Saturday, February 27, 2010

'विदेह' ५२ म अंक १५ फरबरी २०१० (वर्ष ३ मास २६ अंक ५२)- PART III

१.सपथमे मैथिली- सुजीतकुमार झा
२.बेचन ठाकुर,नाटक-‘छीनरदेवी’

१.सपथमे मैथिली
सुजीतकुमार झा

नेपालक उपराष्ट्र पति परमानन्दम झा उपराष्ट्रवपति पदक सपथ मैथिली भाषामे लेलन्हि‍ अछि । उपराष्ट्रलपतिक सपथकेँ पुरे मिथिलाञ्च्लमे चर्चा अछि । बहुतो गोटे मैथिली आन्दोतलनकेँ सपथ सँ जोडैत छथि । उपराष्ट्ररपति कार्यालयक अनुसार मैथिली भाषामे सपथ लेलाक बाद उपराष्ट्रोपति झाकेँ सयकडो बधाई अहि दुआरे एलन्हि‍ जे ओ मातृ भाषामे सपथ लेलथि । ओ अहि सँ पूर्व हिन्दी् भाषामे सपथ लेने रहथि । मुदा हुनकर ओ सपथ नेपालमे भारी विवादमे आएल छल ।
मुदा मैथिलीमे लेलाक बाद ठिक विपरित भेल अछि । नेपाली भाषीसभ सेहो एकरा प्रशंसा कएने अछि । मैथिलीक युवा साहित्यलकार धीरेन्द्र प्रेमर्षि कहैत छथि ‘नेपालमे विकल्पथकेँ रुपमे हिन्दी केँ प्रस्तुित करयबलाकेँ उपराष्ट्रुपतिक नयाँ सपथ सँ चटकन लगलैक अछि ।
मिथिला राज्य‍ संघर्ष समितिक संयोजक परमेश्वरर कापड़ि आब मैथिलीकेँ कियो नहि रोकि सकैत अछि तकर एकटा छोटका उदाहरण रहल बतबैत छथि ।


नेपालमे मैथिली भाषामे सपथ लेबाक परम्पटरा
नेपालमे मैथिली दोसर सभ सँ बेशी बाजय बला भाषा रहल अछि । कहियो काठमाण्डूआ उपत्यिकाक राज्यअ भाषा मैथिली छल । ओतयकेँ राजासभ मैथिलीमे साहित्यल लेखन सेहो करैत छलथि । मल्लि कालमे कएटा राजा एहन भेलथि । जिनकर एकटा साहित्येकारक रुपमे एखनो आदरकेँ साथ नाम लेल जाइत अछि ।
मुदा सपथकेँ इतिहास बहुत लम्बाा नहि अछि ।
नेपालक संसदक तथ्या ङ्क अनुसार डा. बंशीधर मिश्र नेपालक संसदमे पहिल बेर मैथिली भाषामे सपथ लेलन्हिस । नेपाल कम्युकनिष्टअ पार्टी (एकीकृत मार्स्िलवादी लेलिनवादी)क नेता रहल डा. मिश्र २०५१ सालमे सपथ लेने रहथि । जहिया ओ मैथिली भाषामे सपथ लेलथि तहिया मैथिलीकेँ बात करब अपराध मानल जाइत छल, एहन स्थिलतिमे सपथ लेने रहथि । आब तऽ मिथिलाञ्चरलक अधिकाँश नेता मैथिलीमे सपथ लैत छथि ।
हिन्दीि भाषाकेँ गुणगान करयबला मधेशी जनअधिकार फोरमक सह अध्यिक्ष जय प्रकाश प्रसाद गुप्ताे सनक व्य्क्ति सेहो मैथिलीमे सपथ लेने छलथि ।
अहि बेरक संविधान सभाक चुनावमे एकीकृत नेकपा माओवादी तऽ अपन सभासदसभ केँ अपन अपन मातृ भाषामे सपथ लेबाक लेल िह्वाप जारी कएने छल । मैथिलीक चर्चित युवा साहित्यभकार धीरेन्द्रस प्रेमर्षिक शब्दममे मैथिली आन्दो‍लन सही दिसामे जा रहल अछि ।
तकर संकेत अहि बेरक संविधानसभाक सपथ देखलाक बाद लगैत छल ।
मन्त्रीेक रुपमे पहिल बेर एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्का लिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव सपथ लेने रहथि ।
मैथिलीयोमे कम विवाद नहि
उपराष्ट्रेपति परमानन्द झा हिन्दीदमे सपथ लेलाक बाद भारी विवाद भेल छल । एतेक तक की हुनका फेर सँ मैथिली भाषामे सपथ लेबय पडलन्हिद । अहि सँ कम मैथिलीमे सपथ लेबयबलाकेँ नहि भेल छल ।
एकीकृत नेकपा माओवादीक तत्का्लिन नेता मात्रिका प्रसाद यादव मैथिली भाषामे मन्त्रीछपदक सपथ लेबाक इच्छात प्रगट कएलाक बाद तत्कानलिन प्रधानमन्त्री गिरिजा प्रसाद कोइराला किछ घण्टासक लेल सपथ कराबय सँ रोकि देने रहथिन । मुदा मात्रिका यादव नहि झुकलथि आ ओहि समयक सरकारकेँ झुकय पडल छल । मात्रिका यादव कहैत छथि ‘ प्रजातन्त्र चलि एलैक, गणतन्त्रक चलि एलैक आ एकटा भाषा एकटा भेषक नीति रहबे करतै, ई स्वी्कार नहि अछि ।’
मैथिल छी अहि बातक गर्व अछि प्रसंगक क्रममे ओ कहलन्हिह । संासदक रुपमे जहिया डा. बंशीधर मिश्र सपथ लेने रहथि तहियो विवाद भेल छल । आ ओ अडलथि तखन मैथिलीकेँ जीत भेल छलैक ।
सपथमे एतेक माथापिच्चीद किएक
मैथिली भाषामे सपथ लेला सँ मैथिलीकेँ की भेट जएतैक वा की भेट गेलैक ? कोनो नेताद्वारा सपथ लेलाक बाद एकटा छोटछिन कनफुसकी बहस अवश्ये होइत अछि ।
मुदा मैथिली आन्दोनलनीसभ अहि सँ आन्दोइलनमे बल पहुँचैत अछि कहैत छथि । काठमाण्डूि सँ प्रसारण होइत आएल कान्तिीपुर एफएमक हेल्लो मिथिला कार्यक्रमक प्रस्तो ता एवं चर्चित युवा साहित्यँकार धीरेन्द्रक प्रेमर्षि कहैत छथि ‘मैथिलक पहिचानक जतय संकट छैक ओतय छोट छोट चिज महत्व् रखैत छैक । भारतक संसदमे जखन कीर्ति अजाद पाग पहिर कऽ जाइत छथि तऽ लोककेँ गौरव होइत अछि । तहिना नेपाल हुए वा भारत जखन मैथिल नेतासभ मिथिला मैथिलकेँ पहिचान बला कोनो बात करैत छथि तऽ गौरव होइत अछि । आ अहि सँ मैथिली आन्दोथलनमे बल पहुँचैत अछि ।
सपथक लेल नेपालमे प्रयास
नेतासभ मैथिलीमे सपथ लौथु ताहि लेल मैथिली आन्दोचलनी संस्थातसभ पञ्चा यते काल सँ प्रयास करैत आएल अछि । नेतासभ चुनाव जितैथ तऽ अन्यल व्योक्तिकेँ अन्य काज रहैक मुदा जनकपुरक मिथिला नाट्य कला परिषदक संस्थाचपक स्वअ.योेगेन्द्र् साह नेपाली नेता सभकेँ घर घरमे जा कऽ मैथिली भाषामे सपथ लेबाक लेल आग्रह करथि ।
मैथिली विकास मञ्चव काठमाण्डूै आ धीरेन्द्र् प्रेमर्षिकेँ योगदान सेहो नहि बिसरल जा सकैत अछि । जनकपुरक आकृति संस्था‍, राजविराजक मैथिली संस्थाेसभ सेहो अहिकेँ लेल काज कएने अछि ।


२.
बेचन ठाकुर , चनौरा गंज, मधुबनी, बिहार।
‘छीनरदेवी’

एकांकी मैथिली नाटक ‘छीनरदेवी’ पात्र परिचय-

पुरुष पात्र

1. सुभाष ठाकुर- एक साधारण शिक्षित व्यक्ति।
2. ललन ठाकुर- सुभाष ठाकुरक इकलौता पुत्र।
3. पवन- ’’ ’’ भातिज।
4. मटुक- सुभाष ठाकुरक पड़ोसी।
5. राजू- सुभाष ठाकुरक वुजुर्ग भागिन।
6. संजय- सुभाष ठाकुरक भागिन।
7. सुखल कियोट- एकटा साधारण भगत।
8. यदुलाल ठाकुर- सुभाष ठाकुरक छोट भाए।
9. सोमन ठाकुर- यदुलाल ठाकुरक इकलौता बेटा।
10. परबतिया कोइर- एकटा प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक।
11. घटकराज ठाकुर- सुभाष ठाकुरक पीसा।
12. बलदेव महतो- एकटा साधारण किसान।
13. विनोद झा- काली मंदिरक पुजारी।

स्त्री पात्र-
1. मीरा देवी- सुभाष ठाकुरक पत्नी।
2. सुकनी देवी -यदुलाल ठाकुरक पत्नी।
3. मालती देवी- बलदेव महतोक पत्नी।
4. अनु अंजना- बलदेव महतोक इकलौती बेटी।

पहिल दृश्य-

(स्थान- सुभाष ठकुरक घर। मीरा देवी सुभाष ठकुरक पत्नी छथिन्ह। ललन ठाकुर हिनक इकलौता बेटा छथिन्ह। ललन बताह अवस्थामे अपन दरवाजापर अंट-संट करैत छथि। हिनक उपद्रवकेँ देखि सुभाष ओ मीरा मनहुस अवस्थामे)


मीरा- स्वामी, ई छौंरा हमरो बताह बनए देत।
सुभाष- सहए तँ हमहुँ कहैबला रही। हमर मुहक बात छीनि लेलहुँ। हमरा किछु नहि फुराइत अछि। की करी की नहि। ककरासँ देखाबी, ककरासँ नहि। यै ललन माए, मोन होइत अछि जे एकरा राँची वा दरिभंगा लऽ जाय। की विचार अहाँक?
मीरा- हमर विचार इएह अछि जे राँची दरिभंगा लऽ जायसँ पूर्व एकरा कतउ एम्हर-ओम्हर देखए दियौन। नजरि-गुजरि सेहो भए सकैत अछि।
सुभाष- तहन ककरासँ देखए दियन्हि?
मीरा- यै ललन बाप, सुनैत छी सुखलाहा कियोट एहि सभमे बड़ पहुँचल अछि। हुनकहिसँ देखाए दियौन्ह।
सुभाष- हुनक नाम तँ हमहुँ बड़ सुनैत छी।

(ललन घरामसँ खसि पड़ैत छथि आ मुँह रगड़ए लगैत छथि। दुआरिपर ललन ओंघराए रहल अथि।)
मीरा- (अफसियाँत भऽ) बौआ रओ बौआ। की भए गेलौक रओ बौआ?
ललन- (माथ पटकैत) हम तोरे संग जएबौक। हम आब नहि जीबौक। हम तोरो लऽ जेबौक अपनहि संग। हम तोरो खएबौक। हम कोनो भात-दालि खाइत छी। हमरा चाही पियोर खून। हमरा बगिया देने रहौक। बगिएमे सबटा कारामात छल। (सौंसे दुआरि ललन ओंघरए रहल अछि। कपड़ा-लत्ता फारि लैत अछि। पवन, मटुक, राजू आ संजयक प्रवेश। ललनक दृश्य देखि रहल छथि सभ कियो। सुभाषकेँ अक-बक किछु नहि फुराइत छन्हि।)
मटुक- यौ सुभाष, बौक जेकाँ ठाढ़ रहने काज नहि चलत। अहाँ सुखल कियोट लग जाउ। हुनका जल्दी बजौने आउ।
(सुभाष, सुखल कियोटक ओहिठाम गेलाह। किदुए खानक बाद सुभाषक संग सुखलक प्रवेश।)
सुखल- अहाँ सभ कने कात भऽ जाउ।
(सभ कियो कात भऽ जाइत छथि। सुखलकेँ देखि कऽ ललन आओर माथ पटकए लगैत अछि।)
सुभाष- कने जल्दी देखियौक सरकार।
सुखल- अहाँ सभ हरबराउ नहि। हम बैसल नहि छी सभ देखि रहल छी। (अपन जेबीसँ किछु निकालि कऽ ललनपर फेंकैत छथि। ललन बिल्कुल शांत भऽ जाइत अछि।)
ललन- आब नहि हओ। आब कहियो नहि अएबह।
सुखल- तों, के छिअएँ?
ललन- हम नहि कहबह-5
सुखल- नहि हओ। तों हमर के छह, जे तोरा हम कहबह।
सुखल- हम तोहर बाप छियौक।
ललन- हमहुँ तोहर बाप छियह।
(सुखल ललनकेँ एक चाट गालपर मारि दैत छथि।)
आब नहि अएबह।
सुखल- नाम कऽ ह।
ललन- हमर नाम छी देवकी कुमारी।
सुखल- के रखने छौक?
ललन- छोटकी काकी।
सुखल- कत्तए रखने छौक?
ललन- से नहि कहबह-3
(फेर सुखल एक चाट छऽ कऽ माथा हाथ दैत छथि।)
सुखल- आब कहबें।
ललन- हँ हओ। आब कहबह।
सुखल- तहन कह। जल्दी बाज। नहि तँ बुझि ले।
ललन- मारह नहि, कहि दैत छियह।
कोहामे। पैखाना घरमे।
सुखल- किएक अएलें?
ललन- ललनकेँ लऽ जेबाक लेल। एकसरे हमरा मोन नहि लगैत अछि। हम ललनकेँ नहिए छोड़बै।
(सुखल ललनकेँ कसिकए माथा हाथ दैत छथि। भूत भागि जाइत अछि। ललन चंगा भऽ जाइत अछि। देह-हाथ झारि कऽ कुर्सीपर बैस जाइत छथि।)
बाबूजी, एतेक भीड़ किएक अछि?
सुभाष- नहि कोनो खास बात। हिनका सभकेँ हमरासँ किछु विशेष गप्प छेलन्हि। ललन, तों जाह बौआ।
(ललनक प्रस्थान)
सुखल गोसांइ, हमर बेटा कोना ठीक होएत? एकरा अछि की?
सुखल- एकरा केलहा अछि? एकरा केनिहारि अहाँकेँ अपनहि परिवारमे अछि।
सुभाष- गोसांइ, एकर इलाज अहींकेँ करए पड़त।
सुखल- सुभाष बाबू, एकर इलाज हमरासँ असंभव अछि, हम आब ई काज छोड़ि देलहुँ। हाथ जोडैत छी, दोसर जुगार कए लिअ।
(प्रस्थान)
(पटाक्षेप)

दृश्य दोसर- अगिला अंकमे....
१.जनकपुरमे मिथिला महोत्सअवक आयोजन ः नवअध्या यक शुभारंभ २.-कथा-ऋषि बशिष्ठ-पूत कमाल

रामभरोस कापडि भ्रमर
नेपाल सरकारक संस्कृंति मंत्रालय द्वारा २०५५ सालक ऐन द्वारा गठित वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् एहिसं पूर्वो तीन बेर ‘मिथिला महोत्स व’क आयोजन २०६३, २०६४ आ २०६५ सालमे कऽ चुकल अछि । मुदा ओ तीनू आयोजन खेल तमासा सं आगां नहि जा सकल । राजनीतिक हस्तीन सभक जमघट आ तेहने सन पृष्टूपोषण करैत सम्पूंर्ण आयोजन ।
एमहर दीगम्व र राय जखन परिषद्क अध्ययक्ष भऽ अएलाह तं मिथिला महोत्सतव किछु फूट करबाक सोच बनौलनि । फूट एहि मायने मे जे ओ मिथिलाक परम्पररागत लोक संस्कृ ति आ जविनशैलीके मूर्त्त अमूर्त्त रुपें प्रस्तु।त कएल जएबाक विचार रखलनि । तकरालेल स्थापनीय जानकार सभक चारि पांच बैसार भेल आ तखन जे ढांचा तैयार भेलै तकरे आधारपर सम्पूकर्ण कार्यक्रम करबाक नियार भेल अछि । अगामी रामनवमीक अवसर पर चैत्र ९ गते सं १३ गते (२२ मार्चस २६ मार्च धरि) आयोजन होब’ बला ई महोत्सदव स्वकयं अपनामे एखन धरिक नव हयत ।

औचित्य एवं विशेषता
प्राचीन मिथिलाक स्थासपना माधव विदेह द्वारा आइसं पांच हजार वर्ष पूर्व भेल ई इतिहास सत्यत अछि । तहिया सं आइधरि तीन राजवंश मिथिलामे शासन कएलक । राजा जनकक वंश समाप्तह भेलाक बाद १०९७ ई. मे नान्यिदेव मिथिलाराजक नओ ठाढ कएलनि जे २२७ वर्ष धरि चलल । तकरा वाद हेरायल मिथिला पुनः १५५६ ई. मे ओइनवारवंशक संग उजागर भेल जे दरिभंगा महाराजक राजपाट गेला धरि चलल । एहि विच अनेकों तरहक सामाजिक, राजनीतिक उथल–पुथल होइत रहल । मुसलमानी शासक सभक आक्रमणसं पीडित मिथिलाञ्चनलक राजा वा श्रेष्ठं व्येक्तित्वत, विद्वान सभ नेपाल दिश शरण लेलनि । अपन संस्कृछति आ भाषाक संग पलायन कएल ई महापुरुष लोकनि मैथिल संस्कृततिक छापकें अक्षुण्ण रखलनि । ओकर परम्पलरागत सम्प दा, लोक व्यिवहार, जीवन शैली, आचार–व्यगवहार सभकें वर्षहुं धरि वचा कऽ रखलनि । जकर प्रभाव समस्त‍ मिथिलाक आवादीपर पड़लैक । मिथिलाक विशिष्टे जीवनशैली, सांस्कृनतिक परम्पगरा, धार्मिक सहिष्णुतता एखनो मननीय रहल अछि । माछ–मरुवाक रोटी, खेसारीक साग आ आलुक सन्नार, तिलकोरक तरुआ, छाल्हिमगर दही–मुंहसं पानि आबि जाए तेहन भोजनक सामग्री रहल अछि । धोती, अंगपोछा, मुरेठा, गोलगाला–खास पहिरन अछि तं जट–जटिन, सामाचकेवा, झिझिया, लोक पर्व । अरिपन, टाटपरक चित्रांकन मौलिक चित्र अछि तं पोखरि मे चुभक्का– मारि उजी–उजीक खेल अपन पहिचानक साक्षी बनल अछि । पौती, पेटारी, खुरपी–हंसुआ, जांत–ढेकी, खेत–खढ़िहान जीवन पद्धतिक अंग रहल अछि । सोहर, झूला, पराती, पावस, महराई, पजनिया,ं गोदना, पमरिया गीत – घर–आंगनक शोभा बनैत आबि रहल अछि । हजाम, लोहार, कुम्हाुर, डोम गृहस्थीत चलब’ बला पसारी सभ अछि । एहने तत्वर सभक सहयोगसं वनैत अछि एकटा मैथिल परिवार, मिथिलाक जनजीवन ।
‘मिथिला महोत्सेव’ तेहने जीवन शैलीक ताही रुपमे प्रस्तुचति हयत । आजुक नवका पीढि अपनो परम्पअरागत लोक व्योवहार, जीवनशैलीकें विसरने जा रहल अछि, एहि प्रदर्शनीसं अप्पनन पहिचान प्रति आर उर्जावान बनत से विश्वाोस कएल जा रहल अछि ।
एकर आयोजन वृहत्तर जनकपुर क्षेत्र विकास परिषद् जनकपुरधाम कऽ रहल अछि । एकर नारा छैक, हम्मार संस्कृ ति हम्मकर पहिचान ः समृद्ध मिथिला हम्म र अभियान’ ।

महोत्सछवक आकर्षक पक्ष
्र मिथिलाञ्चसलमे पहिल बेर एक्केष ठाम मिथिलाक गौरब गाथाक विभिन्नि पक्षसभ, इतिहास, भूगोल, संस्कृछति, कला एवं लोक जीवनक झांखीसभ जीवंत रुपें प्रदर्शन कएल जाएत ।
्र मैथिलीमे लिखित प्राचीन पाण्डुरलिपि, दस्ताावेज तथा पुरातात्वि,क सामग्री सभक प्रदर्शन हयत ।
्र मिथिलामे रहनिहार जनजाति, आदिवासी एवं विभिन्नग जाति सभक परम्पनरागत व्यसवसाय देखब’ बला फूट फूट स्ट ल सभ राखल जाएत, जाहिमे व्यथवसायिक, उत्पा दनक क्रियात्म क रुप देखाओल जाएत ।
्र मिथिलामे परम्प्रागत रुपें प्रचलित भेषभूषा, परिधान आ आभूषणक सेहो ओत्त प्रदर्शन कएल जाएत ।
्र मैथिल खानपानक विविध रुपरंगक स्वा द आ अनुभूति लेल जा सकत ।
्र सभ धार्मिक सम्प्र दायक फूट फूट स्टतल द्वारा अपन अपन धर्म ज्ञानक प्रचार प्रसारक अवसर उपलव्धर कराओल जाएत ।
्र लोक जीवनमे आब बला बारहो मासक पर्व तिहारक विशिष्टजता दृश्यन द्वारा देखाओल जाएत ।
्र लोक गायक गायिका सभक माध्य‍मसं जन्मशसं मृत्युश धरिक भावदृश्याक अनुभूति गायन द्वारा कराओल जाएत ।
्र लोकमंचक प्रस्तुलतिकरण क्रममे राजा सलहेस, दीनाभद्री, लोरिक, दुलरा दयाल, जया विसहरक नाचक संगहि जट जटिन, समा चकेबा, झिझिया नृत्यलसभ देखाओल जाएत ।
्र लोकशिल्पपक विभिन्नण पक्षकें देखब’ बला प्रदर्शनीक आयोजन कएल जाएत ।
्र प्रचलित लोक गाथाक नायक आ कथा प्रसंगकें माटिक मूर्ति द्वारा सजीव रुपें प्रस्तुयत कएल जाएत ।
्र मैथिलीमे प्रकाशित पत्र पत्रिका सभ, पुस्त क सभक प्रदर्शनी सेहो रहत ।
्र महोत्समव अबधि भरि विचारगोष्ठी , कवि सम्मेकलन, वाल गोष्ठीत, फिल्मक उत्सजव, सभासद् सम्मेअलन, व्यिवसायिक एवं औधोगिक प्रदर्शनी, खेलकूदक संगहि मनोरंजनक आनो सामग्रीक भरमार रहत ।
एहि तरहें विभिन्नि आयोजनक तैयारि चलि रहल अछि । प्राचीन तिरहुतिया गाछीकें एकर आयोजन स्थ ल बनाओल गेल अछि । एकरालेल ४९ गोट उपसमिति बनाओल गेल अछि । लगभग ५० लाख टकाक खर्चसं सम्पछन्नभ होब बला ‘मिथिला महोत्सगव’ सम्पूसर्ण मैथिली भाषीक हेतु दर्शनीय तं हएबे करत, आन्त रिक पर्यटनकें सेहो बढाबा एहिसं भेटतैक । नेपालमे अगामीसन् २०११ कें पर्यटन वर्षक रुपमे मनएबाक तैयारी चलि रहल अछि । एहि तरहक आयोजन ताहिमे सहयोगीक काज करत से विश्वाोस कएल जा सकैछ ।
२.
कथा
ऋषि बशिष्ठ

पूत कमाल

अर्जुन चौधरीक विआह गाममे चर्चक विषए बनल छलै। अर्जुन चौधरी एकटा सुभ्यस्त गृहस्थ रहैत अपन बेटाकेँ कोनो ने कोनो जोगाड़े विदेश पठा देने छला। चौधरीक बेटा दस सालपर गाम घुमल छल। सौंसे गामक लोक पहिने यएह कहैत छलै जे अर्जुन चौधरीकेँ ओहि बेटे पोता नहि होमएबला छनि। ओकर लोटिया डूमले बुझू! ओकी आब गाम आओत? एह! ओ छौंड़ा आब चौधरीक कहने विआह दान करतनि......... ओ तँ ओम्हरे कतहुँ साइट-धाइट लगौने हेतनि की! अर्जुन चौधरीक बंश बुड़ले बुझू।
अर्जुन चौधरीकेँ अपन एकमात्र पुत्र बंशीपर भरोस छलनि मुदा लोकक बात सुनि-सुनि हुनको करेज दलमलित होमए लगैत छलनि। खास कऽ जखन बंशीक माए ककरो बेटाक चर्च करैत छलखिन जे ओ बाहरेमे विआह कऽ लेलकनि। तखन तँ चौधरीकेँ जेना करेज कटि कऽ खसि पड़ैत छलनि।
जहियासँ बंशी आएल अछि सगरो गाममे ओकरे चर्च होइत रहैत छैक। ओना आबक बंशी आ दस साल पहिनेक बंशीमे कतहु मेल मिलाप नहि छैक। दस साल पहिने जखन बंशी कोरिया गेल छल तँ थुल-थुल करैत देह दशा, कौड़ी सन-सन लटकल आँखि आ धरतीकेँ जेना धमकबैत चालि।......... आर तँ जे, ओकर वेश-भुषा आ बगए-बानिसँ ओ साफे विदेशी बुझाइत। ओ बंशी आब बंशी नहि रहल अपन नाम बदलि कऽ डब्बू कऽ लेने अछि।
गामक लेल डब्बू चिड़िघरमे आएल नव जानवर जेकाँ छल जकरा सभकियो देखए चाहैत छल। आ डब्बूक लेल ई गाम-घर आ लोक सभकिछु नब बथान लगैत छल। ठीक ओहिना जेना माल-जाल लेल नबका बथान। सभ किछुकेँ सुँधैत। धियापूता स्कूलसँ हेँजक-हेँज अबैत छल डब्बूकेँ देखवाक लेल। डब्बूक थुलथुल देहदशा पएरमे उज्जर दप-दप जुत्ता, लाल रेगक घुट्टी भरिक मौजा, तैपर कारी रंगक ठेहुन धरि पहिरने पैंट। पैंटमे बसोटा जेबी जेना जगह-जगह चेफड़ी साटल होइ। ऊपर बंदगलाक गंजी आ माथपर मुजैला पथियाक टोप। आँखिमे कारी खुंझा चश्मा, पाछाँसँ डोरी बान्हल। धीया पूताक लेल जेना एकटा खेल उखड़ि गेल छलै। केम्हरोसँ आएल आ डब्बूकेँ देखि कऽ ठिठिया लेलक। एतबेमे जेना ओकर सबहक सभटा ठेही मेटा जाइ। अर्जुन चौधरी डब्बूक विआह करेबाक लेल गोटीपर गोटी फिट करैत रहलाह। पहिने तँ हुनकर अनुमान छलनि जे बेटाकेँ अबिते घटक झपट्टा मारत। लड़का विदेशमे कमाइए। भेल मुदा उनटे। ओ जतए बेटाक विआहक चर्च करथि सभ यैह कहि कऽ टारि दैत छलनि जे बिलेँती लड़काक कोन ठेकान। ओकरासँ वियाहि कऽ के अपन बेटीक जिनगी खराप करत......... एकटा बुढ़ा तँ एतेक तक कहि देलखिन जे- ‘‘औ बाबू, तोहर बेटा छह भारत छोड़ो आन्दोलनकारी आ हमसभ छी सुच्चा भारती। गाँधीक भारत छोड़ो आन्दोलन छलनि फिरंगीकेँ भारत छोड़ेबाक लेल आ तोहर बेटा तँ अपनहि भारत छोड़ने छह......। आब तोहीं कहह जे के एहन धरकट बाप होएत जे एतेकटा बेटीकेँ पोसि-पालि कऽ अपनहि हाथेँ गरदनि काटि लेत?’’
......अर्जुन चौधरीकेँ जेना सटाक्........चाट लगलनि ओहि बुढ़ाक बातक। ओ जेना तेना बेटाक विआह कराबक लेल मोने-मोन निश्चय कऽ लेलनि।
डब्बूक लेल लोकक व्यवहार सामान्य नै छलै आ गामक लोकक लेल डब्बुक व्यवहार असमान्य छलै। ठीक ओहिना जेना ओझाक लेखेँ गाम बताह आ गामक लेखेँ ओझा.........। गाम भरिमे टुनटुन एकमात्र ओहन लड़का जकरासँ डब्बू जखन-तखन गप्प करैत छल। टुनटुन डब्बूक बालसंगी छलै जे पढ़बा-लिखबामे तेज रहितो परिस्थितिवश गामेमे रहैत छल।
.......जेना-तेना अर्जुन चौधरी अपन बेटाक रामनगर तँइ केलनि। ओ अपन बेटाक बदलल व्यवहारसँ कनेक बेसिये चिन्तित छलाह। विआह तँ तँइ भऽ गेलै मुदा किछु तेहन ने भऽ जाइ जाहिसँ सभ कएल-धएल चौपट्ट भऽ जाए।
........आइ विआहक दिन अछि। अर्जुन चौधरीक घरमे जेना उत्सवक माहौल छनि। आँगनसँ कखनो-कखनो महिलाक सामुहिक स्वरमे गीत आ कखनो हँसी-ठट्ठाक अवाज दलान धरि पहुँचैत अछि। आंगनमे बजैत साउण्ड वॉक्ससँ निकलैत रीमिक्स गीत........‘‘सैंया दिलमे आना रे......’’ मुदा बेसी सुनाइ पड़ैत छल।
दलानपर हथपड़ीक लेल आएल पाँच गोट सुभ्यस्त भेल बैसल छथि। गाम-समाज अपन-अपन तर्कसँ डब्बू आ अर्जुन चौधरीक गुणगान करबामे जुटल अछि। पाहुन सभ कखनो-कखनो गप्पोमे सहमति आकि असहमति टा व्यक्त करैत छथि। एकटा प्रौढ़क कहब छनि जे- ‘‘बस्स एकटा संतानकेँ विदेश पठा दिऔ! देखियौ सभ कष्ट दूर....!’’
दोसर टिपैत छथिन- ‘‘विदेश पठाएब सबहक बशमे बात नै छै औ बाबू! विदेश पठाबहिमे केहन केहनकेँ ढोंढ़ी ढील भऽ जाइ छै।’’
प्रौढ़ जेना दोसराक गप्पकेँ मलहम लगबैत छथि- ‘‘से तँ होइते छै, फाउ-दावमे जँ विदेश जैतै तँ सभ अपन बेटाकेँ विदेशे पठा दितै।’’
अर्जुन चौधरीक जेना जीह टाँगल छलनि। ओ कछमछीमे रहथि। कखनो आँगन कखनो दलान। आँगनमे स्त्रीगणक भीड़ आ दलानपर पुरुषपातक। डब्बू विआहक लेल तैयार भऽ गेल छल। ओ कोट पैंट पहिरि गलामे टाइ लगा कऽ तैयार छल। स्त्रीगण सभ ओकरा धोती-कुर्त्ता पहिरेबाक लाख कोशिश केलनि ओ साफे नकारि देलकनि। डब्बू धोती-कुुर्ता आ डोपटा-पागकेँ ‘‘पूअर’’ ड्रेस कहैत अछि। डब्बूक माए जखन कपड़ा बदलबाक लेल कहलखिन तँ ओ तमकैत बाजल- ‘‘हम ड्रेसमे कोनो कम्प्रोमाइज नै कऽ सकै छी।’’
महिला सभ कनफुसकी करए लगलीह। ‘‘मए गै माए, एहन अन्हेर नै देखल-ए! ई मैथिल ब्राहमणक विआहमे कतौ अंगरेजिया ड्रेस चललै-ए?’’
बेराबेरी सभ बुझबैत रहलीह मुदा डब्बू ककरो बात मानबाक लेल तैैयार नहि भेल। हथधड़ीक बेर भेलै। महिला सभ कनफुसकी करैत सभ बिधकेँ पूरा करैत गेलीह।
क्रमशः अगिला अंकमे देल जाएत.......
१. प्रकाश चन्द्र-नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण २.
बिपिन झा-युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग" (वेलेण्टाइन डे विशेष पर)


प्रकाश चन्द्र
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा
भगवान दास रोड, नई दिल्ली – 01

नचिकेताक ‘प्रियंवदा’ : एक विश्लेषण

प्रियंवदा उदय नारायण सिंह नचिकेता द्वारा लिखित एकांकी आछि । एकरा सम्पूर्ण नाटकक रूप द’ क’ मनोज मनुज मंचित केलथि । एहि प्रस्तुति के देखबाक सौभाग्य हमरा नहि प्राप्त भेल, मुदा प्रस्तुति आलेख हमरा उपलब्ध भेल । ओही नाट्यालेख के अध्ययन केलाक बाद हमर निम्न अनुभव अछि ।

जेना कि नाम स’ लगैत अछि जे प्रियंवदा कोनो ऎतिहासिक पृष्ठभूमि पर आधारित नाटक होयत मुदा से अछि नइ । ई मात्र नाटकक एकटा केन्द्रित पात्रक नाम अछि जिनका इर्द-गीर्द नाटकक कथानक घुमैत अछि ।


नाटकक कथ्य एना अछि जे प्रियंवदा नामक एकटा लड़की कोनो शहर में एसगर रहि रहल छथि आ कोनो कम्पनीक लेल मार्केटिंग सर्वे करैत छथि । ओही शहर मे शर्व नामक एकटा युवक सेहो रहैत छथि । शर्व के कविता लिखब खूब पसिन छनि आ प्रियंवदा के कविता सूनब नीक लगैत छनि । शर्वक कविता स’ प्रभावित भ’ प्रियंवदा शर्व संग प्रेम विवाह क’ लैत छथि । बाद मे किछु घटना घटैत अछि । सर्व प्रियंवदा के छोड़ि कतौ चलि जाइत छथि । नाटक मे प्रियंवदाक भैया आ भौजी छथिन संगहि किछु कोरस पात्रक प्रयोग सेहो कयल गेल अछि । एहि तरहे नाटक मे कुल जमा दस गोटे छथि ।


नाटक प्रियंवदा छ: दृश्य मे बाँटल गेल अछि । पहिल मे प्रियंवदा आ हुनकर भौजीक संवाद छनि । दोसर दृश्य मे कोरस, प्रेमी-प्रेमिका, प्रियंवदा आ शर्व छथि । तेसर दृश्य मे कोरस, शर्व आ प्रियंवदा तथा चरिम दृश्य मे शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी छथि । पाँचम दृश्य मे एक बेर फेर शर्व, प्रियंवदा, भैया आ भौजी तथा छठम दृश्य मे शर्व आ प्रियंवदा दुनू मात्र छथि ।


ई नाटक दूटा स्थान पर घटित होएत अछि – पहिल शर्व के घर में आ दोसर सार्वजनिक पार्क मे । शर्व के घर मे चरिटा दृश्य होइत अछि – पहिल, चरिम, पाँचिम आ छठम तथा पार्क में दोसर आ तेसर दृश्य होइत अछि । घरक दृश्य मे कुर्सी, किताब, काग़ज़, लैम्प होइत अछि आ पार्क मे संबंधित सामान राखल जा सकैत छैक ।


प्रियंवदा नाटक फ्लैस बैक मे चलैत अछि । उदय नारायण सिंह नचिकेताक ई प्रिय शैली छनि । एकर प्रयोग नचिकेता जी एक छल राजा मे सेहो केने छथि । नाटकक मे एहन तरहक शैली प्राय: नाटक के कमजोर करैत अछि । हँ ! ज’ नाटकक बीच मे किछु कालक लेल वा कोनो एकटा दृश्य फ्लैस बैक मे अबैत हो तखन त’ कोनो विशेष नहि मुदा, नाटकक पहिल दृश्यक बाद सम्पूर्ण नाटक एहि फ्लैस बैक शैली मे चलय त’ निश्चित नाटकक लेल ओतेक प्रभावी नहि भ’ सकैत अछि । कारण, कोनो नाटक एकटा लय मे चलैत अछि, जकर ग्राफ शून्य स’ आगू उठैत छै । दर्शक मे हरदम ई उत्सुकता बनल रहैत छनि जे आब की हेतैक । जखने ई उत्सुकता समाप्त भ’ जाइत अछि नाटक अपना संग दर्शक के बन्हबा मे कमजोर पर’ लगैत अछि । प्रियंवदाक अंतिम पड़ाव जे कि पहिले दृश्य मे अछि कोनो ओतेक प्रभाव नहि छोड़ैत अछि । खैर ...


आब एहि नाटकक कथ्य पर विचार करबाक चाही । नाटकक शुरुआत कथ्यक समापन स’ होइत अछि । तात्पर्य ई जे शर्व अपन प्रियंवदा के छोड़ि क’ चलि जाइत छथि जिनका स’ किछुए पहिने ओ प्रेम विवाह केने रहथि । प्रियंवदा वियोग मे रहैत छथि आ हुनकर भौजी हुनका समझा-बुझा रहल छथिन । मुदा, ओ अपना आप मे रहनाइ बेसी उचित बुझैत छथि । हुनकर एकटा संवाद बुझू नाटकक मूल अछि : “सेल्स गर्लक काज करैत – करैत हम स्वयं मार्केट पोडक्ट बनि गेल रही ” । आब प्रियंवदा अपन जीवनक कथा दोहरबैत छथि । कोना ओ अपना नौकरी स’ जुड़ल छलीह, कोना हुनका शर्व भेटलखिन, कोना एक दोसर स’ प्रेम भेलन्हि जे विवाह मे परिणत भेल, कोना दुनूक जीवन चलैत रहैन, कोना शर्व पर हुनक पिछला जीवन हॉबी भ’ जाइत रहनि, कोना शर्व कविता लिखनाई स’ प्रेम करैत छलाह, कोना एक दिन भैया भौजी अकस्मात घर अयलखिन, कोना हुनका सभ संग शर्वक व्यवहार बदललनि, कोना शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा संग दुरव्यवहार क’ र’ लगलाह, कोना शर्वक दिमाग बदलि गेलनि आ ओ प्रियंवदा के छोड़ि घर स’ कतौ चलि गेलाह । आब प्रियंवदा हुनकर वियोग मे आइयो ओहिना ठाढ़ छथि ।


एहि नाटक मे कथ्यक दूटा धारा अछि । एकटा त’ बिलकुल सामान्य जे तुरत नाटकक नामे स’ देखाइत अछि जे स्त्रीक सामाजिक स्थिति केहन अछि । आइ नै आदि काल स’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति मे कोनो परिवर्तन नै एलैन्ह अछि । हँ ! एकर रूप जरूर बदल अछि । आदि काल मे नल अपन दमयंती के सुनसान जंगल मे छोड़ि क’ चलि गेल छलाह, दुश्यंत त्यागि देलनि शकुंतला के । आइयो शर्व अपन प्रिय प्रियंवदा के आदमी रूपी जंगल मे छोड़िक’ चलि गेलाह । प्रेमक परिणति, वियोग मे - ओहू समय आ आइयो ।


नाटकक कथ्यक दोसर धारा सेहो अछि जे पहिलुक कथ्य स’ अति महत्वपूर्ण आ सारगर्भित सेहो छैक । शर्व एकटा कवि छथि हुनका पर हुनकर अतीत हरदम सबार रहैत छनि । एहि ठाम शर्व एहि नाटक पात्र मात्र नहि छथि बल्कि आजुक मानव समाजक प्रतिनिधित्व क’ रहल छथि । लोक चाहे जे किछु भ’ जाइछ या बनि जाइछ हुनकर अतीत हरदम हुनका पर छाया जेना मँडराइत रहैत छनि । एहि अतीत स’ किछु समर्थ व्यक्ति अपना आप के बचा लैत छथि आ ओहने व्यक्ति महान होइत छथि । मुदा अधिकांश व्यक्ति ओकर प्रभाव मे आबि जन सामान्यक जीवन जीबैत छथि या शर्व जेना अमानवीय व्यवहार क’र’ लगैत छथि । ई अति महत्वपूर्ण अछि आ एतबे नहि एखुनका सन्दर्भ मे ई विश्व स्तर पर गम्भीर प्रश्न बनल अछि । मुदा प्रियंवदा नाटक मे एहि गम्भीर मुद्दा के दाबि क’ स्त्रीक सामाजिक स्थिति सन सार्वजनित मुद्दा के प्रमुखता स’ प्रभावी बना देल गेल अछि । जँ एहि नाटकक नाम प्रियंवदा क’ बदला किछु आर होइत त’ ई निर्देशकक मोनक विचार आ कुशलता भ’ सकैत छल जे ओ कोन पक्ष केँ बेसी उभारैत छथि ।


पात्रक चुनाव उदय नारायण सिंह नचिकेताक नाटकक अत्यंत प्रभावी अंग थिक । कारण, सभ पात्र गठल आ कथ्यक माँगानुसार होइत छनि । एहू नाटक मे पात्रक संख्या आ ओकर विस्तार कथ्यक अनुसार उचित अछि । संगहि कोरसक प्रयोग क’ क’ आरो आसान बनाओल गेल अछि । कोनो छोट स’ छोट संस्था एहि नाटक केँ आसानी स’ प्रस्तुत क’ सकैत अछि । नाटक मे प्रियंवदा सबस’ महत्वपूर्ण चरित्र छथि आ ओहि के बाद शर्व । मुदा एकटा अभिनेताक लेल सबस’ महत्वपूर्ण आ चुनौतीपूर्ण चरित्र छथि शर्व । ई पात्र जतेक साधारण देखाइत अछि कविक रूपमे ओतबे जटिल अछि आंतरिक रूपे । अभिनयक जे सबस’ महत्वपूर्ण अंग अछि अंतरद्वन्द से एहि पात्र में दुनू तरह स’ भरल अछि – बाहरी आ आंतरिक सेहो । बाहरी मे अपन प्रियंवदा आ समाज सँ, आ आंतरिक मे हुनक अपन अतीत स’ । एहि तरहक चरित्र कोनो अभिनेता लेल पसंदिदा चरित्र होइत अछि । तेँ हम शर्व के एहि नाटक मे महत्वपूर्ण चरित्र मानैत छी । भैया आ भौजीक रूप मे दूटा पात्र आरो छथि । नाटक लेल ई दुनू सहयोगी पात्र छथि । अहू मे भौजी कनी बेसी महत्वपूर्ण । पहिने कहने छी जे कोरस के प्रयोग नीक अछि । तेँ प्रियंवदा पात्रक अनुसार एकटा महत्वपूर्ण नाट्य रचना थिक ।


नाटक मे नाटकीय भाषाक जे प्रयोग भेल अछि से शास्त्रीय थिक । चुँकी नचिकेता जी स्वयं नीक कवि सेहो छथि तेँ हिनक कविता बेसी प्रमुखता संग नाटक मे रहैत छनि । यैह कारण अछि जे बहुत बात ओ बहुत कम्मे शब्द आ सुगठित भाषा मे कहि लैत छथि । मुदा प्रियंवदा मे कविताक प्रयोग किछु विशेष भ’ गेल अछि । ओना शर्व कवि छथि तेँ कविता अधिक - सेहो कोनो उचित तर्क नहि बुझना जाइत अछि । आ एहन तरहक भाषाक प्रयोग नाटक के भ्रमित करैत अछि ओ एना कि भाषाक आधार पर प्रियंवदा के की कहल जाय शास्त्रीय नाटक, ऎतिहासिक नाटक, यथार्थवादी नाटक या आर कोनो । हाँ, भाषा आ कथ्यक आधार पर ई यथार्थवादी नाटकक वैचारिक नाटकक श्रेणी मे राखल जा सकैत अछि । मुदा, कोरसक भाषा नाटकक संग नहि जाएत अछि । संगहि किछु आर मुद्दा सेहो कोरस के माध्यम स’ सामने राखल गेल अछि ओ कनि आरो मूल कथ्य के भ्रमित करैत छै जेना प्रेमी-प्रेमिका मे विवाहेत्तर संबंधक मुद्दा उठायब । ई मुद्दा कमजोर या अप्रासांगिक अछि से हम नहि कहि रहल छी मुदा एहि ठाम एकरा उठायब नाटकक मूल कथ्य के कमजोर करब अछि ।


रंगमंचीय दृष्टि सँ प्रियंवदा एकटा सामान्य कृति अछि । ने कोनो अतिमहत्वपूर्ण आ ने निराशाजनक । एहन कोनो खास नै छै जे किनो निर्देशक वा संस्था एक बेर पढ़िते एकरा मंचनक परिकल्पना क’ र’ लागथि आ इहो नहि कहल जा सकैत अछि जे कोनो निर्देशक एकरा मंचित क’ र’ चाहथि त’ प्रभावी नहि बना सकैत छथि कनि फेर बदल क’ क’ ।

बिपिन झा
युवा हेतु प्रेमक "समुचित मार्ग"।
(वेलेण्टाइन डे विशेष पर)

प्रेम दिवस एकदा मन्यते यत्र रक्तपातोऽल्पि कारयति,
वर्षस्य प्रतिदिवस घ्रृणादिवस सम कुर्वन्न शर्म लभते।
न कोऽपि कथयति तं किमपि, यः वितरति विषयुक्ता हाला,
किन्तु सर्वे निन्दन्ति यदा मधु वितरति मधुशाला॥


सामान्यतया ई देखल जाइत अछि जे प्रेम दिवस अर्थात वेलेण्टाइन डे दिन यदि कोई विशेष उत्साह रखैत अछि तऽ समाज नीक नहि बुझैत छैक। एतय प्रश्न उठैत अछि जे प्रेम केर इजहार करब उचित वा अनुचित? एहि सन्दर्भ में जहाँ तक हमर दृष्टि अछि - प्रेम जीवन केर महत्त्वपूर्ण शक्ति छियैक जे भावना पर आश्रित होइत छैक। आब एतय प्रश्न स्वाभाविक अछि जे प्रेमक अभिव्यक्ति केना हो? एतय सजतया अपन विचार के प्रस्तुत करवाक लेल हम गीता केर ’भक्ति’ आ ’कर्म’ केर अवधारणा क माध्यम बना रहल छी। यदि निष्पक्ष भाव सँ देखल जाय तऽ प्रेम क्यल नहि जाइत छैक सहजतया भय जाइत छैक (we 'fall in love' not 'get it'). एहि स्थिति में समस्त प्रेमी के भक्तिमार्ग आ कर्ममार्ग में बिभक्त कय सकैत छी। भक्ति मार्ग में जतय व्यक्ति एकता दास जकाँ समर्पित भाव सँ काज करैत छैक ओतहि कर्म मार्ग में व्यक्ति स्वामी जकाँ आचरण करैत छैक। भक्ति मार्ग केर अपनबै बला प्रेमी विविध भावनानुकूल आचरण करैत छथि ओतहि कर्ममार्ग केर श्रेयस्कर बुझयबला मैत्री आ आनन्द केर अनुगमन करैत छथि। ई शब्दावली यदि आंग्ल पर्याय रूप में देखी तऽ विशेष स्पष्ट होयत।
उक्त दुनू मार्ग एकांी दृष्टिगत होइछ। यदि दुनू केर समन्वय कय प्रेम केर गाडी आगू बढायल जाय तऽ ओ प्रेम निश्चित रूप सँ सफल होयत एहि में कतहु सन्देह नहि।

प्रेमक मह्त्त्व बुझैत सन्त वेलेण्टाइन अपन जीवन एहि कार्य हेतु युवा के प्रेरित करबा लेल अपन जीवन कें सर्वस्व न्यौछावर कय देलथि। राजा केर अवज्ञाक कारण हुनका मृत्युदण्ड भेटलन्हि।

एतय एकटा गप्प कहब अनिवार्य बुझैत छी जे वर्तमान समय में एहि पावन अवसर के अनुचित प्रयोग होइत अछि। अस्तु युवा वर्ग कें एहि दिस ध्यान देव अत्यावश्यक जे प्रेम दिवस कें नैतिकता क संग प्राणी मात्र हेतु मनायल जाय। आओर बुजुर्ग सँ आग्रह जे एहि पावन दिवस कें संकुचित दृष्टि सँ नहि देखि एकरा उत्साह क संग मनेवा हेतु युवा वर्ग कें प्रेरित करथि।
(लेख केर कोनोशब्द जनभावना के ठेस पहुँचवैत हो ओहि लेल सतत क्षमाप्रार्थी छी)

बिपिन झा, पी एच. डी स्कालर
आय. आय. टी. मुम्बई
http://sites.google.com/site/bipinsnjha/home

१. कुमार मनोज कश्यप-कथा- कचोट २.कथा-मुसिबत– सन्तोपष कुमार मिश्र ३. दुर्गानन्द मंडल- लाल भौजी
कुमार मनोज कश्यप जन्‌म : १९६९ ई़ मे मधुबनी जिलांतर्गत सलेमपुर गाम मे। स्कूली शिक्षा गाममे आ उच्च शिक्षा मधुबनी मे। बाल्य काले सँ लेखनमे आभरुचि। कैक गोट रचना आकाशवाणी सँ प्रसारित आ विभिन्न पत्र-पत्रिका मे प्रकाशित। सम्प्रति केंद्रिय सचिवालयमे अनुभाग अधिकारी पद पर पदस्थापित।

कचोट
'डिवोर्स इज ग्रांटेड। नाऊ यू बोथ आर लीगली सेपरेटेड ऑफ इच अदर' - कंहि कंऽ जज अदालतकं कंार्यवाही समाप्त कंऽ कंऽ उठि गेल छलाह। ओकंरा चेहरा पर पैघ सन मुस्कंान पसरि गेल छलै़माथकं बोझ हल्लुकं होईत सन बुझेलै। ओ विजयी भाव सँ तकंलकं मीरा दिस । मीराकं कंातर नजरि सेहो एकं पल लेल ओकंरा दिस उठलै ; पेᆬर जल्दी सँ अदालत सँ बहरा गेलि मीरा ।

ओ ठाढ़े रहि गेल अदालत मे । सोचैत़आई स्थिति कंोना एकंाएकं बदलि गेलैकंअप्रात्याशित। मीराकं वकंील बहस मे कंतेकं जोर दऽ कंऽ कंहैत छलै जे विवाह भारतीय समाजकं एकं टा पवित्र बंधन छई आ एहि बंधन के कंोनो उद्वेग मे तोड़ल नहि जा सकैछ । ओकंरा मोन पड़लै जखन मीराकं वकंील ओकंरा पर आरोप लगबैत कंहने छलैकं - 'योर ऑनर ! वास्तविकंता तऽ ई आछ जे श्रीमान विकंास हमर मुवक्किंल मीरा सँ तलाकं लऽ कंऽ दोसर विवाह अपन प्रोमिकंा सँग कंरय चाहैत छथि, जे पहिने परिवार आ समाजकं दवाबकं कंारणें नहि कंऽ सकंल छलाह । हमर मुवक्किंल कें पहिने रस्ता सँ हटेबा हेतु ओ तरह-तरह के प्राताड़ना दैत रहलाह़मारि-पीट, गारि-गंजऩक़ंी कंी नहि । ' किं तखने मीरा ठाढ़ भऽ कंऽ अपन वकंील के रोकैत जज दिस ईशारा कंरैत कंहने छलीह - ' हमरा क्षमा कंरब , ई सभ सत्य नहि आछ जज साहेब । हमर पति देवता-तुल्य छथि । हमरा ओ कंहियो अधलाह वचन तकं नहि कंहलनि ; हाथ उठेबाकं तऽ बाते नहिं । ओ किंयैकं हमरा सँ अलग होमय चहैत छथि से तऽ वैह जानथि । ' मीराकं एहि वत्तᆬव्य पर समूचा अदालत स्तब्ध रहि गेल छल। मीराकं भाय तामसे माहुर भऽ रहल छलाह। हुनकंर अँखि सँ व्रᆬोधकं ज्वाला पुᆬटय लागल छल़ठोर पटपटा रहल छल मुदा शब्द नहिं बहरायल।

पाशा तँ तखन पलटि गेलै जखन एकंर वकंील कंहने छलै--'मी लॉर्ड ! हमर मुवक्किंल के अदालत सँ तलाकं मँगबाकं मुख्य कंारण आछ श्रीमति मीराकं व्यभिचार जे हिंदु मैरिज एक्ट-१९५५ के धारा-१३ के अंतर्गत तलाकंकं एकंटा पैघ कंारकं भऽ सकैछ । हमरा लग कैकंटा एहन दृष्टांत आछ जे हमर एहि आरोप के पुष्टि कंरत़। ' एहि सँ पहिने किं वकंील अपन फाईल कें पढ़ि कंऽ किंछु आगु बजतथि, किं मीरा उठि कंऽ ठाढ़ भऽ जज सँ कंहने रहै--' जज साहेब ! हम अपन पति कें तलाकं देबा लेल तैयार छी । हमरा बताओल जाय जे कंोन कंागज पर कंतऽ दस्तखत कंरऽ पड़तै । ' समूचा अदालत मे पेᆬर सँ सन्नाटा पसरि गेलै। सभ स्तब्ध भेल अड़ोस-पड़ोस ताकंय लगलै ; कंाना-पुᆬसी शुरू भऽ गेलै। केयो एहन उम्मीदो नहि केने छल ।

तलाकं भेटलाकं क्षणिकं खुशी के तुरते बाद ओकंरा भान भेलै जे मीराकं चरित्र पर एहन पैघ लाँछन लगा कंऽ ओ नीकं नहि केलकं । एकंरा एकंोटा किंछु एहन घटना नहि बुझल छै जाहि सँ मीराकं चरित्र पर कंोनो टा संदेह होई । चरित्रे तऽ नारीकं सभ सँ पैघ गहना होईत छैकं । पेᆬर सोचलकं तलाकंकं हेतु आन कंोनो कंारणो तऽ नहि छलै ओकंरा लेल़वकंीले कंहने छलै जे एहि ग्राउँड पर सद्यः तलाकं भेट जयतै एकंरा ।

ई धरि सत्य जे ओ अपन ईच्छा के विरुद्ध परिवार-समाजकं दवाब मे मीरा सँ विवाह केने छल । मुदा ओ अपन प्रोमिकंा के नहि बिसरि पओलकंविवाहकं बाद तऽ ओकंर प्रोम बढ़िते गेलैकं। पत्नि आ प्रोमिकंाकं वास्तविकं भेद के जनितो ओ पत्नि मे प्रोमिकंाकं गुण ताकंऽ लागल । परिणाम भेलै जे पत्नि सँ विरत्तिᆬ बढ़ऽ लगलै । जखन प्रोमिकंाकं ईशाराकं हवा भेटलै तऽ पत्नि सँ विरत्तिᆬ अदालत तकं तलाकंकं मुकंदमा रूप मे पहुँचि गेलै़घर-परिवार, गाम-समाज सभ सँ विद्रोह कंऽ कंऽसभ सँ सम्बंध विछोह कंऽ कंऽ ।

अपना के धिक्कंारऽ लागल ओ़चरित्र तऽ एकंर स्वयं कंलुषित छैकं जे व्याहता पत्नि के छोड़ि़। ओकंरा सन पतित भरि संसार मे केयो नहिं हेतैकं । मीरा सन धवल चरित्र पर कंलंकंकं दाग तऽ कंम सँ कंम नहिं लगावऽ बुझैत छलैकं ओकंरा । मीरा़! मीरा तऽ वीराँगना आछ़ज़खन एकंर वकंील ओकंर चरित्र के कंलंकिंत कंहऽ लगलै तऽ ओ अपन चरित्र पर लाँछना सुनबा सँ पहिनहि ओ तलाकंकं कंागज पर दस्तखत कंऽ देब नीकं बुझलकं।

घर आबि कंऽ ओ पलंग पर धड़ाम सँ पड़ि रहल। सामनेकं देवाल पर एखनो एकंरा दुनूकं फोटो टाँगले छलैकं। ओकंर ध्यान ओहि फोटो पर टँगि गेलै़क़ंतेकं ध्यान राखैत छलैकं मीरा एकंर एकं-एकं जरूरति के ध्यान राखैत छलैकं। एकंरा तऽ मोनो ने छैकं जे द्विरागमनकं बाद सँ अपन जरूरति के कंोनो समान ई घर मे मँगने होईकं वा स्वयं उठा कंऽ लेने हुअय़ज़रूरति सँ पहिने मीरा सामान लऽ कंऽ हाजिर । लुड़ि-वितपनी, आवेश-वात सभ मे मीरा अव्वल । भरि गाम मे लोकं कंहै छै जे पुतोहू हुअय तऽ भोलबाबू सन। आस-पड़ोस, घर-परिवार, जन-हरवाह सभकं प्रिाय बनि गेल छलैकं मीरा। एकंो क्षण सासु-ससुर के नजरि नहिं पड़नि तऽ कंनियाँ-कंनियाँ के शोर। ननदि-देयोर भौजी-बौजीकं अनघोल केने। एकंरो तऽ कंोनो शिकंायत नहिये छलैकं मीरा सँ। मुदा किंश्मत बीचहिं मे अपन चालि चललै आ पूर्व-प्रोमिकंा सँ एकंर लगाव बढ़ऽ लगलै नहि चाहितो ओ प्रोमिकंा के प्रोम-जाल मे पँᆬसैत चलि गेल आ पेᆬर दुनू निश्चय केलकं मीरा सँ अलग भऽ विवाह कंरबाकं। एकंरा नीकं जकँा बुझल छलैकं जे मैथिलानी लेल पतिकं आतरित्तᆬ ओकंर कंतहु स्थान नहि आ सौतीन सेहो कंथमपि स्वीकंार्य नहि; तैं अंतिम रस्ता अदलते सँ तलाकं लेब बुझेलैै।


गाम-समाज मे जे सुनलकं से थू-थू कंरय लागल। बाप जे धड़ खसेलनि से खसेनहिं रहि गेलाह़माथकं पाग बेटा खसा देने छलनि। ओकंर विद्रोहकं आगाँ सभ विफल भऽ गेल़ओ घर छोड़ि कंऽ पड़ा गेल ऩहिं जानि कंतऽ।

आई ओकंरा प्राचंड झंझावातकं बाद पसरल विरानगि सन बुझा रहल छलै अपना भीतऱकिंछु टा नहिं नीकं लागि रहल छलै ओकंरा । अपराध-बोध सँ दबले जा रहल छल़किं पओलकं ओ़उनटे पुरखाकं मर्यादा मटियामेट भऽ गेलै़बाबू लोकंलाजें दलानो पर तकं नहि निकंलैत छथिऩमायकं आँखिकं नोर सँ आँचरकं खूट तीतले रहैत छै़हँसैत-खेलैत परिवार मे आई मरघटकं सन्नाटा सन पसरि गेल छै । एहि सभकं दोषी तऽ यैह आछ । ओ जतेकं सोचय; आत्म-ग्लानि सँ ततबे दबल जाय । प्रोमिकंाकं बेर-बेर फोन अबैत छलैकं। मोबाईल स्वीच-ऑफ कंऽ कंऽ ओ कंात मे पेᆬकं देलकं । उठल़दू-चारि टा कंपड़ा-लत्ता जल्दी-जल्दी ब्रीफकेश मे ठुसलकं आ घर मे ताला लगा बाहरा गेल ।

दलान पर बाबू आ कंक्कंा कंोनो गूढ़ विचार-मंथन मे लागल छलाह। ओ दुनूकं पायर छुलकंनि कंकंरो दिस सँ कंोनो प्रातिव्रिᆬया नहिं। ओ अप्रातिभ भऽ गेल। कंने कंाल ओहिना ज़डवत ठाढ़ रहल पेᆬर समान उठा कंऽ आँगन दिस विदा भेल । कंोनटा लग माय ठाढ़ छलैन, दबले स्वरे पुछलकंनि ' निके छी किंने?' ओ स्वीकृति-सूचकं मुड़ी डोलबैत अपना कंोठली मे चल गेल। मीराकं कंपड़ा-लत्ता, वस्तु-जात सभ किंछु ओहिना राखल जेना एखने नीकंलल होथि ओहि कंोठली सँ । माय चौखटि लग नुआँकं खूट सँ नोर पोछैत आबि कंऽ ठाढ़ भऽ गेलखिन। पेᆬर नहुयें-नहुयें कंहय लगलखिन-'बौआ आहाँ अपना पर ध्यान राखब़अहीं पर सदिखन चिंता लागल रहैत आछ । सुनै छियै कंनियाँकं भाय आहाँकं जान लेबा लेल उदवीर्त भऽ गेल आछ । गोनमाकं माय बजैत छलैकं जे ओ तऽ बंदूकं निकंालि कंऽ आहाँ के मारबाकं लेल निकंलि गेल छल। मुदा कंनियाँ ओकंर पैर गछेड़ कंऽ पड़ि रहलै जे भैया एहन पाप नहिं कंरू । एखन हम कंम सँ कंम सधवा तऽ कंहबैत छी़सींथ मे सिनूर पहिरैत छी़माँछ-माँसु खाईत छी। तलाकंकं कंागज पर दस्तखत मात्र कंऽ देने जन्म-जन्मांतरकं सम्बंध नहिं टुटि जायल कंरैत छै । हुनकंा कंरय दियनु ओ जे कंरैत छथि । अहुँ के जँ हम बोझ बुझाईत होई तऽ हमरा छोड़ि दिय़हम वुᆬटौन-चुरौन कंऽ कंऽ पेट पोसि लेब़संसार बड़कंा टा छै । '

सुनि कंऽ ओ ठामहिं ठाढ़ भऽ गेल- ' माय हम गंगापुर जा रहल छी मीरा सँ भेंट कंरय । ' माय अचम्भित भेल कंोनो आनष्टकं आशंकंा सँ ओकंरा रोकिंते रहि गेलखिऩओ मोटरसाईकिंल स्टार्ट कंऽ कंऽ आँखि सोंझा सँ दूर भऽ गेल। बाबू - कंक्कंा बौकं बनल दलान पर ठाढ़े रहि गेलाह।


मुसिबत– सन्तोहष कुमार मिश्र


दुरागणे दिनसँ जे कननी–रोइनी ओकरापर सबार भेलै से एखन धरि छुटल नहि छलै । तें हम साँझखनकऽ जखन कतौसँ आबि त सबहे दिन लोड–सेडिङ्गकें कारणे अन्हाधर ताहुमे ओ असगरे कनैत । कहियो मैनबत्ति बरैत त कहियो अपने बारऽ परैछल । हुनका कनैत देखिकऽ हम मैनबत्ति लऽकऽ हुनकर मुँहके चारु दिश घुमऽबैति कहऽलैगितीए –“आको माइ चाको, पहलाद माइ रोको, सँझा माइ तरणी, सबहे दुःख हरनी, हसनी–खेलनी आगु आ, डिठ–मुठि नजरि–गुजरि सब पाछु जो, .........” एते कहिते ओ छमसिया बच्चान जकाँ खिलखिला– खिलखिलाकऽ हंसऽ लैगतथिन । हम त कनहि बिलाइ, मारे तिरपित । हुनका हसिते हमर सुपसन करेज भऽजाइछल । आ, हम खुसीसँ दङ्ग परैत कैहितिए “सो डारलिङ्ग ह्वानट टु डू ?”
जेना बापक जिमदारी हुए तहिना ओ तखनसँ काज अढ़ाबऽकें शुरु करैछलखिन । हम त धोखासँ अंग्रेजीमे बजैछली आ, तकर बाद ओकर अग्रेजी शुरु होइछल । इहे त बात छै, कहूँ माथ पर बैसल त सोचिलिअ, दिशा करबाक चान्सी बेशी रहत ।
समय एहिना बड़ निकसँ शुद्ध पत्नीरवर्ता पुरुष जकाँ चलैत रहे । मुदा एकबेर अफिसके काजसँ काठमाण्डूल जाए पड़ल । समय त किछु बेशिए लागऽवाला रहै । करिब एक महिना । आ, सबहे दिन फोन पर बात करब से बचन सेहो देनेहे रहि । आबऽबेरमे ओ बेर–बेर कहैत रहथिन –“काठमाण्डूपमे ठन्ढा बेशी छै, अहाँके मिसेज डि–कोल्डे कें आवश्य क पड़त ।” हम बेर–बेर जबाब दिए–“अच्छाा, जरुरत बुझएतै त किनलेबै ।” हमर जबाब ओ सुनिते हैसिदे । मुदा ई बात जखन बसमे हमरा ठन्ढ़ाै लागल तखन महसुस भेल जे ओ डि–कोल्ड के आगुमे मिसेज किए लगै? ओ त अपना लेल कहे । तखन मतलब साफ नजरि आएल जे हुनको काठमाण्डू् आबऽके मोन छलनि ।
काठमाण्डूम पहुचलाके बाद एक दिन पहिने बात कएने रहि मुदा काल्हिेखन दिन भरि फोन लागले नहि रहे । जखन फोन लगबिए त आवाज अबै–“तपाइले .....” मतलब सम्पहर्क नहि होएत । मुदा, तकरे प्रातः कलंकीसँ फोन कनिञाके फोन आएल –“हम अग्नी. बसके काउन्टमर लग ठाढ़छी जलदीसँ लेबऽ आउ” ओ माइ गोड, अखन त साढ़े चारिए बजलैए । पुछलिए टेक्सीबके बारेमे त जबाब आएल जे आइ उपत्य,का बन्दइ छैक । कनिञा आएल काठमाण्डू , एकटा मुसिबत । उपत्यनका बन्दज, दोसर ।
हम होटलके स्टालफकें खुसामद कऽकऽ गाड़ी त मगलहूँ मुदा ओ कलंकीमे मात्र छोरत ओतऽसँ फिर्ता नहि आओत । कहाँदोन हड़तालमे टुटफूटके इन्योऽ ग रेन्सं कभर नहि करैछैक । हम कलंकी पहूचली । हुनका देखलियनि; ओते ठन्ढ़ाेमे पातर ओढ़ना, मुदा ओढ़ना जतबे पातर छलै लोलमे लिपस्टिंक ओतबे मोट ते सायल ओतबे मोट लाठीसँ हुनका पिटऽके सेहो मन भऽगेल । मुदा ..... ।
हम हुनक नजदिक जाकऽ बड़ प्रेमसँ मुस्कैभत कहलिए –“चलु डारलिङ्ग, ... अहाँके बेग कतऽ अछि ?” ओ क्लोुज–अप स्मामइल दैत अप्पहन ह्यांण्डा बेग दैत कहली –“हम त एतबे लऽकऽ आएलछी ।” ओ त काठमाण्डूज आबिकऽ बड़ खुस मुदा हमर मन त हुनक बेग देखिकऽ खौझागेल । तैयो हमसब आगु बढ़लहुँ । किए त पैदले जाएके आश छल । करिब एक किलोमिटर चललो नइ रही कि ओ कहऽ लगली –“चाह पियब ।” कनिके आगु जाकऽ देखलिए एकटा महिला टेबुलपर स्टो भ धऽकऽ चाह बेचैत छली । हम दुनूगोटे ओतै चाह पिलहुँ । आ ओतऽसँ बिदा भेलहुँ । ओतऽसँ बिदा भेला दुइयो मिनट नइ भेल रहे कि ओ अपन पेटपर हाथ हौस्तैहति कह लगली –“हे यौ ....यौ सुनुने, एहन रस्ताु दने चलु जतऽ लगमे ट्वाइलेट हुए ।” आब ई परेसानी संग पकड़लक । मतलब जे हम भोर खनकऽ हिनका बेड टि दै छलियनि तखन ई ट्वाइलेट जाइछलखिन । आदतसँ लाचार, कि करु । जखन–जखन जोरसँ लगैनि तखन–तखन मुहँ घोकचऽबित पेट पकरैत बजथिन–“आहऽऽऽ” आ जखन कने ठिक जकाँ जे हुएन त बजथिन– “दरऽऽऽ, बज्जऽरखसो एहि काठमाण्डूहमे, एकटा ट्वाइलेटो नहि ।” फेर कने आगु सेहे ताल । करिब एक किलोमिटर आगु जाकऽ कालीमाटीकें पुलक निचा एकटा सार्बजानिक सौचालय भेटल । मुदा ओतौ खाली नइ । मुदा हुनक छटपटाहट देखिकऽ एकटा ट्वाइलेटकें केबार हम ढकढकादेलिए आ कने दुर हटिकऽ ठाढ़ भऽगेलीए । तुरत्ते एकटा मोटचोट महिला ओहि ट्वालेटमेसँ निकलली आ एक थप्प र हुनका मारिकऽ फेर ओहिमे पसिगेली । हुनकर मुहँ त लाल रहबेकरै आब कि ? कनिके देर बाद एकटा दोसर ट्वाइलेटमेसँ एकटा पुरुष निकलल आ ओ ओहिमे गेली आ सायद ओतै ओे उपत्येका बन्दरसन पावनिकें सेलीब्रेट कएली ।
३.दुर्गानन्द मंडल-
कथा-
लाल भौजी दुर्गानन्द मण्डलजीक

पछिला अड़तालिस बर्खक सभ रेकार्ड घ्वस्त करैत एहि बेरक जाड़ पाँछा छोड़ि देलक। कहबी छैक जाड़ मासमे रुइये आकि दुइये मुदा रुइ ततैक महग जे बेसाहब कठिन। जँ दाम पुछबै तँ माधो मास सौंसे देह पसीनासँ तर-बत्तर भऽ जाएत। जहाँ धरि दूइएक सवाल अवैत अछि तँ ई सुख प्रायः सबहक कपारमे लिखले नहि अछि। जँ क्यो किशोरावस्थाक बालक-बालिका छथि तँ राति सपनाइते वितैत छन्हि, आ बुढ़हा-बुढ़िक तँ कथे नहि पुछू किऐक तँ आइ ने ओ बुढ़ भेलाहहेँ मुदा ऐहेन कतेको जाड़ कऽ ओ लोकनि देखने छथि आ खेपने छथि। तेँ फलक रुपमे केराक घोड़ जेकाँ हथ्थे-हत्थाक असथानपर गन्डाक-गन्डा धिया-पुता सोहरल छन्हि। बाल-बच्चाक समर्थ रहबाक कारणे ओकरा सभकेँ तँ अपने खाए-खेलाएसँ पलखति नहि। ताहू परसँ जँ कोनो पाहुन-परख चल आबैथि तँ घरक सवर्था अभावे। सभ घरकेँ बेटा-पुतोहू अलगे छेकने। तेँ बुढ़ा-बुढ़िक लेल तँ माध मासक जाड़ प्राणक हार बनल रहैत छनि।
कोनो तेहन अवसरे नहि भेटि पबैत छनि जे समए सँ ओइ कहबीसँ किछु लाभ उठाबथि। तेँ ओम्हर बुढ़ि कोनेा कोन मे धोकरी लगा पुआर मे धोसिआइल रहैत छथि। आ ऐम्हर बुढ़हा दलानक कोनो केानमे पोता पोतीक संग जाड़सँ सर्घष करैत रहैत छथि। कोनो तरहेँ दुनू परानी (बुढ़हा-बुढि) राति खेपक लेल मजबुर। मुदा से कते दिन धरि?
एक दिन मौका पाबि़ बुढ़ा बुढ़िकेँ हाक दैत छथिन- ‘‘सुनै छै हाथ-पाएर जाड़े ठिठुरि रहल अछि, कनी कोनो मालीमे लहसुन तेल पका कऽ लेने आबो तऽ। बुढ़ि आंगनेसँ उतारा दैत छथिन हँ हँ सुनै छियै एते जोरसँ किए हाक दै छै, कोनो की हम बहीर छी? लेने आबै छियै। ताबे माले घरमे आगि तापो। बुढ़हा पुनः बाजि उठैत छथि- ‘‘हे जल्दी सँ औते हम माले घरमे छी।’’
बुढ़ि करीब दस मिनटक बाद मालीमे लहसुन तेल पका दुरुखे सँ हाक दैत छथिन- ‘‘कतए छै हइया लौ।’’
बुढ़हा फेरि बाजि उठैत छथि- ‘‘एम्हरे लेने आबो ने हइया छियै।’’
बुढ़ि लग अबैत बाजि उठैत छथि- ‘‘ई किछो नइ बुझै छै? जे बेटी-पुतोहूबला अंगना-घर भेलै। सुतौ तेल लगा दैत छियै।’’
बुढ़हा पुआरक बिछौनपर ओंघरा जाइत छथि आ बुढ़ि तेलक मालीश करए लगैत छथिन। कने कालक बाद बुढ़ा तेल लगबैत गरमा जाइत छथि। प्रेमसँ बुढ़िकेँ पुछै छथिन- ‘‘भानस भातमे देरी छै की? बच्चा सभकेँ अंगना दऽ आबौ खा पी कऽ सुइत रहतै आ ई एत्ते आगि तापो।’’
बुढ़ि आंगन जा धिया-पुताकेँ पुतोहू सभकेँ दैत अपने बुढ़हा लग आबि जाइत छथि आ मालक घरमे पजरल घुरा लग बैसि आगि तापए लगैत छथि। दुनू परानीक गप्प-सप्प करैत बुढ़हा हाथ-पाएर सुग-बुगबए लगैत छथि। आ अपन दहिना हाथ बुढ़िक बामा.........
शेष अगिला अंकमे
१. विद्यानन्द झा-किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा २ श्या मसुन्दपर शशि- जनकपुरके खवरि



विद्यानन्द झा
किशोर लोकनिक लेल दूटा कथा
नैतिक योग

कोनो गाममे एकटा नापित छल ओ अपन कार्यमे तँ निपुण छलैहे, जाहिसँ गामक लोक ओकरापर प्रसन्न रहैत छल, ओकर दोसर गुण छलैक जे छोट–मोट घाव घोंसकेँ चीर–फाड़ि कऽ के जड़ी–बूटी दऽ ओकर इलाज कऽ दैत छल। लोक नीकेना भऽ जाइत छल। गामक लोक सभ प्रशंसा करैत छल। ओकर ई चिकित्सा सम्बन्धी कार्य खूब चलैत छलै। पाइयो नीके कमाइत छल, बड्ड दिन धरि ओकर कार्य चलैत रहल। किछु दिनक बाद ओहि गाममे एकटा डाक्टर साहेब अएलाह। ओ नीक सर्जन छलाह, बड्ड पैघ–पैघ डिग्री सेहो छलन्हि। ओहि गाममे ओ डाक्टर साहेब अपन क्लीनिक खोललन्हि। हुनका लग चीर–फाड़िक सभटा यंत्र छलन्हि, नीक–नीक औषधिक व्यवस्था सेहो कएलन्हि। पर्चा–पोस्टर छपाए आस–पासक गाममे सटबेलन्हि। ओकर बाद डाक्टर साहेब नियमित रूपसँ अपन क्लीनिकमे भरि दिन बैसथि। मुदा ई की ? रोगीक कोनो पता नहि, डाक्टर साहेब बैसि कऽ झख मारथि। डाक्टर साहेबकेँ किछु फुरैबे नहि करन्हि, की करी की नहि करी। डाक्टर साहेब कम्पाउण्डर सेहो रखने छलाह, तकरा घरेसँ वेतन दै छलाह। आमदनीक कोनो रस्ता नहि छलन्हि। क्लीनिकक खर्च सेहो अलगेसँ। बेचारा डाक्टर साहेब मन मसोसि बैसल रहथि। ओम्हर गामक लोक सभकेँ एहि पढ़ुआ डाक्टरसँ बेसी ओहि नापितक कएल चिकित्सापर विश्वास छलैक।

एक दिन डाक्टर साहेब ओहि गामक परम बृद्ध ओ नीतिज्ञ लोकक शरणागत भेलाह। डाक्टर साहेब हुनकासँ सविस्तार अपन हाल सुनाओलन्हि। ओहि नीतिज्ञ बृद्धक संग समस्त गामक लोक सभ हिनक समस्या सुनलन्हि। डाक्टर साहेब कहलखिन्ह जे हम एतेक दिन धरि पढ़ि–लिखि चिकित्साक उचित वैज्ञानिक शिक्षा पाबि तखन एहि कार्यक लेल क्लीनिक खोललहुँ अछि। जाहिसँ गामक लोकक इलाज नीक ढ़ंगसँ होएत। ओकर बाबजूदो समाजक लोग सभ हमर क्लीनिक नहि आबि ओहि नापित देहातीसँ इलाज करबैत छथि।

नीतिज्ञ, बृद्ध लोकनि डाक्टर साहेबक समस्या सुनि किछु उपदेश देलखिन्ह आ कहलखिन्ह जे अहाँ ई तरीका अपनाउ शीघ्रे समस्या मुक्त भऽ जाएब। डाक्टर साहेब हुनक आदेश शिरोधार्य कऽ वापस डेरापर अएलाह। अगिला दिन सुरूचिगर भोजनक ओरियाओन कऽ ओहि नापितकेँ अपना ओहिठाम भोजन करबा लेल आमंत्रित कएलन्हि। डाक्टर साहेब अपनेसँ जा कऽ ओहि नापितकेँ नोत देने छलखिन्ह। ओ नापित खुशीसँ ओत-प्रोत भए गेल, नचैत–नचैत भरि गामक लोककेँ ई संवाद कहि आएल जे डाक्टर साहेब हमरा गुरू मानि लेलन्हि अछि। भोजनक बेरमे ओ नापित डाक्टर साहेबक ओहिठाम पहुँचल। डाक्टर साहेब ठाढ़ भए आह्लाद पूर्वक ओहि नापितकेँ बैसाओल। भरि पोख भोजन करौलन्हि, आदर देलन्हि आ कहलखिन्ह जे अपनेक चिकित्सा विद्यासँ हम प्रसन्न छी। हम डाक्टरी पढ़ियोकऽ जतेक नहि सिखलहुँ ताहिसँ बेसी अहाँ अपन अनुभवसँ कल्याण करैत छी। जँ एतेक करिते छी तँ कनेक आओर ध्यान देबैक तँ पैघसँ पैघ आपरेशन अपने कऽ सकैत छी, मात्र थोड़बे ध्यान राखए पड़त। ओ नापित परम प्रसन्न भेल डाक्टर साहेबक मुँहे अपन प्रशंसा सुनिकऽ डाक्टर साहेबसँ पुछलक जे कोन–कोन बातक ध्यान राखए पड़त। डाक्टर साहेब ओकरा अपना दिश उन्मुख होइत देखि भीतरे–भीतर प्रसन्न होइत बजलाह-–जेना पएर परक घाव भेलापर किछु नश–नाड़ीकेँ चीन्हि ओकरा कटबासँ बचा कऽ अहाँ पैर परहक घावकेँ चीर–फाड़ि कए चिकित्सा कए सकैत छी। ओ पुछलक जे डाक्टर साहेब पएर परहक नश कटलासँ की होएतैक? डाक्टर साहेब बतौलखिन्ह जे ओ नश कटलासँ तीव्र रक्तस्राव होएत जे साधारण ढंगे नियंत्रणमे नहि आओत, तखन रोगीक रक्त शुन्यताक स्थितिमे प्राणांत भए सकैछ। तहिना धौना परहक नशकेँ देखबैत बतौलन्हि जे एहि ठामक घावक आपरेशन करए काल नश सभपर बेसी ध्यान राखऽ पड़त, से नहि कएलासँ नश कटबाक भए बनल रहत। एहिसँ रोगीकेँ लकबा मारबाक सम्भावना बढ़ि जाएत। जँ नश सभकेँ चिन्हि–चिन्हि आपरेशन करब तँ सफल रहत।

ई सभ सुनि नापित घर दिश बिदा भेल, आब ओ अगिला दिनसँ नशक ज्ञान प्राप्त करबामे लागल। ओकर नैसर्गिक बुद्धि हेड़ाए गेल। जखन ओ चीर–फाड़ दिश सोचलैक की नश कटबाक भए सतबए लगैक। ई नश कटत तँ ई रोग होएत, आ ओ नश कटत तँ ओ रोग होएत। परञ्च ओकरा लेल एहि समस्यासँ पार पाएब सम्भव नहि भेलैक आ अंततः ओ चिकित्सा कार्यसँ विरक्त भए गेल। आ ओम्हर डाक्टर साहेबक क्लीनिक ताबड़तोड़ चलए लगलन्हि।



दीप तर अन्हार

दूटा मित्र छल। दुनहुँक मध्य बड्ड प्रेम छल। जतए जाए संगहि, भोजन संगहि, खेलाइत संगहि, मुदा घरक कोनो काज ओ दुनू नहि करैत छल। सतत् काल दुनू योजना बनबैत छल। शेख–चिल्ली जकाँ गप्प बघारब मुदा कोनो जोगरक नहि। घर–परिवारक लोक सभ आजिज भए दुनूकेँ गामसँ भगा देलन्हि। दुनू मित्र वापस अपन गाम जाए किछु काज कए पाइ जमा कएलक आ आपसमे दुनू विचार कएलक जे गामसँ बहुत दूर शहरमे जाए कोनो काज करब ताहिसँ खूब पाइ कमाएब आ तखन गाम वापस आएब। दुनू मित्र पाइसँ गामहिमे किछु बट खर्चाक ओरियाओन कएलक। ओ ओढ़ना, बिछौनाक मोटरी बनाए दुनू मित्र बिदा भेल। शहरसँ जखन बहुत दूर छल तँ संध्या भए गेलैक। कतहु कोनो गाम नजरि नहि अबैत छल। चलैत रहल–चलैत रहल अन्हार गुज्ज साँझ भए गेलैक। चोर सभ सतबए लगलैक आब की करत? कतए जाएत? दुनू मित्रकेँ किछु फुरएबे नहि करैक। इतस्ततः करैत–करैत जंगलक बीच जा रहल छल। तखन एकटा बरगदक गाछ नजरि अएलैक। ओ दुनू मित्र थाकि गेल छल। ओहि गाछ तर राति बितएबाक बिचार कएलक। ओहि बरगदक गाछ तर मोटरी राखि धम्मसँ बैसि रहल। एक तँ बाटक थकान दोसर अन्हार गुज्ज राति। दुनू बिछौना बिछा कऽ पड़ि रहल। दुनू मित्र आपसमे निर्णय कएलक जे बेरा बेरी सुति कऽ राति बिताएब, एहिसँ चोर उचक्का सामान आ पाइ नहि चोराबै सकत। परंतु से सम्भव नहि भेलैक। दुनू ततेक बेसी थाकल छल जे कखन दुनूक आँखि लागि गेलैक से दुनू नहि बुझलक। खूब सूतल, भोरहरबामे जखन एकटाकेँ निन्न टुटलैक तँ ओ मोटरी नहि देखि चिचिआबै लागल, दोसरो उठल ओहो चिचियाबै लागल। दुनू एक दोसराकेँ चोरि करबाक आरोप लगबए लागल, बहुत काल धरि दुनू झगड़िते रहल। ओहिठाम तँ तेसर क्यो रहैक नहि जे ओकर दुनू लोकनिक झगड़ा छोड़बितैक। अपनहि थोड़ेक कालक बाद शांत भए निर्णय कएलक जे नजदीकक कोनो गाम जाए ओहि गामक पंचसँ निसाफ कराएब जे दोषी के ?

दुनू मित्र बिदा भेल। थोड़े दूर चलैत–चलैत जखन जंगलसँ बाहर भेल तँ एकटा खेतमे हर जोतैत एकटा हरबाह नजरि अएलैक। दुनू मित्र ओहि हरबाह लग पहुँचल, एकटा मित्र बाजल जे भाए हो–रातिमे हमर दुनू मित्रक सामान आ पाइ कौड़ी चोरि भऽ गेल, तेसर तँ क्यो छलै नहि तखन तोहीं कहऽ जे–(दोसर मित्र दिश आंगुर देखबैत)–एकरा छोड़ि दोसर के लेने होएत ? दोसर मित्र फेर बमकल। ओ पहिलकेँ गारि श्रापक तर कऽ देलक। ओ हरबाहा बेचारा स्वयं अपनाकेँ निसाफ देबामे असमर्थ पाबि कहलक जे एहि बातक गाममे एकटा नीक पंच छैक हरि चरण। तोँ सभ ओकरे ओहिठाम जा कऽ सभ वृतांत बता दहक, ओ निजगुत फैसला कऽ देतौक। दुनू मित्र आगाँ बढ़ल। अपरिचित गाम छलैक, बेर–बेर चौक चौराहापर पंचक घरक मादे पुछऽ पड़ैक। तखने एकटा जोन–बोनिहार भेटलैक। एक मित्र ओकरासँ पूछि बैसल जे हौ हरिचरण पंचक घरक पता बता देबह। ओ पुछलक जे अहाँकेँ ओहि पंचसँ कोन काज अछि। तखन दुनू मित्र बताबऽ लागल जे हमरा सभक बीच विवाद भेल अछि हुनकासँ निसाफ कराए। ओ बोनिहार बाजल- ओ की फैसला करताह ओ तँ बड बेइमान छथि। दुनू मित्र अचम्भित होइत आगाँ बढ़ल। किछु दूर आगाँ गेलाक बाद एकटा समर्थगरि कुमारि कन्या नजरि अओलैक। तखन दुनू हुनकासँ पंचक घरक रास्ता देखा देबऽ लेल कहलकैक। ओहो कन्या हिनकासँ प्रयोजन पुछलकन्हि। दुनू मित्र रातुका सभटा खिस्सा कहलकैक। ओ कन्या बाजलि जे ओ की निसाफ करताह ओ तँ आन्हर छथि। दुनू मित्र घोर निराशामे पड़ि गेल। किछु नहि फुरए जे आब कतऽ जाए। लेकिन दुनू मित्रकेँ हरबाहाक कहल गप्पपर बिश्वास छलैक ओ आगाँ बढ़। राहमे एकटा अधेड़ महिला पुछलकै। ओ सभ स्त्रीगण बाजलि जे जँ अहाँ सभ कोनो निसाफ लए जाइत छी तँ बेकार होएत। ओ दिन खाइ छथि तँ राति लेल झखै छथ। आब तँ दुनू मित्र भयंकर असमंजसमे पड़लाह जे आब हरिचरण पंचक ओहि ठाम जाइ आकि नहि। ई सोचिते बढ़ि रहल छलाह की पंचक घर आबि गेल। हरिचरण दलानेपर सुतरी कढ़ैत छलाह। दुनू मित्र हुनकर दलानपर जाए प्रणाम कएलन्हि। सरपंच हुनक लोकनिक समस्या सुनि युक्तिपूर्वक न्याय कऽ देलखिन्ह। दुनू मित्र प्रसन्न भेलाह। परञ्च मनमे ओ सभटा बात उमड़लन्हि जे पंच तँ बड़ निसाफी छथि तखन ओ लोकनि हिनकर मादे एना किएक कहलन्हि। नहि रहल गेलन्हि। एकटा मित्र पंचसँ रास्ताक सभटा वृतांत कहलखिन्ह। हरिचरण गम्भीर भए कहलखिन्ह जे हम एखन गरीबीमे छी। ओहि बोनिहारक किछु बोनि हमरा लग बाँकी छैक जावत दऽ नहि दैत छिऐक तावत् ओकरा लेल बेइमान थिकहुँ। ओ कुमारी कन्या हमर बेटी थिकीह। तों सभ देखने होएबह जे हमर बेटी वियाह करबाक जोगरि भऽ गेल अछि। हम ओकर विवाह नहि करा सकलिऐक अछि तैँ ओकरा हेतु हम आन्हर छी। अंतमे जे महिला भेटल छलीह ओ हमर दोसर पत्नी थिकीह। हम एक दिन बिता कऽ हुनका लग जाइ छी तैँ ओ कहलन्हि जे एक साँझ खाइ छथि दोसर साँझ उपासल रहैत छथि। तैँ ओ सभ अनर्गल तँ नहिए कहलन्हि।


श्या मसुन्दहर शशि- जनकपुरके खवरि
रेल सेवा बन्दा । नेपाल सरकार कानमे तेल तूर धऽ सूतल
श्यासमसुन्ददर शशि ,
जनकपुरधाम । गत एक सप्ता हसँ जनकपुर रेल सेवा बन्दू अछि । भारत एवं पूर्वी धनुषाके आवागमनके वास्तेध प्रयोगमे आवएवला एकमात्र रेल सेवा बन्द् भेलासँ दुनू देशक नागरिकके सास्तीु भोगए परि रहल छनि ।
मुदा रेल व्यतवस्थाएपन,स्थाबनीय प्रशासन,सरकार आ राजनितीकदलसभ कानमे तेल तूर धऽ निषवद्ध पडल अछि । ककरो कोनो चिन्ताय नहि । हँ सोमदिन नेपालक राष्ट्रिपय मानव अधिकार आयोग मध्यभमांचल क्षेत्रीय कार्यालय जनकपुर एहि विषयपर चिन्ताह व्याक्तष कएलक अछि ।
आयोगके प्रमुख प्रदीपकुमार झा प्रेस विज्ञप्ति् प्रकाशित कऽ रेल सेवा अविलम्बा सुचारु कएल जएवाक वातावरण सृजना करवालेल स्थाझनीय प्रशासन तथा सम्ब न्धिऽत पक्षसँ सकृय पहलके अपेक्षा कएलक अछि ।

नेपालके एकमात्र रेल्वेस सेवा बन्दर भेलाक बाद धनुषाक पूर्वी भागसँ दैनिक जनकपुर आवागमन करएवला हजारौ सर्वसाधारणके कठिनाई भेलैक अछि आ एहि बन्दीथसँ बन्दन—व्यादवसाय सेहो प्रभावित भेल अछि । अतः बन्दलक सम्पूार्ण कार्यक्रम फिर्ता लए अपन जायज मांगके वार्ताक माध्यपमसँ समाधान करबाकलेल आयोग सम्बिन्धि।त पक्षसंग आग्रह करैत अछि । झा विज्ञप्ति मार्फत आह्वान कएने छथि ।
गत सातदिनसँ रेल्‍ा सेवा अवरुद्ध भेलाक बाबजुदो स्था नीय प्रशासन चुप्प अछि । रेल्वेे व्य वस्थागपनके कोनो फिकीर नहि छैक । सरकार एतेक वेपर्वाह अछि जे तीन सप्ताुह पूर्व नियुक्तश कएल भेल महाप्रवन्धरक भोला पंजियारके एखन धरि हाजिर होवए नहि पठौने अछि ।
एम्हयर रेल सेवा बन्द कऽ आन्दो लनमे उतरल कर्मचारीसभक वास्तेल सेहो साँप छुछुन्नोरिके ताल भऽ गेल छनि । ओसभ अपने मोने रेल खोलैत लजा रहलाह अछि आ कोनो निकाय खोलवालेल आग्रह नहि कऽ रहल छनि । हुनकासभक आरोप अछि जे कोनो निकाय हमरासभक मांग प्रति सकारात्मरक नहि अछि । दोसर दिस सेवाग्राहीसभ सरकार आ कर्मचारीक प्रवृति विरुद्ध आन्दोरलनमे जएवाक धमकी देलक अछि । हुनकासभक कहब छनि जे यात रेल नीक जकाँ चलाओल जाय वा बन्दर क देल जाय ।
मधेसी जनअधिकार फोरम आ नेपाली काग्रेस निकट श्रमिकसभक एक समूहले चारि सूत्रीय मांग राखि रेल्वेे प्रशासन,लेखा आ प्रवन्धाकके कार्यालयमे तालाबन्दी कएने छल । जकर विरोधमे माओवादी निकट अखिल नेपाल यातायात मजदुर संघ रेल सेवा बन्दक करौने छल ।
संलग्नय तस्वी र



शहीद धोषणामे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’
श्या मसुन्द‍र शशि
गणतन्त्रा न्त्रिघक आन्दोंलनके प्रथम शहीद दुर्गानन्दए झाके एखनधरि औपचारिक रुपमे शहीद घोषणा नहि कएल जएवापर मधेसी नागरिक समाजक अगुवासभ कडा प्रतिवाद कएलनि अछि । हुनकासभक आरोप छनि जे देशमे शहीद घोषणा करबाक विषयमे सेहो ‘मूह देखि मुंगवा’ बाटल जा रहल अछि ।
लोकतन्त्रदके गरदनि दवा क्रुड पंचायती व्येवस्थाक सूत्रपात करएवला राजा महेन्द्र उपर २०१८सालमे वम प्रहार कएनिहार शहीद दुर्गानन्दर झाके ४७सम् वलिदानी दिवसके अवसरपर वृहस्तलपतिदिन जनकपुरके जानकी मन्दिार प्रांगणमे आयोजित प्रवचन गोष्ठीाक वक्ता७सभ ई आरोप लगोने छलाह ।
‘देशमे शहीद घोषणा करेवाक दौर चलल अछि । चोर,डकैतसभ सेहो शहीद घोषित भेल मुदा अदालतके निर्णयसँ फाँसीक सजाय पावएवला दुर्गानन्दच झाके एखनोधरि शहीद घोषणा किए ने कएल गेल ।’ स्विर्गीय झाके सहकर्मी एवं वम काण्डाके दोसर जिवित शहीद अरवीन्दध ठाकुरके प्रश्नण छलनि ।
जनकपुर वौद्धिक समाजके अध्यवक्ष राजेश्विर नेपालीके मांग छलनि जे स्वरर्गीय झाके राष्ट्रि य विभूति आ गणतान्त्रि्क आन्दोएलनके प्रथम शहीद घोषणा कएल जएवाक चाही ।
लोकतन्त्रिके हत्याए कऽ पंचायती व्य वस्थाव सूत्रपात कएनिहार राजा महेन्द्रा विरुद्ध लोकतन्त्रिवादीसभमे आक्रोश छल । लोकतन्त्र स्था‍पनार्थ नेपाली काग्रेस सशस्त्रा जनयुद्धके घोषणा कएने छल । एहि बीच राजा महेन्द्रिके जनकपुर भ्रमण तय भेल छल । नेपाली काग्रेस राजाउपर वम प्रहार करवाक निर्णय कएलक । एहि वास्तेष सीमावर्ती भारतीय नगर उमगाउॅमे अध्यगयनरत्त १९वर्षिय दुर्गानन्द झा आ अरवीन्द ठाकुरके जिम्मा देल गेल । काग्रेस पार्टीक निर्णय अनुसार २०१८साल माघ ९गते राजा महेन्द्र उपर जानकी मन्दिठर प्रांगणमे वम प्रहार कएल गेल छल । अरवीन्दण ठाकुर वम सहित पकडल गेलाह मुदा दुर्गानन्दज झा राजा महेन्द्र उपर मन्दिदर प्रांगणमे वम प्रहार कएलनि । राजा अपने बाचि गेलाह मुदा मोटर क्षतिग्रस्तज भेल छल ।
लगभग १८महिनाक चरम यातना पश्यालत तत्काषलीन मुलुकी ऐनमे परिवर्तन कऽ दुर्गानन्दन झाके राजकाज अपराध सजाय ऐनके दफा ४अन्त र्गत फाँसीक सजाय देल गेल आ ठाकुरके उर्म कैदक सजाय । झाके २०२०साल माघ १५गते केन्द्रि य कारागारमे फाँसीपर लटका हत्या् कएने छल । चुकी तत्कादलीन कानूनमे गाई आ ब्राहृमनके हकमे मृत्युन दण्डि वर्जित छल तें ऐनमे संशोधन कऽ दुर्गानन्दच झाके फाँसी देल गेल छल ।

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'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...