Saturday, May 08, 2010

राधाकृष्ण चौधरी- मिथिलाक इतिहास- अध्याय २१ परिशिष्ट

अध्याय२१
परिशिष्ट
१. मिथिलाक इतिहासपर चंदा झाक मंतव्य
नान्य राजा क्षत्रिय कर्णाट छलाह जे शाके १०१९मे राज्य पौलन्हि। २२६वर्ष धरि हुनक संतान लोकनि राज्य केलन्हि।
       हुनक मंत्री जबदी परगन्ना स्थित अन्धराठाढ़ी गाममे कमलादित्य विष्णुक स्थापना केलन्हि। आधारशिलामे लेख श्लोकार्थ अछि नान्य राजाक मंत्री श्रीधर श्रीधरक प्रतिष्ठा केलन्हि। खसल पाथरक चौखठिपर मकरध्वज योगी लिखल अछि।
       शाके १०४०मे चिक्कौर राजाक राज्यमे जयचन्द्र राजासँ असगरे संग्राम कैल।
काफर राजाकेँ मारबाक बहादुरीमे पुरस्कार स्वरूप महमुदगजनी नरसिंहकेँ तिरहूतक राजा बनौलक। नरसिंह नान्यक पोता छल। बंगदेशसँ घुरबाकाल गयासुद्दीन सिमरौनगढ़ीसँ नरसिंह देवकेँ लऽ गेल छलाह।
       हरिसिंह देव मैथिल ब्राह्मणक पञ्जी प्रबन्ध केलन्हि। हुनक मंत्री रहथिन्ह साँधिविग्रहिक महावार्त्तिकनिबन्धकारक, महामत्तक वीरेश्वर ठाकुर। रणस्तंभ किलापर विजयाभियानक अवसरपर मैथिल मंत्री वीरेश्वर अलाउद्दीनक संग छलाह। १२९५इ. मे हम्वीर स्वर्गवासी भेलाह। अलाउद्दीन वीरेश्वरकेँ मंत्रिरत्नाकरक पदवीसँ अलंकृत केलन्हि।
       शक्रसिंह देव कर्णाटक मंत्री छलाह।
हरिसिंह देव अपना वंशक पंचम राजा छलाह। शाके १२१६मे जन्म भेल छलन्हि। ओ १२४८शाकेमे दरभंगासँ पूब ७कोश एवँ सकरीसँ 1/2 (डेढ़)कोश दक्षिण नेहरा राघोपुरमे निवास करैत छलाह। ओहि गाममे पैघपैघ पोखरि आ किला छल। ओ ओतहि पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केलन्हि। दैवाधीन ओ पटना छोड़ि उत्तर पहाड़ जंगल दिसि चल गेलाह। मिथिलामे भाला परगन्नामे मौजे उमागाममे अहुखन हरिसिंह देव पूज्य छथि। ओतहु भवन आदि देखबामे अवइयै।
कर्णाट वंश
राज्य भोगवर्ष२२६
i) नान्यदेव३६
ii) गंगदेव१४गंगासागर
iii) नरसिंह देव५२
iv) रामसिंह देव९२  
v) शक्रसिंह१२सुखीदीघी
vi) हरिसिंह२०निजाम्बुदीर्घिका
नोट:- एहि प्रसंगमे हमर अपन मत कर्णाट्ज आफ मिथिला (भण्डारकर शोध पत्रिका१९५५) प्रकाशित अछि। संगहि कम्प्रीहेनसिभ हिस्ट्री आफ बिहार खण्डमे सेहो हम सभ तथ्यक विवेचन कैल अछि। रामसिंह देवक पछाति १२६०इ.मे मिथिलामे वीरसिंह नामक राजाक विवरण पेटेक देने छथि जे विचारणीय अछि आ संगहि एहि तथ्यपर ओ नव प्रकाश सेहो देने छथि। द्रष्टव्य अछि हुनके लिखल मिडिवल हिस्ट्री आफ नेपाल आ बिहार रिसर्च सोसायटीक महाराजा वाल्युममे मिथिला आ नेपाल नामक हुनक निबन्ध।       
शाके श्रीहरसिंहदेव नृपतेर्भूपार्क तुल्येजनि
स्तस्माद्दंतमितेऽब्दके द्विजगणैः पञ्जी प्रबन्धः कृतः।
तस्माद्वैरिजवंश वैरिकलिने (?) सद्विश्व चक्रेपुरा
सद्विप्राय समर्पितः सुकृतिने शांताय तस्मैनमः॥1॥
शास्तानान्यपतिर्बभूव तदनुश्रीगाङ्गदेवो नृप 
स्तत्सूनुर्नरसिंहदेवनृपतिः श्री रामसिंहस्तः।
तत्सूनुः खलु शक्रसिंह विजयी भूपाल वन्द्यस्ततो
यत्र श्रीहरि (हर) सिंह देव नृपतिः कर्णाट चूड़ामणि॥२॥
वाणब्धिबाहुशशिसम्मित शाकवर्षे
पौषस्य शुक्लदशमी क्षितिसूनुवारे।
त्यक्तवा सुपट्टनपुरीं हरि (र?) सिंह देवो
दुर्देव देशित पथो गिरिमाविवेश॥३॥
       मिथिलामे जबदीनहड़ी परगन्नामे बलिराजगढ़क समीप सिहुलावन (सिरिहला) नामक प्रसिद्ध स्थान अछि जतए बलदेवजी स्यमंतक मणिक हेतु ६०वर्ष धरि निवास कएने छलाह। दुर्योधन, क्षेमधूर्त्ति, जलसन्ध आदिक सम्बन्ध सेहो एहि स्थानसँ छल।
       पक्षधर मिश्र १३५०शाकेमे हरिनारायण प्रसिद्ध भैरवदेवक सभामे उपस्थित छलाह।
श्रीकृष्ण स्यमंतक मणि जाम्बवानकेँ पराजित प्राप्त केलन्हि आ ओ मणि ओ सत्राजितकेँ देलन्हि। सत्राजित सत्यभामा नामक कन्याकेँ देलन्हि। सत्यभामा रातिमे सत्राजितकेँ मारि मणि ल अकरूरकेँ एहि शर्त्तमे देलन्हि जे ओ एहि चोरीक गप्पकेँ प्रकासमे नहि अनताह। सत्यभामा हस्तिनापुर पहुँचि पितामरण एवँ मणिहरणक समाचार श्रीकृष्णकेँ देलन्हि। श्रीकृष्ण द्वारका पहुँचि अपन जेठ भाइ बलभद्र जीसँ एकरा खोजबाक हेतु आग्रह केलन्हि। मणि नहि भेटलाक कारणे कृष्णकेँ क्रोध भेलन्हि आ तखन ओ मिथिलामे आबि राज सत्कारसँ प्रसन्न भ धर्मागंद गढ़मे निवास केलन्हि आ तखनहिसँ ओहि गढ़क नाम कोपगढ़ पड़ल। ६०वर्षक पछाति कृष्णजी द्वारिका घुरलाह।
बलिराजगढ़ ओ क्षेमगढ़ सेहो प्रसिद्ध अछि-------
       स्कन्दपुराण (सह्याद्रिखण्डअध्याय३५)क आधारपर सौनल मुनिसँ उत्पन्न क्षत्रिय वंशक बीसम राजा बलिराज छलाह (चन्द्रवंशी)।
       हरिअमय बलिराजपुर मूल प्रसिद्ध अछि जाहिमे ब्राह्मण श्रोत्रिय महामहोपाध्याय सचल मिश्र पूनामे वाजीराव पेशवासँ अनेक दान प्राप्त केने छलाह।
       बलिराजपुर गढ़क समीप मदनेश्वर महादेव छथि जकर स्थापना बलिराजक दादा मदन कएने छलाह आ जनिक नामपर मदनोगाम सेहो अछि। १२८१सालमे हावी परगन्नामे साहो मौजेमे पोखरि खुनैतकाल एकटा प्रतिमा बाहर भेल हे हावीडीहमे राखल छल आ लक्ष्मीनारायणक प्रतिमा शिलामे निम्नलिखित लेख उत्कीर्ण छल श्रीमान्मदनमाधवः
पद्मावती देवीसौनल्यमुनि
१.) यदु  
२.) भास्कर
३.) सुरथ
४.) गर्जन
५.) दण्डधारी
६.) खड़्गधर
७.) श्रीवदन
८.) नागराज
९.) गुणराज
१०.) शिव 
११.) सोमनाथ
१२.) महाकाल
१३.) दुन्दुभि
१४.) बिम्बराज
१५.) देवक
१६.) अनिरूद्ध
१७.) गोपति
१८.) मदन
१९.) सुनेत्र
२०.) बलिराज (जकरा नामपर बलिराज गढ़ अछि।)
                                 
परिशिष्ट
ओइनवार वंशक वंश तालिका
ओएन ठाकुर
अतिरूप ठाकुर 
विश्वरूप ठाकुर 
गोविन्द ठाकुर 
लक्ष्मण ठाकुर 
राजपण्डित कामेश्वरहर्षण सुगौनेशःतेवाड़ीसलखनत्रिपुरेगौड़।
राजा भोगीश्वर    
महत्तक कुसुमेश्वर 
राजा भवसिंह
राजा भोगीश्वर
राजा गणेश्वर                                
राजा कीर्तिसिंह(?)                     
वीर सिंह
राजा भवसिंह
राजा देवसिंह
राजा हरसिंह
(पद्मसिंहक बाद राजा भेलाह)
त्रिपुर सिंह राज्य दुर्जन खाड़ेपुत्र अर्जुन राय            
राजा देव सिंह 
शिवसिंह
पद्मसिंह
राजा हरसिंह
दर्पनारायण पदांकित रत्नसिंहनरसिंह
हृदय नारायण धीरसिंह (पुत्रराघवेन्द्र)
हरिनारायण भैरवसिंह (धीर सिंहक भ्राता)
(विश्वास देवी)- ?
रूपनारायण रामभद्र
कंसनारायण लक्ष्मीनाथ
(शिव सिंह)
लखिमा रानीविश्वास देवी(?)
पद्मसिंह
(भैरवसिंहकेँ चन्द्रसिंह नामक एक छोट भाइक उल्लेख अछि इ संभवतः सतभाय रहथिन्ह। इहो कोनो क्षेत्रमे राज करैत छलाहविद्यपति आ मिसारू मिश्र हिनक नरेश, नृपति कहैत छथिन्ह। हिनक पत्नीक नाम सेहो लखिमा रहन्हि।)
नोट:- चंदा झाक अनुसार त्रिपुरसिंहक पुत्र अर्जुन राय गणेश्वरकेँ मारलन्हि। कारण छल राजगद्दीक हेतु आपसी झगड़ा कामेश्वर आ हर्षणक वंशजमे। कीर्ति सिंह बादशाहक मददसँ राजा भेलाह। चंदा झा लिखनावलीक आधारपर कहैत छथि जे बन्धुघाती अर्जुन (त्रिपुरक पुत्र) सेहो मारल गेला। कीर्ति सिंहवीर सिंह अपुत्र मरि गेलाह तखन भवसिंहक वंशक हाथमे शासन गेलन्हि।
       ओइनवार वंशक एक शाखा अहुखन अराइदंगा (मालदह) पश्चिम बंगालमे विराजमान छथि जे अपनाकेँ कामेश्वर ठाकुरक वंशज मानैत छथि। हुनक वंश वृक्ष हमरा स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर १९५८मे पठौने छलाह।
लक्ष्मण ठाकुर
आठम पीढ़ीमे भेलाह कुलमनओइनीसँ मुर्शिदाबाद गेला।
संतोष (अराइदंगा पहुँचलाह)
बोधनारायण
भोलानाथ
काशीनाथ
दुर्गाप्रसाद
चण्डीप्रसाद
विशेश्वर
वीरेश्वर
रामेश्वर
हरेश्वर
विशेश्वर
नवीन
दिनानाथ
उपेन्द्र
दिनानाथ
स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर (भूतपूर्व पार्लियामेंट्री सेक्रेट्री, बंगाल)
अरूण चन्द्र कुमर (पुरनका मालदह गजेटियरमे सेहो हिनका लोकनिक विवरण भेटइत अछि।)
       मिथिला भारतीमे प्रो. हेतुकर झाक निबन्धसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलामे १७१८म शताब्दी धरि ओइनवार लोकनि राजनैतिक दृष्टिये महत्वपूर्ण छलाह आ मुगल बादशाहत एहि तथ्यकेँ मनैत छलाह। अराइदंगाक ओइनवार लोकनिक क्षेत्र पुर्णियाँ धरि पसरल छलन्हि आ हेवनि धरि ओ लोकनि राजनैतिक दृष्टिकोणे मालदहोमे महत्वपूर्ण बुझल जाइत छलाह।

परिशिष्ट

विद्यापतिक वंशावली
विष्णु ठाकुर
हरादित्य
कर्मादित्य
वीरेश्वर
धीरेश्वर
गणेश्वर
धीरेश्वर
जयदत्त
गणपति
विद्यापति
कर्मादित्यक शिलालेख:- अब्देनेत्र शशाँक पक्षगादिते श्रीलक्ष्मण क्षमाप्रते
र्मासि श्रावण संज्ञकेँ मुनितिथौ स्वात्यां गुरौशोभने।
हावीपट्टन संज्ञकेँ सुविदिते हैहट्ट देवी शिवा
कर्मादित्य सुमंत्रिणेह विहिता सौभाग्य देव्याज्ञया।
मिथिलायां हावीडीहेति प्रसिद्धे देवी सिंहासन शिलायामुत्कीर्णमस्तीति।
तथैव तिलकेश्वरशिवमठे कर्मादित्य नाम्नैव कीर्तिशिलायामुत्कीर्ण मास्ति॥
       विद्यापतिक पूर्वज मिथिला राज्यक प्रशासनमे सक्रिय भाग लैत छलथिन्ह जकर प्रमाण हमरा लोकनि निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावलीसँ भेटइत अछि। एहिसँ मिथिलाक प्रशासनक विभिन्न विभागक ज्ञान सेहो होइत अछि।
प्रशासनिक शब्दावलीक सूची:-
i) सान्धिविग्रहिक
ii) राजवल्लभ
iii) पाण्डागरिक
iv) महावार्तिक नैबन्धिक
v) महामत्तक
vi) महामत्तक सान्धिविग्रहिक (चण्डेश्वर)
vii) भाण्डागारिक
viii) स्थानांतरिक
ix) मुद्राहस्तक
x) राजपण्डित
xi) सुमंत्रिण

परिशिष्ट

शिवसिंह द्वारा विद्यापतिकेँ देल गेल ताम्रपत्रक प्रतिलिपि:-
स्वस्ति। गजरथेत्यादिसमस्त प्रक्रिया विराजमान श्रीमद्रामेश्वरी वरलब्ध प्रसादभवानी भवभक्ति भावन परायणरूपनारायण महाराजाधिराजश्री माधव सिंह देवपादाः समर विजयिनः जरैल तप्पायां विसपीग्रामवास्तव्य सकल लोकान् भूकर्षकाँश्च समादिशंतिमतमस्तु भवतां ग्रामोऽयमस्माभिः सप्त क्रियाभिनव जयदेव महाराज पण्डित ठक्कुर
       श्री विद्यापतिभ्यः शासनीकृत्य प्रदत्तोऽतोयूयमेतेषां वचन करीयभूय कर्षणादिकं करिष्यथेति लसं २९३ श्रावणशुद्धि सप्तम्यांगुरौ। श्लोकास्तुअब्दे लक्ष्मण सेन भूपति मते वह्नि(3) ग्रह(९) द्वय(२) ङ्किते।
मासिश्रावण संज्ञकेँ मुनि तिथौपक्षेऽवलक्षे गुरौ॥
वाग्वत्याः सरितस्तहे गजरथेत्याख्याप्रसिद्धेपुरे।
दित्सोत्साहविवृद्दबाहुपुलकः सभ्यायमध्येसभम्॥१॥
प्रज्ञावान् प्रचुरोर्वरंपृथुतराभोगं नदी मातृकं
सारण्यं ससरोवरंच विसपीनामानमासीमतः।
श्री विद्यापतिशर्मणे सुकवये वाणीरसास्वाद विद्
वीरः श्री शिवसिंह देव नृपतिर्ग्रामं ददेशासनम्॥२॥
येन साहस मयेन शास्त्रिणातुङ्गवाहवर पृष्ठवर्तिना।
अश्वपतिबलयोर्बलं जितं गज्जनाधिपतिगौऽभूजाम्॥३॥
रौप्य कुंभ इव कज्जल रेखा स्वेत पद्म इव शैवल वल्ली।
यस्यकीर्तितवकेतककांत्या म्लानिमेतिविजितो हरिणाङ्क॥४॥
द्विषन्नृपति वाहिनी रूधिर वाहिनी कोटिभिः।
प्रतापतरूवृद्दये समरमेदिनी प्लाविता॥
समस्त हरिदङ्गना चिकुरपाशवासः क्षमं।
सितप्रणवपाण्डरं जगतियेन लब्धं यशः॥५॥
मतङ्गजरथप्रदः कनकदान कल्पद्रुम
स्तुलापुरूषमद्भुतं निजधनैः पितादापितः।
अवानिच महात्मना जगतियेन भूमिभुजा
परापरपयोनिधि प्रथम मैत्र पात्रं सरः॥६॥
नरपतिलुलमान्यः कर्णशिक्षावदान्यः
परिचित परमार्थो दानतुष्टार्थिसार्थः।
निजचरितपवित्रो देवसिंहस्य पुत्रः
सजयति शिवसिंहो वैरिनागेन्द्र सिंहः॥७॥
ग्रामेगृहणंत्यमुष्मिन् किमपिनृपतयोहिन्दवोऽन्ये तुरूष्का
गोकोलम्वात्म मांसैः सहितमनुदिनं भुज्यते ते स्वधर्मम्।
येचैनं ग्रामरत्नं नृपकर रहितं पालयंति प्रतापै
स्तेषां सत्कीर्ति गाथा दिशि दिशि सुचरंगीयतां वन्दिवृन्दै॥८॥
ल.स. २९३ शाके १३२४ शिवसिंह राजा भेलाह। चारि महिनेक बाद विद्यापतिकेँ विस्फी ग्राम दानक ताम्रपत्र देलन्हि।
       १३२६मे हरसिंह देव तिरहूत छोड़ि नेपालक जंगलमे गेलाह। भाला परगन्नामे उमगाममे गुप्त रहबाक हेतु एकटा प्रसिद्ध किला छल। कामेश्वर पण्डितकेँ बादशाहसँ राज्य भेटलन्हि मुदा सिद्धपुरूष होएबाक कारणे ओ अंगीकार नञि केलन्हि। फिरोजशाह भोगीश्वरकेँ राज देलन्हि। भोगीश्वरसँ भवसिंह राज्य बटलन्हि। १३६०मे भोगीश्वर मरि गेलाह आ गणेश्वर राजा भेलाह। गणेश्वरकेँ भवसिंहक पौत्र (त्रिपुर सिंहक पुत्र) मारि देलकन्हि। हर्षण ठाकुरक पौत्र रत्नाकरक हाथ सेहो एहिमे छल । गणेश्वरक पुत्र वीरसिंह आ कीर्तिसिंह दिल्ली पहुँचलाह आ बादशाहक मदतिसँ कीर्तिसिंह राजा भेलाह। अर्जुन पुरादित्य द्रोणवारक हाथे मारल गेलाह।
       शिव सिंह १५वर्षक अवस्थामे पिताक जीवतहि राजा भेला। देवसिंह देवकुली बसौलन्हि (दरभंगा कचहरीसँ सबाकोस दक्षिण)। शिवसिंहपुर (गजरथपुर)क स्थापना शिवसिंह करौलन्हि। देवसिंहक बाद शिवसिंह तीन वर्ष नौ मास राज्य केलन्हि। एकवेर पकड़ाकेँ दिल्ली गेल छलाह। अंतमे यवनसँ पराभूत भए उत्तर पहाड़मे चलि गेलाह। विद्यापति लखिमाकेँ लऽ क द्रोणवार पुरादित्यक ओतए रहे लगलाह। शिवसिंहक मंत्री चन्द्रकरक पुत्र अमृतकर पटना जाए बादशाहसँ अभयदान लऽ क बछौरमे पद्मामे रहए लगलाह। लखिमा १२वर्षक बाद सती भेलीह तकर बाद एक वर्ष पद्मसिंह राज्य केलन्हि आ तकर बाद पद्मसिंहक रानी विश्वास देवी १२वर्ष धरि। भाला परगन्नामे बिसौली गाम विश्वास देवीक नामपर अछि। ***विश्वास देवीक बाद धीर सिंह प्रसिद्ध हृदयनारायण तत्पर राजा भैरव सिंह हरिनारायणमिथिलामे १४००मीमाँसक जमघट भेल छलभैरवसिंहक पुत्र हरिनारायण(?)भैरवसिंह बछौर परगन्नामे वरूआर नामक गाममे अपन राजधानी बनौलन्हि 

परिशिष्ट

राजा संग्राम गुप्त देवक पंचोभ अभिलेख
(मूल हमर सिलेक्ट इन्सक्रिपसन्स आफ बिहारमे प्रकाशित अछि।)
लहेरियासरायक समीप पंचोभ ग्रामसँ एकटा ताम्रलेख बहुत दिन पूर्वहि बाहर भेल छल जे मिथिलाक इतिहासक दृष्टिकोणसँ महत्वपूर्ण कहल जा सकइयै। एहि अभिलेखमे तिथि नहि अछि परञ्च लिपिक आधारपर एकरा १३म शताब्दीमे राखल जा सकइयै। इ अभिलेख माण्डलिक राजा संग्रामगुप्तक थिक। एहिमे निम्नलिखित ६राजाक उल्लेख अछि (संभव जे इ लोकनि उत्तर गुप्त वंशसँ सम्बन्धित होथि।)
i) यज्ञेश गुप्त      
ii) दामोदर गुप्त
iii) देवगुप्त  
iv) राजादित्य गुप्त
v) कृष्णगुप्त
vi) संग्रामगुप्त
       एहिमे उपर्युक्त मात्र तीनटाकेँ राजा कहल गेल छैक। संग्राम गुप्त स्वयं परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर महामाण्डलिक आदि पदवीसँ विभूषित छथि। इ सभ कोनो सोमवंशी अर्जुनक वंशज कहल गेल छथि। भऽ सकैत अछि जे इ सम्राट हर्षवर्द्धनक राज्यपाल अर्जुन (जे तिरहूतक राज्यपाल छलाह)क वंशज होथि। किछु इतिहासकार एहिमे वर्णित स्थानक मिलान मूंगेर जिलाक जयनगरसँ करैत छथि जे हमरा बुझने अस्वाभाविक अछि आ एहि वंशकेँ पाल अथवा सेनवंशक सामंत माण्डलिक सिद्ध करबाक चेष्टा करैत छथि। इ निर्णय तथ्यपूर्ण नहि बुझना जाइत अछि कारण ताहि दिनमे मिथिलामे कर्णाट वंशक शासन सर्वशक्तिमान छल। दरभंगा (आव मधुबनी जिला)मे सेहो जयनगर नामक एकटा प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान अछि। हमरा बुझने संग्राम देव अवश्ये एहिठाम कर्णाट वंशक महामाण्डलिक रहल होएताह आ पञ्जी प्रबन्धक पहिने इ ताम्रपत्र प्रकाशित भेल होएत कारण एहुमे कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ दान देबाक व्यवस्था देखबामे अवइयै। प्रशासनिक शब्दावलीक दृष्टिये सेहो इ अभिलेख महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि। प्रशासनिक शब्दावलीक सूची हम मिथिलाक प्रशासनिक इतिहासक क्रममे लिखि चुकल छी तैं एहिठाम दोहराएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। संग्राम गुप्तक सम्बन्ध जे मंतव्य पहिलुक विद्वान लोकनि देने छथि से हमरा मान्य नहि अछि आ हमर अपन विचार इ अछि जे इ लोकनि मिथिलाक छलाह आ एहिठामक कोनो शासकक महामाण्डलिक रहल हेताह।

परिशिष्ट
मिथिलासँ प्राप्त किछु हिन्दू आ मुस्लिम अभिलेख
(१) अशोकक पंचम स्तंभलेख (रमपुरवा : चम्पारण)
       १. देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आह। सड्डवीसति साभि सितेनमे इमानि पि जातानि अवध्यानिकयानि। सेयथ २. सुके सालिक अलुने चकवाके हँसे नंदीमुखे गेलाहे जतूक अंबाक पिलिक दुग्ले अनठिक मछे वेदवेयके ३. गंगा पुपुटकेँ संकुज मछे कफट सेयके पंनससे सिमले संडके ओक पिंडे पलसते सेन कपोते ४. गाम कपोते सबे चतुपदे ये पटिभोगं नो एतिन च खादयाति। अजका नानि एलका च सूकली च गभिनीव ५. पायमीना व अवध्य पोतके च कानि आसं मासिके। विधि कुकुटे नो कट विये। तुसे सजी वेनो झापयति विये। ६. दाबे अनठाये व विहिसाये व नो झापयितविये। जीवेन जीवे नो पुसितविये। तीसू चातुं मासु तिस्यं पुनंमासियं ७. तिनिदिवसानि चस्वुदसं पंनडसं पटिपदं धुवाये च अनुपोसथं मछे अवध्ये नोपि विकेतविये। एतानि येव ८. दिवसानि नाग वनसि केवट भोगसि यानि अंनानिपि जीवनिका यानि नोहं तवियानि। अठमि पखाये चावु दसाये ९. पंतऽसाय तिसा ये पुनावसुने तीसु चातुं मासीसु सुदिवसाये गोने नो निलाखेतविये। अजके एलके सूकले १०. एवापि अंने नील्वखियति नो नीलखित विये। तिसाय पुना वसुने चातुं मासप्रखाय अस्वस गोनस ११. लखने नो कट विये। याव सड्डवीसति वसाभि सितेनमे एताये अंतलिकाये पंन वीसति बन्धन मोखानि कयनि।
(२) अशोकक षष्ठम स्तम्भ लेख (रमपुरवा : चम्पारण)
       १. देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आह। दुवाऽस वसाभिसितेन मेघंमलिपि लिखापित लोकस हित सुखाये। से तं अपहट २. तं तं धंम बढ़ि पापोव। हेवं लोकस हित सुखे ति पटिवेखामि अथ इयं नातिसु हेवं पत्यासंनेसु हेवं अपक ठेसु। किंम कानि ३. सुखं आव हामी ति तथा च विदहामि। हेमेव सर्वकायेषु पटिवेखानिं। सर्वपासंग पिमे पूजित विवधाय पूजाय। ए चुइयं। ४. अतन पचूप गमने से मे मोख्यमुते। सड्डवीसति वसाभि सितेनमे इयं धंम लिपि लिखापिति।
(३) वैशालीसँ प्राप्त किछु महत्वपूर्ण शिलालेख
       १. ध्रुवस्वामिनीक मुद्रा अभिलेखे महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी श्री गोविन्द गुप्त माता श्री ध्रुवस्वामिनी (एहिपर शीघ्रहि हमर लेख प्रकाशित भए रहल अछि।) २. घटोत्कच गुप्तस्य।
(४) संघ श्रेणी एवं राजकर्मचारी लोकनिक मुद्रा लेख
       १. कुमारामात्याधिकरणस्य। २.युवराजपादीय कुमारामात्याधिकरण। ३. श्रेष्ठिसार्थवाहकुलिकनिगम। ४.श्रीयुवराजभट्टारकपादीय कुमारामात्यअधिकरणस्य ५. श्रीपरमभट्टारकपादीय कुमारामात्याधिकरण। ६. युवराजभट्टारकपादीय......काधिकरणस्य ७. युवराजभट्टारकपादीय बालाधिकरणस्य ८. श्रीरणभाण्डागाराधिकरणस्य ९. दण्डपाशाधिकरणस्य १०. महाप्रतिहार तरवर विनयशूरस्य ११. महादण्डनायक अग्निगुप्तस्य १२. भट्टास्वपति यज्ञवत्सस्य १३. तीरभुक्त्यौपरिकाधिकरणस्य १४. तीरभुक्तौ विनयस्थितिस्थापकाधिकरणस्य १५. तीर कुमारामात्याधिकरणस्य १६. उदानकूपे परिषदः १७. वैशाल्याधिष्ठानाधिकरण १८. वैशाल्यामरप्रकृतिकुटुम्बिनाम् १९. वैशाल विषयाः २०. श्रेष्ठकुलिकनिगम् २१. वैशाली अनुटकारे सम्यानक २२. सुजातर्षस् २३. आम्रात्केश्वर २४. श्रीविष्णुपाद स्वामीनारायण २५. जयत्यानंतो अभवान साम्बा २६. जितं भगवतोनंतस्यनन्देश्वरी वरस्वामिनः २७. नमः पशुपतेः २८. रविदास २९. भगवतादितस्य ३०. राज्ञोमहाक्षत्रपस्य स्वामीरूद्रासिंहस्य दुहितु राज्ञोमहाक्षत्रपस्य स्वामीरूद्रसेनस्य भगिन्या महा देव्या प्रभुदमायाः। ३१. देयधमोयम् प्रवर महायानायिनः करणिक उच्छाह माणकस्य सुतस्य यदत्रपुण्यं  तद्भवत्व चर्योपाध्याय मातापित्रोरात्मनश्च पूर्वगमं कृत्वा सकल सत्वरासे रनुत्तर्ज्ञानावाप्रयैति। ३२. कुमारामात्याधिकरणश्च सर्व्वंग विषये ब्राह्मणाद्यपुरस्सरान् वर्त्तमानांभविनश्च ३३. श्रीसामंत......विषयपतिंसाधिकरणान्......व्यवहारी जनपदान बोधयत्यस्तु ओ विदितम्। ३४. श्री लोकनाथस्य ३५. ल.स. २३९ शोधरवली श्री चण्डेश्वरस्य कीर्ति
       एहिमे लक्ष्मण सम्वत् देल अछि ताहि आधारपर एकरा महामत्तक चण्डेश्वरक अभिलेख मानि सकै छी।
            (५) किछु दिन पूर्व मुजफ्फरपुर जिलांतर्गत कटरा थानासँ पाँचम छठम शताब्दीक एकटा ताम्रलेख भेटल अछि जे गुप्तकालीन थीक आओर जाहिमे तीरभुक्तिक उल्लेखक संगहि संग चामुण्डा विषयक उल्लेख सेहो अछि। इ अभिलेख आओर चम्पारणसँ प्राप्त तीन चारिटा ताम्रलेख अप्रकाशित अछि आओर इ पटना प्रमण्डलक विद्वान आयुक्त श्री श्रीधर वासुदेव सोहनीक संग छन्हि। आशा अछि ज ओ शीघ्रे एहि सभ अभिलेखकेँ प्रकाशित करौताह। आब इ ताम्रलेख एपिग्राफियाइण्डिकाक वाल्युम ३५मे प्रकाशित भऽ चुकल अछि। ओहिठाम मोतिहारीसँ प्राप्त दूटा आर अभिलेख प्रकाशित अछि।
            (६) गुप्तकालीन एकटा मुद्रा (माटिक) हमरा बेगूसरायमे प्राप्त भेल छल जाहिमे एकपीठपर गुप्ताक्षरमे लेख अछि आओर दोसर पीठपर मिथिलाक्षरमे आओर लं.सं.क उल्लेख सेहो अछि। (मुद्राक गुप्ताक्षर वाला लेख) सुहमाकस्यसुहमाकस्य (मिथिलाक्षर वाला लेख) सं. ६७ द्यौ पौशदिने नगम केदत्तम् दभम् शाध्येच्यैकेः केशवा पदे इतिइ मुद्रा हमरा लग अछि।
       एकर अतिरिक्त बुद्धमंत्रये धम्महेतु प्रभवा......आदि लिखल ढ़ेरक ढ़ेर मूर्त्ति मिथिलामे भेटइत अछि।
(७) पालकालीन मिथिलाक शिलालेख
(i) भागलपुर कौपरप्लेटमे तीरभुक्ति आओर कक्ष विषयक उल्लेख अछि आओर ओहिमे कहल गेल अछि जे तीरभुक्तिमे हजार शिवमन्दिरक निर्माण भेल छल, (ii) इमादपुर (मुजफ्फरपुर जिलासँ पाप्त) अभिलेख। महिपाल प्रथमक अभिलेख ॐ श्रीमान महिपाल देव राजसम् ४८ ज्येष्ठ दिने सुकलपक्षे २ आलै चकोऽरि माहवसुत साहि देवधर्म्म, (iii) वनगाँव (सहरसा)सँ प्राप्त विग्रहपाल तृतीयक ताम्र अभिलेख इ सभटा अभिलेख हमर सेलक्ट इन्सक्रिपसन्स आफ बिहारमे छपल अछि।
       (पाँति २४): काञ्चनपुर समावासीता श्रीमञ्जय स्कन्ध वारात परम सौगतो महाराजाधिराज श्रीमन्नयपालदेव पादानुध्यातः परमेश्वरः परम भट्टारको २५. महाराजाधिराजः श्रीविग्रहपाल देवः कुशली। तीरभुक्तौ हौद्रेय वैषयिक वसुकावर्तात। यथोप्तत्या पंचशत्ति कांशे। २६. समुपगता शेष....२७. शाण्डिल सगोत्राय। २८. शाण्डिल्यासित देवल प्रवराय नरसिंहसँ ब्रह्मचारिणे। छन्दोग शाखाध्यायिने। मीमाँसा व्याकरण तर्क विद्याविदे। २९. कोलाञ्च विर्निगताय। इट्टाहाक वास्तव्याया योग स्वामी पौत्राय। तुंग पुत्राय। श्री घण्टुक शर्मणे। विषुवत संकांत्याम्। विधिवत्। गं। ३०. गायाम् स्नात्वा शासनी कृत्य प्रदतास्माभिः।
(iv) नौलागढ़ (बेगूसराय)सँ प्राप्त विग्रहपाल तृतीयक अभिलेख सिद्धम्
श्री विग्रहपाल देव राज्ये सम्वत् २४ क्रिमिलिया शौण्डिक महामती दुहित्रा धाम्मजिपल्या आशोककया कारिता॥
(v) नौलागढ़सँ प्राप्त दोसर अभिलेख
नमोधर्माय......श्रद्धा कारूण्य संभेदरदान मस्तुम माये पुण्यधारां। भिक्षा भुजामित्यमायधतुमक्ष। वाट (वदि)...आश्रय मन्विता। यद वध (च) स्वाहा (or श्रद्धा) क्रौद्वोचिंता....भा..वमद...दमल व्यवस्थिताह....श्रद्धाया भाव (च)...यद् गृहादि (धै)....याद दक....बिहार...एहि अभिलेखसँ संदिग्ध रूपें इ बुझना जाइत अछि जे पालकालमे मिथिलामे नौलागढ़ अंचलमे कोनो एकटा बौद्ध बिहार अवश्य छल।
अन्यान्य अभिलेख
पंचोभ ताम्रलेखक किछु अंश
पांति १. श्री संग्रामगुप्तः २. ॐ स्वस्तिः परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर, परममाहेश्वर, वृषभध्वज, सोमांवयज्ञार्जुन वंशोन्न जयपुर ३. परमेश्वर महामाण्डलिक श्रीराजादित्य गुप्तदेव पादानुध्यात राजपुत श्रीकृष्णगुप्त सुत परमभट्टारक महाराजाधिराज ४. परमेश्वर परममाहेश्वर वृषभध्वज सोमान्वयजार्ज्जुन वंशोद्भव जयपुर परमेश्वर महामाण्डलिक श्रीमत् संग्रामगुप्त देवपाद प्रवर्द्धमान विजयराज्ये ५. सप्तदश सम्वत्सरे कार्तिक कृष्ण नवम्यां तिथौ श्री मज्जयस्कन्धवारात् अयदेव महाराजाधिराज महामाण्डलिक श्रीमत् संग्रामगुप्त देवोविजयी....६.७.महासान्धिविग्रहिक, महाव्यूहपति महाधिकारिक, महामुद्राधिकारिक महामत्तक, महापीलुपति, महासाधनिक, महाक्षपटलिक, महाप्रतिहार, महाधर्माधिकरणिक, महाकरणाध्यक्ष, ८. वार्तिनैबन्धिक, महाकटुक, महौत्थिक, तासनिक, महादण्डनायक, महादानिक, महापंचकुलिक, महासामंतराणक, महाश्रेष्ठिदानिक, धूलिदानिक, घट्टपाल, खण्डपाल, नरपति, गुल्मपति, ९. नौ बलव्यापृत गोमहिषवड़बाध्यक्ष राजपादोपजीविनी......११. ............समस्तपीड़ोपकर वर्ज्जितो अचाटभट प्रवेषो महतानुग्रहेण
       एहि अभिलेखमे शासन सम्बन्धी बहुतो एहेन शब्दक उल्लेख भेल अछि जकर विश्लेषण एखनो धरि फरिछाकेँ नहि भेल अछि। इ सभ अभिलेख हमर Selected Inscriptions Of Bihar मे प्रकाशित अछि।
आसीक (महिआहीक) पाथरलेख
जातो वंशे विल्व पंचाभिधाने धमाध्यक्षो वर्द्धमान भवेशात्। देवास्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रा रूढ़ँ कृत्वाऽस्थापय द्वैन तेयम्। एहिमे नैयायिक वर्द्धमानक उल्लेख भेल अछि।
तिलकेश्वरगढ़क अभिलेख
       अब्देनेत्र शशांकपक्ष गणिते श्री लक्ष्मणाक्ष्मपतेर्मासि श्रावण संज्ञकेँ मुनि तिथौ र्त्वात्यांगुरुउशोभने। हावीपतन संज्ञकेँ सुबिदिते हैहट्टदेवी शिवा कर्मादित्य सुमंव्रिणेह विहिता सौभाग्य देव्याज्ञा
       एहि अभिलेखमे रानी सौभाग्य देवी, मंत्री कर्मादित्यक उल्लेख संगहि हैहट्ट भगवतीक उल्लेख सेहो भेल अछि।
खोजपुरक अभिलेख
       एक महत्वपूर्ण अभिलेख खोजपुरक दुर्गाक मूर्त्तिपर अछि जाहिमे ल.स.१४७क उल्लेख भेल अछि आ ओर मदनकपुत्र सूर्यकरक नाम सेहो उल्लिखित अछि।
कन्दाहाक अभिलेख
       कन्दाहा अभिलेखक उल्लेख पूर्वहि राजनैतिक इतिहासमे भए चुकल अछि। स्मरणीय अछि जे एहि अभिलेखमे विल्वपंचकुलोद्भुत् शब्द व्यवहृत अछि जे वर्द्धमानक आसीक अभिलेखमे अछि।
भगीरथपुरक अभिलेख
       पांति १. स्नुषाहरिनारायण क्षितिपतेर्ग्गतेः क्ष्माभृतां बधूर्न्नृपतिमण्डली। महितराम भूमीपतेः २. द्विजोत्तम सुखप्रदानृपति कंसनारायण प्रवीरजननीमुदा मठमधीकरत सुन्दरम्। ३. दानैर्य्या दलयाम्बभूवँ जगतां दारिद्रयमत्युत्कटं कीर्त्यायाः सुन्दर तरान् लोकांश्चकारायुतान। ४. किञ्चोच्चैर्व्विनयान्नयाश्च वशतां नीतोयया बान्धवाः सेयं विश्वविलक्षणोज्जवल गुणग्रामा मठं निर्ममे। ५. वेदरन्ध्रहरनेत्र चिन्हिते लक्ष्मणस्य नृपतेर्म्म तेब्दके। विश्वविश्रु तगुणागुणालयं देवतालय मर्मुमुदाऽकरोत। ६. कविता माधव सुकवे: कीतिदेव्‍या: सुघाम्‍बुधि स्‍फीता। त्रिभुवन भुवना भोगेः विलसुत कल्‍पान्‍त पर्यन्‍तम्।। ७. देवी देवलयमियममु कारयामास कृच्‍छे भक्‍त्‍या नक्‍तं दिनमथमति.....क्ता। यैषां शेषे जगति जागतिनाथ नायस्य योषा भूषा भूता विविध विधया रुपनारायणस्‍य। ८. धन्‍वा का कीर्तिरष्या कुलधर कविता कीर्तनीयानुमत्‍या लक्ष्‍मी: सा कापि लक्ष्‍मीधरमुपगता साधवारधनाया। सूनुज्जिययान् यदीयो यवनपयि भयाधाकस्‍तीरभुक्तौ राजा राजाधिराज: समर:.....स: कंसनारारौ सौ.....श्रीमदनुमतिदेवी नामाज्ञया: मिथिलाक राजनैतिक एवं सांस्‍कृतिक इतिहासक दृष्टिकोणसँ इ अभिलेख बड्ड महत्‍वपूर्ण अछि।
श्रीनगर (मघेपुरा)क अभिलेख
मगरध्‍वज योगी ७०० इयह अभिलेख एकटा अन्‍धराठाड़ीमे सेहो अछि।
वरांटपुर (सहरसा)क अभिलेख
श्रीमन्‍माहेश्‍वरी वरलब्‍ध सत्क्रिया विराजमान बुद्धेश वंशस्‍य सदा चन्‍द्रराज श्रीमत् सर्व्‍वसिंहदेव विजयी
लदहोद विष्णुमूर्त्तिक पादुका लेख
(एखनधरि अप्रकाशित छल) श्रीरामनाथ राजन्यो विष्‍णु: सेवक सेवक: स्‍वरेर देव तलयो विष्‍णुर्नाम करिष्‍यति।
       मिथिलामे एखनो असंख्‍य लेख सब चारुकात छिड़िआएल पड़ल अछि तैँ प्रत्‍येक मैथिलक इ कर्तव्‍य होइछ जे ओ लोकनि एहि दिसि ध्‍यान दऽ ओकर संग्रह करथि। जे शिलालेख सब राजनैतिक इतिहासवाला खण्‍डमे छपि चुकल छल से एहिठाम नहि देल गेल अछि।
१० मिथिलासँ प्राप्‍त किछु मुस्लिम-अभिलेख
(i) महेशवारा (बेगूसराय)सँ प्राप्‍त १२०९ई. एकटा अरबी शिलालेख १६५५मे प्राप्‍त भेल जे भण्‍डारकर शोघसंस्‍थान (१९५६)मे प्रकशित भेल अछि। एहिमे भवन बनेबाक उल्‍लेख अछि। इ लेख बंगाल सुलतान रुकबुद्दीन कैकाउसक समय थिक। (ii) तुगलककालीन वेदीवन (चम्‍पारण) अभिलेख १. तमाम शुद इन हलकात-उल-अक्‍ताव-उल अकवर २. दर अहाद इसहान शाह-इ-आदिल शाह मुहम्‍मद ३. बिन तुगलक शाह लजलामुकोहुब दौलतहु ४. अनाम बजैल इज्‍जुद दौलत वद्दीन ५. काजी-इ-मुहर खासब जिकरुल्लाह बकर ६. वोएन वन्‍दाह महमुद विनुयुसुफ अलमुलकावा ९. विष्‍टुम मह-इ-रबिउल अब्‍वल सनत सब ब अरबीनव सब मयत
       वेदीवन अभिलेख बड्ड महत्‍वपूर्ण अछि। हिन्‍दू लोकनि बहुत दिनधरि एकरा भगवानक चरणापाद कहि पूजा करइत रहथि। इ शिलालेख महमुद तुगलक कालक थिक (हिजरी ७४७-१३४६ ई.) एहिसँ निश्चित रुपे प्रतीत होइछ जे १३४६मे चम्‍पारण धरि शासनक प्रमाण भेटइयै।
दरभंगासँ प्राप्‍त मुहम्‍मद तुगलकक अभिलेख      
       कल्ललाह ओतलमनजा विलहसनत फलहु अश्र अम्‍सलह बिन मस्जिद अलमुजाहिद फी साबीलिल्लाह मुहम्‍मद बिन अस-सुल्‍लान अस सइद इस शहीद इल गाजी गियासुद्दुनिया वद्दीन अनरुल्लाह बुरहानहु इज सोयलत अन तारिख-इ-बेन एही फकुल हवाल मस्जिद अल अक्‍स फिसानत इ सित ब इशरीन बसबा मयात अल हिजारिया उन नबुब: ७२६-इ अभिलेख मुल्ला तकियाक बयाजमे सुरक्षित अछि आओर पटनाक मासिर पत्रिका मे छपल छल (१९४६ ई.मे)।  अभिलेखसँ इ प्रतीत होइछ जे महम्‍मद तुगलकक आदेशानुसार दरभंगामे एकटा विशाल मस्जिद हिजरी ७२६मे बनल छल। हरिसिंहदेव पराजित भऽ चुकल छलाह। तुगलक-कालीन दूटा सिक्का सेहो भेटल अछि जाहिपर तुगलकपुर उर्फ तिरहुत लिखल अछि।
दरभंगासँ प्राप्‍त इब्राहिमशाह शार्कीक अभिलेख
       कलन नबिया सल्‍लालाटु अलैहावसल्लम मम बिन मस्जिद अल्‍लाह बिनल्लाह लहु वैतन फिल जन्नत ही विन हजल मस्जिद फी जमनल इमाम नायव-उलखलीफा अमीरुल मुमीनीन अबुल फतह इब्राहिम शाह अस सुलतान खलदह खिलाफत तहु सनत खस व समन मयत ८०५ई. अभिलेख बहुत महत्‍वपूर्ण अछि कारण (८०५-१४०२-३) इब्राहिमशाहक लेख मिथिलाक केन्‍द्रमे भेटल अछि आओर एहिसँ प्रमाणित होइछ जे शर्की लोकनि दरभंगापर अधिकार प्राप्‍त कएने छलाह-ओहि वर्ष दरभंगा बा‍टे इब्राहिमशाह बंगाल जाइत छलाह आओर हुनक उद्देश्‍य छल शिवसिहकेँ परास्‍त करब कारण शिवसिंह बंगालक राजा गणेशक साहाय्य कऽ रहल छलथिन्‍ह। एहि सम्‍बन्‍धमे प्रो. अस्‍करीक लेख Bengal Past and Present मे छपल अछि।
बंगाल सुलतान नसीर शाहक अभिलेख
(बेगूसराय-मटिहानीसँ प्राप्‍त)
       बिसमिल्लाह इर रहमान दूर रहिम नसरुन मीनल्लाह ब फथुन करीब। हजल मस्जिद अल जमायउल मुअज्‍जम नसीरशाह अस सुलतान खल्ल दल्लह वो मुलकहु व सलन्‍तहु।
       इ ओहि नसीरशाहक अभिलेख थिक जे मिथिलाक ओइनवार वंशक अन्तिम शासककेँ पराजित कएने छलाह।
       इहो अभिलेख आव परसियन आ अरेबिक इन्‍सक्रिपसन्स आफ बिहार’’मे छपल अछि।
                                 
परिशिष्‍ट

१२३४-३६ ई.क मध्‍य तिव्‍वतसँ एक यात्री आएल छलाह जनिक भारतीय नाम धर्मस्‍वामी छलन्हि। ओ तिरहुतमे कर्णाट राजा रामसिंहदेवसँ भेंट कएने छलाह आ ओर रामसिंहदेवक कालीन मिथिलाक बहुत सुन्‍दर वर्णन एहिमे अछि। धर्मस्‍वामीक जीवनीक सम्‍पादन प्रसिद्ध रूसी विद्वान डा. जी. रोयरिक कहने छथि आ ओर एकर प्रकाशन पटना स्थित काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्‍थानसँ प्रकाशित भेल अछि। हम ओहि पोथीमेसँ किछु ओहन अंश एहिठाम दऽ रहल छी जाहिसँ तत्‍कालीन मिथिलापर प्रकाश पड़ैछ:
       P. ५८.- In this Country (Tirhut) there was a town called PA.-TA, which had some ६००,०० houses and was surrounded by seven walls…..outside of the town walls stood the Raja’s palace which had eleven large gates and was surrounded by twentyone ditches filled with water and rows of trees. There were three gates facing each direction, East, West and South, and two gates facing North………guards were stationed, more than ten archers at each bridge. These protective measures were due to the fear of the Turushkas…….who during the year had led an army but failed to reach it. It was also said that there were three men experts in swordsmanship. The Raja owned a she-elephent. P. ६०– Ma-hes (महिंसक उल्लेख)non-Budddhist kingdom of Tirhut. P. ६१-uninhabited border of Vaisali. There exists a miraculous stone image of the Arya Tara with her head and body turned towards the left, foot placed flat, and the right foot turned side ways the right head in the varmudra and the left hand holding the symbol by the Three Jewels in front of the heart…….they were told that the inhabitants were in a state of great commotion and panickstriken because of rumours of Turushka troops. P. ६२- When they had reached the Vaisali, all the inhabitants had fled at dawn from fear of the Turushka soldiery …….the soldiery left for western India P.९८- According to Dharmaswami one pana equalled to eighty Cowries……At that time he was in possession of an extraordinary manuscript.
       P. ९९-….the owner of the house stole the book-fell ill in Trihut (on his return Journey)- The tantric treated me-and I did not die…..The Tantric appears to have been a manifestation of the four. Armed Protector.
       P.१००……he was told that the Raja or the Pata city was coming to the sheet corner, The Raja was accompanied by a crowd of drummers and dancers with banners, buntings, brandishing fans and sounding conches and various musical instruments All the house tops and street corners were ever hung with silk trappings. The Raja named Ramasimha was coming riding on a she elephant, sitting on a throne adorned with precious stones and furnished with an ornamented curtain. The Dharmaswamin received an invitation from the Minisiter who said “please come! If you do not come in person the Raja will punish you. The Raja comes to the sheet corner only once a year, and there is a pageant. The minister sent a sedan chair (Doli) for the Dharamaswamin, who went to meet the Raja. The Dharamaswamin greeted the Raja in Sanskrit slokas and the Raja was very much pleased and presented the Dharamswamin with some gold, a roll of cloth, numerous medicines, rice, and many excellent offerings and reauested the Dharamswamin to become his chaplain but the Dharamswamin replied that it was improper for him, a Buddhist, to become the Guru of a non-Buddhist. The Raja accepted it, and said “well stay here for some days”. The Dharamswamin said that the Raja honourd him with mumerous requisites, P.१०१-Among the laxge gathering of people in the town of  PA-TA in Tirhut, the Dharamswamin met with some Nepalese whom he had met previously.
       एहि पोथीसँ मिथिलाक सांस्‍कृतिक जीवनपर बड्ड प्रकाश पड़इत अछि। एहि पोथीमे जे वैवर्त लिपिक उल्‍लेख अछि सैह आधुनिक मैथिलीक लिपि थिक।
       शिल्‍पशास्‍त्र, चिकित्‍सा, दर्शन, व्‍याकरण, न्‍याय, मण्‍डल इत्‍यादिक अध्‍ययन ओहि युगमे होइत छल।
       कालिदास सम्‍बन्‍धी किंवदन्‍ती एहि पोथीमे अछि आओर चन्‍द्रकीर्ति आओर चन्‍द्रगोमिनक शास्‍त्रार्थक चर्चा सेहो। पटकेँ डा. अल्‍तेकर सिमराँगढ़ मानने छथि जे हमरो मान्‍य अछि। एहि आधारपर आब जँ ओतए उत्‍खनन होअए तँ बड्ड लाभदायक होएत।
       तिरहुतमे तान्त्रिक चर्च अछि। एक चरित्रहीन एवं हठी स्‍त्रीक उल्‍लेख सेहो अछि।
एहिसँ लक्ष्‍मणसेन सम्‍वत् सम्‍बन्‍धी अध्‍ययनमे साहाय्य भेटइत अछि। मिथिलामे कुसियारक खेती खूब होइत छल। काली मंदिरक समक्ष बलिदानक प्रथा छल। छूआछूतक प्रथा छल आओर अछूत लोकनि अपन कान नहि छेदबइत छलाह। अछूतसँ देखला वा छूअल अन्न पैघ वर्णक लोक नहि खाइत छलाह। पान खेबाक प्रथा छल आओर मैथिल लोकनि ताम्‍बुल विन्‍यासमे प्रवीण छलाह। खुरचन डोकाक चून बनइत छल आओर ओहिमे कैक प्रकारक सुगन्धित मशाला सेहो मिलाओल जाइत छल। भीजल कपड़ामे पान लगाकेँ राखल जाइत छल। दाँत रंगबाक हेतु सुरतीक व्‍यवहार होइत छल। टाकाक प्रचलन छल आओर एक पण ७०कौड़ीक बराबर होइत छल।

परिशिष्‍ट
प्राकृतपैंगलम् आ मैथिली

मैथिली भाषा आओर साहित्‍यक स्‍थान भारतीय भाषा मध्‍य महत्‍वपूर्ण छैक। कलकत्ताक मैथिली संघ द्वारा प्रकाशित विद्यापति-पर्व अंकक १९६१क अंकमे हमर एक निबन्‍ध प्रकाशित भेल अछि; प्राक् विद्यापति कालीन मैथिली। जाहिमे हम मैथिलीक प्राचीनतापर अपन विचार संक्षेपमे रखने छी तैं ओकरा एतए दोहराएब उचित नहि बुझना जाइत अछि मैथिली लिपिक प्राचीनक सबसँ पैघ प्रमाण इएह जे ललित विस्‍तरमे एकर उल्‍लेख अछि; आदित्‍यसेन (सातम शताब्‍द)क अभिलेख एहि लिपिमे अछि, धर्मस्वामीन एकर उल्‍लेख वैवर्त लिपिक नामे कएने छथि; ल. स. ६९क एक माटिक मुद्रापर मिथिलाक्षर लिखल भेटल अछि; खोजपुर (दरभंगा)सँ ल. सं. २४७क। एकर अतिरिक्त मिथिलासँ जतेक अभिलेख आओर सिक्‍का लेख भेटल अछि सब मैथिली लिपिमे अछि- तैँ एकर वैज्ञानिक अध्‍ययनक आवश्‍यकता। मित्रवर आचार्य परमानन्‍द शास्त्री मैथिली लिपिक वैज्ञानिक अध्‍ययन मिथिलामिहिरक पृष्‍ठक माध्‍यमसँ प्रस्‍तुत कएने छथि जे स्‍तुत्‍य अछि। अकबरकालीन मिथिलाक्षरक एक अभिलेख एखन हालहिमे गोड्डा (संताल परगना)क एक मन्दिरसँ प्राप्‍त भेल अछि आओर ओकर प्रतिलिपि काशीप्रसाद जायवाल संस्‍थान, पटनामे सुरक्षित अछि।
        लिपिक संगहि मैथिली भाषा सेहो बड्ड प्रचीन अछि आओर सिद्ध लोकनिक भाषा एकर सबसँ पैघ प्रमारण थीक। तिब्‍बती बौद्धधर्मक प्रसिद्ध रूसी विद्वान वसिलज्‍यु (Wassilijeu) अपन एक लेखमे एकठाम लिखने छथि जे सिद्ध कवि लोकनि अपन-अपन मातृभाषामे गीत लिखने छलाह। साहित्‍य निश्चित रुपेँ ज्‍योतिरीश्‍वरक पूर्वहि एक निश्चित शैलीपर पहुँच चुकल छल अन्यथा लोरिक सन वीरकाव्‍य अथवा वर्णरत्‍नाकर सन् महान् ग्रन्‍थक रचना तँ हठात् नहिए भऽ गेल। डा. जयकान्‍त मिश्रक History of Maithili literature क प्रथम भागमे बहुतो एहेन विद्वान आओर ग्रंथ अछि जकर उल्लेख नहि भेल अछि आओर जे मूल रूपसँ मैथिलीक अंग थिक। हमरा विश्‍वास अछि जे ओ अपन भविष्‍यक संस्‍करणमे एहि सबहक अपना पोथीमे अवश्‍य स्‍थान देथिन्‍ह। प्राकृत-पैंगलम्क उल्‍लेख डा. मिश्र कतहु नहि कएने छथि आ ने कृष्‍णदत्त मैथिलक। (कृष्‍णदत्त मैथिलपर देखु हमर लेख जे Journal of the Bihar Research Society मे छपल अछि। बंगला भाषाक सुप्रसिद्ध विद्वान आओर प्रसिद्ध भाषा विद्वान डा. श्रीकुमार बनर्जी History of Maithili Literature क आलोचना करैत सेहो अइ-कमीक उल्‍लेख कएने छथि (द्रष्‍टव्‍य Jouranl of the Asiatic Society of Bengal XVI Letters-p. २६९) प्राकृतपैंगलमक संबन्‍धमे इ स्मरण राखब आवश्‍यक जे एकर भाषा प्राय: ओएह थिक जे विद्यापतिक कीर्तिलता आओर कीर्तिपताकाक भाषा छथि तथा एहि ग्रंथक रचनामे (गीत सभहिक संग्रह पूर्वी भारतमे भेल छल।) महामंत्री चण्डेश्‍वरक प्रशस्तिमे बनाओल दूटा गीत सेहो अछि आओर एकर बनौनि‍हार छलाह चण्डेश्वरक अधीनस्‍थ सामन्‍त हरिब्रह्म प्राकृतपैंगलममे कतोक शताब्दक भाषाक परिचय भेटइत अछि आओर ओहिमे जतवा जे प्रयोग भेला अछि से मूलत: मैथिली प्रयोगसँ मिलैत-जुलैत अछि। सिद्धगानपर जतेक लोक सब माथापच्ची कएने छथि ततवे जँ प्राकृतपैंगलममे एहुखन कएल जाए तँ मैथिलीक बड्ड उपकार होएत। डा. सुभ्रद झा कबीरकेँ मैथिल सिद्ध करबाक बीड़ा तँ उठौलन्हि (देखु Journal of the Bihar University) (हुनक लेख) मुदा प्राकृत-पैंगलम् जे शुद्ध मैथिलीक वस्‍तु थिक, ताहिपर कोनो विशिष्‍ट ध्‍यान नहि देलन्हि। एकर प्रमाण एहिसँ बुझना जाइत अछि जे ओ अपन प्रसिद्ध पोथी Formation of Maithili Language मे एहि ग्रन्‍थक बड्ड कम चर्च कएने छथि।
डा. सुभद्र झाक पोथीसँ किछु अंश हम पाठकक हेतु उद्धृत् कऽ रहल छी:
       पृ.४1-The Prakritpainglam gives  an example to several metres and verses which may be said to have been composed in proto-Maithili..... there is nothing in them that may prevent them being called Maithili of an early period…..
पृ.४२-The language of the Charyas Sarvananda, Prakritpainglam, Kirtilata and Kirtipataka represent Maithili of the oldest period in as much as it preserves some of the Apabhramsa characteristics’.
       पोथीक दाम ततेक छन्हि जे केयो साधारण मै‍थिल पाठक एकरा कीनिकए नहि पढ़ि सकैछ। एतबा कहितो इ प्राकृतपैंगलमपर विशेष ध्‍यान नहि देने छथि। एहि पोथीक आलोचना जे हालहिमे छपल अछि लण्डनमे से उत्‍साहवर्द्धक नहि कहल जा सकैछ। भाषा आओर अन्‍यान्य समस्‍याक अध्‍ययनक हेतु आओर देखू राहूलजीक हिन्‍दी काव्‍य-धारा जाहिमे एहि सभ वस्‍तुक विशद् विश्‍लेषण भेल अछि। प्राकृत- पैंगलममे मिथिलाक इतिहासक सम्‍बन्‍धी सेहो बहुत सटीक बात सब लिखल अछि (देखू-हमरे लेख- Prakrtapainglam–an important source for the study of the History of Mithila) प्राकृत-पैंगलमक दूटा संस्‍करण हमरा बूझल अछि (i) सी. एम. घोष द्वारा सम्पादित एवं विव्लियोथिका इन्डिका सीरीज, कलकत्तासँ प्रकाशित १९०२ई.मे प्राकृत-पैंगलम् आओर (ii) एम्‍हर हालहिमे हिन्‍दीमे एकर एक संस्‍करण दिल्‍लीसँ प्रकाशित भेल अछि।
       एहि सम्‍बन्‍धमे हरिवंश कोछड़क अपभ्रंश साहित्‍यक अध्‍ययन आवश्‍यक बुझना जाइत अछि। प्राकृतपैंगलम्पर प्रो. एस. एन, घोषालक बहुतो लेख अंग्रेजीमे भारतवर्षक विभिन्न शोधपत्रिकामे प्रकाशित भेल छन्हि। एहिठाम प्राकृतपैंगलम्सँ हम थोड़ेक ओहन शब्‍दक संचय कएने छी जकर रूप शुद्ध मैथिलीक अछि एहि हेतु जे केओ १४म शताब्‍दक मैथिली शब्‍द देखए चाहथि से डा. उमेश मिश्रक लेख JBORS-XIV पृष्‍ठ २६६-२७३मे देखि सकइत छथि। हम अपन प्राकृत-विद्यापति वाला लेखक इ एकटा पद सेहो प्राकृतपैंगलमसँ देने छी जाहिसँ सिद्ध होइछ जे इ मैथिली थिक। स्‍थानाभावक कारण एकर विश्‍लेषण एहिठाम संभव नहि।

परिशिष्‍ट१०
मिथिलाक प्राचीन सीमा जनबार श्रोत

(i) मिथिलास्‍थ: योगीन्‍द्र: सम्‍यग् ध्‍यात्‍वा ब्रवीन मुनीन्। यस्मिन देशे मृग: कृष्‍णस्तस्मिन् धर्मान् निबोधयत् (याज्ञवल्‍क्‍यस्‍मृति-आचार १२)
(ii) डा. उमेश मिश्र द्वारा सम्‍पादित विद्याकरसहस्‍त्रक पृ.१४७मे क लिखल अछि; जाता स यत्र सीता सरिदम यत्रपुण्या। यत्रास्‍ते सन्निधाने सुरनगरनदी भैरवौ यत्र लिङ्गम्। मीमांसा-न्‍याय-वेदाध्‍ययन- पटुतरैः पण्डितैपण्डिरतायासाया भूदेवो यत्र भूपो यजनवसुमती सास्तिमे तीरभुक्तिः
(iii) त्रिकाण्डशेषकोष
(a) गण्‍डकी तीरमारभ्‍य चम्‍पारण्‍यान्‍तकं शिवे: विदेहभू: समाख्‍याता तीर-भुक्तमिधो मनुः। (आओर देखु-शक्तिसंगमसूत्र (b) प्राग्‍ज्‍योतिष: कामरुपे तीरभुक्तिस्‍तु लिच्‍छविः (पृष्‍ठ ५६)
(iv) काठकसंहिता- xiii,४- इन्‍द्रो वै वृत्रमहस्‍तं हस्‍तस्‍सप्तभिर्भोगै: पर्यहंस्‍तस्‍य मूर्ध्नो वैदेहीरुदायंस्‍ता: प्राचीरायंस्तस्माताः पुरस्‍य जघन्‍यमृषयं वैदेहमनुद्यान्‍तममन्‍यतेममिदानी मालभेय तेन त्‍वा इतो मुच्‍येयेति
(v) वायुपुराण (८८-३०६)
मिथिर्नाम महा‍वीर्यो येनासौ मिथिलाऽभवत्
(vi) शब्‍दकल्‍पद्रुम-७२३-विदेहा मिथिला प्रोक्ता
(vii) लिङ्गपुराण-तीर-भुक्ति प्रदेशे तु हलावत्ते हलेश्‍वर:।
(viii) चन्‍दा झा-गंगा बहति जनिक दक्षिण दिसि पूर्व कौशिकी धारा पश्चिम बहति गणडकी उत्तरहिमवत बलविस्‍तारा कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा वागमती कृतसारा मध्‍य वहत लक्ष्‍मणा प्रभृति से मिथिला विद्यागारा
(ix) राजनैतिक इतिहासक पाद टिप्‍पणी मे बहुत किछु लिखल जा चुकल अछि आओर देखू- IHQ -XXXV.No..
(x) प्रवचनो सारोद्धार आओर विविध तीर्थकल्‍पमे विदेह जनपदक राजधानी मिथिला कहल गेल अछि। एकर सीमा पूर्वसँ पश्चिम १८० मील आओर उत्तरसँ दक्षिण १२५कहल गेल अछि। निरयावलियाओमे मिथिलाक राजधानी वैशाली कहल गेल अछि।
    
                                  
                          

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