Monday, May 31, 2010

'विदेह' ५८ म अंक १५ मइ २०१० (वर्ष ३ मास २९ अंक ५८)- Part II


जगदीश प्रसाद मंडल
जगदीश प्रसाद मंडल

जीवन संघर्ष- 4

आइ धरि‍क इति‍हासमे बँसपुराक ऐहन रूप कहि‍यो नहि‍ बनल छल जेहन आइ देखि‍ पड़ैछ। ओना ि‍कछु अनुभवी बूढ़-पुरान लोकनि‍क कहब छनि‍ जे आजुक बँसपुरा दोहरा कऽ बसल गाम छी। हुनका लोकनि‍क कथनानुसार करीब साठि‍-सत्तरि‍ बर्ख पहि‍ने एहि‍ गाममे कोसी प्रवेश केलक। तहि‍सँ पहि‍ने जे गाम छल ओकर रूप-रेखा दोसर तरहक छलैक। आजुक जे मुख्‍य बस्‍ती अछि‍ ओ पहि‍ने बाध छलै आ जे बस्‍ती रहै ओ अखन बाध बनि‍ गेल अछि‍। जेकर अनेको परमान अखनो भेटैत अछि‍। अखनो बाधमे कतौ-कतौ पि‍त्तरि‍ आ तामक बरतन भेटि‍ जाइत अछि‍। पहि‍लुका बस्‍तीमे गाछी-वि‍रछी भरपुर छलैक। मुदा अखुनका जेकॉं ने एते लोक छलैक आ ने एते परि‍वार। जखन पहि‍ल बेर कोसीक बाढ़ि‍ आइल तँ लोककेँ वि‍सवासे ने होय कोसीक पानि‍ छी। मुदा ि‍कछु अनुभवी लोक पानि‍क रंग देखि‍ परेखि‍ लेलनि‍। ि‍कऐक तँ कमला पानि‍ जेकॉं घोर-मट्ठा माने पटि‍आइल पानि‍ नहि‍ रहैक। पॉंकक कोनो दरसे नहि‍ रहैक। पहि‍ल साल एतबेपर रहि‍ गेलैक। एक तोड़ बाढ़ि‍ आएल आ दस-बारह दि‍नक उपरान्‍त सटकि‍ गेलै। दोहरा कऽ नहि‍ आएल। दोसर साल जे बाढ़ि‍ आएल ओ छोटकी धार -नासी- जेकॉं गामक बीचो-बीच बना देलक। ओहि‍ साल गामक लोककेँ ई आभास नहि‍ भेलैक जे ऐना धार गाममे बनि‍ जाएत। जहि‍सँ सभ गामेमे रहल। बाधक उँचका जमीनमे घर बना लेलक। कोना नहि‍ बनबैत? एक तँ पुस्‍तैनी गामक सि‍नेह आ अपन सम्‍पति‍यो तँ छलैक। छह मासक उपरान्‍त धार सुखि‍ गेल। मुदा उपजो-बाड़ी आ गाछो-ि‍बरीछ अधा-छि‍धा भऽ गेलैक। ि‍कछु गोटेक मालो-जाल नष्‍ट भेलैक। अनरनेबा, धात्री, लताम, कटहर इत्‍यादि‍क गाछ उपटि‍ गेलै। दूटा पोखरि‍ आ पॉंचटा इनार धारक पेटमे समा गेलै। जहि‍सँ लोकक मनमे डर पैइसए लगलैक। गामक माटि‍-पानि‍क सि‍नेह सेहो कम हुअए लगलैक। ि‍बसवासू जि‍नगी अनि‍ि‍श्‍चतता दि‍स बढ़ए लगलैक। ि‍कछु गोटे आन गाम जा बसैक बात सोचए लगल। मुदा जेकरा खेत-पथार रहै ओ करेजपर पाथर रखि‍ रहै लऽ मजबूर भऽ गेल। तेसर साल बाढ़ि‍ सभसँ भयंकर रूपमे आएल। जहि‍सँ गामक खेतो-पथारक रूप नष्‍ट भऽ गेलैक, गाछो-ि‍बरीछ नष्‍ट भऽ गेलैक आ लोकोक जान अबग्रहमे फँसि‍ गेलैक। छातीमे मुक्‍का मारि‍ सभ गाम छोड़ि‍ देलक। सन्‍मुख कोसी गाम होइत बहए लगल।
      तीस बर्ख, एक रफ्तारमे कोसी बँसपुरा होइत बहैत रहल। गामक सभ आन-आन गाम जा बोनि‍हार बनि‍ गेल। अधि‍कतर लोक नेपाल पकड़ि‍ लेलक। जेकरा-जत्तै जीवैक गर लगलै ओ ओत्तै रहए लगल। जाधरि‍ लोककेँ अपन पूँजी रहैत छैक ताधरि‍ ने ि‍कसान वा कारोबारी रहैत अछि‍। मुदा पूँजी नष्‍ट भेने तँ खाली-पएर बँचि‍ जाइत छैक। बँसपुराक सभ बोनि‍हार बनि‍ गेल। गामक, कोसी ऐलासँ पूर्वक, सामाजि‍क संबंध रॉंइ-बॉंइ भऽ गेलैक। पहि‍लुका समाज नष्‍ट भऽ गेलैक। बँसपुराक सभ सुख लोक ि‍वसरि‍ गेल।
  मातृभूि‍म ककरा कहै छै से बँसपुराक लोकक लेल परि‍भाषे मेटा गेलैक। ि‍कएक तँ मातृभूमि‍ आ दुनि‍यॉंमे की अन्‍तर छैक? जँ जन्‍मभूमि‍केँ मातृभूमि‍ मानल जाए तँ मातृभूमि‍ये नष्‍ट भऽ गेलैक। जे सभ बँसपुरामे जन्‍म नेने छल ओ आन-आन गाममे रहि‍ रहल अछि‍। जँ कहि‍यो फेरि‍ बँसपुरा जगतै तँ ओ फेरि‍ आबि‍ देखत ि‍क नहि‍। तहि‍ना जे घुरि‍ कऽ आओत ओ सभ तँ आने-आने ठाम जन्‍म नेने अछि‍। तहन ओकर मातृभूि‍म कोन भेलै। जँ देशकेँ मातृभूमि‍ मानल जाए तँ देशो वि‍भाजि‍त भऽ जाइ छैक। जे दू नाम धारण कऽ लइत अछि‍। तहन तँ देशोकेँ कोना मातृभूमि‍ मानल जाए। जँ से नहि‍, जहि‍ धरतीपर लोक जन्‍म लइत अछि‍ ओकरा मानल जाए तँ दुनि‍यॉंक जते देश अछि‍ सभ धरति‍येपर अछि‍। तहन ि‍कअए मातृभूि‍मकेँ छोट आकारमे मानैत छी। ि‍कऐक ने दुनि‍यॉंकेँ मातृभूमि‍ मानल जाए?
      कोसीक धार हटलापर जहन बँसपुरा जागल तँ रूपे बदलि‍ गेल छलैक। मुलायम माटि‍ बालु भऽ गेलैक। गाछ-वि‍रीछक जगह काश-पटेर, झौआ लऽ लेलक। अपन पुस्‍तैनी गाम बुझि‍ पुन: लोक सभ आबए लगल। ने ककरो जमीनक सबूत, खति‍आन, दस्‍तावेज इत्‍यादि‍, रहलै आ ने जमीनक ठौर-ठेकान। मुदा गाम तँ हेतैक। जहि‍ना अदौमे माने साबि‍कमे जंगल-झाड़ तोड़ि‍ लोक वसो-वास आ उपजाउ भूि‍म बनौलक। रेन्‍ट-फि‍क्‍स कऽ सरकारो जमीनक अधि‍कार देलक। सएह गाम बँसपुरा छी।
      जहि‍ना कहि‍यो बँसपुरा पानि‍सँ दहा गेल छल तहि‍ना पानि‍क अभाव गाममे भऽ गेलैक। ने एकोटा पोखरि‍-इनार रहल आ ने बाढ़ि‍क पानि‍ अबैत। पोखरि‍-इनार खुनब छोड़ि‍ लोक कलसँ पानि‍क काज चलबए लगल। बरखा पानि‍सँ खेती हुअए लगलैक। चापी जमीनकेँ बान्‍हि‍-बान्‍हि‍ लोक पोखरि‍योक सेहन्‍ता मेटबए लगल। जहि‍मे माछ-मखान, सि‍ंगहार सेहो होइत अछि‍।
      ओहि‍ बँसपुरामे आइ दि‍वालि‍यो आ कालि‍यो पूजाक उत्‍साह लोकक रग-रगमे दौड़ि‍ रहल अछि‍। आन-आन गामसँ अबैबला देखि‍नि‍हार लेल चारू भागक रास्‍ताकेँ गौवॉं, अपन सीमा भरि‍, जते टूटल-टाटल छलै सभकेँ भरि‍-भरि‍ कऽ सहीट बना देलक। जतए कतौ बोन-झार छलै सभ काटि‍-खोंटि‍ साफ कऽ देलक। ओना सरकारो दि‍ससँ बान्‍ह-सड़कपर माटि‍ पड़ैत मुदा, दूधक डाढ़ी जेकॉं पड़ने बरसातमे भसि‍ये जाइत छलैक। जहि‍सँ जहि‍ना कऽ तहिना रहि‍ जाइत। मुदा एहि‍ बेरि‍ गौवॉं अपन सम्‍पत्ति‍ बुझि‍ नीक जेकॉं मरम्‍मत केलक। खाली बान्‍हे-सड़क टा धरि‍ नहि‍ गामक जते पानि‍ पीबैक साधन अछि‍ सबहक मरम्‍मत सेहो केलक। ओना बैसाख-जेठ जेकॉं देखि‍नि‍हार लोक थोड़े पानि‍ये पीति‍ मुदा, तइओ पानि‍ तँ पीवे करत गामक लेल सभसँ आश्‍चर्य ई भेल जे एकाएक सभ अपन जि‍म्‍मा कोना बुझलक।
      केवल पानि‍येक प्रबंध टा नहि‍ पाहुन-परकसँ लऽ कऽ हराएल-भौथि‍आइल देखि‍नि‍हारक लेल सेहो रहैक व्‍यवस्‍था केलक। जेकरा दुआर-दरबज्‍जा छै ओकर तँ कोनो बाते नहि‍, जेकरा नहि‍यो छैक ओहो सभ जोगार केलक। मोटका प्‍लास्‍टि‍क आनि‍-आनि‍ घरे जेकॉं बना लेलक। सबहक मनमे गद्गदी जे आबह कते पाहुन-परक अबैए। सुतैक लेल मोथीक ि‍बछान सेहो बेसि‍ये कऽ कीनि‍-कीनि‍ रखि‍ लेलक। अखन ने अनगौवॉंक लेल कीनलक मुदा, पूजाक पछाति‍ तँ अपने सुतबो करत आ अन्‍नो-पानि‍ सुखौत। ओना जे मेला देखए आओत ओ सुतत ि‍क मेला देखत। मुदा अइओ जे भरि‍ राति‍ मेला देखत ओ तँ दि‍नोमे सुतबे करत।
      रघुनाथोकेँ धन्‍यवाद दि‍यै जे खाइ-पीवैक समान- चाउर-दालि‍, तरकारीसँ लऽ कऽ जारनि‍-काठी धरि‍क तेहन कारोवार पसारि‍ देलक जे कतबो लोक कीनत-बेसाहत तइओ नहि‍ सठतै। एक्‍के मेलाक कमाइमे ओहो धनि‍क भऽ जाएत। हँ तँ पूँजि‍यो तँ वएह ने लगौने अछि‍। तेहेन ओकर बोहूक बोली मीठ छै जे एक्‍कोटा गहि‍कीकेँ थोड़े घूमए देत। सदि‍खन दोकानमे भीड़ लगले रहतै। कहबि‍यो छै ने जेकरा भगवान दइ छथि‍न छप्‍पर फॉंड़ि‍ कऽ दैत छथि‍न। भने दोकान घरेपर केने अछि‍। जँ मेलामे केने रहैत तँ गौवॉंकेँ घि‍नाष्‍ठे करैत, ि‍कएक तँ पाहुन-परकक सोझमे कोना लोक चाउर-दालि‍ कीनैत।
      मुदा, आश्‍चर्य भेल। बाप रे गाममे एते पाहुन-परक कोना उनटि‍ कऽ चलि‍ आएल। जना ककरो कोनो अपना काज नहि‍ छैक। तहूमे मरदसँ तीन गुना स्‍त्रीगण आबि‍ गेल अछि‍। स्‍त्रीगणोमे वेसी ओहन अछि‍ जे पनरहसँ पच्‍चीस बर्खक अछि‍। सेहो एक मेलक माने चालि‍-ढालि‍क रहैत तब ने, चारि‍-पॉंच मेलक छै। कोना नै गामक हबामे खतरनाक कीड़ा फड़त। बम्‍वैइया सभ जे छै ओ सि‍र्फ‍ छौँड़े-माड़रि‍ टा केँ थोड़े धड़त, बुढ़ो-बुढ़ानुसकेँ धड़वे करत। जहि‍ना कोनाे अनठि‍या चि‍ड़ैकेँ गाममे अएलासँ गामक सभ देखए जाइत तहि‍ना ने बम्‍वैइयो चि‍ड़ैकेँ देखत। मुदा नहि‍यो देखत तँ अनुचि‍ते हएत ि‍क ने। आखि‍र ओहो ओहन रूप ि‍कअए बनौने अछि‍। लोके देखैले ि‍क ने। जँ से नहि‍ मनमे रहि‍तै तँ ऐहन पॉंखि‍ बनबैक काज कोन छलै। मनुक्‍ख तँ मनुक्‍ख छी की ने? तइले ऐहन हबा-ि‍मठाइ बनैक कोन जरूरत छैक। तहूमे जखन बनि‍ गेल आ लोक नहि‍ देखै तँ बनैक मोले ि‍क? मोल तँ तखने हेतै ि‍क ने जखन लोक ओकरा नि‍ङहारि‍-नि‍ङहाि‍र तर-उपर देखत। तेँ ि‍क ओकर चराओर गाम-देहातमे नै छै? जरूर छै। बम्‍वइये कलाकार सभ ने गामोक लेाककेँ ि‍सनेमाक माध्‍यमसँ सि‍खौलकैक हेँ। लोकक मनो अजीब छैक। जँ कनि‍यो उपर उड़त तँ बुझि‍ पड़ैत छैक जे जमीनक सभ ि‍कछु हम देखैत छी मुदा, हमरा ि‍कयो देखबे ने करैत अछि‍। तहि‍ना ने जमीनो परक केँ बुझि‍ पड़ै छैक। मुदा भ्रम तँ दुनूकेँ छैक। उपर उड़नि‍हार जँ जमीनक उपरका भाग देखैत अछि‍ तँ जमीनो परक ने ओकरा नि‍चला भाग देखैत अछि‍।
      चाि‍र बजैत-बजैत मेला देखि‍नाहारक भीड़ काली-स्‍थान उमड़ि‍ गेल। ओना बूढ़ि‍-बुढ़ानुस अपन-अपन घर-अंगनाक ओरि‍यानमे लागल। ि‍सरपर सूर्यास्‍त होइतहि‍ दीप जरौनाइसँ लऽ कऽ उक फेरि‍नाइ सबहक सि‍रपर छन्‍हि‍। मुदा आन गामसँ आएल लोककेँ कोन काज छन्‍हि‍ ओ तँ मेले देखैले आएल छथि‍। सभसँ खूबी तँ ई अछि‍ जे मेला देखि‍नि‍हारे मेला देखैक वस्‍तु बनि‍ गेल अछि‍। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍यक उपर जवावदेही-भार रहने सभ जी-जानसँ नि‍गरानीक संग-संग वेवस्‍थामे जुटल। सौँसे मेला पी-पाह होइत। ओना पूजाक प्रक्रि‍या नि‍शा राति‍मे शुरू हएत मुदा, ओरि‍यान तँ पहि‍नहि‍सँ करए पड़त। ऐहन नहि‍ ने जे एक दि‍स पूजा शुरू हएत दोसर दि‍स समान जुटले ने रहत। ऐहन नहि‍ ने जे पूजा काल जहि‍ वस्‍तुक जरूरत होय ओ अछि‍ये नहि‍। तेँ पुजेगरि‍यो आ पुरोहि‍तो अपन सभ वस्‍तु पुरजीसँ ि‍मला-मि‍ला सैंति‍-सैंति‍ रखैत।
      ओना मेलाक आनन्‍द तँ तखन होइत छैक जखन पूजा शुरू होइत अछि‍। नाचो-तमाशा तँ तखनेसँ ने शुरू होइत छैक। मुदा तइयो सोलहन्‍नी नहि‍ तँ अधो-छि‍धो मेलाक आकर्षण तँ बढ़ि‍ये गेल छैक। सभसँ अजीव तँ ई भऽ गेल अछि‍ दर्शककेँ गजपट भऽ गेल अछि‍। तेहन ने बजारू रूप बनि गेल अछि‍ जे लड़का-लड़कीक भेदे मेटा गेल छै। चश्‍मा खोलि‍-खोलि‍ बूढ़-पुरान सभ ऑंखि‍ मलि‍-मलि‍ देखैत जे ई छौँड़ा छी ि‍क छौँड़ी। मुदा तइओ ऑंखि‍ ठीकसँ काजे नहि‍ कऽ रहल। सभ अपन-अपन धुनि‍मे मस्‍त। तहि‍ बीच फटाक-फटाकक अवाज हुअए लगलै। फटाक-फटाकक अवाज सुनि‍ सबहक कान ठाढ़ भेल। जे जेतै रहै ओ ओतैसँ अवाज अकानए लगल। मुदा दोकान-दौड़ी तहि‍ ढंगसँ सजल रहै जे सोझा-सोझी अवाज नि‍कलबे नहि‍ करैत रहै। लगमे जे रहै ओ तँ अवाजो सुनै आ मारि‍यो होइत देखै। ि‍कछु लोक बाहरो दि‍शि‍ भगैत रहै आ ि‍कछु गोटे दौड़ी-दौड़ी ऐबो करैत रहै। उत्तर दि‍ससँ देवन आ पछि‍मसँ मंगल दौड़ल आि‍व भीड़केँ चीड़ैत आगू पहुँचल। आगू पहुँचतहि‍ देखलक जे बीस-पच्‍चीस बर्खक दूटा छौँड़ा चेस्‍टरक दोकानक आगूमे मुक्‍का-मुक्‍की कऽ रहल छै। फांटि‍ देखि‍ दुनू देवनो आ मंगलो सहमि‍ गेल। मुदा तहि‍ बीच जोगि‍नदर दौड़ल आबि‍ दुनू हाथ धुमबैत दुनू छौँड़ाकेँ गट्टा पकड़ि‍ माि‍र छोड़ौलक। हल्‍लो शान्‍त भेलै। एकटा छौँड़ाकेँ देवन पुछलक- बौआ, अखन पूजा-पाठक समए छै तखन तोँ ि‍कअए माि‍र केलक?”
  मुदा, जहि‍ छौँड़ाकेँ देवन पुछलक ओ ि‍कछु ि‍वशेष माि‍र खेने रहै। तेँ जाबत ि‍कछु बाजै-बाजै तहि‍सँ पहि‍नहि‍ दोसर बाजए लगल। ओहि‍ छौँड़ाकेँ चोहटैत जोगि‍नदर कहलक- तूँ चुप रहह। पहि‍ने जेकरा पुछलि‍यै से बाजत।
  मुदा जोगि‍नदरक बातक असि‍र एक्‍को पाइ ओहि‍ छौँड़ापर नहि‍ भेलैक। दुनू गामक पाहुन। तेँ ि‍वकट संकट समि‍ति‍क सदस्‍यक बीच भऽ गेल। ि‍वचि‍त्र स्‍थि‍तमे सभ पड़ि‍ गेल। अधि‍कतर लड़को आ लड़कि‍यो परदेशि‍या। तेँ मारि‍क डर ककरो हेबे ने करैत। लड़की सभ जोर दैत बाजलि‍- ब्रेशि‍यरक दोकानपर लड़का सभकेँ अबैक कोन जरूरत छै। ई तँ स्‍त्रीगणक सौदा छी?”
  मुदा, लड़को सभ लड़कीक बात मानए लेल तैयार नहि‍। तेसर छौँड़ा बाजल- लड़कीक उपयोगक वस्‍तु छी, एकर माने ई नै ने जे ऐकर जरूरत लड़का सभकेँ नहि‍ छैक।
  लड़काकेँ की जरूरत छै?”
  अपनो परि‍वार छै आ ि‍हतो-अपेछि‍त तँ छइहे।
लड़का-लड़कीक बीचक गप्‍प गजपट होइत देखि‍ देवन कहलक- अखन सभ शान्‍त होउ। मेलाक पछाति‍ एकर नि‍बटारा हएत। अखन सभ मेला देखू।
      सूर्यास्‍तक समए। सूर्य तँ पूर्णरूपेण नहि‍ डूबल मुदा, नि‍च्‍चाँ उतड़ि‍ गेलासँ लोकक ऑंखि‍सँ ओझल भऽ गेल। गामक धि‍यो-पूतो आ चेतनो स्‍त्रीगण फुलडालीमे ि‍दआरी, सलाइ, अगरबत्ती आ खढ़क उक लऽ कऽ गामक जते देवस्‍थान अछि‍ सभ दि‍शि‍ धरोहि‍ लगि‍ गेल। ि‍कयो डि‍हवार स्‍थान दि‍स जाइत तँ ि‍कयो महादेव मंदि‍र। ि‍कयो धर्मराजक गहबर दि‍स तँ ि‍कयो हनुमान जीक स्‍थान दि‍स। गाममे पॉंचेटा पुरना देवस्‍थान। छठम नबकामे काली स्‍थान बनल। ओना ठकुरवारी पहि‍ने व्‍यक्‍ति‍गत छल मुदा, महंथ जीक मुइलापर ओहो दसगरदे भऽ गेल। सभ स्‍थानमे दीप जरा, धुप दऽ सभ अपन-अपन आंगन आबि‍ घर-आंगनमे दीप जरबैत माल-जालक थैर, इनार, कलपर सेहो जरौलक। ि‍कछु गोटे कुम्‍हारक बनौल माटि‍क ि‍डबि‍या तँ ि‍कछु गोटे दवाइ पीलहा शीशी सबहक डि‍वि‍या बना सेहो जरौलक। सौँसे गाम इजोत जगमगा गेल। काली स्‍थानक चारू जेनरेटर चलए लगल। जहि‍सँ अन्‍हरि‍या रहि‍तहुँ इजोतसँ गाम दि‍ने जेकॉं भऽ गेल। ओना दि‍नमे मेघ जते उपर रहैत अछि‍ राति‍मे (अन्‍हार) नि‍च्‍चॉं उतड़ि‍ जाइत अछि‍। जाइत अछि‍।
      दि‍वाली पावनि‍सँ गाम नि‍चेन भऽ गेल। स्‍त्रीगण सभ भानस-भात करैमे लागि‍ गेलीह। समए पाबि‍ पुरूख सभ मेले दि‍ि‍श टहलि‍ गेलाह। मेलाक आकर्षण देखि‍ ि‍कनको घरपर अवैक मने नहि‍ होइत रहनि‍। मुदा भरि‍ राति‍ तँ नाच-तमाशा चलि‍ते रहत तेँ ि‍बना खेने-पीने रहबो कठि‍न बुझ अपन-अपन घर-अंगनाक रास्‍ता धेलनि‍। काली-मंडपमे पुजेगरी पूजाक ओरि‍यानमे व्‍यस्‍त रहथि‍। मुजफ्फरपुरक जेहने नाटक तेहने मंचो बनल। ऐहन मंच, आइ धरि‍ एहि‍ इलाकाक लोक नहि‍ देखने रहथि‍। जेहने फइल स्‍टेज तेहने सुन्‍दर-सुन्‍दर रंगीन परदो लगौल गेल रहैक। तेहने उँचगरो। कतबो देखि‍नि‍हार रहत तइओ देखबे करत। अजीव ढंगसँ ि‍बजलीयो लगौल गेल रहैक। बजोक तेहने वेवसथा। मुजफ्फरपुरक मंचसँ कनि‍यो उन्‍नैस वृन्‍दावनक रासक नहि‍। मुदा दुनूमे अंतर साफ-साफ बुझि‍ पड़ैत रहैक। जेहने आधुनि‍कताक प्रदर्शन मुजफ्फरपुरक स्‍टेज करैत रहै तेहने प्राचीनताक वृन्‍दावनक मंच करैत रहै। कौव्‍वालीक मंच तँ ओते लहटगर नहि‍ बुझि‍ पड़ैत। मुदा मेल-फीमेलक दुनू स्‍टेज सटले रहने अपन आकर्षण बढ़ौने रहै। महि‍सोथाक मलि‍नि‍या नाचक मंच सभसँ दब। मात्र चारि‍-पॉंचटा चौकी नि‍च्‍चॉंमे जोड़ने आ चारि‍टा खूँटा गारि‍ उपरमे आल रंगक चनवा आ एकटा परदा मात्र लगल रहैक। मंच दब रहि‍तहुँ मलि‍नि‍या नाचक कलाकार सभक मनमे वि‍शेष उत्‍साह रहै जे सभकेँ उखाड़ि‍ देब। अोकरा सबहक मन गद्-गद् एहि‍ दुआरे रहै जे छुछे टीप-टापसँ सोझे काज चलै छै जे मौलि‍कता हमरा कलाकारमे अछि‍ से अनकामे नहि‍ छैक। संगहि‍ जते देखनि‍हार हमर अछि‍ ओते दोसराक नहि‍ छैक। जहि‍ना बजारमे अनेको दोकान रहि‍तहुँ सोना-चानी कीनि‍हार सोने-चानीक दोकान पहुँचैैत, ि‍कताब कीनिनि‍हार ि‍कताबे दोकानपर पहुँचैत अछि‍ तहि‍ना ने नाचो-तमाशाक छैक।
  नअ बजैत-बजैत मंच सबहक आगू देखि‍नि‍हारक ठट्ठा पड़ए लगल। कोना नहि‍ पड़त? लगसँ देखब आ दूरसँ देखब मे सेहो अंतर होइ छै ि‍कने। मुदा समि‍ति‍क सदस्‍य सभ वि‍चारि‍ नेने रहै जे आगूमे अनगौवॉंकेँ बैसाइब। गौवॉं तँ ठाढ़ो-ठाढ़ पाछुओसँ देखि‍ सकैत अछि‍। तहूमे अनगौवॉंकेँ कोनो ठीके नहि‍ अछि‍ जे सभ दि‍न देखए ऐबे करत। मुदा गौवॉंक तँ अपन मेला छि‍यैक तेँ ऐबे करत। कलाकार सभ मेक-अप करबो नहि‍ केने रहै ि‍क देखि‍नि‍हार सभ पीकी मारब शुरू केलक। कोना नहि‍ मारत? लोक देखए लाइलि‍ ि‍क वैइसैले आइल अछि‍। कमसँ कम बजोबला सभ तँ मंचपर आबि‍ सम बान्‍हह। समो बन्‍हैमे एकाध घंटा लगवे ने करतै। पैसा लऽ कऽ आएल अछि‍ ि‍क कोनो मंगनी आएल अछि‍ जे समए ससरल जाइ छै आ अखन धरि‍ स्‍टेज खाली रखने अछि‍। जनसेवा दलक सदस्‍य सभ कखनो मंचपर जाए शान्‍त करैत तँ कखनो मर्द-स्‍त्रीगणक गजपट भीड़केँ सुढ़ि‍अबैत।
      चारू मंच बाजाक आवाजसँ गनगनाए लगल। देखि‍नि‍हारोक मन बाजाक धुनमे शरबत बनए लगल। ि‍कयो मने-मन गुनगुनाए लगल तँ ि‍कयो हाथक ओंगरीसँ पोनोपर आ ि‍कयो-ि‍कयो ठेहुनोपर ताल मि‍लबए लगल। पूबसँ एक चि‍ड़की मेघ-बादल- पुरबा हवाकेँ संग केने उठल। हवाकेँ उठि‍ते देखि‍नि‍हारक औल-बौल मन शान्‍त हुअए लगल। धीरे-धीरे हवो तेज होइत गेल। करि‍या मेघ सेहो नमहर हुअए लगल। एकाएकी तरेगण डूबए लगल। जहि‍ना-जहि‍ना बादल पसरैत तहि‍ना-तहि‍ना हवो तेज हुअए लगल। काली-मंडपमे पुजेगरी घड़ी देखि‍-देखि‍ पूजाक प्रक्रि‍याकेँ आगू बढ़बए लगलाह। माए-बहीनि‍ गीति‍ शुरू केलनि‍। जोरसँ मेघ बोली देलक। हवो ि‍बहाड़ि‍क रूप पकड़ए लगल। बुन्‍दा-बुन्‍दी पानि‍ पड़ए लगल। मुदा पानि‍क शंका ककरो मनमे नहि‍। ि‍कऐक तँ रौदि‍याह समए रहने सभ नि‍श्‍चि‍न्‍त जे एहि‍बेर मेघमे पानि‍ये नहि‍ छैक जे बरि‍सत। तहूमे जँ शुभ काजमे बुन्‍दा-बुन्‍दी हुअए तँ ओ आरो शुभ छी। तेँ सबहक मन खुशी। मुदा पानि‍क बुन्‍नसँ मंचक आगूमे बैसल देखि‍नि‍हार एका-एकी उठए लगल। तड़तड़ा बड़खा शुरू भेल। ि‍बजलोका सेहो तड़ाक-तड़ाक छि‍टकए लगल। जते ि‍वजलोका छि‍टकै तते मेघो गरजए लगल। गामक लोक घर दि‍सक रास्‍ता धेलक। मुदा अनगौवॉं असमंजसमे पड़ि‍ गेल जे आब भीजबे करब। मुदा ि‍बहाड़ि‍ तँ जान छोड़त। हाि‍र कऽ अनगौवॉं स्‍टेजक उपरो आ तरोमे पहुँच पानि‍सँ बचैक गर अंटबए लगल। इंजन ि‍बगड़ै दुआरे जेनरेटरबला जेनरेटर बन्‍न कऽ देलक। सौँसे मेला अन्‍हार पसरि‍ गेल। जहि‍ना पानि‍ तहि‍ना ि‍बहाड़ि‍ अपन भीमकाय रूप बना नाचए लगल। सौँसे मेला साहोर-साहोरक आवाज हुअए लगल। मुदा सुनै लए ने ि‍बहाड़ि‍ तैयार आ ने बरखा। ि‍बहारि‍ तँ उड़ि‍ कऽ पड़ा गेल मुदा, मुसलाधार बरखा सवा घंटा धरि‍ होइते रहल। दोकान सबहक छप्‍पड़ उड़ने सभ समान तीति‍-भीजि‍ गेल। उड़बो कएल। ककराकेँ देखत। सभ अपने जान बँचवै पाछु लागल। तहि‍ काल एकटा स्‍टेज दि‍ससँ कनै-कुहरैक अवाज उठए लगल। तते लोक स्‍टेजक उपर चढ़ि‍ गेल जे बल्‍ले सभ टूटि‍ गेल जहि‍सँ खसि‍ पड़ल। स्‍टेजक नि‍च्‍चॉं जे लोक सभ बैसल रहै ओकरा उपरेमे उपरका खसल। ककरा की भेलै से तँ अन्‍हारमे देखि‍ नहि‍ पड़ैत मुदा, कानै-कुहड़ैक आवाज टा सुनि‍ पड़ै। छबेटा ि‍सपाही डयूटीमे रहै। वएह बेचारा की करत। ककरा दोख लगाएत। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य आ ि‍सपाही ि‍मलि‍ गर लगौलक। देवन आ जोगि‍नदर राती-राती पड़ा गेल।
      खेला-पीलाक उपरान्‍त सजना ि‍पता दुनि‍यॉंलालकेँ कहलक- बाउ, पॉंच ि‍दनक मेला छै। एक दि‍ना रहैत तखैन ने देखैक धड़कफड़ि‍यो रहैत। से तँ नै अछि‍। सोलहो आना घर-अांगन छोड़ि‍ जाएबो उचि‍त नै। ि‍कएक तँ जते लोक मेला देखए औत ओ सभ ि‍क कोनो मेलेटा देखए औत। ि‍कयो छौँड़ा-छौँड़ीक खेल करए औत, ि‍कयो चाेरी-चपाटी करए औत। के की करए औत से के कहलक। तेँ अखैन हम दुनू परानी जाइ छी आ अधरति‍यामे आबि‍ तोरा उठा देवह। तखन तूँ जइहह।
      सजनाक बात दुनि‍यॉंलालकेँ जँचल। मने-मन मानि‍ लेलक। मुदा माए -तेतरी- बाजलि‍- राति‍-बि‍राति‍केँ देखए हम नै जाएव। साँझू पहरकेँ जाएव। काली-महरानीकेँ सॉंझो दऽ देवनि‍ आ गोड़ो लागि‍ लेबनि‍।
      माएक बात सुि‍न सजना ि‍कछु बाजल नहि‍। मेला देखए वि‍दा भेलि‍। ि‍कछु कालक बाद सजनाक पत्‍नी -सि‍ति‍या- सेहो स्‍त्रीगणक संग गेलि‍। पानि‍-बि‍हाड़ि‍ उठि‍तहि‍ सजना भागल। मुदा तइओ घर लग अबैत-अबैत नीक जेकॉं भीजि‍ गेल। अंगनाक पानि‍ जे नि‍कलैत रहैत तहि‍ठाम डेढ़ि‍या लग आबि‍ पि‍छड़ि‍ कऽ खसि‍ पड़ल। सौँसे देह थालो लगि‍ गेलै आ ठेहुनमे चोटो लगलै। मुदा हूवा कए कऽ उठि‍ ओहि‍ पानि‍मे थाल धाेय आंगन आएल। अखन धरि‍ ने दुनि‍यॉंलाल सुतल छलै आ ने तेतरी। ि‍कऐक तँ हवा देखि‍ तेतरी चुल्‍हि‍ आ मालक घरक घूरक आगि‍ ि‍मझा ओछाइनपर आइले छलि‍। हवाक रूखि‍ देखि‍ दुनि‍यॉंलाल पत्‍नीकेँ कहलक- तेहन हवा अछि‍ जे भरि‍सक घरो ने ठाढ़ रहत। तहूमे एक्‍कोटा खूँटा लकड़ीक नै अछि‍। सभटा बॉंसक अछि‍। बड़ गलती भेलि‍ जे चारि‍ये टा खूँटा बदललौं। सभ खूँटाक जरि‍ सड़ि‍ गेल अछि‍।
      तहि‍ बीच पछुऐतक तीनू पुरना खूँटा कड़कड़ा कऽ टुटि‍ गेलै। नवके खूँटा टा नहि‍ टुटलै। उत्तरबरि‍या-पूबरि‍या कोन लटैक गेलै। मुदा खसल नहि‍। जाड़सँ थरथराइत सजना ओसारपर आि‍ब माएकेँ कहलक- माए, भीज गेलौं। जाड़ो होइए। कनी लूँगी आ चद्दैर नि‍कालि‍ दे?”
  घरेसँ माए कहलक- भीजि‍लेहे धोतीक खूँटक पानि‍ गाड़ि‍ सौँसे देह पोछि‍ ले। लूँगी आ चद्दैर दइ छि‍औ।
      हाथक ओंगरी सजनाक कठुआइल। मुदा तइओ कहुना-कहुना कऽ धोतीक पानि‍ गाड़ि‍, अंगा नि‍कालि‍ सौँसे देह पोदलक। तेतरी डि‍बि‍या लेसए लगली। मुदा सलाइ सि‍मसि‍ गेने बरबे ने कएल। अन्‍हारेमे हथोरि‍-हथोि‍र लूँगि‍यो आ चद्दैरयाे नि‍कालि‍ कऽ दैत बाजलि‍- घूरो कऽ दैति‍यै से सलाइये ने बरैए। तोंही टा ऐलै आ कनि‍यॉं?”
  सजना- कहॉं कतौ देखलि‍यै। पानि‍क दुआरे कतौ अटकि‍ गेल हेतौ।
दुनू गोटे गप-सप्‍प करि‍ते रहै ि‍क रूपलालक घर कड़कड़ा कऽ खसल। रूपलाल दुनि‍यॉंलालक छोट भाए। रूपलाल घरेमे रहै। दू-चारी घर। कोनि‍याबला नहि‍ रहै। घरक दुनू चारक ओलती माटि‍ पकड़ि‍ लेलक आ दुनूक मठौठ ठाढ़े रहलै। पँजराक दुनू टाट टुटि‍ कऽ लबि‍ दुनू भाग घेरने रहला। ओइ बीचमे रूपलाल दबकल ठाढ़ भेल। जान अबग्रहमे जीबन-मृत्‍युक बीच पड़ल रहै। खूब जोर-जोरसँ हल्‍ला करै मुदा, झॉंट-पानि‍क दुआरे ि‍कयो सुनवे ने करै। एक तँ झॉंट-पानि‍ दोसर बान्‍हल माने घेराएल आवाज। ि‍कछु कालक उपरान्‍त मुनेसरी, जे दोसर घरमे रहए, सुनलक। अवाज सुनि‍ते मुनेसरी केवार खोलि‍ अोसारपर आइलि‍ ि‍क ि‍बजलोकाक इजोतमे घर खसल देखलक। खसल घर देखि‍ते बेटोकेँ उठौलक। दुनू गोटे जोर-जोरसँ हल्‍ला करए लगल। मुनेसरीक अवाज सुि‍न दुनि‍यॉंलाल सजनाकेँ कहलक- रौ सजना, रूपलालवाक घर खसि‍ पड़लै। दौड़ि‍ कऽ जो, देखही जे ि‍कयो दबेबो केलै?”
      जाड़सँ कठुआइल सजनाकेँ बरखामे नि‍कलैत अबूह लगै। मुदा की करत। मनमे द्वन्‍द्व सेहो उठि‍ गेलइ। एक ि‍दस पि‍त्तीक मोह तँ दोसर ि‍दस पि‍ति‍आइनि‍क बेवहारसँ कुपि‍त। मुदा ऐहन समएमे तँ जानक प्रश्‍न रहैक। दाेस्‍ती-दुसमनी तँ जीबैतमे रहै छैक। मन मसोसि‍ कऽ लुँगीक फॉंड़ बान्‍हि‍ नि‍कलल। हवो कमि‍ गेल रहै मुदा, बरखा होइते रहै। पाछुसँ दुनि‍यॉंलाल आ तेतरि‍यो गेल।
      रूपलालक दछि‍नबरि‍या घर खसल रहए। सजना पि‍ति‍आइनकेँ कहलक- काकी, एकटा इजोत आ हँसुआ नेने आउ? जाबे नीक-नाहॉंति‍ देखि‍ नै लेब ताबे कन्‍ना ि‍कछु करबै।
      हॉंसू नि‍कालि‍ कऽ दैत पि‍ति‍आइन बाजलि‍- बौआ, चोरवत्ती तँ पि‍ति‍ये लग अछि‍।
हॉंसू लैत सजना जोरसँ बाजल- कक्‍का हौ, कनी टार्चक इजोत दहक?”
  घरक तरसँ रूपलाल बाजल- चोरबत्ती तँ सि‍रमे लग रखने छलौं। उ तँ ठाठक तरमे पड़ि‍ गेल अछि‍।
  चोटो-तोटो लगलहहेँ?”
  नइ बौआ।
  अच्‍छा, तूँ चि‍न्‍ता नइ करह। हवो कम भेल आ बुन्‍नि‍यो पतड़ाएल जाइए।
      सजनाकेँ बुझवैत दुनि‍यॉंलाल कहलक- बौआ, घड़फड़ नै करह।
(भावोसँ)- कनि‍यॉं डि‍बि‍या नेसू।
  मुनेसरी डि‍बि‍या लेसि‍लक। इजोत होइते दुनि‍योलाल आ सजनो टाट हटबैक गर अँटबए लगल। ओलतीक खूँटा जे टुटि‍ कऽ कात भऽ गेल रहै आेकरा टाट देने घोसि‍यबैत कहलक- कक्‍का, अइ दुनू टोनकेँ पकड़ि‍ दुनू ठाठमे सोंगर लगा दहक। जइसँ ठाठ ऐम्‍हर-ओम्‍हर नै डोलतह।
  एकाएकी दुनू सोंगर दुनू ठाठमे रूपलाल लगौलक। सोंगर लगि‍ते सबहक मनमे खुशी एलै। सजनाकेँ दुनि‍यॉंलाल कहलक- सौँसे टाट हटबैक जरूरत अखन नइ छौ। दोग जेकॉं बना पहि‍ने आदमीकेँ बचा, तखन बुझल जेतैक।
  हॉंसूसँ तीनि‍-चारि‍टा टाटक बनहन काटि‍ सजना दोग जेकॉं बनौलक। दोग बनि‍ते रूपलाल बाजल- बौआ, नि‍कलै जोकर भऽ गेल। तूँ दुनू हाथे दुनू ठाठकेँ पकड़ने रहह।
  घरसँ नि‍कलि‍तहि‍ दुनि‍यॉंलाल पएर पकड़ि‍ कनैत बजए लगल- भैया, अपन सवांग दुनि‍यॉंमे सभसँ पैघ होइ छै। अखन जे तूँ दुनू बापूत नै रहि‍तह तँ घरेमे मरि‍ जैतौं।
  शान्‍त्‍वना दैत दुनि‍यॉंलाल कहलक- ऐना ढहलेल जेकॉं ि‍कअए बजै छेँ। अपन-वि‍रान लोक अपने बनबैए। तूँ तँ जानि‍ये कऽ छोट भाए छि‍येँ। समाज बड़ीटा होइ छै। गरीब लोक कोनो सुखे जीवैए। तखन तँ जाबे दुनि‍यॉंक दाना-पानी ि‍लखल रहै छै ताबे काहि‍यो काटि‍ कऽ जीवे करैए। मन थीर कर। जे होइ कऽ छलै से भेलै। थरथर ि‍कअए कपै छेँ।
  मुदा दुनि‍यॉंलालक बातक असरि‍ दुनू परानी रूपलालपर नहि‍ये जेकॉं पड़ल। भीतरसँ करेज डोलैत। मनमे होय जे फेरि‍ ने घरक तरमे दवा कऽ मरि‍ जाय। आंगन डेरौन लगए लगलै। जना ि‍कछु झपटैत होय तहि‍ना बुझि‍ पड़ै। ि‍मरमि‍रा कऽ रूपलाल बाजल- भैया, होइए जे सुति‍ रहब तँ फेरि‍ दोसरो घर खसि‍ पड़त।
  दुनि‍यॉंलालक मनमे एलै जे भरि‍सक डरे ऐना होइ छै। मुदा तइओ बोल-भरोस दैत कहलकै- घर तँ गि‍रमा-गि‍रि‍ए पड़लौ। आब ि‍क दोहरा कऽ खसतौ। जे घर बँचल छौ ओकर भीत केहेन मजगूत छै। उ थोड़े खसत। तहूमे झॉंटे-पानि‍ बन्‍न भेल। नै तँ चल हमरे लग सुति‍हेँ। कनि‍यॉंकेँ पुछि‍ लहुन जे घरमे सुतब ि‍क अहूँकेँ डर होइए। जँ डर होइए तँ सजने माए लग सुति‍ रहब।
  दुनि‍यॉंलालक वि‍चार सुि‍न रूपलाल बाजल- भैया, सगरे देह झोल-झाल आ थाल-कादो लगि‍ गेल अछि‍। ओकरा पहि‍ने धुअए पड़त।
  ओना सभकेँ थाल-कोदो लगल रहै। सभ ि‍कयो कलपर जा सगरे देह धोलक। कलपरसँ आबि‍ मुनेसरी घर बन्‍न केलक। दुनू माए-पूत तेतरीक संग आ रूपलाल दुनि‍यॉंलालक संग धेलक। पूबरि‍या घरमे दुनि‍यॉंलाल भुँइयेमे ओछाइन ओछौने रहए। चौकी नहि‍ रहैक। ओछाइनपर बैसि‍ सि‍रमा तरसँ चुनौटी नि‍कालि‍ रूपलालकेँ दैत कहलक- पहि‍ने तमाकुल चुना।
  सकरीकट तमाकुलक डॉंट ि‍बछैत रूपलाल बाजल- भैया, आइ तँ मरि‍ गेल रहि‍तौं। जना हड़हड़ा कऽ घर खसल तना जँ ओछाइन छोड़ि‍ सतरकी नइ करि‍तौं तँ चाहे मरि‍ जइतौं नै तँ अंग-भंग भऽ गेल रहि‍तए। मुदा माए-बापक धर्मे कुशल कलेप नइ लागल। नइ तँ दुनि‍यॉं अन्‍हार भऽ जाइत।
  रूपलालक वि‍चारकेँ अंकैत दुनि‍यॉंलाल उत्तर देलक- ई देहे तँ कुम्‍हारक बनौल कॉंच बरतन जेकॉं अछि‍। जहि‍ना कँचका बरतन एक रत्ती धक्‍का लगने फुइट जाइत तहि‍ना ने देहो छी। मुदा से लोक वि‍सरि‍ दँति‍या कऽ पकड़ने रहैए। जँ ई बात सभ बुझि‍ जाए ते जि‍नगीक कोनो ठेकान नइ अछि‍ तखन अनेरे ि‍कअए झूठो-फूि‍स बजै छी आ अधलासँ अधला काजो करै छी। तेँ जतबे दि‍न जीवै छी ओतवे दि‍न इमानदारीसँ कमा कऽ पेटो भरी आ जहॉं धरि‍ भऽ सकै तहॉं धरि‍ अनको उपकार करि‍यै। यएह उपकार ने धर्मो छी आ मुइला बादोक जि‍नगी छी।
  मुँह बॉंबि‍ रूपलाल पुछलक- भैया, फेनोसँ एक बेर आरो कहक?”
  रूपलालक प्रश्‍न सुनि‍ दुनि‍यॉंलाल मने-मन सोचए लगल जे भरि‍सक एकरा ज्ञानक उदए भेल जा रहल छै। फेि‍र भेलै जे कोनो बेर पड़लापर एहि‍ना लोकक मनमे नीक वि‍चार जगै छै मुदा, लगले रूि‍क जाइ छै। बुझबैत बाजल- बौआ, अगर जँ लोक ई बुझि‍ जाए जे अइ देहक कोनो ठेकान नै अछि‍। कखन छी कखन नै छी तइले ककरो बेजाए ि‍कअए करबै। जँ ई वि‍चार लोकक मनमे आि‍ब जाए आ ओइ हि‍साबसँ अपन चालि सुधारि‍ लि‍अए तँ ककरो अधला हेतइ। एक तँ ओहि‍ना लोक‍ समस्‍या सभसँ रेजानि‍स-रेजानि‍स रहैत अछि‍ तइपर सँ एदति‍काल लोको ि‍कछु नै ि‍कछु गड़बड़ करि‍ते रहै छै। कोना ि‍कयो कखनो चैनसँ रहत। तोंही कह जे केहेन बढ़ि‍यॉं दुनू भॉंइ जखन जरमे छेलौं तखैन तोरा कोनो भार छेलौ। खाली संग मि‍लि‍ कमाइ छेलेँ। आि‍क नै? तखन भीने ि‍कअए भेलेँ। जखन भीन भेलेँ तखन जँ ि‍कछु कहि‍ति‍यौ तँ कनि‍यॉं कहि‍तथुन जे भैया घर फुटबै छथि‍। तहूले झगड़ा होइतौ। तइसँ नीक ने जे भरमे-सरम मुँह बन्‍न केने रहलौं। तहूँ बात थोड़े सुनि‍तेँ। जे कनि‍यॉं कहि‍तथुन सएह मानि‍तेँ। ई की कोनो हमरे-तोरेमे होइते से तँ नहि‍। सभकेँ यएह गति‍ छै।
  पछबरि‍या घरमे तेतरी सुतैत। पूबरि‍या झटक भेने सौँसे ओसारे आ मुँह सोझे घरोमे पच-पच करैत। मुदा तइओ तेतरी चुल्‍हि‍क छौर छीटि‍ घरकेँ रूख बनौलक। जेठ रहि‍तो वेचारी मुँहसच्‍च मुदा, छोट रहि‍तो मुनेसरी मुँहजोर। सदि‍खन अपन बात दोसरपर चढ़ाइये कऽ रखैत। जहि‍सँ जखन कखनो दुनू दि‍यादि‍नीमे कोनो गप हाेय तँ मुनेसरी चोहटि‍ दइ। मुदा आइ बि‍लमे जाइत सॉंप जेकॉं मुनेसरीक मन सोझ भऽ गेल। जना सभ ताव मरि‍ गेल होय, तहि‍ना। हत्‍याराक खूनमे ताधरि‍ गरमी रहैत छैक जाधरि‍ फॉंसीपर नहि‍ लटकैत अछि‍। मुदा फॉंसीपर लटकि‍ते सवि‍तासँ सूर्यक उदए जेकॉं ज्ञानक उदए होइत अछि‍। तहि‍ना आइ मुनेसरि‍योकेँ भेलि‍। तेतरि‍येक ि‍वछानपर दुनू माए-पूत मुनेसरि‍यो सुतल।
      दुनि‍यॉंलालक बात सुि‍न रूपलाल गुम्‍म भऽ गेल। एक तँ दुनि‍यॉंलालक वि‍चार मनकेँ झकझोड़ि‍ देलकै तइपर सँ गि‍रल घरक सोग सेहो दबने रहए। कने काल गुम्‍म रहि‍ रूपलाल मूड़ी डोलबैत बाजल- हँ, ई तँ सत्ते कहलह भैया।
  अपन ि‍करदानीपर पचताइत देखि‍ दुनि‍यॉंलाल बाजल- आब तोंही कह जे जखैन दुनू भॉंइ एकठाम छलौं तखन तोरा घरक कोनो भार छेलौ। जानि‍ये कऽ तँ गरीब घरमे जन्‍म भेल अछि‍। केहेन बढ़ि‍यॉं दुनू भॉंइ संगे बोनि‍-बुत्ता करै छलौं आ ि‍मलानसँ रहै छलौं। अपना कत्ते खेते अछि‍। लऽ दऽ कऽ सात-सात कट्ठा बाधमे आ घरारी छौ। जेकरा बीघा-बीघे छै ओकरो हजार टा भूर सदि‍काल फुटले रहै छै, जइसँ मन घोर-घोर भेल रहै छै। जेकरा नै छै ओ तँ सहजे भूरेमे घोसि‍आएल रहैत अछि‍।
  दुनि‍यॉंलालक वि‍चार सुि‍न रूपलालक मन केरा भालरि‍ जेकॉं डोलए लगल। ढेरो प्रश्‍न मनमे उठए लगलै। बेबसीक स्‍वरमे बाजल- की नीक की अधलाह से बुझवे ने करै छी। लोकक मुँहे जे सुनै छी से मानि‍ करै छी।
  रूपलालक हारल मन देखि‍ दुनि‍यॉंलालक मन वि‍चारक रास्‍तापर अंटकि‍ गेल। मन हुअए लगलै जे कि‍ कहि‍अइ। एक दि‍स छोट भाइक ममता दबैत तँ दोसर दि‍स स्‍त्रीगणक झगड़ासँ मन अकच्‍छ रहए। ि‍बना ि‍कछु बजनहि‍ दयासँ भरल ऑंखि‍ रूपलालकेँ पढ़ए लगल।
  पछवरि‍या घरमे दुनू ि‍दयादि‍नी, एक वामा करे आ दोसर दहि‍ना करे पड़ल। बीचमे चीत गरे मुनेसरीक बेटा सुतल। दुनूक मनकेँ पानि‍-ि‍बहाड़ि‍क घटना दवने रहए। जइसँ नि‍न्‍न नि‍पत्ता रहए। अनायास मुनेसरीकेँ नैहरक एकटा घटना मन पड़लै। घटना मनमे अबि‍ते बाजलि‍- तेसरॉं, हमरा नैहरमे एक गोरेक घर एहि‍ना ि‍बहाड़ि‍मे खसि‍ पड़लै। घरवारी घरेमे रहए। बेचाराकेँ चोटो खूब लगलै। डेनो टुटि‍ गेलै आ कपारो फुटि‍ गेलै। मुदा रहए कपराक जोरगर जे मरल नहि‍। कपारक घाव तँ छुटि‍ गेलै मुदा, डेन नै जुटलै। ओहि‍ना लर-लर करै छै। बड़ कष्‍ट बेचाराकेँ होइ छै। अपना खेत-पथार नै रहने बोनि‍ करै छलै। मुदा समांग खसने बोहुओ छोड़ि‍ कऽ पड़ा गेलै। हारि‍-थाि‍क कऽ पड़ा गेलै। हारि‍-थाि‍क कऽ बेचारा भीख मंगैए।
      मुनेसरीक कथा सुनि‍ तेतरीक मनमे दया उपकलै। मुदा दुनूक मन आरो डरा गेल। जहि‍ कठि‍आरीसँ घुमैत काल सभ राम-राम सत है, सभको एही गति‍ है। बजैत आंगन अबैत तहि‍ना तेतरि‍योकेँ नैहरक घटना मन पड़ल। बाजलि‍- एक बेरि‍ हमरो नैहरमे बड़का बाढ़ि‍ आएल रहए। ऐहेन बाढ़ि‍ कहि‍यो ने देखि‍ने रहि‍यै। जलखै बेरि‍मे एक गोरे बजलै जे बाढ़ि‍ अबै छै। रोटी पकबैत रही। माए घास लऽ गेल रहए। रोटी पकाइलो ने भेलि‍ ि‍क घर लग पानि‍ चलि‍ आएल। चुल्‍हि‍ तरसँ उठि‍ बान्‍हपर गेलौं ि‍क देखलि‍यै जे चानी जेकॉं बाढ़ि‍ पीटने अबैए। धॉंइ-धॉंइ भीतघर सभ खसए लगलै। लुटना बाध गेल रहै। बाधेसँ दौगल आबि‍ घर पैसल। चाउरक कोठीमे लत्तामे बान्‍हि‍ कऽ रूपैया रखने रहए। कोठीसँ जहॉं रूपैया नि‍कालए लगल ि‍क देहेपर खसि‍ पड़लै। माटि‍क गोरा भीजि‍ कऽ ढील भऽ गेलै। कोठि‍ये तरमे लुटना पड़ि‍ गेल। कोठि‍ये तरसँ हल्‍ला करए लगल। जाबे लोक सभ अबै-अबै ताबे घरो खसि‍ पड़लै। बेचारा तरेमे छटपटा कऽ मरि‍ गेल।
  तेतरीक खि‍स्‍सा सुनि‍ मुनेसरी आरो डरा गेलि‍। दुनू दि‍यादि‍नीक देह थर-थर कपए लगलै। नीन आरो दूर चलि‍ गेलै। डरे दुनू ि‍बछानेपर एक करसँ दोसर कर लगले-लगले उनटए-पुनटए लगल। मुदा ि‍कछु बाजति‍ नहि‍। हारि‍ कऽ मुनेसरी बाजलि‍- दीदी, हमरा डर होइए।
  मुनेसरीक बात सुि‍न तेतरि‍यो समर्थन करैत बाजलि‍- हँ, हए कनि‍यॉं, हमरो डर होइए। चलह पूबरि‍ये घर। जँ मरबो करब तँ सबतुर संगे मरब।
  कहि‍ उठि‍ कऽ बैसि‍ गेल। मुनेसरि‍यो बेटाकेँ उठबए लगल। बेटो जगले। फुड़फुड़ा कऽ उठल। ि‍बछान समेटि‍ तेतरी पॉंचमे लेलक आ मुनेसरी बेटाकेँ कन्‍हा लगा पूबरि‍या ओसारपर पहुँचल। ओसारपर पहुँचते तेतरीक जोरसँ बाजलि‍- कनी घर खोलू?”
  घरेसँ दुनि‍यॉंलाल पुछलक- ि‍कअए? की भेल?”
  ओइ घरमे डर होइए। अही घरमे सभ सुतब।
  अइ घरमे हम दुनू भॉंइ छी तखन अहॉं दुनू गोरे कन्‍ना सुतब?”
  बेरि‍ बि‍पैत्ति‍मे ई सभ लोक नै बुझै छै। पहि‍ने घर खोलू।
  फटक खोलि‍ रूपलाल अपन वि‍छान घुसकौलक। मोख लग डिबि‍या राखि‍ मुनेसरी ि‍वछान वि‍छौलक।
  तहि‍काल सि‍ताहल नढ़ि‍या जेकॉं सजनाक स्‍त्री सेहो अांगन पहुँचलि‍।
    एकटा बि‍छानपर दुनू भॉंइ दुनि‍यॉंलाल आ दोसर ि‍बछानपर दुनू ि‍दयादि‍नी तेतरी बच्‍चा संग सुतैक ओि‍रयान केलक। दुनि‍यॉंलाल ि‍सरमापर माथ रखि‍ पड़ि‍ रहल। आरो गोटे बैसि‍ले रहल। बच्‍चा सेहो सुति‍ रहल। दुनू परानी रूपलालक मनसँ डर हटबे ने करै। होइ जे फेि‍र ने देहेपर घर खसि‍ पड़ए। एक बेरि‍ बड़का भूमकम भेल। भूमकम तँ अढ़ाइये-तीन मि‍नट रहल, मुदा तेहि‍मे घर-द्वार गाछ-वि‍रीछ तँ खसेबे केलक जे कते लोको दबा-दबा मरल। भूमकम तँ लगले समाप्‍त भऽ गेल मुदा, तीनि‍ दि‍न धरि‍ रहि‍-रहि‍ कते बेरि‍ धरती डोलल। तहि‍ना होइ जे बड़का झॉंट-ि‍बहाड़ि‍ ने चलि‍ गेल। मुदा कहीं छोटका सभ ने फेरि‍ घुि‍र-घुरि‍ अबै। तहूमे कोन ठेकान जँ छोटकेसँ बड़को चलि‍ आवए। तेँ दुनू गोटेक मन सशंकि‍त भेल रहए। तेतरीक मन सुतैक होय मुदा, सोचए जे पुरूख बैसल रहत आ हम कोना सुति‍ रहब। तहूमे ि‍डबि‍या जरि‍ते अछि‍। डि‍बि‍याे कन्‍ना मि‍झाएब? बेरि‍-वि‍पत्ति‍मे इजोते मदति‍गार होइत अछि‍। दुनि‍यॉंलालकेँ तमाकुल दैत रूपलाल कहलक- भैया, आइ बुझि‍ पड़ल जे अपन सहोदर केहेन होइ छै?”
  ओछाइनपर सँ उठि‍ दुनि‍यॉंलाल आंगनमे थूक फेि‍क मुस्‍की दैत उत्तर देलक- तखन भीन ि‍कअए भेलै? तोंही कह जे अपना दुनू गोरे सहोदर भॉंइ छी की ने। जखैन सहोदरमे ि‍मलान नै रहत तखन अान तँ आने छी। मनुक्‍खमे एते बुद्धि‍ होइ छै तखन ई गति‍ छै जे भाए-भाएमे दुसमनी भऽ जाइ छै। अगर जँ एहि‍ना सभ मनुक्‍खमे होय तखन ओहन मनुक्‍खसँ उपकारक कोन आशा। अइसँ नीक तँ गाइये-बड़द। जे दूधो दइए आ हरो बहैए।
  दुनि‍यॉंलालक वि‍चार सुनि‍ रूपलाल उठि‍ कऽ आंगनमे थूक फेकि‍ कऽ आबि‍ बाजल- भैया, धरमागती बात कहै छि‍अह। दुरागमनक पछाति‍ जे वि‍दागरी करबै पठौने रहह, ओइ दि‍नक बात कहै छि‍अह। अपनो सौस आ टोलोक मौगी सभ आबि‍ कऽ लगमे बैसलि‍। अपना बुझि‍ पड़ए जे जहि‍ना बि‍रदावनमे कृष्‍ण गोपी सबहक संग वैसि‍ कऽ गप-सप्‍प करैत छलाह तहि‍ना हमहूँ छी। एक मुहरी सभ स्‍त्रीगण कहए लागलि‍ जे अहॉंक भाए बड़ छनकट अछि‍। कतबो कमाएव तँ भाभन्‍स हुअए देत। अहॉं दुनू परानी कमाएव आ ओ कोशल करत। जखैन हाथ-मुट्ठी गरमा जेतै तखन भीन कऽ देत। अखैन दुनू परानी जुआन छी कमाइ-खटाइ छी। अखैन नै ि‍कछु बना लेब तँ जखैन धि‍या-पूता हएत खरचा बढ़त तखैन कएल हएत। तेँ नीक कहै छी जे अखने भीन भऽ जाउ। नै तँ पाछु पचताएब।
  रूपलालक बात सुि‍न दुनि‍यॉंलाल ठहाका मारि‍ हँसल। हँसैत ओछाइनपर सँ उठि‍ मुँहक तमाकुल आंगनमे फेि‍क कऽ आबि‍ बुझबैत बाजल- कोइ जे तोरा ि‍कछु कहलकौ आ तू मानि‍ गेलेँ से अपन बुद्धि‍ कतए गेल छलौ। तू नै देखै छेलही जे दुनू भॉंइ संगे बोनि‍ करैले जाइ छलौं आ आंगनमे भौजाइ भरि‍ दि‍न अंगना-घरक काज सम्‍हारि‍ जरना-काठीक ओरि‍यान करै छेलखुन। तइपर एकटा नांगरि‍क घास-भूसा आ भानस-भात, खुऔनाइ-पि‍औनाइसँ लऽ कऽ बरतन-वासन धरि‍ मँजैत छेलखुन, से सभ अपना ऑंखि‍ये नै देखै छेलही। तोंही कह जे सत बात की छलै आ मौगी सबहक कान भरने तूँ की बुझलीही।
  अपसोच कऽ मूड़ी डोलबैत रूपलाल मि‍रमि‍रा कऽ बाजल- हँ भैया, ई तँ ठीके कहै छह।
   अपने ऑंखि‍सँ जे देखै छेलही से झूठ बुझि‍ पड़लौ आ जे झूठ बात सुनलेँ ओकरा सत मानि‍ लेलही। एकरे कहै छै मौगि‍याही भॉंज। तोरे जेकॉं आनो-आन मौगि‍याही भॉंजमे पड़ि‍ कुल-खानदानक नाक-कान कटबैए। नैहरसँ सासुर जाइ काल जे मौगी सभ कानि‍-कानि‍ बजैए से ि‍क कहै छै से बुझै छीही। ओ कहै छै जे जहि‍ना बाप-माइक घरारीपर हम कनै छी तहि‍ना बाप-दादाक घरारीपर घरबलाकेँ कनाएव। अरे एतबो ने बुझै छीही जे दुि‍नयॉंमे सभ कुछ मि‍लि‍ सकैए मुदा, सहोदर भाय नै मि‍लैत अछि‍। भाइयक खाति‍र लक्ष्‍मण स्‍त्री परि‍वार, समाज सभ छोड़ि‍ देलखि‍न मुदा, भाइयक अंति‍म समए धरि‍ रहलखि‍न। आइ तोरा के काज दइले ऐलौ। कनि‍यो जँ हमरा मनमे पाप रहैत तँ तोरा घरेमे मरै लए नइ छोड़ि‍ दैति‍यो। नै तँ झीकि‍-झॉंकि‍ कऽ ठाठ देहेपर खसा दैति‍यौ। नै मरि‍ते तँ हाथो-पएर तँ टुटबे कैरतौ।
  नमहर सॉंस छोड़ैत रूपलाल ऑंखि‍ ि‍मड़ैत बाजल- भैया, आइ बुझि‍ पड़ैए जे सभ ठकि‍ लेलक।
   कान पाथि‍ कऽ सुनि‍ले। जहि‍ना मनुख सभसँ पैघ जीव अइ धरतीपर अछि‍, जे बड़का-बड़का चमत्‍कारी काजो करैत अछि‍ तहि‍ना छुतहरो अछि‍। देखबीही जे जेकरा कनी बुद्धि‍-अकील छै ओ सदति‍काल बुड़ि‍वक सभक कमाइ ठकि‍-ठकि‍ मौजसँ खाति‍ अछि‍। खेबे टा नै करैत अछि‍ ओकर बोहू-बेटीक संग कुत्ता-बि‍लाइ जेकॉं इज्‍जतो लुटैत अछि‍।
  भैया, आइ बुझि‍ पड़ैए जे हमर बाप मरल नै जीवि‍ते अछि‍।
  पि‍ताक रूपमे अपनाकेँ पाबि‍ दुनि‍यॉंलालक हृदय पसीज गेल। बाजल- बौआ, जे समए बीति‍ गेल ओ तँ बीति‍ गेल। ओ आब थोड़े घुमि‍ कऽ औत। मुदा जाबे जीबैत रहब, तहि‍ बीच जे समए अछि‍ ओ तँ बँचल अछि‍। हमरा तू मोजर देँ आकि‍ नै देँ मुदा, अपन सीमा तँ हमहूँ बुझै छी ि‍क ने। अपन कमाइ खाइ छी अपने औरूदे जीवै छी। तइले दोसराक कोन आशा। अपना जे काज दुसैबला नइ करब। जँ ककरो नीक कएल नै हएत तँ अधले ि‍कअए करबै। तोरा प्रति‍ जे काज अछि‍ सएह ने करब।
  भैया, आब आेंघी पीपनीपर आबि‍ गेल। राति‍यो बेसी भऽ गेल। तोहूँ सुतह अा हमहूँ सुतै छी।
  मुनेसरीक मन सेहो उनटैत-पुनटैत मुदा, थीर भइये ने पबैत। एक दि‍स अपन पैछला जि‍नगीक बाट टूटैत तँ दोसर दि‍स नव बाटक बोध नहि‍ रहने बोनाह बुझि‍ पड़ैत रहए। मुदा दुनि‍यॉंलालक वि‍चारसँ झलफलाएल बाट जरूर देखि‍ पड़ैत रहए। जहि‍सँ मनमे ि‍कछु बदलाव रहए। मनमे उठलै जे जँ नैहरक स्‍त्रीगणक नीक सि‍खौल रहैत तँ नीक होइत रहि‍ते। से तँ नहि‍ भेल। मोम जेकॉं मन पघि‍लए लगलै। मुदा कि‍दु बजैक साहसे ने होय। जहि‍ना मालती फुलक सुगंधसँ वि‍षधर लत्तीमे लटपटा चेतना शून्‍य बनि‍ जाइत तहि‍ना मुनेसरि‍यो मन भऽ गेल। मने-मन गलती कबूल करैत तेतरीकेँ कहलक- दीदी, ई सुतथु जॉंति‍ दइ छि‍यनि‍।
  मुनेसरीक बातसँ तेतरीकेँ खौंझ उठल, बाजलि‍- तोरा एक्‍को पाइ लाज-सरम नै छह जे जइ घरमे पुरूख-पात्र छथि‍ तइठाम तूँ जँतबह। जानि‍ये कऽ तँ भगवान वि‍पत्ति‍ देलनि‍ जे सभ ि‍कयो एक घरमे सुतैले एलौं। डि‍बि‍या मि‍ण दहक जइसँ कने परदा भऽ जाएत आ तोहूँ सुति‍ रह-अ।
  डि‍बि‍या मि‍झाएव सुनि‍ मुनेसरीक मन तत्-मत् करए लगल जे इजोतमे तँ देखबो करै छी अन्‍हारमे की हएत की नइ से देखबो ने करब। मुदा तइओ उठि‍ कऽ डि‍बि‍या मि‍झा कले-बल पड़ि‍ रहल।
    काल्‍हि‍ये ‍ओठर होइत देखि‍ अनुप काली पूजाक हकार दि‍अए गेल। बहीनोक सासुर, अपनो सासुर आ मात्रि‍को एक्‍के डोि‍रमे। कने घुमौन रहि‍तो सोचलक जे पहि‍ने बहीन ऐठाम पहुँच हकारो दऽ देवै आ अबैले कहि‍ देबइ। मुदा ओइठीन अँटकब नहि‍। झलफल होइत-होइत सासुर चलि‍ जाएव। ओइठीन राति‍मे अटकि‍ जाएव। ि‍कऐक तँ अखनो बुढ़ि‍केँ के छन्‍हि‍ जे कतबो धड़फड़ाएल रहब तइओ नहि‍ये आबए देतीह। काल्‍हि‍ भोर मात्रि‍क होइत चलि‍ आएव। छोड़ैबला एक्‍कोटा नइ अछि‍। एक तँ ओहुना बहीनक मनमे होइत हएत जे जाधरि‍ माए-बाप जीवैत छलाह ताधरि‍ ने नैहर छल मुदा, भाए-भौजाइ ककर होइ छै जे हम्‍मर हएत। मुदा हमर बात थोड़े बुझैत हएत जे दू थान महींस अछि‍ ओकरे पाछु भरि‍ दि‍न तबाह रहै छी। अोहुना तँ सालमे एक बेरि‍-दू बेरि‍ अनबे करै छि‍यै आ जेबो करते छि‍यै। मदुा तइयो मनमे होइते हेतै जे बि‍सरि‍ गेल। तेँ पहि‍ने ओकरे ऐठा जाएब।
    दोसर दि‍न दस-एगारह बजे घुमि‍ कऽ अबि‍ते अनुप देखलक जे महींस पाल खाइले बो-बॉं करैए। एक तँ रस्‍ताक थाकल तइपर सँ महींसक डि‍रि‍आइत देख मन तमसा गेलै मुदा, लछमी पावनि‍ दि‍न लगले मनमे खुशी ऐलै। हॉंइ-हॉंइ कऽ खेलक आ महींस लऽ कऽ पारा लग वि‍दा भेल। गाममे पारा नहि‍ रहने बगलक गाम पहुँचल। गाम पहुँचते पता लगलै अखने एकटा महींसक संग दछि‍न मुँहे गेल। फेि‍र ओहि‍ गामसँ दासर गाम ि‍वदा भेल। दोसरो गाममे पता लगलै जे दछि‍न मुँहे गेल। जाति‍-जाि‍त चारि‍ बजेमे एकटा गाछीमे महींसमे पारा लगल रहए। जेहने देखैमे पारा भारी तेहने नमहर-नमहर सि‍ंघो रहए। मरखाहक दुआरे महींसबला अपना अपना महींसकेँ गाछमे बान्‍हि‍ हटि‍ कऽ बैसल रहए। फरि‍क्‍केमे अनुपक महींसकेँ देखि‍ पारा दौगल। पाराकेँ अबैत देखि‍ अनुप हॉंइ-हॉंइ कऽ एकटा गाछमे महींसकेँ बान्‍हि‍ दोसर गाछपर चढ़ि‍ गेल। तहि‍ बीच पहि‍लुका महींसबला अपन महींसक डोरी खोलि‍ ससरि‍ गेल। अनुपक महींस लग आवि‍ पारा गछाड़ि‍ लेलक। लगले-लगले तीन-चारि‍ मूठ पारा देलक। मूठ सुतरैत देखि‍ अनुपक मन खुशीसँ नाचि‍ उठल। मुदा पारा डरे गाछपर सँ उतड़बे ने करए। महीसि‍ लग पारा बैसि‍ रहल। मुदा महीसि‍ ठाढ़े रहल। अनुपक मनमे हाय जे जँ महीसो बैसि‍ जाएत तँ ढरकि‍ जाएत। जइसँ पाल सुतरबे ने करत।
    सॉंझ पड़ि‍ गेल। अमवसि‍या दि‍न रहने दोसरि‍ सॉंझ होइत-होइत अन्‍हार भऽ गेल। अनुपो गाछपर सँ उतड़ि‍ हटि‍ कऽ बैसि‍ गेल। अन्‍हार देखि‍ अनुपक मनमे जे असकरे छी कोना गाम जाएव? तहूमे तेहेन पारा शेतान अछि‍ जे छोड़बो ने करैए। राति‍क दस बजि‍ गेल। हवो उठल आ बून्‍दा-बुन्‍दी पानि‍यो शुरू भेल। पानि‍ पड़ते पारा महींसकेँ छोड़ि‍ गाम दि‍स वि‍दा भेल। हवो आ पानि‍यो तेज हुअए लगल। एक तँ अन्‍हरि‍या राति‍ तइपर सँ पानि‍-हवा जोर पकड़ने जाति‍। महींसक संग अनुप गाम दि‍स वि‍दा भेल। कनि‍ये आगू बढ़ला ि‍क झॉंट-पानि‍ जोर भेल। अधा रास्‍ता अबैत-अबैत घनघाेर बरखो आ वि‍हाड़ि‍यो उठि‍ गेल। अवग्रहमे अनुप पड़ि‍ गेल। अबग्रहमे पड़ल अनुप सोचए लगल जे आइ नइ वँचब। अपटी खेतमे महींसो आ अपनो मरि‍ जाएव। हाथ-हाथ नहि‍ सुझैत अछि‍। ने कतौ एकोटा लोक देखै छी आ ने अपना कोनो इजोत अछि‍। बीच पॉंतरमे कन्‍ना जाएब? तहूँमे अंगो ने पहि‍रने छी। देहमे जेहो कपड़ा अछि‍ सेहो भीजि‍ये गेल अछि‍। हवा दुआरे जाड़ो होइए। जि‍नगीक आशा अनुपकेँ टुटि‍ गेल। मन मानि‍ गेलइ जे आइ नइ बँचव। जखन अपने नइ बँचब तखन महींसे कोन काज देत। बुकौर लगि‍ गेलइ। मुदा कानबो के सुनत? ि‍बजलोका देखि‍ होइ जे देहेपर खसि‍ पड़ल।
    हवा बन्‍न भेल। हवा बन्‍न होइते मनमे आशा जगलै मुदा घनघनाआ बरखा होइते रहए। गाम पहुँचैत-पहुँचैत बरखो बन्‍न भेल। घरपर आबि‍ थरथराइत अवाजमे अनुप घरवालीकेँ कहलक- हाथ-पएर कठुआ गेल अछि‍। कनी घूर करू।
  बेटा, नसीवलाल महींस बन्‍हलक। भुलि‍या अनुकेँ कहलक- जाबे अहॉं धोती फेड़व ताबे घूरक ओरि‍यान कऽ दइ छी।
  घरवालीक बात तँ अनुप सुनलक मुदा, जाड़े-कठुआ कऽ खसि‍ पड़ल। जाड़सँ देह सर्द-सर्द भेल रहए। बोली बन्‍न भऽ गेलै। तइपर सँ भीजल कपड़ा सेहो रहै। हॉंइ-हॉंइ कऽ भुलि‍या लोहि‍यामे गोरहा-गोइठा तोड़ि‍-तोड़ि‍ दऽ मटि‍या तेल ढाि‍र सलाइ खरड़ि‍ कऽ लगौलक। घूर धधकल। बेटी सुनरीकेँ भूलि‍या कहलक- बुच्‍ची, झब दऽ करौछमे चारि‍ ढेकरी थकुच कऽ लसुन आ करूतेल ला। अही घूरपर गरमा कऽ सौंसे देह मालि‍स करव।
  माइक बात सुि‍न सुनरी चारमे टॉंगल लसुनक मुट्ठीमे सँ एकटा ढेंसर नि‍कालि‍, दाना छोड़ा सि‍लौटपर थकुचलक। शीशीसँ तेल ि‍नकालि‍ करौछ घूरपर गरमबए लगल। तीनू गोटे -पत्‍नी, बेटा, बटी- केँ मनमे हाेय जे भरि‍सक कठुआ कऽ मरि‍ गेल। मुदा सॉंस चलैत देखि‍ आशा बनल रहए। लसुन-तेलासँ तीनू गोटे दुनू तरबो आ दुनू तरहत्‍थि‍योकेँ हाथसँ रगड़ए लगल। पान-सात मि‍नट रगड़लापर अनुप ऑंखि‍ खोलि‍ बाजल- जाड़ कनी कम भेल।
  अनुपक बात सुि‍न आरो हॉंइ-हाँइ तीनू गोटे रगड़ए लगल। तरहत्‍थी रगड़ब छोड़ि‍ नसीवलाल चानि‍ रगड़ए लगल। मन हल्‍लुक होइते अनुप बाजल- जाड़े छाती दलकैए। कनी चाह बनाउ। जाबे भीतर नै गरमाएत ताबे जाड़ नै छुटत।
  पति‍क बात सुि‍न भुि‍लया चाह बनबैक ओरि‍यान करए लागलि‍। चाह-पत्ती तँ घरमे रहए मुदा, चि‍न्‍नी घरमे रहवे ने करै। एत्ते राति‍ आ ऐहन समएमे दोकानसँ चीनी कोनो अनैत। पति‍केँ भुलि‍या कहलक- चाह पत्ती तँ घरमे अछि‍ मुदा, चि‍न्‍नी अछि‍ये नहि‍।
  पत्‍नीक बात सुि‍न अनुप कहलक- चीनी नइ अछि‍ तँ नूने दऽ कऽ बना लि‍अ। ऐहन समएमे कत्तए सँ आनब।
  भुि‍लया चाह बनबए लगलीह। बेटाकेँ अनुप कहलक- बौआ, कनी थमि‍ जा, धोती फेड़ि‍ लइ छी। कहि‍ उठि‍ कऽ धोती बदलि‍ गंजी पहीरि‍लक। चाहो बनल। स्‍टीलि‍या गि‍लासमे भरि‍ गि‍लास करीव 250 एम.एल; छानि‍ भुि‍लया अनुपकेँ देलक। जेहने जड़ाएल देह तेहने मुँह रहने चाह गर्म बुझि‍ये ने पड़ै। पानि‍ये जेकॉं घोंटे-घोंट पीबए लगल। अधा ि‍गलास पीबैत-पीवैत देह गरमेले। देह गरमाइते हुहुआ कऽ बोखार अबए लगलै। चाह पीबैत-पीबैत बोखार आबि‍ गेलै। जाड़ हुअए लगलै। ओछाइनेपर पड़ि‍ बेटाकेँ कहलक- बौआ, बड़ जाड़ होइए कनी कम्‍मल नि‍कालि‍ कऽ लाबह।
    कम्‍मल ओढ़ि‍ पड़ि‍ रहल। मुदा जाड़ कमैक बदला बढ़ले जाय। पुन: अनुप बाजल- एकटा कम्‍मलसँ जाड़ नै कमत। आरो अोढ़ावह।
  घरक तीनू कम्‍मल ओढ़ि‍ते देह गरमाएल। देह गरमाइते बाजल- बौआ, देहसँ खौंत फेकैए।
  खौंत सुि‍न भुि‍लया बाजलि‍- सरद-गरम भऽ गेल। एती राति‍मे डाकडरो ऐठीन कन्‍ना पठेबे। तइमे तेहेन दुरकाल समए अछि‍ जे ओहो औत ि‍क नै।
  नि‍राश होइत अनुप बाजल- जँ औरूदा हएत जीवे करब नै जे रसीद कटि‍ गेल हएत तँ डाक्‍टरो बुते थोड़े बॉंचव।
  भुलि‍या- महींसक पाछु जे जान गमबै छी तइसँ नीक जे महींसे बेच लेब।
  आशा भरल स्‍वरमे अनुप पत्‍नीकेँ उत्तर देलक- अही महींसक बले तँ दूटा पाइयो देखै छी आ गुजरो करै छी। जँ एकरे बेचि‍ लेब तँ जीवि‍ कन्‍ना। जि‍नगीमे एहि‍ना नीक-अधला समए अबै-जाइ छै, तइले कि‍ काजे छोड़ि‍ देब। मरै कए कोनाे ठेकान छै। चलि‍तो काल लोक खसि‍ पड़ैए आ मरि‍ जाइए। तइले महीसि‍ कि‍अए उपटाएव।
  अइ अजकल पोरूसाल गाममे कि‍सान गोष्‍ठी भेल रहै। ओहि‍ गोष्‍ठीमे जि‍लोक कृषि‍-पदाधि‍कारी आ ब्‍लौकक पदाधि‍कारी सभ सेहो आइल रहथि‍। ओना गामक लेल पहि‍ल गोष्‍ठी छलए। जहि‍मे कि‍सानक दुख-दर्दकेँ लगसँ देखल गेल रहै। ओहि‍ दि‍न गामोक ि‍कसानकेँ सरकारमे अपन भागीदारी बुझि‍ पड़ल रहै। ि‍कऐक तँ अखन धरि‍ गामक लोक सरकारक माने कोटाक चीनी आ मटि‍यातेल धरि‍ बुझैत छलै। गोटे-गोटे साल खैरातक गहूमो आबि‍ जाइत छलै। मुदा तहि‍सँ बदलल रूप गोष्‍ठीमे रहए। ि‍कएक तँ ि‍कसानकेँ चाि‍र श्रेणी- लघु, सीमान्‍त, मध्‍यम और पैघ ि‍कसानक रूपमे ि‍वभाजि‍त कऽ सबहक लेल सरकारी सुवि‍धाक चर्चा भेलै। सीमान्‍त ि‍कसानकेँ एक-ति‍हाइ माने ३३ प्रति‍शत सरकारी सहायताक घोषणा भेलै। एक-ति‍हाइ मदति‍सँ लोकमे भरपुर उत्‍साह जगलै। खेतीक सभ वि‍धा पशुपालन, माछपालन तरकारीक खेती, फल-फलहरीक खेतीक संग-संग उन्‍नति‍शील धान, गहूम इत्‍यादि‍ अन्‍नक खेतीमे सेहो मदति‍क चर्चा भेलइ। ३३ प्रति‍शत माने एक ति‍हाइ सुवि‍धा पाबि‍ पैघ ि‍कसान आ मध्‍यम कि‍सानक लेल छोट-छोट कारोवार आ गाइयो-महीि‍स पोसैक बाट खुजलै। गोष्‍ठीक ि‍कछुए दि‍नक बाद पंजाब-हरि‍याणासँ ट्रकक माध्‍यमसँ बारह टा जर्सी गाए गाममे आएल। ओहि‍मे सँ एकटा कारी रंगक गाए राजेसर सेहो दस हजारमे कीनि‍लक।
    चारि‍ मास धरि‍ गाए नीक-जेकॉं आठ ि‍कलो दूध दैत रहल। बादमे चारि‍ मासक पछाति‍ एक संझू भऽ गेलइ। जाधरि‍ आठ ि‍कलो दूध गाएकेँ होइत रहल ताधरि‍ दुनू परानी राजेसर सेहो ही खोलि‍ मेहनतो करै। ओना दूधारू घासक खेती नहि‍ केने रहए। ने सुधादाना आ ने कोनो तरहक पौष्‍टि‍क आहारक दोकान इलाकामे खुजल। मुदा तइओ राजेसर पुरने ढंगसँ मुसरी आ मकैक दर्रा थोड़-थाड़ गाएकेँ खुअबैत रहए। छह मास बीतैत-बीतैत गाए ि‍बसकि‍ गेलै। बच्‍छा तरे गाए रहै तेँ गाइयक संख्‍या तँ नहि‍ बढ़ले मुदा, जतवे दि‍न दूध भेलै ओहि‍सँ गाइयक प्रति‍ आकर्षण जरूर बढ़ि‍ गेल रहए। ि‍कएक तँ अखन धरि‍ गाममे एक्कोटा ओहन गाए नहि‍ भेल रहए जेकरा सेर भरि‍सँ बेसी दूध होइ। ओना गामक गाइयक वंश दि‍नानुदि‍न वि‍गड़ैत गेल। तेकर अनेको कारणमे एकटा कारण इहो रहए जे श्राद्धकर्ममे तेेहेन दब बच्‍छाकेँ दागि‍ सॉंढ़ बनौल जाइत रहए जे गाइयक खाढ़े नष्‍ट होइत गेलै। ि‍बसकलाक बाद गाय उठवे ने कएल। आठ मास बीतैत-बीतैत राजेसर नि‍राश भऽ गेल। लोककेँ पुछै तँ ि‍कयो-करूतेल पि‍अबै लए कहै तँ ि‍कयो मेनक पात खुअबै लए कहै। मुदा गाए उठलै नहि‍। हारि‍-थाकि‍ कऽ मधेपुर मवेशी डॉंक्‍टरसँ सम्‍पर्क कऽ पुछलक। गर्भाशय साफ करबैक ि‍वचार डॉक्‍टर सहाएव देलखि‍न।
    दि‍वाली दि‍न राजेसर गाए नेने मधेपुर मवेशी अस्‍पताल पहुँचल। एकटा बीमार महीसि‍ देखैले डॉक्‍टर सहाएव भगवान गेल रहथि‍। गाएकेँ ढाठमे बान्‍हि‍ राजेसर अस्‍पतालक ओसार पर तौनी ि‍वछा सुति‍ रहल।
    सूर्यास्‍त भेलापर डॉक्‍टर भगवानपुर सँ ऐला। डेरा अबि‍ते पत्‍नी कहलकनि‍- एक गोटे दुपहरेसँ भुखे-पि‍यासे गाइयक संग बैसल छथि‍ पहि‍ने ओ देखि‍ लि‍औ।
  दुपहरक नाओ सुनि‍ते डॉक्‍टर चौंकि‍ गेलाह। साइकि‍ल रखि‍ पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- तेहेन बीमारीक भॉंजमे पड़ि‍ गेलहुँ जे छोड़ि‍यो नहि‍ सकैत छलौं। मुदा जखन महींस पाउज धऽ खढ़ उठौलक तखन अपनो संतोष भेल आ महि‍सोबला कहलनि‍ जे आब महीसि‍ बँचि‍ गेल। तेँ एते अबेर भऽ गेल। मन गरमा गेल अछि‍ पहि‍ने एक लोटा पानि‍ पीआउ आ चाह बनाउ। ताबे कपड़ा खोलि‍ लइ छी।
    चाह पीबि‍ डॉक्‍टर राजेसर लग पहुँच गाएकेँ देखि‍ कहलखि‍न- जेँ एते काल बैसलौं तेँ आध घंटा आरो समए लागत।
  आशा भरल स्‍वरमे राजेसर कहलकनि‍- तइले नइ कोनो, मुदा गाममे तमाशा सेहो छी आ अन्‍हरि‍या राति‍ छी तेँ थोड़े.....।
    ढाठीमे गाएकेँ बन्‍हवा डॉक्‍टर साफ केलनि‍। सावुनसँ हाथ धाय एकटा इन्‍जेक्‍शन देलखि‍न। चारि‍ खोराक गोटी दऽ कहलखि‍न- काज तँ भऽ गेल मुदा, आब गाम नइ जाउ। एतै रहि‍ जाउ, भोरे दि‍न-देखार चलि‍ जाएब।
  फीस दैत राजेसर कहलकनि‍- डॉक्‍टर सहाएव, अबेरो भेने तँ काज भइये गेल। गाममे मेलो-तमाशा छी तेँ चलि‍ये जाएब।
  एक तँ करि‍या कम्‍मल जेकॉं अन्‍हार, दासर कारी खुट-खुट गाए, मने-मन राजेसर सोचलक जे हो न हो कहीं हाथसँ डोरी छुटि‍ जाएत तँ गाए हराइये जाएत। छोड़मे ससरफानी दऽ अपन गट्टामे बान्‍हि‍ आगू-आगू गाए आ पाछु-पाछु अपने ि‍वदा भेल। थोड़े दूर आगू बढ़ल ि‍क बुन्‍दा-वुन्‍दी पानि‍यो आ हवो रसे-रसे जोड़ पकड़ए लगल। हवाक संग-संग घनघनौआ बरखो हुअए लगल। घरपर अबैत-अबैत जहि‍ना अपने तहि‍ना गाइयो जाड़े कठुआ गेल।   राति‍ ढहल। गाए टॉंग पटकए लगलै। लगले-लागल उठवो करै आ बैसवो करए। बो-बॉं सेहो करए। समए तेहन भऽ गेलै जे पुन: डॉक्‍टर ऐठाम जाइक साहसे ने भेलै। ने गाममे मवेशी डॉक्‍टर आ ने लग-पासक कोनो गाममे। हारि‍ कऽ करूतेल-मटि‍या तेल मि‍ला, सौँसे देह औंसि‍ बोराक नूरी बना दुनू परानी गाएकेँ ससारए लगल। थोड़े काल ससारि‍ मरीच पीसि‍ करूतेलमे ि‍मला कॉंड़ि‍सँ पि‍औलक। मुदा गाइयक रोग हटलै नहि‍। धीरे-धीरे बढ़ि‍ते गेलै। भोरहरवामे खूव जोरसँ डि‍रि‍या गाए मरि‍ गेलै।
    गाएकेँ मरि‍ते दुनू परानी राजेसर कानए लगल। भोरहरवाक कानव सुनि‍ दुनू परानी डोमन दौड़ि‍ कऽ आएल। अबि‍ते राजेसरकेँ डोमन पुछलक- भैया, की भेलह?”
  डोमनक प्रश्‍नक उत्तर नहि‍ दऽ राजेसर कनि‍ते रहल। लगमे अबि‍ते डोमन देखलक जे चारू पाएर छि‍ड़ि‍ऐने गाए मरल अछि‍। मुँहपर तरहत्‍थी दऽ डोमन बाजल- भैया, चुप हुअअ। कमाइबला बेटा मरलापर लोक सवुर करि‍ते अछि‍, ई तँ सहजे नाङरि‍ छी।
  डोमनक बात सुि‍न राजेसर बाजल- गाए मरि‍ गेल तेकर दुख ओते ने अछि‍ जते बैंकक करजाक अछि‍। एक तँ सरकार लोककेँ मदति‍ करैए ि‍क गरदनि‍मे फॉंस लगबैए। जखन गाए नै नेने रही तखन कहलक जे तेकरी सरकार देत आ बाकी दू हि‍स्‍सा बैंकसँ करजा भेटत। काज सुगम देखि‍ लेलौं। बुझबे ने केलि‍यै जे गरदनि‍मे फँसरी लगबैए। छुट लेल बैंकबला कहलक जे मधमन्‍नीसँ कागज आनि‍ कऽ दि‍अ तखन ओइ रूपैयाक मि‍नहा लोनमे भऽ जाएत। जावे तक ओ कागज नै देब ताबे तक सोलहो आना रूपैयाक सुदि‍ चलैत रहत। अपने देखल-सुनल नहि‍। कोटक मंसीकेँ जा कऽ जा सभ बात कहलि‍यै तँ ओ तैयार भऽ कऽ ओइ ओफि‍स गेल। ओइ ठीमन गेलौं तँ कहलक जे पान सए रूपैया लागत तखन कागज देव। एहि‍ना दौड़-बरहा करैमे हजारसँ उपरे खर्च भऽ गेल। रूपैयाक ि‍कस्‍त नै देने छेलि‍यै बैंकमे जखन ि‍हसाब करबै लगलौं तँ कहलक जे छह मासक सुदि‍ मूड़मे जमा भऽ गेल आ ओकरो सुदि‍ लागत। तइ बीच गाइये मरि‍ गेल। आब की करब?”
    दि‍वालीकेँ शुभ दि‍न बुझि‍ सुरति‍या भोरेसँ दुनू परानी खपड़ाक भट्ठा लगबए लगल। बीस हजार खपड़ाक भट्ठाक मन मे खशी रहए। बीचमे थोपुआ आ चारू कात नरि‍या खपड़ाक आवा लगौलक। थापुआ मोटो होइ छै तेँ कातमे लगौलासँ नीक जेकॉं नहि‍ पाकत। आमदनीक खुशी मनकेँ तेन खुड़-खुड़ा देने रहए जे दुनू परानीकेँ काजक भीड़ बुझि‍ये ने पड़ए। दुनि‍यॉंक सभ ि‍कछु बि‍सरि‍ मन आमदनी देखि‍ तरे-तर हँसए। जहि‍ना कोनो कनैत बच्‍चाकेँ गुदगुदी लगौलासँ हँसीक लाबा फुटैत तहि‍ना दुनू परानी सुरति‍योकेँ होय। भट्ठा लगि‍ गेल।
  एक तँ सुखार माने रौदि‍याह समए दोसर काति‍क मास। काति‍क मासमे चैत-बैशाख जेकॉं ने हवा-वि‍हाड़ि‍क शंका आ ने झॉंट-पानि‍क। तेँ ने भट्ठाक उपर छॉंही देलक आ ने कातमे टाट लगौलक। पहि‍ल सॉंझ उक-बाती फेरि‍ सुरति‍या भट्ठा लग बैसि‍ नि‍ङहारि‍-नि‍ङहारि‍ देखए लगल जे कतौ ि‍कदु छुटि‍ तँ ने गेल। फुलेसरी भानस करए गेलि‍। चुल्‍हि‍ पजाड़ि‍ अदहन दइते मनमे उठलै जे अधि‍क लटारम करैमे बेसी देरी लागत तइसँ नीक खि‍चड़ी आ अल्‍लू चोखा बना लेब। बैसारी लोक ने छनुआ-बगहरूआ बना जी माने जीभकेँ चसकी पुड़बैए। पावनि‍ये दि‍न छी तँ की छी। कोनो ि‍क वावनि‍येकेँ सीमा-नाङड़ि‍ छै, जेकरा रहए छै ओ सभ दि‍न खाइए। खाइये पाछु जे समए बीता लेब तँ खाइक ओरि‍यान कोना हएत। फेरि‍ मनमे भेलै जे अपने फुरने नै करब हुनको पुछि‍ लइ छि‍अनि‍। चुल्‍हि‍ तरसँ उठि‍ फुलेसरी पति‍ लग जाए पुछलक- ओना आइ तँ लछमी दि‍न छी सभ तरूआ-बगहरूआ बनाओत, से की वि‍चार।
  सुरति‍या मने-मन बीस हजार खपड़ाक दाम जोड़ैत रहए। बारह हजार थोपुआ अछि‍ जेकर दाम बारह हजार भेल। सौ-पचास फुटि‍यो जाएत तइओ नै बारह हजार तँ पौने बारहे हजार रहह। आठ हजार नड़ि‍या अछि‍ जे आठ सए रूपैये बीकत। ओहूमे पच्‍चीस-पचास अधपक्‍कू आ फुटि‍-भांगि‍ जाए तइओ नै चौसैंठ साए तँ छह हजार हेबे करत। कहुना-कहुना तँ सत्तरह-अठ्ठारह हजार हेबे करत। पत्‍नि‍क बात सुि‍न उत्तर देलक- बूढ़ि‍ भऽ गेलौं आ नाक लगले अछि‍। एतवो नै बुझै छि‍यै जे भट्ठा लगौने छी आगि‍ देवइ तँ भरि‍ राति‍ ओगरि‍ कऽ रहए पड़त। जगरनामे अधपेटे खेनाइ नीक होइ छै ि‍क चढ़ा कऽ। जाउ खि‍चड़ी आ अल्‍लू चोखा बना लेब।
    अपन ि‍वचारसँ पति‍क वि‍चार ि‍मलि‍ते फुलेसरीक मन खुशीसँ नाचि‍ उठल। मुस्‍की दैत दोहरौलक- पावनि‍क दि‍न छी, तखन.....।
  जाउ-जाउ। जेकरा रहए छै अोकरा ि‍लये सभ दि‍न होलि‍ये आ दि‍वालि‍ये रहै छै आ जकरा नै रहए छै ओकरा लि‍ये सभ दि‍न एकादसि‍ये रहै छै।
    खा-पी कऽ फुलेसरी बच्‍चा सभकेँ सुता देलक। राति‍क साढ़े नअ बजैत सुरति‍या भट्ठामे मसुरीक दालि‍ छि‍टैत- जेहन मसुरीक दालि‍ लाल, तेहन भट्ठा लाले-लाल कहि‍ आि‍ग देलक। सुखाड़ समए धुधुआ कऽ आगि‍ पजड़ि‍ गेल। आगि‍क पजड़व देखि‍ सुरति‍या पत्‍नीकेँ कहलक- अइ बेरक खपड़ासँ पूँजी बढ़ा लेब। दू आदमीकेँ आरो राखि‍ लेब। कहुना-कहुना जँ दसो भट्ठा हाथ लागल तँ लाखक कमाइ भइये जाएत। पूँजी ने पूँजी बढ़बैत अछि‍। गाममे देखते छि‍यै जे जेकरा दस बीघा जमीन छै अो अपनो साल भरि‍ खाएत से नै होइ छै। हम तँ सहजहि‍ नंगा-फरोस छी। तहन तँ लुड़ि‍ये-वुद्धि‍ तेहन अछि‍ जे जनो कमवाएब।
  फुलेसरीक बुद्धि‍मे पति‍क बात नहि‍ अँटल। छोट बुद्धि‍मे पैघ बात कोना अँटत। मुदा पति‍-पत्‍नि‍क बीच ि‍क शास्‍त्रार्थ होइत अि‍छ। सुयोग कवि‍क कवि‍ता जेकॉं तुक ि‍मलौवलि‍ होइत अछि‍। ि‍वषय-वस्‍तु ि‍कछु रहौ वा नहि‍ रहौ मुदा, तुकवन्‍दी जँ नीक रहल तँ ओ श्रेष्‍ठ कवि‍ताक श्रेणीमे अवि‍ये जाइत अछि‍। पति‍क प्रश्‍नक उत्तर फुलि‍या दैत बाजलि‍- अइ बेरि‍ अपनो घरपर खपड़ा दइये देबइ।
  अपन घर सुि‍न सुरति‍याक मनमे उठल जहि‍ना घर बनौनि‍हारकेँ अपना रहैले घर नै रहै छै तहि‍ना तँ हमरो अछि‍। जाबे वि‍राटनगरमे नोकरी करै छलौं ताबे पेटो चलैमे कोताहि‍ये होइ छलए। मुदा आब जँ वेसी कमाइ हुअए लगल तँ घरो बनाइये लेब।
    बुन्‍दा-वुन्‍दी पानि‍यो आ संग-संग हवो उठल। मेघ दि‍स देखि‍ सुरति‍या बुदबुदाएल- मेघो कहॉं देखै छि‍यै। एकटा छोटका टुकड़ी बुझि‍ पड़ैए। नै आओत बरखा। मुदा हवा ने एकभग्‍गू कऽ दि‍अए। जँ हवा जोर भेल तँ एक भाग कॉंचे रहत आ दोसर भाग झाम बना देत। हवा तेज होइत गेल आ मेघो पसरैत गेल। पूबसँ बादल आि‍ब-आबि‍ सघन हुअए लगल। जहि‍ना-जहि‍ना बरखा बढ़ए लगल तहि‍ना-तहि‍ना हवो बढ़ए लगल। तड़तड़ा कऽ जोरगर बरखो आ ि‍वहाड़ि‍यो आबि‍ गेल। झॉंट-पानि‍ देखि‍ सुरति‍याक आशा राइ-छि‍त्ती भऽ गेल। मास दि‍नक मेहनतक संग-संग पूँजीयो-माटि‍ उघैक गाड़ी भाड़ा, जनक वोइन, जरनाक दाम- नष्‍ट भऽ गेल। टूटल मने पत्‍नीकेँ कहलक- सभ ि‍कछु दुइर भऽ गेल।
  पति‍क बात सुि‍न फुलेसरी गौवॉंकेँ दोख लगबैत बाजलि‍- ई सभ कि‍रदानी गौवॉं सबहक छि‍यै। जखन गाममे काली-पूजाक अड़धेना       -आराधना- केलक तँ पहि‍ने भगता बजा पूजा कऽ काली-महरानीसँ वाक लऽ लैत से करबे ने केलक आ अपने फुड़ने पूजा शुरू कऽ देलक। ओकरा सभकेँ की बि‍गड़लै। देत ि‍कयो हरजाना।
  फुलेसरीक जोर-जोरसँ बाजब सुि‍न सुरति‍या डपटैत बाजल- ऐँह सभटा बुझै छै। राजा-दैवक कोनो ठेकान छै। ककरो हाथमे छै जे ककरो दोख लगबै छि‍यै। कोनो ि‍क अपने टा नोकसान भेल। कते लोकक घर खसल हेतै, चीज-बौस दुइर भेल हेतै ि‍क अपने टा भेल?”
  पति‍क बात सुि‍न फुलेसरीक तामस गौवॉंपर सँ हटि‍ पड़ोसि‍नीपर पहुँचल। पड़ोि‍सनीकेँ गरि‍अबए लागलि‍- तेहेन मरमी मौगी सभ अछि‍ जे अनकर नीक सोहाइ छै। बेटा दऽ दऽ डानि‍ सीखने अछि‍ आ अनकर गरदनि‍ कटैए। जहि‍ना हमर भट्ठा नोकसान भेलि‍ तहि‍ना ओकरो सातो पुरखाकेँ उड़ाहि‍ देवै।
  सुरति‍याक घरक बगलेमे एकटा मसोमातक घर। जेकरा सभ स्‍त्रीगण डाइन बुझैत छै। ओकरे ठेकाना-ठेकना फुलेसरी गरि‍अबैत। गारि‍ तँ ओहो मसोमात सुनैत मुदा, नाओ नहि‍ सुि‍न कान ठाढ़ केने रहए जे जखने नाओ लेत तखने देखा देबइ। केहेन घनि‍कपन्‍ना होइ छै से सभ नि‍कालि‍ देवइ। पत्‍नी क्रोध देखि‍ सुरति‍या सोचलक जे एक तँ जे नोकसान भेल से भेवे कएल तइपर सँ अनेरे झगड़ा सेहो ठाढ़ हएत। हमरासँ ि‍क कमजोर ओ मसोमात अछि‍। दि‍यादि‍यो बेसी छै आ अपनो दुनू बेटा बुफगर छै। हो न हो कहीं आबि‍ कऽ माि‍र ठानि‍ दि‍अए। तखन तँ पूँजीयो गेल आ उपरसँ मारि‍यो खाएव। पत्‍नीकेँ पोल्‍हवैत कहलक- की हेतइ, ि‍कयो कपार लऽ लेत। भगवान जे भोग-पारसमे देने हेता ओ हेबे करत। जे नै देने हेता से अपनो केने थोड़े हएत। तइले एते आगि‍-अङोरा होइक कोन काज छै। नोकसाने की भेल खपड़ा गलि‍ कऽ माटि‍ हएत ओकरा फेरि‍ खपड़ा पाथि‍ सुखा कऽ भट्ठा लगा लेब। जरनो भीजवे ने कएल ओकरो सुखा लेब। गि‍रहत सभकेँ देखै छि‍यै हर-जन लगा खेती करैए आ बाढ़ि‍मे दहा जाइ छै तेँ ि‍क ओ मरि‍ जाइए ि‍क खेती छोड़ि‍ दइए। तहि‍ना हमरो भेल। भगवान समांग देने रहथु। सभ कि‍छु फेरि‍ भऽ जाएत।
  पति‍क बात सुि‍न फुलेसरीक मन थीर भेल। मुदा तइओ मनमे खौंझ उठि‍ते रहए। बाजलि‍- भगवानो दुष्‍टे छथि‍। जानि‍-जानि‍ कऽ गरीबे लोककेँ सतबै छथि‍न। जहि‍ना ओ करै छथि‍न तहि‍ना ने हमहूँ सभ करै छि‍अनि‍। ने एकोटा उपास करै छी आ ने एको दि‍न पूजा करै छि‍अनि‍।
  पत्‍नीक बात सुि‍न मुस्‍की दैत सुरति‍या बाजल- अच्‍छा आब भऽ गेल। जहि‍ना ओ -भगवान- केलनि‍ तहि‍ना अहूँ करि‍ते छि‍अनि‍। सधम-बधम भऽ गेल।
  मछुआ सोसाइटी बनने ि‍कछु गोटे उठि‍-वैसल आ ि‍कछु गोटे गोपाल खत्तामे चलि‍ चलि‍ गेल। ओना सोलहो आना पोखरि‍ सोसाइटीमे अखनो धरि‍ नहि‍ गेल अछि‍। मुदा जे गेल ओकर मुआवजा तँ पोखरि‍बलाकेँ नहि‍ भेटल। सोसाइटी बनने नव पानि‍दार मालि‍कक जन्‍म जरूर भऽ गेल। ि‍कऐक तँ एक गोटेक हाथमे अंचल भरि‍क पोखरि‍ आबि‍ गेल। जहि‍सँ पर्याप्‍त उत्‍पादि‍त पूँजी हाथ लगि‍ गेलै। संग-संग सरकारी खजानाक लूट सेहो शुरू भेल। मनमाना ढंगसँ सोसाइटीक सचि‍व आ सरकारी तंत्र मि‍लि‍ कऽ गामक अमूल्‍य पूँजी लुटब शुरू केलक।
    ओहि‍ सोसाइटीसँ एकटा पोखरि‍ आ एकटा खानगी पोखरि‍ डेढ़ हजार सलि‍याना ि‍कस्‍तपर फुदना माछ पोसैक लेल लेलक। सोसाइटीबला पोखरि‍क महार, बि‍नु देखरेख भेने, ढहि‍-ढुहि‍ कऽ सहीट भऽ गेल छलैक। मुदा रामधनबला पोखरि‍क मोहार नीक मुँह कान बना जीवि‍त छै। शुरूहे अखाढ़मे फुदना एकटा बेपारीसँ गंगाक जीा कीनि‍ सैरातबला पोखरि‍मे देलक। आ दोसर पोखरि‍मे तमुरि‍याक हेचरीसँ कीनि‍ कऽ आनि‍ देने रहए। गंगाक जीामे रोहू, नैन, भाकुर रहए आ तमुरि‍याक जीरा सि‍ल्‍वर काफ रहए। सि‍ल्‍बर काफ साले भरि‍मे दू-दू तीनि‍-तीनि‍ कि‍लोक भऽ जाइत छैक जबकि‍ रोहू, नैन तँ कम बढ़ैत छै मुदा, भाकुरक बाढ़ि‍ अधि‍क होइ छै। तीनू जीरा ि‍मला कऽ दैत छैक। पानि‍क सतहक ि‍हसाबसँ तीनू माछ रहैत छै तेँ तीनू ि‍मला कऽ देल जाइ छैक।
    शुरू अखाढ़ेमे जे आद्रामे बरखा भेल रहए ओहि‍मे दुनू पोखरि‍ भरि‍ गेल रहए। पोखरि‍क पानि‍ आ जीराक सुतरब देखि‍ दुनू परानी फुदनाक मन चपचप करैत रहए जे भगवान दुख हेरलनि‍। कहुना-कहुना तँ बीस हजारसँ उपरेक आमदनी हएत। जहि‍ना खूब फइल आमक गाछी, खूब उपजल खेत आ खूब दुधगर गाए ि‍वयेलासँ खुशी ि‍कसानकेँ होइत तहि‍ना फुदनो दुनू परानीकेँ मनमे होय। जहि‍सँ दुनू परानी बेरा-बेरी तीनि‍-तीन बेरि‍ पोखरि‍क घाटपर घंटा-घंटा भरि‍ बैसि‍ माछक बच्‍चाकेँ ऐम्‍हरसँ ओम्‍हर हेलैत देखए। घरपर अबैक मने ने होय।
    माछक कारोवारसँ फुदनाक परि‍वार पहलेसँ जुड़ल। खड़ड़ब, माछ मारि‍ बेचब परि‍वारक जीवि‍का रहए। तीन सलि‍या रौदी भेने फुदना कंठी लऽ लेलक। माछक रोजगार कोन जे माछ खेवो छोड़ि‍ देलक। जे माछक गंध पहि‍ने नीक लगै, आब जी ओकि‍याए लगै छै। गामक कीर्तन मंडलीमे शामि‍ल भऽ अष्‍टयाम, नवाहमे कीर्तन करए सेहो जाए लगल आ भनडारा सेहो पुरए लगल। लाट लगने एक हाथ हरि‍मुनि‍यॉं बजौनाइ, ढोलक बजौनाइ सेहो सीखि‍ लेलक। पाछु-पाछु कीरतन गबैत-गबैत गौनाइयो सीख लेलक। दाढ़ीयो-केश बढ़ा लेलक आ पतलखरीक चानन सेहो करए लगल। समेओ  संग देलकै। कीरतन मंडलीक सट्टा सेहो हुअए लगलै। काजो हल्‍लुक आ प्रति‍ष्‍ठाक संग-संग खेनाइयो नीक भेटै आ पाइयोक आमदनी नी भऽ गेलै। मुदा घरवाली सीति‍या साकठे रहलि‍। जहि‍ना माछक वन्‍यास बनबैमे सि‍ति‍या लूरि‍गर तहि‍ना खाइयोमे जीबि‍लाह। गामक छौँड़ा सभ आ जनि‍जाति‍यो सभ बगुला भगत कहै। घरमे एक्‍केटा थारी-लोटा रहए। जहीमे फुदनो खाए आ सि‍ति‍यो। एते बात जरूर रहए जे कहि‍यो फुदना घरवालीकेँ माछ खेवासँ मनाही नहि‍ केलक। फुदना देखवो करै जे नैहरसँ सनेसमे माछे अबै छै। नहि‍यो-नहि‍यो तँ तीनि‍-चाि‍र खेप मासमे अबि‍ए जाइ छै। सि‍ति‍याक पि‍ता माछक कारवारी रहए। पोखरि‍योबला सभसँ आ मधेपुरोक बेपारीसँ माछ कीनि‍ कीनि‍ आनए आ नफ्फा लगा कऽ गामे-गामे घुमि‍ कऽ बेचि‍ लि‍अए। जहि‍सँ नीक कमाइ होय। खेत-पथार तँ नहि‍ कीनि‍लक मुदा, नीक जेकॉं गुजरो करए आ घरो बनौने रहए।
    एक दि‍न फुदनाक सार टुनटुनमा दू ि‍कलोक अंडाएल रोहू नेने एलै। नमहर-नमहर कुट्टि‍या काटि‍ माछ तरए लगल। माछक सुगंधसँ फुदनाक मन मचकी जेकॉं डोलए लगल। जहि‍ना शरीरमे पुरना रोग समए पाबि‍ पुन: जगि‍ जाइत तहि‍ना फुदनोकेँ भेल। गरदनि‍सँ कंठी नि‍कालि‍ लाचारीक मुस्‍की दैत पत्‍नीकेँ कहलक- दूटा कुट्टि‍या आ चूड़ा भूजि‍ कऽ नेने आउ?”
  पति‍क बात सुि‍न व्‍यंग करैत सि‍ति‍या बाजलि‍- तीन सालमे कते घाटा भेल से बुझै छि‍यै। रोहू माछ खेनि‍हारकेँ कहि‍यो ऑंखि‍मे अबै छै। बुढ़ाढ़ियो तक ओहि‍ना चक-चक देखैत रहैए। अखन चुल्‍हि‍ तरसँ कन्‍ना उठब। घरमे चूड़ा नै अछि‍। दाेकानसँ अधा ि‍कलो नेने आउ। ताबे हम अंडाकेँ तरै छी।‍
    जहिना चोरकेँ गरपर रूपैया देखने देहमे तेजी आबि‍ जाइ छै तहि‍ना फुदनोकेँ आबि‍ गेल। जेबीसँ दसटकही नि‍कालि‍ दोकान गेल। सात रूपैयामे अधा कि‍लो कीनि‍ कऽ आबि‍ चुल्‍हि‍ये लग बैसि‍ पत्‍नीकेँ कहलक- ताबे एकटा लाउ।
    सि‍ति‍याक इच्‍छा रहबे करै। अनेरे दुनू परानी दू दि‍शाह भेल छी। जहि‍सँ अनेने सदति‍काल रक्‍का-टोकी होइत रहैए। तरल अंडा आ चूड़ाक भूजा सि‍ति‍या पति‍केँ देलक। जहि‍ना कोनो वस्‍तु अधि‍क दि‍नक बाद भेटलासँ आनन्‍द अबैत तहि‍ना फुदनाकेँ खेवामे आनन्‍द आबए लगल।
    फुदना सासुर गेल। ससुरक घरमे धड़ैनपर एकटा छोटका घुमौआ जाल सैंति‍ कऽ राखल देखलक। जाल देखि‍ मनमे एलै जे अनेरे ई जाल रखले-रखले दुरि‍ भऽ जाएत तइसँ नीक जे नेने जाइ। छोटका सारकेँ जाल उताड़ि‍ देखबै लए कहलक। जाल देखि‍ फुदना मांगि‍ गाम नेने आएल। गाममे ककरो बुझले नै रहए आ ने ककरो लग बजवे कएल। अोजार देखि‍ फुदना तरे-तर खुशी रहए। तेसरे-चारि‍मे दि‍नसँ ओ पोखरि‍ सभमे साझू पहरकेँ चोरा-चोरा माछ मारए लगल। अपनो खाए आ उगरै तँ बेचि‍यो लि‍अए। पोखरि‍बला सभ धपबए लगल। होइत-होइत एक दि‍न पकड़ा गेल। तत्‍काल तँ पोखरि‍बला ि‍कछु नहि‍ कहलकै मुदा, जाल छीनि‍ लेलकै। दोसर दि‍न भाेरे पोखरि‍बला पनचैती बैसौलक। पूर्बासायक जरूरते ने रहै ि‍कऐक तँ जाले गवाह रहए। पंच सभ पच्‍चीस बेरि‍ कान पकड़ि‍ कऽ उठै-बैठै


क्रमश:        
राजेश्वर नेपाली
कवि पं. प्रतापनारायण झा कें छठम पुण्यतिथि पर हार्दिक श्रद्धाञ्जलि


पं. प्रताप नारायण झा एकटा उच्च कोटिक साहित्यकार रहथि । मूलतः अध्यापन पेशा मे जीवनक महत्वपूर्ण समय व्यतितकए चुकल ज्योतिषीजी के नाम सँ सुपरिचित ओ लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्वर तथा सुकन्या च्यवन दूटा खण्ड काव्यक रचना संगहि अनेक कविता लिखलनि ।

साहित्यिक प्रतिभावान कवि प्रताप नारायण झा के कवित्वक परिचय हुनक कत्र्तव्य की अछि के जनैछी ? शीर्षक कविता सँ भेटैत अछि । २०५० साल जेष्ठ २८ गते जनकपुरधाम मे नेपाल राजकीय प्रज्ञा प्रतिष्ठान के उपकुलपतिक मदनमणि दीक्षितक प्रमुख आतिथ्य मे भेल वृहत कवि सम्मेलन मे पठित कविताक संग्रह लावाक धान मे ओहि कविता संदर्भ मे डा. रमानन्द झा रमण नेपाल मे मैथिली कविताक धार मे टिप्पणी करैत छथि ः
महेन्द्र विद्याभूषण पं. प्रताप नारायण झाक कविता मे विचारक गाम्भीर्यता आ दर्शक उच्चता स्पष्टतः भाषित होइत अछि ः
केहन ई संसार अछि की हम जनैछी ? के जनैछी ? मात्र स्वार्थे एक दोसर सँ जुटल अछि, सब जनैछी । किन्तु जैखन स्वार्थ मे धक्का लगै अछि खसि पडैछी तदपि बंचवाक आगा बंचना करिते रहैछी ।
टुटि परैछी लडि उठैछी, अपन आनकी नै बुझैछी तें कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनैछी ?
कविताक अंत मे कवि लिखै छथि ः
सब देखैछी सब करैछी बेस ततवे सब जनैछी
फलक आशा त्याग कय संलग्न मे छी से जनैछी
आर की चाही तकर चिन्ता कहां अछि से जनैछी
मैथिली संसार अछि कत्र्तव्य की अछि के जनैछी
तें कहल हम केहन ई संसार अछि से के जनैछी ?
हुनक प्रथम खण्डकाव्य लागल यज्ञ आ सीता स्वयम्बर ऐतिहासिक खण्ड काव्य अछि । सात सर्गक एहिखण्ड काव्यक भूमिका मे त्रिभुवन विश्व विद्यालय केन्द्रीय मैथिली विभागक तत्कालिन अध्यक्ष डा. धीरेश्वर झा धीरेन्द्र लिखने छथि ः
ज्योतिषाचार्य पं. प्रताप नारायण झा जीक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्यक अध्ययनक सौभाग्य हमरा प्राप्त भेल । मातृभाषा मैथिली मे रचित ई खण्ड काव्य हुनक प्रथम रचना रहितहुँ अपन प्रौढताक कारणे अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रतीत भेल । एकरा हम नेपाल खण्डक मैथिली साहित्याकाशर्क एक गोट दिव्य नक्षत्र मानैत छी ।
पण्डितजीक वर्णन तन्मयता तथा अभिव्यक्तिक प्रवाह सर्वज्ञा श्याघनीय अछि ।
प्रथम सर्ग मे ओ मिथिला वर्णन मे लिखै छथि हिम पहाड सँ दक्षिण भागक अड्ड कलिड्ड बंग सँ पर गंगा हरिहर क्षेत्र सँ उत्तर सदानिरा (नारायणी) सँ पूर्व सगर तँ सिमान्तर्गत क्षेत्रक अछि मिथिला नाम परल सुुन्दर शस्य श्यामला धरा जनकर छै उत्तर नगपति छै भूधर दोसर सर्ग मे राजर्षि जनकक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः
मिथिक मनोहर मिथिला मे पृथ्वी पति श्री राजर्षि जनक देश सुधारल प्रजा खुशाहल सुखमय जीवन छल सभहक त्रेता मे भेल भयंकर अनिकाल आ ओकर समाधान क हेतु यज्ञ करबाक निर्णय पर ओ लिखै छथि
अन्न पानि बिनु बांचि सकत के ऋषि मुनि श्रुति सम्मत वाणी जँ जल्दी वर्षा नहि होयत बांचि सकत नहि केओ प्राणी सभासदक सम्मति सँ पारित भेल यज्ञ होबक चाही लाड्डल यज्ञ करथु राजा, तैखन मेटल रौदिक धाही । तेसर सर्ग मे सीता स्वयक पूर्वक वर्णन करैत ओ लिखै छथि ः
मिथिला ग्न जनक अति प्रभुदित रानी के मन मे नहि चैन ।
सीता कोना खुशीभय रहती ताहि लेल सदिखन बेचैन ।।
ओ आगु शिव धनुषक आसपाल निपल गेल संदर्भ मे लिखै छथिः
एक दिन माय सुनयना कहलिन पूजा घरक ठाँव कयलेव ।
शिवपिनाक घयल छै तकरो आस पास मे निपिओ देव ।।
राजा जनक जखन पूजा ला ऐला देखलनि सकभारी ।
आई ठाँव के कैलक ऐ ठाँ ऐ तरहे अभिनव कारी ।।
सुुनतहि आवि सुनयना बजली देखलनि काज चमत्कारी ।
जे धनु टस मस होय न कनिको कोना उठा सकली भारी ।।
कारण तर मे निपल भूमि छै उपर सँ शिव धनु राखल ।
सीता केलनि ठाँव कहल हम हुनके ऐ ठाँ ठावक लेल ।।
चारिम सर्ग मे धनुषयज्ञ क तयारी आ देश देशान्तरक राजकुमार सब आएल लिखै छथि
धनुष यज्ञक हेतु जिनका जाहि काजक भार छल ।
काज झन पट पूर्ण करवा लय सदा तैयार छल ।।
ओहि मे स्वागत सत्कारक क्रममे आगू लिखै छथि ः
चहुदिस सँ लोक सब आ राज रजवारक कुंमर ।
अपन अपना ढंग के रथ तुरग गज बाहन सुधर ।।
आवि रहला आवि गेल छथि वैसला स्वविवेक सँ ।
जनक सब ठाँ स्वागतारथ सेवको एक एक सँ ।।
कथुक किनको त्रुटि नहि हो वस्तु नै छल कहथि के ओ ।
सब सतत् तैयार रहि घुमितो रहथु केओ कतहु केओ ।।
पांचम सर्ग मे धनुष भंगक प्रसंग लिखैछथि ः
परशुराम आ लखन मे किछु काल अटपटभय रहल ।
तखन श्री रघुवंशमणि मुनि रुप देखैतई कहल ।।
वीर हीना हो न बसुधा सत्य शिव सुन्दर सबला ।
गुरुक आज्ञा पावि शिव धनु सहज भावे कर गहल ।
भूमि सँ उपर उठवितँह टुटि कय धनु खसि परल ।।
ओ आगू स्वयम्बरक क्रम मे लिखै छथि ः
तेहि समय सीता माला लय सखि संग ऐली झट तहाँ ।
श्री धनुषधारी नृपति मणि श्री राम डाढ तथि जहाँ ।।
फूल वर्षा भेल नभ एँ मांगलिक बाजा बजल ।
दिग दिगन्तो धरि प्रवल जयकार ध्वनि गुन्जिते रहला ।।
छठम सर्ग मे राम सीताक विवाहक प्रसंग लिखै छथि ः
हर्षमय वातावरण तेहि काल सँ सबठाँ रहला
जनक विश्वमित्र सँ शुभ लग्न हेतुक जा पुछला ।।
गाधि सुत तेहि काल से राजा जनक सँ कहि देला ।
अवधपति के नौत पोताक लिखि दिअनु वरियात ला ।।
मास अगहन पंचमी तिथि शुक्ल पक्षक नीक छै ।
अवधपति के चारु पुत कें परिणयन होयवाक छै ।।
ओ सर्गक अंत मे तैयारी के संदर्भ मे लिखै छथि ः
अपन काजक सब रखने छलै अपने उपर ।
देल काजक भार कब कत्त पूर्ण होवय बिना डर ।।
ऐ प्रकारे जनकपुर नगरक सजायल वेश छल ।
प्रजा राजा सब जुटल सुरनर नाम किन्नर यक्ष सब ।
मैथिलीक परिणयन बुझि प्राकृतिक सौन्दयो कहबा ।।
अंतिम सातम सर्ग मे कन्या दलक संदर्भ में लिखै छथि ः
गुरु बशिष्ठक कथन अनुकूले सकल पूर्वाड्ड सब ।
सदानन्द पुरोहितक आसन पकरि विधि करथि सब ।।
कोनो वस्तुत कभी ककरो मैथिलीक दिस सँ ने भेल ।
समय जखनुक छलै तैखन सिन्दुरक शुभदान भेला
गगन सँ सुरवालिका सब पुष्प वर्षा कय रहला
मांगलिक सुरतान लय सँ गीत मंगल गा रहला ।।
एहि तरहे सात सर्गक सीता स्वयम्बर खण्ड काव्य कविक मौलिक कृति छैन्हि ।
२०५२ साल मे कवि द्वारा प्रकाशित एहि खण्ड काव्यक लगले २०५३ साल वैशाख मे सुकन्या च्यपन दोसर खण्ड काव्य हुनक प्रकाशित भेल । सात सर्गक एहो खण्ड काव्य बहुत सुन्दर अछि
महोत्तरी जिलाक सकरी ग्राम मे १९८० साल मार्ग शुक्ल दशमी १८ गते हुनक जन्म भेलनि आ ज्योतिष गणिताचार्य एवं फलित शास्त्री ज्योतिषी जी २००७ साल मे प्रजातन्त्र से पूर्वहि सप्तरी के एकटा संस्कृत विद्यालयक शिक्षक के रुप मे अध्यापन सेवा आरंभ कएलनि आ मटिहानीक श्रीराम माविक प्रधानाध्यापक पद स २०४३ साल मे सेवा निवृत भेल रहथि आ ओकर बाद २०६० साल पुस १५ गते निधन पर्यन्त जनकपुरधाम मे विश्वकर्मा चौक सँ दक्षिण मे अपन छोटछिन घर मे रहैत ज्योतिष कार्य तथा साहित्य साधना मे लागल रहलथि ।
अपन छत्तीस वर्षक अध्यापन सेवा मे रहैत ओ २०२३ साल मे जनसेवा पदक २०२५ मे महेन्द्र विद्याभूषण, २०३६ के शिक्षा दिवस पर पुरस्कृत भेल रहथि आ २०३७ मे दीर्घ सेवा पदक तथा २०३७ सँ २०४० धरि जिला शिक्षा समितिक सदस्य रहथि । पंडित जी मातृभाषा मैथिलीक संगहि हिन्दी मे दर्जनो भजन आ कविता लिखने छथि । उनकर छठम पुण्य तिथिक अवसर पर हुनक स्वर्गीय आत्मा के चिरशान्ति हेतु हार्दिक श्रद्धाञ्जलि अर्पण करैत छियन्हि

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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