतिपर जनकपुरधाममे आयोजित
राष्ट्रीय संगोष्ठी - जेठ 9, 10 गते, तदनुसार 23-24 मई, 2010
मैथिली लोकगीतक अवस्था
डा.रमानन्द झा रमण
उपस्थित लोकज्ञ एवं शास्त्रज्ञ महोदय!
डा.महेन्द्रनारायण रामक उपर्युक्त विषयक कार्यपत्र परिश्रमपूर्वक तैआर
कएल गेल अछि। डा. राम मैथिली लोक साहित्यक क्षेत्रमे किछु मौलिक काज
कएलनि अछि। किन्तु एहि स्तरक संगोष्ठीमे कार्यपत्र प्रस्तुत करबाक समय किछु
बिन्दुके ँ ध्यानमे राखब आवश्यक होइत छैक। से एहि हेतु जे संगोष्ठीक श्रोता ओहन
नहि रहैत छथि जनिका ककहरा पढ़ाओल जाए। श्रोतावर्गमे सामान्यतः बहुपठित एवं
अपन-अपन क्षेत्रक विशेषज्ञ उपस्थित रहैत छथि। उपस्थित छथिओ। ते ँ ई मानि
कार्यपत्र प्रस्तुत कएल जएबाक चाहैत छलनि जे हमर कार्यपत्रक श्रोता असामान्य
ज्ञान आप्रतिभाक लोक रहताह। प्रस्तुत कार्यपत्र विशिष्ट श्रोताके ँ समक्ष राखि नहि
लिखल गेल अछि। कार्यपत्र परिचयात्मक आइतिवृत्तात्मक अछि। विश्लेषणात्मक
होएबाक चाहैत छलैक। एहन विश्लेषणात्मक जे श्रोता/पाठकके ँ वैचारिक स्तरपर
उद्वेलित करबाक क्षमता रखैत हो। उदाहरण लेल विशेष अवसर आभासक गीत
लगनीक नाम लेब। लगनी कोन संस्कृतिक उपज थिक। जाँत चलओला पर जे
थकनी होइत छैक, तकरा गीत गाबि कोना बिसरल जाइत छल। ओहि माध्यमे
ननदि-भाउजक हास-परिहाससँ वातावरण कोना महमहा उठैत छलैक। सम्प्रति
जखन जाँतक स्थान मिक्सी लेने जाइत अछि आढ़ेकीक स्थान मील, तखन एहि
तरहक श्रम-गीतक विलुप्तिक सम्भावना कोना बढ़ि रहल अछि, आदि। कहबाक
तात्पर्य जे लोकगीत संस्कृतिक संवाहक थिक। लोकगीतमे सम्बन्धित क्षेत्रक संस्कृति
झलकैत रहैत छैक। एहन स्फीत विश्लेषणात्मक दृष्टिक अभाव डा.रामक कार्यपत्रमे
खटकैत अछि।
कार्यपत्रक विषय अछि, लोक गीतक अवस्था। एहिमे तीन टा पद अछि -
लोक, गीत आअवस्था। गीतक महत्त्व सर्वकालिक छैक। जहिआसँ मानवक
अस्तित्व छैक, कोनो ने कोनो प्रकारक गीत ओकर कंठसँ स्वतः निःसृत होइत रहल
अछि। अपन परिवेश वा सजातीय किंवा मानव जातिक प्रति रागात्मक होएब लोकक
स्वभावगत विशेषता थिकैक। ते ँ सभ भौगोलिक वा सांस्कृतिक क्षेत्रक लोकक
जीवनमे गीतक महत्त्व छैक आसदा रहतैक। एतेक धरि जे हमरालोकनिक देवी
देवता सेहो संगीत प्रेमी छथि। केओ डमरू बजा के ँ ताण्डब करैत छथि तँ केओ
वीणावादिनी कहबैत छथि।
दोसर पद अछि लोक। लोक तँ सभ दिनसँ अछि। लोक अछि, ते ँ राग
अछि, विराग अछि। ते ँ गीत अछि। मैथिल संस्कृतिमे जेना वेदक अर्थात् शास्त्रक
महत्त्व अछि ओहिना लोकक अर्थात् शास्त्रीयतासँ मुक्त आचार-व्यवहारक महत्त्व
अछि। लोक आवेद समानान्तर मानल गेल अछि। लोके च वेदे च। व्यावहारिको
जीवनमे लोकवेदक पुछारी करब सामान्य शिष्टाचार भए गेल अछि। समाजमे दूनू
वर्गक लोक रहैत आएल अछि। जे शास्त्रीय शब्दावलीमे आभिजात्य वर्ग आसामान्य
वर्ग थिक। एही आधार पर साहित्योक वर्गीकरण - शिष्ट साहित्य एवं लोक
साहित्य अछि। सिद्धाचार्य लोकनि तथाकथित शिष्टवर्गक लोक नहि छलाह। किन्तु
मैथिलीमे जे प्राचीनतम गीत साहित्य उपलब्ध अछि, से सिद्धाचार्य लोकनिक रचना
थिक। ओ जीवनक रागात्मक अनुभूतिक स्थानपर अपन अनुभव आदर्शनक
अभिव्यक्तिक माध्यम लोकभाषाके ँ बनाए गीतक रचना कएल। कविकोकिल विद्यापति
लोकक महत्त्व आलोकक भाषाक महत्त्व बूझलनि। ते ँ सर्वत्र पूज्य आमान्य छथि।
लोक हुनक रचनामे अपन राग-विरागके ँ अभिव्यक्त भेल अनुभव करैत अछि।
लोकक महत्त्वके ँ देखैत महाकवि भवभूति रामके ँ आदर्श शासकक रूपमे चित्रित
करैत हुनकासँ कहबाओल अछि - राज्य, सुख आदेशके ँ - एतेक धरि जे सीता
के ँ लोकक आराधनाक हेतु छोड़बामे व्यथा नहि होएत -
राज्यं, दयां च सौख्यं च, यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्तिमेकथा।।
लोक की कहत? से सोचि राजा राम सीताक निर्वासन कए देलनि। किन्तु
हुनकामे लोकतन्त्रीय जीवन-मूल्यक अभाव छल। एकर विपरीत सीता लोकतन्त्रीय
शासन-व्यवस्थामे जनमल छलीह। लोकतन्त्रमे अपन विचार व्यक्त करबाक स्वतन्त्रता
होइत छैक, से हृदयंगम छलनि। ओ जनैत छलीह जे मिथिलामे लोकशक्तिक महत्त्व
अछि आराजा जनक लोकहिक प्रतिनिधि थिकाह। लोकतन्त्रक भूमिमे जनमलि
सीता अश्वमेध यज्ञक प्रसंगमे राजा रामक समक्ष मिथिलाक मिथिलाक लोक नहि थिकनि राजाक दास
स्वाधीनमना लोकक प्रतिनिधि थिकाह मिथिलेश
अहाँ करबैक आक्रमण।
मिथिला भजैत पुरुषहीन, तखने ने अहाँक जीत?
पति-पुत्र विहीना नारीक नोरसँ मिथिलाक भूमि हैत पाँक हेंक।
फोड़ल लहठीक लागत ढे़र-पहाड़,
माङक सिन्दूरसँ पोखरि झाँखडि हैत लाल,
कन्ना-रोहटसँ भरत मिथिलाक भू, नभ, दिगन्त,
सोहर, कोबर, बटगबनी, लगनी, मलार, रास,
संगीतक सब राग-भास
मरि लुप्त हैत।’1
राजतन्त्रमे वैचारिक मतभिन्नताक अवकाश नहि छैक। राजतन्त्रीय
शासन-व्यवस्थामे प्रशिक्षित राजा रामक लेल वैचारिक मतभिन्नताक महत्त्व नहि
छल। सीता द्वारा मिथिलाक प्रसंग स्थिति कथन राजद्रोह भए गेल। राजद्रोहक दण्ड
होइत अछि - मृत्यु दण्ड वा देश निष्कासन। देश निष्कासनक दण्ड सीताके ँ
भेटलनि।
मिथिलाक संस्कृतिमे लोकतन्त्रात्मक मूल्य कतेक प्रगाढ़ अछि तकर साक्ष्य
नेपाल तराइक घुमन्तू गायकक मुहे ँ सुनि लिपिबद्ध भेल जार्ज अब्राहम ग्रिअर्सन
संकलित गीत दीनाभद्रीसँ सेहो प्रमाणित होइत अछि। मुसाहु बनियँा जखन अकारण
दीनाभद्रीके ँ अपन दोकान परसँ ठोंठिआ दैत अछि तँ ओ तकर प्रतिकार अपन
शारीरिक बलसँ नहि कए, निसाफक हेतु पंचक ओतए जाए नालिस करैत अछि -
पंच मे ँ भद्री देलन्हि नालिस कराय।
छोट पंच बड़ पंच सिरक मटुक।
बिनु अपराधे ँ गरदनियाँ देलक मुसाहु, करू मोर निसाफ।
किअ कहौ, हे मुसाहु, बिनु अपराधे ँ गरदनियाँ देलह।।
तोहर दोकान मना परि जाएत।2
हमर देश अर्थात् भारत विदेशी आक्रमण, राजतन्त्र आउपनिवेशवादक
पीड़ा कतेको शताब्दी धरि भोगि स्वतन्त्र भेल एवं लोकतन्त्रक स्थापना भेलैक अछि।
भारतक नागरिक अपन भाषा-साहित्य एवं संस्कृतिक प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण लेल
स्वतन्त्र अछि। ओहि लेल पूर्ण अवसर छनि। अपने लोकनि (नेपालवासी) कतेको
शताब्दी धरि राजतन्त्रके ँ भोगैत ओहिसँ मुक्तिक लेल अनवरत संषर्घ करैत अएलहुँ
अछि। ओहि संघर्षसँ लोकतन्त्रक उदय भेल अछि। सुन्दर विहान समक्ष अछि। एहि
लोकतन्त्रक युगमे जाहि कोनो शक्तिक सबसँ बेसी महत्त्व छैक से थिक लोकसत्ता
लोकक राग-विराग एवं लोक जीवनके ँ प्रतिनिधित्व करएबाला लोक साहित्यक।
एहि सन्दर्भमे मैथिली लोक संस्कृतिपर संगोष्ठी आयोजित करब, लोकशक्तिक
प्रतिष्ठापनक दिशामे एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण डेग थिक। अपने लोकनि लोकतन्त्रक
स्थापना लेल कतेक लालायित छलहुँ आकतेक आशान्वित छी,, तकरा ई संगोष्ठी
प्रतिध्वनित करैत अछि।
तेसर पद अछि अवस्था। अवस्था कालक द्योतक थिक - भूत, वर्तमान आ
भविष्य। अर्थात् मैथिली लोकगीतक अवस्था की छलैक, वर्तमान कालमे कोन
अवस्थामे अछि तथा भविष्यमे मैथिली लोकगीत कोन अवस्थामे रहत। ई सभ केओ
एक स्वरे ँ एवं मुक्त कण्ठसँ स्वीकारैत छी जे मैथिलीक लोकगीत हमर महान
संस्कृतिक वाहिका थिक। एहि लोकगीतमे हमर राग-विराग, आशा-आकांक्षा,
सुख-दुख, ज्ञान-विज्ञान, हमर जातीय इतिहास, हमर भौगोलिक स्थिति एवं प्राकृतिक
सुषमा, जीवन-शैली तथा सांस्कृतिक वैविध्य अनादि कालसँ संवाहित होइत आबि
रहल अछि। ई सांस्कृतिक सम्पदा अनेक रूपमे अछि - दृश्य आअदृश्य दूनू।
रागात्मकतासँ लबालब भरल अछि। जीवनक एहन कोनो पक्ष नहि छैक जकर
रागात्मक अभिव्यक्ति लोकगीतमे नहि हो। तुलसी, कुश, आम, महु, नीम, बाँस, काछु,
पुरैनिक पात, तिलकोरक पातसँ लए के ँ भोजन-विन्यास धरि लोकगीतमे भेटत। गर्भ
धारणसँ मृत्यु धरिक समस्त संस्कार लोकगीतमे अपन पृथक राग-भास एवं विषय-वस्तुक
संग अनुस्यूत अछि।
लोकगीतमे युग-युगक अनुभव सुरक्षित रहैत अछि। ई अनुभव सम्प्रति
पारम्परिक लोक ज्ञान ;ज्तंकपजपवदंस विसा ादवूसमकहमद्धक स्रोतक रूपमे मान्यता
पाबि गेल अछि। एहि प्रसंग एक दू टा उदाहरण प्रस्तुत अछि।
विवाह पूर्व वा अन्यो अवसर पर उवटन लगेबाक प्रथा अदौकालसँ प्रचलित
अछि। उबटनमे मेथीक प्रयोग होइत अछि। ओहिना हरदि लगेबाक प्रथा अछि। एहि
दूनूमे औषधीय गुण छैक जे विज्ञान द्वारा प्रमाणित अछि। घर-घरमे तुलसीक गाछ
अछि। धी-सुआसिन ओकर जड़िमे जल ढ़ारैत छथि। सांझमे दीप लेसैत छथि।
बेलक पात शिवजीके ँ चढ़बैत छथि। मैथिली लोकगीतमे एहि वनस्पतिक सभक
महत्त्व अकारण नहि अछि। समय-शीला पर परीक्षित एवं अनुभवसिद्ध अछि। ई
वनस्पति सभ औषधीय एवं पर्यावरणीय महत्त्वक बस्तुक थिक जकर उपयोग होइत
आएल अछि। लोकगीतमे आव्यवहारमे रहलाक कारणे ँ पारम्परिक ज्ञानक स्रोत
भए गेल अछि। एहि पारम्परिक लोकज्ञानक स्रोतसँ मानवजाति लाभान्वित भेल
अछि। लोकगीतमे वैज्ञानिक तत्त्वक रहबाक ई स्पष्ट उदाहरण थिक। उबटनक
गीतमे मेथी पीसबाक चर्च बेर-बेर अबैत अछि।
कओन नाना मेथिया बेसाहल? कओने नानी पीसल?
अपन नाना मेथिया बेसाहल, सूहब नानी पीसल।
कनि बिलमि एहि गीत पर विचार कएल जाए। बेसाहब, अपन खेत-पथारसँं
आवश्यकताक पूर्ति नहि होएब थिक। बेसाह लगैत छनि, अर्थात् अन्न-पानिक अभाव
छनि। ई लोकगीत परिवारक आर्थिक स्थितिके ँ सेहो देखबैत अछि। तथापि मातामह
द्वारा दौहित्रीक उबटन हेतु मेथी बेसाहल जाइत अछि। बेसाहल मेथी मातामही
नातिन लेल पीसैत छथि। आनो केओ पीसि सकैत छलीह। मुदा रागात्मकताक महत्त्व
छैक। ते ँ नानीक पीसल मेथी लगाओल जएबाक चर्च अछि। रागात्मकताक रंगमे
व्यावहारिकता एवं लाभप्रदताके ँ बोरि जीवनमे अंगीकृत कए लेब मैथिल संस्कृतिक
अनुपम विशेषता थिकैक। ई विशेषता उबटनक एहि गीतमे वर्तमान अछि। एहिना
हरदिक प्रसंग लोकगीतमे पर्याप्त चर्च अछि: -
हरदीके बड़ा सजाबट जनक जी, हरदीमे बड़ा सजाबट।
पहिल हरदी दादा चढ़ावे पाछू सँ दादी सोहागिन, जनक जी।
हरदी बड़ा सजाबट।
लोक जीवनमे उपयोगिता, रागात्मकता, सौन्दर्यप्रियता एवं सामाजिकताक
अत्यन्त महत्त्व अछि। सामाजिकता रागात्मकतासँ कोना मंडित रहैत अछि तकर
उदाहरण निम्नलिखित गीतक पांतीमे द्रष्टव्य अछि। सेन्टो गमकदारप्राचीन प्रयोग
नहि थिक। ई लोकगीतक लोचकताके ँ प्रदर्शित करैत अछि।
जनकपुरमे धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।....
चाचीक हाथमे तेल फुलेल, मामीक हाथ कसाइ अछि
मौसीक हाथमे अत्तर सुगन्धित, सेन्टो गमकदार अछि।
जनकपुरमे धूम मचल अछि, संगीता पसाहिन आइ अछि।
विवाहक अवसर पर सोहाग देबाक प्रथा अछि। सोहाग थिक
सौभाग्य-कामना, मंगलमय दाम्पत्य जीवनक हेतु आशीर्वचन। मैथिल संस्कृतिमे
सामाजिक समरसताक तत्त्व प्रगाढ़ अछि। एहि तत्त्वक गीतात्मक अभिव्यक्ति
हास्य-विनोदक सृष्टिक संग कोना कएल जाइत अछि से प्रस्तुत सोहाग गीतक लट
छिलकी धोबिनयाँक प्रयोगमे वर्तमान अछि। धोबिनियाँ सामान्य नहि अछि, सौन्दर्य
चेतना छैक। कपोल पर लट लटकौने अछि। एहि लटक कतेको कवि कारी सियाह
नागसँ तुलना कएने छथि। एहिठाम आनो केओ भए सकैत छलि, धोबिनियाँ किएक?
एकरहु एक पौराणिक कारण छैक। शिवजीक मानस पुत्रीक विवाहक अवसर पर
समाजक अनेकहु महिला लोकनि सोहाग लेल उपस्थित भेल छलीह। किन्तु ओहिमे
सभसँ आगू छलि एक धोबिन। गणेशजीसँ ओकरा अखण्ड सौभाग्यक वरदान
भेटलैक। एहि हेतु सभसँ पहिने अखण्ड सौभाग्यक वरदान प्राप्त धोबिनसँ सोहागक
परिपाटी अछि। एहि एक शब्दमे एक संस्कृति अछि। एक कथा गुम्फित अछि।
सियाजी के दही ने सोहाग गे, लट छिलकी धोबिनियाँ
हमरो सियाजी कें पिअरे पिताम्बर
सेहो तों लिहे फेराए गे, लट छिलकी धोबिनियाँ।
हमरो सियाजीकें सोना अशर्फी।
सेहो तों लए गे, लट छिलकी धोबिनियाँ।
समाजमे कन्याके ँ पुत्रवत् सुविधा, विकासक अवसर आअधिकार प्राप्त
नहि छैक। ई विभेद जन्मकालहिसँ आरम्भ भए जाइत अछि। एकोटा एहन सोहर
नहि भेटत जाहिमे सीता, पार्वती, राधा, लक्ष्मी वा सरस्वतीक जन्मक उल्लास हो।
सभटा राम वा कृष्णक जन्मसँ सम्बन्धित अछि। पुत्रक जन्मक अवसर पर बहिंगा
फेंकबाक कतेको ठाम प्रथा अछि। ई प्रसन्नताक संग शौर्यक अभिव्यक्ति थिक।
बेटीक जन्मसँ उल्लासक स्थान पर परिवारमे अवसाद पसरि जाइत छैक। धरतीक
झझकब, नार-पुरैनि काटबा लेल हाँसू तकबाक क्रममे चक्कूओ नहि भेटब आअन्ततः
खुरचनसँ नार काटब, सासु एवं ननदिक व्यवहारमे रुच्छता तथा पतिक मुखाकृतिमे
अप्रसन्नताक चेन्ह आदिक अभिव्यक्ति लोकगीतमे पर्याप्त भेल अछि। जाहि दिन
आगे बेटी तोहरो विवाह भेल, तारा गिरल आधी रातबेटीक विवाहक लेल माइक
चिन्ताके ँ स्वर दैत अछि।
जाहि दिन आगे बेटी तोहरो जनम भेल, धरती उठल झझकाइ हे।
हंसुआ खोजइते गे बेटी छुरियो न भेटल, सितुआसँ नार कटाओल हे।
सासु ननदी गे बेटी मुखहुँ न बोलए, स्वामी जीके ँ जियरा उदास हे।
जाहि दिन आगे बेटी तोहरो विवाह भेल तारा गिरल आधी रात हे।
भ्रूण-परीक्षण आधुनिक विज्ञानक देन थिक। एहि परीक्षणसँ अनिच्छित
संतानके ँ सूर्यक प्रथम रश्मि देखबाक अवसर नहि भेटैत छैक। पहिने ई सुविधा नहि
छलैक। किन्तु बेटीक जन्मसँ माइके ँ जे पारिवारिक आसामाजिक प्रतारण एवं
उपेक्षा होइत छलैक, लोकगीतमे तकर चित्रण अत्यन्त कारुणिक अछि। नारीक प्रति
ई उपेक्षा भाव वर्तमान समय धरि व्याप्त अछि। एहि मानसिकतासँ स्त्री-पुरुषक
जनसंख्यामे भेल असंतुलनके ँ समाज वैज्ञानिक सामाजिक संकटक रूपमे देखय
लगलाह अछि। परिवारमे पुत्रीक जन्मसँ होइत अवसादक लोकगीतमे भेल अभिव्यक्ति
मानवीय संवेदनाक तारके ँ झनझना दैत अछि।
पहिले जे जनितउँ धिया रे जनम लेत, खएतउँ मरिच पचास हे।
मरिचक झाँस धिया दुरि जाइत, छुटितइ धियाक संताप हे।
पितृसत्तात्मक समाजमे पुरुष मानसिकताक दोसर उदाहरण थिक पत्नी
के ँ सेविका मानबाक मानसिकता। एहि मानसिकतामे विवेकक अभाव तँ अछिए
अर्थलोलुपता सेहो अछि। निम्नलिखित लोकगीतमे रुनझुन-रुनझुनशब्द नव
विवाहिताक पति-मिलनक उत्कंठा, पूर्ण रागात्मक संवेदनाक संग अभिव्यक्ति भेल
अछि। प्रतीत होइछ नव कनियाँक पएरक नुपूर नहि बजैत हो, ओकर हृदय एवं
शरीरक अंग-अंग पुलकित एवं झंकृत भए निनाद कए रहल हो। किन्तु स्वामीक
आदेशपर ओ भरि राति बिअनि हौंकैत रहि जाइत अछि -आध राति हौंकल, पहर
राति हौंकल’-
रुनझुन-रुनझुन, इहो नबि कोहबर हे।
आहे माइ, ताहि कोहवर सुतलनि कओन दुलहा, बेनिया डोलए मांगे हे।।
आध राति हौंकल, पहर राति हौंकल हे।
होत भिनसर बेनिया टूटि गेल, बंनिया ला रूसि गेला हे।।
ककरा भेजब बाबा घर, ककरा भेजब भइया घर हे।
परभुजी अरजल बेनिया टूटि गेल, बेनिया ला रूसि गेल हे।।
हजमा भेजऽ बाबा घर, ब्राह्मन भेजऽ भइया घर हे।
आगे माइ, हरिजी अरजल बेनिया टूटि गेल, बेनिया ला रूसल छथि हे।।
हाथी चढ़ल बाबा आबे, घोड़ा चढ़ल भइया आबे हे।
बीचहिं बेनिया झलकैत आबे, आब हम नैहर जएबै।।
उपर्युक्त उदाहरणमे प्रभु जीक अर्थात् पतिक अरजल बिअनि प्रभु जीके ँ
अनवरत हौंकैत रहलासँ पत्नीक हाथमे टूटि जाइत अछि। एहिमे ओकर कोन दोष
छलैक? किन्तु त्रासद पक्ष अछि जे पतिक आचरणसँ पत्नीमे असामान्य ग्लानिक बोध
होइत छैक। कोनो आन उपाय नहि देखि, नैहर समाद पठाए तकर प्रतिपूर्ति करबाक
निर्णय करैत अछि। एक प्रकारे ँ ओ जुर्माना भरैत अछि। तकर बादे नैहर जएबाक
अनुमति भेटैत छैक। अर्थात् पतिक अरजल बिअनि टूटि गेलासँ जुर्माना भरबा धरि
ओ सासुरमे बन्धक बनल छलि। हाथी चढ़ल बाबा आबे, घोड़ा चढ़ल भइया आबे
हे’, बीचहिं बेनिया झलकैत आबेआब हम नैहर जएबैनारी जातिक एही
त्रासदीक अभिव्यक्ति थिक। ई सामाजिक विकृति एवं अर्थलोलुपता कमल नहि
अछि। दहेज लोभी लोकक आखेट नव विवाहिता निरन्तर भए रहल छथि। लोकगीतमे
पुरुष मानसिकता आनारी उत्पीड़नक पर्याप्त चित्रण अछि। ई चित्रण सभ वस्तुतः
सामाजिक मनोवृत्तिक एक करुण इतिहास थिक।
कृषि संस्कृतिक देन लगनी, विशेष भास एवं अवसरक गीत थिक। एहि
कोटिक गीतमे सेहो बधू उत्पीड़नक चित्रण अछि -
घर पछुअरबा लौंग केर गछिया, लौंग फूलेल आधि रतिया रे दइबा।
लौंगवाके चुनी चुनी संजिया ओछइली, सुती रहलइ सासुजीके बेटबा हो दइया।
घुरि सुतु फिरि सुतु सासुजीके बेटबा ननदी जीके भैया।
तोहर घामसँ भीजल सभ चोलिया हे दइया।
उपर्युक्त गीतक पाँतीमे प्रयुक्त सासुजी के बेटबाएवं ननदी जीके भैया
पर विचार कएल जाए। ओ पति, स्वामी आदि कहि सम्बोधित नहि करैत अछि। स्पष्ट
अछि जे पति अपन पत्नीक निकट नहि छथि। ओ माइ-बहिनिक कहलमे छथि।
सासु एवं ननदि सुनियोजित रूपसँ अत्यधिक परिश्रम करबैत छैक जाहिसँ पुतहुक
स्वेदसिक्त अंगबस्त्र पतिक विकर्षणक कारण बनल रहए। घुरि सुतु फिरि सुतु
सासुजीके बेटबा ननदी जीके भैया’- एही स्थिति दिस संकेत करैत अछि।
प्रस्तुत गीतमे मिलनोत्कंठित नायिकाक मनोदशाक सूक्ष्म एवं सुन्दर वर्णन
अछि। ओ अपन तुलना लवंगक फूलसँ करैत अछि। जे पूर्णतः प्रस्फुटित होएबासँ
पहिने अधरतियेमे तोड़ि लेल गेल हो। ई नायिकाक अर्ध विकसित रहबाक द्योतक
थिक। किन्तु प्रस्फुटनक उष्मासँ अवश्य ओ मातलि अछि। जे लौंगवाके चुनी चुनी
संजिया ओछइलीसँ स्पष्ट अछि। एहि गीतमे अप्रस्तुत एवं प्रस्तुत विधानक अद्भुत
नियोजन भेल छैक। एक बेर नायिका लेल, जे प्रस्तुत अछि, प्रस्तुत लवंगक फूल
दोसर बेर अप्रस्तुत मनक उल्लास लेल प्रस्तुत लवंगक फूलक प्रयोग भेल अछि। बेली
चमेली वा केओलाक प्रयोग मैथिली लोकगीतमे ठाम-ठाम भेटैत अछि। किन्तु
औषधीय गुणसँ युक्त एवं मिथिलासँ भिन्न प्राकृतिक एवं भौगोलिक क्षेत्रमे सुलभ
लवंगक फूलक संग नायिकाक मनोदशाक वर्णन दुर्लभ अछि। एही लगनीक अगिला
पांतीमे अछि -
घर पछुअरबामे बसे एक मलहा, मलहा रे जमुनामे फेंकू महजाल रे दइबा।
तोहरेा के देबौ मलहा दही-चूड़ा भेाजन रे, जमुनामे फेकू महजाल रे दइबा।
एक जाल फेंकले मलहा, दुइ जाल फेंकले,तेसर जाल घोंघटा संए मारलए रे दइबा।
एक जाल फेंकले मलहा दुइ जाल फेंकले, तेसर जाल धनीके लहरबा रे दइबा।
कृषि संस्कृतिक नायिकाक कृषि संस्कृतिक नायकक (घर पछुअरबामे बसे
एक मलहा) प्रति आर्कषण सहज अछि। किन्तु नायिका द्वारा जमुनामे जाल फेंकबा
लेल कहब कम महत्त्वपूर्ण नहि अछि। गंगा शान्त छथि तँ जमुना तीव्र प्रवाहिनी। एहि
हेतु जमुनामे पार होएब लेल अपेक्षाकृत बेसी साहस, धैर्य आपरिश्रम चाही। स्पष्ट
अछि जे नायिका तेसर बेर जाल फेंकला पर आकर्षित होइत अछि। अपन तुलना
ओ जमुनासँ करैत अछि। एहि आकर्षणक नाटकीय अभिव्यक्ति प्रस्तुत लोकगीतमे
भेल अछि।
लोक गीतक विशेषता
गीतक विशेषताके ँ मोटामोटी निम्नलिखित रूपमे विभाजित कएल जाए
सकैत अछि -
1.
सामूहिकता - लोकगीत सामूहिक रूपसँ गाओल जाइत अछि। ओ
लगनी, बटगमनी हो वा मांगलिक अवसर पर गाओल जाइत गीत। एकल गायन
कुशल गायक/गायिका टा श्रोताक ध्यान आकर्षित करैत अछि। ई लोकात्मक
होएबाक सेहो प्रमाण थिक।
2.
सहभोगिता आव्यापकता - संग-संग भोगब भेल सहभोगिता। लोक
गीतमे समाज वा सांस्कृतिक समूहक राग-विराग, विजय-पराजयक आदिक रागात्मक
अभिव्यक्ति रहैत अछि।
3.
परिस्थिति एवं मनःस्थितक अनुरूप अनुकूलन - लोक गीत एक दिनमे
नहि सहस्रो वर्ष धरि अनुभवक उपरान्त वर्तमान स्वरूपमे आएल अछि। जे युगक घात
सहि नहि सकल छिटकैत गेल। लोकक नव-नव अनुभव जोड़ाइत गेलैक। लोक
गीतक ई लोचकता ओकरा टटका आसुस्वादु बनौने रहैत अछि।
4.
नृत्यक संग प्रगाढ़ एवं सुदृढ़ सम्बन्ध - लोकगीतक नृत्यक संग प्रगाढ़
सम्बन्ध सामूहिक गायनक समय अकस्मात दर्शन भए जाइत अछि।
वर्तमान
परिवेश बदलैत अछि। लोकक आवश्यकता आरुचि बदलैत अछि। सम्बन्ध
सरोकार बदलैत अछि। एहिसँ सामाजिक जीवनमे परिवर्तन अबैत अछि। एहि
परिवर्तनक प्रभाव लोकक जीवन-यापन पर पड़ैत छैक। उद्योगीकरण आशहरीकरणसँ
श्रमक पलायन आरम्भ भेल। गाम-घर, खेत पथार पोखरि -झांखरि, वन-पर्वतक
स्थान पर लोकके ँ गोठुल्लामे रहबाक बाध्यता भए गेलैक। ओ भिन्न भाषा-भाषी एवं
संस्कृतिक लोकक बीच जीबैत रहबा लेल विवश होइत रहल। पहिने देशहिक एक
कोणसँ दोसर कोन लोक जाइत छल। आब विश्वक एक कोणसँ दोसर कोण धरि
उड़ि जाइत अछि। जाहिठाम सभ किछु अनचिन्हार रहैत छैक। अपरिचित रहैत छैक।
बाजारबाद अपन अकादारुण मुह बाबि सभ किछु गीरि अपन रंग पसारबा लेल दु्रत
वेगसँ चतुर्दिक पसरि रहल अछि। जॉँत पीसब वा ढ़ेकी कूटब अनावश्यक भए गेलैक
अछि। तखन लगनीक कोन प्रयोजन रहि जाएत। पहिनहिसँ वर कनियाँ हाय!
हेलो!करैत रहैत छथि, तखन मुहबज्जी वा कोवरक गीतक की होएतैक? बाजारमे
रंग-विरंगक क्रीम आलोशन उपलब्ध छैक, नानी मेथी कथी लेल पीसतीह। गोदना
आब गोदौल नहि जाइत अछि। खोदपारनि आओत कतए सँ जे अवसरोचित गीत
द्वारा हास-परिहास होएत। टेटूक फाहामे लहरिया कतयसँ आओत, जकर तुलना
पति वियोगक लहरिसँ कएल जा सकैछ। (हमरो लहरिया गे सुन्दरी सहलो ने जाइ
छउ रे जान! जान सूइया के लहरिया कोना सहबे रे जान! सूइया के लहरिया हे
पिअबे घड़ी रे दंइ घड़िए रे जान! जान तोहरो लहरिया हो पिअबे सगर रतिया रे
जान! )। नवजातक वा नेनाक स्स्वास्थ्य रक्षा लेल विभिन्न प्रकारक औधषि एवं सूर्इ्र
आदिक निर्माण भेल अछि। तखन पाच आओहि अवसर पर गबै जाए बाला पाच
गीतक कोन प्रयोजन रहि जएतैक। पसरैत यान्त्रिकता, सांस्कृतिक परिवेशसँ दूर
जीवन-यापन, प्रदर्शन-प्रभाव एवं बाजारबाद तथा संचार माध्यमक माध्यमे अहर्निश
प्रहारसँ लोक संस्कृति प्रभावित एवं विकृत भए रहल अछि। ओकर कतेको वैशिष्ठ्य
लुप्त हेाएबाक कनगी पर छैक।
संरक्षणक उपाय
पारम्परिक ज्ञानक स्रोत एवं मानव जातिक विकासक भावात्मक अभिलेखक
संरक्षण दिस विश्व समुदाय (यूनेस्को)क ध्यान हालहिमे गेल अछि। पहिने विश्व
समुदाय इंटा-पाथरहिके ँसांस्कृतिक सम्पदा मानि विश्वस्तर पर ओकर संरक्षणक हेतु
नीति-निर्धारण करैत छल। ओहि लेल सुविधा दैत छलैक। किन्तु भूमण्डलीकरणक
चपेटमे विश्वक सम्पन्न सांस्कृतिक वैविध्य पर बढ़ल संकट एवं कतेको राष्ट्र तथा एवं
नृवर्गक ;(ethnic group)सांस्कृतिक परिचितिके ँ संकटापन्न स्थितिमे अनुभव
कए यूनेस्कोक ध्यान अस्पृश्य, अभौतिक एवं निराकार ;( Intangible) सांस्कृतिक
सम्पदाक संरक्षणक महत्त्व दिस गेलैक अछि। आई विश्वास बलवती भए गेलैक
अछि जे अभौतिक एवं निराकार सांस्कृतिक सम्पदा कोनहुँ प्रकारसँ साकार भौतिक;(tangible) सांस्कृतिक सम्पदासँ दऽब नहि अछि। इहो ओहिना संरक्षणीय अछि
जेना साकार भौतिक सम्पदा। एहि निमित्त आहूत बैसारमे अभौतिक एवं निराकार
सांस्कृतिक सम्पदाके ँ परिभाषित करैत विश्वक सभ देशसँ संरक्षण हेतु आवश्यक
उपाय करबाक हेतु कहल गेल अछि।3
यूनेस्कोक वैविध्य सांस्कृतिक सम्पदाक सार्वभौम घोषणक ; ( UNESCO Universal Declaration on Cultural Diversity)
 अनुसार सांस्कृतिक विविधता
मानवजातिक सामूहिक सम्पदा थिक एवं वर्तमान तथा भविष्यक संततिक लाभक हेतु
एकरा स्वीकृत आसम्पुष्ट कएल जएबाक चाही। सांस्कृतिक सम्पदाक संरक्षण हेतु
यूनेस्कोक द्वारा दू टा बाटक अनुशंसा कएल गेल अछि -
क. चिन्हित करब एवं
ख. संरक्षण।
क. चिन्हित करब ;(Identification) निम्नलिखित मार्ग निर्देशनक आधार लोकगीत
के ँ चिन्हित कएल जा सकैत अछि: -
पद्ध लोक गीतक सार्वत्रिक (ग्लोबल) उपयोग हेतु सामान्य मार्ग निर्देश
पपद्ध लोक गीतक एक व्यपाक रजिस्टर तैआर करब, तथा
पपपद्ध लोकगीतक क्षेत्रीय वर्गीकरण
ख. लोकगीतक संरक्षण ;(Conservation of folklore) एक राष्ट्रीय अभिलेखागारक स्थापना करब जतय लोकगीत नीक जकाँ संकलित रहए तथा जिज्ञासुके ँ उपलब्ध भए सकए। पपद्ध एक केन्द्रीय अभिलेखागारक स्थापना करब जे सेवा कार्यक हेतु काज करए।
*
एक संग्रहालय स्थापित कएल जाए अथवा स्थापित संग्रहालयमे
पारम्परिक एवं लोकप्रिय संस्कृति एवं कलाकृति प्रदर्शित रहए।
*
पारम्परिक एवं लोकप्रिय संस्कृतिके ँ प्रस्तुतिमे प्राथमिकता देल जाए
तथा यथासम्भव ओही परिवेश/पृष्ठभूमिक जीवन-यापन, कौशल तकनीकी आदिक
सृजन रहए।
*
लोकगीतक संकलन एवं अभिलेखनके ँ सुमेलित कएल जाए।
*
संकलनकर्ता, अभिलेखकर्ता, एवं अन्य विशेषज्ञके ँ लोकगीतक भौतिकसँ
विश्लेषणात्मक संरक्षण लेल प्रशिक्षित करब, तथा
*
संकलित सांस्कृतिक सम्पदाक सुरक्षाक हेतु लोकगीतक प्रतिलिपि
सांस्कृतिक समुदाय एवं क्षेत्रीय संस्थाके ँ उपलब्ध कराएब जाहिसँ ओ सब सक्रिय
बनल रहथि।
नृविज्ञानक मत अछि जे मानवताक विकासक क्रममे सर्वप्रथम समष्टि चेतना
; ( Tribal consciousness)
तदुपरान्त, हम-चेतना ;(we - consciousness)
’ ‘अहं चेतना ; ( I - consciousness)
 विकसित भेल। मानवक विकासक
वास्तविक यात्रा एतहिसँ प्रारम्भ होइत छैक। ओना हम के छी ? से बूझबा लेल कहि
सकैत छी जे एक प्राणी छी, मनुष्य छी, नेपाली छी, भारतीय छी, उच्चवर्गमे जनमल
छी, निम्नवर्गमे जनमल छी, आरक्षित वर्गमे छी, अनारक्षित वर्गमे छी आदि। मुदा,
व्यष्टि चेतनाक सोड़ समष्टि चेतनामे ततेक गहींर धरि छैक जे चाहिओ के ँ समष्टि
चेतनासँ विलग नहि भए सकैत अछि आअपन परिचितिक अभिव्यक्ति वा प्रदर्शन
समष्टि चेतनामे एकाकार भए करैत अछि। विभिन्न सांस्कृतिक अनुष्ठान, विद्यापति
स्मृतिपर्व अथवा मिथिला महोत्सव आदि आयोजित कएल जाएब व्यष्टि-चेतनाक
समष्टि चेतनामे एकाकार होएबे थिक। एहिसँ स्पष्ट अछि जे विकासक उत्कर्षक
परिचयक हेतु भूतमे जाएब आवश्यक भए जाइछ। बिना भूतके ँ देखने, बूझने आ
गमने वर्तमानमे ने प्रासंगिक रहि सकैत छी आने नीक भविष्यक कल्पना कए सकैत
छी। लोक गीतमे इएह समिष्ट चेतना, हमर राग-विराग, उल्लास, अवसाद पराजय
आदि, गीतक माध्यमसँ अभिव्यंजित अछि। आजखन वा जतए कतहु पारम्परिक
भासक गीत, जाहिमे हमर अतीकक समस्त अनुभूति अपन सन्दर्भ आपरिवेशक संग
साकार भेल रहैत अछि, कानमे पड़ैत अछि, हमर सुषुप्त आत्मीय रागात्मक तन्तु
अकस्मात झनझना उठैत अछि। एही हेतु लोकगीतके ँ संस्कृतिक सर्वाधिक बलिष्ठ
सुरक्षित तत्त्व मानल गेल अछि।
संस्कृतिक उपयोगिताक प्रसंग एक अमेरिकन समाजशास्त्रीक मत4 सर्वथा
समीचीन अछि जे द्रुत सामाजिक विकास एवं नवोन्मेष लेल सांस्कृतिक तत्त्वक
वैविध्य महत्त्वपूर्ण अछि। अर्थात् जतेक सांस्कृतिक वैविध्य एवं चेतना प्रखर, ततेक
विकासक गति द्रुततर होएत। मैथिल, सीमाक एहि पारक होथि वा ओहि पारक,
अपेक्षित विकासक अवसर लेल अवश्य लालायित रहलाह छथि। एहना स्थितिमे द्रुत
सामाजिक आआर्थिक विकासक लेल एक मात्र समाधान सांस्कृतिक चेतनाक
जागृति एवं सबलता थिक। एहि अभियानमे मैथिली लोकगीतक संरक्षण प्रयोजनीये
नहि, अनिवार्य सेहो अछि।


सन्दर्भ -
1.
पराशर, कांचीनाथ किरण
2.
गीत दीनाभद्रीक ओ नेबारक,2010, सम्पादक डा.रमानन्द झा रमण’, पृ.सं. 68

3."Convention for the safeguarding of the intangible
cultural heritage" Article 2 :
The 'intangible cultural heriage" means the practices,
representation, expressions, knowledge, skill as well as the
instruments, objects, artifacts and cultural space associated
therewith - that communities, groups and in some
cases, individual recognize as part of cultural heritage. At
his intangible cultural heritage, transmitted from generation
to generation, is constantly recreated by communities and
groups in response to their environment, their interaction
with nature and their history, and provides them with a sense
of identity and continuity, thus promoting respect for
cultural diversity and human creativity. For the purpose of
this Convention, consideration will be given solely to such
intangible cultural heritage as in compitible with existing
international human rights instruments, as well as with the
requirement of mutual respect among communities, groups
and individuals and sustainable develpoment. The " intangible
cultural heritage" as defined in paragraph 1 above, is
manifested inter alia in the followed domains :
a) Oral traditions and expressions, including language
13 14
as a vehicle of the intangible cultural heritage;
b) Performing arts.
4-
ओगबर्न & The large number of cultural elements, the greater
number of inventions and faster the rate of social change.
    
 
1.बेचन ठाकुर- बेटीक अपमान 2.उमेश मंडल-कबि‍लपुरक कथा गाेष्‍ठी 3.रामप्रवेश मंडल- लघुकथा-झगड़ा खतम

बेचन ठाकुर
बेटीक अपमान
दृश्‍य-  तेसर-
(स्‍थान- दीपक चौधरीक आवास। वार्ड सदस्‍य प्रदीप कुमार ठाकुर दीपक चौधरीकेँ सान्‍त्‍वना दैत छथि‍।)
प्रदीप-           दीपक बावू, जूलूम भए गेल। घोर अनर्थ भेल। अहा बेचारी बड नीक               जनानी छलीह। एहेन जनानी गाममे कि‍यो नहि‍ छलीह। एहेन परि‍श्रमी           आ सहनशील जनानी कि‍यो नहि‍ छलीह।
(दीपकक आखि‍मे नोर आबि‍ जाइत अछि‍।)
          दीपक बावू, अहॉं कानि‍ कि‍एक रहल छी? जुनि‍ कानू। आब कानला            खि‍जलासँ कोन फेदा? होनी तँ हाथ धराए कऽ होइत अछि‍। जे हेबाक       छल से भेल। जहन भगवानक यएह मर्जी छेलनि‍ तहन कि‍यो की कए            सकैत अछि‍?
दीपक-     सर, हमरा कि‍छु फुरए नहि‍ रहल अछि‍। हम तँ कि‍ंकर्त्तव्‍य वि‍मूढ़ छी।               हरदम चि‍न्‍ति‍त रहैत छी।
प्रदीप-           चि‍न्‍ता-ति‍न्‍ता छोड़ू। चि‍न्‍तासँ चतुराइ घटए, शोकसँ घटए शरीर। पापसँ          लक्ष्‍मी घटए, कहलनि‍ दास कबीर। आगू परबस्‍ती कोना चलत, ओकर               जोगारमे लागू।
दीपक-     सर, हमरा तीनि‍टा बेटे अछि‍। एक्‍कोटा बेटी रहि‍तए, तँ भनसो भात तँ          करि‍तए। घरमे कि‍यो केनि‍हारि‍ नहि‍ अछि‍। घरमे एगो केनि‍हारि‍केँ बड             आवश्‍यकता महसूस होइत अछि‍।
प्रदीप-           मोन होय यऽ जे दाेसर बि‍आह करी?
दीपक-     सर, मोन तँ सोलहो आना होय यए मुदा करी की, से कि‍छु नहि‍              फुराइत अछि‍।
प्रदीप-           सुनू दीपक बावू, अहॉंकेँ तीनि‍टा लाल भगवान देने छथि‍। हुनके सभकेँ          पढ़ाउ-लि‍खाउ आ मनुक्‍ख बनाउ। बड़का बेटाक ि‍बआह कने जल्‍दीए            कए लेब। घरमे केनि‍हारि‍ आबि‍ जेतीह। कि‍छु त्‍याग करू। दू-चारि‍              बरख कष्‍टे सही। मुदा दोसर बि‍आहक चक्‍करमे नहि‍ पड़ू।
दीपक-     सर, हम अहॉंक बात सभ दि‍न मानैत रहलहुँ आओर मानैत रहब।
प्रदीप-           जदि‍ हमर बात मानी तँ दोसर बि‍आह भूलोसँ नहि‍ करी। दोसर बि‍याहसँ         बाप पीि‍तयो भऽ जाइत अछि‍। अऍं यौ, सतौत तँ भगवानोकेँ नहि‍            भेलनि‍। तहन मनुक्‍ख कोन मालमे माल। जदि‍ हमर बात नहि‍ मानब           तहन जीवन भरि‍ पछताएब दीपक बावू। एक बेर की कुकर्म कएलहुँ से        ई फल भेटल आओर छोसर कुकर्म फेर करब तहन की फल भेटत की         नहि‍।
दीपक-     हँ सर, ई कोनो कुकर्महि‍क फल भोगे रहल छी। आब दोसर कुकर्म            नहि‍ करब दोसर बि‍आह नहि‍ करब।
प्रदीप-           ई हम ओना नहि‍ बुझब, दीपक बावू। सत्त करू आइ सरस्‍वती माताक               समक्ष।
दीपक-     एक तत्त दू सत्त, ब्रह्मा बि‍ष्‍णु सत्त। जे अहॉंक कहल नहि‍ करए, से           अस्‍सी कोस नरकमे खस।। हम दोसर बि‍याह नहि‍ करब, नहि‍ करब                नहि‍ करब।
प्रदीप-           जौं कएलहुँ तँ पछताएब, पछताएब, पछताएब। दीपक बावू, आब हम जए          रहल छी। आइ ब्‍लौकमे आपातकालीन बैठक अछि‍। बेस तँ जय राम               जी।
दीपक-     जय राम जी। (ठाढ़ भऽ कऽ)
     (प्रदीपक प्रस्‍थान)
प्रदीप बावू हमरा समाजक बड अनुभवी लोक छथि‍। हुनक बातक खंडन नहि‍ कए सकैत छी। तखन हुनक बेटाक बि‍याह जल्‍दीए कऽ लेब आ कमो पढ़ल-लि‍खलमे कऽ लेब। की करव कि‍छु अपए तँ चाही।
     पटाक्षेप

दृश्‍य- चारि‍म

(स्‍थान- दीपक चौधरीक दलान। चारू बापुत आपसमे गप-सप्‍प कए रहल छथि‍।)

दीपक-     बौआ सभ, अपना सबहक दि‍न दुर्दिन अछि‍। बि‍ना पढ़ने काज चलए            बला नहि‍ अछि‍। केहेन केहेन पढ़लाहा तँ बौआइत अछि‍। आ अहॉं सभ      मुर्ख रहब तहन कुकुरो नहि‍ पूछत।
मोहन-      बाबू जी, आइ काल्‍हि‍ पढ़नाइ बड महग अछि‍। बि‍ना टीशन वा                कोचि‍ंगकेँ पढ़नाइ असंभव अछि‍।
दीपक-     तैयो पढ़ए बला बि‍ना टीश्‍न कोचि‍ंगकेँ पढ़ि‍ लैत अछि‍।
मोहन-      से एक सएमे एगो आधगो।
दीपक-     खाइर अहॉं सभ कहैत छी तँ कतहु नीक सर लग कोचि‍ंग पकड़ि‍             लि‍अ।
मोहन-      बाबू जी, सुनैत छी जे नीक कोचि‍ंग जे.एम.एस. कोचि‍ंग सेन्‍टर,                    चनौरागंज अछि‍ जे श्री बेचन ठाकुर चलबैत छथि‍। हमरा सभकेँ ओहि‍               कोचि‍ंगमे धराए दि‍य।
सोहन-     मुदा ओहि‍ कोचि‍ंगमे सभ नहि‍ पढ़ि‍ सकैत अछि‍।
दीपक-     से कि‍एक?
सोहन-     एकर कारण ई अछि‍ जे ओहि‍ कोचि‍ंगक फीस बड करगर अछि‍ आ            सेहो अगुरबारे। जहि‍यासँ पढ़ाइ शुरू करू तहि‍ये फीस जमा कए             दि‍यौन। नहि‍ तँ जय राम जी।
दीपक-     ई तँ हुनक कोनो नीक नि‍यम नहि‍ भेलनि‍। पढ़लक नहि‍ए, महीना              लागल नहि‍ए, पहि‍ने फीसे चाही। अच्‍छा, हम एहि‍ संबंधमे सोचि‍ रहल           छी।
गोपाल-     बाबू यौ, एगो छौंरा हमरा कहलक की जे हम हुनका लग पढ़ि‍ रहल            छी। तोरा पढ़ल होएतौक की नहि‍। कारण, बेचन सर बड मारैत            छथि‍न्‍ह आ बड बुरबक बनबैत छथि‍न्‍ह। छड़ी जे देखबि‍हीन तँ बाइ           गुरूम भए जएतौक। बाप रओ बाप, यएह मोटके छड़ी।
दीपक-     आ पढ़ाइ केहेन होइत अछि‍?
मोहन-      पढ़ाइमे कोनो शि‍काइत नहि‍। हुनक चेला सभ डाक्‍टर, इंजि‍नि‍यर,             मास्‍टर इत्‍यादि‍ इत्‍यादि‍ छन्‍हि‍। हमरा मोन होइत अछि‍ बाबू जे हमरा            सभकेँ श्री बेचन सर लग कोचि‍ंग धराए दि‍अ।
दीपक-     बौआ, हम असगरे की करबौक। घर करबौक की बाहर करबौक? मए               एहि‍ दुनि‍यॉंसँ चलि‍ गेलथुन्‍ह। भनसा भातमे बड दि‍क्‍कत होइत अछि‍।             एगो करू, अहॉं पढ़ाइ-लि‍खाइ छोड़ू अहॉं मोहन एहि‍ चक्‍करमे नहि‍ पड़ू।          कारण एक दि‍नका वा एक महीना वा एक सालक बात तँ पढ़ाइ नहि‍           छी। पढ़ाइमे सालक साल लगैत अछि‍ आ तैयो नोकरीक कोनो गाइरेन्‍टी         नहि‍।
मोहन-      बाबू, एक बेर अहॉं कहलहुँ जे बि‍न पढ़ने काज चलए बला नहि‍ अछि‍।          एक बेर कहैत छी जे पढ़ाइ छोड़ि‍ दहि‍न। खाइर पढ़ाइ छोड़ि‍ कऽ हम           की करब?
दीपक-     की करब? गाममे रहलासँ पेट भरत मोहन बौआ। मोहन बौआ, अहॉं            मामाक संग काल्‍हि‍ दि‍ल्‍ली चलि‍ जाउ। एक सालक अन्‍दर अहॉंक            बि‍याह सेहो केनाइ अछि‍। भनसा भातमे बड दि‍क्‍कत होइत अछि‍।
मोहन-      बाबू, हम एखन बि‍याह नहि‍ करब। हमरा सबहक उमर एखन बि‍याह            करए बला अछि‍?
दीपक-     अच्‍छा देखू, की होइत अछि‍? अहॉं काल्‍हि‍ दि‍ल्‍ली चलि‍ जाउ। एम्‍हर           सोहन आ गोपालकेँ पढ़ाइक कोनो व्‍यवस्‍था देखैत छी। पढ़ाइ तँ बड              आवश्‍यक अछि‍।
सोहन-     बाबू, हम भरि‍ दि‍न बकरीए चरबैत रहब की? कतहु हमर पढ़ाइक              जोगार कए ि‍दअ।
गोपाल-     बाबू, हमहुँ पढ़ब यौ, हमहुँ पढ़ब यौ।
          गोली गोली नहि‍ खेलब यौ, गुल्‍ली डन्‍टा नहि‍ खेलब यौ।।
दीपक-     अच्‍छा, काल्‍हि‍ अहॉं दुनू भॉंइकेँ गंज मि‍डि‍ल स्‍कूलमे नाओ लि‍खाए दैत               छी। सुनैत छी जे गंज मि‍डि‍ल स्‍कूलक पढ़ाइ बढ़ि‍यॉं छैक। संग-संग                खि‍चड़ी, कि‍ताब, पाइ, डरेस, टाइ बैच, बेल्‍ट इत्‍यादि‍ सेहो भेटत। ओहि‍          स्‍कूलमे पढ़लासँ बड नफ्फा? सबटा घट्टे-घट्टा बौआ सभ, हम पढ़ल छी      कम्‍मे। मुदा बुझैत बड छी। केहेन-केहेन पढ़ुआकेँ कान काटि‍ लैत छी।
गोपाल-     बाबू तहन काल्‍हि‍ हमरा सभकेँ गंज स्‍कूलमे नाओ लि‍खाए दि‍ब ने?
दीपक-     आब काल्‍हि‍ होएत तहन ने।
     *पटाक्षेप*

दृश्‍य पाचि‍म-

क्रमश:
2
उमेश मंडल

कबि‍लपुरक कथा गाेष्‍ठी

मैथि‍ली भाषा वि‍कासक एक सशक्‍त माध्‍यम्- सगर राति‍ दीप जरयक ७०म कथा गोष्‍ठि‍ गत १२जून २०१०केँ डॉं योगा नन्‍द झाक संयोजकत्‍वमे रमा ि‍नवास -कबि‍लपुर- मे सम्‍पन्‍न भेल। पं चन्‍दकान्‍त मि‍श्र अमरदीप प्रज्‍वलि‍त कए संघ्‍या ७ बजे सुभारम्‍भ केलनि‍।
     कार्यक्रम आगॉं बढ़ौल गेल उद्घाटन सत्रसँ जेकर अध्‍यक्षता डॉं रामदेव झा आ मंच संचालन डाॅ मुरलीधर झा केलनि‍। मुख्‍य अति‍थि‍ डॉ सुरेश्‍वर झा मैथि‍ली भाषाक भवि‍ष्‍य आ आवश्‍यकतापर प्रकाश देलनि‍। लोकार्पण सत्रक संचालन डॉ वि‍भूति‍ आनन्‍द केलनि‍। डेढ़ दर्जन पोथीक लोकार्पण क्रमश: भारती (उपन्‍यास), वि‍धकरी (उपन्‍यास), उचाट (बाल उपन्‍यास), उत्‍थान-पतन (उपन्‍यास), जि‍नगीक जीत (उपन्‍यास), गामक जि‍नगी (कथा संग्रह), मैथि‍ली चि‍त्रकथा (चि‍त्रकथा संग्रह), गोनू झा आ आन मैथि‍ली चि‍त्रकथा (चि‍त्रकथा संग्रह), पक्षधर (पत्रि‍का), हमरो लेने चलू- (कथा संग्रह), पि‍लपि‍लहा गाछ- (बाल कथा), अमर जीक साहि‍त्‍यमे हास्‍य-व्‍यंग (समालोचना), समाचार कथा (कथा संग्रह), कथा-लोककथा (कथा संग्रह), खि‍स्‍सा (कथा संग्रह), मि‍थि‍लाक पंजी प्रबंध (तारपत्र आदि‍क डि‍जि‍टल इमेजि‍ंग, डी.भी.डी), मैथि‍ली भाषा साहि‍त्‍य: बीसम शताब्‍दी (अलोचनात्‍मक नि‍बंध संग्रह) आ जमीनेमे फुटे छै अंकुर (कवि‍ता संग्रह), भेल। डॉ रामदेव झा, डॉ सुरेश्‍वर झा, पं. चन्‍द्रनाथ ि‍मश्र अमर, डॉ भीमनाथ झा, डॉ रामानन्‍द झा रमण, मैथि‍ली पुत्र प्रदीप, डॉ. मोहन मि‍श्र, डॉ वीणा ठाकुर, डॉ कमला चौधरी, डॉ आशा मि‍श्र आ ज्‍योत्‍स्‍ना चंद्रम द्वारा लोकार्पण कराओल गेल। सभ रचनाकार/लेखक/लेखि‍का स्‍वयं सेहो उपस्‍थि‍त रहथि‍। 
     कथा सत्रक अध्‍यक्षता डॉ श्रीशंकर झा आ संचालन अजीत आजाद जी केलनि‍। कथाकार- चण्‍डेश्‍वर खॉं, मुन्ना जी, उमेश नारायण कर्ण, रमाकान्‍त राय रमा, ऋृषि‍ बशि‍ष्‍ठ, राजाराम सि‍ंह राठौड़, ज्‍योत्‍स्‍ना चन्‍द्रम, कमला चौधरी, वि‍नय वि‍श्‍व बंधु, चन्‍द्र मोहन झा पड़वा, नन्‍द वि‍लास राय, बि‍रेन्‍द्र कुमार मि‍श्र, जगदीश प्रसाद मंडल, कपि‍लेश्‍वर राउत, उमेश मंडल, दुर्गा नन्‍द मंडल, संजय कुमार मंडल, मनोज कुमार मंडल, नि‍खि‍ल कुमार झा, बेचन ठाकुर, देवकान्‍त मि‍श्र, महेन्‍द्र नारायण राम, मैथि‍ली पुत्र प्रदीप, गजेन्‍द्र ठाकुर, लालपरी देवी, राजाराम प्रसाद, आनन्‍द कुमार झा, सतेन्‍द्र कुमार झा, उषा चौधरी आ नीता झा अपन-अपन नूतन कथा पाठ कए गोष्‍ठि‍क गरि‍माकेँ बढ़ौलनि‍। संगहि‍ अनेको साहि‍त्‍य प्रेमी सबहक उपस्‍थि‍ति‍ सेहो गोष्‍ठि‍क महत्‍व बनल रहलाह। पठि‍त एहि‍ कथा सभपर समि‍क्षा केलनि‍- हि‍रेन्‍द्र कुमार झा, कमल मोहन चुन्‍नू, रमानन्‍द झा रमण, गजेन्‍द्र ठाकुर, कमलेश झा, जगदीश प्रसाद मंडल, अमलेन्‍दु शेखर पाठक, देवकान्‍त मि‍श्र, फूलचन्‍द्र मि‍झ आ नीता झा।
     भरि‍ राति‍ कथापर कथा, चारि‍ कथाक एक पाली तेकर समि‍क्षा होइत रहल।‍ ई सि‍लसि‍ला कोनो एक-आध-दू घंटाक मात्र नहि‍ रहल वरण् भि‍नसर छह बजे धरि‍क। बारह घंटाक एहि‍ अल्‍प समएमे उपस्‍थि‍त ४५सो कथाकारक कथापाठ नहि‍ भ‍ऽ सकलनि‍। ३० गोट कथाक पाठ भेल। बॉचल‍ १५ गोट कथाकारकेँ (जि‍नकर कथा पाठ नहि‍ भऽ सकलनि‍) अगि‍ला गोष्‍ठीमे शुरूहेमे अवसर देल जेतनि‍ से नि‍र्णए भेल।
     अग्रि‍म ७१म आयोजन २ अक्‍टूवर २०१०केँ संध्‍या ६:३० बजेसँ श्री जगदीश प्रसाद मंडल, बेरमा, मधुबनी (बि‍हार)क आयोजकत्‍वमे बुढ़ि‍या गाछी दुर्गा स्‍थान स्‍थि‍त मध्‍य वि‍द्यालय परि‍सारमे सम्‍पन्न होएवाक संकल्‍प लेल गेल अछि‍ जाहि‍मे समस्‍त ‍सगर राति‍ दीप जरय‍क प्रेमी आ कथाकार लोकनि‍ आमंत्रि‍त छथि‍।
     स्‍थानपर पहुँचवाक लेल ट्रेनसँ तमुरि‍या आ बससँ चनौरागंज आबि‍ बेरमाक लेल मात्र तीन कि‍लोमीटर दूरी तँइ कएल जाए। टेम्‍पू,रि‍क्‍सा,टमटम इत्‍यादि‍क सुवि‍धा दुनूठाम (तमुरि‍या आ चनौरागंज) प्राय: उपलब्‍ध रहैत अछि‍।
3.
रामप्रवेश मंडल
लघुकथा-
झगड़ा खतम

भूखसँ बच्‍चा कि‍नैर मारैत अछि‍। पगली प्रसव पीड़ाक वाद अद्धचेतन अवस्‍थामे पड़ल अछि‍। भाग दौड़क जीनगीमे ककरो केयो देखनि‍हार सुननि‍हार नहि‍।
     दूटा शरावी लड़खराइत आवि‍ रहल अछि‍। बच्‍चाक कननाइ सुनि‍ पहील पूछलक- मीता, एतेक अन्‍हार आ सुनमसानमे बच्‍चा कतए कनैत अछि‍?
  दोसर बाजल- चलू, चलि‍ कए देखैत छी।‍
  दुनू मीता पहुँचल। पहुॅंचतहि‍ बच्‍चा चुप भऽ गेल। दुनू मि‍ता वि‍चार कएलक- बच्‍चा उठा कए अपना घर लए चलू भनए बच्‍चाक माए सुतल अछि‍। बच्‍चाकेँ लैत दुनू गोटेमे झगड़ा उठल। फेर समझौता भेल- पहि‍ने एकर नाम राखल जाए। पहील मीता बाजल- राम।‍
  दोसर बाजल- ‍रहीम।
     दुनू गोटेक आवाजमे ताइस रहए। मारि‍ पीटक स्‍थि‍ति‍ भऽ गेल। तावत् रतुका गस्‍ती पुलि‍स पहुँचल। दुनू गोटेक बात बुझैत आओर झगड़ा देखैत पुलि‍स बाजल- एकर नाम न राम, आ न ‍रहीम, एकर नाम मनुक्‍ख।
  हँ रौ मीता बढ़ि‍या बात ई तँ सोचनहि‍ नहि‍ छलहुँ। ले झगड़ा खतम।


१. मैथिली कथा-गोलबा- बृषेश चन्द्र लाल २.निबन्ध-बिपिन झा-गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता


बृषेश चन्द्र लाल
मैथिली कथा-गोलबा

जहिया ओ जनमल, बड़कीमाइ धरतीपर खसहु नहि देलकैकि π कहादोन माटि लागि जइतैक ππ कहैत छैक जे पशु जाति गन्धेसचिन्हऐत छैक आ प्रायः तैं गोलबा सभसपहिने बड़कीमाइक गन्ध थाह पओलकैक आ लगले तखनहिं सोनी, मोनी आ बब्बूक । अपन माइ चितकबरीक गन्ध त पेटहिंसपओने रहए ।
ओकरा कहियो नहि बुझएलैक जे ओ पशु अछि । ओ अपनाकेसोनी, मोनी आ बब्बूये जकाबड़कीमाइक सन्तान बुझैत रहल । बड़कीमाइ कहैतिरहैति छलैकि जे गोलबा जनमल तओकरा जखने पोछिपाछि कए ठाढ कएल गेलैक, चभकिचभकि कए चितकबरीक थनसदूध पिबए लगलैक आ जखने पेट भरि गेलैक तदौडि कए ओकरि दुनू पएरक बीचमे साड़ीक कोंचामे गरदनि नुका लेलकैक । आ तहियासई क्रम चलिते रहलैक । कुदिफानि कआएल आ बड़कीमाइक साड़ीक कोंचामे गरदनि पैसाकए उपरनीचा करए लागल । बड़कीमाइ ओकरा कोरामे उठाकए ताबरतोड चुम्मा लेबए लगैकि आ गोलबा बड़कीमाइक स्नेहसमुग्ध भजाइक । संसारमे एहिसबेशी सुख ओकरा आओर कतहु कखनो नहि बुझएलैक । ओकरा बड़कीमाइ सभ दिन ममताक समुद्र लगैत रहलैक । कहादोन, सन्तानसप्रेम करएबलाकप्रति सन्तानक माय मुग्ध भजाइत छैक । ओकर माइ चितकबरी बड़कीमाइक सभ दिन आदर करैति रहलैकि । जखने बड़कीमाइ कहैकि — “चितकबरी आह ..आह ।कि ओकर माइ चितकबरी चाहे कतबो दूर किएक ने रहौक, कानमे आवाज झरितेचट बड़कीमाइ लग दौड़ि जाइक । आ बड़कीमाइ जेनाजेना इशारा करैकि चितकबरी चुप्पे मुड़ी गोंतने आदेशक पालन करैति जाइक । करौक कोना नहि ?† भोरेभोरे चितकबरीलेल घास, कोराइ आ कहियो काल दालिक कुन्नीक ओरिआओन तवएह करैकि ने । रौद उगैक तबड़का रस्सीमे खुट्टीमे बान्हि ओकरा चरएलेल छोडि दैकि आ फेर दुपहरियामे चौरीमे लजाइकि । आरिक दुबि खाएमे कतेक आनन्द अबैत छैक से जे खाए सएह ने जानए
तहिना करैक गोलबा । ओहो कहियो बड़कीमाइक आदेशक अवज्ञा नहि कएलक । ह“, चितकबरी स्थिरसअबैकि तओ दौडैतकुदैतफानैत π कहियो काल जखन बड़कीमाइ कोनो काज धन्धामे लागलि रहैति छलि अथवा ककरोसबतिआइतिरहैति छलि तगोलबाकेदुलारसधकेलि दैति छलैकि । मुदा, गोलबा ताधरि जान नहि छोड़ैत छलैक जाधरि बड़कीमाइ ओकरा उठाकए चुमि नहि लैति छलैकि । ... चितकबरी बड़कीमाइ आ गोलबाक सिनेह देखि मुग्ध रहैति छलि । ओ सभ दिन गोलबाकेसिखबैतिरहलि जे जननाहरिसपोसनाहरि बड़की होइत छैक । आ ओ तैसभ दिन बड़कीमाइकेअपन माइ चितकबरीसउपरे देखलकैक ।
सोनी आ मोनी तगोलबालेल अपन जाने न्योछारि देने छलि । नामो तओकरेसभक देल रहैक ने । गोलबा जनमलैक तगोल, गुटमुटाएल आ लेपटाएल रहैक कहादोन आ तैओकरा सोनीमोनीगोलबाकहि देलकैकि । ओकर नामाकरण अहिना भेल रहैक । पहिल बेरसबहुत दिनधरि साझु पहर, रातिमे आ सुतिउठिकए ओसभ ओकरा ओकर माइ चितकबरी लग लजाइक आ मुहपकड़िकए थन छुअबैकि । गोलबा मस्तदूध पिबए लागए । दिनोमे ओकरा मोनसकुदफान कहाकरए दैकि ओसभ । भरि दिन कोरामे लदने छी, लदने छी तहिया गोलबाकेनीक नहि लगैक । मोन होइक जे छोड़ितए तकुदफान करितए । मुदा, बादमे जखन ओ नम्हर भगेल तरहिरहि कए मोन होइक जे कने सोनीमोनी ओकरा कोरमे उठैबितैकि । सोनीमोनी ओकरालेल सुतएलेल ओछाओन आ पहिरएलेल मिरजइक व्यवस्था कएने रहैक । ओ मुति दैक तओसभ बड्ड पिताइक । रातिमे उठाउठा कए पेसाप कराबए लजाइक । गोलबाकेतामस होइक । ओ की जानए गेलैक जे ओकरा मुतक छैक । पेसाप लागल रहैक तने जखन पेसाप लगैक ओ उठिकए गड़गड़ा दैक । ... सोनीमोनी ओकरा अपने कोठरीमे सुतबैकि । बड़कीमाइ कए दिन कहलकैकि जे ओकरा चितकबरी लग पथियासापि दौक । मुदा सोनी कहैकि जे कहुहुराड लजएतैक तखन आ ओसभ एक बरखधरि गोलबाकेअपने कोठरीमे सुतबिते रहि गेलैकि । ओ नम्हर भेलैक तचट्टीमे गहुमक भूस्सा भरि कए ओसभ ओछाओन बना देने रहैकि । आमक पात, दुबि, रामझिमनी आदि गोलबाक प्रिय भोजन रहैक । सोनीमोनी चाऊर भुजि ओहिमे करुतेल सानि कखुअबैति छलैकि । गोलबा मस्तसखाए । कहैकि जे एहिसदेह मोटाइत छैक । गोलबाकेलोक मोट आ कसगर कहकि तबड्ड आनन्द अबैक । आ तैँ ओ चपरचपर खाइक । गेरुका मेला लगलैक तसोनीमोनी मेलासफुदना अनने रहैकि आ लाल, हरियर, कारी फुदना ओकरा गरमे बान्हि देने रहैकि । कहैकि जे लालसशक्ति बढतैक, हरियरसतन्दुरुस्ती आ कारी रहलापर ककरो नजरि नहि लगतैक ।
जेनाजेना ओ बढ़ैत गेल बब्बू ओकर दोस बनैत गेलैक । शुरुशुरुमे ओ अपन दीदीसभक संगेआगा“–पाछाकरैक । मुदा बादमे बब्बू ओकरापर बेशी ध्यान देबए लगलैक । जखनतखन ओकर देह सेहारैक । कतहु, कनेको, कोनो दाग नहि लगबाक चाही । कनेको किछु लागि जाइक त तुरत साफ करैक, देह मलैक आ पोछपाछ करैक । .... एकदिन पेठियासचारिगोट घुंघरुबला पट्टा किनि बब्बू ओकर गरमे सोनीमोनीक फुदना संगहिं बान्हि देने रहैक । गोलबाकेँ अपन गर कनेक भारी जकालगलैक आ कुदफानमे सेहो असहज भगेलैक । घुंघरुक आवाज कानमे झर दैक । कर्कश लगैक । गोलबा मुड़ी हिलाकए पट्टा निकालक प्रयत्न कएलक मुदा ओ निकलएबला थोडेÞ रहैक उन्टे कान फाड़ए लगलैक । आब तदौड़एमे, पछिलका पएरपर ठाढ़ भगरदनि आ खि टेढ़ कए धाही मारएमे सेहो असोकर्य होमए लगलैक । मुदा करो की ? अपने निकालि सकैत नहि अछि भगवान बोली तदेने छथिन्ह मुदा सहज भाषा नहि जे ओ बब्बूकेसम्झाबए सकओ । अन्ततः मन मसोसही पड़लैक ।
गोलबाक सिंघ जनमए लगलैक तमाथपर कुरिऐनी धलेलकैक । ओ दाबा, खम्हा, आड़ि जहापाबए माथ रगड़ए आ धाही मारए । । बब्बू आब ओकर माथकेपकड़िकए ठेलए लगलैक । ओकरा नीक लगैक । ओ छड़पिकए पछिला टांगपर ठाढ भबब्बूक हाथपर धाही मारए लागल । बब्बू आ गोलबाक नित्य कर्ममे इहो एकगोट अभ्यास जुड़ि गेलैक आ तकर बाद तओ लड़ाका बनि गेल । दुपहरियामे बब्बू ओकरा गाछीमे टहलाबए लजाइक आ ओतए ओकरा कएटासभिड़ए पड़ैक । बेशीके लगले भगा दैक मुदा एक दिन ओ हारही लागल छल । ओ तबब्बू जे चलाकीसओकरा जीता देलकैक । ततेक जोड़सने जोश बढ़ओलकैक जे विपक्षी डरे भागि पड़ा गेलैक । मुदा, तीन दिनधरि ओकर सिंघलग माथ दुखाइते रहलैक ।

* * * * *

नहि जानि किएक एकाएक घरमे भीड़भाड़ बढ़ि गेल रहैक । बड़कीमाइ एकदिन बुढ़िया दाईके बजओने रहैकि आ तकर लगले दोसर दिन सभ दरदेआदसभक जमघट भेल रहैक । गोलबाकेघरक गतिविधि किछु विशेष तबुझएलैक मुदा ओ किछु बुझि नहि सकल । ओ देखि सकैत अछि । प्राकृतिक रुपसओकरा अपनालेल आवश्यक विषयमे भगवान बुझक जतबे सामथ्र्य देने छथिन्ह ओ ततबे ने बुझत π ओ अपन दिनचर्या कसकैत अछि, अपनप्रतिक स्नेह आ बजारल चोटकेछू सकैत अछि, मुदा दोसरक छुपल भाव वा मनुखक भाषायी अभिव्यक्ति ओकर प्रकृति प्रदत्त सामथ्र्यसफाजिलक विषय छैक । तैघरमे की चलिरहल रहैक ओ बुझि नहि सकल । ह“, गोलबाप्रति स्नेह किछु बेशीये बढ़ि गेल रहैक । ओना गोलबाकेकेओ ऐंठकाठ खाए नहि देलकैक । शुरुअ‍ेसकोनो घाओघौस नहि होउक, कतहु कटाउक नहि तकर ख्याल सभ केओ रखैत अएलैक अछि । मुदा, एखन ओकर खानपानपर पहिनेसकिछु आओर विशेष ध्यान राखल जारहल छलैक । ... एक दिन पुरहित अएलखिन्ह । बड़ीकालधरि पतरा उनटअबैत रहलखिन्ह । जाएकाल बड़Þकीमाइ बहुते रास चाउर दालि , अल्लू आ नूनक संगहिं किछु टका सेहो देने रहैकि । आ तकरबाद घरक नीपपोत, हाटबजारक गतिविधि बढ़ि गेल रहैक । दसे दिनक बाद घरमे ढ़ोलपिपही बाजए लगलैक । साझखन गोसांउनिघरमे कनिया“–मनियाआ बुढ़ियादाइ सभक जमघट तथा गीतनाद होमए लगलैक । बब्बूक आगाराखि नहि जानि कतेक विधवाध कएल गेलैक । ढ़ोलपिपही आ गीतनादसओकर कान भारी भगेल छलैक । मुदा तैयो सभ किछु रमनगर लगैक । बब्बू हर्षित रहैक तै
ओहि दिन भोरेसभीड़भाड़ रहैक । गोसाउनिघरमे पूजापाठ भेलैक । ओही क्रममे गोलबाकेदू गोट छौंड़ा पकड़िकए पोखरि लगेलैक आ नहा देललैक । बड्ड जाढ़ भेलैक गोलबाके। माघ महीनाक जाढ़ आ ठढ़ल पोखरिक पानि छौंडासभ सोझे पोखरिमे बुड़का देने रहैक । बेचारा गोलबा मेमिआए लागल, पैखानापेसाप सभ भगेलैक । डरे परान निकलए लगलैक । विवश गोलबाक गर लागि गेलैक । ओ बब्बूक स्मरण कएलक । एखन बब्बू रहितैक तएना होइतैक ? .... छौंड़ासभ ओकरा कोरमे उठओने गोसाउनिघरमे लगेलैक आ बब्बू लग ठाढ़ कदेलकैक । तखन जा ओकर परान पलटलैक । बुझएलैक, ओकरो एहि समारोहमे सहभागी बनाओल जारहल छैक । ओ चारु भर देखए लागल । जाढ़े देह थरथराइक मुदा तैयो ओ अपनाकेस्थिर करक पूरा प्रयत्नमे लागि गेल । ओ अपनाकेस्थिर करएमे लागले रहए कि पण्डितजी जोड़जोड़समन्त्र पढलखिन्ह आ बब्बू ओकर माथपर अक्षत, फूल आ पानि ढ़ाड़ि देलकैक । माथ सर्द भगेलैक आ केशमे अक्षत फूल घुसिआ गेलाक कारणेओकरा कुरिअइनी लागि गेलैक । ओ जोड़सअपन माथ झटकए लागल । पण्डितजी जय भगवती जय माते †† ’ चिचिआए लगलखिन्ह । बब्बू पाछाँ हटि गेलैक । एक गोटे पाछाओकर दुनू पएर पकड़ि लेलकैक । दोसर ओकर गर्दनपर हाथ फेरए लगलैक । .... .... छपाक

* * * * *

आहिरो ई की भेलैक ?† ओ तअपन धरसअलग भगेल अछि ††† आब ने ओ धरसअलगे फेकाएल माथमे अछि ने धरेमे । ओ अपन अलग भेल मुड़ीक मुआयना करैत अछि । असह्य पीड़ाक प्रतिविम्व छैक उनटल आखि आ दात तर दने निकलक जीभ । दातक दबाब एतेक जे आधा जीभ कटाइये गेल छैक । धरोक हालत ठीक नहि छैक । छिड़िआएल चारु टांग आ तानल धर एकदम कड़ा भगेल छैक । ओ अपनाकेएकदम हल्लुक पाबिरहल अछि । अनन्त अन्तरिक्षक यात्राक हड़बड़ी भगेल छैक एहि अनन्त यात्राक कतहु कोनो पड़ावपर ओकरा दोसर शरीर धारण करक छैक । नहि जानि ओ पड़ाव कतए हएतैक ? तखने ओ पुनः दुःःखसुख आ भावनाक संवेगकेभोगि सकत । स्वाद आ श्रंगारक रस पिबि सकत । अथवा अन्य कोनो अनुभूति लसकत । .... गोलबा पुनः एकबेर स्थितिक जायजा लैत अछि । सोनीमोनी पानि गरमारहलि छैकि । छौंड़ासभ ओकर धर छोलएलेल केराक पात आ औजारसभ ठीक करहल अछि । भन्सीआसभ बडका कराह आ भट्ठीक प्रबन्ध मिलारहल अछि । बड़कीमाइ कनिया“–मनियासभकेमरमसल्ला, तेल, पिआउज आदिक वन्दोवस्तमे लगओने छैकि । पिअर, धोती, कुत्र्ता आ गमछामे मुण्डित माथ नेने बब्बू अपन दोससभक संग हसिसि बतिआरहल अछि । दरबज्जापर दरदेआदसभ मस्त खैनी चुनबैत गप्पसप्पमे लागल छैक । चितकबरी नोराएल आखिसअपन पहिल बेटाक धरदिसि टुकुरटुकुर ताकिरहलि अछि ।
....
ओ कोनो झोंका जकाअन्तरिक्षदिसि उधिया जाइत अछि । एकदम निस्पृह भावे“ † ई सभ स्वाभाविक छैक । ओहो स्वाभाविक रुपेप्रकृतिक स्वाभाविक प्रक्रियामे आगाबढि जाइत अछि । आब ओ गोलबा कहाअछि
 
२.

बिपिन झा
गुरुशिष्य परम्परा आओर आधुनिकता

भारतीय संस्कृतिक आधारभूत तत्त्व मे सँ एकटा अनन्यतम तत्त्व रहल गुरुशिष्य परम्परा प्राचीन काल सँ आधुनिक काल तक परिवर्तनशील विशिष्टताक संग विद्यमान रहल अछि। गुरुशिष्यपरम्परा सँ तात्पर्य ओहि व्यवस्था सँ अछि  जेकर अन्तर्गत शिष्य बाल्यकाल सँ ब्रह्मचर्यजीवन केर समाप्ति तक गुरुक सान्निध्य मे रहि विद्यार्जन कयल करैत छल। एहि  परंपरा के अन्तर्गत ओ अपन परिवार सँ दीर्घावधि तक अलग रहि कें  गुरुकुल मे निःशुल्क रहि भिक्षाटनक द्वारा अपना संग संग गुरुक भोजन क प्रबन्ध करैत छल।
              ई परंपरा जीवनक आधार के निर्मित करवा मे, आ विद्यार्जन एवं चरित्र निर्माण मे सहायक होइत मानल गेल 
              प्राचीन काल सँ क्रमशः मध्यकाल एवं आधुनिक काल अबैत अबैत गुरुशिष्यपरम्परा जीवित रहितो ह्रासमती प्रवृत्ति सँ युक्त रहल। जतय प्राचीन काल मे ई परम्परा विद्यार्जन आ चरित्रनिर्माण केर एकमात्र निर्माणशाला छल ओतय वर्तमान काल मे कालेजकल्चर एवं कोचिंगकल्चर एकरा औपचारिकता मात्र बना देलक। ई एकर असफलता नहिं अपितु समय केर संग होयबला बदलाव अछि।
              निष्कर्षतः ई कहब समीचीन होयत जे अन्ध आधुनिकता क भागदौडो मे गुरु शिष्यपरम्परा केर गौरवमयी तत्त्वक समावेश आधुनिक शैक्षणिक संस्थान मेम कयल जाय ताकि त्याग, तपस्या व निःस्वार्थ केर प्रतीक गुरुपदक गरिमा अक्षुण्ण रहय।
बिपिन झा
CISTS, IIT, Bombay

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...