Friday, April 30, 2010

'विदेह' ५६ म अंक १५ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५६) Part III


३. पद्य






स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 0 मे भेलनि  पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |


!!
देसिल वयना क अस्तित्व!!

भुवनक सभ सॅ मिठगर वयना,
वेन जकॉ अहॉ वॉटि देलहुॅ ।
औ भलमानुष मिथिला नंदन,
मातृक देहक कुरी लगयलहुॅ ।
केओ दछिनाहा केओ तिरहुतिया,
केओ वज्जि - सरैसा केओ कोशिकन्हा ।
एक्के नादि मे सभ मधुर चखै छी,
तखन विलग अछि छान ओ पग्घा ।
कतछी हम सभ कतहमर मिथिला,
कतविदेह नोर खसवै छथि?
कतवैरागी वनि विद्यापति वैसल छथि,
कतसिया वेटी कुहरै छथि ?
अहॉ छी भलमानुष तरहू,
हम अधम मुदा छी मिथिला भाषी ।
अहॉ पढ़ू अंगरेजी, फ्रेंच, जपानी,
आन वयना वाजू घुमैत काशी ।
नहि अछि हमरा द्वेष अहॉ सॅ,
छोड़ू नहि अपन उत्थानक अवसरि ।
मुदा! द्रविड़, वंग गुजराती केॅ देखू,
हुनक वयना गेलनि आर्यावर्त मे पसरि ।
ओ नहि अपन भाखा केॅ छोड़लनि,
स्वभूमि हो वा हो प्रवास ।
नेना भुटका संग देसिल वयना वाजू,
जगाउ अगिला पिरही मे विश्वास ।
चन्दा सुमन यात्री मधुपक,
जुनि करू भावना पर अघात ।
दिवस निकट ओ आवि रहल अछि,
हेती मैथिली सभ सॅ कात ।
जौं अपन वयना सॅ सिनेह नहि राखव,
मॉजेती अस्तित्व विहीन ।
ततक अस्तित्वक गप्प नहि पुछू,
जननी बिनु ओ स्वतः विलीन ।
ज्योति सुनीत चौधरी
मोनक गति
असगर बैसल एक कोठलीमे
दृष्टि कैद छल चारू देवारमे
मुदा मोन जा चुकल छलद ूर
अपन चालि सऽ मजबूर
विचरि रहल छल बीतल काल
सोचैत अनके आनक हाल
एकएक प्राणि जकरा स भेंटल
सबहक चिन्ता अपने मे समेटल
जॅं जे भेलै से नहिं भेल होयतै
तऽ आहिके की हाल होयतै
सत्‍य के संग प्रयोगक साहस
कल्पनामे आन्हर भऽ केने बास
समय के मोल सऽ अपरिचित
कतेको दिन राति रहल छल बीत
एक एहेन उज्ज्वल भाेर चाहीछल
जे असत्‍यके नींदमें जे सूतल छल
ताहि मोनके झकझाेरिकऽ जगाबै
वास्तविकताक सुन्दरता बुझाबै
सत्‍यके संग कराबैत साक्षात्‍कार
काल्पनिक जीवन के प्रतिकार
आशावादिता जकर मूल धारणा
आगाँ बढ़क एक अद्भुत प्रेरणा 
           
  रूपेश  कुमार  झा  त्योंथ
खायब की                                

नहि फुराइए लए कतय नुकाउ
संकट मे पड़ल निज जान ओ जी।
डार तोडि आब प्राण मंगैयए
धय ठोंठ ठिठियाए महगी।

आध पेट खा दिनराति
ढ़ेकरै छी भरि लोटा जल पी।
सुखा गेल बिनु  बतिये
चार परक सजमनि लत्ती।

हार कांपय जाइत हाट हमर
साधंश नहि लेब  तरकारी।
महगीक ई विकट धाह
ढनढना देलक भोजनक थारी।

लोक करत की अछि कानि रहल
मुदा सरकार नचैछ बजा पिपही।
परिवार बनल हो जेना पहाड़
टेकब कोना हम बनि टिटही।

चिंतित छी जे कोना जुरत
पोथीक टाका सेनूर टिकुली।
एहना मे की छोड़ा सकब
सोनरा सं हुनक हार हंसुली।

महगी बना देलक अछि हमरा
अयोग्य निरीह ओ अपराधी।
भेल अवस्था एहन हमर
अपने सं अपना कें दुत्कारी।

घर अबिते ताकय हमरा दिस
बैसल विवश बेटाबहुधी।
लागय जेना ओ पूछि रहल हो
खायब की  खायब क़ी
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काल कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न




!!
अहॅक ऑचर (बाल साहित्य) !!

आव विसरव कोना सुनू जननी अहॉ,
कतेक निर्मल सेहंतित अहॅक ऑचर ।
हिय सिहकै जखन वहै लोचन तखन
नोर पोछलहुॅ लपेटि हम अहॅक ऑचर ।।
कोना अयलहुॅ खलक ? मोन नहि अछि कथा,
पवित्र पट सॅ सटल देह भागल व्यथा ।
सिनेह निश्छल अनमोल प्रथम सुनलहुॅ मातृबोल,
मोह ममताक आन केकरत परतर ?

आव.................................................................. ।।

दंत दुग्धक उगल, नीर पेट सॅ वहल,
देह लुत्ती भरल कंठ सरिता सुखल ।
जी करै छल विसविस तालु अतुल टिसटिस,
मुॅह मे लऽ चिवयलहुॅ अहॅक ऑचर ।

आव.................................................................. ।।

नेना वयसक अवसान ताकचललहुॅ हम ज्ञान,
कएलहुॅ गणना अशुद्ध गुरू फोड़ि देलनि कान ।
सिलेट वाट पर पटकि मॉक कोर मे सटकि,
तीतल कमलाक धार सॅ अहॅक ऑचर ।

आव.................................................................. ।।

देखि पॉचमक फल मातृदीक्षा सफल,
भाल तिरपित मुदा ! उर तृष्णा भरल ।
गेलहुॅ कतहे अम्बे कतगेल ऑचर,
ताकि रहलहुॅ हम ऑगन सॅ पिपरक तर ।

आव.................................................................. ।।
गजेन्द्र ठाकुर
गीत-प्रबन्ध- नाराशंसी
कोड़वाह ठाढ़ टिक्करक नीचाँमे
हलमहल कऽ कूटि माटि
सिलोहक बनल मुरुत ई मनुक्ख
छोलगढ़ियाक गुलाबीपाक
एहि बेर नहि जानि किएक रहल कचकुआह

आ बीतल कएक दिन, छठिहारी छठम दिन
कविक कविताक छन्दक रससँ उगडुम करैत
आ डराएल विश्वदेव जे पद्यक रस जे झझाएत तँ
पसरि जाएत सगर विश्वमे गायत्री नाराशंसीक संग
से ओ
कविक कविताकेँ छन्दक रसमे राखि दैत छथि
बलि दऽ दैत छथि
कविक कविताक छन्दक रसक बलि
आ गबैत छथि नाराशंसी।

आ आकांक्षाक अग्नि
पृथ्वीसँ द्युलोक दिस जाइत
माता पृथ्वीक हृदएक आगि
द्यौ पिताश्री पृथ्वीक पुत्र वा भाए
आलोकदीप्त ई नीलवर्णक आकास
अरणिमन्थनसँ प्रकाशित ई पृथ्वी

कर्कश बजरी सूगाक स्वर
ओतए धारक पलार लग

आ दूटा धारक हहाइत मोनियारक
भँसिआएल खेबाह कहुना निकलि गेल मुदा
आगाँ बढ़िते जक, बढ़ब आकि धँसब
झाँखीक झझिया करत सुरक्षित हमर गाम
दाह-बोह आएल, किएक ई
एकार्णवा, दह, जलामय, कनबहकेँ झाँपि

खेधा-पौटी नाहक माङीपर बैसि
खसबैत बसेर जाल आ हम दोसर माङीपर बैसि खेबैत छी
ओहि जालकेँ, दिशा निर्दिष्ट भऽ
कन्हेर करैत
जालक चारूकात ठकठकिया करैत
अनैत माँछकेँ जाल दिस

टुस्सा, सारिलबला काठक तँ गाछी विलुप्त
बबुरबन्ना बनल ओहि पारक खेत, कमलाक रेत


बदहा पहिरने लोक, आ ई गाछ बृच्छ
ठाढ़ मुदा हरियरी, जेना दुःखी पीड़ित
टुस्साक निकलब, जेना आगमन कोनो अभागक
चारू कात पसरल कमलाक रेत, आ ताहि बीच टुस्सा निकलब
मुदा संकेत प्रायः कोनो आसक।

आ तखने ध्वनि
मधुर स्वर बला करार सूगाक
कंठ लग लाल दागी बला अमृत भेला सूगाक
स्वर अबैत बनि नाराशंसी।  
गंगेश गुंजन:
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।

अपन-अपन राधा २२म खेप
जखन-जखन पृथ्वी पर पसरैये अनर्थ-अन्यायक वातावरण, लोक प्राणिमात्र होअ लगैत अछि--अपमानित प्रताड़ित आ अपमृत! सबजन हाहाकार मे तिरोहित भ' जाइत अछि स'भ नैसर्गिक मृदु- मधुर वाणी,स्वर ,शब्द, भाषा तथा अंग भंग होअ' लागि जाइत अछि जीवन-छन्दक, प्रकाश इजोत आगि दितहुँ बनि जाइत अछि-क्रान्तिहीन व्यर्थ क्रिया आ अन्हार ' जाइत अछि काल प्रमुख मुखिया, जनजीवनक बसात बनि जाइत अछि दास, 
मात्र किछु आ किछुए सत्ताक खास
बाट सबजनियाँ बनि जाइत अछि सदाक बास्ते राजा कंसक कारागार, 
कारागार स्वयं बिन सेवा-सुश्रूषा, औषद-परिचर्याक प्राण लैत रोगीक अस्पताल,
डाक्टर-वैद्य चलि जाइत अछि अपन कोनो सुभीता-सुरक्षाक पाछाँ 
दौड़ि क' नुकाय, लागि जाइछ करबा मे अपनहि प्राण रक्षाक उपाय..
.रोगी समुदाय-कष्टक गगन भेदी आर्त्तनाद पर्यन्त जखन अन्हर-बिहाड़ि मे उड़ैत धूरा् जकाँ 
अकारथ प्रभावहीन बनि जाइत अछि, दुर्घटना ग्रस्त माए-बाप जकाँ लोक कें 
अपन सकल स'र सम्बन्धी आप्त समाज
क्यो नहि पूछैत छैक, एत' धरि जे-' पीयब ज'?
कंठ सुखाइत हएत कैलौंहें बड़ी काल पीड़ा सहबा लेल चीत्कार...' नहि पूछ' औतैक कोय, नहि देखतैक आबि ओकर हालति, ओकर बाँचल खुचल देह-स्वास्थ्य| सौंसे स सौंसे होअ' लगतैक-टूट फूट, बाँचि ने जएतैक किछुओक कथूक मूल स्वरूप मनुक्ख सँ ल' ' वनस्पति पर्यन्त, आम भ' जेतैक
नीमक गाछ, नीम बेल, बेल आक-धथूर आ आक धथूर भ' जयतैक-तिटपर्री,
तिटपर्री स्वयं बनि जयतै सिक्कठिक बन-झाँखुर, बैर जामुन-लताम भ' जयतै झरकल दूभि,
साबे-खड़ही,कमल पुरइन भ' जयतै करमी लत्ती सेमार, माछ सर्प, सर्प चुट्टी
चुट्टी बताह हाथीक समूह, हाथी अपनो सँ पैघ दैत्याकारक नव बाघ-सिंहक बिकराल पतियानी...
मयूर भ' जायत विलुप्त, आश्चर्य की ? कनैत-कनैत कोइली कौआ| कौआ उड़ैत-उड़ैत अहर्निश सुनइत अपनहि काँव-काँव क' बनि जायत टर्र टर्र करैत व्यर्थक अप्रिय स्वर। सूगा-मैना-बगड़ा कचबचिया- नीलकंठ नहि रहत अपन अपन स्वरूप भ' जाइ जायत गिद्ध-चिल्हो। बगुलो होइत तँ रच्छ,   नहि भ' जायत कए प्रजातिक सुन्दर रूपाकृति मे-बाज ! किछु आओर हिंसक अपन चांगुर कएने-तीख आँखि के केने आओर खुंखार।
पड़बा भ' जायत धरगर चक्कूक बर्छी वला चाँगुर महाकाल। मनुक्खक यैह राक्षसी रूपान्तरण आ सृष्टिक अधिकांश तत्व, पदार्थ प्राणिक विरुद्ध अस्वाभाविक अवतारणा-
जीवन विरुद्ध कार्यकलापक मचि जायत त्राहि-त्राहि।      
सबटा बनि जाय लागत सहज स्वाभाविक। परिस्थितिक दासता मे मनुखक दबल कंठ अपन बौक होयबाक नियति के स्वीकारि लैत| आम-नीम भ' ' सिहकैत रहत आ मयूर-बाज बनि नोचैत रहत निरीह पड़बा सबकें चिबबैत रहत सपरिवार । नीलकंठ अपने नुकाएल फिरताह गाछ बृक्षक दोगे दोग। कतहु नहि भेटतनि सुरक्षा आ आश्रय। सब किछु भ' जाय लागत अपन-अपन अर्थ संकोच आ व्यवहार मे स्वाहा, समाप्त ।आ एहि प्रक्रिया मे आरंभ रहत कलियुगी पल-क्षण अति गतिक प्रवाह मे नव अपसृष्टिक  होइत जाएत सत्ता-प्रतिष्ठा   आओर तदनुरूप सम्राज्य..
ई सबटा प्रक्रिया समान्तर सृष्टिक ई समस्त गरल-प्रवाह मे जे झरकत, ' जायत खकसियाह से मूलतः मनुखेक मन-प्राण। देह तँ बाद मे हएत मृतक स्वयं शिव सेहो गरल तं मने प्राण सँ कएलनि पान ! कोनो कि हुनकर देह ? भने भ' गेलनि गाढ़ नील वर्ण । घटित तं होइत छैक सबटा मने प्राण पर ने। एतहि होइत छैक विस्फोट, एतहि बजैत छैक-बाँसुरी।आ एतहि फुलाइत छैक कमल, कुहुकैत छैक कोइली, एतहि जन्मैत छैक विचार, एतहि सँ बनब प्रारम्भ होइत छैक-संसार।
मोन प्राणक जेहन जाति गोत्र तेहने तं संसारक निर्माण आ स्वरूप| मनुखक मोनप्राण तं रचय मनुक्खेक संसार| से मन प्राण से सौंस मनुक्ख कें डाहि क' कएल जाइत मानव विहीन भूमिक भ' जाय लगैत छैक सर्वनाश- उपस्थित रहैत छैक सम्मुख संसारक महाकाल,तं सबटा भ' जाइत छैक अस्थिर, आतंकित आ असुरक्षा सँ बेहाल। मात्र आर्तश्वरें चिकरब, चतुर्दिक आर्तनाद भरि सृष्टि पूर्वाभ्यास परिपक्व कलाकार जकाँ जेना एकहि बेर कर' लगैत अछि अपन-अपन इष्ट अपेक्षित आ अपना देवताक पुकार| एक संग तँ तकरहि ब्रह्माण्ड भरिक एकत्र एक बेरक एहि वाणी-स्वरक ध्वनि प्रतिध्वनि सँ फूटि जाइत अछि टुकड़ी-टुकड़ी आकाश आ छिरिया जाइत अछि टूटि क' भरि पृथ्वी फूटल कोहा-खापड़ि जकाँ एहि कालक साक्षात्कार प्रायः मनुष्य- जीवन-यात्राक थिक सर्वाधिक अशुभ प्रारब्धक ठाम !
से ठाम की हम स्वयं ई अभागलि  राधेहिक देह-प्राण- चित्त ? से खेत कि ई हमर -हमरे देह होअ' श्रीकृष्ण महराज ? यैह निसाफ ?'
जानि ने ककरा पुछलखिन राधा ई प्रश्न बा मने मे उचरलनि, नहि जानि। जानथि श्रीकृष्ण !...

 
श्यामल सुमन
कहू कि फूसि बजय छी?
गप्पे टा हम नीक करय छी सबटा उनटा काज।
एहि कारण सँ टूटि रहल अछि मैथिल सकल समाज।
कहू कि फूसि बजय छी?
टाका देलहूँ बेटी देलहुँ केलहुँ कन्यादान।
ओहि टाका सँ फुटल फटाका मन मे भरल गुमान।
दाता बनल भिखारी देखियौ केहेन बनल अछि रीत,
कोना अयाची के बेटा सब माँगि देखाबथि शान।
कहू कि फूसि बजय छी?
माछ मांस केर मैथिल प्रेमी मचल जगत मे शोर।
सम्हरि सम्हरि केँ घर मे खेता सानि सानिकय झोर।
बरियाती मे झोर किनारा काली मांसक बुट्टी,
मिथिला केर व्यवहार कोना कय बनल एहेन कमजोर।
कहू कि फूसि बजय छी?
नहि सम्हरब तऽ सच मानू जे भेटत कष्ट अथाह।
जाति-पाति केँ छोड़िकय बेटी करती कतहु बियाह।
तखन सुमन केर गोत्र मूल सब करब कोना पहचान,
बचा सकी तऽ बचाऊ मिथिला बनिकय अपन गवाह।
कहू कि फूसि बजय छी
.-राजदेव मंडल-मिझाइत दीया २.जगदीश प्रसाद मंडल-गीत३.मनोज कुमार मंडल-फैशनक धमाल

राजदेव मंडल
मिझाइत दीया
भुक-भुकाइत दीपक
सम्‍पूर्ण शक्‍ति‍सँ संघर्षरत
पराभूत करबा लेल
सघनतमकेँ
लगा रहल
देहक बाती
जीनगीक तेल
ि‍कन्‍तु,
अथक प्रयास भऽ रहल फेल
एक रत्तीक बाती
दूइ बून तेल
कतेक कऽ सकत खेल
भऽ रहल अवसानक इजोत
पड़ि‍ गेल जेना अन्‍हारकेँ नोत
फेर फक्‍क दऽ मुझा गेल
अन्‍ति‍म सन्‍देश सुझा गेल
प्रभुत्‍व सम्‍पन्‍न पओलक राज
घुप्‍प अन्‍हार पहि‍रि‍लक ताज
चोर उचक्‍काक अत्‍याचार
नहि‍ रोि‍क सकताह अन्‍हार सरकार
हे प्रकाश, जुनि‍ खसाउ नोर
आि‍ब रहल अछि‍ नूतन भोर।


२.
जगदीश प्रसाद मंडल
गीत

चलु उचि‍तपुर देस, यौ-भैया चलु....
नहि‍ अछि‍ भेदभाव ओतए ि‍कछु,
नहि‍ अछि‍ चोर-बइमान।
नहि‍ अछि‍ छोट-पैघक अंतर,
सबहक एक्‍के बेस, यौ भैया.....
सबहक चालि‍-ढालि‍ एक्‍के अछि‍,
सबहक मान-सम्‍मान।
आि‍ग-पानि‍क भेद कोनो नहि‍,
सबहक एक्‍के देस। यौ भैया.....
पढ़ै-लि‍खैक एक्‍के रस्‍ता अछि‍,
सबहक एक्‍के उदेस।
जि‍नगीक तँ एक्‍के वि‍चार अछि‍
नहि‍ अछि‍ देस-ि‍बदेस। यौ भैया.......
माए-बहि‍नि‍ सबहक एक्‍के थि‍क,
बाल-बच्‍चा सभ एक।
एक्‍के खहि‍स सभकेँ होइ छै
नहि‍ कम नहि‍ ि‍बसेस। यौ भैया....
मनोज कुमार मंडल
फैशनक धमाल


बाबू सैदख कहैत छलाह
पहि‍ने बड़ तखलीफ रहैत छल
जाड़ कप्‍प-कप्‍पबैत रहैत छल,
दॉंत कटकटैत रहैत छल
हमर कहब तू नहि‍ पति‍एबए,
एक्‍केटा धोती पहि‍रव-ओढ़व छल।
हमरा सुनवामे नि‍मन्‍न लगैत छल,
ओना आब ओ कष्‍ट नहि‍ छल,
दि‍ल्‍ली-बम्‍बइक बाट खुजल,
सबहक हाथ पाइसँ भरल।
गरीबी तँ एखनो अछि‍।
ि‍कन्‍तु आब ओ तखलीफ नहि‍ रहल।
जाधरि‍ बाबू सबल कपड़ा लौलन्‍हि‍,
इंचो तन उधार नहि‍ रहए।
एकर सतत ध्‍यान रखलैन।
हरदम कहैत छलाह
जँ तोरा सबहक तन उधार रहतह
लोक हमरा की कहत?
बाबू बाटपर हम चलि‍,
ई हुनकर सम्‍मान छल।
फैशनक आब दौड़ चलल,
ि‍बनु पाइबलाकेँ तन झॉंपल छल।
दीनताक कारण उधारो छल।
पाइ बलाक आव नहि‍ पूछ,
देहपर कपड़ा छटल छल,
सगर देह उघारे छल।
हम अचम्‍भामे पड़लौं,
बाबूक कथा आब पाछू भेल,
फेशनक धमाल रंग चढ़ेलक
तनपर कपड़ा खाली भेल
बुचकट शष्‍दक शोभा बढ़ि‍ गेल,
कहु बाबूक उक्‍ति‍ याद राखब?
बालानां कृते-
जगदीश प्रसाद मंडल
किछु प्रेरक कथा
91    सत्य (विद्या)
      विद्याध्ययन साधना छी। जहि स अन्तः क्षेत्र शुद्ध आ पुरुषार्थक जन्म होइत। जकरा संपादित केने बिना मानव जीवनक सब उपलब्धि व्यर्थ।
      जिनगी भरि भरद्वाज मुनि तपस्या करैत रहलाह। जखन मरैक बेरि एलनि त देबदूत लेमए एलनि। देवदूत कऽ भारद्वाज मुनि कहलखिन- हमरा अही लोक मे फेरि जनमै देल जाउ। स्वर्ग जा कऽ की करब?
मुनिक बात सुनि आश्चर्जित होइत देवदूत पूछलकनि- तपक लक्ष्य त स्वर्ग प्राप्त करब होइत अछि जे अहाँ कऽ भेटिये रहल अछि तखन?
  भारद्वाज कहलखिन- ज्ञान संचय आ पूर्ण सत्य तक पहुँचैक लेल। अखन हमर ज्ञान संपदा बहुत कम अछि। तेँ ओते जन्म धरि तपस्या करै चाहै छी जाधरि सत्य कऽ लग स नहि देखि सकियै। स्वर्ग स ज्ञान बहुत पैघ होइत अछि। स्वर्ग स सुविधा भेटैत जबकि ज्ञान स आनंद।
92    समता
      गुरुकुल मे जे विद्याध्ययन होइत ओ अमृत सदृष्य होइत। किऐक त ओ साधनाक नहि उच्च स्तरीय आदर्शक निर्माण करैत। एहि हेतु गुरुकुलक छात्र उपभोग कऽ नहि उपयोगक महत्व सत्-प्रयोजनक लेल अपन अगिला (भावी) दिशाधारा कऽ निर्धारित करैत अछि।
      एक दिन सम्पन्न घर स आयल छात्र गुरुकुल संचालक आत्रेय स पूछल- भगवन! जे कियो अपना घर स नीक भोजन आ नीक वस्त्र मंगा सकै छथि ओ ओकर उपयोग किअए ने कऽ सकै छथि? ओहो किअए निर्धने परिवारक छात्र जेँका जीवन-यापन करथि?
      गंभीर मुद्रा मे आत्रेय कहलखिन- छात्रो श्रेष्ठ (उत्तम) मनुष्य जहि समाज मे रहैत छथि ओ ओहि समाजक अनुकूल जीवन-यापन करैत छथि।
अइह (यैह) समता अपनो आ दोसरोक लेल सौजन्य उत्पन्न करैत अछि। सम्पन्नता प्रदर्शन ईष्र्या आ अहंकार कऽ उत्पन्न करैत अछि। जहि स विग्रहक जन्म होइत अछि। जे सहयोगक  नींव कऽ डोला दइत अछि। विषमते स समाज मे कतेको (अनेको) विग्रह ठाढ़ होइत अछि। अपराध बढ़ैत अछि जहि स अनाचारक जन्म सेहो होइत अछि।  एहिठाम (गुरुकुल) समान जीवन जीवैक रास्ता सिखाओल जाइत अछि। धनिक अपन    धन गरीब कऽ उठबै मे लगावह। नइ कि निजी सुविधा-संवद्धन मे।
      समताक दूरगामी सत्-परिणाम कऽ छात्र बुझि अधिक उपयोगक विचार कऽ बदलि लिअए।
93    जते चोट तते सक्कत
      कोशाम्बीक राजा शूरसेन स मंत्री भद्रक पुछलकनि- राजन् अपने श्रीमंत थिक। राकुमारक शिक्षाक लेल एक सय एक विद्वावन् रखि सकै छियै। तहन अपने एहि पुष्प सन बच्चा कऽ बन्य प्रदेश मे बनल गुरुकुल मे किऐक पठबैत छिअनि? जहि ठाम सुबिधाक घोर अभाव छैक। ऐहन कष्टमय जीबनचार्या मे बच्चा कऽ पठाएव उचित नहि?
  मंत्रीक विचार सुनि मुस्कुराइत शूरसेन उत्तर देलखिन- हे भद्रक जहिना आगि मे तपौला स सोना चमकैत तहिना कष्टपूर्ण जीवन चर्या स मनुष्य बनैत अछि। कष्टे मनुष्य कऽ धैर्य साहस आ अनुभव दैत अछि।
वातावरणक प्रभाव सबसँ बेसी नव उमेरक बच्चे पर अधिक पडै़त अछि। ऋृषि सम्पर्क आ कष्टमय जिनगी राजमहल मे थोड़े भेटि सकैत अछि।
  ऐठाम त हम ओकरा भोगिये-बिलासी बना सकै छी। जँ क्षणिक मोह मे पड़ब त ओकर भविष्ये चैपट्ट भऽ जेतइ। तेँ ओकर उज्जवल भविष्यक लेल गुरुकुल पठाएव उचित अछि।
94    परिष्कार
      गुरुकुल मे विद्याध्ययन सब जाति सब वर्ण आ सब समुदायक लेल हितकारी अछि। अगर जँ किनको अपन पैत्रिके व्यवशाय करैक होइन तिनको पैघ उपलब्धिक लेल संस्कारक शिक्षा देब अत्यन्त जरुरी अछि।
      एक गाम मे क्षत्रिय आ वैश्य रहैत छल। ब्राह्मणक बालक त गुरुकुल पढ़ै ले चलि गेलाह। दुनूक (क्षत्रियो आ वैश्योक) मन मे यैह जे हम योद्धा बनब त हम वणिक। अनेरे विद्याध्ययन मे समय किअए लगाएव। मुदा जखन कने असथिर भऽ सोचलक त अपना पर शंका जरुर भेलइ। मन मे खुट-खुटी उठल। मने-मन सोचलक जे से नहि त कुल पुरोहित स किअए ने पुछि लिअनि। दुनू जा कऽ पुरोहित स पुछलक। कुल पुरोहित उत्तर देलखिन- ब्रह्मविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीख मांगव नहि होइत। ओ जीवनक अंतिम भग मे अधिकारी व्यक्तिक द्वारा ग्रहण कयल जायत छैक। ब्रह्मविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीख मांगव नहि होइत। ओ जीवनक अंतिम भाग मे अधिकारी व्यक्तिक द्वारा ग्रहण कयल जायत छैक। ब्रह्विमद्याक प्रयोजन गुण कर्म स्वभावक परिष्कार करब होइत छैक। जे सब स्तरक प्रगतिक लेल आवश्यक अछि।
      प्राचिनकाल मे गुरुकुल मे कठिन स कठिन कार्यक भर छात्र केँ दइत जायत छल। जहि स भारी स भारी काज करैक अभ्यास छल।
      कुल पुरोहितक परामर्श मानि ओहो दुनू (क्षत्रिय और वैश्य) अपन-अपन बालक कऽ गुरुकुल भेजब शुरु केलक।
      गुरुकुल स अध्ययन कऽ लौटला पर ओहो अपना काज कऽ बिनु अध्ययन केलहा स अधिक सफल भेल।
95    कथनी नहि करनी
      एकटा लोहार वाण (तीर) बनबैक विद्या मे निपुन छल। वाणो अद्भुत बनवैत छल। वाण बनबैक कला कऽ सीखैक लेल दोसर लोहार अबि पुछलक- भाइ! तों कोना वाण बनबै छह। से हमरो कहह।
पहिल लोहार जबाब देलक- भाइ! कहले टा स सब लूड़ि नै होइ छै। तेँ हम वाण बनवै छी तू ध्यान स देखह।
      सुनि दोसर लोहार लग मे बैसि देखै लगल। तहि काल एकटा बरिआती बगलक रस्ता स गुजरै लगल। बरिआतियो खूब झमटगर। दर्जनो गाड़ी रंग-बिरंगक बजो सजाबटो  सुन्दर। दोसर लोहार बाण बनौनाइ देखब छोड़ि बरिआती देखै लगल। जखन बरिआती आखिक अढ़ भऽ गेल तखन ओ लोहार बाजल- बड़ सुन्दर बरिआती छलै।
      वाण बनबैवला लोहार कहलक- भाइ ने तखन देखैक फुरसत छल आ ने अखन तोहर बात सुनैक अछि। जाधरि कोनो काज कऽ तत्परता स नहि कयल जायत ताधरि काजक सफलताक कोन आशा। तेँ जे काज तत्परता आ एकाग्रता स कयल जायत ओइह काज सफल होएत।
      अफसोस करैत दोसर लोहार सोचै लगल जे एकाग्रताक अभ्यास करब सबसँ जरुरी अछि। जँ से नहि करब त जीवन मे कहियो कोनो काज मे सफल नहि होएब।
      ज्ञानक सूत्र कतौ स भेटए ओकर जरुर अंगीकार करक चाही।
96    शालीनता
      विद्या व्यक्ति कऽ विनम्र बनबैत। ओकर अन्तरंगक स्तर कऽ उपर उठबैत। शिक्षा कतौ भेटि सकैत अछि मुदा विद्याक सूत्र कतौ-कतौ भेटैत अछि। जहि व्यक्ति कऽ विद्याक सूत्र भेटि जाइत ओहि व्यक्तिक काया-कल्प भऽ जायत। छान्दोग्य उपनिषदक छठम प्रपाठ मे उद्दालक आ श्वेतकेतुक संवाद अछि।
      विद्यालयक परीक्षा पास कऽ श्वेतकेतु आयल। मुदा ने ओकर आत्म परिष्कृत भेल आ ने उदंडता कमल। जहि स पिता (उद्दालक) केँ दुख भेलनि। खिसिया कऽ कहलखिन- अगर व्यक्तित्व मे शालीनताक समावेश नहि भेलि त अनेरे कियो किऐक पढ़ै मे समय नष्ट करत?
      महसूस करैत श्वेतकेतु कहलकनि- अगर इ रहस्य जँ हमर शिक्षक जनितथि त जिनगी भरि शिक्षके किऐक रहितथि वा तऽ ऋृषि बनितथि वा द्रष्टा।
  श्वेतकेतुक विचार सुनि पिता मने-मन सोचै लगलथि जे पुत्रक प्रति पितोक दायित्व होइत। एकटा गुलरीक फड़ आनि उद्दालक फोड़लनि। गुलरीक तर (भीतर) मे छोट-छोट अनेको बीआ छलैक। ओहि बीआ कऽ देखबैत कहलखिन- एहि नान्हि-नान्हि टा वीआक भीतर विशाल वृक्ष छिपल अछि। तहिना जेकरा आत्म-ज्ञान भऽ जाइत छैक ओ वृक्षे सदृश्य विकासो करैत आ फड़बो-फुलेबो करैत। तोहूँ ओहि तत्व कऽ चिन्हह।
 97   मजूरी
      एक दिन गाड़ीक प्रतीक्षा मे लियो टाल्सटाय स्टेशन पर ठाढ़ रहथि। एकटा अमीर परिवारक महिला साधारण आदमी बुझि हुनका कहलकनि- हमर पति सामनेवला होटल मे छथि। अहाँ जा क हुनका ई चिट्ठी द अबिअनु। एहि काजक लेल दू आना पाइ देब।
      चिट्ठी नेने टाल्सटाय होटल जा दऽ देलखिन। घुरि क आबि अपन कमेलहा दू आना पाइयो ल लेलनि। कने कालक बाद एकटा अमीर आदमी आबि प्रणाम कऽ टाल्सटाय स गप-सप करै लगल। ओ आदमी हुनका स नम्रतापूर्वक गप्प करैत। गप-सपक क्रम मे ओ आदमी टाल्सटाय कऽ आदरसूचक शब्द काउंट स सम्बोधित करति। बगल मे बैसलि ओ महिला सब कुछ देखैत-सुनैत। ओ महिला एक गोटे क पूछलक- ई के छथि?
ओ आदमी लियो टाल्सटायक नाम कहलखिन। टाल्सटाईक नाम सुनि ओ महिला टाल्सटाय लग आबि क्षमा मांगि अपन दुनू आना पाइ घुमा दइ ले कहलकनि। हँसैत टाल्सटाय उत्तर देल- बहिन जी! ई हमर मजूरीक पाइ छी। एकरा हम किन्नहु नहि घुमाएव।
98    जीवन यात्रा
      गंगोत्री स गंगाजल धरती स बाहर निकलि चलि पड़ल। पहाड़ स नीचा आरो निच्चा होइत मैदान मे पहुँचल। एक गोटे एहि प्रक्रिया कऽ गंभीरता सऽ देखि रहल छल। आगू मुहे जल बढ़ैत गेल बढ़ैत गेल। जहि मे अनेको जल-नद आबि-बाबि मिलैत गेल। जहि स एक विशाल नदी बनि गेल। ओ नदी जाइत-जाइत समुद्र मे मिलि गेल। जे व्यक्ति देखि रहल छल। ओहि व्यक्तिक मन मे भेल जे जलक इ मुरुखपना छी। किऐक त जे हिमालयक उच्च शिखर छोड़ि अनेक प्रकारक दुख उठा नोनगर पानि मे मिलल। एकरा मुरुखपना नै कहबै त की कहबै? ओहि व्यक्तिक मनः स्थिति कऽ नदी बुझिगेल। कहलक- अहाँ हमर यात्राक मर्म नहि बुझि सकलहुँ। कतबो ऊँच हिमालय किअए ने हुअए मुदा ओ अपूर्ण अछि। पूर्णता त गहराई मे होइत छैक जहि ठाम पहुँचला पर मनक सब कामना समाप्त भऽ जाइत छैक। हम हिमालय सन महान ऊँचाइक आत्मा छी जे पूर्णता पबैक लेल निरन्तर चलैत समुद्रक गहराइ मे पहुँचलहुँ। तेँ हमरा बेहद खुशी अछि जे अप्पन लक्ष्य धरि पहुँच गेलहुँ।
99    ज्योति (प्रकाश)
      जनक आओर याज्ञवल्क्यक बीच ज्ञानक चरचा चलैत छल। जनक पुछलखिन- सुर्यास्त भेला पर (सुर्य डुबला पर) अन्हारक सघन बन मे रास्ता कोना ढ़ूढ़ल जाय?
  जनकक प्रश्न सुनि मुस्कुराइत याज्ञवल्क्य उत्तर देलखिन- तरेगण रास्ता बता सकैत।
      याज्ञवल्क्यक उत्तर स असन्तुष्ठ होइत जनक पुछलखिन- अगर मेघौन होय? संगे दीपकक प्रकाश सेहो नहि उपलब्धि होय तखन?
  जनकक प्रश्नक गंभीरता कऽ बुझैत याज्ञवल्क्य कहलखिन- अपना सुझि-बुझिक सहारा लेबाक चाही।
      विवेकक प्रकाश हर मनुष्य मे होइत। जे कहियो नहि बुझाइत। हे राजन ओहि सुतल विवेक कऽ जगाइबे (जगायब) ऋृषि समुदायिक पवित्र कर्तव्य छी।
100   पवनक विवेक
      चन्द्रमा केँ दू सन्तान-एक बेटा आ एक बेटी। बेटाक नाओ पवन आ बेटी आँधी (अन्हर)। एक दिन बेटीक (आँधीक) मन मे उपकल जे पिता सांसरिक पिता  जेँका हमरो दुनू भाइ-बहीनि मे भेदि करैत छथि। आँधीक व्यथा कऽ चन्द्रमा बुझि गेलखिन। बेटीक आत्मनिरीक्षणक लेल चन्द्रमा एकटा अवसर देवाक विचार केलनि।
  दुनू भाइ-बहीनि क बजा कहलखिन- बाउ अहाँ सभ स्वर्गक इन्द्रक काननक परिजात नामक देववृक्ष केँ देखने छी?
  दुनू भाइ-बहीनि- हँ।
  पिता- अहाँ दुनू ओतए जाउ आ सात खेपि ओकर परिक्रमा कऽ कऽ आउ।
  पिताक आज्ञा मानि दुनू गोटे चलि देलक। आँधी हू-हू-आ कऽ दौड़ल। जहि स गरदा (धूल) खढ़-पात आ कूड़ा-कड़ कट उड़बैत लगले पहुँच सात बेरि परिक्रमा क चोट्टे घुरि क आबि गेल। मने-मन आँधी सोचैत जे हम्मर काज देखि पिता प्रशंसा करताह।
      पवन पाछु घुरि कऽ आयल। ओकरा संग सौंधी-सुगंध सेहो आयल। जहि स सौंसे घर गमकि उठल।
      मुस्कुराइत चन्द्रमा बेटी कऽ कहलखिन- बेटी अहाँ नीक जेँका बुझि गेल हेबइ जे जे अधिक तेज गति स चलत (दौड़िकेऽ) ओ खाली झोरा लऽ कऽ आओत मुदा जे स्वाभाविक गति स चलत ओ मन कऽ मुग्ध करै वला सुगंध सेहो लाओत। जहि स सौंसे वातावरण सुगंधित होएत।
      वानप्रस्थक यात्रा पवन देवक सदृश्य उद्देश्यपूर्ण होइत।
101   आत्मबल
      जहि समय डाॅक्टर राधाकृष्णन कओलेज मे पढ़ति रहथि घटना ओहि समयक छी। काॅलेज मे पादरी शिक्षक (प्रोफेसर) अधिक।
      एक दिन एकटा प्रोफेसर क्लासे मे हिन्दू धर्मक निन्दा खुलायाम केलनि। बालक राधाकृष्णन सेहो क्लास मे रहथि। प्रोफेसरक बात स हुनका एते क्रोध भेलनि जे सम्हारि नहि सकलाह। उठि कऽ ठाढ़ होइत   पुछलखिन- महाशय की ईसाई धर्म आन धर्मक निन्दा केनाइ सिखबैत अछि?
 राधाकृष्णन प्रश्न सुनि ओ तमसा कऽ बाजल- आओर की हिन्दुधर्म दोसराक प्रशंसा करैत अछि?
राधाकृष्णन जबाव देलखिन- हँ
  हम्मर धर्म ककरो (कोनो धर्मक) अधलाह नहि करैत अछि। गीता मे कृष्ण कहने छथिन कोनो देवता कऽ उपासना कयला स हमरे उपासना होइत अछि। आब अहीं कहू जे हम्मर धर्म ककर निन्दा करैत अछि।
      प्रोफेसर निरुत्तर भऽ गेल।
102   खुदीराम बोस
      स्वतंत्रता संग्रामक प्रखर सिपाही खुदीराम बोस केँ मुजफ्फरपुर जेल मे फाँसी भेलनि। जहि समय फाँसी भेलि रहनि ओहि समय खुदीरामक उम्र (वयस) मात्र अट्ठारह बर्ख आठ मासक छलनि। ओना हुनकर जन्म बंगाल मे भेलि छलनि मुदा ओ अपना कऽ भारत माताक बेटा बुझैत छलाह। हुनका पर अंग्रेज किंग फोर्डक हत्याक आरोप लगौल (लगाओल) गेल छलनि। ओ जेहने कर्मठ तेहने हँसमुख छलाह। फाँसी स किछु समय पूर्व (पहिने) जेलर उदार पूर्वक आम आनि खाइ ले दैत (दइत) कहलकनि- चुपचाप खा लिअ। कियो बुझए नहि।
      खुदीराम आम रखि लेलनि। साँझू पहर जखन दोहरा क जेलर आबि पुछलकनि तऽ ओ जबाव देलखिन- जखन आइ फाँसिये होइवला अछि त डर स किछु खाइ-पीबैक मन नै होइ अए। अहाँक आम ओहिना कोन मे राखल अछि।
      आमक गुद्दा खा कऽ बोस खोंइचा (छिलका) मे मुह स हवा भरि ओहिना रखि देने। कोन मे पहुँच जखन जेलर आम उठौलक त पचकि गेलइ। जहि पर जेलर भभा कऽ हँसल। जेलरक हँसी देखि खुदीरामो खूब जोर स ठहाका मारि हँसल। मृत्युक एक्को पाइ डर  हुनका नहि छलनि।
      खुदीरामक फाँसीक चरचा लोकमान्य तिलक अपन पत्रिका केशरी मे देशक दुर्भाग्य शीर्षक नाम स लेख लिखलनि। जहि पर हुनका (तिलक) छह मासक कारावास भेलनि।
103   गुरुकुल की?
      गुरुकुल मे विद्याध्ययन सब जाति सब वर्ण आ सब समुदाइक लेल हितकारी अछि। अगर जँ किनको अपन पैतृक व्यवसाय दिशि बढ़ेवाक होइन तिनको लेल पैघ उपलब्धिक (श्रेष्ठ) लेल संस्कारक शिक्षण देव अत्यन्त अनिवार्य अछि।
      एकटा गाम मे क्षत्रिय आ वैश्य रहैत छल। ब्राह्मणक बालक त  गुरुकुल पढ़ै ले चलि गेलाह। दुनूक (क्षत्रियो आ वैश्योक) मन मे जे हम योद्धा बनब त हम वणिक अनेरे विद्याध्ययन मे समय किअए लगाएब। मुदा जखन कने स्थिर भऽ सोचलक त अपना पर शंका जरुर भेलइ। मन मे कने खुट-खुटी एलै। सोचलक जे कुल पुरोहित स किअए ने पुछि लिअनि। दुनू जा कऽ पुरोहित स पुछलकनि। कुल पुरोहित उत्तर देलखिन- ब्रहमविद्याक तात्पर्य संयासी बनि भीखे मांगव नहि होइत छैक। ओ जीवनक अंतिम भाग मे अधिकारी व्यक्ति द्वारा ग्रहण कयल जाइत छैक। ब्रह्मविद्याक प्रयोजन-गुण कर्म स्वभावक परिष्कार करब होइत छैक। जे सब स्तरक प्रगतिक लेल आवश्यक अछि। क्षत्रिय आ बैश्य जँ ओहि विद्या केँ ग्रहण करत त अपन-अपन जिनगीक कार्यक्षेत्र मे अधिक सफल आ सुन्दर ढ़ंग स सम्पादन करत।
      प्राचीनकाल मे गुरुकुल मे कठिन काज स छात्र केँ टकरायल जाइत छलै। जहि स भारी स भारी काज करैक अभ्यास बनि जाइत छलैक।
      कुल पुरोहितक परामर्श मानि ओहो दुनू अपन-अपन बालक कऽ गुरुकुल भेजब शुरु केलक।
      गुरुकुल स पढ़ि अध्ययन कऽ लौटला पर ओहो अपना काज कऽ बिनु पढ़लक अपेक्षा अधिक सफल भेल। यैह कारण छल जे प्राचीनकाल मे समाजक सब समुदायक व्यक्ति अपना बच्चा कऽ गुरुकुल मे पढ़बैत छल।
104   शिष्य कऽ शिक्षे टा नहि परीक्षो।
       गुरुकुल मे इ अनिवार्य नहि जे नीक (आलीशान) मकानक बन्द कोठरिये टा मे शिक्षा देल जाय। अनिवार्य इ जे छात्रक मनः स्थितिक अनुरुप प्रकृतिक पाठशाला मे व्यवहारिक शिक्षा भेटइ। जहि स व्यक्तित्व मे प्रखरताक समावेश संवर्धन भऽ सकए।
      महर्षि जरत्कारुक गुरुकुल मे छात्र विद्रुध प्रवेश पौलक (पाऔलक)। किछुए  दिनक उपरान्त विद्रुधक प्रतिभा स गुरु जरत्कारु प्रभावित होइत कहलखिन- बाउ पौरुषक (पुरुषत्वक) परीक्षा मे उतीर्ण भेले पर कियो बरिष्ठ (महान) बनि सकैत अछि। अहाँ पराक्रमक संग-संग पोथियो पढ़ू।
      महर्षिक परामर्श स सहमत होइत विद्रुध कहलकनि- अपनेक जे आदेश होय तैयार छी।
      विद्रुध कऽ एक सय गाय प्रभुदारण्य मे चरबैक आदेश दइत कहलखिन- जखन हजार गाय भऽ जाय तखन घुरि कऽ आयब।
पोथी सब सेहो लऽ लेलक।
      सय गाय कऽ हजार गाय बनवै मे विद्रुध कऽ बारह वर्ख लगल। बच्चो सब पुष्ट। किऐक त कोनो बच्चा कऽ दूध पीबै मे कोताही नै करैत।
      एहि बारह वर्खक बीच विद्रुध अनेको साधक विद्वान सॅ सम्पर्क बना सीखवो केलक आ रास्ताक बाधा स सेहो निपटल। जहि स ओकर प्रतिभा मे आरो चारि चान लगि गेलइ। घुरि कऽ ऐला पर चेहरा स ब्रहमतेज टपकैत। किऐक त अपन बुइधिक प्रयोग स पढ़बो केलक आ बुझवो (सीखवो) केलक।
      विद्रुधक मेहनक आ साहस देखि जरत्कारु हृदय स आनन्दित होइत अपन आश्रमक भार दऽ नमहर काज करए अपने चलि गेलाह।
105   लौह पुरुष
      इ घटना उन्नैस सय छियालिसिक छी। बम्बई बंदरगाह मे नौ-सैनिक विद्रोह केलक। अंग्रेज शासक ओकरा (नौ-सैनिक) गोलि स भुजि देवाक धमकी देलक। जेकरा जबाव मे भारतक नौ-सेना माटि मे मिला देब कहलक। स्थिति भयानक बनि गेल। पाछु हटै ले कियो तैयार नहि। ओहि समय सरदार वल्लभ भाइ पटेलक हाथ मे बम्बईक नेतृत्व छलनि। जनिका पर सब टकटकी लगौने। मुदा सरदार पटेलक मन मे एक्को मिसिया घबड़ाहट नहि। बम्बईक गवर्नर बजा कऽ मारे अन्ट-सन्ट कहलकनि। गवर्नरक बात सुनि शेरक बोली सदृश्य गरजि कऽ सरदार पटेल उत्तर देलकनि- ओ (गवर्नर) अपना सरकार स पुइछ लिअ जे अंग्रेज भारत स मित्र जेँका विदा होएत कि लाश बनि।
      अंगे्रज गवर्नर सरदार पटेलक जबाव स ठर्रा गेल। आखिर कार ओकरा समझौता करए पड़ल। ओइह सरदार पटेल स्वतंत्र भारतक पहिल गृहमंत्री बनलाह।
      कोनो आदमी मे साहस ओहिना नहि अबैत (बनैत)। पुरुषार्थक बल पर विकसित होइत।
106   जंग लागल
       एक बेरि भगवान वुद्धक समक्ष श्रेष्ठि पुत्र सुमंत आ श्रमिक पुत्र तरुण संगे प्रब्रज्या लेलक। दुनू गोटे भावनापूर्वक संघारामक अनुशासनक पालन करै लगल। किछु मासक (मासोपरान्त) प्रगतिक जानकारी दइत प्रधान भिक्षु (संघाराम) कहलकनि- तरुणक अपेक्षा सुमंत अघिक स्वस्थ आ पढ़ल-लिखल अछि। भावनो प्रवल छैक। मुदा सौंपल गेल काज आ साधनोक (साधन) उपलब्धि तरुण मे सुमंतक अपेक्षा अधिक अछि। जेकर कारण वुझि मे नइ अबैत अछि।
      संधारामक विचार सुनि तथागत (बुद्ध) कहलखिन- अखन सुमंत जंग लागल लोहाक औजार सदृश्य अछि। जंग छुटै मे किछु समय लागत।
      तथागतक बात संघाराम नीक-नाहाँति नहि बुझि सकल। तेँ प्रश्न वाचक नजरि स नजरि मिला बकर-बकर मुह दिशि तकैत रहलनि।
      स्पष्ट करैत बुद्ध कहलखिन- ओकर (सुमंतक नमहर) अधिक समय आलस्य आ प्रमाद मे बीतल अछि। जहि स व्यक्तित्व जंग लागल औजार सदृश्य भऽ गेल अछि। जबकि तरुण ऐहन उपकरण अछि जकरा मे जंग छूबो ने केलक अछि। तेँ लगले फल पाबि रहल अछि। सुमंतक जंग छोड़बै मे पर्याप्त समय आ साधना लागत। तखन जा कऽ अभीष्ट फल निकलत।
107   जीवकक परीक्षा
       आदर्श शिक्षक सिर्फ अध्ययने नहि छात्र कऽ ओहि विद्या मे ऐहन पारंगत बना दइत जहि स ओ स्वर्ण (सोन) बनि चमकि उठैत। तक्षशिला विश्वविद्यालय मे सात वर्ख आयुर्वेदक शिक्षा पाबि आचार्य वृहस्पति जीवकक परीक्षा लऽ कऽ विदा करैक समय निकाललनि। समय निकालि गुरु (वृहस्पति) जीवक कऽ हाथ मे खुरपी दइत कहलखिन- एक योजनक बीच एकटा ऐहन पौघा (बनस्पतिक) उपाड़ि (उखाड़ि) कऽ नेने आउ जेकर औषधि नहि बनैत होय।
      खुरपी लऽ जीवक विदा भेल। मास दिन घुमैत रहल मुदा एक्को टा ऐहन गाछ नहि भेटिलइ (भेटिलै) जेकर औषधि नहि बनैत होय। मास दिनक उपरान्त जीवक घुमि कऽ आबि कहलकनि- गुरुदेव! हमरा एक्कोटा ऐहेन गाछ नहि भेटल जेकर औषधि नहि बनैत होय।
      जीवक केँ गरदनि लगबैत वृहस्पति कहलखिन- वत्स! अहाँ सफल भेलहुँ। आब अहाँ जाउ आयुर्वेदक प्रचार करु।
 108  तप (साधना)
      श्रमे (मेहनत) ओ देवता छी जे सब सिद्धिक स्वामी छी। आयुष्य कऽ पूर्वाद्धे (पुवार्धे) मे एकर सम्पादनक लेल विधाता मनुष्य केँ शक्ति सम्पन्न बना दइत छथिन। जखने एकर (श्रमक) उपेक्षा होइत तखने समाज अव्यवस्थित हुअए लगैत।
      राजा विड़ाल मुनि वैवस्वत कऽ प्रणाम कऽ चुपचाप बैसि गेलाह। सूक्ष्मदर्शी गुरु (वैवस्वत) बुझि गेलखिन जे कोनो गंभीर चिन्ता मे विड़ाल पड़़ल छथि।
  पुछलखिन- विड़ाल आइ अहाँ अशान्त जेँका बुझि पड़ै छी। कथीक चिन्ता अछि से हमरो कहू?
      अपन अन्तर्वेदना कऽ प्रगट करैत विड़ाल कहलखिन- देव नहि जानि किऐक प्रजाजन अशान्त छथि। सब कियो धर्म आ शान्ति स विमुख भेल जा रहल छथि। जहि स धन-धान्यक अभाव आ प्रेम-भाव टुटि रहल अछि। अपराध वृत्ति बढ़ि रहल अछि।
  विड़ालक विचार ध्यान स सुनि वैवस्वत कहलखिन- जहि देश मे लोक मेहनत स जी (देह) चोराओत श्रम कऽ सम्मान जनक स्थान नहि देत ओहि ठाम कोना समृद्धि भऽ सकैत अछि।
      श्रम ओहन तप छी जहि स समाजक सब दोष मेटा जाइत अछि। तेँ श्रम कऽ साधना बुझि सभकेँ एहि मे लगि जेवाक चाही। जहि परिवार समाज आ देश मे श्रम कऽ जते महत्व देल जायत ओ ओते उन्नति करत।
109   उल्टा अर्थ
शिक्षा केहेन देल जाय की देल जाय-इ गंभीर प्रश्न छी।
      एक गोटे कऽ इ संतान। एक बेटा दोसर बेटी। सम्पन्न परिवार। दुनू संतान कऽ बच्चे स सुख-सुविधा भेटैत रहल। जहि स वयस्क होइत-होइत अनेको व्यसनक आदति लगि गेलइ।
      अपन दुनू बच्चा कऽ बिगड़ल देखि पिताक मन मे चिन्त5ा भेलइ। भीतरे-भीतर सोगाय लगल। जहि स रोगी जेँका खिन्न हुअए लगल। एक दिन एकटा मित्र पुछलक- मित्र अहाँ दिनानुदिन खिन्न किऐक भेलि जा रहल छी?
मित्रक बात सुनि ओ उत्तर देलक- मित्र सब कुछ अछैतो दुनू बच्चा बिगड़ि गेल अछि। ओइह चिन्ता मन कऽ पकड़ने अछि।
      दुनू गोटे विचारि तय केलक जे दुनू बच्चा कऽ एक मास महाभारतक कथा जहि मे धर्म आ सदाचारक सब तत्व मौजूद अछि सुनाओल जाय। सैह केलक।
      मास दिन महाभारतक कथा सुनलाक बाद दुनू आरो बिगड़ि गेल। बेटा अपना दोस्त कऽ कहलक- भगवान श्री कृष्ण कऽ सोलह हजार रानी छलनि त दस-बीस स संबंध राखब कोना अधलाह होएत (हैत)
      तहिना बेटियो अपन बहिना कऽ कहलक- कुन्ती कऽ कुमारिये मे बेटा भेलइ जे श्रेष्ठ नारीक श्रेणी मे छथि तखन हम कोन अधला काज करै छी।
      आब प्रश्न उठैत जे ऐना किऐक भेल?
अखन धरि जे कथा श्रवणक व्यवहार अछि ओ अपूर्ण अछि। दृष्टिकोण बदलैक लेल ऐहन प्रभावी वातावरण बनवै पड़त जहि मे कथा चर्च आ क्रिया मे समुचित समन्वय हेवाक चाहियै। तखने दृष्टिकोण बदलत आ समुचित उपयोगी बनत।
 110  जाति नहि पानि
      बुद्धदेवक प्रमुख शिष्य आनंद श्रावस्ती मे भिक्षाटन करति रहथि। गरमी मास तेँ रउदो तीख। हुनका (आनंद) प्यास लगलनि। लग मे पाइनिक कोनो जोगार नहि देखि किछु आगू बढ़लाह। एकटा युवती कऽ इनार पर पानि भरैत देखलखिन। पानि देखि मन मे सवुर भेलनि। इनार लग पहुँच ओहि युवती कऽ आनंद कहलखिन- दाय बड़ जोर प्यास लगल अछि कने पानि पिआउ?
  पानि नहि दऽ ओ युवती कहलकनि- साधुबाबा हम चंडालक बेटी छी हम्मर छुबल पानि कना पीवि?
कने काल गुम्म रहि आनंद कहलखिन- बुच्ची हम तोरा त जाति नहि पुछलिअह। पानि मंगलियह।
पियास स तरसैत आनंद कऽ देखि ओहि युवती कऽ दया लगल। मुदा मन मे विचित्र  द्वन्द्व उपैक गेलइ। अंत मे ओ पानि भरि आनंद कऽ देलकनि पानि पीबि आन्नद तृप्त भऽ गेलाह।
      महात्मा नारायण स्वामी कहने छथि जे जाति-पाति आ अस्पृश्यताक बंधन हिन्दू जातिक लेल कलंक छी। अइह (यैह) बंधन सब जाति कऽ छिन्न-भिन्न केने अछि। एकरे चलैत सब जाइतिक बीच घृणा आ द्वेष पसरल अछि।
111   ऊँच-नीच
      एक राति जखन पुजेगरी मंदिरक केबाड़ बन्न कऽ चलि गेल स्तम्भक (खूँटाक) पाथर देवमूर्ति बनल पाथर स पुछलक- की भाइ हम सब त एक्के पहाड़क पाथर छी। फेरि अहाँक पूजा होइ अए आ हम जे मकानक (मंदिरक) भार उठैने छी से हम्मर कोनो मोजरे नहि?
      देवताक आसन पर बैसल पाथर मने मन विचार करै लगल। मुदा प्रश्नक जबाव नहि बुझि कहलक- भाइ हम एहि रहस्य कऽ नहि जनैत छी। पुजेगरी विद्वान छथि हुनका स बुझि काल्हि कहबह।
      प्रातःकाल पुजेगरी आबि पूजा करै लगल। फूल-पात चढ़ा दुनू हाथ जोड़ि पुजेगरी ध्यान केलनि कि देव पाथर पुछलखिन- मंदिर मे जते पाथर अछि सब त गुण-जाति स एक्के अछि। फेरि हम किऐक पूजनीय छी?
  पुजेगरी- हे देव! अपने बड़ पैघ बात पुछलहुँ। एक गुण घर्म आ जाइतिक सब वस्तुक उपयोग एक्के पदक लेल होय इ सर्वथा असंभव अछि। प्रकृति ककरो एक रंग नहि रहए दइत अछि। जे मनुष्यो मे अछि। बहुतो मनुष्य मे एक तरहक प्रतिभा आ गुण-घर्म होइत। मुदा ओहू मे अपन श्रेष्ठ कर्मक कारणे कियो सबसँ आगू बढ़ि जायत आ कियो पाछू पड़ि जायत। तेँ एकर अर्थ इ नहि जे ओ (पाछु पड़ल) अपना कऽ हेय बुझए। किऐक त परिवर्तन सृष्टिक नियम छिअए। आइ जे ऊपर अछि ओ काल्हियो ऊपरे रहत एकर कोनो गारंटी नहि छैक। तहिना जे निच्चा अछि ओ सब दिन निच्चे रहत सेहो बात नहि।

 बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी  धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आसर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आघोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आयुवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आनेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आऔषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आमित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽबिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...