Monday, March 29, 2010

'विदेह' ५४ म अंक १५ मार्च २०१० (वर्ष ३ मास २७ अंक ५४)-PART II


जगदीश प्रसाद मंडल-दू टा कथा
जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
प्रेमी

जगदीश प्रसाद मण्डल

फगुआक दिन। मुरगाक बाङ सुनितहि ओछाइन छोड़ि पक्षधर बाबा परिवारक सभकेँ उठबैत टोलक रास्ता धेने गौँआकेँ हकार दिअए विदा भेलाह। मनो गद्गद्। भीतरसँ खुशी समुद्रक लहरि जेकाँ उफनैत रहनि। गौँवाकेँ फगुआक भाँग पीवैक हकार दए दरबज्जाक ओसारपर बैसि गर अटबए लगलथि जे दस किलो चीनी, मसल्ला आ भाँगक पत्तीक ओरियान तँ कइये नेने छी। आब खाली बाजा-गाजा संग लोककेँ अवैक अछि। एते बात मनमे अवितहि उठि कऽ भाँगक पत्ती आ मसल्ला -मरीच, सोंफ, सनतोलाक खोंइचा, गुलाव फूलक पत्ती, काबुलि बदाम- लऽ आँगन जाए पुतोहूँकेँ कहलखिन- ‘‘कनियाँ, बुरहीकेँ पुआ-मलपुआक ओरियान करए दिअनु आ अहाँ भाँग पीसू। खूब अमैनियासँ पत्ती धुअब। तीनि सलिया पत्ती छी, जल्ला-तल्ला लगल अछि।’’ कहि ओसारपर सभ सामान सूपमे रखि दरबज्जा दिशि घुरि गेलाह। हँ-हूँ केने बिना गांधारी मसल्लाक पुड़िया निच्चाँमे रखि पत्तीकेँ सूपमे पसारि आँखि गड़ा-गड़ा जल्ला तकए लगलीह। मनमे उठलनि जे आइ बूढ़ा सनकि-तनकि तँ ने गेलाहेँ। एत्ते भाँग लऽ कऽ की करताह। मुदा किछु बजलीह नहि। आँखि उठा कऽ देखि विहुँसि नजरि निच्चाँ कऽ लेलनि। ओना मिथिलाक नारी आँखिमे गांधारी जेकाँ पट्टी बान्हि घरती सदृश्य सभ किछु सहैत ऐलीह। दरबज्जापर बैसि पक्षधर सोचए लगलाह- जिनगीक एकटा दुर्गम स्थान दुर्गा टपा देलनि। मने-मन दुनू हाथ जोड़ि हृदयसँ सटा गोड़ लगलनि। अपना विचारसँ सुकन्या जिनगीक प्रेमी चुनलक। कोना नहि आनन्दसँ जीवैक असिरवाद दितिऐक। जहि फुलवारीकेँ लगबैमे अस्सी सालक श्रम लागल अछि ओहि श्रमकेँ, जहिना छोट-छोट बेदरा-बुदरी टिकुली पकड़ि पुनः उड़ा दैत अछि तहिना हमहूँ उड़ा देव। कथमपि नहि।
रुपनगर हाइ स्कूलक बोर्ड परीक्षाक सेन्टर प्रेमनगरक हाइ स्कूल भेल। देहाती स्कूल रहितहुँ परीक्षार्थीकेँ डेराक कोनो चिन्ता मनमे नहि। सभक मनमे एते खुशी जे डेरापर धियाने ने जाइत। सभ निश्चििन्त जे गाम-घरमे अखनो विद्याकेँ देवी स्वरुप बुझि सभ मदति करए चाहैत छथि। जँ मधुबनी सेन्टर होइतै तहन ने डर होइतए जे मेहता लौजमे सभ सामान चोरिये भऽ जाएत, तेँ असुरक्षित अछि आ प्रोफेसर कोलनीक भड़े तते अछि जे ओतेमे तँ विद्यार्थी परीक्षाक सभ खर्च पुरा लेत। ओना प्रेमनगरक सइयोसँ उपर कुटुमैती रुपनगरमे अछि, तेँ किऐक ककरो मनमे रहैक चिन्ता हएत। तहूमे प्रेमनगर हाइ स्कूलक हेड मास्टर तेहन छथि जे स्कूलक समएमे स्कूलक काज करै छथि बाकी बारह बजे राति धरि विद्यार्थीक खोज-पुछाड़िमे लगल रहैत छथि जे ककरो कोनो तरहक असुविधा तँ ने भऽ रहल छैक। तहूमे तेहन दरबज्जा अनन्दी बाबाक छन्हि जे इलाकाक लोक अपन रहैक ठौर बुझैत अछि। घर्मशल्ले जेकाँ। धन्यवाद यशोदिया दादीकेँ दिअनि जे बुढ़ाढ़ियोमे अभ्यागत सबहक ऐँठ-काँठ बारह बजे राति धरि उठबितहि रहै छथि।
परीक्षासँ एकदिन पहिने लोचन सभ समान शुटकेशमे लए साइकिलसँ प्रेमनगर पहुँचल। लोचनक परिवारकेँ पक्षधरक परिवारसँ साठियो बर्ख उपरसँ दोस्ती अवैत रहनि। आजादीक हुड़-बड़ेड़ाक समए रहै। जहिना गामक धियापूता गुल्ली-डंटासँ क्रिकेटक मनोरंजन करैत तँ शहरक धिया-पूता जगहक अभावमे खेलक स्कूलमे नाओ लिखा मनोरंजन करैत अछि। तहिना पक्षधरो आ ज्ञानचन्दो आजादीक लड़ाइमे पढ़ाइ छोड़ि समाजक बीच आवि हुड़-बरेड़ामे शामिल भऽ गेला। समाजक काजमे हाथ बँटबए लगलाह। समाजमे ककरो ऐठाम बेटीक विआह होइत आ बरिआती अबैत तँ अपन बहीनि बुझि, बिनु कहनहुँ पाँच दिन निश्चित समए दिअए लगलखिन। तहिना आरो-आरो काज सभमे हाथ बँटबए लगलाह। मुदा अस्सी बर्खक उपरान्तो पक्षधर पक्षधरे आ ज्ञानचन्द ज्ञानचन्दे रहि गेलाह। कहियो कियो नेता नहि कहलकनि। हँ एत्ते जरुर भेलनि जे भाय-भैयारी भेने गाममे तते भौजाइ भऽ गेलनि जे बसन्त छोड़ि ग्रीष्मक रस्ते घेरि देलकनि। आब तँ सहजहि बुढ़ाढ़ीमे धियापूताक संग रंगो-रंग खेलै छथि आ जोगिड़ो गबै छथि। गाम स्वर्ग जेकाँ लागि रहलनि अछि। किऐक नहि मन लगतनि जहि गाममे कालीदास सन विद्वान, जे जही डारिपर बैसब ओहि डारिकेँ काटब, मुदा ने कुड़हरिक धमक लागत, ने डारि डोलत, ने दुनू हाथे कुड़हड़ि भाँजब तँ देह डोलत आ ने दुनू पाएरक वैलेंस गड़बड़ाएत। निश्चििन्तसँ जखन डारि खसए लगतै तखन ओहिपर बैसिले-बैसल धरतीपर चलि आएव, ऐहन विद्वान् सभसँ तँ गामे भरल अछि। एते दिन, अपराधीक कम संख्या रहने नजरि निच्चाँ रहैत छलैक मुदा आब ककरा कहबै अपनो घरवाली धमकी देती जे माए-बाप आ भाइ-भौजाइक पाछू लगल रहै छी आ अपना धिया-पूता लऽ किछु करबे ने करै छी। एहि जिनगीसँ जहर-माहूर खाए मरब नीक। हौ बाबू, हमरा ऐहन भ्रममे नहि दाए। एहि दुनियाँमे ने कियो अप्पन छी आ ने बिरान। सीता जेकाँ लक्ष्मणक रेखाक भीतर रहह। नहि तँ रावण औतह आ लऽ कऽ चलि जेतह। अपन-अपन पाएरपर ठाढ़ भऽ गंगोत्रीसँ निकलैत गंगाक पानि जेकाँ, जे साथीक संग उपर-निच्चाँ होइत प्रसांत महासागरमे मिलैत अछि तहिना समएक संग चलैत रहह।
देखले पक्षधर बाबाक घर-दुआर लोचनकेँ। ककरो पूछैक जरुरते किऐक होइतैक। साइकिल हड़हड़ौने दरबज्जापर पहुँच साइकिलसँ उतड़ि घरक देवालक पँजरामे साइकिल ठाढ़ कए दुनू हाथे बाबाक पाएर छूबि गोड़ लगलकनि। बाबाकेँ बुझले रहनि, कहलखिन- ‘‘भने अखने चलि ऐलह। सभ सामान सरिया सेन्टरपर जा कऽ देखि-सुनि अविहह।’’ कहि पोती सुकन्याकेँ सोर पाड़लखिन। मुदा लोचनो तँ अंगना-घर जाइते अबैत रहए। सुकन्याकेँ लोचन आंगनसँ बजा अनलक। भाए-बहीनि जेकाँ दुनूकेँ देखि पक्षधर सुकन्याक कहैक बात विसरि दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बाउ, आब तँ हम चलचलौ भेलियह। तोरे सबहक पार एहि दुनियाँमे ऐहलहेँ। दुनियाँमे जते मनुष्य अछि ओ अपना समएक जिम्मा लऽ जीबैत अछि। अखन तू सभ सुकुमार कोमल किसलय सदृश्य छह। मनुष्य बनि जिनगी जीविहह। हम दुनू संगी -पक्षधर आ ज्ञानचन्द- दू जातिक रहितहुँ संगे-संग जिनगी बितेलहुँ। जे समाजोक लोक बुझैत छथि। मुदा हुनको धन्यवाद दैत छिअनि जे संगीक महत्व अदौसँ बुझैत आएल छथि। जेकरे फल छी जाति-कुटुम्बसँ कनियो कम दोस्तीकेँ नहि बुझल जाइत अछि। संगे-संग जहलो कटलौं आ एक ओछाइनपर सुतबो करैत छी। मिथिलांचलक कोनो राजनीतिक वा सामाजिक संगठनक बात होइ, मुदा कि एहि संस्कृतिकेँ आँखिक सोझमे नष्ट होइत देखियैक।’’ मन पड़लनि गाड़ीक ओ दिन जहि दिन जहल जाइत काल दुनू गोटेकेँ पैखाना लागल। हाथमे हथकड़ी। ट्रेनक पैखाना-कोठरीमे पानि नहि। की कएल जाए? जेबीसँ रुमाल निकालि दू टुकड़ी फाड़ि दुनू गोटे शुद्ध भेलहुँ। आँखि ढबढ़बा गेलनि। भरल आँखिसँ पोतीकेँ कहलखिन- ‘‘बुच्ची, दरबज्जापर रहने बौआकेँ पढ़ि नहि हेतइ। एक तँ पढ़वह कि खाक। बहुत लीलसा छल जे परिवारमे इंजीनियर डॉक्टर देखियैक मुदा हमरा सन-सन परिवारक लेल सपना नहि तँ आरो की अछि। एक दिशि पनरह-बीस लाखक पढ़ाइ आ दोसर दुइयो हजार महिनाक आमदनीक परिवार नहि। मुदा अखन बच्चा छह, आशासँ जीवैक उत्साह मनमे जगबैक छह।’’
जहिना जनकजीक फुलवारीमे राम आ सीताक प्रथम मिलन भेलनि तहिना सुकन्या आ लोचनक बदलल रुपक बीच भेल। अखन धरि जे बच्चा खेलौना सदृश्य परिवारमे छल ओकरा कानमे एकाएक जिनगीक बात पड़लै। जिनगीक लेल प्रेम भरल संगीक जरुरत होइत अछि। जिनगीक बात सुनि दुनूक देह सिहरि गेलइ। सिहरैत देह देखि पक्षधर कहलखिन- ‘‘बुच्ची, लोचन तोहर पाहुन भेलखुन। अंगनेक ओसारक कोठरी दऽ दहुन। सभ देखभाल तोरे उपर। कोनो तरहक असुविधा पढ़ैमे नहि होइन।’’
पक्षधरक बात सुनि सुकन्या शुटकेस माथपर उठा लोचनक पाछू-पाछू विदा भेल। कोठरी खुजले रहै अँटकैक कतौ जरुरते नहि पड़लैक। एक जनिया चौकी, कपड़ाक लेल अलगनी, एकटा टेबुल आ एकटा कुरसी। कुरसीपर शुटकेश खोलि लोचन कपड़ा निकालि चौकीपर रखलक। चौकीपर रखितहि सुकन्या ओहि अलगनीपर रखलक जहिपर पहिनेसँ ओकर कपड़ा छलैक। साओनक झूला जेकाँ दुनूक कपड़ा झुलए लगल। किताब, काँपी, कलम निकालि टेबुलपर रखलक। एक्के कोर्सक किताव दुनूक। लोचन मैट्रिकक सेन-टप केंडीडेट आ सुकन्या मैट्रिकक विद्यार्थी। टेबुलक बगलमे लोचन लग ठाढ़ि भऽ सुकन्या किताव फुटा कऽ नहि राखि, सभकेँ जोड़ा लगा-लगा रखलक। दुनूक नजरि दुनू किताब-कापी-पेनक जोड़ापर अँटकि गेल। पहिनेसँ दोबर कितावक थाक भऽ गेल। अएना जेकाँ एक दोसरक हृदयमे अपन-अपन रुप देखए लगल। किताबक लिखावट प्रेसक होइत। तहूमे एक्के प्रेसक किताव। मुदा काँपी तँ अपन-अपन हाथक लिखल होइत। एक दोसराक काँपी उलटा-उलटा देखए लगल। देवनागरी लिखावट लोचनक सुन्दर मुदा अंग्रेजी लिखावट सुकन्याक सुन्दर। ऐना किअए भेल? एक्के हाथक लिखावट दब-तेज कोना भऽ गेल। मुदा उत्तर ककरो मनमे नहि अबैत। अनायास सुकन्याक मन नाँचल। एते काल भऽ गेल अखन धरि पानियो नहि अनलौं। धड़फड़ा कऽ कोठरीसँ निकलि छिपलीमे जलखै आ लोटामे पानि नेने आबि चौकीपर छिपली रखि हाथ शुद्ध करै लऽ लोटा बढ़ा, चौकीक गोड़थारी दिशि पलथा मारि बाबाक पाहुनकेँ खुआवए बैसि गेली। खेबाकाल पुरुख चुप रहैत, नोन-अनोनक प्रश्न किअए उठतै। समदर्शी मिथिला छियै कि ने?
एक बजेसँ लऽ कऽ चारि बजे धरि परीक्षाक कार्यक्रम रहैक। पहिल दिन लोचनो दुर्ग टपै लऽ जाएत तेँ सुकन्याक मन मृगा जेकाँ नचैत। भिनसरेसँ सुकन्या लोचनपर नजरि अटकौने....... समएपर अपन काज पुरबैक अछि। हमरा चलैत जँ शुभ काजमे बाधा होयत तँ भगवानक ऐठाम दोखी हएब। मास्टर साहेबक सिखौल बात सुकन्याकेँ मन पड़ल। काजक भार तँ लोचनक उपरमे छन्हि हम तँ हुनकर मदतिगार मात्र छिअनि। तेँ नीक हएत जे हुनकेसँ पूछि लिअनि। चंचल मनमे उठलै-पूजाक तैयारीमे सभ किछु फुलडालीमे सजबैत होएत बीचमे बाधा देब उचित नहि। हो न हो फूल-पत्तीक जगहे बदलि जाइन। अनायास मनमे उठल-हाय रे बा घड़ी तँ देखबे ने केलहुँ। अगर बारह बजि गेल हेतइ तँ खुअबैक दोखी के हएत? मन व्याकुल, अव्यवस्थित वस्त्र, केश छिड़िआएल, कर्मक भारसँ भादबक अन्हरिया जेकाँ अन्हार आँखिक आगू सुकन्याकेँ पसरि गेल। कतऽ जाउ ककरा पुछियै। गाछो-बिरीछ नहि अछि जे पुछि लैतियै। अस्त-व्यस्त अवस्थामे सुकन्या माए लग पहुँच बाजलि- ‘‘भानस भेलौ?’’
‘‘
अखने। अखन तँ आठो नै बाजल हएत।
‘‘
जलखै भेलौ?’’
‘‘
बच्चा कहलक एक्के बेर खा कऽ सबेरे जाएब।’’
जहिना केचुआ छोड़ैत समए साँपकेँ होइत, भले ही नव जीवन किऐक ने प्राप्त करै मुदा दर्द तँ हेबे करैत छैक। मीरा जेकाँ सुकन्या राजस्थानक तँ नहि। मिथिलाक वाला। परिवार आ समाजक सुकन्या अदौसँ समर्पित। बम्बईक धुन (गीतक धुन) बहुत मधुर होइत अछि तँ समवेत स्वरमे माए-वहिनक चैतावर, बारहमासा आ समदाउनक तँ मधु सदृश्य अछि। जहिना मधुमाछी उड़ि-उड़ि कखनो आमक गाछपर चढ़ि सोझे अपन प्रेमी मंजर लग पहुँच जाइत तँ लगले माटिपर ओंघराएल चमेलीक रसकेँ आमक रसमे महा मिश्रणक घोल बनबैत, तहिना ने छी।
कोठरीसँ निकलितहि लोचनक आँखि सुकन्यापर पड़ल। हजारो रश्मि रुपी तीर दुनूक बीच टकराए लगल। मुदा दू रंग। जहिना लड़ाइक मैदानमे वीर असीम विसवासक संग मरै लऽ नहि बलिदान होइ लऽ बढ़ैत अछि, तहिना लोचनोक हृदयमे होइत। कलीक खिलैत फूल जेकाँ मुँह। मुदा सुकन्या मने-मन भगवानसँ आराधना करैत जे ‘‘कुरुक्षेत्रसँ लोचन हँसैत आबए।’’
उचंगल मन फेरि उचङि गेल। ओसारसँ निच्चाँ उतड़ितहि सुकन्याक हृदय लोचनकेँ पाछूसँ ठेलए लगल। जहिना बच्चा सभ माटिक पहीया, कड़चीक गाड़ी बना धनखेतीक माटि उघि-उघि अंगनाक ओलतीमे दऽ खुशी होइत जे हमर अंगना चिक्कन भऽ गेल, तहिना आगू-बढ़ैत लोचनकेँ देखि सुकन्याकेँ खुशी होएत। मुदा खुशी अंटकल नहि। लगले चारि बाजि गेल। मनमे उठलै भुखल भायकेँ जलखै कहाँ खुएलहुँ। जहिना किसानक खेत दहा गेलासँ व्यापारमे मंदी आबि गेलासँ, बेरोजगार भेलासँ कि भीख मंगोकेँ कियो भीख देनिहार नहि रहत तहिना जे धरती करोड़ो पतिव्रता नारी पैदा केलक वहए धरती पतिहत्यारा भऽ जहल कटबैत अछि।
साढ़े चारि बजे बेरि-बेरि देखलोपरान्त सुकन्याक नजरि मौकनी हाथीपर चढ़ल गणेश जी जेकाँ लोचनकेँ अबैत देखि लोटामे पानि-थारीमे जलखै परोसि आंगनक ओलतीमे ठाढ़ भऽ देखय लगल। अखन धरिक लोचनक साइयो मनोहर रुप मनमे नाचए लगलै। कोठरी आबि लोचन गरमाएल देहक कपड़ा बदलि जलखै करए लगल। विस्मित भेल सुकन्याक मुँह बाजि उठल- ‘‘केहन परीछा भेल भाय?’’
‘‘
बहुत बढ़ियाँ। जरुर पास करब।’’
जरुर पास सुनि सुकन्याक हृदय हनुमानक राम जेकाँ देखलक। मनमे आशाक सिहकी उठलैक। संगिये तँ जिनगीक जीत दिअबैत अछि। अपन सुखद जिनगीक मनोहर रुप लोचनमे देखि सुकन्या मोहित होइत बाजलि- ‘‘औझुका पेपर तँ नीक भेल मुदा आन दिनक जँ अधला हुअए, तहन?’’
‘‘
ओ ओहि दिनक मेहनतपर निर्भर अछि। ऐकर जबाव हँ-नहिमे नहि देल जा सकैत अछि।’’
सातम दिन परीक्षाक अंत भेल। स्कूलसँ आबि पक्षधरकेँ गोड़ लागि लोचन बाजल- ‘‘बाबा परीछा समाप्त भऽ गेल। गाम जाइ छी।’’
असिरवाद दइसँ पहिनहि बाबाक मनमे उठलनि, जहन एहिठाम काज सम्पन्न भऽ गेलैक तहन रोकब उचित नहि। सबेर-अबेर भेनहुँ अपन घर तँ पहुँच जाएत। बात बदलैत बाबा पुछलखिन- ‘‘केहन परीछा भेलह?’’
मुस्की दैत लोचन- ‘‘पास करब बाबा।’’
लोचनक मुस्की पक्षधरक हृदयकेँ, सलाइक काठी जेकाँ, आनन्दक कोठरीकेँ रगड़ि देलकनि। मन पड़लनि जनकपुरक धनुष यज्ञ। ठहाका मारि कहलखिन- ‘‘भाग्य ककरो लिखल नहि होइ छैक, बनाओल जाइ छै बौआ।’’
आंगनक ओलती लग ठाढ़ि सुकन्याक मन मृगा जेकाँ व्याकुल भऽ नचैत। जहिना अपने नाभिक सुगंधसँ मृगा नचैत तहिना सुकन्याक मन परीक्षाक समाचार सुनै लऽ नचैत। मुदा दरबज्जो तँ दोसराक नहिये छी, सोचि आगू बढ़ल।
दुनू गोटेकेँ माने सुकन्या आ लोचनकेँ देखि पक्षधर बाबा कहलखिन- ‘‘आइ तोँ विद्याध्ययनसँ गृहस्ताश्रममे प्रवेश कऽ रहल छह। तेँ बाबाक लगाओल फुलवारीक सुखल-मौलाएल डारिकेँ कमठौन कऽ खाद-पानिसँ सेवा करिहह। ओहिमे नव-नव कलश चलतै। जहिसँ हँसैत-खेलाइत जिनगी चलतह।’’
मूड़ी गोंतने लोचन आंगन आबि पानि पीबि किताव सरियवैक विचार केलक। कितावपर किताब गेटल देखि हाथ काँपए लगलै। सुकन्याक मन कानि उठल। जहिना कोनो धारक दुनू मोहारपर बैसल यात्रीकेँ होइत अछि तहिना सुकन्याक मनमे उठए लगल। लोचन सफलताक जिनगीमे पहुँच गेल आ हम? आशा-निराशाक क्षितिजपर लसकि गेल सुकन्या।
सीमाधरि लोचनकेँ अरिआतए सुकन्या विदा भेलि। गामक सीमा बिला गेल। ने लोचन सीमा देखैत जे घुमैक आग्रह करितैक आ ने सुकन्या देखैत जे अंतिम विदाइ दइतैक। अजीव गामोक सीमा अछि। एक्को परिवारकेँ गाम मानल जाइत अछि -जेना भोजमे- तहिना दसोगाम माला बनि गाम बनि जाइत (दस गम्मा जाति) अछि। अरिआतने-अरिआतने सुकन्या लोचनक घर धरि पहुँच गेली।
पनरह दिन बीतैत-बीतैत अनेको मौगिआही कचहरीमे फैसला लिखा गेल जे सुकन्या पक्षधरक घरसँ निकलि अजाति भऽ गेलि।कचहरीक फैसला सुनि-सुनि दुनू गोटेक सुकन्याक माए-बापक करेज दड़कए लगलैक गेलइ। कनैत मन बाजए लगलैक, मनो ने अछि जे कहियासँ दुनू परिवारमे दोस्ती अछि। सभ तुर हमहूूँ जाइ छी आ ओहो सभ आबि रहैत छथि। मुदा आइ की देखि रहल छी। जाधरि पिता जीबैत छथि ता धरि एहि परिवारक हम सभ के होइ छी? समाजक लोकक जबाव ओ देथिन। पिताकेँ गामक लोकक बात कहलखिन। बेटा-पुतोहूक बात सुनि गरजि कऽ पक्षधर कहलखिन- ‘‘जइ समाजमे मनुक्खक खरीद-बिकरी गाए-महीसि, खेत-पथार जेकाँ होइए कि ओहि समाजकेँ पँच तत्वक बनल मनुष्य कहल जा सकैत अछि। जँ से नहि त हमर कियो मालिक नहि छी। कियो ओंगरी देखाओत त ओकर ओंगरी काटि लेबइ। आइये दोस्तक ऐठाम जाइ छी आ देखि-सुनि अबै छी।
जहन भाँग पानिमे अलगि गेल तहन पुतोहू बुझलनि जे भाँग पीसा गेल। पोछि-पाछि सिलौटकेँ धोय बाटीमे रखलनि। दरबज्जापर बैसल पक्षधरक मनमे उठलनि जे नअ बाजि गेल, अखन धरि किअए ने कियो आएल। फेरि मन उनटि कऽ भाँगपर गेलनि। भाँगपर नजरि पहुँचतहि मनमे उठलनि जे बिनु भाँग पीनहि तँ ने सभ निसा गेल अछि। तहन भाँगक जरुरते की? किछु दिन पहिने धरि सभ गाममे एकदिना फगुआ होइत छलै, मुदा आब तीन दिना भऽ गेल। ओना तीनि रंगक पतरो आबि गेल अछि। मुदा अपना गाममे तँ एकदिने अखनो धरि होइत आएल अछि आ जाधरि जीबि ताधरि होइत रहत।
कीर्तन मंडलीक संग-संग आनो-आन पक्षधर ऐठाम पहुँचलाह। अनगिनित थोपरी बजौनिहार आ अनगिनत गबैयाक समारोह। चीनीमे धोड़ल भाँग। सभसँ उमरदार रहितहुँ पक्षधर भाँग परसिनिहारकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने नवतुरिया सभकेँ पिआबह। वहए सभ ने बेसी काल गेबो करतह आ नचवो करतह।’’ मुदा एक्कोटा नवतुरिया बाबाक बात नहि सुनलक। सबहक यएह कहब रहै जे बाबा सभसँ श्रेष्ठ गाममे छथि, अनुभवी सेहो छथि। तेँ जँ ओ गोबर खत्तेमे खसताह तइओ हम सभ नहि छोड़बनि। नवतुरियाक बात सुनि पक्षधरक मनमे उठलनि अखन आंगनमे कहाँ छी दरबज्जापर छी। दस गोटेक बीच छी। तहन के छोट के पैघ कोना हएत? सभ तँ ब्रह्मेक अंश छी। तहूमे एते टुकड़ी एकठाम एकत्रित छी। दू गिलास भाँग पीबि पक्षधर उठि कऽ ठाढ़ होइत फगुआ शुरु केलनि- ‘‘सदा आनन्द रहे एहि दुआरे, मोहन खेले होरी हो।’’ ढोलक, झालि, कठझालि, हरिमुनिया, मजीरा, खजुरी, डम्फा, गुमगुमाक संग सइयो जोड़ थोपड़ीक महामिश्रणक धुनक संग कोइली सन मधुर अवाजसँ लऽ कऽ टिटहीक टाँहि धरिक बोल अकासमे पसरि गेल। ओना जमीनो खाली नहि रहल। इंगलिश डान्ससँ लऽ कऽ जानी धरिक नाच आ मेल-फीमेलक जोगीड़ा जोर पकड़िनहि रहै। बजनियो सभ अपन-अपन बाजो बजबैत आ कुदि-कुदि नचबो करैत। गोसाँइ डूबै बेरि फेरि पक्षधर भाँग बनबौलनि। अपन शक्तिकेँ कमजोर होइत देखि दोबरा-दोबरा सभ पीलक। उत्साहो दोबरेलै। पुरनिमाक राति। हँसैत चान। फागुन मास रहने अकासमे कतौ बादल नहि। मुदा तरेगण मलिन भऽ अपन जान लऽ झखैत। किऐक नहि तरेगण अपना जान लऽ झखत? आखिर बसन्त-बसन्तीक समागमक दिन छी की ने।
गामक दछिनवरिया सीमापर समन जरए लगल। समनक धधड़ाकेँ पक्षधर उत्तरसँ दछिन मुँहे कुदलाह। बाबाकेँ देखितहि सभ एका-एकी कूदए लगल।
धधड़ा मिझा गेल। मुदा जरनाक आगि चकचक करितहि रहल। समदाउन गबैत सभ घरमुँहा भेलाह।
2.बपौती संप्पति


आसीन अन्हरिया चौठ। गोटि-पङरा खाऐन पीनि शुरु भऽ गेल। मातृनवमी-पितृपक्ष साझिये चलि रहल अछि। क्यो-क्यो बापो
, दादा, परदादा नामसँ तँ कियो-कियो माइओ, दादी, परदादी इत्यादिक निमित्ते नति-नहि खुअबैत। जल-तर्पण सेहो परीबे दिनसँ शुरु भऽ गेल। मुदा इहो गोटि पङरे। किछु गोटे ठकिओने जे एकादशीकेँ जल-तपर्ण कऽ लेब। तहिना मातृपक्षक लेल नवमी आ पितृपक्षक लेल एकादशीकेँ न्योतहारी नति खुआ लेब। मुदा, गामक किछु जातिक बीच तेसरो तरहक होइत। ओ ई होति जे बेरा-बेरी सभ सौँसे टोलकेँ एक-एक दिन कऽ खुअबैत अछि। जेकरा ढढ़क कहैत अछि। किछु गोटे मातृपक्षक लेल महिलाकेँ आ पुरुष पक्षक लेल पुरुषकेँ न्योत दऽ सेहो खुअबैत अछि। पखक मातृपक्ष भिनौज भऽ गेल अछि। एकपक्ष मातृनवमी आ दोसर पितृपक्ष। जहिसँ नवमी मातृपक्षक हिस्सा आ एकादशी पितृपक्षक हिस्सा भऽ गेल दुनू टेंगारीकेँ घरसँ निकालि गुलटेन पच्चार दए सिलौटपर पिजबैक विचार केलक कि तमाकुल खाइक मन भेलै। चुनौटीसँ सकरी कट तमाकुल निकालि तरहत्थीपर डाँट बीछिते रहै कि पत्नी मुनिया आबि कहलक- ‘‘घरमे एक्को चुटकी नून नै अछि। भानसाक बेर भऽ गेल, कखैन आनब?’’
‘‘अच्छा होउ, जाबे अहाँ सजमनि बनाएब ताबे हम दौड़ले नून नेने अबै छी। टेंगारी नेने जाउ कोठीक गोरा तरमे रखि देबै। हाँइ-हाँइ तमाकुल चुबए लगल। ठोरमे तमाकुल लइतै, मरचूनक दुआरे, कोनादन लगलै कि थूकड़ि कऽ फेकैत दोकान दिशि विदा भेल। एक तँ तमाकुल मनकेँ हौड़ि देलक दोसर काज टेंगारी पीजेनाइ पछुआइत देखि आरो मन घोर भऽ गेलैक। मनमे उठलै पुरने कपड़ा जेकाँ परिवारो होइए। जहिना पुरना कपड़ाकेँ एकठाम फाटब सीने दोसर ठाम मसकि जाइत तहिना परिवारोक काजक अछि। एकटा पुराउ दोसर आबि जाएत। मुदा चिन्ता आगू मुँहेे नहि ससरि रुकि गेलै। चिन्ताकेँ अटकितहि मनमे खुशी एलै। अपनापर ग्लानि भेलइ जे जहि धरतीपर बसल परिवारमे जन्म लैक सिहन्ता देवियो-देवताकेँ होइत छन्हि ओकरा हम माया-जाल किअए बुझै छी। ई दुनियाँ केकरा लेल छैक? ककरो कहने दुनियाँ असत्य भऽ जाएत। ई दुनियाँ उपयोग करैक छी नहि कि उपभोग करैक।
गुलटेनकेँ देखि आमक गाछक छाँहमे बैसल भुखना कहलक-
‘‘तमाकुल खा लाए कक्का, तखन जइहह।’’
ठाढ़ भऽ गुलटेन भुखनाकेँ कहलक-
‘‘बौआ, अगुताइल छी, जल्दी दू धूस्सा दहक आ लाबह। बेसी काल नै अँटकब।’’
ऐँह कक्का
, तोहूँ सदिखन अगुताएले रहै छह। तमाकुलो खाइक छुट्टी नै रहै छह।’’ कहि भुखना चून झाड़ि चुटकीसँ तमाकुल बढ़ौलक। मुँहमे तमाकुल दइते रसगर लगलै। सुआद पाबि बाजल- ‘‘बड़ टिपगर खैनी खुऔलेँ भुखन। ऐहन टिपगर माल कोन दोकानक छिऔ?’’
‘‘काका की कहबह; दिन आठम एकटा समस्तीपुरक बेपारी साइकिलपर एक बोझ तमाकुल लऽ बेचए आएल रहै। रातिमे अपने ऐठीन रहल। ऐँह काका भरि राति हिसाबे जगौनहि रहल। जेहने खिस्सकर तेहने महरैया रहए। खाइसँ पहिने महराइ गौलक आ खेला बाद एक्के टा तेहन खिस्सा, रजनी-सजनीक, उठौलक जे ओरेबे ने करै जखन डंडी-तराजू पछिम चलि गेल तखन हमहीं कहलियै जे आब छोड़ि दिऔ। बड़ राति भऽ गेल। तखन जा कऽ छोड़लक। भिनसर भने पोखरि-झाँखरि दिशिसँ आएल तँ चाह पीआ देलियै। दलानसँ साइकिल निकालि तमाकुल सरिअबए लगल। हमहूँ गिलास धोय चक्कापर रखि एलौं कि जेबीसँ दस टकही निकालि दिअए लगल कि कहलियै- ‘‘ई की दइ छी।’’ ओ कहलक हम बेपारी छी कोनो अभ्यागत नहि, तेँ खेनाइक पाइ दइ छी। आब तोंही कहह कक्का ओकरासँ पाइ लेब उचित होएत। कि हम सभ अपन बाप-दादाक बनौल प्रतिष्ठाकेँ भँसा देब? ई तँ बपौती सम्पति छी की ने एकरा कोना आँखिक सोझमे मेटाइत देखब।’’
थूक फेकि गुलटेन कहलक-
‘‘ऐहनो कियो बूड़िबक्की करै। पा भरि खेने हएत कि नै खेने हएत, तइ ले लोक अपन खानदानक नाक कटा लेत। नीक केलह जे पाइ नै छुलै।’’
अपन बड़प्पन देखि मुस्की दैत भुखना बाजल-
‘‘ऐँह कि कहिह काका, ओहो बड़ रगड़ी, कहए लगल जे से कोना हएत। हम कि कोनो भुखल-दुखल छी, आ कि व्यापारी छी। मुदा हमहूँ पाइ नै छुलिऐक तखन ओ दस-बारह टा पात निकालि कऽ दैत कहलक, जहिना अहाँक अन्न खेलौं तहिना हमहूँ तमाकुल खाइये लऽ दइ छी। सएह छी।’’
आगू बढ़ैत गुलटेन-
‘‘बौआ अखैन औगताइल छी। नूनक दुआरे तीमन अनोन रहि जाएत।’’
थोड़बे अटि कऽ घोघन साहुक दोकान। गुलटेनकेँ देखितहि झिंगुर काका कहलखिन-
‘‘अखन धरि माथमे केश लगले देखै छिअह।’’
माथ हसोथि कऽ देखैत गुलटेन बाजल-
‘‘अखन कटबै जोकर कहाँ भेल हेन। जखन कानपर केश लटकऽ लगत तखन ने कटाएव।’’
‘‘बिसरि गेलह। काल्हिये ने बावूक बरखी छिअह। हमरो चच्चा सहाएवकेँ छिअनि। दुनू गोटे एक्के दिन ने मरल रहथुन।’’
झिंगुर काकाक बात सुनि गुलटेनकेँ धक् दऽ मन पड़ल। बाजल-
‘‘हँ, ठीके कहलौं काका। आइ ज अहाँ भेंटि नै होइतौं तँ बरखी छुटिये जाइत।’’
‘‘अखनो किछु नहि भेल हेन। जा कऽ कटा आवह। हमर तँ तेहन झमटगर दियाद अछि जे भोरेसँ चारि गोटे लागल अछि मुदा अखनो धरि पार नहि लागल हेन।’’
‘‘अखन तँ हमहीं टा घरपर छी। दियादिक तँ सभ कियो अपन-अपन हाल-रोजगारमे चलि गेल। कियो झंझारपुर वेपारीक संग गछकटियामे तँ कियो सुखेतक चिमनीपर ईंटा बनवैए। अपने केश कटाएब, ओरियान बात करब आ कि ओकरा सभकेँ बजवै लऽ जाएब।’’
‘‘असली कर्ता तँ तोहीं ने छिअह। तोहर कटाएव जरुरी छह। हमरा सभमे तँ पाँच बर्षी धरि सभ दियाद-वाद केशो कटबैट अछि आ कमसँ कम एगारह गोटेकेँ खाइयो लऽ दैत अछि। तोरा सेहो एकटा आरो हेतह। खाएन-पीनि माने मातृनवमी-पितृपक्ष चलिते अछि। चाचाजीकेँ तीर्थेपर वर्षी पड़ि गेलनि, तेँ दोहरा कऽ खुअबैक झंझट नहि रहलनि। मुदा तूँ सभ ते एकादशीकेँ खुअबै छह तेँ तोरा दोहरा कऽ सेहो करै पड़तह। ओना ई सभ मन मानैक बात छी। मुदा, चलनियो तँ कोनो अपन महत्व रखैत अछि की ने।
झिंगुर काकाक बात सुनि दोकानदारकेँ गुलटेन कहलक-
‘‘हओ घोघन साहु, झब दे एक टका के नून दाए।’’
गमछामे नोन बान्हि गुलटेन लफड़ल घर दिशि चलल। मनमे पिता नाचए लगलनि। हृदय पसीज गेलनि। स्मरण भेलनि
, अनका जेकाँ बाबू नहि छलाह। आगू-पाछुक बात जनैत छलाह। जँ से नहि जनितथि तँ किऐक ने अनके जेकाँ हमरो खेत-पथार कीनि देने रहितथि। कोनो कि कमाइ खटाइ नहि छलाह। जँ से नहि छलाह तँ कातिक मासमे ओते खरचा कऽ कऽ भागवत कोना करबै छलाह। तहिपर सँ भोजो-भनडारा करिते छलाह। हमरे ले कि कम केलनि। घर-गिरहस्तीक सभ लूरि सिखा देलनि। बारहो मासक काज। हम कि कोनो नोकरी करै छी जे सालो भरि कहियो बैसारी नहि होइत अछि। कमाइ छी खाइ छी ठाठसँ जिनगी बीतबै छी। जँ खेते रहैत आ खेतीक करैक लूरिये नहि रहैत तँ छुछे खेते लऽ कऽ की होइतै। गाममे देखबे करै छी खेतबला सभहक दशा। रौदी हुअअ कि दाही अछैते खेते हाट-बजारसँ मोटा उघैत छथि। हमरा तँ एक्को धुर घरारी छोड़ि नहि अछि। तेँ कि ककरोसँ अधला जीबै छी। अपन खुशहाल जिनगीपर नजरि अवितहि आनन्दसँ हृदय ओलड़ि गेलनि। मरहन्ना धान जेकाँ लटुआइल नहि अपन चढ़ल जुआनी जेकाँ खेतसँ आँड़िपर ओलड़ल। कोना लोक बजैत अछि जे जकरा अ आ नहि लिखल अबैत अछि ओ मुरुख अछि। बावू तँ औंठे-निशान दऽ मट्टियो तेल आ चिन्नयो कोटासँ अनैत छलाह। बड़का-बड़का सर्टियोफिकेटबला सभकेँ देखैत छिअनि जे दारु पीवि लेताह आ बीच सड़कपर ठाढ़ भऽ अंग्रेजीमे भाषण करैत लोकक रस्ता रोकने रहैत छथि। तहिसँ हजार गुना नीक ने बावू छलाह। खाइ बेरिमे अंगनामे नहि रहैत छलहुँ तँ शोर पाड़ि संगे खुअवैत छलाह। जहिया कहियो नीक-निकुत अनै छलाह आ थारीमे अन्दाजसँ वेसी बुझि पड़ैत छलनि तँ थारीसँ निकालि माएकेँ दैत छेलखिन नहि तँ ओते छोड़ि कऽ उठैत छलाह। आ हा-हा ऐहन बाप होएव कि अधला छी। जखन काज करऽ जाइत छलाह तँ संगे नेने जाय छलाह आ काजक लूरि सिखवै छलाह। जहन काजक लूरि भेल तहन ने बोइन करऽ लगलहुँ। केहन हुनकर सालो भरिक हिसाव छलनि। आसीन-कातिक गछपंगियाँ आ खढ़ कटिया हुनकेसँ सीखिलहुँ। तहिना अगहन-पूस धन कटिया, नार बन्हिया, दौन केनाइ, टाल लगौनाइ सीखने छी। किअए एक्को दिन बैसारी रहत। अखनुका छौँड़ा सभ जेकाँ नहि ने जे कहत काजे ने अछि। कि रस्तापर बालू उड़ाएव आकि पानि डेंगाएव। मुर्खो रहैत बावूए ने सिखौलनि जे फागुनसँ जेठ धरि घरहटक समए होइ छै। जेकरा घरहट करैक लूरि रहत वएह ने अपनो घर आ अनको घर बन्हैमे मदति कऽ सकैत अछि। जेकरा लूरिये ने रहतै ओकरा इन्दिरा आवासमे मुखिया, चिमनीबला, सिमटीबला नै ठकत तँ कि जेकरा अपन घर बनबैक लूरि रहत, ओकरा ठकत। अपनापर गुलटेनकेँ भरोष होइतहि मनमे खुशी उपकल। मुँहसँ हँसी निकलल। ओगरवाहीक गाछीक मचकीपर नजरि गेलै। कि हमरा सबहक दुनियाँ अछि। बड़क गाछपर सँ बड़्ड़् काटि बरहा बनबै छी। मूठबाँसीक बल्ला, पीढ़ियाँ आ कील बना गाछक डारिमे लटका झुलबो करै छी आ गेबो करैत छी। जे चौमासा, छहमासा, बारहमासा मचकीक स्टेटपर होइत अछि ओ बाजा-बूजी आ वैसि कऽ गबैमे कोना होएत? असकरे कृष्ण राधाक संग कदमक झूलापर चढ़ि नचबो करैत छलाह, बाँसुरियो बजवैत छलाह आ आसो लगबैत छलाह। मुदा, अखन तँ देखैत छी जे बाजा कियो बजवैत, नाच कियो करैत आ गीति कियो गवैत अछि। तेहने ने देखिनिहारो छथि। कियो कैसियोबलाकेँ देखैत तँ कियो ठेकैताकेँ, कियो नचनिहारक नाच देखैत तँ कियो ओकर कानक झुमकाकेँ। गौनिहारक आबाज सुनैत, नहि कि ओकर मुँह देखैत अछि।
नोनक मोटरी पत्नीकेँ दैत गुलटेन कहलक-
‘‘बाबूक बरखी काल्हिये छी। बिसरि गेल छलौं। केश कटौने अबै छी। ताबे अहाँ बरखी लऽ जे चाउर रखने छी ओकरा निकालि रौदमे पसारि दिऔ। राहड़ि सेहो उलबए पड़त। बेरु पहर तीमन-तरकारी आ मसल्ला हाटसँ लँ आनब। दूध तँ आइये पौरल जाइत। ओना अमहौरपर सौझुको दूध जनमि जाएत।’’
पतिक बात सुनि मुनिया बजलीह-
‘‘ऐहेन जे अहाँ बिसराह छी, सब काज चौबीसमा घड़ीमे सम्हरत। ने कुटुमकेँ नोत देलौं आ ने बेटी-जमाइकेँ खबरि देलिएनि।’’
‘‘अच्छा सभ हेतै। अनजान-सुनजान महाकल्याण। बाबू कोनो अधरमी रहथि जे कोनो बाधा हएत। उगलाहा सभ देखबो करै छथि आ पारो लगौताह।’’
कहि गुलटेन केश कटबए विदा भेल। केश कट करखीक जानकारी सबजना न्योत दऽ चोटे घुरि गेल।
काजमे गुलटेन जेहने होशगर माने लुरिगर तेहने बिसराह। जे सभ बुझैत। उजड़ल गाम कोनो बसत। दरिद्र गाम कोनो सुभ्यस्त बनत
, एहि कलाक प्रदर्शन गुलटेनक काज देखबैत। अनाड़ीकेँ काजक लूरि सिखाएब, हनपटाह गाए-महीसि दुहब, डरबूकसँ डरबूक गाएकेँ बहाएब माने साँढ़ लग लऽ जा पाल खुआएब, घोरनोबला आ चुट्टियाहो गाछपर चढ़ि आम तोड़ब, झोंझगर बाँसमे पत्ता तोरव, सुरुंगवा शीशो पाङब, सुआगर घर छाड़ब, सक्कत खेत जोतब, पनिगर खेतमे धान रोपब, सांङिपर ढेंग उठाएव, दुखताहकेँ खाटपर उठा डॉक्टर ऐठाम लऽ जाएब, फड़काह बच्छाकेँ पटकि नाथव, हर लागएव इत्यादि काज समाजमे ककरो कऽ दैत। कोना नहि करैत? एकरे तँ अपन बपौती सम्पति बुझैत अछि।
वर्षी भोजक चर्चा जनिजातिक माध्यमसँ सगरे गाम पसरि गेल। अपन दायित्व बुझि एका-एकी मरदो आ स्त्रीगणो गुलटेन ऐठाम आबए लागल। जहिना अनका ऐठाम काज भेने गुलटेनो बिनु कहनहुँ पहुँच जाइत तहिना समाजोक लोक आवए लगलाह। रवियापर नजरि पड़ितहि गुलटेन कहलक-
‘‘रबी, तोरा ऐठाम तँ जाइये ले छलौं। भने आबिये गेलह। बहुत दिन जीबह।’’
रवि-
‘‘किअए भैया? अखने फोकचाहावाली काकी अंगनामे बजलीह; तब बुझलौं।’’
‘‘ठीके सुनलक। बिसरि गेल छलौं। दोकानपर झिंगुर काका मन पाड़ि देलनि। मुदा काज तँ कौल्हुका बदला परसू नै हएत।’’
‘‘हमरा बुते जे हेतह तइमे पाछू थोड़े हेबह।’’
‘‘चाउर-दालि तँ घरेमे अछि। तेल-मसल्ला, तरकारी हाटेपर सँ लऽ आनब मुदा पंचकेँ दुइओ कौर दही नै खुऐबनि से नीक हएत?’’
‘‘सौझका दूध अपनो रहत आ किसुनोसँ लऽ लेब। कत्ते दूध पौरबहक?’’
‘‘दू मन चाउर रान्हब। अधोमन तँ दही चाही।’’
‘‘अधा मन सँ हेतह?’’
‘‘अपना सभमे दहिये कते परसल जाइत अछि। गरीब लोक अन्ने बेसी खाइत अछि। दूध-दही आ कि फल-फलहरी जे खाइयो चाहत से आनत कतऽ सँ।’’
‘‘हँ, ई तँ ठीके कहलह। हम तँ कहबह जे तरकारियो किअए हाटपर सँ अनबह। अखन तँ सबहक चारपर सजमनि कदीमा आ बाड़ीमे भट्टा अछिये तइ ले पाइ किअए खर्च करवह। धड़फड़मे अदौरी बनौल नै हेतह। बैगन आ अदौरी नै बनेबह से केहन हएत?’’
‘‘मन होइए जे बर-बरीक ओरियान करी।’’
‘‘तों सनकि गेलह हेन। बड़-बड़ीक घाटि कते मेठनियाँ होइत अछि से नै बुझै छहक।’’
‘‘हँ, से तँ ठीके कहलक।’’
‘‘अखन जाइ छिअह। दहीसँ तू निचेन भऽ जाह। काल्हि दुपहरमे ने काज हेतह। आ कि पुजौनिहारो औथुन।’’
‘‘अपना सभमे कत्ते पुजौनिहारकेँ देखै छहक। जतिया आगू कोनो पतिया लगै छै।’’
भगिन पुतोहू दालि दड़ड़ै लऽ अबैत छलि। डेढ़ियापर अवितहि गुलटेनपर नजरि पड़ितहि मुँह बीजकबैत बाजलि-
‘‘बुढ़हा अपनो मरताह आ दोसरोकेँ जान मारथिन काल्हि-परसू ई सब काज नै होइतै। कहि दालिक मुजेला लऽ जाँत दिशि बढ़लि।
गोसांइ डुबिते भाय भजनाक संग सिंहेसरी पहुँचलि। अपना माथपर अपन पहिरएबला कपड़ा आ अल्लूक मोटरी आ भजनाक माथपर चाउर-दालिक। बिनु छँटले चाउर आ गोट्टे दलि। आंगन पहुँच सिंहेसरी कानल नहि। माए-बाप लग बेटीक कानव तँ सिनेहक होइत। मुदा सिंहेसरीक मन तखनेसँ लहकल जखने भजना बरखीक चर्चा केलक। मनमे उठै जे अपना खूँटापर लघैर महीसि अछि
, बरखी सन काजमे जँ एक्को कराही दही नहि लऽ जाएब से केहन हएत? ओसारपर मोटरी रखि माएसँ झगड़ा शुरु करैत बाजलि- ‘‘ऐँ गे बुढ़िया, हमरा कोनो आए-उपाए नै यऽ जे, काल्हि बाबाक बरखी छिअनि आ आइ तू अबै ले कहलेँ?’’
तहि बीच गुलटेन सेहो हाटसँ आबि गेला। माथपर मोटरी रहबे करनि कि मुनिया बाजलि-
‘‘दाय, हमर कोन दोख अछि मासे-मास जे छाया करैत एलौं तेकर ठेकाने ने रहल। बापो तेहन विसराह छेथुन जे बिसरि गेलखुन। आइये बुझलौं।’’
माएक जबाव सुनि सिंहेसरीक तामस पिता दिस बढ़ए लगल। मुदा मुँह-झाड़ि बाजब उचित नहि बुझि माएकेँ अगुअबैत बाजलि-
‘‘जाबे बाबा जीवैत छलाह ताबे कत्ते मानै छलाह। आब जखन ओ नहि छथि तखन हुनकर किरिया-करम छोड़ि देबनि। एगारहो गोटेक तँ ओरियान कऽ कऽ अबितौं।’’
बेटी आ पत्नीक बात गुलटेन चुपचाप सुनैत। कखनो मनमे उठै जे गलती हमरे भेल। फेरि होइ जे कोनो काज करै काल ने उनटा-पुनटा भेने गल्ती होइत अछि। मुदा
, हम तँ बिसरि गेल छलौं। सामंजस्य करैत गुलटेन बाजल- ‘‘पाहुन किअए ने ऐलखुन?’’
सिंहेसरी-
‘‘से तू नै बुझै छहक जे नोकरिया-चकरियाक घर छी जे ताला लगा देवै आ विदा भऽ जाएब। दुनू परानी लगल रहै छी तखन ते एक्को क्षणक छुट्टी नै होइए। ढेनुआर महीसिकेँ छोड़ि कऽ दुनू गोरे कना अबितौं।’’
बेटीक बात सुनि मुनिया बाजलि-
‘‘अइ घर ओइ घरमे कोन अन्तर अछि। तोरा लिये जेहने ई तेहने उ। अहूठीन ते दहीक ओरियान भइये रहल हेन। तइ ले तोरा किअए मनमे दुख होइ छौ। हम तोहर माए नइ छियौ। कोनो आइऐक छियै कि सभ दिनेक बिसराह छथुन। तइ ले तामस किअए होइ छह। मोटरी सभकेँ खोलि-खोलि चीज-बौस ओरिया कऽ राखह। पहिने पएर धोय गोसाँइकेँ गोड़ लगहुन।’’
पत्नी आ बेटीकेँ शान्ति होइत देखि गुलटेन मुस्की दैत बाजल-
‘‘गाममे जेकर काज हम केने छी ओ कि हम्मर नै करत। कते भारी काजे अछि।’’
घरक गोसाँइकेँ गोड़ लागि सिंहेसरी पिताकेँ गोड़ लगैले बढ़ल कि गुलटेनक आँखि सिमसिमा गेल। सिमसिमाएल मने पुछलक-
‘‘बुच्ची, कोनो चीजक दुख-तकलीफ ने ते होइ छह?’’
हँसैत सिंहेसरी कहलक-
‘‘बाबाक बात कान धेने छी। हाथ-पएर लड़बै छी सुखसँ दिन कटैए।’’
भोजमे खूब जस गुलटेनकेँ भेल। भरि-दिन ऐम्हर-दौड़ तँ ओम्हर-ताकमे दुनू परानीकेँ रहल। मुनियाक छाती केराक भालरि जेकाँ कपैत। बिना अन्ने-पानिक भरि दिन खटैत रहलीह। जेना भुख-पियास कतौ पड़ा गेलनि। मुदा भोजनक जस दुनू परानी गुलटेनकेँ
, जहिना ऊसर खेतमे कुश लहलहाइत, तहिना लहलहा देलक। पिताकेँ सिंहेसरी कहलक- ‘‘सभ काज सम्पन्न भऽ गेल। आब अपनो सभ खा लाए।’’
खेला-पीला उपरान्त गुलटेनक मनमे
, सिनेमाक रील जेकाँ, नाचए लगल- ठीके ने लोक कहैत छथि जे जेहन करत से तेहन पाओत। जहिना बाबूक मन शुद्ध छलनि तहिना ने क्रियो-कर्म हेतनि। आ-हा-हा ओंगरी पकड़ि-पकड़ि घर बन्हैक लूरि सिखौलनि। बारहो मासक काज जीवैक लेल सिखौलनि। मने-मन पिताकेँ गोड़ लगलक।

३. पद्य





३.५.सरोज खिलाडी‘-गीत

३.६.कामिनी कामायनी-बाजार मे स्त्री

स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 0 मे भेलनि  पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल  मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि  डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |

!!
नवदुर्गा !!

सिंह पीठ असवारि लगै छी अहॉ बऽर वढ़ियॉ ।
अति सुन्नरि सुकुमारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़िया ।।

हस्त त्रिशूल चक्र अति चकमक,
रक्त पिपासित खप्पड़ भक् भक्,
अखिल लोक अवाक् सभ ठकमक,
चललहुॅ बनलि विहाड़ि लगै छी अहॉ बऽर बढ़ियॉ ।।

गत्र गत्र पर रक्तक छिटका,
असुरक पीजु चरण तर टटका,
क्रुद्ध नयन कर सॉपक सटका,
ठाढ़ि महिष केॅ मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ ।।

भऽरल सभटा राक्षस सेना,
तीतल ऑचर बहल पसेना,
आऊ हौकि दी वॉसक बेना,
बैसू मुस्की मारि लगै छी अहॉ वऽर वढ़ियॉ ।।

हे दुर्गे जगदम्ब व्यथा हरू,
अपना कोर माय हमरा करू,
रामक भक्ति सुधा मुख मे भरू,
हे पयस्विनी नारि लगै छी अहॉ वऽर बढ़ियॉ ।।



!!
रामावतार !!

डेग झटझारि चलू टेल्ह पट पारि चलू ।
राम अवतार भेल नरेशक द्वारि चलू ।।

दिवसो दू पहरक मासो अति मधुरी,
सिहकल मलय पवन, गमकल अवधपुरी,
त्यागि कऽ आड़ि चलू, खेत पथारि चलू ।
राम अवतार भेल........................................ ।।

संग मे शेष लखन भरतक शुभदर्शन,
शंखे अरिमर्दन रामे मधुसूदन,
नवो नरनारि चलू घोघ ऊघारि चलू ।
राम अवतार भेल..................................... ।।

बॉटु सभ विसु वन्हन लुटाउ आभूषण,
परगट पुरूषोत्तम धैन छी अॅऽहू हम,
घट सम्हारि चलू चहुमुॅख वारि चलू ।
राम अवतार भेल ..................................... ।।

शरणे आउ सखी उठाउ पदरजकण,
लगाउ प्रेमांजन जुड़ाउ नैन अपन,
जिनगी तारि चलू अहिल्या नारि चलू,
राम अवतार भेल ............................. ।।

गंगेश गुंजन:
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।

अपन-अपन राधा २०म खेप

-केहन आनन्द छैक राधा, करबा मे कोनो उपकारक काज ? स्वयं
कोनो कारणें अशक्य-असहाय जे भ' गेल हो,
क्यो नहि हो जकरा देखनिहार, ' देबा मे ओकर बहुत जरूरी काज ?
केहन लगैत छैक मोन कें खुशी? 

विदेह २० म खेप

व्यर्थ एतेक जे बौसलीयो छूबाक नहिं बाँचि जाइत छैक स्पृहा।
तों दुक्ख नहि मान, एत' धरि जे बिसरि छें तों पर्यन्त राधा,
तोहूँ हमरा। हमर आनन्द जकाँ भेटैत छें से बात ओही काज मे ओहिना...
जेना मोन छौ-मनसुख दास कें बुढ़ारी मे जे बेदखल क'
निकालि देने रहैक घर सँ बाहर अपन सहोदरे पहलवान भाय ?
हाहाकार करैत असहाय मनसुख दास !
ओकर जीवन मे कतहु किछु ने बाँचल रहि गेलो उतर
पहुँचि गेल रहीक तोंही, हँ तोंही ने आ
मात्र एतबे तँ प्रबोधने रहीक ओकरा-' कका, नै दुख करू।
एतबे टा नहि छैक ई संसार आ यैह टा नहि
अछि एक टा भाय-सुन्नर दास।धैर्य धरू, नै दुख करू।
बाँचल छै एखनो लोक आ समाज ।
स्वयं श्रीकृष्ण छथि एखन अपने गाम।
चलू, आउ। दू घोंट जल पी लेब कका ?                       
नहि हो तं विश्रामे क' लिअ' कनी काल।
ऊपर सबटा देखै छथिन ईश्वर,करै छथिन निसाफ।
तकैत छी हुनका, जानि नहि एखन कत' छथि, एहने बेर मे
जखनि चाही समाज कें हुनकर हएब,
अत्येब क' जेना भ' जएताह अलोपित !
कोना बिसरि गेलही राधा,अपने व्याकुलता अपन से काज?
हम कोन्टा धेने रहियौ सब किछु सुनैत, देखैत तोहर अहुँछिया कटैत
तोहर मातृ-भाव, राधा ।
किछुए काल पहिने तं फुरतीया दौड़ले गेल रहय,
पहुँचि क' कहि चुकल छलय हमरा मनसुख दासक ई समाचार!
कोना कहियौ नइं, तोरो मनक समाद तं सुनाएले रहय तत्काल ।
खौंझाइत-तमसाइत कोना रहें तिलबिखनी तों हमरा पर...
दौगल-दौगल आएल रही...देखने रहियौ तोरा अपन काज करैत !
गछै छियौ देखैत ई सब दृश्य
हृदय भ गेल पवित्र, चिन्ता-निश्चिन्त !
केहन बुधियारि अछि हमर ई बेकूफ राधा...।
तें उपस्थित भेलियौ तोहर दासम दास ।
अएलियौ, प्रगट नहि भेलियौ राधा।...बिसरि गेलही ?
हम तोरा प्रगट नहि, उपस्थित होइ छियौ राधा ।
तोरा लोकनि बूझ ई बात आ मानै जाइ जो।
एहने एहने परिस्थिति मे बेर पर हमरा भरि संसार मे कत्तहु सँ
आनि ले...हमर भाव-रथ केहन तेज आ केहन सुस्त चलैए, बुझले छौक ।....

अरे राधा, कनैत किएक छी ? की भेल, किएक कनै छी राधा !


कानब तं स्त्रीक नियति छैक। आँचर सँ नोर पोछब, जेना दैनिक काज।

मुदा नोर खसबाक आशय बदलि रहलैये-प्रति पल।
युगक अपन-अपन स्वभाव !
युग बदलि रहल छैक। युग बदलिते रहलैये। पण्डित जनक अपन-अपन बुद्धिक व्याख्या संग,
आगत युगक स्थापना आ अतीतक बहिष्कार चलितहिं आएल छैक। कालगतिक ई एकटा अप्पन
आ स्वायत्त प्रक्रिया छैक।सब मानैत छैक। सब के मान' पडैत छैक। कए बेर तेहन अभ्यागत जकाँ
जे अभ्यागती कें बना लेने छथि-अकर्मण्यताक अभ्यास। स्वभाव, अतिथि देवो भव' कें हथिया लेने
छथि बड़का नैतिकअधिकार हथकंडा औजार जकाँ। ओहन-ओहन हुनका हेतु परिवार भेदें अवस्से आब'
लगलैये-सेवा भाव तत्परतामे किंचित उदासीनता सेहो, अवहेलना नहि,हुनक सेवा मे कतबा आ केहन
आ केहन व्यवस्था लागति-समय सं ल' ' स्वागत-सत्कारक गृहस्थीक साधनक कतबा कएल जाय
खर्च-वर्च ताहि पर होम' लगैत छैक विचार पर विचार । गरबैया पएर धोआ कम्मल-पटिया पर स्थापित
',आँगन जा भोजनादिक द' कहि,' जाइत अछि अपन दिनचर्या मे प्रवृत्त। अभ्यागत रहैत छथि दलान
पर असकर स्थापित।
युग सेहो, होइत छथि तेहने अभ्यागतो महराज। आब तं आरो,
जखन बापो-माय बूझल जाय लागल तेहल्ला...
कहू तं बेटा-भाय कतहु घर सं निकालि दिअय ? अपने बाप-भाय कें एना क' करैत तिरस्कार
बनबैत असहाय ? ई एहन युग यैह एकर रंग ताल । आ से रहत जानि नै कतेक द्वापर-युग ?
के जानय !
दुःख प्रगट करू तं कहताह बूढ़ पुरान, ज्ञानी-पंडित-' यैह थिकैक सृष्टि चक्र। कालगतिक यैह छैक
प्रकृति-विधान ।अनादि काल सं चलि आबि रहल, अनन्त काल धरि चलैत रहत। मात्र यैह टा तं
चलैत छैक-अमृत गतिक प्रवाह। नहिं मरैत छेक ।


मनुष्य समेत प्राणि मात्र तं अपना अपनी और्दें मरि जाइत अछि। जन्मे जकाँ मरण सेहो थिक
अनिवार्य।  मुदा ई कालचक्र जकर नाम युग कहैत छैक कतोक युग सँ लोक, समाज  से अपने
रहैत अछि अक्षुण्ण! अनथक चलैत, छलिते रहैत । किछु काल धरि लोकक जीवन मे आदरणीय
अभ्यागत,आत्मीय, सर-सम्बन्धिक जकाँ...।तकरा बाद गृही कें अनुभव होम' लगैत छैक ओकर
ओकर अभ्यागतीक छुच्छ कर्तव्य-निर्वाह। आगाँ सेहो स्थिति यदि एहने बनल रहि जाइछ तं
अतिथि गृहस्थक करय लगैत अछि शोषण। अपन ताही कुटुम्बक, सम्बन्धक कर' लागि जाइत
अछि उपयोग-उपभोग तें गृहस्थ, सम्बन्धी कर' लागि जाइत अछि ओकरा प्रति विचार अस्वीकार।
तकरा पश्चात् ओकर अवहेला। यैह थिक प्रकृति इएह तकर तासीर।तखन बितैत वर्तमान जाइत-
अबैत खारीक मध्य नव तरहें उठै छैक उद्वेग आ विचार-विमर्श ! अनन्तर विवाद । पिता-पुत्र
पीढीक परस्पर विचार भेदक नऽवे यथार्थ जे दुहू कें अपन-अपन तर्क विश्वास मे कएने रहैत छैक
लाचार, तैनात । होअ' लगैत छैक संघर्ष ! तकरा समाज आ समाजक विद्वत्समाज कहैत छथिन
पीढ़ीक मनोभावनाक विभेद । विभेदक द्वन्द्व आ तज्जन्य दुविधा, तकरे प्रभाव, जीवन दशा आ
परिवार-व्यवस्था कें कर' लगैत छैक देखार अनदेखार प्रेरित-प्रभावित।प्रारम्भ भ जाइछ युगक
अन्तर्विरोध। स्वभावतः अन्तर्विरोधक कए टा नव नकारात्मक प्रतिफल ! एहि बीच नव सृष्ट शिशु
पीढ़ीक होइत रहैत अछि एहि दुविधा-द्वन्द्वक घोर परिस्थितिक आगमन, दिनानुदिन विकास।
बनैत-बढ़ैत अछि ओकरो मे अपन बुद्धि, दृष्टिकोण ! लगैये ओहो अपन पिता, पितामहक सोझाँ
करय प्रश्न ठाढ़।जवाब चाही ओकरा । जे जवाब ओकर पिताक छलैक, आजुक आवश्यक ताहि सँ
बहुत बेशी बढ़ि-चढ़ि क' चाही-
नव खाढ़ी कें अपना प्रश्नक त्वरित समाधान !


समय अपने तं एकटा असमाप्त प्रश्न अछि। अपने पूछैत अपने जवाब दैत। अपने
चलैत अपने ठाढ़ रहैत।ठाढ़े ठाढ़ चलैत, चलिते-चलिते ठाढ़ तहैत।पछिला क्षणक प्रश्न
कें अगिला उत्तर लेल मथैत, आगाँक प्रश्न ठाढ़ करैत। पुनः वर्तमानक सोझाँ भविष्यक
आकार-प्रकार, संवेदना आ तर्क तकैत-तैयार करैत-मनुष्य कें बनएबा मे तकर कहार।
समय अंततः तँ होएत अछि-एकाधिकारी बुधियार ! अपना कें रखने सदति तटस्थ आ
निर्विकार, करबैत रहैये सौंसे संसार लोक सँ आद्यन्तो कार्य व्यापार मुदा स्वयं रहैये
यथायोग्य आत्मविश्वासी नाट्य कलाकार । अपन भूमिकाक प्रतीक्षा मे निश्चिन्त आ
तैयार। मोह नहि किछु कोनो आग्रहो-दुराग्रह नहि किछु। मात्र अपन होएबाक आभास
दैत देखैत रहैत अपन अस्तित्वक लक्षण सूक्ष्म सँ ल' ' बिकराल । निश्चिन्त विद्यमान
रहैत अछि-लोककमोन मे। पृथ्वी,आकाश, प्रकाश सब मे स्थितिक मोताबिक जीवनक
जल जकाँ सिक्त सूक्ष्म रंगें घुलल, मिज्झर । एक रती ने एम्हर एक रती ने ओम्हर।
धर्मात्मा दोकानदार जकाँ तराजुक दुनू पल्ला बराबर। डंटी संतुलित ठीक मध्य मे।
तौल बराबर। कतहु सँ कोनो पलड़ा कनियों लत नै, उठल नहि। तेहन पवित्र दोकानदार
-ई समय ! कोना रहैये ललकारने,दुलारने आ हड़कौने मनुक्खक क्रिया कलाप कें?
कतेक आवश्यक आ समयबद्ध प्रयोजन हेतु कएने रहैत अछि संसारी सुख-दुःखक
आलाप-विलाप ! सबटा तँ लैत आखिर अपने मूड़ी पर बौक दास जकाँ सहैत चलि
जाइत अछि- अनन्त काल। करैत रहेत अछि, प्रश्न, दैत चलैत अछि उत्तर । सजग
अभिभावक सतत जेना चिन्तहि मे-साकांक्ष । ई तं भ' गेलैक आब ? अगिला...
कालक कहार बनल मनुक्ख-जाति ओकरे भास पर नहि गबैत रहैये कर्मक गतिक
गुणगान । कउखन उद् गार मे, कखनो दुःख-शोक मे मनुक्ख । कालक ई दुनू बोधे
कें उघबा वास्ते तं लोक अछि। दुःख आ सुख । यैह दुनू टा तट आ बीच मे बहैत
जलक धार । कउखन सरस्वती कखनो यमुना कतहु गंगा, कोशी कतहु कमला कल-
कल धार !


जीवन ई धार थिक । मुदा ई धार कतोक दिन सँ अछि, स्थिर। अनपेक्षित।
अनान्दोलित ठाढ़।आश्चर्य ! नदी होइतहुं स्थिर तेना जेना हो गामक पोखरि-इनार।
यमुना मे कए दिन सँ किछुओ टा गतिविधि नहि। शान्त चुपचाप अछि धार।
बड़ उदास । गुमसुम तकैत जानि नहि कोम्हर, ककरा कतेक काल...
यमुनोक लेल काल ओहने निठुर। ओहिना बहीर अकान, मनुक्ख लेल बनल रहैत
अछि जेना। कालक एतेक विराट विस्तार मे एक टा असकर प्राणि मात्र बाँचल
रहि गेलय-नाम जकर राधा ।
 (१२ मार्च,२०१० ई.)
जगदीश प्रसाद मंडल
जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
 गीत

अहीं कहुँ भाय आब की करबै?
पएर पसारब तखने
मन समेटब जखने
शिव दर्शन कैलाशक ऊँपर
भट्ठा नहि शिरापर
तहन जे धारक लहरिमे हेलैत रहबे
अहीं कहुँ भाय आब की करबै?
दहिना हाथक गति बामा अछि
आगू चलि कऽ देखिऔ
मुदा पाछुओ भेने
बाट नहि छोड़त
की प्रकृति प्रदुशन करबै?
अहीं कहुँ भाय आब की करबै
नम्हर-नम्हर पोस्टर छापि
बिड़ड़ो, दानो, ठंकाक दुर्गकेँ
हेँड़क-हेँड़ कोना टपटै
अहीं कहुँ भाय आब की करबै?
नम्हर-नम्हर बात बना
सुखले आँखिक नोर बहा
जहर लगलाह हाथसँ कोना नोर पोछबै
अहीं कहुँ भाय आब की करबै?
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न

!!
चैतावर !!

आयल चैत मधुर रंग पॉचम,
उपवन बुलबुल गावय ना ............ ।
सन - सन पुरबा मलय वसात,
झन - झन देह झनकाबय ना............. ।।

कुहकै कुक कोइली बबुर वन,
चहकै अलि पाटलि मधुवन,
फड़कै मोर मोरनि लोचन,
फनकै मृगी पद फन - फन,
भन - भन मन भनकावय ना ।
सन - सन................................................. ।।

भाविनी खिलायलि गहवर,
वहिना मुदित हिय फरफर,
सखी नेह मातलि कोहवर
भौजी रेह गावथि सोहर,
क्षण - क्षण तन छनकावय ना ।
सन - सन................................................. ।।

प्रियतम व्यथित ई आखर,
नोरक सियाही झरझर,
कोमल शय्या भेल खरखर,
सुखि देह वक सन पातर
कण - कण पट सिहरावय ना ।
सन - सन................................................. ।।

उपटल फागुन केर रस वुन,
हहरल नुपूर स्वर झुन - झुन,
विकल नैन भेल अधर सुन्न
अछि कोन कांता मे अवगुन?
घन - घन घट सनकावय ना ।
सन - सन................................................. ।।
!! व्रत एकान्त !!
लुटकुन जी केर चकचक भाल,
कपोल सिनुरिया बनल रसाल ।
टीशन चलला लऽ घटही कार,
आवि रहल थिन्ह सासु आ सार ।
छहछह तन मन भरल उमंग,
गृह घुरलनि विधि माताक संग ।
झटपट शांभवि चाह बनावू,
पहिने रूहे आफजा लावू ।
मम्मी छथि वड़ जोड़ पियासलि
भूक्खे समस्तीपूर सॅ मैसूर आयलि ।
जलखै सेवै दलिपूड़ी क बोर,
मझिनी भुजल परोर आ इचना झोर ।
जुनि करू अकरहरि श्रवण जमाय,
अहॅक सासु तऽ हमरो माय ।
माय हमर आडम्वरि धर्मी,
सनातन पालिका संग षट्कर्मी ।
मतिसुन्न लक्ष्मीनाथ बजार गेलनि,
फुलल परोर मॉछ इचना लेलनि ।
देखिते भऽरल मॉछक झोरा,
फुजलनि सासु वन्न मुॅह वोरा ।
पाहुन देलथिन धऽर घिनाय,
कोना करव हम नहाय खाय ?
काल्हि हमर छी व्रत एकान्त
मछैन गृह केर सगरो प्रान्त ।
फेकू मॉछ सटल तरकारी,
ग्ंागाजल सॅ धोयब आंगन वारी ।
गैस चढ़ल अन्न नहि खायब,
बौआ सॅ अंगूर सेव मंगायव ।
काल्हुक लेल चाही आमक चेरा,
माटिक चूल्हि आ वॉस चडेÛरा ।
सिंगापूरी नहि चिनियॉ केरा,
शुद्ध सुधा गुड़ सानल पेरा ।
शांभवि ई मैसूर नहि गाम,
कतऽ हम ताकू जाड़नि आम?
विकट भेल रवि व्रत एकान्त,
एहि चक्कर हमर जीवन अशान्त ।
लुटकुन माथ मे शोणित अटकल,
भाय वहिन मुॅह मुस्की फटकल ।
हम की करव सभ दोष अहॉ केॅ,
पावनि मास किएक बजौलहुॅ मॉ के ?
ताकय चललनि कर्नाटक केर गाम,
हाथ चूल्हि मॉथ गठरी आम ।
सोझे आवि खाट पर खसलनि ।
शांभवि जोर ठहक्का हॅसलनि ।
सुनू प्रिये तारू सूखल अछि,
जल विनु हम्मर हिय विकल अछि ।
एहेन व्यथा नहि हॅसि उड़ाबू,
त्रास कंठगत नीर पियाबू । 
सरोज खिलाडी
 नेपालक पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक
गीत
     
अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी ।
अहाँ बिना हम जीब नहि सकैछी ।
अॅहु त हमरा चाहैछी तेॅ चोरानुका क तकैछी । 
अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । २

सब सँग मिल आहा खुब हसैछी
भितरे भितर कनैछी 
मैर नहि जाय अहाँके प्रेममे
हमरा किया जचैछी
ए अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी ।

बाजब केम्‍हरो इसारा अछी केम्‍हरो
निक जका बुझैछी २
सामनेमे चुपचाप रहैछी
परोछमे किया खोजैछी ।
ए अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी ।

अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी ।
अहाँ बिना हम जीब नहि सकैछी ।
अॅहु त हमरा चाहैछी तेॅ चोरानुकाक तकैछी । 
अहाँ बिना हम रहि नहि सकैछी । २
कामिनी कामायनी

बाजार मे स्त्री
आे रूप कुॅमरि कियै ठाढ आेत्तए ऋ
की छानि रहल अछि राह बाट 
     छिटकल कारी घन केश पास
     हर्षित मुख मंडल  मन उदार ।
आॅखिक भाखा किछु कठाेर सन
दप दप चमकैत उन्नत ललाट ।
    ताकि रहल किछु गुमल चीज
    बरखा बूनि मे रहल भींज ।
बटुआ छै काॅन्ह सॅ लटकि रहल ।
ऊचका सैंडिल छै अटैकि रहल ।
  चालि चलै छै नापि नापि
  रहि जाए छ ैधरती काॅपि काॅपि ।
कत्तेक इर् उर्जावान बनल
ज्ञान भरल अभिमान भरल ।
  ककरा सॅ कम छै अहि जुग मे
इर् अर्जुन के अभिमान ताेडल ।
     वामन अवतार विराट बनल
  इर् ताकि रहल ब्रम्हांड दिस ।
     करे छै सब कियाे नमस्कार
  देखियाे अहि जुग के चमत्त्‍कार ।
इर् रूप कुमरि खूब बूझि रहल ।
     समरथ के नहि  छै दाेख काेनाे
  सहलक आेहाे बड बसात घाम
 नहि लेलक क्षण भरि के विराम ।
आय बल बुद्वि के ताकत प्ऽ्ऽऽ
आे रूप कुमरि अछि ठाढ आेत्तय ।
12 3 10      
१.बेचन ठाकुर- गीत२.मनोज कुमार मंडल-जिनगी

१.बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार।
गीत

खेलै छेलियै धुपै छेलियै करै छेलियै काम-2
भद्वारमे जे छहर टूटलै, दहा गेलै सौंसे गाम।
भैया हो रामै राम, रामै राम सीता राम।
आहो फोकटिया नेता, लुटलक गामकेँ।
कुथि-काथि कऽ रोपनि केलनि, खेतमे हमर किसान
बाढ़ि-डकुबाकेँ लाजो नहि भेलैक धानकेँ कएलक हरान।
भैया हो.........
पिपरौलिया गौवाँ रोडकेँ कटलक, बटौहीकेँ कएलक परेशान
गंजबला बबूर पर से रोडपर बान्हलक मचान।
भैया हो........
पंचायत समिति मुखिया वार्ड मेम्बर सभकेँ छुटलै धाम
जिला परिषदकेँ गंजबला, बनौलक बेइमान।
भैया हो...............
गीत

रिलीफमे बीस किलो चाउर, सए टका नून तेलक दाम
घर-घरमे तीन किलो गहूम सेहो कएलक नाम।
भैया हो..............
घर खस्सीमे गरीब हेतु, घरक आएल अभियान
मुदा पाँच सए टाका जे देताह हुनके होएत काम।
भैया हो............
बड़का चोर मैझला घुसखोर छोटकाकेँ कोना मकान
घुसखोरी देखि कहथि बेचनजी सभकेँ जाएत परान
भैया हो................ 

२.मनोज कुमार मंडल
जिनगी

असकर आएल अएकरे जाइत अछि
ऐवा व जाइक बीच जीनगी कहाति अछि
ई जीनगी फूलक बिछाओन नहि
दुखक समुद्र नहि
सुख-दुखक सामना करए पड़ैत अछि
ई जीनगी संग्राम कहाति अछि
असकर आबि दुनियाँक संग
प्रित होइत अछि
सदिखन मिलबा सुख

बिछड़बा दुख होइत अछि
ई सत्य भूलि संसारक संग
रमि कऽ जेबाक बात भूलैत अछि
सभ झूठ साँचमे बझैत अछि
संबंधक जाल बना कऽ सभ
अपने जालमे फसैत अछि
कर्तव्य बोध बिसरि
फूसिक पर्दा लगबैत अछि
सत्य सत्ये रहत
जाए सभकेँ पड़त
ई बात की फूसि छी
?
एहिठाम आबि
किछु सभ लेल कर्तव्य करी
ओकरे सभ नाम जपैत अछि
ऐतने टा दुनियाँमे
नाना प्रकारक काज अछि
ई करवा लेल सभ अबैत अछि
क्यो आन ने कियो अपन छी
की आँखिक देखल अपन छी
वाँकि सभ बिरान छी
उठू
, जागू
अपन कर्तव्य बुझू
सभ कियोक अपन बना
जिनगीक रास्ता तँइ करु
ई जीनगी
, जीनगी छी।
१. राजदेव मंडल तीनटा कविता
२.जय प्रकाश मंडल (अगिला अंकमे)
राजदेव मंडल तीनटा कविता

 1. जाति

ओ कहलथि-
कनेक भऽ जाउ कात
आर दिअ अपन परिचए-पात
हमरा कहए पड़ल-
अपन नाम-गाम
आओर काम
बजलाह ओ महाशय-
हमर आशय
नहि बुझि सकलहुँ साइत
हम पुछै छी जाति
मूनने अछि ओ नाक
हम भऽ अवाक
निहारि रहल छी हुनक मुख
ओ नहि बुझि सकलाह हमर दुःख।

2.
बदलैत बाट

सोझा राखल दर्पणमे
देखैत स्वयंकेँ
छुटय लागल निश्वास
आ ओहि उच्छावासक भापसँ
बनए लागल दरपन मध्य
नव-नव आकृति
कोनहुँ सुखद कोनहुँ दुखद
जेना,
बर्तमान, भूत, भविष्यक खेतमे
उपजि रहल हो
नव-नव बिम्ब
कोनहुँ कल्पित कोनहुँ स्मृत
...................
किन्तु
जठराग्नि तेज भेलापर
बिसरि गेलहुँ अपनाकेँ
निहारब
बिदा भऽ गेलहुँ
भनसा घर दिशि
रोटीक खोजमे।

3.
भीतरिया जानवर

बन्हने छी बुद्धिक मजगूत कड़ीसँ
एहि भीतरिया
हिंशक पशुकेँ
तइयो,
कछमछाइते रहैत अछि
कनेको दोग भेटलापर
ठाढ़ भऽ जाइत अछि-फन-फनाक
आ हम उनटे पाएरे
आपस भऽ जाइत छी
पुनः जंगली युगमे
किन्तु
भऽ जाइत अछि
डर.........
स्मरण कऽ
ओहि युगक समस्याक
तँइ आब करए पड़त
सशक्त
एहि कड़ीकेँ
२.

जय प्रकाश मंडल
एम.ए. एल.एल.वी
मझौरा निर्मली
जिला- मधुबनी
बिहार
हिनक तीनटा गीत- अगिला अंकमे देल जाएत....

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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

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