Sunday, February 07, 2010

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मँगनीक चन्दनन घस रघुन्दकन मँगनीमे चानन उपलब्धर अछि, तेँ एकरा घसू हे रघुनन्दपन।
मँगनीक चाउर तऽ नानी के सराध चाउर मँगनी भेटि गेल अछि तेँ नानीक श्राद्ध भ’ रहल छनि।
मँगनीक पाइ तऽ टेक सेर तउलाइ बिनु मूल्य क कोनो वस्तु उपलब्धे भ’ जाय तँ ओकरा टकेसेर किनबामे कोनो आपत्ति नहि ।
मँगनीक साँय लेल नीन कामहि स्वाीमी हमर मँगनीक छथि, कारण मात्र काम जनित हैबाक हेतु नीन लगैत छनि।
मँगनी के चाउर दालि, मँगनी के सिनुरा, तेँ जूजि भेल मुंगरा चाउर दालि एवं सिन्दू र मँगनीमे भेटि जाइत छनि, तेँ स्वादस्य्टि मे दिनप्रति दिन विकास भ’ रहल छनि।
मँगनी के बड़द के दाँत ने देखैछ मँगनीमे जँ बड़द उपलब्धन भ’ जाय तँ ओकर दाँत देखबाक कोन प्रयोजन? मँगनीमे वस्तुामे मीन-मेष नहि बाहर करबाक चाही।
मँगनी के बाँस लमपोर मँगनीमे बाँस प्राप्तप भेल अछि तेँ ओकर पोर पैघ-पैघ अछि।
मँगनी के बैल इजोरिया राति बैल जँ मुफ्त भेटि जाय आ राति इजोरिया हो, तँ ओकरा रातियोमे जोतल जाइछ।
मँगनी के सतुआ, सासु के पिण्डाप सतुआ मँगनीमे भेटि गेल अछि तँ सासुकेँ पिण्डम द’ रहल छियनि।
मँगनी के सराब, काजी के हलाल शराब मँगनीमे भेटल, तँ काजीक हलाल भ’ रहल अछि।
मँगनी चँगनीपर एतेक गुमान माँगी-चाँगि क’ वस्तुह आनलहुँ ताहिपर एतेक घमंड करैत छी।
मँगनीपर चँगनी, तइपर दँतखिसटी स्वनयं माँगि क’ आनल ताहिपर आन व्यनक्तिक ओकरा माँगि रहल अछि, प्रयुक्त‍।
मँगनी पाबी तऽ नौ मन तउलाबी बिनु मूल्य क कोनो वस्तु भेटि जाय तँ एक मनक कोन कथा नौ मन तौआओल जा सकैछ।
मँगनीमे चखना, बिलाइ माँगे आधा ताड़ीक चखना तँ हम माँगि क’ आनल अछि ताहिमे बिलाइ आधा हिस्साा माँगि रहल अछि।
मइया धीया गौर पूजे, अपन अपन सोहाग माँगे माय बेटी मिल क’ गौरी पूजन करैछ तथा अपन-अपन सोहागक कामना करैछ।
मइया धीया पूजे, अपन अपन भूले माय बेटी दुनू पूजा-पाठ कयलनि, किन्तुम दुनुकेँ पृथक् पृथक् फल भेटलनि।
मइया मरे धीया लाऽ, धीया मरे जार लऽ माय अपन बेटीक हेतु प्राणान्तध क’ रहल अछि, किन्तुा बेटी तँ अपन प्रेमीक हेतु मरि रहल अछि।
मइल कपड़ा पातर देह, कुत्ता काटे सन्देकह मैल-कुचैल कपड़ा तथा दुब्बुर-पातर व्य क्तिकेँ देखि कुकूर काटबाक हेतु दौड़ैछ।
मउगी आ ककड़ीक बेल जल्दीु बढ़ैछ स्त्री एवं ककड़ीक लत्तीक विकास शीघ्रतासँ होइछ।
मउगी आ घोड़ा रान तरक स्त्री एवं घोड़ापर तखने नियंत्रण राखल जा सकैछ जखन ओकरापर सवारी नीक जकाँ होइछ।
मउगीक की एतबार स्त्रीक कतहु रविक व्रत करय ? स्त्रीत विश्वातस योग्यी नहि होइछ।
मउगीक सलाहपर जे चलैछ चुतिया स्त्रीसगणक सलाहपर चलनिहारक कोनो इज्जरति नहि रहैछ।
मउगी के नाक नहि हो तऽ गूँह खाय स्त्रीेगणकेँ जँ नाक नहि रहय तँ ओ पौखाना पर्यन्तर खा लेत।
मउगी ने मरद बलिगोबिना कोनो व्यमक्तिकेँ लक्ष्यि क’ कहल जाइछ जे ई ने पुरुष छथि ने तँ स्त्रीय, प्रत्यु त बालगोविन्द थिकाह अर्थात् नपुंसक।
मउगीपर जऽ हाथ फिरय तऽ ओ फइल जाइछ वय-संधिक स्थितिमे जँ नायिकाक उपयोग होइछ तँ ओ युवावस्था्केँ शीघ्रहि प्राप्त करैछ।
मउगीपर हाथ उठायब नीक नहि स्त्री केँ मारब-पीटब उचित नहि।
मउगी मुनसा बाँझ, गोंइठा पैला तीन साँझ पुरुष-स्त्रीँ जँ बाँझ अछि तँ एकटा गोइठा तथा एक पैली चाउर तीन साँझ चलैछ।
मकून सुतले रहि गेल चीना चरि गेल मकून (व्यगक्ति-विशेष) सुतले रहि गेलाह तथा मालजाल सब चीना चरि गेल।
मक्कम मे रहैत छी, हज ने करैत छी रहैत छथि‍ मक्काेमे, मुदा हज नहि करैत छथि।
मखमलमे मूजक बखिया मखमल सदृश कपड़ामे मूजक डोरीसँ बखिया करैत अछि।
मखानक पात सऽ मुह पोछब मखानक पातमे काँट होइछ।
मग्घा लगाबे घग्घाी सेबाती लगाबे टाटी, कहथि हथिया रानी हमहुँ अबइत छी बाटी मग्घाह नक्षत्रहिसँ वर्षाक आधिक्य रहैछ।
मजा मारय गाजी मियाँ, मारि खाय दफाली मियाँ आनन्द लेलनि गाँजी मियाँ, किन्तुर मारि खयलनि दफाली मियाँ।
मठ्ठा घोटाय ने पिट्ठा धकेल मठ्ठा पर्यन्ते नहि पीयल जाइत छनि, मुदा कहैत छथि जे पीठा खायब।
मड़ुआक खेत कतहु केसर लागल मड़ुआक खेतमे केसरक खेती नहि भ’ सकैछ।
मड़ुआक रोटी टेंगराक झोर, कइली बूढि़या कनठी तोर मड़ुआक रोटी तथा टेंगरा माछक झोरक हेतु कैली बुढि़या अपन कंठी तोडि़ लेलक।
मड़ुआक रोटीपर दुधही खीर मड़ुआक रोटीक संग दूधक खीर कोनो शोभा नहि दैछ।
मड़ुआक रोटी, बलानक पोठी मड़ुआक रोटी आ बलानक पोठी माछ प्रसिद्ध अछि।
मड़ुआ रोटी गब्बकर गब्बरर, साउस सऽ पुतोहु जब्बटर मड़ुआक रोटी खैबामे गब्बीर-गब्ब,र लगैछ।
मड़ूआ मीन चीन संग दही, कोदोक भात दूध संग सही मड़ुआक रोटी माछ संग, चीनाक माढ़ा संग दही तथा कोदोक भात संग दूध खैलासँ नीक लगैछ।
मध्यलम काठी चंचल खढ़, खोरने खारने गोइठा जड़ काठ शनै:-शनै:, खढ़ अकस्माेत तथा गोइठा खोर-चार कयलापर जरैत अछि।
मन अचताइअऽ मन पछताइयऽ, एहन सुन्नतर बहु नहिरा जाइयऽ ककरो स्त्रीम नैहर जा रहल छलैक।
मनक मनसुब्बा‍ मनेमे रहि गेल, बाओ करबा खेसारी सन भऽ गेल मनक बात मनहिमे रहि गेल, किन्तु़ ओकरा क्रिया रूप नहि द’ पलौहुँ।
मन करब मोटा तऽ खायब सोंटा, मन करब मेही घरमे रहब अहीं क्योम ककरो उपदेश दैछ जे मन मोट करब तँ घरमे दुरजरू हैब मारि खायब।
मन चंचल करम दल्लिदर मन तँ चंचल छनि, मुदा भाग्यटमे दरिद्रा छनि।
मन चंगा तऽ कठउतीमे गंगा मन जँ पवित्र अछि तँ सब ठाम गंगा छथि अर्थात् मनक पवित्रता सभक मूल अछि।
मन छल जे पुआ पकबितहुँ, चिक्कंस अनितहुँ पैंचा माइ गे गुड़ ने ककरो पूआ खैबाक इच्छा बलवती भेलैक, ओ चिक्कआस पैंच अनबाक बात सोचलक, किन्तुक स्म रण भेलैक जे गुड़ तँ नहि अछि।
मन छल मन छल खायब दही चूड़ा सानि, आस भेल निरास सतुआ ढारलहुँ पानि मन छल जे चूड़ा दही सा‍नि क’ खैतहुँ मुदा ई आशा फलवती नहि भ’ सकल।
मन बड़ा तऽ करमे छोट मन तँ बड़ पैघ अछि, किन्तुर भाग्येँ बड़ छोट, तखन मनोरथ कोना सिद्ध हैत? साधनहीन व्यैक्तिक पैघ-पैघ अभिलाषापर व्यंहग्यख।
मन बैरागी चित्त गिरहस्थत मन वैरागी सदृश अछि, किन्तुै चित्त गृहस्थागश्रमक आनन्द क हेतु इच्छुुक अछि।
मन भला तऽ गाबी गीत मन जँ नीक रहैछ तँ गीत सेहो नीक लगैछ।
मनमाना घरजाना स्वेनच्छागसँ घर गेनिहार व्यछक्तिक आचरणमे आनक बातक कोनो प्रभाव‍ नहि पड़ैछ।
मन माने तऽ चेला ने तऽ सबसे भला अकेला मन जँ स्वी कार करय तँ शिष्यि बनयबाक चाही, अन्यरथा एसगर रहब सर्वोत्तम अछि।
मनमे आन बगलमे छूरी मनमे किछु आर बात छनि, मीठ-मीठ बात करैत छथि, मुदा आघात करबाक हेतु छूरी सतत हाथेमे रखने रहैत छथि।
मनमे छल खीर खाँउ, बिआह भेल निघटले ठाँउ मनमे छल जे खीर भोजन करैत रहितहुँ, किन्तुल एहन घटल घरमे विवाह भेल जे मनोरथक पूर्त्ति नहि भ’ सकल।
मन मोदक सऽ कतहु भूख भेटाय मनेमन कल्प ना कयलासँ भूख नहि समाप्तम भ’ सकैछ।
मनमौजी जोगी के गजरा के संख, मनमे आयल तऽ बजयलक ने तऽ खयलक अपना मनपर निर्भर रहनिहार योगी गजराकेँ शंख मानि क’ रखैत अछि।
मन रे मन रहि रहि उकासी मनमे कोनो कार्य करबाक इच्छाग शक्ति छनि, किन्तुइ उकासीक कारणेँ नहि क’ पबैछ।
मनसा उपजाबे धान, तकर मउगी लछनमान धान उपार्जित तँ पुरुष करैछ, किन्तुह ओकर बलपर विविध प्रकारक व्यकवहार क’ स्त्री सुलक्षणा बनैछ।
मनसा करे भनसा, बहु करे सिंगा भान-सभात पुरुष करैछ तथा पत्नी सतत श्रृंगार-पटारमे लागल रहैछ, तँ व्यंशग्य्।
मनसा के छाँछ ने, बिलाइ के मटकूरी मनुष्येकेँ खयबाक हेतु छाँछ पर्यन्तू नहि भेटैछ, मुदा बिलाइकेँ संपूर्ण मटकूरी दहीक देल जाइछ।
मन हरखित तऽ गाबी गीत, घर खरची तऽ सुती निचीत मन जँ प्रसन्न रहैछ तँ अनायासे कंठसँ गीत फूटि पड़ैछ।
मन हुये गाबी गीत, बाँहीक सुखे उठाबी भीत प्रसन्न चित्त रहलापर गीत गयबाक इच्छा होइछ तथा हाथसँ मजगूत रहलापर भीत उठाओल जा सकैछ।
मन हुलसे तऽ गाबी गीत, भादो मास उठाबी भीत प्रफुल्लित रहलापर अनायासे गीतक स्वसर फूटि पड़ैछ, किन्तु भादो मासमे भीत उठायब कठिन अछि, ओहि समयमे भीत उठायब अत्य न्त, श्रमसाध्यी अछि, कारण वर्षा भेलापर ओ गलि जाइछ।
मनुख के आगाँ सऽ, आ पसु के पाछाँ सऽ, हाँकक चाही मनुष्येकेँ आगाँसँआ पशुकेँ पाछाँसँ हाँकबाक चाही।
मरक बेरि चुट्टी पाँखि जनमल मरबाकाल चुट्टीकेँ पाँखि जनमि जाइछ।
मरक मन ने तऽ उठि उठि कऽ बइसी मरबाक इच्छाऽ नहि छनि, तेँ उठि-उठि क’ बसैत छथि।
मरक मन ने रहि रहि उकासी मरबाक समय एखन नहि आयल छनि, मुदा रहि-रहि क’ उकासी क’ कए लोककेँ डेरायबाक काज करैछ, तँ व्यं’ग्यक।
मर जइहें जी, तऽ लाँड़ खहिहें घी जखन प्राण चलिए जायत तँ घी खयलासँ की लाभ ? इच्छित वस्तु तुकपर नहि प्राप्त‍ भेलापर कहल जाइछ।
मरदक खेनाइ मउगीक नहानाइ, केओ देखलक केओ बाँकिए रहल पुरुषकेँ भोजन करैत आ स्त्रीवकेँ स्नाुन करैत क्योष देखैछ, क्योक नहि देखि पबैछ।
मरदक जबान, आ गाड़ीक पहिया चलिते फिरते नीक मर्दक जवान आ गाड़ीक पहिया चलैत-फिरैत नीक होइछ।
मरदक बहिया मरे, मउगीक बहिया जीये मर्दक नोकर-चाकर काज करैत-करैत मरैत अछि, किन्तुक स्त्री क बहियाकेँ कार्याभाव रहैछ, तेँ ओ जीवित रहैछ।
मरदक लहना आ मउगीक गहना मर्दक समाजमे प्रतिष्ठाक लहना लगौलासँ होइछ तथा स्त्रीरक प्रतिष्ठा गहनासँ।
मरद के बात हाथी के दाँत, जे निकलल से निकलल मर्दक बात हाथीक दाँतक समकक्ष होइछ जे बहरा गेल से बहरा गेल।
मरद मउगी राजी, की करे गाम के काजी स्त्रीग पुरुष सहवास सुखक हेतु राजी अछि, तँ गामक काजी की क’ सकैछ?
मरद मोटाय गबहीमे, बड़द मोटाय दउनीमे पुरुष जखन मोकदमामे गवाही देमय जाइछ तखन इच्छा नुरूप भोजन क’ आ बड़द दौनीमे जाइछ तँ पर्याप्त खा क’ मोटा जाइछ।
मरद रहल से हरदी गेल, तकरा पाछाँ बिपत पडि़ गेल मरद जे होइछ ओ विपत्तिक सामना करैछ।
मरद हो तऽ बड़द पोसय मर्द जे रहैछ वैह बड़द पोसि सकैछ।
मरद हो से राउत बुझाबय मर्द राउतकेँ नीक-बेजाय बुझा-सुझा सकैछ।
मरदाबा उपजाबए धान, तऽ मउगी लछनमान पुरुष धान उपजबैछ, किन्तुी ओकर पत्नीछ भाग्य वान कहबैछ।
मरनाहर के धरनाहर के जकरा मारबाक छैकतकरा क्यो रोकि नहि सकैछ।
मरबे तऽ मरबे, तीन खून करबे मरबाक तँ हमरा अछिए तखन तीन व्याक्तिक हत्याी किएक ने करी ? स्वेाच्छा चारी व्याक्तिपर व्यंीग्यए।
मरय के मन ने तऽ उठि उठि कऽ बइसी मरबाक मन नहि अछि, किन्तुग मरबाक अभिनय करैत छी तें उठि-उठि क’ बैसि जाइत छी।
मरय माय जीये मउसी, आधो राति खोआबे बासी माय मरि जाय तँ कोनो हर्ज ने, किन्तुा मौसीक जीवित रहब आवश्यरक अछि।
मरल के मारब जे पहिनेसँ कष्ट मे अछि ओकरा आर कष्टत देब उचित नहि।
मरल के मारी बाँस लऽ खोंचारी मृत्यु क पश्चाोत् ककरो मारब आ ओकरा बाँस लऽ कए खोंचारब दुनू एक्केा बात थिक।
मरल घोड़ा कतहु घास खाय मृत्युडपरान्तर घोड़ा कोना घास खा सकैछ।
मरलजाइ रास गाइ की मरबा काल क्योा प्रेम गाबि सकैछ? अस्वरस्था वा असन्तुबष्ट व्यसक्ति आनान्दित नहि रहैछ।
मरल बाछी बाभन के दान मरल बाछी ब्राह्मणकेँ दान देल गेल।
मरल मुरदा कनखी मारे देo मरल मुरदा मटकी मारे
मरल मुरदा मटकी मारय मुर्दा कनखी-मटकी मारि रहल अछि।
मरल बहु के बड़ बड़ आँखि पत्नीह तँ मरि गेल, किन्तुष ओकर आँखि बड़का-बड़का छल।
मरल पूत के बड़ बड़ आँखि बेटा तँ मरि गेल, किन्तुअ ओकर आँखि बड़ पैघ-पैघ छल।
मरला आगू डोम राजा मृत्युगपरान्त, डोम किएक ने राजा बनथु ताहिसँ दोसराकेँ कोन प्रयोजन? मृत्यु क पश्चाँत् के देखैछ जे की होइछ?
मरला पूत के बड़ बड़ नाम देo मरला पूत के बड़ बड़ आँखि
मरले गुन कि पड़यले गुन व्येक्तिक वास्त विकताक जानकारी ओकर मृत्‍युपरान्ता अथवा ओकरा कतहु चलि गेलापर होइछ।
मरि जाइ तऽ रासि गाबी मृत्युइपरान्त ककरो गुणगन क’ ओकर प्रशंसा कयल जा रहल अछि, तँ कहल जा रहल अछि।
मरी ने जीबी हुकुर हुकुर करी ने तँ मरैत छी आ ने जीवित छी।
मरुआ मालिक पातर नीक, रब्बीँ रइयत धन नीक मड़ुआक खेती पातर, नीक मालिक सेहो पातरे ठीक होइछ।
मरैतक हाथ पकड़ल जाइछ, जबानक हाथ ने पकड़ल जाइछ जीवन-मृत्युइक बीच संघर्षरत व्यकक्तिक हाथ पकडि़ ओकरा उबारल जा सकैछ, किन्तु् एक बेर वचन चूकि गेलापर ओकरा असंभव अछि।
मलयागिरि के भिलनी चन्द न दैछ जड़ाय मलय पर्वतक समीप रहनिहार व्य क्तिक चाननक जाड़नि करैछ।
महतमनिया बिआयल कूथि कऽ, चेरिया कहलक बेटिए कठिन तपस्या क पश्चारत् अनेक कष्टोतपरान्तप महतमाइन बच्चाषक जन्मा देलिन तँ नौड़ी कहलक ‘बे‍िटए भेल’।
महतो सऽ बहिया बली, बात बोले तऽ सन्तासपे मरी मालिकसँ जँ नौकर अत्य धिक शक्तिशाली भ’ जाइछ तँ ओकर व्यववहार एवं बात-विचार कष्टेन दैत अछि।
महफा महक कनबे ने करे, लोकनिया भोकारि पारे महफाक नववधूक आँखिसँ नोर ने बराइछ, किन्तुन संगक नौड़ी जोर-जोरसँ भोकारि पाडि़ क’ कानि रहल अछि।
महादेबक इष्ट’ भाँङ महादेव भाँङसँ प्रसन्न होइत छथि।
महादेबक माने ने गउराक मान महादेवक कोनो गणना नहि, किन्तु। पार्वतीकेँ अत्यनधिक मान-सम्माुन देल जा रहल छनि।
माँगने कोइरी साग ने दिये, बन्हसने कोइरी सब किछु‍ दिये माँगलापर कोइरी साग धरि देबाक हेतु तैयार नहि होइछ, किन्तुत ओकुरा बान्ह लापर ओ सब किछफ देबाक हेतु तैयार भ’ जाइछ।
माँगमे तेल ने टाँगमे तेल माथमे तेल नहि, किन्तुब पैरमे तेल लागल अछि।
माँगि कै ने खाइ फूलल जाइ अनेने मोटौनिहारपर व्यंाग्य ।
माँगि चाँगि कऽ धुम्मां सन काया, धुम्मान के देखि कऽ सब के माया भीख माँगि क’ खैनिहार जँ मोटा जाय तथापि ओकरा भीखमंगा बूझि क’ सभ दयाभाव प्रदर्शित करैछ।
माँगि दही खायब, तऽ मरि नहि जायब दही जँ माँगि क’ खायब तँ एहिसँ नीक मृत्यु थिक।
माँगि ने खाइ, तऽ रूसल जाइ माँगि क’ नहि खायबसँ नीक अछि जे रुसि रहब।
माँगी भीख आ पूछी गामके जमा मँगैत अछि भीख आ गामक लगानक जिज्ञासा करैछ।
माँगी हर्रे तऽ देबे बहेड़ा ककरोसँ क्यो हर्रे माँगैत अछि, किन्तुम ओकरा बदलामे ओ बहेड़ा दैछ।
माँगै जाय तऽ टाँगै चाह ककरोसँ कोनो वस्तुैक याचना करी, किन्तुम वैह जखन याचना करब प्रारंभ करैछ, तँ व्यंजग्य कयल जाइछ।
माँगो माय के ई पहिले जग्गाक माँगो मायक ई प्रथमे यज्ञ छनि।
माइक्रोसॉफ्ट जिउ गाइ सन, पूतक जिउ कसाइ सन मायक ममता आ पुत्रक कर्कशतापर व्यं ग्यक।
माइ धी दू बंस फुफू भतीजी एक्के् बंस माय बेटी दुनू दू वंशक रहैछ, किन्तु फुफू भतीजीक वंशमे कोनो परिवर्त्तन नहि होइछ।
माघक कनिया बाघ माघ मासमे जन्म लेनिहारि कन्यात बाघ सदृश निडर भ’ जाइछ।
माघक घाघस बकरीक टुइस, साँय बहुक झगड़ा तीनू फूइस माघक बदरी, बकरीक टुसि तथा साँय-बहुक झगड़ा तीनू निरर्थक थिक।
माघ के गरमी जेठ के जाड़, पहिला पानी भरि गेल ताड़, घाघ कहे हम होबौं जोगी, कूआँक पानी धोइहें धोबी माघ मासमे गर्मी, जेठ मारसमे जाड़ आ पहिल वर्षासँ पोखरि पानिसँ भरि जाय, तँ घाघ कहैत छथि जे हम योगी बनि जायब, कारण अभाव हैत आ धोबी इनारक पानिसँ कपड़ा धोअत।
माघ नहाय गुड़ गाजर खाय, तकर पुन्नँ अकारथ जाय माघ मासमे प्रात:कालजे स्नाकन करैछ तथा गुड़ एवं गजरा खाइछ, तँ ओकर सब पुण्या बेकार भ’ जाइछ ।
माघ बरसबे करत, भाय भिन होयबे करत माघ मासमे वर्षा होयबे करत तथा भाय-भायक बीचमे पृथक् भेनाइ सेहो स्वायभाविके थिक।
माघ बरिसे तीन जाय, गहूँम गाय बेमाय माघ मासमे वर्षा भेलापर गहूँम, एवं बेमाय समाप्तस भ’ जाइछ।
माछक पथार, बिलाइ रखबार माछक पथार पसरल अछि जकर रक्षा करबाक भार बिलाइकेँ देल गेल।
माछक बच्चाब के हेलब के सिखबैछ माछकेँ क्योि हेलब सिखबैछ, प्रत्युात ओ स्वकयं सिख जाइछ।
माछक संगे दूध ने खाइ, मुइला बहुक नइहर ने जाइ माछक संग दूध खायब तथा मृत पत्नीिक नैहर जायब सेहो वर्जित अछि।
माछ खाय तऽ हाथो ने गन्हाजय मुहो ने गन्हााय माछ खयलाक पश्चा त् हाथ, मुह दुनू गन्धग करैछ।
माछ खाय सऽ बेसी ताकत, गेल गाँझ घिचैमे माछ खायसँ बेसी शक्ति ओकर गाँझ घिचबामे चल जाइछ।
माछ तऽ बेसी ताकत, गेल गाँझ घिचैमे माछ खायसँ बेसी शक्ति ओकर गाँझ घिचबामे चल जाइछ।
माछ तऽ छैक ने जे सडि़ जयतैक माछ तँ नहि अछि जे सडि़ जायत।
माछ पहुना तीन दिन केहुना माछ तथा पाहुन कोनो प्रकारेँ तीन दिन धरि चलि सकैछ।
माछ भात पाँच हाथ एकर प्रयोग बच्चा सब करैछ।
माछमे रेबा मासुमे परबा रेबा माछ तथा कबूतरक मासु नीक होइछ।
माछे चिड़इपर निसान अभष्टचपर लक्ष्य रखनिहारपर कहल जाइछ।
माछो बाँतर दूधो बाँतर माछ एवं दूध दुनू वर्जित अछि ।
माछो मीइ चट निओ मीठ सब वस्तु क समान स्थिति रहलापर कहल जाइछ।
मा‍ि‍ तर सुँगठी बिलाइ के नीन जँ माथ तर माछक सुँगठी रखने छी, तँ बिलाइकेँ नीन कोना भ’ सकैछ?
मानक पान अपमानक लड्डू सम्मापनित क’ कए पानो नीक तथा अपमानित क’ कए लड्डू खोआयब सेहो नीक नहि।
मान घटे जहाँ नित्तहु जाइ, रोग घटे औखध खाइ, पाप घटे हरि गुन गाइ प्रतिदिन कतहु गोलापर मर्यादा समाप्त भ’ जाइछ।
मान ने मान हम तोहर मेहमान अयोग्य व्यरक्तिक हाथमे मूल्येवान वस्तुत पडि़ गेलापर कहल जाइत अछि।
मानू तऽ देबता ने तऽ पाथर श्रद्धा हो तँ देवता मानू अन्यकथा ओ तँ पाथर थिक।
माने मम्म त गमाबे, इच्छे भोजन पाबे ममत्वमक कारणेँ लोक अपन सम्माेन समाप्तम करैछ तथा इच्छाननुरूप भोजन भेटलापर परितृप्तिक अनुभव होइछ।
मायक मुइने एक सराध, बहुक मुइने तीन सराध माय मरली तँ एकहि बेर श्राद्ध कयलनि, किन्तुल जखन पत्नीाक मृत्यु भेलनि तखन तीन बेर।
माय करे कुटान पिसान, पूतक नाम दुर्गादत्त माय तँ कूटि-पीसि क’ जीवनयापन करैछ, किन्तु बेटाक नाम दुर्गादत्त छनि।
माय कुमारी धी गढुआर, नतनी के देखे आयल बरतुहार माय कुमारि छथिन, लेकिन हुनक बेटी गर्भवती भ’ गेलथिन।
माय के न मोटरी, धीया के न लोर माय बेटीकेँ सनेस मोटरी बान्हि क’ नहि पठबैछ, तँ बेटी नोर कथीपर बहाओत ? स्वाछथ्र रहलेपर कयो ककरो स्मओरण करैछ।
माय के बेटी ने, आ सासुक जमाय सासुकेँ बेटी नहि छनि आ ई अपनाकेँ जमाय कहैत छथि।
माय गे गील भेल, धीया गे गुन भेल बेटी मायसँ कहैछ, ‘आँटा तँ गील भ’ गेल।‘
माय गे माय बड़ सुलबाय, पदना मनसा ने पतियाय बेटी मायकेँ संबोधित क’ कए कहैछ जे ‘हमरा शूल भ’ रहल अछि तथापि हमर स्वाहमीकेँ विश्वापस नहि भ’ रहल छनि।‘
माय जी गाय सन, पूत जी कसाइ सन मायक हृदय गायक हृदय सदृश अत्यीन्तभ सुकुमार एवं पवित्र अछि, किन्तु पुत्रक हृदय कसाइ सदृश अछि।
माय तऽ माय माय सतमाय, भात देलक फुलकाय, दालि देलक छिलकाय, आर लेबे गे बेटी, नहि लेब गे हथकट्टी सतमाय बेटीकेँ फुलका क’ भात, छिलकाय क’ दालि दैछ आ जिज्ञासा करैछ जे आर लेबें।
माय ताके अँतड़ी, बहु ताके मोटरी मायक इच्छाँ रहैछ जे ओकर बैआ स्वोस्थ रहय, किन्तुछ ओकर पत्नी‍क इच्छा रहैछ भोजन काटि क’ ओकर फरमाइशक पूर्ति करय।
माय तितइ बहिन मिरचाइ, बहु भेल मिठाइ, मन हो कहाँ लऽ कऽ जाइ विवाहोपरान्तन माय तीत, बहिन मिरचाइ, किन्तुप पत्नीत मधुर सदृश भ’ जाइछ।
माय देखे सँसरी, बहु देखे मोटरी देo माय ताके अँतड़ी, बहु ताके मोटरी
माय बहिन खटाइ, बहु मिठाइ विवाहोपरान्तइ माय बहिन खटाइ भ’ जाइछ, किन्तुप पत्नीत चीनी सदृश मधुर भ’ जाइछ।
माय बाप मरि गेल रहि गेल भाय भउजाइ, तीमन साजन जरि गेल रहि गेल नोन मिरचाइ माय बापक मृत्यु परान्ति भाय भौजाइ अभिभावक भ’ जाइछ, जे कष्टौ दैछ।
माय भेल काफर, सब दु:ख जाफर माय काफर (एक औषधि) सदृश होइछ जनि सामीप्यरसँ सब दु:ख समाप्‍त भ’ जाइछ।
माय मुइने बाप पित्ती मायक मृत्युापरान्त पिता पित्ती सदृश व्यकवहार करैछ, कारण ओ दोसर विवाह क’ लैछ।
माय सऽ बढि़ कऽ जे मानय से डायन मायसँ बेसी माननिहारि डायन कहबैछ।
माय हो आन के, बहु हो परान के पत्नीो भेलापर ओ प्राणसँ प्रियगर भ’ जाइछ तथा जे जन्मप देलक ओ आन भ’ जाइछ।
मार काट तोरे आस पत्नीाकेँ सतत अपन प्रियतमसँ आशा रहैछ चाहे ओ मारे वा पीटे।
मार गोसइयाँ तोर आस कतबो प्रतडि़त करब तथापि तोरे आशा अछि।
मारलक कहिया, चोट लागल कहिया मारि कहियो लागल तथा चोट कहियो लागल अर्थात् काय्र कहियो भेल, मुदा ओकर फल कहियो भेटल।
मारला बिना गदहा हेहर मारि बिनु गदहा सेहो हेहर भ’ जाइछ।
मारल बिना जोलहा बइरागी मारिक अभावमे जोलहा वैरागी भेल जा रहल अछि।
मारा माछ कबइ के झोड़, तइपर भुन्नाछ कंठी तोड़ कंठी बान्हि पुन: माछ खायब, तँ व्यंछग्य ।
मारिक डर सऽ भूत पड़ाय मारि-पीटक डरेँ भूत सेहो पड़ा जाइत अछि।
मारि कऽ ससरी, खा कऽ पसरी मारि-पीट क’ कए पड़ा जाइ तथा खा-पीब क’ आराम करी।
मारि कम बपराहटि बेसी चोट तँ कम लागल छैक, मुदा हल्लाा बेसी क’ रहल अछि।
मारि बाढ़नि धऽ कऽ कोनो अधलाह कार्यक प्रति उपहासात्मुक रूप प्रदर्शित कयलापर कहल जाइछ।
मारि लाठिये हम घूइ तोड़इत छी, तरकी बेचि कऽ बड़द कीनइत छी एहन बात बजैछ जे बुझना जाइछ जे लाठीक मारिसँ धुट्ठी तोडि़ रहल अछि।
मारी माछ ने उपछी खत्ता देo मारी माछ ने उपछी पानी
मारी माछ ने उपछी पानी ने माछ मारब ने पानि उपछबाक प्रयोजन पड़त।
मारे सरदार, लूटे भण्डारर जँ सरादक हत्या क’ देल जाय तँ खजाना सुगमता पूर्वक लूटल जा सकैछ।
मारे सिपाही नाम हबलदार कार्य क्योी करैछ, किन्तुय नाम ककरो होइछ, तँ प्रयुक्त ।
मारे के मोट, अरहाबे के छोट अपनासँ शक्तिशलीकेँ मारबाक चाही तथा छोटकेँ कोनो कार्य करबाक हेतु आदेश देल करी ।
मारैत छी घुट्ठी फुटैत अछि लिलार, तइयो ने बुझे छौंडा गमार मरैत छी तँ घुठ्ठीमे, मुदा फूटि जाइत छैक ललाट तथापि मूर्ख छौड़ा कोनो बात नहि बुझैछ।
माल बाला हारि गेल, गाल बाला जीत गेल पैसा वाला तँ हारि गेल, किन्तुी जे गलगर छल ओ जीत गेल।द्य
माल महाजन के, मिरजा ,खेले होरी माल तँ महाजनक जा रहल अछि, मुदा मिर्जा फगुआ खेला रहल अछि।
माल रातिए, आदमी सातिए पशुकेँ एक राति जँ भोजन नहि भेटैछ तँ ओ दुब्बएर भ’ जाइछ, किन्तु मनुष्य केँ सात राति जँ भोजन नहि भेटैछ तापि ओकरा कोनो परिवर्त्तन नहि होइछ।
मालिक बाबा मालिक बाबा, धयियामे की छै नाना धीआपूताकेँ कचकचयबाक हेतु प्रयुक्तय।
माले मुफ्त दिले बेरहम मँगनीक माल भेटलापर ओकर प्रयोग निर्ममता पूर्वक होइछ।
मासु भात घरबइया खाय, हत्याम नेने पाहुन जाय मासु-भात तँ घरबैया खयलक, किन्तुे ओकर हत्या क भार बेचारे अतिथि उठौलनि।
मिथिलाक माटिए स्वार्ग मिथिला पुण्यए-भूमि थिक, तेँ ई भूमि स्व र्ग थिक।
मियाँक जुत्ता मियाँक माथ मियाँकेँअपन जुत्ता अपनहि कपारपर पड़ैछ।
मियाँक दउड़ मसजिद तक मियाँ दौडि़ क’ मस्जिद धरि जा सकैछ।
मियाँक दौड़ महजीद धरि मियाँ मस्जिदसँ आगाँ नहि जाइछ।
मियाँ के जुरे माड़ ने, ताड़ी के फरमाइस मौलवी साहेबकेँ माड़ पर्यन्तछ नहि जुड़ैत छनि, मुदा ताड़ी पीताह तकर फरमाश क’ रहल छथि।
मियाँ के दाढ़ी बाह बाहे पार मियाँक दाढ़ी प्रशंसामे समाप्तत भ’ जाइछ।
मियाँजी के मियाँजी, बजनियाँ केबजनियाँ देo बाबाजी के बाबाजी, बजनिया के बजनियाँ
मियाँ जोडि़हे लडि़ये लडि़ये, खोदा लऽ जइहें एके बरिये मियाँ एक-एकपाइ जोडि़ क’ जमरा करैत अछि, किन्तुज खुदा मियाँ एकहि बेर सब नाश क’ दैत छनि।
मियाँ दुब्बरर किएक टिरीस के मारे क्योँ पुछलक ‘मियाँ दुर्बल किएक छी’ ? मियाँ उत्तर देलथिन, ‘क्रोधक आधिक्य अछि।‘
मियाँ बुझलनि पेआउज मियाँ किछु नहि बुझलनि।
मिरगिसरा तबय रोहिनी लबय अदरा बुदबुदाय, कहे डाक सुनु भिल्लररी कुत्ता भात न खाय मृगशिरा नक्षत्रमे गर्मी, रोहिनी आर्द्रामे वर्षा होइछ तँ डाक कहैछ भल्लीीरीकेँ जे धान एतेक बेसी होयत जे कुकुर पर्यन्ती भात नहि खाइछ।
मिले मोछमे मोछ, कि मिले धोंछमे धोंछ जे जाहि प्रकारक रहैछ तकरा ओही प्रकराक व्यकक्तिसँ जखन मिलना होइछ, तँ कहल जाइछ।
मीठ खातिर ऐंठ खायब मधुरक कारणेँ लोक भ्रष्टत भ’ जाइछ।
मीठ मीठ बात सउतिन बजइये, काँखि तर कऽ छूरी करेज कटइये सौतिन तँ अमृत सदृश बात बजैत अछि, किन्तुत काँखि तरक चक्कूिसँ हमर करेज काटि रहल अछि।
मीठ मुरमुर दुनु एकहि संग भेल।
मुइनहि गुन कि पड़ैनहि गुन देo मरले गुन कि पड़यने गुन
मुइला पूत के बड़ बड़ नाम देo मरल पूतके बड़ बड़ आँखि
मुइलापर कोदो दररब दुशमनक मृत्युदक भ’ गेलज तथापि ओकर परिवारकेँ कष्टर पहुँचौलापर कहल जाइछ।
मुकिऔने कटहर ने पाक मुक्काे मारलापरह कटहर नहि पकैछ।
मुख सुद्धिक ने परकार, तनिका अडि़आतबाक बड़ चमत्कापर अतिथिक स्वाडगतार्थ मुखशुद्धी अर्थात् सुपारी पर्यन्तस नहि छनि, किन्तु ओ अतिथिकेँ अत्यनन्तत चमत्काधरी ढंगे बिदा करेत छथित।
मुदइ सुस्ता गबाह चुस्तत वादी सुस्ता भ’ गेल अछि, मुदा ओकर समर्थक ओहिना सचेष्टब अछि।
मुन दाइ मुन दाइ किछुओ ने खाइ छी, टुके टुके रोटी अढ़ाय टा खाइ छी क्यो कहैछ जे मुनदाइ किछु नहि खाइछ, टुके-टुके अढ़ायटा रोटी खा जाइत छथि।
मुनल मुह मटकुरिए नीक अपनाकेँ चुप राखब उचित।
मुरख लाठी बीच कपार मूर्खक संगत नीक नहि।
मुरगी अपन जान सऽ गेल, खाय बाला के सबादे ने मुर्गी अपन जान द’ देलक, किन्तुब खैनिहारकेँ कोनो स्वा’द नहि भेटल नि।
मुरगी बाङ ने देतै त भेर नै हेतै ककरो अभावमे कोनो काज वाधित नहि होइछ।
मुरदा पड़ोसिया खोरने नीक मुर्दा आ पड़ोसिया खोरने नीक रहैछ।
मुरदापर जेहन एक मन तेहन सय मन मुर्दापर कतबो भार पड़ैछ, तँ ओ बराबरे होइछ।
मुरदापर जेहने नौ मन तहने नब्बेै मन देo मुरदापर जेहन एक मन तेहन सय मन
मुरली हाथ मुड़मूड़, दही चूड़ा सुर सुर ककरो ठकि लेलापर जेहन आनन्दह होइछ तेहने आनन्दल चूड़ा-दही खयबामे।
मूरही के पूँजी ने, पूरी के दोकान मुरहीक व्यूवसाय करबाक पूजी नहि छनि, मुदा दोकान करताह पूरीक।
मुरुख एक चलल सुसरारी, बाटही लेल सुरखाब उतारी, कन्याा छल से सासुर गेल, गाछे कटहर ओठे तेल अभीष्टए वस्तुेक हेतु प्रयास करब, किन्तुि प्राप्ति नहि होइछ, तँ कहल जाइछ।
मुसरे ढोल पिटायब सफलता भेलापर ढोल बजा क’ आनन्दर लेब।
मुसहरक बेटी के ने नइहर सुख ने सासुर सुख मुसहरक बेटीकेँ नैहर-सासुर कतहु ने सुख होइछ अर्थात् सबठाम कार्य करय पड़ैछ।
मुह कान सूप सन, नाक बन्दूुक सन मुह कान तँ सूप सदृश गोल आ नाक बन्दूाक सदृश लम्बान छनि।
मुह केहनो सऽख बराबरे मुह केहन छनि, किन्तुब शौख बराबरे करताह।
मुह खाय आँखि लजाय खाइत अछि मुहसँ, मुदा लाज लगैछ आँखिकेँ ।
मुहदुबराक बहु भरि गामक भउजाइ सामर्थ्यकहीन व्यउक्तिक साधनसँ सब को लाभन्वित होयबाक प्रयास करैछ।
मुह देखि कऽ मुँगबा परसब मुहक आकार प्रकार देखि क’ ओकरा मुँगबा देल जाइछ।
मुह देखि बीड़ा, चुत्तर देखि पीढ़ा ककरो मुह देखि क’ पानक बीड़ा एवं चुत्तर देखिक क’ पीढ़ा देल जाइछ।
मुह ने कान दीपना नाम मुह तँ छनि ने अर्थात् गोंगा छनि, कानसँ बहिर छनि, किन्तुा नाम छनि दीपना।
मुह ने कान बीच मे दोकान बजबाक क्षमता छनि ने, कानसँ से बहिर छथिा, मुदा दोकान करताह बीचहिमे।
मुह ने देखिऔन्हि चुकरी भट्ट सन ककरो मुह देखि क’ कहल जाइछ जे मुह चुकरीभट्ट सदृश छनि।
मुह ने देखिऔन्हछ चुहार सन देo मुह ने देखिऔन्ह चुकरी भट्ट सन
मुह ने बोल आँखि ने लोर महुमे ने बोली छनि आ ने आँखिमे नोर।
मुहपर के कहल खुसामद मुहपर ककरो प्रशंसासँ ओ खुशामदी बुझल जाइछ अर्थात् मुहपर प्रशंसा करब नीक नहि।
मुह मारि पीठ चुम्माप सोझाँमे तँ दुर्दशा करैछ, किन्तुम परोक्षमे प्रशंसा, कहल जाइछ।
मुहमे दाँत ने मटर जलखइ मुहमे दाँतक नामोनिशान नहि, किन्तुम जलखइ करैत छथि मटर।
मुहमे पान तऽ बूढ़ो सिआन पान खयलापर बूढ़ व्यसक्ति जवान सदृश लगैछ।
मुह मुसहरनी गाँडि़ धनुकाइन मुह तँ मुसहरनीक समान छनि, किन्तुश ओ धनिक सदृश रहैछ।
मुहमे राम बगलमे छूरी ओना तँ सतत राम-नाम जपैत रहैत छथिु, मुदा बगलमे छूरी रखेन रहैत छथि।
मुह‍ लरिकौना पेनी पुरान मुह तँ बचकानी सदृश छनि, किन्तुश अवस्था बड़ बेसी छनि।
मुह सन मुह नहि मुह तिनकोनमा, कोदोक चाउर लऽ कऽ कऽ दहुन चुमोनमा वरक मुह तँ तिनकोनमा अर्थात् टेढ़ छनि, मुदा बात तँ बड़ पैघ-पैघ करैत छथि,।
मुह सन मुह ने मुह तिनकोनमा, कोदो कऽ चाउर लऽ कऽ दहुन चुमौनमा मुह तँ तीनकोनमा छनि, तँ कोदोक चाउरसँ चुमौन कयल गेलनि।
मुह सुन्द र चालि छुछुन्दकर देखबामे सुन्दनर छथि, किन्तु हुनक चालि-चलन छुछुन्न्र सदृश छनि।
मुह सुन्द्र बूरि छुछुन्द।र देo मुह सुन्दुर चालि छुछुन्द र
मूडि़ देलहुँ माँगि खाउ माथक केश काटि देलहुँ अर्थात् संन्यािसी बना देलहुँ आब भीख माँगि क’ खाउ।
मूरख के डाँग सोझे ठाँय देo मूरखक लाठी माझ कपार
मूरख लाठी माझ कपार मूर्ख व्यपक्ति छल-प्रपंचसँ पृथक रहैछ तेँ सोझ लाठी कपारेपर मारैछ।
मूरछल जीबय चुरुक पानि समयपर तुच्छोु वस्तु प्राण रक्षक होइछ।
मूर पलटने नाचे साहु मूल धन वापस भेलापर साहु नाचय लगैत अछि।
मूसक चाम सऽ कतहु नगाड़ा छाड़ल जाय मूसक चमड़ा अत्युन्तछ छोट तथा नगाड़ाक स्वकरूप विशाल होइछ तेँ ओकरा कथमपि नहि छाड़ल जा सकैछ।
मूस बच्चे सऽ बिल खनैछ मूस जन्मेहिसँ बील खनब प्रारंभ करैछ।
मूस मोटानी तऽ दुम सुटकानी पैघ भ’ कए नीच काज कयनिहारपर व्यंभग्यए।
मोन करइअ पूआ खइती, तेल रहइत तऽ गूड़ पैंचो लइती साधनहीन व्यलक्तिक अभिलाषापर व्यंछग्य ।
मोखाक माटि खियाब निजी स्वािर्थ सिद्धिक निमित्त अत्यधिक चाटुकारिता कयनिहारपर व्यंग्यक।
मोची मोचीमे लड़ाइ हो, हाथ फाटे राज के जीन चमार-चमारक युद्धमे राजाक घोड़ाक जीन फाटि गेल।
मोछ दाढ़ी पाकि गेल, बड़का बाबू लडि़के बचकानीपनपर व्यं ग्य ।
मोनक पैंच मोने निस्तांर ऋण लेनिहार व्य क्तिपर व्यंयग्यू।
मोन दाइ किछु ने खाइथि, सबा सेर चूड़ा फुला के खाथि देo मुन दाइ मुन किछुओ ने खाइ छी, टुके टुके रोटी अढ़ाय टा खाइ छी
मोनमे राम बगलमे छूरी पारघाती व्यगक्तिपर व्यं ग्य ।
मोन हरखित तऽ गाबी गीत देo मोन हुलास तऽ गाबी गीत
मोन हुलास तऽ गाबी गीत मोन हर्षित रहैछ तखेन सब किछु नीक लगैछ।
मोने महफा पैरे कहार इच्छामनुसार कार्यक निमित्त सहज साधन उपलब्धिपर कहल जाइछ।
मोन मन मोर म3न नइ पतिआय, सउतिनीक टाँग दुनू झुलिते जाय सौतिनक मृत्यु परान्तत क्योन कहैछ जे ‘हमरा विश्वा स नहि भ’ रहल अछि जे हमर सौतिनक मृत्युा भ’ गेलनि।
मोसमातक धन के राम रखबार निर्बल व्य क्तिक रक्षा भगवान करैत छथि।
मोहरक सिपाही एहन सिपाही अछि जकर प्रयोग मोहर सदृश होइछ।
मोर पिया रंगिया सय सय बीड़ा खाए, चारू कात रिनिया महाजन लेखा जाय ऋणसँ ग्रस्तन व्याक्तिक मौज मस्ती पर व्यं ग्यह।
मौनं स्वी्कार लक्षणम् चुप रहब सम्म‍तिक लक्षण थिक।
म्यारऊँ के मुह पकड़े बिलाइक मुह के पकड़त अर्थात् ओकर बाजबकेँ बन्दे क’ सकैछ ? बजन्तापसँ विवाद करब उचित नहि।
रंग राजा पूत परजा राजा जँ कदाचित निर्धनो भ’ जाइत छथि तथापि प्रजा हुनक बेटा सदृश होइछ।
रंडी ककर बहु, भड़ुआ ककर सार वेश्याक ककरो पत्नीड नहि तथा भड़ुआ ककरो सार नहि भ’ सकैछ।
रंछी के सैकड़ो इयार वेश्याेकेँ सैकड़ो प्रेमी रहैछ अर्थात् जे टाका दैछ सैह ओकर प्रेमी बनि जाइछ।
रंडी रूसल धरम बाँचल वेश्याह रूसि रहली जाहिसँ धर्म बाँचि गेल।
रकटल छी भरि थरिया दे हम भोजनक हेतु लालयित छी, अतएव हमरा थारी भरि भोजन दिअ।
रकटल बेटी के कदीमा सनेस बेटी कदीमाक निमित्त लालायित छलीह तेँ हुनका सनस पठओल गेलनि।
रकटले पौलहुँ कोहबर, हे गोसैइयाँ परात ने करब बहुत दिनसँ कोहबरक हेतु लालयित छलीह से भे‍टलबनि, तेँ भगवानसँ प्रार्थना कयलनि जे प्रात नहि करब।
रखली बोनिहार, भेल चोदनिहार रखलहुँ काज-धन्धाे देखबाक हेतु, मुदा ओ तँ हमरे संग अनुचित कार्य करब प्रारंभ कयलक।
रघुनन्द न सऽ करब बैर, ककर ककर ने घरब पैर भगवानसँ जँ शत्रुता करब तँ ककर-ककर ने पैर पकड़य पड़त।
रजपूतक धनक ओर ने राजपुत्रक धनक अन्त क कोनो पता नहि चलैछ।
रजपूत के काँखिए तर फौज राजपुत्रकेँ सदिखन फौज संगे रहैत छनि।
रटन्तत बिद्या लपटन्तर जोर, नहि किछु तऽ थोड़बो थोर अभ्याडसोत्तर विद्या तथा अखाड़ापर कुस्ती खेलैलासँ शरीरमे शक्ति होइछ।
रड़बा ससुर सब के भाबे, राँड़ सासु ककरो ने भाबे मूर्ख ससुरकेँ साधारणतया सब पसिन्दा करैछ, किन्तुा सासु जे राँड रहैछ ओकरा क्योख ने पसिन्द‍ करैछ।
रमता जोगी कहता पानी भ्रमण कयनिहार संन्या सी तथा बहैत पानि दुनू एक समान अछि।
रबि अढ़ाइ मंगलवार तीन, बुध के बखा आठो दिन रवि दिन वर्षा प्रारंभ होइछ तँ बुझबाक चाही जे वर्षा अढ़ाय दिन धरि चलत।
रबि गुरु मङ्गल जौं चन्दाध परिबेस, दिन चौथी अट्ठे महि भरन बिसेस जँ प्रभामण्डहलमे चन्‍द्रमा रविक रातिमे प्रवेश करैछ तँ वर्षा अवश्यं्भावी अछि।
रब्बीश राँड़ के, भदइ साँढ़ के रब्बीशक खेती सरल अछि, कारण कोहुना खेतमे फेकि देलापर ओ किछु-ने-किछु भ’ जाइछ, किन्तुछ भदइक खेतीमे अत्युधिक श्रमक प्रयोजन पड़ैछ।
रस्सी जरि गेल, मुदा अँइठन ने गेल रस्‍सी जरि क’ समान्तद भ’ गेल, मुदा ओकर ऐंठन यथावत् रहल।
रह जी सह जी, नइहर जायब जी, सब चीज खायब जी परिस्थितिवश विवश व्यजक्ति आत्मानकेँ संबोधित क’ कए कहैछ, ‘हे जीह ! धैर्य धारण करह ! जे किछु सोझाँ अबैत छह तकरा सहन करैत चलह।
रहब फूसमे आ खोआब देखब महलक रहैत छी फूसक घरमे, मुदा स्वरप्न! देखैत छी महलक, जे सर्वथा अस्वाबभाविक प्रतीपत होइछ।
रहब सासुर दिन दुइ चारि, तब मजा भेटत ससुरारि सासुरमे दुइ चारि दिन रहला उत्तर आनन्द भेटैछ अन्यइथा ओ कष्टउदायी भ’ जाइछ।
रहय तऽ मन ने भाबे, चल जाय तऽ मन पछताबे कोनो वस्तुन उपस्थित रहैछ तँ ओ नीक नहि लगैछ, मुदा ओकरा चल गेलापर ओही वस्तुगक हेतु लालायित रहैछ, तँ व्यंतग्यी।
रहरीक टाटपर गुजराती ताला घरमे टाट लगौने अछि राहटक, मुदा ताला लगबैत गुजराती ।
रहरीमे रहरी पुरान रहरी, डोलीमे कनिया हमर मेहरी महफामे कनियाँ चढि़ क’ कतहु जाइछ तँ बच्चाे सब ओकरा कबदबैत अछि।
रहलहुँ जीर सन भेलहुँ जमायन सन, सासुर गेलहुँ तऽ भेलहुँ गिरथाइन सन पहिने तँ जीरक समान छलहुँ, मुदा परिस्थितिवशात् जमायन सदृश भ’ गेलहुँ।
रहली कायथ भऽ गेली कैथबनियाँ, करम जरि गेल तऽ भऽ गेली किरतनियाँ छलहुँ तँ कायस्थे, मुदा परिस्थितिक कारणेँ कायस्थत भ’ कए बनियाक काज क’ रहल छी।
रही कनाह देखी ऊपर कनाह व्य क्ति सतत ऊपरे देखैछ।
रही गरीब खोजी गामक जामा अपने तँ गरीब छथि, मुदा संपूर्ण गामक वस्त्रँ खोजि रहल छथि।
रही फूसमे सपनाइ घरहर रहैत छथि तँ फूसक घरमे, मुदा स्व प्न देखि रहल छथि महलक।
रही बुलबुल खाइ डुम्मिरि छथि , बुलबुल, मुदा खाइत छथि डु‍म्म रि।
रही रानी भेली पदमिनी छलीह रानी सदृश, किन्तुद आब पद्मिनी बनि गेलही।
रहूक मूरी भुन्नामक पेट, दहीक ऊपर गुड़क हेठ रोहु माछक मूड़ी, भुन्नाद माछक पेटी तथा दहीमे जँ कदाचित् गुड़क खखोरी भेटि जाय तँ ओ खयबामे अत्य धिक स्वा दिष्ट होइछ।
रहे निरोग जे कम खाय, काज न बिगड़े जे गम खाय अल्पमभोजी व्यकक्ति सतत निरोग रहैछ तथा गम खैनिहार व्योथ्क‍तक काज कहियो ने बिगड़ैछ1
राँड कानय माँग खातिर, निपुतरी कानय कोखि खातिर विधवा स्त्री अपन सौभाग्यनक हेतु तथा बन्या स् अपन सन्ता‍नक हेतु सतत विलाप करैछ।
राँड के सुख बलाय विधवा स्त्री क हेतु सुख बेकार होइछ।
राँड़ नानीक घरमे नाती भतार राँड नानीक घमे नातीक दुलार-मलार अत्य धिक भ’ जाइछ, कारण नियन्त्र्ण कयनिहारक कोनो ने प्रभाव पड़ैछ।
राँड़ बहुरिया ईंगुरक टीका विधवा कनियाँ लाल रंगक टीका लगबैछ।
राँड मउगी साँड़ राँड स्त्रीा साढ़क समान होइछ।
राँड़ संग अहिबाती कानय, तकरा संग बटकुमारि कानय विधवाक कानब स्वाीभाविक अछि, अहिबातीक कानब सर्वथा अस्तावाभाविक, किन्तुी ओहूसँ अस्वाभभाविक तँ अछि जे कुमारि कन्यात सेहो कानि रहल अछि।
राँड़ साँढ़ सीढ़ी संन्यावसी, एहि सऽ बचे तऽ सेबे कासी बनारसमे विधवा, साँढ़, सीढ़ी एवं संन्याेसीसँ जे बाँचि जाइछ ओ ओतय रहि सकैछ, अन्येथा ओतय रहब कष्टी साध्यत भ’ जाइछ।
राँड़ी मूड़ी हेरय बाट, कहाँ होइ छै भोज भात गरीब लोक सतत एही खोजमे रहैछ जे कतय भोज-भात भ’ रहल अछि, कारण ओतय भोज्यस सामग्री उपलब्धर भ’ सकैछ।
राँड़ी सुख जे सबके मरे, भँइसी सुख जे मढि़या परे विधावाकेँ वास्तबविक सुखक अनुभव तखन होइछ जखन ककरो पतिक मृत्युव होइछ।
राउत बुझाबय से मरद मूर्खकेँ जे समझा दिअय वैह मर्द कहा सकैछ।
राकस घरमे भेल पकमान राक्षसक घरमे कतहु पकमानक आयोजन भ’ सकैछ ।
राजक लोभे बंसक संहार राजा बनबाक लोभमे वंशक संहार कयलनि।
राख पत रखा पत जँ क्योर अपन प्रतिष्ठाकक रक्षा चाहैछ तँओ आनक प्रतिष्ठाोक रक्षा सेहो करय।
राज घटल जाय, फरमाइस बढ़ल जाय मिथ्याल आडम्ब रपर व्यंकग्यँ।
राज पाट भउजो के, छलछल करतन ननदो संपत्ति तँ भौजीक छनि, छलछल ननदि क’ रहल छथि।
राजा उमतयला तऽ, लड्डू फेकि फेकि मारलनि राजा प्रेमसँ उन्मछत्त छथिू तेँ लड्डू फेकि-फेकि क’ लोककेँ मारि रहल छथिफ।
राजा ओ बाभन, एक कामी दोसर लोभी राजा कामी होइछ तथा ब्राह्मण लोभी।
राजाक आगू बाबूक दोहाइ राजा सदृश पैघ व्योथ्क तक समक्ष छोट व्याक्तिक बाहबाही देब सर्वथा निराधार प्रतीत होइछ।
राजाक ओढ़ना, रानीक गँइर बैठना जाहि वस्तुाकेँ राजा ओढ़ैत छथिै ओहि वस्तुवपर रानी बसैछ।
राजाक कटहर नगर बाँटय, राजाक बेटी कामरि चाटय राजाक कटहर शहरमे बाँटल जाइछ, किन्तु राजाक बेटी ओकर कमरी चाटि रहल अछि।
राजाक घरमे मोतिक दुख राजाक घरमे कतहु मोतीक अभाव हो ? तात्प र्य जे सम्पान्न? व्यिकितक घरमे बहुमूल्य‍ वस्तुपक अभाव नहि होइछ।
राजाक टोइयाँ झब्बूवलालक घइला राजाक काज साधारणो वस्तुकसँ चलि जाइछ, किन्तुक झब्बूलालक काज घैलक बिनु नहि चलैछ।
राजाक दरबारमे कनैत जाय सेहो मारल जाय, हँसैत जाय सेहो मारल जाय राजाक ओतय जे कनैत अपन फरियाद करय जाइछ ओहो दोषी बनि जाइछ तथा जे हँसैत जाइछ ओकरो वैह फल भोगय पड़ैछ।
राजाक बेटीक कोन काम, खाय हगे दू काम राजाक पुत्री सर्वथा अकार्यक होइछ, कारण हुनका कोनो कार्य नहि रहैछ तेँ ओ खाइछ तथा दिशा फिरैछ।
राजा के आँखि ने हँ कान ने हँ राजाकेँ ने आँखि होइछ आ ने कान।
राज के सेबने कान दुनू सोन, बनियाँ के सेबने छटाक भरि नोन निम्न स्तनरक व्य क्तिक अपेक्षा स्तघरक व्य्क्तिकसँ सर्म्प क राखब सर्वथा लाभप्रद होइछ।
राजा गुरूवार अरु पेखना, खाली हाथ ने देखना राजा गुरु एवं पक्षीक दर्शन भ्रमहुँसँ खाली हाथे नहि करबाक चाही।
राजा तनने चदरिया, चलय के बेरिया मृत्युनपरान्त, राजा, रंक, फकीर सब अपन चादर समान रूपेँ तानि दैछ।
राजा बेटा के मुहपोछना, धोबी बेटी के पैरपोछना महत्त्वापूर्ण वस्तुै सेहो स्थापन विशेषमे महत्त्वहीन भ’ जाइछ।
राजा राज ला बेहाल, रानी चुम्मास ला बेहाल राजा सतत चिन्तित रहैछ जे हमर राज्यु कोना सुरक्षित रहत, किन्तुु रानी एहि हेतु चिन्तित रहैछ जे राजा कोना हमर आदर करैत रहताह।
राजा रीझे तऽ कान दुनू सोन, बनियाँ रीझे तऽ छटाक भरि नोन ककरो क्रिया-कलापसँ राजा जँ प्रसन्न भ’ जाइछ तँ दुनू कानमे सोन दैछ तथा बनिया जँ प्रसन्नम होइछ तँ ओ एक कनमा नोन दैछ।
राजा रीझे तऽ न्याेय, पासा पड़े तऽ दाओ राजा प्रसन्न हैताह तँ न्यााय भेटत तथा पासा पड़त तँ दाओ लागि सकैछ।
राड़क असघँइ जीबक जंजाल छोट लोककक असकतायब महान कष्ट दायी होइछ।
राड़क भौजी सभक भौजी राड़ व्यजथ्कातक भाउज सभक भाउज होइछ।
राड़क बेटी हाँड़ी चढ़लनि, सागक मूड़ी हेरते गेलनि गरीबक बेटी जँ पालकी ऊपर चढि़ क’ जाइछ तँ ओ सर्वत्र सागपात देखैत जाइछ।
राड़क मउगी माड़े तिरपित गरीब बेटी जँ पालकी ऊपर चढि़क’ जाइछ तँ ओ सर्वत्र सागपात देखैत जाइछ।
राड़क मउगी माड़े तिरपित गरीब लोकक पत्नीे माड़ पर्यन्त।सँ तृत्पिक अनुभव करैछ।
राड़क लग्घी क काज भेल, तऽ कहलक छओ मास कैना भेल छोट लोकक जँ लग्धीलक प्रयोजन पड़त तँ ओ कहत जे हम छओ मास लग्धीधए ने करब।
राड़ जाने बारा के सबाद गरीब व्येक्ति नहि जनैछ बाराक स्वाबद केहन होइछ, कारण ओकरा ओ कहियो उपलब्धो नहि होइछ।
राड़ रोहिया तऽ डुमरीइक फूल निम्नर स्तमरक व्य क्तिक अभाव भेलापर कहल जाइछ।
राड़ लग्धीा छौ मास ने भेट क्षुद्र व्य थ्कसत कोनो-ने-कोनो बहन्ना् क’ कए अपन कर्तव्यससँ हटि जाइछ, तँ प्रयुक्तर।
रात निबद्ध दिनके छाया, कहे घाघ जे बरखा गाया रतिमे मेघहीन आकाश रहय तँ घाघक कथन छनि जे वर्षा समाप्तँ भ’ गेल।
राति कऽ बहु कामरू जाथि, दिन कऽ कउआ देखि डे‍राथि राति क’ स्त्रीा सर्वत्र भ्रमण करैछ, किन्तुव दिनमे ओ कौआ देखि क’ डेरयबाक अभिनय करैछ।
राति पराती भोर बसन्तस, एहन बुडि़क कतहु ने अन्तो मूर्ख रामिे पराती तथा भिनसरमे बसन्तय गबैछ तँ ओकर मूर्खतापर सब हँसैछ।
रातुक कागा दिनक सियार, की भरि बादर की उपतार राति क’ कौआ आ दिनमे गीदड़ बाजय तँ वर्षाक संग अन्ह ड़ आओत तकर संभावना।
राति सूतू दिन सूतू, बेर पाबू आर सूतू रातिदिन तथा जखन अवसर भेटैछ तखन सुतबाक उपक्रम कयनिहारपर व्यंखग्यआ।
रानीक ओढ़ना रघुताइनक गँरि बइठना रानी जकरा ओढ़ैत छथ तकरा रघुताइन अपन आसनक हेतु उपयोग करैछ।
रामक नाम परातक बेरा भिनसरमे रामक नाम लेबाक चाही।
राम कहय से धक्का पाबय, डाँड़ घुमाबए से टक्कास पाबय भगवानक नाम लैछ ओ सतत धक्का खाइछ, किन्तुक जे डाँड लचका क’ नाच करैछ ओ टाका पबैछ।
राम कहे हर गोएँड़ा बहे, चूल्हि खापडि़ सोझाँ रहे हरबाहक उक्ति अछि,’हर जँ घरक पाछूमे बहत तँ ओकरा पनछपिआइक चिन्ता नहि, कारण जाहि चूल्हिपर राटी पाकत वा जाहि खापडि़मे भूजा भूजल जायत ओ ओकरा आँखिक सोझाँमे रहत।
रामजी लक लक, सीता जी भोकना वर तँ दुब्बमर पातर अछि, किन्तुघ कनियाँ मोट-डाँट, तँ व्यंकग्यु।
रामधनी के कोन कमी, भगबा फाटे तना तनी जे राम नाममे सतत तल्ली न रहैछ तकरा समक्ष कोनो वस्तु क कखनो अभाव नहि रहैछ।
राम नाम कहबे तऽ कह पदनी के, नहि कहबे तऽ सुन पदनी के राम नाम कहबाक अछि तँ कहू अन्येथा हम जे राम जपैत छी तकरा सुनू।
राम नाममे आलसी भोजनमे तइयार रामक नाम लेबामे तँ आलस्यम होइत छनि, किन्तुा भोजनक हेतु सतत तत्पहर रहैछ।
राम मड़इया गहगह करे, चारू कोन दरब से भरे भीख माँगनिहार, साधु-सन्त एवं ब्राह्मण ककरोसँ कोनो वस्तु क प्राप्य्सन्र्थ सतत आशीर्वादक रूपमे प्रयोग करैछ, जे दाता धन-धान्य्सँ सम्प,न्ना रहथि।
राम मिलाए जोड़ी, एक आन्ह्र एक कोढ़ी राम नीक जोड़ी मिलौलनि, कारण एक आन्हनर अछि तँ दोसर कोढि़ ।
राम राम जपना, पराया माल अपना भगवत भजन क’ कए आनक सम्पपत्तिपर ध्या न देलापर व्यंआग्या।
रामो कहब आ कपड़ो उठायब भगवत भजनो करब आ निकृष्टव काज सेहो करब, तँ व्यंवग्यं।
राह बता तऽ आगाँ चल रस्तात देखैनिहारकेँ सतत आगाँ चलय पड़ैछ।
राहुक दाँत तर चन्द्र मा चन्द्रदमा सतत राहुसँ भयभीत रहैछ जे कखन ग्रास क’ जायत ।
रिन खयने की, खर तपने की ऋण खयलासँ वा खढ़क आगि तपलासँ क्षणिक सुखानुभूति होइछ।
रिन बिआय, पैंचे खियाय ऋण रूपमे देल टाकामे वृद्धि होइछ, मुदा पैंच रूपमे देल वस्तुव सर्वथा क्षीण भ’ जाइछ।
रुइए कि दुइए जाड़ मासमे दुइ वस्तुव विशेष आनन्दण दैछ, सिरक अथवा दुइ व्य्क्तिक एक संग सूतब।
रुपइया खरचब दू तीन चारि, कनियाँ ताकब खूब बिचारि जहिना रुपैया खर्च करबामे खूब सोच-विचार करबाक चाही तहिना कनियाँ खोजबामे अत्यचधिक विचार-विमर्श क’ निर्णय करबाक चाही।
रुपइया चिन्हीच बेर बेर, आदमी चिन्हीन एक्केा बेर रुपैया तँ बारबार चिन्ह ल जा सकैछ, मुदा आदमी तँ एक्केबबेर।
रुपइया तऽ सेख ने तऽ जोलहा संगमे रुपैया अछि तँ शेख बनल छी ने तँ जोलहा छी।
रुसने फुलने कोन फल पायब, इक्ख मारि पुनि रोटी खायब ककरोसँ अप्रसन्नख भेलासँ कोनो फल नहि भेटि सकैछ।
रूसल के बउसी ने, फाटल के सीबी ने, तऽ बढ़ले जाय अप्रसन्न व्य क्तिकेँ जँ प्रसन्नी नहि कयल जाय, जे वस्त्र फाटल अदि तकरा पुन: सिअल ने जाय तँ ओहिमे क्रमश: विकासे होइछ।
रूसल छी बइरागल छी सुनू मोरा सँइयाँ, बेगर बेगर सुतल छी चुत्तर एके ठइयाँ पत्नीब पतिकेँ संबोधित करैछ, ‘हम अहाँसँ अप्रसन्न‍ अर्थात् रुष्टर छी।
रूसल जमइया करताह की, धीया छोडि़ कऽ लेताह की जमाय अप्रसन्नत भ’ कए की करताह, बड़ बेसी करताह तँ हमर बेटी, जे हुनक पत्नी छथिीन तकरा ल’ जयताह।
रूसल बहुरिया डोम घर जाय कनियाँ जखन रुष्ट भ’ जाइछ तँ पड़ाक आनक घर चल जाइछ, तँ व्यंाग्यत।
रूसल बौसब बड़ परेआस रूसल व्यबक्तिकेँ मनायब बड़ कठिन काज थिक।
रोगक घर खाँसी, झगड़ाक घर हाँसी जहिना खोंकी सब रोगक जडि़ अछि तहिना हँसी-मजाक सब झगड़ाक जडि़ होइछ।
रोगिया बिआहलक बइदा भरोसे अपन रोगी ब बेटीक विवाह वैद्यक भरोसे क’ देलनि जे वैद्य उपचार करैत रहथिन।
रोटी खाइ सक्केर सऽ, दुनियाँ चले मक्क र सऽ रोटी गुड़क संग खयलापर नीक लगैछ, किन्तुं दुनियाँदारी चलैछ छल प्रपंचोपरान्त‍।
रोटी तऽ मोटी भला, जोड़ू तऽ छोटी भला रोटी मोट तथा पत्नीा छोअ खूटक नीक होइछ।
रोपि न काटिअ बिखहुक गाछ अपन लगाओल विषक गाछ सेहो नहि काटल जाइछ।
लंका गाँडि़ बनारस पीढ़ा देo गाया गाडि़ बनारस पीढ़ा
लंकामे बड़ छोट से उनचास हाथ लंकामे जे सबसँ छोअ वीर छल ओहो उनचास हाथक छल।
लँङटा नाचे फाटे की नाङट व्यचक्ति नाच करत तँ की फटतैक ?
लँगटा नाचे तीन बेरिया, अनगुत साँझ दुपहरिया लज्जािहीन व्य क्ति भिनसर, दुपहर आ साँझमे नित्यज हल्लार करैछ।
लँगड़ा लुल्हाा गेल बरियात, अगुआनीमे खयलक लात बरियातमे लाँङर एवं लुल्हि व्यझक्ति सब गेल छल तकर स्वाँगतक बदलामे ओतयसँ जुत्ता-लात खा क’ आयल।
लंगड़ी घोड़ी के मसुरी दाना अकार्यक घोड़ीकेँ मसुरी दाना खयबाक हेतु दैछ, जाहिसँ कोनो फल नहि भेटत।
लग मांडरि दूर पानि, दूर मांडरि लग पानि वर्षा हैत वा नहि तकर सूचना मांडरि भेटैछ।
लगमे कचहरी घूस दऽ कऽ बेगारी कचहरी लगहिमे अछि तँ घूस द’ कए ककरोसँ कार्य चलाओल जा सकैछ।
लगन बीत जायत, चकमक छूटि जायत जखन लगने बीत जायत तखन चकमक ल’ कए की करब? क्षणिक रंगमे आबि ओहिपर नितरौनिहारपर व्यंकग्य्।
लगमाक बेटी सऽ केहन ठट्ठा लगमा मिथिलाक एक गाम अछि।
लगहरि गाय के नौ बेर सानी लाभ देनिहारक स्वाेगत बेर-बेर कयल जाइछ।
लगहरि गाय के लथारो नीक जकरासँ लाभक आशा रहैछ तकर दुत्कारर सेहो सहल जा सकैछ।
लगे खूर पड़ोसे दाढ़ी दाढ़ीमे एकदिन छूरा लागि जायत तँ जनमबामे कतेक देरी लागत ? तात्पयर्य शीघ्रहि दाढ़ी भ’ जाइछ ।
लचारीक नाम बहरमचारी लाचारवस्था मे ब्रह्मचारी बनल छथि।
लछमी अबैत कतहु ने बेड़ संपत्ति कखन आओत से नहि जानल जा सकैछ।
लछमी अबैत कतहु ने बेड़ संपत्ति कखन आओत से नहि जानल जा सकैछ।
लछमीक बाहन उल्लूस लक्ष्‍मीक सवारी उल्लू थिक।
लछमी दरिदरा सहोदर लक्ष्मीि आ दरिद्रा दुनू एक दोसराक सहोदर छथि।
लछमी सऽ भेट ने दलिदर सऽ झगड़ा संपत्ति तँ छनि ने, मुदा दरिद्रासँ अकारण युद्ध ठननमे छथि।
लछिमिनि दया, तोँ कोना बुझलह हो भइया, ओलतीक खढ़ चढ़ल गोहइया, तेँ हम बुझलहुँ लछिमिनि दइया भाय अपन बहिनकेँ लक्ष्मीदक अवतार बुझैछ।
लज्जा। पछ मड़ुआ भच्छम इज्जात बचयबाक हेतु मड़ुआ खा क’ दिन बितायब, तँ प्रयुक्तआ।
लटकल चुचिया फलकल बूरि वृद्धावस्था पर व्यंरग्य ।
लटकल पगिया फरकल टीक, तखन बूझी भिटौताक थीक माथपर पाग फलकल तथा टीकक बोझक कारणेँ लोक बुझैछ जे भिटौता गामक रहनिहार थिकाह।
लटक भैंसुर देओर बरोबरि कमजोर भैंसुर देओर समान होइछ।
लड्डू लड़े तऽ झिल्लीा झड़े लड्डूकेँ एक दोसरासँ समीप भेलापर ओकर सब बुनियाँ झरि जाइछ।
लड़ ने जड़, कटहर तर घर कोनो सम्ब़न्ध नहि रहलापर प्रयुक्ति होइछ।
लड़ पड़ोसिया दीद रख स्त्री़ झगड़ा क’ कए पुन: एक भ’ जाइछ, तँ व्यंोग्यझ।
लडि़का खाइत खाइत बूढ़ भेलहुँ, लोक कहे बकडाइन पक्काक डाइनकेँ जखन लोक उपेक्षा करैछ, तँ व्यंाग्यइ।
लडि़का खाइत खाइत बूढ़ भेलहुँ, हमरे कहे डइनी बच्चाइ सभक जान लैत-लैत हम बूढ़ भ’ गेलहुँ तँ आब हमरे कहैछ डाइन।
लडि़का मालिक बूढ़ देबान, ममि ला उनटे साँझ बिहान घरक मालिक जँ बच्चाद हो तथा हुनक मन्त्रीि बूढ़ हो‍थि तँ निर्णय सतत परिवर्त्ति त होइत रहैछ।
लडि़का सिखबे बॅढ़ दादी के बच्चाा कोना बूढ़ दादीकेँ सिखा सकैछ ? अल्पाज्ञ व्यबक्ति अनुभवी व्यरक्तिकेँ शिक्षा दैछ, तँ व्यंसग्यव।
लड़े जड़े भरी छी, हकन्न नोरे कनै छी सन्ताजनक अभाव नहि छैक तथापि हकन्न कानि रहल अछि।
लड़े जोलहा फूले पयठान झगड़ा करैत अछि बेचारा जोलहा, किन्तु ओहिपर गर्व करैछ पैठान ।
लड़े फौज नाम सरदारक कार्य करैछ छोट श्रेणीक लोक, किन्तु यशक भागी होइछ ओकर सरदार,तँ व्यं्ग्य ।
लड़े सिपाही नाम हलदार के देo लड़े फौज नाम सरदार के
लड्डू लड़े झिल्लीड झरे, कायथ बेचारे के पेट भरे लड्डू-लड्डूक टकराहटमे बुनियाँ झरि जाइछ जाहिसँ कायस्थ क पेट भरि लाइछ।
लत्ता चोर पत्ता चोर नेढ़ा चोर चोर चौरकर्म छोट-छोट वस्तुोसँ प्रारंभ करैछ।
लत्ता ने कपड़ा, धरम के भतरा लत्ताक-कपड़ा किछु ने दैत छथि, तथापि स्वाामीकेँ सर्वस्वन मानैछ।
लदनी घोड़ीक मुलतानी लगाम घोड़ीपर मात्र लादैत छथि, मुदा लगाम लगौने छथि मुलतानी ।
लबड़ाक मउगति माघ मास लबड़ा व्यगक्तिक मृत्यु माघ मासमे होइछ।
लबड़ी लुच्ची‍क मारे, मासे मासे नूआ फारे लबड़ी मौगी डाँर लचका-लचका क’ मासे-मासे अपन सारी फारि लैछ, जे सर्वथा विश्वअसनीय नहि।
लबलब लबना बिचकाओल ठोर, लबना जैती देसक ओर कुमारि कन्या जँ बेसी लबलब बजैत अछि तथा बात बातपर ठोर बिचकबैत अछि तँ ओकर वियाह बहुत दूर क’ देल जाइत छैक जे कहिओ उपराग ने आबे।
लबर लबर करे झाड़ी, एको चाउर ने पड़े हाँड़ी अपना मने सब बातमे लबर-लबर कूदैछ-फनैछ, किन्तुब हाँड़ीमे एको टा चाउर नहि पड़ैछ।
लबर लबर तीन पसर सब बातक बीचमे टिप्प्णी अपन दैछ।
लबरोक बेटा उतपत नाम झूठ बजनिहार स्त्रीमकेँ बेटा भेल जकर नाम ओ उतपाती रखलक।
लमहर चोरी जीबक जंजाल पैघ व्यरक्तिक संग चोरि वा कपट व्यकवहार करब जीवक जंजाल भ’ जाइछ।
लम्बाी धोती मुहमे पान, धरक हाल गोसइयाँ जान अपने तँ पैघ धोती पहिरने छथि तथा मुहमे पान छनि, किन्तुा घरक जे हाल छनि ओ तँ भगवाने जनैत छथि।
लरिका लाथे लडि़कोरी जीये बच्चा क नामपर बच्चा्क माय जीवित रहैछ।
लरे जरे भरल छी, पानिमे तितइत छी सखा-सन्ताानक अभाव नहि अछि तथापि अपनाकेँ एकाकिनी बुझैछ।
ललइली गे ललइली, तोरा पितर के कनइली अतृप्तग व्युक्तिकेँ जँ कदाचित पितरक कनैली भेटि जाइछ तँ ओ तृप्त् भ’ जाइछ।
ललकारे कुकूर सिकार करे ललकारा देलापर कुकूर शिकार नहि पकडि़ सकैछ।
ललायल अतमा कलायल अतमा, जमायक अँइठ खयलहुँ भरि अतमा भोजनाभावमे मन तँ सतत अतृप्तह छल।
लस्कारमे ऊँट बदनाम बेसी व्य‍क्तिक बीच जँ कोनो कार्यमे व्यीवधान भ’ जाइछ तँ पैघ जाइछ तँ पैघ व्यीक्तिकेँ अयश होइछ, तँ व्यंछग्यल।
लस्साव लगा कऽ बक टिटिआइए कार्यावस्थाममे व्य वधान उपस्थित क’ कए आनन्दा लेनिहारपर व्यं‍ग्य्।
लहंगा लाडि़ला सदा सुखी जकरा आगाँ-पाछाँ क्योय ने रहैछ ओ अत्य न्तप सुखी रहैछ।
लहनाक पूत तगादा ऋण लेबामे जे लाभ होइछ तकर तगादा सेहो संगे-संग आबि जाइछ।
लाउ टाका मारू फक्का द्रव्योापार्जनोपरान्तछ क्यो मनोवांछित फल प्राप्तिक आशा क’ सकैछ।
लाख जाय मुदा साख ने जाय लाख टाका चल जाय अर्थात् कोनो कार्यमे घाटा किएक ने लागि जाय ओ स्वी कार्य, मुदा साख चल गेलापर लोक कोनो ठामक ने रहैछ।
लाख टाकाक बात उचित बात कहलापर कहल जाइछ।
लाख रुपइया धनिकक घरमे, ने तऽ लबड़ाक मुहमे टाका पैसाक आधिक्यघ तँ धनिकेक घरमे भ’ सकैछ अथवा लबड़ाक मुहमे।
लागल खेती गाभिन गाय, तब बुझि जब मुहमे जाय खेतमे लागल अन्नय तथा गाभिन गायपर तखने विश्वाास करबाक चाही जखन अन्नप अपन घरमे आबि जाय तथा गाय बच्चा द’ कए दूध देब प्रारंभ करैछ।
लाचार के कोन विचार असमर्थ व्योक्तिक आचार-विचार सब समाप्त भ’ जाइछ।
लाज बीज धोकड़ी, मोर नाम सधुकरी लाज वा तँ धो देलहुँ वा अपन धोकरीमे राखि देलहुँ तथा अपन नाम साधु राखि लेलहुँ।
लाज ने सरम, सउँसे देह गरम जकरा अपन इज्जथति-आबरूक कोनो ख्यााल नहि अछि ओ अधलाह कर्म करबामे ककरोसँ संकोच नहि करैछ।
लाज हजूर झात की जखन सोझाँ अयबाक अछि तखन पुन: संकोच कोन बातक?
लाजू मरे, ढीठू जीये संकोची व्यबक्तिकेँ डेग-डेगपर हानि उठाबय पड़ैछ तथा तकर विपरीत धृष्टे व्येक्ति सतत मौज करैछ।
लाजू मुइला, ढीठू जीला लज्जामशील व्यधक्तिक मृत्यु भ’ जाइछ, किन्तुु जे ढीठ अछि ओ अधलाहो कार्य कयलापर जीवित रहैछ।
लाजू लाज अइसन, बीबी काठ अइसन पति तँ लज्जानक प्रतिरूप छथि, किन्तुड पत्नीँ निर्लज्ज ।
लाजे भाबो बाजे ने, पतित भइँसुर छोड़य ने संकोचवश छोट भायक पत्नीर अर्थात् भावो किछु ने बजैछ, किन्तुि पतित भैंसुर हुनका नहि छोड़ैछ।
लाजे भाबो बोले ने, निरलज्जअ भँइसुर छोड़य ने संकोचवश छोट भायक पत्नीत अर्थात् भावो किछु ने बजैछ, किन्तुथ पतित भैंसुर हुनका नहि छोड़ैछ।
लाजे भाबो बोले ने, निरलज्जा भँइसुर छोड़े ने संकोचवश भावो एकोशब्द, नहि बजैछ, किन्तुश भैंसुर एहन निर्लज्जब छथि जे बाज नहि अबैछ।
लाजे ने लजैलनि, मउगो खीर माँगलनि झोर लज्जान नहि होइत छनि जे झोरक बदलामे हमरासँ खीरक याचना करैत छथि।
लाजो के कात कयलहुँ बाजहु तऽ दिअ, टाटो के कात कयलहुँ देखहु तऽ दिअ लाजक परित्याकग कयल तँ हमरा बजबाक अवसर तँ दिअ।
लाठीक मारल काने, देबताक सूते लाठीक मारिक अपेक्षा दैवक डाङ कष्टककर होइछ।
लाठी हाथे मालगुजारी बेमाक बल प्रयोग द्वारा कोनो काय्र अथवा मालगुजारी वसूल कयल जाइछ।
लाढ़ो धीया लाढ़ करे, आंगुर काटि कऽ घाओ करे अत्यकधिक दुलारु बेटी अपन आंगुर जानि क’ काटि क’ घाव करैछ।
लातक देबता कतहु बात सुने लात खैनिहार देवता‍क कतबो स्तु ति कयल जाय, किन्तुन ओ किछु ने सुनैछ ।
लादि दऽ लदा दऽ, लादनपुर पहुँचा दऽ क्यो ककरो कहैछ, ‘हमरा धनसँ लादि दिअ, लादयमे सहायता करू तथा लादनपुर सेहो पहुँचा दिअ।‘
लादि दहुन लदा दहुन, घर धरि पहुँचा दहुन देo लादि दऽ लदा दऽ लादनपुर पहुँचा दऽ
लादू साहुक बेटा पादू साहु, छओ मन लाबे नओ मन तउलाबे लादू साहुक पुत्र पादू साहु छथि जे छौ मन अनैत छथि कीन क’, किन्तुे ओकरा नौ मनक हिसाबेँ बेचैत छथि।
लापट सापट हर बहे, मोर बरदा बइसले रहे जँ छोट खूटक बड़दसँ हर जोतबाक कार्य सम्पोन्नस भ’ जाइछ तँ पैघ बड़दक कोनो प्रयोजन नहि रहि जाइछ।
लाभक लागि मूल डूबि गेल लाभक संभावनामे मूलधन सेहो डूबि जाइछ।
लालचबस परलोक नसाय अत्यबधिक लोभ कयलासँ मनुष्यजक परलोक सेहो बिगडि़ जाइछ।
लाल नुआ नौ दिन, लुगरी बीस दिन नव वस्त्रौ थोड़बहि दिन नीक लगैछ, मुदा जखन ओ पुरान भ’ जाइछ तँ ओ वर्ष दिन धरि चलैछ।
लाल पइसा तऽ रोदना कइसा पैसाक बलपर अप्राप्यइ वस्‍तु सेहो प्राइज़ भ6 जाइछ।
लाल पियअर जँ होय अकास, तब बरसा के ने आस वर्षा ऋतुमे जँ अकाश लाल पीअर भ’ जाइछ, तँ बुझबाक चाही जे एहि वषा्र नहि हैत ।
लाल बाबाजी लाले लाल, चउदह पूरी एके गाल लाल वस्त्र धारी बाबाजी एतेक बेसी खाधुर होइछ जे चौदह पूरी एकहि बेर एक कओरमे खा जाइछ।
लाल बाबाजी लाले लाल, बहु मारलकनि गाले गाल लाल वस्त्र धारी बाबाजीक पत्नीर हुनका दुनू गालपर प्रहार कयलकनि।
लाल बुझक्काड़ बुझि गेल, आर ने बुझलक केओ जे किछु ने बुझैछ, किन्तुत दाबी करैछ जे बड़ बेसी हम जनैत छी।
लाल मिरचाइ बड़ करू मिरचाइक करू हैब स्वा भाविक गुण थिक, किन्तुक लाल रंगक मिरचाइ आर बेसी करू होइछ।
लाह लटबा तीन पटबा अभिधेयार्थ स्पटष्ट अछि।
लिखतमक आगाँ बकतम की जे वस्तुग लिपिबद्ध अछि तकरा अगाँ थोथीक कोनो प्रयोजन नहि होइछ।
लिखलाहा नहि टरय जे भाग्यनमे लिखल अछि ओ कहियो नहि टरैत अछि।
लिख लोढ़ा पर पाथर निरक्षर भट्टाचार्य व्यखक्तिक प्रसंग कहल जाइछ।
लिखे ने पढ़े नाम मोहमद फाजिल लिखल पढ़ल किछु नहि तथापि अपनाकेँ विद्वान कहैछ, तँ व्यंँग्य ।
लिखे मूसा पढ़े ईसा लिखैत छथि मूस सदृश अर्थात् अक्षर भ्रष्ट् छनि तेँ एहन लिखबटकेँ भगवाने पढि़ सकैछ।
लिलार बड़ सरदार के, गोड़ बर गमार के पैघ ललाटवला व्य क्ति अत्यडधिक भाग्यछवान होइछ, किन्तुग जकर पैर बड़ पैघ होइछ ओ निश्चलये पैघ मूर्ख होइछ।
लीक लीक गाड़ी चले लीके चले कपूत, तीन लीकपर ना चले सुरमा सती सपूत गाड़ी एवं कुपुत्र लीकपर चलैछ, किन्तुन जे वीर अछि, जे सपूत अछि आ सती अछि ओ अपन इच्छाुनुसारेँ चलैछ।
ली बकरी ली, अपन खाइ छी, अनका की बकरीकेँ संबोधित क’ क्योछ कहैछ, ‘हम अपन खा रहल छी अहाँकेँ ताहिसँ कोन प्रयोजन ? आनकेँ खाइत-पीबैत देखि बजनिहारपर व्यंअग्यन।
लुआठ के मारल कुकूर, लौका देख पराय जरल जारनिसँ मारल गेल कूकूर बिजलीक चमक देखि पड़ा जाइछ।
लुखी मारे दुखी, कउआ मारे सुखी किंवदन्ती अछि, ‘लुखीकेँ मारलासँ लोक दु:खी भ’ जाइछ, किन्तुर कौआकेँ मारलासँ सुखी।
लुच्चा मारलक बटेर, नओ मन गदरी सौ मन तेल लुच्चा अर्थात् झुट्ठा व्याक्ति एक बटैर मारलक जाहिमे नौ मन गदरी बहरायल तथा सौ मन तेल।
लुच्चा मारलक बेंग, सौ सो पसेरीक एक एक टाँग कोनो झुठ्ठा एक बेंग मारलक जकर एक-एकटा टाँग सौ-सौ पसेरीक छलैक।
लुच्चाा बनि कऽ बंगला बाल बढ़ौने छल, तेल ने भेटे तऽ पानी सऽ चिकनौने छल अवारा बनि क’ बंगाली सदृश पैघ-पैघ केश बढ़ौने छल तथा तेलक अभावमे ओकरा पानिसँ चिक्कान कयने छल।
लुब लुब करे बुहरियाक जीउ, कखन जायत सासु जे चाटब घीउ जीवलाहि स्त्रीा सतत प्रयत्नकशील रहैछ जे सासु कखन कतहु चल जयतीह अर्थात घरसँ बाहर जयतीह, जे हम सब घी चाटि जायब।
लूच गाँडि़ फूच, बानर गाँडि़ झउआ मूर्ख व्य़कित कनियेमे अगराय लगैछ, तँ प्रयुक्तय।
लूट अछि कि भोज अछि एतय लूट भ’ रहल अछि अथवा भोजक आयोजन अछि ? असंतुष्ट व्य क्तिक उक्ति।
लुटमे चरखा नफा लूट भ’ रहल छल जाहिमे हम चर्खा लूटल।
लूटि लाबऽ कूटि खा लूटिका आनल वस्तुा कूटि क’ खाइछ।
लूरि ने उरि चल मियाँ जगदीसपुर कोनो वस्तु क तँ ज्ञान नहि छनि, मुदा जगदीशपुर जयबाक सोचि रहल छथि।
लूरि ने बुद्धि भथिहान धऽ कऽ चूर ने तँ कोनो वस्तुथक लूरि छनि ने बुद्धि मुदा बल प्रयोग द्वारा सब कार्य करबाक क्षमता प्रदर्शित करैछ।
लूरि ने भास, तऽ दैबक तरास अपना तँ कोनो कार्यक ढंग नहि छनि, किन्तुँ ओकर दोषारोपण करैत छथि, विधातापर।
लेंगरा रे घोड़ापर चढ़बें, हम दुनू टाँग अलगौने छी कोनो नाङरसँ क्यो पुछलक, ‘घोड़ापर चढ़बेँ ?’ नाङर एहिपर उत्तर देलक, ‘हम तँ अपन दुनु पैर अलगौने छी।‘
लेखे जोखे थाहे, लडि़का बुडलन काहे हिसाब-किताबमे साधारण छल तेँ बच्चान कोना डूबि गेल ? कथा अछि जे एक बेर कायस्थू अपन बेटाक यात्रापर रहथि।
ले जनकपुर छोड़ जान जनकपुर ल’ कए हमर जान छोडि़ दिअ।
लेब एक ने देब दू हम एक लेब ने तँ किएक देब दू।
लेब देब साढ़े बाइस, भरि ठेहुन जमऔरा लेन-देन तँ किछु ने छनि, मुदा जमा रहल छथि बड़ बेसी।
लेर छोट तोर, धिया गाहे मोर बच्चाो तँ आनक छैक, किन्तुज ओकर देखभाल हमरा करय पड़ैछ।
लेलहिओ तऽ माइये, तेलहिओ तऽ मिठाइये जँ लेलाहिओ अर्थात् मुर्खो रहैछ तँ ओ माइए कहबैछ, तहिना तेलोमे बनल रहैछ ताहिसँ की ओ तँ मधुरे कहाओत।
ले लुगरिया चल डुमरिया अपन नुआ ल’ कए डुमरी गामक हेतु प्रस्था न कयलक।
ले हींग उधारी, बैसाख के करारी वैशाख मासक करारपर हींग उधार लेल गेल।
लोआ पोआ बैल करी, साहू करी भारी कम वयसक बड़द कीनब उचित तथा महाजन भारी करबाक चाही।
लोक चोराबे नरिये नरिये, खुदा चोराबे एक्केो बेरिये लोक जखन शनै:-शनै: चोरि करैछ तकर अन्दाखज शीघ्रतासँ नहि अबैछ, किन्तुै भगवान तँ एकहि बेर सब वस्तुनक हरण क’ लैछ तखन लोक हाकरोस करैछ।
लोकनियाँक पैर जतने ससुरा बास संगमे जे नउड़ी आयल अछि तकर पैर जाँतलासँ सासुरमे बास भ’ सकैछ।
लोक पतित की बंस पतित व्यतक्ति पतित भ’ जाइछ ने कि ओकर वंश।
लोभहि पतन कहय संसार विश्व विदित अछि जे लोभ नाशक जडि़ थिक।
लोभीक घरक उपास लोभीक ओतय सतत उपवासेक संभावना रहैछ।
लोभीक गाममे ठक दऽ उपास
लोभीक गाममे उपवास करय पड़ैछ।
लोभीक गाँडि़ कुत्ता चाटे लोभी प्रकृतिक व्यतक्तिक गाँडि़ कुकूर सतत चाटि जाइछ।
लोभीक गाममे ठक उपास लोभीक गाममे उपासले रहल।
लोभी गुरू लालची चेला, दुनू नरकमे ठेलमठेला गुरु एवं शिष्यी दुनूक लोभी भेलापर दुनू नर्कमे धक्का् खाइछ।
लोभी चाटे पापीक गाँडि़ लोभी व्येक्ति पापी व्यभक्तिक गाँडि़ चटबाक हेतु तत्प र रहैछ।
लोहारक कुच्चीी आगि पानि दुनू मे लोहारक कुच्चीी आगि एवं पानि दुनूमे समान रूपेँ कार्य करैछ।
लोहा के लोहे काटैछ जे जेहन रहैछ तकर विनाश ओहने व्यपक्ति करैछ, तँ प्रयुक्त ।
लोहे लोह धराबी जे जेहन रहैछ तकर विनाश ओहने व्यपक्ति करैछ, तँ प्रयुक्त ।
लोहे लोह धराबी लोहाक सहायतासँ लोहा नीक जकाँ पकड़ल जाइछ।
लौड़ा देखने हुलकल जाय, बुरि देखने भागल जाय दुश्चजरित्र व्यककितपर व्यंाग्यब।
संख बाजे बलाय भागे शंखक पवित्र ध्वानि सुनि दु:खन-दारिद्रय पड़ा जाइत अछि।
संख बाजे बलाय भागे, धिया पूता के रोजी जागे शंखक पवित्र ध्वेनि सुनि दीनता पड़ा जाइछ।
संख बाजे बलाय भागे, मुद्दइकमुह कारिख लागे शंख-ध्वानिक फलस्वदरूप दुष्टइ दुश्मयनक मुहमे कारिख लागि जाइत अछि।
संख भरोसे घोंघा चुत्तर टेढ़ कयलक शंख बनबाक आशामे घोंघा अपन चुत्तरकेँ टेढ़ क’ लेलक।
संगक सुख बनारस जाय नीक व्यखक्तिक संपर्कक फलस्व रूप सुख-सुविधाक प्राप्तियर्थ लोक बनारस पर्यन्तक चल जाइछ।
संगत ने करी तीन सऽ, नाबालिग मोसमात मतिहीन सऽ नावालिग, मोसमात एवं मतिहीन व्योक्तिसँ संगत नहि करबाक चाही।
संग गुने सासन संगतिक अनुरूप लोककेँ शासन पड़ैछ।
संग घोड़ा पैदल चले तीर चलाबे बीन, थाती धरे जमाय घर जगमे भकुआ तीन संगमे घोड़ा रहैत पैछल चलनिहार, युद्ध-स्थमलमे चुनि-चुनि क’ तीर चलौनिहार तथा जमायक ओतय अपन संचित पूँजी रखनिहार व्यपक्ति मूर्ख कहबैछ।
संगे बिआह भेल संगे संगे गौना, सब के धिआपूता हमर साँय बौना सब सखी बहिनपाक संगहि-संग विवाह भेल, सभक द्विरगमन भेलैक, सभकेँ धिआपूता भेलैक, मुदा हमर स्वा मी किएक किएक बौना बनि गेलाह ? कोनो कारणेँ ककरोसँ पाछाँ रहि गेलापर एहन कहल जाइछ।
संगे संगे गाय चलरौलहुँ, किसुनमा भेल गोसाँइ एक संगहि सब काज कयलो उत्तर क्योि पैघ भ’ जाइछ, तँ प्रयुक्तु।
संतोखक गाछमे मेबा संतोष कयलापर मेवा सदृश फल प्राप्ति होइछ।
संधि ने बिगरे बिगरे दुरमतिया मेल रखलासँ कार्य होइछ, मुदा अधलाह बुद्धि भेलासँ सब कार्य समाप्तब भ’ जाइछ।
संपतक बहिन, बिपतक इयार धन-धान्य सँ सम्पान्नु रहला उत्र बहिनसंग दैछ अन्य-था नहि, किन्तु् वास्तलविक मित्र विपत्ति उपस्थित भेलोपर समान रूपेँ सहायक होइछ।
संपत्तिक सिंगार, बिपतिक इयार आभूषण सम्पिन्न,ताक स्थितिमे श्रृंगार-प्रसाधन जाइछ, किन्तुा विपत्तिक स्थितिमे ओकरा बेचि क’ लोकगुजर करैछ।
संभरने सपूत, बिगड़ने कपूत काज सम्हिरि गेल तँ सपूत कहौलनि आ जँ काज गिडि़ गेल तँ ओ कपूत भेलाह।
संयोगक अन्ते बियोग संयोगक पश्चालत् वियोग हैब स्वाआभाविक।
सँइयाँक अरजल भइयाक नाम, लाह लहठीा मुंगेरिया नाम पत्नीँकेँ स्वायमी लाहक लहठी मुंगेरसँ आनि क’ देलनि, किन्‍तु ओ पतिक नाम नहि ल’ अपन अपन भायक नाम लैछ आ कहैछ, हमरा भाय आनि क’ देलनि अछि।
सँइयाँक टिकुली भइयाक नाम, से पहिर हम सासुर जायब टिकुली तँ पति आनि क’ देलथि, किन्तुन सासुर जयबाक काल ओ पतिक नाम नहि लए भायक नाम लैछ।
सँइयाँ भेल कोतबाल, आब डर कथिेक जखन स्वाेमी कोतवाल भ’ गेलाह तँ डर कोनो नहि।
सँइयाँ भेल कोतबाल, आब हम नाङटे सूतब देo सँइया भेल कोतबाल, आब डर कथिक
सँइयाँ मीठ बेटा मीठ, किरिया ककर खाउ प्रत्येमक स्त्री क हेतु स्वाखमी एवं पुत्र दुनू समान रूपेँ प्रिय होइछ, तँ ओकरा समक्ष्‍ समस्याूउ भ’ जाइछ जेओ किरिया अर्थात् शपथ ककर खाथि।
सँउसे खीरा खा कऽ पेनी तीत खीरा तँ संपूर्ण खा गेलाह, किन्तुक ओकर अन्त मे तीत लागय लगलनि।
सउँसे गामक जोतनियाँ, तनिका डारडोरि ने संपूर्ण गामक जमीन जोतनिहार छथि, किन्तुण डाँरमे डाँराडोरि पर्यन्ता नहि छनि।
सउँसे रामायन पढि़ गेलहुँ, सीता ककर बहु संपूर्ण रामायणक अध्यलयनोपरान्तत ई नहि जानकारी भेज जे सीता ककर पत्नीय छथिन।
सउँसे हाथ मेहदी, तऽ काज के करत संपूर्ण हाथमे मेहदी छनि, तँ काज के करत ? बेकार बैसनिहारपर व्यं ग्यज।
सउखिन खबइया बूट के दालि खैबा-पीबामे सौखीन छथि तँ बूटक दालि बेसी पसिंद करैछ, कारण ओकर विभिन्नट साम्रगी बनाओल जाइछ।
सउखिन चढ़बइया के, पालकीमे बोरसी सवारी कयनिहार शौकनि छथि तेँ पालकी पर्यन्तयपर बोरसि रखने रहैछ।
सउखिन बिलाइ के, चटाइक लहंगा देo सउखिन बहुरिया के चढाइक लहंगा
सउखिन बहुरिया, चटाइ के लहंगा कनियाँ शौकीन छथिट तेँ चटाइकेँ अपन सारी बनौने छथि।
सउखिन बुढि़या के, कम्बथल चोली बुढि़या शौकीन अछि तेँ कम्बालक चोली पहिरने अछि।
सउखिन बुढि़या, पालकीपर बोरसी देo सउखिन चढ़बइया के, पालकीपर बोरसी
सउतिनक खुसामदे ससुरा बास सौतिनक खुशामद कयलासँ सासुरमे बास भ’ सकैछ अन्यसथा नहि।
सउतिनक बेटी ओलक टोटी, बिकती तऽ बिकती ने तऽ गन्हैोती सौतिनक बेटी ओलक टोटीक समान होइछ।
सउतिन कमे बात ने रखैत छी टाँग करैत छी सौतिनपर विश्वानस नहि क’ हुनका आर अधलाह कर्म करबाक प्रेरणा दैत छी।
सउतिन सऽ खटपट, साउस बदनाम झगड़ा तँ भ’ रहल छनि सौतिनक संग, मुदा बदनाम भ’ रहल छथि बेचारी सासु।
सए चोट सोनारक, एक चोट लोहारक सोनार सौ चोट मारैछ, किन्तु लोहार एकहि चोटमे काज करैछ।
सए सोन सऽ एक गोत अनेक वस्तुएक संयोगसँ जखन एके वस्तुस बनैछ तखन प्रयुक्तु।
सकल सूरत लंगूरक, एक नाङरिक कमी मुह-कान तॅं लंगूरक समान छनि, मुरदा कमी रहि गेलनि एक ना‍ङिरकङ
सखक सधोरि बंगोरा के फुइट शौक भेलनि जे सधोरि पठाबी, मुदा एकरा हेतु श्रम के करत ? आलसी व्य कित्कर कार्य व्युवहारपर व्यं?ग्यवङ
सखी के भखी, केओ केओ लखी कोनो स्त्रीे कहैछ जे हमर सखीक भाषा क्यो नहि जानि सकैछङ
सखी सरौता पोखरि खुनौता, सखी के ढीर भेलनि हमरो पड़ल नौता एक स्त्री कहलक ‘हमर सखी पोखरि खुना रहल छथिङ
सगर गाँओ ओझा, चलब ककरा सोझाँ संपूर्ण गाममे तँ ओझे पसरल छथि तँ ककरा सोझाँ द’ कए हम चलब।
सगर तलाबमे एकटा पोठी एक मात्र संतान रहलापर कहल जाइछ।
सगरे गाम परायल जाय, धूरा बहु कहे माँग टीके दे समग्र गाम कोनो भीषण विभीषिकासँ भागि रहल अछि, किन्तुक धूराक पत्नीा कहैछ हमरा साज-श्रृंगार करय दिअ।
सगरे फौजमे ऊँट बदनाम ऊँटक ऊँच गर्दनिक कारणेँ दुश्मदनकेँ अनुमान भ’ जाइछ।
सगरो समइया सेबल कासी, मरे बेर आगि ने काठी संपूर्ण जीवन काशीमे व्ती, शत कयल, किन्तु मुइलापर आगि एवं काठी पर्यन्त‍ नहि उपलब्धर होइछ।
सग्गोध मग्गो मोटे मोटे अल्हुलआ घूरामे गेल, धियापूताक मोन तिरपित भेल सग्गोध-मग्गो मोट-मोट अल्हुेआकेँ पका क’ धियापूताक अतृप्तध आत्मािक क्षुधाके शान्तट कयलनि।
सजमनिपर सितुआ चोख सजमनि सुकुमार अछि तेँ ओहिपर सितुआ आसानीसँ काज करैछ।
सजज्नस बइसे आठ तइयो ने टूटे खाट, दुरजन बइसे एक टूटे खाट अनेक खाटपर सज्ज न आठ व्येक्ति बैसैछ तथापि ओ नहि टुटैछ, किन्तुट एको दुर्जन व्युक्ति जँ खाटपर बैसैछ तँ ओ शीघ्रहि टूटि जाइछ।
सज्जरन के बात बातमे बात, केरा के पात पातमे पात जहिना केराक पातमे तहपर तह रहैछ तहिना सज्न् व्यिक्तिकबातक तहमे गूढार्थ रहैछ।
सट्टा तऽ पट्टा किंवदन्तीप अछि जे साठि वर्षक अवस्थात धरि लोक शक्तिसँ संपन्न रहैछ।
सठियेला बहतरेला, सभक पैंच बिसरेला साठि वर्षक भेलाक पश्चा त् लोकक बुद्धि अकार्यक भ’ जाइछ तेँ ओसब बात बि‍सरि जाइछ।
सड़ल गाय बाभन के दान गाय अकार्यक छल तेँ ओकरा ब्राह्मणकेँ दान द’ देल।
सड़ल घोड़ी के लाल लगाम यद्यपि घोड़ी तँ सड़ल अछि तथापि ओकरा ललका लगाम लगौने छी।
सड़लो भुन्नाौ, तऽ रहुक दुन्ना भुन्नाभ माछ जँ सड़लो रहैछ तथापि ओकर स्वानद रहु माछक अपेक्षा दुगुणित रहैछ।
सडि़ गलि जायत गोतिया ने खायत, गोतियाक खायल अकारथ जायत खादय पदार्थ सडि़ रहल अछि, किन्तुत ओकरा अपन सर-संबंधीक नहि खाय दैछ, कारण दर-देयादक खायल तँ अकारथ चल जायत।
सड़ी बुढि़या पड़ी है, दुनकीमे दम है वृद्धा तँ मरनासन्ना अवस्था,मे पड़ल छथि, किन्तु दम नहि बहार भ’ रहल छनि।
सत कहे से मारल जाय जे सत्यस बजैछ ओ मारि खाइछ।
सत के सोर पताल सत्ये अत्यबन्ति व्यालपक अछि तेँ ओकर जडि़ पताल धरि चल जाइछ।
सतबादी धक्काि खाय, चाटुकारी सम्माेन पाय सत्यदवादी व्याक्तिक सतत एम्हुर-ओम्हपर धक्काी खाइछ, किन्तु जे खुशामदी अछि ओ सतत सम्मा्न पबैछ, कारण सत्यु कटु होइछ आ चाटुकारिता मीठ।
सतबा मतारी तिलकोर के तरकारी, कनी दीहे गे मतारी सतमाय अपन बेटा-बेटी केँ तिलकोरक तरकारी मंगलोपर देबाक हेतु प्रस्तुकत नहि रहैछ।
सतभतरी के पूछ कहाँ सात पति स्त्रीककेँ क्योप नहि पुछैछ।
सतभतरी के लाज बड़, छिनरी के बात बड़ चरित्रहीन स्त्री केँ लज्जा अत्यपधिक होइछ तथा ओ बात बनयबामे सेहो अत्य न्तज पटु होइछ।
सतमाय कारने बादी बाप सतमायक कारणेँ पिता सेहो दुश्मजन भ’ जाइछ।
सती सोबरना, बूरि बरबरना सती नारी सोबरना सदृश पवित्र अछि, किन्तुर एक वस्तुि एहन अछि जकरा प्रसंगमे विश्वाएस नहि कयल जा सकैछ।
सतुआक पेट सोहारी से भरी जे सातु खैनिहार अछि ओ सोहारीसँ कोना पेट भरि सकैछ? खाधुर व्यनक्ति अल्पमभोजी नहि भ’ सकैछ।
सतुआ तऽ लतुआ घोरबह तऽ खैबह, तऽ जयबह झटपट खाना घीउ खिचरी दुइ बटोही एक स्थाउनपर ठहरल छल।
सतुआ सम्म रि बान्हि कऽ सब वस्तुमक संग पाछाँ पडि़ गेलापर कहल जाइछ।
सत्तर चूहा खा कऽ, बिलाइ चलल हज कऽ सत्तरि मूसक भोजनोपरान्त बिलाइ आब घोषणा कयलक जे हम हज करबाक हेतु जा रहल छी।
सदा दिबाली संत घर सन्तदक घर सदैव दीपावली अर्थात् आनन्दो रहैछ।
सनमुख छीके दुन्ना लाभ यात्राक समय जँ क्योद छीक दैछ तँ ओहिसँ दूगुणा लाभक संभावना रहैछ।
सनमुख छीके दोबर लाभ देo सनमुख छीके दुन्नाछ लाभ
सनि अढ़ाइ मंगल तीन, रबि के बरखा आठो दिन शनि दिनसँ प्रारंभ भेल वर्षा अढ़ाइ दिन, मंगल दिनसँ प्रारंभ भेल तीन दिन तथा रवि दिनसँ प्रारंभ भेल वर्षा आठो दिन धरि समान रूपेँ चलैछ।
सनेस ने बारी, ढेकार बर भारी पाहुनक पदार्पणपर सनेसक अपेक्षा सब करैछ।
सन्दू कक बलपर खून रुपैयाक बलपर अपराध करब, तँ व्यं ग्य ।
सपना देखि रहिये गोय, अपना देखि अनका होय स्वाप्नग देखि क’ ककरो नहि कहबाक चाही, कारण विषयमे देखल स्व‍प्नअक प्रभाव दोसरापर पड़ैछ।
सब कऽ कऽ पेनी तीत सब प्रकारेँ नीक कयनिहार व्येक्ति द्वारा जँ कोनो कारणेँ अन्तकमे अनिष्टन भ’ जाइछ, तँ कहल जाइछ।
सबक धिया सासुर गेल, मोरा लेखे चइत पडि़ गेल सभक बेटी सासुर गेल, किन्तुे हमर बेटीक सासुर जयबाक अवसर आयल तँ चैत (खड़मास) पडि़ गेल।
सब काज दाइ के, नाम भउजाइ के सब काज तँ कयलनि दाइ, मुदा नाम लगाओल गेलनि भौजाइक ।
सब काल दाइ, भोज काल छिनारि सब समय बेटी कहि क’ सम्मालन देलनि, मुदा जखन भोजक अवसर आयल तखन छिनारि कहि क’ फटकारि देल गेलनि।
सब किछु देत मुदा धिया के नाक के देत बेटीकेँ सब किछु देल जा सकैछ, मुदा हुनका नाक ने छनि से के देत ? कुरूप व्यकक्तिक स्व रूपपर व्यंिग्या।
सब किछु लऽ गेल, फदकी दऽ गेल सब वस्तुल तँ अपवना संगे नेने गेलाह, मुदा निरर्थक बजबाक बिमारी देने गेलाह।
सब कुकुर कासी जायत, तऽ पात के चाटत देo सब कुकूर गंगा नहायत, तऽ हाँड़ी के ढूँढ़त
सब कुकूर कासी जायत, तऽ हाँड़ी के खोखरत सब कुकूर काशी चल जायत तँ हाँड़ीमे मुह देबाक कार्य के करत ? पैघक समान देखी- देखी कयनिहारक प्रयासपर व्यंँग्यस।
सब कुकूर गंगा नहायत, तऽ हाँड़ी के ढूँढ़त कुकूर जँ गंगा नहा क’ पवित्र बनि जायत तँ हाँड़ीमे मुह देबाक कार्य के करत ? तुo सब कुकुर कासी जायत, तऽ हाँड़ी के खोखरत
सब के गोर धोहिहेँ चेरिया, अपना बेर लजइहें नउड़ी तँ सभक पैर पकड़ैत-पकड़ैत दिन बितबैछ, मुदा जखन अपन अवसर अबैछ तखन लजा क’ रहि जाइछ।
सब के दबाइ अछि, सुभाबक नइ अछि दुनियाँमे जतेक रोग-व्याबधि अछि तकर उपचारक औषध अछि, मुदा स्व‍भावक कोनो नहि ।
सब के दुअरिया गोपी चन्द माँगि चाँगि खइहऽ, बहिनी दुअरिया मति जइहऽ गोपीचद सभक दरबाजा जा क’ खाइत छथि अर्थात् निर्वाह करैछ, मुदा बहिनक दुआरिपर नहि जाइत छथि।
सब के नाक काटलक बइगन के भरिता जतेक खाद्य विन्याइस भेल छल ताहिमे सभक काटि लेलक भाँटाक चोखा।
सब के पाँडे बुंद्धि देल, अपना बेर ढिलमिलिया गेल पंडित जी सबकेँ विपत्ति कालमे उचित बुद्धिक बतौलनि, किन्तुच बेरमे बुद्धि भ्रष्टू भ’ गेलनि।
सब के बटइ छी, आ हमरा डँटइ छी सभकेँ अपन धन बाँटि रहल छी, किन्तु हम जखन माँगैत छी तखन डाँटि दैत छी।
सब के भेल बिआह, बउका करहल कुमार गामक सभक विवाह भ’ गेल, किन्तु बौका नामक व्य क्ति विशेष कुमारे रहि गेल।
सब के सब धन्धा , लाड़ो के भतारक चिन्तास प्रत्येबक व्यतक्ति वविध वस्तु क चर्चा करैछ, मुदा लाड़ो (व्यँक्ति विशेष) अपन स्वाैमीक अतिरिक्त़ आन कोनो वस्तुतक चर्चा नहि करैछ।
सब गुनक आगर धिया, नाक बिना बेहाल सब प्रकारक गुणसँ परिपूर्ण छ‍थि, मुदा नाक नहि छनि तँ कुरूप लागि रहल छथि।
सब गुनक धिया आगर, दुअरा फुटल गागर सर्वगुण सम्प न्नि भेनिहारक दावा कयनिहारक त्रुटिपर व्यं्ग्य ।
सब चलल घर कऽ, राउत चलल बन कऽ संध्या काल सब अपन दैनिक कार्य समाप्तद क’ घर चलल, मुदा राउत घरक परित्या ग क’ चोरि करबाक उद्देश्येा वन दिस विदा भेल।
सब छउड़ी गामपर, हेहरी लतामपर सब लड़की गाममे अछि, मुदा हेहरी गाम छोडि़ लतामपर चढल अछि।
सब छउड़ी झुम्मढरि खेलय, लुल्ही कहे हमहूँ सब लड़की झुम्मढरि नामक खेल विशेष रहल अछि तकरा संगहि लुल्हीा कहैछ जे हमहूँ झुम्मारि खेलब।
सब छुटलनि तुम्बा‍ हेराफेरी नहि छुटलनि सब अभयास तँ छोडि़ देलनि, मुदा तुम्बाछ फेरीक कार्य नहि छुटलनि।
सब जाति सब सऽ मिले, ठक ठाकुर आ चोर, तीन जाति कबहु ने मिले, बाभन कुत्ता घोर सब व्य क्ति सभक संग मिल जाइछ।
सब जोगिया मरे, मोर खपरबा भरे प्रत्येयक योगी इएह कामना करैछ जे सब योगी मरि जाय आ हमहीँ जीवित रही जाहिसँ सब भीक्षा हमरे भेटय।
सझिया मउगी नीक, सझिया खेती ने नीक साझीक स्त्री नीक रहैछ, परन्तुब साझीक खेती नहि, कारण ओहिमे व्यखवधान होइछ।
सझिया मउगी सझिया खेती कतहु भेल साझीक स्त्री तथा खेती नीक नहि होइछ, कारण कोनो स्थितिमे विद्रोह भ’ सकैछ।
सब टा करम के कमाल सब व्यकक्ति अपन भाग्यभक फल भोगैछ।
सब्‍ टा बिधिक बिधान प्रत्येरक कार्य ब्रह्मा नियमक अनुसारेँ चलैछ।
सब तीरथ बेरि, गंगासागर एक बेरि प्रत्ये क तीर्थ लोक बारंबार जा सकैछ, किन्तुे गंगासागर एकहि बेर गेलापर सब पुण्यु भेटि जाइछ।
सब दाँत रंगुआ चूल्हि के फूकत, भरि हाथ लहठी धान के कूटत घरक प्रत्येनक स्त्रीक पान खाइछ तँ चूल्हि फुकबाक कार्य के करत ? भरि हाथमे लहठी अछि तँ धान के कूटत ? परिवारक सब रईस भ’ जाइछ तखन गृहस्थीपक सब कार्य समाप्त भ’ जाइछ।
सब दिन खाइहऽ, पाबनि दिन ललइहऽ सब दिन तँ नीक-नीक वस्तु खाइत छलहुँ, मुदा पाबनि दिन ओहिसँ वंचित भ’ गेलहुँ।
सब दिन चोर के, एक दिन साधु के सब दिन तँ चोर बाजी मारि लैछ, किन्तु। साधु ओकरा एक-ने-एक दिन पकडि़ए लैछ।
सब दिन सेबल कासी, मरे बेर उसर बासी सब दिन तँ काशीवास कयल आ मारबा कालमे अधलाह स्थाीनपर आबि गेलहुँ।
सब देबताक उछल कूद, गनेसक घुड़कुनियाँ सब देवता उछलैत-कूदैत छथि, मुदा गणेश एक घुसकुनियाँ लगबैत छथि तकर समानता क्योा नहि करैछ।
सब देबताक दउड़, से महादेबक घुसकुनियाँ सब देवता दौड़ैत छथि एक भाग तथा महादेव तँ मात्र घुसकैत छथि तथापि सबसँ आगू रहैत छथि।
सबादो ने पौलहुँ, जातियो गमौलहुँ जाति भ्रष्टल क’ कए इच्छित वस्तुे नहि प्राप्तर भेलापर प्रयुक्तो।
सब धन बाइस पसेरी सब धन बाइस पसेरीक समान अछि।
सब धन रहि गेल बहु गेल चोरी सब धन जहिनाक तहिना रहल, मुदा पत्नी क चोरि भ’ गेल।
सबपर दया चिल्लकरपर ने सब जीव-जन्तुरपर दया करबाक चाही, मुदा चिल्लवर दयाक पात्र नहि।
सब बूडि़ गेला कासी, ई बूडि़ रहला आसी जतेक मूर्ख छल ओ तँ काशी चल गेल, मुदा इएह बूडि़ आसी गाममे रहि गेलाह।
सब सखी झुम्मिरि खेले, लुल्हीद कहे हमहूँ सब सखी झुम्मिरि खेलाइछ तँ लुल्हील सेहो खेलयबाक इच्छा़ व्यलक्तल करैछ।
सब सऽ कठिन जाति अपमान जातिक अपमान अत्यअन्त असह्म होइछ।
सब सऽ बुड़बक दीनानाथ सबसँ मूर्ख दीनानाथ थिकाह।
सब साँप मरल ढोंढबा के भेटल टीका सब साँप तँ मरि गेल तेँ ढोंढ आब प्रधान बनल अछि।
सबसे भला चुप्प चु रहब सर्वोपरि अछि।
सबहक धी बेटी सासुर गेल, हमरा लेखेँचैत पडि़ गेल देo सबक धिया सासुर गेल, मोरा लेखे चइत पडि़ गेल
सब हाथ लहठी धान के कूटत सभक हाथमे तँ लहठी छैक तँ आब घान के कूटत ? सबकेँ चूड़ी फूटि जयबाक आशंका छैक तँ धान ओहिना पड़ल रहि जाइत अछि।
सबुरक गाछमे मेबा सन्तो षक वृक्षमे मेवा सदृश फल लगैछ।
सबुरी गेला पात आनय, हकुलहू कहथिन्हक जे भूँइये दऽ जा सन्तोेषी व्य,क्ति भोजनार्थ केराक पात आनय गेलाह ता असन्तोीषी व्ययक्ति कहलक जे हमरा भुइयेँपर खैबाक हेतु द’ दिय।
सभ खा कऽ भोंटी तीत कोनो कार्यक अन्तिम परिणाम दुखद होइछ, तँ प्रयुक्तु।
सभ छउड़ी गामपर, लुल्हीछ लतामपर सब छाँड़ी गामपर, किन्तुछ लुल्ही लतामपर अछि।
सभ दुसमन्नाा, अपन टेटर ने झाँपथि चन्नास सब तँ दुश्मान छनि तथापि चन्द्ररमा अपन टेटर नहि झाँपैत छथि।
सभ परियोग भऽ गेल, बहुरिया पद घयले यद्यपि वृद्धावस्था आबि गेलनि तथापि अपनाकेँ अद्यावति कनियाँ कहि रहल छथि।
सभ सऽ गुरू गोबर्धन दास अपनाकेँ श्रेष्ठ् प्रमाणित कयनिहारपर व्यंकग्यन।
सभ सऽ छोट सभ सऽ जेठ जे सभसँ छोट छथि ओ सभसँ जेठ सदृश करैछ, तँ प्रयुक्तस।
सभा बिगाड़े तीन जन, चुगला चुतिया चोर सभाक कार्यवाहीमे तीन व्यजक्ति व्युतिक्रम उपस्थिति करैछ, चुगलखोर, चुतिया एवं चोर।
समांगक सुख पेटक दुख बाल-बच्चाुक सुखसँ अछि, किन्तु बच्चा‍क अधिक्य क कारणेँ पेटक दु:ख भ’ गेल अछि।
समांग मूइने ने डेराइ, जमक परिकने डेराइ परिवारक ककरो मृत्युइ भेलासँ डर नहि मानबाक चाही, किन्तुा यमराजक परिकबासँ डर मानबाक चाही।
समादे दही नहि जनमत संवाद पठा देलासँ दही नहि जनमि सकैछ।
सरंग टूटि खसत, टिटही कते टेकत आकाश टूटि क’ खसि रहल अछि, टिटही ओकरा कतेक टेकि क’ राखि सकैछ।
सरंग पताली भुइयाँ डेग, अपन खाय परोसिया हेरि जाहि बड़दक एक सींग ऊपर तथा एक नीचाँ भ’ गेल अछि ओ अपन मालिकक संगहि पड़ोसियाक विनाश करैछ।
सरंग सऽ खसी तऽ मुंगराक मारि स्वगर्गसँ ख्रामसलापर पृथ्वींपर मुँगराक मारि लगैछ।
सर बरोबर बखड़ा, ने तँ हड़हडी बज्जरड़ बँटबारा समान रूपेँ हैबाक अन्यहथा कल्यारणाकारी नहि हैत।
सरबस हारी तऽ हारी, गज भरि ने फारी संपूर्ण संपत्तिक विनाश भ’ जाय ओ स्वीरकार्य, मुदा ओकर एक अंश गमा देलासँ सर्वसवक रक्षा हैत, एहन नहि कयनिहार व्यवक्तिपर व्यं,ग्यय।
सरलो छतरी तऽ तीन जबान राजपुत्र केहनो गेल किएक ने होथु, मुदा हुनका संगमे रुपैया-पाइ रहिते छनि।
सराहल बहुरिया डोम घर जाय बहुप्रशंसित स्त्रीघ डोमक संग पड़ा जाइछ।
सरिसोंक साग जकाँ गला देब अपन दुश्मानक विनाश लोक सरिसोंक साग सदृश करैछ।
ससउते उजड़ी, जाउते बसी सौतनिक बैटज्ञ लग बास नहि होइछ, किन्तु गोतनीक बेटा लग निर्वाह भ’ जाइछ।
ससता गहूँम घर घर पूजा गहूम सस्तम अछि तँ घर-घरमे पूजा भ’ रहल अछि।
ससता झखे बेरि बेरि, महगा झखे एक्केभ बेरि सस्त वस्तुछ कीलासँ बारबार पश्चाभत्ताप करय पड़ैछ, किन्तुत महग वस्तु जँ एकहि बेर कीन लेल जाइछ तँ ओकरा हेतु एकहि बेर कष्टल होइछ।
ससता पाबी तऽ नौमन तउलाबी सस्त वस्तुउ लोककेँ भेटैछ तँ ओ निष्प्रबयोजन नौ मन तौला अनैछ।
ससतेँ मरद बरद उपास, ससतेँ मरद उपास घरमे मर्दक आधिक्यस भेलासँ बड़द उपवास पड़ैछ, कारण एक दोसरापर अवलंबित रहैछ।
ससते लुआ सहोदर नाङट कपड़ा तॅं सस्त अछि तथापि सहोदर नाङट छथिङ
ससुर भॅंइसुर के डरे ने, जकर डर से घरे ने सुसर आ भैंसुरक कोनो डर ने छनि, मुदा जकर डर छनि तॅं घरमेँ नहि छनि, तेँ स्व च्छरन्दि छथि।
ससुर सऽ बजलौ सेहन्ते‍, भैंसुर सऽ बजलौं बेगरते सौखसँ सुसरक संग बजलहुँ, किन्तु लाचरीमे भैंसुरक संग बाजय पड़ल।
सहज पाके से मीठ होय अनायास पाकि गेनिहार फल अत्यदन्तत मीठ होइछ।
सहजर्हि राम बइरागी भेला राम ओहिना वैरागी भ’ गेलाह।
सहर सिखाबे कोताबाली शहर कोतवालकेँ अपन कर्त्तव्यद सिखा दैछ।
सहस्सोर गोपी एक कन्हदइया राधा तँ अनेक छथि, मुदा कृष्णय एकहि छथि।
सहे से लहे जकरा कष्टे होइछ सैह पश्चा त् जा क’ लाभान्वित होइछ।
साँच कहे से मारल जाय, झूठा जग पतियाय सत्यावादी व्यछक्ति सतत दण्डिक अधिकारी होइछ, किन्तु मिथ्या भाषी व्यकक्तिपर सब विश्वा स करैछ।
साँच बरोबरि पुन्नर ने, झूठ बरोबरि पाप सत्य वादी पुण्येक भागी होइछ तथा मिथ्यारभाषी सतत पापक अधिकारी होइछ।
साँच बात सह दुलबे कहे, सभक चित सऽ उतरल रहे सत्यतवादी व्यतक्ति सभक मनसँ उतरल रहैछ, कारण सत्यहकथा अत्य न्तक कटु होइछ।
साँचमे आँच की सत्यम कथा बजबामे डर कोन बातक ? अर्थात् सत्यय कथा बजबामे डेरयबाक नहि चाही।
साँझ पराती भोर बसंत, जे गाबे से हो निरबंस संध्या काल जे पराती (प्रभातकालीन भजन) तथा प्रात: काल बसंत (राग विशेष) गबैछ तकर वंशक विनाश भ’ जाइछ।
साँझ पाहुनो साँझक झर कतय जाय संध्यााकालक आयल पाहुन तथा वर्षा दुनू राति भरि निश्चकये रुकैत अछि।
साँझ बीत गेल की करब दिया, बयस बीत गेल की करब पिया संध्याल कालक समय समाप्तअ भ’ गेल तँ दीप ल’ कए आब की करब ? अवस्थात व्य तीत भ’ गेलापर स्वा्मीक कोन प्रयोजन रहत ? कोनो वस्तुरक प्रयोजन अनुकूल अवसरेपर उपयोगी सिद्ध होइछ।
साँझे खयली हर्रे, परातेँ टोयली गाँडि़ शीघ्रहि लाभ प्राप्तिक आशा कयनिहारपर व्यंरग्य्।
साँझे मुइला कानब कते, नूआ फाटत सीअब कते जे व्यतक्ति साँझे मरि गेल अछि तकरा हेतु कतेक कानल जाय ? जे सारी फाटि गेल अछि तकरा कतेक सीअल जाय ?
साँझे सूते पराते खाय, तकर लछमी परायल जाय संध्याज काल जे सूति रहैछ तथा भिनसरे जे खा लैछ तकरा लक्ष्मीज छोडि़ क’ चल जाइछ।
साँपक काटल रस्सी् सऽ डेराइछ जकरा साँप काटने अछि ओ जँ अन्ध कारमे रस्सीस देखैछ, तँ डेरा जाइत अछि।
साँपक मंतर खाटक बानि, अनका नीके अपना हानि साँपक मन्त्र एवं खटियाकम बंधन तँ आनक हेतु लाभप्रद होइछ, किन्तुँ अपना हेतु अहितकर।
साँप गेल बीलमे, धँ सना डेंगा कऽ की साँप तँ बिलमे चल गेल तखन धँसनापर प्रहार कयलासँ कोन फल भेटत ? अवसर बीत गेलापर निरर्थक प्रयासँ कोनो लाभ नहि।
साँप छुछुन्निरक हाल साँप एवं छुछुन्द‍रक समाने हाल रहैछ।
साँपो मरे लाठिओ ने टूटय साँप सेहो मरि जाय, किन्तुह लाठी सेहो नहि टूटय।
साँयक अरजल भइयाक नाम उपार्जन कयलनि पति, किन्तुह नाम भायक ल’ रहल छथि।
साँयक अरजल भाइक नाम, चोली पहिर जायब ससुरजीक गाम उपार्जन तँ स्वाममी करैत छथि, किन्तुक नाम होइत छनि भायक, जे चोली कीन क’ देलनि अछि।
साँयक कउड़ी भइयाक नाम पैसा तँ स्वाभमीक छनि, मुदा नाम तँ भायक लैत छथि।
साँयक नाम सब जाने आ हें हें करे अपन स्वाममीक नाम तँ सब जनैछ, किन्तुय लोक लज्जा क कारणेँ नामसँ संबोधित नहि करैछ।
साँयक कहल करी तऽ जतबे टूटे, भइयाक कहल करी तऽ सेजिए छूटे जँ स्वाहमीक बातमे रहैत छी तँ सब सर-संबंधीसँ संबंध टूटि जाइछ।
साँयक लहर सउतिनपर पतिपर जे क्रोध भे‍लनि तकरा सौतिनपर उतारलनि।
साँयक सोहागिन मोखा लागी पत्नी पतिक निमित्त किछु-ने-किछु करिते रहैछ।
साँय कहलक पदनी मन भेल हुलास, कतय राखब हाला डाला कतय राखब साग कोनो पति पत्नीाकेँ पद्मिनी कहलनि जाहिसँ हुनक मन प्रफुल्लित भ’ गेलनि।
साँय कहलक सुनरी, सनाथ भऽ गेल दइया स्वा मी पत्नी केँ सुन्द र कहलनि जकर फलस्वकरूप अक्रिचन पत्नीक सनाथ भ’ गेलीह।
साँयक भूख माथा दूख अपन भूख चूल्हा फूक स्वाकमीकेँ जँ भोजनक इच्छास रहैछ तँ पत्नीग माथा दुखैबाक बहन्ना करैछ, किन्तु पत्नीदकेँ जँ कदाचित अपना भूख लगैछ तँ ओ चुल्हि फुकबाक हेतु तत्पिर भ’ जाइछ।
साँयक राज महाजन, बेटाक राज मुहताज स्वाामीक स्वातमित्वामे राजसुखक आनन्द् भेटैछ, किन्तुत बेटाक राजमे एक-एक वस्तुजक हेतु मुहताज होमय पड़ैछ।
साँय छलनि गाँउ, मन करे की की खाँउ पतिक गाम छोड़लाक पश्चाुत् पत्नीकक इच्छाग करैछ जे कोन-कोन वस्तुी खाइ।
साँय नित नहाइन, बहु ढकनेमे खाइन पति एहन धार्मिक छथिन जे नित्यह स्नाएनोपरान्ते भोजन करैछ, मुदा पत्नीन एहन छथिन जे ढाकनेमे खाइछ।
साँय नूनू बेटा नूनू, किरिया ककर खाउ देo सँइया मीठ बेटा मीठ, किरिया ककर खाउ
साँय पूछे ने कोन घर बिछौना स्वा मी उपेक्षा करैत छथिन, मुदा पत्नी जिज्ञासु छथि जे कोन घरमे सुतब्राक निमित्त ओछाइन करी।
साँय बहु राजी, की करे गाम के काजी पति-पत्नी मे जखन अत्य धिक प्रेम छनि, तँ गामक मुखिया की करताह।
साँय बहु समतो, गामक लोक उमतो पति पत्नीस एक मत छथि, तँ गामक लोक विरुद्ध वातावरण बना क’ की कए सकैछ ? जँ अपनामे मेल हो तँ आन किछु ने बिगाडि़ सकैछ।
साँय बहुक झगड़ा, पंच बने से लबड़ा पति-पत्नीतक झगड़ामे पंच लबड़ा बनि जाइछ।
साँय माथा तेल ने, गोसाँइ माथा तेल स्वा मीक माथामे तँ तेल नहि छनि, मुदा गोसाँइक माथा तेलसँ चपचप क’ रहल छनि।
साँय राज नीक राज, पूत राज दूत राज स्त्रीा कहैछ जे पतिक राज प्रत्येाक दृष्टिऍं उत्तम रहैछ, किन्तुर बेटाक राज दूतक समान अछि।
साँय सऽ छुट्टी ने, दओर करे गोड़धरिया पतिसँ एको क्षणक पलाखति नहि भेटैछ, मुदा देओर हमर पैर पकडि़ रहल छथि जे हमरो समय दिअ।
साँय सऽ दुसमनी आ देओरक संग स्वा मीक संग तँ शत्रुता छनि, मुदा देओरक संग अत्य‍न्तग अपनैती।
साँय सऽ फुरस्तिी ने, देओर माँगे चुम्माद पतिसँ पलखति नहि, किन्तुत देओर चुम्मा माँगैछ।
साँय सराहलकनि तऽ चार चढि़ बइसलीह, नगरक लोक थुकरालकनि तऽ नीचाँ भेलीह पतिक मुहसँ प्रशंसा सुनि पत्नीथ चढि़ क’ बैसि रहलीह, किन्तुु गामक लोक जखन थूक फेकब प्रारंभ कयलनि, तँ तत्क्षोण नीचाँ उतरि गेलीह।
साँय सिपाही, बहु बिचकाही पति तँ सिपाही छथिन, मुदा पत्नीक बिचकाहि।
साँस नै तऽ आस की जीता-जिग्नीय लोक आशान्वित रहैछ, किन्तु मृत्युैक संग सब समाप्तक भ’ जाइछ।
साउस अपने बेटी बेटइतिन, पुतहु अपने बेटे बेटइतनि सासु होथु वा पुतोहु दुनु अपन बेटा वा बेटीक कारणेँ बेटावाली वा बेटावाली कहा सकैछ।
साउस के खोंखी ननद के दम्माी, के करे घरक कम्मास सासुकेँ खोंखी भ’ रहल छनि, ननदि केँ दम्माे भेल छनि तखन घर काज-धन्धाे के करत ? अर्थात् घरक सब काज स्वसयं करैत छी।
साउस के डरे ने, जकर डर से घरे ने पुतोहु कहैछ, ‘सासुक डर हमरा नहि अछि।
साउस गेल गाम सऽ मन होइए की की खाउ, साँय गेल घर सऽ मन होइए कहाँ कहाँ जाउ सासु गामसँ बाहर गेलीह तँ मन करैछ जे कोन-कोन वस्तु खाउ।
साउस घरबारी, पुतहु दरबारी सासु घरक काज-धन्धाुमे लागल रहैछ पुतोहु दरबार करैछ।
साउस चुमाबे गेली, आगे माय पुतहु हमरे रंग कुरूप सासु पुतोहुकेँ चुमैबाक निमित्त गेलीह।
साउस तर बसलहुँ तऽ बसलहुँ, पुतहु तर बसब तखन ने सासुक संग निर्वाह भ’ गेल, तँ कोना पैघ बात नहि।
साउस तोडि़ बहु सऽ नाता सासुसँ तँ कोनो संबंध नहि छनि, मुदा पत्नीतसँ संबंध छनि।
साउस ननद के डरे ने, जकर डर से घरे ने निडर व्य क्तिक व्य।वहारपर व्यंतग्यी।
साउस ने ननद घर अपने आनन्दय सासु एवं ननदि घरमे नहि छनि।
साउस पाबनि तिहार, पुतहु ओएह ढकना, ओएह सरबा ओएह बेबहार पुतोहु सासुकेँ संबोधित क’ कहैछ, ‘पावनि तिहार आबि गेल।‘
साउस पुतहु एक्कें होयत, भामा कुटनी घर चल जायत कतबो विवाद किएक ने हो अन्त त: सासु पुतोहु एक्केि हैत।
साउस पुतहुमे झगड़ा भेल, सूप डगरा बखरा भेल सासु पुतोहुमे झगड़ा भेलनि जाहिमे सूप-डगराक बाँट-बखरा भेल।
साउस मरने पुतहुक ठरि सासुक मृत्युतपरान्त। पुतोहुक संग निर्वाह होइछ।
साउस रुसनी कूटत पुतहु रुसनी सूतत, गेलहुँ जगाबय तऽ देलहुँ दू मूसर सासुक अप्रसन्नतताक कारण जे हुनका परिश्रमसँ धान कूटय पड़ैछ तथा पुतोहु एहि हेतु रुसल छथि जे हुनका सुतबाक कम समय भेटैछ।
साउस सऽ बइर, पड़ोसिन सऽ नाता सासु पुतोहुमे बैर-भाव छनि, किन्तुन पड़ोसिनसँ तँ नीक संबंध छनि।
साउस सऽ भीन भेली, ननद पड़लनि बखरा सासुसँ पृथक भेलापर हिस्सािमे पड़लथिन।
साउस हे गील भेल, पुतहु हे गुन भेल पुतोहु सासुकेँ कहलथिन, ‘आँटा तँ गील भ’ गेल।
साओनक आन्हुर के सब ठाम हरियरी साओन मासमे आन्हकरकेँ सबठाम हरियर दृश्यम देखबामे अबैछ, कारण ओ अनुमान करैछ जे एहि मासमे हरियर हैबे करत।
साओनक आन्हिर के साल भरि हरियरी देo साओनक आन्हभर के सब ठाम हरियरी
साओनक ढोल सोआओन श्रावण मासमे ढोलक स्व र सुनबामे नीक लगैछ।
साओनक पहिल दिन उगत न देखे भान, चारि महीना बरिसे याको यह परमान श्रावणमे प्रथमे दिन सूर्योदय काल आकाश मेघसँ आवृत्त रहैछ, तँ बुझबाक चाही जे चारू मास नीक वर्षा हैत।
साओन के पहिल दिन डूबैत ने देखे भान, चारि महीना बरिसे याको यह परमान श्रावणमे प्रथम दिन सूर्यास्ता काल जँ मेघ लागल रहैछ तँ बुझबाक चाही जे चारू मास अर्थात् श्रावण, भाद्र, आश्विन एवं कार्तिकमे वर्षा नीक हैत।
साओन के पुरबा भादो पछिया जोर, बरदा बेचइ सामी चहल देसक ओर पतनी पतिसँ कहैछ जे अपन बड़द बेचि लैह, कारण श्रावन मासमे पुरबा आ भादो मासमे पछबा बसात बहैत अछि।
साओन जनमल गीदड़ भादो आयल बाढि़, ओ बाजि उठल जे एहन बाढि़ कहियो ने आयल श्रावणमे गीदड़क जन्मढ भेल।
साओन धोयल सोना होइ, भादोक धोयल किछु किछु होइ, आसिन धोयल किछुओ ने होइ धानमे साओन मासमे वर्षा भेलापर सोना सदृश होइछ, भादोमे भेलापर किछु होइछ, किन्तुो आसिनमे भेलापर किछु ने होइछ।
साओन पछबा बह दिन दुइ चारि, चुल्हिक पाछाँ उपजय सारि श्रावणमे दुइ चारि दिन पछबा बहलापर धानक फसिल सर्वत्र अति उत्तम होइछ।
साओन पुरबा बहे हरा हरर, धानक खेतमे बुनो रहर श्रावणमे जँ पुरबा बसात बहैछ तँ बुझी जे अकाल पड़त।
साओन बदरी चउथ कऽ जे मेघ बरसाय, घाघ कहे घाघिन सऽ साख सबाइ जाय श्रावणक चौथ दिन आकाश मेघसँ घेरल रहय आ किछु वर्षा भ’ जाय तँ बुझबाक चाही जे आगू सेहो नीक वषा्र हैत तथा धानक उपजा सेहो नीके हैत।
साओन मास करइला फूलल, नानी देख नबासा भूलल श्रावणमे करैला फुलायल देखि तथा नानीक प्रति ममत्वै-भावनाक जागरण होइतहिा नाती नबासाक बात बिसरि जाइछ।
साओन मास बहे पुरबइया, बेचह बरदा कीनह गइया श्रावणमे जँ पुरबा बसात चलय, तँ बड़द बेचि क’ गाय कीनबाक चाही, कारण वषा्र नहि तँ गृहस्थीर नहि।
साओनमे पुरबा बहे भादो पछिया जोर, खेती बाड़ी छोडि़ दऽ भइया चलह कोनो ओर श्रावणमे पुरबैया तथा भाद्रमे पछबा बसात चले तँ बुझबाक चाही जे वर्षा नहि हैत।
साओन रोपियह चीर फारि, भादो रोपियह सारि गारि, आसिन रोपियह ककुड़ा बान,तीनू काटियह एक समान श्रावणमे कोहुना चीर-फारि क’ धान रोपी, भाद्रमे खेतमे जंगलकेँ सड़ा क’ रोपी तथा अ‍ाश्विनमे काँकुड़क टाँगक समान घनगर रोपलासँ नीक हैबाक संभावना रहैछ।
साओन सऽ भादो कोन दुब्बकर श्रावणसँ भाद्र कोनो अर्थमे दुर्बल नहि अछि।
साओन साग ने भादो दही, जेनर खाय से पड़ले रही श्रावणमे साग, भाद्रमे दहीक सेवनसँ स्वावस्य्ही पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ैछ।
साओन सुकला सपतमी उदय जे देखे भान, तो जा पिया मालबा हम जायब मुलतान श्रावण शुक्लात सप्तममी तिथिकेँ सूर्योदय देखलासँ अनुमान कयल जाइछ जे वर्षा नहि हैत, तेँ जीविकोपार्जनार्थ पति मालवा तथा पत्नीन मुलतान चल जाइत अछि।
साओन सुकला सतमी उगि कऽ लुकहि सूर, हाँकू पिया हर बरद बरखा गेल बरी दूर श्रावण शुल्काम सप्तहमीकेँ सूर्योदय भ’ कए पुन: सूर्य नुका रहथि तँ पत्नीे पतिसँ कहैछ, ‘हर बड़दक आब प्रयोजन नहि।
साओन सुकला सतमी चंदा उगे तुरन्त , कि जल मिले समुद्रमे कि नगर कूप भरंत श्रावणमे शुक्लद पक्षमे जँ चन्द्रनमा देखबामे अबैछ तँ बुझबाक चाही जे एहि वर्ष वर्षा नहि हैत।
साओन सुकला सतमी चंदा उगे तुरन्त , कि जल मिले समुद्रमे कि नगर कूप भरंत श्रावणमे शुक्ली पक्षमे जँ चन्द्ररमा देखबामे अबैछ तँ बुझबाक चाही जे एहि वर्ष वर्षा नहि हैत।
साओन सुकला सतमी छिपके उगे भान, तब लौ देब बरिसिहौं जब लौं देब उठान श्रावण शुकला सप्तंमीकेँ उदय बेलामे जँ सूर्य मेघक ओटमे रहथि तँ दवोत्थाउन एकादशी पर्यन्ते वर्षाक संभावना रहैछ।
साओन सुकला सतमी छिप कऽ उगे भान, घाघ कहे घाघिन सौं कहाँ कऽ राखब धान श्रावण शुक्लाम सप्तिमीकेँ प्रात: काल सूर्य जँ मेघमे नुकायल रहलाक पश्चापत् उदित होइछ, तँ वर्षाक संगहि संग धान उपजबाक संभावना रहैछ।
साओन सुकला सतमी जौं गरजे अधिरात, तो जा पिया मालबा हम जैब गुजरात श्रावणक शुक्ल पक्षक सप्तामीकेँ जँ कदाचित आधा रातिमे मेघ गरजैछ तँ बुझबाक चाही जे वर्षा नहि हैत।
साओन सुकला सपतमी उदय न देखय भान, तब ला देब बरिसाहिँ जब ले देब उठान श्रावण शुक्लात सप्तरमीकेँ सूर्योदय काल जँ सूर्यनहि देखबामे अबैछ तँ वर्षाक आधिक्यी रहैछ।
साओन सुकला सपतमी उगते जो देखे भान, या जल मिले कूप महँ या गंगाजल असमान श्रावण शुक्लात सप्तकमीक सूर्योदय बेलामे जँ सूर्य स्पकष्टल देखबामे अबैछ, तँ वर्षा एतेक कम हैत जे जल वा तँ इनोरमे भेटत वा गंगा सदृश पैघ नदीमे, अन्यैत्र कतहु ने।
साओन सुखे धान, भादो सुखे गहूँम श्रावणमे वर्षाक अभावसँ धान सुखि जाइछ तथा भाद्रमे वर्षा-अभावसँ गहूँमपर अधलाह प्रभाव पड़ैछ।
साकल दीपीमे तीन गुन, बिद्या बिनय बिबेक शाकल दीपी ब्राह्मणमे विद्या, विनय एवं विवेक तीनू गुणक प्रधानता देखल जाइछ।
साग तोड़ी के, नीन भोर के सारिसोंक साग अत्य न्तभ स्वानदिष्टह तथा भिनसुरका नीन अत्य धिक आनन्दा्यक होइछ।
साग पात के भंडारी, गोबर के सरदरी भंडारी बनल छथि साग, पात एवं गोबरक।
साग लल पात लल, साँझ खन भतार लल साग-पातक हेतु लालयित अछि, मुदा संध्या काल भतारक लग जयबाक आकांक्षी रहैछ।
साग भाँटा दोबरी लऽ दऽ कऽ बरोबरी साग भाँटाक व्या पार कयलनि लाहिमे ल’ द’ कए समाने लाभ भेलनि।
साग मीठ तोरीक, नारी मीठ चोरीक, राग मीठ होरीक सरिसोंक साग अत्य,न्त स्वा्दिष्ट , चोरि क’ कए आनल स्त्री होरीक राग अत्यरन्तव प्रिय होइछ।
साझाक हरिया, चौराहापर फूटय ककरो मेल- मिलापक संबंधमे ककरो पता रहौ वा नहि, किन्तुं झगड़ा भेलापर सब बुझि जाइछ।
साठ कोस नाटा के दौड़ अस्सीन कोस बहुकान, बा के अन्तं न पाइये जो एक आँख के कान साठि कोस भुट्ट, अस्सीी कोस बहीर दौड़ैछ तथा ओकर कोनो अन्तौ नहि अछि जे एक आँखिक व्योक्ति अछि।
सात गाम माँगथि तइयो एके तामा, एक गाम मागथि एके तामा सात गाम भिक्षाटन करैछ तँ एक तामा अन्नग भेटैछ अन्न भेटैछ तथा एक गाम माँगथि तथापि एक तामा भेटैछ ।
सात चमार एक भुइँहार एक भूमिहार सात चमारक बरोबरि होइछ।
सात चमार न एक भुँइहार, सात भुइँहार न एक नोनियार जहिना सात चमार एक भूमिहारक बरोबरि नहि क’ सकैछ तहिना सात भूमिहार एक नोनियारक नहि।
सात जोलहामे नौ हुक्कात,तइयो होइये थुक्कोम थुक्कात सात जोलहामे नौ हुक्कात अछि तथापि आपसमे हुक्कानक निमित थुक्कतम-फज्झ‍ति भ’ रहल अछि।
सात तामा के सात पकयलहुँ चउदह तम्माा के एक्के , तों कुल बोरना सातो खयलें हम कुलबन्ती एके, तों कुलबोरना तीमन खयलें नूनू तेल मिरचाइ, हम कुलबन्तीे छुच्छेइ खयलहुँ दही दूध मिठाइ पत्नी् पतिक प्रसंगमे कहैछ, ‘सात तम्मातक सात गोट रोटी पकयलहुँ, अहाँ वंश विनाश कयनिहार छी तँ सातो रोटी खा गेलहुँ।
सात नूए सहोदर नाङट देo सात नूए सीता नाङट
सात नूए सीता नाङट सात सारी रहलोपर सीता नाङट अछि।
सात पाँच मिलि करियह काज, हारने खगने कबहु ने लाज पाँच सात एक स्था नपर एकत्रित भ’ कार्य कयला उत्तर हारने वा कोनो वस्तुएक खगता भेलापर लज्जा क अनुभव नहि होइछ।
सात पाँच रजपूत एक संतोख, गदहा खयलामे कोनो ने दोख देo सात पाँच कायथ एक सन्तोहख, गदहा खैने नाहि न दोख
सात बरदे बाभन कोढि़ बड़दक संख्यानत तँ सात छनि, तथापि ब्राह्मण कोढि़ बनि क’ बैसल छथि, कारण ओ स्व्यं हर नहि चला सकैत छथिल।
सात बहिन सोख केओ देहरी केओ मोखा, केओ काटे सोना सोहिला केओ काटे फुल्लाट सोखा सात बहिन छथि।
सात बाभन सात पेट, सात राड़ एक पेट ब्राह्मण सात छथि, किन्तुड वैमत्यथक कारणेँ सातोक सात मत छनि, किन्तुड राड़ सात अछि तथापि ओकरामे मतैक्यओ छैक, तँ सातोक एक विचार छैक।
सात बासी सात तेबासी, बहुरिया कहथि रातुक उपासी पुतोहु सात बेर बासि-तेबासि खा लेलनि तथापि कहथि जे हम काल्हि रातिएसँ उपवासमे छी, तँ व्यं ग्यन।
सात बेर सतबन, साँय आगू दतमन पतिक अनुपस्थितिमे पत्नी सात बेर खा चुकल छथि, किन्तुँ जखन पति अयलथिन तँ हुनका देखयबाक निमित्त दातमनि करैछ।
सात मउगीक सरदार कोनो पुरुषक स्त्रीक जकाँ व्यैवहार देखि क’ व्यं ग्यी।
सात रोटी खा कऽ धौंस पठाबे जाय सात रोटी खाइयो क’ उनटे धौंस देखबैत अछि जे हम उपासे छी।
सात रोटी सात बाटी सात रे चमकौना, पुछुन गऽ बहुरिया के आर किछु लेना, लेब ने तऽ जीब कोना आयल छी गौना, पड़ल छी संकोचमे देह रे सुखौना सासु पुतोहुकेँ भोजनार्थ सात रोटी एवं रोटी एवं सात बाटी दालि देलनि।
सात सेर के सात पकौलहुँ, चउदइ सेर कऽ एक्केक, ओ देह जरुआ सातो खयलक, हम कुलमन्तीस एक्के, पत्नील पतिक हेतु सात सेरक सात रोटी पकौलनिख्‍ मुदा अपना हेतु चौदह सेरक एकेटा ।
सात बेर सतौन, पिया आगू दतौन सात बेर जलखइ कयलनि, मुदा घरवलाक आगाँ दतमनि ल’ कए बैसली।
सात बइदें कारनी मात सात वैद्यक इलाजक परिणाम भेल जे रोगीकेँ रोगसँ त्राण नहि भेलनि, प्रत्युेत‍ व्याकधि आर बेसी भ’ गेलनि।
सात सारी गाँडि उघार यद्यपि सारी सात छनि, तथापि संपूर्ण शरीर नग्नप छनि।
सात हाथ घोड़ा से डरिये चौदह हाथ मतबाल, हाथ अनगनित बा से डरिये जेकर जात फटेहाल घोड़ासँ सात हाथ, मद्य पिबनिहारसँ चौदह हाथ आ वर्णसंकर व्यथक्तिसँ अनगनित हाथ फारके रहबाक चाही।
साते पूते ने अघइली, तऽ कानी धिया देख सिहइली अपन सात पुत्रसँ संतोष नहि भेलनि।
सातो बिदिया नास श्राप देबामे प्रयुक्त ।
सादा सब सऽ मरजादा खान-पान, रहन-सहन, वेष-भूषा सबमे सागी रहलापर ओ बहुत दिन धरि चलैछ।
सादा है मरजादा, निबहय बाप दादा एहन करबाक चाही जाहिसँ जे बाप दादाक कयल अछि, तकर अनुरूप हो।
साधक धन बाकी आ गाछी साधु-सन्ता लोकनिक धन-संपत्ति गाछी लगयबामे वा बाछी कीन क’ दान देबामे लगैछ।
साध सधाबी, आप दुख पाबी साधु सन्ताकेँ दु:ख देलासँ लोक स्वैयं दु:ख भोगैछ।
साधुक मुह कुकूर चाटे सज्जकन व्यटक्तिक संग क्योँ दुर्व्येवहार करैछ, तँ प्रयुक्तु।
साधुक बेटा सबादू पिता स्वभाव तँ साधु सदृश अछि, किन्तु् पुत्र तँ सब वस्तुधक स्वा,दक आकांक्षी रहैछ।
साधुक हाथमे भाला, चोरक हाथमे ताला विपरीत चरित्रपर व्यं,ग्यह।
साधु ने फकीर भड़पोंगा साधु फकीर किछु ने छथि मात्र ढोंग कयने छथि।
साधु ने सबादू साधु नहि छथि सभक स्वा द लेनिहार थिकाह।
साधे कयने सधोरी, भँइसुर बइसल अगोरी बड़ अभिलाषासँ सघोरिक आयोजन कयलनि, मुदा भैंसुर अगोरि क’ बैसल रहथिन।
साँप के दूध पिआइ तबहुँ बीख उगले साँपकेँ दूध पिऔलो उत्तर ओ सतत विष उगलैत अछि।
सामा सोले बुड़बक सराहले सामा (अन्न -विशेष) केँ सोहैत रहलासँ तथा बुड़बक अर्थात् मूर्खकेँ प्रशंसा करैत रहलासँ ओ नीक जकाँ कार्य संपादित करैछ।
सामी तर की माटि तर मनुद्वय अपन मालिकक नीचाँ वा माटिक तरमे ठीक रहैछ।
साल सालक कोढि़, एके एतबारमे पार अनेक वर्षक रोग एकहि एतवारमे कोना समाप्तर हैत ? तात्पकर्य समय अवश्यर लागत।
सासन जेलक, परबन्धह धरमासालाक शासन तँ जेलक अछि, मुदा प्रबंध धर्मशालाक अछि।
सास पुतोहियाएके होइहें, भामा कुट्टन घर चल जैहें झगड़ा भेलापर सासु पुतोह एकहि रहैछ, मुदा कुटनपन कयनिहारकेँ घर जयबाक अतिरिक्तन किछु नहि रहैछ।
सासु पाबनि तिहार, उहे ढकना उहे बेबहार पुतहु सासुसँ कहैछ जे आइ पा‍वनि-तिहार अछि।
सासु पाबनि तिहार, पुतहु ओएह खड़ा, ओएह हुक्का ओएह बेबहार देo सासु पाबनि तिहार, उहे ढकना उहे बेबहार
सासुरक सुखक सार, जँ रहय दिन चारि सासुरक सुखक महत्त्व अछि जँ क्यो ओतय दुइ चारि दिन रहैछ।
सासुरक हजाम गारि पढ़य सासुरमे हजाम सेहो गारि पढ़बाक अधिकारी भ’ जाइछ।
सासुर थिक कैलासे जँ रही दू चारि दिने, जँ रही दू चारि मासे खुरपी छिट्टा माथे सासुरमे दुइ चारि दिन रहलापर कैलाश सदृश मान-सम्मारन होइछ, किन्तुह दुइ चारि मास रहलापर घर-गृहस्थी क काजमे संग देमय पड़ैछ।
सासुर बसने दुहू कुल नास सासुरमे बास कयलासँ दुनू कुल अर्थात् पितृकुल एवं श्वासुर-कुलक मर्यादा भंग भ’ जाइछ।
सासुरमे सभ सारिये सारि सासुरमे सारिक अधिकता रहलापर प्रयुक्तक होइछ।
सास्त्र सऽ बिध भारी शास्त्र ओतेक कठिन नहि जतेक कि ओकर विध-विधान होइछ।
साहु जी सऽ बटखारा भारी साहुजीक अपेक्षा हुनक बटखारा बेसी भरिगर छनि।
साहु बटोरे कउड़ी कउड़ी, राम बटोरे कुप्पग व्या पारमे साहु कौड़ी-कौड़ी एकत्रित करैछ, मुदा भगवान एकहि बेर उठा क’ सब ल’ जाइत छथि।
साहेब सन सउखी, पालकीपर बोरसी साहेब सदृश अपन सौखी झाड़ैत अछि आ पाकीमे बोरसि रखैत अछि।
सिंगार मधुर एक्के श्रृंगार आ मधुर एक समान प्रिय होइछ।
सिंघ छूबि मरखाह बनायब जे शान्ति अछि तकरा बारंबार टोकरा द’ कए मरखाह बना देब।
सिनुर काजर बहु सुनरी, पेट भेल बहु बिगरी श्रृंगार-प्रसाधन कयलापर पत्नीो सुन्दगर लगैछ, किन्तुन गर्भधारण कयलापर ओकर सौन्दगर्य बिगडि़ जाइछ।
सिनुर टिकुली जरल, पेट बज्ज र खसल सोहागक चिह्न सिन्दूगर एवं टिकुली तँ आब नहि भेटैछ, आ आब तँ पेटोपर बज्र खसि पड़ल।
सिंघिया चोर के टीक भेल ठाढ़ नामी चोरक चर्चा भेलापर ओकर टीक ठाढ़ भ’ जाइछ।
सिधरिया चाल पारे, भोथहा के कपारे बीते जहिना पैघ माछक मुहमे छोटमाछ समा जाइछ तहिना तेज व्यमक्ति अपन काज निकालि लैछ, मुदा ओकर दुष्पनरिणाम मन्दलबुद्धिक व्यमक्तिकेँ भोग्यि पड़ैछ।
सिफलाहक मउगति माघ मास अधलाह व्याक्तिक मृत्युक माघ मासमे होइछ।
सिमरपुरक सुग्गाा जकाँ आस लगाएब सुग्गार सदृश कोनो वस्ु् ल पर ध्या न लगौने रहब, तँ प्रयुक्त्।
सियारक गुँह परबत सियारक बिष्टार पर्वत समान अछि।
सिरकी एक देलहि तानि, ताहि बेरमे आयल पानि, सिरकी उठाबे के रहल ने बेरा, आगू नाथ ने पाछू पगहा देखूo आगू नाथ ने पाछाँ पगहा, ना आगू नाब ने पाछाँ बेरा
सिर तोड़ मेहनत, मुह तोड़ बात अधिक परिश्रमक कयनिहार सतत मुहतोड़ जबाब दैछ।
सिर सलामत तऽ पगरी पचीस माथ जँ बाँचल रहत तँ पगड़ीक कोनो अभाव नहि रहत।
सिरहौना तर सुँगठी बिलाइ आँखि सिरमामेजँ माछक सुकठी राखल रहत, तँ बिलाइकेँ कोना नीन पड़तैक।
सिरा खाय मीरा, पोछी खाय गुलाम माछक माथा परिवारक वरिष्ठप सदस्यतकेँ भेटैछ तथा ओकर पछिला हिस्साछ अन्या न्यभ व्यैक्तिकेँ ।
सिंहक भाग गीदड़ लय गेल बलवान व्य क्तिक हिस्साख बलहीन व्ययक्ति ल’ जाइछ, तँ व्यंहग्या।
सीखने छी पढ़ने छी आँगुर तर जतने छी, जखन भऽ पड़त तखन ने छोड़ब हम संपूर्ण स्थितिसँ परिचित छी।
सीताक जनम बिरोगे गेल, दुख छोडि़ सुख कखनो ने भेल सीता जीवन भरि वियोगमे बितौलनि।
सीते लऽ कऽ रामक महातम सीताक करणेँ रामकेँ महत्त्व देल गेलनि।
सीधामे सन्दे ह गब्ये गब्यक करथि सीधा अर्थात् चाउर, दालि, तरकारी आदि भोज्यअ सामग्री भेटबामे संदेह छलनि, मुदा गव्यय अर्थात् घी दूध, दहीक चर्चा करैत छथि।
सारे भेंडी कनाह आगाँ-पाछाँ चलनिहार भेडी सेहो नीक जकाँ नहि चलैछ।
सीलगर मरद भिखारि, सीलगर मउगी छिनारि आवश्यिकतासँ अधिक शीलवान पुरुष आर्थिक दृष्टिऍं कष्टध सहन करैछ तथा आवश्यककतासँ अधिक शीलवान स्त्री साधारणतया छिनारि होइछ।
सुइयामे सांगि फारब सुइया स्वायं छोट अछि ताहिमे आन वस्तु क प्रवेश कोना भ’ सकैछ।
सुक केर बदरी सनीचर रहे छाए, औसन बोले भहुरी बिनु बरसे नहि जाय शुक्र आ शनीचर दिन जँ आकाशमे बदरी लागल रहे तँ भहुरीक कथन छनि जे वर्षा अवश्यर हैत।
सुकठीक बनिज आ पसुपतिक दरसन मिथिलावासी नेपाल जा क’ साधारणतया सुखायल माछक व्या पार करैछ।
सुकर दिनक बदरी रहे सनीचर छाय, कहे घाघ सुन घाघिन बिनु बरिसे ने जाय शुक्र दिन जँ बदरी लागि जाय ताथ शनि दिन धरि लागल रहैछ।
सुकराती के चरबाह सुकरातीमे चरबाहक माथमे चोपकारि क’ तेल दे जाइछ।
सुक सुक राती दिया बाती, तकरे छबे छठि दीपावलीक छओ दिनक पश्चा त् छठिव्रत होइछ।
सुकिरिए नाम कुकुरिए नाम, एकटा नाम दोसर बदनाम ककरो नाम दुइ रूपेँ होइछ सुकर्म अथवा दुष्कनर्मसँ।
सुख के सिंगार, भुख के आहार आभूषण सुखक श्रृंगार थिक, मुदा विपत्तिमे ओ आहारक साधन होइछ।
सुख पुन करथि चमरू, कोड़ा खाथि दयाल चमरु सब सुख पुण्य। करैत छथि, मुदा मारि खयबा काल दयाल आगाँ रहैछ।
सुख गे खखड़ी, ननदि अउतौ भूखलि भाउज धानकेँ सुखबाक हेतु कहैछ जे सुखि जो, कारण ननदि भुखायल आबि रहल छथि।
सुख ने सोगारथ, जूजि लौड़ा अकारथ देo सुख ने सोगारथ, देह जरल अकारथ
सुख ने सोगराथ, देह जरल अकारथ अथक परिश्रमोपरान्तख‍ कोनो सुख नहि, अतएव निष्प्र योजन अपन देहकेँ जरौलहुँ।
सुखला साओन भरला भादो हिनक पेट के भरत श्रावणक अकाल वा भाद्र मासक हरीतिमामेकहियो हिनकर पेट नहि भरैछ।
सुख सिहली दुख दिनाय, करम फुटे तऽ हो सतमाय सिहली सुखक, दिनाय दुखक तथा सतमाय कर्महीनताक प्रतीक थिक।
सुक सिहली दुख दिनाय, करम घटे तऽ फटे बेमाय देo सुख सिहली दुख दिनाय,करम फुटै तऽ हो सतमाय
सुख सुकराती दीया बाती, तकरे छबे छठि देo सुक सुक राती दिया बाती, तकरे छबे छबे छठि
सुगरक गूँह ने नीपे के ने पोते के सुगरक मल कोनो कार्यक नहि होइछ।
सुगरक गूँह ने नीपे जोग ने सूँधय जोग सुगरक मल अकार्यक होइछ।
सुट्टी पिल्ली् रमभजना माय, डोका तीमन लेल घुसकल जाय पातर पिल्लीस आ रामभजनक माय डोका तीमन लेल आबि जाइछ।
सुंतरय जऽ गप्पा, तऽ मुह मारी खेती के जँ गप्पज करबाक सुअवसर भेटैत रहय तँ खेती करबाक कोन प्रयोजन ? आलसी व्यीक्तिपर व्यंसग्यल।
सुतरय पहुनाइ, तऽ मुह मारी खेती के जँ पहुनाइ करबाक सुअवसर भेटि जाय तँ खेती करबाक कोनो प्रयोजन नहि।
सुतरे तऽ सगाइ, ने तऽ जनम भर हगाइ द्वितीय विवाह जँ नीक जकाँ सम्पजन्नइ भ’ जाय तँ कोनो कष्ट ने अन्य था आजीवन कष्टत सहन करय पड़ैछ।
सुतली रातिमे पुतली पेन्हाैय सूतलमे ककरो नाङट करब तँ कहल जाइछ।
सुथनी सन मुह बनायब कोनो कार्य सुचारु रूपेँ नहि भेलापर लोकक मुह स्वरत: विकृत भ’ जाइछ।
सुदामाक पोटरी निर्धन व्यटक्तिक हृदय उच्चव रहलापर कहल जाइछ।
सुद्दर ठके के लाल पतरा शूद्रकेँ ठकबाक निमित्त लाल पतडाक प्रयोजन पड़ैछ।
सुद्धा मुह कुत्ता चाटय सोझ व्यतक्तिक मुह कुकूर पर्यन्त चाटि लैछ।
सुधरल बाप के बिगड़ल बेटा नीक बापक अधलाह बेटाक प्रति उक्ति।
सुन रे ढोल बहुक बोल हे लोक सब कनियाँक बोली तँ सुनू ।
सुनैत सुनैत कान बहीर भऽ गेल एकहि कथा बारंबारसुनलापर लोक ध्या न नहि दैछ।
सुन्नै चोट नेहाइक माथ अभावग्रस्ताताक स्थितिमे कष्टेक-कष्टत होइछ।
सुन्नार घरमे मुन्नाि नाचे शून्या मुन्नाम नाच करैछ।
सुप्पात कहने संग बिधुआय उचित बात कहलापर मित्रता वा संबंधमे उदासीनता आबि जाइछ।
सुप्पनत बात सहदुल के कहियह, सभक चित सऽ उतरल रहियह ककरो जँ उचित बात कहल जाइछ तँ स्वा भाविक रूपेँ लोक चित्तसँ उतरि जाइछ।
सुभ होउ तऽ खोआ, असुभ हो तऽ खोआ ब्राह्मण शुभ एवं अशुभ दुनू स्थितिमे भोजनक अधिकारी बनैत छथि।
सुमिरने मरी, बिसरने जीबी विपत्ति वा शोकक स्मछरण कयलासँ तज्ज्नित चिन्ता बढि़ जाइछ, मुदा ओकरा बिसरि गेलासँ मन हल्लुतक रहैछ।
सुर चमइन सन, रूप परी सन स्व र तँ चमइन सदृश कर्कश छनि, मुदा स्व रूप परी सदृश सुन्दकर।
सुरती मुरती दइबक देल, एकटा माँगलहुँ चारिटा भेल सुरती मुरती तँ भगवान देलनि।
सुरपुर डंका बजाइ स्वपर्ग पर्यन्तनमे कोखिसँ अधलाह सन्तावन भेलापर व्यं ग्यन।
सूतक चटाइ ने, तमाकूक फरमाइस सूतबाक हेतु चटाइ पर्यन्तत नहि छनि, मुदा तमाकूक फरमाइश क’ रहल छथि।
सूतल उठल पाँजर मोरा ताहि बीचमे जनमल छौड़ा, बतहाक चौदह आ बतहीक आठ अन्नड छोडि़ छोडि़ जीबन काठ सन्ता्नाधिक्यिक कारणेँ अन्न भाव भेलापर जीवन कष्टादायी भ’ जाइछ।
सूतल छी आ बिआह भऽ रहल विवाह काल तँ सूतल छलहुँ आ ओ सम्पहन्नल भ’ गेल।
सूतल छी खाटपर, टांगा दूनू टाटपर देo सूतल छी घरमे पैर दुनू बहरा
सूतल छी घरमे, पैर दुनू बहरा सूतल छथि घरमे, मुदा पैर दुनू बहरा रखने छथि।
सूतल छी बिआह होइत अछि बिनु अरायासक कार्य सम्प न्नू भ’ रहल अछि।
सूतल ने जागय आ जागल की जागत नीनसँ सूतल व्याक्ति जगौलापर जागि जाइछ, मुदा जे सुतबाक आडम्बगर कयने अछि ओ नहि जगैछ।
सूतल पड़ल हम सब देखइ छी, कनखी ककरा के दइ छी हम तँ सूतल पड़ल रहैत छी, मुदा हम सब देखैत रहैत छी जे ककरा के की क’ रहल अछि।
सूती खड़तर सपना, देखी नौ लाखक निरर्थक कल्पपनापर व्यंखग्यह।
सूती खरपर, सपनाइ घरहर सूतैत छथि खरपर, मुदा स्व प्नय देखैत छथि महलक।
सूती खाटपर कोंचा टाट पर सूतल छथि खाटपर, मुदा कोंचा हुनक टाटपर छनि।
सूती सेजपर सपना देखी महलक तुo सुती खरपर सपननाइ घरहर
सूते मियाँ अइ घर, टाँग पसारे ओइ घर तुo सूती खाटपर कोंचा टाट पर
सूते रजपूत उठे अजगूत सूतल रहलोपर राजपूत सतत चौकस रहैछ।
सूतै लेल खरतर नै, सपना देखलौं नौ लक्खाल देo सूती खरपर सपननाइ घरपर
सून घरक पाहुन जहिना आबथि तहिना जाथि गृहपतिक अनुपस्थितिमे जँ पाहुन अबैछ तँ ओ वापस भ’ जाइछ।
सूना घर मुना राजा जाहि घरमे क्योा नहि अछि ताहि ठाम जे रहैछ तकरे स्वाामित्वअ भेटैछ ।
सूनू सबहक करू मनक बात सभक सुनबाक चाही, किन्तुभ काय्र स्वेसच्छाीसँ करबाक चाही।
सूपक भाँटा जेम्हछर पाउ, तेम्हयर ओंघराउ सूपमे राखल भाँटाकेँ जेम्हबर चाहू तेम्हसर ओंघरा दिअ।
सूप डेंगा कऽ ऊँट भगायब सूपक आवाज सुनि कतहु ऊँट भागैछ ? असंगत कार्यपर व्यंुग्य ।
सूरदास केर कारी कमरिया चढ़े न दूजा रंग लोक अपन अभयासमे कोनो परिवर्त्तन नहि अनैछ, तँ प्रयुक्तत।
सूरदास घी दै छी, तऽ गड़गड़ैने बूझब आन्हारकेँ कोनो वस्तुतक स्पझर्श वा स्वओर सुनलेसँ आभास होइछ।
सेतियाक मिरचाइ पाबी, तऽ आँखिमे लगाबी मँगनीमे जँ मिरचाइ भेटि जाय तँ ओकरा आँखिमे लगा ली।
सेतियाक सेनुर, भरि गाम बिआह मँगनीक सिन्दू।र अछि तेँ भरि गाममे विवाह भ’ रहल अछि।
दे दिन हैत गे से दिन हैत, कनहा पूत मोरा कोहबतर जायत एक स्त्री आन स्त्रीहकेँ संबोधित क’ कहैछ, ‘ओहो दिन निश्चआये आओत जे हमर कनाह पूत कोहबरक मुह देखत।
सेर जागल पउआ जागल, कनमा के छटपटी लागल सेर जागि गेल ओकरा देखि क’ पौआ जागल तकरा देखि कनमा सेहो जागि गेल।
सेरपर साबा सेर अपन सामर्थ्यकसँ बेसी सामर्थ्यावलासँ पाला पड़लापर प्रयुक्तन।
सेर भर धनियाँ तइपातपुर दोकान धनियॉं तँ एकहि सेर अछि, मुदा दोकान लगौने छथि तइपातपुरमे।
सेरमे पसेरीक धोखा सेरमे पसेरीक धोखा नहि भ’ सकैछ, कारण पसेरी पाँच सेरक होइछ।
सेर सेकत तीन बेकत संपूर्ण परिवासरक सदस्या संख्या मात्र तीन अछि तँ एक सेरसँ काज चलि जाइछ।
सेरे मरद पसेरिए बड़द मर्दक खोराक बेसीसँ बेसी एक सेरक होइछ, मुदा बड़दक खोराक एक पसेरीसँ कम नहि होइछ।
सेबा कयला सऽ मेबा सेवाक पश्चाऽत् मेवा भेटैछ।
से सौदा रहितहुँ तऽ, हाट छाडि़ कुहाट ने बिकइतहुँ सौदा जँ उत्तम रहैत तँ हाट छोडि़ क’ कुहाटमे नहि बिकाइत।
सै गुणडाक एक मोछ मुण्डाा मोछ कटायल व्यमक्ति साधारणतया गुण्डाकक समान सतत दुष्टोता करैछ।
सै चाकर तइयो घर सून अनेक नोकर रहलोपर घर शून्यर रहैछ।
सै चासक एक ताक खेतीमे ताक सर्वोपरि अछि ने कि सै बेर जोतब।
सै चोट सोनार के, एक चोट लोहार के सोनारक सै चोटक अपेक्षा लोहारक एक चोट पर्याप्तट होइछ।
सै तऽ सै निनानबेयो कम नइ क्योऽ ककरोसँ कम नहि रहैछ, तँ प्रयुक्तर।
सैतान जान ने मारे हरान करे दुष्ट व्य क्मित ककरो जान नहि लैछ, प्रत्युात ओ लोककेँ सतत पीडि़त करैछ, जे ओकर स्वाभाव होइछ।
सै दिन चोर के, एक दिन साधु के सब दिन चोरकेँ चोरि करब फबैछ, मुदा एकहि दिन साधु ओकरा पकडि़ लैछ तूं ओ सब बहार क’ लैछ।
सै बातक एक बात अनेक बातक जवाब एकहि बातमे देल जा सकैछ।
सैमे सूर सहस्त्र मे काना, सबा लाखमे अँइचा ताना, अँइचा ताना कहे पुकारि, हम मानल कुइरा सऽ हारि सयमे एक आन्हार, हजारमे एक कनाह, सबा लाखमे एक अँइचा ताना अपन-अपन अगतपनाक लेल प्रसिद्ध अछि तथापि अँइचा ताना कहैछ जे हम कुइर व्य क्तिसँ हारि मानि लेल अर्थात् कुइर सबसँ बेसी अगत्ती होइछ।
सैयाँके अरजन भैया के नाँउ, चूरी पहिर सासुर जाँउ स्वारमीा द्वारा प्रदत्त कपड़ा, आभूषणकेँ भायक नाम देब।
खोखगर अम्माब सँठिते बेयाकुल, निरधन अम्मा कनिते बेयाकुल बेटीक विदा काल सौखवाली माय नाना प्रकारक वस्तुल अपना बेटीकेँ दैछ, किन्तुे निर्धन माय तँ सतत कनैत रहैछ।
सोझ आँगुर सऽ घी नहि बहराइछ सोझ आँगुर घीक बासनमे देलासँ ओ नहि बहरा सकैछ।
सोति सुग्गाी ओ खरगोस, ई तीनू ने माने पोस सोति, सुग्गार एवं खरगोश ई तीनू कोनो स्थितिमे अपन नहि भ’ सकैछ।
सोधल बहुरिया डोम घर जाय नीकम जकाँ रहनिहारि कनियाँ अधलाह कर्मक फलस्वहरूप डोमक घर चल जाइछ।
सोन तऽ कान नइ, कान तऽ सोन नइ साधनक अभावमे साध्य तथा साध्यनक अभावमे साधन अकार्यक भ’ जाइछ।
सोन पूत बोनमे, कानी धिया कोनमे सोना सदृश पुत्र वनमे भ्रमण क’ रहल छथिा, किन्तुि कनाहि बेटी सतत कोनामे बैसल रहैछ।
सोनमे सुगन्धि सोन मूल्यनवान वस्तुन अछि जाहिमे स्वामभाविक रूपेँ सुगन्धि आबि जाइछ।
सोन सन कनियाँ के हुड़ार सन बर अनमेल विवाहपर व्यंुग्य ।
सोन सनक कनिया, छुछुन्नधरि सनक बर कनियाँ तँ सोनक समान पवित्र छथि, मुदा हनक वर छुछुन्न र सदृश छथि।
सोन सन धिया के रखबार सोन सदृश पुत्रीकेँ रखबारक प्रयोजन पड़ैछ।
सोनाक अँउठी टेढ़ो भला सोनाक जे अँउठी अछि ओ जँ नीक जकाँ नहि गढ़ल गेल अछि तथापि ओ नीक लगैछ।
सोनाक अँउठी पितरक टाका, माय छिनरी पूत बाँका अँउठी तँ सोनाक छनि टाका पितरक अछि।
सोनाक अण्डान दै बाली मुरगी मूल्य वान वस्तुब देनिहारक प्रसंगमे प्रयुक्ता।
सोनाक कटोरी अछि तऽ, दूधक कोन कमी सोनाक जँ कटोरी अछि तँ दूध कोनो-ने-कोनो रूपेँ भेटिए जायत।
सोनाक कटोरीमे भीख के देत सोनाक कटोदी ल’ कए कयो भ्ज्ञी ख माँगय जायत तँ भीख क्यो’ ने देत।
सोनाक चोट, निहाइक माथ सोनाकेँ आभूषण बनयबा काल सोनार ओकरा लोहाक निहाइपर राखि ठोकैछ।
सोनाक बड़ेरी, फूसक छप्पठर बड़ेरी तँ सोनाक अछि, मुदा ओकर छप्प र फूसक।
सोना दहायल जाय, कोइलापर मोहर सोना तँ बाढि़मे दहा रहल अछि, मुदा कोइलापर नियंत्रण कयल जा रहल अछि।
सोनार कहे जे नहि गाढि़ देब, तऽ कने देखहु दिअऽ सोनार कहैछ ‘आभूषण हमरासँ नहि गढ़बायब तँ कनेक्शन हमरा देखबाक हेतु दिअ।
सोना सोनार के, अबरन संसार के वस्तुसत: सोना तँ सोनारक रहैछ, किन्तु् ओकर विविध आभूषण बनाया संसारक ग्रहाक सुसज्जित होइछ।
सोने के दिअरा रूपे के बाती, लहरे लागल दिअरा जरे लागल बाती, रूसि रहल छयला करके लागल छाती सोना सदृश कन्याल छल।
सोमक धन खोट खाय कृपणक धनकेँ अधलाह आदमी खा जाइछ।
सोमक धन सन्ताधन खाय कृपण धन एकत्रित करैछ, किन्तुस ओकर वास्तधविक सदुपयोग ओकर सन्तानन करैछ।
सोलह सीसे सीस, तऽ समधियार कथीक जखन सोलह ठाममे एके ठाम बोनि भेटत तखन समधियारी कोन बातक ? संबंधक कारणेँ बेसीक आशा रखनिहापर व्यंटग्यक।
सोलहो सिंगार कइली नीक लगइअ, हमरा तऽ पिया नीक लगइअ, नगरक लोक सभ थूक धरइअ श्रृंगार-पटार कयल जे नीक लागत, किन्तु श्रृंगार-प्रसाधन एहन भ’ गेल जे नगरक लोक थूक द’ रहल अछि।
सोलहो सिंगार बतीसो अभरन स्रीो स सोलह प्रकारेँ श्रृंगार करैछ तथा बतीस प्रकारक आभरणक उपयोग करैछ।
सौख सऽ चूर फिकिर सऽ बुकनी शौकसँ चूर भ’ एम्हपर-ओम्हथर घुमैछ, मुदा आर्थिक विपन्नकताक कारणेँ फिकिरसँ मातत अछि।
सौखिन बहुरिया चटाइ के लहँगा नारी प्रदर्शनक बड़ बेसी अभिलाषिनी रहैछ, किन्तु् नीक वस्त्रर पहिरबाक साधनक अभाव रहैछ तँ चटाइकेँ साड़ी सदृश धारण करैछ, तँ व्यंडग्या।
सौतिन खुसामदे ससरा बास सौतिनकेँ प्रसन्नर रखलेपर सासुरमे रहि सकब।
सौदा लाभ के, राजा दाब के सौदा लाभक हेतु कयल जाइछ तथा राज दाओ-पेंचसँ चलैछ।
सौ पुत राम के, एको ने काम के सन्तातनाधिक्यै रहलोपर सब अकार्यक भ’ जाइछ, तँ प्रयुक्त ।
सौमे फूली सहसरमे काना, सबा लाखमे ऐंचा ताना, ऐंचा ताना कहे पुकार, कोंसा से रहियो होसिआर जकरा आँखिमे मोतियाबिन छैक ओकर संख्याँ एक सै अछि, एक हजारमे कनाह व्य्क्ति अछि, सबा लाखमे ऐंचा ताना हल्ला क’ कए कहैत अछि जे कुइर आँखिसँ सतत सावधान रहबाक प्रोजन अछि।
सौ सोनार के न एक लोहार के सोनारक सौ चोट लोहारक एक चोटक बरोबरि नहि भ’ सकैछ।
हंसक मन्तिरी कउआ हंसक मंत्री कौआ अछि।
हँसत तऽ फँसत बेसी हँसी-मजाकसँ संकटक स्थिति उत्प न्न- भ’ सकैछ।
हँसन्तह बाभन खोखना चोर, कुपढ़ कायथ कुलक बोर ब्रह्मणक हेतु विशेष हँसब, चोरक हेतु खोंखी करब एवं निरक्षर होयब समुचित नहि कारण ई सब अवगुण भ’ जाइछ।
हँसल घर राम बसाबे जाहि परिवारक अत्य धिक उपहास भ’ जाइछ तकर रक्षक भ’ कए राम उपस्थित होइत छथि।
हँसल नीमन, खसल ने नीमन ककरो उपहास करब नीक ने कि ओकरा उपहासक पात्र बनायब।
हँसि कऽ बाजे नारी, बनलो काज बिगारी हँसि क’ जँ स्त्री बजैछ तँ बनल काज सेहो बिगेडि़ जाइछ।
हँसि के बाजे नारी, तीनू कुल बिगारी हँसि क’ बाजैवाली स्त्रील दुश्चारत्रि होइछ, जे तीनू कुलक मर्यादाकेँ नष्टा क’ दैछ।
हँसि हँसि बात, करेजपर हाथ हँसि क’ जे बजैछ तथा करेजापर हाथ रखैछ ओ नीक नहि।
हँसीमे मसकरी हँसी-मजाकमे अकस्माैत झगड़ा भ’ जाइछ, तँ कहल जाइछ।
हँसी हँसी मारी कुकूर, रोइ रोइ फेँकोँ गूँह कुकूरकेँ मारलापर सब हँसैछ, मुदा ओकर गूँह फेकबाक बेर सब कनैछ।
हँसुआ चोख ने खुरपी भोथड़ ने हँसुआ तेज अतिछ आ ने खुरपी भोथ अर्थात् दुनु एक समान अछि।
हँसे काने गाबे गीत, ताहि मउगीक ने परतीत स्त्रीा जँ कखनो कनैछ, कखनो गबैछ तँ ओकरापर विश्वा्स नहि करबाक चाही।
हगबाक कि बघबाक डर दिसा फिरबा काल बाघोक डर नहि होइछ।
हगनी लजाय ने, पदनी उपराग दिये जाय जे मलत्यााग कयलक अछि तकरा कोनो लाजे नहि, किन्तुछ जे बसात छोड़लक अछि ओकरा ओ उपराग द’ रहल अछि।
हजामक बरियातमे ठाकुरे ठाकुर हजामक बरियातमे अगबे हजामे हजाम रहैछ।
हजाम के चूड़ा दही समांग के भूजा हजामकेँ चूड़ादही भोजनार्थ भेटि रहल अछि, किन्तुर घरक समांगकेँ भूजा।
हठ खाय कपार, बुद्धू खाय संसार जिद्दी व्यरक्तिकेँ बुझायब कठिन एवं मूख्र व्य्कित उत्पाेती होइछ।
हठी जोगी बरी राजा, न ले भीख न छोड़े दरबाजा योगी जिद्दी अछि तथा राजा जबर्दस्तभ ।
हठ्ठा सऽ कोल्हु अरबे नीक हरबाह हरबाहीक अपेक्षा कोल्हुआड़मे रहब नीक बुझैछ, कारण ओतय कुसियारक रस, मिट्ठा इत्या,दि सतत उपलब्धर रहैछ।
हड़बड़कइ काम गड़बड़ शीघ्रतासँ कार्य कयलासँ प्राय: ओ खराब भ’ जाइछ।
हड़बड़ीक घानी, आधा तेल आधा पानी तेल पेड़बा काल शीघ्रतासँ घानी देलासँ तेल नीक जकाँ नहि पेड़ाइछ।
हड़बड़ी बिआह, कनपट्टीमे सिनूर शीघ्रतासँ विवाहक विध सम्पनन्नन करबाक परिणाम होइछ जे माँगक बदला कनपट्टीमे सिन्दूार पडि़ जाइछ।
हड़हीक रंग, बइरागीक संग हरही स्त्रीि अर्थात् बदमाश कखन अपन रंग बदलि लेत तकर कोनो ठेकान नहि।
हथकट्टी हाथक के, उकटी हाथक ने खाय के कृपणक ओतय भोजन करब किछु हर धरि नीक, कि‍न्तु जे उकटी अर्थात् उपराग देनिहार अछि ओकर हाथक नहि खैबाक चाही, कारण कखन ओ उपराग द’ देत तकर कोनो ठेकान नहि।
हथिया पेटसे निकलल जाड़ हस्ता नक्षत्रसँ प्रारम्भ भ’ जाइछ।
हथिया बरिसे चित मँड़राय, घर बइसल गिरहथ नितराय हस्ता नक्षत्रमे वर्षा तथा चित्रा नक्षत्रमे आकाश मेघसँ आच्छकन्ना रहलापर गृहस्थआ नितराइछ, कारण धानक उपजा उत्तम होइछ।
हने को हनिये, दोष पाप न गनिये दोषीकेँ दण्ड देलापर कोनो पाप नहि होइछ।
हम अपखैतनी रबि केने छी, सबा सेर चूड़ा जलखै केने छी बहुभोजी स्त्री कहैछ जेहम रवि कयने छी आ सवासेर चूड़ा जलखे कयलहुँ।
हम अपना गहूँमक भूजा भुजाएब, ताहि सऽ अनका की अपन गहूँमक जँ हम भूजा भुजा क’ समाप्तू करब ताहिसँ आन व्यैक्तिकेँ कोन प्रयोजन ?
हम अहाँ लै तीमन तरैत छी, आ अहाँ हमरा नामे बकियौता लिखैत छी क्यो जकर उपकारमे लागल रहैछ वैह जखन ओकर अपकार करैत रहैछ तँ व्यंओग्यत।
हम करी अनकर, हमरे कहे कमहर हम तँ सतत दोसराक नोकरी करेत्‍ छी आ हमर नोकरीक काज के करत ?
हमकी लागी एहन ओहन, हमरा केथरीपर साबनु जेहन हम की एहन-ओहन छी ? हम अपन फाटल पुरान केथरीपर साबुन लगबैत छी।
हम गे तू गे तोरा से की कम गे हम छी, तोँ छँ, तोरासँ के कम अछि? ककरासँ के बड़ अछि तकर निर्णय नहि भेलापर कहल जाइछ।
हम चराबी डिल्ली।, हमरा चराबे घर के बिल्लीब हम तँ संपूर्ण दिल्ली पर शासन करैत छी आ अमरापर घरक बिलाइ शासन करैछ।
हम छोड़ी तऽ छोड़ी, कमरिया छोड़े तब ने हम तँ छोडि़ दैत छी, मुदा कमरिया छोड़य तखन ने।
हम डारि डारि, तोँ पात पात हम कोनो कार्य करबाक निमित्त जाहि रूपक योजना बनबैत छी तकर जानकारी सर्वधाराणकेँ पहिने भ’ जाइछ ।
हम तऽ राजा जी के बेटी महाराजी बेटी, हमरा तरबामे घी हमरा के कहत की निरर्थक अहंकर कयनिहारके उक्ति।
हम नइ देखबउ देखतउ आन, हम नइ सुनबउ सुनतउ आन ककरो क्योत कहैछ, हम तँ नहि देखब, हम नहि सुनब जे जीवित रहत ओ देखते आ सुनत।
हम नरौनेक छी, हमरा कहत की, हमरा तरबेमे घी हम ‘नरौने’ वंशक बेटी छी।
हम निमन तऽ दुनियाँ नीमन अपने नीक रहब तँ संसारो नीक बूझात।
हम बइसलहुँ बुढ़बा जानि, बुढ़बा सूतल सलगा तानि हम बूढ़ जानि क’ बैसबाक स्था़न देल, परन्तु़ बुढ़बा सलगा ओढि़ क’ सूति रहल।
हम बूढ़ गै हम नै बूढ़, बुढ़बा बियाहलक तएँ भेलहुँ बूढ़ अपन बुढ़ारीकेँ नुकयबाक कोनो बहन्नाढ कए कहब।
हम मरि जायब तोरा ने भजायब, तोरा देखि देखि जियरा जुड़ायब पति पत्नी केँ ‘हम तँ अहाँक रूप-सुषमा देखि क’ सन्तो ष करब।
हमर गहूँम सऽ घर घर पूजा, हमरा कुतरुमक भूजा हमरे गहूँमसँ घर-घरमे पूजा भ’ रहल अछि, मुदा हमरा खयबाक हेतु कुतरुमक भूजा भेटैछ।
हमर धिया किछु ने खा‍थि, टुके टुके अढ़ाइ रोटी खाथि बहुभोजी व्यखक्तिपर व्यंहग्यु।
हमर बिलाइ हमरे मिआँउ ककरो अधीनस्थर व्यपक्ति जँ ओकरे आँखि देखबैछ, तँ प्रयुक्तं।
हमर बेटी सासुर जाय, आगाँ आगाँ भरिया जाय, भरिया खोलि खोलि खयने जाय, हमर बेटीक नाम लगौने जाय हमर बेटी सासुर जा रहल अछि।
हमर साँयक उनटे रीत, साओन मास उठाबथि भीत पत्नीि कहैछ, ‘हमर स्वामीक उनटे रीति छनि।
हमरा केओ ने मारै तऽ हमर संसार के मारि आबी हमर जँ केयो विरोध नहि करय तँ हम संसारकेँ मारि सकैत छी।
हमरा बाप के ठकले तोँ, ताहू लेले ढुढुर।मढू कोनो मूढ़केँ ठकबाक निमित्त बेसी ताम झामक प्रयोजन नहि पड़ैछ।
हमरा मारब पेटमे, हम मारब खेतमे हमरा भोजनमे कष्ट देब तँ हम खेतमे नीक जकाँ काज नहि करब।
हमरे जनमल हमरे कहे इनरमन हमर जे जनमल अछि वैह हमरा मूख्र बनबैछ।
हमरे झड़ी सुहाना घड़ी, आ जखन अपनापर पड़ी, ऐसन खुदा कभी ने कड़ी विपत्ति कोनो स्थितिमे ककरोपर नहि आबय,तकर कामना ।
हमरे सिखायल गोनुआ बाघ मारे हमरे द्वारा प्रशि क्षित छथि, तेँ आब मारैत छथि।
हमरो सऽ हमर समधि सियान, पुतोहुक मुह देखता बिहान हमरासँ हमर समधि चतुर छथि।
हम सुकुमार हमर साँय बनिहार, केओ तीन कउड़ी ले, केओ बोइन आनि दे कोनो स्त्रीह कहैछ जे हम अत्यबन्तत सुकुमारि छी।
हम सुनरी पिआ सुनरा, गामक लोक बनरी बनरा स्त्रीन, कहैछ, ‘एहि संसारमे हम सर्वसुन्दिरी छी।
हरक भाँगठ हरसालि प्रत्येगक वर्ष हरमे कोनो-ने-कोनो भांगठ लगले रहैछ।
हरकाओल नीक, परिकाओल ने नीक फटकारल व्य क्ति नीक, मुदा परिकाओल व्याक्ति कोनो स्थितिमे नीक ने रहैछ।
हरकायल नीक, परिकायल ने नीक कोनो व्यीक्तिकेँ अधिक प्रश्रय देब नीक नहि होइछ।
हरखे पितर तिलांजलि पाबे वंशज जँ प्रसन्नज रहैछ तँ पितरकेँ तिलांजलि दैछ।
हरती ने धरती, देह लेटायल माँझ परती अपना तँ जगह जमीन नहि छनि, मुदा दोसराक जमीनपर परिश्रम करैछ।
हरदी दह दह नून बिहुन, फुरहीक रान्हरल हैत केहन तरकारी वा दालिमे हरदिक आधिक्य तथा नोनक अभाव अछि।
हर ने फार चमक दऽ हेंगा हर फार खेतमे किछु ने देलनि, मुदा चमकि क’ हेंगा द’ देलनि।
हर ने फार लबर लबर कर हर फार किछु ने छनि, मुदा बेकार एम्हकर-ओम्हार करैछ।
हर ने बड़द, ढोढ़ाय मड़र हर बड़द नहि छनि, किन्तुर कृषिक सरदार बनल छथि।
हर बड़द घरे, उपजा तोरा डरे हर बड़द सब दिन बैसले रहैछ तँ खेतमे डरसँ उपजा कतयसँ आओतैक ? बिनु उद्यमक उत्पायदन संभव नहि।
हर बहे बड़द, हकमे कुकूर हरमे परिश्रम तँ बड़द करैछ, मुदा घरमे बैसल कुकूर हकमैछ।
हर बहे से खर खाय, बकरी पथार खाय तुo हर बहे से खर खाय, बकरी अँचार खाय
हर बहे तऽ अपनो बही हर जोतयबाकाल उपस्थिति अनिवार्य अछि।
हरबाहे हर, घरनिये घर हरबाहेपर गृहस्थी् तथा गृहिणीपर घर समुचित रूपेँ चलैछ, अन्यतथा नहि।
हरबाहो चरबाह के इनारक पानि हरबाह चरबाह की इनारेक पानि पीअत ? सब वस्तुब एक समान भेलापर कहल जाइछ।
हरमे जँहि तँहि, चउकीमे बीहड़ बड़द हरमे तँ हनछिन करैछ, मुदा चौकी देबामे फेहम अछि।
हर लागल पताल, भागि गेल अकाल नियोजित ढंगे हर जोतल जाइछ अर्थात् जमीनकेँ कोड़ल जाइछ, तँ अकाल भागि जाइछ।
हरहा हाथी हाकिम चोर, बिगड़लापर ने लागे ओर बदमाश हाथी तथा घुसखोर हाकिम जखन खिसिया जाइछ तँ ओ की करत तकर अन्तय नहि भेटैछ।
हरहीक कोखिमे सुरही बदमाश व्यिक्तिकेँ कुरूप सन्ता‍नक जन्मा भेलापर प्रयुक्तर।
हरही गाय के गारा लटकन बदमाश गायकेँ गर्दनिमे लटकन बान्हि देल जाइछ।
हरही गाय के घंटी सिंगार बदमाश गायकेँ घंटी बान्ह ल जाइछ तकरा ओ श्रृंगार बुझैछ।
हरही गाय लेखेँ, चास कते दूर बदमाश गायक हेतु खेत बेसी दूर नहि होइछ।
हरही संगे कपली जाय, दूनू मारि बरोबरि खाय नीक व्यखक्तिकेँ बदमाशक संग भ’ जाइछ तँ दण्डव दुनूकेँ समान रूपेँ भोगय पड़ैछ।
हरही संगे सुरही जाय, घी खिचड़ी बरोबरि खाय बदमाशक संग सुराह व्यँक्तिक कुसंगति भ’ जाइछ, तँ समान रूपेँ जेलमे खिचडि़ खाय पड़ैछ।
हरिनक गबाही सुगर हरिणक गवाही सुगर की देत ? भक्षकसँ भक्ष्यगक रक्षाक आशा करब निरर्थक।
हरिनक जामिल सुगर भेल, दुनू भागि कऽ जंगल गेल हरिणक जमानतदार सुगर भेल, किन्तुक ओकर परिणाम भेल जे दुनू पड़ा क’ जंगल चल गेल।
हरियर खेती गाभिन गाय, तब जानिय जब कंठे जाय हरियर फसिल तथा गाभिन गायक कोनो विश्वाफस नहि।
हरि रूसे गुरू देय मिलाय, गुरू रूसे हरि सकत न पाय भगवानक अप्रसन्ने भेलापर गुरुक माध्य मे हुनका मनाओल जा सकैछ, मुदा गुरुक अप्रसन्ना भेलापर समस्यार रहैछ जे हरि गुरुकेँ नहि मिला सकैछ।
हलुआइक दोकान, आ दादाक फतिहा हलुआइक दोकानपर दादाक प्रशंसा होइछ।
हल्लुकक बाजा सहनाइ बाजामे हल्लुलक शहनाइ होइछ।
हल्लुेक माटि बिलाडि़ कोड़े काज आसान अछि, तँ सब सुगमतापूर्वक करैछ।
हल्लु क सबार घोड़ा फौछ मारे सबार हल्लुछक अछि, तँ घोड़ा अकडि़ क’ चलैछ।
हाँड़ी छूछ सोमार के नौता हाँड़ीमे किछु ने छैक, किन्तु सोम दिनक निमंत्रण दैत अछि।
हाँड़ीमे डाली ने चली समधिन हाँड़ीमे साग पर्यन्त नहि छनि, मुदा समधिनकेँ भोजनार्थ आग्रह क’ रहल छथि।
हाँसुक बिआहमे खुरपीक गीत हाँसुक विवाह भेल, किन्तुछ गीत भेलैक खुरपीक।
हाकिमक घोड़ी, छओ पसेरी दाना घोड़ी तँ हाकिमक छनि, तँ ओकरा छओ पसेरी दानासँ कममे निर्वाह नहि होइछ।
हाकिम टरे, हुकुम ने टरे अधिकारीमे परिवर्त्तन भ’ सकैछ, मुदा हुनका द्वार जे हुकुम देल जाइछ ओ यथावत् रहैछ।
हाकिम हारे तऽ मुहमे मारे अधिकारी जँ पराजित भ’ जाइछ तँ ओ नाना प्रकारेँ कष्टभ दैछ।
हाकिनी डाकिनी, बरहम पिसाचिनी फल्लाँ तँ कहल डाइने ने अछि, प्रत्युपत ओ तँ ब्रह्मपिशचिनी अछि।
हाटक चाउर बाटक पानि, छनहिमे बिला जाय कीन क’ आनल चाउर तथा बाहरसँ आनल पानि क्षणहिमे बिला जाइछ।
हाटक चाउर बाटक पानी, बइसल खाली डोमबाक रानी डोमक पत्नीी सतत हाटक चाउर तथा रस्तापमे भेटनिहार निर्भर करैछ तथापि ओ रानी कहबैछ।
हाथ कंबगन आरसी की काज जे वस्तुन प्रत्य क्ष अछि ताहि प्रसंगमे विशेष जानकारीक कोन प्रयोजन ?
हाथ काटि कऽ घाओ करी, दइबके दोस दी हाथ स्वियं कटलनि, मुदा दोष द’ रहल छथि विधाताकेँ जे वैह हाथ काटि देलनि ।
हााि खाली नथ बाली हाथमे एको पाइ नहि छनि, मुदा नाकमे नथिमया पहिरने छथि।
हाथ गोड़ छोट मोट पेट बरोबरी हाथ पैर तँ बड़ छोट छनि, मुदा भोजन सियान अर्थात् जवान सदृश करैछ।
हाथ चले गोड़ ठामे ठाम हाथ तँ चलि रहल छनि, मुदा पैर तँ जतय छलनि ततहि छनि।
हाथ पैर सूत सन, लौड़ा बन्दू क सन शारीरीक असंतुलन रहलापर प्रयुक्त ।
हाथ मलने हैत की, बाझ तऽ उडि़ गेल पश्चालत्ताप कयलासँ कोनो फल ने भेटत, कारण हाथक वस्तु् तँ उडि़ गेल ।
हाथमे कङना तऽ ऐनाक कोन काज प्रत्यकक्षक प्रमाण की ?
हाथमे ने गोड़मे टकुली लिलारमे हाथ वा पैरमे आभूषणक अभाव अछि, किन्तु ललाटपर टिकुली चमकैछ।
हाथमे ने गोड़मे, टकुली लिलारमे हाथ वा पैरमे आभूषणक अभाव अछि, किन्तु ललाटपर टिकुली चमकैछ।
हाथमे लोटा काँखि तर बच्चक, तखन बुझल करियामाक लुच्चाब हाथमे लोटा तथा काँखितर बच्चाच छैक।
हाथ सनक देह, चुट्टी सनक जान मनुष्यकक शरीर तँ विशाल रहैछ, मुदा प्राण तँ चुट्टी सदृश अछि।
हाथ सूखल, बरामन भूखल एक स्थालनसँ भोजनक पश्चालत् ब्राह्मणक हाथ धोयबाक हेतु उठैछ तखने हुनका पुन: भूख ला‍गि जाइछ।
हाथ सुमरिनी, बगल कतरनी हाथमे माला ल’ कए भगवानक स्मारण करैछ, मुदा व्यकवहारमे सबकेँ जान लैछ अर्थात् कतरनीसँ कतरैत छथि।
हाथी अपने पयरे भारी, चुट्टी अपने पयरे भारी हाथी अपन पैरक भार तथा चुट्टी अपन पैरक भारक अनुभव करैछ।
हाथीक आगाँ पाछाँ बुझैबे ने करे हाथीक कोन आगाँ आ कोन पाछाँ, बूझाब दुरूह होइछ।
हाथीक दाँत, मरदक बात सत्पु रुषरक वचन हाथीक दाँतक समान अथ्छु जे अत्युन्तथ कठिनतासँ बहराइछ।
हाथीक दाँत खाइ ले कोनो, देखाबै ले कोनो देo हाथीक दुइ दाँत, एक खयबाक दोसर देखयबाक
हाथीक दुइ दाँत, एक खयबाक, दोसर देखयबाक हाथीक खायवला तथा देखाबयवला दाँत पृथक्-पृथक् होइछ ।
हाथीक पीठपर रुइयाक फाहा हाथीक पीठपर जँ रुइयाक फाहा राखल जाय तँ कोनो फर्क नहि पड़ैछ।
हाथी कूदे घोड़ा कूदे, तइ पाछू नरगदही कूदे हाथी घोड़ा कूदि रहल अछि तकरा पाछाँ-पाछाँ नरगदही सेहो कूदि रहल अछि।
हाथी खबइया घोड़ाक पकउड़ी हाथी खयनिरकेँ जँ घोड़ाक पकौड़ी देल जाय तँ ओकरा किछु ने होइछ।
हाथी चल गेल हथियार चल गेल, हाथमे सिक्कचड़ नेने बउआइत छी हाथी एवं हथिसार चल गेल, मुदा हाथमे सिक्कएड़ नेने बौआ रहल छी जे हम हाथीबाला छलहुँ।
हाथी चले घोड़ा चले, तकरा पाछाँ संगरौर चले हाथी घोड़ाक पाछाँ-पछाँ छोट-छोट जानवर सेहो चलि रहल अछि।
हाथी चले बजार, कुत्ता भूके हजार हाथी बजार जा रहल अछिर तकरा देखि क’ कुकुर पाछाँ-पाछाँ भूकैछ, किन्तु् ताहिसँ हाथीक किछु ने बिगैड़ैछ।
हाथी निकलि गेल मुदा दोम लटकल अछि हाथी बहरा गेल, मुदा ओकर नाङरि लटकले रहि गेल।
हाथी बाझे जंगलमे, छाती फाटे राजा सलहेस के हाथी जंगलमे बझाओल जाइछ, किन्तु ईर्ष्याग भ’ रहल छनि राजा सलहेसकेँ जे सब हमर हाथी बझा लेलक।
हाथी बिका गेल आँकुस ला मारि हाथीक तँ बिक्री भ’ गेल, मुदा ओकर आँकुशक हेतु आपसमे मारि भ’ रहल अछि जे हम लेब, तँ हम।
हाथी बुले गामे गाम, जकर हाथी तकर नाम हाथी तँ गामे-गामे जाइछ, किन्तुँ ओकरे नाम लेल जाइछ जकर हाथी रहैछ।
हाथी मइया हथनी, धिया पूता लदनी एहि लोकोक्तिक प्रयोग बच्चा। सब अपन मनोविनोदाथ्र करैछ जकर विशेषार्थ किछु नहि।
हाथी हैत तऽ महाउत ने भेटे हाथी हेत तँ महाएत भेटबे करत।
हाथे धनु कान्हेए बान, कतय चलल डिल्लीँ सुलतान दिल्ली क सुलतान कतय चललाह? हुनका हाथमे धनुष छनि तथा कान्हतपर वाण।
हाय ने झड़ी सुहाना घड़ी, आ जखन अपनापर पड़ी, ऐसन खुदा कभीन ने करी दोसराक विपत्ति दोसराकें नीक लगैछ, किन्तक वैह अपनापर अबैछ तँ भगवानसँ प्रार्थना करैछ जे एहन ककरो ने होइ।
हारने हरि नाम असफल व्यिकित भगवानक स्मँरण करैछ।
हारल नटुआ झिटकी बीछए नटुआ हारि जाइछ तँ ओ कंकड़ चनैछ।
हारल बिलाइ खम्भाँ नोचे असफल व्याकित अपनहि माथ नोचबाक चेष्टा् करैछ, तँ प्रयुक्त ।
हारिओ जायब, राजो चाहब मनोनुकूल सब वस्तु प्राइज़ अभिलाषा रखलापर प्रयुक्तत।
हारि पच्छर मड़ुआ भच्छ् जखन कोनो उपाय नहि रहैछ तखन लोक मड़ुआकेँ अन्न क रूपमे स्वी कार करैछ।
हारि माने तऽ झगड़ा छूटे ककरोसँ विवाद भेलापर क्योू पराजित भ’ जाइछ तँ झगड़ा स्वपत: छूटि जाइछ।
हारों तऽ हूरों, जीतों तो थूरो हारि जायब तँ हूरि देब जीतब तँ थूरि देब।
हिछें गोतपर, परे पूतपर गकोलियाक अधलाह कामना कयनिहारकेँ प्रतयक्ष प्रभाव अपन सन्ताहपर पड़ैछ।
हिनका माथा नाचै अछि काल विपत्तिक आगमनक सूचना काल दैछ।
हिन्नूि बढ़े नेत सऽ, मुसलमान बढ़े कुनेत सऽ हिन्दूिक विकास धर्म-कर्म कयलासँ होइछ, किन्तुि मुसलमानक वृद्धि अधर्म कयलासँ।
हिन्नूि रे हिन्नूव, एके नाडि़ पुरइनक दुन्नूत हिन्दूि-हिन्दू मे कतबो जातिगत विभिन्नरता किएक ने हो अन्तरत: तँ ओ हिन्दूतए कहबैछ।
हिया रे हिया, एक ढ़ेउआ जमाय के दिया कतेक विशाल वा उदार हृदय छनि जे एक ढ़ेउआ जमायकेँ देलनि।
हिलब ने डोलब, बइसल बइसल मेलब हाथ पैश्र नहि चलायब, प्रत्युेत बैसल-बैसल खाली खयबाक उपक्रम करैत रहब।
हिलले रोअी बहाने मौत काज करब तँ भोजन भेटत अन्यबथा मृत्युि।
हिसकी पाथर कयलक बड़ाय, हमहूँ छी महादेब के भाय देखादेखी पाथर अपन प्रशंसा स्वयं कयलक जे हम महादेवक भाय छी ।
हिसके पादी गाँडि़ चरचराय बेआदतिक देखाँउस करब, तँ प्रयुक्तय।
हिसके बनली पतिबरता, मूसर खैलन भरत देखाँउस क’ कए पतिव्रता बनबाक उपक्रम करैछ, किन्तु परिणाम विपरीत भेलापर व्यंँग्यि कयल जाइछ।
हीड़ भीड़ कहयरिया के, छाती फाटे लोकनियाँ के महफाका सब भार तँ कहरियाकेँ वहन करय पड़ैछ, मुदा छाती फाटि रहल अछि लोकनियाँक।
हीरा हेरा गेल कतरनमे हीरा एतेक सूक्ष्मन छल जे ओ कटिते-कटिते समाप्तत भ’ गेल।
हुए तऽ ठाँउ दऽ कऽ पादी, ने तऽ पदने जाइ भागल जाइ जँ संभव हो तँ नियामनुसारेँ कार्य करी अन्यंथा जहिना संभव हो तहिना काय्र करबाक चाही।
हुकमी ने रुक्मीि, गोतनी ने अपनी ने तँ कोनो आदेश अछि आ ने कोनो रकम।
हुक्मीककी रुक्मीे हुकूम पैघ अछि अथवा रकम ? तात्प र्य सरकारी आदेश सर्वोपरि अछि।
हुड़ार चिन्हेर बाभन पूत हुड़ार थोड़बे चिन्हैहछ जे क्यो् ब्राह्मणक बेटा थिक? दुष्टे प्रकृतिक लोक सबकेँ समान रूपँक अनिष्ट करैछ, तँ कहल जाइछ।
हुनक लग्धी़ सऽ चिराग जडै़छ अमुक व्यधक्तिक एतेक शान-‍शौकत छनि जे जुनक लग्धी़सँ चिराग बरैछ।
हुबगर तिरिया पहाड़ ढाहे बुद्धिमति पत्नीा दुस्साैध्यल परिश्रमक बलपर पहाड़ पर्यन्तन ढाहि दैछ।
हे आँखि तों जनि झाँखि, जीयब तऽ सब देखब आँखी हे आँखि ! तों किएक झखैत छह! जँ हम जीवित रहब तँ सब किछु अपना आँछिए देखि लेब।
हे धरती तों फाटह हम समायब अत्यातचारन देखि क्योछ कहैछ,’पृथ्वीर तोँ फाटि जा, हम ओहिमे प्रवेश करब।‘
हे ननदो तोरो ननदो भौजाइ ननदिकेँ संबोधित करैत कहैछ, ‘हे ननदि ! चिन्ताब जुनि करू अहूँकेँ ननदि हैबे करती।
हे मन ककरा ला मरी, तऽ से मरे हमरा ला प्रश्नक-‘हे मन ककरा हेतु मरैत छह? ‘उत्तर- ‘जे हमरा हेतु मरैछ ।‘
हे रतनउउती, एतक बात ओतय पहुँचइती हे रतन पौती ! अहाँक एतबे कार्य अछि जे एहि ठामक बात ओहि ठाम पहुँचा देब।
हे सइयाँ लहू, हगलो बतिया कहू पत्नीय पतिसँ कहैछ, ‘ निकृष्ट सँ निकृष्अत बात अहाँ हमरा कहू।’
हे समरो तोरा तोरा संगे पति गेल हमरो हे सखी! तोरा कारण हमरो इज्जयति समाप्तक भ’ गेल।
हे हरख तोहर पेट किएक तरख, ई की देखलह देखियह अगिला बरख क्योर ककरो पुछलक ‘अहाँक पेट एतेक बेसी किएक तरखायल अछि ? एहिपर ओ जवाब देलक, ‘एहि वष्र की देखलहुँ अछि ? देखब अगिला वर्ष।
हेहरा गाँडि़मे गाछ जनमल, तऽ कहलक हम छाहरिमे छी हेहर व्यमक्तिकेँ कतहु गाछ जनमलैक तँ कहलक जे हम छाहरिमे छी।
हेहरा रे हेहरा कोना रहै छै, लात मुक्काी खाइ भने रहै छी हेहर व्यरक्तिक प्रसंगमे प्रयुक्त ।
हेहरी गे हेहरी, साँय मारलक बापक देहरी थेथर महिलाकेँ स्वा्मी प्रताडि़त करैछ तँ ओ बापक ओतय पड़ा जाइछ।
हें हें करैत छी, साँयक जनैत छी संपूर्ण विषय वस्तुइसँ अवगत छी।
होअक भीन, खायक रीन परिवारसँ पृथक् भ’ कए ऋण ल’ कए खाइत छथि।
होनहार गाछ के लहुलुहार पात जे गाछ होनहार होइछ ओकर पात अत्यान्तइ झमटगर प्रारंभहिसँ होइछ।
हो भइया तोहर बहु भउजाइ, हम कतय जाइ ओहीमे घुसिआइ छोट भाय बड़ भायकेँ संबोधित करैछ, ‘ अहाँक पत्नी हमर भाउज छथि, तँ हम कतय जाउ? हमरो हुनकापर समान अधिकार अछि।’
होसियार माखे सात ठाम बुद्धिमान व्यसक्ति सात स्थामनपर पछड़ैछ।

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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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