Friday, May 14, 2010

'विदेह' ५७ म अंक ०१ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५७)- PART III



जगदीश प्रसाद मंडल
जीवन संर्घष-  3

नीन टुटि‍तहि‍ ओछाइनेपर दुखनीक मनमे उपकल आइये दीयोबाती छी आ काली-पूजाक मेलो गाममे हएत। ऐना कऽ बेटी श्‍यामाकेँ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍नहि‍ धीया-पूताकेँ नेने अवि‍हेँ, से कहॉं आइलि‍। ओहो बेचारी की करत? अन्‍न-पानि‍ घरमे हेतै मुदा, तीनू तूर जे मेला देखत तइ लए तँ दसो-बीच रूपैया खर्च हेबे करतै। जँ कहीं अपना हाथ-मुठ्ठीमे नइ होइ तेकरो इन्‍जाम ने करए पड़तै। भऽ सकैए जे तेकर ओरि‍यान नइ भेल होय। हँ, हँ, भरि‍सक सएह भेल हेतै। ओना आइ भरि‍ अबैक समए छै, बेरो धरि‍ ऐवे करत। खाइले चाउर आ देखैले रूपैया नेने औत मुदा, जरना तँ नै आनत। अखन धरि‍ हमहूँ तँ जरनाक कोनो ओरि‍यान नहि‍ये केलौंहेँ। आब कहि‍या करब? भने मन पड़ि‍ गेल। सोचने छेलौं जे श्‍याम आउत तँ घर-अंगनाक काज सम्‍हारि‍ देत सेहो नहि‍ये भेल। भरि‍ये ि‍दनमे की सभ करब। घरो छछाड़ै लए अछि‍, ओलति‍यो ओहि‍ना पड़ल अछि‍। कन्‍ना असकरे एते काज सम्‍हरत? ओलतीमे माटि‍ भरब, ि‍क घर छछाड़ब आि‍क जरना आनव। काज देखि‍ अबूह लगि‍ गेलइ। असकताइत मने वि‍छानसँ उठि‍ ओलती देखलक। मुदा रौदि‍याह समए रहने माटि‍ देव जरूरी नहि‍ वुझि‍ पड़लै। काज हल्‍लुक होइत देखि‍ मनमे खुशी एलै। ओलति‍येमे ठाढ़ भऽ ओसार ि‍हयासलक। कतौ चुबाट नहि‍ देखि‍ सोचलक जे छछाड़वो जरूरी नहि‍ये अछि‍। बाढ़नि‍सँ झोल-झाड़ झाड़ि‍ देवै। आरो मन हल्‍लुक भेलै। मन हल्‍लुक होइते बाढ़नि‍ लऽ घरो-ओसारक झोल-झार झाड़ि‍, अंगनो बहारलक। बाढ़नि‍ रखि‍ घैला नेने कलपर गेल। छउरेसँ मुँह धाेइ-कुड़ड़्ा कऽ घैल भरने आंगन आइलि‍। पानि‍ पीबि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ सोचलक जे एक जूम खाइयो लेब आ दू जूम बान्‍हि‍ कऽ बाधो नेने जाएव। सएह केलक।
     ओनो दुखनी पहि‍ने तमाकुल नहि‍ खाति‍ छलि‍, हुक्‍का पीबैत छलि‍। मुदा जहि‍यासँ लबहदक ि‍मल बन्‍न भेल तहि‍यासँ छुआ भेटवे बन्‍न भऽ गेल। जहि‍सँ पीनी महग भऽ गेल। घर बन्‍न कऽ कान्‍हपर लग्‍गी नेने मारन बाध वि‍दा भेलि‍। बाधक अधा भाग नि‍च्‍चॉं दि‍स खेती होइत बाँकी उपर दि‍स गाछि‍ये कलम अछि‍। बड़बढ़ि‍या आमक गाछक नि‍च्‍चॉंमे ठाढ़ि‍ भऽ सुखल ठौहरी सभ ि‍हयासए लागलि‍। रौदि‍याह समए रहने मनसम्‍फे जारन देखलक। जारन देखि‍ मन चपचपा गेलइ। आँचरक खूँट खोलि‍ तमाकुल नि‍कालि‍ एक चुटकी मुँहमे लेलक आ फेरि‍ बान्‍हि‍ लेलक। तमाकुल मुँहमे लइते मन पड़लै जे उक बनबै लए खढ़ कहॉं अछि‍। आन साल लोक आसीन-काति‍कमे खढ़होरि‍ कटबै छलए ओइमे सँ दू मुठ्ठी रखि‍ लइ छेलौं। जइसँ सालो भरि‍ बाढ़नि‍यो भऽ जाइ छलए आ उको बना लेइ छेलौं। मुदा जेहन बाढ़नि‍ चड़ि‍काटूक होइए तेहन राड़ीक थोड़े होइए। हारल नटुआ की करत? तते ने लोक बकरी पोसि‍ नेने अछि‍ जे कतौ एकोटा चड़ि‍कॉंटू रहए दैत अछि‍। तहूमे तेहन रौदि‍याह समए भेल जे घसवाह सभ चोरा-चोरा घासेमे काटि‍ खरहोरि‍यो उपटा देलक। कथीक उको बनाएव? उक नै हएत तँ पावनि‍ कोना हएत। गाम ि‍क कोनो शहर-बजार छि‍यै जे ने लोक घरमे सीर-पाट रखैए आ ने उक फेड़ैए। सोझे छुड़छुड़ी-फटक्‍कासँ पावनि‍ करैए। नजरि‍ खि‍रा खढ़ भजि‍अवए लागलि‍। भजि‍अवैत गंगवापर नजरि‍ गेलइ। बुदवुदाइल- ‘‘त: अनेने एते मन औनाइ छलए। घरे लग पोखरि‍क महारपर खढ़क जाक लगौने अछि‍। ओहीमे सँ लऽ आनब। मुँहमे खैनी घुलि‍तहि‍ थूक फेकलक। खढ़क ओरि‍यान देखि‍ मन सनठीपर गेलइ। ि‍बना सनठि‍ये उक कन्‍ना बनाएव? मनमे खौंझ उठलै। खौंझा कऽ बाजए लागलि‍- ‘‘सभ खेतबला पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। आब अपनो उक बना लि‍अ। हमसब तँ सहजे गरीब छी अपना खेत-पथार नै अछि‍। मुदा खेतोबला उक फेड़ि‍ लि‍अ। माल-जालकेँ ठेका-गरदामी बना लि‍अ। आनह आब बजारसँ कीनि‍ कऽ प्‍लास्‍टि‍कक डोरी। अपने मालकेँ डोरीक रगड़ा लगतै, चमड़ी उड़तै माछी असाइ देतै, घा हेतै, मरतै। तखन बुझत जे पटुआ नै उपजेने केहन भेल।’’ बजैत-बजैत दुखनीक तामस कमल। ि‍बनु सनठि‍ये जँ उक बनाइयो लेब तँ भोरमे सूप कथी लऽ कऽ बजाएव। लछमी ि‍दन छी जँ सूप बजा दरि‍दराकेँ नै भगाएव तँ ओ ि‍कन्‍नहुँ भागत। अपने गप-सप्‍प करै लागलि‍- ‘‘कोनो की हमरेटा सेठी नै हएत ि‍क गामेमे ककरो नै हेतै?’’
  ‘‘अनका भेने हमरा की? ि‍कयो अपन दरि‍दरा भगौत आि‍क दोसराक?’’
  ‘‘जँ कोनो जोगार कऽ सभ संठीक ओरि‍यान कऽ लेत आ हमरा नै हएत तखन तँ सबहक भागि‍ जेतै आ हमरे रहि‍ जाएत।’’
     दुनू हाथ माथपर लऽ संठीक चि‍न्‍तामे दुखनी डूबि‍ गेल। रसे-रसे हूब टूटए लगलै। मन औनाए लगलै। जहि‍ना कोनो भारी चीज अांगुरपर पड़ि‍ गेलासँ छटपटाइत तहि‍ना संठीक सोगसँ मन छटपटाए लगलै। तरे-तर नजरि‍ गाममे टहलबए लागलि‍। एक बेरि‍ टहला कऽ देखलक तँ कतौ नहि‍ संठी अभरलै। फेरि‍ दोहरा कऽ टहलबए लागलि‍। फेरि‍ नहि‍ कतौ अभरलै। मन कहै जे ि‍बनु संठि‍ये उक अशुद्ध हएत। अशुद्ध उक गोसॉंइक आगूमे कन्‍ना फेड़ब। ओहो की बुझताह। फेरि‍ मनमे भेलै गरीब लोककेँ एहि‍ना सभ चीजक खगता रहै छै मुदा, कहुना तँ जीवि‍ये लइए। देवतो-पि‍तरकेँ बुत्ता नै छनि‍ जे अपनो पावनि‍-ति‍हारक ओि‍रयान करताह। संठी ताकब छोड़ि‍ डि‍हवार स्‍थानक भागवत मन पड़लै। भागवत मनमे अवि‍तहि‍ महाभारतक कृष्‍णकेँ कुरूक्षेत्रमे शंख फूकैत देखलक। मुदा जखन व्‍यासजी अर्थ बुझवए लगलथि‍न ि‍क तहि‍ काल खैनी खाइक मन भेलइ। ऑंचरक खूँटसँ खैनी नि‍काि‍ल चुनवए लागलि‍। अर्थ सुनबे ने केलक। भागवतक कम्‍मे बात रहै मनसँ नि‍कलि‍ गेलै। फेरि‍ संठि‍येपर मन आि‍ब गेलइ। पटुआक संठीक बदला चन्‍नी आ सनैपर नजरि‍ पहुँचलै। सनै आ चन्‍नीपर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मने-मन अपसोच करै लगल जे अनेरे ि‍गरहत सभकेँ दुसलि‍यै। पटुआक खेती तँ बेपारी सबहक दुआरे छोड़लक। मेहनतो आ लगतो लगा उपजबैत छलै आ बेपारी सभ गरदनि‍ कट्टी कऽ लैत छलै। नीक केलक जे पटुआ उपजौनाइ छोड़ि‍ देलक। अपना जते डोरी-पगहाक काज होइ छै अो तँ सनइयो आ चन्‍नि‍योसँ कइये लैत अछि‍। मुदा बेपारि‍यो सभकेँ भाभन्‍स कहॉं भेलै। जहि‍ना ि‍गरहतक गरदनि‍ काटि‍ धन ढेरि‍औलक तहि‍ना प्‍लास्‍टि‍क आि‍ब सभटा खा गेलइ। बड़का-बड़का करखन्‍ना सभ ओहि‍ना ढ़न-ढ़न करै छै। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ दुखनीक मनमे खुशी उपकल। खूँटसँ तमाकुल नि‍कालि‍-मुँहमे लेलक। पटुओ संठीसँ मोट-मोट संठी चन्‍नीक होइ छै। सूपो बजबैमे नीक हएत। खूब जोरसँ बजाएव जे दोसरे ि‍दन दि‍रदरा पड़ा जाएत। चन्‍नी मन पड़ि‍तहि‍ घुरनापर नजरि‍ गेलइ। बान्‍हे कात खेतमे ओकरा खूब चन्‍नी भेलि‍ छलै। सोनो सुन्‍दर मुदा, पटुआक सोन जेकॉं सक्‍कत नइ होइ छै। खैर जे हौ काज तँ सम्‍हैर जाइ छै। घुरनाक घरवाली अछि‍यो बड़ आवेशी। जखने कहवै तखने बेसि‍ये कए कऽ देत। जेललबा बौहू धौंछ थोड़े अछि‍ जे सोझोक वस्‍तु लाथ कऽ लेत। अनकर चीज लइ बेरि‍मे धौंछीक मुँह केहेन मीठ भऽ जाइ छै जना मुँहसँ मौध चुवैत होय। भगवान करौ जे सभ चीज बि‍ला जाइ। तामसपर दुखनी सरापि‍ तँ देलक मुदा, लगले अफसोच करए लागलि‍ जे अनेरे ि‍कअए सरापि‍ देलि‍यै। कहुना भेलौं तँ माइये-पि‍ति‍आइन भेलौं ि‍क ने? माइये-बापक सराप ने धीया-पूताकेँ पड़ै छै। जेहेन चालि‍ रहतै तेहेन फल अपने हेतै। बीस बर्खसँ कहि‍यो थूको फेकए गेलि‍यै। अपना आि‍गये-पानि‍ये नि‍महै छी। आगि‍-पानि‍पर नजरि‍ अबि‍तहि‍ बेटी श्‍यामा मन पड़लै। ऐना कऽ समाद देने छेलि‍यै जे एक दि‍न पहि‍ने चलि‍ अबि‍हें। अनका जेकॉं ि‍क तूँ असकरे छेँ। हाथी सनक सासु छेथुन तखन तोरा घरक कोन चि‍न्‍ता छौ। फेरि‍ मनमे उठलै लछमी पावनि‍ छी की ने। सभ ने अपना-अपना घरमे पूजा करत। भरि‍सक तही दुआरे नइ आइलि‍। तमाकुल खाइक मन भेलै। अँचराक खूँट खोलि‍ तमाकुल देखलक तँ एक्‍के जूम बुझि‍ पड़ल। एक्‍के जूम देखि‍ सोचलक जे एकरे दू जूम बना लेब। मुदा टूटल दॉंतक गहमे तँ हराइले रहत। एक्‍के जूम बना मुँहमे लेलक। तमाकुल लइते बेटपर मन गेलै। बेटा मन पड़ते दुखनी सोचए लगलि‍ जे सालो भरि‍ परदेशमे नइ रहत तँ कमाएत कतए? अंदाजे मनमे एलै जे चारि‍-पॉंच मास गेना भेल हेतै। मुदा चारि‍-पॉंच मास झुझुआन बुझि‍ पड़लै। फेरि‍ मन पाड़ि‍ ि‍हसाव जोड़ए लागलि‍। ठेकना कऽ मन पाड़लक जे आसीनमे गेल रहै। हँ, हँ आसि‍ने रहै। खानि‍-पीनि‍ चलैत रहै। हमहूँ पोखरि‍मे तेल-खैर चढ़ा कऽ आइल रही। अखैन काति‍क छी। ऐँ, तब तँ बरखोसँ बेसी भऽ गेलै। ओह नै, पैछला आसीन नै छी ि‍कऐक तँ ओकरा गेलापर नाइतक जनम भेल। ओहो छौँड़ा दौड़ैए। कहुना-कहुना दू बर्ख भेल हेतै। आंगुरपर ि‍हसाब जोड़ै लगल। दू बर्ख आ एक बर्ख तीन बर्ख ने भेल। तीन बर्ख मनमे अबि‍ते चौंि‍क गेल। ने एकोटा पाइ पठौलक आ ने एको बेर आएल। मनमे खुशी उपकलै। छौँड़ा फुटि‍ कऽ जुआन भऽ गेल हएत। कोनो ि‍क खाइ-पीबैक दुख हेतइ। आब तँ चि‍न्‍हलो ने जाएत। दाढ़ी-मोछ सेहो भऽ गेल हेतै। आओत तँ ि‍बआहो कइये देवइ। असकरे नीक नइ लगैए। ि‍बनु धि‍या-पूताक अंगना कोनो अंगना छी। लोके ने लछमी छी। मगन भऽ दुखनी ऑंखि‍ बन्‍न कऽ फड़ल-फुलाएल परि‍वार देखए लगलीह। जहि‍ना पोखरि‍मे नावपर चढ़ि‍ झि‍लहोि‍र खेला उतड़ि‍ कऽ महारपर अबैत तहि‍ना दुखनि‍योकेँ भेलि‍। तकि‍तहि‍ वि‍चार बदलि‍ गेलनि‍। मनमे उठलै जे जँ कहीं छौँड़ा ओनै वि‍याह-ति‍याह कऽ नेने हुअए आ गाम नै आबै तखन की करब। गामोमे तँ कते गोरेकेँ देखबे केलि‍यैहेँ। अखन धरि‍क खुशीक मनमे एकाएक पानि‍ पड़ि‍ गेलै। ि‍नराश मने सोचए लगलि‍ जे जुगे-जमाना तेहेन भऽ गेल जे केकरा के की कहतै। आब ककरो बेटा-बेटी थोड़े पॉंजमे रहै छै। जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। छौँड़ा सभ जहॉं बौहू देखलक ि‍क माए-बाप ि‍बसरि‍ जाइए। मने उनटि‍ जाइ छै। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलै। ऑंचरसँ नोर पाछलक। नोर पोछि‍तहि‍ मनमे उठलै जाबे पैरूख अछि‍ ताबे तक ने ककरो पमौजी केलि‍यै आ ने करबै। जइ दि‍न पैरूख घटि‍ जाएत तइ दि‍न बुझल जेतइ। जि‍नगि‍यो तँ तहि‍ना अछि‍। कोनो ि‍क ठीक अछि‍ जे पैरूख घटलेपर मरब। पहि‍नहुँ मरि‍ सकै छी तइले सोगे की करब। बेटा जँ उड़हड़ि‍ये जाएत तँ उड़हरि‍ जौ। बेटापर सँ नजरि‍ हटि‍ बेटीपर गेलै। बेटीपर नजरि‍ परि‍तहि‍ मनमे आशाक उदय भेलै। आशा जगि‍तहि‍ मुँहमे हँसी एलै। सात घर दुश्‍मनोकेँ भगवान हमरा सन बेटी देथुन। साक्षात् लछमी छी। अपने फेरल नुआ ि‍कअए ने दि‍अए मुदा, कहि‍यो ओढ़ैसँ पहि‍रए धरि‍ वस्‍त्रक दुख अखैन तक भेलि‍हेँ। ओकरे परसादे तीनटा कम्‍मल घरोमे अछि‍। जमाइयो तेहने छथि‍ जे अपने माथपर उठाकेँ अन्‍नो-पानि‍ दइये जाइत छथि‍। आशा जगि‍तहि‍ दुखनी जारन तोड़ए उठल।
     ऑंखि‍ उठा गाछमे सुखल ठौहरी हि‍यासए लगलीह। रौदि‍याह समए भेने मनसम्‍फे सुखल ठौहरी गाछमे। जारन देि‍ख मन खुशीसँ नाचि‍ उठलै। मनमे गामक सुख नचए लगलै। अखनो गाम गामे छी। शहर बजारमे तँ लोक जरना कीनैत-कीनैत तबाह रहैए। मन पड़लै सि‍ंहेश्‍वर स्‍थानक मेला। एक्‍के सॉंझ भानस केलहुँ तहि‍मे दस रूपैया जरनेमे लगि‍ गेल। ई तँ गुन रहए जे सात-आठ गोरे रही जे सवे रूपैया ि‍हस्‍सा लागल। नइ तँ सवा रूपैयाक जरना चुल्‍हि‍ये पजारैमे लगि‍ जाइत। एक सूरे दुखनी दूटा गाछमे लग्‍गीसँ ठौहरी तोड़लक। जारन देखि‍ अबूह लगि‍ गेलै जे कहुना-कहुना तँ पॉंच बोझसँ बेसि‍ये भऽ जाएत। उगहौ पड़त ने। घरो ि‍क कोनो लगमे अछि‍। पॉंच बेरि‍ उघैत-उघैत दुपहर भऽ जाएत। मुदा भीड़ो हएत तँ कहुना-कहुना पनरह दि‍न नि‍चेनो रहब। फेरि‍ मनमे उठलै जे जँ कीहीं अइ बीचमे श्‍यामा आि‍ब गेल हएत तँ अंगने-अंगने खोज-पुछाड़ि‍ करैत बौआइत हएत। मुदा छोड़ि‍यो कऽ कन्‍ना जाएव। सभटा लोक लइये जाएत। से नइ तँ सभटाकेँ बोझ बान्‍हि‍ लइ छी आ एकटा लऽ कऽ जाएव। देखि‍यो सुनि‍ लेबइ। जँ नइ आइलि‍ हएत तँ सभटा उघि‍ये लेब। ओना जँ आइलि‍ हएत तँ ि‍क ओहो मानत। दुनू माए-बेटी दुइये बेरि‍मे उघि‍ लेब। मन असथि‍र होइतहि‍ तमाकुल खाइक मन भेलै। ऑंचरक खूँटपर नजरि‍ पड़तहि‍ मन पड़लै जे तमाकुल तँ तखने सठि‍ गेल। मुदा पथार लागल जारन देखि‍ मनमे एलै जे पावनि‍क दि‍न छी। वेसी अंहोस-मंहोस करब तँ सभ काज दुरि‍ भऽ जाएत। अंगनोमे मारि‍ते रास काज अछि‍। जारन बि‍छैले उठल। गाछक चारू भाग नजरि‍ देलक तँ बीचमे एकटा घोरनक छत्ता सेहो खसल देखलक। छत्तासँ नि‍कलि‍-नि‍कलि‍ घोरन पसरि‍ गेल। पॉंखि‍बला धोरन देखि‍ दुखनी डरा गेल। बापरे ई तँ डकूबा घोरन छी दुइयेटा काटत तँ पराने लऽ लेत। मुदा छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। से नइ तँ लग्‍गि‍येपर उठा कातमे फेि‍क जारन बीछब। मुदा छोटका सभ तँ सौँसे पसरि‍ गेल अछि‍। छोड़ि‍यो कन्‍ना देवइ। जीबठ बान्‍हि‍ छत्ताकेँ कातमे फेि‍क जारन बीछए लगलि‍। फेरि‍ मनमे एलै जे ठौहरि‍यो तँ दू रंगक अछि‍। मोटको अछि‍ आ पतरको अछि‍। से नइ तँ दुनूकेँ फुटा-फुटा रखि‍ बोझ बान्‍हब। सएह करए लगल। ठौहरी बीछि‍ते रहै ि‍क मन पड़लै, हाय रे बा बान्‍हब कथीपर। जुना तँ अछि‍ये नहि‍। अगदि‍गमे पड़ि‍ गेल। पहि‍ने जे से मन पड़ैत तँ अंगनेसँ जुन्‍नो नेने अबि‍तौं मुदा, सेहो ने मन रहल। छोड़ि‍ देबइ तँ सभटा आने लऽ जाएत। एते बेरि‍ उठि‍ गेल ि‍कछु खेनौ ने छी। मुदा जारन देखि‍ मनमे खुशी होय जे कहुना-कहुना एक पनरहि‍या तँ चलबे करत। जँ दू-चारि‍ दि‍न आरो तोड़ि‍ लेब तँ भरि‍ जाड़क ओरि‍यान भऽ जाएत। ऑंखि‍ उठा घसबाहि‍नी सभ दि‍स तकलक जे कि‍यो भेटत तँ ओकरे हॉंसू लऽ कड़चि‍ये नइ तँ राड़ि‍ये काटि‍ जुन्‍ना बना लेब। मुदा सेहो नै ककरो देखै छि‍यै। ि‍हया-हि‍या करजान दि‍स ि‍वदा भेल। मुदा ओहो केराक सुखल डपोर तँ ि‍बना हँसुए काटल नहि‍ हएत। करजान पहुँचते देखलक जे करजानबला केरा घौड़ काटि‍ भालरि‍ आ थम्‍होकेँ काटि‍ छोड़ि‍ देने अछि‍। जुन्‍ना देखि‍ मनमे खुशी भेलइ। पान-सातटा जुन्‍ना लऽ आबि‍ बोझ बन्‍हलक। पॉंच बोझ। चारू बोझ गाछे लग छोड़ि‍ एकटा नेने आंगन आइलि‍।
     आंगन आबि‍ सोचए लगलि‍ जे ि‍कछु बना कऽ खा लइ छी। फेरि‍ मनमे भेले जे जखने आंगनक काजमे ओझड़ाएव तखने जारन बाधेमे रहि‍ जाएत। तत्-मत् करैत पानि‍ पीलक। घरसँ तमाकुल नि‍कालि‍ चुनबैत ि‍वदा भेल। पॉंचो बोझ उघि‍ लेलक। काठी जेकॉं डॉंड़ो आ गरदनि‍यो तानि‍ देलकै। देहो-हाथमे दर्द हुअए लगलै। हाथो-पएर नहि‍ धोय ओसारेपर भुँइयेमे ओंघरा गेलि‍। थाकल-ठहि‍आइल देह ओंघराइत नि‍न्‍न पड़ि‍ गेल।
     बेरि‍ टगि‍ गेल। घरक छाहरि‍ अंगनामे दू हाथ ससरि‍ गेल। डेड़ि‍यापर सँ जोगि‍नदर सोर पाड़ए लगल- ‘‘काकी, काकी।’’
  दुखनीक नि‍न्‍न टुटल। डेढ़ि‍यापर सँ ससरि‍ जोगि‍नदर आंगन गेल तँ देखलक जे भुँइयेमे नि‍न्‍न भेरि‍ सुतल अछि‍। फेरि‍ बाजल- ‘‘काकी, काकी।’’
  ठाढ़ भेलि‍ जोगि‍नदरक मनमे उठल जे हमहूँ तँ पाइयेबला अइठीन रहलौं मुदा, सभ सुख-सुवि‍धा रहि‍तो ओकरा सभकेँ ऐहन नि‍न्‍न कहॉं होइ छै। देखै छी जे पेट खपटा जेकॉं खलपट छै, भरि‍सक खेवो केने अछि‍ ि‍क नहि‍। तहूमे पाएरो धुराइले देखै छि‍यै भरि‍सक कतौसँ काज कए कऽ आइलि‍ अछि‍। अखन जे घरक सभ कुछ उठा ि‍कयो लऽ जाय तँ बुझवो ने करत। एकरा सबहक कोन दुनि‍यॉं छै। जहि‍ना चीनीक कीड़ाकेँ मि‍रचाइमे दऽ देल जाए तँ ओ मरि‍ जाएत। जे स्‍वभावि‍के छैक। मुदा ि‍क मि‍रचाइक कीड़ा चीनीमे जीबि‍ सकत। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍ति‍ जोगि‍नदरक मनमे उठि‍ गेल। मुदा काजक धुमसाही, वि‍चारक दुनि‍यॉंसँ खींचि‍, ओकरा हड़वड़ा देलक। फेरि‍ काकी, काकीक आवाज देलक। मुदा नि‍न्‍न नहि‍ टुटल देखि‍ कपड़ाकेँ ओसारेपर रखि‍ दुखनीक घुट्ठी दाबए लगल। घुट्ठी दबि‍तहि‍ दुखनीक नि‍न्‍न टूटल। ऑंखि‍ मुननहि‍ बाजलि‍- ‘‘अयँ गे सामा (श्‍यामा) काल्‍हि‍ ि‍कअए ने ऐलै?’’
     दुखनीक अवाज सुि‍न जोगि‍नदरक मनमे भेल जे भरि‍सक काकी सपनाइए। घुट्ठीकेँ ि‍हलबैत बाजल- ‘‘काकी, काकी....।’’
  ऑंखि‍ खोलि‍ दुखनी उठि‍ कऽ बैसि‍ गेल। हाफी कऽ जोगि‍नदर ि‍दस तकलक। मुदा ि‍कछु बाजलि‍ नहि‍। मोटरी खोलि‍ जोगि‍नदर जोड़ भरि‍ साड़ी, साया, एकटा आंगीक संग दसटा दसटकही आगूमे रखि‍ बाजल- ‘‘अखैन धरि‍ काकी अहॉं नहेबो ने केलहुँहेँ।’’
  जहि‍ना आम बीछि‍नि‍हार गाछक नि‍च्‍चॉंमे खसल आम देखि‍ उजगुजा जाइत तहि‍ना दुखनी उजगुजा गेलि‍। बाजलि‍- ‘‘बौआ, जारनि‍ नइ छलै वएह तोड़ए भि‍नसरे चलि‍ गेलौं। ओकरे सम्‍हारैत-सम्‍हारैत दुपहर भऽ गेल। ि‍कछु खेबो ने केने छी। अराम करए लगलौं ि‍क ऑंख लगि‍ गेल।’’
  दुखनीक बात सुि‍न जोगेनदर बाजल- ‘‘काकी, अखैन अगुताइल छी तेँ नै अँटकब। पूजा उसरला बाद नि‍चेनसँ आि‍ब आरो गप्‍पो करब आ कोनो कारोबार करैले मदति‍ सेहो कऽ देब। अखैन मेला देखैले कपड़ो आ रूपैइयो देलौंहेँ। जाइ छी।’’
     जोगि‍नदर उठि‍ कऽ ि‍वदा भऽ गेल। मने-मन दुखनी ि‍हसाब जोड़ए लागलि‍ जे अधा रूपैया कऽ चाउर कीनि‍ लेब आ अधा हाथ-मुट्ठीमे रखि‍ लेब। मेला-ढेलाक समए छी कखैन कोना भूर फूटि‍ जाइत। फेरि‍ मनमे एलै जे श्‍यामो तँ अबि‍ते हएत। ओहो चाउर अनबे करत। जखन अनदि‍नो नेने अबैए, अखन तँ सहजे पाबैनि‍ये छी। दुनू नाइत-नाति‍न सेहो ऐबे करत। ओकरो हाथकेँ दू-चारि‍ रूपैया नइ देवइ से केहन हएत। हम कतबो गरीब ि‍कअए ने छी मुदा, नानी तँ छि‍यै। साड़ी खोलि‍ दुखनी देखए लागलि। साड़ी देखि‍ बुदबुदाइल- ‘‘ऐहेन साड़ीक कोन काज अछि‍। कोनो ि‍क नव-नौतारि‍ छी जे ऐहेन छपुआ पहि‍रब। अइसँ नीक तँ तीन काजू मरकीन दैत जे कतबो मारि‍-धुसि‍ कऽ पहि‍रतौं तइओ साल भरि‍ चलबे करैत। सायाक कोन अछि‍। सायाक कोन काज अछि‍। आब तँ सहजहि‍ बुढ़ि‍ भेलौं। जहि‍या जुआन छलौं तहि‍यो तँ डेढ़ि‍ये पहि‍रैत छलौं। कोनो ि‍क मंगै लए गेल छेेलि‍यै, मुदा जखैन घर पैसि‍ दऽ गेल तखैन तँ जे देलक सएह नीक। बेटी ऐबे करत अोकरे पुरना लऽ लेब आ ई दऽ देबै।’’
  साड़ी-साया, आंगी समेटि‍ कऽ रखि‍ दुखनी रूपैया गनए लागलि‍। फेर बुदबुदाइल- ‘‘सभटा दस टकहि‍ये छी। दसटा अछि‍। दसटा दसटकही काए बीस भेल। दू-दू टा कऽ फुटा-फुटा रखि‍ गनलक। पॉंच बीस भेल। मनमे खुशी एलै। फेर लगले मनमे एलै जे आइ पावनि‍क दि‍न छी अखन धरि‍ खेलौंहेँ कहॉं। सभ दि‍न खैहह पाबनि‍ दि‍न ललैहह। मुदा भि‍नसरसँ तँ गाछि‍ये-ि‍बरछीमे रहलहुँ। सारा-गाड़ा नंघलौं। ि‍बना नहेने कोना भानस करब? सूर्य दि‍स तकलक। माथसँ ि‍नच्‍चॉं देखि‍ सोचलक आइ उपासे कऽ लेब। जाबे नहा कऽ भानस करए लगब ताबे तँ साँझे पड़ि‍ जाएत। सॉंझमे लछमी पूजा करब ि‍क अपने खाए-पीबए लगब। तहूमे अखन धरि‍ ने खढ़ अनलौं आ ने संठी। जाबे से नहि‍ आनब ताबे उक कन्‍ना बनाएव। ि‍दआरि‍यो बनबए पड़त। करू तेलो आनए पड़त। घरमे जे तेल अछि‍ ओ अँइठ भऽ गेल अछि‍ कन्‍ना ि‍दयारीमे देवइ। काज देखि‍ दुखनीकेँ अबूह लागि‍ गेल। पावनि‍क सभ ि‍कछु ि‍बसरि‍ गेल। नजरि‍ बेटीपर गेलइ। बेटीपर नजरि‍ पहुँचते मनमे खौंझ उठले। बाजलि‍- ‘‘ऐना कऽ समाद पठौलि‍यै से ि‍कअए ने आइलि‍।’’
  असमंजसमे पड़ि‍ गेल।
  तहि‍ बीच नवानीवाली बान्‍हेपर सँ सोर पाड़ि‍ बाजलि‍- ‘‘काकी, काकी, दैया आगू अबैले कहलकनि‍हेँ। उत्तरवरि‍या पोखरि‍पर दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍यो लऽ बैसल छन्‍हि‍।’’
  दैयाक नाओ माने श्‍यामा दऽ सुनि धड़फड़ा कऽ उठि‍ घरमे कपड़ा रखि‍ ऑंचरमे रूपैया बान्‍हि‍ ि‍वदा भेलि‍। तीनि‍-चारि‍टा धि‍या-पूता सेहो संग लगि‍ गेलनि‍। बेटी लग पहुँचते श्‍यामा उठि‍ कऽ गोड़ लगलक। गोड़ लगि‍तहि‍ तरंगि‍ कऽ दुखनी बाजलि‍- ‘‘अँइ गे, तोरा जानक काज नइ छौ जे एते लदने ऐलेहेँ।’’
     माइक बातकेँ अनसून करैत श्‍यामा दुनू बच्‍चाकेँ कहलक- ‘‘नानीकेँ गोड़ लाग।’’
  बच्‍चाकेँ देखि‍ दुखनी हरा गेलि‍। सभ बात वि‍सरि‍ गेलि‍। ऑंचरक रूपैया नि‍कालि‍ एक-एक टा दस टकही दुनू बच्‍चाकेँ हाथमे दऽ बॉंि‍क अस्‍सि‍यो रूपैया श्‍यामा दि‍शि‍ बढ़ौलक। रूपैया देखि‍ श्‍यामाक मनमे उठल। भरि‍सक बौआ पठौलकेहेँ। मुस्‍की दैत माएकेँ पुछलक- ‘‘की सभ बौआ पठौलकौहेँ?’’
  बौआक नाओ सुि‍न दुखनीक मन फेरि‍ औनाए गेल। नजरि‍ बेटापर गेलइ। बेटापर नजरि‍ पहुँचतहि‍ मनमे तामस उठलै। बाजलि‍- ‘‘कतए छौड़ा हराएल-ढराएल अछि‍ तेकर कोन ठेकान अछि‍। अखन धरि‍ ने कहि‍यो चि‍ट्ठी-पुरजी पठौलक आ ने एक्कोटा छि‍द्दी। ओम्‍हरे कतौ कोनो मौगी सने उढ़ढ़ि‍ गेल ि‍क की। से ि‍क कोनो पता अछि‍।’’
  माइक बात रोकैत श्‍यामा बाजलि‍- ‘‘ऐना ि‍कअए बजै छेँ। माए छीही कनी ठर-ठेकानसँ बजमे से नै।’’
     बेटीक बात सुि‍न माएक बेटासँ हटि‍ बेटीपर पुन: आबि‍ गेल। बाजलि‍- ‘‘दुनू बच्‍चो आ मोटरि‍योकेँ कन्‍ना आनल भेलौ?’’
  मुस्‍कुराइत श्‍यामा बाजलि‍- ‘‘अपने एतऽ तक पहुँुचा गेलखि‍न।’’
  जमाए दऽ सुि‍न दुखनी बाजलि‍- ‘‘एक डेग आगू घर नै देखल छलनि‍ जे जइतथि‍।’’
  ‘‘गाममे मेलो होइ छै आ पावनि‍यो छि‍यै तेँ कहलखि‍न जे घरपर गेने ओझरा जाएब। चारि‍ थान माल अएकरे माए बुते सम्‍हारल नै ने हेतै। परसू ऐथुन।’’
     परसू सुि‍न दुखनीक मन थीर भेल। छोटका बच्‍चाकेँ केरामे लऽ जेठकीकेँ आगू कऽ ि‍वदा भेलि‍। घरसँ कने पाछुऐ रहै ि‍क दछि‍नसँ एक गोटेकेँ हाथमे बैग, फुलपेंट-शर्ट पहीरि‍ने अवैत दुनू गोटे देखलक। मुदा ि‍कयो चि‍न्‍हलक नहि‍। बदलल चेहरा भुखनाक। भुखनो अंगने दि‍शि‍सँ अबैत आ दुनू गोटे दुखनि‍यो अंगने दि‍स बढ़ैत। घर लग आबि‍ भुखना दुखनीकेँ कहलक- ‘‘माए।’’
  भुखनाक माए कहब दुखनी सुनलक मुदा, अनठि‍या बुझि‍ अनठा देलक। ि‍कछु नहि‍ बाजलि‍। मुदा श्‍यामा चीन्‍हि‍ गेली। बाजलि‍- ‘‘बौआ हौ।’’
  बौआ सुि‍न दुखनि‍यो चौंकलीह। ताधरि‍ भुखना लग आबि‍ माएकेँ पएर छुबि‍ गोड़ लगलक। दुखनी अवाक् भऽ गेलि‍। ऑंखि‍मे नोर ढबढ़बा गेलनि‍। ि‍नच्‍चॉंसँ उपर धरि‍ भुखनाकेँ नि‍ग्‍हारए लगलीह।
करेज दहलि‍ गेलनि‍।‍ वामा बॉंहि‍सँ नाति‍केँ दवने आ दहि‍ना तरहत्‍थीसँ ऑंखि‍ पोछि‍ ि‍वह्वल होइत बजलीह- ऑंइ रौ बौआ तूँ तँ समरथ भऽ गेलेँ। चि‍न्‍हवे ने केलि‍यौ। आंङै-समांगे नीक रहै छलेँ की ने। एते दि‍नपर ि‍कअए एलेँ। ि‍क बुझि‍ पड़ै छेलौ जे घरमे ि‍कयो ने अछि‍। कोनो ि‍क हम मरि‍ गेलि‍यौ। रूपैया नै कमेलेँ तँ नै कमेलेँ मुदा, छुछो देहे तँ अबि‍तेँ। अखैन तँ हम अपने थेहगर छी।
  श्‍यामक माथ परक मोटरी पकड़ैत भुखना बाजल- दाय, तोहर माथ अगि‍या गेल हेतौ।
  नै-नै कथी लए तूँ लेबह। आब ि‍क अंगना कोनो बड़ दूर अछि‍। मुदा बलजोरी भुखना श्‍यामक माथपर सँ मोटरी उताड़ि‍ अपना माथपर लेलक। आद्र स्‍वरे दुखनी बाजलि‍- बौआ, रस्‍ता तँ भुखले आएल हेबह।
  नइ गै। खाइत-पीबैत एलौं ि‍क।
  बौआ, अंगनो गेल छेलहक ि‍क रस्‍तेसँ रस्‍ता छह?”
  अंगनामे बेग रखि‍ देलि‍यै। घर बोन दे देखलि‍यै तँ तमोरि‍यावाली भौजीकेँ पुछलि‍यै। वएह कहलनि‍ जे दायकेँ आनै काकी आगू गेल छथि‍।
     भुखनाक बात सुनि‍ दुखनीकेँ तामस उठल। बाजलि‍- ऑंइ रौ छौँड़ा, अंगना गेलेँ तँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलेँ की नै?”
  घर बोन देखलि‍यै तँ बेगकेँ अोसरेपर राखि‍ तोरा तकैले ि‍वदा भेलौं।
  हम कोनो ि‍बलेँत गेल छेलौं। ताबे तूँ हाथ-पाएर धो कऽ अंगनेसँ गोसॉंइकेँ गोड़ लागि‍ लइतेँ से तोरा बुते नै होइतौ। जाबे हमरा तकै लए गेलेँ ताबे जे कोइ बेग चोरा लेतौ, तब की करबीही।
  हमरा देखि‍ते मारे धि‍यो-पूतो आ जनि‍जाति‍यो सभ आबि‍ गेल। ओते लोकमे के बेग चोराओत।
  फुसफुसा कऽ माए बेटीकेँ पूछलक- दाय, कि‍छु खाइयोबला सनेस छौ। देखै छीही छौँडाक मुँह केहन सुखाइल छै।
  हँ। असकरे दुआरे कते अनि‍ति‍यौ। पॉंच गो दलि‍पूड़ी अछि‍।
  अच्‍छा, वड़बढ़ि‍यॉं। हम तँ अखैन धरि‍ नहेबो ने केलौंहेँ।
  ि‍कअए? पावनि‍क दि‍न छि‍यै तइयो ने नहेलेँ।
  छुट्टि‍यो ने भेल। भि‍नसरेसँ जारनि‍क अोरि‍यानमे लागल छलौं। बोझ उघैत-उघैत मन ठहि‍या गेल। असकता गेलौं। ने भानसे केलौं आ ने नहेबो केलौंहेँ। ओहि‍ना ओसारपर ओघड़ेलौं ि‍क नीन आि‍ब गेल। जोगि‍नदरा आि‍ब कऽ उठौलक। नइ तँ सुतले रहि‍तौं। देखही जे सॉंझ लगि‍चाइल जाइ छै ने अखैन तक उकक ओरि‍यान भेलहेँ आ ने सॉंझ-बतीक।
     आंगन अबि‍ते दुखनी-भुखनाकेँ कहलक- बौआ, पहि‍न पएर-हाथ धो कऽ सि‍रा आगूमे गोड़ लागह। तखन ि‍कछु करि‍हह।
  भुखना सएह केलक। श्‍यामा सेहो घैलची लग जा घैला झुका एक चुरूक पानि‍ नि‍च्‍चॉं खसा ओहि‍मे दुनू पाएरक तरबा भीजा ओसारेपर सँ गोसॉंइकेँ गोड़ लगलक। सौँसे अंगना धि‍यो-पूतो आ जनि‍जाति‍यो सभ कच-बच करैत। छोटका बच्‍चा सभ फुटे कॉंइ-ि‍कचीड़ करैत रहै। तहि‍ बीच जुगेसराक बेटा रवि‍याक बेटाकेँ पाछुसँ पोनमे ि‍बठुआ काटि‍ दोगे-दोग घुसुि‍क गेल। छि‍लमि‍ला कऽ रवि‍याक बेटा पाछु तकलक तँ शि‍बुआक बेटीकेँ देखलक। ओहि‍ छौँड़ाकेँ भेले जे यएह छौँड़ी ि‍बठुआ कटलक। हॉंइ-हॉंइ कऽ दू मुक्‍का लगा देलक। मुक्‍का लगि‍ते शि‍वुआक बेटी चि‍चि‍आ कऽ कानए लागलि‍। शि‍वुआक घरवाली सेहो पछवारि‍ कात ठाढ़ छलि‍। बेटीकेँ कनैत देखि‍ कोरामे उठबैत पुछलक। ओ छौँड़ी रवि‍याक बेटा नाओ कहलक। ओकरो हड़लै ने फुड़लै ओहि‍ छौँड़ाकेँ कान ऐँठि‍ एक थापर लगा देलक। तहि‍ समए रवि‍याक घरवाली सेहो अबैत छलि‍। बेटाकेँ देखि‍ पुछलक। ओंगरीक इशारासँ छौँड़ा शि‍वुआक घरवालीकेँ देखा देलक। शि‍वुआक घरवालीकेँ देखवि‍तहि‍ रवि‍याक घरवाली लगमे जा झोंट पकड़ि‍ मुँहपर थूक फेि‍क देलक। सौँसे आंगन हड़-वि‍रड़ो मचि‍ गेल। छोटका धि‍या-पूता डरे पड़ाए लगल। तँ दोसर ि‍दस हल्‍ला सुनि‍ आन-आन अबौ लगल। दुखनीक बकारे बन्‍न। जहि‍ना-जहि‍ना शि‍वुआक घरवाली गारि‍ पढ़ै तहि‍ना-तहि‍ना रवि‍याक घरवाली उनटबैत जाए। ि‍कएक तँ स्‍त्रीगणक झगड़ाक वि‍शेषता होइत जे जे पाछु धरि‍ गरि‍आओत ओकर जीत होइत। अंगनाक दृश्‍य देखि‍ भुखनो आ श्‍यामो दुनूक बॉंहि‍ पकड़ि‍-पकड़ि‍ ठेल-ठालि‍ कऽ अपना-अपना अंगना दऽ आइल। भगलाहा धि‍या-पूता सभ पुन: आबए लगल। जनि‍जाति‍यो आ धि‍यो-पूतोमे पाटी बनि‍ गेल। ि‍कछु गोटे ि‍शवुआक घरवालीक पक्ष लऽ आ ि‍कछु गोटे रवि‍याक घरवालीक पक्ष लऽ झगड़ाकेँ पुन: ठाढ़ केलक। एक दोसराक दोख लगवैत अपना पक्षकेँ नि‍र्दोष साबि‍त करए लगल। मुदा जहि‍ना पोखरि‍मे गोला फेकलापर पानि‍मे हि‍लकोर उठैत जे धीरे-धीरे शान्‍त भऽ जाइत तहि‍ना शान्‍त भऽ गेल।
     तत्-खनात तँ दुखनीक आंगन शान्‍त भऽ गेल। अंगनासँ बाहर रस्‍तो आ आनो-आनो जगहपर गुद-गुद-फुस-फुस होइते रहल। जहि‍ना कोनो गाम वा घरमे आगि‍ लगलापर पानि‍ देने मि‍झा जाइत मुदा आगि‍क गरमी रहबे करैत तहि‍ना भेल। आन सभ तँ आंगनसँ ि‍नकलि‍ गेल मुदा, दुखनीक मनक आगि‍ पजरि‍ गेल। बेटी श्‍यामा दि‍स देख जोर-जोरसँ बजए लागलि‍- हम ककरो बजबैले गेल छेलि‍यै जे आबि‍ पावनि‍क दि‍न अंगनामे झगड़ा केलक। पावनि‍ ि‍क कोनो एक दि‍नक होइत अछि‍ आि‍क सालो भरि‍ले होइए। सालो भरि‍ अंगनामे झगड़ा होइते रहत ि‍क ने। तहूमे जे ि‍कयो डोरी बॉंटि‍ घरक पछुऐत बान्‍हि‍ देत तखन तँ आरो सालो भरि‍ झगड़ा होइते रहत कि‍ ने?”
  माइयक बोली बन्‍न करै दुआरे थोम-थाम लगबैत श्‍यामा कहलक- अनेरे तूँ ि‍कअए आफन तोड़ै छेँ। तोरा अंगनामे छेबे के करौ जे साल भरि‍ झगड़ा हेतौ।
     बेटीक बात सुि‍न दुखनी दम कसलक। मुदा तइओ मनमे आगि‍ लगले रहै। घरसँ वि‍छान नि‍कालि‍ श्‍यामा अंगनामे ि‍वछौलक। बि‍छा अपन मोटरी खोललक। एक धारा चाउर, सेर तीनि‍ऐक खेसारीक दालि‍, पॉंचटा दलि‍पूड़ी आ अपनो आ बच्‍चो सभक कपड़ा नि‍कालि‍ रखलक। पॉंचो पूड़ीमे सँ दूटा भुखनाकेँ एकटा कऽ सरस-नि‍रस तोड़ि‍ दुनू बच्‍चाक हाथमे देलक। एकटा अपना लेल आ एकटा माए लेल फुटा कऽ रखलक। बैग खोलि‍ भुखना रूपैयाक गड्डी नि‍कालि‍ माएकेँ कहलक- माए, यएह कमा कऽ अनलि‍यौ।
  रूपैया देखि‍ माइयो आ बहीनो बाजलि‍- झॉंपह, झब दऽ झॉंपह नै तँ लोक देखि‍ लेतह।
  रूपैया झाँपि‍ भुखना दू जोड़ साड़ी आंङी आ सायाक कपड़ाक संग दुनू बच्‍चा लेल शर्ट-पेन्‍ट नि‍कालि‍ आगूमे रखलक। कपड़ा देखि‍ दुखनी ि‍वस्‍मि‍त भऽ गेलि‍। मने-मन सोचए लगलि‍। जे ढहलेलो अछि‍ तइओ तँ बेटे धन छी। मन पड़लै पति‍। भगवान ककरो अधला करै छथि‍न। मन-मन गोड़ लगलकनि‍। अही दुनू बेटा-बेटीक आशापर ने अपन वएस गमा कऽ रहलौं। संतोखे गाछमे ने मेवा फड़ै छै। माएकेँ वि‍स्‍मि‍त देखि‍ भुखना वि‍स्‍कुटक ि‍डब्‍बा नि‍कालि‍ माएक हाथमे दैत कहलक- माए, ई मक्‍खनबला ि‍वस्‍कुट छी तोड़े लए अनलि‍यौहेँ।
  हाथमे वि‍स्‍कुटक डब्‍बा लऽ उनटा-पुनटा कऽ देखए लगली। दुनू बच्‍चो आ श्‍यामोक नजरि‍ डि‍ब्‍बापर अँटकि‍ गेल। तहि‍ बीच देहमे लगबैबला दूटा गमकौआ साबुन, दूटा कपड़ाक साबुन पौवाही नारि‍यल तेलक डि‍ब्‍बा, नि‍कालि‍ दुखनीक आगूमे रखलक। चीज बौस देखि‍ दुखनी मन उधि‍या गेलै। मनमे हुअए लगलै जे अकासमे उड़ि‍ गेलहुँ आि‍क नरकसँ सरग (स्‍वर्ग) चलि‍ गेलहुँ आि‍क सपना देखै छी। अपनाकेँ संयत करैत बाजलि‍- पावनि‍क दि‍न छी, पहि‍ने सभ ि‍कयो खा लइ जाइ जाह। हम अखैन नै खाएव। दि‍नो खटि‍आइये गेल अछि‍ कनी कालमे सॉंझ-बॉंती दइये कऽ खाएव।
  फेर मनमे एलै जे गोसॉंइ डूबैपर अछि‍ अखन धरि‍ पावनि‍क तँ कोनो ओरि‍यान भेवे ने कएल अछि‍। ने उक बनबै लए खढ़-संठी अनलौं आने दि‍आरी बनेलौंहेँ। ने दि‍यारीक टेमी बनवै लए साफ सुती कपड़ा तकलौंहेँ आ ने दोकानसँ तेले अनलौंहेँ। तहूमे दुनू भाए-बहीन आइल अछि‍ दुइओटा तीन-तरकारी नहि‍ करब से केहन हएत। एक तँ लछमी पावनि‍ तहूमे एते दि‍नपर छौँड़ा आएल अछि‍।
     पूड़ी खा पानि‍ पीबि‍ श्‍यामा माएकेँ कहलक- चि‍कनी माटि‍ सानि‍ कऽ दि‍आरी बना लइ छी। तूँ दोकानक काज झब दऽ केने आ नै तँ ि‍करि‍ण डूबलापर दोकानोक काज नइ हेतौ। ओहो पूजा-पाठमे लगि‍ जाएत।
  बेटीक बात सुि‍न दुखनी बाजलि‍- ऑंइ गै दैया दोकान-दौड़ीक काजमे ओझरा जाएव तँ खढ़-संठी कखैन आनि‍ उक बनाएव?”
  काजक भरमार देखि‍ भुखना माएकेँ कहलक- तोँ दोसरे काज कर हम दाेकानक काज कऽ लैत छी।
  बेटाक बात सुि‍न दुखनी कहलक- अनठि‍या बुझि‍ दोकानबला ठकि‍ लेतौ।
  माइक बात सुि‍न भुखनाकेँ हँसी लागल। मने-मन सोचए लगल जे शहर-बजार घुमै छी हम आ गामक बनि‍यॉं ठकि‍ लेत हमरे। मुदा ि‍कछु बाजल नहि‍। माएकेँ रोकैत श्‍यामा कहलक- आब जे ककरो अइठीन खढ़-संठी मांगए जेबही से देतौ। लछमी पूजाक बेरि‍ भऽ गेलै। काल्‍हि‍ये ि‍कअए ने मांगि‍ अनलेँ। नइ तँ आइये दुपहर से पहि‍ने मांगि‍ अनि‍ते। आब लेाक अपन-अपन चीज-बौस समेटि‍ घर आनत आि‍क तोरा खढ़-संठी देतौ।
  बेटीक बात सुि‍न दुखनी नि‍राश भऽ गेलि‍। उकक आशा टुटि‍ गेलइ। बाजलि‍- हम तँ बूढ़ि‍ भेलौं। आब ि‍क कोनो पावनि‍-ति‍हारक ठेकान रहैए।
  माइक टूटल आशा देखि‍ श्‍यामा सम्‍हारैत बाजलि‍- खढ़-संठी छोड़ि‍ देही। उक नै हएत तँ ि‍क हेतै। गोसॉंइ बाबाकेँ कहि‍ देबनि‍ जे एते ति‍रोट भऽ गेल। नै पान तँ पानक डंटि‍ये सँ तँ पूजा करबे केलौं।
  सामंजस्‍य करैत दुखनी- अच्‍छा हो-अ। खढ़-संठी छोड़ि‍ दइ छि‍यै। तूँ चि‍कनी माटि‍क दि‍आरी बनाले। कनी रूखे कऽ माटि‍ सनि‍हेँ। नइ तँ आब नै सुखतौ। दि‍नो खटि‍आइये गेल। रौदो ठंढ़ा गेल। दोकानेक काज केने अबै छी।
  तहि‍ बीच भुखना कहलक- तूँ अंगनेक काज सम्‍हार। दोकानक काज केने अबै छी।
  बेटाक बात सुि‍न दुखनी कहलक- ऑंइ रौ, शुभ-शुभ कऽ तूँ गाम एलेहेँ, तोरा कन्‍ना दोकान जाए ि‍दऔ। लोक की कहत?”
  लोक की कहतौ?”
  एतबो ने बुझै छीही जे सभ खि‍धांस करए लगत जे फलनीक खापड़ि‍ केहेन तबधल छै जे अखने बेटा परदेशसँ एलै आ बेसाह अनैले दोकान पठौलक।
  कोइ ने ि‍कछु बाजत। कोनो अनकर काज छि‍यै जे ि‍कयो ि‍कछु बाजत। बाज कथी सबहक काज छौ?”
  एक रूपैया कऽ नून, दू गो तीमनो-तरकारी करब तेँ पॉंच रूपैयाक करू तेल सेहो लऽ लि‍हेँ। आठ अन्‍नाक जीर-मरीच, आठ अन्‍नाक हरदी आ आठ आनाक मि‍रचाइ सेहो लऽ लि‍हेँ। अल्‍लुओ घरमे नहि‍ये अछि‍। तरैबला अल्‍लू सेहो लऽ लि‍हेँ। दूटा पापड़ो लऽ लि‍हेँ। आइ लछमी पूजा सेहो छी तेँ आठ अन्‍नाक मखान आ आठ अन्‍नाक चि‍न्‍नि‍यो लइये लि‍हेँ। भरि‍ राति‍ डि‍बि‍या जरत तइले मट्टि‍यो तेल कनी बेसि‍ये कऽ लऽ लि‍हेँ।
  आउरो ि‍कछु?”
  मन पाड़ दुखनी बाजल- आब तँ लोक धुमनक धूपो देनाइ छोड़ि‍ये देलक तेँ एकटा अगरवत्तीक डि‍ब्‍बा सेहो लइये लि‍हेँ।
     श्‍यामा ि‍दआरी बनवै लए ि‍चक्‍कनि‍ माटि लोढ़ीसँ फोड़ए लगलीह। भुखना दोकान वि‍दा भेल। दुखनीक मन असथि‍र भेल। मन असथि‍र होइते बेटीकेँ कहलक- बुच्‍ची, हम नहाइ लए जाइ छी। ि‍करि‍णो लुकझुकाइये गेल।
  श्‍यामा- बौआ जे साड़ी अनलकौ सएह लऽ ले।
     बेटीक बात सुि‍न दुखनी हरा गेलि‍। मनमे नचए लगलै बेटाक कीनल पहि‍ल साड़ी। जहि‍यासँ अपने मुइलाह तहि‍यासँ कहि‍यो नव साड़ीक नसीव नहि‍ भेलि‍। ओना बेटी अपन पहि‍रल साड़ी साले-साल दइते रहल तेँ कहि‍यो कपड़ाक दुख नहि‍ये भेलि‍। रोडे ि‍कनछरि‍मे गारल सरकारी कलपर दुखनी पहुँचल। कलपर पहुँचते मन पड़लै। साड़ी-लोटा कलेपर रखि‍ चोट्टे घुि‍र कऽ आंगन आबि‍ बेटीकेँ कहलक- दाय, एकटा बात मन पड़ि‍ गेल। ि‍बसरि‍ जाइतौं तेँ कहै लए एलि‍यौ।
  अकचकाइत श्‍यामा पुछलक- कोन बात मन पड़लौ?”
  दुखनी- बच्‍चा जे दोकानसँ औत तँ कहि‍ दि‍हैन जे अगि‍ला चौमास बि‍करी अछि‍। दुइये कट्ठा छइहो। से कीनि‍ लेत। हमरा ने एक्कोटा घरसँ काज चलैत अछि‍ मुदा, नइ अइ साल तँ अगि‍लाे साल ि‍वआह कइये देवइ। बाल-बच्‍चा हेतै। लघि‍यो करै लऽ कतऽ जतै। लोक बढ़ने मालो-जाल पोसबे करत। से कतऽ बान्‍हत।
  श्‍यामा- अच्‍छा जो, पहि‍ने नहाले। बौआ दोकानसँ औत तँ मन पाड़ि‍ देबौ।        
गजेन्द्र ठाकुर-
कथा-
संघर्ष

फाइलक गेँट
, गरदासँ सनल। ओहिमे सँ एक-एकटा कागत निकालि मुँहपर रुमाल राखि झारि रहल छी। ओहिमे सँ किछु काजक वस्तु निकलैत अछि, किछु बेकाजक। विधवा सोहागोक केस-मुकदमाक फाइल। मान-अपमानक खाता-खेसरा। आरोप-प्रत्यारोपक प्रकरणक क्रम। बूढ़ महिलाक युवावस्थाक खिस्सा, किछु सत्य, किछु मिथ्यारोप। पति आ पुत्रक जीवन। बेनग्न होइत हमर सभक सभ्यताक छाप। किएक चानन घसने रहैत अछि ई बूढ़ी। भगवान पर एतेक भरोस? एहि उमरिमे बेटाक स्मारक बनेबाक जिद्द? हारि आ जीतक तारतम्यक बीच, एखन फेर एकटा दोसरे पेटीशन? जितबाक कोन अद्भुत लगन लागल छैक ओकरा। हारिते रहल अछि भरि जिनगी, तैयो!
पहिने तँ कुमोनसँ मंडल सरक कहलापर ई काज हाथमे लेने रही। मुदा आब हमरो इच्छा भऽ गेल अछि
, इच्छा ओकर पेटीशनकेँ यथाशीघ्र दाखिल करबाक। इच्छा ओकरा जितेबाक। ई फाइलक गरदा, गरदासँ सानल कागत-पत्तर सभ। डस्टसँ एलर्जी अछैत हम एहिमे घोसिया गेल छी। एहि बुढ़ियाक हारिक नमगर फेहरिस्ट, तकर सोझाँ हमर अपन हारि सभक कोनो लेखा नहि। एकरा जितएबाक जिद्दक आगाँ अपन अप्रत्यक्ष विजय लखैत अछि। सोझाँ-सोझी विजय नहि तँ एहि बुढ़ियाक माध्यमसँ सम्भावित विजयक पेटीशन। हारत तँ ई बुढ़िया आ जे ई बुढ़िया जीतत तँ जीतब हम। ई बुढ़िया धरि अछि अगरजित। ऑफिसमे सभसँ झगड़ा केने अछि। कार्यालयक क्यो गोटे एकर पेटीशन आगाँ बढ़ेबाक लेल तैयार नहि। मंडल सर मुदा एकर सभटा नखड़ा बरदास्त करैत छथि। एकर बेटा हुनकर बैचमेट छलन्हि। नीक लोक छथि, सज्जन। कार्यालयक कनीय सदस्य सभसँ हमरा कहियो कोनो प्रतियोगिता नहि होइत अछि। मुदा उच्च पदाधिकारी सभसँ फाइलोपर आ ओहिनो किछु ने किछु होइते रहैत अछि। मुदा मंडल सर नीक लोक। सज्जन। आ एहि पेटीशनकेँ देबाक भार ओ हमरेपर छोड़ने छथि। बुझल छन्हि जे अधिकारी सभ ओहि पेटीशनमे नेङरी मारत। आ तखन दोसर सभ बीचेमे पेटीशन छोड़ि भागि जएत। मुदा हम तँ से भेलापर पाछू पड़ि जाएब आ तखन पेटीशन दाखिल भऽ सकत हमरे बुते। ई विश्वास छन्हि मंडल सरकेँ।
अहाँपर सँ हमर विश्वास उठि गेल अछि । एक महिनासँ झुट्ठे घुमा रहल छी। एखन धरि पेटीशन नहि भेल दाखिल कएल”- बुढ़िया आइ लगा कऽ तेसर बेर ई सभ गप सुनेलक अछि आ चलि गेल अछि। पहिल बेर तँ हम मंडल सरकेँ कहबो केलियन्हि जे कोन फेरमे हमरा सभ पड़ल छी। एहि बुढ़िया लेल जान-प्राण लगेने छी। मुदा देखू, दस टा गप सुना कऽ चलि गेल। मुदा मंडल सर कहलन्हि जे- नञि यौ। समएक मारल अछि ई । जेहन लोक सभसँ आइ धरि एकरा भेँट छै, तेहने ने बुझत ई अपना सभकेँ। ई गरदा सानल फाइल सभकेँ मुदा आब घोंटि गेल छी हम, बुझू सोंखि गेल छी। आइ फेर बुढ़िया ई सभ गप कहि बहार भऽ गेल। हम आ मंडल सर एक दोसराकेँ देखि रहल छी। बिनु हँसने। पराजयक छाह दुनू गोटेक मुँहपर अछि।
भऽ गेल अछि सर। एहि शुक्र धरि पेटीशन दाखिल भऽ जाएत
मुदा अहाँक स्थानान्तरण भऽ गेल अछि, शुक्र दिन धरि अहाँकेँ जएबाक अछि
कहलहुँ ने हम। भऽ जाएत शुक्र दिन धरि। जएबासँ पहिने दाखिल कइये कऽ जाएब। परिणाम तँ बादमे पता लागिये जाएत
बिनु हँसने
, बिनु तमसाएल मुखाकृति लेने बहराइत छी। कऽ दैत छिऐक दाखिल एकर पेटीशन। हारत तँ ई हारत। जीतत जे ई, तँ जीतब हम।
 
 

सोहागो। गढ़ बलिराजपुरक बसिन्दा एकर परिवार। खेती-बाड़ी नीक
, तरकारी बेचि नीक जमीन-जत्था बनेने। छह भाँएपर भेल छलीह सोहागो।
पिताक दुलारि। माताक दुलारि। सभ भाएँक दुलारि। मुदा मात्र दस बरख। फेर विवाह भऽ गेलन्हि। पतिसँ प्रेम छलन्हि वा नहि छलन्हि
, ई गप गरदा लागल कोर्ट फाइलमे नहि लिखल अछि।
हुनकर नैहरक चर्च मात्र एक पैराग्राफमे खतम अछि। मात्र ई विवरण अछि जे पतिक मृत्यु भऽ गेलन्हि जखन हिनकर उमरि अठारह बरखक छलन्हि।
मुदा एकटा बेटा भगवानक कृपासँ मृत्युक पूर्व पति हुनका दऽ गेल छलखिन्ह। अठारह बरखक उमरि। एकटा बच्चा।
मुदा गरदाबला फाइलमे नहिये सासुरक कोनो लोकक आ नहिये नैहरक कोनो भाए-बन्धुक कोनो गबाही वा किछुओ भेटल। ताहिसँ ई लागल जे भाए सभ अपन-अपन परिवारमे व्यस्त भऽ जाइ गेल होएताह। तखन सोहागोक ई बयान जे ओ नैहरक दुलारि छलीह! माए-बापक आ छह भाँएक। माए-बाप तँ चलू बूढ़ भऽ मरि गेल होएताह
, मुदा भाए सभ?
कष्ट काटि अफेलकेँ पढ़ेलन्हि-लिखेलन्हि सोहागो। बीस बरखक बेटा भेलन्हि तँ ओहो मृत्युकेँ प्राप्त कएलक। नीक सरकारी नोकरी भेटले छलैक। घटक सभ घुरियाइये रहल छलैक। आठ बरखक वैवाहिक जीवनक बाद बीस बर्खक वैधव्य। आब पुतोहु अबितैक आ नैत-नातिन संगे ओ खेलाइतए। मुदा तखने ई वज्रपात। मुदा हमर तँ तहिया जन्मो नहि भेल छल होएत। नञि
, सत्ते। बुझू जाहि बरख एहि बुढ़ियाक बेटाक मृत्यु भेल छलै, ताहि बरख हमर जन्म भेल रहए। आ तकरो बाइस बरख बीति गेल। बूढ़ी आब हमरा समक्ष अछि। ओकर बेटाक बैचमेट हमर मंडल सर। आ हम ओही पदपर छी जाहि पदपर ओकर बेटा आइसँ बाइस बर्ख पहिने नोकरी शुरूह कएने रहए। छह मास मात्र नोकरी कएने रहए आकि...। शुक्र दिन धरि समय बाँचल अछि हमरा लग। की करू? ई बुढ़िया हहाएल-फुफुआएल अबैत अछि। सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक आग्रह लोक सभसँ करैए, कैक बरखसँ। मुदा एकर झनकाहि बला स्वभावसँ, व्यवहारसँ लोक एकरापर तमसा उठैत अछि। एकरा अर्द्ध-बताह घोषित कऽ देल गेल अछि। मुदा एहि बेर तँ एकर काज किछु दोसरे तरहक छैक। अही सप्ताह किछु करए पड़त। देखै छी।

 अफेलकेँ मरबाक रहितै तँ अहाँक रिवाल्वरसँ अपन माथपर किऐ मारितए। ओकरा लग तँ अपन सर्विस रिवाल्वर रहए
श्रीमान्। हमर बेटाक हत्या कएने अछि जटाशंकर। हमर जीवन नर्क बना देलक। बीस सालक हमर तपस्या समाप्त कऽ देलक। एकरा सजाए देल जाए
मुदा जज साहेब। जटाशंकर आ अफेलक अलाबे ओहि घरमे क्यो नहि छल। हमर कानून कहैए जे दस दोषी बहरा जाए मुदा एकटा निर्दोषकेँ सजा नहि भेटए। के गबाही देत जखन तेसर क्यो रहबे नहि करए”?
मुदा जज साहेब अपने कहि रहल छथि जे अफेल दोसराक रिवाल्वरसँ अपनापर गोली किएक चलाओत। आ अपनापर गोली चलेबाक अर्थ भेल आत्महत्या। हमर बेटा हमरा असगर छोड़ि आत्महत्या कऽ लेत? किएक करत ओ आत्महत्या”?
जटाशंकरकेँ हिरासतमे लेल जाए...अगिला सुनवाई....
फाइल पढ़िते रही आकि बूढ़ी बिहाड़ि जेकाँ आएलि।
अहाँक चेलाक तँ ट्रांसफर भऽ गेल मंडल सर! सभ एक्के रंगक छी। हमर बेटाक मूर्ति कॉलोनीक गेटपर लागि जाइत तँ कोन अनर्थ भऽ जइतैक। मुदा सभ अपन-अपन घर परिवारमे लागल अछि! जे गेल से गेल। अनका की कहू, हमर भाइये सभकेँ देखू। कहै लेल तँ छह टा....। हनहन-पटपट करैत ओ बहार भऽ गेलि। मंडल सर ओकरा-सुनू। हिनकर ट्रांसफर भेल छन्हि मुदा एखन शुक्र दिन धरि रहताह”- ई सभ कहिये रहल छलाह मुदा ओ भङ्गतराहि नहि सुनलक। किएक सुनत?
की भेल? जाए दियौक। शुक्र दिन पेटीशन फाइल भऽ जएतैक तँ ओकर गोस्सा अपने ठंढ़ा भऽ जएतैक

कहू जटाशंकर। हमरा तँ अफेलक आत्महत्याक कोनो कारण नहि बुझना जाइत अछि। ई सत्य जे ओहि मृत्युक गबाह नहि अछि। मुदा ओहि कोठलीमे मात्र दू गोटे रहथि। अफेल आ जटाशंकर। आ अहाँक रिवाल्वरक गोली अफेलक माथमे गेलैक।
मुदा जज साहेब। हमरा किछु सूचना भेटल अछि जाहिसँ हमर दिमाग घूमि गेल अछि। ओना हम ई सूचना सार्वजनिक करबाक पक्षमे नहि छलहुँ कारण एहिसँ एकटा भूचाल आओत। मुदा जखन हमर क्लाइन्टपर फाँसीक सजाक खतरा घुरमि रहल अछि, हमरा लग एकरा सार्वजनिक करबाक अतिरिक्त आर कोनो उपाय नहि अछि।
ई कारी कोट पहीर फेर कोनो बहन्ना अनने अछि। हम गरीब लोक छी सरकार। हमरा कोर्टक तारीखपर आबएमे ढेर खरचा उठबए पड़ैत अछि। एकरा सजा देनेसँ हमर बेटा घुरि कऽ तँ नहि आओत मुदा ई फेर एहन काज नहि करए से टा हम चाहै छी।
मुदा सोहागो देवीजी। ई केस कतेक माससँ चलि रहल अछि मुदा नहिये अहाँक परिवारक आ नहिये अहाँक सासुरक क्यो गोटे आएल
आगाँक आरोप प्रत्यारोपमे सोहागोपर चरित्रहीनताक आरोप लगाओल गेल रहै आ सिद्ध करबाक प्रयास कएल गेल रहै जे हुनकर पुत्र अपन माएक प्रेमी सभसँ आजिज आबि कऽ आत्महत्या कएने छल। जटाशंकर बचि गेल रहए। आब तँ ओ रिटायर भऽ सरकारी पेंशन उठा रहल अछि।

बिहारशरीफ घुरि हम बूढ़ीक पेटीशन दाखिल कऽ दै छी। पतिक मृत्युक बाद ऑफिस बला सभ सर्टिफिकेटक अभावमे ओकर जन्म तिथिपाँच साल घटा देने रहै
, कोनो जानि बूझि कऽ से नहि। मुदा बुढ़िया तै जमानामे मैट्रिक छल। मैट्रिकक सर्टिफिकेटक जन्म तिथिक हिसाबसँ पाँच साल आर नोकरी छै। चलू, जे भेलै एकरा संग, देखी आब। अगिला साल रिटायरमेन्ट छै, जे पाँच साल बढ़ि जएतैक तँ आर नीक। हमर ट्रांसफर तँ भइये गेल रहए से हम अपन झोर-झपटा आ समान चीज-बौस्तु लऽ कऽ अपन नव गन्तव्य स्थलपर बिदा भऽ जाइत छी। कार्यालयसँ जाइत काल बुढ़िया भेटैत अछि, कल जोड़ने ठाढ़, जेना कहि रहल होए- धन्यवाद। हम ओहि काल्पनिक धन्यवादक उत्तर दै छी- काज भऽ जाए तखन ने।

कएक साल बीति गेल। किछु व्यस्तताक कारणसँ आ किछु पेटीशन अस्वीकृत भऽ जएबाक सम्भावित सम्भावनासँ परिणामक प्रति उत्सुक नञि रहै छी। मुदा मंडल सर एक दिन भेटि जाइ छथि।
ओकर पेटीशन स्वीकृत कऽ लेलकै विभाग। रिटायरमेंटक दिनसँ पहिनहिये आदेश आबि गेल रहै। आब ओ पाँच साल आर संघर्ष करत, सरकारी कॉलोनीक गेटपर अपन बेटाक मूर्ति लगेबाक लेल वा आन कोनो संघर्ष।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...