Saturday, March 13, 2010

'विदेह' ५३ म अंक ०१ मार्च २०१० (वर्ष ३ मास २७ अंक ५३)- PART III

• जगदीश प्रसाद मंडल- कथा-नवान
• जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
• नवान

• बाध दिशिसँ भोरे बड़का काका आबि नादिमे कुट्टी-सानी लगा, गाए बहार कऽ केटली नेने कलपर पहुँचलाह। जहि कलपर आन समए (जाड़-बरसात) हेँक-हेँक भेलि रहैत छल ओ रुख बुझि पड़लनि। समएक गरमियोमे अंतर बुझि पड़लनि। जाड़क मासमे दस बजे दिनक समए पाँचे बजे भोरेमे वुझि पड़लनि। सोहनगर समए बुझि बसन्तपर नजरि गेलनि। बसन्त आमक मंजरक महमही फल रुपमे महमहा रहल अछि। मनमे उठलनि जे बसन्त ऋृतु बर्खक पहिल ऋृतु (चैत-वैशाख) होइतहुँ शरद-शिशिर सन ऋृतु कोना आगू अवैत? हाँइ-हाँइ कऽ केटली धोइ लोटामे पानि नेने चुल्हि लग आवि, चाह बनवए लगलथि। केतलीमे चाह कऽ खौलैत देखि मनमे उठलनि जे एहिना समुद्रोमे लहरि ज्वार-भाँटासँ उठैत अछि। एते गहीर समुद्र जहिमे करोड़ो-अरबो तह पानिक रहैत तहन किएक उपरमे एत्ते जोरसँ लहरि अबैत अछि। मन ओनाइते रहनि कि चाहक गंध लगलनि। गिलासमे चीनी दऽ चाह छनलनि। केटली अखारि कऽ रखि चाहक गिलास नेने दरवज्जाक चैकीपर बैसि पीवए लगलथि। मन औनाइत रहनि जाहिसँ चाहो नीक-नाहाँति नहिये पीवैत रहति। तखनहि हहाएल-फुहाएल रविया आबि कने पड़िक्केसँ बाजल- ‘‘गोड़ लगै छी कक्का।’’
• असिरवाद दैत बड़का काका कहलखिन- ‘‘कनिये पहिने अबितह रबी तँ चाहो पीअबितियह, आब तँ हूसि गेलह।’’
• - ‘‘नहि काका, हूसल नहि नीके भेल। एक चुटकी विष्णु भगवान कऽ चढ़ाइये मुँहमे पानि लेब।’’
• विष्णु भगवानक नाओ दिशि धियान नहि गेलनि। कहलखिन- ‘‘तूँ तँ अनेने बौआइबला आदमी नहि छह। तहन.......?’’
• - ‘‘काजे एलौंहेँ।’’
• - ‘‘भोरे कोन काज बजरि गेलह?’’
• - ‘‘न्योत दइले एलौं।’’
• न्योंत सुनि बड़का काका तारतम्य करए लगलाह जे अखन तँ, ने विआह-मूड़नक दिन अछि आ ने केशे कटौल देखै छियै जे बरखीओ-तरखीओ करैत। मुदा चैलौ तँ कहियो नहि केलक जे आइ करत। सभ दिन शिष्ट बुझि श्रद्धाक नजरिसँ देखैत अछि। मन पाड़लनि- जेठ मास परीब तिथि। आमो पाकब नहिये शुरु भेल जे अमैइयो भोज करैत। पनरह दिनक पछाइते अमैइया भोज चलत। तहूमे नवको गाछी-कलम तँ कतौ नहिये नजरिपर अवैत अछि। तीनि दिन रोहणियोकेँ चढ़ैमे बाकिये अछि। खिच्चा आम पाकि कऽ केहन हएत? धिया-पूता चोकर-मोकर खाइए। भोज-काज कोना ओहिसँ हएत? भोज-काजक लेल तँ नीक आम चाही। मन आगू बढ़लनि। तीमन-तरकारीक तँ भोज नहि होइत अछि। ओ तँ ओहिना पहिल फड़ महादेवो स्थानमे चढ़बैत अछि आ हितो-अपेछितकेँ दैत अछि। ओना लोक कटहरोक भोज करैत अछि मुदा ओ तँ आमोसँ पाँछा होइत। भऽ सकैत अछि जे गाए विआइल होए। गाइयक दूध तँ छाँकी दइत अछि। कियो-कियो रक्तमाला स्थानमे चढ़वैत अछि। पाल खेलापर राजाजीकेँ गाँजा चढ़वैत अछि आ बियेलापर कुशेश्वर स्थानमे घी चढ़वैत अछि। हमरा किऐक न्योत देत। पुछवो कोना करवैै? दही-दूध चर्च तँ खाधुर लोक करैत अछि। हँ-निहसकमे पड़ल बड़का काका सोचलनि जे हमहीं सवाल पुछियै आ ओइह ने किअए जवाव देत जे अनेने अपसियाँत होइ छी। मुस्की दैत पुछलखिन- ‘‘आरो के सभ न्योंतिहारी रहथुन?’’
• बड़का काकाक प्रश्न सपाप्तो नहि भेलि छलनि तहि बिचहिमे रविया बाजि उठल- ‘‘अहींटा छियै काका। पहिल नवान छी कते गोटेकेँ न्योत देवनि। कोनो कि उपनएन छी जे गिनती पुरबए पड़त।’’
• नवान सुनि बड़का काका आरो ओझरा गेलाह। कोना नहि ओझरितथि किछु दिन पूर्व धरि तँ ओइह पहिने नवानक चर्च करै छलखिन। जहियासँ बाढ़ि आबि-आबि अगहने उसारि देलक तहियासँ कहब छोड़ि देलखिन। अमती काँट जेकाँ एकटा डारि छोड़वैत तँ दोसर लगि जाइन। मिरचाइक घौँदा जेकाँ ओझरी देखि बड़का काकाक मन असोथकित भऽ गेलनि। आँखि बन्न भऽ गेलनि। बड़का काकाक आँखि बन्न होइतहि रविया कहलकनि- ‘‘काका, ओरियान-पाती करैक अछि। अखन जाइ छी।’’
• कहि रविया विदा भऽ गेल। मुदा काकाक आँखि बन्ने रहनि। मनमे उपकलनि, भने पतरो कीनब छोड़ि देलहुँ। एक तँ ओहिना रंग-विरंगक पतरा समाजमे (गाममे) आबए लगल। सेहो जँ भिन्न-भिन्न लेखक जेकाँ एक्के ढंगसँ बुझाओल जाएत तँ बड़बढ़िया। मुदा सेहो नहि। सभ पतरा कीनि अपनेसँ निर्णय करैक ज्ञाने नहि अछि। मनमे खुशी उपकलनि। जे पावनि क्षण-पल गनि निर्धारित होइत अछि ओ तीनि दिना हुअए लगल। एक-दिना दू दिना भऽ गेल आ दू दिना तीनि दिना। तहूमे तेहन-तेहन अगिमूत्तू छुछुनरि सभ गामे-गाम फड़ि गेल अछि जे एक डांरिय समाजकेँ थोड़े चलए देत। समाजो तेहने गड़िखच्चर अछि जे अपन वर्चस्वक दुआरे (जाइज-नाजायजक) उचित-अनुचितक विचारे ने करत। कियो जाइतिक सिपाही तँ कियो सम्प्रदायिक सिपाही बनि-बनि मोंछ टेढ़ि करैत रहैत अछि। ककर के सुनत। ऐहन परिस्थितिमे चुप्पे रहब नीक। फेरि मनमे उठलनि जे एते ओझरीमे ओझराइक कोन जरुरत अछि। जहन रविया न्योत दइये गेल अछि तहन किऐक ने स्नान कए कऽ ओकरे ऐठाम जा बुझि ली। सैह केलनि।
• चारिम सालक बाढ़ि दुनू बेकती रवियाक जिनगी मोड़ि देलक। ऐहन विकराल बाढ़ि जिनगीक पहिल बाढ़ि छलैक। पाँच बीघा जमीनबला रविया पुरान ढर्राक जिनगी (किसानी जिनगी) बदलैत रहए। लगभग चारि आना बदलि गेल रहए। उन्नति किस्मक तरकारी आ फल-फलहरिक खेती अपनाए नेने रहए। अन्नक खेतीमे कोनो सुधार नहि कऽ सकल रहए। मालो-जाल तहिना (पूर्ववते) रहए। बाधक सभ जजात दहा गेलइ। गाछीक बड़का आम-जामुनक गाछ छोड़ि सभ सुखि गेलइ। अंगुर, अनारस, नेवो, लताम, धात्री, अनरनेवा इत्यादि सभ नष्ट भऽ गेलइ। संग-संग घरोक सभ समान नष्ट भऽ गेलै। बढिये दिनसँ दुनू परानी रवियाक मन टुटए लगलैक। जेना-जेना पानि सटकैत जाइत तेना-तेना सुखल गाछ घरक सड़ल समान सभ देखि-देखि दुनूक मन टुटब बढ़ितहि गेलइ। मुदा जिनगीक आशा दुनूकेँ अन्हारसँ इजोत दिशि धकेलि देलक। नव उत्साहक संग दुनू संगी आँखि उठा आगू देखि डेग बढ़वए लगल।
• सबेरे स्नान कए कऽ बड़का काका रविया ऐठाम पहुँचलाह। आँगन नीपि बुधनी नहाइले गेलि कि बड़का काकाकेँ देखलक। हाँइ-हाँइ कऽ गोबराइल हाथ धोइ धड़फड़ा कऽ आंगन आबि ओसारपर कम्मल विछा पतिकेँ कहलक- ‘‘काका ऐलखिन।’’
• दरवज्जापर आबि बड़का काका कनडेरिये आँखिये हिया-हिया आंगन, दरबज्जा, बाड़ी देखए लगलथि। आँखिपर सँ मनक विसवास उठए लगलनि जे सत्ते देखै छी कि फूसि। जहि जेठमे पियाससँ धरती हाथ-हाथ भरि जीह बहार करै छथि माल-जाल अधसुखू भऽ जाइत अछि। ठेहुन भरि मोट गाछक सुखाएल पत्ताक पथार लगि जाइत अछि तहिठाम बसन्तक बहार देखि रहल छी। मनमे नचितहि रहनि कि पानक खिल्ली सिक्कीक चंगेरीमे सरिया कऽ ओसारक खोलियापर रखि रविया आगूमे आबि कहलखिन- ‘‘अंगने चलू ने कक्का। अनठिया जेकाँ दुआरपर किएक ठाढ़ छी।’’
• रवियाक मनमे अपन सहवाल गाए आ दस कट्ठाक गरमा धानक बोझ देखवैक रहए। मुदा काकाक मनमे आंगन तँ औरतक होइत, पुरुखक नहि। पुरुख तँ केबल खेबा काल आ कोनो काजक काल जाइत अछि। मुदा बुधनियो तँ अंगनेक ओसारपर कम्मल विछौलक। ओ ऐना किएक उट-पटांग केलक। मुदा ओसारक एक भागमे बुधनी दू कसतार दही, दू चंगेरा आम, एक चंगेरा चूड़ा, स्टीलक अढ़ियामे तरकारी इत्यादि भोज्य-पदार्थक सरंजाम केने रहए। जेकरा देखवैक इच्छा पेटमे रहनि। सभ अपन-अपन विचारो आ काजोमे डूबल। अगहन जेँका लड़ती-चड़ती देखि बड़का काकाक मन असथिर होइत रहनि। अस्सीयो बर्खक ओ औरत जनिका पति छन्हि अपनाकेँ कते सुन्दर बुझैत छथि मुदा सोलह वर्खक बैधव्य अपनाकेँ कि बुझैत छथि। जे जेठ गरमीक विराट मास छी ओ वसन्ती हवा कोना बहा रहल अछि। सालक एक्को दिन ओहन अछि जहि दिन अनेक ऋृतु नहि भ्रमण करैत हुअए। चुप-चाप आँखि नचबैत बड़का काकाकेँ पुनः रविया कहलकनि- ‘‘काका जहिना पाँच अंग उठलासँ शरीरक बसन्त अबैत, तहिना ने वसन्त पंचमीसँ वसन्त ऋृतुक आगमन होइत अछि। आगू-आगू चलू, सभ किछु देखा दइ छी।’’
• रवियाक बात सुनि बड़का काकाकेँ खुशी भेलनि मुदा मनकेँ ‘नवान’ शब्द हौंड़ैत रहनि। मन नचैत रहनि अगहनक नवानपर। बजलाह- ‘‘पतरा देखब छोड़ि देलहुँ तेँ सभ बात नजरिपर नहि अबैत अछि। कनी-मनी मन अछि जे नवान तँ अगहन (कातिक इजोरिया पखसँ लऽ कऽ अधा पूस धरि) मे होइत छलैक।’’
• काकाक बात सुनि रवियाक मनमे खुशी नहि भेल, पुछलकनि- ‘‘कक्का नवान की?’’
• - ‘‘नव अन्नक ग्रहण।’’
• - ‘‘सएह छी काका।’’
• - ‘‘चलह कने देखा दाए।’’
• धान देखवैत रविया कहलकनि- ‘‘एक बीघा खेत चैरीमे अछि। सत-सत, अठ-अठ वर्खपर खेत हँसुआ पहुँचैत छलए। सेहो दूध महक डाढ़ी होइत छलए। गोटे साल आध मनक कट्ठा तँ गोटे बेरि तीन पसेरी कट्ठा धान होइत छलए। तहूमे तते चिलमिल, कोढ़िला, आ करमी लत्ती भऽ जाइत छलए जे उपरका खेतीसँ दोबर खर्च होइत छलए। उपजा देखि मनमे उठैत छलए जे बेचिये लेब नीक होएत। मुदा लेबालो नहि। के अनेरे पूजी दुरि करत। सबहक एक्के गति। गामक अधा हिस्सा जमीन ऐहने अछि। वर्ख दसम मनमे उठल जे चैथाइ खेतमे डबरा खुनि माछ पोसब। नवका-नवका माछक थर सभ हेचरीमे विकाइत अछि। ओकरे पोसब। सदिकाल रेडियोओसँ आ अखवारो, पत्रिका सभमे माछक खेतीक लाभ देखाओल जाइत छैक। खूब लाभकारी अछि। सैह केलहुँ। दू कट्टा उपरका खेत बेचि खुनेलहुँ। हेचरीसँ थर आनि देलियै। ले बलैया, कोसी नहरिमे पानि एलै। फाटकक खुजले मुँह छोड़ि देलक। भरि मुहखर पानि चैड़ीमे पसरि गेल। बीच बाधमे खेत अछि। डबराक महारोपर जाएब कठिन भऽ गेल। एक दिन नहाइ बेरिमे केरा थम्हक बेरही बना गेलहुँ तँ देखिलियै जे सौँसे चोरीक सलाढ़ लागल अछि। एक्कोटा जीराक दर्शन नहि भेलि।’’
• - ‘‘देखि कऽ बड़ दुख भेल हेतह?’’
• - ‘‘ऐँह, काका की कहब, अपनेटा होइत तहन ने से तँ सौँसे बाधे झलकैत रहए।’’
• - ‘‘तब निचला खेतक संग दू कट्ठा उपरको चलि गेलह।’’
• - ‘‘ओतबे गेल। साले-साल मलगुजारियो भरै पड़ैत अछि। तेहेन पाहीपट्टीक पट्टी छी जे अग्गहसँ बिग्गह भरए पड़ैत अछि। गामक खेतक कि एक्के रंग मलगुजारी अछि। अन्हरा राज छी। जइ खेतमे उपजा नहि होइत अछि ओकरे मलगुजारी बेसी अछि। हँ, तँ कहै छलहुँ जे ओहि एक बीघा चैरी खेतमे (कोचाढ़ि भरा कऽ) तेसर-साल आ पोउर साल पच्चीस क्वीन्टल आ सत्ताइस क्वीन्टल धान भेल। उपजबैक ढंगो नहि छल। थोड़े-थोड़े आब सीखिने जा रहल छी। एहि बेरि दुनू सालसँ नीक धान अछि। अखन काटि-काटि अनितहि छी। तैयार पछाति करब। चलू, गाए कऽ देखिऔ।’’
• सेहवाल गाए। ललौन कारी। कतौ-कतौ चितकावर। पतरकी नाङरि। साढ़े चारि फुट खड़ा आ आठ फुट नमती। निच्चासँ उपर धरि काका तजबीज करथि मुदा नजरिपर चढ़वे ने करनि जे कोन किस्मक गाए छी। थने कहै छै जे भरि बाल्टी खुआउ आ भरि बालटीन दुहि कऽ लऽ जाउ। गाम दिशि नजरि दौड़ेलनि। कहाँ कतौ अहि कटिंगक गाए छै। कियो-कियो जे अनवो केलनि तँ महीसक खाढ़क जरसी छन्हि। सेहो तँ गनले-गूथल अछि। पहिलुका गाए सभ जे अछि ओकर खाढ़े बिगड़ि गेलइ। तेहन-तेहन दानी सभ साँढ़ दान केलनि जे टाएरक बड़दक बंश कोल्हुक रास्ता धेलक।
• रविया - ‘‘काका की सभ देखै छियै?’’
• बड़का काका- ‘‘हौ, कोन चीज नहि देखैबला अछि। कतएसँ अनलह?’’
• - ‘‘चारिम साल जे बाढ़ि आएल ओ मालो-जालकेँ नष्ट कऽ देलक। खूँटेपर बान्हल गाए-बड़द मरि गेल। धिया-पूता मात्रिकमे रहए तेँ बँचि गेल। बाढ़िक बाद सासु भेंट करै लऽ समाद पठौलनि। हमर मन नहि मानलक। ओकरे -पत्नी- कहलियै जाइले। एक तँ नैहर दोसर धियो-पूताकेँ देखना साल भरि भऽ गेल छलैक। गेली। ओतइ एकटा गाए आ खेती करैले बड़दो आ मन तीनिऐक अन्न देलकै। किछुए दिनक पछाति गाए उठल। (मुस्की दैत) जहिना बाढ़ि ऐने मूस पतरा गेल तहिना अनेरुआ साँढ़ो सभ। मन भेलि जे साँढ़ लग लऽ जाय। मुदा मनमे भेल अनेर खाइत-खाइत तँ बुद्धियार लोक सनकि जाइत अछि मुदा साँढ़-पारा तँ जानिये कऽ पशु छी। साँढ़ लग नहि जाए डाक्टरकेँ बजा अनलिएनि। ओइह पाल (सिम) देलखिन सैह बच्चा छी। गाए तेहन दुधगरि जे अपन जीह दागि बच्चा कऽ पोसलौं। ओइह गाए छी। पाँचम दिन बिआएलहेँ।’’
• पाँचम दिन सुनितहि बड़का काकाक मन फेरि ओझरा गेलनि। मनमे नाचए लगलनि जे गाए तँ नअ दिनपर शुद्ध होइत अछि। अशुद्ध दूधक दही खुऔत कि ककरोसँ दूध आनि पौरने अछि। पुछबो कोना करवै? ओहन खाधुर थोड़े छी जे खाइसँ पहिने पता लगा लेब। शुद्ध-अशुद्ध विचार मनमे संघर्ष करए लगलनि। एक दिस देखैत जे जहि गाइयक दूध, गोंत, गोबर सभ शुद्ध होइत अछि, एते तक कि दूधक लाटमे छुतहर घैइलो शुद्ध भऽ जाइत अछि। दूध तँ अमृतोसँ पैघ छी। दोसर दिस देखैत कोनो हमरे मनक बात नहि छी। सभ मानवो करैत अछि आ परहेजो करैत अछि ओना देस-देसक आ कोस-कोसक चलनि सेहो एक-दोसराक विपरीत चलैत अछि। विचित्र स्थितिमे अपनाकेँ देखि निर्णए केलनि जे पुछबैक तहने शुद्ध-अशुद्ध। जँ बुझले नहि रहत तहन कि शुद्ध-अशुद्ध होएत। मनमे खुशी एलनि पुछलखिन- ‘‘दूध कते होइ छह?’’
• दूधक नाओ सुनि रवियाक मन, फुलक पहिल सुगंध जेँका, महमहा गेल। बाजल- ‘‘कक्का, की कहू! दुहैत-दुहैत आङुर भरा जाइए। बेराबेरी दुनू बेकती दुहै छी। ओना अखन पाँचे दिन भेलि अछि। तहूमे दू दिन अधे-छिधे दुहलौं। पहिलोठ रहने थनमे गुदगुदी चलतै हरपटाए लगै। मुदा परसूसँ दूधो फाटब बन्न भऽ गेल आ असथिरो भऽ गेल।’’
• - ‘‘दूध बेचबो करै छह?’’
• - ‘‘अखन तक तँ नहि बेचलौंहेँ मुदा एते दूध दुइये गोटे बुते कना सठत।’’ कहि अगारी बढ़ल। आमक कलम। चारु कातक हत्तापर लताम, दाड़ीम, नेवो, सरीफा रोपल। गाछक बीचमे अनारस, हरदी-आदी सेहो रोपल देखि खुशीसँ गद्-गद् होइत बड़का काका बजलाह- ‘‘रवि, तेहन वृन्दावन सजौने छह जे एत्तसँ जाइक मन नहि होइए।’’
• काकाक खुशी देखि हँसैत रविया कहए लगलनि- ‘‘कक्का, बाढ़िक नोकसानसँ मन टुटि गेल। आगू नाथ ने पाछु पगहा देखि मनमे आबि गेल जे सभ खेत-पथार बेचि गामसँ चलि जाइ। मुदा फेरि मनमे आएल जे गामसँ कतए जाएब। गाम-घर बाढ़िमे दहाइत अछि रौदीमे जरैत अछि। मुदा शहरो-बजारक दशा तँ सएह देखै छी। दिन-दहार डकैकती, हत्या, अपहरण, सदिकाल होइते रहैत अछि। ततबे नहि कतौ भाषाक तँ कतौ साम्प्रदायिक जहर वायुमंडलकेँ दुषित केने अछि।’’
• रविक बात सुनि मूड़ि डोलवैत काका कहलखिन- ‘‘हँ, ई तँ लाख रुपैयाक बात कहलह। हम तँ बुढ़हा गेलहुँ। दू-चारि सालक मेहमान छी। भने भगवान आँखिक इजोत लऽ लेलनि। ने किछु देखब आ ने दुख हएत। छोड़ह दुनियाँ दारीकेँ अपन कहह।’’
• बड़का काकाक जिज्ञासा देखि रविया कहलखिन- ‘‘कक्का, घरसँ बहार धरि एक्के रंग बुझि पड़ल। की करी की नहि करी! मनमे ऐबे नइ कराए। बड़ी कालक बाद मन पड़ल अपन देश आ पूर्वज। जहियेसँ मनुष्य एहि धरतीपर अछि तहियेसँ ने हमर-अहाँक वंश सेहो अछि। जँ से नहि रहितथि तँ अखन कोना रहितहुँ। तहिना तँ अपन देशो (मिथिला) अछि। अदौएसँ मिथिलाक चर्च वेद-पुरानमे अछि। तहि बीच लाखो भूमकम, अन्हर-बिहाड़ि, पानि-पाथर, बाढ़ि अएल होएत। कोना हमर पूर्वज सहलनि? कि हमरामे ओहि वंशक खून नहि अछि? मनमे उत्साह जगल।’’
• बड़का काका- ‘‘वाह! अच्छा एहि बगीचाक विषएमे कहह?’’
• रविया- ‘‘कक्का, तेसर साल मद्रासी व्यापारी ट्रकपर फल-फलहरीक गाछ बेचैले आएल। हमहँू पनहरटा गाछ कीनि कऽ रोपलहुँ। वएह छी। परुँकांे-तेसरांे मोजरल रहए मुदा मोजर तोड़ि देलियै। एकटा-दूटा आम फड़ैत मुदा गाछक सेखिये चलि जाइत। बड़हनमो खूब अछि। तीनिये सालक गाछ छी सए-सवा-सए कऽ फड़ल अछि। अपने ऐठामक गुलाब खास जेकाँ अछि, मुदा पकैत अछि ओहिसँ पहिने। यएह आम खुआएब। आब आगू चलू तरकारीक खेत।’’
• खेतक आड़िपर अबितहि कक्काक नजरि चोन्हरा गेलनि। तरहत्थीसँ आँखि पोछि देखलनि तँ मनमे शंका भेलनि। जहि जेठमे धार-पोखरि इनार सूखि जाइत, बाध-बोनमे लू चलैत, खेतसँ धधड़ा जेकाँ ताव उठैत ओहि खेतकेँ हरियर वस्त्र पहिरा गहना-जेवरसँ सजा नायिका जेँका मलड़वैत अछि, ई नान्हिटा काज नहि अछि। मुदा काजो ओहन अछि जे सोझे स्वर्ग बनवैत अछि। जिज्ञासा भरल नजरिसँ काका पुछलखिन- ‘‘रबी, की सभ लगौने छह?’’
• रविया- ‘‘कते कहब काका, एक बेरि घूमि कऽ देखि लियौ। सुरुजो बारहसँ निच्चाँ उतड़ताह। चलू भोजन कऽ लिअ।’’
• - ‘‘मन भरि गेल। खाइक छुधा मेटा गेल। होइए जे जहिना कृष्ण वृन्दावनमे रहथि तहिना हमहूँ एतइ रहि जाय।’’
• होरीके परिवर्तित रुप
जनकपुरमे महामूर्ख सम्मेलन
सुजीतकुमार झा


मैथिली सम्मेलन, हिन्दी सम्मेलन, नेपाली सम्मेलन, जातीय सम्मेलन, स्वास्थ्य सम्मेलन, किछ नइ किछ सम्मेलन सभ देश विदेशमे जतय जाऊ ओतय होइते रहैत अछि । मुदा महामूर्ख सम्मेलन नामेसँ लगैत अछि जे कोनो नयाँ सम्मेलन हैत । ठिक । नयाँ सम्मेलन वा कहि महामूर्ख सम्मेलनके नेपालमे धुम अछि । होरीक अवसरपर आइ काल्हि नेपालक विभिन्न स्थानमे महामूर्ख सम्मेलन होइत अछि ।
सम्मेलन अहि प्रकार सँ उचाई ग्रहण कऽ रहल अछि जे
अहिके साल भरि सँ लोकके प्रतिक्षा रहैत अछि ।
महामूर्ख सम्मेलन भेलैक की ?
जहिना अन्य सम्मेलन सभा होइत अछि तहिना महामूर्ख सम्मेलन सेहो होइत अछि । मुदा अहि में जे पदबी भेटइत अछि ओ महामूर्ख नाम सँ जोडल रहैत अछि । जनकपुरमे पाँच वर्ष सँ महामूर्ख सम्मेलनक आयोजन कऽ रहल मिथिला नाट्यकला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि —‘विभिन्न क्षेत्रक व्यक्तिसभ एकठाम जम्मा होइत छी घण्टो ब्यंग्यात्मक कार्यक्रम होइत अछि बर्षभरिमे कतय कमजोरी कएलौ ताहिपर विद्वानसभ ब्यंग्य करैत छथि मुख्य रुपसँ महामूर्ख सम्मेलनमे इएह सभ होइत अछि ।’
समान्यतया लोककँे लागत जे महामूर्ख के बनैत हैत ? मुदा आश्चर्यक बात तऽ ई छैक जे लोक कामना करैत रहैत अछि जे महामूर्खक उपाधि हमरा भेटौ ।
२०६५ सालक महामूर्खक उपाधि प्राप्त कर्ता एवं मैथिलीक बरिष्ठ साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल कहैत छथि ‘उपाधि प्राप्त करब अपनामे बडका बात होइत अछि , प्रेम सँ लोक किछ पिब लैत अछि । तखन महामूर्ख पाएब बडका भारी बात नहि ।

सम्मेलनक इतिहास
महामूर्ख सम्मेलन नेपालक विभिन्न स्थानमे होइत अछि । जनकपुरमे बहुत उचाइ ई सम्मेलन प्राप्त कएने अछि । मुदा एकर प्रारम्भ नेपालक विरगंज सँ भेल अछि । मैथिली साहित्य परिषद विरगंज २०५० साल में एकर पहिल आयोजना कएने छल । पहिल महामूर्ख लाला माधवेन्द्र जी भेल रहथि । इ सम्मेलनकें परिकल्पनाकार रहल मैथिली साहित्य परिषदक पूर्व महासचिव एवं चर्चित पत्रकार चन्द्र किशोर झा कहैत छथि— ‘नेपालमे २०४६ सालमे बहुदल आएल छल । राजनीतिक रुप सँ बदलाबक समय छल । ओ बदलाबमे समाजिक तथा साहित्यिक क्षेत्रक व्यक्तिके सेहो योगदानक आवश्यकता छल तेहनमे ई कन्सेप्ट आएल अछि ।’ समाजमे रहल विकृति विसंगति कें समाप्त करबा मे ब्यंग्य बहुत काम करैत अछि ओ कहलन्हि । विरगंजमे आब होरी मिलन समारोह महामूर्ख सम्मेलनक आयोजना करैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन प्रकृतिके कार्यक्रम भारतक किछ राज्यमे पहिनहि सँ होइत आएल अछि । जनकपुरमे २०६१ साल सँ महामूर्ख सम्मेलन होइत आएल अछि । २०६१ सालक महामूर्ख मैथिली कवि नरेश ठाकुर , २०६२ कें एमाले नेता शीतल झा , २०६३ कें जनकपुर नगरपालिकाक तत्कालीन मेयर हरि बहादुर बिसि, २०६४ कें सदभावना नेता ओमकुमार झा , २०६५ कें बरिष्ठ साकित्यकार डा. राजेन्द्र विमल आ २०६६ केँ पूर्व मन्त्री एवं एमाले नेता रामचन्द्र झा कें पदबी देल गेल ।

महामूर्खक छनौट केना ?
महामूर्खक छनौट केना होइत हैत बहुतोकें उत्सुकता भऽ सकैत अछि । सहीमे कम मेहनत नहि होइत अछि ।
महामूर्ख सम्मेलनक आयोजक मिथिला नाट्यकला परिषदक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक कहैत छथि —‘महामूर्खक छनौटक तैयारी आयोजनाक तैयारी सँग शुरु भऽ जाइत अछि । अहिके लेल एकटा कमिटी गठन कएल जाइत छैक । ओहे निर्णय करैत अछि । किछ गोटे तऽ महामूर्ख बनबाक लेल कसिकऽ लगैत अछि । जनकपुरक पत्रिका सभ एक हप्ता पहिनहि सँ अहि बेरक महामूर्ख के बनत तकर नामपर समाचार दऽ चर्चा चलबैत रहैत अछि । तहलका नेपाल दैनिक पत्रिकाक सम्पादक राजेश कुमार कर्ण कहैत छथि —‘महामूर्ख जनकपुरक एकटा लोकप्रिय कार्यक्रम अछि एकरा तऽ मिडिया क्यास करबे करत । फेर मिडियामे नाम सभ एला सँ कार्यक्रमके आकर्षण बढि जाइत अछि ।
महामूर्खक नामपर बहुतो गीत बनल
कोनो चिज जखन लोकप्रिय होइत अछि तखन ओकरा सभ क्यास करय लगैत अछि । महामूर्ख सम्मेलन सँ जोडिकऽ बहुत गीतकार सभ गीत लिखलन्हि अछि । मैथिलीक चर्चित गीतकार कालीकान्त झा त्रिषितक गीत खुब चर्चित भेल अछि । हुनक गीत .....
स्वागत वागत मूर्ख महान
महामूर्ख सम्मेलन के अछि
अपनेही पर अभिमान
निप्पट मूर्ख चौपट्ट भट्ट
अही आयब भेल प्रमाण
छल प्रपंच पाखण्ड भरल जग
सत्यक नहि पहिचान
ई सम्मेलन कय प्रमाणित मूर्ख सकल विद्वान
बनी प्रतिनिधि संसद सुनैत
मूर्ख शिरोमणि शान
पेन्ट पहिरि ठाडे भऽ मुतैत
कुकुर सभक राग
कुर्सी चढि लक्ष्मीके बाहन
मूर्ख बनय विद्वान
हा कुर्सी हे कुर्सी
कुर्सी पक्ष विपक्षक प्राण
स्वागत वागत मूर्ख महान
महामूर्ख सम्मेलन आ मैथिली आन्दोलन
महमूर्ख सम्मेलन सफलताक बाद मैथिली आन्दोलनी सभ एकरा मैथिली आन्दोलन सँ सेहो जोडय लागल अछि ।
मैथिलीके कोनो पाबनि हुए वा कार्यक्रम जखन सफल हैत तऽ एकरा आन्दोलन सँ जोडबे करत । पत्रकार श्याम सुन्दर शशि कहैत छथि — जनता संगे कोनो कार्यक्रमके जोडि देला सँ केना सफलता भेटैत छैक महामूर्ख सम्मेलनके देख लोक बुझि सकैत अछि ।
एकर प्रयोग मैथिली आन्दोलनमे सेहो करय परत हुनक कथन अछि ।

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• १. बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’२. राधा कान्त मंडल ‘रमण’-कने हमहूँ पढ़व
• बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार।
• ‘छीनरदेवी’बेचन ठाकुरक-

छीनर देवी एकांकीक
दृश्य दोसर-
(स्थान- सुभाष ठाकुरक घर। दलानपर सुभाष ओ मीरा चिन्तित मुद्रामे बैसल छथि। पवन, मटुक जाजू ओ संजयक प्रवेश।)

मटुक- सुभाष भाय, अहाँक बेटा भरि-भरि राति बौआइते रहैत अछि।
पवन- हँ सुभाष कका, हमहूँ देखलिएक आठ बजे रातिमे गाछी दिशि जाइत आ कहलियन्हि तँ कहलनि तू हमर बाप छें।
राजू- हमहुँ देखलियन्हि, बारह बजे रातिमे मुसहरी दिशि निछोहे भागल जाइत। तखन हम राम एकबाल ओहिठामसँ भोज खा कऽ अबैत रही।
संजय- सुभाष मामा, काल्हि साँझमे हमरो एहिठाम गेल रहए। हमरा कहलक- हमहुँ पठबै आ बड़का हाकिम बनबै। शर्ट उनटा पहिरने छल आ एकहि पएरमे जूता छलै।
सुभाष- अपने सभ विचार दिअ जे हम की करी?
(ललनक प्रवेश। पूर्ण बताह अवस्थामे छथि। अबितहि शर्ट निकालि फेक दैत अछि। गंजी फारैत-चिरैत अछि। बाप रओ बाप, माए गै माए करैत ओंधरा रहल अछि। माथ पकड़ि बसि कऽ झुलि रहल अछि।)
ललन- आब हम चारिए दिन जीबौैक। हम तोरे लइ लए आएल छी। हमरा एतऽ नीक नहि लागि रहल अछि। छोटकी काकी देबकी दीदीकेँ खाक सीखलकैक। हमहुँ देबकी दीदी लग रहब। ओ हमरा बड़ मानैतए। देबकी दीदी हमरे खून पीबि ओहि पैखाना घरमे कोहामे रहैत अछि। पाँच दिनक अन्दरमे हम निपत्ता भऽ जेबौक।

(फेर ओंधरए रहल अछि। कुकुर जेकाँ माटि भोमहरि कऽ खए रहल अछि। दलानपर दर्शक अपार भीड़ अछि।)

सुभाष- यौ श्रोत्रा-समाज लोकनि अपने सभ एकर बकनाइ सुनि रहलहुँ अछि। हम की करी, हमरा अहाँ सभ बिचार दिअ।
मटुक- सुभाष भाय, अहाँ किछु नहि करु अहाँ एक्के गोट काज करु।
सुभाष- की करु। अहीं बाजू।
मटुक- एकरा उठा-पुठा कऽ छोटकी अंगनामे राखि दियौक आओर ओकरा कहियो जे तू एकरा होंसैत दहिन। जदि ओ एकरा होंसैत देतैक तखनहि ई ठीक भए जाएत आन कोनो उपए नहि।
ललन- जाधरि छेटकी काकी हमरा नहि छुतैक ताधरि हम बताहे रहब, चारि दिनमे मरि जाएब।
मटुक- कहलौं ने सुभाष भाय। एकरा जल्दी लऽ चलू। नहि तऽ ई नहि बाँचत।
पवन- कका, अहाँ डरैत किएक छी? हमरा लोकनि छी ने पीठपर। यौ कका, ओ कथीमे फरिएतैक? मारिमे-गारिमे, भालामे-लाठीमे आङमे-समांगमे, घनमे-संपत्तिमे, केशमे फौदारीमे। हम सभ किछुमे सक्षमे छी अहाँ डरु नइ कका। आ नहि तऽ अहाँ अपन जानू। बेटा हाथसँ चलि जाएत।

(सुभाष आ मीरा ललनकेँ उठा-पुठा कऽ सुकनी लग लऽ जा रहल अछि। सुकनी यदुलाल ठाकुरक घरवाली आ सोमन ठाकुरक माए छथीन। सुकनी रोटी पकबैत अछि आ सोमन कुट्टी काटि रहल अछि। सुभाष आ मीरा ललनक संग प्रवेश होइत। ओ सभ ललनकेँ सुकनीक अंगनामे पटकि दैत अछि। ललन पहिनहि जेकाँ कऽ रहल अछि।)

मीरा- भैडाही एकरा हसौथ, नइ तँ बापसँ भेट करैबौ। सैंखौकी-बेटखौकी एकरा एखन ठीक कर नहि तऽ भकसी झोंकेबौक।
सुकनी- ओइ हाथमे लकबा धरतौक। सैंडाही मङजरौनी लुल्ही पकड़तौक।

(आंगनमे हो-हल्ला भऽ रहल अछि। हल्ला सुनि यदू लाल आ सोमनक प्रवेश।)
सोमन- माए तों शान्त रह। कका, अहाँ नीक काज नहि कएलहुँ एहिसँ कोन फेदा? कोन इज्जत कोन प्रतिष्ठा हमरा सबहक प्रतिष्ठा अहाँ माटिमे मिला देलहुँ। अबहु चेत जाउ नहि तऽ एकर परिणाम बड खराप हएत।
सुभाष- परिणाम जे हेबाक हएत से हएत मुदा गै मौगिया एखन तों एकरा एक्को बेरि छुबि दहिन नै तऽ आइ तोहि नइ आकि हमहीं नै।
सोमन- गै माए तों एक्को बेर नै बाज आ ने एक्को बेर एतएसँ उठ एै कुत्ता के एहिना भुकए दही।
सुभाष- चौट्टा तू हमरा कुत्ता कहमे एखने मारैत-मारैत सोझ कऽ देबो नइ कहीन एै मौगियाकेँ जे ललनमाकेँ चुप-चाप हासौंथि देतौ।
सोमन- चौट्टा, अन्हरा कहीं कऽ सभ खचरै निकलि जाएत

(राजूक प्रवेश)
राजू- हौ सोमन सुनह, हल्ला-गुल्ला नइ करह, एक बेर माए कऽ कहक जे एकरा हसौति देतै एकरो संतोष भऽ जेतै आ हल्लो-गुल्ला शान्त भऽ जेतै तोरा नीक लगै छह ऐहन अशान्ति?
सोमन- अहाँ पढ़ल-लिखल लोक भऽ ऐहन भासल गप्प कए रहल छी? ई गप्प हमरा बड अप्रिय लागल। ऐँ यौ राजू बाबू एइ छौँड़ाकेँ माथा खराप भऽ गेलैक। तँ सुकनीसँ छुआ दहीन ठीक भऽ जेतइ। ककरो बोखार लागल तँ सुकनीसँ छुआ दहीन, ककरो ललबा मारि देलक तँ सुकनीसँ छुआ दहीन। सबसँ बुरबक दीनेनाथ होइ छै की ने? ठीके कहबी छै मुँह-दुबरा बौह सभक भौाजइ।
राजू- सोमन, हम अपन बात आपस लेलौं हमरासँ गलती भेल। तौं सभ अपसेमे फरिया लएह। वा जे मन हो से करह। हम जाइ छी।

(राजूक प्रस्थान)
मटुक- सोमन अहाँ माएकेँ कहियौन ललनमाकेँ छुबै लए नै तँ बुझि लिअ।
सोमन- हमर माए कोनहुँ हालेत मे नहि छुबि सकैत अछि अइ लेल अहाँ सभकेँ जे करबाक हुअए से करु।
मटुक- हरामी नहितन, डाइनकेँ प्रश्रय दैत अछि। ऐहन माएकेँ भरल सभामे जिनदै जरा दैततहुँ।
सोमन- निकाल सार, बजा कोन धाइमकेँ बजाबै छेँ। जदि हमर माए डाइन साबीत भेल तखन धाइमक टोटल खर्च हमर आओर माएकेँ भरल सभामे मोटीया तेल ढारि कऽ आगि लगा देब।
मटुक- एक महिनाक भीतरे हम तोरा माएकेँ डाइन निकालि कऽ देखा दै छियौ। सार हम तोरा माएकेँ एक तोरा माएकेँ एक महिना कऽ भीतरे भकसी नइ झोंका देलहुँ तऽ हम पाजी।
सोमन- सार, तोहूँ सुनि ले, डाइन साबित भेलापर हमहुँ अपन माएकेँ जिनदे नहि जरा देलौं तँ हम पाजी।
पवन- कका, चलू अपन आंगन। लऽ चलू ललनमाकेँ। ई खच्चरी नइ छुअत एकरा। एकटा चिक्कन धामिकेँ लाउ आ पहिने एकरा डाइन साबित करु तखन एकरा सभकेँ बापक बिआह आ पितियाक सगाइ देखाएब। रुपैआक बड़ गरमी भऽ गेलैए सोमनाकेँ। चलू कक्का। लऽ चलू सोमनाकेँ।

(कहैत सबहक प्रस्थान)
-पटाक्षेप-

क्रमशः आगाँ-
• 2.

• राधा कान्त मंडल ‘रमण’
जन्म- 01 03 1978
पिता- श्री तुरन्त लाल मण्डल
गाम- धबौली, लौकही
भाया- निर्मली
जिला-मधुबनी
षिक्षा- स्नातक

मैथिली एकांकी

कने हमहूँ पढ़व

पात्र परिचय
1. धनिकलाल पंचाइतक मुखियाजी छथि।
2. चम्पत लाल मुंशी मुखियाजीकेँ
3. दुखना गरीव व्यक्ति
4. दुखनी ‘‘ ’’
5. अमर ‘‘ ’’
6. रीता ‘‘ ’’

प्रथम दृश्य

(दुखना दुखनी अपन घरमे जीवनकेँ पलक घड़ी दुखसँ वितबैत छलै जेकरा एक सांझक भोजनपर आफद छल। ई बात अपनामे विचार करैत दुखना आ दुखनीक प्रवेश होइत अछि। दुखनी आंगन घरक काज करैत छलि आ मने-मन विचारैत छल जे हे भगवान आइ हम आ हमर धिया पुता खाएत की )
• कथा-ऋषि बशिष्ठ-पूत कमाल
• कथा
• ऋषि बशिष्ठ

• ऋृषि बष्ष्ठिजीक

पूत कमाल कथाक शेष अंश

स्त्रीगणसभ गीत गबैत डब्बूकेँ लऽ कऽ दलान तक गेलीह। डब्बू अप्टू-डेट बेर। सूट-बूटमे सजल-धजल। पैट-कोट टाइ जूता आ काँखतर झुलैत एकटा बैग।
पाहुन सभ वरकेँ देखिते अकचका उठलाह। बरियाती समाज सेहो चौंकि गेलाह। अर्जुन चौधरी मुदा गप्पकेँ सम्हारलनि।
-‘‘कपड़ा-लत्तासँ कोन अन्तर पड़तै, जेहने धोती तेहने सूट-बूट। देहो झँपेबाक ने काज छै।’’
बरियाती समाजसँ एकटा युवक व्यंग्य केलक- ‘‘वाह! बहुत सुन्दर! ई भेलै किने प्रगतिवादी विचार!’’
अर्जुन चौधरी जेना लजा गेलाह। हुनका वुझबामे अएलनि जे ई वाह-वाही नहि अपन संस्कृतिक पतनपर व्यंग्य वाण छल जे सोझ करेजमे लागल। हथकड़ीक लेल आएल पाहुन उठलाह। ओ अपन विध बाधक लेल अग्रसर होइत बजलाह- ‘‘ऐसँ हमरा सभकेँ कोनो अन्तर नै पड़ैए! हमसब तँ घरबैयाक पठाओल दूत छी। ......बस्स! वरकेँ लऽ जेबाक अछि। आब ई सूट-बूट पिहरि कऽ चलथि वा नांगट से तँ हिनकर विवेकक बात छै।’’
एकटा बुढ़केँ जेना अकस्मात बजा गेलनि- ‘‘कमसँ कम माथो तँ झाँपि दहक! उधारे माथ विआह करेबहक?.......हौ, माथक पाग प्रतिष्टाक निशानी होइछै।’’
एतबा सुनिते झट् दऽ डब्बूक भाय धुनेस लागल पाग डब्बूक माथपर धऽ देलखिन। डब्बू झटकैत ओकरा नीचाँ खसा देलक।- ‘‘ई केहन जोकर सन लगैए।’’
डब्बू टुनटुनक इशारासँ लग बजौलक आ कानमे किदु फुसफुसाइत कहलक। टुनटुन आंगनसँ मुजैला टोप नेने आएल। डब्बू ओकरा माथपर रखैत मुस्कुराएल। फोटोग्राफरक बिजलौका चमकि उठलै।
कन्यागतक दलान भुकभुकिया बल्व आ टेन्ट-समेनासँ धेरल-बेढ़ल आ सजाओल छल। विस्मिल्लाह खानक सहनाइक धुन बाजि रहल छल। सौंसे गामक लोक वर वरियातीक स्वागतक ेलल उताहुल छल। वर बिलेंतमे रहै छथि, ई भीड़ जुटबाक आकर्षण छल। पुरुष आ स्त्री सभ बिलेंतीया वरकेँ देखए चाहैत छथि। सबहक मोनमे एकटा नव जिज्ञासा। वर बरियातीक गाड़ी घर्र......घोंऽऽऽ करैत कन्यागतक दलानपर पहुँचए लागल। वरकेँ उतरैत देखि स्त्रीगणक झूंड दूरेसँ ठहाक्का मारलनि- ‘‘माए गै माए, ई वर तँ मुँहोंमे जाबी लगौने छै।’’
- ‘‘आ सूट-बूट ने देखियौ! गोविन्द कका ठीके सुलेखियाकेँ गददनि काटि लेलखिन।’’- एकटा किशोरी बाजि उठलि।
कन्याक माएक करेज पातसन कापए लगलनि। ’’हे भगवती आब की हेतै?’’
पड़ोसिन सभ रंग-विरंगक चर्च-बर्च करए लगलीह। ककरो कहब छलै जे- ‘‘सुलेखा एकरा संग कोना जीवन बिताओत!’’
तखनहि एकटा महिला बाजि उठलीह- ‘‘देखियौ यै, ई तँ वरक हाथोमे किदन भेल छै।........ बापरे बाप! सौंसे हाथ ठेल्ला ओदरल छै।’’
एकटा युवती तजबीज करैत बाजल- ‘‘नै यै काकी, ओ तँ हाथोमे किदन पहिरने छै।’’
कन्याक माएकेँ रहि-रहि सेप सुखाइत छलनि। कन्याक जेठकी बहीन बिधकरी बनल छलीह। ओ वरकेँ देखि बाजि उठलीह- ‘‘देखियौन ने, तेहन नाच नचेबनि जे सभ बिलेंती भूत उतरि जेतनि।’’
सभ स्त्रीगणकेँ जेना कोनो कौतुक दृष्यक अनुमान लागि गेलनि। ओ सभ ठिठिया उठलीह।
दलानक दृश्य अद्भुते छल। बरियाती सभ अपना-अपनामे मस्त। सरियाती स्वागत सत्कारमे व्यस्त। अर्जुन चौधरीक मुँहपर मुदा जेना फुफड़ी पड़ैत छलनि। पंडालक सभसँ मुख्य आसनपर बैसल डब्बू अपन मित्र टुनटुनसँ लगातार बात-विचार करैत छल। टुनटुन डब्बूक ‘‘गाइड’’ बनि गेल छल। डब्बू परिछनक लेल बजाओल गेलाह। स्त्रीगण सभकेँ जेना एकटा खेलौड़िया नेना हाथ लागि गेलै। बिधकरी चौल करैत बजलीह- ‘‘की यौ दुल्हा, ई नाकमे मुन्नो किएक लगौने छी? कने नाक बाहर करियौ तखन ने बिध-बाध हएत।’’
दोसर स़्ी टिपलनि- ‘‘आ हाथमे जे काछु जेकाँ खोल पहिरने छथि से?’’
तेसर स्त्री अधिकारिक कपें बाजि उठलीह- ‘‘ओहो खोलए पड़तनि की! सभटा वस्त्रो खोलए पड़तनि, तखन ने परिछनि हेतनि।’’
तेसर स्त्रीक गप्प समाप्तो नहि भेल छलनि कि एकटा युवती डब्बूक हाथसँ सट् दऽ दस्ताना घिचि देलकनि। डब्बू जेना छिलमिला उठलाह।
- ‘‘ओफ्फो! एनामे तँ इन्फेक्शन भऽ सकैए!’’
डब्बू दस्ताना छिनबाक लेल झपटलनि तावेत ओ युवती ओहि दस्तानाकेँ जुमा कऽ फेकलक! डब्बू जेना बेचैन भेल एम्हर-ओम्हर मूड़ी झाँपए लागल। तावत विधकरी नाकमे लागल मास्कपर हाथ दऽ देलक। पाछाँसँ ओ युवती मास्कक डोरी घिचलक।
......देखिते-देखिते ओ मास्क बिधकरीक हाथ आबि गेल। ओ ओहि मास्ककेँ अपना नाकपर लगवैत लोककेँ हँसेबाक अभिनय केलनि।
डब्बू अपन दुनू हाथक तरहत्थीसँ नाक झाँपलक। एकटा महिला महौलकेँ आर सुखद बनबैत बजलीह- ‘‘जाह! दुल्हाकेँ नाक तँ छनिहेँ! ई छौंड़िया सभ तखनसँ कहै छलैए जे दुल्हा बिलेंतमे नाक कटा आएल छथि।’’
समूचा भीड़ ठहाक्कापर ठहक्का लगाबए लागलि।
एकटा युवती व्यंग्य करैत बजलीह- ‘‘दुल्हा बड़ लजकोटर छथिन! देखियौन ने अपनाभरि एकोटा अंग उधार छोड़ने छथिन!’’
स्त्रीगणक हँसी-ठहक्का बढ़ैत गेलनि आ डब्बूक तामस। डब्बू मास्ककेँ बिना एतेक लोकक बीच रहब सोझे सोझ बिमारीकेँ नोतब बुझैत छलाह। ओ केहन-कहाँ हाथे स्त्रीगणक स्पर्श कऽ इन्फेक्शनकेँ बेसाहब मानैत छलाह। ओ तरङैत अपन कपड़ा उतारबसँ इन्कार कऽ देलनि।
स्त्रीगण सभ जिद्द पकड़ि लेलनि। बिना वस्त्र उतारने एक्कहुटा बिध आगू नै बढ़त।
डब्बू तमकैत दरबाज्जा दिस पड़ेलाह। स्त्रीगण सभ हँसैत आ धिक्कारैत पछौड़ केलनि। अर्जुन चौधरी, डब्बूकेँ देखि जेना अधमरु भऽ गेलाह।
डब्बू फनकैत बजलाह- ‘‘एहन बिआह हम नै करब। ई सभ तँ हमर.....।’’
अर्जुन चौधरी डब्बूकेँ पोल्हबैत बजलाह- ‘‘एना तामस नै करु! ई सभ बिध-बेबहार छै! ई सभ तँ करजि पड़त!’’
- ‘‘हम नै करब एहन बिध-बेबहार!............फुलिश मैरेज.........।.........भेगाबोन लेडिज!!’’
- ‘‘तखन तँ बियाहो नै हेतह!’’
- ‘‘बिआह नै होएत तँ नै करब!............आ जँ बिमार भऽ जाएब तखन......?’’
एकटा बुढ़ बरियातीकेँ नहि रहि भेलनि। ओ चमकैत बाजि उठलाह- ‘‘इह बुड़िबक नहितन! अँइ हौ! एहन जे जीह छेगाएल छह से तोरेटा बिआह हेतह कि आर ककरो भेल छै?’’
दोसर बृद्ध दाँत किचैत बजलाह- ‘‘नै, नै! यएह एकटा अवतारी पुरुष भेलाहेँ।’’
अर्जुन चौधरी आ टुनटुन डब्बूकेँ बुझबैत रहलाह! स्त्रीगण सभ ठहक्का मारैत रहलीह। कन्याक माएक करेज कपैत रहलनि। बिध-बेबहार ठमकल छल। सबहक मोनमे शंका छलैक। की हएत, की नै? पुरान स्त्रीगण सबहक कहब छलनि जे- ‘‘बर झमकाह छैक। एकरा घुमा दियौ! कथीलए सुलेखाक गरदनि हलाल करबै।’’
नवतुरक मुदा दोसरे विचार! सुलेखाक सहमति स्थितिक अनुसार लेब जरुरी छलै। निस्तुकी भेल जे- ‘‘सुलेख अपन आँखिये बरकेँ देखथि आ अगिला बिध-बाधक लेल निर्णय करथि। ओ हँ कहतीह तँ बिआह होएत आ नहि कहतीह तँ डब्बूक बिदाइ।’’
नव तूरक ई निर्णय बुढ़-बुढ़ानुसकेँ कठाइन लगलनि। ओ सभ नाक-मुँह चुकरियाबए लगलीह।
स्त्रीगणक झूंड सुलेखाक नेतृत्वमे दलान दिस बढ़ल। बुढ़ पुरान पछुआ गेलीह। सुलेखा डब्बूकेँ इशारासँ अपना दिस बजेलीह। डब्बू नहि मे इशारा केलनि। स्त्रीगणक झूंड आर आगाँ बढ़ल। बिधकरी बाजि उठलीह- ‘‘की सुलेखा? हँ की नहि?’’
सुलेखा मुस्कियाइत हँ मे इशारा केलनि। बिधकरी हाथ बढ़बैत डब्बूक टाइ पकड़लनि। डब्बू अर्जुन चौधरी दिस पड़ाए लगलाह।.........ऊँहूँ.......! आहाँ आब सुलेखाक सम्पति छियनि। ओम्हर नै एम्हर चलू!’’ ई कहैत बिधकरी डब्बूकेँ अपना दिस घिचि विदा भेलीह। सभ स्त्रीगण डब्बूकेँ सहटारैत आंगन दिस चललीह। बुढ़ी सभ सेहो पछोड़ धऽ लेलनि।
बरियाती सभ भयमुक्त भऽ हँसी ठट्ठामे लागि गेलाह।
• १. एक टा पत्र एक टा संस्मरण
डॉ. शेफालिका वर्मा
• २. बिपिन झा-पर्वक ’औचित्यक उपेक्षा’ सर्वथा चिन्तनीय।
• एक टा पत्र एक टा संस्मरण
डॉ. शेफालिका वर्मा

हमर विवाह फिजिक्स ऑनर्स पटना सायंस कोलेजक विद्यार्थी ललन कुमार वर्मा से भेल छल. तखन हम मैट्रिक पास केने छलों आ हिंदी मे लिखैत छलों. अपन संगी रामदेव जी के कहला पर ओ हमरा मैथिलि मे लिखवा लेल प्रेरित केलान्ही . एक बेर ओ अपन गाम डुमरा मे छलैथ ,हम पटना मे अपन नैहर गोलकपुर मे रही. बहुत दिन बाद हुनकर पत्र आयल जे पढ़ही हमर जी जरि गेल , एतेक दिन बाद पत्रों आयल ते सिनेहक लेश नहीं.हमरा एहेन अति भावुक ,संवेदनशील लेल बड घातक छल.. मुदा , एही पत्रक भाषा देखि हमरा कानब आबी गेल जे हमरा किएक ने ई मैथिलि अबैत ऐछ, मोन होयत छल हम मैथिलि मे लिखनाय छोढ़ी दी, आय फगुआ के अवसर पर ई पत्र पाठक लोकनि के समर्पित करैत निक लगी रहल ऐछ .......
हमर सासुजीक कन्किरवी
जय गोलकपुर के
अहाँक परीक्षा आब अवस्से ख़चम भय गेल होयत . कनि कान एम्हर दियो ने , एकटा सनगर बात कही . कनि कैस के सुनवैत छि. लिय भरि छांक सुनु ......
चारिम दिन मुनहर साँझ के तिरपित बाबु एकटा बेश खढ़गर अलग टेंट संग एहिठाम पहुँचलाह .अलग टेंट महाशय आर केओ नहीं बल्कि हुनकर श्री श्री १०८ डिगा सन भातिज छलथिन . आब सुनु हुनक किछु सराहना , डिगा महोदयक परिधान मे दुनल्ली. नहीं बुझलियैक वैह फत्ते खान वाला पैजामा . पैजमाक डोरिक काज डरा डोरी से चलैत छल. कद तीन फिट चारी इंच , धुआ कब्ज़ा वैह तीन गिरहवाला हरवाहाक पेना आ ठांचा ? बुझु जे सजमैन छिलल. कोनो ठाम ब्रह्मा बाबा खुरचनी से बेसी ओदारि लेलन्हि आ कोनो ठाम जेना संयोगवश हुनक आंखि लागि गेलेइक ते खुरचनी एकदम से छछरी गेलैक. वयस आब जे होय मुदा रहैथ झाढ़बेर जकां अन्ठियाल . गारि ते हुनका मुंह से फुस्सुकी गोली ..बोल्चालक भाषा मे केयोटी दाली..कखनो हिन्नी मे रंगरेजी कखनो रंगरेजी मे मिथली..एकटा उदाहरण सुनु . एकबेर ओ बजलाह .औ ललन बाबु, आय काल्हि सायंस जे रैकेट मे इन्वेंट केलक सेहो बर्ल्ड के सात बंदर्स मे छैक. .....हमर दिमाग चकराय गेल जे बैडमिन्टन आ टेनिस वाला रैकेट दुनियाक सात बानर मे कोना आयल ? पाछु बुझालों जे ओ गपे गप मे रोकेट के रैकेट आ वंडर्स के बंदर्स बना देलनि.
आ-हां- एकटा गप ते बिसरले जायत छलों --हुनका देखले संता हमरा अहांक भट्टा बाढ़िक मन्नाजिक बनाओल लाठी समेत उनटल करिया खापैढ़ मन पढ़ी गेल. ब्रह्मा बाबा हुनक रचना स्पेशल करियोठ माएट से केने छथिन्ह. परसु भोरे भोर बेचारा के बायब्रिंग उखाढ़ी गेलैक , कुटुंब वाली बात खेने रहथिन्ह विशेषे .बायब्रिंग एहेन हुम्चलाकन्ही जे भोर से दुपहर धरि एक सोरे बेर पिचकारी बांसक अढ़ह मे छोढ़ालैठ. राति मे एहेन दाबल अबाज होय जेना विवाहक देढ़ह आ रसन्चोकी. कखनो टामिगन सेहो चलैत छल परन्तु अपवाद रुपे , आब विशेष कि कही ?तिरपित बाबु लग हुनक शोभा वोहिनाजेना भर्हक्दम लग टनक बेहरि .आर समाचार कि कही ? अपना वोहिथाम पिल्ला पिल्ली मिलआई सात जन छल .तीन गोतनी आ चारी दियाद , सभ एक पर एक बिलैंती .अहि बिच मे बड़ दर्दनाक घटना भय गेलैक . सभ कुत्ता के कोन दन मारुख बिमारी भै गेलैक. तीन टाक ते अपतटी खेत मे प्राण चली गेलैक ,बचलो सभ स्वर्ग पार्सल हेवाक तैयारी मे ऐछ . अहि कारने बड़ दुखी छि. खेवा पिवा मे मोन नहीं लागैत ऐछ देखियोक ने ट्रेजेडी ई भेल, जे कुत्ता श्राद्ध करवा लेल अबैत ऐछ से एही गिरफित मे परि जायत अछि . से गाम परक सभ कुत्ता असहयोग आन्दोलन कयने ऐछ .विचार अछि जहिना दक्षिण अफ्रिका मे शहीद के श्रधांजलि अर्पित करवा लेल मोर्निंग डे मंवैत अछि तहिना हमहूँ सभ शहीद कुत्ता सभ के श्रधांजलि अर्पित करी. मोन, कर्म वचन से शुध्ह भ क अंहु सभ श्रधांजलि अर्पित क दियोक .
पढ़ह्नाय ते कम सम चलैत अछि . देह हाथ छोरि के खायत छि . मुख्यतः ते चारी बेर फा दुआ मिलाय आठ दस बेर . दिमाग से बेसी पेट से काज ल रहल छि. परिणाम ई जे पेट संक्रान्तिक टिमकी कोहा जकां फूलल जा रहल अछि, कपार चोकर बनल जाईत ऐछ. अच्छा ते बेस ...
• अहीनक बत बनौआ
राजा ललन
• डुमरा .१२.४.६१

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• बिपिन झा
• बिपिन झा
• पर्वक ’औचित्यक उपेक्षा’ सर्वथा चिन्तनीय।
• भारतवर्षक प्रमुख वशेषता अछि ’विविधता में एकता’। ई वैशिष्ट्य एहि रा्ष्ट्र कें अन्य सऽ अलग छवि दैत अछि। ई विविधता एकर संस्कृति, स्थान, भाषा आदि कऽ रूप में प्रस्तुत होइत अछि। जहाँ तक संस्कृतिक बात अछि विविध प्राकारक पर्वक समावेश अपना में कय लैत अछि।
विविध प्रान्त में आ प्रत्येक माह में विवध प्रकारक पर्व मनाओल जाइत अछि जेकर सूची http://www.festivalsofindia.in/mw.asp एहि साइट सँ प्राप्त कयल जा सकैत अछि। अस्तु कहवाक आशय जे किछु पर्व मात्र क्षेत्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त अछि तऽ किछु राष्ट्रीय स्तर पर, किछु पर एहनो अछि जे विविध प्रान्त में विविध नाम सँ जेना तिला सँकरैत।
एतय हम होली कऽ सन्दर्भ दैत (ई राष्ट्रीय पर्व अछि) हम एहि बातक चर्चा करय चाहैत छी जे - कोन कारण छैक जे दिन प्रति दिन लोक पावनि कें एकटा होलीडे रूप में मात्र स्वीकार करब अधिक पसन्द कय रहल अछि अपेक्षाकृत एहि बात कें कि ई पर्व सभ अपन संस्कृति के किछु विशेष तथ्य के अभिव्यक्त करैत अछि।
सामान्यतया युवावर्ग होली क दिन खायब पीयब मस्त रहब एहि दिस ध्यान देनाई उचित बुझैत छथि। होली क आशय मांस मदिरा आ अन्य के रासायनिक रंग सँ यथा सम्भव परेशान करब, भय गेल अछि। ई पर्व कियाक मनाओल जाइत अछि एहि दिस कोई सोचबाक इच्छा नहिं करैत छथि। कदाचित ई बुझैत जे ई सभ बीतल जमानाक गप्प ीक।
एतय आवश्यकता अछि जे ई जन चेतना जागृत हो कि ई पर्व सभ जे शुभसंदेश दैत अछि ओकर अनुगमन कयल जाय एहि मऽ निहित सन्देश जे सामाजिक एकता आओर राष्ट्र केर अखण्डता क विकास में सहायक हो ओकर विस्तृत ्विवरण जनमानस के जे ओहि स अपरिचित हो, ओकरा तक पहुंचायल जाय ताकि राष्ट्र विकासक पथ पर सर्वथा अग्रसर हो।
• १.सोच- सरोज ‘खिलाडी’-नेपालके पहिल रेडियो नाटक संचालक २. दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी
• सोच-
सरोज ‘खिलाडी’
नेपालके पहिल रेडियो नाटक संचालक

(भैसा गामक बेरोजगार मुदा राजनितीक पार्टीके सदस्य छथि । भैसा टेढ टेढ बात करमे माहिर मुदा सत्य आ इमन्दार पात्र छथि मतलब भैसा मजकिया छथि । आई भैसा सबटा काम छोरिक परशु बरियाती जाएके तैयारिमे जुटल छथि ।)

भैसा ः— (गँभिर मुद्रामे ्क्यालकुलेटर आ कापी पेन लक ) ः— कम स कम कएटा रसवरी हम खासकैछी ? फेर आओर –२ मिठाई सेहो खाएके अछि हमरा । रसबरी कनीका घटाब परलै । दोसर कागजमे सारैछी । (सोचैत) लगभग रसवरी २२० पिस मात्रे, लालमोहन त कि खाउँ ? कम्मेसम खबै ११० पिस, लड्डु त के पुछैछै ? मात्र ८० पिस । आ आओर –आओर मिठाई मिलाजुलाक ६० गो । दहि नै खबै मन खराब भजाइत नामके लेल मात्रै खबै मात्र २–३ तौला । (अचानक) जा ककक । हिसाव जोरके चक्करमे त कालानुन आ जमाइनके फक्की खाएके बिसैरेगेलीयै । (पुरिया निकालैत) जल्दी स खालु । दु दिन स भुकले छि मिठाइ खाएला जल्दी स कालानुन जमाइन खालु तखन नै हिसाब किताब चुक्ता होतै । २ दिन आरो बाकिए छै जम्मा ४ दिन भुकलेरहपरत । ठिके छै लेकिन मिठाई नै छोरबै । (पुरिया निकालैत) एकबेर फेर कालानुन जमाइन खालु । ताबते मे गामक छौरा पचासग्राम हडबराति दौगैत भैसा लँगअबैय आ)

पचासग्रामः—(हडबराति) होउ भैसा भैया, होउ भैसा भैया ।
भैसा ः—(रारजका फटकारैत) है कथिला बाप —बाप चिच्याईछे ? । कथि भेलौव आई ?
पचासग्राम (हकमैत) ः— तोरा माईके तिनचारी गो हतीयारधारी छौरासब पकैरक लगेलोह ।
भैसा ः—(औगताक कनैत) हतियारधारी पकैर क लगेलैय ? हे भगबान आइरे केमहर गेलैय उ सव ?
पचासग्राम ः— नदिदिसन गेलैय ।


भैसा ः— नदिदिसन । वैदिन आइलरहै ५—७ टा छौरासव चन्दा लेब । त नै देलीयै पक्के ओहेसब होतै । हमकोनो नै चिन्हनेछियै ? ठिक है हम ओकर सबहके अडे पर जाईछियै । देर करबै तकि होतैे नै होतै ।
पचासग्राम ः— हम त कहै छियो नैजा फोन—तोन करतो त फोन स बात कलीहा ।
भैसा ः— है फोनके भरोसे बैसु ? हट हमरा जाइदे ।
(भैसा हडबराइत दौगैत नदितर्फ जाइछथि ।आ अड्डापर भैसाके १टा हतियारधारी पकैरक पुछैय )
हतियारधारी ः— है के छे तो ?
भैसा ः— भैसा । तो सब हमर माइके अपहरण कक लैले हँ । बता हमर माई काहाँ है ?

(हतियारधारी) भैसाके पकैर क वै ठामके इन्चार्ज लँग लजाइत अछी आ )


(हतियारधारी) ः— हजुर ओ बुढिया भूमी देवीके बेटा यिहे है । माइके छोराब आइल है ।
भैसा ः— इन्चार्ज साहेव हमरा माइके छोइरदु । हम सव तोहर कथि विगारने छियो ?
इन्चार्ज ः—(बजबैत) रे अग्नी ?

अग्नी ः— जी
इन्चार्ज ः— रे वै दिन चन्दा माँगगेले त कथि कहलकौ यि छौरा ?
अग्नी ः— कहे भगवान हात पैर ने देने छौ कमाइला ?
इन्चार्ज ः— सबके अपन —अपन काम छै हमर सबके कामे छै अपहरण करक,े मारिके पिटके । (भैसापर तकैत) सुन छौरा ५० हजार लक आ । आ माइके लजो । आ सुन आइ दिन स अै ठाम नै अबीहे हम सव अपने फोन करबौ ।
भैसा ः— लेकिन हमरा लग ५ चो सय रुपैया नै है । हम गरिव आदमी तोरा सबके कत स ओते रुपैया आइनदियो ?
इन्चार्ज ः— तखन एकटा काम कर, तो अपन मतारि स हात धोले । जो चैल जो घर, तोरा मतारिके चालिस टुक्रा क क बोरामे वन्द क क नदिमे फेक देबौ, कुता नढीयाके पेट भैरजऐतै ।
भैसा ः— ( पित स ) रे मरदाबाके बेटा छे त फरचीयानले अकेले अकेले । बन्दुक के बल स हिम्मत दखबै छे कायर ।
इन्चार्ज ः— कि रे ? तो हमरा चुनौती देले हँ । रे तोरा सन सन ४ टाके हम अकेले उठाक फेकसकैछी, आ खेल्बे आ ।
भैसा ः— यि तो अपन सब कुताके कही, कि तो जे हारबे त हमर माइ के छोइर देतौ आ गोली नै चलतौ ।
इन्चार्ज ः— ( हसैत ) सुनले रे छौेरासब, यी जीत जएतैे त केउ गोली नै चलबीहे । बुझले ?
(इन्चार्ज भैसाके माय लँग जा कक)
इन्चार्ज ः— बुढीया तोहर बेटा हमरा फरचियाबके धम्की देलकौव। (भैसापर तकैत) समझ यि गेलौ ?
माँय ः— नै ओ जऐते नै तो जएबा आ कहु जएवे करबात सुनक होतै हमरे कोख, कोनो माँयके कोख ।
इन्चार्ज ः— बुढीया तो भावना्त्मक बात नै कर माइर देख माइर ।

(इन्चार्ज आ भैसा मारि करबाके लेल भिरजाति अछि । इन्चार्ज भैसाके एक मुक्का द क मारिके सुरुवात करैत अछि । इन्चार्जके मुक्का भैसाके लगिते भैसाके माँय आहककक कहिक चिच्याति अछि आ भैसाके मुक्का इन्चार्ज के लगिते फेरु भैसाके माँय आहककक कहिक चिचियाति छथि । भैसाके माँयके चिच्याति सुनिक सब आदमीके ध्यान ओकर माँयके तर्फ जाति अछी )


इन्चार्ज ः— गेइबुढीया, हम ओकरा मारलियैय आओ हमरा । लेकिन तोहर मुहस खुन कथिला निकलैछौ ?
माँय हम तख्नीए कहलियोह कि केउ मारते ककरो त चोट हमरे लागत ।
इन्चार्ज ः— (हसैत) सुनहि रेइ छौरासब, पिटतै हमरा चोट लगतै एकरा
(सबकेउ हसैछथि)

(मारि फेरु सुरु होतिअछि । एमकी बेरके मारि लगातार पाँच मिनेट चलैतअछि । पाँच मिनेट तक मायँ आहककक आहककक चिच्याति छथि । मायँ पाँच मिनेटके बाद बेहोस भ क खैसपरैत छथि । तखन)

इन्चार्ज ः—(मायँ तरफ देखैत) बापरे, भैसाके मांयके मुहस खुनेखुन निकललछै । यि कोन आश्चार्य भेलै ? चोट बास्तवमे एकरे माँयके लगलैय ।
भैसा ः— आब कथि तोहर माँय आ हमर माँय । तोरो पिटलीयौव त चोट लगलैय हमरे माँयके । तखन त हमर तोहर सबके माँय भेलैनै ?
इनचार्ज ः— अच्छा एकटा बात ओई छौराके पिटक देखियै एकरा चोट लगैछै ।
(इन्चार्ज एकटा छौराके पिटैछथि । मुदा छटपटाति अछि भैसाके माँय । इन्चार्ज डर स ओकर माँयके पैर पकरि क कनैत कहैछथि )
इन्चार्ज ः— माँय उठु, हमरा स गल्ती भेल माफ करु । आँहा त पुरे नेपालके माँय छी । हमर सोच गल्त छल । माँय सबके एके होइछै । ककरो बेटा आ घरबला मरैछै त दुख होइछै माँयके, नेपाल माँयके । हमसब, सबमधेशी, हिमाली आ पहाडी जनता एके माँयके सन्तान छी । आइ स हम ककरो अपहरण आ ककरो स चन्दा नै मँगबै । (कनैत हमरा माफ कदिअ ।)
• लाल भौजी (आगाँ)

• दुर्गानन्द मण्डल

• दुर्गानन्द मंडलजीक
लाल भौजी कथाक
शेष अंश-

हाथ दैत बाजि उठैत छथि एकरा एक्को रत्ती कोनो बातक घ्यान नै रहै छै। कहौ तँ कतैक जाड़ होइत छै..... कहैत बुढ़िकेँ पाँजमे उठा आ पुआरक बीछौनपर ओंधरा जाइत छथि। कनिये जा कि लट्टा-पटी होइत आकि तखने आंगनसँ पोता-पोती खा कऽ सुतैक लेल बाबा किलोल करैत मालक घर दिशि दौड़ पड़ैत अछि। बुढ़ि बाजि उठैत छथि- ‘‘छोड़ौ ने, छोड़ौ धिया-पुता सभ आबि रहल छै।’’ आ दुनू परानी माने बुढ़ा-बुढ़ि गरमाएले अवस्थामे एक-दोसरासँ धड़फड़ा कऽ अलग भऽ जाइत छथि।
रहल जबान-जुआनक गप्प, जबानीक धाह पावि जाड़ो गरमाएले रहैत अछि। बुझू तँ दू परानी जबान-जुआन होथि आ उपरमे रजाइ परल हो तँ जाड़ोकेँ जाड़मे पसीना छुटए लगैत छै। मुदा प्रकृति तँ स्थिर रहत नहि। ओ तँ अपना कालक्रमे चलैत रहत।
बीतल जाड़ मास आएल सरस्वती पूजा उड़ए लागल वातावरणमे रंग-अबीर जारु कात डारि-पातपर चीड़ै-चुनमुनी चहकए लागल। कोइली धीया-पूताकेँ मुँह दुसब सुरु कऽ देलक। आमक गाछ मंजरसँ महमह करए लागल। मुनगा फूल धरए लागल, राइ, तोड़ी, तीसी आ सरिसबमे पीअर-पीअर फूल सेहो लहलहाए लागल। वातावरण किछु दोसरे रंगक भऽ गेल। चारु कात महमह करैत। कथा-कुटमैती शुरु भऽ गेल। कथकिया सभ ठाम-ठाम जाए-आबए लगलाह। कथा फरिछैला उत्तर लाल-पीअर धोती आ ताहिपर लाठी हुरबला लाल-लाल ठप्पा अपन मैथिल सभ्यताक परिचए दिअए लागल। नेना-भुटका सभ फगुनहरि गीत गाबए लागल- ‘‘यै बड़की भौजी करियौ बिचार,
कतै दिन रहबै आब हम कुमार
दैखैत देखैत हमरा ई भऽ गेलै
अहाँ बहीनसँ हमरा लभ भऽ गेलै। हरबाहो-चरबाहो सभ फगुआसँ सम्बन्धित मैथिली आ भोजपुरी गीत गाबए लागल। बाध-बोनमे मालो-महिस चराबए आ घर-घसबहिनीकेँ देखैत ई गीत गाबए- ‘‘तोहर लंहगा उठा देव रीमौटसँ....।’’
घसबहिनीयो सभ उत्तारा देनाइ नइ बिसराए ओहो सभ गाबए ई गीत- ‘‘रओ छोड़ा बज्जर खसतो....।’’ बुझू जे जाड़क खुमारी लोक सभ फागुनेमे उताड़ए चाहैत। जिनका परिवारमे नव विआह भेल रहनि, बुझू तँ हुनकर छओ आंगुर घीएमे आखिर एहि समएसँ भला गोधनपुर गामक रामदेव बाबूक छोटका बचबा उगन किऐक ने लाभ उठबितथि। किएक तँ एहीबेर बाइस दिसम्बर 2009मे हुनक अग्रज दुर्गानन्द जीक विआह दरभंगा जिलाक बरुआरा गाममे सम्पन्न भेल छलनि। तेँ भैयासँ तँ डर जरुर रहनि मुदा नवकि कनियाँ अर्थात लाल भौजीसँ खुब रंग-रभस होइत छलनि। उगनक भौजी सेहो करीब एक्कैस बर्खक छलीह। बीस बसन्त तँ सुखले-साखले बितौलनि मुदा एक्कैसम बंसन्त बुझू जे ओ तँ रससँ उगडुब करैत छलीह। बेस पाँच हाथ नमहर-छड़गर, देहो दशा बेस भरल-पुरल गाल तँ बुझू हाइ ब्रीड टमाटर जेकाँ लाल टरैस आ बेस गुदगर। आँखि ऐहन कटगर जे जेकरा दिशि एक बेर ताकि देथिन तँ बुझू सोनित एक्को ठोप नइ खसैत मुदा ओ बेचारे घाएल भऽ जाइत। हुनकर जुट्टी तँ बुझू सुच्चा गहुमन साँप जेकाँ फूफकार छौड़ैत छलनि। नव विवाहित भेलाक कारणे सदिखन भरि बाँहि चुड़ी आ भरि हाथ मेहदी, आरतसँ रंगल पएर, भरि आँखि काजर आ भरि माङ सेनुर लाल टुहटुह करैत। क्यो जँ धोखहुँसँ देखति तँ आँखि चोन्हरा जाइत। सभसँ सुन्दर हुनक वस्त्राभुषणक परिरव आ ओढ़ब छन्हि। एक तँ गोड़ि नारि ताहिपर सँ सुगा पंखी रंगक साड़ी आ बेलाउज आ ओहिक तरमे उज्जर धप-धप करैत ब्रेसिअर जे पहिरथि ओकर उज्जरका फिता, से देखि से देखि उगनकेँ तँ मौगति भऽ जाइत छलनि। ओ मने-मन बिचारथि जे एहि बेरि फगुआमे लाल भौजीकेँ सभ तरहेँ लाल कऽ कए देबनि। दिन बितैत कोनो कि देरी लगैत छै। संयोग एहन जे एहि बेर फगुओ पहिले मार्चमे छल। जेना-जेना फगुआ लगिचाइल जाए उगनक मना तेना-तेना लाल भौजीक जुआनीसँ बौराइल जाइत छलनि।
फगुआसँ एक दिन पहिने उगन दरभंगा अपना डिपटीपर सँ गाम अबैत छथि। किलो दुइ मधुर नेने किलो एक अंगुर, आसेर काजू आ दू पैटिक किशमीस आ चारि-चारि पैटिक हरियर लाल रंग सेहो हाथमे टंगने आएल संग-संग दू शीशी रम सेहो नेने आएल। पीठपर एम.आर. बला बैग। उगन आंगनसँ ससरि ओसारपर जाइत छथि आ ओतैसँ हाक दै छथिन- ‘‘भौजी, यै लाल भौजी कतए गेलौं, आउ-आउ लग आउ हम छी उगन।’’
लाल भौजी पलंगपर सँ उठि बाहर अबैत छथि। तात उगन पीठपरक बैग निचाँ राखि एक हाथे मधुरक पैकित लाल भौजीक हाथमे दैत आ दहिना हाथमे पहिनेसँ धोरल लाल रंग लाल भौजीक बामा गालपर लगबैत आ दहिना गालमे चुम्मा लइत बाजि उठैत छथि- ‘‘अधला नइ मानब फगुआ छी। भौजी यै भौजी आब कहू मन केहन लगैए?’’
लाल भौजी चौबनियाँ मुस्की दैत बाजलि- ‘‘धूर जाउ, हमरा अहाँक ई चालि नइ सोहाइए।’’ बाजि लाल भौजी अपना पलंगपर चलि जाइत छथि। आ उगन अपन कोठलीमे। राति भरि उगनक आँखिमे नीन नै भेल। सुतलीयो रातिमे रहि-रहि मन पड़ि उठैत छन्हि भौजी, लाल भौजी........।
• १. नागेन्द्र कुमार कर्ण-मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा २. मनोज झा मुक्ति- महाशिवरात्री मेला आ गाँजाक व्यापार,मिडिया सेन्टरक स्थापना
• १

• नागेन्द्र कुमार कर्ण
• मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा


मिथिलाक प्रत्येक पावनि, तिहारमे परिक्रमा करबाक चलन पुराने आ अनिवार्य रहल अछि । मन्दिरमे हुए या कोनहु पुजा–पाठक बाद मन्दिरके कमसँकम एक चक्कर घुमबाक काज जे होइत अछि सैह परिक्रमा अछि ।
परिक्रमा कोनो निश्चित स्थानके कायल जाइत अछि । मिथिलामे विवाह सँ मृत्यु पर्यन्त परिक्रमा कायल जाइत अछि । विवाहमे वर–कनियाँ वेदीक चारुकात घुमल करैत अछि जे परिक्रमेक प्रतिक रहल अछि । अहिना परिक्रमा मिथिलाञ्चलमे सृष्टिक शुरुआतेसँ चलि आयल अछि । मिथिलाक राजधानी जनकपुरके केन्द्र मानि परिक्रमा करबाक परम्परा एतऽ रहल अछि, जकरा पंचकोशी, माध्यमिकी परिक्रमाक नामसँ सम्बोधन कायल जाइत अछि ।
हरेक वर्ष फागुण कृष्णपक्षक अमावश्यासँ शुरु भऽ फागुण पूर्णिमाधरि पञ्चकोशी परिक्रमा मनाओल जाइत अछि । परिक्रमा जनकपुरसँ शुरु भ जनकपुरेमे जाऽकऽ ईतीश्री होइत अछि ।
परिक्रमा वृहत, मध्य आ अन्तगृही पश्चात सम्पन्न होइत अछि । वृहद परिक्रमा उत्तरमे हिमालय पर्वत श्रेणी, पूवमे कोशी, दक्षिणमे गंगा आ पश्चिममे गण्डकधरिके परिक्रमाकबाद सम्पन्न होइत अछि । आइकाल्हि एहि तरहक परिक्रमा विरले कयल जाइत भेटैत अछि ।
मध्य परिक्रमा अठारहमं शताब्दीसँ पूवेसँ मनवैत अएबाक विश्वास कायल जाइत अछि । पहिने पहिने ई परिक्रमा ५ दिनधरि मनाओल जाइत छल । एहि परिक्रमाके २०म् शताब्दीमे आविकऽ महात्मा सुरकिशोर दास पाँच दिनसँ १५ दिन बनौलथि । जकर कारणसँ अखन एहि परिक्रमामे साघुसन्त, महन्थ, गृहस्थ, नागा लगायतक वृहत उपस्थिती रहैत अछि ।
मिथिलाक राजधानी जनकपुरके केन्द्रविन्दू मानि नेपाल आ भारतक १५ विश्राम स्थलमे बसोबास कऽ फागुन पूर्णिमाक दिन जनकपुरमे अन्तगृही परिक्रमा कएला पश्चात एकर समापन कायल जाइत अछि । १५ विश्रामस्थल जनकपुरसँ पाँच–पाँच कोशक दुरीमे रहबाक कारणे एकर नाम पञ्चकोशी परिक्रमा परल अछि । फागुण अमावश्याक दिन धनुषाक कचुरीसँ मिथिलाविहारीक (रामसीता) आ किशोरीजीक डोला बाजागाजा सहित जनकपुर स्थित जानकी मन्दिरमे लावि परिक्रमाक विधिवत शूरुवात होइत अछि । ई डोला मिथिलाक विभिन्न धार्मिक, ऐतिहासिक आ पुरातात्विक महत्व रहल स्थलक परिक्रमा कऽ कऽ जनकपुरमे आविकऽ सम्पन्न होइत अछि । जनकपुरमे मध्य परिक्रमा अन्तगृही परिक्रमाक रुपमे सम्पन्न होइत अछि ।
परिक्रमाक अवधिमे परिक्रमा यात्रीसब नेपाल आ भारतक १५ स्थानमे बास बसैत छथि । जाहिमे धनुषाक जनकपुर, धनुषाधाम, हनुमानगढी, औरही, सतोषर आ पर्वता, महोत्तरीक मटिहानी, जलेश्वर, मडै, धुव्रकुण्ड आ कञ्चनवन, भारतक गिरिजास्थान फुलहर, कल्याणेश्वर, विशौल आ करुणा लगायतक स्थानमे परिक्रमायात्रीसब विश्राम करैत छथि । परिक्रमाबासीसब करीब १२८ किलोमिटरक यात्रा कएल करैत छथि ।
नेपाल आ भारतक सामाजिक सदभावक सेतुक रुपमे रहल ई परिक्रमा धार्मिक, ऐतिहासिक आ पूरातात्विक महत्वक परिचायक अछि । परिक्रमा आर्थिक दुनु कातक जनताक मजबुतीक एकटा कारक सेहो बनल अछि । विश्रामस्थल विशिष्ट महत्वक भेलाकबादो अवस्था दयनिय रहल अछि । ताहि स्थलसबमे रहल जलाशय, मठ, मन्दिर उपेक्षाक कारणे दिनानुदिन जीर्ण बनि रहल अछि । परिक्रमा सडकक निर्माण हरेक वर्ष जोडतोडकसँग उठौलाक बादो अखनधरि सडकक निर्माण नहि भेलाक कारणे परिक्रमाबासीसबके अपेक्षाकृत बेसिए कष्ट भोगवाकलेल विवश कऽदैत अछि ।
परिक्रमा केलाकबाद सुख, शान्ति, मनोकामना पुर्ण होएबाक विश्वास रहल मान्यताक कारणे प्रत्येक वर्ष परिक्रमा यात्रीक संख्यामे बढोत्तरी होइत आयल अछि ।

परिक्रमा मार्ग

मध्य परिक्रमा अर्थात पञ्चकोशी परिक्रमा नेपाल भारतक ८० कोशक वृत्ताकारमे धुमिकऽ मनाओल जाइत अछि । नेपाल आ भारतक १५ विश्राम स्थलमे फागुण अमावश्यासँ फागुण पूर्णिमाधरि ई परिक्रमा पुरा होइत अछि । हरेक विश्रामस्थलक अपने–अपने तरहक विशिष्ट आ पुरातात्विक महत्व रहल अछि ।
(१) हनुमानगढी ः— फागुण अमावश्याक दिन धनुषाक कचुरी मठसँ निकलल रामजानकी (मिथिलाविहारी)क डोला जानकी मन्दिर होइत बाजागाजा सहित हनुमानगढीमे रात्रिक विश्राम करैत अछि । एतऽ शताब्दियो पुरान हनुमानक विशाल मूर्ति रहल अछि ।
(२) कल्याणेश्वर (कलना) ः— विश्रामक दोसर पडाव स्थल भारतक कल्याणेश्वर अर्थात कलना अछि । एतऽ कल्याणेश्वरनाथ महादेवक मन्दिर अवस्थित अछि । राजर्षी जनकद्वारा अपन राजधानीक चारु कोन्हमे स्थापना कायल चारि महादेव मध्य ई एक अछि ।
(३) गिरिजास्थान (फुलहर) ः— कल्याणेश्वरस्थानसँ चारि कोस दक्षिण– पश्चिममे रहल गिरिजास्थान, परिक्रमाक तेसर दिनक विश्राम स्थल अछि । गिरिजास्थान पौराणिक स्थल रहबाक विश्वास अछि । त्रेता युगमे जानकीजी एत्तहि फुल लोढ़वाक समयमे श्रीरामसँ पहिल भेंट भेलछलनि से किंवदन्ति अछि । एतऽ दुःखहरण कुण्ड, सीतासागर आ फुलवारी रहल अछि ।
(४) मटिहानी ः— मिथिला पञ्चकोशी परिक्रमा चारिमदिन अर्थात फागुण शुक्ल तृतीयाक दिन महोत्तरी जिल्लाक पहिल विश्राम स्थल मटिहानीमें प्रवेश करैत अछि । एतऽ सीताजीक मटकोरक लेल माटि खनाएल विश्वास कायल जाइत अछि । एहिठाम प्रसिद्ध लक्ष्मी सागर नामक विशाल पोखरि आ प्रसिद्ध लक्ष्मीनारायणक मन्दिर रहल अछि ।
(५) जलेश्वर ः— मटिहानीसँ परिक्रमायात्री पाँचमदिन जलेश्वर पहुँचैत अछि जे मटिहानीसँ २ कोश पश्चिममे अवस्थित अछि । एतऽ जलमे विराजमान जलेश्वरनाथक पुजा आराधना पश्चात यात्रीक रतुका विश्राम एतहि होइत अछि ।
(६) मडै ः— फागुण शुक्ल पञ्चमीक दिन परिक्रमाक डोला जलेश्वरसँ प्रस्थान कऽ मडै पहुँचैत अछि आ एतऽ रातिक विश्राम करैत अछि । प्राचिनकालमे एतऽ माण्डव ऋर्षीक आश्रम आ सीताजीक विवाहकलेल मडवा (वेदी) एत्तहि बनाओलगेल बुढ़–पुरानक कहबी छन्हि ।
(७) धु्रवकुण्ड ः— परिक्रमावासी मडैÞसँ सातम दिन धु्रवकुण्ड पहुँचि एतऽ विश्राम करैत अछि । एतऽ ध्रुवक मन्दिर आ ध्रुव कुण्ड रहल अछि ।
(८) कञ्चनवन ः— ध्रुवको दर्शन कएला पश्चात परिक्रमाबासी महोत्तरीक अन्तिम पडाव स्थलक रुपमा रहल कञ्चनवनमे सप्तमीक दिन विश्राम लेल करैत अछि । एहिठाम ईच्छावती आ विरजा गंगाक पवित्र संगमस्थल भेलाक कारणे एकरा पवित्र मानल जाइत अछि । पौराणिककालमे एतऽ अनारवन, तमालवन, तालवन, कदलीवन लगायतक १२ टा रमणीय वन रहल छल । त्रेता युगमे एतऽ भगवान राम हारी खेलने रहल किंवदन्ति अनुसार एतऽ परिक्रमाबासी पहुँचिकऽ अविर खेलीकऽ होली मनवैत अछि ।
(९) पर्वता ः— नवम् दिन परिक्रमायात्री धनुषाक पर्वतामे विश्राम लैत अछि । राजा जनकद्वारा स्थापित क्षिरेश्वरनाथ महादेवक प्रसिद्ध मन्दिर एतऽ रहल अछि ।
(१०) धनुषाधाम ः— पर्वतासँ परिक्रमाबासी दशम् पडावस्थलक रुपमा रहल धनुषाधाम पहुँचैत अछि । एहिठाम जनकपुरमे सीताक स्वंयम्वर होइतकाल मर्यादापुरुषोत्तम श्रीरामद्वारा तोड़लगेल धनुषक एकटा टुकड़ी खसल विश्वास अछि । एतऽ सीताराम, हनुमान लगायतक मन्दिर रहल अछि, मुदा दर्शनार्थीक दर्शनक केन्द्रविन्दु धनुषे रहल पाओलगेल अछि ।
(११) सतोषर ः— फागुण शुक्ल दशमीक दिन परिक्रमाबासी डोलाक संगे सतोषर पहुँचल करैत अछि । एहिठाम सातटा पोखरी होयबाक कारणे एकर नाम सतोषर परल अछि । एतऽ शिव आ सीताराम मन्दिर रहल अछि ।
(१२) औरही ः— विमला नदीक तटमे अवस्थित औरहीमे परिक्रमा यात्रीसब अपन १२ दिनक विश्राम लेल करैत अछि ।
(१३) करुणा ः— नेपालक औरहीसँ पुनः परिक्रमा भारतक करुणामे तेरहम् दिनमे प्रवेश करैत अछि । एहिठाम करुणा नामक नदी विख्यात रहल अछि ।
(१४) विशौल ः— करुणाक विश्रान्तिकबाद परिक्रमाबासी चर्तुदशीक दिन भारतक विशौल पहुँचैत अछि । एहि स्थान होइत कमला नदी वहैत अछि आ एतऽ ऋर्षी विश्वामित्रक मन्दिर सेहो अवस्थित अछि ।
(१५) जनकपुर ः— भारतक विशौल पश्चात परिक्रमाक अन्तिम पडावस्थलक रुपमे नेपाल स्थित मिथिलाक राजधानीक रुपमे विश्व प्रसिद्ध रहल जनकपुरमे पहुँचिकऽ परिक्रमाबासी विश्राम करैत अछि । एतऽ रतुका विश्राम पश्चात अन्तिम प्रहरमे अन्तगृही परिक्रमा करबाक परम्परा रहल अछि । जानकी आ राममन्दिरके केन्द्रविन्दु मानिक अन्तगृही परिक्रमा होइत अछि । एतऽ सम्मत जरौलाकवादमे मिथिलामे होली अर्थात फगुआक डम्फ बजैत रंग आ अविरक वर्षा प्रारम्भ भऽजाइत अछि ।

• २


महाशिवरात्री मेला आ गाँजाक व्यापार
–मनोज झा मुक्ति

संसारमे सबसँ प्रसिद्ध शिवलिङ्ग रहल नेपालक काठमाण्डू स्थित मन्दिर सबठामक हिन्दू सबहकलेल पैघ आस्थाक केन्द्रकरुपमे परिचित रहल अछि । विभिन्न अवसरपर एतऽ लागऽवला मेलामे कसिकऽ दर्शनार्थिक भीड़ लगैत अछि । ओना बेगर मेलोके पशुपतिनाथक दर्शनकलेल संसारक सभ कोनासँ हिन्दूसब आओल करैत अछि ।
विषेश रुपसँ शिवरात्रीमे पशुपतिनाथक मन्दिरमे अपार भीडभाड लगैत अछि । बहुत दुर–दुरसँ योगीसब बाबाक दर्शनकलेल सेहो अवैत अछि । नेपाल सरकारक दिससँ जोगी सबहकलेल विषेश व्यवस्था होएबाक कारणे सेहो जोगी सबहक आकर्षणक केन्द्र पशुपतिनाथ बनल अछि । शिवरात्रीक अवसरपर आओल जोगीके एतऽ सेवा सत्कारक अलावा सम्मानक सँग विदाई करबाक परम्परा चलैत आएल अछि ।
नेपाली भाषामे एकटा कहबी छैक,‘पशुपतिको यात्रा, सीद्राको व्यापार’ । जकर अर्थ होइछ, पशुपतिक यात्रा आ सिधरीक व्यापार । सिधरीक उदाहरण एहिलेल देलगेल होएबाक चाही कि निरंकारक दरबारमे, दर्शनक बहन्नासँ सभ तरहक लोक अपन–अपन कार्य सिद्धि करैत छथि । पशुपतिनाथक प्राँगणमे शिवरात्रीक समयमे लागऽवलामे औनिहार जोगी सबमे बहुत लोक त जोगीक भेषमे मात्र आ मात्र गाँजाक व्यापार करबाकलेल अवैत अछि । एकटा आओल जोगीक कहब रहनि जे ‘दू दिन गाँजा बेच लेलहुँ त भरि सालक जेबखर्ची चलि जाइत अछि ।’ हुनक कहब रहनि जे हम सबदिन गाँजा नई बेचैछी, मुदा शिवरात्रीमे गाँजाक बेचवामे कोनो रोकटोक नई रहबाक कारणे हमहुँ ओइदिन गाँजा बेचलेल करैत छी ।
एहि बेरुका वितल शिवरात्रीमे हमहुँ गेल छलहुँ ई देखबाकलेल जे कोन तरहें गाँजाक खुलेआम बाजार लगैत अछि पशुपतिनाथक मेलामे । जखन पशुपतिनाथक मन्दिरक सटले रहल आर्यघाटक सँगेक पुलसँ वाग्मतीके ओहिपार राम मन्दिरक प्राँगणमे प्रवेश केलहुँ त विभुतसँ अपना शरीरके रंगने बाबासभ अपन अपन खन्ति गाड़िकऽ धुनी रमौने बैसल भेटलाह । हम आ हमरा संगे तीनटा आओर मीत्र रहैथ । हमसब पहिनहींसँ गाँजाक बाजारमे जाऽकऽ मोलजोल करबाक, मुदा नहिं किनवाक बात विचारिकऽ ओतऽ गेल छलहुँ ।
ओतऽ देखलियैक प्रायः बाबासब अपना अपना आगामे नीक चीप्पीबला गाँजा एकटा प्लास्टिकवला पुडियामे देखयबाकलेल धेने छथि आ एकटा छोट वासनमें गाँजाक बुकनी रखने ओकरा सिकरेटमें भरैत अछि । सिकरेट भरि–भरिकऽ आगामे सजाविकऽ राखिरहल छथि । हुनकासँ पुछलियैन,‘बाबा गाँजा केना देते हैं ?’
बाबा कहलथि,‘ दश रुपैयाका एक सिकरेट ’
हम कहलियैन,‘बाबा, बहुत महँग भऽ गया, कनि कम नही होगा ?’
बाबा,‘हम दुसरे बाबाजी जैसे भाँगको गाँजा कहकर नही बेचते हैं, एकदम असली माल है ।’
हम, ‘बाबा केना बुझेंगे जे ई असली है ?’
बाबा(गाँजाक चीप्पी देखवैत), ‘ई देखता है, वस ऐसाही माल हमारे ईहां मिलेगा ’
हम, ‘बाबा २५ रुपैयामे चारिटा दिजिएगा ?’
जखन हम १० रुपैयामे एकटा दाम कहने सिकरेटके २५ रुपैयामे चारिटा देवाक बात कहलियैन्ह त बाबा मोनके मसोरैत देवाकलेल तैयार भऽ गेलाह । मुदा हमरा सबके लेबाक नई छल ताँए दुआरे ओतऽसँ आगा बढलहुँ ।
आगा बढलहुँ त देखैत छी जे सब बाबाक आगामे ओहिना सिकरेट सजाओल अछि आ गहिंकीसब किनमे आ बाबाजीसब बेचऽमे व्यस्त छथि । फेर एकटा बाबालग पहुँचलहु आ पुछलियैन्ह, ‘बाबा परसाद है ?’
बाबा( हमरा दिस निचासँ उपरदिस घुरैत), ‘बेचनेके लिए त नही है, लेकिन पीनेके लिए मिल जाएगा ’
हम,‘कते पैसा लगेगा ?’
बाबा,‘१००÷५० जो देना हो देदो’
हम,‘बाबा ५ रुपैयाके नही मिलेगा ?’
बाबा,‘यहाँसे जाओ, पाँच रुपैयाके गाँजा नही मिलता है ।’
हमसब फेर ओतसँ आगा बढलहु त एकठाम ५÷६ टा बाबाजी चारुकातमे वैसिकऽ धुनी तपैत देखलियैन । हम ओतऽ जाकऽ पुछलियै जे बाबा परसाद मिलेगा ? केओ किछु नई बाजल तहन हमसब आगा बढऽ लगलहुँ । हमरा सबके आगा बढैत देखि ओहिमेंसँ एकटा बाबा बजौलथि आ कहलथि,‘ जादा त नही है, हँ कमसम पानेके लिए परसाद मिल जाएगा ,’
हम,‘कते रुपैया देना पडेगा ?’
बाबा,‘कमसेकम १० रुपैयाका’
हम,‘बाबा दू रुपैयाके नही मिलेगा ?’
बाबा(हमरा मुँहपर ठिकियवैत),‘ अच्छा लाओ लेले ।’
बाबाके देवाक तैयारी भेल देखिकऽ हमर मित्र कहलथिजे छोडू चलु–चलु कहैत हमसब आगा बढि गेलहुँ ।
ओहि प्राँगणमे किछु विदेशी महिला आ पुरुषसेहो बाबाक धुनीक बगलमे गाँजा भरल चीलम सुनगवैत नजर आओल । ओहि परिसरमे भिडभाड बहुत कसिकऽ छल, आ ओहि परिसरमे घुमैत प्रायः दर्शनार्थीक आँगि देखवा योग्य छल । किनको आँखि बुझाइत छल जे लाल भऽकऽ आब निकलही बला अछि त किनको आँखि डुबिगेल अछि । जाहीमे युवा आ युवती सभ सामेल छल । सबहक चलबाक दृश्य सेहो देखवा योग्य छल । एकटा डेग एम्हर त दोसर ओम्हर । ओहीमे गाँजाक अवैद्य बिक्रि नई हो ताहिलेल सुरक्षा निकाय प्रहरीक ड्यूटी सेहो खटौने छल । गाँजा रोकबाकलेल आएल पुलिस सेहो बाबाक धुनीक आगा गाँजाक सोंटा लगवैत नजरि आएल । नजारा सब देखैत हमसब ओतऽसँ बाहर निकललहुँ आ शिवरात्रीक अवसरपर पशुपतिनाथक दर्शन करबाकलेल आओल अधिकांश बाबाक असली कारणसँ भिज्ञ भेलहुँ ।
बुझाइया ताहु दुआरे अनदिनो जौं केओ कहैत अछि जे पशुपति जाऽकऽ अवैत छी त अधिकांश लोक ई बुझैत अछि जे,‘ ई पक्के गाँजा पिवऽ जाऽरहल छथि ।’
जौं एहि तरहक गाँजाक खुल्ला व्यापार होइत रहल त लोक अपना धियापुताके शिवरात्रीक मेलामे पशुपतिनाथक मन्दिरमे पठेवासँ परहेज नई करत तकर कोनो ग्यारेन्टी नहि ।




मिडिया सेन्टरक स्थापना
पशुपति क्षेत्र विकास कोषद्वारा पशुपतिनाथक महिमाके राष्ट्रिय÷अन्तरराष्ट्रिय रुपमे प्रचार प्रसार करबाकलेल मिडिया सेन्टरक स्थापना केलक अछि ।
पशुपतिनाथक सम्बन्धमे देश÷विदेशमे रहल हिन्दू आ गैर हिन्दू सबहक पशुपतिनाथक सम्बन्धमे जानकारी कराएब प्रमुख उद्देश्यक संग स्थापित मिडिया सेन्टर पशुपतिनाथ सम्बन्धि सभ तरहक सूचना संसार भरि संप्रेषण करबाक काज करत से बात मिडिया सेन्टरके उद्घाटन करैत कोषक सदस्य–सचिव सुशील नाहटा बतौलन्हि ।
श्रीपशुपतिनाथक परिसरमे लागऽवला हरेक मेला÷महोत्सवमे सूचना प्रकाशन÷प्रशारणकलेल आबऽवला संचारकर्मीके यथा संभव सहयोग करबाक काज मिडिया सेन्टरके रहल बात बताओलगेल अछि ।
तहिना संसारभरि घरेमे बैसल–बैसल पशुपतिनाथ सम्बन्धि हरेक गतिविधिके देखवाकलेल कोषद्वारा मिडिया सेन्टर मार्फत वेभ साइटक शुरुवात सेहो कयलगेल अछि । धधध।उबकजगउबतष्।यचन।लउ ठेगाना रहल एहि साइटक उद्घाटन संस्कृति मन्त्री मिनेन्द्र रिजाल कयने रहथि ।

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