Wednesday, April 14, 2010

'विदेह' ५५ म अंक ०१ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५५)- PART II


 .राजदेव मंडल-जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर.जगदीश प्रसाद मंडल-उपन्‍यास-जीवन संघर्ष-२


राजदेव मंडल
जगदीश प्रसाद मंडलक उपन्यास उत्थान-पतनपर


नाटककार, कथाकार आ उपन्यासकारक रुपमे श्री जगदीश प्रसाद मंडलजी मैथिली साहित्यमे नूतन उर्जाक संग उपस्थित भेल छथि। हिनक जन्म १९५७ ई. मे भेल। विभिन्न पत्र-पत्रिकामे हिनक कथा, प्रेरक कथा उपन्यास सेहो प्रकाशित भऽ चुकल अछि।
      
एहि उपन्यास उत्थान-पतनक माध्यमसँ लेखक गामक जिनगीकेँ यथार्थ आ नव रुपमे उपस्थित करबाक चेष्टा कएने छथि। गामक जड़ता, रीति-रिवाज, पावनि-तिहार, मूर्खता, विद्वता, अड़ि जाएबला भाव आ सहज स्वभाव आदि सहज रुपमे आबि गेल अछि।

तत्वक दृष्टिसँ देखल जाए तँ सर्वप्रथम कथावस्तु घ्यानकेँ आकृष्ट करैत अछि। कथावस्तु तँ सशक्त आधार अछि जाहिपर उपन्यासक कतेक रंगक प्रसाद ठाढ़ होइत अछि। जाहिमे जिनगीक श्वास रहब आवश्यक।

उत्थान-पतनमे गंगानंद, यमुनानंद, पंडित शंकर, सुधिया, ज्ञानचंद, भोलिया, विसेसर, भोलानाथ, सुकल, निलमणि, मोहिनी, रीता, महंथ रघुनाथ दास, लीला, दीनानाथ, गुलाब आदि अनेक पात्रसँ सज्जित भऽ अंचलक मार्मिक चित्र उपस्थित भेल अछि।
      
कथावस्तुमे बिच्छिन्न होइत गाम-घर आ टूटैत बेकती सबहक समस्याकेँ मार्मिक ढंगसँ अभिव्यक्ति कएल गेल अछि। उपन्यासक प्रारम्भ होइत अछि- ‘‘गामे-गाम, कतौ अष्टयाम-कीर्तन तँ कतौ नवाह, कतौ चण्डी यज्ञ तँ कतौ सहस्त्र चण्डी यज्ञ होइत। किएक तँ एगारहटा ग्रह एकत्रित भऽ गेल अछि। की हएत की नै हएत कहब कठिन। एकटा बालग्रह बच्चाकेँ भेने तँ सुखौनी लगि जाइत आ जहिठाम एगारह ग्रह एकत्रित अछि तइठाम तँ अनुमानो कम्मे हएत। परोपट्टा भगवानक नामसँ गदमिसान होइत।........ जाधरि लोक कीर्तन मंडलीक संग मंडपमे कीर्तन करैत ताधरि घरक सभ सुधि-बुधि बिसरि मस्त भऽ रहैत। मुदा घरपर अबितहि.......... बच्चाकेँ बाइस-बेरहट लेल ठुनकब सुनि। व्यथाककेँ दबैत सभ आँखिक नोर होइत बहबैत।’’
 
सामाजिक उत्थान करऽ बला बेकतीकेँ गामक एहि परम्परा आ धार्मिक आडम्बरसँ संधर्ष करऽ पड़ैत अछि। लेखक अपना पात्रक द्वारा अंधविश्वासकेँ तोड़ि परिवर्तन अनबाक प्रयास कएने छथि।
      
साहित्यक भाषा होएबाक चाही जन-भाषा। जेकरा साधारण जन सहज रुपसँ पचा सकए। एहि उपन्यासक भाषा गाम-घरक बोलचालक भाषा अछि। जेकरा प्रयोग करैत काल सहजहि नव-नव शब्दक निर्माण भऽ गेल अछि। साधारण जनक बोली आ नूतन शब्दक प्रयोग एहि उपन्यासमे प्रचुरताक संग देखल जा सकैत अछि। कथोपकथनमे सहजता संक्षिप्तता आओर स्वभाविकता अछि। जेना एहि कथोपकथनपर दृष्टिपात कएल जा सकैत अछि-
  ‘‘अगर दसखत कएल नइ होइत होअए तब?’’
  ‘‘तब की? औंठा निशान दऽ देतइ।’’
  ‘‘भाय दूटा समांग आएल अछि। दुनूकेँ काज कऽ दहक।’’
  ‘‘अच्छा थमहह। किरानी बाबूसँ गप्प केने अबै छी।’’
      
कथोपकथन उपन्यासमे वर्णित जिनगीक अनुकूल अछि। दौड़ैत-पड़ाइत संसारमे बृहताकार उपन्यास पढ़बाक लेल समएक अभाव रहैत अछि। किन्तु भाषा आ शौलीमे जँ आकर्षणक गुण रहैत अछि तँ ओ जनमानसकेँ पढ़बाक लेल अपना दिशि घिचि लैत अछि। ताहि गुणसँ भरल-पूरल एहि उपन्यासक चित्रात्मक शैलीक एकटा उदाहरण देखल जा सकैत अछि।

‘‘गौर वर्ण, रिष्ट-पुष्ट शरीर, घनगर मोंछ, बड़दक आँखि सन नम्हर-नम्हर आँखि सुकलक रहै। कोठीक गेटपर कान्हमे बन्दूक लटका ठाढ़ ड्यूटी सुकल सेठक करैत।’’
      
एकहि वाक्यमे बहुत बात कहि देब लेखकक बिशेषता अछि। जेना-

‘‘माथपर छिट्टा, दुनू हाथसँ दुनू भाग छिट्टाकेँ पकड़ने, दुलकी डेग बढ़बैत गुलाब, सैंया भेल किसनमा घुनघुनाइत आंगन दिशि लफड़ल चललीह।’’

केहनो अकर्मण्य बेकती जँ पूर्ण मनोयोगक संग आर्थिक उन्नतिमे दत्तचित भऽ जाए तँ हुनक प्रगति होएब निश्चित भऽ जाइत अछि। एहि दर्शनकेँ देखेबाक प्रयत्न लेखक पात्र श्यामानन्द द्वारा कएलनि अछि। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। परिवर्तनशीलता संसारक निअम थीक। सामन्तवादसँ पूँजीवाद आ पूँजीवादक गर्भहिसँ समाजवादक जन्म सेहो होइत अछि। ई अलग बात जे पूँजीवादसँ साम्राज्यवाद सेहो पनपैत अछि।
      
सामाजिक उत्थान समितिक निर्माण कऽ लेखक ई देखबए चाहैत छथि जे टूटैत गामक लेल एकता आवश्यक भऽ गेल अछि। जाहिसँ एक-दोसराक सहयोग भेटतैक आ गामक सम्पूर्ण विकास होएतैक। सबहक संगे सामाजिक न्याय होएतैक। श्यामानन्द द्वारा आधुनिक यंत्रसँ कृषि कार्य होइत अछि। जाहिसँ ओ सम्पन्न किसान बनि जाइत अछि। एहि माध्यमसँ लेखक देखाबए चाहैत छथि जे अपनहुँ गाम-घरमे जँ बेकती विवेक आ कर्म निष्ठासँ काज करए तँ ओकरा अर्जन करबाक लेल दोसर प्रदेश नहि जाए पड़तैक आ पलायन रुकि जएतैक।

एखनहुँ गाम-घरमे पूर्ण ज्ञानक किरिण नहि पहुँचि सकल अछि। ताहि कारणे एक गाम दोसर गामसँ लड़ैत-झगड़ैत अपना विकासकेँ अवरुद्ध कएने रहैत अछि। बेमारीकेँ डाइन-जोगिन आ भूत-प्रेतक प्रकोप मानैत अछि। ई समस्या सभ सहजहि एहि उपन्यासमे उपस्थित भऽ गेल अछि। एहि तरहेँ देखैत छी जे लेखक गामक यथार्थ जिनगीक चित्र उपस्थित कएने छथि, संगहि आदर्श रुप सेहो दृष्टिगत भऽ रहल अछि।
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जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
जगदीश प्रसाद मंडल

उपन्‍यास

जीवन संघर्ष-  2

अमावास्‍‍या दि‍न। आइये सॉंझमे ि‍दवाली आ ि‍नशांराति‍मे कालीपूजा हएत। अखन धरि‍क जे काजक उत्‍साह सभमे रहै ओ ठमकि‍ गेल। काजो आखि‍री रूपमे आि‍ब ओरा गेल। जहि‍ना साल भरि‍क अध्‍ययनक आखि‍री दि‍न परीछा दि‍न होइत, तहि‍ना। काल्‍हि‍ धरि‍ काजक गति‍सँ चलैत रहल। जइ दि‍न जेहन काज तइ दि‍न तेहन रफ्तार। मुदा आइ तँ आखि‍री ि‍दन छी तेँ काजक उनटा ि‍गनती कऽ लेब जरूरी अछि‍। हो न हो ि‍कछु छुि‍ट गेल हुअए। जँ छुि‍ट गेल हएत तँ पूजामे ि‍बध्‍न-बाधा पड़त। तहि‍ दुआरे पूजा समि‍ति‍क बैसार सबेर साते बजे बजौल गेल।
     आठे दि‍नमे गामक चुहचुहि‍ये बदलि‍ गेल। जहि‍ना हरोथ बॉंसक जि‍ड़ अधि‍क मोट रहि‍तहुँ बीचमे भुर कम होइत मुदा आगू आेहि‍सँ पात रहनहुँ भूर बेसी होइत तहि‍ना बँसपुरोमे बुि‍झ पड़ैत। जखन पूजाक दि‍न आगू छल तखन काज बेसी आ जखन लग आएल तँ कमि‍ गेल। काल्‍हि‍येसँ गामक धी-बहीनि‍ आबि‍ रहल अछि‍। ओना गामक सभ अपन-अपन कुटुमकेँ हकार देने, मुदा अबैमे दि‍वाली बाधक बनल छलै। दि‍वाली दि‍न घरमे नहि‍ रहने भूतक बसेराक डर सबहक मनमे नचैत। जहि‍सँ आगू आरो पहपटि‍ हएत। तेँ गामक जे धी-बहीनि‍ असकरूआ छलि‍ ओ भरदुति‍या ठेकना कऽ दि‍वालीक परात आओत। मुदा जेकरा घरमे दि‍यादनी वा सासु अछि‍ ओ ि‍कअए ने एक ि‍दन पहि‍ने आओत। नैहर छि‍यै ने। कते दि‍न माए-बाप, भाए-भौजाइ आ गामक सखी-सहेलीसँ भेंट भेना भऽ गेल छैक। तहूँमे जेकर नैहरक परि‍वार जेरगर छै ओ तँ साले-साल वा सालमे दुइओ-तीनि‍ बेरि‍ आि‍ब जाइत अछि‍ मुदा, जेकर परि‍वार छोट छै, जइमे कम काज होइ छै, ओ तँ दस-दस सालसँ नैहरक मुँह-ऑंखि‍ नै देखलक। गामक सौभाग्‍य जे काली-पूजा शुरू भेल। मुदा एकटा अजगुत बात भऽ गेलै। गामक धी-बहीनि‍सँ बेसी गामक सारि‍-सरहोजि‍ आबि‍ गेलै। गाममे बेसी साइर-सरहोजि‍ ऐलासँ गामक चकचकि‍ये बढ़ि‍ गेल। जइसँ छौड़ा-मारड़ि‍सँ लऽ कऽ बूढ़-पुरानक मुँहमे चौवन्‍नि‍यॉं मुस्‍की आि‍ब गेल। तहूँमे परदेशि‍या साइर-सरहोजि‍ आि‍ब कऽ तँ आरो रंग बदलि‍ देलक।
     दुखक दि‍न गौँआक कटि‍ गेल। सुखक दि‍न आि‍ब रहल अछि‍। ि‍कऐक तँ आठ दि‍न जे बीतल अो ओहन बीतल जे ने ककरो खाइक ठेकान रहै आ ने सुतैक। मुदा, आब तँ सभ पाहुन-परकक संग अपनो पहुनाइये करत। मरदक कोन बात जे जनि‍जाति‍यो खुशी जे भनसि‍या आि‍ब गेल। नीक-नि‍कुत खेनाइ, दि‍न-राति‍ तमाशा देखनाइ, अइसँ सुखक दि‍न केहेन हएत। तहूसँ बेसी खुशी ई जे भरि‍ मेला ने ककरो पैंइच-उधार करए पड़तै आ ने दोकान-दौरीक झंझट रहतै। ि‍कएक तँ दू ि‍दन पहि‍ने सभ अपन-अपन काज सम्‍हारि‍ नेने छल। महाजनोक बही-खाता बन्‍न रहत। मुदा, दि‍वालीक बोहनि‍क दुख महाजनक मनमे जरूर हेतइ। कतबो रेड़गड़ मेला ि‍कअए ने होउ मुदा, दूध-दही, माछ-माउसक अभाव नै हएत। पॉंच दि‍न पहि‍नहि‍ सुधा दूधक एजेन्‍ट आ माद-माउसक व्‍यापारीकेँ एडभांस दऽ देने अि‍छ। तहूमे काली-पूजा छी। ि‍बना बलि‍-प्रदाने पूजाे कोना हएत। बँसपुराक जनि‍जाति‍यो तँ ओते अनाड़ी नहि‍ये अि‍छ जे जोड़ा छागर कबुला नहि‍ केने होथि‍। पहि‍ल साल पूजाक छी। ि‍बना नव बस्‍त्र पहि‍रने पूजा कोना कएल जाएत आ धि‍या-पूजा मेला कना देखत? जँ से नइ हएत तँ ि‍क देवीक अपमान नहि‍ हेतनि‍।
     जइ जगहपर काली मंडप बनल ओइ ि‍ठमक आठे-दस कट्ठाक परती। सेहो आम जमीन। जइसँ एकपेरि‍यासँ लऽ कऽ खुरपेरि‍या लगा सौँसे परती रस्‍ते बनल। ओइ परतीक पछि‍म-उत्तर कोनमे लोक फुटल-फाटल माटि‍योक बरतन आ कपड़ो-लत्ता फेकैत। पूब-उत्तर कोनमे ि‍धया-पूजा झाड़ा फि‍रैत। दछि‍न-पछि‍म भागमे घसबाह सभ घास-घास खेलाइ दुआरे कतेको खाधि‍ खुनने आ दछि‍न-पूब कोनमे कबड्डी आ गुड़ी-गुड़ीक चेन्‍ह दऽ घर बनौने। काली-पूजाक आगमनसँ सौँसे परती छीलि‍-छालि‍ एक रंग बना देलक। जहि‍ तरहक मेलाक आयोजन भऽ रहल अछि‍ ओहि‍ ि‍हसावसँ जगहो छुछुन लगैत। मुदा रौदि‍याह समए भेने परतीक चारू भागक खेतक धान मरहन्‍ना भऽ गेलै, जेकरा काटि‍-काटि‍ सभ अगते माल-जालकेँ खुआ नेने छलै। तेँ मेलाक लेल जगहक कमी नै रहल। पनरह बघासँ उपरे खेतक आि‍ड़-मेि‍ड़ तोि‍ड़ चट्टान बना देलक। अगर जँ से नइ बनौल जाइत तँ मुजफ्फरपुरक ओहन नाटकक अँटावेश कोना हएत? ि‍कएक तँ जइ पार्टीमे बाजा बजौनि‍हारसँ लऽ कऽ स्‍त्री पाट खेलेनि‍हारि‍ धरि‍ मौि‍गये संगीतकार आ कलाकार अछि‍। परोपट्टाक लोक उनटि‍ कऽ नाटक देखए लेल आउत। तेँ कमसँ कम पॉंच बीघाक फील्‍ड देखि‍नि‍हार लेल चाहबे करी। से तँ भइये गेल। तइपर सँ वृन्‍दावनक रास सेहो अछि‍। नाटकसँ कनि‍यो कम नै। एकपर एक कलाकार अछि‍। मोट-मोट, थुल-थुल देह, हाथ-हाथ भरि‍क दाढ़ी-केश लऽ लऽ पार्टो खेलत आ नचबो करत। तेँ देखि‍नि‍हारोक कमी नहि‍ये रहत। मेल-फि‍मेल कौव्‍वालीक संग महि‍सोथाक मलि‍नि‍यॉं नाच सेहो अछि‍। एकपर एक चारू। ि‍कअए ने धमगज्‍जर मेला लागत। पूजा-समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे खुशी होइत मुदा, एकटा शंका सबहक मनमे रहबे करै। ओ ई जे एत्ते भारी मेलाकेँ सम्‍हारल कोना जाए? कतबो गौँवा जी-जान लगौत तइओ लफुआ छौँड़ा सभ छअ-पॉंच करवे करत। पौकेटमारो हाथ ससारबे करत। मुदा, की हेतै, मेला-ठेलामे कनी-मनी ई सभ होइते छै। केकरा के देखत आ ककर के सुनत। तहूमे रौतुका मसीम रहत की ने?
     दोकानो-दौरीक आयोजन सेहो बेजाए नहि‍। दुनू ढंगक दोकान। पुरनो आ नवको। नवका समानक लेल न्‍यू मार्केट एक भाग आ दोसर भाग पुरना बजार बैसल। ओना अखन धरि‍ दोकान-दौरी नीक-नहॉंति‍ नहि‍ जमल अछि‍ मुदा बेर टगैत सभ बनि‍ जाएत।
     न्‍यू मार्केटक चाक्-चि‍क्‍य दोसरे ढंगक अछि‍ जइमे ि‍बनुदेखलेहे समान बेसी रहत। दोकानदारीो सभ बहरबैये रहत। ऐहन-ऐहन सुन्‍नर चूड़ी एहि‍ इलाका लोक देखनौ हएत ि‍क नहि‍ ि‍क नहि‍ तेहन-तेहन चूड़ीक दोकान सभ आि‍ब गेल अछि‍। देखि‍नि‍हारोकेँ ऑंखि‍ उठि‍ जाएत। ि‍कअए ने उठत? एते दि‍न देखैत छल जे चूड़ी स्‍त्रीगणे बेचै छलि‍ अइबेरि‍ देखत जे पुरूखो बेचैए। तइमे तेहन-तेहन फोटो सभ दोकानक भीतरो आ बाहरो लगौने अछि‍ जे अनेरे आगूमे भीड़ लागल रहत। असली मनुक्‍ख छी आि‍क नकली से सभ थोड़े बुझत। फोटोए टा नहि‍ गीतो गबैबला तेहन-तेहन साउण्‍ड-बक्‍स सभ सजौने अि‍छ जे सभ ि‍कछु ि‍बस‍रि‍ जाएत। चूड़ी बजारक बगलेमे चेस्‍टरक दोकान लगल अछि‍। चूड़ी बजारसँ कम थोड़े ओहो बेपारी सभ सजौने अछि‍। काल्‍हि‍येसँ ऐहन-ऐहन प्रचारक मशीन सभ लगौने अछि‍ ि‍कयो थोड़े परखि‍ लेत जे आदमीक मुँह बजै छै ि‍क मशीन। परचारो ि‍क अरही-सुरही छै। समानक संग-संग पहि‍रैक लूरि‍ सेहो ि‍सखबैत अछि‍। धन्‍यवाद ओि‍ह बनौनि‍हारकेँ दी जे हाथी सन-सन मोट देहसँ लऽ कऽ खि‍रकि‍ट्टी देह धरि‍मे एक्‍के रंगक चेस्‍टरसँ काज चलि‍ जाएत। तहूमे तेहन डि‍जेनगर सभ अछि‍ जे एकटा छोड़ि‍ दोसर पसन्‍दो करैक जरूरत नहि‍ पड़त। जेकरा पाइ छै ओकरा एकटासँ मन भरत ओ तँ गेटक गेट कीनत। ि‍बल्‍कुल औटोमेटि‍क। दामो कोनो बेसी नहि‍ये रखने अछि‍ जे समानक बि‍क्री कम होतै। मात्र एगारहे रूपैया। बेपारि‍यो सभ तेहन ओसताज अछि‍ जे पहि‍ने पता लगा समान डि‍क देने अछि‍।
     चेस्‍टरक दोकानक बगलेमे खेलौनाक बजार अछि‍। वाह रे खेलौना बनौनि‍हार आ पँूजी लगा व्‍यापार केनि‍हार। दस रूपैयासँ लऽ कऽ हजार धरि‍क। बन्‍दूक, तोप, रौकेट, हवाइ जहाजक संग बम साइजि‍क खेलौना सभसँ दोकान भरने अछि‍। देखैमे असलि‍ये बुि‍झ पड़त मुदा, अछि‍ नकली। अोना असलेहे जेकॉं गोलि‍यो छुटैत, अवाजो होइत आ उड़बो करैत अछि‍।
     तीनि‍टा दाढ़ी केश बनवैबला बम्‍बैया शैलून सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तीनूमे महि‍ले कारीगर। मरदे जेकॉं अपन रूप बनौने। मुदा, मरदोसँ बेसी फुरति‍गरो आ बजबोमे चंगला। दाढ़ी कटबैकाल बुझि‍ये ने पड़त जे उनटा हाथ पड़ैए आि‍क सुनटा। हाथो मरदे जेकॉं मुदा, कने गुलगुल बेसी। शैलूनक बगलेमे साड़ीक बाजार। साि‍ड़यो सभ अजबे टँगने अछि‍। पुरजीमे रेशमी लि‍खि‍-लि‍खि‍ सटने मुदा, पटुआ जेकॉं छल-छल करैत अछि‍। कतौ ओचि‍ला नहि‍, एकदम पलीन। तेहन-तेहन पटोर सभ रखने अछि‍ जे बुझबे ने करबै ई भगलपुरि‍या रेशम छी ि‍क पटुआक। प्‍लास्‍टि‍कक मनुक्‍ख बना तेहन सजौने अछि‍ जे बुझि‍ पड़त ऑंखि‍क इशारासँ दोकान अबैले कहैए।
     राम-हि‍लोरा, मौतक कुऑं, हेलि‍केप्‍टर, जवाइ-जहाज, रेलगाड़ी, ि‍दल्‍लीक चौकक चरि‍ पहि‍या, छह पहि‍या गाड़ीक दौि‍ड़-बरहा सभ अछि‍। मुदा, जखन न्‍यू मार्केट घुमि‍ये लेलौं तँ बजार घुमि‍ये लि‍अ। क्‍यो छपड़ीक दोकान बनौने तँ ि‍कयो फट्ठाक खूँटापर बातीक कोरो बना प्‍लास्‍टि‍क दऽ घर बनौने अछि‍। ि‍कयो ि‍तरपाल टँगने अछि‍ तँ ि‍कयो ओहि‍ना घैला-डाबा इत्‍यादि‍ माटि‍क बरतन पसारने अछि‍। दोकानदारो सभ सुच्‍चा ग्रामीण। ऐँ ई तँ ि‍चन्‍हरबे दोकानदार सभ छी। पहि‍लुके दोकान झुनझुनाबला बुढ़बाक छी। चालि‍सो बर्ख उपरेसँ झुनझुना बेचैए। आब तँ बुढ़हा गेल। दुनू परानी दुनू दि‍शि‍ बैसि‍ ताड़क पत्ता झुनझुनाे बना रहल अछि‍ आ खजुरक पातक पटि‍या, बीअनि‍ सेहो सजौने अछि‍। तोरा तँ कनी कऽ चि‍न्‍है छि‍यह हौ झुनझुनाबला।’’
  ‘‘बौआ चसमा लगौने छी तेँ धकचुकाए छह। पहि‍ने चसमा नै लगवै छलौं। ऑंखि‍यो नीक छलाए। दू साल पहि‍ने ऑंखि‍ खराब भऽ गेल। तेँ अहीबेर लहानमे ऑंखि‍ बनेलौं।’’
     मुदा, झुनझुनावाली परेखि‍ कऽ बाजलि‍- ‘‘बौआ सोनमा रौ। जहि‍यासँ परदेश खटै लगलेँ तहि‍यासँ नै देखलि‍यौ। तूँ हमरा चि‍न्‍है छेँ?’’
  ‘‘नै।’’
तोहर मामाघर आ हम्‍मर नैहर एक्‍केठीन अछि‍। अंगने-अंगने झुनझुनो आ बि‍अनि‍यो पटि‍या बेचै छी। अहीसे गुजर करै छी। आब तँ भगवान सब ि‍कछु दए देलनि‍। दूटा बेटा-पुतोहू अछि‍। सातटा पोता-पोती अछि‍। दुनू बेटा घर जोड़ैया (राज ि‍मस्‍त्री) करैए। खूब कमाइए आब तँ अपनो ईटाक घर भऽ गेल। मुदा, दुनू परानी तँ ि‍जनगी भरि‍ यएह केलौं। आब दोसर काज करब से पार लगत। ओना दुनू भॉंइ मनाहि‍यो करैए। मगर हाथपर हाथ धऽ कऽ बैसल नीक लागत। तेँ जावे जीवै छी ताबे करै छी। तोरा माएसँ बच्‍चेसँ बहि‍ना लागल अछि‍। जहि‍या तोरा घर दि‍स जाइ छी तहि‍या ि‍बना खुऔने थोड़े आबए दइए। माएकेँ कहि‍ दि‍हैन जे अपनो दोकान मेलामे अछि‍। तोरा कइअ टा बच्‍चा छौ?’’
  ‘‘एक्‍केटा अछि‍।’’
  ‘‘एकटा झुनझुना बौआले नेने जाही।’’
  ‘‘ओहि‍ना नै लेबौ मौसी। अखैन हमरो संगमे पाइ नै अछि‍ आ तोहूँ दोकान लगैब‍ते‍ छेँ। ि‍बकरी बट्टा थोड़े भेलि‍ हेतौ।’’
  ‘‘रओ बोहनि‍क सगुन ओकरा होइ छै जे इद-बि‍द करैए। हम तँ अपन पोताकेँ देब। तइ लए बोहैनक काज अछि‍।’’
     दोसर दोकान रमेसराक लोहोक समान आ लकड़ि‍योक समानक अछि‍। हँसुआ, खुरपी, टेंगारी, पगहरि‍या, कुड़हड़ि‍, खनती, चक्‍कू, सरौता, छोलनीक संग-संग चकला, बेलना, कत्ता, रेही, दाइब, खराम, बच्‍चा सभक तीन पहि‍या गाड़ीक दोकान लगौने अछि‍। असकरे रमेसरा समान पसारि‍ खूँटामे ओगठि‍, टॉंग पसारि‍ बीड़ी पीवैत अछि‍।
     ‘‘रमेसरा रौ। सुनने रहि‍यौ जे तोहूँ दि‍ल्‍ली धए लेलेँ।’’
  ‘‘धुड़ बूि‍ड़, दि‍ल्‍ली हौआ ि‍छयै। जहि‍ना लोक कहै छै ने जे ि‍दल्‍लीक लडू जेहो खाइए सेहो पचताइए आ जे नै खेलक सेहो पचताइए। ि‍दल्‍लीसेट सभकेँ फुलपेंट, चकचकौआ शर्ट, घड़ी, रेि‍डयो, उनटा बावरी देखि‍ हमरो मन खुरछौही कटए लगल। गामपर ककरो कहवो ने केलियै आ पड़ा कऽ चलि‍ गेलौं। अपने जाति‍क -बरही- ऐठाम नोकरी भऽ गेल। तीन हजार रूपैया महीना दरमाहा आ खाइले दि‍अए। मुदा तते खटबे जे ओते जँ अपने गाममे खटलासँ कतेक बेसी होइए। घुरि‍ कऽ चलि‍ ऐलौं। जहि‍या सुनलि‍यै जे अपनो गाममे काली-पूजाक मेला हएत तहि‍यासँ एते समान बनौने छी। कहुना-कहुना तँ चारि‍-पॉंच हजारक समान अछि‍। कोनो ि‍क सड़ै-पचैबला छी जे सड़ि‍ जाएत। तोरा सभकेँ ने बुझ पड़ै छौ जे ि‍दल्‍लीमे हुंडी गारल अछि‍। हम तँ एक्‍के मासमे बुझ गेलि‍यै। जखन अपना चीज-बौस बनबैक लूरि‍ अछ तखन अनकर तबेदारी ि‍कअए करब। अपन मेहनतसँ मालि‍क बनि‍ कऽ ि‍कअए ने रहब। तू सभ ने अनके कोठा आ सम्‍पत्ति‍ कऽ अपन बुझै छीही। मुदा, ई बुझै छीही जे धनि‍कहा सभ तोरे मेहनत लूटि‍ कऽ मौज करैए। अखैन जो, कनी दोकान लगबै छी।’’
  ‘‘ई तँ रौदि‍या भैयाक चाहक दोकान बुझि‍ पड़ैए। अपने दोकान खोललह भैया?’’
  ‘‘हँ, बौआ। गामक मेला छी। एकर भीड़-कुभीड़ तँ गौँऐपर ने पड़त। ओहि‍ना जे टहलैत-बुलैत रहि‍तौं, तइसँ नीक ने जे दू पाइ कमाइयो लेब आ मेलाक ओगरबाहि‍यो करब।’’
  ‘‘बेस केलह। बरतन-वासन अपने छेलह?’’
  ‘‘नहि‍। रघुनाथ लग बजलौं तँ वएह अपन पुरना सभ समान देलक।’’
  ‘‘रघुनाथक दोकान तँ बड़ स्‍टेनडर भऽ गेलै।’’
  ‘‘चाहे दोकानक परसादे तीनि‍टा बेटि‍ओक ि‍वआह केलक आ ईंटाक घरो बना लेलक।’’
  ‘‘वाह बड्ड सुन्‍दर, बर बेस।’’
कते छोटका दोकानदार छपड़ि‍यो ने बनौने। काति‍क मास रहने ने वेसी गरमी आ ने वेसी जाड़। तहन ि‍कअए अनेरे बॉंस-बत्ती कीनि‍ घर बनौत। दूटा बॉंसक खूँटा गाड़ि‍ उपर बल्‍ला दऽ देत। ओहि‍पर केराक घौर टॉंगि‍ बेचत। कचड़ी पापड़ फोफी लेल माटि‍येमे चुल्‍हि‍ खुनि‍ लोहि‍या चढ़ा बनौत। मुरही पथि‍येमे रखि‍ ि‍डब्‍बासँ नापि‍-नापि‍ बेचत। झि‍ल्‍ली बनवैक सॉंचा तँ सभकेँ रहि‍तो ने छै, जे बनौत।
     झंझारपुरक आ मधेपुरक दस-बारहटा दोकानदार आि‍ब कऽ मेलाक चुहचुहि‍ये बदलि‍ देलक। गहि‍ि‍कयो ि‍चन्‍हरवे आ दोकानदारो सएह। तेँ सभसँ नीक कमाइ ओकरे सभकेँ हएत। नगद-उधार सभ चलतै। एक पॉंतीसँ सभ दोकान बना रहल अछि‍।
     पि‍तोझि‍या गाछ लग के झगड़ा करैए। कनी ओकरो देखि‍ लि‍अए। अरे ई तँ दुनू परानी ढोलबा छी। ‘‘ऐना ि‍कअए ढोल भाय अि‍बते-अबि‍ते ढोल जेकॉं दुनू परानी ढवढ़बाइ छह?’’
अवाज दाबि‍ ढोलबा बाजल- ‘‘हौ भाय, देखहक ने अइ मौि‍गयाकेँ, मेलासँ जेकरा जे हानि‍-लाभ होउ मुदा हमरा तँ सीजि‍न पकड़ाएल अछि‍। आगूमे छठि‍ अछि‍। परोपट्टाक लोक तँ कोनि‍यॉं, सूप, छि‍ट्टा, डगरी कीनबे करत। अोइ हि‍सावसँ ने समान बनवैत। से कहैए जे तीसे गो छि‍ट्टा-पथि‍या ि‍मला कऽ अछि‍। अट्ठारह गो सूप आ गोर पचासे कोनि‍यॉं अछि‍। उँटक मुँहमे जीरक फोरनसँ काज चलत?’’
  ‘‘अइ लेल झगड़ा ि‍कअए करै छह? फेरि‍ लऽ अनि‍हह।’’
ढोलबा कने गम खेलक मुदा, झपटि‍ कऽ तेतरी बाजलि‍- ‘‘अइ मरदावाकेँ एक्‍को ि‍मसि‍या बुइध छै। एतनो ने बुझैए जे आठे दि‍नमे कते बनवि‍तौ। दूटा ढेनमा-ढेनमी अछि‍ ओकरो सम्‍हारए पड़ैए। ई तँ भरि‍ दि‍न बॉंस, बत्ती, कैमचीक जोगारमे रहैए। कोनो ि‍क बजारक सौदा छि‍यै जे रूपि‍या नेने जाइतौं आ कीनि‍ अनि‍तौं।’’
  ढोलबा- ‘‘तूँ नै देखै छीही जे महि‍नामे पनरह दि‍न, काजक दुआरे नहेबो ने करै छी। तोँही छातीपर हाथ राखि‍ बाज जे एक्‍को दि‍न टटका भात-तीमन खाइ छी। डेढ़ बजे दू बजे हकासल-पि‍यासल बॉंस आनै छी, तखन गोटे दि‍न नहाइ छी ने तँ नहि‍ये नहाइ छी। धड़-फड़ा कऽ खाइ छी आ काजेमे लगि‍ जाइ छी। नि‍चेनसँ बीड़ीयो-तमाकुल नइ खाए-पीबए लगै छी। खा कऽ अराम केकरा कहै छै से तँ दि‍नकेँ सि‍हि‍नते लागल रहैए। तूँ की बुझबीही जे बॉंस टोनै, फाड़ै, गादि‍ लइमे कते भीर होइ छै। बैसल-बैसल बानि‍ चलबै छै तँ बुझि‍ पड़ै छौ एहि‍ना होइ छै। ई थोड़े बुझै छीही जे उठ-बैठ करैत-करैत जॉंघ चढ़ि‍ जाइए। अइसँ हल्‍लुक सए बेरि‍ डंड-बैठकी करब होइ छै। एते काज केला बाद जा कऽ बैसारी काज अबैए। बैसि‍यो कऽ कारा-कैमची बनैबते छी। गुन अछि‍ जे ताड़ी पीबै छी तेँ मन असथि‍र रहैए। मूड फरेस रहैए। तेँ ने कोनो काज उनटा-पुनटा होइए। ने तँ केकर मजाल छि‍यै जे एक्‍के दि‍नमे एते रंगक काज सरि‍या कऽ कए लेत। अच्‍छा हो, दोकान लगा। दोकान की लगेमे, कोनि‍यॉंकेँ तीनि‍ मेल बना ले। डगरी, सूप तँ एक्‍के रंग छौ आ छि‍ट्टाकेँ दू मेल बड़का एक भाग छोटका एक भाग कऽ के लगा ले। पॉंच गो रूपैया दे कनी ताड़ी पीने अबै छी।’’
  ‘‘अखैन रौद चरहन्‍त छै। अखैन जे ताड़ी पीबैले पाइ देवह से ि‍क हमरा गारि‍ सुनैक मन अछि‍।’’
  ‘‘ऑंइ गै मौगि‍या, तोरा बजैत एक्को पाइ लाज नै होइ छौ जे पुरूख रहि‍तो घरक भार सुमझा देने ि‍छयौ। संगीयो-साथी सदति‍ काल ि‍कचाड़ैए।’’
  ‘‘अच्‍छा रूपैया दइ छि‍य, मुदा फेरि‍ बेरू पहर नै मंगि‍हह। जाइ छह ते जा मुदा झब दऽ अबि‍हह। मेला-ठेला ि‍छयै असकरे हम दोकान चलाएब ि‍क बेदरा-बुदरी सम्‍हारब।’’
  ‘‘से ि‍क हम नै बुझै छि‍यै, मुदा दसटा दोस-महि‍म अछि‍। अगर भेंट-घॉंट भऽ जाएत तँ ि‍क कुशलो-क्षेम नै करब।’’
    
     बँसपुराक लड़कीक संग जे दुरबेबहार सि‍सौनीक दुर्गा-स्‍थानमे भेल ओहि‍ घटनाक समाचार तरे-तर चारू भरक गाममे पसरि‍ गेल छल। जेकर टीका-टीप्‍पणी गामे-गाम होइत छल। मुदा, एक रूपमे नहि‍। अधि‍कतर लोक एि‍ह घटनाकेँ ि‍नन्‍दा करैत तँ अल्‍पांश मनोरंजन कहैत। ि‍कछु गोटे फैशन बुझि‍ पाछुसँ अबैत बेबहार मानि‍ बजवे ने करैत। मगर सभ ि‍कछु होइतो ि‍ससौनीबला बँसपुराबलासँ सहमल। ऐहन घटना आगू नहि‍ हुअए तहि‍ लेल सि‍सौनीक बुद्धि‍जीवी सबहक मनमे खलबली मचि‍ गेल। ि‍ससौनि‍एक दयानन्‍द दरभंगा कओलेजमे प्रोफेसरी करैत छथि‍। गामक लोक तँ हुनका एकटा नोकरि‍हरा बुझैत छन्‍हि‍, मुदा, कओलेजमे छात्रोक बीच आ ि‍शक्षकोक बीच प्रति‍ष्‍ठि‍त व्‍यक्‍ति‍ बुझल जाइत छथि‍। अइबेर ओ दुर्गा-पूजामे गाम नहि‍ आि‍ब संगीक संग रामेश्‍वरम् चलि‍ गेल छलाह। मुदा, बालो-बच्‍चा आ पत्‍नि‍यो गाम आइल रहनि‍। वएह सभ रामेश्‍वरम् सँ एलापर घटनाक जानकारी देलकनि‍। घटना सुनि‍ प्रोफेसर दयानन्‍द मने-मन जरि‍ गेलाह। गुम्‍म-सुम्‍म भऽ सोचए लगलथि‍ जे ई कोन तमाशा भऽ गेल जे धरमक काजक दौर ऐहन अधर्म भऽ गेल। कोना लोकक मनमे धरमक प्रति‍ आदर रहत। धर्मस्‍थलमे जँ ऐहन-ऐहन वृत्ति‍ होयत तँ कैक दि‍न ओ स्‍थल जीवि‍त रहत? ककरो माए-बहीनि‍ कोनो घरसँ नि‍कलि‍ देबस्‍थान पूजा करए वा सॉंझ दि‍अए आओत। जते घटनाकेँ टोब-टाब करति‍ तते पैघ-पैघ प्रश्‍न मनकेँ हौड़ए लगलनि‍। मुदा, जे समए ससरि‍ गेल ओ उनटि‍यो तँ नहि‍ सकैत अछि‍। कोन मुँहे ओहि‍ गाम पएर देब। लोक की कहत? ओहू गामक (बँसपुराक) तँ अनेको वि‍द्यार्थी पढ़बो करैत अछि‍ आ पढ़ि‍ कऽ नि‍कललो अछि‍। ओ सभ की कहैत हएत। मुदा, आगू ऐहन घटना नहि‍ हुअए तेकर तँ प्रति‍कार कएल जा सकैत अछि‍। पाप तँ प्राश्‍चि‍तेसँ कटैत अछि‍। तहूमे अगुरबारे बँसपुरासँ काली-पूजाक हकार-कार्ड सेहो आि‍ब गेल अछि‍। तत्-मत् करैत मनमे एलनि‍ जे एकटा बेंग मरलासँ लोक इनारक पानि‍ पीि‍व तँ नहि‍ छोड़ि‍ दैत अछि‍। ओकरा नि‍कालि‍ गंधकेँ मेटबैक उपाइ करैत अछि‍। बँसपुराक काली-पूजाक आरंभ सेहो सि‍सौनि‍एक घटनाक प्रति‍क्रि‍या स्‍वरूप भऽ रहल अछि‍। हो न हो ऐकरे जबावमे ओहो सभ ने घटना दोहरा दि‍अए?
     काली-पूजा शुरू होइसँ तीन ि‍दन पहि‍ने प्रो. दयानन्‍द गाम आि‍ब, बीना कोनो मान-रोख केने गामक पढ़ल-लि‍खल उमरदार सभसँ सम्‍पर्क कए कहलखि‍न- ‘‘ि‍कछु गोटे गामक प्रति‍ष्‍ठा बुझबो करैत छलाह आ ि‍कछु गोटे बुझौलासँ बुझलनि‍। बुझला बाद एकमुँहरी सभ गाममे बैसार कए एकर नि‍राकरण करैक ि‍वचार व्‍यक्‍त केलकनि‍। दयानन्‍दक मनमे आगू डेग बढ़बैक साहस जगलनि‍। साहस जगि‍तहि‍ कओलेजक ि‍वद्यार्थी सभकेँ बैसार करैक भार देलखि‍न। दू ि‍दन समए बीति‍ गेल। जइ ि‍दन काली-पूजा शरू होएत तहि‍ ि‍दन भोरे सात बजे बैसार भेल।
     सात बजेसँ पहि‍नहि‍ दुर्गेस्‍थानमे सभ एकत्रि‍त भेलाह बैचारि‍क रूपमे गाम दू फॉंक जेकॉं भऽ गेल। तेँ अपन-अपन ि‍वचारकेँ मजबूत बनबैक ि‍वचार सभक मनमे। तीनू कार्यकर्ताक -जे सभ घटनामे शामि‍ल रहए- पि‍ता बैसारमे नहि‍ आएल। नहि‍ अबैक कारण ि‍वरौध नहि‍ लाज होय। तहूमे जखनसँ प्रो. दयानन्‍द दरभंगासँ आि‍ब घटनाक चर्चा चलौलनि‍ तखनेसँ मुँह नुकबए लगल। मुदा, मौलाइल घटना पुन: पोनगि‍ गेल। ओना गामक एक ग्रुप, जेकरा कुकर्मी ग्रुप कहि‍ सकै छि‍यै, बल प्रयोगक योजना तरे-तर बनौने रहै। जहि‍सँ कोनो रस्‍ते ने गाममे खुजतै। मुदा, गामक ि‍वशाल समूहक, जे अधला काजसँ घृणा करैत, एक रंगाह ि‍वचार। एक तरहक ि‍वचारक पाछु कते तरहक सोच अछि‍। ि‍कछु गोटेक सोच जे गाममे एकटा कुकर्मी समाज अछि‍ जे सदति‍काल ि‍कछु नहि‍ ि‍कछु करि‍ते रहैत अछि‍। परोछा-परोछी तँ एक-दोसरकेँ गाि‍र पढ़ैत अछि‍ मगर, बेर ऐलापर सभ एक मुहरी भऽ जाइत अछि‍। तेँ घटना ओहन अस्‍त्र छि‍यै जहि‍सँ ओि‍ह समाजकेँ काटि‍-काटि‍ लति‍औल जा सकैत अछि‍। ि‍कछु गोटेक वि‍चार जे जहि‍ना तीनू गोरे दसगरदा जगहपर जुल्‍म केलक तहि‍ना समाजक बीच लति‍औल जाए। ि‍कछु गोटेक ि‍वचार जे हम सभ मनुष्‍यक समाजमे रहै छी नहि‍ ि‍क जानवरक समाजमे। तेँ मनुष्‍यक समाज बने। भलेहीं मनुष्‍यक समाज बनबैक जे प्रक्रि‍या होइत अछि‍ ओि‍ह प्रक्रि‍याकेँ क्रि‍यान्‍वि‍त कएल जाए। ललबाक ि‍वचार सभसँ भि‍न्‍न। ि‍कएक तँ जहि‍ लड़कीक संग दुरबेबहार भेल छलै ओ ओकर ममि‍औत बहीन। ललबा कलकत्तामे डाइबरी करैत अछि‍। दुर्गापूजामे गाम आएल रहै। जहि‍ दि‍न घटना भेल ओइ दि‍न ओ बुझबे ने केलक। जखैनसँ बुझलक तखैनसँ देहमे आि‍ग लगि‍ गेलै। मनै-मन योजना बना नेने रहए जे धनि‍कक टेरही कोना झाड़ल जाइ छै से समाजकेँ देखा देब। नीक मौका। हाथ लागल हेन। मुदा, मनमे इहो शंका होय जे दयानन्‍द कक्‍काक आयोजन छि‍यनि‍ जँ कहीं आगूमे आि‍ब जेताह तँ सभ वि‍चार चौपट भऽ जाएत। सोचैत-ि‍वचारैत तँइ केलक जे चाहे जे होय मुदा, ि‍बना जुत्ति‍यौने नहि‍ छोड़ब। भलेहीं जि‍नगी भरि‍ जहलेमे ि‍कअए ने रहै पड़ै।
     गामक सभ टोलक लोक, गोटि‍-पंगरा छोड़ि‍, बैसारमे आइल। प्रो. दयानन्‍द उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ कहए लगलखि‍न- ‘‘अइ बेरक दुर्गा-पूजामे जे घटना गाममे घटल ओ समाजक लेल बड़का कलंक छी। एहि‍ घटनाकेँ जत्ते ि‍नन्‍दा कएल जाए ओते कम होयत। कते गोटे बुझैत हेबइ जे अनगौँवा लड़की छल मुदा, ई बुझब हमरा सबहक पलायनवादी ि‍वचार हएत। जइसँ रंग-वि‍रंगक अधलासँ अधला घटना रहत आ हम सभ मुँह तकैत रहब। तेँ ऐहन-ऐहन घटनाकेँ रोकए पड़त।’’
  ि‍वचहि‍मे जे ग्रुप हंगामा करए चाहैत छल उठि‍-उठि‍ हल्‍ला करए लगल। हल्‍ला देखि‍ सभ उठि‍ कऽ ठाढ़ भऽ ि‍वरोध करए लगल। ललबा प्रो. दयानन्‍द दि‍शि‍ तकलक। दयानन्‍द मुँहक रूखि‍ तँ नहि‍ बदलल मुदा, नोरसँ ऑंखि‍, करि‍या मेघ जेकॉं, लटकि‍ कऽ ि‍नच्‍चॉं मुँहे जरूर भऽ गेल दलनि‍। ि‍बजलोका जेकॉं ललबा चमकि‍ कऽ फॉंइट चलबए लगल। तीनूकेँ असकरे ललबा मारि‍ कऽ खसा देलक। जाबे सभ शान्‍त भेल ताबे तँ तीनूक गाल-मुँह फुइल गेल मुदा, तइयो ललबाक गरमी कमल नहि‍। जहि‍ना खून केनि‍हारकेँ आरो खून करैक गरमी खूनमे आि‍ब जाइत तहि‍ना ललबोकेँ भेल। मुदा, चारू दि‍ससँ सभ पकड़ि‍ घि‍चने-ि‍घचने कात लऽ गेल। दुनू हाथ पकड़ि‍ दयाबाबू फुसफुसा कऽ कहलखि‍न- ‘‘अगर समाजमे एक्‍कोटा बेटा अन्‍यायक ि‍खलाफ अपनाकेँ उत्‍सर्ग कऽ देत तँ सैकड़ो बेटा धरतीमाता गोदमे पैदा भऽ जाएत। मन थीर करह। ओना समाजक सभ तरहक समस्‍याक समाधान खाली मारि‍ये टा सँ नहि‍ होएत आ ने केवल पनचैति‍येसँ हएत। ि‍कएक तँ समस्‍या दू तरहक होइत अछि‍ पहि‍ल घटना वि‍शेषक परि‍स्‍थि‍ति‍ वि‍शेषक होइत जबकि‍ दोसर सत्ता-वि‍शेष वा व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक होइत अछि‍। अखुनका जे समस्‍या अछि‍ ओ व्‍यवस्‍था ि‍वशेषक छी तेँ ऐहन समस्‍याकेँ बलेसँ रोकल जा सकैत अछि‍। नहि‍ तँ कोनो नहि‍ कोनो रूपमे चलि‍ते रहत, मरत नहि‍।’’
  प्रोफेसर दयानन्‍दक ि‍वचार सुि‍न ललबा बाजल- ‘‘कक्‍का, अहॉं लग ि‍कछु बजैत संकोच होइए मुदा, आइ तीनूक खून पीवि‍ ि‍लति‍ऐक। भलेहीं ि‍जनगी भरि‍ जहले कि‍अए ने कटि‍तौं। फॉंसि‍येपर ि‍कअए ने चढ़ि‍तौं। की लऽ कऽ एलौं आ ि‍क लऽ कऽ जाएब। जखन मरनाइ अछये तँ लड़ि‍ कऽ ि‍कअए ने मरब जे सड़ि‍ कऽ मरब।’’
  ललबाक बात सुनि‍ मुस्‍कुराइत प्रो. दयानन्‍द कहलखि‍न- ‘‘अल्‍होमे लोक गवैत अछि‍ रनमे मरे दोख नहि‍ लागे। तहि‍ना महाभारतमे व्‍यासोबाबा कहने छथि‍न जे इन्‍द्रासनक अधि‍कारी वएह छी जे अन्‍यायक ि‍वरूद्ध रनक्षेत्रमे ठाढ़ भऽ अपन बलि‍ चढ़ौत। मुदा, जे भेल से उचि‍त भेल। एहि‍सँ आगू नहि‍ बढ़ह। अगर जँ एहि‍सँ सुधरि‍ जाएत तँ बड़बढ़ि‍यॉं नहि‍ तँ ओकर फल आन थोड़े भोगत। तूँ एतै रहह।’’
  कहि‍ आगू बढ़ि‍ दयानन्‍द सोचए लगलाह जे समाजक अध्‍ययन नीक नहॉंति‍ नहि‍ भेल अछि‍। लोकक जे रूखि‍ बनि‍ गेल अछि‍ ओ कखनो बेकाबू भए सकैत अछि‍। तेँ सभकेँ गामपर जाइले कहि‍ दि‍अए। कहि‍ तँ देलखि‍न मुदा ि‍कयो मैदान छोड़ै लऽ तैयार नहि‍ भेल। सभ अड़ल। वि‍चि‍त्र स्‍थि‍ति‍मे अपनोहु पड़ि‍ गेलाह। मनमे नाचए लगलनि‍ जे सभसँ पहि‍ने हमहीं कोना मैदान छोड़ि‍ देब। मुदा, रहनहुँ तँ लोक मानि‍ नहि‍ रहल अछि‍। दोहरा कऽ कहलखि‍न- ‘‘सभ गोटेक परि‍वार आइयेसँ नहि‍ बहुत दि‍नसँ एकठाम रहैत एलहुँ आ आगुओ रहब। तेँ सभकेँ मि‍लि‍-जुलि‍ रहैक अछि‍। ककरो संग ि‍कयो अधला करबै तँ झंझट हेबे करत। एक परि‍वारक झगड़ा गामक माने समाजक झगड़ा बनि‍ जाइत अछि‍। तेँ झगड़ाकेँ रोकैक उपाए एक्‍केटा अछि‍ जे ओहन कारणे ने उठै जहि‍सँ झगड़ा हुअए।’’
  कहि‍ घर दि‍सक रास्‍ता पकड़लनि‍। मुदा सभ मैदानमे डँटले रहल। प्रो. दयानन्‍दक ि‍वचारक असरि‍ तेनाहे सन लोकक मनपर पड़ल। ि‍कऐक तँ ऐहन-ऐहन घटना पूर्वमे अनेक भऽ चुकल अछि‍। जे सबहक मनमे उपकए लगल। दयानन्‍द बाट धेने आगूओ बढ़ल जाइत आ पाछु घुरि‍-घुरि‍ सेहो देखथि‍। जे फेरि‍ ने कहीं पटका-पटकी शुरू हुअए। ओना ककरो हाथमे ने लाठी अछि‍ आ ने हथि‍यार मुदा, देह तँ छैक। पॉंच बीघा आगू बढ़लापर पेशाब करैक लाथे बैसि‍ हि‍या-हि‍या देखथि‍। जे ि‍कयो हाथ-पएर ने तँ फड़कबैए। मुदा, से नहि‍ देखथि‍। पहि‍ने पारि‍ खेलहा सभ मैदान छोड़लक। पाछुसँ सभ अपन-अपन रास्‍ता धेलक। ठंढ़ाएल रूखि‍ देखि‍ अपनो उठि‍ कऽ वि‍दा भेलाह।
     घरपर आि‍ब प्रो. दयानन्‍द पत्‍नीकेँ कहलखि‍न- ‘‘बँसपुरा जाइक समए दसे बजेक बनौने छलहुँ मुदा, बैसारेमे बेसी समए लगि‍ गेल। तेँ आब नहाए नहि‍ लगब। झब दऽ खाइले ि‍दय। ताबे हाथ-पएर धोइ लइ छी।’’
  पति‍क बात सुि‍न पत्‍नी ि‍कछु नहि‍ बजलीह। बुझल रहनि‍ जे ऐना कते दि‍न भेल अछि‍ जे काजक धड़फड़ीमे नहाइये नहि‍ लगैत छथि‍।
     नउ बजे। बगुरबोनीक भगत कफलाक संग बँसपुरा काली-स्‍थान पहुँचल। भगतजीक हाथमे लोटा आ जगरनथि‍या बेंत। डलि‍बाह मनटुनक हाथमे सि‍क्‍कीक चौड़गर चंगेरी, जे मधुबनी बजारमे कीनने रहै। चंगेरीमे फूल-अछत, अगरबत्ती आ सलाइ रखने रहै। नि‍रधनक कन्‍हामे ि‍मरदंग लटकल। सवि‍या आ सैनि‍याक हाथमे झालि‍। सोमनाथ हाथमे एकटा बसनी; सरही आमक पल्‍लो आ पान-सातटा सुखल कुश। बुधबाक कान्‍हपर एकटा मुँठवासी बॉंस, जेकरा छीपमे आठ रंगक पताका आ तीन हाथ जड़ि‍सँ उपर ओहने रंगक कपड़ा टुकड़ा बान्‍हल। सभ एक सूरे काली महरानीक जय क नारा लगबैत।
     पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य बैसि‍ अपन काजक ि‍हसाब लगबैत रहै। छलगोरि‍या मुरतीक अंति‍म परीक्षण मंडपमे करैत रहए। भगतजीक ि‍क्रया-कलाप देखए लेल एक्‍के-दुइये लोक जमा हुअए लगल। पूजा समि‍ति‍क सदस्‍य अपन हि‍साब-वारी रोकि‍ भगतजी सभकेँ देखए लगल। काली मंडपक ओसारपर भगतजीक मेड़ि‍या सभ अपन-अपन समान रखि‍ हाथ-पएर धोय लेल बगलेक पोखरि‍ वि‍दा भेल। अछीजल भरै लेल सोनमा वसनी लऽ लेलक। भगतजीक हाथमे लोटा। हाथ-पएर धोय सभ ि‍कयो काली मंडपक आगू आि‍ब एकटंगा दऽ दऽ गोड़ लगलकनि‍। गोड़ लाि‍ग नि‍रधन मि‍रदंग चढ़बए लगल। सैनि‍यॉं, रवि‍या झालि‍ बजबए लगल। पोखरि‍सँ आि‍ब भगतजी हाथमे लोटा नेने ठोर पटपटबैत मंउपक आगू ठाढ़ भऽ ऑंखि‍ बन्‍न कऽ सुमि‍रन करए लगल। बुधवा मंडपक आगूमे थोड़े हटि‍ कऽ धुजा गाड़ए लगल। बरसपति‍या भगैत उठौलक- ‘‘हे काली मैया।’’ जना सभ काजक बँटबारा पहि‍ने कऽ नेने हुअए तहि‍ना। ठाढ़े-ठाढ़ भगतजी देह थरथरबए लगल। गोसाँइ आबि‍ गेलखि‍न। भगतजीक आगूमे डलि‍बाह दुनू हाथे डाली पकड़ने। थोड़े कालक बाद भगतजी चंगेरीमे सँ फूल-अछत लऽ उत्तर मुँहे खूब जुमा कऽ फेकलक। फेरि‍ फूल-अछत लऽ गंगाजीक नाओ लऽ दछि‍न मुँहे फेकलक। चाि‍र मुट्ठी चारू दि‍स फेि‍क पॉंचम मुट्ठी उपर फेकि‍ जोरसँ बाजल- ‘‘ओ..... ओ.....। कहि‍ अपन परि‍चए कालीक नाओसँ देलक। कालीक नाओ सुि‍न डलि‍बाह बाजल- ‘‘हे माए, ि‍कछु वाक् दि‍औ?’’
  भगत- ‘‘अइ जगहक भाग्‍य जमि‍ गेल। एकरा नि‍च्‍चॉंमे साक्षात् गंगाजी बहै छथि‍न ई स्‍थान बनने, गाममे कोनो डाइन-जोगि‍नक ि‍कछु नहि‍ चलत। एते दि‍न गामक लोक बड़ कलहन्‍तमे रहै छलै मुदा, आब सभ खुशीसँ रहत। कोनो कुशक कलेप ककरो नै लगत।’’
     गामक खुशहाली सुनि‍ पूजा समि‍ति‍क सभ सदस्‍यक मनमे नव आनन्‍दक जन्‍म भेल। देवनाथ पूछलक- ‘‘हे माए, अहॉं की चाहै छी?’’
  ‘‘ई स्‍थान हमर छी। अखन धुजा गारि‍ पीरी बनेलौं। सभ दि‍न पूजो करब आ बेरागने-बेरागन गोसाँइ खेलब। जेकरा जे कोनो उपद्रव देहमे हेतै ओ डाली लगौत। फूल दइते छुरि‍ जेतइ।’’
     धुजा गारि‍, पीरी बना बुधबा तुलसि‍यो गाछ रोपि‍ देलक। समि‍ति‍क सभ चुपचाप भऽ देखैत रहै। ककरो मनमे कोनो शंके नहि‍ उठल। ि‍कएक तँ अनेको स्‍थानमे गहवरो रहैत अछि‍। मुस्‍की दैत देवनाथ पूछलक- ‘‘हे मैया, अपन कोनो पहचान दि‍औ?’’
  झपटि‍ कऽ भगत बाजल- ‘‘तू जे जानक बदला जान गछने रहह से देलह। जखैन जान गड़ूमे रहह तखैन के बचौने रहह। गड़ू मेटा गेलह तँ सभ ि‍कछु बि‍सरि‍ गेलह। अखनो धरि‍ जे बचल छह से स्‍त्रीऐक धरमे। जेहने तोहर स्‍त्री धरमात्‍मा छह तेहने तू पापी छह। ओकरे धरमे अखन धरि‍ बचल छह। नइ तँ कहि‍या ने तोहर नाश भऽ गेल रहि‍तह।’’
     भगतक बात सुि‍न देवनाथक मनमे लड़कीबला घटना ठनकल। मुदा, ि‍कछु बाजल नहि‍। चुपचाप दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल- ‘‘हे माए, ि‍बसरि‍ गेल छलौं भने मन पाड़ि‍ देलह।’’
  देवनाथपर सँ नजरि‍ हटा भगत जोगि‍नदरकेँ कहलक- ‘‘तूँ जे कबुला केलह से देलह। जखैन जान उकड़ूमे फँसल रहह तखन कते बेर कहि‍ कऽ गछने रहह। ओना तोहर बारह आना ग्रह कटि‍ गेलह सि‍र्फ चारि‍ आना बँचल छह। तेँ दान-पुन कऽ कऽ जल्‍दी ओकरो मेटाबह।’’
     जोगि‍नदरकेँ ओहि‍ राति‍क घटना मन पड़ल जहि‍ राति‍ रूपैया लऽ सेठक ऐठामसँ पड़ाएल रहै। दुनू हाथ जोि‍ड़ बाजल- ‘‘हे मैया, ठीके बि‍सरि‍ गेल छलौं। जलदि‍ये तोहर कबुला पूरा करबह।’’
     बीच-बचाव करैत डलि‍वाह बाजल- ‘‘आइ पहि‍ल दि‍न गोसॉंइ जगबे कएलाह अइसँ बेसी आब कोनो काज ने हएत।’’
     डलि‍बाहक बात सुि‍न भगत उत्तर मुँहे ठाढ़ भऽ दुनू हाथ उठा ऑंखि‍ मूनि‍ लेलक। काली देहसँ नि‍कलि‍ गेलखि‍न। सामान्‍ये आदमी जेकॉं भगतो भऽ गेल। झालि‍-मि‍रदंग, भगैत सेहो बन्‍न भऽ गेल। ऑंखि‍क इशारासँ भगत डलि‍बाहकेँ कहलक- ‘‘काज सुढ़ि‍आइल अछि‍।’’
  ऑंखि‍क इशारासँ डलि‍वाह उत्तर देलक- ‘‘हँ।’’
     समि‍ति‍क सदस्‍य भगत लगसँ हटि‍ पुन: बैसारमे आि‍ब गेल। मुदा, एकटा नव समस्‍या समि‍ति‍क सामने उपस्‍थि‍त भऽ गेल। समस्‍या ई जे ि‍क गहबरो बनौल जाए आि‍क धुजा उखारि‍ कऽ फेि‍क देल जाए। मुदा, दुनू तरहक वि‍चार उठि‍ गेल। ि‍कदु गोटे गहवरक समर्थनो केलक आ ि‍कछु गोटे ि‍वरोधो केलक। बीचमे मंगलकेँ ि‍कछु फुरबे ने करै। मने-मन सोचै जे ई तँ बेरि‍ परक भदबा आि‍ब गेल। जँ मनाही करव तँ शुभ काज अशुभेसँ शुरू िहएत। जँ नहि‍ करब तँ सभ दि‍ना भदवा टाढ़ भऽ जाएत। भगतकेँ मंगल ि‍चन्‍हतो नहि‍ रहए मुदा, बगुरबोनीक भगतक ि‍वषएमे बुझल रहै जे एकटा कोखि‍या गुहारि‍ केनि‍हार भगत जहल गेल रहए।
क्रमश: ........
 
१.बेचन ठाकुर-नाटक छीनरदेवी- आगाँ २.सरोज खिलाडी’-  नाटक- ललका कपड़ा

बेचन ठाकुर
नाटक छीनरदेवी- आगाँ
दृश्‍य चारि‍म

     (स्‍थान- सुभाष ठाकुरक आवास। सुभाषक पीसा घटकराज ठाकुर थि‍काह। दुनू    आदमी दलानपर बैसि‍ कऽ गप-सप्‍प करैत छथि‍। ललन चश्‍मा आ फाटल-    चि‍टल वस्‍त्र पहि‍र बताह भेषमे एम्‍हर-ओम्‍हर, दर्शकक बीचमे घुि‍म रहल अछि‍।)

घटकराज-   बौआ, राति‍मे ि‍कएक फोन कएने रही? तखन हम गामपर नहि‍ रही,             पोखरि‍ ि‍दशि‍ गेल रही।
सुभाष-     की कहि‍यऽ पीसा। कहैत लाजो होइत अछि‍। मुदा कहबह नहि‍ तँ             बुझबहक कोना? हओ, ललनमाकेँ छीनरदेवी लागल अछि‍ तेँ ओ बतहपनी           करैत अछि‍। एगो नीक भगत कहलनि‍ जे एकर ि‍बयाह जल्‍दी कर,              ठीक भए जेतौक। एहि‍ ि‍वषयमे गप केनाइ अनि‍वार्य छल। एकरा लेल            केतौ लड़ि‍कीक जोगार करहक।
घटकराज-   बौआ, हमरा लग लड़ि‍का-लड़ि‍कीक जुगार सदि‍खन रहि‍तहि‍ अछि‍। मुदा          एखन तँ नहि‍ अछि‍ आ तोरा करबाक छह जल्‍दीए। खएर एगो उपए              छह एकरा कहुना कऽ दवाइ ि‍खया-पि‍या कऽ शांत कऽ अमोलागाछी लऽ          चलह। ओतय एहेने जरूरीबला ि‍बयाहक लड़ि‍का-लड़ि‍की प्रति‍दि‍न आबैत         अछि‍ आओर काली मंदि‍रमे ि‍बयाह होइत अछि‍। आइ एगो लड़ि‍की              अवश्‍य आएल हेतीह। मुदा ओतए लेन-देनक कोनो गप नहि‍ होइत             अि‍छ। मंदि‍रक पुजारी दु-चाि‍र बेर फोन हमरा प्रति‍दि‍न करैत छथि‍।
घटकराज-   ि‍बलंब जुि‍न करह, नहि‍ लड़ि‍की उठि‍ जेतीह। ओना हम पुजारीकेँ फोन               कऽ दैत छि‍यन्‍हि‍ जे हम लड़ि‍का लऽ कऽ जल्‍दी आबि‍ रहलहुँ अछि‍।
     (घटकराज पुजारीकेँ फोन करैत छथि‍। एहि‍ बीच सुभाष ललनकेँ दवाइ ि‍खया-     पि‍या कऽ शांत करैत छथि‍। मीराकेँ बजा कऽ ललनकेँ चि‍क्‍कन कपड़ा पहि‍राबैत छथि‍। पूर्ण तैयार भऽ कऽ सुभाश, ललन आ घटकराज अमोलागाछी जाए रहलाह अछ। ि‍कदु देर ओ सभ ओतए पहुँचि‍ गेलाह। पर्दा हटैत अछ।      काली पंदि‍रमे पुजारी श्री ि‍वनोद झा घंटी डालए पूजा करैत छथि‍। सुभाष,   ललन अो घटकराज माथ टेि‍क प्रणाम करैत छथि‍। ि‍वनोद झा उँ श्री काल्‍यै    नम: मंत्र जपि‍ रहल छथि‍। सुभाष तीनु आदमी कालीकेँ प्रणाम कऽ बैसैत छथि‍। दोसर कात लड़ि‍की अनुअंजना अपन माए-बापक संग बैसल छि‍थ।      लड़ि‍कीक बाप बलदेव महतो आओर माए मालती देवी छथि‍न्‍ह।)
बलदेव-     पंडीजी, हमरा लोकनि‍ कखनसँ बैसल छी?
वि‍नोद-     से हम की करब? लड़ि‍का अएलाह एखन। ि‍बना लड़ि‍कहि‍ ि‍बयाह             होयतए।
मालती-     पंडीजी, लड़ि‍का ओतए छथि‍। की?
ि‍वनोद-     हँ हँ, वएह होएताह छोट अहॉंक दमाद।
मालती-     हनु अंजना बाउ, लड़ि‍का तँ बड खाप-सूरत कच्‍छे नि‍मन अछि‍। आओर         समधि‍ सेहो राज कुमाररहि‍ जेकॉं छथि‍। यै अनु अंजना बाउ, एक गोट        गप्‍प कहु।
बलदेव-     कहु ने, की कहए चाहैत छी?
मालती-     हमहुँ आइए समधि‍सँ ि‍बयाह कऽ लि‍अ।
बलदेव-     हँ हँ हँ हँ, औगतहु नहि‍। जुलूम भऽ जाएत। हम कोना जीयब।              एक्‍कोटा बकरीयाे नहि‍ अछि‍।
ि‍वनोद-     आउ जजमान सभ। आबै जाइ जाउ आ मैया कालीक दरवारमे बैसै            जाउ।
     (एक कात लड़ि‍काबला, दोसर कात लड़ि‍कीबला आ बीचमे पंडीजी बैसैत    छथि‍। पंडीजी लड़ि‍का-लड़ि‍कीक हाथमे गंगा जल दैत छथि‍न्‍ह।)
     पढ़ु- ओम अपवि‍त्रो पवि‍त्रो भव- 5
दुनू (ललन ओ अनु अंजना) ओम अपवि‍त्रो पवि‍त्रो भव- 5

ि‍वनोद-     अपन-अपन देहकेँ ि‍सद्ध कऽ लि‍य।
     (ललन अो अनुअंजना जल देहपर छीटि‍ लैत छथि‍।)
पढ़ु- ओम श्री गणेशाय नम: -5
दुनू-       ओम श्री गणेशय नम: -5
ि‍वनोद-     ओम श्री काल्‍यै नम: -5
दुनू-       ओम श्री काल्‍यै नम: -5
ललन-     पंडीजी, ि‍बयाह कखन होएत, से मंत्र पढ़ुने।
वि‍नोद-     एखन कुम्‍हारम भए रहल अछि‍ आओर ि‍बयाह राति‍मे हएत।
बलदेव-     पंडीजी, एना ि‍कएक यौ?
अनुअंजना-   ठीके कहैत छथि‍ लड़ि‍का। एत्ते देरी कतउ ि‍बयाहमे होअए। हम ि‍बयाह          नहि देखने छी की? एहेन-एहेन कतेको ि‍बयाह देखने छी आ कऽ कए              छोड़ि‍ देने छी।
    (दुनू पक्ष एक-दोसरकेँ मुँह देखैत छथि‍।)
ि‍वनोद-     अहॉं सभ औगतउ नहि‍। एि‍ह दरबारमे सभ कलेश नष्‍ट भए जाइत             अि‍छ। अहॉं माए कालीपर पूर्ण भरोसा राखू। पढ़ु अहॉं दुनू गोटे- गौरीशंकरभ्‍याम् नम: -5
दुनू-       ओम गौरी शंकराभ्‍याम नम: -5
     (दुनूकेँ ि‍सन्‍दुरदान करए कहैत छथि‍ पंडीजी।लड़ि‍का-लड़ि‍कीक मांगमे भुसना सेनुर दैत छथि‍। पंडीजी दुनूकेँ लठबंधन कराए काली देवीकेँ गोर लगबैत छथि‍। फेर सभ ि‍कयो गोर लागैत छथि‍। हल्‍लुक नश्‍ता-पानि‍ होइत अछि‍।)

ललन-     पंडीजी, आब हमरा लोकनि‍ जा सकैत छी घर?
ि‍वनोद-     हॉं हॉं हॉं हॉं, रूकु। सुभाष बाबू ओ बलदेब बाबू, पहि‍ने दक्षि‍णा दि‍अ           तहन जाएब।
सुभाष-     कतेक पंडीजी?
ि‍वनोद-     मात्र एक सए एक टाका।
बलदेव-     हमरा कतेक लगतैक पंडीजी?
ि‍वनोद-     अहॉंकेँ मात्र एकावन टका।
     (दुनू आदमी पंडीजीकेँ दक्षि‍णा देलनि‍ आ आशीर्वाद लऽ कऽ अपन-अपन घर हेतु प्रस्‍थान। लड़ि‍का-लड़ि‍की दुनू एक-दोसरक कन्‍हापर हाथ राखि‍ कऽ शानसँ जा रहल छथि‍ पाछु-पाछु)

पटाक्षेप
दृश्‍य पॉंचि‍म क्रमश:

२.
सरोज खिलाडी
  नाटक- ललका कपड़ा                        
नेपालके पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक
                      
     
(पहिल दृृश्‍य )

(रबिन्‍द्रबाबुके दलानपर बेटीवला आयल छैक अपन बेटीके विवाहके लेल बातचित चलावला । दलानपर रविन्‍द्रबाबु आ लिलाम्‍बरजी (बेटीबला) विवाहक बातचित चलारहल छथि ।)

रबिन्‍द्रबाबु – ( समझबैत ) देखियौ अहँा सँ सम्‍वन्‍ध करबाकेलेल हम एकदम तैयार छि । अहाँके घरमे हम अपन बेटाके सम्‍बन्‍ध करब यि त सपनोमे नै सोचने छलौ ।

लिलाम्‍बरजी नैनै अपने यि कि कहल जाय छै । अपनेसँ हम कुटमैती करव यि त हमरालेल  अहो भाग्‍य अछि । हम आय बहुत खुश छि ।

रबिन्‍द्रजी मुद्दा एकटा बात ।

लिलाम्‍बरजी – ( घवराति ) कोन बात  ?

रबिन्‍द्रजी हमर इच्‍छा अछि कि, आन विवाह स या कहि दोसर गाउँके विवाह स कनेक हटि क अपन बेटाके विवाह करी । ताकि लोको कहे कि हँ रबिन्‍द्रबाबु किछु नाँयापन देखिलखिनहँ अपन बेटाके विवाह स ।

लिलाम्‍बरजी कहलजाय  न त केहन नयाँपन ?

रबिन्‍द्रबाबु देखियौ विवाह दानमे कतौ देवलेव नै होइछै मुदा अै विवाहमे हम अहँा देबलेव करु ।

लिलाम्‍बरजी देबलेब ? ( घबराक ) केहन देबलेब ?
रबिन्‍द्रबाबु –( मजाक क कऽ ) केहन देबलेब । किछ ददिअ, ५ छिटी मकै ददिअ । मरुवा ददिअ, धान ददिअ । जाय स सारा गाँउमेे यि हल्‍ला चले कि, फलना गाँउमे फलनाके घरमे बिवाहमे धान,मकै मरुवा सन चिज लेलकैय ।

लिलाम्‍बरजी– ( हसैत ) मकै, धान, मरुवा,  ठिक छै कोनो बात नै, हम अहँाके देवाके लेल तैयार छि । चलु ओमहर जा कऽ बातचित करिछि ।
          ( दुनु आदमी उठिछथि आ आगा बढिछथि )


रबिन्‍द्रबाबु हमरा बिचारमे अैगला महिनामे विवाहके दिन राखलजाय ।
लिलाम्‍बरजी जी, हमरो बिचार सयाह अछि ।
   ( ओ सव बातचित करैत आगा बढतिछथि । रस्‍तामे एकटा घैला राखल रहैय । घैलामे कोनो राक्षसके मुहँ बनाओल रहिछै । रविन्‍द्रबाबु बातचित करबाके क्रममे वै घैलाके लात सँ मारिछथि आ वो घैला फुटिजाइछै । घैला फुटिते एकटा तुरुन्‍तके जन्‍मल मुद्दा आन बच्‍चा सँ फरक किसिमके बच्‍चा निकलैय आ जोर जोर सँ हाँस लगैय । हसैतहसैत वो बच्‍चा उडिजाइछै । आ जा क बैसैछै एकटा पहाड पर । )

नेपथ्‍यसँ ः– ( अहि प्रकार स गाउँ गाउँमे विवाहमे किछ ल कऽ विवाहके उत्‍सव मनेबाके चलन चल लागल । आ जन्‍मल ( बच्‍चाके अवाजमे ) दहेज१० )

( दृश्‍य २ )
( गाउँके दृश्‍य अछि । साँझके समय बस्‍ती स कनेक आगा खेत दिस ३ टा युवा मदिरा सेवन क कऽ एक दोसरके बातके काट पर भिरल छथि । )

युवा १सुन हमरवात । हम ओहिना नै दारु पिलीयौव्‍ा । अपना गाउँके खपटी बुढीया जे छौनै उ बुढीया चलैत चलैत गीरपरलैय । हमरा दाया लागिगेल आ जा कऽ ओक्रा हम उठादेलियौव वै के वाद ओ बुढीया हमरा कथि कहलक बुझल छौ ?
( युवा २ आ ३ ) ( एकवेर )ंकथि ?
युवा १ धन्‍यबाद बौवा । जहिना तो हमरा उठादेलेहँ तहिना भगवान तोरोउठादेथुन । हमरा जे भगवान उठादेतै त हमर बालबच्‍चाके के पोसि देतै ?
युवा २ तोहर दुख कोनो दुख नै छौ हमरा दुखके आगामे । सुन ह म कथिला मदिरा सेबन कैलियौव । हमरा घरमे एतेक मच्‍छर छौ । राइतमे जे हम सुतऽ जबौ, हमरा उ मच्‍छरसब एतेक माया करतौ, एतेक माया करतौ कि कि कहियौ । सव मच्‍छरसव मिलक ऽहमराउठाकऽ घरके  खपरा छुवाबके प्रयाश करतौ ओमहर उडिससव मिलकऽ हमरा भितर स जोर स पकरने रहतौ । बलु नै लजायदेबौ । बातो ठिके है । मच्‍छर सब जे हमरा लजायत खपरा छुवाबला आ कहु उपर छोरिदेलक त हम त गेली हाबा खाय । देह हात टुटीजायत । धन्‍यवाद देइछी वै उडिससबके जे कमतीमे पकरने रहैय । राइतभैर अै मच्‍छर आ उडिसके लडाइ स तंग भऽक हम मदिरा सेबन कैलीयौव ।

युवा ३ तोहर दुनुके समस्‍या तकिछ नै छौ हमरा सामनेमे ।
-       घोडाके अवाज अवैत अछि । तखने एकटा युवक जोर जोर सँ बाजलगैय । भागुभागु दहेज आवीरहल अछि । हो काका हो भागा होउ गे दाइ गे भाग गेइ मँगलाके माइ गे भाग गेइ दहेज आबिरहल छौ । गाउँमे कुताके भूकनाइ तक बन्‍द । तखने राक्षस सन मनुष्‍य सबके घोडापर प्रवेश होइत अछि । १ टा राक्षस आगाआगा आ ६७ टा राक्षस पाछापाछा घोडा सँ अबैत अछि )

                दृृश्‍य ३
(राक्षस पुरा गाउँ पर नजर फेरैत बजैय ।)



दहेजदहेजके अै गाउँमे अबिते कुताके भुकनाइ बन्‍द । सुन गँउवासब
तोरा सबके साइत हमरा नै समझाव परत कि, जे हमर बात नै मानै छै  ओकर कि हाल  होय छै । जखन हम सबके कहिदेने छियौ कि, अै गाँउमे, पुरा देशमे संसारमे यदि ककरो विवाह होतै त देवलेव होवहीके चाहि । वैके बाद सब स पहिले हमरा न्‍यौता परके चाहि, मुद्दा अै गाउके चलितरा हमरा अपन माउस खायके लेल नेयौता देलक । (बजबैत) हिरिङगा ।
               ( पाछा स घोडा पर बैसल एकटा राक्षस )

हिरिङगा भगवान ।
   दहेज चलितराके घरमे जो ओकरा पिटैत निकाल ।
-       हिरिङगा चलितरके पिटैत धकियबैत निकालै छै आ घरक लोक चलितरके छोडाबके लेल हात पैर जोरैत कनैत निकलैय )

हरिङगा   ( दहेज स ) भगवान, सार आबके लेल माइन्‍ते नै छल ।

दहेज हिमऽऽ । किरे चलीतरा, बेटाके विवाह मंगनीएमे करैछे नइ ? हमरा न्‍यौता तकनै पठौले । ( घोडा  पर सँ उतरैत घेटके तरबार स उठबैत )
दहेज ःहरिङगा ।
हरिङगा जी भगवान ।
दहेज लाद एकरा घोडा पर आ लचल । आइ एकरे माउस आ मकैके भुटन चलतै ।
-       घोडा पर  लदैत ओकर घरक लोकके लात स मारैत घोडापर बैसैय  हरिङगा )
दहेज याद कले गउवाँसब, जे अपन बेटाके विवाह बिना दहेज के करबे तकर याह हाल हौतौ ।
-       प्रस्‍थान ) 
                   ( दृश्‍य ४ )

-       नेपथ्‍यस समय वितैत गेल । बहुतो मरल बहुतो बिलटल आ बहुतो बरवाद भेल दहेजके कारण । समय परिवर्तन होइतगेल ।ं)

-       किछ युवा सब क्‍याम्‍पसके प्राङगनमे बैसकऽ छलफल करैत )

युवा १ आखीरमे कहिया तक चलतै यि दहेजक मनोमानी । गाउँमे आबीकऽ ककरो पिटैछ,ै ककरो मारैछ,ै धमकबै छै दहेज लेबाके लेल । अहि दहेजके कारण कतेके बेटी कुमारी बैसल छै । कतेक आत्‍महत्‍या कलेलकै आ कतेक डूविकऽ मरिगेलै । आखीर हमअहाँसब नै भिरबै त यि  अत्‍याचार दिनके दिन बढल जतै । एकरा रोक परलै ।

युवा २ खाली विचार कैला सँ किछ नै हयात । हम त कहैछि  चलु अखन आ सब केउ मिलकऽ वै दहेजके कपाड हात फोरि देइछि ।

युवा ३ नैनै । औगता क निर्णय नै कर ।

युवा २ अरे भारमे जाए तोहर सल्‍लाह । ( युवा तर्फ ) रेइ चल अखन सारके कपार हात फोरिदेइछियै ।
-       किछ युवासब युवा २ के साथमे पाछापाछा जाइछथि )

(दृश्‍य ५)

-       दहेज अपन अंगरक्षकके साथ पहाड पर थारमे माउस राखीक खाति रहैय )

दहेज – ( हसैत ) चलितराके माउस बडि स्‍वादिष्‍ट छौ रौ ? बड निक माउस छौ आइके ।

-       तखने युवा सबद्धारा दहेजपर आक्रमण होति अछि । एकटा युवा दहेजके चैला सँ १०२० बेर कपारपर मारैछथि । मुद्दा दहेजके किछ नै होति अछि । दहेज हसैत रहैय । बल्‍कि दहेज २३ टा युवाके पकैर कऽ मारि देइछै आ किछु युवा भागि जाति अछि ।

(दृश्‍य ६)

-       फेर सँ किछु युवासबके जमघट बैसल अछि । )
युवा १ वै राक्षसके कतबो मारलकैय कपारपर किछ नै भेलैया । हमरा बुझाइय मारला पिटला सँ यि दहेज हटवला नै छौ ।

युवा २ मारला पिटला सँ कहादुन । रेइ ओकरा तरवार स मारलीयैय ५६ बेर तैयौनै किछ भेलैय । 

युवा ३हमरा बुझाइय नैत यि हटतै नैत कटतै नै त मरतै ।

युवा ४ हमरा लंग एकटा उपाय छौ ।
     ( सब युवा सब एकेबेर ं)

युवा सब कोन उपाय ?
-       युवा ४ एकटा युवाके कानमे किछु कहैछथि अछि प्रकार सँ सबके सब एकदोसरके कानमे किछ कहैछथि )

(दृुश्‍य ७)
-       एकटा युवा दहेजके पहाडपरजाकऽ कनिका दुरे सँ दहेजके अकेलेअकेले फर्चियाबके लेलधम्‍की देइछथि । बाकी १०१२ टा युवा नुकायल ढुक्‍का लागल रहैछथि ।)
युवा रेइ दहेज रे मर्दाबाके बेटा छे त आ अकेलेअकेले फर्चियाले । रे दहेज लेइछे काहाँदुन । माइ करे कुटाओन पिसाओन पुतके नाम दुर्गादत । कोढीया । आ एकले देखैछियौ कतेक मायके दुध पिने छे । ३२ सो दात नै तोरिकऽ  हातमे धरादेलियौ त देखिहे ।

(दृश्‍य ८)

-       दहेज गरम लोहाजका लाल भऽक सबटा अंगरक्षक राक्षसके आदेश देइछथि । ­)
दहेज हम ऐकरा माइर कऽ अवैछि । तोसब अहि ठाम रह ।
-       दहेज अकेले दौरैछथि युवाके मारला । युवा भगैत भगैत कनेका दुर लजाइत अछि । तखने १०१२ टा युवा आर्दश विवाह लिखल बरका लाल बैनर लऽक अबैय । दहेजके ओ बैनेर देखेत होस उडी जाइछै । दहेजक अंगरक्षकसब हमला करैछथि युवासबपर मुद्दा युवासब केउ अपना जेवी सँ रुमाल निकालैछथि त केउ सर्ट खोली कऽ गंजी मात्र पहिरकऽठारह भजाइछथि । तहिना केउ बैनर पकरने रहैय । गंजी आ रुमालपर आर्दश विवाह लिखल रहैछै । ओ देख देख कऽ सब राक्षस सब केउ घेट पकैरक त केउ तलमला तलमलाकऽ चिच्‍चाचिच्‍चा कऽ मैर जाति अछि । दहेज भागऽ लगैये पहाडदिस । सबयुवासब दहेजके खेहार लगैय । खेहारैत खेहारैत दहेजके पकैर कऽ अर्दश विवाह लिखल ललका कपडा सँ दहेजके झापी देइछै ।
आ ललका पकडाके हटैलाके बाद ओहि ठाम छाउर मात्र रहैछै ।              जाहिके देख कऽ युवासबके मुखपर मुस्‍कान आविजाइछै । ओसब आर्दश      विवाहके ललका कपडा लऽक अगा बढैत फ्रिज भजाइछै ।


१. बेचन ठाकुर,नाटक-छीनरदेवी२.राधा कान्त मंडल रमण’-कने हमहूँ पढ़व
बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार।
छीनरदेवीबेचन ठाकुरक-



बेचन ठाकुर
(
चनौरा गंज)
दृश्य तेसर

(
स्थान-सुभाष ठाकुरक घर। दुनू परानी ललनक विषएमे गप-सप करैत छथि।)
मीरा- यै ललनक बाबू, हमर विचार अछि जे आब ललनकेँ कोनो बढ़ियाँ धाइमसँ देखाए दियौक।
सुभाष- यै ललनक माए, रातिमे अपन घरक गोसांइ काली बंदी हमरा सप्पन देलनि जे बौआकेँ कोनो चिक्कन धाइमसँ देखा। हम पुछलियनि जे के चिक्कन धाइम छथि तऽ ओ कहलनि जे खोपामे रोडक कातमे परवतिया कोइर नामक एकटा धाइम छथि, एकदम सिद्ध धाइम छथि आ ओ जे किछु कहैत छथि से उचितो मे उचित। ओतए तोरा मोनक भ्रम दूर भऽ जेतौक।
मीरा- ललन बाउ, घरक गोसांइ बड़ पैघ होइत छथिन्ह हुनक कहल नहि करबनि तँ किनक कहल करबनि।
सुभाष- हँ हँ हुनक कहल करबाके अछि! ललन, ललन, बौआ ललन।
(
ललनक प्रवेश। ललन बताहक अवस्थामे छथि।)
ललन- हमरा तों बौआ किएक कहैत छह? हम तोहर बौआ नहि छियह। हम तोहर नाना छियह। आइसँ तों हमरा नाना कहह।
सुभाष- ललन नाना, हमरा सङे चलू एकठाम मेला देखै लए। मएओ जेतीह।
ललन- हम पएरहि नहि जेबह। हम कनहापर जेबह।
सुभाष- चलह ने, बेसी कनहेपर चलिह आ कने-मने पएरो।
ललन- बेस चलह। हमरा ओतए रसगुल्ला, लाय मुरही, झिल्ली किनि दिह। बगियो कीनि दिह।
मीरा- चल ने, सबटा कीनि देबौक।
(
सुभाष, मीरा ओ ललन जा रहलाह अछि परबतिया कोइर ओहिठाम। परबतिया गहबरमे बैसल छथि! मृदंग बाजि रहल अछि। किछए कालमे परबतियाक देहपर काली बंदी सवार भऽ जाइत छथिन्ह। मृदंग बजनाइ बन्द भऽ जाइत अछि)
परबतिया- होऽऽऽ बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह हम। बोल जय गंगा। बाजह, के कहाली छह? बोल जय गंगा। जल्दी लग आबह। बोल जय गंगा जल्दी आबह। हमरा जेबाक छह बाबा धाम। फेर गंगोकेँ देखनाइ अछि।

(
तीनू परानी लग जाइत छथि। ललन देह-हाथ पटकि रहल अछि। मूरी हिलाए रहल अछि। भगत पीड़ि परसँ माटि लऽ कऽ ललनक देहपर फेंकलथि। ललन शांत भऽ जाइत अछि। भगत ललनक माथक पूरा पकड़ैत छथि।)
परबतिया- हओ बाबू, एकरा केलहा नहि छह। जे कियो तोरा कहैत छह जे एकरा केलहा अछि से तोहर कट्टर दुश्मन छियह। तोरा दुनू दियादमे झगड़ा लगाबए चाहैत छह। बोल जय गंगा। काली बंदी छियह। हओ बाबू ओ तोरासँ ऊपरे ऊपर मुँह धएने रहैत छह। ओ आस्तीनक साँप छियह। हओ बाबू तोड़ै लऽ सब चाहैत अछि मुदा, जोड़ै लऽ कियो नहि। बोल जय गंगा। ओ बड़का धुर्त्त छह, मचण्ड छह।
सुभाष- सरकार, हमरा बहुते लोक कहलक जे अहाँक छोटकी भाबो पहुँचल फकीर अछि। ओकरहि ई कारामात छी।
परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, कने तोहुँ सोचहक, अकल लगाबहक जे जदि डाइनकेँ एतेक पावर रहितैक तँ ओ अपन विद्यासँ सौंसे दुनियाँपर शासन करैत रहितैक। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मुख्य मंत्री, एस.डी.ओ., कलक्टर, थाना-पुलिस बैंक सभटा वएह रहितैक ने। बोल जय गंगा। हओ बाबू, डायनपर विश्वास केनाइ खाटी अंध विश्वास छी। ई मोनक भ्रम छी। ई मोनक शंका छी। बोल जय गंगा। हओ बाबू, अगर शंकाबला आदमी केकरो हँसैत देखि लेलक तँ ओकरो होइत छैक जे ओ हमरेपर हँसल। तें हम यएह कहबह जे तों नीक लोक लागैत छह, एहि भ्रममे नहि पड़ह। नहि जौं पड़लह तँ सत्यानाश भऽ जेतह। हम तोरहि घर गोसांइ काली बंदी बाजैत छियह। बोल जय गंगा। हओ बाबू, आब हमरा देरी भऽ रहल छह, हमर विमान ऊपरमे लागल छह।
मीरा- सरकार, ई ठीक कोना होएत, से उपए बता दथुन्ह न? ई एना किएक करैत अछि?
परबतिया- बोल जय गंगा। हओ बाबू, एहि छौंड़ाकेँ छीनर देवी लागलि छह।
सुभाष- छीनरदेवी हटत कोना?
परबतिया- हँ हटत, नहि किएक हटत? जल्दी तों एकर बिआह केहनो लड़कीसँ करह। सभ ठीक भऽ जेतह। आओरो कोनो कष्ट छह?
सुभाष- नहि सरकार, जदि अपने सहाय रहबैक तँ कोनो कष्ट नहि होएतैक।
मीरा- सरकार, कने विभूति दए दिअ।

(
परबतिया मीराकेँ विभूति देलनि।)
परबतिया- बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। बोल जय गंगा। आब हम जाइ छियह। बाबा धाम।
(
कहैत कहैत काली बंदी चलि जाइत छथि।)
सुभाष- सरकार, अपनेक दक्षिणा?
परबतिया- पाँच टका मात्र।
सुभाष- सरकार एतबै?
परबतिया- हँ पाँचहि टका मात्र। उहो गहबरमे प्रसाद चढ़ाबए लेल। हमरा गहबरमे ठकै फुसलबै बला काज नहि होइत अछि। हमरा गहबरमे कलयाणक आ संतोषक गप होइत अछि। शंका वा भ्रम बढ़ाबए बला नहि, पूर्णतः हटाबए बला गप होइत अछि आब अपने सभ जाउ। एकर बिआह जल्दी करु, छीनरदेवी भागि जाएत।
(
तीनू परानी माथा टेक कऽ प्रणाम करैत छथि आ आर्शीवाद लऽ कऽ प्रस्थान करैत छथि।)
पटाक्षेप
दृश्य चारिम क्रमशः
 
2.
राधा कान्त मंडल रमण
जन्म- 01 03 1978
पिता- श्री तुरन्त लाल मण्डल
गाम- धबौली, लौकही
भाया- निर्मली
जिला-मधुबनी
षिक्षा- स्नातक

मैथिली एकांकी

कने हमहूँ पढ़व

पात्र परिचय
1.
धनिकलाल पंचाइतक मुखियाजी छथि।
2.
चम्पत लाल मुंशी मुखियाजीकेँ
3.
दुखना गरीव व्यक्ति
4.
दुखनी ‘‘ ’’
5.
अमर ‘‘ ’’
6.
रीता ‘‘ ’’

प्रथम दृश्य

(
दुखना दुखनी अपन घरमे जीवनकेँ पलक घड़ी दुखसँ वितबैत छलै जेकरा एक सांझक भोजनपर आफद छल। ई बात अपनामे विचार करैत दुखना आ दुखनीक प्रवेश होइत अछि। दुखनी आंगन घरक काज करैत छलि आ मने-मन विचारैत छल जे हे भगवान आइ हम आ हमर धिया पुता खाएत की तहि बीचमे दुखनाक प्रवेश)

दुखना- सुनै छहक ने?

दुखनी- अहाँ बाजू ने की भेल हेँ?

दुखना- आइ बच्चा सभ की खतौ घरमे किछो छौ कि नाइ, हम तू तँ भूख मेटा लेव आ बच्चा कोना रहतौ।

(
अमरकेँ प्रवेश)
अमर- बाबू बाबू हमरा भूख लागल अछि माए भनस कहाँ करै छै?

दुखनी- (अमरकेँ कोरामे लैत भगवानकेँ तरफ देखि कऽ छनि) हे भगवान हम तँ नोर पी कऽ अपन जीवन बीता रहल छी आ ई बच्चा कोना जीयत? (दुखनी यएह बजैत सोचमे डूबि जाइत अछि।)


दोसर दृश्य


(
मुखिया जी आ हुनक मुंशीकेँ संग बात चीत)

धनिक लाल- (मुंशीकेँ इशारा करैत) हे रौ हे रौ मुंशिया से कतेक दिन भऽ गेलौ बही खाताकेँ लेखा जोखा, बही खाता ठीक छौ की ने।

चम्पतलाल- (डराइत बाजल चम्पतलाल मुंशी बाजल) जी ......जी मुखिया जी, ठीके -ठाक छै।

धनिकलाल- हेरौ आय कालि तँ लेन-देनक कार-बार भऽ रहल छै किने।

दुखनाक प्रवेश

दुखना- (मुखिया जीक पएरपर गीर पडैत अछि।) मालिक भऽ....भगवान हमर......।

(
परएपर सँ दुखनाकेँ उठबैत मुखियाजी)

मुखिया- रै दुखन बाज तोरा की भेलौ जे तू एतै व्यग्र छे।

दुखना- मुखिजी हमरा घरवालीकेँ बहुत जोर मन खराप भऽ गेलै से अपने लँग दोगल एलौंहेँ घरमे फूटल कौड़ीओ नै छै जे इलाज करबै लऽ जेबे हम अहा पास रुपैआ ले ऐलौं हेन।

मुखियाजी- बाज तोरा कतेक टाकाक जरुरी छौ?

दुखना- पा..... पाँच सौ रुपैआ।

मुखियाजी- (मुंशी तरफ इशारा करैत) हे रौ मुंशीया तिजोरीसँ पाँच सौ टाका दुखनकेँ दही आ सुन ओकरा सँ वापसीक एग्रीमेट करबाले बुझलेँ की नै।

मुंशी- (रुपैआ दैत) ले रौ दुखना ई टाका ले आ हमरा सादा वहीपर एग्रीमेट कर।

दुखन- (औठामे निशान लगबैत) ई मालिक कतए कऽ देव, आइ अहीं हमर भगवान छी।

(
दुखनकेँ प्रस्थान)

मंुशी- दुखनसँ सुन अगर ई टाका तों समएपर नहि देबही तँ तोरा टाकाक व्याजक ब्याज लगतौ आ सब गिरबी रखऽ पड़तौ से सुनि ले।

मुखियाजी- कतेक दिनक बाद ई एकट मोकिर धरैलो हेँ।

मुंशीजी- मऽ ... मालिक वहीपर दुखनक नाम कतेक मारबै?

मुखियाजी- (तमसाइत बजलाह) रौ मुऽऽ........मुंशीया तोरा हमर छाली घी मठ्ठा खा कऽ बुद्धिये ने तँ मोटा गेलौ।

मुंशी- (कपैत बाजलाह) जी......जी हुजूर हम आब बुझि गेलौं, जे...... जे पाँच हजारमे जेतै न मुऽऽ....मुखिया जी।

मुखियाजी- (हँसैत) ई भेलौ ने एकटा मुंशीया बुद्धि ई तँ बुझि जे हमरा अन्नक असर।

तेसर दृश्य- क्रमशः

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...