Saturday, February 27, 2010

'विदेह' ५२ म अंक १५ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५२)- PART IV

३. पद्य

३.१. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ

३.२. गंगेश गुंजन:अपन-अपन राधा १८म खेप

३.३. कामिनी कामायनी-वसंत
३.४. शिव कुमार झा-किछु पद्य

३.५. आमोद कुमार झामैथिल नँइ–छोटका

३.६. सरोज ‘खिलाडी‘-गीत

३.७.१.सत्यक जीत- सतीश चन्द्र झा२. मनोज कुमार मंडल ३.कल्पना शरण-नुकाएल दिनकर
३.८. कालीनाथ ठाकुर, -एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ२. तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक
स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे 1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह। माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह। अंतरस्नातक समस्तीपुर कॉलेज, समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंड कर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभ कयलनि। बालहिं कालसँ कविता लेखनमे विशेष रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि। साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादक डाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे, डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना ‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि । डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |




!! डहकन !!

मोॅछ लागल औ करकर मोॅछ लागल औ,
बुडहा समधिक नाकक नीचाॅ कर - कर मोॅछ लागल औ ।।

खोंच लागल औ खरखर खोॅच लागल औ,
भृत्या समधिनक गालक ऊपर बरबर खोॅच लागल औ,

सऽमधि बनला वन विलार चढला बोहुक चिनुआर
ताबरतोड़ करौछक मारि देखि कऽ सोच लागल औ,
खोंच लागल..................................................... ।।

समधिन पड़ले पड़लि ऊतान, झाड़थि अपन पुरनकी शान,
सऽमधि गोरथारी दिसि ठाढ़ कपै छथि कोच लागल औ
खोंच लागल..................................................... ।।

समधिन ऊपर सऽमधि तऽर हुड़ियाठल गतर गतऽर
नूआ केर मुंडी सॅ डोराडोरि मे, घोॅच लागल औ,
खोंच लागल..................................................... ।।



!! राघव सरकार !!

सुनिऔ औ राघव सरकार केहेन कऽ देलिऐ उपकार
गमकल चरण कमल रज सॅ हम्मर सऽड़ल जिनगी ।।

दुलकल दुलकल राजभवन सॅ आयलऊॅ आश्रम हुलसल मन सॅ,
अकारण देखि ऐहेन उपकार चकित भऽ रहल सकल संसार
गमकल....................................................................... ।।

लुटा गेल सर्वस्व हमर छल के सुधि लितय मजाल ककर छल,
अपने दया सिन्धु अवतार कयलहुॅ बरका चमत्कार ।
गमकल....................................................................... ।।

मानव की कीट पतंग चरि हमरा त्यागि पड़ायल हे हरि,
हरलहुॅ भारी पापक भार कयलहुॅ डूबल नैया पार ।
गमकल....................................................................... ।।

चरण बढ़ाउ कृपालु खड़ाडी नेह नोर सॅ लाउ पखारी,
पोछि आॅचर सॅ बांटवार करब हम तरवे केॅ श्रृंगार ।
गमकल....................................................................... ।।

गंगेश गुंजन:
जन्म स्थान- पिलखबाड़, मधुबनी।श्री गंगेश गुंजन मैथिलीक प्रथम चौबटिया नाटक बुधिबधियाक लेखक छथि आऽ हिनका उचितवक्ता (कथा संग्रह) क लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटल छन्हि। एकर अतिरिक्त्त मैथिलीमे हम एकटा मिथ्या परिचय, लोक सुनू (कविता संग्रह), अन्हार- इजोत (कथा संग्रह), पहिल लोक (उपन्यास), आइ भोर (नाटक)प्रकाशित। हिन्दीमे मिथिलांचल की लोक कथाएँ, मणिपद्मक नैका- बनिजाराक मैथिलीसँ हिन्दी अनुवाद आऽ शब्द तैयार है (कविता संग्रह)।१९९४- गंगेश गुंजन (उचितवक्ता, कथा)पुस्तक लेल सहित्य अकादेमी पुरस्कारसँ सम्मानित ।

अपन-अपन राधा १८म खेप

ओना ई सबटा आत्मप्रतारणाक जे थिक हमर अपनहिं उपाय अंततः थिक कि एकर जड़ि आ आरंभ ? किएक बनल रहैत अछि हमर एहन दिन-राति-दिन? जीवन जगतक कोन आवश्यकता आ तकर उद्योग हेतु हमर ई निष्क्रिय जीवन-चर्या, आइ आइ भ' गेल कए दिन ।हम जे एना एहि तरहें सब सं कटि क', छूटि क' सबसं सौंसे समाज कें क' एक कात हम जे चलि रहल छी अपन आ अपनहिं एकान्त बाट तकर अर्थ की आ महत्व ? सबटा अछि गति विधि ठप्प, सब किछु ठाढ़ । गाछ-बृक्ष ठाढ़ से तं बेश, लगैत छैक बेजाय मेघक तारा पर्यन्त जे जानि नहि, चलैत छैक आ अपन-अपन स्थान बदलि लैत छैक बा नहिं, ज्ञात नहिं, धरतीक लोक कें तं बुझाइत रहैत छैक स्थिरे भने कौखन क' बुझाइत टिमटिमाइत जेकां मुदा ई मनुक्ख आन प्राणी ई नहिं रहबाक थिक ठाढ़ बेशी काल नहि चाही स्थिर ई थिक अधलाह, असुन्दर । कारण जे ठाढ़ रहब थिक निष्क्रिय कर्म । मनुष्यक महिमा तँ अछि-सकर्मके सकर्मक ।
भने ओ ठेहुन मोड़ने बैसल-बैसल बाँटि रहल हो साबेक जौर। बीच-बीच मे करैत सक्कत अपन मुरेठा, भने रोमि रहल हो कुकुर-बिलाड़ि, भने मोछे पिजबैत हो बड़ी-बड़ी काल-आत्मलीन !
भने मनुक्ख तोड़ैत बेलपात-फूल । लोढ़ा करैत कटनी भ' गेल खेत मे मनुक्ख । एत' धरि जे नीक लगैत अछि-नीक ! अर्थात सक्रिय किछु करैत । मुदा बच्चा कें करैत दुलार । बैसोने कान्ह पर अपना लगैत अछि लोक दिव्य आ विश्वासी । लगा रहल सानी-पानी माल जालक मनुष्य। आ तहिना पोखरि, धार मे गाय-गोरु-बाछी कें नूरी सं मलि मलि क' नहबैत। एहि सबटा परिस्थिति आ रूप मे मनुष्य सत्तेक मनुष्य बुझाइत अछि। स्त्रीयो तहिना लगैत अछि पिहुआ कें अपना स्तन सँ लगा पिआ रहल दूध ! सुन्दर, वास्तविक ।
स्त्रियो थिक तखनहिं मनुक्ख।
ओहो नहि लगैत अछि बिनु किछु करैत, निष्क्रिय बैसलि बा सूतलि-नीक नहि लगैत अछि स्त्री। कम सं कम अयनाक सोझाँ बैसलि निंहारैत अपन देह-मुख । कम सं कम यत्न आ मन सँ दुनू आँखि केन्द्रित क' दर्पण मे सटैत भाल पर मोन पसिन्न टिकुली , स्त्री एतबा करैत नीक लगैत अछि।बैसलि आ चुप्प स्त्री कथमपि नीक नहि लगैत अछि। बैसलि स्त्री बुझाइत अछि-गृहस्थीक बस्तु जात, जेना-खाट-चौकी-चूल्हि-घैल आ हाँसू बाढ़नि इत्यादि...। स्त्री एहन आ एतबे कदापि ने नीक लगैत अछि।




घोघ तनने डेराएल-धाखें दबल-सहमल बेमोनक मर्यादा ऊघैत सेहो नहि लगैत अछि-स्त्री। किछु मास,दिन कनियाँ-बौआसिन बनलि रहबाक अतिरिक्त बड़ दिब लगैत अछि ओ तथापि,घोड़ैत रंग, बनबैत फाहा करैत चित्रकला,बना रहलि धुरखुर पर कदमक गाछ सप्त पुरइन पात । सूर्य-चन्द्रमा-तारा आ नब नब कोहबरक करैत विन्यास,गबैत गौरी-पूजा काल गीत।अर्थवान सत्य आ तें बड़ विश्वसनीय लगैए स्त्री। सखिसंगीक हेंज मे माथ पर काँख तर लेने घैल पोखरि इनार सँ अबैत हँसी ठट्ठा करैत स्त्री। प्रेमासक्त पुरुष-मुख चुम्बित होइत लगैत अछि विलक्षण ।मुदा टटका घैल सदृश् भरल दूध-वक्ष धरौने नेना, बनि जाइछ स्वयं एकटा अनिर्वचनीय कलाकृति ।एक संग अपने कला आ अपने कलाकार! स्त्री-आँचर तर शिशु पल्लव मुख मे देने निज प्राण-रस थन, नीक लगैए।-दिव्य अलौकिक । -" से तों कोना क' बुझलहिक राधा ? तों ? ई तं छौक नहि तोहर अपन अनुभव। तखन...?" चिहुँकि उठली राधा-ऐं प्रश्न अछि कि ई कोनो आकाशवाणी ? एकान्तहु असकर मे सम्हारि लेलनि माथ पर नूआ, झाँपि लेलनि छाती। नख-शिख सम्हारैत आँचर भ' गेलीह अस्तव्यस्त। लाजें निहुंरि गेलीह। भ' गेलीह कठौत । ठकमूड़ी लागि गेलनि। सोझाँ मे ठाढ़ सद्यः श्रीकृष्ण ! सरस कुटिल मुस्किआइत, चाहैत जवाब एहि स्त्री रूपक। -" माधव अहाँ ?" एतबे तं बाजि सकलीह राधा। तत्क्षणें भ' गेलीह तुरन्ते स्पर्शित लजबिज्जी !- फेरो एक बेर धोखा ,पुनः कएल छल । जानि नहि ई कपटी सं कहिया भेटत कल ? ने सोझाँ अबैत छथि ने चल्ले जाइत छथि चित्त सँ ।
कामिनी कामायनी

वसंत
नाचि रहल नब नब तरंग
नूतन बसंत नूतन बसंत ।
नब ताल वृन्द़ नब छाग फाग़
न्ब गेह देह नब पात़ साग ।
नब बाट हाट नब प्रीत गीत
नब लाेभ क्षाेभ नब हास्य रूदन
नवनीत रूप नब कमल नयन ।
मन हर्षित भ’ नितराति कहल
आयल बसंत नबका वसंत ।
नब सखी सखा नब मधुर रास
नबका सूरूज नबका प्रकास ।
नब तालमेल नब धूर खेल
नब जान माल नब वृद्द बाल ।
सब तर मदमातल छै अनंग
नब नब बसंत नूतन बसंत़ ।
नब स्वप्न नयन मे उठल उठल
उल्लास हिय मे भरल भरल ।
रज कण सॅ झाॅकैत अछि पर्यन्त
नबका बसंत नबका बसंत ।
नब कुसुम कली सकुचाय उठल
मदमस्त भ्रमर मॅडराय रहल
कुहुक काेयलिया गाबि रहल
रस रंग सुधा बरसाय रहल ।
अल्हड बसात चलै सनन सनन
गंंंमकि उठल नंदन कानन ।
आयल गायल मन माेहि चलल
नूतन वसंत नब नब वसंत ।
शिव कुमार झा-किछु पद्य ३..शिव कुमार झा ‘‘टिल्लू‘‘,नाम ः शिव कुमार झा,पिताक नाम ः स्व0 काली कान्त झा ‘‘बूच‘‘,माताक नाम ः स्व0 चन्द्रकला देवी,जन्म तिथि ः 11-12-1973,शिक्षा ः स्नातक (प्रतिष्ठा),जन्म स्थान ः मातृक ः मालीपुर मोड़तर, जि0 - बेगूसराय,मूलग्राम ः ग्राम $ पत्रालय - करियन,जिला - समस्तीपुर,पिन: 848101,संप्रति ः प्रबंधक, संग्रहण,जे0 एम0 ए0 स्टोर्स लि0,मेन रोड, बिस्टुपुर
जमशेदपुर - 831 001, अन्य गतिविधि ः वर्ष 1996 सॅ वर्ष 2002 धरि विद्यापति परिषद समस्तीपुरक सांस्कृतिक ,गतिवधि एवं मैथिलीक प्रचार - प्रसार हेतु डाॅ0 नरेश कुमार विकल आ श्री उदय नारायण चैधरी (राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त शिक्षक) क नेतृत्व मे संलग्न



!! अंतिम छंद !!
(बाल साहित्य)

सात बरख केर जखन वयस छल,
विहुंसल मन उजड़ल मकरन्द ।
एखनहुॅ क्षण - क्षण हिय सॅ उफनय,
माय जे वाजलि अंतिम छंद ।।
सुनू पूत हम छाड़ि अवनि केॅ,
जा रहलहुॅ विधना केर घऽर ।
अपन तात केॅ कोॅचा पकड़ू,
मानि जननि शीतल आॅचर ।।
हमर चरण धऽ लियऽ अहाॅ प्रण,
तनय धरम केर राखब मान ।
कर्म डगरि पर हमर छाॅह संग,
बढ़ब करैत पितृक सम्मान ।।
हंसवाहिनी चरण मे अर्पित,
अपन शीश दऽ सोखब ज्ञान ।
नीच बाट पर डेग नहि राखब,
जीवन मे करब नहि सुरापान ।।
केहन दृष्ट अदृश्य व्याधि ई,
सभ किछु बूड़ल अहाॅ भेलहुॅ दीन ।
हिय नहि हारू एहि अखिल भुवन मे,
छथि कतेक लाल साधन विहीन ।।
अम्बुज अहाॅ केॅ हमर शपथ थिक -
विलोचन सॅ जुनि बहबू नोर ।
शिखर लक्ष्य केॅ निश्चित साधव,
दैत मातृ स्मृतिक वोर ।।
हुनक दिव्य आशीष प्रताप सॅ,
भेल धन, मन, यश पूरित जीवन ।
मुदा ‘माय’ गुंजन जौ सुनि हम,
रोम - रोम सॅ उपटय क्रन्दन ।।

!! ऋृतुराज !!

सोहर गावथि कोइली बहिना,
कीर मधुर ध्वनि बजबथि साज ।
जननी वीणा वादिनी हर्षित,
अवतार लेलनि सद्यः ऋृतुराज ।।
गर्वित उपवन मधुपक गुंजन,
वर्णक पुष्पक दिव्य सोहनगर ।
सरिता लवलव शांत उदधि छथि,
मऽहु रसाल में उमड़ल मज्जर ।।
माघक सातम धवल इजारिया,
भेल नवल ऋृतु नृप छठिहार ।
चिनुआर भरल पायस पूआ सॅ,
कुलदेवी साजल उपहार ।।
भगजोगिनी केर पंचम सुर सुनि,
आंगन महमह मुग्ध दलान ।
दशोदिशि मलमल गेना फूलल,
सरिसब बूट भरल खरिहान ।।
रवि संग सुषमा अछिंजल उष्मा,
पात-पात पर पछवा वसात ।
विरहिनी बैसलि कंत आश मे
वयः ताप सॅ उपटल गात ।।
मातु उमा मन मुदित विभूषित,
सजल नुपूर चरण चमकल ।
शिवरात्रिक अवाहन भेलै,
नाथ कुशेश्वर छथि गमकल ।।
संवत जड़ल आ होली आयल,
अबीर गुलाबी हरियर लाल ।
क्षितिज धरित्री एक बनल छथि,
ढ़ोलक डुग्गी झाॅझक ताल ।।
छोट पैघ केर भेद मिटायल,
वृद्ध जुआन संग मे बाल ।
छोटकी कनियाॅ ठोर रंगलि आ -
बऽरक भरल पान सॅ गाल ।ं
भैया भांग सुधा मे सानल,
शिथिल पड़ल छथि माॅझ ओसार ।
रंगलहुॅ हऽम भौजीक चरण केॅ,
विदा बसन्त एहि लोक सॅ पार ।।
आमोद कुमार झा, पिता: श्री दयानन्द झा, ग्राम : मोगलाहा, पोस्ट: मिसरौलिया, भाया: बाबूबरही, जिला : मधुबनी, जन्म : 01/11/1968, शिक्षा: बी.ए.(मैथिली), एम.ए. (मैथिली), एन.इ.टी–जुलाइ–1996, बी.इ.टी।


मैथिल नँइ–छोटका
नइ हइ ककरो गरज
शहरे अउरमे करे हइ
बड़का–बड़का पार्टी आ सम्मेलन
गाम अउरमे हमरा सुहूनकेँ
नइ बुझइ हइ मैथिल..
हमरा अउरकेँ बुझइ हइ ‘छोटका’
गिरहत अइयग एक दिन
बजलिऐक आ बइसे गेलिऐक..
खुर्सीयेपर फज्झति कऽ कऽ
उठा देने छऽल गऽ बभना
हमरा सुहून नइ बुझइ–गमइ हिअइ
‘मैथिली’ हइ हमरा अउरक भाषा
सभ दिन बएह अउर बुझलकै
माने विद्यापति हइ ओकरे
अउरक बुझू दादा–परदादा
ई युग हइ लोकक
कहबी हइ दस टके नइ नितराय
दस सगे नितराय
नइ करइ हइ कहियो
राजा लोरिकक समारोह
देवता सलहेसक फंगसन
कारिख पघियारक गाथा
कियो कहाँ याद करइ हइ
बंठा चमारकेँ..
करौक एकर परचार–परसार
गाम–घर चौराहा अउरपर
देखियौक ने छिनि लेतइक कियो
हमरा अउरक माइक भाषा
ककर बापक दिन हइ
सिर लेबइ आ सिर कटा देबइ।
सरोज ‘खिलाडी‘
नेपालके पहिल मैथिली रेडियो नाटक संचालक
गीत
भोरका किरण सन आँहाके रुपरंग
कतेक निक सुन्दआर मुस्का न ऐइ
आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २

चन्द्र मा सँ गिरल चन्द्र माके टुक्रा
ओ बनिगेल अछि आँहाके मुखरा
स्वनर्गक परि आँहा आकककक
स्वनर्गक परि आँहा दुखिके सपना
आँहा छि सबहक मुस्कारन ऐइ
आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २

भोरका किरण सन आँहाके रुपरंग
कतेक निक सुन्दआर मुस्काइन ऐइ
आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २

नै देखि आँहाके त मननै लगैय
देखि जँ आँहाके त मननै भरैय
खिलैत गुलाफ आँहाकककककक
खिलैत गुलाफ आँहा कविके रचना
आँहा छि गजलके भाव ऐइ
आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — २

भोरका किरण सन आँहाके रुपरंग
कतेक निक सुन्दआर मुस्का न ऐइ
आँहाके हसिए त हमर जान ऐइ — ३
१.सत्यक जीत- सतीश चन्द्र झा२. मनोज कुमार मंडल ३.कल्पना शरण-नुकाएल दिनकर


सतीश चन्द्र झा,राम जानकी नगर,मधुबनी,एम0 ए0 दर्शन शास्त्र, समप्रति मिथिला जनता इन्टर कालेन मे व्याख्याता पद पर 10 वर्ष सँ कार्यरत, संगे 15 साल सं अप्पन एकटा एन0जी0ओ0 क सेहो संचालन।
सत्यक जीत
किछु विलंब सँ मुदा सत्य कें जीत होइत छै।
बुन्द-बुन्द सँ सागर कें निर्माण होइत छै।
कतबो बादल झाँपि देत दिनकर कें नभ मे
जागत तैयो प्रात,राति नहि अमर होइत छै।

नहि भेटत अधिकार माँगि क’ इएह विधान छै।
बाँटि सकी जे जते , सत्य के असल ज्ञान छै।
अपने सँ अनुरोध स्नेह दुख सुख सभ बाँटी
अपने दै छै संग, विपति मे आन- आन छै।

एखनो धरि मिथिला के नित अपमान होइत छै।
अधिकारक संघर्ष करब सम्मान होइत छै।
एक डेग सभ चलब मैथिली बढ़तै आगा
अपने भाषा पर सभकें अभिमान होइत छै।

लिअ आइ संकल्प करब संघर्ष फेर सँ
जय मिथिला के शंखनाद हम करब फेर सँ।
छटतै लागल धुइन बाट पर चलबै जखने
फुटतै अपने किरिण भले ही किछु विलंब सँ।

जे छी जतय ओतै सँ आगाँ चलू झटकि क’।
अछि संम्मानक बात लेब हम कहियो लड़ि क’।
एक बेर सभ लिअ प्रतिज्ञा स्वच्छ मोन सँ
अपने भुस्सा हैत बाट कें बाधा जड़ि क’।


मनोज कुमार मंडल

जाहि प्रांत रहैत छी हम।
जाहि प्रांत रहैत छी हम।
मोती सनक चमकैत पानि,
सोना सनक जाहिठाम माटि,
सोनित पानि बना कए
खटैत अछि मजदूर जाहिठाम
जाहिठाम घरती उगलैत हीरा
मुदा खेद अछि
एखनो अन्न-अन्नकेँ मरैत लोग,
जाहि प्रांत रहैत छी हम।
नदीक जाल बिछाउल जाहिठाम
कहबाक लेल पानि खजाना अहिठाम,
पानियो सँ बिजली बनैत
सातवाँ दसक आजादीक बितल
परन्तु एखनो दीया जलैत जाहिठाम
सभ किछु बिलिन भऽ जाइत
रातिक अन्हारमे
जाहि प्रांत रहैत छी हम।।
बागक हरियाली एतबा सुन्दर जे,
भगवानो स्वर्ग लोकसँ अएबा लेल तरसैत
अहि छटाकेँ देखैत हर्सित
सभ अहि हरियाली अनबा लेल आतूर
छनमे अबैत बाढ़ि
सभ किछु बहा लऽ जाइत जाहिठाम
जाहि प्रांत रहैत छी हम।
भरल रहबा जाहि अन्नसँ डाबा
किंतु भरैत छोट-पैघ नेतासँ
जाहि माटि-पानि मुद्दा बना कअ
बनैत छोटसँ पैघ राजनेता
लूटल मे, लूटल जाइत जाहिठाम लोक
जाहि प्रांत रहैत छी हम।
३.कल्पना शरण

नुकायल दिनकर
नुका नुका कऽताकि रहल छथि
अपने दिनकर एना रहि रहि कऽ
लाेक सबके अपार कष्ट मे बाेरने
अपन मनाेरंजन लेल स्वार्थी भऽ
अपन विश्रामक सुधि लेने छथि
सबहक सुविधाक अव्हेलना कऽ
आकि ई मेघक कुटिल बुद्धि अछि
सूर्यदेवके दूर करक पृथ्वी वासी सऽ
अपन आढ़िमे झॅंपने अछि उष्मा
बसाताे मेघक संग दैत शीतल भऽ
जे काेनाे किरण आबि गेल बचि
सेहाे शक्तििहीन भेल बसात सऽ
१. कालीनाथ ठाकुर-एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ २. तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक

कालीनाथ ठाकुर, सर्वसीमा, दरभंगा, बिहार

एक श्रद्धाञ्जलि-- कोकिलकेँ

हे कवि किरीट "मैथिल कोकिल,
ऐलहुँ मनबए पुनि" स्मृति-पर्व"।
सभ दिनु का ई गोरखधंधा;
"हमहूं मैथिल छी " मात्र गर्व॥१॥

सब वर्ष तोहर वरषी मनाए,
कए बेर कते संकल्प लेल।
छी अखनहुँ ओहिना पछुआएल;
आगूक जनमल जनु कतय गेला ॥२॥
बिस्फी कनैछ महिषी कनैछ,
छह कानि रहल अप्पन भाषा।
तोहरे सब पँच कोशी कनैछ;
चुप करबो ले तोहरे आशा ॥३॥

चच्लणि एखनहुँ कय कोटि पूत,
परनाति नाति घर आँगनि भरि।
तोहरे बिछोह सँ कोर सुन्न;
मायक ममता छह बजारहल॥४॥

ई इन्द्र धनुष कें देखि देखि,
अपनहि जडि के खोदि रहल ।
घर एकहि अछि तेरह चुल्हा;
की बना सकब सपनाक महल॥५॥

कर्तव्य नाम "खाली लिफाफ"
अछि स्वार्थ सिद्धि केर मन्त्र प्रबल।
ई तीन पाँच केर समावेश ;
की बना सकब ? सपनाक महल ॥६॥

श्रद्धा क सुमन मौलाए गेल ,
अछि दग्ध भेल माय’क छाती।
आकांक्षा आ आदर्श छुच्छ;
बिनु तेलक की दीया बाती॥७॥

2.

तीनटा कविता राजदेव मंडलजीक
हथियारक सभा

जमा भेल सभ अस्त्र-शस्त्र
पहिरने अछि खूनियाँ वस्त्र
उच्च आसनपर संच-मंच
बैसल अछि पाँच पंच
सभसँ पैघ कोन हथियार
निर्णय करबाक लेल तैयार
के अछि श्रेष्ठ के अछि हीन
गुण-अवगुणकेँ रहल अछि गिन
कएने होएत जे पैघ संहारक काज
वहए पाओत ई रक्तिम ताज
कतेक बेर भेल अछि प्रहार
कतेक कएने अछि नरसंहार
सतयुगसँ कलियुग धरि
आदिम युगसँ वर्तमान धरि
सभ हथियारक बनल अछि इतिहास
के कतेक बनौलक दास
कतेक के कएलक विनाश
पाषाण, लाठी आर अणुबम
कियो नहि अछि ककरोसँ कम
शक्तिक मदमे सभ रहल फानि
ताल ठोकैत अछि देह तानि
वीर, महारथीक जहिया बनल छलहुँ भक्त
पीने रहि ओहिदिन भ्रिपोख रक्त
सभ बाजए-हम छी जेठ
हमरा सोझा सभ अछि हेठ
पंच बजलाह-
सुनह लगाबह घ्यान
खोलह अपन-अपन कान
तब भेटतह आजुक सम्मान
बिनु देहसँ गिरौने रकत
कऽ सकैत छह दोसर जुगत
आँखिसँ बिनु गिरौने नोर
दोसर तरहें लगा सकैत छह जोर
बिना कोनो दबावकेँ जे करबौने होएत स्वीकार
अपन सर्वोतम विचार
बिनु हिंसाकेँ जे कएने होएत हृदयपर राज
ओकरे भेटत ई अमूल्य ताज
एखनुक निर्णय इएह भेल ठीक
आगू आएत विचार आओर नीक
पंचक निर्णय सुइन
सभ लेलक कान मुइन
सबहक माथपर गिरल गाज
अहिंसा दिश बढ़ल ताज
ककरो मुँहसँ नहि फुटय बकार
सत्य अहिंसाक जय-जयकार

घातक गंध

आसमानसँ बरसैत आगि
त्रसित जीव रहल अछि भागि
लाल-लाल जेना काल
रुप विकराल
सँ बँचबाक हेतु
आश्रयकेँ अन्वेषणमे
भागि रहल अछि हरिणी
कतऽ भेटत निरापद धरणी
सोचैत मनमे
गहन बनमे
खोजि रहल अछि छाया
बचेबाक लेल कोमल-काया
दौड़ि रहल अछि
छोट-पैघ तरुवरकेँ छाँहमे
सनाहमे
किन्तु गाछ सभसँ निकलि रहल
तीव्र आर मन्द
घातक दुर्गन्ध
ओ सहि नहि पाबैत अछि
किनको कहि नहि पाबैत अछि
जेना बनि गेल जीभहीन
गनि-गनि काटि रहल अछि दिन
किन्तु कहिया तक
काटत झड़क
तेँ ओ जना रहल अछि
आ बना रहल अछि
फेसमास्क आओर छाता
मोकाबिला करत आब ओ ओहि दुर्गन्धसँ
कवच पहिरि ठाढ़ भेल अछि
अपनहि सुगन्धसँ

कुहेसक परदा

कुहिेसक सघन आवरणसँ
आवृत भऽ गेल छी हम
निर्जन पथपर
भयत्रस्त भेल
खोजि रहल छी
चिर परिचित मार्ग
गंतव्य प्राप्तिक हेतु
किन्तु दिशा भ्रमित भऽ गेलासँ
ज्ञात नहि भऽ रहल अछि
जे पूरब चलि रहल छी वा पश्चिम
तखनहि
हमरा देहसँ
टक्कर मारैत अछि
तीक्ष्ण प्रकाश
झन-झना उठैत अछि मन
चौन्हिया गेल चक्षु
सँ देखैत छी जे
हमर छाँह
ठाढ़ भऽ गेल अछि
भूत बनि
कुहेसक परदापर
ओ करए चहैत अछि भयभीत
हमरा
किन्तु
इजोत देखा देलक बाट
जे अछि सपाट।

विदेह नूतन अंक गद्य-पद्य भारती
मूल तेलुगु पद्य- अन्नावरन देवेन्दर-अंग्रेजी अनुवाद-

पी.जयलक्ष्मी आ मैथिली अनुवाद- गजेन्द्र ठाकुर

कवि अन्नावरम् देवेन्दर आन्ध्र प्रदेशक करीमनगर जिलासँ छथि आ तेलुगु भाषाक तेलंगाना बोलीमे तेलंगाना राज्यक संवेदना आ संस्कृति आ ओकर अलग राज्यक लेल संघर्षकेँ स्वर दैत छथि। हुनकर छह टा कविताक संग्रह छपल छन्हि। महात्मा जोतिबा फुले फेलोशिप २००१, रंजनी कुन्दुरती कविता पुरस्कारम् २००६, डॉ. मलयश्री साहिति पुरस्कारम् २००६, रांगिनेनी येनम्मा साहित्य पुरस्कारम् २००७ पुरस्कारसँ सम्मानित। ओ जिला परिषद, करीमनगरक पंचायती राज विभागमे सीनियर असिस्टेन्ट छथि।
पी.जयलक्ष्मी, ओस्मानिया विश्वविद्यालयक , निजाम कॉलेज हैदराबादमे अंग्रेजी विभागमे एसोसिएट प्रोफेसर छथि। विगत ३० बरखसँ अंग्रेजीक अध्यापन। हुनकर विशेषज्ञता अंग्रेजीमे भारतीय कविता, अनुवाद आ अनुवादशास्त्र अछि।२००३ मे भार्गवी रावक संग मिलि कऽ शीला सुभद्रा देवीक सितम्बर ११ आ ओकर परिणामपर तेलुगु काव्यक अंग्रेजीमे वार अ हर्ट्स रैवेज नामसँ अनुवाद। २००७ मे गोपीक ननीलू केर अंग्रेजी अनुवाद। स्प्रिन्ग नामसँ अन्नावरम् देवेन्दरक कविताक अंग्रेजी अनुवाद प्रेसमे अछि।
(तेलुगु कविता: तेलुगुसँ अंग्रेजी पी.जयलक्ष्मी द्वारा, अंग्रेजीसँ मैथिली गजेन्द्र ठाकुर द्वारा)
अंतिम शब्द (तेलंगानाक किसान द्वारा आत्महत्यासँ पहिने पत्नीसँ कहल)

“लछम्मा, प्रिय! हम छोड़ि कऽ जा रहल छी
हमर शिक्षा मोन राखू...अपन बच्चाक नीक पालन करब
ई हमरा सकमे नहि अछि- जीब
कर्ज देनिहार सभ बनि गेल छथि यम।
आइ काल्हिक समए नहि अछि किसानक लेल
हम छोड़ि कऽ जा रहल छी

ओ सभ हमरा नहि छोड़ताह जीवित
हम कतबो चाही
ई जिनगी कोन तरहक जतए अन्न नहि अछि खएबाक लेल
महाजन सभ तीरि रहल छथि
कर्जदाता हमर सम्मानकेँ लज्जित कऽ रहल छथि
हम नहि जीबि सकब लछमी, नहि, नहि आब आर!

एकटा बीस वा चालीस हजार
हमरापर कर्ज छै समाजक- सुनै सएह छी

आर पचासेक देबाक अछि साहूकारकेँ
आ एकर अलाबे, सुनू! ऋण मारिते रास एत्तऽ आ ओत्तऽ
अपनासँ घृणाक अनुभूति
एहि जिनगीकेँ जीबाक विचार मात्रसँ छी लज्जित।
एहि ऋण सभकेँ प्लेग जेकाँ बढ़ैत देखि!

ऋण देनिहार सभ आबए लागल छथि घर सेहो
रोकए लागल छथि बाटे-घाटे
पछोड़ धऽ लैत छथि जखने तखने
अपन जिनगीक बाद जतए कतहु हम जाएब
जिबैत अपन मुख, बार्लिस सन पातर
की हम करब आ कोना हम जीब?
ई समए नहि अछि छोड़ि कऽ एहि जगकेँ जएबाक
कतहु पानि नहि
मुदा नोर बहैत हुहुआइत
पोखरि कहियासँ ने सुखाएल
इनारमे हरियरी देखाइत
बोरवेल सँ पाइ मात्र जाइत
खुनैत सए फीटसँ बेशी, पाताल धरि

कोनो टा मे मुदा पानि नहि
हम पिटैत हाथसँ कपार
खुनल माटिक पहाड़ देखैत
हँसीक उद्गम सभक लेल!
बोरवेल लेल एकड़क-एकड़ बेचैत
जे एना अछि
तँ कतए अछि कटही गाड़ी आ कतए अछि खेती
आ कोना जिबै अछि बच्चा सभ?
आउ आब!

बरखा नहि हएत
नहिये जाएत अकाल आकि भुखमरी
पानि नहि बहत
नहिये जाएत अपन नोर
खेत सभ तपि कऽ सुखाएल
समए सेहो उनटि अछि गेल

बरखा जाहिसँ नहि खसै अछि एक्कोटा बुँद
बीया बाओग करैत काल
सएह बहैत अछि मोनसँ कटनीक समएमे
जे एकाध टा दाना रहए बचल
बहि गेल बाढ़िक पनिमे
जे दाना जाइत कंठमे
से बहि गेल
नालामे
कपासक खेती सेहो तेहने
कीड़ा..सभटा कीड़ा, खतम भेल दहोदिश
बीयासँ रसायन धरि
धोखा...धोखा..बेइमानी चारू दिश
बेइमानी बोनिहारसँ
सभटा क्षति, जेम्हरे देखू तेम्हरे

हानि..आ ओहूसँ बड़का हानि ओकरा दबेबा लेल
बिन प्रयोजन
कतबो बरिखसँ करैत होइ खेती
बिनु प्रयोजन
हमर बच्चा सभ अछि पैघ भऽ रहल
किसान सभ अछि मरि रहल
हमरा ई कहए दिअ, हम सेहो छी मरि रहल

हम नहि जीबि सकब आर अधिक काल
हे लच्छैय्या! छी हम जा रहल!


हाल-फिलहालक पाइ के अछि मँगने?
की ओ सभ चाहै छथि
जे किसान बन्न कऽ देअए खेती?
जकरा चाही दरमाहा जीबाक लेल?
कोना जीब आ कोना मरब..
कोना कऽ भरब कर्जक अम्बार..
अपनो बेचि कऽ की चुका सकब?
की अपन खेतिहर भूमि सेहो बेचि दी?
मुदा से एहि अकालमे कीनत के?
जे हमर जीवन-संघर्ष तेहेन अछि
सुनलहुँ धनिक लोक सभक ओहेन शब्द-सभ?
“मरैत अपच होइत जे ओ सभ लेने छथि”।
हमर बाउ! कतएसँ आनै छी ओ सभ दाना जे अहाँ खाइ छी?
एक बेर फेर, ई अछि हिस्टीरिया रोग!
जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि रोगमे?
जे खेतीकेँ बदलि देलन्हि जुआमे?
आ बढ़ा लेलन्हि अपन धोधि?
की अहाँ नहि देखि पाबि रहल छी किसानक अँकड़ल पेट?
की अन्न देनिहार भऽ गेल रोगी?
नहि एकटा चातकक माउस ओकरा देहमे, हमर बाउ!
धानक खेतीसँ पोसल ई देश
आ आब हमरा दाना देबासँ मना कऽ देलहुँ अहाँ, नञि की?

ओ कहै छथि
हम मरि रहल छी अनुकम्पा राशि लेबाक लेल
ओ कोना ई कहि सकै छथि...एहन शब्द सभ?
की अहाँ देखने छी, हमर लच्छैय्या?
ई शब्द सभ दाह उत्पन्न करैत अछि हमरा देहमे,
अहाँक पाइक खगता? ककरा छै ई खगता?
हम सभ गाए जेकाँ छी पवित्र, अहाँ से कहै छी?
अहाँ सभ मरब हमरा सभक शाप माथपर लेने
हम सभ नहि छी ऋणखौक
हृदए राखू..हम सभ छी स्वाभिमानी मनुक्ख
मरि जाएब से एतए
फेर लेब जन्म एतए
अपन जिनगी काटल गंगासन पवित्रतासँ
हम सभ छी ऋणमे डूमल
आ ऋणदाता सभ बनि गेल छथि यम, प्रिय
हम आब नञि..हम आब नञि.. छी जा रहल
.............................



लच्छय्या! लच्छय्या!
अहाँ एना किएक छी कलपि रहल?
ई अछि लिखल अपना सभक भाग्यमे
ततेक दिन जीब जतेक दिन अछि लिखल
हम जा रहल छी जहिया हमरा जेबाक छल
.........................

हमर दिनक गणती शुरु अछि भऽ गेल
नहि स्वीकार करब लच्छैय्या, अनुकम्पा राशि
हमरा गेलाक बाद सरकार ई देबाक गप करत
ओ नहि कहैत अछि जे, हम जे छी मरि रहल से, जे खेलहुँ तकर अपच भेलासँ छी मरि रहल?
ओकरा लऽ जाए दियौ
ओ पाइ अपना सारामे?
धिक् ओहि घरकेँ।

हम जा रहल छी...
अहाँकेँ हानिमे दैत, लच्छा!
बच्चा सभक लेल नहि कियो आर
हम जा रहल छी..जा रहल छी
ऋण देनिहार सभक द्वारे”

(मनकम्मा थोटा लेबर अड्डासँ “आखरी माता”)

बालानां कृते-
१. जगदीश प्रसाद मंडल-किछु प्रेरक प्रसंग २. देवांशु वत्सक मैथिली चित्र-श्रृंखला (कॉमिक्स) ३.कल्पना शरण-देवीजी

१. जगदीश प्रसाद मंडल
किछु प्रेरक कथा

51 भद्रपुरुष
एक दिन एकटा वृद्धा कोठी स निकलैत एकटा भद्रपुरुष केँ पूछलखिन- अहाँ एहि कोठीक मालिक स कने भेटि करा दिअ?
ओ भद्र पुरुष कहलखिन- कोन काज अछि कहू?
वृद्धा- हमरा बेटीक विआह छी। तीनि सय रुपैआक जरुरत अछि। अगर रुपैआ नइ हैत त विआह रुकि जायत।
चलू।
ओ भद्रपुरुष अपन कार मे बृद्धा क बैसाय ल गेलखिन। थोड़े दूर गेला पर कार स उतरि सामनेक मकान मे प्रवेश केलनि। वृद्धो कऽ संगे नेने गेलखिन। भीतर गेला पर वृद्धा केँ ओसार पर बैसाय अपने कोठरी मे गेला। कोठरी मे जा पाँच सय रुपैआ नोकर कऽ द ओहि वृद्धा क द अबै ले कहलखिन। पाँचो सौ रुपैया नेने आबि नोकर वृद्धा केँ दैत कहलक- भाई! पाँचो सौ रुपैआ अछि। तीनि सय मे बेटीक विआह सम्हारि लेब आ दू सय स कोनो धंधा शुरु क लेब। जहि स आगूक जिनगी आसानी स चलत।
रुपैआ हाथ मे ल वृद्धा ओहि नोकरक मुह दिशि देखैत कहलक- भाइ! कोठीक मालिक कहाँ भेटिलथि?
नोकर- जनिका संग अहाँ कार मे एलौ ओइह एहि कोठिक मालिक बावू चितरंजन दास छथि।
जहि आदमीक लेल सैाँसे समाज परिवार होइत जे अनको दुख क अपन दुख बुझि जीबैक प्रेरणा दैत ओइह त भद्रपुरुष होइत।
52 झूठ नइ बाजब
बंगालक पूर्व मुख्यमंत्री डाॅक्टर विधानचन्द्र राय बच्चे स मानवीय गुणक अंगीकार करति रहथि। जे गुण हुनक पिता स भेटति रहनि। सत्य कऽ प्रति निष्ठा आ साहस दिनानुदिन बढ़ैत गेलनि। जखन विधानचन्द्र डाॅक्टरी पढ़ति रहति तखने अध्यापक मोटर एक्सिडैंटक संबंध मे झूठ गबाही देइ ले कहलकनि। अध्यापकक इच्छा रहनि जे विधानचन्द्र छात्र छी तेँ जे कहबैक से करत। मुदा झूठ नहि बाजैक संकल्प विधानचन्द्र केने रहथि। अध्यापकक कहला पर विधानचन्द झूठ बजै स इनकार करैत कहलकनि- हम जे देखलिऐक सैह कहबै। मुदा झूठ नइ बाजब।
जकर परिणाम विधानचन्द्र केँ भोगै पड़लैक। परीक्षा मे फेल कऽ देल गेला। मुदा फेल होइ स ओ ओते दुखी नहि भेला जते खुशी अपन संकल्प निमाहै स भेलाह।
53 आर्दश माए
आर्मेनियाक सर्वोच्च सेनापति सीरोज ग्रिथक व्यक्तित्व हुनक माइयेक बनाओल छलनि। जखन ग्रिथ बच्चे रहथि तखने पिता मरि गेलखिन। विधवा नार्विन ग्रिड कपड़ा सीबि-सीबि गुजरो करति आ बेटो क पढ़बति। गरीब परिबारक ग्रिथ अछि ई बात स्कूलोक शिक्षक सभ जनैत। फीस माफ होइ ले ग्रिथ आवेदन देलक। फीस माफो भ गेलै। फीस माफक समाचार ग्रिथ माए केँ कहलक। माए बिगड़ि क बाजलि- हम मेहनत क कऽ गुजर करै छी तखन फीस किऐक ने देबैक। हम मेहनती छी नहि की गरीब। हमर अपन स्वाभिमान कहैत अछि जे गरीब नइ छी।
स्वाभिमानी माए अपन बच्चाक ऐहन चरित्र बनौलक जे देशक सर्वोच्च सेनापति भेल।
54 नारीक सम्मान
नेपोलियन बोनापार्ट अपन टुइ लेरिस नामक महल मे स्नान घरक मरम्मत करबै ले सचिब कऽ कहलखिन। सचिव महलक अधिकारी के फ्रान्सक कुशल कारीगर कऽ बजा मरम्मत करबै ले कहलखिन। कारीगर आबि मरम्मत करै लगल। जखन मरम्मत भ गेलै तखन नारीक नग्न चित्र सब सेहो बना देलकै।
नेपोलियन नहाइ ले गेला। नहाइ स पहिने चित्र सब देखलखिन। चित्र देखि नेपोलियन चोट्टे घुरि क आबि अधिकारी कऽ बजौलखिन। अधिकारी आयल। हृृदयक क्रोध क दबैत नेपोलियन
55 अनुशासन
अंग्रेजी शासनक खिलाप आन्दोलन उग्र रुप धेने जा रहल छल। आन्दोलन चलबैक लेल क्रान्तिकारी दल केँ डकैतियो करै पड़ै। एक दिन राम प्रसाद विस्मिलक नेनृत्व मे एकटा गाम मे डकैती करैक लेल पहुँचल। एकटा परिवार मे सब घुसल। जत्ते जे किछु दल कऽ भेटिलै लऽ कऽ निकलल। सभ एकत्रित हुअए लगल कि अपन साथीक गिनती करै लगल। गिनती मे एक गोटे कमैत छल। घरे मे चन्द्रशेखर एकटा बुढ़ियाक कैद मे पड़ल छल। ओ बुढ़िया अपन जेबर आ नगदीवला बक्सा पर बैसि चन्द्रशेखरक गट्टा पकड़ने छलि। चन्द्रशेखर चुपचाप आगू मे ठाढ़। ने बाँहि झमारैत आ ने किछु बजैत। सब केयो घर पैसि देखलक जे चन्द्रशेखर बुढ़ियाक पाला मे पड़ल छथि।
क्रान्तिकारी पार्टीक बीच अनुशासन छल जे ने महिला पर हाथ उठाओल जाय आ ने ओकर जेबर लेल जाय। आजाद बुढ़िया कऽ बुझबति कहथिन- माता जी! अहाँ बक्सा पर स हटि जाउ। हम सिर्फ नगद लेब। जेबर नहि लेब।
आजादक विनम्र बात स बुढ़ियाक साहस बढ़ि गेल छलैक। जखन चन्द्रशेखर स संगी सब पूछल तखन ओ सब बात कहलखिन। आजादक बात सुनि सभ ठाहाका द हँसै लगल। गट्टा छोड़बै ले एक गोटे बढ़ै लगलथि कि चन्द्रशेखर कहलखिन- माताजीक सब सम्पत्ति घुमा दिऔन।
सम्पत्तिक नाम सुनि भावुक बुढ़िया चन्द्रशेखरक गट्टा छोड़ि देलकनि। तखन ओ घर स संगी सभक संगे निकललाह।
56 सादा जीवन
सन 1949 ई0 क बात थिक। ओहि समय स्वर्गीय लालबहादुर शास्त्री उत्तर प्रदेश सरकार मे गृहमंत्री रहथि। एक दिन लोक निर्माण विभागक किछु कर्मचारी हुनका डेरा मे कूलर लगबै ले आइल। शास्त्री जी डेरा मे नहि रहथि। परिवारक बच्चो आ पत्नियो केँ कूलर देखि खुशी होइत।
साँझ मे लालबहादुर शास्त्री डेरा अयलाह। डेरा अविते देखलखिन जे कूलर लगबै लोक निर्माणक कर्मचारी सब छथि। कूलर स शास्त्री जी केँ खुशी नहि भेलनि। ओ कूलर लगवै स मना कऽ देलखिन। परिवारक सभ स्तब्ध भऽ गेल। पत्नी कहलकनि- जे सुविधा सरकार द रहल अछि ओकरा मना किऐक करै छी?
गंभीर स्वर मे शास्त्री जी उत्तर देलखिन- ई जरुरी नइ अछि जे हम सब दिन मंत्रिये रहब। कूलर स सभक आदति बिगड़ि जायत। परिवार मे बेटियो अछि जेकर बिआहो हेतैक। दोसर घर जायत। अगर जँ ओकरा ओहि परिवार मे जँ ऐहेन सुविधा नहि होय तखन त कष्ट हेतैक।
57 विचारक उदय
गाँधीजी बच्चे रहथि। हुनक बड़का भाई हुनका मारलकनि। गाँधीजी कनैत माए लग आबि कहलखिन। गाँधीक बात सुनि माए कहलखिन- तोहूँ किऐक ने मारलह?
माएक बात सुनि गाँधीजी कानब छोड़ि कहलखिन- जे गलती भैया केलनि सैह करै ले हमरो कहै छी। आ की हुनका मनाही करबनि।
बेटाक बात सुनि माए कहलखिन- बौआ हम तोहर परीछा लेलिअह। अगर तोरा मे ऐहन विचारक विकास हेतह त आगू चलि क सैाँसे दुनियाँक प्रति सिनेह आ प्रेम पौबह।
बच्चाक समुचित विकासक आरंभ परिवारे स शुरु होइत अछि।
58पुष्ट इकाइ स समर्थ राष्ट बनैत।
फ्रान्स हालैंड पर आक्रमण क देलक। फ्रन्स नमहर देशो आ सम्पन्नो। जबकि होलैंड छोटो आ पछुआइलो। मुदा फ्रान्स हालैंड स जीति नहि पबैत। ई देखि फ्रन्सक राजा लुई चैदहम बिगड़ि मंत्री कालवर्ट क बजा पूछल- हमर देश एत्ते पैघ आ सामरिक सम्पन्न रहितहुँ पछड़ि किऐक रहल अछि?

राजाक बात सुनि कालवर्ट नम्र भ उत्तर देलकनि- महत्ता आ समर्थता। कोनो देशक विस्तार आ बैभव पर निर्भर नहि करैत। ओ निर्भर करैत ओहि देशक देश भक्त आ बहादुर नागरिक पर। जे अपना देशक अपेक्षा हालैंड मे मजगूत अछि।
मंत्रीक बात सुनि राजा अपन सेना वापस बजा लेलक। हालैंड मे बच्चा-बच्चाकऽ राष्ट्रक सशक्त इकाईक रुप मे ढ़ालल जाइत। जहि स ओ शक्तिशाली बनि ठाढ़ अछि।
59 डर नहि करी
उगैत सुरुज जेँका जिनगी अपन दिशा मे अपना ढ़ंग स बढ़ैत जा रहल छलि। एक विराम पर जा जिनगी पाछू मुहे घुरि क तकलक ते चैंकि पड़लि। चंडालिनी सन कारी आ कुरुप छाया पाछू-पाछू अबैत छलि। छाया क देखि जिनगी ललकारि कऽ पूछलक- अभागिनी! तोँ के छियै? हमरा पाछू-पाछू किऐक अबै छेँ? तोहर कारी आ कुरुप काया देखि हमरा डर होइ अए। जो भाग। हमरा स हटि कऽ रह।
छाया छिप गेलि। मुदा जिनगी घिंघिआइत बढ़ल। पुनः छाया आबि कहलकै- बहिन! हम तोहर सहचरी छिअहुँ। तोरे संग हमहू चलि रहल छी। आ अंत मे दुनू गोटे संगे रहब। तेँ डरैक कोनो बात नहि। तोँ हमरा नहि चिन्है छेँ हमरे नाम मृत्यु थिक।
मृत्यु क पाछु लगल अबैत देखि जिनगी डरि गेल। सकपका क गिर पड़ल।
60 असिरवाद उलटि गेल
एक गोटे कऽ दू टा बेटा छलैक। दुनूक बीच तीनि बर्खक जेठाइ-छोटाइ छलैक। गामेक स्कूल मे दुनू भाई पढ़बो केलक। अपर प्राइमरी स्कूल रहने दुनू-भाइ पचमे तक पढ़लक। दुनू बेटाक विआह बाप-माए क देलक। जाबे धरि छोटका बेटाक दुरागमन नहि भेल छलैक ताबे धरि त परिवार शान्त रहलै मुदा छोटकाक दुरागमन होइते परिवार मे खटपट शुरु हुअए लगलै। एक्को दिन ऐहेन नहि होय जहि दिन दुनूक बीच झगड़ा नहि होइत। सब दिन दुनू दियादनी कऽ झगड़ा करैत देखि बाप कऽ बरदास नहि भेलैक। दुनू बेटा कऽ बजा बाप कहलकै- बौआ सब दिन झगड़ा केने घर स लछमी पड़ा जेथुन तेँ अखन हमहू जीविते छी दुनू भाइ भिन्न भ जाह। जे चीज छह दुनू कऽ बाँटि दइ छिअइ।
जेठका बेटा कऽ नगद आ जेवर-जात हिस्सा भेलै आ छोटका क दू बीघा खेत आ बड़द भेलै। दुनू भाइ खुशी स भिन्न भऽ गेल। नगद आ गहना-गुरिया पाबि जेठका खूब ऐश-मौज करै लगल।
दुनू परानी छोटका दिन-राति मेहनत करै लगल। गामक लोक जेठका कऽ करमगर आ छोटका कऽ करमघटू कहै लगलैक।
समय बीतै लगलै। दुइये सालक बाद पाशा पलटै लगलै। जेठका बेटाक रुपैओ आ गहनो सठि गेलै मुदा छोटकाक उन्नति हुअए लगलै। नगद आ जेबर सठने जेठका चोरि करै लगल। एक दिन चोरि करै गेल त घरे मे पकड़ा गेल। जहि स मारिओ खूब खेलक आ जहलो गेल।
गामक लोकक असिरवाद उनटै लगल। जेही मंुह स जेठका कऽ करमगर आ छोटका कऽ करमघटू कहैत छलैक ओहि मंुह स लोक जेठका कऽ करमघटू आ छोटका कऽ करमगर कहै लगलैक।


२.देवांशु वत्स, जन्म- तुलापट्टी, सुपौल। मास कम्युनिकेशनमे एम.ए., हिन्दी, अंग्रेजी आ मैथिलीक विभिन्न पत्र-पत्रिकामे कथा, लघुकथा, विज्ञान-कथा, चित्र-कथा, कार्टून, चित्र-प्रहेलिका इत्यादिक प्रकाशन।
विशेष: गुजरात राज्य शाला पाठ्य-पुस्तक मंडल द्वारा आठम कक्षाक लेल विज्ञान कथा “जंग” प्रकाशित (2004 ई.)

नताशा:
(नीचाँक कार्टूनकेँ क्लिक करू आ पढ़ू)
नताशा तैंतालीस

नताशा चौआलीस


३.कल्पना शरण- देवीजी
देवीजी ः मुस्कुराहट
देवीजी विद्यालय एली तऽ देखलखिन जे एकटा बच्चा कानि रहल छल आ बाॅंकि सब दूर जा कऽ ठाढ़ छलैथ। देवीजी आेहुना देखैत रहैथ जे नब आयल इर् बच्चा सब संगे मिलि नहिं पाबि रहल छल।तखन देवीजी सबसऽ बात केली तऽ बुझलखिन जे अहि बच्चा के स्वभाव मे कनि खराबी छल आ सबसऽ खाैंझाकऽ बात करै छल।ताहि पर देवीजी के एक विचार बनलैन। आे आेहि असगरूआ बच्चाके बजाकऽ कहलखिन जे हमरा एकटा किताब अपन कक्षाके बच्चा सऽ मांगि क दे। आे भीड़मे आेकरे लग गेल जे स्वभाव सऽ नम्र छल आ अकरा हॅंसि कऽ जवाब दैत छल। जे बच्चा पढ़ै मे भने तेज छल लेकिन स्वभाव सऽ कड़क छल तकरा लग अकरा जायके नहिं माेन भेलै। टाहि पर देवीजी कहलखिन जे जहिना अहाॅंके विनम्र स्वभाव नीक लागैत अछि तहिना दाेसराे के हाेयत छै। आ अपन विनम्रता दर्शाबऽके सबसऽ नीक तरीका छै मुस्कुरेनाइ।
देवीजी इहाे कहलखिन जे हॅंसैत रहबला व्यक्तिैअपने तऽस्वस्थ रहिते अछि संगे दाेसराे के माेन हल्लुक कऽ दैत अछि।साैहार्द्र सऽ भरल हॅंसी केहनाे कुदरूपके सुन्दर बना दैत छै आ अकर विपरीत कियाे कतबाे सुन्दर कियैक नहिं हुए विनम्रता आ सुभाषिताक अभाव मे सबसऽ एकहरबा भऽ जायत अछि। देवीजीके अहि ज्ञानसऽ आे बालक बहुत लज्जित भेल आ अपन स्वभाव बदलैके निर्णय लेलक।
फेर की छल देवीजीके इर् चेला तऽ सबहक कान कटलक। शबहक बीचमे हॅंसैत चहचहायत अहि शिष्य के देखिकऽ देवीजीक माेन गदगद भऽ गेलैन।7 फरवरीकऽ ‘स्माएल डे’ पर देवीजीके सबसऽ पैघ उपहार यैह भेटल छलैन।
आहि बच्चा सबहक व्यक्ति त्वल के विकास पर विशेष ध्यान देेने रहैथ।

बच्चा लोकनि द्वारा स्मरणीय श्लोक
१.प्रातः काल ब्रह्ममुहूर्त्त (सूर्योदयक एक घंटा पहिने) सर्वप्रथम अपन दुनू हाथ देखबाक चाही, आ’ ई श्लोक बजबाक चाही।
कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥
करक आगाँ लक्ष्मी बसैत छथि, करक मध्यमे सरस्वती, करक मूलमे ब्रह्मा स्थित छथि। भोरमे ताहि द्वारे करक दर्शन करबाक थीक।
२.संध्या काल दीप लेसबाक काल-
दीपमूले स्थितो ब्रह्मा दीपमध्ये जनार्दनः।
दीपाग्रे शङ्करः प्रोक्त्तः सन्ध्याज्योतिर्नमोऽस्तुते॥
दीपक मूल भागमे ब्रह्मा, दीपक मध्यभागमे जनार्दन (विष्णु) आऽ दीपक अग्र भागमे शङ्कर स्थित छथि। हे संध्याज्योति! अहाँकेँ नमस्कार।
३.सुतबाक काल-
रामं स्कन्दं हनूमन्तं वैनतेयं वृकोदरम्।
शयने यः स्मरेन्नित्यं दुःस्वप्नस्तस्य नश्यति॥
जे सभ दिन सुतबासँ पहिने राम, कुमारस्वामी, हनूमान्, गरुड़ आऽ भीमक स्मरण करैत छथि, हुनकर दुःस्वप्न नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
४. नहेबाक समय-
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरू॥
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिन्धु आऽ कावेरी धार। एहि जलमे अपन सान्निध्य दिअ।
५.उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तत् भारतं नाम भारती यत्र सन्ततिः॥
समुद्रक उत्तरमे आऽ हिमालयक दक्षिणमे भारत अछि आऽ ओतुका सन्तति भारती कहबैत छथि।
६.अहल्या द्रौपदी सीता तारा मण्डोदरी तथा।
पञ्चकं ना स्मरेन्नित्यं महापातकनाशकम्॥
जे सभ दिन अहल्या, द्रौपदी, सीता, तारा आऽ मण्दोदरी, एहि पाँच साध्वी-स्त्रीक स्मरण करैत छथि, हुनकर सभ पाप नष्ट भऽ जाइत छन्हि।
७.अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरञ्जीविनः॥
अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनूमान्, विभीषण, कृपाचार्य आऽ परशुराम- ई सात टा चिरञ्जीवी कहबैत छथि।
८.साते भवतु सुप्रीता देवी शिखर वासिनी
उग्रेन तपसा लब्धो यया पशुपतिः पतिः।
सिद्धिः साध्ये सतामस्तु प्रसादान्तस्य धूर्जटेः
जाह्नवीफेनलेखेव यन्यूधि शशिनः कला॥
९. बालोऽहं जगदानन्द न मे बाला सरस्वती।
अपूर्णे पंचमे वर्षे वर्णयामि जगत्त्रयम् ॥
१०. दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)
आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥
आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥
मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।
ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।
हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ’ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ’ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बरद भार वहन करएमे सक्षम होथि आ’ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ’ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ’ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ’ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ’ मित्रक उदय होए॥
मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।
एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।
अन्वय-
ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म
रा॒ष्ट्रे - देशमे
ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त
आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए
रा॑ज॒न्यः-राजा
शुरे॑ऽ–बिना डर बला
इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण
ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला
म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर
दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)
धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बरद ना॒शुः-आशुः-त्वरित
सप्तिः॒-घोड़ा
पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री
जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला
र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर
स॒भेयो॒-उत्तम सभामे
युवास्य-युवा जेहन
यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे
वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला
निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे
नः-हमर सभक
प॒र्जन्यों-मेघ
वर्षतु॒-वर्षा होए
फल॑वत्यो-उत्तम फल बला
ओष॑धयः-औषधिः
पच्यन्तां- पाकए
योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा
नः॑-हमरा सभक हेतु
कल्पताम्-समर्थ होए
ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/संरक्षित करी।
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1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/होबएबला /होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’/
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला / करए बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद/ इआद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश/दालान दिस
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ/लए कए
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै/भाए
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै / माए
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे


71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय/बननाइ
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो/करिऔ-करैऔ
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह / इएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ/ अएनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो / केओ
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ /करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय/हाथ मटिआएब
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/ क
216.जाऽ/जा
217.आऽ/ आ
218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि/नहि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो
२३२.गेलैन्ह-गेलन्हि
२३३.हेबाक- होएबाक
२३४.केलौँ- कएलौँ- कएलहुँ
२३५.किछु न किछ- किछु ने किछु
२३६.केहेन- केहन
२३७.आऽ (come)-आ (conjunction-and)/आ
२३८. हएत-हैत
२३९.घुमेलहुँ-घुमएलहुँ
२४०.एलाक- अएलाक
२४१.होनि- होइन/होन्हि
२४२.ओ-राम ओ श्यामक बीच(conjunction), ओऽ कहलक (he said)/ओ
२४३.की हए/ कोसी अएली हए/ की है। की हइ
२४४.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
२४५.शामिल/ सामेल
२४६.तैँ / तँए/ तञि/ तहिं
२४७.जौँ/ ज्योँ
२४८.सभ/ सब
२४९.सभक/ सबहक
२५०.कहिं/ कहीं
२५१.कुनो/ कोनो
२५२.फारकती भऽ गेल/ भए गेल/ भय गेल
२५३.कुनो/ कोनो
२५४.अः/ अह
२५५.जनै/ जनञ
२५६.गेलन्हि/ गेलाह (अर्थ परिवर्तन)
२५७.केलन्हि/ कएलन्हि
२५८.लय/ लए(अर्थ परिवर्तन)
२५९.कनीक/ कनेक
२६०.पठेलन्हि/ पठओलन्हि
२६१.निअम/ नियम
२६२.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
२६३.पहिल अक्षर रहने ढ/ बीचमे रहने ढ़
२६४.आकारान्तमे बिकारीक प्रयोग उचित नहि/ अपोस्ट्रोफीक प्रयोग फान्टक न्यूनताक परिचायक ओकर बदला अवग्रह(बिकारी)क प्रयोग उचित

२६५.केर/-क/ कऽ/ के
२६६.छैन्हि- छन्हि
२६७.लगैए/ लगैये
२६८.होएत/ हएत
२६९.जाएत/ जएत
२७०.आएत/ अएत/ आओत
२७१.खाएत/ खएत/ खैत
२७२.पिअएबाक/ पिएबाक
२७३.शुरु/ शुरुह
२७४.शुरुहे/ शुरुए
२७५.अएताह/अओताह/ एताह
२७६.जाहि/ जाइ/ जै
२७७.जाइत/ जैतए/ जइतए
२७८.आएल/ अएल
२७९.कैक/ कएक
२८०.आयल/ अएल/ आएल
२८१. जाए/ जै/ जए
२८२. नुकएल/ नुकाएल
२८३. कठुआएल/ कठुअएल
२८४. ताहि/ तै
२८५. गायब/ गाएब/ गएब
२८६. सकै/ सकए/ सकय
२८७.सेरा/सरा/ सराए (भात सेरा गेल)
२८८.कहैत रही/देखैत रही/ कहैत छलहुँ/ कहै छलहुँ- एहिना चलैत/ पढ़ैत (पढ़ै-पढ़ैत अर्थ कखनो काल परिवर्तित)-आर बुझै/ बुझैत (बुझै/ बुझ छी, मुदा बुझैत-बुझैत)/ सकैत/सकै। करैत/ करै। दै/ दैत। छैक/ छै। बचलै/ बचलैक। रखबा/ रखबाक । बिनु/बिन। रातिक/ रातुक
२८९. दुआरे/ द्वारे
२९०.भेटि/ भेट
२९१. खन/ खुना (भोर खन/ भोर खुना)
२९२.तक/ धरि
२९३.गऽ/गै (meaning different-जनबै गऽ)
२९४.सऽ/ सँ (मुदा दऽ, लऽ)
२९५.त्त्व,(तीन अक्षरक मेल बदला पुनरुक्तिक एक आ एकटा दोसरक उपयोग) आदिक बदला त्व आदि। महत्त्व/ महत्व/ कर्ता/ कर्त्ता आदिमे त्त संयुक्तक कोनो आवश्यकता मैथिलीमे नहि अछि।वक्तव्य/ वक्तव्य
२९६.बेसी/ बेशी
२९७.बाला/वाला बला/ वला (रहैबला)
२९८.बाली/ (बदलएबाली)
२९९.वार्त्ता/ वार्ता
300. अन्तर्राष्ट्रिय/ अन्तर्राष्ट्रीय
३०१. लेमए/ लेबए
३०२.लमछुरका, नमछुरका
३०२.लागै/ लगै (भेटैत/ भेटै)
३०३.लागल/ लगल
३०४.हबा/ हवा
३०५.राखलक/ रखलक
३०६.आ (come)/ आ (and)
३०७. पश्चाताप/ पश्चात्ताप
३०८. ऽ केर व्यवहार शब्दक अन्तमे मात्र, बीचमे नहि।
३०९.कहैत/ कहै
३१०. रहए (छल)/ रहै (छलै) (meaning different)
३११.तागति/ ताकति
३१२.खराप/ खराब
३१३.बोइन/ बोनि/ बोइनि
३१४.जाठि/ जाइठ
३१५.कागज/ कागच
३१६.गिरै (meaning different- swallow)/ गिरए (खसए)
३१७.राष्ट्रिय/ राष्ट्रीय

उच्चारण निर्देश:
दन्त न क उच्चारणमे दाँतमे जीह सटत- जेना बाजू नाम , मुदा ण क उच्चारणमे जीह मूर्धामे सटत (नहि सटैए तँ उच्चारण दोष अछि)- जेना बाजू गणेश। तालव्य शमे जीह तालुसँ , षमे मूर्धासँ आ दन्त समे दाँतसँ सटत। निशाँ, सभ आ शोषण बाजि कऽ देखू। मैथिलीमे ष केँ वैदिक संस्कृत जेकाँ ख सेहो उच्चरित कएल जाइत अछि, जेना वर्षा, दोष। य अनेको स्थानपर ज जेकाँ उच्चरित होइत अछि आ ण ड़ जेकाँ (यथा संयोग आ गणेश संजोग आ गड़ेस उच्चरित होइत अछि)। मैथिलीमे व क उच्चारण ब, श क उच्चारण स आ य क उच्चारण ज सेहो होइत अछि।
ओहिना ह्रस्व इ बेशीकाल मैथिलीमे पहिने बाजल जाइत अछि कारण देवनागरीमे आ मिथिलाक्षरमे ह्रस्व इ अक्षरक पहिने लिखलो जाइत आ बाजलो जएबाक चाही। कारण जे हिन्दीमे एकर दोषपूर्ण उच्चारण होइत अछि (लिखल तँ पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि) से शिक्षा पद्धतिक दोषक कारण हम सभ ओकर उच्चारण दोषपूर्ण ढंगसँ कऽ रहल छी।
अछि- अ इ छ ऐछ
छथि- छ इ थ – छैथ
पहुँचि- प हुँ इ च
आब अ आ इ ई ए ऐ ओ औ अं अः ऋ एहि सभ लेल मात्रा सेहो अछि, मुदा एहिमे ई ऐ ओ औ अं अः ऋ केँ संयुक्ताक्षर रूपमे गलत रूपमे प्रयुक्त आ उच्चरित कएल जाइत अछि। जेना ऋ केँ री रूपमे उच्चरित करब। आ देखियौ- एहि लेल देखिऔ क प्रयोग अनुचित। मुदा देखिऐ लेल देखियै अनुचित। क् सँ ह् धरि अ सम्मिलित भेलासँ क सँ ह बनैत अछि, मुदा उच्चारण काल हलन्त युक्त शब्दक अन्तक उच्चारणक प्रवृत्ति बढ़ल अछि, मुदा हम जखन मनोजमे ज् अन्तमे बजैत छी, तखनो पुरनका लोककेँ बजैत सुनबन्हि- मनोजऽ, वास्तवमे ओ अ युक्त ज् = ज बजै छथि।
फेर ज्ञ अछि ज् आ ञ क संयुक्त मुदा गलत उच्चारण होइत अछि- ग्य। ओहिना क्ष अछि क् आ ष क संयुक्त मुदा उच्चारण होइत अछि छ। फेर श् आ र क संयुक्त अछि श्र ( जेना श्रमिक) आ स् आ र क संयुक्त अछि स्र (जेना मिस्र)। त्र भेल त+र ।
उच्चारणक ऑडियो फाइल विदेह आर्काइव http://www.videha.co.in/ पर उपलब्ध अछि। फेर केँ / सँ / पर पूर्व अक्षरसँ सटा कऽ लिखू मुदा तँ/ के/ कऽ हटा कऽ। एहिमे सँ मे पहिल सटा कऽ लिखू आ बादबला हटा कऽ। अंकक बाद टा लिखू सटा कऽ मुदा अन्य ठाम टा लिखू हटा कऽ– जेना छहटा मुदा सभ टा। फेर ६अ म सातम लिखू- छठम सातम नहि। घरबलामे बला मुदा घरवालीमे वाली प्रयुक्त करू।
रहए- रहै मुदा सकैए- सकै-ए
मुदा कखनो काल रहए आ रहै मे अर्थ भिन्नता सेहो, जेना
से कम्मो जगहमे पार्किंग करबाक अभ्यास रहै ओकरा।
पुछलापर पता लागल जे ढुनढुन नाम्ना ई ड्राइवर कनाट प्लेसक पार्किंगमे काज करैत रहए।
छलै, छलए मे सेहो एहि तरहक भेल। छलए क उच्चारण छल-ए सेहो।
संयोगने- संजोगने
केँ- के / कऽ
केर- क (केर क प्रयोग नहि करू )
क (जेना रामक) –रामक आ संगे राम के/ राम कऽ
सँ- सऽ
चन्द्रबिन्दु आ अनुस्वार- अनुस्वारमे कंठ धरिक प्रयोग होइत अछि मुदा चन्द्रबिन्दुमे नहि। चन्द्रबिन्दुमे कनेक एकारक सेहो उच्चारण होइत अछि- जेना रामसँ- राम सऽ रामकेँ- राम कऽ राम के

केँ जेना रामकेँ भेल हिन्दीक को (राम को)- राम को= रामकेँ
क जेना रामक भेल हिन्दीक का ( राम का) राम का= रामक
कऽ जेना जा कऽ भेल हिन्दीक कर ( जा कर) जा कर= जा कऽ
सँ भेल हिन्दीक से (राम से) राम से= रामसँ
सऽ तऽ त केर एहि सभक प्रयोग अवांछित।
के दोसर अर्थेँ प्रयुक्त भऽ सकैए- जेना के कहलक।
नञि, नहि, नै, नइ, नँइ, नइँ एहि सभक उच्चारण- नै

त्त्व क बदलामे त्व जेना महत्वपूर्ण (महत्त्वपूर्ण नहि) जतए अर्थ बदलि जाए ओतहि मात्र तीन अक्षरक संयुक्ताक्षरक प्रयोग उचित। सम्पति- उच्चारण स म्प इ त (सम्पत्ति नहि- कारण सही उच्चारण आसानीसँ सम्भव नहि)। मुदा सर्वोत्तम (सर्वोतम नहि)।
राष्ट्रिय (राष्ट्रीय नहि)
सकैए/ सकै (अर्थ परिवर्तन)
पोछैले/
पोछैए/ पोछए/ (अर्थ परिवर्तन)
पोछए/ पोछै
ओ लोकनि ( हटा कऽ, ओ मे बिकारी नहि)
ओइ/ ओहि
ओहिले/ ओहि लेल
जएबेँ/ बैसबेँ
पँचभइयाँ
देखियौक (देखिऔक बहि- तहिना अ मे ह्रस्व आ दीर्घक मात्राक प्रयोग अनुचित)
जकाँ/ जेकाँ
तँइ/ तैँ
होएत/ हएत
नञि/ नहि/ नँइ/ नइँ
सौँसे
बड़/ बड़ी (झोराओल)
गाए (गाइ नहि)
रहलेँ/ पहिरतैँ
हमहीं/ अहीं
सब - सभ
सबहक - सभहक
धरि - तक
गप- बात
बूझब - समझब
बुझलहुँ - समझलहुँ
हमरा आर - हम सभ
आकि- आ कि
सकैछ/ करैछ (गद्यमे प्रयोगक आवश्यकता नहि)
मे केँ सँ पर (शब्दसँ सटा कऽ) तँ कऽ धऽ दऽ (शब्दसँ हटा कऽ) मुदा दूटा वा बेशी विभक्ति संग रहलापर पहिल विभक्ति टाकेँ सटाऊ।
एकटा दूटा (मुदा कैक टा)
बिकारीक प्रयोग शब्दक अन्तमे, बीचमे अनावश्यक रूपेँ नहि।आकारान्त आ अन्तमे अ क बाद बिकारीक प्रयोग नहि (जेना दिअ, आ )
अपोस्ट्रोफीक प्रयोग बिकारीक बदलामे करब अनुचित आ मात्र फॉन्टक तकनीकी न्यूनताक परिचाएक)- ओना बिकारीक संस्कृत रूप ऽ अवग्रह कहल जाइत अछि आ वर्तनी आ उच्चारण दुनू ठाम एकर लोप रहैत अछि/ रहि सकैत अछि (उच्चारणमे लोप रहिते अछि)। मुदा अपोस्ट्रोफी सेहो अंग्रेजीमे पसेसिव केसमे होइत अछि आ फ्रेंचमे शब्दमे जतए एकर प्रयोग होइत अछि जेना raison d’etre एत्स्हो एकर उच्चारण रैजौन डेटर होइत अछि, माने अपोस्ट्रॉफी अवकाश नहि दैत अछि वरन जोड़ैत अछि, से एकर प्रयोग बिकारीक बदला देनाइ तकनीकी रूपेँ सेहो अनुचित)।
अइमे, एहिमे
जइमे, जाहिमे
एखन/ अखन/ अइखन

केँ (के नहि) मे (अनुस्वार रहित)
भऽ
मे
दऽ
तँ (तऽ त नहि)
सँ ( सऽ स नहि)
गाछ तर
गाछ लग
साँझ खन
जो (जो go, करै जो do)

३.नेपाल आ भारतक मैथिली भाषा-वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली


1.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक उच्चारण आ लेखन शैली
(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)
मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए।
-(भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक
धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ निर्धारित)

2. मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

VIDEHA FOR NON-RESIDENT MAITHILS(Festivals of Mithila date-list)

6.VIDEHA FOR NON RESIDENTS
6.1.NAAGPHAANS-PART_II-Maithili novel written by Dr.Shefalika Verma-Translated by Dr.Rajiv Kumar Verma and Dr.Jaya Verma, Associate Professors, Delhi University, Delhi

6.2.Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.-In the depth of my heart


DATE-LIST (year- 2009-10)

(१४१७ साल)

Marriage Days:

Nov.2009- 19, 22, 23, 27

May 2010- 28, 30

June 2010- 2, 3, 6, 7, 9, 13, 17, 18, 20, 21,23, 24, 25, 27, 28, 30

July 2010- 1, 8, 9, 14

Upanayana Days: June 2010- 21,22

Dviragaman Din:

November 2009- 18, 19, 23, 27, 29

December 2009- 2, 4, 6

Feb 2010- 15, 18, 19, 21, 22, 24, 25

March 2010- 1, 4, 5

Mundan Din:

November 2009- 18, 19, 23

December 2009- 3

Jan 2010- 18, 22

Feb 2010- 3, 15, 25, 26

March 2010- 3, 5

June 2010- 2, 21

July 2010- 1

FESTIVALS OF MITHILA

Mauna Panchami-12 July

Madhushravani-24 July

Nag Panchami-26 Jul

Raksha Bandhan-5 Aug

Krishnastami-13-14 Aug

Kushi Amavasya- 20 August

Hartalika Teej- 23 Aug

ChauthChandra-23 Aug

Karma Dharma Ekadashi-31 August

Indra Pooja Aarambh- 1 September

Anant Caturdashi- 3 Sep

Pitri Paksha begins- 5 Sep

Jimootavahan Vrata/ Jitia-11 Sep

Matri Navami- 13 Sep

Vishwakarma Pooja-17Sep

Kalashsthapan-19 Sep

Belnauti- 24 September

Mahastami- 26 Sep

Maha Navami - 27 September

Vijaya Dashami- 28 September

Kojagara- 3 Oct

Dhanteras- 15 Oct

Chaturdashi-27 Oct

Diyabati/Deepavali/Shyama Pooja-17 Oct

Annakoota/ Govardhana Pooja-18 Oct

Bhratridwitiya/ Chitragupta Pooja-20 Oct

Chhathi- -24 Oct

Akshyay Navami- 27 Oct

Devotthan Ekadashi- 29 Oct

Kartik Poornima/ Sama Bisarjan- 2 Nov

Somvari Amavasya Vrata-16 Nov

Vivaha Panchami- 21 Nov

Ravi vrat arambh-22 Nov

Navanna Parvana-25 Nov

Naraknivaran chaturdashi-13 Jan

Makara/ Teela Sankranti-14 Jan

Basant Panchami/ Saraswati Pooja- 20 Jan

Mahashivaratri-12 Feb

Fagua-28 Feb

Holi-1 Mar

Ram Navami-24 March

Mesha Sankranti-Satuani-14 April

Jurishital-15 April

Ravi Brat Ant-25 April

Akshaya Tritiya-16 May

Janaki Navami- 22 May

Vat Savitri-barasait-12 June

Ganga Dashhara-21 June

Hari Sayan Ekadashi- 21 Jul
Guru Poornima-25 Jul
NAAGPHAANS- Maithili novel written by Dr. Shefalika Verma in 2004- Arushi Aditi Sanskriti Publication, Patna- Translated by Dr. Rajiv Kumar Verma and Dr. Jaya Verma- Associate Professors, Delhi University, Delhi.

NAAGPHAANS
PART –II

Once Dhara had visited Liverpool with Kadamba. Dhara was surprised to see the historical grandeur and culture of Liverpool. This place was situated near the mouth of river Mersy which was 142 kms. long. Mersy river has originated from Irish sea. The earliest construction in Liverpool was an 11 kms. long dock built in 1715. Dhara stood near the dock and listened to Mersy river’s scaring sound. On the other side of the river Dhara saw beautiful lights and inquired from Kadamba about it. Ma, it is Viral, Kadamba replied. How can people go to Viral – is there any bridge? No Ma, there is a tunnel inside the river and people cross to other side through it. Dhara was shocked and scared with mere imagination of a tunnel under river. Car, bus, truck all crossed through it – it was well-lit and airy. Dhara felt suffocating just thinking about it. Kadamba laughed – Ma everything is possible- all these are fruits of science and technology – men have made tremendous progress – Do you see this Albert dock , it is the earliest dock. England traded with the outside world through this dock – the African slaves were brought to this dock and spices arrived from the West Indies.
Ma, let us go to the oldest restaurant of Liverpool, Kadamba said. The restaurant was located on one side of the dock. Large buildings hovered the road from both sides – they represented the architectural style of the early times. Bombay’s Taj Hotel, Gateway of India and Kolkata’s Victoria Memorial were all parts of this style of architecture.We reached near a secluded forest area. Small restaurant named Brittania was located there. Following was written on a copper plate – Wheat Bread, P.L.C. 1742 , which meant this restaurant was constructed in the year 1742. Parking space was packed. There were several wooden tables and benches outside the small restaurant. The lights of the Viral city were clearly visible and enjoyable even from this distance – I do not know why there was Diwali everyday in England ? Summer had already arrived but the wind was cool and refreshing – but Dhara went into past, recalling – to whom she became close, they left her, to whom she loved, they deserted her- it was Dhara’s fate – nothing remained , nothing …..

Ma, come inside the restaurant. Dhara followed him. Everywhere British people sitting in close proximity – all couples. Air was full with cigarette smoke. Pub was located in one corner. Kadamba took his mother to non-smoking zone from where Dhara was able to observe through glass panes the sorrow, pain and loneliness of River Mersy. Beautiful, scantily dressed British girls worked as waitress, moving in a mechanical manner and continuously smiling like machines. Really, they were quite disciplined. Restaurant was

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over-crowded, yet peaceful – no hue and cry, no tension. A boy wearing a track suit entered the restaurant with a beautiful girl but with heavy bottom resembling two falling
big stones. Both sat on chair facing each other, looking directly into eye , forgetting the world. The secrets of body and soul are really astonishing, what kind of pleasure is derived, nobody is certain, different ways to satiate and seek pleasures can never be explained.

Dhara had become used to visiting these places with Kadamba. Initially she had felt uncomfortable. But search for Simant had made it possible as he could be located in one of these places. He must be a great drunkard, a money making machine and a women seeker. Kadamba was silently looking in the eyes of his mother. Since the time he gained consciousness, he remembered the resemblance between the lotus flower of his village pond with that of the emotional eyes of mother. Mother’s eyes always had a kind of sadness resembling the evening sky, but her face always smiling. Both mother and son shared a very loving relationship but there was a sea like distance between them due to son’s respect towards mother. Inner feelings are one thing, but to exhibit the same is altogether a different matter.

Ma, why you have named me Kadamba?- he had inquired this when he was a child- this Kadamba flower becomes lifeless in two days. Mother had embraced him saying , no son, you are not the Kadamba flower of this earth, you are that Kadamba tree on whose stems lord Krishna used to climb – I have filled you with love as vast as the universe. You are the ornamental symbol of your parents’ vast love and faith. We have inculcated in you the feelings of universal brotherhood. Listening to these words Kadamba was overjoyed to be linked with lord Krishna. Ma had taught her the great lessons of love and faith. Whenever human beings chose dark, doubtful, faithless path, their fall was imminent and inevitable. This earth survives on faith – faith in god helps in day-to-day life, faith in mother secures love and protection for child and faith in teacher secures knowledge for him.

A newly married bride leaves the loving and protected world of parents to lead life with an unknown person – this relationship is also based on faith. When this faith will disappear, human life is bound to touch the lowest ebb like the unlimited and unmeasured depth of sea. Human beings will feel excommunicated or exiled like Pandavas through gamble.

Dhara remembered her mother’s utterances– Dhara is now grown up, we must look for a suitable match. Papa used to laugh and said, Dhara is not our daughter, but our son – do you not see how educated and cultured she is? You always consider her as your son, but we have to get her married. – I am also worried, I also understand everything, but right now let her complete her studies, if we marry her at this juncture, her career will be ruined in household chores.--- If we wait right now, then when we look for the bridegroom, we must not get the ideal choice – mother’s voice was unstable and full of doubts. If I fail to express like you, do not think I am not serious – Papa spoke laughingly
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– I am also worried about my daughter’s future. Look Dhara’s mother, when some drop of swati nakshatra falls on earth it disappears, but if falls in an oyster, it gets converted
into pearl. I am waiting for the same oyster for Dhara where our Dhara will live as pearl – Look People give birth to children, make them capable, get them married and become free from their responsibilities. After that love for grand-son, grand-daughters and the worldly life moves so on and so forth ….. Mother replied philosophically, alright, when we get a good match, we will get her married. Father said mockingly, how can we judge the goodness of a human being.

If the parents are cultured, liberal and tolerant, the offspring must be good, Mother’s words surprised both Dhara and her father. Ultimately fathers’ words became a reality. After her Post-Graduation, she was married to Simant, meritorious and good natured. But nobody on this earth knows what is stored in future. Dhara recalls the wedding song—
‘Dhir dharu janani adhir ati jani hou, kahu kiyo bheti sakai vidhi ker rachna …’

As parents’ loving daughter, adolescent Dhara, playful and lost in her dream world now enters her sasural as Simant’s wife, overburdened with new responsibilities. How the freedom loving daughters with their happy go lucky attitude make their sudden transition as daughter-in-laws at someone else’s home—ready to fulfill high expectations of people all the time. No one feels the pain she goes through – she was the loving daughter of her father who overlooked all her mistakes and gave freedom and liberty required for development of personality. But with Dhara’s marriage, her sasural got a full time unpaid maid for life time who worked tirelessly for her in-laws, then for her husband and lastly for her children and their off-springs – a maid without salary. The family is complete with the coming of daughter-in-law, but the girl gets imprisoned fulfilling family’s aspirations with all restrictions imposed on her. In spite of performing all household chores, she lacked the right to question anybody. But there were always some exceptions to this rule.

The preparation for Dhara’s marriage was in full swing, everybody was overjoyed. Dhara’s heart was also full of hope, joy as well as the unknown fear – looking at the seven colors of Rainbow Dhara wondered – where was she going from here, what kind of life she was going to have? Birds in several rows flying in the sky singing the song of freedom, Dhara also started flying high in the large unending sky- free , uninterrupted and uncontrolled. Dhara’s thoughts were blowing like a wind.

Dhara’s body, mind, heart and soul were satiated with Simant’s love. Simant never imposed any kind of restrictions on her mind and thought. Simant’s love energized her to face the unknown challenges of life. Dhara remembered – one day she was asleep. When Simant came back from morning walk, he hold a beautiful fragrant red flower in his hand. He secretly kept it on Dhara’s face. Dhara got awakened due to soft touch of fragrant flower. Simant murmured in her ear, Princess of Flower. Dhara laughed freely. It seemed goddess of nature dawned on this earth. You will love me forever, Dhara

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asked. Is there any doubt? Dhara felt Simant’s loving and caring hand on her soul, on her body. Simant also started playing with Dhara’s long and beautiful cloud like hair and
entered into his sea depth thoughts to attain the pearl like happiness. It was such a bliss undiscovered in any garden of the world.

Kadamba was born. Dhara felt like goddess due to labour pain and her contribution in this new creation leading to continuity of universe. Birth of Kadamba added to her responsibilities. Kadamba’s oil massage, his bathe, his daily chores – whenever he slept Dhara tried to finish her household work. Sometimes when Kagamba awakened in the midst of work, Dhara ran to calm and pacify him. Simant was sitting nearby but he never took the child in his arms to calm him. Instead he used to shout, what are you doing? Kadamba is crying. She came from kitchen almost running and hold the child with either flour or spice laden hands. Simant always reacted, BAAP RE, you do not have any manners. You do not know how to live. You behave like a village girl.

Initially Dhara was shocked with these outbursts. But gradually she undersood that in some cases the birth of a child brings parents closer and in other cases the vice-versa happens. Simant developed the feeling that Dhara was paying more attention to child thereby ignoring him. Dhara always thought that Kadamba was known by her fathers’ name, not by her name. Whenever she visited her parents home people used to say, look at Dhara’s son, her total replica – Dhara derived satisfaction. Yes, Kadamba is my son, my child, --there nobody even took the name of Simant. But outside NAIHAR , from SASURAL to anywhere within own country or foreign, everywhere he was known as the son of Simant – then why women are ceaselessly working at home day and night?, What do they get in return even after surrendering their very existence?

Child is born. The entire family is overjoyed. Child descends like a moonlight. But nobody is sure about the future of the child. In child’s innocent eyes and smile parents forget their sorrows. Child automatically understands the love and very presence of mother. Mother in turn understands child’s gesture. But these things will continue for how long……………………………… ……..
TO BE CONTINUED
Original Poem in Maithili by Gajendra Thakur Translated into English by Lucy Gracy of New York.
In the depth of my heart

Forgotten in mirth
Keeping all sorrow apart
Also my ambitions alongside
The sign of possibility inspires
The confidence enhanced by working
The fulfilment of wishes creates desires
When my eye lids meet
My worries vanishes
Just like the waves of a sea
Cleans the beaches
All anxiety are swiped away
From the beach of my heart
Diving into the deep sleep
I will talk to the love
The possibility of this only
Brings so much lights of positivity
But on the contrary...............................

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Ist edition 2009 of Gajendra Thakur’s KuruKshetram-Antarmanak (Vol. I to VII)- essay-paper-criticism, novel, poems, story, play, epics and Children-grown-ups literature in single binding:
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विदेह: सदेह : १ : तिरहुता : देवनागरी
"विदेह" क २५म अंक १ जनवरी २००९, प्रिंट संस्करण :विदेह-ई-पत्रिकाक पहिल २५ अंकक चुनल रचना सम्मिलित।

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विदेह: वर्ष:2, मास:13, अंक:25 (विदेह:सदेह:१)
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Devanagari 244 pages (A4 big magazine size)विदेह: सदेह: 1: : देवनागरी : मूल्य भा. रु. 100/-
६. गामक जिनगी (कथा संेग्रह)- जगदीश प्रसाद मंकडल): मूल्य भा.रु. ५०/- (सामान्य), $२०/- पुस्तकालय आ विदेश हेतु)
७/८/९.a.मैथिली-अंग्रेजी शब्द कोश; b.अंग्रेजी-मैथिली शब्द कोश आ c.जीनोम मैपिंग ४५० ए.डी. सँ २००९ ए.डी.- मिथिलाक पञ्जी प्रबन्ध-सम्पादन-लेखन-गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा
P.S. Maithili-English Dictionary Vol.I & II ; English-Maithili Dictionary Vol.I (Price Rs.500/-per volume and $160 for overseas buyers) and Genome Mapping 450AD-2009 AD- Mithilak Panji Prabandh (Price Rs.5000/- and $1600 for overseas buyers. TIRHUTA MANUSCRIPT IMAGE DVD AVAILABLE SEPARATELY FOR RS.1000/-US$320) have currently been made available for sale.
१०.सहस्रबाढ़नि (मैथिलीक पहिल ब्रेल पुस्तक)-ISBN:978-93-80538-00-6 Price Rs.100/-(for individual buyers) US$40 (Library/ Institution- India & abroad)
११.नताशा- मैथिलीक पहिल चित्र श्रृंखला- देवांशु वत्स
१२.मैथिली-अंग्रेजी वैज्ञानिक शब्दकोष आ सार्वभौमिक कोष--गजेन्द्र ठाकुर, नागेन्द्र कुमार झा एवं पञ्जीकार विद्यानन्द झा Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad)
13.Modern English Maithili Dictionary-Gajendra Thakur, Nagendra Kumar Jha and Panjikar Vidyanand Jha- Price Rs.1000/-(for individual buyers) US$400 (Library/ Institution- India & abroad) COMING SOON:
I.गजेन्द्र ठाकुरक शीघ्र प्रकाश्य रचना सभ:-
१.कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक सात खण्डक बाद गजेन्द्र ठाकुरक
कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक-२
खण्ड-८
(प्रबन्ध-निबन्ध-समालोचना-२) क संग
२.सहस्रबाढ़नि क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर उपन्यास
स॒हस्र॑ शीर्षा॒
३.सहस्राब्दीक चौपड़पर क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर पद्य-संग्रह
स॑हस्रजित्
४.गल्प गुच्छ क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर कथा-गल्प संग्रह
शब्दशास्त्रम्
५.संकर्षण क बाद गजेन्द्र ठाकुरक दोसर नाटक
उल्कामुख
६. त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन क बाद गजेन्द्र ठाकुरक तेसर गीत-प्रबन्ध
नाराशं॒खसी
७. नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक तीनटा नाटक
जलोदीप
८.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक पद्य संग्रह
बाङक बङौरा
९.नेना-भुटका आ किशोरक लेल गजेन्द्र ठाकुरक खिस्सा-पिहानी संग्रह
अक्षरमुष्टिका
II.जगदीश प्रसाद मंकडल-
कथा-संग्रह- गामक जिनगी
नाटक- मिथिलाक बेटी
उपन्यास- मौलाइल गाछक फूल, जीवन संघर्ष, जीवन मरण, उत्थान-पतन, जिनगीक जीत
III.मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार गीत आ गीतनाद -संकलन उमेश मंडल- आइ धरि प्रकाशित मिथिलाक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद मिथिलाक नहि वरन मैथिल ब्राह्मणक आ कर्ण कायस्थक संस्कार/ विधि-व्यवहार आ गीत नाद छल। पहिल बेर जनमानसक मिथिला लोक गीत प्रस्तुत भय रहल अछि।
IV.पंचदेवोपासना-भूमि मिथिला- मौन
V.मैथिली भाषा-साहित्य (२०म शताब्दी)- प्रेमशंकर सिंह
VI.गुंजन जीक राधा (गद्य-पद्य-ब्रजबुली मिश्रित)- गंगेश गुंजन
VII.विभारानीक दू टा नाटक: "भाग रौ" आ "बलचन्दा"
VIII.हम पुछैत छी (पद्य-संग्रह)- विनीत उत्पल
IX.मिथिलाक जन साहित्य- अनुवादिका श्रीमती रेवती मिश्र (Maithili Translation of Late Jayakanta Mishra’s Introduction to Folk Literature of Mithila Vol.I & II)
X. स्वर्गीय प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी-
मिथिलाक इतिहास, शारान्तिधा, A survey of Maithili Literature
XI. मैथिली चित्रकथा- नीतू कुमारी
XII. मैथिली चित्रकथा- प्रीति ठाकुर
[After receiving reports and confirming it ( proof may be seen at http://www.box.net/shared/75xgdy37dr ) that Mr. Pankaj Parashar copied verbatim the article Technopolitics by Douglas Kellner (email: kellner@gseis.ucla.edu) and got it published in Hindi Magazine Pahal (email:editor.pahal@gmail.com, edpahaljbp@yahoo.co.in and info@deshkaal.com website: www.deshkaal.com) in his own name. The author was also involved in blackmailing using different ISP addresses and different email addresses. In the light of above we hereby ban the book "Vilambit Kaik Yug me Nibadha" by Mr. Pankaj Parashar and are withdrawing the book and blacklisting the author with immediate effect.]
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(कार्यालय प्रयोग लेल)
विदेह:सदेह:१ (तिरहुता/ देवनागरी)क अपार सफलताक बाद विदेह:सदेह:२ आ आगाँक अंक लेल वार्षिक/ द्विवार्षिक/ त्रिवार्षिक/ पंचवार्षिक/ आजीवन सद्स्यता अभियान।
ओहि बर्खमे प्रकाशित विदेह:सदेहक सभ अंक/ पुस्तिका पठाओल जाएत।
नीचाँक फॉर्म भरू:-
विदेह:सदेहक देवनागरी/ वा तिरहुताक सदस्यता चाही: देवनागरी/ तिरहुता
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पाँच बर्ख(२०१०-१३ ई.)::७५०/- NEPAL-(INR 2250), Abroad-(US$125)
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(ग्राहकक हस्ताक्षर)


२. संदेश-
[ विदेह ई-पत्रिका, विदेह:सदेह मिथिलाक्षर आ देवनागरी आ गजेन्द्र ठाकुरक सात खण्डक- निबन्ध-प्रबन्ध-समीक्षा,उपन्यास (सहस्रबाढ़नि) , पद्य-संग्रह (सहस्राब्दीक चौपड़पर), कथा-गल्प (गल्प गुच्छ), नाटक (संकर्षण), महाकाव्य (त्वञ्चाहञ्च आ असञ्जाति मन) आ बाल-मंडली-किशोर जगत- संग्रह कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मादेँ। ]
१.श्री गोविन्द झा- विदेहकेँ तरंगजालपर उतारि विश्वभरिमे मातृभाषा मैथिलीक लहरि जगाओल, खेद जे अपनेक एहि महाभियानमे हम एखन धरि संग नहि दए सकलहुँ। सुनैत छी अपनेकेँ सुझाओ आ रचनात्मक आलोचना प्रिय लगैत अछि तेँ किछु लिखक मोन भेल। हमर सहायता आ सहयोग अपनेकेँ सदा उपलब्ध रहत।
२.श्री रमानन्द रेणु- मैथिलीमे ई-पत्रिका पाक्षिक रूपेँ चला कऽ जे अपन मातृभाषाक प्रचार कऽ रहल छी, से धन्यवाद । आगाँ अपनेक समस्त मैथिलीक कार्यक हेतु हम हृदयसँ शुभकामना दऽ रहल छी।
३.श्री विद्यानाथ झा "विदित"- संचार आ प्रौद्योगिकीक एहि प्रतिस्पर्धी ग्लोबल युगमे अपन महिमामय "विदेह"केँ अपना देहमे प्रकट देखि जतबा प्रसन्नता आ संतोष भेल, तकरा कोनो उपलब्ध "मीटर"सँ नहि नापल जा सकैछ? ..एकर ऐतिहासिक मूल्यांकन आ सांस्कृतिक प्रतिफलन एहि शताब्दीक अंत धरि लोकक नजरिमे आश्चर्यजनक रूपसँ प्रकट हैत।
४. प्रो. उदय नारायण सिंह "नचिकेता"- जे काज अहाँ कए रहल छी तकर चरचा एक दिन मैथिली भाषाक इतिहासमे होएत। आनन्द भए रहल अछि, ई जानि कए जे एतेक गोट मैथिल "विदेह" ई जर्नलकेँ पढ़ि रहल छथि।...विदेहक चालीसम अंक पुरबाक लेल अभिनन्दन।
५. डॉ. गंगेश गुंजन- एहि विदेह-कर्ममे लागि रहल अहाँक सम्वेदनशील मन, मैथिलीक प्रति समर्पित मेहनतिक अमृत रंग, इतिहास मे एक टा विशिष्ट फराक अध्याय आरंभ करत, हमरा विश्वास अछि। अशेष शुभकामना आ बधाइक सङ्ग, सस्नेह...अहाँक पोथी कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रथम दृष्टया बहुत भव्य तथा उपयोगी बुझाइछ। मैथिलीमे तँ अपना स्वरूपक प्रायः ई पहिले एहन भव्य अवतारक पोथी थिक। हर्षपूर्ण हमर हार्दिक बधाई स्वीकार करी।
६. श्री रामाश्रय झा "रामरंग"(आब स्वर्गीय)- "अपना" मिथिलासँ संबंधित...विषय वस्तुसँ अवगत भेलहुँ।...शेष सभ कुशल अछि।
७. श्री ब्रजेन्द्र त्रिपाठी- साहित्य अकादमी- इंटरनेट पर प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" केर लेल बधाई आ शुभकामना स्वीकार करू।
८. श्री प्रफुल्लकुमार सिंह "मौन"- प्रथम मैथिली पाक्षिक पत्रिका "विदेह" क प्रकाशनक समाचार जानि कनेक चकित मुदा बेसी आह्लादित भेलहुँ। कालचक्रकेँ पकड़ि जाहि दूरदृष्टिक परिचय देलहुँ, ओहि लेल हमर मंगलकामना।
९.डॉ. शिवप्रसाद यादव- ई जानि अपार हर्ष भए रहल अछि, जे नव सूचना-क्रान्तिक क्षेत्रमे मैथिली पत्रकारिताकेँ प्रवेश दिअएबाक साहसिक कदम उठाओल अछि। पत्रकारितामे एहि प्रकारक नव प्रयोगक हम स्वागत करैत छी, संगहि "विदेह"क सफलताक शुभकामना।
१०. श्री आद्याचरण झा- कोनो पत्र-पत्रिकाक प्रकाशन- ताहूमे मैथिली पत्रिकाक प्रकाशनमे के कतेक सहयोग करताह- ई तऽ भविष्य कहत। ई हमर ८८ वर्षमे ७५ वर्षक अनुभव रहल। एतेक पैघ महान यज्ञमे हमर श्रद्धापूर्ण आहुति प्राप्त होयत- यावत ठीक-ठाक छी/ रहब।
११. श्री विजय ठाकुर- मिशिगन विश्वविद्यालय- "विदेह" पत्रिकाक अंक देखलहुँ, सम्पूर्ण टीम बधाईक पात्र अछि। पत्रिकाक मंगल भविष्य हेतु हमर शुभकामना स्वीकार कएल जाओ।
१२. श्री सुभाषचन्द्र यादव- ई-पत्रिका "विदेह" क बारेमे जानि प्रसन्नता भेल। ’विदेह’ निरन्तर पल्लवित-पुष्पित हो आ चतुर्दिक अपन सुगंध पसारय से कामना अछि।
१३. श्री मैथिलीपुत्र प्रदीप- ई-पत्रिका "विदेह" केर सफलताक भगवतीसँ कामना। हमर पूर्ण सहयोग रहत।
१४. डॉ. श्री भीमनाथ झा- "विदेह" इन्टरनेट पर अछि तेँ "विदेह" नाम उचित आर कतेक रूपेँ एकर विवरण भए सकैत अछि। आइ-काल्हि मोनमे उद्वेग रहैत अछि, मुदा शीघ्र पूर्ण सहयोग देब।कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि अति प्रसन्नता भेल। मैथिलीक लेल ई घटना छी।
१५. श्री रामभरोस कापड़ि "भ्रमर"- जनकपुरधाम- "विदेह" ऑनलाइन देखि रहल छी। मैथिलीकेँ अन्तर्राष्ट्रीय जगतमे पहुँचेलहुँ तकरा लेल हार्दिक बधाई। मिथिला रत्न सभक संकलन अपूर्व। नेपालोक सहयोग भेटत, से विश्वास करी।
१६. श्री राजनन्दन लालदास- "विदेह" ई-पत्रिकाक माध्यमसँ बड़ नीक काज कए रहल छी, नातिक अहिठाम देखलहुँ। एकर वार्षिक अ‍ंक जखन प्रिं‍ट निकालब तँ हमरा पठायब। कलकत्तामे बहुत गोटेकेँ हम साइटक पता लिखाए देने छियन्हि। मोन तँ होइत अछि जे दिल्ली आबि कए आशीर्वाद दैतहुँ, मुदा उमर आब बेशी भए गेल। शुभकामना देश-विदेशक मैथिलकेँ जोड़बाक लेल।.. उत्कृष्ट प्रकाशन कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक लेल बधाइ। अद्भुत काज कएल अछि, नीक प्रस्तुति अछि सात खण्डमे। ..सुभाष चन्द्र यादवक कथापर अहाँक आमुखक पहिल दस पं्क्तिमे आ आगाँ हिन्दी, उर्दू तथा अंग्रेजी शब्द अछि (बेबाक, आद्योपान्त, फोकलोर..)..लोक नहि कहत जे चालनि दुशलनि बाढ़निकेँ जिनका अपना बहत्तरि टा भूर!..( स्पष्टीकरण- अहाँ द्वारा उद्घृत अंश यादवजीक कथा संग्रह बनैत-बिगड़ैतक आमुख १ जे कैलास कुमार मिश्रजी द्वारा लिखल गेल अछि-हमरा द्वारा नहि- केँ संबोधित करैत अछि। कैलासजीक सम्पूर्ण आमुख हम पढ़ने छी आ ओ अपन विषयक विशेषज्ञ छथि आ हुनका प्रति कएल अपशब्दक प्रयोग अनुचित-गजेन्द्र ठाकुर)...अहाँक मंतव्य क्यो चित्रगुप्त सभा खोलि मणिपद्मकेँ बेचि रहल छथि तँ क्यो मैथिल (ब्राह्मण) सभा खोलि सुमनजीक व्यापारमे लागल छथि-मणिपद्म आ सुमनजीक आरिमे अपन धंधा चमका रहल छथि आ मणिपद्म आ सुमनजीकेँ अपमानित कए रहल छथि।..तखन लोक तँ कहबे करत जे अपन घेघ नहि सुझैत छन्हि, लोकक टेटर आ से बिना देखनहि, अधलाह लागैत छनि.....ओना अहाँ तँ अपनहुँ बड़ पैघ धंधा कऽ रहल छी। मात्र सेवा आ से निःस्वार्थ तखन बूझल जाइत जँ अहाँ द्वारा प्रकाशित पोथी सभपर दाम लिखल नहि रहितैक। ओहिना सभकेँ विलहि देल जइतैक। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, अहाँक सूचनार्थ विदेह द्वारा ई-प्रकाशित कएल सभटा सामग्री आर्काइवमे http://www.videha.co.in/ पर बिना मूल्यक डाउनलोड लेल उपलब्ध छै आ भविष्यमे सेहो रहतैक। एहि आर्काइवकेँ जे कियो प्रकाशक अनुमति लऽ कऽ प्रिंट रूपमे प्रकाशित कएने छथि आ तकर ओ दाम रखने छथि आ किएक रखने छथि वा आगाँसँ दाम नहि राखथु- ई सभटा परामर्श अहाँ प्रकाशककेँ पत्र/ ई-पत्र द्वारा पठा सकै छियन्हि।- गजेन्द्र ठाकुर)... अहाँक प्रति अशेष शुभकामनाक संग।
१७. डॉ. प्रेमशंकर सिंह- अहाँ मैथिलीमे इंटरनेटपर पहिल पत्रिका "विदेह" प्रकाशित कए अपन अद्भुत मातृभाषानुरागक परिचय देल अछि, अहाँक निःस्वार्थ मातृभाषानुरागसँ प्रेरित छी, एकर निमित्त जे हमर सेवाक प्रयोजन हो, तँ सूचित करी। इंटरनेटपर आद्योपांत पत्रिका देखल, मन प्रफुल्लित भऽ गेल।
१८.श्रीमती शेफालिका वर्मा- विदेह ई-पत्रिका देखि मोन उल्लाससँ भरि गेल। विज्ञान कतेक प्रगति कऽ रहल अछि...अहाँ सभ अनन्त आकाशकेँ भेदि दियौ, समस्त विस्तारक रहस्यकेँ तार-तार कऽ दियौक...। अपनेक अद्भुत पुस्तक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक विषयवस्तुक दृष्टिसँ गागरमे सागर अछि। बधाई।
१९.श्री हेतुकर झा, पटना-जाहि समर्पण भावसँ अपने मिथिला-मैथिलीक सेवामे तत्पर छी से स्तुत्य अछि। देशक राजधानीसँ भय रहल मैथिलीक शंखनाद मिथिलाक गाम-गाममे मैथिली चेतनाक विकास अवश्य करत।
२०. श्री योगानन्द झा, कबिलपुर, लहेरियासराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीकेँ निकटसँ देखबाक अवसर भेटल अछि आ मैथिली जगतक एकटा उद्भट ओ समसामयिक दृष्टिसम्पन्न हस्ताक्षरक कलमबन्द परिचयसँ आह्लादित छी। "विदेह"क देवनागरी सँस्करण पटनामे रु. 80/- मे उपलब्ध भऽ सकल जे विभिन्न लेखक लोकनिक छायाचित्र, परिचय पत्रक ओ रचनावलीक सम्यक प्रकाशनसँ ऐतिहासिक कहल जा सकैछ।
२१. श्री किशोरीकान्त मिश्र- कोलकाता- जय मैथिली, विदेहमे बहुत रास कविता, कथा, रिपोर्ट आदिक सचित्र संग्रह देखि आ आर अधिक प्रसन्नता मिथिलाक्षर देखि- बधाई स्वीकार कएल जाओ।
२२.श्री जीवकान्त- विदेहक मुद्रित अंक पढ़ल- अद्भुत मेहनति। चाबस-चाबस। किछु समालोचना मरखाह..मुदा सत्य।
२३. श्री भालचन्द्र झा- अपनेक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि बुझाएल जेना हम अपने छपलहुँ अछि। एकर विशालकाय आकृति अपनेक सर्वसमावेशताक परिचायक अछि। अपनेक रचना सामर्थ्यमे उत्तरोत्तर वृद्धि हो, एहि शुभकामनाक संग हार्दिक बधाई।
२४.श्रीमती डॉ नीता झा- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। ज्योतिरीश्वर शब्दावली, कृषि मत्स्य शब्दावली आ सीत बसन्त आ सभ कथा, कविता, उपन्यास, बाल-किशोर साहित्य सभ उत्तम छल। मैथिलीक उत्तरोत्तर विकासक लक्ष्य दृष्टिगोचर होइत अछि।
२५.श्री मायानन्द मिश्र- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक मे हमर उपन्यास स्त्रीधनक जे विरोध कएल गेल अछि तकर हम विरोध करैत छी।... कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पोथीक लेल शुभकामना।(श्रीमान् समालोचनाकेँ विरोधक रूपमे नहि लेल जाए।-गजेन्द्र ठाकुर)
२६.श्री महेन्द्र हजारी- सम्पादक श्रीमिथिला- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़ि मोन हर्षित भऽ गेल..एखन पूरा पढ़यमे बहुत समय लागत, मुदा जतेक पढ़लहुँ से आह्लादित कएलक।
२७.श्री केदारनाथ चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल, मैथिली साहित्य लेल ई पोथी एकटा प्रतिमान बनत।
२८.श्री सत्यानन्द पाठक- विदेहक हम नियमित पाठक छी। ओकर स्वरूपक प्रशंसक छलहुँ। एम्हर अहाँक लिखल - कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखलहुँ। मोन आह्लादित भऽ उठल। कोनो रचना तरा-उपरी।
२९.श्रीमती रमा झा-सम्पादक मिथिला दर्पण। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक प्रिंट फॉर्म पढ़ि आ एकर गुणवत्ता देखि मोन प्रसन्न भऽ गेल, अद्भुत शब्द एकरा लेल प्रयुक्त कऽ रहल छी। विदेहक उत्तरोत्तर प्रगतिक शुभकामना।
३०.श्री नरेन्द्र झा, पटना- विदेह नियमित देखैत रहैत छी। मैथिली लेल अद्भुत काज कऽ रहल छी।
३१.श्री रामलोचन ठाकुर- कोलकाता- मिथिलाक्षर विदेह देखि मोन प्रसन्नतासँ भरि उठल, अंकक विशाल परिदृश्य आस्वस्तकारी अछि।
३२.श्री तारानन्द वियोगी- विदेह आ कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक देखि चकबिदोर लागि गेल। आश्चर्य। शुभकामना आ बधाई।
३३.श्रीमती प्रेमलता मिश्र “प्रेम”- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ। सभ रचना उच्चकोटिक लागल। बधाई।
३४.श्री कीर्तिनारायण मिश्र- बेगूसराय- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बड्ड नीक लागल, आगांक सभ काज लेल बधाई।
३५.श्री महाप्रकाश-सहरसा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक नीक लागल, विशालकाय संगहि उत्तमकोटिक।
३६.श्री अग्निपुष्प- मिथिलाक्षर आ देवाक्षर विदेह पढ़ल..ई प्रथम तँ अछि एकरा प्रशंसामे मुदा हम एकरा दुस्साहसिक कहब। मिथिला चित्रकलाक स्तम्भकेँ मुदा अगिला अंकमे आर विस्तृत बनाऊ।
३७.श्री मंजर सुलेमान-दरभंगा- विदेहक जतेक प्रशंसा कएल जाए कम होएत। सभ चीज उत्तम।
३८.श्रीमती प्रोफेसर वीणा ठाकुर- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक उत्तम, पठनीय, विचारनीय। जे क्यो देखैत छथि पोथी प्राप्त करबाक उपाय पुछैत छथि। शुभकामना।
३९.श्री छत्रानन्द सिंह झा- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक पढ़लहुँ, बड्ड नीक सभ तरहेँ।
४०.श्री ताराकान्त झा- सम्पादक मैथिली दैनिक मिथिला समाद- विदेह तँ कन्टेन्ट प्रोवाइडरक काज कऽ रहल अछि। कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक अद्भुत लागल।
४१.डॉ रवीन्द्र कुमार चौधरी- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक बहुत नीक, बहुत मेहनतिक परिणाम। बधाई।
४२.श्री अमरनाथ- कुरुक्षेत्रम् अंतर्मनक आ विदेह दुनू स्मरणीय घटना अछि, मैथिली साहित्य मध्य।
४३.श्री पंचानन मिश्र- विदेहक वैविध्य आ निरन्तरता प्रभावित करैत अछि, शुभकामना।
४४.श्री केदार कानन- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल अनेक धन्यवाद, शुभकामना आ बधाइ स्वीकार करी। आ नचिकेताक भूमिका पढ़लहुँ। शुरूमे तँ लागल जेना कोनो उपन्यास अहाँ द्वारा सृजित भेल अछि मुदा पोथी उनटौला पर ज्ञात भेल जे एहिमे तँ सभ विधा समाहित अछि।
४५.श्री धनाकर ठाकुर- अहाँ नीक काज कऽ रहल छी। फोटो गैलरीमे चित्र एहि शताब्दीक जन्मतिथिक अनुसार रहैत तऽ नीक।
४६.श्री आशीष झा- अहाँक पुस्तकक संबंधमे एतबा लिखबा सँ अपना कए नहि रोकि सकलहुँ जे ई किताब मात्र किताब नहि थीक, ई एकटा उम्मीद छी जे मैथिली अहाँ सन पुत्रक सेवा सँ निरंतर समृद्ध होइत चिरजीवन कए प्राप्त करत।
४७.श्री शम्भु कुमार सिंह- विदेहक तत्परता आ क्रियाशीलता देखि आह्लादित भऽ रहल छी। निश्चितरूपेण कहल जा सकैछ जे समकालीन मैथिली पत्रिकाक इतिहासमे विदेहक नाम स्वर्णाक्षरमे लिखल जाएत। ओहि कुरुक्षेत्रक घटना सभ तँ अठारहे दिनमे खतम भऽ गेल रहए मुदा अहाँक कुरुक्षेत्रम् तँ अशेष अछि।
४८.डॉ. अजीत मिश्र- अपनेक प्रयासक कतबो प्रशंुसा कएल जाए कमे होएतैक। मैथिली साहित्यमे अहाँ द्वारा कएल गेल काज युग-युगान्तर धरि पूजनीय रहत।
४९.श्री बीरेन्द्र मल्लिक- अहाँक कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक आ विदेह:सदेह पढ़ि अति प्रसन्नता भेल। अहाँक स्वास्थ्य ठीक रहए आ उत्साह बनल रहए से कामना।
५०.श्री कुमार राधारमण- अहाँक दिशा-निर्देशमे विदेह पहिल मैथिली ई-जर्नल देखि अति प्रसन्नता भेल। हमर शुभकामना।
५१.श्री फूलचन्द्र झा प्रवीण-विदेह:सदेह पढ़ने रही मुदा कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखि बढ़ाई देबा लेल बाध्य भऽ गेलहुँ। आब विश्वास भऽ गेल जे मैथिली नहि मरत। अशेष शुभकामना।
५२.श्री विभूति आनन्द- विदेह:सदेह देखि, ओकर विस्तार देखि अति प्रसन्नता भेल।
५३.श्री मानेश्वर मनुज-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक एकर भव्यता देखि अति प्रसन्नता भेल, एतेक विशाल ग्रन्थ मैथिलीमे आइ धरि नहि देखने रही। एहिना भविष्यमे काज करैत रही, शुभकामना।
५४.श्री विद्यानन्द झा- आइ.आइ.एम.कोलकाता- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक विस्तार, छपाईक संग गुणवत्ता देखि अति प्रसन्नता भेल।
५५.श्री अरविन्द ठाकुर-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मैथिली साहित्यमे कएल गेल एहि तरहक पहिल प्रयोग अछि, शुभकामना।
५६.श्री कुमार पवन-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़ि रहल छी। किछु लघुकथा पढ़ल अछि, बहुत मार्मिक छल।
५७. श्री प्रदीप बिहारी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक देखल, बधाई।
५८.डॉ मणिकान्त ठाकुर-कैलिफोर्निया- अपन विलक्षण नियमित सेवासँ हमरा लोकनिक हृदयमे विदेह सदेह भऽ गेल अछि।
५९.श्री धीरेन्द्र प्रेमर्षि- अहाँक समस्त प्रयास सराहनीय। दुख होइत अछि जखन अहाँक प्रयासमे अपेक्षित सहयोग नहि कऽ पबैत छी।
६०.श्री देवशंकर नवीन- विदेहक निरन्तरता आ विशाल स्वरूप- विशाल पाठक वर्ग, एकरा ऐतिहासिक बनबैत अछि।
६१.श्री मोहन भारद्वाज- अहाँक समस्त कार्य देखल, बहुत नीक। एखन किछु परेशानीमे छी, मुदा शीघ्र सहयोग देब।
६२.श्री फजलुर रहमान हाशमी-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक मे एतेक मेहनतक लेल अहाँ साधुवादक अधिकारी छी।
६३.श्री लक्ष्मण झा "सागर"- मैथिलीमे चमत्कारिक रूपेँ अहाँक प्रवेश आह्लादकारी अछि।..अहाँकेँ एखन आर..दूर..बहुत दूरधरि जेबाक अछि। स्वस्थ आ प्रसन्न रही।
६४.श्री जगदीश प्रसाद मंडल-कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक पढ़लहुँ । कथा सभ आ उपन्यास सहस्रबाढ़नि पूर्णरूपेँ पढ़ि गेल छी। गाम-घरक भौगोलिक विवरणक जे सूक्ष्म वर्णन सहस्रबाढ़निमे अछि, से चकित कएलक, एहि संग्रहक कथा-उपन्यास मैथिली लेखनमे विविधता अनलक अछि। समालोचना शास्त्रमे अहाँक दृष्टि वैयक्तिक नहि वरन् सामाजिक आ कल्याणकारी अछि, से प्रशंसनीय।
६५.श्री अशोक झा-अध्यक्ष मिथिला विकास परिषद- कुरुक्षेत्रम् अन्तर्मनक लेल बधाई आ आगाँ लेल शुभकामना।
६६.श्री ठाकुर प्रसाद मुर्मु- अद्भुत प्रयास। धन्यवादक संग प्रार्थना जे अपन माटि-पानिकेँ ध्यानमे राखि अंकक समायोजन कएल जाए। नव अंक धरि प्रयास सराहनीय। विदेहकेँ बहुत-बहुत धन्यवाद जे एहेन सुन्दर-सुन्दर सचार (आलेख) लगा रहल छथि। सभटा ग्रहणीय- पठनीय।
६७.बुद्धिनाथ मिश्र- प्रिय गजेन्द्र जी,अहाँक सम्पादन मे प्रकाशित ‘विदेह’आ ‘कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक’ विलक्षण पत्रिका आ विलक्षण पोथी! की नहि अछि अहाँक सम्पादनमे? एहि प्रयत्न सँ मैथिली क विकास होयत,निस्संदेह।
६८.श्री बृखेश चन्द्र लाल- गजेन्द्रजी, अपनेक पुस्तक कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि मोन गदगद भय गेल , हृदयसँ अनुगृहित छी । हार्दिक शुभकामना ।
६९.श्री परमेश्वर कापड़ि - श्री गजेन्द्र जी । कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक पढ़ि गदगद आ नेहाल भेलहुँ।
७०.श्री रवीन्द्रनाथ ठाकुर- विदेह पढ़ैत रहैत छी। धीरेन्द्र प्रेमर्षिक मैथिली गजलपर आलेख पढ़लहुँ। मैथिली गजल कत्तऽ सँ कत्तऽ चलि गेलैक आ ओ अपन आलेखमे मात्र अपन जानल-पहिचानल लोकक चर्च कएने छथि। जेना मैथिलीमे मठक परम्परा रहल अछि। (स्पष्टीकरण- श्रीमान्, प्रेमर्षि जी ओहि आलेखमे ई स्पष्ट लिखने छथि जे किनको नाम जे छुटि गेल छन्हि तँ से मात्र आलेखक लेखकक जानकारी नहि रहबाक द्वारे, एहिमे आन कोनो कारण नहि देखल जाय। अहाँसँ एहि विषयपर विस्तृत आलेख सादर आमंत्रित अछि।-सम्पादक)
७१.श्री मंत्रेश्वर झा- विदेह पढ़ल आ संगहि अहाँक मैगनम ओपस कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सेहो, अति उत्तम। मैथिलीक लेल कएल जा रहल अहाँक समस्त कार्य अतुलनीय अछि।
७२. श्री हरेकृष्ण झा- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मैथिलीमे अपन तरहक एकमात्र ग्रन्थ अछि, एहिमे लेखकक समग्र दृष्टि आ रचना कौशल देखबामे आएल जे लेखकक फील्डवर्कसँ जुड़ल रहबाक कारणसँ अछि।
७३.श्री सुकान्त सोम- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक मे समाजक इतिहास आ वर्तमानसँ अहाँक जुड़ाव बड्ड नीक लागल, अहाँ एहि क्षेत्रमे आर आगाँ काज करब से आशा अछि।
७४.प्रोफेसर मदन मिश्र- कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन किताब मैथिलीमे पहिले अछि आ एतेक विशाल संग्रहपर शोध कएल जा सकैत अछि। भविष्यक लेल शुभकामना।
७५.प्रोफेसर कमला चौधरी- मैथिलीमे कुरुक्षेत्रम्‌ अंतर्मनक सन पोथी आबए जे गुण आ रूप दुनूमे निस्सन होअए, से बहुत दिनसँ आकांक्षा छल, ओ आब जा कऽ पूर्ण भेल। पोथी एक हाथसँ दोसर हाथ घुमि रहल अछि, एहिना आगाँ सेहो अहाँसँ आशा अछि।
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'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...