Monday, March 29, 2010

'विदेह' ५५ म अंक ०१ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५५)- PART I





'विदेह' ५५ म अंक ०१ अप्रैल २०१० (वर्ष ३ मास २८ अंक ५५)NEPAL       INDIA 
                                                     
 वि  दे   विदेह Videha বিদেহ http://www.videha.co.in  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका Videha Ist Maithili Fortnightly e Magazine  विदेह प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका नव अंक देखबाक लेल पृष्ठ सभकेँ रिफ्रेश कए देखू। Always refresh the pages for viewing new issue of VIDEHA. Read in your own scriptRoman(Eng)Gujarati Bangla Oriya Gurmukhi Telugu Tamil Kannada Malayalam Hindi
एहि अंकमे अछि:-

१. संपादकीय संदेश


२. गद्य






३. पद्य




३.४.जय प्रकाश मंडल

३.५.गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा २१म खेप


४. बालानां कृते-. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक कथा


५. भाषापाक रचना-लेखन -[मानक मैथिली], [विदेहक मैथिली-अंग्रेजी आ अंग्रेजी मैथिली कोष (इंटरनेटपर पहिल बेर सर्च-डिक्शनरी) एम.एस. एस.क्यू.एल. सर्वर आधारित -Based on ms-sql server Maithili-English and English-Maithili Dictionary.]




 

विदेह ई-पत्रिकाक सभटा पुरान अंक ( ब्रेल, तिरहुता आ देवनागरी मे ) पी.डी.एफ. डाउनलोडक लेल नीचाँक लिंकपर उपलब्ध अछि। All the old issues of Videha e journal ( in Braille, Tirhuta and Devanagari versions ) are available for pdf download at the following link.

ब्लॉग "लेआउट" पर "एड गाडजेट" मे "फीड" सेलेक्ट कए "फीड यू.आर.एल." मे http://www.videha.co.in/index.xml टाइप केलासँ सेहो विदेह फीड प्राप्त कए सकैत छी। गूगल रीडरमे पढ़बा लेल http://reader.google.com/ पर जा कऽ Add a  Subscription बटन क्लिक करू आ खाली स्थानमे http://www.videha.co.in/index.xml पेस्ट करू आ Add  बटन दबाऊ।

मैथिली देवनागरी वा मिथिलाक्षरमे नहि देखि/ लिखि पाबि रहल छी, (cannot see/write Maithili in Devanagari/ Mithilakshara follow links below or contact at ggajendra@videha.com) तँ एहि हेतु नीचाँक लिंक सभ पर जाऊ। संगहि विदेहक स्तंभ मैथिली भाषापाक/ रचना लेखनक नव-पुरान अंक पढ़ू।
http://devanaagarii.net/
http://kaulonline.com/uninagari/  (एतए बॉक्समे ऑनलाइन देवनागरी टाइप करू, बॉक्ससँ कॉपी करू आ वर्ड डॉक्युमेन्टमे पेस्ट कए वर्ड फाइलकेँ सेव करू। विशेष जानकारीक लेल ggajendra@videha.com पर सम्पर्क करू।)(Use Firefox 3.0 (from WWW.MOZILLA.COM )/ Opera/ Safari/ Internet Explorer 8.0/ Flock 2.0/ Google Chrome for best view of 'Videha' Maithili e-journal at http://www.videha.co.in/ .) 

Go to the link below for download of old issues of VIDEHA Maithili e magazine in .pdf format and Maithili Audio/ Video/ Book/ paintings/ photo files. विदेहक पुरान अंक आ ऑडियो/ वीडियो/ पोथी/ चित्रकला/ फोटो सभक फाइल सभ (उच्चारण, बड़ सुख सार आ दूर्वाक्षत मंत्र सहित) डाउनलोड करबाक हेतु नीचाँक लिंक पर जाऊ।
 VIDEHA ARCHIVE विदेह आर्काइव

example

भारतीय डाक विभाग द्वारा जारी कवि, नाटककार आ धर्मशास्त्री विद्यापतिक स्टाम्प। भारत आ नेपालक माटिमे पसरल मिथिलाक धरती प्राचीन कालहिसँ महान पुरुष ओ महिला लोकनिक कर्मभूमि रहल अछि। मिथिलाक महान पुरुष ओ महिला लोकनिक चित्र 'मिथिला रत्न' मे देखू।

example

गौरी-शंकरक पालवंश कालक मूर्त्ति, एहिमे मिथिलाक्षरमे (१२०० वर्ष पूर्वक) अभिलेख अंकित अछि। मिथिलाक भारत आ नेपालक माटिमे पसरल एहि तरहक अन्यान्य प्राचीन आ नव स्थापत्य, चित्र, अभिलेख आ मूर्त्तिकलाक़ हेतु देखू 'मिथिलाक खोज'


मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित सूचना, सम्पर्क, अन्वेषण संगहि विदेहक सर्च-इंजन आ न्यूज सर्विस आ मिथिला, मैथिल आ मैथिलीसँ सम्बन्धित वेबसाइट सभक समग्र संकलनक लेल देखू "विदेह सूचना संपर्क अन्वेषण"
विदेह जालवृत्तक डिसकसन फोरमपर जाऊ।
"मैथिल आर मिथिला" (मैथिलीक सभसँ लोकप्रिय जालवृत्त) पर जाऊ।

 १. संपादकीय

मैथिली गजल शास्त्र
गजलक उत्पत्ति अरबी साहित्यसँ मानल जा सकैत अछि मुदा ओतए ई अरकान माने कोनो उत्तेजक घटनाक वर्णन विशेषक रूपमे छल। मुदा गजल जे एहि अरकान सभक समुच्चय अछि से फारसीक छी। फेर ओतएसँ गजल उर्दू-हिन्दी आ आब मैथिलीमे आएल अछि।
मायानन्द मिश्र मैथिली गजलकेँ गीतल कहलन्हि, मुदा हम एतए ओकरा गजले कहब आ अरबी फारसीक छन्द-शास्त्रक किछु शब्दावलीक प्रयोग करब। से मैथिली गजल शास्त्रक शब्दावली भेल अरूज
बहर: उन्नैस टा अरबी बहर होइत अछि। एतेक बहर मोन रखबाक आवश्यकता नहि। किएक तँ बहर माने थाट, राग-रागिनी। एहि उन्नैसटा अरबी बहरक बदला मैथिली लेल नीचाँमे भारतीय संगीत (स्रोत स्व. श्री रामाश्रय झा रामरंग) दऽ रहल छी। आ किएक तँ देवनागरी आ मिथिलाक्षरमे जे बाजल जाइत अछि सएह लिखल जाइत अछि (ह्रस्व इ सेहो मैथिलीमे अपवाद नहि अछि) से ह्रस्व आ दीर्घ स्वरकेँ गनबाक विधि मैथिलीमे भिन्न अछि, सेहो एतए देल जाएत। जाहि बहरमे शेरमे आठ (माने शेरक दुनू मिसरामे चारि-चारि) अरकान हुअए से भेल मसम्मन  आ जाहि बहरमे शेरमे छह (माने शेरक दुनू मिसरामे तीन-तीन) अरकान हुअए से भेल मुसद्द्स । एतए मैथिलीमे विभक्ति सटा कऽ लिखबाक वैज्ञानिक आधार फेर सिद्ध होइत अछि कारण गजलमे जे विभक्ति हटाइयो कऽ लिखब तैयो अरकान गनबा काल तेना कऽ गानए पड़त जेना विभक्ति सटल हुअए, विभक्ति लेल अलगसँ गणना नहि भेटत।
जाहि बहरमे एक्केटा रुक्न हुअए से भेल मफरिद बहर आ जाहिमे एकटा सँ बेशी रुक्न हुअए (रुक्नक बहुवचन अराकान) से भेल मुरक्कब बहर।
दूटा अराकान पुनः आबए तँ ओकरा बहरे-शिकस्ता कहल जाएत।
मिसराशेर: मैथिली गजलमे दू पाँतीक दोहा जे कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत अछि तकरा मिसरा वा शेर कहै छी। दुनू पाँती एकट्ठे भेल शेर आ ओहि दुनू पाँतीकेँ असगरे मिसरा कहब। मतलाक दुनू मिसरामे एकरंग काफिया माने तुकबन्दी होएत।
ऊलासानी: शेरक पहिल मिसरा ऊला आ दोसर मिसरा सानी भेल।  दू मिसरासँ मतला आ दू पाँतीसँ दोहा बनल।
अरकान (रुक्न) आ जिहाफ: आठ टा अरकान (एकवचन रुक्न) सँ उन्नैस टा बहर बहराइत अछि। से अरकान मूल राग अछि आ बहर भेल वर्णनात्मक राग। अरकानक छारन भेल जिहाफ । जेना वरेण्यम् सँ वरेणियम्।
तकतीअ: दू पाँतीक कोनो उत्तेजक घटनाक विशेष वर्णन करैत दोहा जे मिसरा वा शेर अछि आ कएक टा मिसरा वा शेर मिलि कऽ गजल बनैत अछि, तकर शल्य चिकित्सा लेल तकतीअ अछि। से मिसरा कोन राग-रागिनीमे अछि तकर तकतीअसँ बहर ज्ञात होइत अछि
काफिया रदीफ: तुकान्त काफिया आ ओकर बादक शब्दकेँ रदीफ कहैत छिऐ।  काफिया बदलत मुदा रदीफ नञि बदलत।
मतला (आरम्भ) आ मकता (अन्त): गजलमे पहिल शेर मतला आ आखिरी शेर मकता भेल। मतलाक दुनू मिसरामे तुक एकरंग मुदा मकतामे कवि अपन नाम दै छथि। मकताक कखनो काल लोप रहत, एकरा सन्दर्भसँ बुझब थिक मुदा मतलाक रहब अनिवार्य।

पञ्जीपर किछु तथ्य
मालद्वार पंचप्रवर- करमहे नरुआर वत्सगोत्री, राजा रामलोचन चौधरी-मालद्वार- २५०० वर्ष पूर्व- राजा दुर्गा प्रसाद चौधरी-
-राजा बुद्धिनाथ चौधरी(मालद्वार)-कुमार वैद्यनाथ चौधरी
- छत्रनाथ चौधरी (दुर्गागंज)-टंकनाअथ चौधरी-कर्मनाथ/ शेषनाथ/ रुद्रनाथ


एक छलि महारानी- डॉ. मदनेश्वर मिश्र
सुरगणे लौआम- गोत्र पराशर
लौआम गाम मूलतः बसैठीसँ पूर्णियाँक बीचमे- आब नहि छैक।
तिलैबार मूलक शाण्डिल्य गोत्री
बनैली गाम- अगरू राय- हिनकर जमाए सुरगणे लौआम मूलक प्राणपति- हिनक बालक समर झा
१५७५-१६२५ (लगभग १६म शताब्दी), दिल्ली सल्तनतसँ जमीन्दारी किनलन्हि आ समर चौधरी भऽ गेलाह, महाराज भऽ गेलाह।
लौआमक दू शाखा
-महाराज कृष्णदेव (पहसरा बसैटी)
-महाराज भगीरथ- सौरिया (कटिहार-सोनालीक बीचमे)- एकटा स्थान दण्डखोड़- एतए अपराधीकेँ सजा देल जाइत छल (सौरिया शाखा द्वारा)।

पाँच वंश बाद पहसरा बसैटी- कृष्णदेव-देवनारायण-वीरनारायण-रामचन्द्र नारायण (जॉन बुकानन पूर्णियाँ गजेटियरमे हुनकर वर्णन किंग ऑफ पूर्णियाँक रूपमे कएने छथि)- इन्द्रनारायण (बिना सन्तान) रानी इन्द्रावती(सासुरक नाम- असल नाम लीलावती) हिनकर मृत्युतिथि १५-११-१८०३ मृत्युस्थान पूर्णियाँ, समए- मध्याह्ण काल, श्राद्ध खर्चक हेतु पूर्णियाँ जजसँ प्राप्ति- रु.५०००/- माँग रु.१५,६७०/-( बोर्ड ऑफ रेवेन्यु, फोर्ट विलियममे २९.११.१८०३ ई. केँ कार्यवाही)। इन्द्रनारायणक समकालीन सौरिया दिश राजा राजेन्द्रनारायण आ राजा महेन्द्रनारायण। महाराज इन्द्रनारायणक मृत्यु १७७६ ई. मे, तकर बाद २७ बर्ख धरि रानी इन्द्रावती राज कएलन्हि।
राज बनैली- रामनगर/ श्रीनगर/ गढ़बनैली/ सुल्तानगंज/ चंपानगर।

श्यामा मन्दिर बनारसमे संस्कृत पढ़बाक वृत्ति- रानी चन्द्रावती- कोइलख (राजा पद्मानन्द सिंह, पुतोहु-कुमार चन्द्रानन्द सिंहक पत्नी)- रामनगर।
विशेश्वर झा बैगनी नवादासँ पहसरा नोकरी करबा लेल अएलाह। हिनकर बेटा दीवान देवानन्द फेर चातुर्धरिक मनसबदार परमानन्द- संध्यागायत्रीसँ लोप बनैली समर सिंहकेँ मानि लेलन्हि। दुलार चौधरी/ फेर सिंह (बनैली राज), बुकानन हिनका चौधरी कहि सम्बोधित करैत छथि, मात्र एक बेर सिंह कहै छथि।
१६८०-१७०० ई.-दरभंगा राज, कन्दर्पीघाटक लड़ाई, राजा नरेन्द्र सिंह- दिल्ली सल्तनत आ जनताक बीचमे, बागमती तटपर समस्तीपुर ब्रह्महत्याक आरोपी नरेन्द्र सिंहकेँ बारि ब्राह्मण सभ पूर्णियाँ सुरगणे लौआम महाराज समर सिंह सन्तति महाराज नरनारायण, पहसरा बसैटी (कोशीक पूर्व)- फारबिसगंजसँ दण्डखोड़ा कटिहार तक बसाओल गेलाह। फेर माधव सिंहक समएमे दरभंगा आपस भेलाह।
खुद्दी झा/ परमेश्वर झाकेँ आशुतोष मुखर्जीक समए दरमाहा राज बनैली देलकैक।

पञ्जीमे दरभंगा राजक विरुद्- विविध विरुदावली विराजमान् मानोन्नतमान् प्रतिज्ञापदर्योधिक परशुराम समस्त प्रक्रिया विराजमान् नृपराज महोग्रप्रताप मिथिलाङ्कार महाराजाधिराज माधव सिंह बहादुर कामेश्वर सिंह।
धकजरीक नवलक्षाधिपति लक्ष्मीपति मिश्र कोदरिये मूल शाण्डिल्य पाञ्जि भेटि गेलन्हि, रमेश्वर सिंहकेँ १ १/२ लाख टाकाक चन्दा देलन्हि, पिण्डारुछक चौधरी सभकेँ सेहो पाँजि भेटलन्हि (नित्यानन्द चौधरी)।

गुणाकर झा हरसिंहदेवक समकालीन ई.१३२६ ततैल ग्राम- १० खाढ़ी पाछाँ ककरौड़ गाम-जिला मधुबनी रघुदेव झा- आनन्द झा- देवानन्द प्रसिद्ध छोटी झा दरभंगा नरेश माधव सिंहक (शाखा पुस्तकक प्रणयन आदेश) समकालीन १६५० ई.क आसपास- मित्रानन्द प्रसिद्ध झोंटी झा- गोपीनाथ झा प्रसिद्ध होरिल झा- हरखानन्द प्रसिद्ध हरखी झा- एखसँ १५९ वर्ख पूर्क दिनकर टिपणी (जन्म) रसाढ़ पूर्णियाँ बनमनखी लग- श्री भोलानाथ प्रसिद्ध भिखिया झा- श्री मोदानन्द झा- पञ्जीकार विद्यानन्द झा प्रसिद्ध मोहनजी- मूल पड़ुआ(पण्डुआ) महिन्द्रपुर, गोत्र काश्यप त्रिप्रवर।
खाँ- कुजिलवार उल्लू- कात्यायन गोत्र
उतेढ़- सिद्धांत लिखबाक पहिने वर ओ कन्या पक्षक अधिकार ताकल जाइत छैक आ ई मात्र मूलक आधारपर बनाओल जाइत अछि आ समगोत्री विवाह नहि होअए ताहि लेल गोत्र आ प्रवर सेहो देखल जाइत अछि। मूलसँ गोत्र सामान्यतः पता चलि जाइत अछि, किछु अपवादो छैक। जेना ब्रह्मपुरा मूल- काश्यप/ गौतम/ वत्स/ वशिष्ठ (सात टा), करमहा- शाण्डिल्य (गौल शाखा)/ बाकी सभ वत्सगोत्री, दुनु करमहामे विवाह संभव।
चन्दा झा- माण्डर रजौरा

रामोऽवेत्ति नलोऽवेत्ति वेत्ति राजा पुरुरवा।
अलर्कस्य धनं प्राप्य नान्यदेवोनृप भविष्यति॥

नान्यदेव घोड़ापर चढ़ल हकासल-पियासल अएलाह, गाछतरमे घोड़ा बान्हलन्हि, घोड़ा लेल खाद्य छीलए लगलाह तँ फन काढ़ि साँप नाग आएल, किछु लिखल जे नान्यदेव मिथिलाक भाषा नहि पढ़ि सकलाह। कामेश्वर ठाकुर जे गाममे रहथि पढ़ि बतओलन्हि जे अहाँ मिथिला राजा नान्यदेव छी।
कामेश्वर ठाकुर संतति चण्डेश्वरकेँ हरसिंहदेव राज लिखितमे सौंपि पलाएन कएल। चण्डेश्वरक पाछाँ सिपाही आएल। एकरापर जल फेंकि ठाढ़ भऽ गेल, दोसर खेहारलक, ओकरापर जल फेकलन्हि ओ आन्हर भऽ गेल (अन्हरा ठाढ़ी)।
वर्षकृत्य- अयलीह बिहुला देलन्हि पसारि,
गेलीह सामा लेलन्हि ओसारि।

पञ्जी- अधिकारक नियमावली- पञ्जी अयाची मिश्रक पौत्र ढाका कवि- ढाकामे जागीर भेटलन्हि। हल्ली झा तांत्रिक आ शिव कुमार शास्त्रीक बीच शास्त्रार्थ- प्रत्याहार वाक तंत्र द्वारा हल्ली शिवकुमार शास्त्रीक वाक् बन्न कए देलन्हि।

तस्कर केशव, मंगरौनी नरौने सुल्हनी- पराशर गोत्र माण्डर सिहौल मूलक काश्यप गोत्री खगनाथ झा- गाम जमसम। महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह लेल लड़की निहुछल गेल, गाममे पोखरि खुनाओल, मन्दिर बनल जे राजा दोसराक मन्दिरमे कोना पूजा करताह। केशव झा लड़कीकेँ लए गाम आबि गेलाह। धोती रंगाइत छल। पता केनिहार जे आएल तकरा पकड़ि कन्यादान करबाओल। तकर बाद राजा की करताह, पञ्जीकारकेँ बजा कऽ ओकर नाममे तस्कर उपाधि लगबाओल। खगनाथ झा- श्रीकान्त झा पाँजि, तस्कर केशव श्रोत्रिय ओहिठाम विवाह कएलापर श्रोत्रिय श्रेणी विराजमान रहितन्हि। पाञ्जि आ पानि अधोगामी, पछबारि पारक प्रथम श्रेणी आब नहि अछि।

संगहि "विदेह" केँ एखन धरि (१ जनवरी २००८ सँ ३० मार्च २०१०) ९६ देशक १,२३० ठामसँ ४०,६५१ गोटे द्वारा विभिन्न आइ.एस.पी.सँ २,३३,३८९ बेर  देखल गेल अछि (गूगल एनेलेटिक्स डाटा)- धन्यवाद पाठकगण।


सूचना: पंकज पराशरकेँ डगलस केलनर आ अरुण कमलक रचनाक चोरिक पुष्टिक बाद (proof file at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr  and detailed article and reactions at http://groups.google.com/group/videha/web/%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%A5%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%80%E0%A4%95+%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8+%E0%A4%B8%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE?hl=en ) बैन कए विदेह मैथिली साहित्य आन्दोलनसँ निकालि देल गेल अछि।

गजेन्द्र ठाकुर

ggajendra@videha.com
 

२. गद्य





१.अनमोल झा-गामक बताह २.-कामिनी कामायिनी-घडियाली नोर

`अनमोल झा
                           गामक बताह
                                                    

बताह, बुरि, बकलेल पत्ता नै की-की ने गामक लोक कहै। सगर गाम इएह बात। हौ कोनाकेँ इ भुसकौलहा सुभषवा मैट्रिक पास कऽ गेल आ कोन दके इंजिनीयरीमे नामों लिखा गेलै। हौ ओकर तँ एक फेजे पार छै। कहह तँ गामक छौड़ा कऽ संग कऽ-कऽ पत्ता नै की-की नियार भास करैत रहैत अछि। आ छौड़ो सभ खुब ओकर आगा पाछा करैत रहैत अछि, हमरा तँ लगैत अछि इ रूतबा रहलै तँ छौड़ा सभहक तँ छोड़ह, गामे कऽ नै उड़हारि चल जैह। सभहक नजरि गाम अबैत मांतर ओकरापर गड़ि जाइत छलै। आ सुभाषो एक आध दिनमे गाममे रहि, गामक हाल-चालसँ अवगत भऽ छौड़ा सभहक बैठार कऽ चल जाइत छल सिन्दरी।
      गाम अति पिछड़ल-गमार आ हँसी-कुचिष्टाक समुद्र छल। सभहक एक बात, एक विचार कियो तेहेन पढ़ल लिखल नै, तै छल मूर्खक लाठी बिचे कपार सेहो छल। ककरो नेना-भुटका नीक जकाँ पढ़ाइ-लिखाइमे नै भीरल छल आ जे भीरलो छल से प्रोत्साहनक अभावमे डारटुट्टु जकाँ बैसी जाइत छल।
      तखन पत्ता नै कोनाकेँ सुभाष ओहि गाम आ ओहि समाज आ ओहि वातावरणमे रहि मैट्रिक पास कय, इन्जीनियरीमे पढ़ि रहल अछि आ पाँच हजार रूपैया स्कॉलरसीप पाबैत अछि। आ पत्ता किएक नै थालमे जे कमल फुलाइत छै से कोना।
      जे अपने खराप रहैत अछि ओकरा सौसे दुनियाँ खरापे लगैत छैंक। आ ताहीमे नीक, नीक तँ आर तीत ओकरा बुझाइत छैक। सैह बात छलै सुभाष मिसिया भरि नै सोहाइत छलै। ई गामक विकास लेल गाम अबैत देरी नीक-नीक योजना बनायब। जाहिमे नियम कानून छल-सभ छात्र स्व अध्यायमे लागल रही, दोसरो कऽ पढ़ाइ-लिखाइमे सहायता पहुँचाबथि, गामक रस्ता परहक गंदा कऽ मासमे 2 बेर नै तँ एक बेर अवश्य सभ युवा वर्ग मिलि - कोहारि खुशीसँ साफ सुथरा करैए। गामक सभ बिजली पोल सभपर चंदा लऽ बिजली लगा देल जाए। उसराहा बाबाक ढ़हैत मन्दिरपर ध्यान देल जाए। गाममे एकटा लाइब्रेरी होमक चाही, पत्र-पत्रिका ओतए नित्य आयल करए। गामक स्कूल मास्टरकेँ जा कऽ कहल जाए जे चटिया लोकनिपर नीक नजरि राखनिहार गामक कोनो काज श्राद्ध, उपनयन, आदि-आदिमे बिना कहने सभ ओतए जा हुनका परिश्रमसँ सेवा कयल जाए। गामक विकास लैल ब्लौंकसँ सम्पर्क स्थापित कयल जाए आ ओहि सँ गामक लोक कऽ लाभ होइन। आदि-----आदि---------।
      यैह छल सुभाषक बतहपन्नी आ देखितहि-देखितहि ओ एकटा नव जागरण युवा संघक गठन कऽ बैसल। आ योजना सभ लागू भऽ जैह तैही हेतु सभ कृत संकल्पित भऽ गेल।
      एम्हर गामक लोक कहए "केहेन-केहेन गेला तँ मोंछ बला एलाह" नूनू, रामचन्द्र, गोनाई आ गुर कते बेर एहेन-एहेन योजना बना, चकापर राखलक से रखले छनि आ हुनका सभक केश पाकि गेलनि, दाँत टुटि गेलनि आ लाठी लऽ चलैत छथि, आ योजना-योजने रही गेलैन हूँ-----। देखैत छीयैन लैटसहिबो कऽ------? बीस गोटए मुदे बीस रंगक बात।
      एहि बेर सुभाष गर्मीक छुट्टीमे मास दिन गाममे रहल, आ गुहकट्टीसँ लऽ कऽ मन्दिर तकमे हाथ लगा देलक। अपनेमे दस-बीस रू. प्रति माह चन्दा लऽ पत्र पत्रिका मंगबय लागल। मन्दिरमे बेस पाइ लगितै तै धनिक लोक ओतए संघक सभ गोटा जाए भीख माँगए, दतखीसरी कऽ दैत छल, तेना तेना कऽ मन्दिर चमकए लागल। गामक कोनो नेना कऽ पढ़बाक समएमे बड़द-महीस किछु खोलने देखैत छल सुभाष तँ अपनेसँ खुट्टामे बान्हि अबै छल आ ओकर बाबू कऽ शिकायत करै छलै....हे हम अहाँक माल बान्हि देलौ अछि। उत्तर भेटै बड़का काज केलौ है, हम अपना बेटासँ माल चरबै छी, अहाँक मतलब। सुभाष कहैए से नहि भऽ सकैत अछि, पढ़ए कऽ समयमे पढ़त दोसर समएमे अहाँ अपना बेटासँ किछु कराउ।
      नेनों-भुटका सभकेँ रुचि खुजलै पढ़ै-लिखैएकेँ ओ सभ माए-बापकेँ ठाए-फटाए उत्तर दऽ दैक, हम नै महीस खोलबौ। हमरा कोपी-किताब दे, आ कंठपर ठाढ़ भए किनबाबए। ओना जकर आर्थिक स्थिति एकदमे खराप छलै, सुभाष अपना पाइसँ स्कूलमे नाम लिखा दैक, किताब कॉपी कीनि दैक आ अपने गेलापर संघ कऽ भार द दैक ओकर कॉपी-कितापक, सिलेट-पेंसिलक।
      गामक नवतुरमे अनुशासन जगजगार होमए लगलै। एक दोसरामे छोट-पैघ, अचार-विचार, उचित-अनुचित धारा फूटलै। जहाँ-तहाँसँ थोड़-थोड़ पोथी जमा भेल आ तामे एकटा तामे टटघर बना पुस्तकालय सेहो बनि गेल।
      एतेक भेलाक बादो कुचिष्ट समाज कहै यौ सुभाष बाबू हमरा सभ कऽ पैखाना करैएमे दिक्कत होइत अछि, जल्दी रस्ता साफ कराउ, तखन ने हम सभ पतियानी लगा बैसब। सुभाष कहए जेहन अहाँ सभक विचार। अहाँ सभ जतेक गंदा करबै, हमरा सभ ओतेक साफ करबै। कारण आब गाम अहाँ सभक नै, हमरा सभक छी। एकर नीक अधलाहसँ अहाँ सभ कऽ कोन काज। अहाँ सभ तँ पाकल आम भेलौहुँ नै। "गेल माघ उंतीस दिन बाँकी"
      समए छन-छन बितैत गेल आ किछु दिनुका बाद देखएमे आबए लागल जे गाम पूर्ण विकासमे लागि गेल आ एका एकी गाममे पोल सभपर बल्ब लागि गेल, पुस्तकालयमे बेस पोथी सभ जमा भऽ गेल, पत्र-पत्रिका बेस जुटए बिना पुस्तकालयपर गेने छात्र सभ कऽ चैन नहि आबैए रस्ता दुधसँ घोल, उसराहा बाबापर जे चढ़ाएल अछत माल-जाल चटैत रहै छल से आब ओहिमे खुब निसन केबाड़ लागी गेल। छतपर लाउडिस्पीकर भजन गबैत गामक मनोरम कऽ आर बढ़बए छल। ब्लौकसँ कल आएल, पहिले पुस्तकालयपर आ तकरा बाद सगर गाममे गोट बीसेक लगभग कल गरा गेल। लाउडिस्पीकर सुभाष अपन स्कॉलरसीप बला पाइसँ कीनल धरि ईटाक घर पुस्तकालय ब्लौकक फण्डसँ बनाएल गेलै।
      आँखिक आगूमे एतेक परिवर्त्तन देखि आइ पूरा गाम छुब्द, चकित आ विस्मित अछि। कोना कऽ नव जागरण संघ, आ जाए संघ तै नै इ सोना बनैत गाम।
      एहि समाजकेँ नै आगू चलि नै पाछु। जे कालि कहैए सुभषवा बताह, बुरि, बकलेलहा, सैह समाज आइ कहैत छैक सुभाषक बुद्धिक आ परिश्रमक इ परिणाम छी, चमकैत, खनकैत, हमर गाम।
      सैह जे गामक बताह छल, अपन हीनता अपन खिध्यास सुनैत रहैत छल, से बताह बनी की-की नै कए देलक। मुदा वास्तविक बताह के...सुभाष आ गामक लोक.....?
      आइ गाममे घर-घर बी.ए., एम.ए. पास अछि आ मैट्रिक कतेक गनाऊ। पूरा गाम मात्र एकों सुभषवाक बतहपनीसँ शिक्षित आ नोकरी-चाकरीमे लागी गेल अछि। नै तँ गामक लोकक अनुसार लोक एखनो घिर सेवने तहितए।
      सुभाष अपन प्रतिभाक बले स्वीडनमे रीसर्च करैत अछि। आ गाम एखनो ओतसँ जाइत अबैत रहैत अछि। ओकरे सन कतेक प्रतिभाशाली लोक सभ ओहि गामक गौरव बढ़ा रहल अछि। ओकर गाम आदर्श गाम भऽ गेल अछि। संघ एखनो कार्यरत अछि आ जऽ जऽ छोटगर लोक गाम छोड़ने जाइत अछि पढ़ै लिखै लेल बाहर गेलासँ छोटतुरक बच्चा सभ ओहि क्रमक आगाँ बढ़बैत रहैत अछि।
      सुभाषक एखनो अपना गामपर गर्व छैक आ पुरा गामक सुभाषपर। एखनो ओकर फोन जे अबैत छैक विदेशसँ तँ घंटाक-घंटा गामक मादे चर्च आ पुछताछ करैत रहैत अछि ओ।                               
  २.-कामिनी कामायिनी
घडियाली नोर
प्रिय रत्‍ना
हम अहिठाम कुशल सॅ रहैत अहि विश्वासक संग चिट्टी  लिख रहल छी जे अहूॅ सकल पेलवार स्वस्थ आ़ प्रसन्न हाेयब ।स्नातकक परीक्षा के उपरांत हमहूॅ खाली बैसल छी  हाथ प़ हाथ धेने घर में अहिं जकाॅ ।विचारैत छी मिथिला पेंटिंग सीखू ।अहाँ बड नीक काज केलहूॅ जे बी एड में एडमीशन ल़ लेलहूॅ ।
     हाँस्टल में हम सब वर्त्तमान राजनीतिक चर्चा में कत्तेक समय बिताबी ।अहाँ बरमहल हमर सबहक प्रगतिशील मंच में आबि अपन शहऱ अपन समाज आ़आेकर कथा व्यथा जाहि रूपें प्रस्तुत करी ताहि सॅ सब कियो मर्माहित भजाए छल ।
    अहाँ सदिखन अनका सबके कहैत छलिए जे अहाँ तहमरा अपन बेस्ट फ्रेंड मानैत छी मुदा हम अहाँ के कोनाे वैल्यू नहि दैत छी ।अहाँ के इर् धारणा निराधार अछि ।कि कहियो हम अहाँ के अनुचित सलाह देलहुँ   हमरे कहबा पअहाँ इंटर में अंगे्रजी नहि नेने रही़  जनैत छलहूॅ जे अंगरेजी सम्हारब अहाँक बसक गप्‍प नहि छल      देखू कत्तेक नीक रिजल्ट रहल अहाँके ।
  सीमा सॅ हमर घरक पता लए कअहाँ इर् चिट्टी लिखलहूॅ ताहि लेल  धन्यवाद ।हमरा प्रति  अपन माेन में एतेक श्रद्वा आइर्ज्जत राखए लेल सेहाे थन्यवाद   मुदा हमरा विचार सॅ केकराे दाेस्त बूझनाए मात्र बड पैघ गप छैक ।
   घर में सबके हमरा दिस सॅ यथाेचित कहबैन्ह ।
                 अहाँक सखी
                  शैली ।
 प्रिय  रत्‍ना
    अहाँक टेढ बाकुड हैंडराइर्टिंग़    खराप नहि मानब़  हॅस्सी कए रहल छी़    में लिखल मुदा अतिशय प्रेम सॅ भरल चिठ्ठी एखन तुरत हस्तगत भेल ।इर् जानि कप्रसन्नता भेल कि अहाँ बी ए सेकेंड डिविजन सॅ पास करि गेलहूॅ ।
  अहाँ बी़ एड कइर्ए रहल छी मुदा अहाँ के पढेबा में विशेष अभिरूचि नञि अछि । तखन हमरा विचार सॅ अहाँके स्टेट पब्लिक सर्विस कमीशनक तैयारी करब चाही ।अहाँ सब लेल तकत्तेक सीट रिजर्व छै ।   एकरा हमर अहंकार कदापि नञि बूझब   
      एक तअहाँ कन्या  ऊपर सॅ अनुसूचित जाति   एकर लाभ अहाँ किएक नहिं उठाबी   ।कोनाे तरहक गायडेन्स जाै हमरा सॅ चाही तनिधाेक हमरा घर आबि सकैत छी वा चिठ्ठी पतरी के माध्यम सॅ सेहाे जानकारी लए सकैत छी ।
   क्षितिज सॅ उतरि  सांझ गाछ बिरीछ के अपना गिरफ्‍त में लेबए लागल छै ।हम बाहर जा रहल छी बूलए टहलए ।शेष गप सप्‍प दाेसर चिठ्ठी में    
             पैघ के प्रणाम छाेट के आर्शिवाद 
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
 प्रिय रत्‍ना
     अहाँक एडमिट कार्ड आबि गेल  इर् जानि प्रसन्नता भेल ।अहाँ अपन एक्‍जाम सेंटर अहि शहरि में देने छी से जानि आआेर प्रसन्नता भेल ।अहाँ लिखलहूॅ जे अहाँक कोनाे संबंधी हमर घरक लग़ पास में रहै छथि  अहाँ आेतए आयब हमर सहयोग लेबा लेल   स्वागत अछि  अवश्य आऊ़  ।आेना अहि बीच में जे राइर्टर्स के किताब आप्रतियोगी पत्रिका सब पढबा के लेल लिखने रही से सब अवश्य पढब ।किछु उपयोगी पुस्तक जे अहाँ के शहरि में नहिं उपलब्ध भसकैछ़  किछु नाेट्रस हम डाक सॅ पठा रहल छी  ।बूझल अछि जे अहाँक रटबाक क्षमता बड तीव्र अछि   सबटा चीज ताेता जकाॅ  आॅखि मूनि करटि जायब ।अहि गप के दुख नहि करब जे कोचिंग नहि करि सकैत छी ।स्वाध्याय सॅ सेहाे सफलता क बाट कसब टा विध्न बाधा हरण भजाय छै ।हॅ लिखबाक खूब अभ्यास करब   अहि सॅ लिखावट में सुधार हाेयत आस्मरण सेहाे रहत ।सफलता अवस्स भेंटबाकचाही  इर् हमर अन्तः करणक स्वर थीक ।
अहि बेर कतेक गरमी पडि रहल छै़   तहिना गाछी सब में आम लुधकल छै।
 शेष सब यथावत ।                                            अहाँक संगी
                      शैली ।

प्रिय रत्‍ना
       अहाँ के परीक्षा दिन देखने छलहॅू मुदा गप नहिं भसकल ।चश्मा लगा कसत्ते अहाँ गैजटेड आफीसर लागि रहल छलहूॅ ।अधिकांश प्रश्न ततीन साल पहिलुका रिपीट छल इतिहास आराजनीति शास्त्र वला प्रश्न तवएह सब छल जे हम लिख कअहाँ के पठाैने रही   अहाँ नीक जकाॅ घाेंकि गेल रहाैं ।एडवांस मुबारक  रिटेन तअहाँ निकालिए लेब आइंटरव्यु में अहाँक वाक ् शक्‍ति के आगाॅ भला के टिक सकैय ।अहि गप सॅ अहाँ के दुख अछि जे बजबा काल अहाँ के स्त्रीलिंग पुलिंगक भान नञि रहैत अछि ।व्याकरण बड कमजाेर अछि ।कमजाेर व्याकरण अहाँ के किछु नहि बिगाडि सकैत अछि   अहाँ में बड आत्‍म विश्वास अछि ।आेना इर् कहबी अवस्स माेन पाडने रहब जे  नाे बडी कैन मेक यू इनफीरियर विदाउट योर परमीशन
        अहाँ इर् की लिखलहू जे सिडुल कास्ट में सेहाे बड भीड छै  ।हेतैक  मेडिकल  इंजीनियरिंग में हेतैक  पी सी एस में पुरूखक हेतै  मुदा स्त्री उम्मीदवार कत्तेक छै  ।आ उपर सॅ आेतेक डल सेहाे नहि छी ।दुर्गा माॅ के पूजा करू  हनुमान चालिसा पढू देखबै अहाँक सेलेक्‍शन अवश्य अवश्य अवश्य हाेयत ।
    मध्य   रृात्रि भरहल छै़  हम रा बड कैस कआेंघि लागि रहल अछि ।
                       अहाँक संगी शैली ।
प्रिय रत्‍ना
     अहाँक विवाहक कार्ड आचिठ्ठी दूनू एके संगे भेंटल । इर् की    लिखलाैं जे अहाँ बड उदास छी   से किएक    डाक्‍टर वर सॅ विवाह भरहल अछि   अहाँ आेहि करिलुठ्ठा मजनूॅ के लेल फिरीशान भटिपना नाेर बहा रहल छी जे अहाँ के अशुद्वि सॅ भरल चिठ्ठी लिखैत छल ।आय आे कत्तए अछि   अपन बाबू के तेल डीजल के दाेकान पतेल बेचि रहल हाेयत ।कि अहाँ आेकर तेल सॅ गंधाति वस्त्र सूॅघि सूॅधि कअपन जीनगी बिताएब 
    भाग्य अहाँ के डाक्‍टर कअर्द्धागिंनी बनबाक अवसरि दरहल अछि   ।साफ सुथरा वातावरण में रहब ।अपनहूॅ नाैकरी करब आअपन धिया पुत्ता सब के नीक भविष्य देब ।दूरक साेचूॅ  छुच्छ  भावुकता मनुक्‍ख के रने बाेने बाैआबए  छिछियाबए लागै छै ।
    ंमाेन छाेट जुनि करू ।साेचू  अहाँ के कत्तेक आगाॅ जेबाक अछि ।आेहि मजनूॅ के धमकी सॅ नहि डरायब   जे करतै से करए देबै   आेकरा पुरना फिल्मक गीत गाबैत़  देवदास बनल रहए दियाै ।
  हॅ  अहाँ के विवाह में अयबा के माेन तबड छल   मुदा हमर पितियाैत बहिनक विवाह सेहाे आेहि दिन छै़  भिलाइर् जा रहल छी ।
             हमर शुभेच्छा अहाँक संग  
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
प्रिय रत्‍ना
    बड दिनक विराम के पछाति अहाँ के चिठ्ठी भेंटल।अहाँ पी सी एस कम्पीट करि गेलहूॅ  ।हृदय गद गद भगेल ।बङ बड बधाइर्  ।अहाँ पहमरा बङ विश्वास छल ।देखलाहा सपना सच भगेल ।
        मुदा इर् की   लिखलहूॅ ।सासुरक लाेक बड खराप निकलल ।गारिये सराप सॅ गप आरंभकरैत छैथ ।छाेट छाेट गप पअहाँक बाप ददा संग छत्तीस पुरखा के उकैट कराखि दैत छैथ ।घरबाला सेहाे मतारी के आॅचरक खूॅट सॅ बंंधेल़     कनिक सन उकसेला पसम्पूर्ण काया ततारि कदैत छै ।
   अहाँक तीन दिन धऱि     अहि प्रचंड गरमी मास में   बिन दाना पानि के़  एक गाेट छाेट कोठरी में   जाहि में नहि कोनाे जंगला  नहि राेशनदाऩ   बंद करि करखने छल ।बेसुध़   अहाँके त  दाॅती पदाॅती लागि रहल छल़   आे तमाॅ दुरगा के कीरपा सॅ़  आैचक में अहाँ के बाबूजी आबि गेला आआेह़ि जहन्नुम सॅ पिंड छाेडा कअहाँके अपना संगे लअयला ।
    एहेेन तस्वप्‍नाे में नहिं साेचल   अहाँ सन पित्तमरू आसहमिल्लू संग एहेन व्यवहार  ।केहेन केहेन मनुक्‍ख हाेइर्त अछि अहि दुनिया में   ।देखू  किंस्याति आे सब अहाँक महत्त्‍व बूझैथ ।
   कनि दिन माेन के एकदम शांत राखि पूजा पाठ करब  ।संसारक मालिक अवस्स कोनाे नै कोनाे नीक बाट सूझा देता ।
       भगवति अहाँ के रच्छा करैथ ।हम अहाँ लेल पूजा करब ।
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
                
 प्रिय रत्‍ना
   अहाँक अहरा ब्लॅाकक प्रभारी नियुक्‍त कएल गेल अछि ।फेर सॅ मुबारक हाे   इर् बङ प्रसन्नताकके गप अछि   हमर विनती छलैन्ह भगवति माॅ सॅ जे अहाँ के जिनगी सॅ दुखक कारी कचाेर  मेघ यथाशीघ्र  उङि क   नील लाेहित  अध्यात्‍म आसुखक चादरि बिछ बैत समय शीघ्र आबए ।
      अहाँ उचित अर्थ में अपन पएर पठाढ एक सफल सुयोग्य स्त्री भगेलहूॅ ।आब अपन आे न्याय पूर्ण प्रशासनिक क्षमता देखबियाै  जाहि लेल काआेलेज में एतेक भाषण दइर्त छलहूॅ ।
 आशा अछि जे अहाँ अपन दायित्‍व के नीक जकाॅ निभायब बी डी आे साहिबा ।
                              शेष शुभ
                   अहाँक संगी
                      शैली ।



                
प्रिय रत्‍ना
      बङ नमहर प्रतीक्षा के बाद अहाँ क चिठ्ठी भेंटल  ।इर् जानि हार्दिक दुख भेल जे अहाँ के तलाक भगेल ।खैर   जे भवित्‍व्य छल तेकरा के मेटा सकैत अछ़ि  ।आेना अहाँ जे  राेइर्ंया राेइर्ंया ठाढ करए बला  वर्णन    कएने रही आेहेन परिस्थिति में अहाँ सन पढल गुनल आफिसर के निर्वाह केना दुष्कर छल ।अपना दिस सॅ तअहाँ बङ कोरसिस केलियै निभाबए के  मुदा़  शराब पीबि कप्रतिदिन मार पीट करय वला मनुक्‍ख के भाग्य आभगवान भराेसे  सुधरए
लेल लाेक कत्तेक दिन धरि आस लगाैने दिवस गमावैत रहतै  
        अहाँ अपन माय आछाेटका भाइर् बहिन के अहरा लइर् अनलहू से नीक कएल ।आब अहाँ अपन राजनीतिक पटल  कनि आआेर विस्तृत करू ।देश विदेशक न्यूज सूनितै रहबै । लिखलहू जे अहाँक स्वर्गीय नाना बङ पहिने एम पी छलाह   आब आेत्तय के लाेक अहाँ के अपन प्रतिनिधि चुनि पार्लियामेंट में पठबए चाहैत अछि ।इर् तबङ नीक गप भेल ।अहाँक वक्‍तृत्‍व क्षमता आब खुजि कलाेकक साेझाॅ आयत ।
     अहाँ पहिने आेहि क्षेत्र विशेषक जातिगत आंकङा   आेकर   समस्या   विकासक लेल की सब आ केहेन कदम उठेबाक चाही अहि सब पगहीङ शाेध प्रारंभ करि दियाै  ।अहि क्रम में घरे घर जा कए स्त्रीगण सब सॅ गप करि आेकर सबहक दिल जीतबा के प्रयास करब   एक तआे रिजर्व सीट छै़  अहाँ के नाना के नाम तीस बरखक बादाे लाेकक ठाेर पआेहिना छैक  ।अहाँ सीधे ब्लाॅक सॅ देशक पालियामेंट में नहि पहुँच गेलहु तहमर नाम पकूकूर पाेसि देब ।
         बाहर अन्हार भगेलै़  सांझ मे तघर में रहनाए उचित नै । टहलए जा रहल छी ।
           बेस    फेर दाेसर चिठ्ठी में ।
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
प्रिय रत्‍ना
 अहाँ के चिठ्ठी में हमरा फेर सॅ मानसिक भटकाव के गंध लागि रहल अछि ।इर् की   लिखलहूॅ जे खैरा जिला के कलक्‍टर   जे अहींक बिरादरी के अछि  सदिखन रेशमकडाेरी नेने अहाँक पाछाॅ पडल रहैत अछि ।आेकराे वैवाहिक जीवन तेहने सन छै ।कनिया नै छै  गत भगेलै  वा छाेडि देने छै  ।हॅ आेहाे दाताैन के स्थान पभरिसक दारूए सॅ मुॅह धाेबति हेतैक़  लाल टरेस आॅख़ि  जेना   कोनाे हिंसक पशु़  ।मुदा अहाँके इज्जत सेहाे बङ करैत अछि    ताहि लेल अहाँ आेकर अवगुण नहि देख पाबै छी।खैऱ  अहि में हम अहाँ के की मशविरा दिय अहि क्षेत्र में तअहाँ अपने बङ चतुर सुजान छी ।
      ंमुदा कनि साेचू़  अहि में अहाँ के कोन उत्तकृष्ट भविष्य देखाय पङि रहल अछि ।आय नै काल्ह़ि  अपनाे तअहाँ कलक्‍टर बनिए जायब    ।हमरा जनतब अहाँ के अपन धियान इलेक्‍शन लङबा दिस लगेबाक चाही ।अपन प्रतिभा नष्ट नै हाेमए देबै  पैघ काज लेल अहाँ के जनम भेल अछि ।
           अखन घर में किछु पाहुन पङक आयल छथि ताहि में व्यस्त छी ।
                                आर सब कुशल मंगल
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
प्रिय रत्त्‍ना
अहाँके बङका पार्टी चुनाव लङबा लेल टिकट ददेलक़   बधाइर् हाे  ढेर रास उम्मीदवार कमध्य अहाँक टिकट भेंटनाए  सरिपहॅू एक गाेट पैघ गप अछि ।अहाँ के आग्रह जे हम मास दिन अहाँ के संगे रही़     अहाँ हमर ऋण कोशकी में पानि रहतै ता धरि नहिं बिसरब़  अपन माए बाबू सॅ बेशी हमर आभारी छी  जे घींच घाॅचि क  सजा सॅवारिकमनुक्‍ख सॅ विशिष्ठ मनुक्‍ख बना देलहूॅ      आेहि जन्मक माए़  बाप   भाय बहिनी   किछु नै किछु अवस्स छी  नै तके करै छै अनका लेल एतेक़  ।आन संगी सब तएको टा चिठ्ठी के उत्तर नहि पठाेलक ।
      ंहमरा विचारैं इर् सब गप बिसरि जाऊ  ।हाँस्टल में तनहिए   मुदा तेकरा बाद अहाँ के भाव विह्यवल चिठ्ठी सबहक उत्तर दइत दइर्त हम अहाँ के संगी अवश्य बूझय लागलाैं हैं   फ्रेंड इन नीड  इज अ फ्रेंड इन डीड  दाेस्ती अपना आप में एक टा मजगूत नाता छै  आेहाे दैवीक महान गिफ्‍ट छै ।
 हम नाेमिनेसन दिन अहीं के संग छी ।हमरा सॅ ज़त्तेक भसकत तैयार रहब ।
                  एतय बारिश झमाझम भरहल छै़  कत्तेक दिन सॅ मेघ लदने छलै   आय अपन माेनक सबटा मवाद जेना निकालि रहल हाेय ।
                         शेष सबटा गप भेंट भेला पहाेयत । 
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
प्रिय रत्‍ना 
     बधाइऱ्  बधाइर्  बधाइर्   ।ढाइर् लाख वाेट सॅ अहाँ जीत गेलहूॅ ।काउंटिंग काल कोनेा अपरिहार्य कारणे हम उपस्थित नहिं रहि सकलहूॅ ।बङ प्रसन्नता अछि सबटा वाेट अहाँ दूनू हाथे अपन झाेरा में हसाेथि लेलाैं ।आय एहेन लागि रहल अछि जेना  नब सूरूज अपना संगे नव प्रभात नेने चाराें दिशा सॅ मंगल गान करैत सिंहनाद करि रहल अछि ।अहाँ सॅ हमरा एहने सफलताक उम्मीद छल ।आब मनाऊ भरि छाॅक हाेरी  गाऊ खूब फाग  झाल मृदंग बजा बजा क
         मुदा एक गाेट गप सदिखन माेन पाङने राखब़  सांसद बनला उत्तर  क्षेत्र के जनता सॅ विश्वासघात नहिं करबै  आे सबटा वादा अवश्य पूरन करबै़  जाहि आधार पइर् महासंग्राम जतिलहुँ ।
       माेन पङि रहल अछि माॅ के कहबी  संगे संगे गाय चरेलहु  किसना भेल गाेसैयाॅ 
                     शेष शुभ । एक बेर फेर हार्दिक बधाइर् ।
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
प्रिय रत्‍ना़
  दूरदर्शन सॅ खबरि भेटल कि अहाँके स्त्री आअनुसूचित जाति   दूनू हाेबाक कारणे केबिनेट मिनिस्टरक पद सॅ नमाजल गेल अछ़ि    साेशल वेल फेयर मिनिस्टर    हिप  हिप  हुर्रे़   ।बङ प्रसन्न छी आय हम   एकदम गदगद   ।अपन परिजन संगे खुशी मनाबए जा रहल छी 
          अहू ठामक सांसदक विजय के खुशी में बङका विशाल जूलूस  जिन्दा बादकनारा लगबैत हमर घरक साेंझा राेड सॅ गुजरि रहल अछि ।
                अपार शुभ कामना के संग
                   अहाँक संगी
                      शैली ।
प्रिय रत्‍ना
   कत्तेक बेर अहाँ के चिठ्ठी लिखलहूॅ  टेलिग्राम  सेहाे पठाैलहूॅ  मुदा कोनाे जवाब नॅ भेंटल ।कत्तेक ताकि तुकि कअहाँ के फाेन नंबर उपरेलहूॅ   फाेन सेहाे कयलहूॅ  अहाँ के कोनाे पी ए  उठाैलक  नाम पता पुछि  कनि कालकबाद कहैत अछि मैडम बाहर गेल छथि   बाद में कखनाें गप करब ।बाद में सेहाे कत्तेक बेर फाेन कयलहूॅ   एयह जवाब 
    हम इर् बूझै लेल व्यग्र छी  जे मंत्री के रूप में अहाँ के केहेन केहेन अनुभव भरहल अछि ।कि सब करि रहल छी आदि ।
      जाैं चिठ्ठी भेटै तअवस्स पहुँचनामा पठैब ।लिखबा के जाैं टाइर्म नै भेटै तफाेन सएह खटखटा देबए ।आब तअहू शहरि में टेलिफाेन एक्‍सचेंज लागि गेल छै     घरे घर फाेन  गेलए ।फाेन नं पठा रहल छी   पी ए के सेहाे लिखा देने छी ।
             यथाशीघ्र संपर्क करब ।
                   अहाँक  शैली ।
प्रिय रत्‍ना
  आय अहाँ के अहि शहरक नव निर्मित स्टेडियम के उदघाटन करबा के छल ।अहाँ तहमरा बिसरिये गेलहूॅ  मुदा माेन नै पतियाय छल़   भेल   हमर लिखलाहा वासंदेश अहाँ धरि नहिं पहुँच रहल हाेयत ।
     भाेरे सॅ हम स्टेडियम के प्रबंधक आगण मान्य जनक संग अहाँ के प्रतीक्षा में एक पएर पठाढ रही किंस्यात अहाँ सॅ भेंट भजाए । अहाँ अयलहूॅ   उज्जर झक झक सिल्कक नूआ   माथ पबङ हल्लुक सन आॅचरि रखने़   आॅखि के धूपक करिका चश्मा सॅ झॅपने   भीङ सॅ फराक़  एक गाेट भव्य व्यक्‍तित्‍व ।  मुदा आॅखि पचढल चश्मा के  कारण प्रबंधकक कात मे ठाढ हमरा   शैली पएकटा दृष्टिपात सेहाे नञि कय सकलहूॅ ।कनि ढीठ बनि  हम आगाॅ बढलहूॅ तएक गाेट अपरिचित सन आैपचारिक  नमस्तेके मुद्रा में   दूनू हाथ जाेङि   लाल रिबन काटि गङगङाति ताली के मध्य उदघाटन समाराेह कबाद बङ व्यस्त सन लगैत अपन ताम झाम अमला संग निकलि गेल छलाैं  कत्ताै के आर प्राेग्राम छल ।
       अनायास सब टा गप हमरा बूझबा में आबि गेल छल    वा  हमर भ्क खूजि गेल छल ।लागल जे भरल बाजार मे कियो हमरा चाकू मारि कहमर करेज निकालि कनेने चलि गेल हाेय ।कत्तेक काल थरि हमर बकार नै फूटल छल ।
  अहीं के माेताबिक   हाँस्टल में हम अहाँ के अपन बेस्ट फ्रेंङनहिं बूझैत छलहूॅ  आब लागि रहल अछि    अहाँ एतेक पैघ नाटक किएक रचने छलहूॅ ।अहाँ के बेचैनी छल किछु करबा के   मुदा गाइर्ड के करितै़  आब जखन अहाँ एलीट क्‍लास के कहबए लगलहूॅ  पएरक नीचा के सबटा साेपान उखाङि फेंकलहुँ   स्वाभाविक छल   कियाक तअहाँ कहियो  क कराे बेस्ट की  फ्रेंड थरि कहाबए के जाेगर नहिं छलहूॅ आनहिं हाेयब ।
     अहाँक सबटा मगर मच्छी नाेर हमरा एकए क करि कमाेन पङि रहल अछि  हमर आत्‍मा जेना हमरे धिक्‍कारि रहल हाेय ।आेना उपरि सॅ खसबा के आेकरे डर रहैत छे जे ऊपर छै  हमरा की़ हम तनीच्चे ठाढ छी  ही दैट इज डाउन  नीड्स फियर नाे फाैल  ।हॅ जेना ताेता जकाॅ हमरा सॅ नजरि फेर लेलहूॅ तेना कंस्टीचुएंसी के लाेक संग नहि फेरबै़  प्रजातंत्र में जनते जनार्दन हाेइर्त छै़  जाैं आेहाे अपन मुॅह फेर लेत तमूहे बल धङाम सॅ धरती पखसब ।इर् हमर एक गाेट पहिल आआखिरी व्यक्‍तिगत काज बूझब ।            
                धन्यवाद     
                             एक टा शुभेच्छु


१.जगदीश प्रसाद मंडल--तिलासंक्रान्तिक लाइ २.कुमार मनोज कश्यप-मास्टर साहेब
जगदीश प्रसाद मंडल1947- गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.। कथा (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटक(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यास(मौलाइल गाछकफूल, जीवन संघर्ष, जीवनमरण, उत्थान-पतन,जिनगीक जीत- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।
तिलासंक्रान्तिक लाइ

धानक लड़ती-चड़ती पतराइते गमैया विद्यालयमे तिलासंक्रान्तिक पढ़ाइ शुरु भऽ गेल। विद्यालयक लेल ने जगहक कमी आ ने पढ़ौनिहारक। इनार-पोखरिक घाट सन पवित्र स्थान आ बिनु आरक्षणक महिला शिक्षक। शिक्षको इमानदार। ने टयूशन फीस लइत आ ने दरमाहा। पढ़वैक लेल एते उताहुल जे खेनाइयो-पीनाइक चिन्ता नहि। छोट दिन होइतहुँ भानस-भातक कौड़ियो भरि ढकार नहि। पावनिक विषय नमहर तेँ पूरा विषयक शिक्षक तँ नहि मुदा टुकड़ी-टुकड़ी कऽ कए अपना-अपना ढंगसँ अपन हिस्साक विषय पढ़बए लगलीह।
      पाँच दिन पहिनहि केदार कलकत्तासँ गाम आबि गेल। ओना ओ दुर्गोपूजामे सभ साल देबे करैत छथि, तिलोसंक्रान्ति सेहो नहिये छोड़ै छथि। कोना छोड़ताह? आब कि कलकत्ता ओ कलकत्ता रहल जे तीनि-तीनि दिन गाड़ीमे बैसल-बैसल देह-हाथ अकड़ि जाएत। आब तँ छह घंटाक रस्ता कलकत्ता थिक। तहूमे केदार अपन गाड़ी रखने छथि चाह-नास्ता कलकत्ताक डेरामे करैत छथि आ कलौ गाममे। हुनके सबहक तँ ई दुनियाँ आ देश छी। एक तँ बैंकक मैनेजरक दरमाहा दोसर कुरसीक कमीशन आ तहिपर सँ अपनो बैंकक शाखा खोलनहि छथि। कमीशने बेकतन तेँ स्टाफोक कमी नहि। कलकत्ता सन शहर जहिठाम भीखमंगो करोड़पति अछि।
      ‘‘गाममे जँ कियो मरद अछि तँ केदार छथि। गाममे के आँखि उठा कऽ हुनका दिशि तकलनि। अखनो सत्तरहटा अँचार, बीकानेरक पापड़ केदार छोड़ि तिलासंक्रान्तिमे के खाइत अछि। विधि पूर्वक जँ कियो पावनि करैत अछि तँ केदार छोड़ि दोसर के बाजत- ‘‘दतमनि करैत पोखरिक घाटपर जगदरवाली कछुबीवालीकेँ कहलखिन।
      साड़ी-साया रखि कछुबीवाली घाटपर बैसि झुटकासँ पाएर मजैत छलीह। मन चिन्तामे बाझल छलनि। काल्हिये पावनि छी ने चूड़ा कुटलौंहेँ आ ने मुरही भुजलौं। जाबे चूड़ा-मुरही नहि हएत ताबे लाइ कथीक बनाएव। गलती अपनो भेल जे अगते-ओरियान नहि केलहुँ। फेरि मनमे उठलनि, एक दिनक पावनि लेल महीना दिन पहिनेसँ ओरियान करए लागब। एतवे काज अछि। काजक दुआरे एको दिन ने समएपर नहाइ छी आ ने खाइ छी। जेकरा काज नइ छै सालो भरि पावनिये करह। कोनो की हम जनै छेलियै जे पनरह दिन पहिनेसँ शीतलहरी लाधि देतइ जहिसँ चूड़ा-मुरहीक ताड़ल धान भारले ने जाएत। जहि देवताकेँ पावनि करबनि हुनका एतबो बुत्ता नइ छन्हि जे अपनो पावनिक ओरियानक चिन्ता करितथि। फेरि मनमे एलनि जे चूड़ा-मूढ़ी तँ दोकानो-दौरीमे बिकाइत अछि। कीनि लेब। मुदा लाइ कोना हएत? चूड़ा-मुरही तँ अखड़ा होइत अछि अमैनियाक जरुरत नहि अछि। मुदा लाइ? केेेहन-कहाँ हाथे, केहन-कहाँ बरतनमे बनौने हएत। तहूमे आइ-काल्हिक बनियाँ सभ तेहन गइ-खोर भऽ गेल अछि जे गुड़क बदला छुऐमे बना पाइ टलिया लेत। दिनेमे मुरही-चूड़ा लऽ आनब आ रातिमे खेला-पीला बाद बना लेब। मन असथिर होइत रहनि कि जगदरवालीक बात मन पड़लनि। फेरि वापसी क्रोध रस्तासँ घुरि गेलनि। तुरुछ भऽ उत्तर देलखिन- ‘‘सत्तरह रंगक आ कि पचासे रंगक जे अँचार केदरबा ख-ए-त तइसँ कछुबीवालीक जीहक पानि मेटेतइ।’’
      श्यामा काकी चुपचाप नहा कऽ घर दिसक रस्ता धेलीह। अपना धुनिमे श्यामाकाकी। ने समाजसँ कोनो मतलब आ ने समाजक काजसँ। समाजक काजे बेढ़ंग अछि। ककरो कोनो ठेकान नहि। की बाजत आ की करत तेकर कोन ठेकान। एक्के मुँह जत्ते लोकसँ गप करत, एक्के गप तते रंगक बाजत। लगले किछु लगले किछु। तहूमे आब तेहन-तेहन अगिमूत्तू सभ भेलहेँ जे, जूरशीतलक मुइल नढ़ियाकेँ जहिना कुत्ता सभ अपना-अपना दिस दाँतसँ पकड़ि-पकड़ि घिचैत, तेहने भऽ गेल अछि। नै तँ कतौ ऐना हुअए जे एक्के गाममे एक्के पावनि दू-दिना, तीन दिना दुनू होय। तहन तँ जेकरा जे मन फुड़ै छै से करैए। सभ करत अपना मने आ हम करब लोकक मने। अपन जिनगी अछि अपन दुख-सुख अछि। अपनासँ पलखति हएत तँ दोसरो बच्चा दिशि देखब। नहि तँ अपन के सम्हारि देत? यएह सभ विचार श्यामा काकीक मनमे नचैत रहनि। चूड़ो-मूढ़ीक लाइ भइये गेल। तिलबो बनाइये लेलहुँ। कुरथियो-तेबखाक दालि अछिये। लोको सभ जीहक चसकी दुआरे कियो खेरही तँ कियो राहड़ि तँ कियो बदामक दालिक खिचैड़ बनबैत अछि। एते बात मनमे उठितहि काकीक विचार रुकि गेलनि। कुरथीक तुलना राहड़ि, खेरहीसँ करए लगलीह। पूसक संक्रान्तिक दिन पावनि होइत। राहड़ि चैत-बैशाखमे जहनकि बदाम फागुन आ खेरही जेठ-अखाढ़मे होइत अछि। तहिक हिसावे कुरथिये ने नवकी कनियाँ बनि घर अओतीह। ई बात मनमे अवितहि काकीक मन आगू बढ़लनि। हमरा सन दही ककर हेतइ? कियो लोहा महीसिक दूध पौरने हएत तँ कियो पोखरिक पानिक। मुँहसँ हँसी निकललनि। जेहने लोक सभ ठक भऽ गेल अछि तहने देवयो-देवता। अनदिना कियो दूधमे पानि फेटि कऽ बेचैए तँ बेचैए, पावनिमे जे हुनको सभकेँ खुआवैत छन्हि से ओ नहि बुझै छथिन। किऐक ने हड़हरी बज्जर खसा दैत छथिन। एते दिन हुनको सभकेँ शक्ति छलनि आब ओहो सभ डलडाक मधुर खा पेट बिगाड़ि लेलन्हि अछि। फेरि मन अपना दिस घुड़लनि। खिचैड़मे जम्बीरी नेबो नीक आ कि घीउ। मुदा एहि प्रश्नपर मन नहि अँटकलनि। खाइ बेरमे बुझल जाएत। फेरि मनमे खुशी एलनि। मुस्की दैत आँखि उठा कऽ तकलनि तँ दिनकरपर नजड़ि पड़लनि। मने-मन प्रणाम कए कऽ कहए लगलखिन- ‘‘एहनो जाड़मे अहाँ चास-वासकेँ भरि देने छियै। अपना लेल कोठी माल-जाल लेल टाल खेतक-खेत तरकारी, बाधक-बाध गहूम, दलिहन-तेलहनसँ सजल खेत। हे दिनकर बहुत जाड़ सहि जीवि रहल छी कल्लह फेरु। आँखि निच्चाँ होइतहि मनमे एलनि। आइये ने सीमापर (मकर रेखा) जएताह। काल्हिसँ तँ तिले-तिल ऐवे करताह।’’
      पावनिक छुट्टीमे ज्योतिषी काका गाम नहि अएलाह कि काकीकेँ आफद भऽ गेलखिन। ओना साल भरिसँ काकियोक मन बदलि रहल छन्हि। जत्ते वुधियार काकी भेलि जाइ छथिन तते काकासँ मत-भेद भेलि जाइ छन्हि। ज्योतिषी काकाकेँ काकीक ओहि किरदानीसँ हृदयमे चोट लगलनि, जहि दिन काकी काकाक पाइ (कमाएल रुपैआ) चोरा कऽ बुइधिक सर्टिफिकेट कीनि लेलखिन। ओही दिनसँ काकीक आफद कक्का आ काकाक आफद काकी भऽ गेलखिन। विद्यालयसँ अबैतखिन बाटेमे पावनिपर नजरि गेलनि। कने काल गुम्म भऽ उत्तर-दक्षिण -उत्तरायण आ दक्षिणायण-क सीमापर आँखि रोपलनि। आँखि रोपितहि हृदयमे हँसी उठलनि। जाधरि लोक दक्षिणायणमे मरैत अछि नर्क जाइत अछि आ उत्तरायणमे स्वर्ग। स्वर्ग तँ मनुष्य निर्मित छी जहन कि मकर संक्रान्ति ग्रह-नक्षत्रक प्रक्रिया छी। दुनू एक ठाम कोना भऽ गेल। बाटेसँ ज्योतिषी काकाक मनकेँ हौड़ने रहनि। आंगनमे पाएर रखितहि काकी टोकि देलखिन- ‘‘तलब भेटल कि नहि? अखन धरि कोनो ओरियान नहि भेलि अछि।’’
  काकीक बात सुनि काकाक मन लहड़ि गेलनि। आँखि गुड़ेरि काकीकेँ देखि ओसारक चैकीपर झोरा रखि हाथ-पाएर धोअए कल दिशि बढ़लाह। मने-मन काका सोचति जे सबकाज कालमे फँड़बन्ही करतीह आ टाका बेरिमे काका मन पड़ै छन्हि। काका अप्पन धुनिमे आ काकी पावनिक धुनिमे। तिलासंक्रान्ति संक्रान्तिसँ पावनि जे दंगलक अखाड़ापर उतरैबला अछि ओहि लेल अखन धरि हाथपर हाथ जोड़ि बैसलि छी। मुदा पहिलुके नजरि काकीकेँ डोला देलकनि। करेज काँपि गेलनि। मन निर्णय कऽ लेलकनि जे परिवारक गारजन पुरुख होइत अछि, मान-अपमान पुरुखक कपारपर चढ़त। हम तँ अनेने तबाह छी। जे आनि कऽ देता ओ बना कऽ आगूमे देबनि।
      कलपर पानि पीबि, आंगन आबि ज्योतिषी काका चैकीपर बैसि तमाकुल चुनवए लगलाह। अपन भलाइ सोचि काकी बाड़ी दिस टहलि गेलीह। मुँहमे तमाकुल लैत काका आँखि घुमा कऽ पत्नी दिस देलखिन। मन खुट-खुट करनि जे फेरि ने किम्हरोसँ आबि किछु फरमा दथि। मुदा सोझमे नहि देखि मन असथिर भेलनि। मनमे उठलनि, काल्हि मकर संक्रान्ति छी। जहिठाम सँ सूर्य दछिन मँुहे नहि बढ़ि उत्तर मुँहे घुमताह। सूर्यकेँ उत्तरायण होइतहि जीव-जन्तुमे सूर्यक प्रकाश नव स्फूर्ति पैदा करैत अछि। मौसमक बदलाव हुअए लगैत अछि। जहिसँ परिवर्तनक रुप देख पड़ैत अछि। मुदा लोकमे परिवर्तन की आओत? जे दछिनपंथी विचार व्यवहारिक रुपमे पर्वत सदृश्य अपन रुप बनौने अछि ओ चूड़ा-लाइ खेने भेटि जाएत।
      संक्रान्तिक पहिल संध्या अबैत-अबैत भोरमे नहेबाक कार्यक्रम तैयार भऽ गेल। एहि प्रश्नपर विद्यालयक सभ शिक्षिका एकमत भऽ गेलीह। एहि कार्यक्रममे एकटा फनिगा आबि गेल। फनिगाक गंधसँ वातावरणमे गंध आवि गेल। गंध ई जे पोखरिक घाटक तरमे कमलेसरी (कमलेश्वरी) महरानी चूड़लाइक छिट्टा रखने छथिन। जे पहिने नहाइले जाएत ओकरा देथिन।
  टेल्हुक धिया-पूतासँ लऽ कऽ ढेरबा धरि अपन दावा ठोकए लगल जे पहिने हम नहाएव आ कमलेसरी महरानीक चूड़-लाइक छिट्टा आनव। अपन-अपन शक्तिकेँ जगबैत संकल्पित हुअए लगल।
      जारन तोड़ि कऽ अबैत काल अझप्पे पोखरिक घाटक तरमे कमलेसरीक चूड़-लाइक छिट्टा गोपला सुनलक। मुदा किछु दोहरा कऽ नहि बुझए चाहलक। माथपर ठहुरीक बोझ रहै। मुदा भारीकेँ मनसँ हटा चूड़ा-लाइक छिट्टापर पड़लै। बड़का छिट्टा। जेहन बड़का छिट्टा भत-भोजमे भात-झकैक लेल होइत छैक। भरिये दिन ने पावनि छी, कते खाएव। मनमे खुशीक अंकुरा उगलै। घरपर आबि जरनाक बोझ रखि संकल्प केलक जे सभसँ पहिने हम घाटपर जाएब। गहीर गोपला विचारकेँ गोपनीय रखलक। माइयो-बापकेँ नहि कहलक।
      बारह बजे रातिमे नीन टुटितहि गोपला माए-बापकेँ बिनु किछु कहनहि पोखरि दिस विदा भेल। माए बुझलनि जे लघी-तघी करए निकलल। बुधबा (पिता) नीन, तेँ बुझबे ने केलक। जहिना प्रेमीकेँ अपन प्रिय छोड़ि दुनियाँमे किछु नहि देखि पड़ैत तहिना लाइक छिट्टा छोड़ि गोपला किछु नहि देखैत। दुलकी मारैत पोखरि दिस बढ़वो करै आ आँखि-कान उठा-उठा आगुओ ताकै जे क्यो दोसर ने तँ बढ़ि गेल। ने कानसँ कोनो भनक बुझि पड़ै आ ने अन्हारमे किछु देखए। किछु काल देखि माए बान्हपर आबि तकलक तँ गोपलाकेँ नहि देखलक। मनमे टराटक लगए लगलै। जे एते अन्हारमे कतए चलि गेल। भरिसक भकुआएलमे किम्हरो चलि ने तँ गेल। मुदा अन्हारमे देखबे कते दूर करब। ओह से नहि तँ हुनाको (पति) उठा दुनू गोटे चोरबत्तीक हाथे तकबै। सएह केलक।
      पनरह-बीस दिनसँ शीतलहरी चलैत। लागल-लागल पछियो संग दैत। घुरक आगियो मैलमुँह भेल रहैत अछि। गोपलाकेँ ने रस्ता अन्हार बुझि पड़ै आ ने पोखरि दूर, ने जाड़ बुझि पड़ै आ ने पोखरिमे पानि। साक्षत् ब्रह्ममे लीन भक्त जेकाँ गोपलो लाइमे लीन भऽ गेल। पोखरि पहुँच घाटक तरमे गोपला हथोरिया दिअए लगल। जाधरि लाइक आशा मनमे रहए ताधरि खूब हथोड़लक। हथुरैत-हथुरैत बर्फ जेकाँ मन जमि गेलइ। जाड़ बुझि पड़ए लगलै। सौँसे देह थरथर कँपैत रहए। गोपालक मन मानि गेलै जे मरि जाएब। पोखरिसँ उपर भऽ घर दिसक रास्ता धेलक। ताधरि चोरबत्तीक हाथे आगू-आगू माए आ दू लग्गा पाछु पिता पेना नेने जाइत। फड़िक्केसँ माए थर-थर कँपैत गोपलाकेँ पुछलक- ‘‘गोपाल।’’
  गोपाल सुनि बुद्धूकेँ खौंझ उठल बाजल- ‘‘मिरगी उठल छलौ जे पोखरि आएल छेलँे?’’
      थरथराइत गोपलाकेँ अपन आँचारसँ माए पानि पोछए लगली। गोपलाक दशा देखि पिताक मन पघिलए लगलैक। जहिना गंगा स्नानक बाद नीक विचार मनमे उपकैत अछि तहिना बुद्धुकेँ मनमे उपकलैक। सोचए लगल आइ जँ परि जाइत तँ दिनमे ककरा तिल-चाउर दैतियैक के तिल बहैत। दछिनबारि टोलमे दखै छी सबहक बेटा-पुतोहू बाप-माएकेँ छोड़ि चलि गेल अछि। अपने सभ बुढ़ियाँसँ नवकी कनियाँ जेकाँ तिलकोर तडै़ छथि। तिलकोरक तरुआ केहन होइ छैक ई तँ बुढ़िये कनियाँ सभ वुझै छथिन। जिबठ बान्हि बुद्धु गोपलकेँ पजिया कऽ पकड़ि कोरामे लए डेगगरसँ आंगन दिस बढ़ए लगल। आंगन आबि पुआर धधकबए लगल।
      जहिना गोपलाक देह भीजल तहिना देहमे सटल गंजी-पेन्ट। मुदा कपड़ा बदलैक साहस नहि भेलइ। देह कठुआएल, हाथ बिधुआएल, ओंगरी ठिठुरल। मुदा कनियेँ कालक बाद टनकल। दुनू परानी बुधबो जाड़सँ ठिठुरल रहए। तीनू टनगर भेल। टनगर होइतहि गोपाल माएकेँ कहलक- ‘‘अंङी-पेंट आनि दे।’’
      गोपाल पेंट-शर्ट पहीरए लगल। अखन धरि तीनूक सिरसिराएल मन आगिक गरमी पाबि बसन्ती हवामे टहलए लगल। बुद्धु पत्नी दिस देखि हाथ पकड़ि पहुँचल फकीर जेकाँ बाजल- ‘‘आइ गोपला हाथसँ चलि जाइत। सबहक अंगनामे पावनिक उत्साह रहितै आ अपना दुनू गोटे बेटाक सोगमे करैत दिन बितैबतौं।’’
      पिताक बात सुनि आशा चैंक गेलि। जना भूमकमक धक्का धरतीकेँ लगैत तहिना आशाक हृदयमे धक्का लगल। धड़फड़ा कऽ उठि कोठीपर राखल मुजेलासँ दूटा गोल-गोल लाइ लेने गोपलाक हाथमे देलक। हाथमे चूड़ाक लाइ अबितहि हबक मारलक। मुदा तेहन सक्कत जे ठोर चँछा गेलइ मुदा दाँतसँ लाइ नहि कटलै। माएकेँ कहलक- ‘‘लाइ कहाँ टुटैए।’’
      बेटाक बात सुनि आशाक मनमे खुशी उपकल। अपन कारीगरीक परीछामे पास देखि मुस्की दैत पति दिशि देखि बाजलि- ‘‘तेहेन पाकमे लाइ बनौने छी जे बिना सिलौट-लोढ़ीसँ सुनत।’’
      बेटाकेँ बुद्धू पुछलक- ‘‘आइ तँ कतौ नाचो-ताँच ने होइ छै तखन किअए तू रातिमे एते दूर चलि गेलेँ।’’
  बितहिमे आशा बाजलि- ‘‘लघी-तघी करैले उठल हेतै, भकुआएलमे बौआ गेल हेतै।’’
  हाँइ-हाँइ गोपाल मुँहक लाइ कऽ चिबा घोटि कऽ माए दिस देखि बाजल- ‘‘लोक सभ साँझमे बजै छेलै जे पोखरिक घाटक तरमे कमलेसरी महरानी लाइ रखै छेथिन। वहाए अनैले गेल रहौं।’’
  गोपलाक बात सुनि बुद्धुक मन माहुरा गेल। मने-मन बाजल जे अपना कमेने नहि होएत ओ भोला बावा बड़दक.......। मुदा क्रोधकेँ एहि दुआरे मनमे दबने रहल जे गामक लीला सभ आँखिक सोझमे नचए लगल रहैक। जे सभ जुआनीमे, मद-मस्त भोम्हरा जेँका जिनगी बितौलनि, बेटा-पुतोहूक चलैत मुँहसँ धुँआएल चुल्हि फूकए पड़ैत छन्हि। जाहिसँ दुनू आँखिमे नोर टघरैत रहैत छन्हि मुदा ओ हृदयक व्यथा नहि, धुँआ लागब बुझैत छथि। बुद्धूक हृदय पसीज गेल। मुरखो अछि तइयो तँ बेटे छी। बरखे ने चैदहटा भऽ गेलइ, मुदा भरि दिन तँ असकरे लग्गी लऽ कऽ बोनाएल रहैए। ने खाइक ठेकान रहै छै आ ने नहाइक। तहन बुद्धिसँ भेंट कोना हेतइ?
      बेटाक बात सुनि माएक मन उमड़ि गेलनि। बुझबैत बजलीह- ‘‘रौ औआ अपना की कोनो चीजक कमी अछि। जते रंगक धान गिरहतकेँ होइ छै तते अपनो ने होइए। सतरियाक चूड़ा कुटने छी, लाइ बनौने छी आ ओकरे खिचैड़ियो रान्हव।’’
      पछुआरक रस्तापर गल्ल-गुल्ल सुनि आशा घरसँ निकलि डेढ़ियापर पहुँचलीह कि महरैलवालीक बाजब सुनलनि। डेढ़ियेपर ठाढ़ि भऽ कए सुनए लगलीह। महरैलवाली हड़ड़ीवालीकेँ कहलखिन- ‘‘हम तँ आध पहर रातिये नहेलहुँ। अखन धरि अहाँ पछुआएले छी।’’
  हड़ड़ीवाली- ‘‘अहाँ जेकाँ रातिमे कुकुड़ घिसियेने छलहुँ जे भोरे नहा पाक हएव।’’
      दुनू गोटेक गपकेँ दबैत तमोरियावाली जोर-जोरसँ पुतोहूकेँ कहैत रहथिन- तीनि दिनसँ बोखार छेलह तहन किअए भोरे ऐहन समएमे नहेलह?’’
      मुदा पुतोहू उत्तर नहि देलकनि। आशाकेँ मन पड़लनि जाड़सँ कँपैत गोपाल।
२.
कुमार मनोज कश्यप
मास्टर साहेब

परोपट्‌टा भरि मे मास्टर साहेब के नाम सँ चिन्हल जायवला  भगवानबाबू आब एहि दुनिया मे नहि रहलाह --ई समाचार सुनिते भरि गामक लोकक बीच मे हुनकर व्यत्तित्व आ कृतित्वक मादें क्रिया-प्रतिक्रिया होमय लागल । हुनकर अंतिम दर्शनक हेतु लोक सभ जुटऽ लागल ।

मास्टर साहेब नेनपन मे पढ़ेने तऽ हमरो छलाह़़ओ गामक स्कूल मे मास्टर आ हम गामक बच्चा़हुनका सँ नहि पढ़ितौं तऽ जयतौं कतऽ ? हमरो मोन कहलक जे गुरूदेवक अंतिम-दर्शन कऽ अपन श्रद्धांजलि दऽ आबी । अपन बाल सखा आलोक सँ पुछलियै- ' चलबैं ?' ओ छुटितहिं मुँह बीचकबैत बाजल- 'धुर्‌ ! की जाऊ देखय हुनका । तेना पढ़ेलनि जे कतहु गोड़ा नहि बैसल । ' ओकर स्वर मे विषाद तऽ स्पष्ट छलैक मुदा मुईनाहर के बारे मे एहन वत्तव्य तऽ साईत नहिये हेबाक चाही ।

पढ़ाई तऽ मास्टर साहेब के ठिके शून्ये छलनि। क्लास मे आबते ककरो ठाढ़ करा कऽ कहैत छलखिन कोनो पाठ जोर सँ पढ़ऽ आ अपने टेबुल पर पैर पसारि लगैत छलाह फोंफ काटऽ । जहाँ केयो कनेको बाजल किं एक दिस सँ सभ के छौंकिंया दैत छलखिन । बच्चा सभ मास्टर साहेब के 'दुख-हरणी '(पाकल बाँसक छौंकी) नामे सँ थर-थर कँपैत छल।

आलोक पर तऽ मास्टर साहेब के खास ध्यान रहैत छलैन । हुनकर घर आ स्कूल सटले छलै । जऽन-हरवाहक  पनपीयाई स्कूले लऽ आबथि आ आलोक जा कऽ ओकरा सभ के पनपीयाई कराबय । एकदिन बहाना बनबैत कहबो केने रहनि जे हमर पढ़ाई छुटि जायत । मास्टर साहेब ओहो बहाना के विफल करैत कहने रहथिन - 'तों जो, ताबत हम पढ़ाई रोकने छी । ' ओकरा गेलाक बाद बाजल रहथि - 'कहुना कऽ बईलेलौं ओकरा । ओ क्लास मे रहैत तऽ ककरो पढ़ऽ नहि दैत ।' पनपीयाई पहुँचेबाक बाद व्रमशहे आलोक मास्टर साहेबक कपड़ा खिचब सँ लऽ कऽ घरक अनयान्यो काज करऽ लागल ।

एक दिन मास्टर साहेब क्लास मे आबते आलोक के ठाढ़ होमय कहि कऽ ओकरा कहलखिन- 'अलोक ! काल्हि तोहर बाबू भेटल छलाह। कहैत छलाह जे आलोक हिन्दी मे बड़ कमजोर आछ से कने आहाँ ओकरा पर ध्यान दियौ़साँझ मे एक घंटा पढ़ा देल करियौ । ' पेर आदेशक स्वर मे बजलाह -'तों काल्हि सँ पाँच बजे साँझ मे हमरा ओतऽ आबि जायल कर पढ़बा लेल ।' सभ विद्यार्थी आलोकक मुँह दिस ताकऽ लागल छल । जे मास्टर साहेब क्लास मे नहि पढ़बैत छथिन से आलोक के ट्यूशन पढेथिन  ककरो विश्वासे नहि होई ।

स्कूलक छुट्‌टी होईते तमतमायल आलोक सीधा अपन बाबू सँ जा कऽ पुछलकै जे मास्टर साहेब के की कहि देलियैन । ओ तऽ पहिने चवुएलाह पेर याददाश्त पर जोर दैत बजलाह--' अच्छा, अच्छा । अरे हम किंयैक कहबनि ट्यूशन पढ़ेबाक हेत ु। काल्हि चौक पर अपने कहऽ लगलाह जे आहाँक बेटा हमर विषय मे बड़ कमजोर आछ । ओकरा किंयैक नहि पठा दैत छियै हमरा ओतऽ पढ़ऽ लेल़़हम किं कोनो पाई लेबै। '

से मास्टर साहेब आब नहि रहलाह। हुनकर अंगना मे  लोकक भीड़ बढ़ले जा रहल छल । जनि-जाति ओघढ़िया दऽ रहल छल़़पुरूष-पात्र अंतिम-यात्राक तैयारी मे जुटल छल । मास्टर साहेबक नश्वर शरीर भने पंच-तत्व मे विलिन भऽ जाउन ; मुदा हुनकर व्यत्तित्व के लोक कोना विसरि सकत ।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...