Wednesday, April 14, 2010

'विदेह' ५५ म अंक ०१ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५५)- PART VII


बालानां कृते-
जगदीश प्रसाद मंडल
किछु प्रेरक कथा
81    सद्गृहस्त
      एकटा गृहस्त छला। संयम स जीवन-यापन करैत छला। परिवार कऽ सुसंस्कारी बनबै मे सदिखन लागल रहैत। नीतिपूर्वक आजीविका स जिनगी बितबैत। परिवारक काज आ खर्च स जे समय आ धन बँचैत छलनि ओ परमार्थ मे लगबैत। ओ गृहस्त कहियो तपोभूमि नहि गेलाह मुदा घरे मे तपोवन बना नेने छलाह। देवतो खुशी रहैत छलथिन।
      एक दिन गृहस्तक क्रिया सऽ खुशी भऽ इन्द्र आबि बर मांगैक लेल कहलखिन। गृहस्त असमंजस मे पड़ि गेला जे की मंगबनि। जखन असंतोषे नहि तखन अभावे कथीक? स्वाभिमानी गमौलाक उपरान्ते क्यो ककरो स किछु पबैत अछि। ई बात सोचि गृहस्त मने-मन विचारै लगलाह जे जहि स ऋृणो-भार नहि हुअए आ देवतो अपमान नहि बुझति। बड़ी काल धरि सोचैत-विचारैत गृहस्त मंगलकनि- हमर छाया जतै पड़ै ओतए कल्याणक बरखा होय।
      इन्द्र वरदान तऽ दऽ देलखिन मुदा अचंभित भऽ गृहस्त स पूछलखिन- हाथ  रखला पर कल्याणों होइत आ आनंदो प्रशंसो आ प्रत्युपकारक संभवनो होइत। मुदा छाया स कल्याण भेलो पर लाभ स बंचित रहै पड़ैत। तखन ऐहन विचित्र वर किऐक मंगलहुँ?    
      मुस्कुराइत गृहस्त कहलखिन- देव! सोझावलाक कल्याण भेने अपना मे अहंकार पनपैत अछि। जहि स साधना मे बाधा उपस्थिति होइत। छाया ककरा पर पड़ल के कत्ते लाभन्वित भेल ई पता नइ लगब जीवनक लेल श्रेयस्कर थिक।
      साधनाक यैह रुप पैघ होइत। यैह क्रम प्रगतिक रास्ता पर चलैत-चलैत व्यक्ति महामानव बनैत अछि।

 82   सद्भाव
      अपन शिष्यक संग महात्मा ईसा कतौ जाइत रहथि। साँझ पड़ि गेलै। राति बितवैक लेल एकठाम ठहरि गेला। संग मे पाँचे टा रोटी खाइ ले छलनि। रोटीक हिसाबे खेनिहार अधिक तेँ सभकेँ पेट भरब कठिन। अपना मे शिष्य सब यैह गप-सप करैत। ईसो सुनलखिन। मुस्कुराइत ईसा कहलखिन- सब रोटी कऽ टुकड़ी-टुकड़ी तोड़ि एकठाम कऽ लिअ आ चारु भाग स सभ बैसि खाउ। जहि स सभकेँ एक रंग भोजन भेटि जायत।
      महात्मा ईसाक विचार मानि सभ सैह केलक। संतोषक जन्म सभक हृदय मे भऽ गेलैक। सभ केयो खायब शुरु केलक। रोटी सठैत-सठैत सभक पेटो भरि गेलैक। तखन एकटा शिष्य बाजल- ई गुरुदेवक चमत्कार छिअनि।
      शिष्यक बात सुनि ईसा कहलखिन- ई अहाँ लोकनिक सद्भावक सहकार थिक नहि की चमत्कार। अगर अहाँ सभ अपना मे छीना-झपटी करितहुँ त ई संभव नहि होइत। जहिठाम सद्भाव स परिवारक संबंध होइत तहिठाम एहिना प्रभुक अयाचित सहयोग भेटैत अछि।

 83   आलस्य वनाम पिशाच
      वन विहार करैक लेल वासुदेव बलदेव आ सात्यकि घोड़ा पर चढ़ि निकललाह। घनघोर जंगल रहने तीनू गोटे रास्ता मे भटकि गेला जाइत-जाइत ऐहन सघन बन मे पहुँच गेलथि जहिठाम सऽ ने पाछू होएब बननि आ ने आगू बढ़ब। मुन्हारि साँझ भ गेलै। अन्हार मे चलब आरो कठिन भऽ गेलनि। अचताइत-पचताइत तीनू गोटे अटकि गेला। एकटा  झमटगर गाछ छलैक जहिक तर (निच्चा) मे घोड़ा बान्हि तीनू गोटे राति बितबैक कार्यक्रम बनौलनि। खाइ-पीबै ले किछु रहबे ने करनि तेँ गाछेक निच्चा मे दूबि पर सुतैक ओरियान केलनि। मुदा मन मे शंका होइत रहनि जे जँ तीनू गोटे सुति रहब आ घोड़ा कियो खोलि कऽ ल जाय? तीनू गोटे बिचारलनि जे एक-एक पहर जागि अपनो आ घोड़ोक ओगरवाही कऽ लेब आ सुतियो लेब।
      पहरा करैक पहिल पारी सात्यकिक भेल। वासुदेव आ बलदेव सुति रहला। सात्यकि जगल रहल। थोड़े खानक बाद गाछ पर स पिशाच उतड़ि सात्यकिक संग मल्लयुद्ध करैक लेल ललकारलक। ओहने उत्तर सात्यकियो देलक। दुनूक बीच घुस्सा-घुस्सी हुअए लगल। सैाँसे पहर दुनूक बीच मल्लयुद्ध होइते रहल। कते ठाम सात्यकिक देह मे चोटो लगलैक। छालो ओदरलै। पहर बीति गेल।
      दोसर पारी बलदेवक आयल। सात्यकि सुति रहल। बलदेव पहरा करै लगल। थोड़े कालक बाद पिशाच पुुनः आबि चुनौती देलकनि। बलदेवो ओहने उत्तर देलखिन। पिशाचक आकार सेहो नमहर भ गेल छलै। दुनूक बीच मल्लयुद्ध शुरु भेल। बलदेवो केँ पिशाच दुरगति क देलकनि। दोसरो पहर बीतल। तेसर पहरक पारी वासुदेवक छलनि। पुनः पिशाच आबि हुनको चुनौती देलकनि। मुदा वासुदेव हँसवो करति आ कहबो करथिन- बड़ मजगर अहाँ छी। निन्न आ आलस स बँचैक लेल मित्र जेँका मखौल करै छी।
      पिशाचक बल घटै लगलै। आकारो छोट होइत गेलै। भिनसर भेल। नित्यकर्म स तीनू गोटे निवृत्ति भ चलैक तैयारी करै लगलथि। तखन सात्यकि आ बलदेव अपन रौतुका चरचा करैत जतऽ-जतऽ चोट लगल रहनि सेहो देखोलखिन। हँसैत वासुदेव कहलखिन- ई पिशाच आरो किछु नहि थिक। ई मात्र कुसंस्कार रुपी क्रोध छी। ओकरो ओहने प्रत्युत्तर भेटिलै तेँ बढ़ैत गेल। मुदा जखन ओकरा उपेक्षाक रुप मे देखलिऐक तखन ओ छोट आ दुर्बल भ गेल।
 84   स्वर्ग आ नर्क
      विद्यालयक ओसार पर बैसि गुरु आ शिष्य गप-सप करति रहथि। एकटा शिष्य गुरु स स्वर्ग आ नर्कक संबंध मे पूछलकनि। शिष्य कऽ बुझबैत गुरु कहै लगलखिन- स्वर्ग आ नर्क अही धरती पर अछि। जे कर्मक अनुसार अही जिनगी मे भेटैत छैक।
      गुरुक उत्तर स शिष्य संतुष्ट नहि भेल। शंका बनले रहलै। पुनः गुरु स अपन शंका व्यक्त केलक। गुरु बुझलनि जे बिना व्यवहारिक जिनगी देखौने शिष्य संतुष्ट नइ हैत। ओ (गुरु) उठि शिष्य सभ कऽ संग केने गाम दिशि विदा भेला।
      गाम मे एकटा बहेलियाक घर छलै।। ओहिठाम पहुँचते सभ देखलक जे पेट-पोसैक लेल बहेलिया जीव-हत्या कऽ रहल अछि। ततबे नहि जीब हत्यो केने ने देह पर वस्त्र छैक आ ने भरि पेट भोजन। धीयो-पुतोक देह पर माछी भिनकै छै। एको क्षण ओतै रहैक इच्छा ककरो नहि होय। चुपचाप गुरुजी शिष्यक संग ओतै स विदा भ गेला। दोसर ठाम पहुँचला। ओ वेश्याक घर छलै। युवावस्था मे ओ (बेश्या) खूब पाइयो कमेने छलि आ भोगो केने छलि। मुदा बुढ़ाढ़ी मे आबि अनेको रोगो स ग्रसित भ गेलि आ परिवारो-समाजो स तिरस्कृत भ गेलि। पेटक दुआरे भीख मंगैत छलि। सभ केयो (गुरु-शिष्य) देखि ओतै स विदा भ गेला।
      तेसर परिवार गृहस्तक छल। जहिठाम जा सभ देखलखिन जे गृहस्त जेहने संयमी छथि तेहने परिश्रमी। स्वभाव स उदार आ सद्गुणी सेहो छथि। जहि स परिवार सुख-समृद्धि स भरल-पूरल छलैक। गृहस्तक परिवार देखि गुरुजी शिष्यक संग आगू बढ़ि चारिम परिवार मे पहुँचल। पोखरिक मोहार पर एकटा संत कुटी बनौने रहथि। शिक्षा आ प्रेरणा पवैक लेल दिन-राति समाजक लोक अबैत-जाइत रहैत छल। संतजी मस्त-मौला जेँका जिनगी बितवैत। ने मन मे एक्को मिसिया क्रोध आ ने कोनो तरहक चिन्ता।
      चारु परिवार देखि शिष्यक संग गुरुजी विद्यालय दिशि चललाह। रास्ता मे शिष्य केँ कहलखिन- पहिल जे दुनू परिवार देखलिऐक ओ नरकक रुप मे छल आ बादक जे दुनू परिवार देखलिऐक ओ स्वर्गक रुप मे।
 85  यथार्थक बोध
      शिखिध्वज ब्रह्मज्ञानी बनै चाहति रहथि। ओ सुनने छलथि जे तियाग आ वैराग्य स मनुष्य ब्रह्मज्ञानी बनैत अछि। तेँ शिखिध्वज घर-परिवार छोड़ि जंगल मे कुटी बना रहै लगलथि। ओहि बन मे तपस्वी शतमन्यु सेहो रहैतछलथिन। शतमन्यु कऽ पता लगलनि जे एकटा नवांगतुक घर-परिवार छोड़ि कुटी बना रहैत अछि।
      शतमन्यु आबि शिखिध्वज केँ कहलखिन- गामक घर-गिरहस्ती  उजाड़ि बन मे वैह सब सरंजाम (रहैक व्यबस्था) जुटबै मे लागि गेलहुँ ताहि स की लाभ? बैराग्य त अहंता आ लिप्सा स हेबाक चाही। जँ भऽ सकै तऽ घरे मे तपोवन बना सकै छी।
      शतमन्युक विचार सुनि शिखिध्वज केँ वास्तविकताक बोध भऽ गेलनि। ओ घुरि कऽ घर आबि परिवारक बीच रहि सेवा-साधना मे जुटि गेला। शिखिघ्वज एकांकी मुक्तिक जगह सामूहिक मुक्तिक मार्ग अपनौलनि। हुनके वंश मे बाल्यखिल्य ऋृषि भेलखिन जे सैाँसे जम्बूद्वीप कऽ देवभूमि बना देलखिन।
86    विद्वताक मद
      एक दिन महाकवि माघ राजा भोजक संग वन-विहार कऽ घुमल अवैत रहथि। रास्ता मे एकटा झोपड़ी देखलखिन। ओहि झोपड़ी मे एकटा वृद्धा टोकरी (तकली) कटैत रहथि। ओहि वृद्धा स माघ पूछलखिन- ई रास्ता कत्ते जाइत अछि? बृद्धा माघ कऽ चीन्हि गेलीह। ओ हँसैत उत्तर देलखिन- वत्स! रास्ता त कतौ नहि जाइत अछि। जाइत अछि ओहि पर चलैवला राही। अहाँ सभ के छी?
  माघ- हम सभ यात्री छी।
  मुस्कुराइत वृद्धा बाजलि- तात्! यात्री त सुरुज आ चान दुइये टा छथि। जे दिन-राति चलैत रहति छथि।  सच-सच कहू जे अहाँ के छी?
  थोड़े चिन्तित होइत माघ कहलखिन- माँ! हम क्षणभंगुर आदमी छी।
  थोड़े गंभीर होइत पुनः वृद्धा कहलकनि- बेटा! यौवन आ धने टा क्षणभंगुर होइत। पुराण कहैत अछि जे एहि दुनूक बिसवास नहि करी।
  माघक चिन्ता आरो बढ़लनि। रोष मे कहलखिन- हम राजा छी। हुनका मन मे एलनि जे राजाक नाम लेला स ओ सहमि जयतीह। मुदा ओ वृद्धा निर्भीक भऽ उत्तर देलकनि- नई भाई अहाँ राजा कोना भऽ सकै छी? शास्त्र त दुइये टा राजा- यम आ इन्द्र मानने अछि।
87    श्रद्धा
      बच्चा मे स्वामी रामतीर्थ गामेक एकटा मौलवी सहाएव स पढ़ने रहथि। प्रारंभिक पढ़ाई पुरला उपरान्त पाठशाला मे नाम लिखौलनि। पाठशाला मे नाओ लिखबै स पहिने पिताक (रामतीर्थक) मन मे प्रश्न उठलनि जे मौलवी एहाएव केँ की देल जाइन। प्रश्न दू तरहक। पहिल जे उचित महीना (मजदूरी) आ दोसर ज्ञानक पुरस्कार। काजो दोसर जिनगी भरिक। पिताक चिन्तित मुद्रा देखि रातीर्थ पुछलखिन। पिता कहलखिन।
  पिताक बात सुनि रामतीर्थ कहलखिन। पिताक बात सुनि रामतीर्थ कहलखिन- पिता जी जहिना ओ (मौलवी सहाएव) हमरा ज्ञानक दूध पीबैक लेल देलनि तहिना हिनको दूध दइवाली बढ़िया गाय दऽ दिअनु।
      पिता सैह केलनि।
88    अनंत
हरि अनंत हरि कथा अनंता - तुलसी
      एक दिन भगवान बुद्ध आनंदक संग एकटा सघन बन स गुजरैत रहथि। रास्ता मे दुनू गोटेक बीच ज्ञानक चर्चा चलैत रहनि। आनंद पूछलखिन- देव अपने तऽ ज्ञानक भंडार छिअए। अपने जे जनैत छी ओ हमरा बुझा देलहुँ?
      आनंदक बात सुनि उलटि कऽ बुद्धदेव पूछलखिन- एहि जंगलक जमीन पर कते सुखल पत्ता पड़ल छै? हम जइ गाछक निच्चा मे ठाढ़ छी ओइ गाछ मे कते सुखल पात लागल छै? आ अपना सभक पाएरक निच्चा कते पड़ल छैक। सब मिला कते होएत?
      बुद्धदेवक प्रश्न स आनंद निरुत्तर भऽ गेलाह। आनंद कऽ उत्तर नहि दइत देखि तथागत कहलखिन- ज्ञानक विस्तार ओते अछि जते एहि वन प्रदेश मे सुखल पातक परिवार। अखन धरि हमहूँ एतबे बुझलौ हेँ जे जते वृक्षक उपर सुखल पात अछि। मुदा पाएरक निच्चा जे अछि ओ हमहूँ ने बुझै।

89    हँसैत लहास (मुरदा)
      जिनगी कऽ जिनगी बुझि मनुष्य कऽ जीबाक चाहिऐक। जँ से नहि भेलि त जिनगीक कोनो महत्व नहि जायत। जे कियो जिनगी कऽ कमेनाइ-खेनाइ धरि रखैत ओकर संस्कार मरलो पर ओहिना रहि जायत।
      एक दिन दू टा शव एक्के बेरि श्मशान पहुँचल। कठिआरीक लोक डाहैक ओरियान करै लगल। एकटा शव दोसर कऽ देखि ठहाका मारि हँसै लगल। हँसैत शव कऽ देखि दोसर शव पुछलक- बंधु ऐहन कोन बात भऽ गेल जे अहाँ हँसि रहल छी। जबकि दुनू गोटे एक्के स्थिति मे छी?
  हँसैत शव उत्तर देलक- बंधु अहाँ कऽ मन अछि की नाहि मुदा हमरा त मन अछि। दुनू गोटे संगे गामक स्कूल मे पढ़ने रही। पढ़लाक वाद अहाँ वणिक वृत्ति मे लगि दिन-राति पाइयेक हिसाबो आ भोग-बिलास मे लगि गेलहुँ। आब अहाँक ओहन स्थिति भऽ गेलि अछि जे श्मशानो घाट पर पाइयेक हिसाब आ भोगे-बिलासक गर लगबै छी।
      आओर अहाँ - दोसर पूछलक।
  पहिल- जाधरि जीवैत छलौ मस्त सऽ रहलौ। ने कहियो बेसी पाइक जरुरत भेलि आ ने तइ ले मन मे चिन्ता। जहिना चिन्ता मुक्त पहिने छलहुँ तहिना अखन छी। अच्छा आब ओहूँ जाउ आ हमहूँ जाइ छी। अछिया तैयार भऽ गेल। नमस्कार।
      कहि पहिल शव चिता दिशि बढ़ि गेल आ दोसर कनगुरिया ओंगरी पर हिसाब जोड़ै लगल।
90    अनगढ़ चेतना
      ज्ञान (विद्या) अनगढ़ चित्त कऽ सुगढ़ बनबैत। जहि स सोचै आ चलैक दिशा निर्धारित होइत। ओना मनुष्यक अनगढ़ता क प्राप्ति जन्मजात होइत। जहिना शरीरक रक्षाक लेल भोजनक प्रयोजन होइत तहिना मनुष्यता प्राप्त करैक लेल विद्याक।
      वशिष्ठ जी राम केँ भयंकर वन मे विचरण करैवला उनमत्तक आखिक देखल कथा सुनवैत कहलखिन- ओ (उनमत्त) देखै मे त निरोग (स्वस्थ) बुझि पड़ैत मुदा ओकर जे क्रिया-कलाप होइत ओ विल्कुल पागलक सद्श्य होइत। सदिखन रास्ताक व्यतिक्रम करैत। जहाँ-तहाँ बौआइलो घुमैत आ अन्ट-सन्ट रास्ता सेहो बनबैत। जहि स अपनो देह-हाथक नोकसान करैत आ काँट-कुश मे ओझराइलो रहैत। मुदा तइओ अपना कऽ बुद्धियार बुझि दोसराक नीको विचार कऽ मोजरो ने दइत। जहि स सदिखन भय चिन्ता स मन त्रस्त रहैत। मुदा तइयो ने अधलाह रस्ता छोडै़त आ ने ककरो नीक करैत।
      वशिष्ठक विचार सुनि राम पूछलखिन- भगवन! ओ उन्मादी कते रहैत अछि? ओकर नाओ की थिकैक आ ओकर कोनो उपचार छैक की नहि?
  वशिष्ठ- वत्स ओ कियो आन नहि मनुष्यक अनगढ़ चेतना छी। जे जाल मे फँसल ओहि चिड़ैक सदृश्य अछि जे मरैक रास्ता देखि फड़फड़ाइत त अछि मुदा निकलैक रस्ते ने देखैत।
 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.
मैथिलीमे भाषा सम्पादन पाठ्यक्रम
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वर्ड फाइलमे बोल्ड कएल रूप:  

1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेबबला, हेमबला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक
2. आ
/आऽ
3. क
लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल/लऽ/लय/लए
4. भ
गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर
गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय
,दिय,लिअ,दिय/
7. कर
बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/कबला / करए बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह
, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ
/ओऽ(सर्वनाम)
20. ओ (संयोजक) ओ
/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे
/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा
रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल
/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत
/ओत/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे
/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस

34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की
/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए
/कऽ/लए कए
47. ल
/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा
/करबाय/करबाए
60. त
/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै / माए
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द
/द ऽ/दए
67. (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका
कए तकाय तकाए
69. पैरे (
on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे


71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय/बननाइ
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि
  गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे

81. से/ के से
/के
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा

94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह / इएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(
in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (
play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (
different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (
understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग
 
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (
to test)चिखइत
126. करइयो(
willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा
/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग

141. खेलाइ (
for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो / केओ
145. केश (
hair)
146. केस (
court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल

155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना
/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो
रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के

169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा
(आगि लगा)
193. से से

194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(
spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा

201. देखाय देखा

202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/
216.जाऽ/जा
217.आऽ/
218.भऽ/भ
( फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (
come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (
conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)- (conjunction-and)/
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/होन्हि
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौँ/ ज्योँ
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कुनो/ कोनो
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि
२५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक
२६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित

२६५.केर/-/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जै
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जै/ जए
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट
२९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना)
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य
२९६.बेसी/ बेशी
२९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला)
२९८.बाली/ (बदलएबाली)
२९९.वार्त्ता/ वार्ता
300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय
३०१. लेमए/ लेबए
३०२.लमछुरका, नमछुरका
३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै)
३०३.लागल/ लगल
३०४.हबा/ हवा
३०५.राखलक/ रखलक
३०६.आ (come)/ आ (and)
३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप
३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि।
३०९.कहैत/ कहै
३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different)
३११.तागति/ ताकति
३१२.खराप/ खराब
३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि
३१४.जाठि/ जाइठ
३१५.कागज/ कागच
३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए)
३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय

उच्चारण निर्देश:
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य मे जीह तालुसँ , मे मूर्धासँ आ दन्त मे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोगगड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ  ऐछ
छथि- छ इ थ  – छैथ
पहुँचि- प हुँ इ च
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री  रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव  http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना
से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा।
पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए
छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- संजोगने
केँ- के / कऽ
केर- क (केर क प्रयोग नहि करू )
क (जेना रामक) रामक आ संगे राम के/  राम कऽ
सँ- सऽ
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ  रामकेँ- राम कऽ राम के

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन)
पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि)
ओइ/ ओहि
ओहिले/ ओहि लेल
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ/ जेकाँ
तँइ/ तैँ
होएत/ हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ
सौँसे
बड़/ बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि)
मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ।
एकटा दूटा (मुदा कैक टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ त नहि)
सँ ( सऽ स नहि)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)

३.नेपाल भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली


1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक  उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ,,, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक
धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि
, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर
,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन
,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा
,ठिना,ठमा
जेकर
, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ
, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल
, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। करगेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक
न्हध्वनिक स्थानमे लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4.
तथा ततय लिखल जाय जतस्पष्टतः अइतथा अउसदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह
,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे
के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व
वा प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ वा लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे
ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव
लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ
, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। मेमे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। क वैकल्पिक रूप केरराखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद
कयवा कएअव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग
, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध
ओ अर्द्ध क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ’ , ‘’, तथा क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय
, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क
लिखल जाय, हटा कनहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क
लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा कनहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा
' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

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