Sunday, July 04, 2010

'विदेह' ६० म अंक १५ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ६०)-PART II


एक बैसार सुनि‍ दुनू दि‍शि‍ गल्‍ल-गुल्‍ल शुरू भेल। दू तरहक ि‍वचार दुनू दि‍स टकराए लगल। टकराहट देखि‍ कते पुरूख उठि‍ कऽ वि‍दा हुअए लगलथि‍। मुदा बाबाक बात महि‍ला सभ मानि‍ अपन बैसार उसारि‍ पुरूखेक बैसारमे बैसि‍ चि‍कड़ि‍-चि‍कड़ि‍ बाजए लगलीह-अहॉंक पीठि‍पर हम सभ तैयार छी बाबा, उठि‍ कऽ नर्णए दि‍औक।
      महि‍लाक अावाज सुनि‍ बाबाकेँ भेलनि‍ जे ई आवाज शरीरक नहि‍ शरीरीक (आत्‍मा) छी। हृदयसँ एकरा सभ कल्‍याण चाहि‍ रहल छथि‍। एकरा रोकब तँ असंभव अछि‍ मुदा, मोड़ल जा सकैत अछि‍। एक तँ बुढा़ढी दोसर मनमे आि‍ग लगल, मनधन बाबा थर-थर कपैत फराठी बले उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत कहलखि‍न-बाउ, हमरा आगू सभ बच्‍चे छह। जहन बच्‍चा बौआ आ बुच्‍ची बनैत तहि‍येसँ दूजा-भाव शुरू भऽ जाइत अछि‍। मुदा हम सभकेँ बच्‍चे बुझै छि‍यह तेँ कहै छि‍अह जे अपन कल्‍याणक बाट सभ पकड़ि‍ चलह। अखन जहि‍ घटना माने समस्‍या दुआरे सभ एकत्रि‍क भेल छी ओ दू गोटेक बीचक नहि‍ दू समाजक बीचक छी। दू गोटेक बीचक जँ रहैत तँ ओकरा छोट मानल जाइत मुदा, दू गामक समस्‍याकेँ छोट मानब गलत ऑंकव होएत। ई ओहन अछि‍ जे एकसँ अनेक रूपमे पसरि‍ जाएत। जहि‍ना तूँ सभ कहै छहक जे सि‍सौनीमे आि‍ग लगा देव, मारब बेइज्‍जत करब तहि‍ना तँ ओहो सभ करतह। तोहूँ सभ मारबहक ओहो सभ मारतह। तोहूँ कपार फोड़वहक ओहो सभ फोड़तह। अखन ने बुझि‍ पड़ै छह जे सोलहन्‍नी हमहीं सभ मारबै आ ओ सभ मारि‍ खाएत। मुदा से कतौ देखलहकहेँ। दुनू दि‍सक लोक मारबो करैए आ मारि‍यो खाइए।
      मनधन बाबाक वि‍चार सुनि‍ सभ मूड़ी डोला-डोला सोचए लगल। एक दोसर दि‍स तकवो करैत। सबहक मनमे मारि‍क गंभीरता नचए लगल। मुदा तइओ मनक गरमी पूर्ण शान्‍त नहि‍ भेलैक। वि‍चार गजपटाए लगलै। कखनो शान्‍तीक रास्‍ता मनमे जोर पकड़ै तँ लगले उनटि‍ कऽ मारि‍-दंगाक रास्‍ता पकड़ि‍ लैत। जे चढ़ैत-उतड़ैत वि‍चार मुँहक रूखि‍सँ साफ बुझि‍ पड़ैत। लोकक रूखि‍ देखि‍ बाबा कहए लगलखि‍न-गामेमे की देखै छहक? जे कने हुबगर अछि‍ ओ मुँहदुबराक संग केहन वेवहार करैए। भलेहीं अप्‍पन जाति‍ये, दि‍यादे ि‍कएक ने होय। भीतरसँ अप्‍पन गाम फोंक छह। देखते छहक जे सभ अपन-अपन नून-रोटीमे दि‍न-राति‍ लगल रहैत अछि‍। ने अपना पेटसँ छुट्टी होइ छै आ ने दोसराक आि‍क समाजक कोनो चि‍न्‍ता रहै छै। समाज की छि‍यै से लोक बुझवे ने करैत अछि‍। अपने पेटक खाति‍र बेइमानी-शैतानी, चोरी-डकैती सब करैत अछि‍। सभ ि‍मलि‍ समाजकेँ परि‍वार जेकॉं ठाढ़ कए काज करी, से ककरो मनमे छइहे नहि‍। ओना सि‍सौनि‍यो सएह अछि‍ मुदा, तइओ तँ अपना गामसँ कने नि‍स्‍सन अछि‍। कमसँ कम तँ सभ मि‍लि‍ दुर्गा-पूजा तँ कइये लैत अछि‍। जखने दस-पनरह दि‍न सभ एकठाम भऽ एक काजक पाछू लगैत अछि‍, तखने ने अपनामे गप-सप्‍प भेने साल भरि‍क छोट-छोट झगड़ा मेटाइत अछि‍। तेँ समाजकेँ आगू बढ़बैक लेल दसगरदा काज जरूरी अछि‍। जाधरि‍ लोकक मनमे दसनामा काजक प्रति‍ झुकाव नहि‍ हेतैक ताधरि‍ समाज आगू मुँहे कोना ससरत? एि‍ह नजरि‍सँ देखवहक तँ बुझि‍ पड़तह जे अपना गामसँ थोड़े आगू सि‍सौनी बढ़ल अछि‍। ि‍ससौनि‍योसँ आगू पछबारि‍ गाम बरहरबा अछि‍। देखते छहक जे ओहि‍ गाममे दुर्गो-पूजा होइत अछि‍ आ पढ़ै-लि‍खैले हाइयो स्‍कूल अछि‍। बरहरबोसँ अगुआइल दछि‍नवरि‍या गाम कटहरबा अछि‍। ओहि‍ गाममे हाइयो स्‍कूल अछि‍, अस्‍पतालो अछि‍ आ सालमे एक-बेरि‍ सभ ि‍मलि‍ चारि‍ दि‍नक मेला कालि‍यो-पूजामे लगा लैत अछि‍। जहि‍ गाममे जते सार्वजनि‍क काज हएत ओ गाम ओते तेजीसँ आगू बढ़त। गाम अगुआइक माने संस्‍थे बनि‍ जाएव आ पूजे होएव नहि‍ बल्‍कि‍ आचार-वि‍चार बेवहार, चालि‍-ढालि‍ सभ ि‍कछु बदलब होएत। जाधरि‍ कोनो गाम पछुआएल रहैत अछि‍ ताधरि‍ ओहि‍ गाममे सदि‍खन रॉंड़ी-बेटखौकी, मारि‍-मरौबलि‍, हल्‍ला-फसाद होइते रहैत अछि‍। जाधरि‍ लोक झूठ-फूसि‍, छोट-छीन बात लऽ कऽ लड़ैत-झगड़ैत रहत ताधरि‍ ओकरा समएक कोनो मोल नहि‍ होएत। जखने मूल्‍यहीन जि‍नगी चलैत रहत तखने श्रमक कोनो महत्‍व नहि‍ रहत। जे श्रम सार छी, मनुष्‍यक पूजी छी ओ धूरा जेकॉं उड़ैत रहत। भाग्‍य-तकदीर बनौनि‍हार चानी कटैत रहत। जहि‍सँ लाेकक कमाइ ऑंखि‍केँ सदति‍काल नोर दबने रहत अो दुनि‍यॉंकेँ कोना देख सकत?”
      मनधन बाबा बजि‍ते रहथि‍ ि‍क सुनि‍नि‍हारक बीच गल-गुल शुरू भेल। लोकक गल-गुलसँ मनधन बाबाकेँ दुख नहि‍ भेलनि‍, खुशि‍ये भेलनि‍। मनमे उठलनि‍ जे भरि‍सक लोकक परती बुद्धि‍मे जोत-कोर भऽ रहल छैक। नजरि‍ खि‍रा-खि‍रा मरदो दि‍शि‍ आ जनि‍जाति‍यो दि‍स देखए लगलथि‍। बैसले-बैसल जोगि‍नदर जोरसँ बाजल-दुर्गा-पूजा तँ आब पौरूकॉं हएत, मुदा कालीपूजा तँ लगि‍चाएल अछि‍। तेँ हम सभ आइये संकल्‍प लऽ ली जे हमहूँ सभ काली-पूजा गाममे करब।
      जोगि‍नदरक बातपर सभ थोपड़ी बजा समर्थन दऽ देलक। अही प्रति‍क्रि‍याक फल थि‍क गाममे काली-पूजा।
      ओना रौदि‍याह समए भेने गामक ि‍कसानो आ बोनि‍हारोक दशा दयनीय मुदा, सि‍सौनीक घटना तेना उत्‍साहि‍त कऽ देलक जे सभ ि‍बसरि‍ गेल। उत्‍साहि‍त भऽ बोनि‍हारो सभ एकावन-एकावन रूपैआ चंदाक घोषणा कऽ देलक। बोनि‍हारक उत्‍साह ि‍कसानकेँ झकझोड़ि‍ देलक। प्रति‍ष्‍ठाक प्रश्‍न सामनेमे उठि‍ गेलइ। तइपर सँ परदेशि‍या आरो रंग चढ़ा देलक। एक दुखकेँ दबैक लेल अनेको दवाइ आ पथ्‍य सामने आि‍ब गेलै। समाजक संग ि‍मलि‍ चलैक अछि‍ तेँ व्‍यक्‍ति‍गत दुखकेँ दबै पड़त। सार्वजनि‍क काजमे पाछुओ हटब उचि‍त नहि‍। गामक बहू-बेटी आन गाम मेला देखए जाइत ओि‍ह प्रति‍ष्‍ठाकेँ प्राप्‍त करब। सभसँ पैघ बात बदला लेबाक रास्‍ता बनि‍ रहल अछि‍। हमरा गामक लोककेँ जँ आन गामक लोक बेइज्‍जत करत तँ ओहू गामक लेाककेँ हमसभ करबै। जहि‍सँ आन गामक बरावरीमे अपनो गाम आओत। उत्‍साहि‍त भऽ प्रेमलाल उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ जोर-जोरसँ बजए लगल-भाय लोकनि‍, अपना गामक भाए-बहीि‍न आन गामक मेलामे जा बेइज्‍जत होइत अछि‍। एकर की कारण छैक? कारण छै जे अपना गाममे कोनो तेहेन सार्वजनि‍क काजे ने होइत अछि‍। जखने अपनो सभ तेहन काज करब तँ अनेरे आन गामबलाकेँ दहसैत हेतइ। वएह दहसति‍ गामकेँ उजागर करत, प्रति‍ष्‍ठि‍त बनाओत। गोसॉंइ जी रामाएणमे कहने छथि‍-ि‍बनु भय होहि‍ न प्रीति‍।
      प्रेमलालक मुँह तँ बन्‍न भऽ गेलै मुदा, बजैले मन लुसफुसाइते रहै। आगूक बात मनमे ऐबे नहि‍ करै आ बजले बात दोहरौनाइ उचि‍त नहि‍ बुझि‍, बैसि‍ रहल। प्रेमलालकेँ बैसि‍ते फेरि‍ गल-गुल हुअए लगल। गल-गुल एते बढ़ि‍ गेलै जे जहि‍ना सौजनि‍यॉं भोजमे होइत। गल-गुल देखि‍ अनुप उठि‍ कऽ हाथक इशारासँ शान्‍त करैत गरमा कऽ बाजल-देखू, गल-गुल केने ि‍कछु ने हएत। सि‍सौनीबला सभकेँ एते गरमी ि‍कअए चढ़ल रहै छै से वुझै छि‍यै। अो सभ दस हजार रूपि‍या खर्च कऽ कऽ दुर्गा-पूजा कए लैत अछि‍, तेँ। ओकरा सबहक गरमी हेट करैक अि‍छ। तेँ हम सभ पचास हजार रूपि‍या काली-पूजामे खर्च करब। जँ सवैया-ड्यौढ़ा खर्च कऽ पूजा करब तँ अाे सभ मद्दि‍यो ने देत। तेँ समधानि‍ कऽ हरदा बजवैक अछि‍। अखने पूजा कमि‍टी बना लि‍अ। ओना अखन बीस-बाइस दि‍न काली-पूजाक अछि‍। मुदा अखनेसँ गामसँ आन गाम धरि‍ माहौल बनवैक अछि‍। पूजा समि‍ति‍मे सभ टोल आ सभ जाति‍क सदस्‍य बनाउ। जँ सभ टोल आ सभ जाति‍क सदस्‍य नहि‍ बनाएव तँ अनेरे अखनेसँ अनोन-वि‍सनोन शुरू भऽ जाएत। ततबे नहि‍ सभ जाति‍क सदस्‍य बनौने काजो असान हएत। सभ अपन-अपन लूरि‍-वुद्धि‍सँ सहयोग करत।
      अनुपक वि‍चारसँ सभ सहमति‍ भेला। समि‍ति‍ बनए लगल। सभ ि‍मला एक्‍कैस गोटेक समि‍ति‍ बनल जहि‍मे पॉंच महि‍ला। एक्‍कैसो गोटे उठि‍ कऽ ठाढ़ भेलाह तँ एक दि‍व्‍य स्‍वरूप चमकल। सभ नौजवान। एक्‍कैसोक मनमे खुशी जे सामाजि‍क क्षेत्रमे आगू बढ़ि‍ रहल छी। समि‍ति‍क सदस्‍य एक भाग आ गौवॉं दोसर भागमे बैि‍स वि‍चार आगू बढ़ौलनि‍। समि‍ति‍क संचालनक लेल पदाधि‍कारीक जरूरत होइत। कमसँ कम अध्‍यक्ष, उपाध्‍यक्ष आ कोषाध्‍यक्षक जरूरत हेबे करैत। मुदा अध्‍यक्ष के बनथि‍? गंभीर प्रश्‍न। सभ सबहक मुँह देखए लगलाह।
  ककरो अनुभव नहि‍। ओना समि‍ति‍क अधि‍कांश सदस्‍यकेँ अध्‍यक्ष बनैक इच्‍छा मुदा, अनुभव नहि‍ रहने डरो होइत। सभकेँ चुप देखि‍ रघुनाथ अपन पि‍ति‍औत भाय देवनाथकेँ अध्‍यक्षक लेल प्रस्‍ताव केलक। देवनाथक परि‍वार जाति‍योक आ पूँजीयोमे गाममे सभसँ बीस। देवनाथक नाओ सुनि‍ अधि‍कांश सदस्‍य धकमकाए लगल। दोसर गोटेक नाओ नहि‍ सुनि‍ मंगल अपन नामक प्रस्‍ताव वि‍रोधमे अपने केलक। दू गोटेक नाओ अबि‍ते बैसारमे गुन-गुनी शुरू भेल। धनो आ जाति‍योमे मंगल देवनाथसँ पछुअाएल। मुदा जेहने बजैमे फड़कोर तेहने इमानदार। बी.ए. पास सेहो। जे सभ बुझैत।
      देवनाथ आ मंगल संगे-संग बी.ए. पास केने रहए। ओना पढ़ैमे मंगल चन्‍सगर मुदा, रि‍जल्‍ट देवनाथक नीक रहै। तेकर कारण रहै जे देवनाथ धुड़फन्‍दा शुरूहेसँ  रहए। मंगलक नाओ सुनि‍ देवनाथो आ रघुनाथो ऑंखि‍क इशारासँ गप-सप्‍प करए लगल। कनि‍येँ खानक पछाति‍ मंगलकेँ पलौसी दैत रघुनाथ बाजल-भैया, हमरा ि‍लए जेहने आहॉं तेहने भैया छथि‍। अहूँ दुनू गोटे संगि‍ये छी। आग्रह करब जे देवनाथ भैयाकेँ अध्‍यक्ष आ अहॉं उपाध्‍यक्ष बनि‍ काज करू।
      मंगलक मनमे केवल पूजे समि‍ति‍ चलाएव नहि‍ समाजकेँ आगू बढ़बैक वि‍चार सेहो। बच्‍चेसँ देवनाथक चालि‍-ढालि‍ मंगल देखैत आएल। मुदा समाज तँ पोखरि‍क पानि‍ सदृश्‍य होइत अछि‍। हवा-बि‍हाड़ि‍मे लहरि‍ सेहो उठैत मुदा, लगले असथि‍र भऽ शान्‍त सेहो भऽ जाइत अछि‍। मंगलक मनमे देवनाथक प्रति‍ एकटा आरो बात घुरि‍आइत। ओ ई जे एक दि‍न करीब चारि‍ साल पहि‍ने एकटा गामेक लड़कीक संग छेड़खानी करैत देवनाथकेँ मंगल पकड़ने रहए। हाटसँ अबैत मंगलकेँ देखि‍ ओ फफकि‍-फफकि‍ कानए लगलि‍। साइि‍कल ठाढ़ कऽ सभ बात सुनलक। तामसे बेकाबू भऽ गेल। देवनाथकेँ ि‍बनु ि‍कछु पुछनहि‍ चारि‍-पॉंच चाट मुँहमे लगा देलक। क्रोधो कमलै। मुदा डरसँ देवनाथ थर-थर कपैत रहै। मंगल दवनाथकेँ कहलक-बच्‍चा, अखन धरि‍क संगी छलै तेँ छोड़ि‍ दैत छि‍यौ। नहि‍ तँ समाजक बेटीक संग ऐहन वेवहार करैबलाकेँ जि‍नगी भरि‍क पाठ पढ़ा दैति‍यै।
      दुनू हाथ जोड़ि‍ देवनाथ, न्‍यायालयक अपराधी जेकॉं आगूमे ठाढ़ रहै। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍तमे मंगल उलझि‍ गेल। मनमे क्रोध आ दयाक बीच घि‍च्‍चम-घि‍च्‍च हुअए लगलैक। कखनो दया दि‍स मन ससरैत तँ लगले क्रोध दि‍स बढ़ि‍ जाय। मनकेँ असथि‍र करैत कहलक-अखन धरि‍क संगी होइक नाते छोड़ि‍ रहल छि‍औ। नै.... तँ......। कान पकड़ि‍ कऽ बाज जे ऐहन गलती फेरि‍ ककरो संग नहि‍ करब? जाधरि‍ कोनो लड़कीकेँ वि‍आह-दुरागमन नहि‍ होइत ताधरि‍ माए-बापक सन्‍तान बुझल जाइत मुदा, सासुर जाइते गामवाली माने गामक बेटी बनि‍ जाइत अछि‍।
यएह बात मंगलक मनमे घुरि‍आइत रहै।
      रघुनाथक बात सुनि‍ मंगल जबाब देलक-बौआ रघू, दसगरदा काजक शुरूआत गाममे भऽ रहल अछि‍। मुदा समाज तँ टुकड़ी-टुकड़ी भऽ छि‍ड़ि‍आइल अछि‍। तेँ जरूरत अछि‍ जे एक-एक टुकड़ीकेँ ओरि‍या-ओरि‍या पकड़ि‍ दोसरमे सटबैक अछि‍। से जाधरि‍ नहि‍ हएत ताधरि‍ कोनो सार्वजनि‍क काज सफल होएव संदि‍ग्‍ध बनल रहत। खंडि‍त भऽ जाएत। देखते छि‍यै जे कोनो भोज होइ छै तेँ दस कोस-पनरह कोससँ पंच आि‍ब-आबि‍ खाइत अछि‍ मुदा, भोजैतक घर लगहक परि‍वार भुखले रहैत अछि‍। ऐहन अन्‍यायी समाजमे न्‍याय कहि‍या आओत। के आनत? अखन जे सामाजि‍क ढॉंचा बनि‍ ठाढ़ अछि‍ ओ गॉंड़ि‍-मुड़ाह अछि‍। जहि‍ना कोनो बोझ गँडि‍़-मुराह भेने कखन माथपर सँ खसि‍ छि‍ड़ि‍या जाएत, तेकर कोनो ठेकान नहि‍, तहि‍ना समाजोक अछि‍। तेँ बोझे जेकॉं समतुल्‍यपर बान्‍ह पड़ैक चाही। जहि‍सँ कहि‍यो छि‍ड़ि‍ऐवाक शंका नहि‍ रहत। दसनामा काजमे समाजक बच्‍चा-बच्‍चाकेँ बरावरीक ि‍हस्‍सा भेटक चाहि‍यै। मुइल-टूटल क्‍यो ि‍कऐक ने हुअए मुदा, ओकरा मनसँ ई वि‍चार नि‍कलि‍ जेबाक चाहि‍यै जे ई काज हमर नहि‍ फल्‍लांक छि‍यै। हम सोझे करैबला छी करबैबला नहि‍। ककरो बाप-पुरखा हर जोतैत आएल अछि‍, अखनो जोतैत अछि‍ आ आगुओ जोतैत रहत। जँ से नहि‍ जोतत तँ खेती कोना होएत? मुदा, ओहो समाजक ओहने अंग छी जहि‍ना पढ़ि‍-लि‍खि‍ क्‍यो करैत अछि‍। अखन गामक सभ बैसल छी तेँ पूजा-प्रकरणक सभ नि‍र्णए सबहक बीच भऽ जाए। सि‍सौनीमे अखनो देखै छी जे दुर्गास्‍थानमे सबहक पहुँच नहि‍ अछि।‍
      मंगलक बात सुनि‍ सभ स्‍तब्‍ध भऽ गेला। मनमे उठा-पटक हुअए लगलनि‍। ओना बहुतोक बुद्धि‍मे सभ बात अँटबो ने कएल मुदा, जतबे अँटल ओ आि‍गक लुत्ती जेकॉं चमकए लगल। व्‍यवहारि‍क जि‍नगी आ वास्‍तवि‍क जि‍नगीक दुरी बहुत बेसी भऽ गेल अछि‍। व्‍यवहाि‍रक जि‍नगीकेँ वास्‍तवि‍क जि‍नगी दि‍शि‍ झुकौने चलए पड़त। जँ से नहि‍ हएत तँ सदि‍खन चलैक रास्‍ता गजपट होइत रहत। परोछमे उचि‍त बात बजनि‍हारक कमी नहि‍ मुदा, सोझा-सोझी बजनि‍हार क्‍यो नहि‍। तेकरो कतेक कारण छैक। गुन-गुन, फुस-फुस होइत देखि‍ मंगल बुझि‍ गेल। मनमे उठलै बुद्धदेवक ओ बात जहि‍मे कहने छथि‍ जे वीणक तारकेँ ओते नहि‍ कड़ा कऽ दि‍यै जे टुटि‍ जाए। आ ने ओते ढील रहए ि‍दयै जे अबाजे नहि‍ नि‍कलै। मंगल बाजल-अध्‍यक्ष पदसँ हम अपन ना आपस लइ छी। देवनाथे अध्‍यक्ष होथि‍। मुदा अखनसँ लऽ कऽ जाधरि‍ पूजाक प्रकरण चलैत रहत ताधरि‍ सभ काजक नि‍र्णए समि‍ति‍क बीच हुअए।‍
      मंगलक बात सुनि‍ देवनाथ ठाढ़ भऽ बाजल-जि‍नगीमे पहि‍ल-पहि‍ल दि‍न समाजक काज करैक मौका भेटि‍ रहल अछि‍ तेँ मनमे असीम खुशी अछि‍। सभ तँ अनाड़ि‍ये छी, जहि‍सँ ि‍बनु बुझलो कतेक गलती भऽ सकैत अछि‍। मुदा ओहि‍ सभकेँ भुल-चुक मानि‍ सम्‍हारैक उपाय हेवाक चाही। अखन सभ ि‍कयो छी तँ मुख्‍य-मुख्‍य काजक नि‍र्णए अखने भऽ जाए। ओना अखन दि‍नगर अछि‍ मुदा, सबहक नजरि‍मे रहब बढ़ि‍यॉं रहत।‍
      देवनाथक ि‍वचार सुनि‍ सबहक मुँहसँ नि‍कलल-बहुत बढ़ि‍यॉं, बहुत बढ़ि‍यॉं।
  कहि‍ समर्थन देलक। नि‍र्णए भेल-
(१)    गामेक कारीगर माने मुर्ति बनौनि‍हार मुरती बनावे। ओना एकपर एक कारीगर दुनि‍यॉंमे अछि‍ मुदा, पूजाक मुरतीमे कला       नहि‍ देवी-देवताक स्‍वरूप देखल जाइत अछि‍। दोसर जँ हम     अपन बनौल मूर्तिकेँ अपने अधलाह कहब तँ गामक कलाकार      आगू कोना ससरत। तेँ जे गामक कला अछि‍ ओकरा सभ      ि‍मलि‍ प्रोत्‍साहि‍त करी।

(२)    काली मंडप गामेक घरहटि‍या बनावथि‍। जि‍नका घर बनवैक     लूरि‍ छन्‍हि‍ ओ मंडप ि‍कऐक नहि‍ बना सकैत छथि‍। संगे इहो      हएत जे गामक अधि‍कसँ अधि‍क लोकक सहयोग सेहो होएत।

(३)    मनोरंजनक लेल गामोक कलाकारकेँ अवसर भेटनि‍। सेगे      बाहरोक ओहन-ओहन तमाशा आनल जाए जेहन एि‍ह परोपट्टामे      नहि‍ आएल हुअए।

(४)     पूजाक लेल, परम्‍परासँ अबैत ओहनो पुजेगरीकेँ अवसर भेटनि‍   जे पूजाक प्रेमी छथि‍।

(५)     गामक जते गोटे काज करथि‍ ओहि‍मे नीक केनि‍हारकेँ   पुरस्‍कृत आ अधला केनि‍हारकेँ आगू मौका नहि‍ देल जाइन।
     
      पॉंचो नि‍र्णए सर्वसम्‍मति‍सँ भऽ गेल। बैसार उसरि‍ गेल। खाए-पीबि‍ कऽ मंगल सुतै ले ि‍बछान ि‍बछवैक रहए। राति‍क एगारह बजैत। सतरंजी ि‍बछा दुनू हाथे जाजीम झाड़लक। तहि‍ बीच जोगि‍नदर मंगलसँ भेटि‍ करए आएल। जाजीमक अवाज सुनि‍ जोगि‍नदर घबड़ा गेल। मनमे भेलइ जे ि‍कम्‍हरौ थ्री-नट्टा ने तँ चलल। हि‍यासि‍-हि‍यासि‍ चारू कात ताकए लगल। मुदा ककरो सुनि‍-गुनि‍ नहि‍ पाबि‍ मन असथि‍र भेलइ। असथि‍र होइते मंगलकेँ सोर पाड़लक। कोठरि‍येसँ मंगल अवाज दैत बहराएल। वाहर अबि‍ते जोगि‍नदरकेँ देखि‍ बाजल-आबह। आबह भाय। एती राति‍केँ ि‍कअए ऐलह?”
  दुनू गोटे ओसारक चौकीपर बैसि‍ गप-सप्‍प करए लगल। जोगि‍नदर कहलक-भाय, आइ तक तोरा ऐना भऽ कऽ नै चि‍न्‍हने छेलि‍यह। मुदा तोहर औझुका वि‍चार सुनि‍ छाती बारह हाथक भऽ गेल। भॉंइमे ि‍कयो दादा हुअए।
  जोगि‍नदरक बात सुि‍न मंगल बाजल-भाय, बहुत राति‍ भऽ गेल अि‍छ भोरे उठैयोक अछि‍। ि‍कएक ऐलह से कहह।
  अखन अबैक खास कारण अछि‍। तेँ नि‍चेन बुझि‍ एलौं। तोहूँ तँ देखते छहक जे अखैन धरि‍ हम गाममे दहलाइते छी। ने रहैक बढ़ि‍यॉं ठौर अछि‍ आ ने जीवैक कोनो आशा। मुदा....।
  मुदा की?”
  मुदा यएह जे करोड़पति‍ रहि‍तो कोनो मोजर गाममे नइ अछि‍।‍
  करोड़पति‍ सुनि‍ मंगल चौंकैत पुछलक-करोड़ कतेक होइ छै, से बुझै छहक?”
  हँ। सौ लाख।
  एत्ते रूपैआ अनलह कतएसँ?”
  अइ बातकेँ छोड़ह। जहि‍येसँ दि‍ल्‍ली नोकरी करए गेलौं तहि‍येसँ रूपैयाक ढेरी लग पहुँच गेलौं। शुरूमे जे बोरामे कसल रूपैया देखि‍यै तँ हुअए जे छपुआ कागज छि‍यै। मुदा कनी दि‍न रहलापर रूपैआ हथि‍यबैक लूरि‍ भऽ गेल। अखैन, दि‍न भरि‍मे लाख रूपैया हसोथब कोनो भारी कहॉं बुझै छि‍यै। मुदा ओइ काजसँ मन उचैट गेल। आब एक्‍केटा इच्‍छा अछि‍ जे मनुख बनि‍ गाममे रही।
  हमरा की कहए चाहै छह?”
  अखैन तँ सभ पूजामे ओझराइल छी। पूजाक पछाति‍ मदति‍ कऽ दि‍हह। एक लाख रूपैया अनने छी। अपन जे आदमी अछि‍ जदी अाेकरा जरूरी होय तँ ि‍बना सुदि‍ऐक सम्‍हारि‍ देबै। मूड़क-मूड़ घुमा देत। संगे तोरो कहै छि‍अ जे रूपैया दुआरे पूजामे कोनो कमी नै होय।
  जोगि‍नदर बात सुि‍न मंगलक मनमे ि‍बरड़ो उठि‍ गेल। एक मन कहै जे रूपैया दुआरे काज पछुआ जाइए। से आब नइ हएत। तँ फेरि‍ सोचए जे डकैत-तकैतक भॉंजमे ने तँ पड़ल जाइ छी। अखन धरि‍ एकटा साधारण आदमी बुझि‍ परदेशि‍या बुझै छलौं। परदेशमे की करै छलै से तँ नहि‍ बुझै छलौं। मुदा खतरनाक आदमी बुझि‍ पड़ैए। एसमगलर छी ि‍क हवालाक धंधा करैए। तत्-मत् करैत मंगल पुछलक-एत्ते रूपैआ कोना भेलह?”
  मंगलक प्रश्‍न सुनि‍ जोगि‍नदर चौकन्‍ना भऽ चारू दि‍शि‍ तकलक। ककरो नहि‍ देखि‍ घुन-घुना कऽ बाजल-भाय, जइठि‍न नोकरी करै छलौं ओ बड़ भारी कारोवारी अछि‍। हजारो नोकर-चाकर छै। देखौआ कारोवारक संग चोरनुकवा कारोवार सेहो करैए। आन-आन देशक रूपैया भजबैए। कोन-कोन देशक लोक कोन-कोन रंगक रूपैया भजवैए से ि‍क सभकेँ ि‍चन्‍हवो करै छेलि‍यै। मुदा हमरापर सेठवाकेँ खूब वि‍सवास छै। हरदम अपने लग रखैत अछि‍। टहल-टि‍कोरासँ लऽ कऽ चाह-पान धरि‍ आनि‍-आनि‍ दैत छेलि‍यै। नि‍शि‍भाग राति‍मे एक आदमी गाड़ीपर अबैत छै आ भरि‍ ि‍दन जते बाहरी रूपैया भेल रहै छै ओ सभ लऽ जाइ छै। आपस ि‍कछु ने करै छै। खाली पास बुकपर रूपैया चढ़ा दइ छै। सेठवाकेँ जखैन जते रूपैयाक जरूरत होय, हमहीं बैंकसँ आनि‍-आन दैत छेलि‍यै।
  जोगि‍नदरक बात सुि‍न मंगलक भक्‍क खुजल। पुछलक-दि‍ल्‍ली सनक शहरमे सी.आइ.डी. आ पुलि‍स ि‍कछु ने कहै छै?”
  मुस्‍की दैत जोि‍गनदर उत्तर देलक-सभकेँ महीना बान्‍हल छै।
  जोगि‍नदरक बात सुि‍नतहि‍ मंगलक मनकेँ, नि‍राशाक कारी मेघ टोपर बान्‍हि‍ घेड़ि‍ देलक। हतोतसाह भऽ गेल। मनमे उठलै-ककरापर करब सि‍ंगार पि‍या मोरा आन्‍हर रे। जहि‍ देशक शासन कमजोर रहत ओहि‍ देशक सुरक्षा भगवान छाेड़ि‍ के कऽ सकैत अछि‍। भीतरे-भीतर डरा गेल। मुदा मनकेँ असथि‍र करैत पुछलक-तूँ ओही सेठक संग रहै छह ि‍क.......?”
  दस बर्ख ओहि‍ सेठबा अइठीन रहि‍ सभ तरी-घटी देखि‍ लेलि‍यै। ओकरा अइठीनसँ हटैक मन भऽ गेल। मुदा नोकरी नै छोड़लौं। कहलि‍यै, माए अस्‍सक अछि‍ तेँ ि‍कछु अगुरवारो रूपैया दि‍अ जे इलाज कराएव। भरि‍ दि‍न दारूए पीवैत रहैत अछि‍। सारकेँ लगबो करै छै ि‍क नै। एते भारी कारोवार कोना सम्‍हारि‍ लैत अछि‍। मनमे उठल जे जहि‍ना ई सार दुनि‍यॉंकेँ ठकि‍ धन जमा केने अछि‍ तहि‍ना हमहूँ ि‍कअए ने एकरे ठकी। दवाइक दोकानसँ एकटा कड़गर नि‍शॉंबला दवाइ कीनि‍ आनि‍ दारूक बोतलमे फेंटि‍ देलि‍यै। आठ बजे सॉंझमे जखन दारू मंगलक तँ वएह बोतल दऽ देलि‍यै आ कहलि‍यै जे हमरा गाम दि‍सक गाड़ी चारि‍ बजे भोरमे अछि‍ तेँ राति‍येमे चलि‍ जाएव। कहलक- बड़बढ़ि‍याँ। दारू पीलक। हम ससरि‍ कऽ मलि‍काइन लग जाय कहलि‍यै जे गाम जाएव। फेरि‍ ओइठीनसँ थानापर चलि‍ गेलौं। सभकेँ कहि‍ देलि‍यै जे आइ गाम जाएव। सभ ि‍चन्‍हरबे रहै। धुरि‍ कऽ एलौं तँ देखलि‍यै जे सेठवा बेमत अछि‍। खाइले गेलौं। खेलौं। खा कऽ आबि‍ ि‍सरमा तरसँ कुन्‍जी नि‍कालि‍ रूपैयाबला कोठरी खोललौं। बाप रे सौंसे कोठरी रूपैयेसँ भरल। मझोलका बैगमे रूपैया भरि‍ कोठरी बन्‍न कऽ कुन्‍जी रखि‍ देलि‍यै। अपन जे नेपलि‍या रैक्‍सीनबला बैग रहै अोहि‍मे रूपैयोक बैग आ कपड़ो-लत्ता लेलौं। बारह बजे राति‍मे जखन रोड खाली भेल तखन एकटा टेम्‍पूसँ ममि‍औत भाय लग चलि‍ गेलौं। भैया बड़ होशगर छथि‍। कहलनि‍ जे जहन रूपैया हाथ आि‍ब गेल तहन चलि‍ कोना जाएत। वएह रूपि‍या छी।
  जोगि‍नदरक बात सुनि‍ मंगल पुछलक-अपन ि‍क अभि‍यंतर छह?”
  मनमे अछि‍ जे दस कट्ठा घरारी जोकर जमीन भऽ जाए आ पॉंच बीघा घनहर। दसो कट्ठा घरारीकेँ छहरदेवालीसँ घेरि‍ ि‍दअए। बीचमे डेढ़ कट्ठामे चौबगली घर-अंगना बना लेब। दू कट्ठा खुनि‍ भरि‍यो लेब आ दुनू कट्ठामे माछो पोसब। दू कट्ठामे फल-फलहरीक गाछ लगा लेब। तीमन-तरकारीले चौमासो भइये जाएत। काजो-उदम आ खरि‍हानो लेल आगूमे खस्‍ते रखि‍ लेब।
  जोगि‍नदरक ि‍वचार सुनि‍ मंगलक मनमे आशा जगल। बाजल-देखते छहक जे बथनाहामे अवधि‍या सभ अछि‍। ओकरा सभकेँ बहुत जमीन छै। ओइमे सँ एकगोटे बैंकमे नोकरी करैए। समांगोक पातर अछि‍। असकरे नोकरी करत ि‍क खेती करत। सभ खेत बटाइ लगौने अछि‍। दस बीधा जमीन अपना गाममे ओकर छै। जँ इच्‍छा हुअ तँ दसो बीघा कीनि‍ लाए। अखन धरि‍ ओकर जमीन एहि‍ दुआरे बचल छै जे एक्‍के दामठाम बेचए चाहैए। नइ तँ कहि‍या ने ि‍बका गेल रहि‍तै। मुदा एकटा बात पूछै छि‍अह जे अखैन धरि‍क जे तोहर जि‍नगी रहलह ओ हमरासँ वि‍परीत रहलह। तोंही कहह जे दुनू गोटेक बीच कते दि‍न नि‍महत?”
  मंगलक प्रश्‍न सुनि‍ जोगि‍नदर अबाक भऽ गेल। कनी खानक वाद बाजल-मंगल भाय, तोहर शंका सोलहन्‍नी सही छह। दस गोटेक बीच बजैबला मुँह बनौने छह। मुदा शपत-ि‍करि‍या खा कऽ कहै छि‍अह जे अपनो अपना जि‍नगीसँ मन उचटि‍ गेल अछि‍। सदि‍खन होइत रहैए कखैन सड़कपर घूमै छी आ कखैन जहल चलि‍ जाएव। ओना रोडक सि‍पाहीसँ लऽ कऽ नीक-नीक पाइबला सभसँ चि‍न्‍हारे अछि‍ मुदा, ओ सभ पाइयक दोस छी। कहि‍यो काल जे सुतलमे सपनाइ छी तँ ओहि‍ना देखै छी जे आगू-पाछू बन्‍दूकक हाथे ि‍सपाही घेरने अछि‍ आ हाथमे कड़ी लगौने जहल नेने जाइए। कखनो सोचै छी तँ बुझि‍ पड़ैए जे जते अपनाकेँ आगू मुँहे जाइत देखै छी तँ लगले होइए जे पाछु मँुहे तेजीसँ खसल जाइ छी। कखनो चैन नै रहैए।
  बजैत-बजैत जोगि‍नदरक ऑंखि‍मे नोर ढ़बढ़बा गेल। दुनि‍याँक आकर्षण देखि‍ मंगलोक मन पघि‍लए लगल। मनमे उठल मनुष्‍यमे ऐहन अद्भुत शक्‍ति‍ होइ अछि‍ जे एकाएक बदलि‍ जाइत अछि‍। डकैतसँ महात्‍मा बनि‍ जाइत अछि‍ आ महात्‍मासँ डकैत। तेँ मनुष्‍यक संबंधमे ि‍कछु नि‍श्‍चि‍त कहब असंभव अछि‍। अनुपमेय अछि‍। मुदा तइओ एकटा नमहर खाधि‍ बुझि‍ पड़ैए। हमरा तपमे ि‍वसवास अछि‍ जहन ि‍क ऐकर ि‍जनगी उनटा छै। उम्रमे भलेहीं बेसी अन्‍तर नहि‍ हुअए मुदा, ि‍जनगी तँ दू-दि‍शाह अछि‍। मात्रि‍कक एकटा बात मन पड़लै। मात्रि‍क कोशि‍कन्‍हामे। पूबसँ कोशी आ पछि‍मसँ कमला गामकेँ घेरने रहै। ि‍बचला सभ धार एक-दोसरमे ि‍मलल। ओहि‍ गाममे बॉंसक बोन। बॉंसक एकटा बीट गहीरगरमे। खूब सहजोर बॉंस रहै। चालीस-चालीस हाथक बॉंस ओहि‍मे। अगते धार फुला गेल। बाढ़ि‍ आि‍व गेल। गामक सभ माल-जालक संग गाम छोड़ि‍ कुटुमारे चलि‍ गेल। काि‍तकेमे घुि‍र कऽ आओत। ऐहन परि‍स्‍थि‍ति‍मे मातृभूमि‍ कोना स्‍वर्ग बनि‍ सकैत अछि‍। ओहि‍ वॉंसक बीटमे दस-बारह हाथ पानि‍ लगल रहै। ओहि‍ बीटमे दस-बारह हाथ उपरसँ सौँसे बीट कोपर दऽ देलक। जे मंगलो देखने रहै। वएह बात मंगलकेँ मन पड़ल। मन पड़ि‍तहि‍ सोचलक जे अगर जँ मनुक्‍ख संकल्‍पि‍त भऽ जि‍नगी मोड़ए चाहत तँ जरूर मोि‍ड़ सकैत अछि‍। अपन परि‍वारक पाछु लोक चाेरी-डकैती, वेइमानी, शैतानी सभ ि‍कछु करैत अछि‍। हम तँ एकटा ि‍गरल आदमीकेँ उठबए चाहै छी। मनमे खुशी उपकलै। मुस्‍क्‍ुराइत बाजल-भाय, जहि‍ना तूँ दरबज्‍जापर आि‍ब कहलह तहि‍ना तँ हमरो मदति‍ करब फर्ज बनैत अछि‍। मुदा, आइधरि‍ अधलाह काज नहि‍ केलहुँ, तेकरो तँ नि‍माहैक अछि‍।
  मंगलक बात मंगलक पि‍ता गणेशी सेहो सुनलनि‍। ओ पेशाव करए नि‍कलल रहति‍। हॉंइ-हॉंइ कऽ पेशाव कऽ लगमे दुनू गोटेक बीच आि‍व कहलखि‍न-वौआ, तीस बर्ख पहि‍लुका एकटा ि‍खस्‍सा कहै छि‍अह। ओहि‍ समए जुआने रही। मोछ-दाढ़ीक पम्‍ह अवि‍ते रहै। माइओ-बावू जीवि‍ते रहथि‍। एहि‍ना काति‍क मास रहै। तीन बजे करीब वेरू-पहर माथपर मोटरी नेने नाना हहाएल-फुहाएल ऐलाह। अबि‍तहि‍ माएकेँ कहलखि‍न-दाय, गंगा नहाइले जाइ छी। बहुत लोक गामक जाइत अछि‍। ओकरा सभकेँ कहने छि‍यै जे टीशनेपर भेटि‍ हेवह। तावे कनी हमहूँ सुसता लइ छी आ तोहूँ तैयार हुअ। खेवा-खरचा अछि‍ये तेँ कोनो ओरि‍यान करैक नहि‍ छह।
      नन्‍नाक बात सुनि‍ माए ठर्रा गेलि‍। एक दि‍न पहि‍ने गाए ि‍वआइल रहै। अइ सभमे माए बड़ सुति‍हार रहै। माइयक मनमे दू तरहक बात टकरा गेलइ। ओमहर गंगा नहाइले जाएव आ ऐम्‍हर जँ गाएकेँ ि‍कछु भऽ जाए। तहन तँ नअ मासक मेहनत डुबि‍ जाएत। दोसर होइ जे गौवॉं-घरूआकेँ छोड़ि‍ बावू ऐलाह। गाड़ि‍ये-सवारीक भीड़-भड़क्‍काक बात छी, जँ कही क्‍यो भेंट नहि‍ होइन, तहन ि‍क हेतनि‍। तेँ गुम्‍म रहै। तहि‍ बीच बावूओ आि‍ब गेलाह। गोड़ लागि‍ ओहो कातमे ठाढ़ भऽ गेलाह। ने माए ि‍कछु बाजै आ ने बाबू। नाना अपन बात बाजि‍ चुकल रहथि‍ तेँ ने ि‍कछु बजैत। तीनू गोटेकेँ चुप देखि‍ कहलएनि‍- नाना पएर धुअअ ने?”
  ओ कहलनि‍-नै-नै, पएर-तएर नै धुअब। टेनक टेम भेल जाइए। सामंजस्‍य करैत माए बाजलि‍-बौआ, छोड़ैबला कोनो ने छह। नन्‍ना संगे तोंही जाह।‍
      मन अपनो रहए मुदा बीचमे बाजब उचि‍त नहि‍ बुझि‍ चुप्‍पे रही। ओना भागवत सुनैकाल एकटा ि‍खस्‍सा सुनने रही जे गंगा तेहेन भारी धार अछि‍ जहि‍मे सौँसे दुनि‍यॉंक मनुक्‍खसँ लऽ कऽ चुट्टी-पि‍परी धरि‍ अटि‍ जाएत। तइओ पेट खालि‍ये रहत। सएह देखैक ि‍जज्ञासा रहए। नाना संगे ि‍वदा भेलौं। जखन गंगामे पैसि‍ दुनू गोटे नहाए लगलौं ि‍क कहलनि‍-नाति‍ मने-मन गंगाकेँ कहुन जे आइसँ झूठ-फूसि‍ नहि‍ बाजब।सएह कहि‍ डूब लेलौं। दू सालक बाद बावू मरि‍ गेलाह। घरक गारजन बनलौं। बावू मुइलाक पछाि‍त माइओ रोगा गेलि‍। मुदा काज करैक सभ लूरि‍ रहए तेँ कहि‍यो कोनो काजक अबूह नहि‍ लागए। अपन राजकाजमे सदति‍काल लागल रहैत छलौं। कहि‍यो झूठ बजैक जरूरते ने हुअए। दछि‍नवारि‍ टोलमे सरूप रहै। दस बीघा खेतो ओकरा रहै। मुदा रहए फुर्र-फॉंइ बला आदमी। ललबबुआ। भरि‍ दि‍न ऐम्‍हरसँ ओम्‍हर घूमल घुरै। ताश जे खेलए लगे तँ बारह-दू बजे राति‍ धरि‍ खेलते रहै। गामक लोककेँ टि‍क ओझरवैमे माहि‍र रहए। पर-पनचैतीमे तेहन पेेंच लगा दइ जे मारि‍-पीटि‍ भइये जाए। कोट-कचहरीक दलाल रहए। जहि‍सँ होइ तँ दस बीघा खेत रहि‍तो दुइयो मास घरसँ नै खाए। ने अपने कोनो काज करै आ ने खूँटापर बड़द रखने रहै। जे सभ झड़-झंझटमे फँसल रहए ओकरे सबहक बड़दसँ खेति‍ओ करै आ ओकरे सभसँ ठकि‍-फुसि‍या कऽ गुजरो करै। जेकरासँ जे चीज लइ ओकरा घुमा कऽ दइक नामो ने लि‍अए। एक दि‍न अपना ऐठाम आि‍ब कहलक-गणेश, सुनै छी तूँ चाउर बेचै छह?”
  हँ।
  एक मन चाउरक काज अछि‍।
  भऽ जाएत। ककरो पठा देवइ। नै ते अपने नेने जाएव तँ नेने जाउ।
चाउर तौला कऽ छोड़ि‍ देलक आ कहलक-तोरा तगेदा करैक जरूरत नहि‍ छह। जखने हाथमे रूपैया आओत तखने दऽ देवह।
  कहलि‍यै-बड़वढ़ि‍यॉं।छह मास बीति‍ गेल। ने तगेदा करि‍यै आ ने ि‍दअए। साल बीति‍ गेल। दोसर साल फेरि‍ ओहि‍ना केलक। तेसरो साल केलक। झुठ कोना बजि‍तौ जे चाउर नइ अछि‍। पाइयक दुआरे अपन काज खगैत रहै। काजकेँ बि‍थुत होइत देखि‍ मनमे आएल जे कमाइ छी हम आ खाइए ललबवुआ। ई तँ सोझा-सोझी गरदनि‍ कट्टी भऽ रहल अछि‍। ओह से नइ तँ आब कहत तँ गछबे ने करब। कहबै जे नइए। मुदा फेरि‍ मनमे उठल जे बीच गंगामे पैसि‍ संकल्‍प केने छी, झूठ कोना बाजब। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍ भऽ गेल। हारि‍ कऽ झूठ बजए लगलौं। मुदा एते जरूर करै छी जे जे झुठ्ठा अछि‍ ओकरा लग झूठ बजै छी आ जे झूठ बजनि‍हार नहि‍ अछि‍ ओकरा लग सत्‍य बजै छी। तेँ बौआ कहि‍ दइत छी जे अहॉं सभ जुआन-जहान छी सोचि‍-वि‍चारि‍ कऽ डेग उठाएव। जहि‍ना दुनि‍यॉं बड़ीटा छै, बड़ लोक छै, खेत-पथार धार-धुर, पहाड़-पठार, समुद्र इत्‍यादि‍ की कहॉं छै तहि‍ना मनुक्‍खो अछि‍। एक्‍के कुम्‍हारक बनाओल पनि‍पीवा घैल सेहो छी आ छुतहरो छी। मुदा देखैमे दुनू एक्‍के रंग होइए।




जीवन संघर्ष भाग- 2

अमावास्‍‍या दि‍न। आइये सॉंझमे ि‍दवाली आ ि‍नशांराति‍मे कालीपूजा हएत। अखन धरि‍क जे काजक उत्‍साह सभमे रहै ओ ठमकि‍ गेल। काजो आखि‍री रूपमे आि‍ब गेल। काजो ओरा गेल। जहि‍ना साल भरि‍क अध्‍ययनक आखि‍री दि‍न परीछा दि‍न होइत, तहि‍ना। काल्‍हि‍ धरि‍ काजक गति‍सँ चलैत रहल। जइ दि‍न जेहन काज तइ दि‍न तेहन रफ्तार। मुदा आइ तँ आखि‍री ि‍दन छी तेँ काजक उनटा ि‍गनती कऽ लेब जरूरी अछि‍। हो न हो ि‍कछु छुि‍ट गेल हुअए। जँ छुि‍ट गेल हएत तँ पूजामे ि‍बध्‍न-बाधा पड़त। तहि‍ दुआरे पूजा समि‍ति‍क बैसार सबेर साते बजे बजौल गेल।
      आठे दि‍नमे गामक चुहचुहि‍ये बदलि‍ गेल। जहि‍ना हरोथ बॉंसक जड़ि‍ अधि‍क मोट रहि‍तहुँ बीचमे भुर कम होइत मुदा आगू आेहि‍सँ पात- रहनहुँ भूर बेसी होइत तहि‍ना बँसपुरोमे बुि‍झ पड़ैत। जखन पूजाक दि‍न आगू छल तखन काज बेसी आ जखन लग आएल तँ कमि‍ गेल। काल्‍हि‍येसँ गामक धी-बहीनि‍ आबि‍ रहल अछि‍। ओना गामक सभ अपन-अपन कुटुमकेँ हकार देने, मुदा अबैमे दि‍वाली बाधक बनल छलै। दि‍वाली दि‍न घरमे नहि‍ रहने भूतक बसेराक डर सबहक मनमे नचैत। जहि‍सँ आगू आरो पहपटि‍ हएत। तेँ गामक जे धी-बहीनि‍ असकरूआ छलि‍ ओ भरदुति‍या ठेकना कऽ दि‍वालीक परात आओत। मुदा जेकरा घरमे दि‍यादनी वा सासु अछि‍ ओ ि‍कअए ने एक ि‍दन पहि‍ने आओत। नैहर छि‍यै ने। कते दि‍न माए-बाप, भाए-भौजाइ आ गामक सखी-सहेलीसँ भेंट भेना भऽ गेल छैक। तहूँमे जेकर नैहरक परि‍वार जेरगर छै ओ तँ साले-साल वा सालमे दुइओ-तीनि‍ बेरि‍ आि‍ब जाइत अछि‍ मुदा, जेकर परि‍वार छोट छै, जइमे कम काज होइ छै, ओ तँ दस-दस सालसँ नैहरक मुँह-ऑंखि‍ नै देखलक। गामक सौभाग्‍य जे काली-पूजा शुरू भेल। मुदा एकटा अजगुत बात भऽ गेलै। गामक धी-बहीनि‍सँ बेसी गामक सारि‍-सरहोजि‍ आबि‍ गेलै। गाममे बेसी साइर-सरहोजि‍ ऐलासँ गामक चकचकि‍ये बढ़ि‍ गेल। जइसँ छौड़ा-मारड़ि‍सँ लऽ कऽ बूढ़-पुरानक मुँहमे चौवन्‍नि‍यॉं मुस्‍की आि‍ब गेल। तहूँमे परदेशि‍या साइर-सरहोजि‍ आि‍ब कऽ तँ आरो रंग बदलि‍ देलक।
      दुखक दि‍न गौँआक कटि‍ गेल। सुखक दि‍न आि‍ब रहल अछि‍। ि‍कऐक तँ आठ दि‍न जे बीतल अो ओहन बीतल जे ने ककरो खाइक ठेकान रहै आ ने सुतैक। मुदा, आब तँ सभ पाहुन-परकक संग अपनो पहुनाइये करत। मरदक कोन बात जे जनि‍जाति‍यो खुशी जे भनसि‍या आि‍ब गेल। नीक-नि‍कुत खेनाइ, दि‍न-राति‍ तमाशा देखनाइ, अइसँ सुखक दि‍न केहेन हएत। तहूसँ बेसी खुशी ई जे भरि‍ मेला ने ककरो पैंइच-उधार करए पड़तै आ ने दोकान-दौरीक झंझट रहतै। ि‍कएक तँ दू ि‍दन पहि‍ने सभ अपन-अपन काज सम्‍हारि‍ नेने छल। महाजनोक बही-खाता बन्‍न रहत। मुदा, दि‍वालीक बोहनि‍क दुख महाजनक मनकेँ जरूर कचोटइ। कतबो रेड़गड़ मेला ि‍कअए ने होउ मुदा, दूध-दही, माछ-माउसक अभाव नै हएत। पॉंच दि‍न पहि‍नहि‍ सुधा दूधक एजेन्‍ट आ माछ-माउसक व्‍यापारीकेँ एडभांस दऽ देने अि‍छ। तहूमे काली-पूजा छी। ि‍बना बलि‍-प्रदाने पूजाे कोना हएत। बँसपुराक जनि‍जाति‍यो तँ ओते अनाड़ी नहि‍ये अि‍छ जे जोड़ा छागर कबुला नहि‍ केने होथि‍। पहि‍ल साल पूजाक छी। ि‍बना नव बस्‍त्र पहि‍रने पूजा कोना कएल जाएत आ धि‍या-पूजा मेला कना देखत? जँ से नइ हएत तँ ि‍क देवीक अपमान नहि‍ हेतनि‍।
      जइ जगहपर काली मंडप बनल ओइ ि‍ठमक आठे-दस कट्ठाक परती। सेहो आम जमीन। जइसँ एकपेरि‍यासँ लऽ कऽ खुरपेरि‍या लगा सौँसे परती रस्‍ते बनल। ओइ परतीक पछि‍म-उत्तर कोनमे लोक फुटल-फाटल माटि‍योक बरतन आ परसौतीक कपड़ो-लत्ता फेकैत। पूब-उत्तर कोनमे ि‍धया-पूजा झाड़ा फि‍रैत। दछि‍न-पछि‍म भागमे घसबाह सभ घास-घास खेलाइ दुआरे कतेको खाधि‍ खुनने आ दछि‍न-पूब कोनमे कबड्डी आ गुड़ी-गुड़ीक चेन्‍ह दऽ घर बनौने। काली-पूजाक आगमनसँ सौँसे परती छीलि‍-छालि‍ एक रंग बना देलक। जहि‍ तरहक मेलाक आयोजन भऽ रहल अछि‍ ओहि‍ ि‍हसावसँ जगहो छुछुन लगैत। मुदा रौदि‍याह समए भेने परतीक चारू भागक खेतक धान मरहन्‍ना भऽ गेलै, जेकरा काटि‍-काटि‍ सभ अगते माल-जालकेँ खुआ नेने छलै। तेँ मेलाक लेल जगहक कमी नै रहल। पनरह बि‍घासँ उपरे खेतक आि‍ड़-मेि‍ड़ तोि‍ड़ चट्टान बना देलक। अगर जँ से नइ बनौल जाइत तँ मुजफ्फरपुरक ओहन नाटकक अँटावेश कोना हएत? ि‍कएक तँ जइ पार्टीमे बाजा बजौनि‍हारसँ लऽ कऽ स्‍त्री पाट खेलेनि‍हारि‍ धरि‍ मौि‍गये संगीतकार आ कलाकार अछि‍। परोपट्टाक लोक उनटि‍ कऽ नाटक देखए लेल आउत। तेँ कमसँ कम पॉंच बीघाक फील्‍ड देखि‍नि‍हार लेल चाहबे करी। से तँ भइये गेल। तइपर सँ वृन्‍दावनक रास सेहो अछि‍। नाटकसँ कनि‍यो कम नै। एकपर एक कलाकार अछि‍। मोट-मोट, थुल-थुल देह, हाथ-हाथ भरि‍क दाढ़ी-केश लऽ लऽ पार्टो खेलत आ नचबो करत। तेँ देखि‍नि‍हारोक कमी नहि‍ये रहत। मेल-फि‍मेल कौव्‍वालीक संग महि‍सोथाक मलि‍नि‍यॉं नाच सेहो अछि‍। एकपर एक चारू। ि‍कअए ने धमगज्‍जर मेला लागत। पूजा-समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे खुशी होइत मुदा, एकटा शंका सबहक मनमे रहबे करै। ओ ई जे एत्ते भारी मेलाकेँ सम्‍हारल कोना जाए? कतबो गौँवा जी-जान लगौत तइओ लफुआ छौँड़ा सभ छअ-पॉंच करवे करत। पौकेटमारो हाथ ससारबे करत। मुदा, की हेतै, मेला-ठेलामे कनी-मनी ई सभ होइते छै। केकरा के देखत आ ककर के सुनत। तहूमे रौतुका मसीम रहत की ने?
      दोकानो-दौरीक आयोजन सेहो बेजाए नहि‍। दुनू ढंगक दोकान। पुरनो आ नवको। नवका समानक लेल न्‍यू मार्केट एक भाग आ दोसर भाग पुरना बजार बैसल। ओना अखन धरि‍ दोकान-दौरी नीक-नहॉंति‍ नहि‍ जमल अछि‍ मुदा बेर टगैत सभ बनि‍ जाएत।
      न्‍यू मार्केटक चाक्-चि‍क्‍य दोसरे ढंगक अछि‍ जइमे ि‍बनुदेखलेहे समान बेसी रहत। दोकानदारो सभ बहरबैये रहत। ऐहन-ऐहन सुन्‍नर चूड़ी एहि‍ इलाका लोक देखनौ हएत ि‍क नहि‍ तेहन-तेहन चूड़ीक दोकान सभ आि‍ब गेल अछि‍। देखि‍नि‍हारोकेँ ऑंखि‍ उठि‍ जाएत। ि‍कअए ने उठत? एते दि‍न देखैत छल जे चूड़ी स्‍त्रीगणे बेचै छलि‍ अइबेरि‍ देखत जे पुरूखो बेचैए। तइमे तेहन-तेहन फोटो सभ दोकानक भीतरो आ बाहरो लगौने अछि‍ जे अनेरे आगूमे भीड़ लागल रहत। असली मनुक्‍ख छी आि‍क नकली से सभ थोड़े बुझत। फोटोए टा नहि‍ गीतो गबैबला तेहन-तेहन साउण्‍ड-बक्‍स सभ सजौने अि‍छ जे सभ ि‍कछु ि‍बस‍रि‍ जाएत। चूड़ी बजारक बगलेमे चेस्‍टरक दोकान लगल अछि‍। चूड़ी बजारसँ कम थोड़े ओहो बेपारी सभ सजौने अछि‍। काल्‍हि‍येसँ ऐहन-ऐहन प्रचारक मशीन सभ लगौने अछि‍ जे ि‍कयो थोड़े परखि‍ लेत जे आदमीक मुँह बजै छै ि‍क मशीन। परचारो ि‍क हरही-सुरही छै। समानक संग-संग पहि‍रैक लूरि‍ सेहो ि‍सखबैत अछि‍। धन्‍यवाद ओि‍ह बनौनि‍हारकेँ दी जे हाथी सन-सन मोट देहसँ लऽ कऽ खि‍रकि‍ट्टी देह धरि‍मे एक्‍के रंगक चेस्‍टरसँ काज चलि‍ जाएत। तहूमे तेहन डि‍जेनगर सभ अछि‍ जे एकटा छोड़ि‍ दोसर पसन्‍दो करैक जरूरत नहि‍ पड़त। जेकरा पाइ छै ओकरा एकटासँ मन भरत ओ तँ गेटक गेट कीनत। ि‍बल्‍कुल औटोमेटि‍क। दामो कोनो बेसी नहि‍ये रखने अछि‍ जे समानक बि‍क्री कम होतै। मात्र एगारहे रूपैया। बेपारि‍यो सभ तेहन ओसताज अछि‍ जे पहि‍ने पता लगा समान डि‍क देने अछि‍।
      चेस्‍टरक दोकानक बगलेमे खेलौनाक बजार अछि‍। वाह रे खेलौना बनौनि‍हार आ पँूजी लगा व्‍यापार केनि‍हार। दस रूपैयासँ लऽ कऽ हजार धरि‍क। बन्‍दूक, तोप, रौकेट, हवाइ जहाजक संग बम साइजि‍क खेलौना सभसँ दोकान भरने अछि‍। देखैमे असलि‍ये बुि‍झ पड़त मुदा, अछि‍ नकली। अोना असलेहे जेकॉं गोलि‍यो छुटैत, अवाजो होइत आ उड़बो करैत अछि‍।
      तीनि‍टा दाढ़ी केश बनवैबला बम्‍बैया शैलून सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तीनूमे महि‍ले कारीगर। मरदे जेकॉं अपन रूप बनौने। मुदा, मरदोसँ बेसी फुरति‍गरो आ बजबोमे चंगला। दाढ़ी कटबैकाल बुझि‍ये ने पड़त जे उनटा हाथ पड़ैए आि‍क सुनटा। हाथो मरदे जेकॉं मुदा, कने गुलगुल बेसी। शैलूनक बगलेमे साड़ीक बाजार। साि‍ड़यो सभ अजबे टँगने अछि‍। पुरजीमे रेशमी लि‍खि‍-लि‍खि‍ सटने मुदा, पटुआ जेकॉं छल-छल करैत अछि‍। कतौ ओचि‍ला नहि‍, एकदम पलीन। तेहन-तेहन पटोर सभ रखने अछि‍ जे बुझबे ने करबै ई भगलपुरि‍या रेशम छी ि‍क पटुआक। प्‍लास्‍टि‍कक मनुक्‍ख बना तेहन सजौने अछि‍ जे बुझि‍ पड़त ऑंखि‍क इशारासँ दोकान अबैले कहैए।
      राम-हि‍लोरा, मौतक कुऑं, हेलि‍केप्‍टर, हवाइ-जहाज, रेलगाड़ी, ि‍दल्‍लीक चौकक चरि‍ पहि‍या, छह पहि‍या गाड़ीक दौि‍ड़-बरहा सभ अछि‍। मुदा, जखन न्‍यू मार्केट घुमि‍ये लेलौं तँ पुरनो बजार घुमि‍ये लि‍अ। क्‍यो छपड़ीक दोकान बनौने तँ ि‍कयो फट्ठाक खूँटापर बातीक कोरो बना प्‍लास्‍टि‍क दऽ घर बनौने अछि‍। ि‍कयो ि‍तरपाल टँगने अछि‍ तँ ि‍कयो ओहि‍ना घैला-डाबा इत्‍यादि‍ माटि‍क बरतन पसारने अछि‍। दोकानदारो सभ सुच्‍चा ग्रामीण। ऐँ ई तँ ि‍चन्‍हरबे दोकानदार सभ छी। पहि‍लुके दोकान झुनझुनाबला बुढ़बाक छी। चालि‍सो बर्ख उपरेसँ झुनझुना बेचैए। आब तँ बुढ़हा गेल। दुनू परानी दुनू दि‍शि‍ बैसि‍ ताड़क पत्ता झुनझुनाे बना रहल अछि‍ आ खजुरक पातक पटि‍या, बीअनि‍ सेहो सजौने अछि‍। तोरा तँ कनी कऽ चि‍न्‍है छि‍यह हौ झुनझुनाबला।
  बौआ चसमा लगौने छी तेँ धकचुकाए छह। पहि‍ने चसमा नै लगवै छलौं। ऑंखि‍यो नीक छलए। दू साल पहि‍ने ऑंखि‍ खराब भऽ गेल। तेँ अहीबेर लहानमे ऑंखि‍ बनेलौं।
      मुदा, झुनझुनावाली परेखि‍ कऽ बाजलि‍-बौआ सोनमा रौ। जहि‍यासँ परदेश खटै लगलेँ तहि‍यासे नै देखलि‍यौ। तूँ हमरा चि‍न्‍है छेँ?”
  नै।
तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्‍केठीन अछि‍। अंगने-अंगने झुनझुनो आ बि‍अनि‍यो पटि‍या बेचै छी। अहीसे गुजर करै छी। आब तँ भगवान सब ि‍कछु दए देलनि‍। दूटा बेटा-पुतोहू अछि‍। सातटा पोता-पोती अछि‍। दुनू बेटा घर जोड़ैया (राज ि‍मस्‍त्री) करैए। खूब कमाइए आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा, दुनू परानी तँ ि‍जनगी भरि‍ यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना दुनू भॉंइ मनाहि‍यो करैए। मगर हाथपर हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लागत। तेँ जावे जीवै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्‍चेसँ बहि‍ना लागल अछि‍। जहि‍या तोरा घर दि‍स जाइ छी तहि‍या ि‍बना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि‍ दि‍हैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि‍। तोरा कइअ टा बच्‍चा छौ?”
  एक्‍केटा अछि‍।
  एकटा झुनझुना बौआले नेने जाही।
  ओहि‍ना नै लेबौ मौसी। अखैन हमरो संगमे पाइ नै अछि‍ आ तोहूँ दोकान लगैब‍ते‍ छेँ। ि‍बकरी बट्टा थोड़े भेलि‍ हेतौ।
  रओ बोहनि‍क सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बि‍द करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइले बोहैनक काज अछि‍।
      दोसर दोकान रमेसराक लोहोक समान आ लकड़ि‍योक समानक अछि‍। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्‍कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्‍चा सभक तीन पहि‍या गाड़ीक दोकान लगौने अछि‍। असकरे रमेसरा समान पसारि‍ खूँटामे ओङठि‍, टॉंग पसारि‍ बीड़ी पीवैत अछि‍।
      रमेसरा रौ। सुनने रहि‍यौ जे तोहूँ दि‍ल्‍ली धए लेलेँ।
  धुड़ बूि‍ड़, दि‍ल्‍ली हौआ ि‍छयै। जहि‍ना लोक कहै छै ने जे ि‍दल्‍लीक लडू जेहो खाइए सेहो पचताइए आ जे नै खेलक सेहो पचताइए। ि‍दल्‍लीसेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेि‍डयो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछाही कटए लगल। गामपर ककरो कहवो ने केलियै आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क -बरही- ऐठाम नोकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपैया महीना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटी तँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ ऐलौं। जहि‍या सुनलि‍यै जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पॉंच हजारक समान अछि‍। कोनो ि‍क सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझ पड़ै छौ जे ि‍दल्‍लीमे हुंडी गारल अछि‍। हम तँ एक्‍के मासमे बुझ गेलि‍यै। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछ तखन अनकर तबेदारी ि‍कअए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ ि‍कअए ने रहब। तू सभ ने अनके कोठा आ सम्‍पत्ति‍ कऽ अपन बुझै छीही। मुदा, ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लूटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।
  ई तँ रौदि‍या भैयाक चाहक दोकान बुझि‍ पड़ैए। अपने दोकान खोललह भैया?”
  हँ, बौआ। गामक मेला छी। एकर भीड़-कुभीड़ तँ गौँऐपर ने पड़त। ओहि‍ना जे टहलैत-बुलैत रहि‍तौं, तइसँ नीक ने जे दू पाइ कमाइयो लेब आ मेलाक ओगरबाहि‍यो करब।
  बेस केलह। बरतन-वासन अपने छेलह?”
  नहि‍। रघुनाथ लग बजलौं तँ वएह अपन पुरना सभ समान देलक।
  रघुनाथक दोकान तँ बड़ स्‍टेनडर भऽ गेलै।
  चाहे दोकानक परसादे तीनि‍टा बेटि‍ओक ि‍वआह केलक आ ईंटाक घरो बना लेलक।
  वाह बड्ड सुन्‍दर, बर बेस।
कते छोटका दोकानदार छपड़ि‍यो ने बनौने। काति‍क मास रहने ने वेसी गरमी आ ने वेसी जाड़। तहन ि‍कअए अनेरे बॉंस-बत्ती कीनि‍ घर बनौत। दूटा बॉंसक खूँटा गाड़ि‍ उपर बल्‍ला दऽ देत। ओहि‍पर केराक घौर टॉंगि‍ बेचत। कचड़ी पापड़ फोफी लेल माटि‍येमे चुल्‍हि‍ खुनि‍ लोहि‍या चढ़ा बनौत। मुरही पथि‍येमे रखि‍ ि‍डब्‍बासँ नापि‍-नापि‍ बेचत। झि‍ल्‍ली बनवैक सॉंचा तँ सभकेँ रहि‍तो ने छै, जे बनौत।
      झंझारपुरक आ मधेपुरक दस-बारहटा दोकानदार आि‍ब कऽ मेलाक चुहचुहि‍ये बदलि‍ देलक। गहि‍ि‍कयो ि‍चन्‍हरवे आ दोकानदारो सएह। तेँ सभसँ नीक कमाइ ओकरे सभकेँ हएत। नगद-उधार सभ चलतै। एक पॉंतीसँ सभ दोकान बना रहल अछि‍।
      पि‍तोझि‍या गाछ लग के झगड़ा करैए। कनी ओकरो देखि‍ लि‍अए। अरे ई तँ दुनू परानी ढोलबा छी।ऐना ि‍कअए ढोल भाय अि‍बते-अबि‍ते ढोल जेकॉं दुनू परानी ढवढ़बाइ छह?”
अवाज दाबि‍ ढोलबा बाजल-हौ भाय, देखहक ने अइ मौि‍गयाकेँ, मेलासे जेकरा जे हानि‍-लाभ होउ मुदा हमरा ते सीजि‍न पकड़ाएल अछि‍। आगूमे छठि‍ अछि‍। परोपट्टाक लोक ते कोनि‍यॉं, सूप, छि‍ट्टा, डगरी कीनबे करत। अोइ हि‍सावसे ने समान बनवैत। से कहैए जे तीसे गो छि‍ट्टा-पथि‍या ि‍मला कऽ अछि‍। अट्ठारह गो सूप आ गोर पचासे कोनि‍यॉं अछि‍। ऊँटक मुँहमे जीरक फोरनसे काज चलत?”
  अइ ले झगड़ा ि‍कअए करै छह? फेरि‍ लऽ अनि‍हह।
ढोलबा कने गम खेलक मुदा, झपटि‍ कऽ तेतरी बाजलि‍-अइ मरदावाकेँ एक्‍को ि‍मसि‍या बुइध छै। एतनो ने बुझैए जे आठे दि‍नमे कते बनवि‍तौ। दूटा ढेनमा-ढेनमी अछि‍ ओकरो सम्‍हारए पड़ैए। ई तँ भरि‍ दि‍न बॉंस, बत्ती, कैमचीक जोगारमे रहैए। कोनो ि‍क बजारक सौदा छि‍यै जे रूपि‍या नेने जाइतौं आ कीनि‍ अनि‍तौं।
  ढोलबा-तूँ नै देखै छीही जे महि‍नामे पनरह दि‍न, काजक दुआरे नहेबो ने करै छी। तोँही छातीपर हाथ राखि‍ बाज जे एक्‍को दि‍न टटका भात-तीमन खाइ छी। डेढ़ बजे दू बजे हकासल-पि‍यासल बॉंस आनै छी, तखन गोटे दि‍न नहाइ छी ने तँ नहि‍ये नहाइ छी। धड़-फड़ा कऽ खाइ छी आ काजेमे लगि‍ जाइ छी। नि‍चेनसँ बीड़ीयो-तमाकुल नइ खाए-पीबए लगै छी। खा कऽ अराम केकरा कहै छै से तँ दि‍नकेँ सि‍हि‍नते लागल रहैए। तूँ की बुझबीही जे बॉंस टोनै, फाड़ै, गादि‍ लइमे कते भीर होइ छै। बैसल-बैसल बानि‍ चलबै छै तँ बुझि‍ पड़ै छौ एहि‍ना होइ छै। ई थोड़े बुझै छीही जे उठ-बैठ करैत-करैत जॉंघ चढ़ि‍ जाइए। अइसे हल्‍लुक सए बेरि‍ डंड-बैठकी करब होइ छै। एते काज केला बाद जा कऽ बैसारी काज अबैए। बैसि‍यो कऽ कारा-कैमची बनैबते छी। गुन अछि‍ जे ताड़ी पीबै छी तेँ मन असथि‍र रहैए। मूड फरेस रहैए। तेँ ने कोनो काज उनटा-पुनटा होइए। ने तँ केकर मजाल छि‍यै जे एक्‍के दि‍नमे एते रंगक काज सरि‍या कऽ कए लेत। अच्‍छा हो, दोकान लगा। दोकान की लगेमे, कोनि‍यॉंकेँ तीनि‍ मेल बना ले। डगरी, सूप तँ एक्‍के रंग छौ आ छि‍ट्टाकेँ दू मेल बड़का एक भाग छोटका एक भाग कऽ के लगा ले। पॉंच गो रूपैया दे कनी ताड़ी पीने अबै छी।
  अखैन रौद चरहन्‍त छै। अखैन जे ताड़ी पीबैले पाइ देवह से ि‍क हमरा गारि‍ सुनैक मन अछि‍।
  ऑंइ गै मौगि‍या, तोरा बजैत एक्को पाइ लाज नै होइ छौ जे पुरूख रहि‍तो घरक भार सुमझा देने ि‍छयौ। संगीयो-साथी सदति‍ काल ि‍कचाड़ैए।
  अच्‍छा रूपैया दइ छि‍य, मुदा फेरि‍ बेरू पहर नै मंगि‍हह। जाइ छह ते जा मुदा झब दऽ अबि‍हह। मेला-ठेला ि‍छयै असकरे हम दोकान चलाएब ि‍क बेदरा-बुदरी सम्‍हारब।
  से ि‍क हम नै बुझै छि‍यै, मुदा दसटा दोस-महि‍म अछि‍। अगर भेंट-घॉंट भऽ जाएत ते ि‍क कुशलो-क्षेम नै करब।
     
      बँसपुराक लड़कीक संग जे दुरबेबहार सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे भेल ओहि‍ घटनाक समाचार तरे-तर चारू भरक गाममे पसरि‍ गेल छल। जेकर टीका-टीपनी गामे-गाम होइत छल। मुदा, एक रूपमे नहि‍। अधि‍कतर लोक एि‍ह घटनाकेँ ि‍नन्‍दा करैत तँ कमतर मनोरंजन कहैत। ि‍कछु गोटे फैशन बुझि‍ पाछुसँ अबैत बेबहार मानि‍ बजवे ने करैत। मगर सभ ि‍कछु होइतो ि‍ससौनीबला बँसपुराबलासँ सहमल। ऐहन घटना आगू नहि‍ हुअए तहि‍ लेल सि‍सौनीक बुद्धि‍जीवी सबहक मनमे खलबली मचि‍ गेल। ि‍ससौनि‍एक दयानन्‍द दरभंगा कओलेजमे प्रोफेसरी करैत छथि‍। गामक लोक तँ हुनका एकटा नोकरि‍हरा बुझैत छन्‍हि‍, मुदा, कओलेजमे छात्रोक बीच आ ि‍शक्षकोक बीच प्रति‍ष्‍ठि‍त व्‍यक्‍ति‍ बुझल जाइत छथि‍। अइबेर ओ दुर्गा-पूजामे गाम नहि‍ आि‍ब संगीक संग रामेश्‍वरम् चलि‍ गेल छलाह। मुदा, बालो-बच्‍चा आ पत्‍नि‍यो गाम आइल रहनि‍। वएह सभ रामेश्‍वरम् सँ एलापर घटनाक जानकारी देलकनि‍। घटना सुनि‍ प्रोफेसर दयानन्‍द मने-मन जरि‍ गेलाह। गुम्‍म-सुम्‍म भऽ सोचए लगलथि‍ जे ई कोन तमाशा भऽ गेल जे धरमक काजक दौर ऐहन अधर्म भऽ गेल। कोना लोकक मनमे धरमक प्रति‍ आदर रहत। धर्मस्‍थलमे जँ ऐहन-ऐहन वृत्ति‍ होयत तँ कैक दि‍न ओ स्‍थल जीवि‍त रहत? कोना ककरो माए-बहीनि‍ कोनो घरसँ नि‍कलि‍ देबस्‍थान पूजा करए वा सॉंझ दि‍अए आओत। जते घटनाकेँ टोब-टाब करति‍ तते पैघ-पैघ प्रश्‍न मनकेँ हौड़ए लगलनि‍। मुदा, जे समए ससरि‍ गेल ओ उनटि‍यो तँ नहि‍ सकैत अछि‍। कोन मुँहे ओहि‍ गाम पएर देब। लोक की कहत? ओहू गामक (बँसपुराक) तँ अनेको वि‍द्यार्थी पढ़बो करैत अछि‍ आ पढ़ि‍ कऽ नि‍कललो अछि‍। ओ सभ की कहैत हएत। मुदा, आगू ऐहन घटना नहि‍ हुअए तेकर तँ प्रति‍कार कएल जा सकैत अछि‍। पाप तँ प्राश्‍चि‍तेसँ कटैत अछि‍। तहूमे अगुरबारे बँसपुरासँ काली-पूजाक हकार-कार्ड सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तत्-मत् करैत मनमे एलनि‍ जे एकटा बेंग मरलासँ लोक इनारक पानि‍ पीि‍व तँ नहि‍ छोड़ि‍ दैत अछि‍। ओकरा नि‍कालि‍ गंधकेँ मेटबैक उपाइ करैत अछि‍। बँसपुराक काली-पूजाक आरंभ सेहो सि‍सौनि‍एक घटनाक प्रति‍क्रि‍या स्‍वरूप भऽ रहल अछि‍। हो न हो ऐकरे जबावमे ओहो सभ ने घटना दोहरा दि‍अए?
      काली-पूजा शुरू होइसँ तीन ि‍दन पहि‍ने प्रो. दयानन्‍द गाम आि‍ब, बि‍ना कोनो मान-रोख केने गामक पढ़ल-लि‍खल उमरदार सभसँ सम्‍पर्क कए कहलखि‍न। ि‍कछु गोटे गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझबो करैत छलाह आ ि‍कछु गोटे बुझौलासँ बुझलनि‍। बुझला बाद एकमुँहरी सभ गाममे बैसार कए एकर नि‍राकरण करैक ि‍वचार व्‍यक्‍त केलकनि‍। दयानन्‍दक मनमे आगू डेग बढ़बैक साहस जगलनि‍। साहस जगि‍तहि‍ कओलेजक ि‍वद्यार्थी सभकेँ बैसार करैक भार देलखि‍न। दू ि‍दन समए बीति‍ गेल। जइ ि‍दन काली-पूजा शुरू होएत तहि‍ ि‍दन भोरे सात बजे बैसार भेल।
      सात बजेसँ पहि‍नहि‍ दुर्गेस्‍थानमे सभ एकत्रि‍त भेलाह। बैचारि‍क रूपमे गाम दू फॉंक जेकॉं भऽ गेल। तेँ अपन-अपन ि‍वचारकेँ मजबूत बनबैक ि‍वचार सभक मनमे। तीनू कार्यकर्ताक -जे सभ घटनामे शामि‍ल रहए- पि‍ता बैसारमे नहि‍ आएल। नहि‍ अबैक कारण ि‍वरोध नहि‍ लाज होय। तहूमे जखनसँ प्रो. दयानन्‍द दरभंगासँ आि‍ब घटनाक चर्चा चलौलनि‍ तखनेसँ मुँह नुकबए लगल। मुदा, मौलाइल घटना पुन: पोनगि‍ गेल। ओना गामक एक ग्रुप, जेकरा कुकर्मी ग्रुप कहि‍ सकै छि‍यै, बल प्रयोगक योजना तरे-तर बनौने रहै। जहि‍सँ कोनो रस्‍ते ने गाममे खुजतै। मुदा, गामक ि‍वशाल समूहक, जे अधला काजसँ घृणा करैत, एक रंगाह ि‍वचार। एक तरहक ि‍वचारक पाछु कते तरहक सोच अछि‍। ि‍कछु गोटेक सोच जे गाममे एकटा कुकर्मी समाज अछि‍ जे सदति‍काल ि‍कछु नहि‍ ि‍कछु करि‍ते रहैत अछि‍। परोछा-परोछी तँ एक-दोसरकेँ गाि‍र पढ़ैत अछि‍ मगर, बेर ऐलापर सभ एक मुहरी भऽ जाइत अछि‍। तेँ घटना ओहन अस्‍त्र छि‍यै जहि‍सँ ओि‍ह समाजकेँ काटि‍-काटि‍ लति‍औल जा सकैत अछि‍। ि‍कछु गोटेक वि‍चार जे जहि‍ना तीनू गोरे दसगरदा जगहपर जुल्‍म केलक तहि‍ना समाजक बीच लति‍औल जाए। ि‍कछु गोटेक ि‍वचार जे हम सभ मनुष्‍यक समाजमे रहै छी नहि‍ ि‍क जानवरक समाजमे। तेँ मनुष्‍यक समाज बने। भलेहीं मनुष्‍यक समाज बनबैक जे प्रक्रि‍या होइत अछि‍ ओि‍ह प्रक्रि‍याकेँ क्रि‍यान्‍वि‍त कएल जाए। ललबाक ि‍वचार सभसँ भि‍न्‍न। ि‍कएक तँ जहि‍ लड़कीक संग दुरबेबहार भेल छलै ओ ओकर ममि‍औत बहीन। ललबा कलकत्तामे ड्रइबरी करैत अछि‍। दुर्गापूजामे गाम आएल रहै। जहि‍ दि‍न घटना भेल ओइ दि‍न ओ बुझबे ने केलक। जखैनसँ बुझलक तखैनसँ देहमे आि‍ग लगि‍ गेलै। मनै-मन योजना बना नेने रहए जे धनि‍कक टेरही कोना झाड़ल जाइ छै से समाजकेँ देखा देब। नीक मौका हाथ लागल हेन। मुदा, मनमे इहो शंका होय जे दयानन्‍द कक्‍काक आयोजन छि‍यनि‍ जँ कहीं आगूमे आि‍ब जेताह तँ सभ वि‍चार चौपट भऽ जाएत। सोचैत-ि‍वचारैत तइँ केलक जे चाहे जे होय मुदा, ि‍बना जुत्ति‍यौने नहि‍ छोड़ब। भलेहीं जि‍नगी भरि‍ जहलेमे ि‍कअए ने रहै पड़ै।
      गामक सभ टोलक लोक, गोटि‍-पंगरा छोड़ि‍, बैसारमे आइल। प्रो. दयानन्‍द उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ कहए लगलखि‍न-अइ बेरक दुर्गा-पूजामे जे घटना गाममे घटल ओ समाजक लेल बड़का कलंक छी। एहि‍ घटनाकेँ जत्ते ि‍नन्‍दा कएल जाए ओते कम होयत। कते गोटे बुझैत हेबइ जे अनगौँवा लड़की छल मुदा, ई बुझब हमरा सबहक पलायनवादी ि‍वचार हएत। जइसँ रंग-वि‍रंगक अधलासँ अधला घटना होइत रहत आ हम सभ मुँह तकैत रहब। तेँ ऐहन-ऐहन घटनाकेँ रोकए पड़त।
  ि‍वचहि‍मे जे ग्रुप हंगामा करए चाहैत छल उठि‍-उठि‍ हल्‍ला करए लगल। हल्‍ला देखि‍ सभ उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ ि‍वरोध करए लगल। ललबा प्रो. दयानन्‍द दि‍शि‍ तकलक। दयानन्‍दक मुँहक रूखि‍ तँ नहि‍ बदलल मुदा, नोरसँ ऑंखि‍, करि‍या मेघ जेकॉं, लटकि‍ कऽ ि‍नच्‍चॉं मुँहे जरूर भऽ गेल छलनि‍। ि‍बजलोका जेकॉं ललबा चमकि‍ कऽ फॉंइट चलबए लगल। तीनूकेँ असकरे ललबा मारि‍ कऽ खसा देलक। जाबे सभ शान्‍त भेल ताबे तँ तीनूक गाल-मुँह फुइल गेल मुदा, तइयो ललबाक गरमी कमल नहि‍। जहि‍ना खून केनि‍हारकेँ आरो खून करैक गरमी खूनमे आि‍ब जाइत अछि‍ तहि‍ना ललबोकेँ भेल। मुदा, चारू दि‍ससँ सभ पकड़ि‍ ललबाकेँ घि‍चने-ि‍घचने कात लऽ गेल। दुनू हाथ पकड़ि‍ दयाबाबू फुसफुसा कऽ कहलखि‍न-अगर समाजमे एक्‍कोटा बेटा अन्‍यायक ि‍खलाफ अपनाकेँ उत्‍सर्ग कऽ देत तँ सैकड़ो बेटा धरतीमाता गोदमे पैदा भऽ जाएत। मन थीर करह। ओना समाजक सभ तरहक समस्‍याक समाधान खाली मारि‍ये टा सँ नहि‍ होएत आ ने केवल पनचैति‍येसँ हएत। ि‍कएक तँ समस्‍या दू तरहक होइत अछि‍ पहि‍ल घटना वि‍शेष परि‍स्‍थि‍तिक‍ होइत जबकि‍ दोसर सत्ता-वि‍शेष वा व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक होइत अछि‍। अखुनका जे समस्‍या अछि‍ ओ व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक छी तेँ ऐहन समस्‍याकेँ बलेसँ रोकल जा सकैत अछि‍। नहि‍ तँ कोनो नहि‍ कोनो रूपमे चलि‍ते रहत, मरत नहि‍।
  प्रोफेसर दयानन्‍दक ि‍वचार सुि‍न ललबा बाजल-कक्‍का, अहॉं लग ि‍कछु बजैत संकोच होइए मुदा, आइ तीनूक खून पीवि‍ ि‍लति‍ऐक। भलेहीं ि‍जनगी भरि‍ जहले कि‍अए ने कटि‍तौं। फॉंसि‍येपर ि‍कअए ने चढ़ि‍तौं। की लऽ कऽ एलौं आ ि‍क लऽ कऽ जाएब। जखन मरनाइ अि‍छये तँ लड़ि‍ कऽ ि‍कअए ने मरब जे सड़ि‍ कऽ मरब।
ललबाक बात सुनि‍ मुस्‍कुराइत प्रो. दयानन्‍द कहलखि‍न-अल्‍होमे लोक गवैत अछि‍ रनमे मरे दोख नहि‍ लागे। तहि‍ना महाभारतमे व्‍यासोबाबा कहने छथि‍न जे इन्‍द्रासनक अधि‍कारी वएह छी जे अन्‍यायक ि‍वरूद्ध रनक्षेत्रमे ठाढ़ भऽ अपन बलि‍ चढ़ौत। मुदा, जे भेल से उचि‍त भेल। एहि‍सँ आगू नहि‍ बढ़ह। अगर जँ एहि‍सँ सुधरि‍ जाएत तँ बड़बढ़ि‍यॉं नहि‍ तँ ओकर फल आन थोड़े भोगत। तूँ एतै रहह।
  कहि‍ आगू बढ़ि‍ दयानन्‍द सोचए लगलाह जे समाजक अध्‍ययन नीक नहॉंति‍ नहि‍ भेल अछि‍। लोकक जे रूखि‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओ कखनो बेकाबू भऽ सकैत अछि‍। तेँ सभकेँ गामपर जाइले कहि‍ दि‍अए। कहि‍ तँ देलखि‍न मुदा ि‍कयो मैदान छोड़ैले तैयार नहि‍ भेल। सभ अड़ल। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे अपनोहु पड़ि‍ गेलाह। मनमे नाचए लगलनि‍ जे सभसँ पहि‍ने हमहीं कोना मैदान छोड़ि‍ देब। मुदा, रहनहुँ तँ लोक मानि‍ नहि‍ रहल अछि‍। दोहरा कऽ कहलखि‍न-सभ गोटेक परि‍वार आइयेसँ नहि‍ बहुत दि‍नसँ एकठाम रहैत एलहुँ आ आगुओ रहब। तेँ सभकेँ मि‍लि‍-जुलि‍ रहैक अछि‍। ककरो संग ि‍कयो अधला करबै तँ झंझट हेबे करत। एक परि‍वारक झगड़ा गामक माने समाजक झगड़ा बनि‍ जाइत अछि‍। तेँ झगड़ाकेँ रोकैक उपाए एक्‍केटा अछि‍ जे ओहन कारणे ने उठै जहि‍सँ झगड़ा हुअए।
  कहि‍ घर दि‍सक रास्‍ता पकड़लनि‍। मुदा सभ मैदानमे डँटले रहल। प्रो. दयानन्‍दक ि‍वचारक असरि‍ तेनाहे सन लोकक मनपर पड़ल। ि‍कऐक तँ ऐहन-ऐहन घटना पूर्वमे अनेको भऽ चुकल छलैक‍। जे सबहक मनमे उपकए लगल। दयानन्‍द बाट धेने आगूओ बढ़ल जाइत आ पाछु घुरि‍-घुरि‍ सेहो देखथि‍। जे फेरि‍ ने कहीं पटका-पटकी शुरू हुअए। ओना ककरो हाथमे ने लाठी अछि‍ आ ने हथि‍यार मुदा, देह तँ छैक। पॉंच बीघा आगू बढ़लापर पेशाब करैक लाथे बैसि‍ हि‍या-हि‍या देखथि‍। जे ि‍कयो हाथ-पएर ने तँ फड़कबैए। मुदा, से नहि‍ देखथि‍। पहि‍ने मारि‍ खेलहा सभ मैदान छोड़लक। पाछुसँ सभ अपन-अपन रास्‍ता धेलक। ठंढ़ाएल रूखि‍ देखि‍ अपनो उठि‍ कऽ वि‍दा भेलाह।
      घरपर आि‍ब प्रो. दयानन्‍द पत्‍नीकेँ कहलखि‍न-बँसपुरा जाइक समए दसे बजेक बनौने छलहुँ मुदा, बैसारेमे बेसी समए लगि‍ गेल। तेँ आब नहाए नहि‍ लगब। झब दऽ खाइले ि‍दय। ताबे हाथ-पएर धोइ लइ छी।
  पति‍क बात सुि‍न पत्‍नी ि‍कछु नहि‍ बजलीह। बुझल रहनि‍ जे ऐना कते दि‍न भेल अछि‍ जे काजक धड़फड़ीमे नहाइयो नहि‍ लगैत छथि‍।
      नउ बजे। बगुरबोनीक भगत कफलाक संग बँसपुरा काली-स्‍थान पहुँचल। भगतजीक हाथमे लोटा आ जगरनथि‍या बेंत। डलि‍बाह मनटुनक हाथमे सि‍क्‍कीक चौड़गर चंगेरी, जे मधुबनी बजारमे कीनने रहै। चंगेरीमे फूल-अछत, अगरबत्ती आ सलाइ रखने रहै। नि‍रधनक कन्‍हामे ि‍मरदंग लटकल। रवि‍या आ सैनि‍याक हाथमे झालि‍। सोमना हाथमे एकटा बसनी; सरही आमक पल्‍लो आ पान-सातटा सुखल कुश। बुधबाक कान्‍हपर एकटा मुँठवासी बॉंस, जेकरा छीपमे आल रंगक पताका आ तीन हाथ जड़ि‍सँ उपर ओहने रंगक कपड़ाक टुकड़ा बान्‍हल। सभ एक सूरे काली महरानीक जय क नारा लगबैत।
      पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य बैसि‍ अपन काजक ि‍हसाब लगबैत रहै। छलगोरि‍या मुरतीक अंति‍म परीक्षण मंडपमे करैत रहए। भगतजीक ि‍क्रया-कलाप देखए लेल एक्‍के-दुइये लोक जमा हुअए लगल। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य अपन हि‍साब-वारी रोकि‍ भगतजी सभकेँ देखए लगल। काली मंडपक ओसारपर भगतजीक मेड़ि‍या सभ अपन-अपन समान रखि‍ हाथ-पएर धोय लेल बगलेक पोखरि‍ वि‍दा भेल। अछीजल भरै लेल सोनमा वसनी लऽ लेलक। भगतजीक हाथमे लोटा। हाथ-पएर धोय सभ ि‍कयो काली मंडपक आगू आि‍ब एकटंगा दऽ दऽ गोड़ लगलकनि‍। गोड़ लाि‍ग नि‍रधन मि‍रदंग चढ़बए लगल। सैनि‍यॉं, रवि‍या झालि‍ बजबए लगल। पोखरि‍सँ आि‍ब भगतजी हाथमे लोटा नेने ठोर पटपटबैत मंउपक आगू ठाढ़ भऽ ऑंखि‍ बन्‍न कऽ सुमि‍रन करए लगल। बुधवा मंडपक आगूमे थोड़े हटि‍ कऽ धुजा गाड़ए लगल। बरसपति‍या भगैत उठौलक-हे काली मैया।जना सभ काजक बँटबारा पहि‍ने कऽ नेने हुअए तहि‍ना। ठाढ़े-ठाढ़ भगतजी देह थरथरबए लगल। गोसाँइ आबि‍ गेलखि‍न। भगतजीक आगूमे डलि‍बाह दुनू हाथे डाली पकड़ने। थोड़े कालक बाद भगतजी चंगेरीमे सँ फूल-अछत लऽ उत्तर मुँहे खूब जुमा कऽ फेकलक। फेरि‍ फूल-अछत लऽ गंगाजीक नाओ लऽ दछि‍न मुँहे फेकलक। चाि‍र मुट्ठी चारू दि‍स फेि‍क पॉंचम मुट्ठी उपर फेकि‍ जोरसँ बाजल-ओ..... ओ.....। कहि‍ अपन परि‍चए कालीक नाओसँ देलक। कालीक नाओ सुि‍न डलि‍बाह बाजल-हे माए, ि‍कछु वाक् दि‍औ?”
  भगत-अइ जगहक भाग्‍य चमकि‍‍ गेल। एकरा नि‍च्‍चॉंमे साक्षात् गंगाजी बहै छथि‍न। ई स्‍थान बनने, गाममे कोनो डाइन-जोगि‍नक ि‍कछु नहि‍ चलत। एते दि‍न गामक लोक बड़ कलहन्‍तमे रहै छलै मुदा, आब सभ खुशीसँ रहत। कोनो कुशक कलेप ककरो नै लगत।
      गामक खुशहाली सुनि‍ पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे नव आनन्‍दक जन्‍म भेल। देवनाथ पूछलक-हे माए, अहॉं की चाहै छी?”
  ई स्‍थान हमर छी। अखन धुजा गारि‍ पीरी बनेलौं। सभ दि‍न पूजो करब आ बेरागने-बेरागन गोसाँइओ खेलब। जेकरा जे कोनो उपद्रव देहमे हेतै ओ डाली लगौत। फूल दइते छुरि‍ जेतइ।
      धुजा गारि‍, पीरी बना बुधबा तुलसि‍योक गाछ रोपि‍ देलक। समि‍ति‍क सभ चुपचाप भऽ देखैत रहै। ककरो मनमे कोनो शंके नहि‍ उठल। ि‍कएक तँ अनेको स्‍थानमे गहवरो रहैत अछि‍। मुस्‍की दैत देवनाथ पूछलक-हे मैया, अपन कोनो पहचान दि‍औ?”
  झपटि‍ कऽ भगत बाजल-तू जे जानक बदला जान गछने रहह से देलह। जखैन जान गड़ूमे रहह तखैन के बचौने रहह। गड़ू मेटा गेलह तँ सभ ि‍कछु बि‍सरि‍ गेलह। अखनो धरि‍ जे बचल छह से स्‍त्रीऐक धरमे। जेहने तोहर स्‍त्री धरमात्‍मा छथुन तेहने तू पापी छह। हुनके धरमे अखन धरि‍ बचल छह। नइ तँ कहि‍या ने तोहर नाश भऽ गेल रहि‍तह।
      भगतक बात सुि‍न देवनाथक मनमे लड़कीबला घटना ठनकल। मुदा, ि‍कछु बाजल नहि‍। चुपचाप दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल-हे माए, ि‍बसरि‍ गेल छलौं भने मन पाड़ि‍ देलह।
  देवनाथपर सँ नजरि‍ हटा भगत जोगि‍नदरकेँ कहलक-तूँ जे कबुला केलह से देलह। जखैन जान उकड़ूमे फँसल रहह तखन कते बेर कहि‍ कऽ गछने रहह। ओना तोहर बारह आना ग्रह कटि‍ गेलह सि‍र्फ चारि‍ आना बँचल छह। तेँ दान-पुन कऽ कऽ जल्‍दी ओकरो मेटाबह।
      जोगि‍नदरकेँ ओहि‍ राति‍क घटना मन पड़ल जहि‍ राति‍ रूपैया लऽ सेठक ऐठामसँ पड़ाएल रहै। दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल-हे मैया, ठीके बि‍सरि‍ गेल छलौं। जलदि‍ये तोहर कबुला पूरा करबह।
      बीच-बचाव करैत डलि‍वाह बाजल-आइ पहि‍ल दि‍न गोसॉंइ जगबे कएलाह अइसँ बेसी आब कोनो काज ने हएत।
      डलि‍बाहक बात सुि‍न भगत उत्तर मुँहे ठाढ़ भऽ दुनू हाथ उठा ऑंखि‍ मूनि‍ लेलक। काली देहसँ नि‍कलि‍ गेलखि‍न। सामान्‍ये आदमी जेकॉं भगतो भऽ गेल। झालि‍-मि‍रदंग, भगैत सेहो बन्‍न भऽ गेल। ऑंखि‍क इशारासँ भगत डलि‍बाहकेँ कहलक-काज सुढ़ि‍आइल अछि‍।
  ऑंखि‍एक इशारासँ डलि‍वाह उत्तर देलक-हँ।
      समि‍ति‍क सदस्‍य भगत लगसँ हटि‍ पुन: बैसारमे आि‍ब गेल। मुदा, एकटा नव समस्‍या समि‍ति‍क सामने उपस्‍थि‍त भऽ गेल। समस्‍या ई जे ि‍क गहबरो बनौल जाए आि‍क धुजा उखारि‍ कऽ फेि‍क देल जाए। मुदा, दुनू तरहक वि‍चार उठि‍ गेल। ि‍कदु गोटे गहवरक समर्थनो केलक आ ि‍कछु गोटे ि‍वरोधो केलक। बीचमे मंगलकेँ ि‍कछु फुरबे ने करै। मने-मन सोचै जे ई तँ बेरि‍ परक भदबा आि‍ब गेल। जँ मनाही करव तँ शुभ काज अशुभेसँ शुरू हएत। जँ नहि‍ करब तँ सभ दि‍ना भदवा ठाढ़ भऽ जाएत। भगतकेँ मंगल ि‍चन्‍हतो नहि‍ रहए मुदा, बगुरबोनीक भगतक ि‍वषएमे बुझल रहै जे एकटा कोखि‍या गुहारि‍ केनि‍हार भगत जहल गेल रहए।
      वएह भगत छह मास जहल काटि‍ हालेमे नि‍कलल छलै। बगुरबोनीक गहबर कऽ बदनाम बुझि‍ दोसर गहबर जगबए चाहैत अछि‍। भगता जहल ि‍कअए गेल? बगुरबोनीक भगता मथ-दुखीसँ लऽ कऽ कोखि‍या गुहारि‍ धरि‍ करैत छलै। एक दि‍न एकटा नोकरि‍या अपन घरवालीकेँ लऽ कऽ कोखि‍या गुहारि‍ करबए बगुरबोनी गहबर आएल। शुक्र दि‍न रहै। तीनू वेरागनमे शुक्र सभसँ नीक बुझल जाइत अछि‍। खूब डील-डालसँ डाली सजा अनने रहै। आन-आन कोखि‍या गुहारि‍मे कहालीक संग बुढ़ि‍-वुढ़ानुस स्‍त्रीगण सभ अबैत छलि‍ तेँ कहि‍यो कोनो रक्‍का-टोकी नै हाेय। मुदा ओ बुड़ि‍चोन्‍ह नोकरि‍या अपन घरवालीक संग अपने आएल। बुि‍ड़चोन्‍ह ऐहन जे कलकत्तामे नोकरी करि‍तहुँ अस्‍पताल देखले ने रहै। पूजा ढ़ारि‍ भगत ओकरा कहलकै जे गहवरक सीमासँ हटि‍ जाह। सौझुका समए रहै। अन्‍हारो भइये गेल रहै। ओकरा मनमे शंका जगलै। ओ हटैले तैयारे ने भेल। दुनू गोरेक बीच रक्‍का-टोकी शुरू भेल। रक्‍का-टोकीक बाद ओ गहबरसँ नि‍कलि‍ बहराक जाफरी लग ठाढ़ भऽ गेल। मुदा, ऑंखि‍-कान ठाढ़ केने रहल। असकरे भगत आ ओ औरत गहबरक भीतर रहल। देह थरथरबैत भगत पहि‍ने ओकरा माने औरतक देहपर हाथ देलक। औरत गुहारि‍ बुि‍झ ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। जखन भगत ओकरा पीरीक आगुमे पड़ै लेल कहलक तखन ओ जोरसँ घरबलाकेँ सोर पाड़लक। घरवालीक अवाज सुि‍न दौि‍ड़ कऽ आबि‍ सोझे भगतपर हाथ छोड़ए लगल। भगतोक अपन घर छलै। कोना अपना घरमे माि‍र खा बरदास करैत। हल्‍ला सुनि‍ पान-सात आदमी पहुँच गेल। सभ भगतेक लाइग-भाइगक। भगतकेँ कहि‍ते ओ सभ ओकरा थोपड़ा देलक। दू-चारि‍ थापर मौि‍गयोकेँ लगलै। वएह आदमी थाना जा दोसर दि‍न केस कऽ देलक। तेसरे ि‍दन भगत जेल चलि‍ गेल।
      जखनसँ जोगि‍नदर सुनलक जे चारि‍ आना ग्रह बाि‍कये अछि‍, जे दान-पुन केलासँ कटत, तखनसँ मनमे उड़ी-बीड़ी लगि‍ गेलै। मनमे होय जे भगत ठीके कहलक। जखन रूपैया लऽ टेम्‍पूपर चढ़लौं तखन ठीके कबुलो केलौं आ भरि‍ रस्‍ता गुहरि‍वतहुँ  गेल रहि‍एनि‍। भरि‍ रस्‍ता काली माए, काली माए, सेहो जपैत गेल रही। एते बात जखन ि‍मलि‍ गेल तँ चाि‍र आना ग्रह कोना झूठ भऽ सकैत अछि‍। दाने-पुन केलासँ ने ग्रह कटैत अछि‍। मुदा, दान-पुन करैक तँ कतेको रास्‍ता अछि‍। तहूमे फुटा कऽ ि‍कछु नहि‍ कहलक। ि‍कयो भोज-भनडारा करैए तँ ि‍कयो तीर्थ-स्‍थानमे धर्मशाला बनबैत अछि‍। ि‍कयो-पोखरि‍-इनार खुनवैए तँ ि‍कयो स्‍कूल-कओलेज बनबैए। ि‍कयो अस्‍पताल बनवैए तँ ि‍कयो अन्‍न-वस्‍त्र दान करैत अछि‍। दान-पुन करैक तँ अनेको जगह अछि‍। मुदा, हम की करी? फेर मनमे एलै जे एते ि‍दन ककरोसँ दोस्‍ती नइ केने छलौं, तेँ अपने फुरने ि‍कछु करैत छलौं। मुदा, आब तँ मंगलसँ दोस्‍ती भऽ गेल अछि‍ तेँ पुछि‍ लेब जरूरी अछि‍।
      पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍य कालि‍ये स्‍थानमे छल, ि‍कएक तँ औझुका काज सभसँ झनझटि‍या अछि‍। कतौ दोकान बनवैक तँ कतौ चंदा माने बेहरीक। मुदा, जोगि‍नदर मंगलकेँ बैठकसँ उठा कात लऽ गेल। कातमे लऽ जाए कहलक-  भाय, भगतजी ठीके कहलनि‍ जे तोरा चारि‍ आना ग्रह बाँि‍कये छह।
  मंगल-तोरा अपनो ि‍वसवास होइ छह?”

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

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