Sunday, July 04, 2010

'विदेह' ६० म अंक १५ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ६०)-PART I


'विदेह' ६० म अंक १५ जून २०१० (वर्ष ३ मास ३० अंक ६०)NEPAL       INDIA                     
                                                     
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एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य



२.१. जीवन संघर्ष--जगदीश प्रसाद मंडल





 

३. पद्य



३.२.. कामोद झा -केओ नई २.लालबाबु कर्ण-जन्मभूमि ३.मनोज झा मुक्ति-देखावटी छोडिदे




६. बालानां कृते-देवांशु वत्स- चित्र शृंखला

 


७. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]



 

9. VIDEHA MAITHILI SAMSKRIT EDUCATION (contd.)



विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

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भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

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गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


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 १. संपादकीय

अरकान :
अरकान सामिल पूर्णाक्षर: फलुन U।। फालुन।U। मफालुन U।।। मुसतफलुन ।।U। फालातुन ।U।। मुफालुन UUU। मफातुन UUU मफलातु ।।।U
सभ पूर्णाक्षरी घटक मारते रास प्रकार।
१० पूर्णाक्षरी(सालिम) अराकानसँ १९ बहर आ से दू प्रकारक:
मुफरद बहर माने रुक्नक बेर-बेर प्रयोगसँ।सात सालिम(पूर्णाक्षरी)बहर, संगीत शब्दावलीमे एकरा शुद्ध कहि सकै छी।सभ पाँतीमे २-८ बेर दोहरा कऽ शेरमे ४-१६ रुक्नी बहर बनत। ४ रुक्नक बहर- मुरब्बा ६ रुक्नक बहर- मुसद्दस ८ रुक्नक बहर- मुसम्मन / मुफ़रद(विशुद्ध) आठरुक्न, छह रुक्न आ चारिरुक्नक सालिम बहर
हजज :-आठरुक्न म फा ई लुन (U।।।) चारि बेर/ छःरुक्न म फा ई लुन (U।।।)तीन बेर/ चारिरुक्न म फा ई लुन (U।।।) दू बेर
रजज़ आठरुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) चारि बेर/ छःरुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) तीन बेर/ चारिरुक्न मुस तफ इ लुन (।।U।) दू बेर/
रमल आठरुक्न फा इ ला तुन (।U।।) चारि बेर/ छःरुक्न फा इ ला तुन (U।।)तीन बेर/ चारिरुक्न फा इ ला तुन (।U।।)दू बेर
वाफ़िर आठरुक्न म फा इ ल तुन (UUU।) चारि बेर/ छःरुक्न म फा इ ल तुन (UUU।) तीन बेर/ चारिरुक्न म फा इ ल तुन (UUU।)दू बेर
कामिल आठरुक्न मु त फा इ लुन (UUU।)चारि बेर/ छःरुक्न मु त फा इ लुन (UUU।) तीन बेर/ चारिरुक्न मु त फा इ लुन (UUU।) दू बेर
मुतकारिब आठरुक्न फ ऊ लुन (U।।) चारि बेर/ छःरुक्न फ ऊ लुन (U।।) तीन बेर/ चारिरुक्न फ ऊ लुन (U।।) दू बेर
मुतदारिक आठरुक्न फा इ लुन (।U।) चारि बेर/ छःरुक्न फा इ लुन (।U।) तीन बेर/ चारिरुक्न फा इ लुन (।U।) दू बेर
एहि सभक मारते रास अपूर्णाक्षरी रूप सेहो।
मुरक्कब बहर: दू प्रकारक अरकानक बेर-बेर अएलासँ १२ सालिम बहर,संगीतक भाषामे मिश्रित। तीन तरहक- ४ रुक्नक बहर, ६ रुक्नक बहर, ८ रुक्नक बहर / मुरक्कब (मिश्रित) पूर्णाक्षरी (सालिम) बहर
१२ टा तवील,मदीद,मुनसरेह,मुक्तज़ब,मज़ारे,मुजतस,ख़फीफ,
बसीत,सरी,जदीद, क़रीब, मुशाकिल
मुक्तजब (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):फ ऊ लु U U फै लुन U । फ ऊ लु UU फै लुन। ।
मज़ारे (अपूर्णाक्षरी आठ रुक्न):मफ ऊ लु । । U फा इ ला तु । U U म फा ई लु U । । U फा इ लुन। U । फा इ ला न। U U
मुजतस (अपूर्णाक्षरी आठरुक्न):म फा इ लुन U U । फ इ ला तुन U U । । म फा इ लुन U U । फै लुन। ।
ख़फीफ़ (अपूर्णाक्षरी छः रुक्न):फा इ ला तुन । U । । म फा इ लुन U U । फै लुन। । फ इ लुन U U
मुज़ाहिफ अरकान अपूर्णाक्षर :फलुन UU। मफालुन UU। फलालुन UU।। फालु U।।U मुफलुन ।UU। फलु UU मफलु ।।U मफलुन ।।। फैलुन ।। फा । फअल् U। फल् UU फा अ । U फा इ लुन । U । फ ऊ लुन U
आब एक धक्का फेरसँ मैथिलीक उच्चारण निर्देश आ ह्रस्व-दीर्घ विचारपर आउ।
जेना कहल गेल रहए जे अनुस्वार आ विसर्गयुक्त भेलासँ दीर्घ होएत तहिना आब कहल जा रहल अछि जे चन्द्रबिन्दु आ ह्रस्वक मेल ह्रस्व होएत।
माने चन्द्रबिन्दु+ह्रस्व स्वर= एक मात्रा

संयुक्ताक्षर: एतए मात्रा गानल जाएत एहि तरहेँ:-
क्ति= क् + त् + इ = ०+०+१= १
क्ती= क् + त् + ई = ०+०+२= २

आब आउ किछु आर शब्दपर:
जेना आएल, हएत, हैत
आब हैतकेँ हएत लिखब बेशी वैज्ञानिक अछि कारण हैतकेँ ह + ऐ + त पढ़ल जएबाक खतरा अछि (दोषपूर्ण)। आ ताहि रूपमे आएल क उच्चारण होएत
अ + ऐ + ल = १ + २ + १
तँ आएल = २ + १ + १ = ४

तहिना आओत क उच्चारण होएत
अ +औ + त= १ + २ + १
तँ आओत = २ + १ + १
हएबाक= १+२+२+१
होएबाक= २+१+२+१ (ओ क बाद ए क मान ह्रस्व)
हेबाक= २+२+१
नञि= १+१
नै= २
नहि=१+१
सएह= १+२+१ (ग्राह्य)
सैह= २+१ (दोषपूर्ण उच्चारण)
तखन निअम भेल: दीर्घक बाद वा क गणना १ मात्रा होएत।

आब पाँती वा पाँति खण्डक अन्तिम वर्णपर आउ।
एकरा लय मिलेबाक दृष्टिसँ हलन्तयुक्त रहलापर एकआ लघु रहलापर दीर्घदूमात्रा लऽ सकै छी, मुदा से अपवादस्वरूप आ आवश्यकतानुसार, आपद् रूपमे।
जेना मनोज- एकर उच्चारण होइत अछि-
म+नो+ज्
मुदा संबोधनमे
म+नो+ज+अ+अ
तखन निअम भेल:
मैथिलीमे स्युक्ताक्षरमे हलन्तक अस्तित्वक अनुसार गणना होएत। मुदा जतए हलन्तयुक्त वर्णसँ पाँती वा पाँती खण्डक समापन होएत ततए हलन्तयुक्तकेँ एक मात्राक गणना लय मिलानी लेल कऽ सकै छी। संगहि लय मिलानी लेल पाँती वा पाँती खण्डक अन्तिम वर्ण ह्रस्व रहलापर ओकरा दीर्घ बुझि मात्रा गणना कऽ सकै छी।

क्ष= क् + ष= ०+१
त्र= त् + र= ०+१
ज्ञ= ज् + ञ= ०+१
श्र= श् + र= ०+१
स्र= स् +र= ०+१
शृ =श् +ऋ= ०+१
त्व= त् +व= ०+१
त्त्व= त् + त् + व= ० + ० + १
ह्रस्व + ऽ = १ + ०
अ वा दीर्घक बाद बिकारीक प्रयोग नहि होइत अछि जेना दिअऽ आऽ ओऽ (दोषपूर्ण प्रयोग)। हँ व्यंजन+अ गुणिताक्षरक बाद बिकारी दऽ सकै छी।
ह्रस्व + चन्द्रबिन्दु= १+०
दीर्घ+ चन्द्रबिन्दु= २+०
जेना हँसल= १+१+१
साँस= २+१
बिकारी आ चन्द्रबिन्दुक गणना शून्य होएत।
जा कऽ = २+१
क् =०
क= क् +अ= ०+१
किएक तँ क केँ क् पढ़बाक प्रवृत्ति मैथिलीमे आबि गेल तेँ बिकारी देबाक आवश्यकता पड़ल, दीर्घ स्वरमे एहन आवश्यकता नहि अछि।

आब आउ बहरे मुतकारिबमे एकटा गजल कही:

बहरे मुतकारिब:- सभ पाँतिमे पाँच-पाँच वर्णक संगीत-शब्द चारि बेर एहि क्रममे:
U
। । अरकान सामिल पूर्णाक्षर

आब मैथिलीमे विभक्ति सटलासँ कनेक सुविधा अछि, तैयो शब्दक संख्या चारिसँ बेशी राखि सकै छी मुदा ह्रस्व दीर्घक क्रम वएह राखू।
लुन U।।
लुन फलुन फलुन फलुन
लुन फलुन फलुन फलुन



गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com

२. गद्य

२.१. जीवन संघर्ष--जगदीश प्रसाद मंडल





कॉंपी राइट- लेखकक ज्‍येष्‍ठ पुत्र सुरेश मंडल
उपन्‍यास

जीवन संघर्ष
 
जगदीश प्रसाद मंडल

काति‍कक अनहरि‍या। रौदि‍याह समए भेने जेठेक रौद जेकॉं रौदो कड़गर होएत। तइ परसँ जनमारा उम्‍मस। जहि‍ना छींच स्‍नान माने ि‍छच्‍चासँ देह सि‍क्‍त करबामे देहपर पाि‍नक टघार होइत तहि‍ना पसीनासँ होइत। दस बजेक बाद बाध-बोन ि‍दस ऑंि‍ख नहि‍ उठाओल जाइत, तते झड़क। मुदा घरोमे चैन कहॉं? माथक पसेना नाकपर होइत टप-टप खसैत। देहक बस्‍त्रसँ गंध अबैत। औल-बौल करैत सभक मन। आठमे दि‍न दि‍यारी छी तहूमे काली-पूजा करैक वि‍चार सेहो सौँसे गौवाँ मि‍लि‍ कऽ कए लेलनि‍। दुनू अमबसि‍ये ि‍दन होएत। ओना अदौसँ दि‍वाली एक दि‍ने पावनि‍ होइत आएल अछि‍ मुदा, काली-पूजा धूम-धामसँ मनबैक वि‍चार भेने, पॉंचो दि‍न सभ अपन-अपन अंगनोमे दीप जरबैक वि‍चार कए लेलनि‍। आठमे दि‍न पावनि‍ तेँ सात-दि‍नक पेसतरे घर-अंगनाक टाट-फड़क सरिऔनाइ, छाउर-गोबरक ढेरी हटौनाइ, दुआर-दरवज्‍जासँ लऽ कऽ अपन-अपन घर लगक बाटकेँ छि‍लनाइ-बनौनाइ, कनि‍ये काज अछि‍। तइपर सँ आन-आन गामसँ अबैत सड़को सभकेँ तँ अपना सीमान धरि‍ मरम्‍मत करै पड़त की ने। मुदा गुण अछि‍ जे रौदी भेने खेत-पथारमे काज नहि‍ अि‍छ। जँ रहि‍तै तँ सभक लटैक जैतै। काली-पूजाक पैघ आयोजनक वि‍चार अछि‍ तेँ काजोक भरमार अछि‍ये। लोकक उत्‍साहे तेहन अछि‍ जे कोि‍ढ़लो बोझसँ हल्‍लुक बुि‍झ रहल अछि‍। मालो-जालक भार सभ स्‍त्रीगणेपर छोि‍ड़ देलनि‍। सभ ि‍कछु होइतहुँ आ रहि‍तहुँ मुँहक चुहचुहीमे सेब-तड़क छन्‍हि‍। कारण धानक खेतीमे गामक कि‍सान बँटा गेल छथि‍। ओना खेतक बुनाबटि‍ सेहो तेहन अछि‍ जे बँटाएब स्‍वाभावि‍के अछि‍। अधि‍क ऊँच, मध्‍यम ऊँच, नीच आ अधि‍क नीच रूपमे गामक खेत अछि‍। जहि‍सँ पानि‍ आ रौदक एक रंग असर नहि‍ होएत अछि‍। जेकर सद््य: प्रभाव उपजापर पड़ि‍ते अछि‍। गामक कि‍सानो बॅटा गेल छथि‍। जनि‍का मध्‍यम आ ऊँच खेत छन्‍हि‍ हुनका लेल गरमा धानक खेती उपयोगी छन्‍हि‍। मुदा जिनकर खेत नीच अधि‍क नीच छन्‍हि‍, जहि‍मे शुरू बर्खासँ अगहन-पूस धरि‍ पानि‍ जमल रहैत अछि‍ ओि‍ह खेतक लेल अगहनि‍ये धानक खेती उपयोगी अछि‍। ओना बैचारि‍क भेद सेहो अछि‍। अखनो गरमा धानकेँ अशुद्ध बुझल जाइत अछि‍। जहि‍सँ ि‍कछु गोटे वि‍रोध स्‍वरूप कम उपजा खुशीसँ पबैत छथि‍।
      आइ धरि‍ बँसपुरामे ने कहि‍यो कोनो होम-यज्ञ भेलि‍ आ ने कोनो तेहन दसगरदा उत्‍सवे। जहि‍सँ परोपट्टा लोक बँसपुराबलाकेँ अधरमी सेहो बुझैत अछि‍। ओना गाम मेहनती कि‍सान-बोनि‍हारक छी। गाममे एक्‍कोटा कम्‍पनीक एजेंट, चोर-डकैत, ठक-फुसि‍याह नहि‍ अछि‍। मुदा तेँ ि‍क बँसपुराबला धर्मक काज नहि‍ करैत छथि‍, बखूबी करैत छथि‍। साले-साले महावीरजी स्‍थानमे अष्‍टयामक संग रामनवमी मनवि‍तहि‍ छथि‍। समए नीक होउ ि‍क अधला मुदा उत्‍सवमे बाधा नहि‍ होइत, भलेहीं नहि‍ पान तँ पानक डंटि‍योसँ काज चलि‍तहि‍ अछि‍। तेकर अति‍रि‍क्‍तो बेकता-बेकती भनडारा, अगहनमे जनार, अासीनमे सलहेसक पूजा इत्‍यादि‍ होइतहि‍ अछि‍।
      रौदी सबहक मनकेँ हौड़ि‍ रहल छन्‍हि‍। मुदा तइओ मनमे नव उत्‍साह जगले छन्‍हि‍। भि‍नसरसँ लऽ कऽ खाइ-पीबै राति‍ धरि‍ सभ पूजेक माने कालि‍ये पूजाक कोनो नहि‍ कोनो काजो करैत, नहि‍ तँ पूजेक जुि‍त-भॉंति‍क वि‍चार करि‍तहि‍ छथि‍। डि‍हवारो स्‍थानक चलती आि‍ब गेल। स्‍थानक सौँसे आंगनकेँ चि‍क्‍कनि‍ माि‍टसँ दुनू सॉंझ नीपलो जाइत अछि‍ जे जनि‍जाि‍त माने गामक पुतोहू आ ढेरबा बेटी जाति‍ सभ कमसँ कम पॉंचटा उचि‍ती-वि‍नती सुनवि‍ति‍ह छन्‍हि‍। कुमारि‍ भोजन तँ पावनि‍ दि‍न हएत। मुदा अनेको तरहक सुगंध अगरबतीक माध्‍यमसँ लगि‍ति‍ह छन्‍हि‍। कोना नहि‍ लगतनि‍? पहि‍ले-पहि‍ल गाममे पॉंच दि‍नक मेला देलनि‍ अि‍छ। रंग-वि‍रंगक दोकानमे रंग-वि‍रंगक बस्‍तुक बि‍करी गाममे होएत। सभ अपन-अपन जि‍नगीक अनुरूप कीनबो करत। मेलाक प्रति‍ लोकक मन एते उड़ि‍ गेल अि‍छ जे ने आन काज आ ने आन गप करैत नीक लगैत। घरक सोलहन्‍नी भार स्‍त्रीगणेपर पड़ि‍ गेलनि‍। मुदा तरे-तर रोगक एकटा कीड़ी फड़ि‍ गेल। ओ कीड़ी ई जे खि‍स्‍सकरक चलती आबि‍ गेल। सुनि‍नि‍हारक कमि‍ये नहि‍। बूि‍ढ़-बुढ़ानुससँ लऽ कऽ धि‍या-पूजा धरि‍। खि‍स्‍सकरो रंग-वि‍रंगक, ि‍कयो कालीकेँ समएक गति‍ बुझि‍ बजैत तँ कि‍यो महादेवक छातीपर पएर देव कहैत। जहि‍ना अपन खेत छोि‍ड़ ि‍कसान वसंत पंचमी दि‍न एक्‍के परतीकेँ बेरा-बेरी जोतैत तहि‍ना कालि‍योक चर्च करैत।
      अदौसँ दि‍वाली एक दि‍ना पावनि‍ होइत आएल अि‍छ। मुदा एक लाटेमे गोधन पूजा, भरदुि‍तया दवातक पूजा सेहो होइत आएल अछि‍। तहि‍पर सँ पॉंच दि‍नक काली पूजाक मेला सेहो होएत। गाममे गहगट मचि‍ जाएत। बि‍ना ब्‍लीचि‍ंग पाउडर छि‍टने पेशावक गंध मेटाएत। दोहरी पूजा भेने जेहने सबहक मनमे खुशी होइत तेहने काजक तबाही सेहो। एक लखाइत दस-बारह ि‍दन खटब असान नहि‍। के बीमार पड़त, ककरा रद-दस्‍त हेतइ तकर कोन ठेकान। तहूमे धि‍या-पूजा अकड़-धकड़ खेबे करत। रोकने थोड़े मानत। तइपर सँ भरि‍ राति‍ नाचो-तमाशा देखवे करत। सोचि‍नि‍हार सभकेँ तरे-तर सोगो होइत। ततवे नहि‍ आरो सोग सभ एकाएकी मनमे अबैत जाइत। एक तँ ओहि‍ना दि‍ल्‍ली-कलकत्ता दुआरे भाए-बहीनि‍क पावनि‍ भरदुति‍या रोगा गेल अछि‍ तइपर सँ गामक मेला। जँ पूजाक हकारो देल जाएत तँ के ऐहन अभागल होएत जे लक्ष्‍मी पूजा छोि‍ड़ आओत। भलेहीं उक पुरूखे फेड़त मुदा, तम्‍मा तरमे दूि‍ब, पाइ ि‍सरा आगू तँ जनि‍जाति‍ये रखै छथि‍। ओ पुरूख कोना करताह। ऐहन पावनि‍ छोड़व कते उचि‍त होएत। मुदा गामक मेला सबहक मनकेँ ि‍बरड़ोक झोंक जेकॉं उड़बैत। तेँ नीक-अधलापर नजरि‍ ककरो टि‍कहि‍ नहि‍ दइत। काति‍कक जरैया बोखार आ पेट-झरी पर नजरि‍ ककरो जेबे नहि‍ करैत। सभ उन्‍मत। सभ बेहाल। जहि‍ना फगुआ दि‍न भॉंग पीबि‍ गाममे नचैत अछि‍ तहि‍ना सभ घरसँ गाम-धरि‍क काजक पाछू नचैत। जहि‍ना घरक ओलतीक पानि‍ टधरि‍ कऽ अंगनासँ नि‍कलैत-नि‍कलैत पानि‍क बेग बनि‍ पोखरि‍ पहुँच जाइत तहि‍ना व्‍यक्‍ति‍ ससरि‍ कऽ समाजमे मि‍लि‍ रहल अछि‍।
      गाममे काली-पूजा ि‍कऐक होएत? जे एते दि‍न नहि‍ भेल ओ एहि‍ सालसँ ि‍कऐक होएत? अनेरे खर्चाक उतड़ी गौँवा गरदनि‍मे पहि‍रए लेल ि‍कऐक तैयार भऽ गेल? तेकर कारण ई अछि‍ जे बँसपुरासँ कोसभरि‍ सटले सि‍सौनीमे पच्‍चीसो वर्ख उपरेसँ दुर्गा-पूजा होइत अबैत अछि‍। चरि‍ कोसीक लोक दुर्गा-पूजा देखए सि‍सौनी अबैत छथि‍। गामेक नहि‍ आनो-आनो गामक स्‍त्रीगण दुर्गा-स्‍थानमे सॉंझो ि‍दअए अबैत छथि‍। कुमारि‍ भोजन सेहो करबैत छथि‍। कबुलाक छागर सेहो चढ़बैत छथि‍। बलि‍-प्रदानमे सि‍सौनीक जोड़ा जि‍लामे नहि‍ अछि‍। दुर्गा-पूजा होइसँ एक महीना पहि‍नहि‍सँ बकरी पोसि‍नि‍हारक चलती आि‍ब जाइत। तहूमे एकरंगापर तँ डाक-डकौबलि‍ भऽ जाइत। ततबे नहि‍, पाठ केनि‍हार सभ सेहो अभ्‍यास करए लगैत। गाममे दुर्गा-पूजाक समए परीक्षाक समए बनि‍ जाइत। जे बेसीठाम सम्‍पूट पाठ केलनि‍ ओ ि‍डस्‍टि‍ंगसनक संग फस्‍ट डि‍वीजन घोषि‍त होइत छथि‍। आमदनि‍यो नीक आ डि‍पलोमो नमहर। कतवो ि‍कयो अभ्‍यास करति‍ मुदा, छन्‍ठे पंडीजी फस्‍ट करताह, ई सबहक मन बीस सालक अनुभवसँ मानैत आएल छन्‍हि‍। हद छथि‍ ओहो। एक तँ ओहि‍ना तेज वोली छन्‍हि‍ तइपर सँ तते स्‍पीडमे धड़ै छथि‍ जे चौपाइक पहि‍ल शब्‍द आ अंति‍मो शब्‍द सुनि‍ पएब ि‍क नहि‍? ओना ि‍कछु होउ मुदा, कीनुआ सर्टिफि‍केट नहि‍ रखने छथि‍। मेहनत कऽ कऽ अनने छथि‍।
      एि‍ह बेरि‍ सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे एकटा घटना घटल। घटना ई भेल जे बँसपुराक एकटा अठ्ठारह-बीस बर्खक लड़की, जेकर पैछले साल वि‍आह भेलि‍ छलै आ तीनि‍ये मास सासुर बसल छलि‍, केँ पूजा कमि‍टीक तीन गोटे फुसला कऽ भंडार घर लऽ गेल। मेला-गनगनाइत। नाच-तमाशाक लाउड-स्‍पीकर चरि‍ कोसीक नीन उड़ौने। तीनू गोटे ओहि‍ लड़कीक संग दुरबेबहार केलक। बेबस भऽ ओ लड़की सभ ि‍कछु बरदास केलक। चारि‍ बजे भोरमे ओकरा सभ छोि‍ड़ देलक। मेला भरि‍ ओ ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। मुँह-कान झॉंपि‍ मेलासँ नि‍कलि‍ सोझे गामक रास्‍ता धेलक। गामक सीमापर पहुँचतहि‍ छाती चहकि‍ गेलइ। छाती चहकि‍तहि‍ हबो-ढकार भऽ कानए लागलि‍। भि‍नसुरका कानब सुनि‍ एक्‍के-दुइये गामक लोक घर-आंगनसँ नि‍कलि‍ रास्‍तापर आि‍ब-आि‍ब देखए लगल। टोल प्रवेश करि‍तहि‍ एका-एकी लोक पूछए लगलै। कानि‍-कानि‍ अपन बीतल घटना सुनबए लागलि‍‍। ि‍बना ि‍कछु पुछनहि‍ माए, बेटीकेँ कनैत देि‍ख, छाती पीि‍ट-पीि‍ट कनवो करै आ दुनू हाथे पँजि‍या कऽ पुछलक-की भेलौ, हम माए छि‍औ, हमरा नै कहमे ते केकरा कहवीही।
  जेना-जेना माए बेटीक मुँहक बात सुनैत तेना-तेना देहमे आि‍ग सुनगए लगलै। सुनैत-सुनैत बमकि‍ कऽ पति‍केँ कहलक-जहि‍ना हमर बेटीक इज्‍जत सि‍सौनीबला लुटलक तहि‍ना सि‍सौनीक दुर्गास्‍थानमे मनुक्‍खक बलि‍ पड़त।
      कहि‍ घरमे राखल झोलाएल फौरसा नि‍कालि‍, साड़ी समेटि‍ कऽ बान्‍हि‍ सि‍सौनीबला सभकेँ गरि‍अबैत वि‍दा भेलि‍। काली रूप पत्‍नीकेँ सि‍सौनी ि‍दस बढ़ैत देखि‍ पति‍ तौनीक मुरेठा बान्‍हि‍ हरोथि‍या लाठी नेने गारि‍ पढ़ैत सेहो बढ़ल। बताहि‍ जेकॉं माए ि‍चकड़ि‍-चि‍कड़ि‍ गरि‍ऐवो करै आ देवी-दुर्गा लगा-लगा सरापबो करए। जते डेग आगू मुँहे बढ़ै तते तामसो उपरे मुँहे चढ़ल जाइ। ऐम्‍हर भूमहुरक आि‍ग जेकॉं तरे-तर गौंओक करेजमे आि‍ग लहरि‍ गेल। सभसँ पहि‍ने सातो दि‍यादी परि‍वारक पुरूष, स्‍त्रीगण सहि‍त धि‍यो-पूतो, जेकरा जएह सोझमे भेटि‍लै, से सएह-सहए लऽ कऽ सि‍सौनीक रास्‍ता धेलक। दि‍याद-वादकेँ आगू बढ़ैत देखि‍ टोलोक आ जाति‍योक सभ वि‍दा भेल। गाम दलमलि‍त हुअए लगल। जेकरा जएह मनमे उठै से सएह जोर-जोरसँ बजैत सि‍सौनी दि‍सक रास्‍ता धेलक। बुद्धि‍यार लोक सभक मन दड़कए लगल जे दुनू गामक बीच खून-खराबी हेबे करत। एकरा ि‍कयो नहि‍ रोि‍क सकैत अछि‍। मुदा तइयो आगि‍मे जरैसँ रोकैक प्रयास करै दुआरे दाैि‍ड़-दौि‍ड़ आगू बढ़ि‍ रास्‍ता रोकलक। ि‍कयो बात मानैले तैयारे नहि‍। दुनू परानी कुसुमलालकेँ माने लड़की माए-बापकेँ चाि‍र-चारि‍ गोटे पकि‍ड़ कऽ रोकलक। कुसुमलाल तँ ठमकि‍ गेल मुदा, पवि‍त्री मानैले तैयारे नहि‍। चरि‍-चरि‍ हाथ कुदि‍ चारू गोटेक हाथ छोड़ा-छोड़ा आगू बढ़ि‍ बाजै-सब दि‍नसँ पुरूख स्‍त्रीगणपर अति‍याचार करैत आएल अछि‍ आ अखनो करैत अछि‍। अइ अति‍याचारकेँ के रोकत? पुरूष-पुरूष स्‍ाभ एक छी। जहि‍ना गाएसँ गाए नै पाल खाइत तहि‍ना पुरूख बुते पपि‍याह पुरूखकेँ सि‍खौल नै हेतै।
  जहि‍ना भादबक बादलमे ि‍बजलोको ि‍छटकैत आ चारू भर अवाजो होइत तहि‍ना हंसेरीक बीच रंग-वि‍रंगक बात अकासमे उड़ए लगल-
सि‍सौनीमे आि‍ग लगा लंका जेकॉं जरा देव।
इज्‍जत-आबरू लुि‍ट, गाममे आि‍ग लगा देव।
चौराहापर अपराधीकेँ आनि‍ मुँहपर थूक फेि‍क देहमे आि‍ग लगा देव।
सि‍सौनीक बहू-बेटीकेँ पकड़ि‍ लऽ अाएव।
      क्रोधक चि‍नगारी उि‍ड़-उड़ि‍ फुलझाड़ी जेकॉं अकासमे चमकए लगल। मुदा ई सभ ि‍वचार बेकता-बेकती होइत सामूहि‍क नहि‍। ने ि‍कयो ककरो बात सुनैले तैयार आ ने अपन मुँह रोकैक लेल। मुदा तइओ बुद्धि‍यार सभ रास्‍ता छोड़लनि‍ नहि‍। घरमे लागल आि‍ग ि‍मझबैमे हाथ-पाएर झड़कि‍तहि‍ छैक।
      गाममे सभसँ बेसी उमेरक मनधन बाबा। नब्‍बे माघक जाड़ कटने छथि‍। तहि‍ बीच अनेको झॉंट, पाथर, शीतलहरी, बि‍हाड़ि‍, भूमकम देखि‍-भोगि‍ चुकल छथि‍। गामक लोककेँ एकमुहरी देखि‍ बॉंसक फराठी नेने टुघरल-टुघरल सेहो पहुँचलाह। पाछुएसँ देखलखि‍न तँ मन मानि‍ गेलनि‍ जे सि‍सौनी आ बँसपुराक बीच मारि‍ हेबे करत। ब्रह्माक बापो नहि‍ बँचा सकैत छथि‍। केमहर के मरत, कतेक हॉंड़-पॉंजर टुटत तेकर कोनो ठेकान नहि‍ रहत। ि‍वचारैत-वि‍चारैत दुनू ऑंखि‍सँ नोरक टघार चलए लगलनि‍। छहोछीति‍ छाती भऽ गेलनि‍। बुकौर लागि‍ गेलनि‍। देहक हूबा टुि‍ट गेलनि‍। बोम फाि‍ड़ कनए लगलाह। गंगोत्रीक गंगा जेकॉं दुनू ऑंखि‍सँ अनघोल करैत अश्रु, अरड़ाहटि‍ मारैत मुँहक बोल आ थर-थर कँपैत छातीसँ बेकाबू मनधन बाबा भऽ गेलाह। जहि‍ना कोसीक धारक बीच मोइनमे पाछुक पानि‍क धारा आबि‍ घुमए लगैत तहि‍ना मनधनक वि‍चार घुमए लगलनि‍। हूबा कऽ कए उठि‍ आगू मुँहे ससरए लगलाह। आगू पहुँच रस्‍तापर फराठीसँ चेन्‍ह दैत पड़ि‍ रहला। मन थि‍रे नहि‍ होइत। कखनो ऑंखि‍क सोझमे दू गामकेँ नष्‍ट होइत देखति‍ तँ कखनो पुस्‍त-पुस्‍ताइनकेँ दुश्‍मनी होइत देखैत। मन पड़लनि‍ जूरशीतल पावनि‍क घटना। एकटा नढ़ि‍याक खातीर बेला आ मैनही गामक शि‍कार खेलि‍नि‍हारक बीच मारि‍ भेल। धमगज्‍जरि‍ मारि‍। परि‍स्‍थि‍ति‍यो अनुकूले पड़लैक। पावनि‍ मनबए सभ लाठी, सहत, तीर-धनुष लऽ लऽ शि‍कार खेलए गेले रहै। ने लोकक कमी आ ने मारि‍ करैक वस्‍तुक। मुद्दो तेहने भारी, एकटा मुइल नढ़ि‍या। मुदा प्रति‍ष्‍ठाक प्रश्‍न तँ गामक रहबे करै। अही प्रति‍ष्‍ठा लऽ कऽ कतेक लोकक कपार फुटल, कतेक हाथ-पएर टूटल आ दुनू दि‍स एक-एकटा खूनो भेल। केयो ककरो देखैबला नहि‍ रहल। जे जत्ते से तत्ते कुहरैत। केकरा के उठा कऽ लऽ जाइत आ इलाज करबैत। हो न हो तहि‍ना कहीं आइयो ने हुअए। मनमे उठलनि‍ जे सभकेँ मनाही करी, मुदा सुनत के। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍तमे मन ओनाए लगलनि‍। ऑंखि‍ उठबैत तँ देखथि‍न जे जे स्‍त्रीगण सभ दि‍न सोझ मूड़ी खसबैत अि‍छ अाइ ओहो सभ बताहि‍ जेकॉं साड़ीक भरकौंच बन्‍हने लाठी फड़का रहल अछि‍। सबहक मन मारि‍येपर टँगल अछि‍। कोना उतड़त? मुदा तरे-तर खुशि‍यो होइत रहनि‍ जे नीक वस्‍तुक कीमतो बेसी होइत अछि‍। गुन-धुनमे फँसल मनधन बाबाक मन अपन दायि‍त्‍वपर पड़लनि‍। मुदा, एहि‍ हंसेरीक बोनमे दायि‍त्‍वक मोजर के देत। मुदा, तइओ एक भाग फराठीकेँ पकड़ि‍ दोसर भाग उठा इशारासँ सभकेँ शान्‍त होइले कहलखि‍न। मुदा, सभ अपने ताले, बेताल। गामक जत्ते कुकूड़ जतए रहै ओ बान्‍हक नि‍च्‍चॉं खेते-खेत भूकैत आगू पहुॅच गेल। छह मसि‍या बच्‍चा सभ चाि‍र बेरि‍ भूकै आ कनी-काल सुसता ि‍लअए। मनधन बाबाक मनमे उठलनि‍ जे बँसपुराक लड़कीक संग जे दुर्व्‍यवहार ि‍ससौनीबला लुच्‍चा सभ केलक अो गामक इज्‍जतक संग जुड़ल सवाल अछि‍। इज्‍जतक लेल जान देब पुरूखक काज छी। एकरा अधलाह के कहत। सभकेँ अप्‍पन-अप्‍पन इज्‍जत-आबरू बनबैक लेल, बना कऽ नि‍माहैक लेल कटए-मरए पड़तैक। से जँ नहि‍ रहत तँ कखन केकर इज्‍जत के लुटि‍ लेत तेकर कोन ठेकान अछि‍। भदबरि‍या बेंङ जेकॉं साले-साल तत्ते लुच्‍चा-लम्‍पटक जन्‍म भऽ रहल अछि‍ जे गामे-गाम सोहरल जाइत अछि‍। मुदा, गामक भीतर तँ ऐहन-ऐहन ि‍करदानी सदति‍ काल होइते रहैत अछि‍। तहन कहॉं ि‍कयो कि‍छु बजैत अछि‍। तहि‍ काल साला सभ कहत जे धु: छौंड़ा-छौंड़ीक खेल छी। दुनू बात मनमे उठि‍तहि‍ मुँहसँ हँसी नि‍कलि‍लनि‍। मुदा, गामक लोकक रूखि‍ हँसी कऽ दाि‍ब देलकनि‍। सोचए लगलाह जे एक्‍के रंगक काज लेल एकठाम लोक कटए-मरए चाहैत अछि‍ आ दोसर ठाम धि‍या-पूताक माने छौड़ा-छौड़ीक खेल बना उड़वैत अछि‍। अजीव अछि‍ लोकोक बुद्धि‍-वि‍चार। जहि‍ना सदति‍ काल एक पुरूष दोसर महि‍लापर नजरि‍ उठवैत रहैत अछि‍ मुदा अपन पत्‍नीकेँ दोसरक संग बजैत देखि‍ आि‍ग-बबूला भऽ ि‍कछु सँ ि‍कछु करैक लेल तैयार भऽ जाइत अछि‍ तहि‍ना ने अखनो भऽ रहल अछि‍। जहि‍ घटनाकेँ सामूहि‍क रूपे इज्‍जत बुझल जाइत अछि‍ ओहि‍ इज्‍जति‍क रकछो तँ समूहेकेँ करए पड़तैक। जँ खेल बुझत तँ खेल जेकॉं वुझह नहि‍ जँ इज्‍जत बुझत तँ इज्‍जत जेकॉं सुरक्षि‍त राखह। नहि‍ जँ गुल-गुल बुि‍झ दुनू करत तँ इज्‍जत-आवरूक बात करब छोि‍ड़ ि‍दअ। मन सक्‍कत हुअए लगलनि‍। रस्‍तापर फराठी नोकसँ डॉंरि‍ दैत कहलखि‍न-एहि‍ डाँरिसँ जँ ि‍कयो एक्‍को डेग पएर बढ़ेवह तँ एतै परान गमा देब। नहि‍ तँ अखन सभ शान्‍त भऽ जाह।‍ नहाइयो-खाइ बेरि‍ भेलि‍ जाइत अछि‍। भानसो-भात सबहक बन्‍ने छह। तेँ अखन जाइ जाह। खा-पी कऽ चारि‍ बजे ब्रह्मस्‍थानक आगूमे बैसि‍ आगूक रास्‍ता बना लि‍हह।
      मनधन बाबाक ि‍वचार सभ मानि‍ घरमुँहा भेल। तत्खनात झंझट ठमकि‍ गेल। मुदा मनक धधड़ा नहि‍ ि‍मझाएल। जहि‍ना चेराक धधकैत आगि‍मे पानि‍ ढ़ारलासँ धधड़ा बुझा जाइत मुदा, ताव रहबे करैत अछि‍ तहि‍ना लोकोक मनक आि‍गमे भेल। छोट-छोट टुकड़ी बनि‍ सभ ि‍वदा भेल। मुदा रस्‍तामे सभ क्रोध बोकरि‍तहि‍ रहए। सभकेँ डोरि‍आइत घर दि‍स जाइत देखि‍ मनधन बाबाक मन थीर भेलनि‍। घर ि‍दस घुमि‍ते मनमे उठलनि‍ जे जखन गामक लोकमे एते आि‍ग लगल अछि‍ तखन दुनू परानी कुसुमलालकेँ कते लगल हेतइ। से नहि‍ तँ ओकरा ऐठाम जाए बोल-भरोस दऽ अबि‍ऐक। अपन अंगनाक रास्‍ता छोड़ि‍ मनधन बावा कुसुमलालक ऐठाम पहुँचलाह। दुनू परानी कुसुमलाल दुखक अथाह समुद्रमे उगि‍-डूबि‍ रहल अछि‍। दुनू ि‍नराश। आशाक कतौ दरस नहि‍। दुनूक चेहराक रंग फि‍क्‍का। मनमे बेरि‍-बेरि‍ उठैत जे ि‍बनु इज्‍जतक जि‍नगी जीवि‍ नहि‍ जीबि‍ दुनू बरावरि‍। दुनू बेकतीकेँ देखि‍ मनधन बाबा चुपचाप मेह जेकॉं डेढ़ि‍यापर ठाढ़। ने कुसुमलाल ि‍कछु बजैत आ ने मनधन। मनमे होनि‍ जे कुसुमलाल हमरे सोलहन्‍नी दोखी बुझैत रहए। जहि‍ना प्रेमक अंति‍म सीढ़ी वि‍आह छी तहि‍ना तँ क्रोधक खूनो छी। हो न हो कोनो उझट बात कहि‍ दि‍अए। फेरि‍ मनमे एलनि‍ जे आइले तँ छी बोले-भरोस दइले। जीबठ बान्‍हि‍ कहलखि‍न-वौआ कुसुम, हमरा आगू तू बच्‍चा छह। तोरासँ बहुत बेसी एहि‍ दुनि‍यॉंकेँ चक्‍कर-भक्‍कर देखने छी। मनकेँ थीर करह। जे भऽ गेल ओ तँ नहि‍ घुमत। मुदा तइले की करी, कते करी, ई सभ बुझए पड़तह। ऐहन तँ नहि‍ ने जे सभ ि‍कयो ओही लागल परान गमा दाय। तू दुनू गोटे तँ बापे-माए छहुन। दुखी भेनाइ उचि‍ते छह। मुदा आइ की देखलहक? देखलहक ि‍क ने जे सगरे गामक लोककेँ असीम दुख भेलि‍ छैक। ई ि‍वचार मनसँ हटावह जे हम्‍मर इज्जत चलि‍ गेल। गरीब लोकक सभसँ पैघ दुश्‍मन ओकर गरीबी छि‍यै। गरीबी केबल अन्‍ने-पानि‍ धरि‍ नहि‍ होइत अछि‍। जि‍नगीक सभ पहलुक लेल होइत अछि‍। गरीबीक बान्‍ह ओि‍ह रूपे बन्‍हने अछि‍ जहि‍मे गारि‍-फज्‍झति‍सँ लऽ कऽ धन-सम्‍पत्ति‍, माए-बहीनि‍क इज्‍जत लुटै धरि‍ अछि‍। तहन जँ ि‍कयो हँसी-खुशीसँ जीवि‍ये लैत अछि‍ वएह एक लाख। गरीबीक ताला लोहोक तालासँ नमहर आ सक्‍कत अछि‍। लोहाक तालामे एक्‍केटा मुँह आ दॉंत होइ छै जहि‍मे कुन्‍जी घुमौलासँ भक दऽ खुजि‍ जाइत अछि‍। मुदा गरीबीक जे ताला अछि‍ ओहि‍मे अनेको मुँह आ दॉंत अछि‍। एकटा खोलबह दोसर लगि‍ जेतह। सोझे लगबे टा नहि‍ करतह, पहि‍लुकासँ कते गुना कस-कसा कऽ लगि‍ जेतह। तेँ, जहि‍ना कोनो आमक गाछ साले-साल रौद, बरखा, पानि‍-पाथर, ि‍बहाड़ि‍ जाड़ सहि‍ नमहर भऽ फड़ैत अछि‍ आ ओ फड़ मनुक्‍खसँ लऽ कऽ अनेको जीव-जन्‍तु धरि‍ बि‍लहैत अछि‍ तहि‍ना मनुक्‍खोक जि‍नगी छी। जखने गरीब घरमे जन्‍म लेलह तखने बुझि‍ जाहक जे ऑंखि‍ देखैले नहि‍ कनैले अछि‍। गारि‍ सुनैले कान अछि‍ आ मारि‍ खाइले देह अछि‍। गरीबक ऑंखि‍मे जते इजोत बढ़ैत अछि‍ तते नोरक समुद्र दि‍शि‍ जाइत अछि‍। जत्ते समुद्रक लग पहुँचैत अछि‍ ततै नोरक टघार अनवरताक रूपमे बदलैत अछि‍। जहि‍सँ अनवरत टघरैत रहैत अछि‍। तोहर दुख समाजक दुख बनि‍ गेल अछि‍। समाज ओहन कारखाना छी जहि‍मे देवतासँ लऽ कऽ छुतहर धरि‍ बनैत अछि‍। तेँ ने ककरो कहने ककरो इज्‍जत अबैत अछि‍ आ ने जाइत अछि‍। लोककेँ अपने केने होइत अछि‍ आ गमौने जाइत अछि‍।
      मनधनबाबाक बात सुनैत-सुनैत पवि‍त्री बोम फाड़ि‍ कानए लगली हि‍चुि‍क-ि‍हचुि‍क बजली-बाबा, ई तँ गामक मेह छथि‍न तेँ ि‍हनकर बात मानि‍ लेलि‍एनि‍। नै ते आइ सि‍सौनीमे आि‍ग लगौने ि‍बना नै छोड़ि‍ति‍यै। जखैनसँ बेटी आइलि‍ तखैनसँ एक्‍को बेरि‍ मुँह उठा नइ तकैए। कनैत-कनैत दुनू ऑंखि‍ डोका जेकॉं भऽ गेलै। सदि‍खन एक्‍केटा रट लगौने अछि‍ जे जीवि‍ये कऽ की हएत? जखन इज्‍जत चलि‍ये गेल तखैन कोन मुँह समाजकेँ देखाएव।
      पवि‍त्रीक बात सुि‍न मनधन बाबाक हृदए छोहोछीत भऽ गेलनि‍। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलनि‍। दुनू हाथसँ ऑंखि‍ पोछि‍ बजलाह-कनि‍यॉं, जकरा अहॉं इज्‍जत जाएव बुझै छि‍यै ओ जाएव नहि‍ छी। जोर-जबरदस्‍ती ि‍छयै। जोर-जबरदस्‍ती मुँहक कहलासँ नहि‍ मेटाएत छैक। ओकरा शक्‍ति‍सँ रोकल जाय पड़ैत छैक। गरीबक बीच ओहन शक्‍ति‍ अखन नहि‍ भेलि‍ अछि‍। जखन होएत स्‍वत: रूि‍क जाएत। अखन जोर-जबरदस्‍ती केि‍नहार बलगर अछि‍ तेँ सुझि‍-बुझिसँ चलए पड़त। इलाकामे कोन गाम ऐहन अछि‍ जहि‍ गाममे ऐहन-ऐहन ि‍करदानी नहि‍ होइत छैक। सभसँ पहि‍ने गरीबकेँ अपना पाएरपर ठाढ़ हुअए पड़तैक। जखन ओ ठाढ़ भऽ संगठि‍त होएत तखन शोषकक माने जबरदस्‍ती केनि‍हारक संग संघर्ष होएत। संघर्षोसँ समाज बदलैत अछि‍। समाज बदलने सभ ि‍कछु बदलि‍ जाइत अछि‍। तेँ कानू-खीजू नहि‍। समाजक संग पाएरमे पएर ि‍मला कऽ चलू।
  कहि‍ ि‍वदा भऽ गेलाह। घर दि‍सक वाट तँ मनधन बाबा धए लेलनि‍ मुदा, डेग उठबे ने करनि‍। तइओ बलजोरी बढ़लाह। फराठी हाथे कहुना-कहुना कऽ आि‍ब गेलाह, मुदा देहमे आि‍ग लगल रहनि‍। जहि‍सँ ि‍वचार ओझरा गेलनि‍। धरती-पहाड़क दूरी देखि‍ सोचति‍ जे कोनो आंगुर कटने अपने घाव हएत। भलेहीं अखन ई घटना छौड़ा-छौड़ीक खेल बुझल जाइत छल आइ सही रास्‍तापर आबए चाहैत अछि‍। तेँ घटनाकेँ रोकब उचि‍त नहि‍ हएत। पुन: मनमे उठलनि‍ जे दू गामक बीचक घटना छी। एक गामक रहैत तँ कने हल्‍लुको रहैत मुदा, दू गामक बीच ऐहन घटनाकेँ कते नमहर मानल जाए। मुदा छोड़बो तँ उचि‍त नहि‍। अदौसँ पहाड़ी धार जेकॉं नि‍च्‍चॉं मुहे बहैत आएल अछि‍, जेकरा रोकबो जरूरी अछि‍। जँ से नहि‍ हएत तँ वैश्‍वीकरणक ि‍बरड़ोमे उड़ि‍ कऽ अकास ठेि‍क जाएत। मुदा जहि‍ रूपे घटनाक जबाव बढ़ए चाहैत अछि‍ ओ तँ आरो ि‍बनाशक अछि‍। जहि‍ना एहि‍ गामक लोक सामाजि‍क प्रति‍ष्‍ठा बना कटै-मरैले तैयार अछि‍ तहि‍ना जँ कहीं ओहो-ि‍ससौनीबला सभ गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझि‍ ठाढ़ भऽ जाए, तहन ि‍क होएत? ठाढ़ो होइक कते कारण भऽ सकैत अछि‍। ओना सार्वजनि‍क स्‍थानक घटना होइतहुँ गाम आि‍ब लड़की बाजल। जेकरा गौवाँ मानि‍ रहल अछि‍। मुदा सही घटना रहि‍तहुँ ओ ि‍ससौनीबला मानि‍ये लेत सेहो जरूरी नहि‍ अछि‍। एक गाम दोसर गामपर बलजोरी कते काल कऽ सकैत अछि‍? कोनो बाटे नहि‍ सुझनि‍। दू गामक बीच तँ ि‍वचारेसँ रोकल जा सकैत अछि‍। मुदा जँ ऐहन घटना रोकल नहि‍ जाएत तँ सार्वजनि‍क स्‍थानक महत्‍वे कते दि‍न ि‍टकत। भुँइयेँमे दलानक ओसारपर कर बदलि‍तहि‍ मनमे एलनि‍ जे ऐहन घटना सामाजि‍क स्‍तरपर रोकब नीक हएत। मन असथि‍र भेलनि‍। बेरूका बैसारमे जाइ ि‍क नहि‍? मुदा, बाजल तँ हमहीं छी। फेरि‍ मनमे एलनि‍ जे चारि‍ बजे सौँसे गौवॉंकेँ बैसि‍ कऽ ि‍वचार करैले कहलि‍यै आि‍क ई कहलि‍यै जे तोरा सभकेँ ि‍वचार सुना देवह। दस ि‍मलि‍ करी काज, हारने-जीतने कोनो ने लाज। पाकल आम भेलहुँ, कखन छी कखन नहि‍ छी। इहो कोनो जरूरी नहि‍ अछि‍ जे हम्‍मर ि‍वचार सभकेँ सोहेवे करै। जँ नहि‍ सोहेतै तहन तँ ओरो मनमे दुख हएत। तहूमे मूलत: ई घटना महि‍लाक छी। जे पुरूष हजारो बर्खसँ ऐहन अपराध करैत आएल अछि‍ ओ सुहरदे मुँहे मानि‍ लेत। आन गामक घटना कहीं गामे ि‍दशि‍ ने चलि‍ आवए। अखनो धरि‍ समाजमे ऐहन कि‍रदानीकेँ लोक हँसि‍ये-चौल बुझैत अछि‍। फेरि‍ मनमे उठलनि‍, अपनो तँ आब बलजोरि‍ये जीवि‍ रहल छी नहि‍ तँ अपन दातारी कैकटा गाममे अछि‍। तेँ ि‍क समाजसँ हटि‍ जाइ? हटब तँ मुइलाक बाद, डाहैले के आओत? से देखवो करैले तँ नहि‍ आएव। अपनो परि‍वारमे देखै छी जे सि‍नेमा कलाकार आ खेलाड़ी सबहक कुल-खुटक नाओ जनैत अछि‍ आ अपनाक कल-खुटक जनि‍तहि‍ नहि‍ अछि‍। ऐहन तँ गड़ि‍बहू गाम अछि‍। ककरा कहबै, स्‍त्रीगणो सभ तेहन-तेहन आि‍ब गेल अछि‍ जे पुरूख सभकेँ गाि‍र पढ़ि‍-पढ़ि‍ कहैत अछि‍ जेहने छुतहर कुल-खुट रहत‍ह तेहने ने चालि‍ रहतह। आब कहू जे कुल-खुटक कोना दोख छै। नान्‍हि‍-नान्‍हि‍टा छौँड़ा शि‍खर-पराग खाए लगल अछि‍, एि‍हमे ककर दोख। जीबैतमे ऐहन-ऐहन लीला देखै छी आ परोछ भेलापर हीरा सजाओल मंदि‍र बना देत। तहि‍ बीच पोती आि‍ब कऽ कहलकनि‍-खाइले चलू ने बाबा? नहेबै नै?”
  केचुआइल सॉंप जेकॉं बाबा कहलखि‍न-चलै-फीड़ैक होश नहि‍ अछि‍। अहीठाम नेने आबह। पहि‍ने एक लोटा पानि‍ नेने आबह। कने मुँह-हाथ धोइ लेव।
     जहि‍ना गदगरल मन रहने खाइक इच्‍छा नहि‍ होइत तहि‍ना मनधनोकेँ वुझि‍ पड़नि‍। मुदा तइयो जी-जॉंति‍ कऽ खाए लगलाह। लाभर-जीभर चारि‍ कौर खाऽ लोटो भरि‍ पानि‍ पीबि‍ बजलाह-अन्‍न नहि‍ धसैत अछि‍। लऽ जाह।
  हाथ मुँह धाेइ चौकीपर ओंधरा गेला। मुदा जहि‍ना ज्‍वर-ऐलासँ कछमछी अबैत अछि‍ तहि‍ना चौकीपर एक करसँ दोसर कर घुमैत। बेर टगल देखि‍ उठि‍ कऽ फराठी हाथे ब्रहमस्‍थान दि‍शि‍ ि‍बदा भेलाह।
      तीनि‍ये बजेसँ एका-एकी लोक ब्रह्मस्‍थान पहुँचए लगल। चारि‍ बजेसँ पहि‍नहि‍ गामक लोक एकत्रि‍त भऽ गेल। मुदा एकटा नव घटना सेहो भेल। ओ ई भेलि‍ जे जहि‍ गाममे आइ धरि‍ कोनो पनचैती वा सार्वजनि‍क काजमे महि‍ला भाग नहि‍ लइत अबैत छलि‍ ओ घराघरी सभ पहुँच गेलीह। ओना आइ धरि‍ हुनका सभकेँ कहलो नहि‍ जाइत छलनि‍। मुदा जखन सबहक बीच माने पुरूष-महि‍लाक बीच समए नि‍र्धारि‍त भेल तखन हुनको माने महलो सभकेँ हौसला जगलनि‍। हौसला जगि‍तहि‍ टाट-फड़कक परदा तोड़ि‍ घरसँ नि‍कलि‍ तीत-मीठक सुआद लइले नि‍कललीह। अखन धरि‍ जे बुद्धि‍-वि‍चारक गाछ माटि‍क तर बीज रूपमे पड़ल छलनि‍ ओ एकाएक अकुर गेलनि‍। नजि‍र नचलनि‍ तँ देखलनि‍ जे अदौसँ आइ धरि‍ महि‍ला पुरूखक चारागाह छोड़ि‍ आरो ि‍कछु नहि‍ रहलीह। जबकि‍ बुद्धि‍-वि‍वेक आ हाथ-पाएर तँ सभकेँ छन्‍हि‍। केवल नीन तोि‍ड जगैक जरूरत अछि‍। चरैत-चरैत पुरूख महि‍लाक सम्‍पूर्ण ि‍जनगीकेँ, पाण्‍डु रोगी जेकॉं नि‍रस बना देने छथि‍। विवाहसँ पूर्ब ि‍शक्षा-वि‍हीन बच्‍चा जि‍नगी आ वि‍वाहक पॉंचे दि‍न उपरान्‍त समाजक कलंि‍कत वि‍धवाक जि‍नगी। जहि‍ना सामूहि‍क हत्‍याराकेँ जहलमे यातना भेटैत तहि‍ना महि‍लाक संग भेलि‍ अछि‍। मुदा आइ बँसपुरामे नव सूर्यक उदय भेल।
      बैसारमे पुरूख-नारी तँ पहुँचलीह मदुा, एक संग नहि‍ बैसि‍ फुट-फुट वैसलीह। एक भाग पुरूष आ दोसर भाग महि‍ला। ि‍बना अनुशासक बैसार तेँ दुनू बैसारमे सभ अपन-अपन पेटक बात बोकरए लगल जहि‍सँ दुनू ि‍दशि‍ अनधोल हुअए लगल। ि‍कयो ककरो बात सुनैले तैयार नहि‍। सभ अपने बजैमे बेहाल। मुदा पेटक बात सठि‍ते सभ पोखरि‍क पानि‍ जेकॉं शान्‍त भऽ गेल। कातमे बैसल मनधन बाबा समाजक रूखि‍ चुपचाप भऽ अकैत रहथि‍। सभकेँ चानि‍पर पसेना टघार देखथि‍‍। जहि‍सँ बुझि‍ पड़लनि‍ जे भीतरक गरमी नि‍कलि‍ रहल छनि‍। समस्‍याकेँ दू ढंगसँ समाधान करब सोचि‍ उठि‍ कऽ ठाढ़ होइत कहलखि‍न-अनकर घेघ देखैसँ पहि‍ने अपन देखू। जँ से नहि‍ देखब तँ ओहन दशा होएत जेहन हँसि‍ कऽ बजलासँ गंभीर वि‍चारकेँ होएत। सभसँ जरूरी अछि‍ गामक बीच जे ऐहन-ऐहन कुचालि‍ सभ चलि‍ रहल अछि‍ ओकरा बन्‍न करए पड़त। जँ से नहि‍ करब तँ आइ ओहन लकड़ीमे आि‍ग धऽ लेलक जे एक गामक कोन बात जे सइयो गामकेँ जराओत। औझका सूमा जे देखि‍ रहल छी ओ पुरूखसँ कम महि‍लामे नहि‍ अछि‍। तेँ दू बैसारकेँ एक बनाउ।

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

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