Monday, May 31, 2010

'विदेह' ५८ म अंक १५ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५८)- Part III


३. पद्य





३.६.१.राजदेव मंडल-तीन टा कविता २.सतीश चन्द्र झा-दूटा कविता



स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 . मे भेलनि  पिता स्व. पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व. कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज,  समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि,भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि।साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डा. बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डा. विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डा. दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |



!! जागू मॉ आद्या !!

सूतलि वतहिया मैया लागल केवाड़ अय ।
जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।

मधुकैटभ महिषासुर घातिनि,
धूम्रनयन चण्डादि निपातिनि,
बीजक शोणित सुरा पायिनी,
शुम्भ मारि कऽ शांति दायिनी
पसरल फेरो अघलहिया असुरी अन्हार अय ।
जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।

सौम्ये नंदिनी अति भयंकरे,
रक्त दंतिके मॉ अयोनिजे,
ताकू मॉ अपन संतति केॅ,
शाकम्भरि हरि लियऽ दुर्गति केॅ,
अहीं सॅ भेलै ताहिया दुर्गम संहार अय ।
जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।

भीमे क्षुधिते असुर भक्षिके,
अरूण नाशिनी साधु रक्षिके,
अत्याचार कही जॅ हेतै,
रक्षाभार अहीं पर एतै,
लऽ तिरसूल सुदर्शन पहिया लियौ अवतार अय।
जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।

महिमा अहॅक महान भवानी,
करू कतेक गुणगान भाविनी
भोग मोक्ष दुहू पवै अभव्या,
जे अहॅक धुरखुरू भाव्या,
हमहॅू संतति नहि वहिया हमरो अधिकार अय ।
जागू - जागू मॉ आद्या करियौ उद्धार अय ।
गंगेश गुंजन:
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।

अपन-अपन राधा
राधा-२३म खेप
(पछिला-२२ म खेप मे अपने पढ़ने रही-)

....
भरि पृथ्वी फूटल कोहा-खापड़ि जकाँएहि कालक साक्षात्कार मनुष्य जीवन यात्राक थिक सर्वाधिक अशुभ प्रारब्धक ठाम ! से ठाम की हम स्वयं ई अभागलि राधेहिक देह-प्राण- चित्त
? से खेत कि ई हमर -हमरे देह होअ' श्रीकृष्ण महराज ? यैह निसाफ ?'

जानि ने ककरा पुछलखिन राधा ई प्रश्न बा मने मे उचरलनि
, नहि जानि। जानथि श्रीकृष्ण !...

आब राधा-२३म खेप


क्रमश: कोना शिथिल भेल चलि गेलय शरीरक सब अंग
? परलो मे करोट फेरैत पर्यंत होअ' लगैत अछि आलस,

उठि क
' बैसबा काल तं एड़ी सं ल' गरदनि पर्यंत होअ' लगैत अछि उद्वेलित | आ जँ कहुना उठि क' बैसि गेलहुं किछु काल , तं उठि क' ठाढ़ होयबा क्षण तं सद्य: बुझायित रहैत अछि जे ई देह मथुरा ककाक खोपड़ी भ' गेलय| कनिक एक रती बसातो बहि जाय तं डोल' लगैत अछि |खसबा-खसबा पर बिर्त जेना कोनो क्षण -मथुरा ककाक खोपड़ी ! संभव दू टा बांस, दू बोझ खरही-खढ़क तैयार कएल गेल अपने हाथें -खोपड़ी,खुट्टा समेत छारल
पर्यंत एतबै सामग्रीक खोपड़ी
, कोनो क्षण खसि पड़बाक हालत में टगल ठाड़ !
हमर शरीर सैह भ
' गेलए...अनमन । की करी कतय जाय, कोना जाय या जाय किएक ?


एत्तैक असल प्रश्न त यैह कि जयबै कियै करी केकरो समीप
?
मुदा देहक तं अछि प्रतिपल एहि इच्छा कष्ट भरल दिन राति हमरे पर भार
यैह भार त बनि गेलए आब जेना आनक धनक क
' रहल होइ रक्षा
आनक अमानतक रक्षा में ई संपूर्ण चेतना
, अपने शरीर हाथ पैर आंगुरक शक्ति धरिक क' रहल अछि
दिन दिन हरण। बनौने जा रहल अछि सब प्रात किछु आर दुर्बल आर बेसंभार
|
केहेन पालकी में बीच बाट कनिया के राखि चलिए गेलए सब कहार
?
ई देह-ठठरी देहक ओहार लागल सबारी राखल रहि गेलए।
आब भ
' गेलए कतेक दिन, एहिना, एकहि ठाम!


बाट बटोही एक कात स निकलैत बढि जाइत अछि अपन अपन ठाम
पहिने कौतुहल तखन करूणा
, एक रती चिंता, आ अंतत: समाज के गारि पढ़ैत
बढि जाइत अछि अपन गंतव्य
|
हम लज्जा में कुंठित असुरक्षित
, बिदागरीक कनिया बीच बाट के पालकी में राखल पालकी|

किछु करबाक स्पृहा नहि बांचल अछि
, किछुटा करबाक नहि होइत अछि मोन |
मोन-देह तेना असोथकित लगैत रहैये... जेना कै कट्ठा खेत जोति क
' आयल हरबाह होइ |
बिना स्नान केने गमछा सं घाम सुखबैत बैसल कोनो गाछ तर।
एक रती आर सुस्ता ली
, एके रती आर...|तखनि उठि धार, करवा लेल स्नान
जे मोन हो थीर
ताहि एक रती एक रती में बैसल बैसल निन्न स..झूक
' लागल होय आ गाछे में लागि ओठंगि क'' गेल हो निन्न।


माथ पर सुस्ताइत चिडै़-चुनमुन्नीक मृदुल कलरवक हरियर पात स झरैत होय जेना देह पर
,

आकि बुन्न
| मुदा लागि गेल होय अनायास प्रिय |आंखि लागि गेल होय, आंखि लागि गेल होय आ
कियो ताकहु नै आयल होय
, बड़ी काल! एत धर जे भ' गेल हो मुन्हाइर सांझ |
जखनि आंखि खुजल त बुझाय लागल भोर...एकदम स भोर
एकर अर्थ जे आई भोर स दुपहरिया त भेल
, तकर बाद सांझ,..आ राति नहि भेल ।
से कोना धरफरैलए दतिमन कर गेलौं...त हंस
' लागल ठहाका मारि क' मनोरथा ! -
ई की भेलैक
, ई त बताह भ' गेलौ रौ, भरलो सांझ क' रहल छहु दतिमन|
तेकर त मतलब जे लदतऊ कनी काल में हर आ बड़द हंकैत बिदा हेतऊ बाध!
ई त बताह भ
' गेलौ..हा हा हा!'
लजा क
' ओ फेकैत नहि अछि दतमनि| करिते रहि जाइत अछि |
ई बुझैत कि भोरक ज़बर्दस्त भ्रम भैले
छैक
ओकरा
| मुदा अखेन सांझे
कहलकै- कि हैतै
, कियैक बर्बाद करबै नीमक ई ठाड़ि, जेकर क रहल छी दातमिन
दांते-मुंह साफ करवा लेल त
, कैल जाइत छैक दतिमनि
ज लोक कै दिन दू बेर नहा लियै त कोनो दोख नहि
, त दू बेर दतमनि क लेबाक लेल एतेक कियैक हंसी
जखन कियो नहि छै ल
ग पास, नितांत असकर अछि राधा
त के हंसलै ये ओकरा पर
, भोर भ जेबाक भ्रम में दतमनि कर लगवा पर के हंसलै ए !
कंठ त अवश्ये कोनो सखी अर्थात सखी बहिनपा के नहि छल
, तखन हंसल के ई पुरूख
चारू कात आंखि के किछु आर पसारत
, तकबाक चिन्हबाक प्रयास करैत भ गेली नब व्याकुल
बड़ी काल धैर माथ में छहक्का बजरैत रहलेन
, मोन खिन्न, खौंजाईत रहलेन, आ होयत की
अपन मुंह अपने नोचि ली
, अपन झौंटा अपने उपारि ली।
कहुना क
' करैत कुल्ला स दांत, सांझक दात्मैन संपन्न, मैल कुचैल आंचर स पोछ लगली मुंह
कि अपने हाथ पर बुझैलें दोसर एकटा परम शीतल अपनत्वक हाथ
अपने आंगुरि भ गेलेन अचानक अनचिन्हार- हम पोछि दिय मुंह राधा !
बड सुस्त छओ तोहर शरीर...
' स्नेह कोमल स्पर्श स पोछि रहल छथि हमर भीजल मुंह |
ओह त सैह हाथ थिक ई
???
-छोडू छोड़ू बड आयल छी दया देखबय लेल । राखू अपन नाटकक ई स्नेह अपने लग
|
आन ठाम देत काज
, अहां के कोन प्रयोजन राधाक ?अहां के एकर कोन चिंता!' .... मुदा झटकल कहां भ' रहल अछि तथापि हुनकर हाथ ?
हमरे आंचर स पोछैत हमर मुख
?

हाथक सामर्थ्य कियैक भ
' गेल अछि सुन्न !
-बड चलाकी के दुलार माधब
, नहि हमरे संगे ?'
..से की...से की राधा !..


-मुंहों पोछ
' बेसलहुं त हमरे आंचर स...अपन पीतांबरी की दूरि भ' जैत ?

नहि कैलहुं तेकरा एकोरती हमर मुंह स्पर्श स मलिन
, बेस !'


-बात से नहिं राधा
, हमर पीतांबरी सं तोहर कोमल मुंह खोखरा जेतउ |हमरा तेकर ने चिंता भेल|

देखैत नहि छहीं किदन कहां-दन टांकल छैक एहिमें सोना-रूपाक तार पन्नी सब-
माता जसोदाजीक कृपा सं..केहेन छैक खौंचाह-खरखर
?'
की त सुंदर लगैत छैन...मुदा तोहीं कह जकरा स हम तोहर मुंहौं नहिं पोछि सकी तेहन वस्त्रक कोन का़ज
?
अकार्जक...
'



-छोड़ू-छोड़ू बूझल अछि अहांक लीला
| हमरा जुनि सिखाउ |

देखू एक रती
, केहन खरखर अछि अहांक पीतांबरी, जाहि स चछां जायत हमर मुख ?' स्न्देहें
राधा यत्नपूर्वक छूबैत घीचलखिन कृष्णक वस्त्र
|
त से बात झलफल अन्हारक प्राय: करामाति !


-ओ त से ने कहू। क
' ' तं आयल छी कै पहर जमुना विहार !

सौंसे तीतल त अछि वस्त्र अहांक...
'


-नहिं राधा से बात नहिं
, से नहिं, करै हमर विश्वास...'

-त कोना अछि भीजल वस्त्र
, खाउ त हमर सप्पत!'

-कोना भीजल बस्त्र
, जदि नहिं चुभकलउं हैं जमुना में भरि सांझ त ?' राधा पुछलखिन

-तोहर सप्पत। ते नहिं। कारण किछु आन छैक राधा।
'

-की से त बूझी...
'

कृष्ण कठिन असमंजस में पड़ि गेलाह
|

की कहथिन्ह
, कहथिन्ह बा नहिं...


-कहैत नै कियैक छी
? सोचि रहल हएब कोनो बहाना, झुठ्ठे खेलहुं हैं हमर सप्पत, बुझलहुं

हम
| छूबिक कहू त हमर माथ, आर के रहै संग ?'
-झूठ नहिं। सुनै।
एकटा नेरू चरैत-चरैत जमुना में ओंघड़ा गेल रहैक
| एखनि नहिं अबैत छैक हेल' ओकरा | कनिक काल आर होयतै त रघुनी काकाक ओ नेरू डूमिए जेतैक जमुना मे|...
तैं जमुना में पैस
' पड़ल राधा, अपनी कोरा में उठा क' ऊपर कैलिए.\.अवश्ये ओकर माय फकरैत
छल हेते असहाय।
बुझहिं मै पर्यंत
, ' जाइत अछि- एहि सृष्टि में कखनो काल केहन असमर्थ, अपन संतान लेल पर्यंत
ओकरो कल्याणक नहि कैल भ
' पबैत छैक कै बेर जरूरी स जरूरी उपाय। ताहू
मै ओ भ
' जाइत अछि केहेन निरुपाय। एत' धरि जे संतानो लेल, संतानक दु:खे मायक फकरब होयत अछि बड असह्य काल।
बात ई छैक राधा
, तैं भीजल अछि हमर देह आर वस्त्र।'


आब भेलौ विश्वास बुद्धू !
'

राधा मातृ-व्याकुलता मे हुनकर देह-वस्त्र हँसोथ
' लगलीह होइत रहलीह बिकल। कतेक काल सँ छी भिजल देहें अहाँ ? सर्दी नहि भ' जायत हएत नहि ज्वर ? हम कोन उपाय करी आब। अछयो तव नहि कोनो पुरुष-वस्त्र।बेचैन भ गेलीह। कहाँ छनि पुरुखक कोनो वस्त्र घर मे। बजलीह, बल्कि पुछलखिन-' की करू, की पहिराउ अहाँ कें एखनि, बाजू ने।'

-से तं जानयँ तों
, तोहर उपाय। हम की कहियौ ? बस्त्र तँ ठिके जहि छौक हमरा योग तोरा लग मे। किंचित करैत अभिनय एक रती भ' ' गंभीर एक रती हास कएलखिन-' एकटा उपाय छौक, करबें से ?'

-
'बाजू जल्दी, की ? कहू।' राधा व्यग्र भेलीह। प्रत्याशा मे ताक' लगलीह कृष्ण दिस।

-अपने नूआ द
' दे' खोलि क', हम सएह पहिरि ली...'

ओहन झलफल अन्हार मे पर्यन्त स्पष्ट देखार देखलनि- श्रीकृष्णक ठोढ़क दुर्लभ कुटिल बिहुँसी
, राधा। सर्वांग संगीत-सुन्न भ' गेलनि चेतना । एक्के क्षण लेल मात्र मुनएलैन राधाक दुनू आँखि। बजलीह-

-
'हर्जे की माधव ! लिय' अहाँ कें ने लागय बोखार, हो नहि एको मिसिया कष्ट...लिय',...

सत्ते उतार
' लगलीह राधा अपना देह पर सँ आँचर खोल' लगली-साड़ी...। देखितहि कृष्ण भेलाह राधहु सँ बेशी व्याकुल।

-
' ई की करै छें राधा ! बताहि ! पकड़ि लेलखिन राधाक हाथ। -' जुनि हो एना उद्विग्न। कहलगलखिन हमरा ज्वर नहि हएत।मोन खराप नहि हएत। कनियें काल मे तँ चलि जायब आँगन| बदलि लेब भिजलाहा ई वस्त्र । नहि कर तों चिन्ता ।' राधाक कोमल कृश हाथ कें स्नेह सँ दबैत कर' लगलखिन कृष्ण हँसी-'...मुदा एकटा क', तोरो ई कोन चलाकी? देह परक साड़ी खोलि क' देबाक बदला राखल कोनो नइं द' सकैत छलेहें ? कि तं चिन्तो देखा देलौं आ कनियों हेतनि कृष्ण के लज्जा बाँचल तँ देह परहक साड़ी तं नहिये करता हरण। बूझल छौ । की सैह बुधियारी ने ? बाज..'. -' नहि माधव,एना नहि किचकिचाउ हमरा। नै करू ठठ्ठा। अहाँ कहाँ कहलौं राखल साड़ी देब' हमरा? से तँ कहलौं पहिरलहे दे। एको क्षण तखन किएक हो देरी ? एको क्षण किएक रह' पड़य भीजल अहाँ कें। आ जखन अहींक इच्छा से, तँ हमरा हेतु कोन बाट ? अहाँ जे मंगलौं सएह हम देलौं। हम द' रहल छी।' कहैत राधा शान्त,प्रकृतिस्थ। एको रती ने विचलित। बल्कि तकैत सम्मुख कृष्ण कें पीबैत...आंखि असोधार... -'मानि ले तोहर ई साड़ी पहिरने हम निकलितौं ..लोक देखितय..लोक की तोरे सखि-बहिनपा- तखन की होइतौक ? होइतौ नइं तोरा लाज? लोकक ?' ओ बिहुँसि रहल छलाह प्रेम कुटिल बिहुँसी । -से पक्ष अहाँक। हमर कोन मर्यादा आ लोक लज्जा। बनल रहय भरि समाज, से पक्ष आ दायित्व अहाँक कृष्ण, मात्र अहीक।कृष्ण अपन हाथ कान्ह पर पुनः केश पर फेरैत राधा कें ललाट पर लैत अलौकिक चुम्बन, बाँहि कें करैत किछु आओर प्रगाढ़, अनचोखे हिचुक' लगलाह।हिचुक' लगलीह राधा हुनके संग-बड़ी काल बड़ी काल, आर बड़ी काल...

एहिना चलैत बितैत रहल कएटा ने युग...
ज्योति सुनीत चौधरी
आसमानी आकाश
ऋतुक बदलैत रूप संग
धरैत भिन्न भिन्न रंग
बीति रहल मानवक जीवन
सभ दिन देखैत नव परिवर्तन
समस्याक आगमन बिन सूचना
अवधि सेहो अज्ञाते जेना
स्वयमकेँ कालानुसार रमौने
ध्येयपर मुदा आँखि टिकौने
विपरीत काल समाधान ताकैत
बाधाकेँ एक-एक कऽ छाँटैत
धैर्य आ परिश्रमकेँ हाथ धऽ
असंभवोकेँ बनाओल सम्भव
अनेक दिनुका अनवरत प्रयास
स्वच्छ विशाल आसमानी आकाश      
१.रामभरोस कापड़ि भ्रमर-गजल २. नन्द विलास राय-गीत

रामभरोस कापडि भ्रमर
गजल

समुद्रक गहिंरइ अपना भितर नुकौने

कतेको आश इच्छाके भरिसक दबौने

मुस्कीक इजोतमे फतिंगाके फंसबैत
,

भ्रम दीपक देखा मुंह सुरसाक बनौने ।

हा
,प्रकृति किए मुरुत गढलौं एहन,

छुरी भोंकितो सदैब जे छातीस लगौने ।

रुप भिनसर हो कि बेछप सांझ करिया
,

राजमार्गोके अनेरे एकपेरिया बनौने ।

सक्क छै जकरा निमाहत ग प्रीत नेह
,

आमंत्रण बटैत रही छिटकिल्ली लगौने ।

मायाजाल फंदामे बेरबेर घुरिआइछ भ्रमर
,

बुझी आगा छै कुण्ड तैयो चली डेग बढौने ।



नन्‍द वि‍लास राय

ग्राम
,पोस्‍ट- भपटि‍याही, टोला- सखुआ, वाया-
नरहि‍या, जि‍ला- मधुबनी, ि‍बहार।
 
गीत


कतेक दि‍नसँ हम
, चि‍ट्ठी लि‍खै छी,

कथी ले रूसर छी पि‍या
, ि‍कएक ने अबै छी

बीत गेलै दुर्गापुजा
, ि‍बतलै दि‍यारी,

ि‍बरहा सतबैए हमरा राति‍ कारी-कारी
,

एक दि‍न ि‍जबै छी पि‍या
, एक दि‍न मरै छी,

कथी ले रूसल छी पि‍या
, कि‍एक ने अबै छी।

जहि‍यासँ परदेश गेलौं अहॉं
, दि‍लकेँ नहि‍ अछि‍ चैन यौ,

कनेको नहि‍ दैत छी अहॉं हमरा गप्‍पक माि‍न यौ
,

नि‍नो नहि‍ अबै राति‍केँ तारा गि‍नै छी
,

कथी ले रूसल छी राजा ि‍कएक नहि‍ अबै छी।

गाछ सभमे लटकल अछि‍ एमकी रंग-बि‍रंगक आम यौ

आम खाइ ले पि‍या हमर
, आबि‍ जाएव गाम यौ,

भाेरसँ हम सॉंझ धरि‍ अहॉंक रास्‍ता तकै छी
,

कथी ले रूसल छी पि‍या
, कि‍एक नहि‍ अबै छी।

अपन शरीरपर पि‍या देबै अहॉं धि‍यान यौ
,

दुि‍नयॉंमे नहि‍ अछि‍ हमरा
, अहॉं छोड़ि‍ आन यौ,

अहॉंकेँ दीर्घायु खाति‍र पूजा करै छी
,

कथी ले रूसल छी पि‍या
, कि‍एक नहि‍ अबै छी

बुच्‍चीकेँ ओझा आनलक लँहगा-पटोर यौ
,

ऑंखि‍सँ झहरै हमरा दि‍न-राति‍ नोर यौ
,

बुच्‍चीकेँ दुल्‍हा देखि‍-देखि‍ हम जरै छी
,

कथी ले रूसल छी पि‍या
, कि‍एक नहि‍ अबै छी।

हमरा नहि‍ चाही राजा लँहगा-पटोर यौ
,

आम खाइ ले आएव मुदा
, अहॉं श्‍योर यौ,

चि‍ट्ठीसँ नहि‍ अएलौ अहॉं
, फोन करै छी,

कथी ले रूसल छी पि‍या
, ि‍कएक नहि‍ अबै छी।
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम : शिव कुमार झा,पिताक नाम: स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम: स्व. चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि : 11-12-1973,शिक्षा : स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम + पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति : प्रबंधक, संग्रहण,जे. एम. ए. स्टोर्स लि.,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि : वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डा. नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चौधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न

 
!! हे तात !!

विलखि रहल छी अन्हर जाल मे,
छोड़ि कत चलि गेलहुॅ तात ।
कॉपि रहल छथि सूर्यमुखी आ,
कुहरथि वृद्ध कनैलक पात ।।
टोलक सभटा नेना भुटका,
आश लगौने घूमथि वथान ।
के देत उदयन धामक पेड़ा,
के देत मिठगर मगही पान ।।
पंडित बाबा खाट पकड़लनि,
ककरा मुख सॅ सुनता गान ।
श्यामजी अश्रु इनार मे पैसलनि,
आव के कहतनि पैघ अकान ।।
आर्या मॉक दुआरि सुन्न अछि,
सत्संगी सभ ओलती मे ठाढ़ ।
भक्ति सागरक धार विलोकित,
लुप्त गगन मे अहॅक कहार ।।
अनसोहॉत ई दैवक लीला,
कोना वनौलनि मर्त्य भुवन ?
विज्ञानक ऑगन सॅ बाहर,
जन्म मरण जीवन दर्शन ।।
करतीह कोना श्रृंगार मेनका,
करतनि के रूपक वर्णन ।
देवराज छथि कोप भवन मे
जल विनु करव कोना तर्पण?
मुख मलीन कहियो नहि देखलहुॅ,
सुख दुख सॅ अहॉ विलग विदेह ।
अंतिम भीख मॅगै छी बाबू,
दर्शन दिऔ एक वेरि सदेह ।।
१. राजदेव मंडल-तीन टा कविता २. सतीश चन्द्र झा-दूटा कविता





राजदेव मंडल



1
कठुआएल-रूप



एहि‍ मुरूतकेँ पूजैत

आ गबैत मंगल गान

हम भेलहुँ जवान

मनमे छल पूर्ण आस

भरल आत्‍मवि‍श्‍वास

वि‍पत्ति‍मे होएत सहाइ

दैत रहलहुँ दोहाइ

करैत रहलहुँ जय-जय

कि‍न्‍तु हि‍नका सोझेमे

सभ कुछ हेरा गेल

हमरा सँगे भेल अन्‍याय

ओ देखैत रहल नि‍रूपाय

नहि‍ भेटल मेवा

कि‍एक करब सेवा

थुड़ि‍ कऽ देबै फेक

नहि‍ रहए देबै रेख

क्रोधसँ कँपैत हम

चला देलि‍एक लट्ठ

ि‍हनका माथपर

आ गातपर

टूटि‍ कऽ भऽ गेल छहोछि‍त हम भेलहुँ आश्‍चर्य चकि‍त

पर आशाक बीपरि‍त

मुरूतक भीतरसँ

नि‍कलल भयावह रूप

टुकुर-टुकुर तकैत

भेल अछि‍ चुप्‍प

हमरा दि‍श देखतहि‍

ओ लटुआ गेल

लाजसँ कठुआ गेल।





2
सुनगैत चि‍नगी

छाउरक ढेरीपर

मि‍झाइत चि‍नगी

सोचि‍ रहल अछि‍

अपना शक्‍ति‍क वि‍षएमे

डाहि‍ सकैत छलहुँ

सम्‍पूर्ण वि‍श्‍वकेँ

कि‍न्‍तु पड़ल छी आइ

उपेक्षि‍त सन

जीबि‍ रहल छी

एहि‍ आशापर

जे उठत जोरगर बसात

करत हमरा साथ

पहुँच जाएव भुस्‍साक ढेरीपर

आ पुन: लहलहा उठब हम

तखन डाहि‍ देव ओहि‍ महलकेँ

जे रँगल अछि‍ शोणि‍तसँ

खाक कऽ देव ओहि‍ जंगलकेँ

जाहि‍मे नुकाएल रहैत अछि‍

कुमंत्रणा करैत हि‍शंक जन्‍तु

आ हम अपना धधरासँ लि‍खब

नभपर नव इति‍हास।





3
अहॉंक आगवानी मे



हम सोचलहुँ-भेल अि‍छ

शुभागमन

ि‍कन्‍तु बसात बनौलक

पदचापक भ्रम

के रोकि‍ सकैत अछि‍

उड़ैत मनकेँ

फड़कैत तनकेँ

तेँ वि‍वशताबश

बन्‍न दरबज्‍जाक-रन्‍घ्र

बनि‍ गेल-चक्षु

नि‍हारबाक हेतु

चानकेँ

कि‍न्‍तु डर छल

उमड़त धनकेँ

तइयौ-आसमे डूबल

दि‍लकेँ थामि‍

एकटक तत्‍पर छी

आगवानीमे

परन्‍तु, भूत बनल जा रहल

वर्तमान

कि‍ पथ अछि‍ कंटकमय

वा दि‍ल पाषाणमय

भवि‍ष्‍यक अागि‍मे

जरैत मन

नीरीह तन।

२.


सतीश चन्द्र झा


भूखल पेट

सड़कक काते गली -गली सँ
पन्नी कागत बीछ - बीछ क
जीबि रहल अछि एखनो मानव
दृश्य ठाढ़ अछि केहन विकासक।

रद्दी-फद्दी, डिब्बा- डुब्बी
जे भेटल लगेल समटि क
गंदा-गुन्दी किछु नहि बूझत
जायत सभ ताकि हेरि क

जड़तै तखने ओकरो चुल्हा
भरतै पेट राति मे कहुना।
शिक्षा के अधिकार करत की
छै एखनो जे रोटी सपना।

फाटल साटल वस्त्र देह पर
लाज अबोधक कहुना छाँपल।
जएत कोना इस्कूल पीठ पर
शीशी बोतल दै किछु बान्हल।

छोट छोट नेन्ना उठि भोरे
दौड़ जाइत अछि रौद बसाते।
भरतै पेट कोना परिवारक
अछि गरीब अक्षर सँ काते।

मासक मास अभाव सुअन्नक
एक साँ किछु खा कजीबय।
अछि धिक्कार समाज राज्य कें
जौं आबो किछु भूखल सूतय।
सतीश चन्द्र झा, मधुबनी



पाँच साल

छल भेल प्रफुल्लित गाम गाम
जहिया जड़ शासन अंत भेल।
स्वागत मे जन जन छलै ठाढ़
सुन्दर भविष्य कें स्वप्न लेल।

बदलल प्रदेश के किछु बसात
सुख शांति फेर सँ उतरि गेल।
चलि पड़ल विकासक विवध चक्र
जीवन कें जड़ता लुप्त भेल।

सकल मुदा नहि चित्र अपन
संपूर्ण सुभग सुन्दर स्वरूप।
भ सकल नष्ट नहि एखनो धरि
भ्रष्टाचारक दानव स्वरूप।

बनि रहल योजना नित नव नव
घुरि रहल जिला सँ देल पाइ।
ऑफीसर लागू करत कोना
नहि छै जइ मे एकरा कमाइ।

प्रतिपक्ष अगिलका सरकारक
गद्दी लए अछि बुनि रहल जाल।
वातानुकुलित घरक जीवन
नहि किछु बुझतै रौदी अकाल।

छै आबि गेल ओ समय फेर
धन बल सँ सभ जीतत चुनाव।
सामर्थ्यवान के संग लेत
भूखल सँ एकरा की लगाव।


सभ दोष एक दोसर कें द
छीनत फुसला कपाँच साल।
सुख दुख ओहिना जीवन ओहिना
जहिना छल बीतल पाँच साल।
कामिनी कामायनी
बंजारा मोन
    मन मस्त मतंग फकीर बनल ।
   मन सोर करैत अछि बेर बेर  
    मन पड़ा रहल अछि फेर फेर
     डोलैत जाइए मन इम्हर उम्हर
     ई दंड  भेदसँ बाहर अछि ।
 मन झूठ फूइस गढि रहल सदा
मन दौड़ भाग करि रहल सदा
मन केँ परतारय लै प्राणी 
केहेन केहेन इतिहास गढल
मन ककरो बसमे आयल नै    
     मन जोगी भऽ रमि रहल इम्हर
      मन भोगी भऽ पड़ि रहल उम्हर
       मन केँ लाज लिहाज नै छै
       मन हेहर छै़ मन थेथ्थर छै
       ई चंचल पथ के राही छै ।
मन भागि रहल अछि चानक लेल
मन सूरूज देखि उधिया लागल
मन धरती पर छिछियाय रहल
मन अनंतमे सन्हियालि रहल़़
मन कखनो शांत प्रशांत नहि ।
       कखनो उकटा पैंचीमे
कखनो बाकसमे अटैचीमे
कखनो नरमे नारीमे
कखनो धोतीमे साड़ीमे
कखनो दादा परदादामे
कखनो मान मर्जादामे
हुलकी दैत अछि बेर बेर 
      गहनामे कखनो गुरियामे
      कखनो  भाँगक  पुरियामे
      कखनो तीमन तरकारीमे
       कखनो कोठीमे अटारीमे
       मायामे उनटै बेर बेर 
बिरहा पर मन अछि डूबि रहल
मल्हार पर अतिशय फूलि रहल
मन करै छै कखनो साम गान
कखनो कखनो फूसही बखान
कखनो कानैत अछि नोर झोर
कखनो हुलसति अछि जोर जोर ।
     मन सज्जन छै  मन हरीफ छै़
    मन तुलसी छै मन कबीर छै़
    मन के किछुओ अलभ्य नहि
    ई चारू लोकक मालिक छै़ ।
मन राह बाट के राहगीर
 लमहर चौरस वा बानवीर
  नृत्‍यरत अछि राति दिवस
  मन के कखनो विराम नहि
मनक पाथेय छै बस चिन्तन ।
     मन भ्रमण करै छै जुग जुगसँ
     ई सभ तर बूलै जुग जुगसँ
      मन रास विलास करैत सदा
      मन सन कोनो बंजारा नहि
  मन जोगी छै नागा जोगी ।
डॉ. शेफालिका वर्मा
1.इजोरियाक भाषा

चलु, परछाहीं क पार हम घुइम  आबी..
लिखल जे सांसक गाथा
मौनक भाषा में ओकरे हम
गुनगुनाबी........................
दर्द प्राण में अहाँक स्मृति केर
बिलखि बिलखि छटपटा रहल
आहत गीत उमढ़ी उमढ़ी
बैसि अधर पर कुहरि रहल !
साँझुक दम तोढ़ैत  बेला
चैती बयारक कम्पन
चांदनी बैसि हमर अहांक
लिखि रहल ओ भाषा
जे नै कहि सकलों हम अहांके
नहि कहि सकलों अहाँ हमरा
चलु, तखन इजोरिया से
पुछि आबी
अपन अहांक मूक गाथा
मौनक
भाषा में ओकरे हम  
गुनगुनाबी...........
+++

2.उपेक्षित
अपन सोचक बेडिंग
दिमागक कम्पार्टमेंट में
रिजर्व बर्थ पर दैत छी पसारि
कल्पनाक रंग विरंगी बिछोना
बेडिंग में से गेल बहिराय!
हृदयक नयन टुक टुक तकैत ऐछ
के आवि एहि भाविक  बेडिंग के
अपनाओत ???
मुठ्ठी से रेत जकां समय ससरी जायछ
आ सोचक बेडिंग ओहिना पडल रही जायछ
उपेक्षित अनछुअल...........  
कोंकणी कथा :             मर्णताळणी
मूल कथाकार :            संत भगवंत सावंत
हिन्दी अनुवाद :            डॉ. शंभु कुमार सिंह ओ श्री सेबी फर्नांडीस
मैथिली अनुवाद :         डॉ. शंभु कुमार सिंह

मृत्युकेँ टारब
कनिष्ठ अभियंताक जीप आबि रहल अछि.....सभ केओ काज पर लागि जाउ। गाछ पर चढ़ि मौध निकालबाक प्रयास क रहल फ्रांसिस पहाड़ीक बाटे हपसैत  अबैत जीपकेँ देखि सभ मजदूरकेँ चेतएबाक स्वरमे चिकरल आ स्वयं सेहो शीघ्रहिं नीचाँ उतरि गेल। बीड़ी पीबाक बहन्ना सँ काम बन्न क कए गप्प कर वला आ लगपासमे बैसल सभटा मजदूर हाँइहाँइ उठि हाथमे दबिया ल गाछबिरीछ काटए लागल। आइ  भोरहि सँ मजदूर सभ मोन लगा कए काज नहि केने छल। हमरा सभकेँ दाणे पहाड़ दए चढ़िकए अबैतअबैत साढ़े नओ बजि गेल रहय । आइ हम स्वयं ओकरा सभक समक्ष ठाढ़ भ कए काज नहि ल रहल छलहुँ एहिलेल ओहो सभ नहुएँनहुएँ काज क रहल छल। बिना काजक दिन खेपैत देखियो कए हम ओकरा सभ पर गोस्सा नहि क सकलहुँ। आइ हमर मोन नीक नहि रहय। भोरहिं सँ हम पहाड़क टिल्हा पर सातनक गाछक नीचाँ बैसल रही। हम जतए बैसल रही ओतए सँ नीचाँ सलावली नहरक काज चलैत रहैक, जे साफ झलकैत रहैक। बहुतो रास मशीनक हल्ला होइत रहैक। नहरक काज आधासँ बेसी भ चुकल छलैक। आगूक पाँचछओ बरखक भीतरहिं काज पूर्ण भ जएबाक उमेद रहैक आर ओहि नहरक पानि पीबा आर आन प्रयोगक लेल एहि दाणे पहाड़ पर ट्रिटमेंन्ट प्लान्ट बन वला रहैक। हमरा एतुका कार्यभार भेटबासँ पूर्वहिं निरीक्षण भ गेल रहैक। यैह किछु दिनमे काजक ठीका (निविदा) निकालि ठिकेदारकेँ काज संपन्न करएबाक आदेश द देल गेल रहैक। अगिले सप्ताह मुख्यमंत्रीक हाथेँ शिलान्यास हेबाक रहैक। एहिलेल ओहि जमीनकेँ चिह्नित करबाक लेल कार्यपालक अभियंता साहेब एतेक मजदूरकेँ लगा कए एहि महत्वपूर्ण जमीनकेँ साफ करबाक लेल कहने छलैक। काल्हि आ परसू तँ मजदूर सभकेँ लड़ाचड़ा कए हम नीक जकाँ काज करा लेने रही मुदा आइ हमर मोन काजमे नहि लागि रहल छल।
कनिष्ठ अभियंताक जीप पहाड़ीक बाटे एम्हरे आबि रहल छलैक आ ओहिसँ आबए बला आवाजसँ हमर बेचैनी बढ़ल जा रहल छल। सभ मजदूर दौड़ि कए काज करबाक नाटकमे लागि गेल, मुदा हमरा उठि कए ठाढ़ होएबाक साधंस नहि भेल। हमरा बुझाइत छल जेना हमरा देहसँ प्राण निकलल जा रहल हो। काल्हि भोरहिंतँ कनिष्ठ अभियंता द्वारा कार्यस्थल केर निरीक्षण क लेल गेल छलैक तखन एखन दिनक बारह बजे ओ किएक आबि रहल छलैक? निश्चित रूपेँ ओ हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल कए आबि रहल हेताह, हमरा लागल। आइ काज पर नहि जाउ भोरहिसँ हमर घरक लोक सभ कहैत छलाह। बाबूजी कखन अपन अंतिम साँस लेताह भरोस नहि। ओछाओन पर पड़ल बाबूजीक हालति एकदम खराप भ गेल छलनि। मुदा दाणे पहाड़केँ साफ करएबाक काज हमरा भेटल रहय। जँ एहिकालमे कोनहुँ प्रकारक व्यवधान भेलैक तँ हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी कार्यपालक अभियंता पहिनहिं द देने रहय। हम कनिष्ठ अभियंताक व्यवहारसँ नीक जकाँ अवगत रही एहिलेल हम घरक लोकसभक कथनी नहि मानि डिब्बामे दूटा रोटी राखि काज पर चलि देलहुँ। हमरा दाणे जंक्शन धरि पहुँचतहि आठ बजि गेल छल। सभ मजदूर अपनअपन दबिया आ डिब्बा ल कए हमर बाट देखैत छल। दाणे पहाड़ दिस जाएबला ट्रक सभक बाट नहि देखि हमसभ पयरे चलब आरंभ क देलहुँ जे जँ बाटमे कतहुँ ट्रक भेटि गेल तँ ओकरा हाथ द देबैक। मुदा कुर्डे पहुँच धरि हमरा सभकेँ एक्को टा गाड़ी नहि भेटल। ओतए सँ एकपेरिया बाटे अएबाक कारणेँ हमरा सभकेँ बड्ड विलम्ब भ गेल।
मरणशय्या पर पड़ल हमर बाबूजीक चिन्ता आर पैदल चलिकए अएबाक थकानक कारणेँ हमर प्राण कंठ धरि आबि गेल छल। आ एखन हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि ल कए आब वला जीपकेँ देखिकए हमरा आँखिक सोझाँ तारा नाचए लागल। गाड़ी ऊपर आबि रहल छल। केहनो हृदयविदारक समाद हो हम ओकरा सुनबाक लेल अपना मोनकेँ एकाग्रचित्त केलहुँ आ आँखि मुनि लेलहुँ। हमरा आँखिक समक्ष चित्र सभ नाचय लागल आब ओ जीप ठहरत.....कनिष्ठ अभियंता जीपसँ उतरि जेताह.....काज करएवला मजदूर सभसँ पर्यवेक्षक कतए छथि ?” पूछताह.....ओ लोकनि गाछ दिस आँगूर देखेतनि, अभियंता घुमिकए हमरा दिस उपर अओताह.....हमरा कान्ह पर हाथ राखि बजताह.....मिस्टर नायक......हमसभ एखन सांगे केर कार्यालय जाएब।  हम चुप रहब।
अहाँक लेल एकटा खबरि अछि....इट इज नॉट मच सिरियस.....(ओतेक चिंताजन नहि अछि.....) मुदा अहाँकेँ शीघ्रहिं घर बजाओल गेल अछि। हम जीप ल कए ओम्हरे जाएबला छी.....ओतहिसँ अहूँकेँ छोड़ि देब। कनिष्ठ अभियंता जानि-बूझिकए हमरा बाबूजीक मृत्युक खबरि नुका रहल अछि, ई हमरा पता लागत.....हमर करेज फाटि जाएत, हमरा आँखिमे नोर आबि जाएत।
यू इडियट (बदमाश).....,एमहर आउ ! राजा जकाँ बैसल छथि....नॉनसेन्स (बेकूफ)। अहाँकेँ देल गेल काजक कोनो परवाहि नहि अछि? आब अहाँकेँ घरहिं पठा देब.....।
सोचलहुँ की आ क्षणहिंमे भ गेल की, हमरो पता नहि चलि सकल। आँखि खोलिकए देखलहुँ तँ कनिष्ठ अभियंताक जीप ल कए आएल कार्यपालक अभियंता हमरा पर डाँटफटकारक बरखा केने जा रहल छल। अपना समक्ष राक्षस सदृश
ठाढ़ कार्यपालक अभियंताकेँ देखि हमर तँ हड्डी काँपि गेल।
हे भगवान, एहि ब्रह्म बबाक चाँगुरसँ हमरा मुक्ति दिया दिअ।
मोनहिमोन भगवानसँ प्रार्थना करैत हम कार्यपालक अभियंताक समक्ष ठाढ़ रहलहुँ।
अहाँक ओकादि एतेक बढ़ि गेल? मजदूर सभपर ध्यान नहि राखि, हमरा अबैत देखियहुकेँ ओतए साहूकार जकाँ बैसल रहलहुँ? ई सभटा काज चारि दिनक भीतरहिने संपन्न करएबाक लेल कहने रही , कमीना नहितन? एना तँ अहाँ हमरहु संकटमे द देब....ठहरू ! एखनहि हम अहाँकेँ सबक सिखबैत छी....हम एखनहि कार्यालय जा कए, अहाँक टर्मिनेशन ऑर्डर निकालि दैत छी...।
क्षण भरिक लेल हमरा एहन बुझाएल जेना एकटा अल्सेशियन कुकुर हमरा पर भूकैत एम्हरे आबि रहल अछि। हमरा मुँहसँ एक्कहुटा शब्द नहि नकलि सकल।
साहेब, हिनक बाबूजी बहुत बेराम छनि....एहिलेल ओ कनेक कालक लेल बैसि गेल छलाह, एकटा मजदूर हमर पक्ष लैत कार्यपालक अभियंताकेँ समझएबाक प्रयास कएलक मुदा साहेब पर हुनक बातक कोनहुँ असरि नहि भेलनि।
बेराम छथि तँ होमए दिऔक, जीवैत तँ छथि ने? एहि तरहक बहन्ना बना कए अहाँ काज परसँ बेसी नागा नहि रहल करू, नहि तँ सभदिनक लेल घरहिं बैसा देब। कार्यपालक अभियंता हमरा पर आओर भड़कि गेलाह। ओहि भरल दुपहरियामे हमरा आँखिक समक्ष तरेगन झिलमिलबए लागल।
जलेस सुपरवाइजर....(बेकाम पर्यवेक्षक....) एतए आउ.....देखू ई सभटा गाछबिरीछ कटवा लेब। परसू धरि ई सभटा साफ भ जएबाक चाही। मंगल दिन सी.एम. (मुख्यमंत्री) अओताह, ओहिसँ पहिने कनिष्ठ अभियंताकेँ चिन्हित करबाक लेल ई जगह साफसुथरा भेटबाक चाही। जँ ठीक समय पर ई काज नहि भेल तँ हम अहाँकेँ देखि लेब।
अहूँ सभ केओ सुनि लेलहुँ की नहि? सभ मजदूरकेँ सुनएबाक लेल ओ ओकरा दिस देखलक आ जा कए जीपमे बैसि गेल।
पल भरिक लेल हमरा एहन लागल जेना ढ़लानसँ उतर वला ओहि जीपक पाछू हमरा डोरिसँ बान्हि घिसियाओल जा रहल अछि। हमरा आँखिमे नोर आबि गेल। नोकरीसँ निकालि देबाक धमकीसँ हमर सौंसे देह सुन्न भेल जा रहल अछि, हमरा एहन बुझाएल। एहि नोकरीसँ हाथ धो लेब हमरा बसक गप्प नहि छल। बी.कॉम. कएलाक बाद लगभग दू वर्ष धरि हम बेरोजगार रही। पछिले साल बाबूजीकेँ लकवाक प्रकोप भेल छलनि ओ तहिएसँ ओछाओन पकड़ि नेने छथि। बाबूजीक दवाइ, कॉलेजमे पढ़ए वला अपन छोट भाय आर मैट्रिकमे पढ़यवाली अपन छोटकी बहिनक सभटा दायित्व हमरहिं कन्हा पर छल। कतेकोक पयर पकड़लाक पश्चात् हमरा हिसाब-किताबक काज भेटल छल, मुदा डेढ़ दूइ सय टकासँ बेसी हमरा कहियो नहि भेटि सकल। कतेको पैरवीक केलाक पश्चात् हमरा बारह टकाक दैनिक मजदूरी पर सुपरवाइजर (पर्यवेक्षक)क ई काज भेटल छल। हमर दुब्बर-पातर कद-काठी देखि कनिष्ठ अभियंता हमरा सुपरवाइजरक नोकरी देबाक लेल किन्नहुँ राजी नहि छल, मुदा ओकरा लग ल जाएबला हमर शुभचिन्तक हमर विषम परिस्थिति आ लचारीक तेना ने बखान कएलनि जे नहियों चाहैत ओ हमरा ई नोकरी द देलक। हमर छोटो छिन गलती केँ ल कए ओ हमरा सदिखन उँच-नीच कहैत रहैत छल। पछिला तीन माससँ तीन-सवा तीन सय टकाक महिनवारी दरमाहासँ हम साधारण रूपेँ अपन जिनगी चला रहल छलहुँ। एहि सप्ताह बाबूजीक तबीयत बिगड़ि जेबाक कारणेँ हमरा लग जतेको पाइ छल, सभटा हुनक दबाइ आ डागदरक पाछू खर्च भ गेल। जँ बाबूजीक संग किछु भ गेलनि तँ हम कोना की करब, से सोचबाक साहस आब हमरामे नहि रहि गेल छल।
हम अंतर्द्वन्द्व मे फँसि गेल रही। कार्यपालक अभियंता हमरा नोकरीसँ निकालि देबाक धमकी द कए गेल छल।  हमरा बुझाइत छल जेना हमर हड्डीक मज्झा जमल जा रहल अछि। कोनो मजदूर दौड़ि कए हमरा थाम्हि लेलक आ गैलन मे भरल पानिसँ हमरा आँखि पर छिट्टा देलक नहि तँ हम ओतहिं अचेत भ कए गिर जेतहुँ।
खएलाक पश्चात् हम भारी मनसँ ओतए आबि ठाढ़ भ गेलहुँ जतए आन मजदूर सभ काज करैत रहथि। हमर नजरि घूमि-फिरि ओहि बाटक दिस जा रहल छल। बाबूजीक मरबाक खबरि ल कए जीप आब आएल तब आएल, यैह सोचैत-सोचैत हम आधा दिन बिता देलहुँ। हमर एहि स्थिति पर दया करैत मजदूर सभसँ जतेक संभव भ सकलैक ततेक काज क देलक। जँ मजदूर सभ एहने लगनसँ काज करैत रहल तँ ई काज काल्हि धरि पूरा भ जेतैक, हमरा बुझाएल। साँझुक पहर हम जल्दीए निकलि कए पहाड़ीक बाटे उतरैत नीचाँ आबि गेलहुँ। लकड़ी ल जाएबला ट्रक भेटि गेलाक कारणेँ हम राति हेबासँ पहिनहिं बजार पहुँचि गेलहुँ। झटकि कए चलि हम घरक बाट पकड़लहुँ। पिचरोड खतम भेलाक बाद गली वला माटिक सड़क पर हमर चालि कने मद्धिम भ गेल। एहि गलीक ओहि छज्जाकेँ पार कएलाक बाद हम अपन वार्डमे पहुँचि जेतहुँ। हम सोचए लागलहुँ जे हमरा आँगनमे हमर किछु पड़ोसी लोकनि हाथ पर हाथ ध ठाढ़ छथि। हमरा देखतहिं ओ लोकनि अपनामे गप्प करए लगलाह। हम जेना-जेना घरक दिस बढ़ैत रही तहिना-तहिना कानबाक शोर बढ़ैत जा रहल छल। जहिना हम अँगना पहुँचब, एकटा पड़ोसी आबि हमरा गल-बाँही द घर ल जैताह। घरमे बाबूजीक प्राणहीन लहास पड़ल रहतनि। एकटा कोनमे कानि-कानि कए बेदम भेल हमर माय आ बहिनकेँ सम्हारबाक लेल पड़ोसक औरत लोकनि बैसल हेतीह। हुनका सोझाँ सोडाक बोतल आ काटल पेयाजु राखल रहतनि। बाबूजीक लहासक समक्ष एकटा दीप राखल हेतनि। एक दिस तश्तरीमे अगरबत्ती राखल रहत। लगहिमे एकटा पात्रमे चीनी राखल रहत। ओहिमे लोक सभ द्वारा चुट्टासँ उठाओल गेल चीनीक चेन्ह होएत। हमहूँ ओहिमेसँ एक चुट्टा चीनी उठाएब आ बाबूजीक फूजलका मुँहमे ध देबनि आ बाबा कहि जोरसँ कानए लागब।
जखन हम आँगन पहुँचलहुँ तँ हमरा केओ नहि देखना मे आएल। घरसँ ककरहुँ बाजबाक आवाज आबि रहल छलैक। हम जूता खोललहुँ आ नहुएँ-नहुएँ पयर राखैत भीतर चलि गेलहुँ।
आउ बाउ! शायद अहींक खातिर हिनकर प्राण कंठ धरि आबिकए अटकि गेल छनि। आब हिनका एहि कष्टसँ मुक्तिए भटि जेबाक चाहियनि, हमरा भीतर अबैत देखि हमरा माय लग बैसलि एकटा औरत बाजलि। हम बाबूजीक ओछाओन दिस देखलहुँ। जाहि गतिएँ हुनक छाती उपर-नीचाँ होइत छलनि, हमरासँ देखल नहि जा रहल छल। मुँह सँ निकल वला शब्द सुनमे नहि आबि रहल छल। आँखि खुजले छलनि। बाबूजीक ई स्थिति देखि हमरा बुझा पड़ल जेना ओ सरिपहुँ हमरहिं बाट जोहि रहल छलाह।
हमर  छोटकी बहिन हमरा चाह देलनि। चाह पीबि हम अँगपोछासँ अपन मुँह झाँपि बाबूजीए लग बैसि गेलहुँ।
देखा पर चाही, जँ आजुक राति ई काटि लैत छथि तँ..... नहि जँ आइ रातिए किछु भ गेलनि तँ एहना स्थितिमे एमहर-ओमहर दौड़ब नहि, काल्हि भोरहिं उठिकए संबंधी लोकनिकेँ समाद पठा देबनि, की ठीक ने? हमरा भरोस देबाक लेल एकटा पड़ोसिन कहलथि। अँगपोछासँ झाँपल अपन माथ डोला हम हँ कहलियनि। राति बढ़ल जा रहल छलैक मुदा हमरा निन्न नहि आबि रहल छल। हम ओतहि बैसल रहलहुँ। रातिक बारह बाजि गेल रहैक मुदा बाबूजीक घर्र-घर्र केर आवाज एखनहुँ नहि कम भेल रहनि। घरक आन सभ सदस्य एमहर-ओमहर कोनमे सूति रहल छलाह। राति तीन बजे धरि बाबूजीक हालतिमे कोनहुँ सुधार नहि भेलनि। मुदा भोर होइतहिं हम द्वन्द्वक स्थितिमे आबि गेलहुँ। आब की करी? नोकरी पर जाइ, वा नहि? काज एकदम अनिवार्य रहैक आ  जँ हम नहि गेलहुँ तँ कार्यपालक अभियंता हमरा छोड़त नहि। जँ कार्यपालक अभियंताक डरे नोकरी पर चलियो गेलहुँ आ एमहर बाबूजीक संग किछु खराप भ गेलनि    तखन की हैत?
माए.... हम नोकरी पर चलि जाउ? हम साहस ककए माए सँ पूछलहुँ। माए तँ किछु नहि बाजलीह मुदा एखनहि हमरा घर आयल हमर किछु पड़ोसी सभ हमरा पर अपन गोस्सा निकालए लगलाह।
साँचे अहाँक दिमाग ठौर पर अछि कि नहि?  एतए अहाँक बाबूजी मरण-शय्या पर पड़ल छथि आ अहाँकेँ नोकरी सूझैत अछि?
नहि, नहि हमर कार्यपालक अभियंता बड्ड खरूस छथि।
ओ शैतान छथि की? नीक-बेजाए केर ओकरा ज्ञान नहि छनि?
हम चुप भ गेलहुँ। दुपहर होइत-होइत घर्राहटि आर बढ़िते गेलनि।
चलू नीके छैक.... आइ बृहस्पति दिन छैक, प्राण छोड़बाक लेल आजुक दिन उत्तम अछि। हमर बूढ़ पड़ोसिन बाजलथि। एतबा सुनतहि हमर माए आर जोर-जोर सँ कानए लगलीह।
साँझ होइत-होइत हमरा मोनमे आर डर समा गेल। जँ आइयो बाबूजी प्राण नहि निकललनि आ हुनक मृत्यु नहि भेलनि तँ काल्हि काज पर किएक नहि आएल छलहुँ?’ एकर स्पष्टीकरण हम कनिष्ठ अभियंता केँ कोना देबनि? बाबूजी मरि गेलाह तकर पहिलुक दिन अहाँ काज पर किएक नहि एलहुँ? एहि तरहक प्रश्न सभ पूछि-पूछि ओ हमर पिंड नहि छोड़ताह.....जँ हम नोकरी पर नहि गेलहुँ आ मजदूर लोकनि काजकेँ आर बेसी घिच लैक तखन.......? आ एहि गोस्साक कारणेँ जँ ओ हमर टर्मिनेशन आर्डर निकालि देलक तखन.....? कार्यपालक अभियंताक काल्हुक पल-पल केर दृश्य हमरा आँखिक सोझाँ नाचय लागल।
दू बजेक पश्चात् खराप नक्षत्र आरंभ होइ बला रहैक, ओहिसँ पहिनहि हुनका मुक्ति भेटि जयबाक चाहियनि.....! केओ एहन बाजलथि। मुदा हमरा बुझाएल दू बजे नहि बारह बज सँ पहिनहि हुनक प्राण जयबाक चाहियनि, ताकि बाबूजीक मृत्यु बृहस्पतिए दिन भ गेल छलनि, कार्यपालक अभियंताकेँ बतएबामे हमरा सुविधा होएत।
राति आठ बजे हम एक बाटी मरगिल्ला खा बाबूजी लग बैसि गेलहुँ। काल्हि राति भरिक जगरनाक कारणेँ हमरहुँ आँखि निन्नक बाट जोहि रहल छल। एखन हमर आँखि लागलहि छल कि केओ हमरा हाथ लगा उठा देलक। घरमे सात-आठ पड़ोसी लोकनि ठाढ़ छलाह। हुनका सभक आँखि बाबूजी पर स्थिर भ गेल छलनि। बाबूजीक मुँहसँ होमए वला घर्र-घर्र केर आवाज आर बेसी भ रहल छलनि। हम जल्दीसँ उठिकए बैसि गेलहुँ। बाबूजीक आवाज आर बढ़ि गेलनि। क्षण भरिक लेल हुनक सौंसे देह हिललनि आ अचानक सभ किछु शांत भ गेल। कतेक बाजि रहल छैक, कने ध्यानसँ देखियौक केओ? केओ बजलाह। केओ आगू बढ़ि पलंग सँ लटकल बाबूजीक हाथ सीधा क कए हुनक फुजल आँखि बन्न क देलकनि।
हमर माए आ बहिन एक्कहि सँग जोर सँ चिकरैत बाबूजीक लहास पर हाथ राखि कानब शुरू क देलथि। एखन धरि ठाढ़ भए हमरा बाबूजीकेँ देखवला हमर भाए झुकिकए गिरहि वला छल कि तखनहि केओ हुनका पकड़ि लेलकनि आर ओकरा मुँह पर पानिक छिट्टा देलकनि। मुदा हमरा तँ नीक लागल।
हम एकटा दीर्घ निसाँस लेलहुँ आर देखलहुँ.....हमर बाबूजी.....हमर खून, हमरहि सोझाँ मरल पड़ल छथि.....,हमर साक्षात् बाबूजी हमरा सदाक लेल छोड़िकए चलि गेल छलाह। हम ई देखतहिं रहि गेलहुँ।
ने जानि कोन-सन अनुभूति हमरा करेज सँ बाहर आबि गेल, बाबूजीकक लहास पकड़ि हम फूटि-फूटि कए कानब शुरू क देलहुँ.....
हम्मर बाबूजी.........। 

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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

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