Saturday, March 13, 2010

'विदेह' ५३ म अंक ०१ मार्च २०१० (वर्ष ३ मास २७ अंक ५३)- PART II

अध्याय–21
परिशिष्ट
मिथिलाक इतिहासपर चंदा झाक मंतव्य
- नान्य राजा क्षत्रियकर्णाट छलाह जे शाके 1019मे राज्य पौलन्हि। 226वर्ष धरि हुनक संतान लोकनि राज्य केलन्हि।
- हुनक मंत्री जबदी परगन्ना स्थित अन्धराठाढ़ी गाममे कमलादित्य विष्णुक स्थापना केलन्हि। आधारशिलामे लेख श्लोकार्थ अछि–“नान्य राजाक मंत्री श्रीधर श्रीधरक प्रतिष्ठा केलन्हि। खसल पाथरक चौखठिपर “मकरध्वज योगी” लिखल अछि।
- शाके 1040मे चिक्कौर राजाक राज्यमे जयचन्द्र राजासँ असगरे संग्राम कैल।
- काफर राजाकेँ मारबाक बहादुरीमे पुरस्कार स्वरूप महमुदगमनी नरसिंहकेँ तिरहूतक राजा बनौलक। नरसिंह नान्यक पोता छल। बंगदेशसँ घुरबाकाल गयासुद्दीन सिमरौनगढ़ीसँ नरसिंह देवकेँ लऽ गेल छलाह।
- हरिसिंह देव मैथिल ब्राह्मणक पञ्जी प्रबन्ध केलन्हि। हुनक मंत्री रहथिन्ह साँधिविग्रहिक महावार्त्तिक–निबन्धकारक, महामत्तक वीरेश्वर ठाकुर–रणस्तंभ किलापर विजयाभियानक अवसरपर मैथिल मंत्री वीरेश्वर अलाउद्दीनक संग छलाह। 1295ई. मे हम्वीर स्वर्गवासी भेलाह। अलाउद्दीन वीरेश्वरकेँ मंत्रिरत्नाकरक पदवीसँ अलंकृत केलन्हि।
- शक्रसिंह देव कर्णाटक मंत्री छलाह।
- हरिसिंह देव अपना वंशक पंचम राजा छलाह। शाके 1216मे जन्म भेल छलन्हि। ओ 1248 शाकेमे दरभंगासँ पूब 7कोश एवँ सकरीसँ 1’’कोश दक्षिण नेहरा राघोपुरमे निवास करैत छलाह। ओहि गाममे पैघ–पैघ पोखरि आर किला छल। ओ ओतहि पञ्जी प्रबन्धक व्यवस्था केलन्हि। दैवाधीन ओ पटना छोड़ि उत्तर पहाड़ जंगल दिसि चल गेलाह। मिथिलामे भाला परगन्नामे मौजे उमागाममे अहुखन हरिसिंह देव पूज्य छथि। ओतहु भवन आदि देखबामे अवइयै।
कर्णाट वंश
राज्य योग–वर्ष–226
i) नान्यदेव–36,
ii) गंगदेव–14–गंगासागर,
iii) नरसिंह देव–52,
iv) रामसिंह देव–92,
v) शक्रसिंह–12–सुखीदीघी,
vi) हरिसिंह–20–निजाम्बुदीर्घिका।
नोट:- एहि प्रसंगमे हमर अपन मत “कर्णाट्ज आफ मिथिला” (भण्डारक) शोध पत्रिका–1955) प्रकाशित अछि। संगहि ‘कम्प्रीहेनसिभ हिस्ट्री आफ बिहार खण्ड–1’मे सेहो हम सभ तथ्यक विवेचन कैल अछि। रामसिंह देवक पछाति 1260ई.मे मिथिलामे वीरसिंह नामक राजाक विवरण पेटेक देने छथि जे विचारणीय अछि आर संगहि एहि तथ्यपर ओ नव प्रकाश सेहो देने छथि। द्रष्टव्य अछि हुनके लिखन “मिडिवल हिस्ट्री आफ नेपाल” आर बिहार रिसर्च सोसायटीक महाराजा वाल्युममे “मिथिला आर नेपाल” नामक हुनक निबन्ध।
“शाके श्रीहर सिंह देव नृपते र्भूपार्क तुल्येजनि–
स्तस्माद्दंतमितेऽब्दके द्विजगणैः पञ्जी प्रबन्धः कृतः।
तस्माद्वैरिजवंश वैरिकलिने (?) सद्विश्व चक्रेपुरा
सद्विप्राय समर्पितः सुकृतिने शांताय तस्मैनमः॥?॥
शास्तानान्यपतिर्बभूव=तदनुश्रीगाङ्गदेवो नृप –
स्तत्सूनुर्नरसिंहदेवनृपतिः श्री रामसिंहस्तः।
तत्सूनुः खलु शक्रसिंह विजयी भूपाल वन्धस्ततो
यत्र श्रीहरि (हर) सिंह देव नृपतिः कर्णाट चूड़ामणि॥2॥
वाणब्धिबाहुशशिसम्मित शाकवर्षे
पौषस्य शुक्लदशमी क्षितिसूनुबारे।
त्यक्तवा सुपट्टनपुरीं हरि (र?) सिंह देवो
दुर्देव देशित पथो गिरिमाविवेश॥3॥
मिथिलामे जब दीन हड़ी परगन्नामे बलिराज गढ़क समीप सिहुलावन (सिरिहला) नामक प्रसिद्ध स्थान अछि जतए बलदेवजी स्यमंतक मणिक हेतु 60वर्ष धरि निवास कएने छलाह। दुर्योधन, क्षेमधूर्त्ति, जलसन्ध आदिक सम्बन्ध सेहो एहिस्थानसम छल।
पक्षधर मिश्र 1350शाकेमे हरिनारायण प्रसिद्ध भैरवदेवक सभामे उपस्थित छलाह।
श्रीकृष्णस्य मंतक मणि जाम्बवानकेँ पराजित प्राप्त केलन्हि आर ओ मणि ओ सत्राजितकेँ देलन्हि। सत्राजित सत्यभामा नामक कन्या श्रीकृष्णकेँ देलन्हि। सत्यभामा रातिमे सत्राजितकेँ मारि मणि लए अकरूरकेँ एहि शर्त्तमे देलन्हि जे ओ एहि चोरीक गप्पकेँ प्रयासमे नहि अनताह। सत्यभामा हस्तिनापुर पहुँचि पितामरण एवँ मणिहरणक समाचार श्रीकृष्णकेँ देलन्हि। श्रीकृष्ण द्वारका पहुँचि अपन जेठ भाइ बलभद्र जीसँ एकरा खोजबाक हेतु आग्रह केलन्हि। मणि नहि भेटलाक कारणे कृष्णकेँ क्रोध भेलन्हि आर तखन ओ मिथिलामे आबि राज सत्कारसँ प्रसन्न भए धर्मागंद गढ़मे निवास केलन्हि आर तखनहिसँ ओहि गढ़क नाम कोपगढ़ पड़ल। 60वर्षक पछाति कृष्णजी द्वारिका घुरलाह।
बलिराजगढ़ ओ क्षेमगढ़ सेहो प्रसिद्ध अछि - - -
स्कन्दपुराण (सह्याद्रिखण्ड–अध्याय–35)क आधारपर सौनल मुनिसँ उत्पन्न क्षत्रिय वंशक बीसम राजा बलिराज छलाह (चन्द्रवंशी)।
हरिअमय बलिराजपुर मूल प्रसिद्ध अछि जाहिमे ब्राह्मण श्रोत्रिय महामहोपाध्याय सचल मिश्र पूनामे वाजीराव पेशवासँ अनेक दान प्राप्त केने छलाह।
बलिराजपुर गढ़क समीप मदनेश्वर महादेव छथि जकर स्थापना बलिराजक दादा मदन कएने छलाह आर जनिक नामपर मदनाग्राम सेहो अछि। 1281सालमे हावी परगन्नामे साहो मौजेमे पोखरि खुनैतकाल एकटा प्रतिमा बाहर भेल हे हावीडीहमे राखल छल आर लक्ष्मीनारायणक प्रतिमा शिलामे निम्नलिखित लेख उत्कीर्ण छल – “श्री मान्म दन माधवः”
पद्मावती देवी – सौनल्यमुनि
1.) यदु,
2.) भास्कर,
3.) सुरथ,
4.) गर्जन,
5.) दण्डधारी,
6.) खड़्गधर,
7.) श्रीवदन,
8.) नागराज,
9.) गुणराज,
10.) शिव,
11.) सोमनाथ,
12.) महाकाल,
13.) दुन्दुभि,
14.) बिम्बराज,
15.) देवक,
16.) अनिरूद्ध,
17.) गोपति,
18.) मदन,
19.) सुनेत्र, आर
20.) बलिराज – (जकरा नामपर बलिराज गढ़ अछि।)
परिशिष्ट – 2
ओइनवार वंशक वंश तालिका
ओएन ठाकुर –
अतिरूप ठाकुर –
विश्वरूप ठाकुर –
गोविन्द ठाकुर –
लक्ष्मण ठाकुर –
राजपण्डित कामेश्वर–हर्षण–तेवाड़ी–सलखन–त्रिपुरे–गौड़ (सुगौवेशः)।
राजा भोगीश्वर
महत्तक कुसुमेश्वर
राजा भवसिंह
(राजा भोगीश्वर)
राजा गणेश्वर
राजा कीर्तिसिंह(?)
वीर सिंह
(राजा भवसिंह)
राजा देवसिंह
राजा हरसिंह
(नरसिंहक बाद राजा भेलाह)
त्रिपुर सिंह (राज्य दुर्जन खाड़े)
(राजा देव सिंह)
शिवसिंह
पद्मसिंह
(राजा हरसिंह)
दर्पनारायण पदांकित रत्नसिंह – नरा
हृदय नारायण धीरसिंह (पुत्र – राघवेन्द्र)
हरिनारायण भैरवसिंह (धीर सिंहक भ्राता)
(विश्वास देवी) - ?
रूपनारायण रामभद्र
कंसनारायण लक्ष्मीनाथ –
(शिव सिंह)
लखिमा रानी – विश्वास देवी(?)
पद्मसिंह
(भैरव सिंहकेँ चन्द्र सिंह नामक एक छोट भाइक उल्लेख अछि – ई संभवतः सत भाय रहथिन्ह। इहो कोनो क्षेत्रमे राज करैत छलाह – विद्यपति आर मिसारू मिश्र हिनक ‘नरेश’, ‘नृपति’ कहैत छथिन्ह। हिनक पत्नीक नाम सेहो लखिमा रहन्हि।)
नोट:- चंदा झाक अनुसार त्रिपुर सिंहक पुत्र अर्जुन राय गणेश्वरकेँ मारलन्हि। कारण छल राजगद्दीक हेतु आपसी झगड़ा कामेश्वर आर हर्षणक वंशजमे। कीर्ति सिंह बादशाहक मददसँ राजा भेलाह। चंदा झा लिखनावलीक आधारपर कहैत छथि जे बन्धुघाती अर्जुन (त्रिपुरक पुत्र) कीर्तिसिंह सेहो मारल गेला। (वीर सिंह अपुत्र मरि गेलाह तखन भवसिंहक वंशक हाथमे शासन गेलैन्ह।
ओइनवार वंशक एक शाखा अहुखन अराईदंगा (मालदह) पश्चिम बंगालमे विराजमान छथि जे अपनाकेँ कामेश्वर ठाकुरक वंशज मानैत छथि। हुनक वंश वृक्ष हमरा स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर 1958मे पठौने छलाह।
लक्ष्मण ठाकुर
आठम पीढ़ीमे भेलाह कुलमन – ओइनीसँ मुर्शिदाबाद गेला।
संतोष (अराइदंगा पहुँचलाह)
बोधनारायण
भोलानाथ
काशीनाथ
दुर्गाप्रसाद
चण्डीप्रसाद
विशेश्वर
वीरेश्वर
रामेश्वर
हरेश्वर
(विशेश्वर)
नवीन
दिनानाथ
उपेन्द्र
(दिनानाथ)
स्वर्गीय अतुल चन्द्र कुमर (भूतपूर्व पार्लियामेंट्री सेक्रेट्री, बंगाल)
अरूण चन्द्र कुमर
(पुरनका मालदह गजेटियरमे सेहो हिनका लोकनिक विवरण भेटइत अछि।)
- मिथिला भारतीमे प्रो. हेतुकर झाक निबन्धसँ स्पष्ट अछि जे मिथिलामे 17–18म शताब्दी धरि ओइनवार लोकनि राजनैतिक दृष्टिये महत्वपूर्ण छलाह आर मुगल बादशाहत एहि तथ्यकेँ मनैत छलाह। अराइदंगाक ओइनवार लोकनिक क्षेत्र पुर्णियाँ धरि पसरल छलन्हि आर हेवनि धरि ओ लोकनि राजनैतिक दृष्टिकोणे मालदहोमे महत्वपूर्ण बुझल जाइत छलाह।
परिशिष्ट – 3
विद्यापतिक वंशावली
विष्णु ठाकुर
हरादित्य
कर्मादित्य
वीरेश्वर
धीरेश्वर
गणेश्वर
(धीरेश्वर)
जयदत्त
गणपति
विद्यापति
कर्मादित्यक शिलालेख:- अब्देनेत्र शशाँक पक्षगादिते श्रीलक्ष्मण क्षमाप्रते
र्मासि श्रावण संज्ञकेँ मुनितिथौ स्वात्यां गुरौशोभने।
हावीपट्टन संज्ञकेँ सुविदिते हैरट्ट देवी शिवा
कर्मादित्य सुमंत्रिणेह विहिता सौभाग्य देव्याज्ञया।
मिथिलायां हावीडीहेति प्रसिद्धे देवी सिंहा सन शिलायामुत्कीर्णमस्तीति।
तथैव तिलकेश्वरशिवमठे कर्मादित्य नाम्नैव कीर्ति शिलायामुत्कीर्ण मास्ति॥
विद्यापतिक पूर्वज मिथिला राज्यक प्रशासनमे सक्रिय भाग लैत छलथिन्ह जकर प्रमाण हमरा लोकनि निम्नलिखित प्रशासनिक शब्दावलीसँ भेटैत अछि। एहिसँ मिथिलाक प्रशासनक विभिन्न विभागक ज्ञान सेहो होइत अछि।
प्रशासनिक शब्दावलीक सूची:-
i) सान्धि विग्रहिक,
ii) राजवल्लभ,
iii) पाण्डागारिक,
iv) महावार्तिक नैबन्धिक,
v) महामत्तक,
vi) महामत्तक सान्धिविग्रहिक (चण्डेश्वर),
vii) भाण्डागारिक,
viii) स्थानांतरिक,
ix) मुद्राहस्तक,
x) राजपण्डित,
xi) सुमंत्रिण –
परिशिष्ट – 4
शिवसिंह द्वारा विद्यापतिकेँ देल गेल ताम्रपत्रक प्रतिलिपि:-
- स्वस्ति। गजरथेत्यादि – समस्त प्रक्रिया विराजमान श्रीमद्रामेश्वरी वरलब्ध प्रसाद – भवानी भवभक्ति भावन परायण – रूपनारायण महाराजाधिराज – श्री माधव सिंह देवपादाः समर विजयिनः जरैल तप्पायां विसपीग्रामवास्तव्य सकल लोकान् भूकर्ष काँञ्च समादिशांति – मतमस्तु यवनां ग्रामोऽयम स्माभिः सप्त क्रियाभिनव जयदेव महाराज पण्डित ठक्कुर-
श्री विद्या पतिभ्यः शासनीकृत्य प्रदतोऽतोयूयमेतेषां वचन करीयभूय कर्षणादिकं करिष्यथेति लसं २९३ श्रावणशुद्धि सप्तम्यांगुरौ। श्लोकास्तु –
अब्दे लक्ष्मण सेन भूपति मते वह्नि(३) ग्रह(९) द्वय(२) ङ्किते।
मासिश्रावण संग़्य़केँ मुनि तिथौपक्षेऽवलक्षे गुरौ॥
वाग्वत्याः सरितस्तहे गजरथेत्याख्याप्रसिद्देपुरे।
दित्सोत्साहविवृद्दबाहुपुलकः सभ्यायमध्येसभम्॥१॥
प्रज्ञावान् प्रचुरोर्वरंपृथुतराभोगं नदी मातृकं
सारण्यं ससरोवरंच विसपीनामानमासीमतः।
श्री विद्यापतिशर्मणे सुकवये वाणीरसास्वाद विद्
वीरः श्री शिवसिंह देव नृपतिर्ग्रामं ददेशासनम्॥२॥
येन साहस मयेन शास्त्रिणातुङ्गवाहवर पृष्ठवर्तिना।
अश्वपतिबलयोर्बलं जितं गज्जनाधिपतिगौऽभूजाम्॥३॥
रौप्य कुंभ इव कज्जल रेखा स्वेत पद्म इव शैवल वल्ली।
यस्यकीर्तितवकेतककांत्या मतानिमेतिविजितो हरिणाङ्क॥४॥
द्विषन्नृपति वाहिनी रूधिर वाहिनी कोटिभिः।
प्रतापतरूवृद्दये समरमेदिनी प्लाविता॥
समस्त हरिदङ्गना थिकुरपाशवासः क्षमं।
सितप्रणवपाण्डरं जगतियेन लब्धं यशः॥५॥
मतङ्गजरथप्रदः कनकदान कल्पद्रुम
स्तुलापुरूषमद्भुतं निजधनैः पितादाइतः।
अवानिच महात्मना जगतियेन भूमिभुजा
परापरपयोनिधि प्रथम मैत्र पात्रं सरः॥६॥
नरपतिउलमान्यः कर्णशिक्षावदान्यः
परिचित परमार्थो दानतुष्टार्थिसार्थः।
निजचरितपवित्रोदेक सिंहस्य पुत्रः
सजयति शिवसिंहो वैरिनागेन्द्र सिंहः॥७॥
ग्रामेगृहणंत्यमुष्मिन् किमपिनृपतयोहिन्दवोऽन्ये तुरूष्का
गोकोलम्वात्म मांसैः सहितमनुदिनं भुज्यतेते स्वधर्मम्।
येचैनं ग्रामरत्नं नृपकर रहितं पालयंति प्रतापै–
स्तेषां सत्कीर्ति गाथा दिशि दिशि सुचरंगीयतां वन्दिवृन्दै॥८॥
लसं २९३ शाके १३२४ शिवसिंह राजा भेलाह। चारि मीमाँसाक बाद विद्यापतिकेँ विस्फी ग्राम दानक ताम्रपत्र देलन्हि।
१३२६मे हरसिंह देव तिरहूत छोड़ि नेपालक जंगलमे गेलाह। भाला परगन्नामे उमगाममे गुप्त रहबाक हेतु एकटा प्रसिद्ध किला छल। कामेश्वर पण्डितकेँ बादशाहसँ राज्य भेटलन्हि मुदा सिद्धपुरूष होएबाक कारणे ओ अंगीकार नञ केलन्हि। फिरोजशाह भोगीश्वरकेँ राज देलन्हि। भोगीश्वरसँ भवसिंह राज्य बटलन्हि। १३६०मे भोगीश्वर मरि गेलाह आर गणेश्वर राजा भेलाह। गणेश्वरकेँ भवसिंहक पौत्र (त्रिपुर सिंहक पुत्र) मारि देलकन्हि। हर्षण ठाकुरक पौत्र रत्नाकरक हाथ सेहो एहिमे छल। गणेश्वरक पुत्र वीरसिंह आर कीर्तिसिंह दिल्ली पहुँचलाह आर बादशाहक मदतिसँ कीर्तिसिंह राजा भेलाह। अर्जुन पुरादित्य द्रोणवारक हाथे मारल गेलाह।
शिव सिंह १५वर्षक अवस्थामे पिताक जीवतहि राजा भेला। देवसिंह देवकुली बसौलन्हि (दरभंगाक चटरीसँ सबाकोस दक्षिण)। शिवसिंहपुर (गजरथपुर)क स्थापना शिवसिंह करौलन्हि। देवसिंहक बाद शिवसिंह तीन वर्ष नौ मास राज्य केलन्हि। एकवेर पकड़ाकेँ दिल्ली गेल छलाह। अंतमे यवनसँ पराभूत भए उत्तर पहाड़मे चलि गेलाह। विद्यापति लखिमाकेँ लऽ कए द्रोणवार पुरादित्यक ओतए रहे लगलाह। शिवसिंहक मंत्री चन्द्रकरक पुत्र अमृतकर पटना जाए बादशाहसँ अभयदान लऽ कए बछौरमे पद्मामे रहए लगलाह। लखिमा १२वर्षक बाद सती भेलीहे तकर बाद एक वर्ष पद्मसिंह राज्य केलन्हि आर तकर बाद पद्मसिंहक रानी विश्वास देवी १२वर्ष धरि। भाला परगन्नामे बिसौली गाम विश्वास देवीक नामपर अछि। ***विश्वास देवीक बाद धीर सिंह प्रसिद्ध हृदयनारायण तत्पर राजा भैरव सिंह हरिनारायण–मिथिलामे १४००मीमाँसक जमघट भेल छल–भैरवसिंहक पुत्र हरिनारायण (?)–भैरवसिंह बछौर परगन्नामे वरूआर नामक गाममे अपन राजधानी बनौलन्हि–
परिशिष्ट–५
राजा संग्राम गुप्त देवक पंचोभ अभिलेख
(मुल हमर ‘सिलेक्ट इन्स क्रियसिन आफ बिहार’मे प्रकाशित अछि।)
लहेरियासरायक समीप पंचोभ ग्रामसँ एकटा ताम्रलेख बहुत दिन पूर्वहि बाहर भेल छल जे मिथिलाक इतिहासक दृष्टिकोणसँ महत्वपूर्ण कहल जा सकइयै। एहि अभिलेखमे तिथि नहि अछि परञ्च लिपिक आधारपर एकरा १३म शताब्दीमे राखल जा सकइयै। ई अभिलेख माण्डलिक राजा संग्राम गुप्तक थिक। एहिमे निम्नलिखित ६राजाक उल्लेख अछि–
i) यज्ञेश गुप्त, संभव जे ई लोकनि उत्तर गुप्त वंशसँ सम्बन्धित होथि।
ii) दामोदर गुप्त,
iii) देवगुप्त,
iv) राजदित्य गुप्त,
v) कृष्णगुप्त,
vi) संग्रामगुप्त।
एहिमे उपर्युक्त मात्र तीनटाकेँ राजा कहल गेल छैक। संग्राम गुप्त स्वयं “परमभट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर महामाण्डलिक” आदि पदवीसँ विभूषित छथि। ई सभ कोनो सोमवंशी अर्जुनक वंशज कहल गेल छथि। भऽ सकैत अछि जे ई सम्राट हर्षवर्द्धनक राज्यपाल अर्जुन (जे तिरहूतक राज्यपाल छलाह)क वंशज होथि। किछु इतिहासकार एहिमे वर्णित स्थानक मिलान मूंगेर जिलाक जयनगरसँ करैत छथि जे हमरा बुझने अस्वाभाविक अछि आर एहि वंशकेँ पाल अथवा सेनवंशक सामंत माण्डलिक सिद्ध करबाक चेष्टा करैत छथि। ई निर्णय तथ्यपूर्ण नहि बुझना जाइत अछि कारण ताहि दिनमे मिथिलामे कर्णाट वंशक शासन सर्वशक्तिमान छल। दरभंगा (आव मधुबनी जिला)मे सेहो जयनगर नामक एकटा प्रसिद्ध ऐतिहासिक स्थान अछि। हमरा बुझने संग्राम देव अवश्ये एहिठाम कर्णाट वंशक महामाण्डलिक रहल होएताह आर पञ्जी प्रबन्धक पहिने ई ताम्र पत्र प्रकाशित भेल होएत कारण एहुमे कोलाञ्च ब्राह्मणकेँ दान देबाक व्यवस्था देखबामे अवइयै। प्रशासनिक शब्दावलीक दृष्टिये सेहो ई अभिलेख महत्वपूर्ण मानल जाइत अछि। प्रशासनिक शब्दावलीक सूची हम मिथिलाक प्रशासनिक इतिहासक क्रममे लिखि चुकल छी तैं एहिठाम दोहराएब उचित नहि बुझना जाइत अछि। संग्राम गुप्तक सम्बन्ध जे मंतव्य पहिलुक विद्वान लोकनि देने छथि से हमरा मान्य नहि अछि आर हमर अपन विचार ई अछि आर हमर अपन विचार ई अछि जे ई लोकनि मिथिलाक छलाह आर एहिठामक कोनो शासकक महामाण्डलिक रहल हेताह।
परिशिष्ट–७
मिथिलासँ प्राप्त किछु हिन्दू आर मुस्लिम अभिलेख
(१) अशोकक पंचम स्तंभलेख (रमपुरवा : चम्पारण)
१ देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आह। सङ्गवीसति साभि सितेनमे इमानि पि जातानि अवध्यानिकयानि। सेयथ २ सुके सालिक अलुने चकवाके। हँसे नंदीमुखे गेलाहे जतूक अंबाक पिलिक दुग्ले अनठिक मछे वेदवेयके ३ गंगा पुपुटकेँ संकुज मछे कफट सेयके पंन–ससे सिमले संडके ओक पिंडे पलसते सेन कपोते ४ गाम कपोते सबे चतुपदे ये पटिभोगं नो एतिन च खादयाति। अजका नानि एलका च सूकली च गभिनीव ५–पाय–मीना व अवध्य पोतके च कानि आसं मासिके। विधि कुकुटे नो कट विये। तुसे सजी वेनी झापयति विये। ६ दाबे अनठाये व विहिसाये व नो झापयितविये। जीवेन जीवे नो पुसितविये। तीसू चातुं मासु तिस्यं पुनंमासियं ७ तिनि–दिवसानि चस्वुदसं पंनडसं पटिपदं धुवाये च अनुपोसथं मछे अवध्ये नोपि विकेतविये। एतानि येव ८ दिवसानि नागं वनसि केवट भोगसि यानि अंनानिपि जीवनिका यानि नोहं तवियानि। अठमि पखाये चावु दसाये ९ पंतऽसाय तिसा ये पुनावसुने तीसु चातुं मासीसु सुदिवसाये गोने नो निलाखेतविये। अजके एलके सूकले १० एवापि अंने नील्वखियति नो नीलखित विये। तिसाय पुना वसुने चातुं मास–प्रखाय अस्वस गोनस ११ लखने नो कट विये। याव सङ्कवीसति वसाभि सितेनमे एताये अंतलिकाये पंन वीसति बन्धन मोखानि कयनि।
(२) अशोकक षष्ठम स्तम्भ लेख (रमपुरवा : चम्पारण)
१ देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आह। दुवाऽस वसाभि–सितेन मेघंमलिपि लिखापित लोकस हित सुखाये। से तं अपहट २ तं धंम बढ़ि पापोव। हेवं लोकस हित सुखे ति पटिवेखामि अथ इयं नातिसु हेवं पत्या–संनेसु हेवं अपक ठेसु। किमं कानि ३ सुखं आव हामी ति तथा च विदहामि। हेमेव सर्वकायेषु पटिवेखानिं। सर्वपासंग पिमे पूजित विवधाय पूजाय। ए चुइयं। ४ अतन पचूप गमने से मे मोख्यमुते। सङ्कवीस वसाभि सितेनमे इयं धंम लिपि लिखापिति।
(३) वैशालीसँ प्राप्त किछु महत्वपूर्ण शिलालेख
१ ध्रुवस्वामिनीक मुद्रा अभिलेखे महाराजाधिराज श्री चन्द्रगुप्त पत्नी श्री गोविन्द गुप्त माता श्री ध्रुवस्वामिनी (एहिपर शीघ्रहि हमर लेख प्रकाशित भए रहल अछि।) २ घटोत्कच गुप्तस्य।
(४) संघ श्रेणी एवं राजकर्मचारी लोकनिक मुद्रा लेख
१ कुमारामात्याधिकरणत्य। २ युवराजपादीय कुमारामात्याधिकरण। ३ श्रेष्ठिसार्थवाहकुलिकनिगम। ४ श्रीयुवराजभट्टारापादीय कुमाराअधिकरणस्य ५ श्रीपरमभट्टारकपादीय कुमारामात्याधिकरण। ६ युवराजभट्टारकपादीय......काधिकरणस्य ७ युवराजभट्टारकपादीय बालाधिकरणस्य ८ श्रीरणभाण्डागाराधिकरणस्य ९ दण्डपाशाधिकरणॅस्य १० महाप्रतिहार तरवर विनयशूरस्य ११ महादण्डनायक अग्निगुप्तस्य १२ भट्टास्वपति यज्ञवत्सस्य १३ तीरभुक्त्यौ परिकाधिकरणस्य १४ तीरभुक्तौ विनयस्थितिस्थापकाधिकरणस्य १५ तीर कुमारामात्याधिकरणस्य १६ उदानकूपे परिषदः १७ वैशाल्याधिष्ठानाधिकरण १८ वैशाल्यामरप्रकृतिकुटुम्बिनाम् १९ वैशाल विषयाः २० श्रेष्ठकुलिकनिगम् २१ वैशाली अनुटकारे सम्यानक २२ सुजातर्षस् २३ आम्रात्केश्वर २४ श्रीविष्णुपाद स्वामीनारायण २५ जयत्यानंतो अभवान साम्बा २६ जिलं भगवतोनंतस्यनन्देश्वरी वरस्वामिनः २७ नमः पशुपतेः २८ रविदास २९ भगवतादितस्य ३० राज्ञोमहाक्षत्रपस्य स्वामीरूद्रासिंहस्य दुहितु राज्ञोमहाक्षत्रपस्य स्वामीरूद्रसेनस्य भगिन्या महोदेव्यां प्रभुदमायाः।
३१ देयधमोयम् प्रवर महायानायिनः करणिक उच्छाह माणकस्य सुतस्य यदत्रपुण्यं तद्भवत्व चर्योपाध्याय मातापित्रोरात्मनश्च पूर्वगमं कृत्वा सकल सत्वरासे रनुत्तर्ज्ञानावाप्रयैति।
३२ कुमारामात्याधिकरणश्च सर्व्वंग विषये ब्राह्मणाद्यपुरस्सरान् वर्त्तमानांभविनश्च्य श्रीसामंत......विषयपतिंसाधिकरणान्......व्यवहारी जनपादान बोधयत्यस्तु ओ विदितम्।
३४ श्री लोकनाथस्य
३५ ल.स. २३६ शोधरवाली श्री चण्डेश्वरस्य कीर्ति–
एहिमे लक्ष्मण सम्वत् देल अछि ताहि आधारपर एकरा महाम्त्तक चण्डेश्वरक अभिलेख मानि सकै छी।
५किछु दिन पूर्व मुजफ्फरपुर जिलांतर्गत कटरा थानासँ पाँचम छठम शताब्दीक एकटा ताम्रलेख भेटल अछि जे गुप्तकालीन थीक आओर जाहिमे तीरभुक्तिक उल्लेखक संगहि संग चामुण्डा विषयक उल्लेख सेहो अछि। ई अभिलेख आओर चम्पारणसँ प्राप्त तीन चारिटा ताम्रलेख अप्रकाशित अछि आओर चम्पारणसँ प्राप्त तीन चारिटा ताम्रलेख अप्रकाशित अछि आओर ई पटना प्रमण्डलक विद्वान आयुक्त श्री श्रीधर वासुदेवसोहनीक संग छन्हि। आशा अछि ज ओ शीघ्रे एहि सभ अभिलेखकेँ प्रकाशित करौताह।-आब ई ताम्रलेख एफिगेआफिताशण्डिकाक वाल्युम ३५मे प्रकाशित भऽ चुकल अछि। ओहिठाम मोतिहारीसँ प्राप्त दूटा आर अभिलेख प्रकाशित अछि।
६ गुप्तकालीन एकटा मुद्रा (माटिक) हमरा बेगूसरायमे प्राप्त भेल छल जाहिमे एकपीठपर गुप्ताक्षरमे लेख अछि आओर दोसर पीठपर मिथिलाक्षरमे आओर लं.सं.क उल्लेख सेहो अछि। (मुद्राक गुप्ताक्षर वाला लेख) सुहमाकस्य–सुहमाकस्य (मिथिलाक्षर वाला लेख) सं. ६७द्यौ पौशदिने नगम केदत्तम् दूभम् शाध्येच्यैकेः केशवपदे इति–ई मुद्रा हमरा लग अछि।
एकर अतिरिक्त बुद्धमंत्र–ये धम्महेतु प्रभवा......आदि लिखल ढ़ेरक ढ़ेर मूर्त्ति मिथिलामे भेटइत अछि।
८ पालकालीन मिथिलाक शिलालेख
(i) भागलपुर कौपरप्लेटमे तीरभुक्ति आओर कक्ष (विषयक उल्लेख अछि आओर ओहिमे कहल गेल अछि जे तीरभुक्तिमे हजार शिवमन्दिरक निर्माण भेल छल, (ii) इमाद (मुजफ्फरपुर जिलासँ पाप्त) अभिलेख। महिपाल प्रथमक अभिलेख ॐ श्रीमान महिपाल देव राजसम् ४८ ज्येष्ठ दिने सुकलपक्षे २ आलै चकोऽरि माहवसुत साहि देवधर्म्म, (iii) वनगाँव (सहरसा)सँ प्राप्त विग्रहपाल तृतीयक ताम्र अभिलेख:, ई सभटा अभिलेख हमर ‘सेलक्ट इ.सक्रिय सनस आफ बिहार’मे छपल अछि।
(पाँति २४): काञ्चनपुर समावासीता श्रीमञ्जय स्कन्ध वारात परम सौगतो महाराजाधिराज श्रीमन्नयपालदेव पादानुध्यातः परमेश्वरः परम भट्टारको २५: महाराजाधिराजः श्रीविग्रहपाल देवः कुशली। तीरभुक्तौ हौद्रेय वैषयिक वसुकावर्त्तात। यथोप्तत्या पंचशत्ति कांशे। २६: समुपगता शेष....३७ शाण्डिल संगोत्राय। ३८ शाण्डिल्यासित देवल प्रवराय नरसिंहसँ ब्रह्मचारिणे। छन्दोग्य शाखाध्यायिने। मीमाँसा व्याकरण तर्क विद्याविदे। ३९ कोलाञ्च विर्निगताय। इट्टाहाक वास्तव्याया योग स्वामी पौत्राय। तुंग पुत्राय। श्री घण्टुक शर्मणे। विषुवत स%कांत्याम्। विधिवत्। गं। ४० गायाम् स्नात्वा शासनी कृत्य प्रदत्तास्माभिः।
(iv) नौलागढ़ (बेगूसराय)सँ प्राप्त विग्रहपाल तृतीयक सिद्धम्
श्री विग्रहपाल देव राज्ये सम्वत् २४ क्रिमिलिया शौण्डिक महामती दुहित्रा धाम्मजिपल्या आशोककया कारिता॥
(v) नौलागढ़सँ प्राप्त दोसर अभिलेख
नमोधर्माय......श्रद्धा कारूण्य संभेदरदान मस्तुम माये पुण्यधारां। भिक्षा भुजामित्यमायधतुमक्ष। वाट (वदि)...आश्रय भान्वत। यद वध (च) स्वाहा (or श्रद्धा) क्रौद्विचिंता....भा..वमद...दमल व्यबस्थिताह....श्रद्धाया भाव (च)...यद् गृहादि (धै)....याद दक....बिहार...एहि अभिलेखसँ संदिग्ध रूपें ई बुझना जाइत अछि जे पालकालमे मिथिलामे नौलागढ़ अंचलमे कोनो एकटा बौद्ध बिहार अवश्य छल।
अन्यान्य अभिलेख
पंचोभ ताम्रलेखक किछु अंश
पांति १–श्री संग्रामगुप्तः २–ॐ स्वस्तिः परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर, परममाहेश्वर, वृषध्वज, सोमांवयज्ञार्जुन वंशोन्न जयपुर ३–परमेश्वर महामाण्डलिक श्रीराजादित्य गुप्तदेव पादानुध्यात राजपुत श्रीकृष्णगुप्त सुत परमभट्टारक महाराजाधिराज ४–परमेश्वर परममाहेश्वर व्रषध्वज सोमान्वयजार्ज्जुन वंशोद्भव जयपुर परमेश्वर महामाण्डलिक श्रीमत् संग्रामगुप्त देवपाद प्रवर्द्धमान विजयराज्ये ५–सप्तदश सम्वत्सरे कार्तिक कृष्ण नवभ्यां तिथौ श्री मज्जयस्कन्धवारात् अयदेव महाराजाधिराज महामाण्डलिक श्रीमत् संग्रामगुप्त देवोविजयी....
६–७–महासान्धिविग्रहिक, महाव्यूहपति महाधिकारिक, महामुद्राधिकारिक महामत्तक, महापीलुपति, महासाधनिक, महाक्षपटलिंक, महाप्रतिहार, महाधर्माधिकरणिक, महाकरणाध्यक्ष, ८–वार्त्तिनैबन्धिक, महाकटुक, महौत्थिक, तासनिक, महादण्डनायक, महादानिक, महापंचकुलिक, महासामंतराणक, महाश्रेष्ठिदानिक्, धूलिदानिक, घट्टपाल, खण्डपाल, नरपति, गुल्मपति, ९–नौ बलव्यापृत गोमहिषवड़बाध्यक्ष १०राजपादोपजीविनी......११-............समस्तपीड़ोपकर वर्ज्जितो अचाटभट प्रवेषो महतानुग्रहेण
एहि अभिलेखमे शासन सम्बन्धी बहुतो एहेन शब्दक उल्लेख भेल अछि जकर विश्लेषण एखनो धरि फरिछाकेँ नहि भेल अछि। ई सभ अभिलेख हमर Selected Inscription Of Bihar मे प्रकाशित अछि।
आसीक (महिआहीक) पाथर–लेख
जातो वंशे विल्व पंचाभिघाने धमाध्यक्षो वर्द्धमान भवेशात्। देवा–स्याग्रे देवयष्टि ध्वजाग्रा रूढ़ँ कृत्वाऽस्थाप्य द्वैन तेयम्।
एहिमे नैयायिक वर्द्धमानक उल्लेख भेल अछि।
तिलकेश्वरगढ़क अभिलेख
अब्देनेत्र शशांकपक्ष गणिते श्री लक्ष्मणाक्ष्मपतेर्मासि श्रावण संज्ञकेँ मुनि तिथौ स्वात्यांगुरुउशोभने। हावीपतन संज्ञकेँ सुबिदिते हैहट्टदेवी शिवा कर्मादित्य सुमंत्रिणेह विहिता सौभाग्य देव्याज्ञा–
एहि अभिलेखमे रानी सौभाग्य देवी, मंत्री कर्मादित्यक उल्लेख संगहि हैहट्ट भगवतीक उल्लेख सेहो भेल अछि।
खोजपुरक अभिलेख
एक महत्वपूर्ण अभिलेख खोजपुरक दुर्गाक मूर्त्तिपर अछि जाहिमे ल.–स. १४७क उल्लेख भेल अछि आओर मदनकपुत्र सूर्यकरक नाम सेहो उल्लिखित अछि।
कन्दाहाक अभिलेख
कन्दाहा अभिलेखक उल्लेख पूर्वहि राजनैतिक इतिहासमे भए चुकल अछि। स्मरणीय अछि जे एहि अभिलेखमे ‘विल्वपंचकुलोद्भुत्’ शब्द व्यवहृत अछि जे वर्द्धमानक आसीक अभिलेखमे अछि।
भगीरथपुरक अभिलेख
पांति १–स्नुषाहरिनारायण क्षितिपतेर्ग्गतेः क्ष्माभृतां बधून्नृ पतिमण्डली। महितराम भूमीपतेः २–द्विजोत्तम सुखप्रदानृपति कंसनारायण प्रवीरजननीमुदा मठमधीकरत सुन्दरम्। ३–दानैर्य्या दलयाम्बभूवँ जगतां दारिद्रं यमत्युत्कटं कीर्त्यायाः सुन्दर तरान् लोकांश्चकारायुतान। ४–किञ्चोच्चैर्व्विनयान्नयाश्च वशतां नीतोयया बान्धवाः सेयं विश्वविलक्षणोज्जवल गुणग्रामा मठं निर्ममे। ५–वेद रन्ध्रहरनेत्र चिन्हते लक्ष्मणस्य नृपतेर्म्म तेब्दके। विश्वविश्रु तगुणागुणालयं देवतालय मर्मुमुदाऽकरोत।
६- कविता माधव सुकवे: कीतिदेव्याल: सुघाम्बुवधि स्फीनता। त्रिभुवन भुवना-भोगे विलसुत कल्पातन्तयपर्यन्तबम्।। ७-देवीदेवलयमियममु कारयामास कृच्छेत भक्या्रु नक्त् दिनमथमति क्ता यैषांशेषे जगति गजीनाथ नायस्थभ योषा भूषा भ्रू ता विविकोविधया रुपनारायरास्य् । ८- धन्वा का कीर्तिरस्याी कुलधर कविता कीर्तनीयानुम3त्याष लक्ष्मीथ: सा कापि लक्ष्मी धरमुपगता साधवारधनाया। सूनुज्जिययान् यदीयो यवनपयिभयाधाकस्तीारभुक्तौ राजाराधिराज; समर:’’स: कंसनारारौ सौ’’’’ श्रीमदनुमतिदबी नाकज्ञया:-मिथिलाक राजनैतिक एवं सांस्कृयतिक इतिहासक दृष्टिकोरासँ ई अभिलेकख बड्ड महत्विपूर्णा अछि।
• श्रीनगर (मघेपुरा) क अभिलेख
• मगरध्वरज योगी १०० इयह अभिलेख एकटा अन्धतराठाड़ीमेसेहो अछि।
• वरांटपुर (सहरसा) क अभिलेख
• श्रीमन्माृहेश्वृरी वरलब्ध सत्क्रिया दविराजमान बुद्धेश वंशस्य सदा चन्द्र राजद श्रीमत् सर्व्विसिंहदेव विजयी
• लदहोद विषणुमूर्त्तिक पादुका लेख
• (एखनधरि अप्रकाशित छल) श्रीरामनाथ राजन्यी् विष्णु :सेवक सेवक: स्वररेर देव तलयो विष्णुहर्नाम करिष्यसति।
• मिथिलामे एखनो असंख्य लेख सब चारुकात छिडि़आएल पड़ल अछि तैँ प्रत्येंक मैथिलक ई कर्तव्य‍ होइछ जे ओ लोकनि एहिदिसि ध्या न दुए ओकर संग्रह करथि। जे शिलालेख सब राजनैतिक इतिहासवाला खण्डंमे छपि चुकल छल से एहिठाम नहि देल गेल अछि।
• २० मिथिलासँ प्राप्तओ किछु मुस्लिम-अभिलेख
• (i) महेशवरा (बेगूसराय) सँ प्राप्तत १२६१ ईo एकटा अरबी शिला लेख १६५५ मे प्राप्तम भेल जे भण्डा रकर शोघसंस्थाृन (२६४६) मे प्रकशित भेल अछि। एहिमे भवन बनेबाक उल्लेाख अछि। ई लेख बंगाल सुलतान रुकबुद्दीन कैकाउसक समय थीक। (ii) तुगलककालीन वेदीवन (चम्पाेरणा) अभिलेख २ तमास शुद इन हलकात-उल-अक्तादव-उल अकवर दर २ अहाद इसहान शाह-इ-आदिल शाह मुहम्मिद ३ बिन तुग- लक शाह लजलामुकोहुब दौलतहु ४ अनाम बजैल इज्जु द दौलत वद्दीन ५ काजी-इ-मुहर खासब जिकरुल्लाह बकर ६ वोएन वन्दा।ह महमुद विनुयुसुफ अलमुलकावा ९ विष्टुजम मह-इ- रबिउल अब्वजल सनत सब ब अरबीनव दसब मयत-वेदीवन अभिलेख बड्ड महत्व पूर्णा अछि। हिन्दूल लोकनि बहुत दिनधरि। एकरा भावानक चरणापाद’ कहि पूजा करइत रहथि। ई शिलालेख महमुद तुगलक कालक थीक (हिजरी १४६ = २३४६ ईo) एहिसँ निश्रिचत रुप ई प्रतीत होइछ जे २३४६ मे चम्पाईरणा धरि शासनक प्रमाणा भेटइयै।
• दरभंगासँ प्राप्तट मुहम्महद तुगलकक अभिलेख
• कल्लाह ओतलमनजा विलहसनत फलहु अश्र अम्स लह बिन मस्जिद अलमुजाहिद फी साबीलिल्लाह मुहम्मनद बिन अस-सुल्ला्न अस सइद इस शहीद गाजी गियासुद्दनिया वद्दीन दअनरुल्लाह बुरहानहु इज सोयलत अन तारिख-ई-बेन एही फकुल हवाल मस्जिद अल अक्सन फिसानत इ सित व इशरीन बसबा अल हिजारिया उन नबुब: १२६-ई अभिलेख मुल्ला तकियाक बयाज मे सुरक्षित अछि आओर पटनाक मासिर पत्रिका मे छपल छल (२६४६ ईo मे )। अभिलेख सँ ई प्रतीत होइछ जे महम्मुद तुगलकक आदेशानुसार दरभंगा मे एकटा विशाल मस्जिद हिजरी १२६ मे बनल छल। हरिसिंहदेव पराजित भए चुकल छलाह। तुगलक-कालीन दूटा सिक्का सेहो भेटल अछि जीहिमर तुगलकपुर उर्फ तिरहुत लिखल अछि।
• रभंगासँ प्राप्तट इब्राहिमशाह शार्कीक अभिलेख
• कलन नबिया सल्लाटलाटु अलैहावसल्लाम मन बिन मस्जिद अल्ला ह बिनल्लाह लहु वैतन फिल जत्रत ही विन हजल मस्जिद फी जमनल इसास नायव-उलखालीफा अमीरुल मुमीनीन अबुल फतह इब्राहिम शाह अस सुलतान खलदह खिलाफत तहु सनत खस व सभन मयत ५०४-ई अभिलेख बहुत महत्वुपूर्णा अछि कारणा (१०५-२४०२-३) इब्राहिमशाहक लेख मिथिलाक केन्द्र मे भेअल अछि आओर एहिसँ प्रर्मा-रित होइछ जे शर्की लोकनि दरभंगापर अधिकार प्राप्त कएने छलाह-ओहि वर्ष दरभंगा बा‍टे इब्राहिमशाह बंगाल जाइत छलाह आओर हुनक उद्देश्य छल शिवसिहकेँ परास्तर करब कारणा शिवसिंह बंगालक राजा गणोशक साहाय्य कए रहल छलथिन्हा। एहि सम्ब्न्धयमे प्रोo अस्कबरीक लेख Bengal Past and Present मे छपल अछि।
• बंगाल सुलतान नसीर शाहक अभिलेख
• (वेगूसराय-महिहानीस प्राप्तय)
• बिसमिल्लाह इर रहमान रहिम नसरुत मोनल्लाह वद फथुन करीब। हजल मस्जिद अल जमायउल मुअज्ज म नसीरशाह अस सुलतान खल्ल दल्लह वो मुलकहु व सलन्तहहु।
• -इ ओहि नसीरशाहक अभिलेख थीक जे मिथिलाक ओइनवार वंशक अन्तिम शासकककेँ पराजित कएने छलाह।
• इहो अभिलेख आव’’ परसियन आ अरोबक इन्स क्रिय आक विहार’’ मे छलल अछि।
• परिशिष्टे
• १२३४-३६ ईo क मध्यर तिव्वकतसँ एक यात्री आएल छलाह जनिक भारतीय नाम धर्मस्वाामी छलन्हि। ओ तिरहुतमे कर्णाअ राजा रामसिंहदेव सँ भेंट कएने छलाह आओर रामसिंहदेवकालीन मिथिलाक बहुत सुन्दयर वर्णन एहिमे अछि। ‘धर्मस्वावमीक जीवनी’ क सम्पारदन प्रसिद्ध प्रसिद्ध रूसी विद्वान डाo जीo रोयरिक कयने छथि आओर एकर प्रकाशन पटनास्थित काशी प्रसाद जायसवाल शोध संस्थाानसँ प्रकाशति भेल अछि1 हमओहि पोथीमेसँ किछु ओहन अंश एहिठाम दए रहल छी जाहिसूं तत्कारलीन मिथिलापर प्रकाश पड़ैछ:
• P. 58.- In This Country (Tihut) there was a town called PA.-TA, which had some 600,000 houses and was surrounded by severn palace which had eleven large gates and was surrounded by twentyone ditches filled with water and rows of trees. There were threee gates facing each direction, East, West and south, and two gates facing North……… guards were stationed more than ten archers at each hridge. These protective measures were due to the fear of the Turushkas…….who during the year had led an army but failed to reach it. It was also said that there were three men experts in swordsmanship. The Raja owned a she-elephent. P. 6 – Ma-hes ( महिंसक उललेख) –non-Budddhist kingdom of Tirhut. P. 61-uninhabited border of Vai Sali. There exists a miraculous stone image of the Arya Tara with her head and body turned towards the left, foot placed flat, and the right foot turned side ways the right head I the varmaudra and the left hand holding the symbol by the three Jewels in front of the heart…….they were told that the inhabitants were in a state of great commotion and panickstriken because of rumours of Turushka troops. P. 62- When they had reached the Vaisali, all the inhabitants had fled at dawn from fear of the Turushka soldiery ……. the soldiery left for western India P. k98 According to Dharmawami one pana equaled to eighty Cowries……At that time he was in possession of an extraordinary manuscript.
• P. 99-…. the owner of the house stole the book fell ill in Trihut (on his return Journey)- The tantric treated me-and I did not die….. The Tantric appears to have been a manifestation of the four. Armed Protector.
• P. 100 ……he was told the Raja or the Pata city was coming to the sheet corner, The Raja was accompanied by a crowd of drummers and dances with banners, buntings, brandisisng fans and sounding conches and various musical instruments All the house tops and street corners were ever hung with silk trappings. The Raja named Ramasimha was coming riding on a she eleophent, sitting on a throne a droped with precious stones and furnished with an ornamented curtain. The Dharmaswamin received an invitation from the Minisiter who said “ please come ! If you do not come to person the Raja will punish you. The Raja comes to the sheet corner only once a year, and there is a pagent. The minister sent a sedan chair (Doli) for the Dharamaswamin greeted the Raja I Sanskrit s’ lokas and the Raja was very much pleased and presented the Dharamswamin with some gold, a roll of cloth, numerous medicines, rice, and many excellent offerings and reguested the Dharamswamin to become his chaplain but the Dharamswamin replied that it was improper for him, a Buddhist, to become the Guru of a non-Buddhist. The Raja accepted it, and said “well stay here for some days” The Dharamswamin said that the Raja honourd him gathering of people in the town of PA-TA in Tirhut, the Dharamswamin met with some Nepalese whom he had met previously.
• एहि पोथी सँ मिथिलाक सांस्कृ तिक जीवन पर बड्ड प्रकाश पड़ैत अछि। एहि पोथी मे जे ‘वैवर्त लिपि’ क उल्लेsख अछि सैह आधुनिक मैथिली लिपि थीक।
• शिल्पकशास्त्र चिकित्साक; दशन, व्या करणा न्यालय मण्ड ल इत्यालदिक अध्यथयन ओहि युग मे होइत छल।
• कालिदास सम्बपन्धी् किंवदन्ती एहि पोथी मे अछि आओर चन्द्राकीर्ति आओर चन्द्र गोमिनाक शास्त्रािर्थक चर्चा सेहो पट-केँ डाoअल्तेशकर सिमराँवाढ़ मानने छथिजे हमरो मान्यप अछि। एहि आधार पर आब जँ ओतए उत्ख्नन होअए तँ बड्ड होएत।
• तिरहुत मैं तान्त्रिक चर्च अछि। एक चरिब्रहीन दवं हठी स्री्यपक उल्लेरख सेहो अछि।
• एहि सँ लक्ष्मनणासेन सम्वएत् सम्बहन्धीी अध्य यन मे साहाय्य भेटइत अछि। मिथिला मे कुसियारक खेती खूब होइत छल। काली मदिरक समक्ष बलिदानक प्रथा छल। छूआछुतक प्रथा छल आओर अछूत लोकनि अपन कान नहि छेदबइत छलाह। अछूत सँ देखला वा छूअल अत्र पैघ वर्णाक लोक नहि खाइत छलाह। पान खेबाक प्रथा छल आओर मैथिल लोकनि ताम्बुूल विन्याछस मे प्रवीणा छलाह। खुरचन डोकाक चून बनइत छल आओर ओहि मे कै प्रकार सुगन्धित मशाला। मिलाओल जाइत छल। भीजल कपड़ामे पान लगा केँ राखल जाइत छल। दाँत रंगकाक हेतु सुरलीक व्यरवहार होइत छल। टाकाक प्रचलन छल आओर एक पण ७० कौड़ोकबराबर होइत छल
• परिशिष्टह
• प्राकृतपैंगलम् मौलली
• मैथिली भाषा आओर साहित्यरक स्थाीन भारतीय मध्यो महत्वर-पूर्ण छैक। कलकत्ताक मैथिली संघ द्वारा प्रकाशित विद्मापति-पर्वअंक क २६६२ क अ क मे हमर एक निवन्धव प्रकाशित भेल अछि: प्राक् विद्मापति कालीन मैथिली । जाहि मे हम मैथिलीक प्राचीनता पर अपन विचार संक्षेप मे रखने छी तैं ओकरा एतए दोहराएब उचित नहि बुझना जाइत अछि मैथिली लिपिक प्राचीनक सबसँ पैघ प्रमारण इएह जे ‘ललित विस्ततर मे एकर उल्लेउख अछि; आदित्यलसेन (सातम शताब्दा) अभिलेख एहि लिपि मे अछि, धर्मरवामीन एकर उल्लेकख वैवर्त लिपिक नामे कएने छथि; लo सo ६६ क एक माटिक मुद्रा पर मिथिलाक्षर लिखल भेटल अछि; खोजपुर (दरभंगा) सँ लo संo २४७ क-एकर अतिरिक्त मिथिला सँ जतेक दिभि लेख ओओर सिक्काक लेख भेटल अछि सब मैथिली लिपि मे अछि-तैँ एकर वैज्ञानिक आध्यानक आवश्यिकता मित्रवर आचार्य परमानन्द शास्त्रीओर मैथिली लिपिक वैज्ञानिक अध्य यन मिथिलामिहिरक पृष्ठभक परमानन्द शास्त्रीक मैथिली लिपिक वैज्ञानिक अध्यआयन मिथिलामिहिक पृष्ठ्क माध्य‍म सँ प्रस्तुित कएनेँ छथि जे स्तुलत्यठ अछि। अकबरकालीन मिथिलाक्षरक एक अभिलेख एखनहालहिमे गोड्डा (संताल परगना) क एक मन्दिरसँ प्राप्तष भेल अछि अओर ओकर प्रतिलिपि काशीप्रसाद जायवाल संस्थािन, पटना मे सुरिक्षत अछि।
• लिपिक संगहि मैथिली भाषा सेहो बड्ड प्रचीन अछि आओर सिद्ध लोकनिक भाषा एकर सबसँ पैघ प्रमारण थीक। तिब्बाती बौद्धधर्मक प्रसिद्ध रूसी विद्वान वसिलज्युअ (Wassilijeu) अपन एक लेखमे एकठाम लिखने छथि जे सिद्ध कवि लोकनि अपन-अपन मातृभाषामे गीत लिखने छलाह। साहित्यस निश्चित रुपेँ ज्यो(तिरीश्वपरक काव्यम अथवा वर्णरत्नािकर सन् महान् ग्रन्थ क रचना तँ हठात् नहिए भए गेल। डाo जयकान्ति मिश्रक History of Maithili literature क प्रथम भागमे बहुतो एहेन विद्वान अओर अंग थीक। हमरा विश्वा।स अछि जे ओ अपन भविष्य्क संस्कHरणामे एहि सबहक अपना पोथीमे अवश्य स्थाबन देथिन्हन। ‘प्राकृत-पैंगलम्’ क उल्लेिख डाo मिश्र कतहु नहि कएने छथि आर ने कष्ण दत्त मैथिलक। (कृष्णपदत्त मैथिल पर देखु हमर लेख जे Journal of the Bihar Research Society मे छपल अछि। बंगला भाषाक सुप्रसिद्ध विद्वान अओर प्रसिद्ध भाषा विद्वान डाo श्रीकुमार बनर्जी History of Maithili Literature क आलोचना करैत सेहो अइ-कमीक उल्ले ख कएने छथि (द्रष्टतव्यश Jouranl of the Asiatic Society of Bengal XVI Letters-p. 269) प्राकृतपैंगलमूक संबन्ध मे ई स्र्थि णा राखब आवश्यमक जे एकर भाषा प्राय: ओएह थीक जे विद्मापतिक कीर्तिलता आओर कीर्तिपताकाक भाषा छथि तथा एहि ग्रंथक रचनामे (गीत सभहिक संग्रह पूर्वी भारतमे भेल छल।) महामंत्री चणडे श्वतरक प्रशास्तिमे बनाओल दूटा गीत सेहो अछि आओर एकर बनौनि‍हार छलोह चरडेशरक अधीनस्थल सामन्तम ‘हरिब्रह्म’ ‘प्राकृतपैं गलमू’ मे कतोक शताबछक भाषाक परिचय भेटइत अछि आओर ओहिमे जतवा जे प्रयोग भेला अछि से मूल्यथत: मैथिली प्रयोगसँ मिलैत-जुलैत अछि। ‘सिद्धगान पर जतेक लोक सब माथापज्वीे कएने छथि ततवे जँ प्रकृतपैं गलम् मे एहुखन कएल जायतँ मैथिलीक बड्ड उपकार होएत। डाo सुभ्रदझा कबीर’ केँ मैथिल सिद्ध करबाक बीड़ा तँ उठौलन्हि ( देखु Journal oJ the Bihar University ) (हुनक लेख) मुदा ‘प्राकृत-पैंगलम्’ जे शुद्ध मैथिलीक वस्तुख थीक, ताहि पर कोनो विशिष्‍ट ध्याेन प्रसिद्ध नहि देलन्हि। ाएकर प्रमाणा एहिसूं बुझना जाइत अछि जे ओ अपन प्रसिद्ध पोथी Formation of Maithili Language मे एहि ग्रन्थ क बड्ड कम चर्च कएने छथि।
• डाo सुभद्रझाक पोथीसँ किछु अंश हम पाठकक हेतु उद्धत् कए रहल छी:
• पृo ४२-The Prakritpainglam gives an example to several metres and verses which may be said to have been composed in proto-Maithili there is nothing in them that may prevent them being called Maithili of an early period…..
• पृo ४२-The language of the charyas Sarvananda, Prakritpaingalm, Kirtilata and Kirtipataka represent Maithili of the oldest period in as much as it preserves some of the Apahramsa characteristics’.
• पोथीक दाम ततेक छन्हि जे केपो साधारणा मै‍थिल पाठक एकरा कीनिकए नहि पढि़। सकैछ । एतबा कहितो ई प्राकृतपैरालम् पर विशेष ध्याकन नहि देने छथि। एहि पोथीक आलोचना जे हालहि मे छपल अछि लएडनमे से उत्सापहवर्द्धक नहि कहल जा सकैछ। भाषा आओर अन्या य समस्यानक अध्याछनक हेतु आओर देखू राहूलजीक हिन्दी काव्यस-धारा जाहिम मे एहि सभ वस्तुरक विशद् विश्लेाषणा भेल अछि। ‘प्राकृत- पैंगलम् गे मिथिलाक इतिहास सम्ब न्धीव सेहो बहुत सटीक बात सब लिखल अछि (देखू-हमरे लेख- Prakrtapainglam –an important source for the study of the History of Mithila) । ‘प्राकृत-पैंगलाक दूटा संस्क रणा इन्डिका सीरीज, कलकत्ता सँ प्रकाशित २३०२ ईo मे प्राकृत-पैंगलम् आओर ii ) एम्ह र हालहि मे हिन्दीय मे एकर एक संस्क रणा दिल्लीा सँ प्रकाशित भेल अछि।
• एहि सम्बकन्ध‍ मे हरिवंश कोछड़क ‘अपभ्र’श साहित्यHक अध्यकयन आवश्यमक बुझना जाइत अछि। ‘प्राकृतपैंगलस्’ पर प्रोo एसo एनo घोषालक बहुतो लेख अंग्रेजी मे भारतवर्षक विभित्र शोधपत्रिका मे प्रकाशित भेल छन्हि। एहिठाम ‘प्राकृतपैंगलम्’ सँ हम थोड़ेक ओहन शब्दoक संचय कएने छी जकर रूप शुद्ध मैथिलीक अछि एहि हेतु जे केओ २४ म शताब्द क मैथिली शब्दर देखए चाहथि से डाo उमेशमिश्रक लेख JBOKS-XIV पृष्ठु २६६-२७३ मे देखि सकइत छथि। हम अअन ‘प्राकृत-विद्मापति वाला लेखक इ एकटा पद सेहो प्राकृतपैंगलम् सँ देने छी जाहिसँ सिद्ध होइछ जे ई मैथिली थीक। स्थापनभावक कारणा विश्लेेषणा एहिठाम संभव नहि।
• परिशीष्ट मिथिलाक प्राचीन सीमाजनबार श्रोत
• (i) मिथिलास्थि: प्रोगीन्द्र : सम्य‍ग् ध्याात्वाइ ब्रवीन मुनीन। यस्मिन देशे मृग: कृष्णाकस्स्मि न धर्मान् विनोधयत् (याज्ञवल्य्हा स्मृखति-आचार १२)
• (ii) डा उमेशमिश्र द्वारा सम्पा दित विद्माकरसहस्त्रलक यत्रपुणया। यत्रास्ते सत्रिधाने सुरनगरनदी भैरवौ यत्र लिङ्गम् ।। मीमांसा-न्यािय-वेदाध्यियन- पटुतरै पणिडतौपणिडसाया भूदेवो यत्र भूपो यजनवसुमती सास्ति मेद तीरभुक्ति ( iii ) त्रिकाणडशेषकोष
• ( a ) गण्डिकी तीरमारभ्ये चम्पाारण्या न्तैकं शिवे: विदेहभू: समाख्या ता तीर- भुक्तमिधो :। (आओर देखु-शक्तिसंगमसूत्र (b) प्राग्यो) ्टतिष: कामरुपे तीरमुक्तिस्तुय लिच्छ‍व (पृष्ठन ५६ ) iv) काठकसंहित- xiii4-
• इन्द्रोट वै वृत्रमहस्तंम हस्तरस्सिप्रभिर्भोगै: पर्यहंस्तिस्य‍ मूर्ध्रो वैदेहीरुदायंस्ताi: प्राचीरयंस्मा् म ता: पुरस्यर जघन्यिमृषयं वैदेहमनुद्मान्तउममन्यहतेममिदानी मालभेय तेन त्वा् इतो मुच्येभयोति
• (v) वायुपुराणा ( ४४-३०६ )
• मिथिर्नाम महा‍वीर्यो येनासौ मिथिलाऽ भवत्
• (vi) शब्दाकल्पोद्रुम-१२३-विदेहा मिथिला प्रोक्ता (vii) लिङ्गपुरणा-तीर-भुक्ति प्रदेशे तु हलावत्ते हलेश्वार:। ( viii ) चन्दास झा-गंगा बहति जनिक दक्षिणा दिसि पूर्वकौशिकीधारा पश्चिम बहति गणडकी उत्तरहिमवत बलविस्ताोरा कमला त्रियुगा अमृता धेमुड़ा वागमती कृतासारा मध्यक वहत लक्ष्मवरणा प्रभृति से मिथिला विद्मागारा
• (ix) राजनैतिक इतिहासक पाद टिप्पीणी मे बहुत किछु लिखल जा चुकल अछि आओर देखू- IHQ XXXV.No.2.
• x प्रवचनो सारोद्धार आओर विविध तीर्थकल्पेमे विदेह जनपदक राजधानी मिथिला कहल गेल अछि । एकर सीमा पूर्वसँ पश्चिम २५० मील आओर उत्तरसँ दक्षिणा २२५ कहल गेल अछि। निरयावलियाओमे मिथिलाक राजधानी कहल गेल अछि।
• (समाप्त)
• ( अंग्रेजी आ मैथिलीमे मैथिली आ मिथिलाक इतिहास देबाक उद्देश्य पाठककेँ अपन जड़िसँ जोड़बाक रहए। ई साहित्यकार लोकनिक लेल आर बेशी जरूरी छल। Courtesy:For earlier articles on VIDEHA,MITHILA,TIRBHUKTI and TIRHUT in English and for these articles in Maithili to Yogendra Yadav, Sunil Kumar Jha, Ramavtar Yadav, Vijaykant Mishra, Yogendra Jha, Y. Mishra, Radha Krishna Choudhary,Makhan Jha, Prabhat Kumar Chaudhary M/s Shruti Publication and Videha http://www.videha.co.in/ editorial staff and volunteers and to Wikipaedia. No commercial use permitted Strictly for academic use. )

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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

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