Sunday, February 07, 2010

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दालिओ मीठ, तरकरी ओ मीठ सभक समान स्व,भावेँ अर्थात् सब बातपर हूँकारी देनिहारपर व्यंाग्य्।
दालि भातमे मूसर चंद दालि भातमे मूसर चंद बनल अछि।
दालि भात रोटी, सब बात खोटी दालि, भात एवं रोटीक अतिरिक्तब जे बात करैछ ओ बेकार थिक।
दालि भात सलोरे, जाड़ घूड़ धिधोरे दालि, भात गील खयबामे नीक लगैड।
दालिमे मुनिगा दू तीमन एकहि वस्तुिसँ दू काज भेलापर प्रयुक्त ।
दाहामे सब पहलमान, बरियातमे सब बाबू दाहाक अखाड़ापर सब पहलवान बनि क’ लाठी भजैत अछि तथा बरियात जयबा काल सब अपनाकेँ बाबू जकाँ सजबैत अछि।
दिगम्‍बरक गाममे, धोबीक बास जाहि गाममे लोक दिगम्बकर रहैछ वस्त्रबक प्रयोग नहि करैछ ततय धोबी रहि क’ की करत? जतय उपभोग कयनिहार नहि हो तँ उपभोग्यन वस्तुोक कोन प्रयोजन ?
दिदगर कनियाँ के दादा लोकनियाँ कनिया दिदगर अछि तँ ओकर लोकनियाँमे दादा जाइत छथि।
दिदगर भाबो के भैसूर लोकनियाँ देo दिदगर कनियाँ के दादा लोकनियाँ
दिन अल्हु आ राति सुथनी, कुटुम अयलापर भात चिखली पहिने दिनमे अन्हुुआ, राति क’ सुथनी खाइत छलहुँ, पाहुन अयलाह तँ भात चिखबाक अवसर भेटल।
दिन के हरे हरे, राति के घरे घरे दिनमे बाबाजीक स्व रूप बनायब भगवानक नाम जपैछ, किन्तु राति क’ घरे-घर भ्रमण क’ गृहस्था श्रमक आनन्दव उठबैछ।
दिन दिन भेल मलेच्छाक पहरा, नेत धरम गेल गामक बहरा कलियुगमे दिनप्रतिदिन म्लेच्छहक पहरा पड़य लागल तकर परिणाम भेल जे ईमान आ धर्म गामसँ पड़ा गेल।
दिन धराबे तीन नाम अधलाह दिनक कारणेँ मनुष्य केँ अनेक नाम राखल जाइछ।
दिन भरि डग डग, राति भरि ठक ठक दिन भरि एम्हगर-ओम्हठर धुमैछ तथा राति भेलापर सभक घर जा क’ पहरा दैछ।
दिन मंगलहुँ तऽ साबा सेर, राति मंगलहुँ तऽ साबा सेर एक व्याक्ति भीक्षाटन प्रारंभ कयलनि।
दिनमा चलि गेल, गुनमा रहि गेल नीक वा अधलाह दिन तँ व्यमतीत भ’ गेल, मुदा गुण धरि रहि गेल।
दिनमे ईद रातिमे सरबत दिनमे ईद मनबैत छथि तथा राति क’ सरबत पीबैत छथि।
दिनमे कौआ देखि कऽ डेराइ, रातिमे नदी हेलि जाइ दिनमे कौआ देखिक डर होइत छनि, मुदा रातिक नदी हेलि जाइत छथि।
दिन रे दिन तोही खियले बेटाक रीन जखन लोकक असमय अबैछ तँ ओ अपन बेटासँ ऋण्‍ लैछ।
दिन सुथनी राति उपास दिनमे सुथनी खा क’ निर्वाह तथा रातिमे उपवास होइछ।
दिया तर अन्हाार दीप जरि क’ सगरो प्रकाशित करैछ, किन्तुल ओकर पेनीक नीचाँ अन्हागरे रहैछ।
दियामे तेल ने मोछ फहराय घरमे दीया जरैबाक हेतु तेल नहि छनि, मुदा बाहर मोछ फहरा रहल छथि।
दिया तर अन्हा र दीप जरि क’ सगरो प्रकाशित करैछ, किन्तुल ओकर पेनीक नीचाँ अन्हागरे रहैछ।
दियामे तेल ने मोछ फराय घरमे दीया जरैबाक हेतु तेल नहि छनि, मुदा बाहर मोछ फहरा रहल छथिन।
दिल गे दिल भात किए गील, अरबा चाउर छल तेँ भेल गील, दाइ गे दाइ साग किए तीत, पटुआ साग छल तेँ भेल तीत एकर प्रयोग धीयापुता सब खेलबाक क्रममे करैत अछि।
दिल मिलल देबाल सऽ, तऽ परीक कोन काज मन जखन देवालसँ मिल गेल तखन परीक्षा कोन प्रयोजन? कुरूप स्त्री सँ जकरा प्रेम भ’ जाइछ ओकरा हेतु सुन्देरि स्त्री क प्रयोजनीयता नहि रहैछ।
दिल्लीनक कमाइ, दिल्लीन गमाइ दिल्लीनमे जे उपार्जित कयलहुँ ओ समाप्तल भ’ गेल।
दिल्लीनक लड्डू जे खयलक सेहो पछलायल, जे ने खयलक सेहो पछतायल दिल्लीनक लड्डू खाउ अथवा नहि खाउ पश्चाीत्ताप अवश्य करय पड़त।
दिसा मारे रोगी, पेसाब मारे भागी पैखानापर रोगी तथा पेशावपर भोगी व्यकक्ति नियंत्रण क’ लैछ।
दुआरिपर बाबाजी लटकल कोनो वस्तुबक लेल जँ क्योव जिद्दमे धरफरनियाँ दैछ, तँ प्रयुक्तर।
दुआरि लागल बरियात, समधिन के लागल हगबास दुआरिपर बरियात आबि गेल ताही बीचमे समधिनकेँ पैखाना लागि गेलनि।
दुइ मुल्हाैमे मुरगी हराम दुइ कसाइक बीचमे बीचमे हराम भ’ गेल।
दुख एहन सुख से, जे पन्थम जोड़ल जाय सुखसँ पीड़ाकेँ आमंत्रित कयलनि जाहि निमित्त पथ्ये-पानिक व्यमवस्थाल क’ रहल छी।
दुखक राति पहाड़ विपत्तिग्रस्तड व्ययकितक लेल राति बितायब पहाड़ सदृश भ’ जाइछ।
दुखड़ी झाक दडि़भंगा कोनो गाँवमे एक व्याक्ति अपन पड़ोसीसँ पुछलथिन जे अहाँके दरभंगा जयबाक अछि ?एहिपर क्योँ कोनो जवाब नहि देलकनि।
दुख दुखे गेल, सुख सपना भेल संपूर्ण जीवन तँ कष्टेोमे व्य तीत भेल।
दुखपर पाचक दुख भेलापर पाचकक जोगार होइछ।
दुखहि जनम भेल दुख भेल साथी, दुखहि बिआह भेल दुखन बराती देo दुखे जनम दुखे बिआह भेल, दुखे बराती दुखे के साथी
दुखियाक घर जरे, सुखिया पीठ सेदे दीन-हीनक घरक विषम परिस्थिति देखि सु।खी व्यरक्ति ओहिसँ लाभ उठबैछ।
दुखिया गेल सुख करे, गोड़मे गरल खुट्टी कोनो दुखी व्यखक्ति सुख करबाक उद्देश्येँ कतहु गेल, मुदा ओकरा पैरमे खुट्टी गाडि़ गेलैक।
दुखे जनम दुखे बिआह भेल, दुखे बराती दुखे के साथी कष्टेकमे जन्मल भेल, कष्टुमे विवाह सेहो भेल, दुख बरियाती बनि क’ आयल आ दुखे हमर जीवनसंगी बनि गेल।
दुर्गाक अर्थ छागर दुर्गाकेँ प्रसन्न करबाकहेतु बलिप्रदानमे छागर पड़ैछ।
दुर्गाक स्थारनमे मुर्गाक पूजा असम्बाद्ध कार्य कयनिहारपर व्यंाग्या।
दुधगरि गाय के लथारो नीक जे गाय दूध देनिहार अछि ओकर लथाड़ मारब सेहो नीक लगैछ।
दुनियाँक मुह के रोकलक संसारक लोकक मुहपर क्यो ताला नहि लगा सकैछ।
दुनियाँमे ककर के होइछ संसारमे ककर के होइत छैक? अर्थात् संसारमे क्योक ककरोम ने होइछ।
दुनियाँ ला दाता आ अपना ला दलिद्दर संसारक हेतुएँ तँ दाता थिकाह, मुदा अपना हेतु तँ दरिद्र छथि।
दुनू पड़ोसिया एके रूप, ने हुनका बढ़नी ने हुनका सूप दुनू पड़ोसी एकहि रूपक छथि।
दुनू रोटी चाउर के, पपरा गहूँम के दुनू रोटी तँ चाउरक छनि, मुदा ओकर पपरा गहूँमक छनि।
दुनू लोक से गेलन पाँड़े, हलुआ मिले न माड़े पाण्डेोय दुनू ठामसँ गेलाह कारण, ने तँ हलुआ भेटलनि आ ने माड़।
दुनू समधि तालम तूल दुनू समधि समाने छथि।
दुनू हाथमे लड्डू हनका दुनू हाथमे लड्डू छनि।
दुबिधामे दुनू गेलाह, माया भेटल न राम एक बेर दूटा काज ठनने कोनहुमे सफलता नहि होइछ।
दूरि गेल खेत खेत दऽ बाट, दुरि गेल तिरिया नित गेल हाट, दुरि गेल बरदा बहे सुरंग, दुरि गेल पंडित मूरख संग जाहि खेत द’ रास्तां बनि जाइछ तकर सब फसिल बर्बाद भ’ जाइछ।
दुलहा के पात ने, बजनियाँ के थारी भोजन करबाक कालमे दुल्हािकेँ पातो नहि देल गेल, मुदा बजनियाँकेँ थारी भेटल।
दुलहे संग बरियात सजाइछ जहि प्रकारक दुल्हाज रहैछ बरियात सेहो तदनुरूपेँ ।
दुलारे धिया दूरि गेल बेसी दुलार-मलारसँ बेटी दूरि भ- जाइछ।
दुलारे पड़ल छिनारे नाम दुलारसँ नामकेँ विकृति कयलापर प्रयुक्तत ।
दू तलबार एक मयानमे नहि दू प्रतिद्वन्द्वी एकम स्थाुनमे एकत्र नहि भ’ सकैछ।
दू दाना खाइ तऽ चारि दाना उपजाइ भोजनकमआ परिश्रम अधिक अपेक्षित अछि।
दूधक जरल मुह मठ्ठा फूकि फूकि पीबय दूध पीलासँ जेँ मुह पाकि गेल अछि तेँ मठ्ठाकेँ सेहो फूकि-फूकि क’ पिबैत छी जे कदाउचित मुह ने पाकि जाय।
दूधक दाँत एखन ने झरलनि अद्यावधि शैवावस्थारक दाँत यथावत् छनि।
दूधक दूध पानीक पानी स्पकस्टा वा साफ-साफ निर्णय देबाक प्रसंगमे जाइछ।
दूधक डरे मठ्ठा फूकि पीबी गरम दूध पिलासँ ककरो आघात भेलनि तँ ओ मठ्ठा पर्यन्तककेँ फूकि क’ पिबैत छथि।
दूधक माछी लाभ देनिहारक अत्यरधिक तिरस्का-र भेलापर व्यंकग्यघ।
दूधक माछी जकाँ बहार करब अत्य न्तह आत्मीरय व्य क्ति कोनो कारणेँ अपन समाजसँ तिरस्कृरत भ’ जाइछ, तँ कहल जाइछ।
दूध पूत भाग सऽ कहल जाइछ जे भगवान लोककेँ दूध आ पूत भाग्येँ सँ दैत छथिन।
दू नाओपर चढ़ल, छाती फाटि कऽ मरल दुइ नावपर चढ़निहारक मृत्युत अकारण होइछ।
दू बहिआबी एके पाबी दुइ व्यबक्तिक पाछाँ-पाछाँ करैत छी, किन्तुण पबैत छी एकहि व्ययक्तिकेँ।
दू बेकत के झगड़ा, बीचमे बोले लबड़ा पति-पत्नीगक बीच भेनिहार झगड़ामे ककरो ने बाजबाक चाही।
दू बेटामे माय कुतिया दुइ बेटावाली मायक स्थिति कुकूरक समान रहैछ जे ओ कतय जाथि।
दू बेर नौ एक बेर चारि, अपना मन मे लिअऽ बिचारि, हमरा दिअऽ पार उतारि भोजन प्रेमी अपन भोजनक प्रसंग कहैछ जे २ + २+ ४ = २२ अर्थात् छथि ताहिरपरसँ एक कोहा दालि रहैछ तँ संतुष्टि भेटि जाइत छनि।
दू बरे बीस बीस एक बेर दस, एक कोहा दालि दिअऽ ओहीमे बस भोजनभट्ट दू बेर २०+२० आ एक बेर १०= ५० रोटी खाइत छथि ताहिपरसँ एक कोहा दालि रहैछ तँ संतुष्टि भेटि छनि।
दूनू हाथमे लड्डू सब तरहेँ सफलता भेटलापर प्रयुक्त ।
दूरक जमइया आगत भागत, लगक जमइया भेंड़ा दुर रनिहार जमायक स्वारगत-सत्कालर अत्यरधिक होइछ, किन्तुइ लगमे रहनिहार जमायकेँ क्योय ने पूछैछ, ने सम्मारन दैछ।
दूरक ढोल सोहाओन दूरसँ ढोल सुनबामे नीक लगैछ।
दूर जमइया आद गिद जग जमइया आध, घर जमइया गदहा जे चाहे से लाद दूर रहनिहार जमायक आदर-सत्काचर बेसी होइछ, किन्तुय जे जमाय लगमे रहैछ ओकर सम्माहन दूर रहनिहारक अपेक्षा आधा भ’ जाइछ।
दृष्टिक लेखें पीठ पछुआड़ नहि देखलाक कारणेँ अपन पीठ पर्यन्त् पाछाँ पडि़ जाइछ।
दे अच्छडर जनलन ने, जनलन ले अच्छमर ककरो किछु देबाक नाम तँ नहि लैत छथि मात्र सबसँ लेबाक हेतु तत्प र रहैछ।
दे दालिमे पानी छउ तिरहुनियाक मेहमानी तिरहुतक लोक बड़ बेसी खाइछ जे चिर प्रसिद्ध अछि।
दे दालिमे पानी, बहि चले चुलहानी दालिमे एतेक पानि द’ देल जाइछ जे बहि क’ चुल्हासनीमे चल गेल।
देखक बुडबक, उठक अनगुतिए देखबामे तँ मूर्ख सदृश बुझना जाइछ, मुदा उठि जाइछ प्रात: काल।
देख पड़ोसी जरि मरे उन्नपति देखि क’ पड़ोसीक प्राण जा रहल अछि।
देख परोसिया झरकि मरे एक पड़ोसिया अपन पड़ोसियाक नीक देखि क’ मरि जाइत अछि।
देखबो कारन, तोरे लटारन अहीँक कारणेँ ओतय गेलहुँ जकर परिणाम हमरा भोग्ये पड़ल।
देख रे आँखि सुन रे कान आँखि देखबाक कार्य करैछ तथा कान चुपचाप सब वस्तु् सुनैछ।
देखल दिगम्बसर, पुरल मनोरथ महादेवकेँ देखलहुँ तेँ मनोरथ पूर्ण भ’ गेल।
देखलह तऽ देखलह चिखलह तऽ ने क्‍योक कहैछ जे अहाँ तँ हमरा देखबे ने कयलहुँ, चिखलहु तँ नहि।
देखलहुँ सिल्लीक, तोहर डिल्लीय हे सिल्लीि, तोहर दिल्लील केहन छह तकरा हम देखलहुँ।
देखले कनियाँ देखले बर, कोठी तर बिछओना कर कनियाँ वर जानले अछि अतएव कोठीक नीचाँ ओछाओन कयल गेल।
देखले छउड़ी समधिन जानल सुनल छौ़ड़ी हमर समधिन बनि गेल।
देखले जनकपुर, चिन्हिले गोसइयाँ जनकपुर देखल अछि तथा गोसाँइ सेहो चिन्हरल छथि।
देखह हे आय माय घर दुआरि, सइयाँ बइसला चुल्हिक दुआरि हे माय बहिन, हमर घर दुआरि तँ देखू।
देखह हे आय माय तिला दाइक नखरा, छह पइला धान देलनि नौ पइला खखरा हे दाय माय! तिला दाइक नखरा तँ देखू।
देखेक बुड़बक, उठे के अनगुतिए देखबामे बुडबक सदृश बुझना जाइत अछि, मुदा अपन कार्य निकलबामे निपुण अछि।
देखे के अनमुह, सूते के सबेरे देखबामे अनमुनाह बूझि पड़ैत अछि, मुदा सबेरे सूति रहैत अछि।
देखे के मिलमिलाह, उठे के अनगुतिए देखबामे तँ दुबर-पातर अछि, मुदा भिनसरे उठैत अछि।
देखेमे छाइ सन, गहूँमे लेती बोइन देखबामे तँ छाउर सदृश अछि, मुदा पारिश्रमक लेत गहूँम।
देखेमे छोटी मोटी, खाय के सबइया रोटी देखबामे तँ छोट खूटक आ मोट अछि, मुदा साधारण व्य क्तिक अपेक्षा सवा गुणा बेसी खाइत अछि।
देखेमे छोटी मोटी, खाय के समूचे रोटी तुo देखेमे छोटी मोटी खाय के सबइया रोटी
देखेमे नीक ने, माथामे टीक ने देखबामे तँ नीक नहि अछि, मुदा माथमे एक बोझ टीक रखने अछि।
देखेमे लीख सन, पादे के बीख सन देखबामे तँ लीख सदृश अछि, मुदा बात बजैत अछि विष सनक।
देखे राही, बाजे सिपाही कोनो घटनाक प्रत्य क्ष गवाह होइछ राह चलनिहार बटोही, किन्तुव ओकरा बदला बजैछ सिपाही।
देखैत बहुरिया लोआ पोआ, सउँसे घर बहुरियो खोआ देखबामे तँ कनियाँ अत्यजन्तस विनम्र सुकोमल अछि, मुदा परिवारकेँ नाश क’ देलक।
देखैत सुनैत महकारी, तरमे बीआ कारी देखबा सुनबामे सुन्दहर, गंध उत्तम, किन्तु भीतरमे बीआ कारी अछि।
दे दालिमे पानी, पैगा बह चले चुल्हंनी दालिमे ततेक ने पानि देलक जे पैगा गामक चुल्हा नी दहा गेल।
देन न लेन मोहब्बहत एक चीज लेन-देन कोनो वस्तु नहि अछि, प्रत्यु त संसारमे प्रेम सब वस्तुस अछि।
देनी लेनी खाक नै, टहल के फरमाइस बिनु पारिश्रमिकक काज करौनिहारपर व्यं ग्यक।
देने नेने जस, नूने तेले रस लेनदेन कयलासँ यश भेटैछ।
देबता पितर भरथि पेटक भीतर जे भगवान जन्मथ देलनि वैह हमर पेट सेहो भरताह।
देबता सुन्न्र, बूरि छुछुन्नीर भगवान तँ सुन्दिर छथि, किन्तु ओ छुछुन्नँर सदृश होइछ।
देब दल होइत फल, बेटी ने तऽ बेटा कहाँ चल दान-पुण्यर कयलासँ मनोवांछित फलक किछु-ने-किछु अंशक प्राप्ति निश्चित अछि।
देब पठानके, लेब जोलहा सऽ हम कोनो वस्तु देबैक पठानकेँ, ओकर वसूली करब जोलहासँ।
देब ने पीतर, जमराजे भीतर देवता-पितरक कतहु चर्चा नहि अछि, मुदा यमराज भीतर आबि गेल अछि।
देबालो के कान होइछ देवाल सेहो सब कथा-वार्ता कान लगा क’ सुनैत अछि।
देर आयल दुरूसत आयल सपलता विलम्बससँ किएक ने भेटय, किन्तुर भेटब निश्चित अछि।
देल खरी खाय ने, कोल्हू चाटे जाय बड़दकेँ खरी खैबाक हेतु देल गेल, किन्तुे से नहि खाइछ, मुदा बारबार कोल्हू चाटबाक हेतु जाइछ।
देसक चेरी बिआही, भदेसक महतमाइन ने बिआही जानल बुझल स्थाीनमे गरीबाके ओतय विवाह करब उचित, किन्तुओ भदेसक बढ़ल-लिखलसँ विवाह करब समुचित नहि।
देसी मुरगी बिलाइती बोली मुर्गी तँ देशी अछि, किन्तुव ओकर बाजब बिलायती अछि।
देसे देसे चालि, कुले कुले बेबहार जहिना प्रत्येिक स्थाकन भिन्नर- भिन्नर चालि-चलन होइछ तहिन पृथक-पृथक वंशक व्य वहार पृथक्-पृथक् होइछ।
देह चले ने केराक भार अपन शरीरक भार ढ़ोयबाक शक्ति तँ छनि ने, किन्तु् भार ढोयता‍ह केराक।
देह डोरा, पेट बोरा दुब्बोर-पातर तँ देखबामे अछि, किन्तुन पेट तँ बोरा सदृश गहीर छनि।
देह ने दस्सा , नाकेपर गोस्सा देह दशा तँ नहि नहि छैक, मुदा सतत क्रोधे करैत अछि।
देह ने दसाा तेलबासा भारी देहसँ तँ सबल नहि छनि, मुदा तेलबासा बड़ भारी छनि।
देह देलनि सुकुमारा, करम देलनि बोनिहारा सुकुमार व्युक्तिकेँ भाग्यम अधलाह होयबाक कारणेँ जीविकोपार्जनक हेतु जँ अधिक परिश्रम करय पड़ैछ, तँ प्रयुक्तन ।
देह पर लत्ता ने चल कलकत्ता शरीरपर वस्त्रन पर्यन्तप नहि छनि, मुदा कलकत्ता जयबाक योजना बनबघ्‍ैत छथि।
देहपर ने लत्ता, पान खाय अलबत्ता शरीरपर वस्त्रा तँ नहि छनि, मुदा पान बेसी खाइत छथि।
देहमे दम ने नओ सुगर के नौता देहमे दम नहि छनि, मुदा नओ सुगरकेँ नौता देलनि अछि।
देहमे दम ने, बजारमे धक्कास शरीरपर वस्त्रि तँ नहि छनि, मुदा पान बेसी खाइत छथि।
देहमे बार ने तीन पाओ के छूरा शरीरमे केशक कतहु नामो-निशान छनि, मुदा तीन पौआक छूराक आवश्यूकता छनि।
देहातक भात दालि सहरमे रमरमी गाँवमे अतिथिक सत्कामर भात-दालि भरिपेट खोआ क’ कयल जाइछ, किन्तुल शहरमे मात्र नमस्का र क’ कए विदा कयल जाइछ।
दैबो दुर्बल घातक भगवान दुर्बले व्ययक्तिकेँ कष्टए दैत छथि।
दोआरिका जी जे जरे तऽ कतहु मरे द्वारिका जा क’ जे छाप ल’ लेलक ओकर मृत्युक कतहु होइछ, तँ कोनो अन्त र नहि पड़ैछ।
दोसराक माथाक ढील के फोड़य आनक काजसँ आनकेँ कोन प्रयोजन?
दोसाराक लेल रंग, अपना लेल दोसर रंग स्वारथी्र व्यरक्तिक प्रसंगमे प्रयुक्त होइछ।
दोसालापर कम्मारक पेओन दोशालापर कम्बालक पेओन लागल अछि।
दोस्तीपमे कुस्ती विशेष मित्रतासँ शत्रुता भ’ जाइछ।
दोहरौने बनियाँ दुन्नु बनियाँकेँ किछु कहि देलापर ओ क्रोधित भ’ जाइछ।
धन अछैत दुखिया, भतार अछैत राँड़ सम्पछत्ति रहलोपर दुखिया आ पति रहलोपर विधवा कहबैछ।
धन आन्हहर होइछ धनकेँ आँखि नहि होइछ।
धनक तीन गति, दान भोग नास धनक तीन गति होइछ, दान करी, भोग करी अन्यगथा ओकर नाश निश्चित अछि।
धनक बाजी घाटी, निरध्नश लोटे माटी जकरा ध्न छैक ओ बाजी मारि लैछ, किन्तु् जकरा नहि छैक ओ माटिपर लेटाइत रहैछ।
धन घटल जाय, बिध बढ़ल जाय धन घटि गेल, मुदा सेआख बढि़ रहल अछि, तँ प्रयुक्ता।
धन घटल जाय, बिध बढ़य जाय आमदनी घटल जा रहल अछि, किन्तु विधि-व्यलवहार बढ़ल जा रहल अछि।
धन घटल जाय, रेआसत बढ़ल जाय धन घअि रहल अछि तथा खर्च बढ़ल जा रहल अछि।
धन घटल जाय हुकूमति बढल जाय धन धटि रहल अछि, किन्तुा हुकूमति बढ़ल जा रहल अछि।
धन जाय तऽ धरमो जाय धन नष्टत भेलापर कर्त्तव्याक ज्ञान सेहो नष्टन भ’ जाइछ जाहि कारणेँ धर्मक प्रवृत्ति समाप्तट भ’ जाइछ।
धन देस मझउआ, जहाँ भात ने पूछे कउआ धन्ये अछि मझौआ देश जतय भात पर्यन्तमकेँ कौआ नहि पुछैत अछि।
धन धनहो के, नाम कनहो के धन्यन अछि मझौआ देश जतय भात पर्यन्त केँ कौआ नहि पुछैत अछि।
धन धनहो के, नाम कनहो के धन ककरो खर्च भ’ रहल अछि,मुदा नाम तँ कनही क भ’ रहल अछि।
धन धनिक के, नाम बाबाजी के धन रहैछ धनिक व्य,क्तिक लग, मुदा नाम भ’ रहल छनि बाबाजीक।
धन धराबे तीन नाम संपत्ति रहलापर मनुष्याक अनेक नाम राखल जाइछ।
धन धराबे तेरह नाम तुo धन धराबे, तीन नाम
धन बढ़े मन बढे़ धन बढ़ला उत्तर मन अनायासे बढि़ जाइछ।
धन बढ़ले नीक, मन बढ़ले ने नीक धनक बढ़ब नीक बात थिक, किन्तुन मनक बढ़ब नीक नहि।
धन भेल थोड़, बिपत बड़ जोर धन तँ घटि गेल, किन्तुड विपत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ले जा रहल अछि।
धनमे धन एकटा हुक्काह आ चिलम हमरा संपत्तिक नामपर मात्र हुक्काम आ चिलम अछि।
धन मोर हिया कि मोर पिया, सासुरे सऽ देखैत छी नइहरक दिया धन्यत हमर हृदय अछि कि धन्यो हमर स्वीतमी।
धन मोरा हिया कि ध्नृ मोरा पिया, अँचरा फारि कऽ नंगोटा दिया धन्या छथि हमर पदिदेव तथा धन्यय अछि हमर हृदय ।
धन रहल तऽ धनराज बहू, धन घटल तऽ धनइया धन रहलापर धनराजक बहु कहि संबोधित कयल जाइछ।
धन राशि के धरम, काया राशि के करम धन रहलापर धर्म तथा शरीर रहलापर कर्म नीक लगैछ।
धन ने सिनुर के भाग, मोर पिया दरभंगा सऽ घुरला धन्यग हमर सोहाग अछि जे हमर पति दरभंगासँ घुरि क’ आबि गेलाह।
धन होए कटने सूत, कि धन होए गाइक पूत धनक आगमन सूत कटलासँ होइछ वा बड़दसँ।
धन्नस सेठक नाती बनला अछि अपने मनसँ धन्नाे सेठक नाती बनबाक कल्प ना करैत अछि।
धनि आन्ह‍र पिया खोट, दूनू मिलला जोड़म जोड़ पत्नी आन्हपर, किन्ता पति छथि कनाह।
धनिकक आदर सब कँह होय धनवान व्य क्ति सर्वत्र पूजित होइछ।
धनिकक आदर सब तहँ होय धनिक व्यरक्तिक सम्मारन सबठाम होइछ।
धनिकक पूत के भीख ने भेटैछ धनिकक बेटाकेँ भीक्षा नहि भेटैछ।
धनिक बूडि़ बैदनाथ अबतार धन छनि, किन्तुे बुद्धिक अभाव छनि तेँ वैद्यनाथक अवतार कहबैत छथि।
धनि के धरम धनवान व्यमक्ति धर्म करैछ अर्थात् धनिक जे कार्य करैछ वैह तँ धर्म कहबैछ।
धनि छी अहाँ धनि छी हम, चलइ छी अहाँ निहारइ छी हम हम दुनू गोटे धन्य छी, कारण अहाँ चलैत छी तँ हम देखैत छी तथा हम चलैत छी तँ अहाँ।
धनि दडि़भंगा जे दोहरी अंगा धन्यद अछि दरभंगा जतय अहाँकेँ दोसर अंगा भेटि सकल।
धनि मनचनियाँ लाज बचल मनचनियाँक कारणेँ इज्ज ति बाँचि गेल।
धनि हमर छितनी तऽ रजपुतनी धन्यह अतिछ हमर छितनी जाहि बलपर अहाँ राजपुत्री कहबैत छी।
धनि हमर जुत्ता तऽ रजपुत्ता धन्यह अछि हमर जुत्ता तेँ अहाँ राजपुत्र बनलहुँ।
धनी के बात सुनी, गरीब के भात खाइ धनवानक बात सुनी आ गरीबाक ओतय भोजन करी।
धने धराबे तीन नाम, जगुआ जागो जगमोहन धन रहलाक कारणेँ लोक ककरो जगमोहन वा जागो कहैछ, मुदा धनाभाव भेलापर ओकरे जगुआ कहल जाइछ।
धरतीपर पैर ने पड़ब अंहकारक कारणेँ पृथ्वीकपर पैर नहि रहैछ तँ कहलन जाइछ।
धरम करैत जँ होए हानि, तबहु ने छोड़ए धरमक बानि धर्म-कर्म करबामे थोड़ेक हानि अवश्यो होइत छैक तथापित ओहि मार्गकेँ नहि छोड़बाक चाही।
धरमक सोर पताल धर्मक जडि़ पताल धरि अछि।
धमरे दास गुमस्ताध, धरमे दास पटबारी जखन धर्मदास स्वायं गुमस्ताड एवं पटबारी दुनुक कार्य करैछ तखन जेहन कार्य होयत ओ अनुमान सापेक्ष अछि।
धरमहि धाधरि पापहि बिरधी आजुक ससयमे धर्मसँ हानि तथा पापसँ वृद्धि होइछ।
धरमो गेल तुम्मोस फूटल धर्म चल गेल तथा तुम्मा सेहो फूटि गेल।
धरे के गोर तऽ, धऽ लेलनि सोर पकड़बाक चाही हनुक पैर, किन्तुट लेलनि लडि़केँ।
धानक आङन पोआरहि चिन्हाल धान कतेक उपजलनि अछि तकर निर्णय तँ पोआर देखि क’ कयल जा सकैछ।
धानक जाति पानी, आ अजातिक जाति टाका धानक जाति पानि अछि तथा अजातिक जाति टाका।
धान काटी दुद्धा, रब्बीत काटी बुड्ढ़ा जहिना अधपक्कूध धान काटब फलदायक होइछ तहिना रब्बी‍ पूरा पाकि जाइत अछि तकरा बादे ओकरा काटब नीक।
धान के चटका, महींस के सटका धानक पानि अकस्मा,त सुखि जाइछ तँ ओ बर्बाद भ’ जाइछ।
धान के टोकबे ने करे, आ भूस्सा कहे टन बिनु किछु कहनहि-पुछनहि जँ क्योस बाजय, तँ प्रयुक्तह।
धान कूट रे मनसा, हम सुकुमार छी पत्नीू पतिकेँ कहैछ ‘रे मनसा तोँ धान कूट हम तँ सुकुमारि छी’ ।
धान खसय सुभागलक, गहूँम खसय अभागलक धान भाग्युवान व्य क्तिक खसि पड़ैछ जे नीक होइछ, किन्तु गहूँम अभागलक खसैछ, जे अधलाह होइछ।
धान पान के नित असलान धान एवं पानकेँ नित्य पानि भेटलासँ नीक होइछ।
धान पान कुसिआर, ई तीनू पा‍नीक इयार धान, पान एवं कुसियचारमे जतेक बेसी पानि पड़ैछ ततेक ओ नीक होइछ।
धान पान खीरा, तीनू पानी के कीड़ा धान, पान एवं खारा तीनू पानिक कीड़ाउ होइछ।
धान पान पानी कातिक सबाद जानी धान, पान एवं पानिमे कतेक स्वाकद अछि तकर वास्त विकताक जानकारी होइछ कार्तिक मासमे।
धान बाभन के एक्केा हाल धान तथा ब्राह्मणक एकहि हाल रहैछ अर्थात् दुनू परस्पएरापेक्षी अछि।
धान सुखाइछ, कउआ टरटराइछ अपन कार्यमे तल्ली न भेनिहारक प्रसंग कहल जाइछ।
धीया पूता ककरो, घीढ़ारी करे मङरो बेटा-बेटी ककरो छैक, मुदा घीढ़ारी क्योछ क’ रहल अछि ।
धिया पूता के गाँती ने बिलाइ के गाँती जाड़ मासमे बाल-बच्चाि सभकेँ वस्त्रो नहि देलनि, मुदा बिलाइ हेतु गाँतीक व्येवस्थाि क’ रहल छथि।
धिया ने पुत्ता, मुह चाटे कुत्ता बेटा बेटी किछु ने छनि तेँ भरि दिन सूतल रहैत छथि।
धिया राँड ने भेली, धिया दुलारू भेली बेटी विधवा नहि भेलीह दुलारू भ’ गेलीह।
धिरिक जीबन तीसी तिमन, ताहू सऽ करइला निमन धिक्कानर अछि ओहि जीवनकेँ जे तीसीक तरकारी खा क’ व्यनतीत होइछ।
धी छोडि़ जमाय सऽ पिआर बेटीक कोनो मूल्य नहि, किन्तु जमायसँ प्रेम छनि।
धी जमइया भगिना, ई तीनू ने आपना बेटी, जमाय एवं भागिन ई तीनू कहियो अपन नहि भ’ सकैछ, कारण दान-दहेज’क हेतु सतत मुह बौने रहैछ।
धी बेटी अपने घर भली बेटील अपन सासुरमे बास करैछ, सैह नीक अछि।
धी मरने जमाय चोर बेटीक मृत्यु परान्त जमाय चोर बनि जाइछ।
धी मारि पुतोहु ला तरास बेटीकेँ तँ मारैत अछि, मुदा पुतहुसँ डेराइत अछि।
धीया ने पूरा, असगर पेट्टा बाल-बच्चा क अभावमे जीतिव रहनिहारपर व्यं ग्य ।
धीया माय रानी, बुढ़ारी भरे पानी बेटीक माय रानी बनि जाइछ तँ ओकरा वृद्धावस्थाामे पानि भरय पड़ैछ।
धीया बढ़ली तऽ काबा काढ़ली बेटी पैघ भेलापर चिन्ता़क कारण होइछ।
धीरे धन पाइ, अगुतयने पत जाइ संपत्ति एकत्रित करबाक हेतु धैर्यसँ कार्य लेबाक चाही, जल्दीर बाजी कयलासँ सब नष्टक भ’ जाइछ।
धीरे धन सबूरे बेटा धन शनै:शनै: होइछ तथा सन्तोलष कयलासँ बेटा प्राप्त: होइछ।
धूनी पानीक संयोग अछि अपरिचित व्यसक्ति अनायासे एक स्थ लपर संयोगसँ जँ एकत्रित होइछ, तँ कहल जाइछ।
धोती लऽ कऽ डुब जायब डुबबाक बहन्नात कयलापर कहल जाइछ।
धोएल धाएल भेंड़ी पाकाँ लागे चाहे जाहि भेंडीकेँ धो-धा क’ साफ कयलहुँ अछि ओ पाँकमे जाय चाहैछ।
धोकड़ाक मारि धोकड़ा जाने जकरापर जे बितैत छैक ओएह ओ जनैछ।
धोबीक गदहा ने घर ने घाटक धोबीक गदहा ने घाटक रहैछ नेक घरक।
धोबीक बातपर बनबास सीता वनबासक कथाक प्रसंगमे कहल जाइछ।
धोबीक बाप के किछु ने फाटे कपड़ा तँ ग्राहकक रहैछ तेँ ओ निर्ममता पूर्वक ओकरा धोयबामे फारैछ।
धोबी के घर आगि लागल ने हरखे ने बिखादे धोबीक घरमे अकस्माेत आगि लागि गेलैक जाहिसँ ने तँ ओकरा हर्ष भेलैक ने विषाद ।
धोबी के घर बिआह, गदहा के भेल छुट्टी धोबीक सन्ताबनक विवाह भेलैक।
धोबी गिरलन गदहापर से, रूसलन गामक लोक से ककरोसँ निरर्थक असंतुष्टव भेलापर व्यंीग्यं।
धोबी धोबे पिआसे मरे यद्यपि धोबी पानिमे कपड़ा धोइत अछि तथापि ओ पियासे मरि रहल अछि, कारण जयत ओ कपड़ा धोइछ ओ जल पेय नहि होइछ।
धोबी नउआ दरजी, ई तीनू अलगरजी धोबी, हजाम तथा दर्जी ई तीनू जाति लापरवाह होइछ।
धोबी नाउ दरजी, ई तीनू अलगरजी धोबी, नौआ आ दर्जी मतलबक इयार होइछ।
धोबीपर धोबी बसे, तब कपड़ापर साबुन चढ़े धोबी-धोबीक बीचमे प्रतियोगिता होइछ तखन कपड़ाक सफाइ नीक जकाँ जाइछ।
धोबीपर धेबी बसे, तब गेनरापर साबुन चढ़े परास्प र प्रतिस्पँर्धी भेलासँ कार्यमे गति अबैछ।
धोबी बसि कऽ की करत दिगम्बजरक गाममे जयत सब नांगट रहैछ ततय धोबीक कोन प्रयोजन? तुo दिगम्बसरक गाममे धोबीक बास
धोबी बेटी बिआह, गदहा माथा मउर धोबीक घरमे विवाहक ओरिओन भेल तँ गदहा माथापर मौर चढ़ाओल गेल।
धोबी बेटी बिआह, गदहा लौड़ा मउर धोबी बेटीक विवाह अवसरपर गदहाक कीदनसँ मौर बना ओल गेल।
धोबिनियाँ आयल, लुगरिये साबनु लागल धोबिन साबून सतत अपना संगे रखैछ।
धोबिनियाँक बस चले, तऽ गदहाक कान अँइठे धोबिनक जँ सब कबात चलय तँ ओ गदहोक कान ऐंठि देत।
धोबिनियाँ बेटी के, ने नइहर सुख ने सासुर सुख धोबिनक बेटीकेँ नैहर, सासुर कतहु नहि सुख होइछ अर्थात् दुनू ठाम समान भावेँ कार्य करय पड़ैछ।
धोबियाक कुकूर, ने घरक ने घाटक धोबियामक कुकूरकेँ ने घरपर भोजन भेटैछ ने घाटपर।
धोबिया के ने आन बान, गदहा के ने आन किसान जहिना धोबी कपड़ा धोयबाक अतिरिक्तग आन व्यधवसाय नहि क’ सकैछ तहिना गदहाक गुजारा धोबी छोडि़ क’ अन्य त्र नहि भ’ सकैछ।
धोबिया सऽ तेलिया कतेक घाटि, ओकरा मुंगरा ओकरा जाठि धोबीसँ तेली कोन बातमे घटी रहत? तेलीकेँ जँ जाठि छैक तँ धोबीकेँ मुँगरी।
नंगट के दू बंगट लागे चूड़ा के दू मूसर, मउगी के मरदाबा लागे तब तीनू घर कूसल नंगट अर्थात् बदमाश आदमीकेँ जखन बंगट अर्थात् ओहूसँ बढि़ क’ बदमाशसँ भेट होइछ तखन ओ रस्तािपर आबि जाइछ।
नंगटाक नाक कटल, अढ़ाय बीत रोज बाढ़य नंगटाक नाक ने जतेक कटल ओहिसँ बेसी ओ अढ़ाय बीतक हिसाबेँ रोज बढ़ैछ।
नंगटा चाहे पूरा हबाल नंगटाकेँ नंगटपनी करबाक कोनो बहन्नाओक प्रयोजन अछि।
नंगटा भागे तऽ भाग, नहि तऽ अपने भाग बदमाश जँ बदमाशी नहि छोड़य तँ स्वेयं ओकरा लगसँ हटि जायब उचित।
नंगटा सऽ पैगम्बर डेराय नंगट आदमीसँ पैगम्बर सेहो भय खाइत अछि।
नंगटे पहिरी भुखले खाइ, जहाँ जहाँ मन फिरे तहाँ जाइ वस्त्रााभाव रहलापर वस्त्रहके प्रयोग, भूखल रहलापर भोजन, तत्पसश्चा्त जतय-जतय मन करे ततय-ततय जयबाक चाही।
नंगे नाचे हजार देखे नांगअ भ’ कए जे नाच करैछ तकरा हजारो व्य क्ति देखनिहार भ’ जाइछ।
न आगू नाओ न पाछू बेरा आगाँ ने नाव अछि ने पाछू बेरा।
नइहर अइसन ससुर अइसन, हे धीया तोहर करम कइसन यद्यपि नैहर सम्पइन्न। अछि, किन्तुध सासुर ओहन सम्पैन्न‍ नहि।
नइहर खइली सासुर खइली ठूठ कइली पीपर, इहे कुलदीपा अबतारी हाथ कऽ लेलक मूसर नैहर सासुर दुनू भागकेँ विनाश कयल ओकरा संगहि पीपर गाछकेँ सेहो ठूठ क’ देल।
नइहर पकबैत रही खीर पूड़ी सासुर महैत छी घोर, अपन पिया परदेस बसे नयना ढरैत छै नोर नैहरमे खीर-पूड़ी पकबैत छलहुँ, किन्तुन सासुरमे मठ्ठा महैत छी।
नइहर बहलो तोर,तीन सेर मड़ुआ चले न मोर मलिकाइनकेँ नउड़ी कहैछ, -हमरा अहाँक नैहर देखल अछि जे केहन अछि जे तीन सेर मड़ुआ नहि चलैछ’? अपन सत्वँक रक्षा सब करैछ।
नउआक घरमे चोरी भेल, तीन चोंगा बार गेल नौआक घरमे चोरि भेल जाहिमे तीन चोंगा केशक चोरि भेल।
नउआ के ने ओर छोर चिन्हिल जायत नौआक आदि अन्तछक पता लगायब कठिन, कारण ओ अपन धूर्त्तातासँ सब नुका लैछ।
नउआ केबट चीन्हेत जात, बड़का लोक के चिक्केन बात जहिना नौआ आ नाविक अपन जातिक लोककेँ चिन्हैात अछि तहिना पैघ व्यडकित चिक्कँन-चनुमनु बात करबामे प्रवीण होइछ।
नउआ देखेन काँखिमे बार तुo नउआ देखने नह बाढ़य
नउआ देखने नह बाढ़य नौआकेँ देखला उत्तर नह बढि़ जाइछ।
नउआक बिआहमे ठाकुरे ठाकुर नौआक विवाहमे बरियात नौआ जाइत अछि।
नउआ सीखे माथपर नौआ आनक माथपर केश कटबाक कला सिखैछ।
नओ के लकड़ी नब्बे खर्च अधिक व्यडय भेलापर प्रयुक्त ।
नओ नगद ने तेरह उधार अधारमे अधिक बेचबासँ नीक थिक कमो, किन्तु नगद बेचब।
नकलमे अकिलक कोन काज नक करबामे बुद्धिक कोनो प्रयोजन नहि होइछ।
नकली पण्डित मधुरक संहार ढोंगी पण्डित मधुरकेँ ध्व्स्तो करैत अछि।
नकलाकह मउगी के पितिऔती साँय, घुरि कऽ देखलक तऽ अपन साँय जे स्त्री नकलाहि अछि ओकरा स्वा मीक कतहु अभाव नहि रहैछ।
नगद कायथ भूत, उधार कायथ देऔता कायस्थयकेँ नगद देलासँ ओ भूत सदृश व्यसवहार करैछ, किन्तु ओकरे जँ उधार देल जाय तँ ओ देवता सदृश भ’ जाइछ।
नगर पड़ल दोहाइ, राँड़ जुनि करथि सगाइ संपूर्ण नगरमे ई हल्लाछ भ’ गेल अछि जे राँड़ स्त्री पुनर्विवाह नहि क’ सकैछ।
नचार दालि खेसारी लाचारीक अवस्थारमे खेसारीक दालि बनैछ।
नटिन जखन बाँसपर चढ़े तऽ घोघ कथीक नटिन जखन बाँसपर चढि़ए जायत तखन घोघ काढ़ाबाक कोन प्रयोजन ? निरर्थक आडम्बार प्रदर्शित कयनिहारपर व्यंरग्यक।
नटी पूत नड़हड़ा टीक बाह्म बात-विचार एवं व्यहवहारसँ मनुष्यैक कुल-शीलक पता लागि सकैछ।
नङटे पहिरी भुखले खाइ, जहाँ मन करे तहाँ जाइ वस्त्राइभाव रहलापर वस्त्रह पहिरबाक चाही।
नतनी सिखाबे बूढ़ दादी के नातिन अपन नानीकेँ शिक्षा दैत हो, तँ कहल जाइछ।
नथला बेगर भँइस हेहर नाथ नहि लगैबाक कारणेँ महीस हेहर भ’ गेल।
नदी तरक चास, बैरी लगक बास नदीक कछेरक कयल खेती तथा दुश्मलनक समीप रहब दुनू खतरासँ खाली नहि होइछ।
नदिया नाओ संयोग नदी पार करबा काल जँ नाव भेटि जाय तँ सब कष्ट समाप्तभ भ’ जाइछ।
ननद नन्दारबे सात घर कनाबे, ननद घरमे आगि लागल केओ ने बुताबे ननदि अपन भौजाइकेँ सता क’ सातो घर कनबैछ, किन्तुक ननदिक घरमे जखन आगि लगैत अछि तँ ओकरा बुतैबाक शक्ति ककरो ने रहैछ।
ननद लबरी घर झगड़ा लगाबे ननदि जँ लबरी रहैछ, तँ ओ अनेक घरमे झगड़ा लगबैत अछि।
ननदिओ के ननदि ननदिकेँ सेहो ननदि होइछ।
ननदोसी आयल पहुना, एक राति एहुना पाहुन रूपेँ नदोसि आयल छथि अतएव एक राति हिनको मन राखि देल जाय।
नपना बिनु उपास खाद-सामग्री नापबाक साधन नहि अछि तेँ उपासल छी।
नफा के धाबे, मूर गमाबे लाभक लोभमे मूल सेहो नष्ट भ’ जाइछ।
नब गुण्डाे अण्डीसक फुलेल नव गुण्डाे अछि तेँ अण्डीडक फुलेल लगबैत अछि।
नब जोकी के पोनमे जट्टा देo नब जोगी के गाँडि़मे जट्टा
नब जोगी के गजरा शंख तुo नया जोगी गजराक संख
नब जोगी के गाँडि़मे जट्टा नव कार्यकर्त्ताक अनभिज्ञताक कारणेँ उपहासास्परद बनय पड़ैछ।
नब नबाब आसमानपर दिमाग नवे नवाब बनल अछि तेँ ओकर दिमाग आसामानपर अछि।
नब नोकर खरहा पकड़त नोकर नव अछि तेँ खरहा सदृश चमकि-चमकि क’ काज करैछ।
नब पुजारी कोल्हु क संख नव पूजा कयनिहार कोल्हूजकेँ खंश बना क’ पूजा करैछ।
नब मउगी के कोखि भारी पहिल सन्ता न जखन स्त्रीकक कोखिमे रहैछ तँ ओ अपेक्षाकृत बेसी कष्ट्कर होइछ।
नबारीमे मृगनयनी, बुढ़ारीमे मृगछाला युवावस्थाृमे मृगनयनीपर ध्यामनस्थम तथा वृद्धावस्थानमे मृगछालाक खोज करैछ।
नबा‍रीमे सिंगारक सरिता, बुढ़ा‍रीमे बैरागक बहाना युवावास्थानमे श्रृ़गार-प्रसाधन आ वृद्धावस्थागमे वैरगयक बहन्नाी कयनिहारपर व्यं ग्यध।
नया गँजेड़ी बडे़रीपर धूआँ गाजाँ पिनिहारनव अछि तेँ दम मारबा काल धूआँ बरेड़ीक उपर उठैत अछि।
नया जोगी के गजरा के शंख योगी नव अछि तेँ गजराक शंख बनौने अछि।
नया जोगी के गाँडि़मे जट्टा, चलय जोगी झूले जट्टा योगी नव अछि तेँ गाँडि़ पर्यन्तेम जट्टा छैक।
नया जोतसी बइद पुरान ज्योजतिषी नव आ वैद्य पुरान कार्यक होइछ।
नया दरोगा के पालकीमे बोरसी दरोगा नव अछि तेँ पालकीमे बोरसि राखि क’ चलैछ।
नया नया राज भेल, गगरी अनाज भेल नवपर एक गगरी अन्‍न नहि भेल की अपनाकैँ राजा मानि लेलहुँ।
नया नौ गंडा, पुरान छौ गंडा नव वस्तुं दर नौ गंडा अछि तथा पुरानक छो गंडा।
नयापर जोलहा बैसनब भेल, तऽ पानि के कहलक जल जोलहा नवे वैष्णनव भेल अछि तेँ ओ आब पानिकेँ जल कहब शुरू कयलक अछि।
नयापर धन भेल, बिलाइ महाजन भेल जकरा नव धन होइछ तकर महाजन बिलाइ होइछ।
नया भजनियाँ टीकमे झालि भजन कयनिहार नव अछि तेँ टीकमे झालि बन्हकने अछि।
नया भनसिया करइलामे झोर भानस कयनिहार नव अछि तेँ करैलामे झोर लगा रहल अछि।
नाया मुसलमान खुदा मियाँ ला बेहाल नव-नव मुसलमान भेल अछि अतएव अल्लामसँ मिलबाक हेतु चिन्तित अछि।
नया मुसलमान दस बेर नबाज पढ़े देo नया मुसलमान खुदा मियाँ ला बेहाल
नया मुसलमान खायमे राकस नवे-नव मुसलमान भेल अछि तेँ प्यालज राक्षस सदृश खाइछ।
नया लुगा नौ दिन, लुगरी बरिस दिन नव वस्त्रन किछुए दिन नव रहैछ, तत्प श्चागत् ओ पुरान भ’ जाइछ जे अनेक दिन रहैछ।
नरकोमे ठेलम ठेला नरकमे सेहो धक्का -धुक्कीह भ’ रहल अछि।
नरमे नउआ, पंछीमे कउआ मनुष्यउमे नौओ तथा पंछीमे कौआ अत्य्धिक चतुर होइछ, जे विख्याधत अछि।
न रहे बाँस ने बाजय बसुरी मूल वस्तुसए नहि रहत तँ काज कोना होयत?
नरे जरे भरल छी, पानीमे तितैत छी सर-संबंधीक कोनो अभाव नहि अछि तथापि पानिमे तीत रहल छी अर्थात् क्योि देखनिहार नहि।
नसकट खटिया दुलकइत घोड़, नारि करकसा बिपदक ओर छोट खाटपर शयन करब, दुलकि क’ चलनिहार घोड़ा तथा कर्कशा स्त्रीक ई सब विपत्तिक कारण होइछ।
नहि किछु जानी, बूढ़हक बात मानी जँ कोनो विषयक जानकारी नहि हो तँ एहन स्थितिमे वृद्ध व्यनक्तिक बात मानबाक चाही, अन्यायथा लोक विभ्रान्तच भ’ जाइछ।
नहि खायब नहि खायब खायब भरि थारी, नहि सुतब नहि सुतब गोरथारी क्योख बहुभोजी महिला पहिने भूमिका दैछ जे हम नहि खायब, किन्तु जखन खायब प्रारंभ करैछ तखन भरि थारी खा लैछ।
नहि गढ़यबऽ तऽ देखय दऽ सोनार ग्राहककेँ कहैछ जे गहना नहि गढ़ायब ताहिसँ कोनो हर्ज नहि, हमरा मात्र देख्पा य दिअ।
नहि बिअइली अपन मइया, नहि भेल सहोदर भइया अपन माय बेटाक जन्मा नहि द’ सकली तेँ सेहोदर भायक मुह कतयसँ देखब ? अपन कोनो भाय नहि रहलापर सन्तोबष स्व रूप होइछ।
नहिराक उलहन ससुराक ढीठ, बाअ चलथि नहि झाँपथि पीठ नैहरक अल्हाड़ तथा सासुरक धृष्अब स्त्री बाट चलैत कहियो अपन पीठ नहि झाँपैत अछि।
नहिराक बोल आ केहुनी चोट नैहरक विरुद्ध गप्पी सुनलासँ ओतबे कष्टि होठछ जतेक केहुनीमे चोट लगलासँ।
नहिरा जो बेटी ससुरा जो, बहिया बेटी कतहु खो बहिया अर्थात् नोकर चाकरक बेटी सासुरमे रहथु अथवा नैहरमे दुनू ठाम समान भावेँ कार्य करय पड़ैछ तखन भोजन उपलब्धभ होइछ।
नहिरा जो बेटी ससुरा जो, बहियाँ डोला बेटी कतौ खो देo नहिरा जो बे‍टी ससुरा जो, हाथ पैर चलो बेटी कतहु जो
नहिरा जो बेटी ससुरा जो, हाथ पैर चलो बेटी कतहु जो बेटी नैहरमे रहथु अथवा सासुरमे जाधरि ओ अपन हाथ पैर नहि चलौती अर्थात् कार्य नहि करती तँ हुनकर निर्वाह कठिन भ’ जाइछ।
नहिरा दुर दुन ससुरा दुर दुर, जेहो बिआहलक सेहो दुर दुर जकरा नैहरमे दुत्का र भेटैछ तकरा सासुरमे सेहो दुत्का रे भेटैछ तथा जे विवाह कयलक ओहो दुत्काारलक।
नहू नहू धिया, पैरमे गरल तूर ककरो सुकुमारतापर व्यं।ग्य ।
नहू नहू मुते तऽ सन सन उठे पेशाव तँ करैछ शनै:शैन:, मुदा ओकर आवाज सन-सन भ’ रहल अछि।
नांगट नहायत तऽ गारत की जखन नांगट भ’ कए स्ना्न करत तखन कथी गारत ? जँ मूल नहि अछि तँ फलक की आशा वा निर्धन व्य क्तिसँ कोनो आशा नहि कयज जा सकैछ।
नाँगटपर नाँगट गिरल, दुनू गेल ओझराय एक नग्न व्यीक्ति दोसर नगन व्य क्तिपर खसल, दुनू आपसमे ओझरा गेल।
नाँगट बेगरता के लाज कोन खगल व्येक्तिकेँ लाजक त्यालग करय पड़ैछ।
नाक ने कान बाली के अरमान जकरा कान नाकक अभाव छैक सेहो कानमे बाली पहिरबाक इच्छाे रखेत अछि।
नाक ने कान बीचमे दोकान नाक छनि ने कान अर्थात् कुरूप छथि, मुदा दोकान खोललअनि अछि बीच बजारमे।
नाकमे नकटी चोङामे घी, उठ बुढि़या माड़ पी कृपण व्य क्तिक रहन-सहन एवं खान-पानपर व्यं ग्यक।
नाक रंगौलनि जखन पूर्ण रूपेँ अपमानित होइछ, तखन कहल जाइछ।
नागर जे हिताहित जान नीक अधलाहक ज्ञाता विद्धान होइत छथि।
नाच पड़ोसिन मोरा, तऽ हम नाचब तोरा जँ तों हमरा घर नचबह तँ हमरो तोरा घर नाचय पड़त।
नाचि काछि अयलहुँ बर के जुजिए ने दौड़-धूप क’ वर खोजल, किन्तु् ओ नपुंसक अछि।
नाचे के लूरि ने अङना टेढ़ नाचय तँ नहि अबैछ, किन्तुल कहैछ जे आँगन टेढ़ अछि।
नाचे कूदे तोरे तानख्‍ तेकर दुनियाँ राखे मान चलता‍-फिरता आदमीक दुनियाँमे सम्माँन होइछ, किन्तुआ जे सोझ अछि तकर कतहु नहि ।
नातिन सिखाबे बुढ़ दादी के, कोहबर केहन होइछ नातिन अपन बूढ़ दादीकेँ सिखा अछि जेकोहबर केहन होइछ ? कोनो अज्ञान द्वारा ज्ञानी व्यहक्तिकेँ शिक्षा व्यं ग्या।
नाती के गाँती ने, बिलाइ के जामा नाती गाँतीक अभावमे जाड़े ठिठुरि रहल अछि, किन्तु़ बिलाइकेँ जामा पहिराओल जाइछ।
ना धोबिया के दोसर जनाबर, ना गदहा के दोसर मौआर गदहाक अतिरिक्ति धोबीकेँ आन कोनो जानवर नहि होइछ आ गदहाकेँ क्योन आन नहि पोसैछ।
नानीक आगाँ, ननिहालक गप सोझाँ जखन जे व्य,क्ति रहैछ तखन ओकरे चर्चा कयलापर कहल जाइछ।
नानी मरल नाता छूटल नानी गाममे ताधरि आदर-सम्माछन रहैछ जा‍धरि नानी जीवित रहैछ।
नाम ऊँच कान दुनू बुच्ची नाम तँ बड़ पैघ छनि, किन्तु कर्त्तव्य‍ नदारत छनि।
नाम छैन्हि नमरल नाको पैघ, कते दिन झपता गरा के घेघ दोषकेँ नहि नुकाओल जा सकैछ।
नाम पैघ दरसन थोड़ नाम पैघ छनि, किन्तुन दर्शन थोड़ द’ रहल छथि ।
नाम बडका करनी कुत्ता नाम तँ बड़का रखने छथि , मुदा काज कुकूर जकाँ करैत छथि।
नाम मिसरी लाल गुन गुड़ोक नहि नाम मिसरी लाल रखने छथि, किन्तु गुण तँ गुड़क सेहो नछि छनि।
नामी बनियाँ के झाँटि बिकाय देo नामी बनियाँ के मोछ बिकाय
नामी बनियाँ के मोछ बिकाय प्रसिद्ध बनियाँक मोछ बिकाइछ।
नामी बनियाँ बदनामी चोर नाची चोर (चोरि करबामे कुख्यानत) आर बदनाम बनियाँ (ठकबामे बदनाम) ई दुनू निरपराध भेलोपर पकड़ल जाइछ।
नामी मरे नाम ला, पेटू मरे पेट ला प्रतिष्ठित व्याक्ति अपन प्रतिष्ठाटक अपन प्रतिष्ठातक हेतु मरैछ, किन्तुक पेटू व्यओक्ति अपन पेअ खातिर।
नामी मुइला नाम ले, पेटू मुइला पेट ले देo नामी मरे नाम ला, पेटू मरे पेट ला
नारिए नरकक खानि, नारिए स्व र्गक खानि नारी स्व र्ग एवं नरक दुनूक खान अछि।
नासहि काल बिनासहि बुद्धि विनाशक स्थितिमे बुद्धि भ्रष्ट भ’ जाइछ।
निकउडि़या गेला हाट, ककड़ी देखि हिया फाट निर्धन व्यगकित बजार गेल, ओतय ओ ककड़ी बिकाइत देखलक, किन्तुद द्रव्याेभावक कारणेँ ओ कीन नहि सकल ।
निकटले नाती भतार अभाव ग्रस्ताभक स्थितिमे नातीकेँ भतार सदृश बुझैछ।
निचिन्तझ सूते कुम्हाेर, जकर माटिओ न ले जाय चोर कुम्हा र निश्चिन्त् भ’ कए सुतैछ, कारण ओकर सम्प‍त्ति माटिकेँ चोर नहि चोरि क’ सकैछ।
निचिन्तप सूते हेतु, जनिका गाय ने गोरू जकरा मालजाल नहि छैक ओ निश्चिन्तो भ’ कए किएक ने सूतत ? घर-संसारसँ निश्चिन्ते व्य क्तिक प्रसंगे कहल जाइछ।
नित उठि खेती नित उठि गाय, जे ने देखथि तकरे जाय खेती एवं गायक देखरेख प्रतिदिन आवश्यपक अछि, अन्य था ओ अधलाह भ’ जाइछ।
नित उपास के के दय रोज, नित रोगी के के करे खोज जकरा ओतय प्रतिदिन उपवास होइछ तकरा के रोजी द’ सकैछ तथा जे सतत रोगी रहैछ तकरा के प्रतिदिन जिज्ञासा क’ सकैछ।
नित रोगी के करय सेबा, नित पाहुन के दिए मेबा जन्ममजात रोगीक सेवा एवं प्रतिदिन पाहुनक आगमनपर मेवा नहि देल जा सकैछ।
निते खेती दोसरे गाय, जे नहि देखे तेकर जाय खेती एवं गायकेँ प्रतिदिन देखय पड़ैछ।
निपने पोतने देहरी, पेन्हैने ओढ़ने मेहरी निपला-पोतलासँ देहरी चिक्क्न-चुनमुन रहैछ तथा नीक वस्त्रा भूषणसँ सुसज्जित स्त्रीथ नीक लगैछ।
निर्बल के बलराम ईश्वबर गरीबक एकमात्र सहायक छथि।
निमोछिया के बहु सबे के बहु जकरा मोछ दाढ़ी नहि छैक तकर स्त्री सभक स्त्रीा बुझल जाइछ।
नीचाँ पंच ऊपर परमेसर पंच एवं परमेश्वररक एक समान स्था न अछि।
नीचे ऊँचे खेती करी महाजन करी भारी, बैसि उठि कऽ बड़दा कीनी हँसमुख करी नारी खेती ऊँच-नीचमे करब, महाजन पैघ व्यीकितकेँ बनयब, बड़द किनबाकाल एकहि बेरि नहि, बारम्बाुर उठि-बैसि क’ देखब तथा पत्नीक हँसमुख करब उचित अछि, जे सुखक सार मानल जाइछ।
नीम खयलाक बाद गुड़क स्वा द भेटैछ दुखक उपरान्तद सुखक अनुभव होइछ।
नीम सऽ मधु नहि टपकैछ तीतसँ मीठक अनुभव नहि कयल जा सकैछ।
नीम हकीम खतरे जान जँ नव वैद्यसँ इलाज होइछ तँ प्राण संकटमे पडि़ जाइछ।
नीर नारी कहलक की, एकरा ढरकइत देरी की पानि एवं स्त्रीी दुनू एक समान अछि।
नूआ तऽ धोबी धो देत, आ मुह के धो देत मैल कपड़ाकेँ धोबी साफ क’ देत, मुदा अधलाह मुहकेँ के साफ करत ? संसारमे खराब जबानक कोनो इलाज नहि।
नूआ लेलिऐ झुल्लाइ लेलिऐ गेलिऐ पड़ा कऽ, साउस के जे माया लगले तऽ लऽ अलै बजा कऽ सारी-ब्लाजउज सब ल’ कए हम सासुरसँ पड़ा गेलहुँ।
ने अति बकता ने अति चूप, ने अति बरखा ने अति धूप ने अधिक बजनिहार, ने अधिक चुप्पि रहनिहार, ने अधिक वर्षा ने अधिक रौद नीक होइछ।
ने आँखिमे लोर, ने मुहमे बोल ने तँ आँखिमे नोर छनि आ ने मुहमे बोली।
ने आगू नाथ ने पाछू पगहा जकरा आगाँ-पाछाँ क्योग देखनिहार नहि रहैछ तकरा लक्ष्यप क’ कहल जाइछ।
नेओतल बाभन हेरायल पानि निमन्त्रित ब्राह्मण भोजन कयलनि।
ने ओ देबी ने ओ कराह देवीक अनुरूप कड़ाह नहि अछि।
ने ओ गनगरी ने ओ ठाम कोनो वस्तु क अकस्मा।त गुम भ’ गेलापर प्रयुक्तत।
ने ओ राम ने ओ अजोध्याक पूर्वक अपेक्षा वर्त्तमानमे महत्त्वमे ह्रास भेलापर कहल जाइछ।
ने कइली नइहरे सुख, ने देखली पिया मुख जकरा नैहरक सुख नहि भेटलैक आ सासुरमे अपन स्वाहमीक मुह देखि सकल, तेहन अभागल व्यवक्तिक प्रसंगे कहल जाइछ।
नेकिओ पूइछ पूइछ होइ नीक कतहु पूछि क’ कयल जाय? अर्था परोपकारक निमित ककरोसँ अनुमतिक प्रयोजन नहि पड़ैछ।
नेकी कर दरियामे डाल नीक क’ कए विस्म रण क’ देब।
ने कौमदीमे ने कोदारिमे अध्यौयन एवं परिश्रमसँ मुह चोरौनिहारपर व्यंौग्यव।
ने खायब ने खाय देब, सउँसे घर छीट देब ने तँ हम खायब आ ने ककरो खाय देबैक, प्रत्युमत खाद्य-सामग्रीकेँ हम सउँसे घरमे छीट देब।
ने गदहबा के दोसर मठ, ने धो‍बिया के देसर परोहन धोबी आ गदहा एक दोसराक पूरक अछि।
ने गिरैत देरी, ने उठैत देरी प्रत्येतक स्थितिमे सामान रहनिहारपर कहल जाइछ।
नेङड़ा दू टेंगड़ा सबइया रोटी खो, एक रोटी घटि गेलौ बहु किरिया खो नेना-भुटका कोनो नाङर व्यरक्तिकेँ कचकचयबाक हेतु कहैछ।
ने जायब ऊ टोल, ने सुनब ऊ बोल हम ओहि टोल नहि जायब आ ने हमरा एहन बोली सुनय पड़त ।
ने जीबइ छी ने मरइ छी, हुकुर हुकुर करइ छी अपग्रहमे प्राण पड़लापर प्रयुक्तह।
ने ढरैत देरी, ने उठैत देरी तुनुक मिजाजी व्य क्तिक प्रति प्रयुक्तर होइछ।
ने दउड चली, ने ठेसि खसी हम ने तँ दोडि़ क’ चलब आ ने हमरा ठेंस लगबाक भय बनल रहत!
ने दिगबलमे फूल, ने दिकसूलमे सूल यात्रामे कोनो प्रभाव नहि पड़लापर व्यंमग्ये।
ने नओ मन घी होयतनि ने राधा नचती असम्भ व व्य वस्था करबाक हेतु प्रयुक्त होइछ।
ने नमीन काम करब, ने दरबार देखे जायब दरबार जाबयका प्रयोजन तँ हमरा तखन हैत जखन हम नीक जकाँ काज करब।
ने नीमन गीत गायब, ने बेगारी पकड़ल जायब हम नीक गीत कतहु नहि गायब।
नेम टेम गोपाल अइसन, हाँड़ी चोराबे चमार अइसन नियमक पालन भगवान सदृश करैछ भोजन बनयबाक बासनक चोरि करैछ, तँ व्यं ग्य ।
ने मरि खाइ, ने उपास पड़ी बेसी भोजनोपरान्त, मरनासन्ऩ स्थिति भ’ जाइछ तथा उपवास करबाक स्थिति आबि जाइछ।
ने माघे जाड़ ने फागुने जाड़, जब बेआर तबे जाड़ ई आवश्य़क नहि जे माघ, फागुने मासमे जाड़ हो।
ने मामा सऽ कनहा मामा नीक अभावमे तुच्छन वस्तु पर्यन्त महत्त्वपूर्ण होइछ।
ने रहत बाँस ने बाजत बँसुली बाँसे जखन नहि रहत तँ बाँसुरी कथीक बाजत? जँ मूल वस्तु ए ने रहत तँ अनर्थपूर्ण कार्य कतयसँ हैत? झगड़ाक जडि़ उखरालपर प्रयुक्‍तद होइछ।
ने सिबगंगा ने सिब थान, बाटहि बाटमे गेल परान ने तँ ओ शिवगंगा आ ने शिवालय पहुँचि पौलनि, प्रत्युवत मार्गहिमे प्राणान्तोर भ’ गेलनि।
ने सोनू साह जनिक गाछ व्यसक्तिक अनुपस्थित भेलापर प्रयुक्तर होइछ।
ने सवर्गक लोभ, ने नरकक डर स्वसर्ग नर्कसँ निफिकिर रहनिहार व्य्क्तिपर व्यंवग्यन।
ने हगब ने बाट छोड़ब ने तँ कोनो काज करब आ ने तँ दोसराकेँ करय देब, तँ प्रयुक्तर।
नोकर के चाकर तकरो लमेचर नोकरकेँ सेहो नोकर रहैछ तकरा लमेचर कहल जाइछ।
नोख मजूरी चोख काम बेसी मजदूरी देलापर कार्य अत्यमन्तल शीघ्रतासँ होइछ।
नोखि नाउनि के बाँसक नहरनी हजामिन तेज अछि अतएव बाँसक नहरनी रखने अछि।
नोखि बनियाइन के, भरि घर बटखारा बनियाइन तेज अछि तेँ सँउसे घर बटखारा पसारने अछि।
नोनगर ने तेलगर चहटगर बर, माइगर ने बपगर ठेसगर बर कोनो गुण नहिओं रहलापर अपनाकेँ गुणसम्पणन्नर कहब, तँ प्रयुक्तव।
नोन संग सन एहन तऽ तेल संग केहन, रोटी संग एहन भात तऽ भात संग केहन कोनो वस्तुह वा व्यंक्तिक महत्त्व उचित स्था न भेलापर बढि़ जाइछ।
नोनियाँ के बेटी के ने नैहरे सुख ने ससुरे सुख नोनियाँक बेटीकेँ ने तँ नैहरमे सुख नसीब होइछ आ ने सासुरमे, कारण परिश्रमी होइछ तँ काज दुनू ठाम करय पड़ैछ।
नोने तेले रस, आ लेने देने जस नोन-तेल देलासँ व्यदञ्जन रसगर एवं चहटगर होइछ तथा लेला देलासँ यश।
नोन ने तेल, छूछे धकेल नोन तेल किछु ने अछि तें छुच्छेक खा लिय।
नौकर के चाकर मड़इके ओसारा अप्रासंगिक कार्यपर प्रयुक्त्।
नौ के लकड़ी नब्बे खरच नौ टाकाक लकड़ी अछि, मुदा ओकरा ढोयबापर नब्बेी टाका खर्च पडि़ गेल।
नौतल बाघ बरोबरि नोतिहारीक व्यरवहार शेर सदृश होइछ, तँ व्यंहग्यि।
नौ नकद तेरह उधार नगदी व्येवासाय लाभकारी होइछ।
नौ सै चूहा खा कऽ, बिलाइ चलल हज कऽ नौ से मूस खाक बिलाइ चलल तीर्थाटनपर।
पंच नउतली हूब सऽ पंच आयल खूब सऽ, हाँड़ीमे अरथ ने पंच भाय के लाज ने क्योन अपना ओतय पंच लोकनिकेँ भोजनार्थ निमंत्रित कयलक ।
पंच मुह परमेसर पंचक मुहमे परमेश्वारक निवास रहैछ।
पंच संगे नीक, पिया संगे ने नीक पंच लोकनिक संग प्रिय पात्र बनि जाइछ, किन्तुक स्वा मीक संग नहि।
पंचांगक जालमे जजमनिनीक खोंपा भ्रमर जाल पसारि निजी स्वांर्थसिद्धि करब, तँ प्रयुक्तस।
पंछीमे कउआ, आदमीमे नउआ पंछीमे कौआ तथा मनुष्य।मे हजाम अत्यधन्त, चतुर होइछ।
पंडितक बहु भदबा बियाय पंडितक पत्नीद भदवामे जन्मा दैछ, किन्तुच भदवाक कोनो प्रभाव ओकरापर नहि पड़ैछ।
पंडि़तक बिलाइओ पंडि़त ज्ञानी व्यलक्तिक सब ज्ञानी होइछ।
पंडितकमकर जालमे जजमानक नारी भ्रमजाल पसारि क’ ककरो अपना प्रति आकर्षित करब, तँ प्रयुक्तन।
पंडितक ससरफानीमे भगबान पंडितक मकरजालमे फसि ओकरे मनानुकूल भगवानो करैत छथि।
पंडित नया बइद पुरान पंडित नपव तथा वैद्य पुरान अनुभवी होइछ जे क्रमश: नीक गणना तथा अनुीावर इलाज करैछ।
पंडित मुनिजन दुख अपार, अधम परम सुख मूढ़ अपार ज्ञानीकेँ दु:ख आ मूर्खकेँ सुख भेलापर कहल जाइछ।
पंडित बइद मसालची एकर उनटे रीति, आन के गैल बताया कऽ अपने साधे भीति पंडित, वैद्य एवं मशालचीक उनटे रीति होइत होइत अछि।
पंडील जी पंडउल के, धीया पूता कमतउल के पंडित जी अपने पंडौलक थिकाह, मुदा जाहि बालक-बालिकाकेँ पढ़बैत छथि ओ सभ कमतौलक अछि।
पंडीजी पंडउल के, पइसा माँगे तउल के पंडित जी पंडौलक थिकाह, मुदा अपन पारिश्रमिक पूर्ण लैत छथिँ अर्थात् एहिमे कनेको कमी नहि करैछ।
पंडीजी पंडीजी गोर लगैत छी, अहाँक छोटकी पुतहुक भगतइ करैत छी एक भगता पंडितजीसँ कहैछ, ‘हम अपनेकेँ प्रणाम करैत छी।
पंडीजी परनाम दही चूड़ा आम, आ ऊपर सऽ दू खराम ब्राह्मण साधारणत: विशेष खाधुर होइछ।
पइसा छउ तऽ चख, ने तऽ चउबटियापर झख संगमे पैसा अछि तँ कीनि क’ स्वाझद लिय अन्येथा चौराहापर जा क’ झख मारू।
पइसा ने कउड़ी, बाँकीपुरक सैर संगमे पाइ-कौड़ी नहि छनि, मुदा बाँकीपुरक सैर काताह।
पइसा ने कउड़ी, बीच बाजरमे दउड़ा दउड़ी संगमे पैसा-कौड़ी नहि छनि, मुदा बीच बजारमे दौड़-धूप क’ रहल छथि।
पकले आम सोहाओन, पकले मरद घिनाओन आम जखन पकैत अछि तखन ओकर स्वाखद तथा सुगन्धि नीक लगैछ, किन्तुी पुरु
ष वृद्ध भ’ जाइत अछि तँ ओ अपन व्युवहारसँ घिनाओन भ’ जाइछ।
पकाओल रोटी से जुरियाबे, जकरा अपना बेले ने आबे रोटी पकयबासँ पूर्व बेलय पड़ैछ, मुदा रोटी बेलबाक लूरि नहि, मुदा खयबा बेरमे संगी बनब, तँ व्यं ग्यख।
पछिममे सूर्य उगब कोनो असंभव कार्य भेलापर कहल जाइछ।
पड़लन भाट कुकूरक पल्लार भाँट कुकूरक पल्लाप पडि़ गेल।
पड़लहुँ पिया तोहर बस, जेन्नेब पाब ओन्नेु घस हे स्वा मी, आब हम तँ अहाँक आश्रयमे छी जहिना हमरा राखब तहिना हमरा रहब स्वीाकार अछि।
पड़ला राम कुकुरबाक पाला दुष्ट व्य क्तिसँ सम्प‍र्क भेलापर प्रयुक्ते होइछ।
पड़ले पाबह ठौरहि ताक अकस्मापत योग्यलतासँ विशिष्टी स्थारन भेटि गेलापर प्रयुक्त ।
पड़ाइत चोर के पाद नफा चोर जखन सब वस्तुदक चोरि क’ लेलक आ ताहिमेसँ जे किछु ओ छोडि़ देलक ओ लाभे थिक।
पड़ाइत भूतक भगबाक आस जे व्य क्ति पड़ा रहल अछि ओकरासँ जैह भेटि जाय वैह उपलब्धि मानबाक चाही।
पड़ोसिन भातो सिहइली उपासो सिहइली एक पड़ोसिया दोसर पड़ोसियीकेँ भात खाइत देखि सेहो सिहाइत अछि आ जँ उपवासक स्थिति होइछ तैयो सिहाइत अछि।
पड़ोसिया के घोड़ा, तऽ हमरा हीं हीं हीं पड़ोसीकेँ घोड़ा छनि तँ हमरा घोड़ाक हिनहिनाहटिसँ कोनो प्रयोजन नहि।
पढ़ल लिखल बेटा बानर भऽ गेल पढ़ायल-लिखायल बेटा बानर बनि गेल।
पढ़ब तऽ पढ़ाबह ने तऽ सहरमे बसाबह बच्चातकेँ जँ पढ़ैबाक अछि तँ ओकरा पढ़ाउ अन्याथा शहरमे रहबाक व्यिवस्था करू, जाहिसँ बहुत बात ओकरा ओहिना आबि जाइक।
पढ़ब सिखाबी फरिखाय पढ़ब-लिखल तँ किछु ने छथि, मुदा नाम रखने छथि- मुंशी जी।
पढ़ल लिखल के चारि आँखि पढ़ल लिखल व्यचक्ति कोनो कार्य करबासँ पूर्व नीक जकाँ क’ लैछ।
पढ़ल लिखल तऽ किछु नहि, बालम घड़ीमे देखऽ टैम पढ़ल लिखल नहि छथि, किन्तुल घड़ीकेँ उनट-पुनटा रहल छथि ताहिपर पत्नीक पूछि बैसैत छनि, जे कतेक समय भ’ रहल अछि? मूख्र जँ बेसी फैशन करैछ, तँ व्यंतग्यू।
पढ़ल लिखल साढ़े बाइस, कोट धरि भेल चाहे अंगरेजी कोनो व्यरक्तिक हेतु कारी अक्षर भैंस बरोबरि अछि, किन्तु पहिरत अंग्रेजी कोट।
पढ़ला घरमे बिलाइयो पढ़ली पढ़ल-लिखल घरक बिलाइ सेहो पढ़ल-लिखल होइत अछि।
पढ़े फारसी बेचे तेल, देखू तऽ करम के खेल फारसी पढि़ क’ तेल बेचि रहल अछि।
पत्थीलपर जँ जनमे घुरमी, तबहु ने अपन होय कुरमी जँ पाथरपर घुरमी शीघ्र जनमैछ, तथापि कुरमी जाति अपन नहि भ’ सकैछ।
पदनी पादि गेल, पीढि़या फाटि गेल पदनी बसातो छोड़ैछ तँ ओहिसँ पीढ़ी पर्यन्ता फाटि जाइछ।
पदनी पादि गेल, पेठिया लागि गेल पदनी बसात छोड़ैछ तँ एतेक लोक एकत्रित भ’ जाइछ जे बजार लागि जाइछ।
पमरियाक तेसर सब बातमे हँ-मे-हँ मिलौनिहारकेँ लक्ष्यन क’ कहल जाइछ।
पर उपकारी, धरम धारी आनक उपकार कयनिहार धर्मात्माी होइछ।
परक किरखी पर के गाय, पापी हुऐ से हाँके जाय खेत ककर अछि ? गाय ककर अछि ? जे पापी होइछ ओ ओकरा हाँकि क’ बहार क’ दैछ।
परक बेदन बाँटि न लेइ वेदनाक बटबारा नहि भ’ सकैछ।
पर के अन खो रे मन रे मन दोसराक अन्न खूब खो।
पर के जेबर तीन पहर, छीन लेलक भेल कुहर आनक वस्त्रातभूषण किछुए क्षण शोभैछ।
पर के धन धनेसर राजा आनक ध्नन हड़पि क’ धनेश्वेर राजा बनलाह।
पर के बासन पर के घी, हमरो तोरो लागय की दोसराक बासनमे घी राखल अछि।
पर घर नाचे तीन जन, कायथ बइद दलाल दोसराक घरमे तीन व्यखक्ति विशेष भाभट पसारैछ कायस्थी, वैद्य एवं दलाल।
परतिस्ठेा परान गमायब प्रति‍ष्ठाठक खातिर प्राणर्पण नहि करबाक चाही।
पर दु:खी नहि कोइ आनक दु:खसँ लोक दु:खी नहि होइछ।
परबतपर कुआँ खनब पहाडपर इनार खूनि रहल अछि।
परबाहित जल निरमल प्रवाहित जल स्वलच्छ होइछ।
पर मुडि़या फलहार करे ने ढेकार आनक टाकासँ नीक-नीक वस्तु खयनिहार ढेकार पर्यन्तक नहि करैछ।
पर मुण्डेय फलहार दोसरापर आश्रित रहनिहारपर व्यं्ग्यन।
परिकल गीदड़ ककरीक खेत गीदड़ दौड़-दौड़ क’ ककरी खेतमे जाइत अछि।
परिकल पाँडे घिउ खिचड़ी पाँडे परिकल छथि तँ सतत घी खिच्चवडि़क माँग करैत छथिथ।
परिकल बभना लुती लगओना, फेर फेर आबे हमरे अङना ब्राह्मण परिकल अछि तथा झगड़ा लगयबामे सेहो बाहादुर अछि।
परिकल मलाहिन के मँगुरी चाही परिकल मलाहिन सतत मँगुरी माछ चाहैछ।
परिकल सहुआइन, डेढ़सेरिये चढ़ाबे सहुआइन परिकल अछि तेँ ओकरासँ कोनो वस्तुन कीनबा काल ओ सेरक बदला डेढ़ सेर तौलि दैछ।
परिकू परिकू मूस माय, एक बेर पकड़ब जीबे जाय मूस अत्यसधिक उपद्रवी होइछ ।
परात काल जे नहाय, तकरा देखि बइद पछताय नित्य प्रात: काल जे स्नाछन करैछ तकरा देखि क’ वैद्य पश्चाात्ताप करैछ जे ओ कहियो अस्वेस्थव नहि हैत।
पराधीन सुख सपनहु नाही जे सुख अपना लग अछि ओकर कल्पशना स्वसप्नछहुमे दोसर ठाम नहि कयल जा सकैछ।
पहिने आत्मा भाब, तखन परमात्मक भाब मनुष्यआ पहिने अपन हृदयकेँ सन्तुरष्ट करैछ तत्प्श्चानत् देवी-देवताक चिन्ता करैछ।
पहिने घरमे दीप, तखन मंदिरमे इजोत मंदिरक अपेक्षा घरक महत्त्व अधिक होइछ, तें घरक देवता पूज्यम होइछ तखन बाहरक ।
पहिने दू कर भीतर, तखन देबता पीतर आत्मे-तुष्टिक पश्चाेत् भगवत् नीक लगैछ।
पहिने पीबे जोगी, बीचमे पीबे भोगी, पाछाँ पीबे रोगी भोजन करबा काल पहिने योगी पानि पिबैछ, बीच-बीचमे भोगी तथा अन्तवत: रोगी।
पहिने पेट पूजा, तब काम दूजा पहिने भोजन करबाक चाही तत्पाश्चाजत् आन काज होइछ।
पहिने भाब तखन भात पहिने प्रेम देखयबाक चाही तत्पबश्चाात् भोजनार्थ निमंत्रित करब अपेक्षित।
पहिने भीतर तब देबता पितर पहिने लोक भोजन करैछ तत्प श्चाशत् देवताक आहवान ।
पहिने मारय से मीर जे पहिने मारैत अछि वैह मीर कहबैछ।
पहिने सीता तखन राम अभिधेयार्थ स्पमष्टा अछि।
पहिने सोच बिचार, पाछाँ करी काज कोनो कार्य करबाक पूवर्स नीक जकाँ सोचि-विचारि लेबाक चाही तखन काज करबाक चाही।
पहिरी धनकाइन जकाँ, राखी गरीब जकाँ वस्त्रानभूषणकेँ पहिरबाक चाही धनिक व्य क्ति सदृश, मुदा ओकरा रखबाक चाही गरीब जकाँ।
पहिल मारि धरहरारिया खाय दुइ व्यरक्ति बीच मारिपीट भेलापर जे छोड़ाबय जाइछ वैह पहिने मारि खाइछ।
पहिलहि बोहनी गोंसइयाँक आस बनियाँ भगवानसँ प्रार्थना करैछ जे हमर बोहनी शीघ्र करबा दिअ।
पहिला नीपल गेल दहाय, आब के नीपल देखऽ जाय पहिने जे घर नीपने छलहुँ ओ दहा गेल।
पहुनमे बेचि कऽ खरची पाहुनकेँ बेचि क’ खर्ची चलाओल जा रहल अछि।
पाँच कओर भीतर, तब देबता पितर पाँच ग्रास भीतर गेलाक पश्चादते ईश्वारक आराधनामे मन लगैछ।
पाँच मास बिआहक बीतल, पेट कतय सऽ आनल एखन पाँचे मास विवाहक भेल अछि, मुदा ई गर्भवती अछि।
पाँचहि मित्र पचीसहि ठाकुर पाँच टाका हेतु मित्रसँ तथा पचीस टाकाक हेतु राजासँ शत्रुता करब अपेक्षित नहि।
पाँचे आम पचीसे महुआ, तीस बरसमे इमली कहुआ आम पाँच वर्षमे, महुआ पचीस वर्षमे, इमली तथा कहुआ तीस वर्षमे फड़ब प्रारंभ होइछ।
पाँचो आङुर बरोबरि नहि हाथक पाँचो आङुर एक समान नहि अछि।
पाँचो आङर सऽ पहुँचा भारी पाँचो आङुरसँ बेसी भारी हुनक पहुँचा छनि।
पाँड़े फुसलाय के लाल पतरा पाँडेकेँ लाल पतरा छनि।
पाकल पड़ार बुद्धिक दाबीपर व्यंनग्यु।
पाकल बाँस कतहु लीबल असंभव बात नहि भ’ सकैछ।
पाछाँ खाधि आगाँ पहाड़ द्वन्द्व क स्थितिमे प्रयुक्त।।
पातिल छुआयल कुकूरक जाति चिन्हा्यल हाँडी तँ छुआ गेल, किन्तुक कुकूरक जातिसँ परिचित भ’ गेलहुँ।
पाथरक नाओ ने चले पाथरक नाव नहि चलि सकैछ।
पाथर करे अपन बड़ाई, हमहुँ सिब के अपन भाई पाथर अपन प्रशंसा करैछ जेहम तँ शिवक सहोदर भाय छी।
पाथर के जोंक नहि लगैछ पाथर चिक्क न होइछ तेँ ओकरापर जोंकक कोनो प्रभाव नहि पड़ैछ।
पाथपर जँ जनमे गुरमी, तइयो न होय अपन कुरमी पाथरपर दूभि जनमियो जा सकैछ, किन्तुप कुर्मी कोनो स्थितिमे अपन नहि भ’ सकैछ।
पान देले सातु ने पनही देले पूआ पान देलापर सातु। नहि दैछ आ मारलापर पूआ खाय लेल दैछ।
पान ने तँ पानक डंटी सही जखन ककरो यथापूर्ण स्वाीगत नहि होइछ तखन कहल जाइछ।
पान सन रोटी पहाड़ सन दिन, कोना कऽ काटब बैसाख सन दिन पान सदृश पातर रोटी एतय भेटैछ।
पानि तेल नहि निबडि़ पिरीत भिन्नत स्विभावक व्यनक्तिक प्रेम प्रगाढ़ नहि होइछ।
पानिमे बतासा गलि जाइछ जे वस्तुत जाहि स्था नक हेतु उपयुक्तप होइछ ओ ओतय जा क’ मिल जाइछ।
पानिमे माछ नओ नओ कुटिआ बखरा अप्राप्या वस्तुबक बटबारापर व्यं ग्या।
पानिमे रहि कऽ मगर सऽ बैर मगर पानिमे रहैछ अतएव ओकरासँ शत्रुता नहि कयल जा सकैछ।
पानी अउटने गाढ़ नहि, अनकर जनमल अपन नहि पानि आगिपर कतबो काल किएक ने औंटल जाय, किन्तुे ओ गाढ़ नहि भ’ सकैछ तथा दोसराक जनमल बच्चाेकेँ कतबो किएक ने अपनत्वल देखाओल जाय ओ अपन नहि भ’ सकैछ।
पानी पीबी छानि कऽ, गुरू करी जानि कऽ पानिकेँ छानि क’ पीबाक चाही तथा गुरुक विद्वत्तासँ प्रभावित भेलासँ हुनक आधित्यग स्वीवकार करब उचित अछि।
पानी बरसे आधा पूस, आधा गहूँम आधा भूस आधा पूस मासमे वर्षा भेलापर गहूँममे आधा भूस्सास भ’ जाइछ।
पानी मथला सऽ कतहु घी बहराइछ पानिकेँ कतबो मनोयोग पूर्वक किएक ने महल जाय ओहिसँ घी नहि बहरा सकैछ।
पानीमे मछरी नओ नओ कुटिया बखरा माछ एखन पानिएमे अछि तथापि ओकर नौ-नौ कुअिया क’ कए बटबारा भ’ रहल अछि।
पाप के बाप लालच लोभक कारणेँ लोक पाप करैछ।
पापीक धन अकारथ जाय पापी व्य क्ति द्वारा उपर्जित धन बिनु कोनो कारणेँ समाप्तथ भ’ जाइछ।
पापीक नाओ भरि कऽ डूबे, पासा पड़े अनाड़ी जीते पापी जखन नावपर चढ़ैछ तँ पानि भरि क’ ओ डूबि जाइछ।
पापी पेट जे ने कराबे पेट पापी होइछ जकरा कारणेँ लोक नाना प्रकारक छल-छद्मपूर्ण कार्य करैछ ।
पापी पेट पुरैनिञा अनलक पेटक कारणेँ पूर्णियाँ सदृश आबय पड़ल जतय मलेरियाक प्रकोप बेसी छलैक।
पापे पुन्ना सऽ दुख सुख भोग पाप-पुण्य सँ सुख-दु:खक भोग होइछ।
पाभरक देबी नओ पाओक पूआ देवीक वजन एक पौआक अछि, किन्तुै हुनका नौ पौआ अर्थात् सावा दू सेरक पूआ भोग लगाओल जाइछ।
पाभर के बाबाजी सबा सेरक संख बाबाजी अपने तँ एक पौआक छथि, मुदा हुनक शंख सवा सेरक छनि।
पालकीमे दुलहा भुइयाँमे चूतड़ अप्रसंगिक कार्यपर व्यं ग्य ।
पिआसलि सितआ के गरमाएल पानि अतृप्त केँ आर अतृप्त कयलापर कहल जाइछ।
पितरक नथपर एते गुमान, सोनाक रहितहु तऽ चलिते उतान संयोगवश नथिया पितरक अछि जाहिपर एतेक घमंड करैत अछि।
पिता पतितो भला बाप पतित किएक ने हो‍थु तथापि ओ बापे होइछ अर्थात् पिताक समान आन क्योत नहि।
पिया पूछए ने गाम सोहागिन स्वा मी नहि पुछैत छनि, तथापि गामक लोक सोहागिन कहैछ।
पीठक मारि मारी, पेटक मानि ने मारी ककरो पीठपर मारब नीक, किन्तुन पेटक मारि अर्थात् पेट काटब उचित नहि बु झना जाइछ।
पीरक सगाइ मीरक ओतय पीरक विवाह मीरक ओतय होइछ।
पूछे न पाछे गनउरापर फेके क्यो पूछैत नहि अछि तेँ तँ गनौड़ापर फेकल छी।
पूछे ने पाछे तऽ पाउछ लागल जाय कयो पूछैत नहि अछि तथापि पाछाँ लागल छी।
पुछे न पाछे बड़बड़ करे क्यो पूछैत नहि छैक तथापि बड़बड़ा रहल अछि।
पूछे ने पाछे हम दुलहीनक काकी बिनु ककरो पुछने-पाछने अपनाकेँ कनियाँक काकी कहि सम्माकन प्राप्तन करबाक प्रयास क’ रहल छथि।
पुछे बार ने कहाबे कानूनगोय क्यो कोनो समस्या पर विचार तँ नहि लैछ, मुदा ओ अपना मनसँ कानूनगोय कहबैछ।
पुतहु पुतहु एती हिक लागल छल, पुतहु एली पुतहु आब दिक लागैए पुतहुक अयबाक आतुरतासँ प्रतीक्षा छल।
पुतहु पुतहु लोचना, एली पुतहु भात भेल सपना पुतहुक आगमन भेलापर भोजन पर्यन्त मे कष्टु भ’ गेल।
पुरखाहा छूलक माँग तऽ पुरखइनियाँ पड़ल नाम, छुछुनारा छूलक माँग तऽ छुछुनरी पड़ल नाम पुरुषार्थवान् पुरुषक संग हमर विवाह भेल तेँ हम पुरखाइन बनलहुँ, किन्तु जँ छुछुन्नपर पुरुषक संग हमर विवाह होइत तँ छुछुनरी कहबितहुँ।
पुरबक फल भोगब पूर्व जन्मोमे मनुष्यस जेहन कर्म कयने रहैछ तकर फल ओकरा भोगय पड़ैछ।
पुरब पुनरबस बोये धान, मग्धान असलेसा कादो सान पुनर्वसु नक्षत्रसँ पूर्व धान बाओग करबाक चाही तथा मगधा आररेसा नक्षत्रमे खेतमे कादो क’ कए रोपबाक चाही।
पुरब सऽ चलल तमाकु रहल बंगला छाय, जेकरा देहपर ने लत्ता सेहो तमाकु खाय तमाकू पूर्व दिशासँ एतय आयल तेँ एकर प्रसार-प्रसार बंगालमे विशेष भेलैक।
पुरबा रोपे पूब किसान, आधा खखरी आधा धान पूर्वा नक्षत्रमे धान रोपलासँ नीक उपजा नहि होइछ।
पुरबापर जौं पछबा बहै बिहुसि राँड़ बात करे, एह दोनो के इहे बिचार ऊ बरसे ई करे भतार पूर्वा नक्षत्रमे जँ पछबा बसात बहैत अछि आ राँड़ हँसि क’ बात करैत अछि, एहिसँ ई अनुमान सापेक्ष थिक वर्षा हैत आ विध्वाा नारी पुन: विवाह करत।
पुरबैयाक लहरामे तीतल नुआ साधन रहलोपर विपत्तिमे पड़लापर कहल जाइछ।
पुरान बइद नब जोतखी पुरान वैद्य ओ नव ज्यो तिषी उचित ढंगसँ काज करैछ।
पुराने चाउर पन्थ पड़े रोगीकेँ पुरान चाउर पंथ देल जाइछ।
पुरुख उपजाबे धान, तऽ मउगी लछनमान पुरुष धन उपलबैछ तँ ओकर पत्नीत ओहिसँ आराम करैछ तँ लक्षणमान कहबैछ।
पुरुख पुरुखमे होइछ अन्तहर, केओ हीरो केओ कंकर पुरुष-पुरुषमे स्वहभावक कारणेँ अन्तेर भ’ जाइछ तेँ क्योु हीरो बनि जाइछ आर क्यो कंकर सदृश रहैछ।
पुरुखा तऽ मरि गेलनि कुमारे, आ नातीक नओ नओ बिआह वंशमे ककरो विवाह तँ भेलनि ने, किन्तुन नाती नौ टा विवाह कयने छथि।
पुरुब पुनरबसु बोये धान, मग्घाि असरेसा कोदो साम पूर्वा एवं पुनर्वसु नक्षत्रमे धन तथा मग्धा् एवं असरेसा नक्षत्रमे कोदो एवं साम बाओग कयल जाइछ।
पूजाक नाटक, सरगक फाटक पूजाक बहन्नाछ बना क’ स्व्र्गक द्वार प्रशस्तछ करब ।
पूजी घास ने कुंजीक झाबा पूँजीक नामपर किछु ने छनि, किन्तुव देखयबाक हेतु कुंजीक झबबा रखने छथि।
पूजी ने छी दोकान कयने छी पूँजी किछु ने छनि, मुदा दोकान खोलने छथि।
पूत भेल सियान, दुख भेल बिरान बेटा जखन जवान भ’ जाइछ अर्थात् कमाय योग्यज भ’ जाइछ तखन दु:ख स्वखत: भागि जाइछ।
पूत माँगय गेलहुँ भतार गमा कऽ अयलहुँ बेटा माँगबाक हेतु गेल छलहुँ, मुदा परिणाम भेल जे स्वागमीकेँ गमा क’ आबि गेलहुँ।
पूरी पड़े तऽ सपूत कहाबी व्या पारमे लाभ भेले उत्तर कयो सपूत कहा सकैछ।
पूसक दिन फूस, कउखन छाया कउखन धूप पूस मासक दिन विशेष समय धरि नहि टिकैछ।
पेचाह बिलारि मूसे बाउर कमजोर बिलाडि़ मूससँ भयभीत रहैछ।
पेटक पानि नहि पचब कोनो कार्य सुगमता पूर्वक सम्पछन्नू नहि होइछ, तँ कहल जाइछ।
पेट करे कह कह, चूड़ा करे मह मह भुखायल व्य क्ति किछुओ खयबाक हेतु तैयार भ’ जाइछ।
पेट के दु:ख देब, देह के सुख देब कामचोर व्य क्ति पेटकेँ दु:ख दैछ कारण ओ परिश्रम नहि करैछ।
पेट ने भरे तऽ मुह ने दुखाय पेट नहि भरैछ तँ मुह सेहोनहि दुखाइछ।
पेट पेटारी मुह सुपारी पेट तँ खाली छनि आ मुहमे सतत सुपारी रखैत छथि।
पेट बजारी नै जुरैती, भुखलो नै अघैती बहुभोजीकेँ तृप्तिक अभाव रहैछ आ भूखल कहियो अघा नहि सकैछ, तँ व्यंैग्यण।
पेट बिगाड़े मुरही, घर बिगाड़े बुरही मुरही खयलासँ पैट खराब भ’ जाइछ।
पेटबेक कि लोटबे पेटकेँ सर्वस्वे बुझनिहारपर व्यंाग्यण।
पेट भरल तऽ पेड़ा सड़ल पेट भरल अछि तेँ पेड़ा पर्यन्तर सड़ल जाइछ।
पेट भरले पीठ लादे पेट भरलापर पीठपर लादैछ।
पेट भारी से माथ भारी पेट भरला पर आलस्यासँ माथ सेहो भारी भ’ जाइछ।
पेटमे अन्नर ने ऊपर ढेकार पेटमे अन्नर नहि छनि, मुदा देखैबाक हेतु ऊपरसँ ढेकार क’ रहल छथि।
पेटमे खर ने सिंहमे तेल पेटमे अन्ने नहि छनि, मुदा माथमे तेल चोपकारने छथि।
पेटमे पड़ल अन, तऽ उमके लागल मन पेट भरले सन्तां मनमे विविध प्रकारक विकार उत्पनन्नत होइछ।
पेटमे पड़ल जुराइ, कयलहुँ नहिराक बड़ाइ पेटक ज्वालला शान्ते भेलापर स्त्री गण नैहरक प्रशंसा करय लगैछ।
पेटमे धीया बटलनि डराडोरि भविष्यधक कल्पानापर व्यंपग्यल।
पेटमे भात तऽ नीक नीक बात, पेटमे ने भात तऽ अल्हु आ सन बात पेटमे भात रहलापर नीक-नीक बात बहराइछ अन्यहथा सब बात निरर्थक।
पेटमे लडि़का नगरमे सोर नेना तँ एखन पेटेमे अछि, कितु संपूर्ण नगरमे हल्ला भ’ गेल।
पेट सऽ खसलें, हर लऽ कऽ दउड़लें जनमितहि हर जोतब प्रारंभ कयलक।
पेटहि सऽ केओ की सिखने अबैछ संसारक प्रत्येीक वस्तु क्यों पे‍टहिसँ नहि सिखने अबैछ।
पेटहा चाकर घसहा घोड़, खाय बहुत काज करे थोड़ बहुभोजी नोकर, अत्युधिक घास खयनिहार घोड़ा भोजनक अनुरूप काज नहि करैछ।
पेटारीमे बन्दन कऽ राखब कोनो एहन वस्तुु जकरा प्रदर्शित कयलासँ ओकर महत्त्व घटबाक आशंका रहैछ तँ ओकरा प्रकाशित नहि कयलापर कहल जाइछ।
पेन्ह ने छी ओढने छी सीकीपर डोले पहिर ओढि़ क’ सीकी सदृश डोलि रहल छथि।
पेन्हओने ओढ़ने मेहरी, निपने पोतने देहरी महिला नीक वस्त्र पहिरने आ घर-आङन नीपला पोतलापर नीक लगैछ।
पैदल आ सबारीक की संग पैदल तथा सवारीपर चलनिहारक कोनो रूपेँ समन्वतय नहि भ’ सकैछ।
पैरमे जुत्ता ने माथपर टोपी पैरमे जुत्ता पर्यन्तर नहि छनि, किन्तुि माथपर टोपी पहिरने छथि।
पैसा ने कउड़ी, उतान हो गे छउड़ी द्रव्या भाव रहलोपर मौज उड़ौनिहारपर व्यं्ग्य ।
पों बर पातर चूड़ा, दाइ के नहिरा कतेक दूरा के केहन अछि से सब जनैछ।
पोआ देखा गरुड़ के डेराबी गरुड़केँ साँपक पोआसँ नहि डर होइछ।
पोखरि खनेबे ने कयल, घडिआरक डोरा पडि़ गेल पोखरि अद्यपर्यन्तल नहि खुनाओल गेल अछि ताधरि घडि़यार आबि क’ डेरा द’ देलक।
पोखरि रजोखरी आर सब पोखरा, राजा सिबै सिंह आर सब छोकरा रजोखरि पोखरि प्रसिद्ध अछि।
पोठी माछ के काँट मुलकी, सगही बहु के दुलारे मुलकी पोठी माछमे अत्यटधिक काँट होइछ।
पोथीक आगाँ थोथी किछु ने लिखित प्रमाणक समक्ष मौखिक प्रमाण कोनो मूल्या नहि रखैछ।
पोथी ने पतरा, देखे चललन जतरा ने पोथी छनि आ ने पतरा, मुदा यात्राक मुहूर्त्त बहार करैत छथि।
पोनपर लत्ता ने जेता कलकत्ता वस्त्रातभाव छैक मुदा कलकत्ता जयबाक कल्प्ना करैत अछि।
पोन फाटे तऽ गाबी मलार अधलाह परिस्थितिमे गीत शोभनीय नहि।
पोसली बकरियो ने खयती छाली बकरी पर्यन्तल नहि पोसैत छथि आ भोजन करताह छाल्हील।
फटकनाथ गिरिधारी, जनिका लोटा ने थारी भगवान फटनाथ छथिब जनिका लोटा नहि छनि जे पानि पीताह आ ने थारी छनि जाहिमे खैताह।
फट बड़ाय पातर चूरा, दायक नइहर कतेक दूरा क्यो कहैछ, ‘हिनक एतेक बेसी प्रशंसा सुनलहुँ जे हमर कान पाकि गेल।
फटले ने लजाइ, मइले लजाइ वस्त्रे मैल रहलापर लज्जाइक अनुभव होइछ, किन्तुे साफ वस्त्रर फाटलो रहलापर लज्जाश नहि होइछ।
फटलो तऽ पितमरी फाटल अछि तैयो पीताम्बलरी अछि।
फनू मुड़लो बेल तर, बेलक मारि भटाभट खयतन पुन: मुड़ली (माथ मुड़ायल स्त्रीज) बेलतर जयतीह? एक बेर जे खयने अछि ओ पुन: धोखा खयबासँ बाँचल रहबाक प्रयास करैछ।
फरत कपाल तऽ देत भूपाल, जाय नेपाल साथ कपाल जँ भाग्य नीक रहैछ तँ राजा महाराजा घर आबि क’ अनेक वस्तु द’ जाइत छथि।
फल खायब आसान नहि अभीष्टब वस्तुकक प्राप्ति अत्यान्त कष्टपसाध्यज अछि।
फागु कराई चैत चुक कातिक नद्ठहि तार, सबाती नट्ठहि मारब तिल कहि गए डाक गोआर फागुनमे वर्षा भेलासँ रब्बीह, चैतमे नेबो, कार्तिका नक्षत्रमे ताड़ी तथा स्वाीती नक्षत्रमे वर्षा भेलापर सीम आ सीसो नष्ट होइछ।
फाट फाट रे कपरा जबान होय भतरा, जिनका होय लाज गारी सेहे जोड़य कपरा जखन वस्त्रल नहि फटैत अछि तँ क्यो स्त्री कहैछ जे हे वस्त्र् ! आब तोरा पहिरैत- पहिरैतमन अकच्छत भ’ गेल, तोँ फाटि जो।
फाटल सियल ने जाय, रूसल बऊँसल ने जाय, रूसल बऊँसल ने जाय, तऽ कोना गुजारा हो फाटल वस्त्रेकेँ जँ सियल ने जाय तथा जे रूसि रहल अछि तकरा मनाओल ने जाय तँ काज कोना चलत? बुद्धिमानी ओहीमे अछि जे सबकेँ मिला जुला क’ काज कयल जाय।
फुकना लेखे टाका झिटका जे फूजूलाखर्ची अछि तकरा हाथपर टाकाक कोनो मूल्यी नहि रहैछ।
फुजल घोड़ भुसौले ठाढ बन्ध न-मुक्तछ घोड़ा भुसकार लग ठाढ़ अछि।
फुटल भाँड़ संग जोहए फुटल हँडि़या सेहो अपन संगी खोजैछ।
फुफ्फ फुफेली बाँसक बेली, फुफा बहिन के लऽ गेल तेली एकर कोनो विशषार्थ नहि अछि, प्रत्युेत बच्चाो सब अपन पीसाकेँ कबदबैत अछि।
फुरलौं कहाँ तऽ हुरलक जहाँ ककरोसँ क्यो पुछलक, ‘सत्यिता कतय प्रगट भेल ? ‘ उत्तर भेटलैक, ‘जतय लाठीक हूरसँ मारल गेल।‘
फुले न फरे ढक मारे पात पात तँ बड़ लहुलुहार अछि, किन्तुै फूल आ फरक कतहु नाम पता नहि अछि।
फुसरी सऽ भोकन्नार छौअ घाव अर्थात् फुँसरीसँ पैघ घाव बनि जायत जँ ओकर समुचित व्यछवस्थाा नहि कयल जाय।
फुसियाहा साँय नीन कामहि कोनो स्त्रीँ कहैछ जे ई हमर स्वािमी फुसिये कहैत छथि् हिनका एक मात्र काम- जनित प्रेम छनि।
फुसियाही बनिआइनि के भरि घर बटखारा जे वास्त वमे बनिआइनि नहि अछि ओ सउँसे घरमे भिन्ने-भिन्न रूपक बटखारा पसारने रहैत अछि।
फुसुर फुसुर तीन फुसुर, जान लेलऽ हो भैंसुर कोनो भाबहु अपन भैंसुरसँ कहैछ जे फुसुर-फुसुर बात क’ कए हमर प्राण ल’ लेलेहुँ।
फूके के ने फाँके के, टाँग पसारि कऽ तापेके घूड़केँ ने सजौलक आ ने ओहिमे आगि लगौलक, मुदा टाँग पसारि क’ तापबाक हेतु आबि गेल।
फूकि दिय झोपड़ी, चलि दी परयाग साधु-संत प्रकृतिक लोक अपन घर पर्यन्तक जरा क’ तीर्थ स्थाोनक हेतु विदा भ’ जाइत छथि।
फूटल भाग आ जरल कपार अभागल व्यआक्तिक प्रसंगमे प्रयुक्तु।
फूल ने पान मल्हूय चललन गोसइयाँ थान संगमे फूल पान किछु ने छनि, मुदा मल्हू जा रहल छथि गोसा‍ञि घर पूजा करबाक हेतु।
फूसि बनिआइनि के भरि घर थइली, हाथ देली तऽ किछु ने पइली मिथ्याऽभषिणी बनिआइनि अपन भरि घरमे थैली पसारने रहैछ चोर डकैतसँ बचबाक हेतु।
फूसि बिआह सय टाका विवाहमे कतबो कम खर्च किएक ने कयल जाय तथापि सय टाका खर्चा होयबे करत।
फूहड़ करे सिंगार, माँग ईंटा सऽ फोरे फूहड़ स्त्री श्रृ़गर करैछ, तँ अपन माँगकेँ ईंटासँ फोछि़ लैछ जे ओ सतत लाले रहत।
फूहड़ देबी के कुरथी अच्छतत जँ देवता महत्त्वपूर्ण नहि होइछ तँ हुनक पूजा लोक कुर्थीकेँ अक्षतसँ करैछ।
फूहीं फूहीं भरे तलइया बूँद-बूँद वर्षा भेलापर पोखरि भरि जाइछ।
फेर गबै छी गाओले गीत कहल गेल बातकेँ बारबार किएक दोहरबैत छी? एक वस्तुएकेँ बारबार कहलापर व्यंेग्यू ।
फेर फेर नढ़रो बेल तर जयतन, बेलक मारि भटाभट खयतन पुन: नाढ़ो नामक स्त्री बेलक नीचाँ नहि जयतीह।
फेरु सियार तार तर जयता, तारक मारि भटाभअ खयता पुन: सियार तार गाछक नीचाँ जायत।
फोंसरी सऽ भोकन्नसर निरर्थक बातसँ बतंगर बनायब।
फोकट कारन चोकअ पिटयला बिनु कोनो कारण चोकट नामक मारि खयलनि।
बंठी गाय सदा बाछी छोट खूटक गाय सतत बाछीक जन्मर दैछ।
बंड़ा बैल के कोन पटियासा बंड़ा बैल के कोन पटियास ने करैछ ?
बंस आ बाँस एकठाँ ने रहे वंश आ बाँस बहुत दिन धरि एक ठाम नहि रहैछ, कारण परिवार पैघ भेलापर पृथक्-पृथक् भ’ जाइछ तथा इएह स्थिति सेहो होइछ।
बंस गुने बतोड़ा चाम गुने अदउड़ा बतौड़ा वंश रोग होइछ, मुदा अन्यइ चर्म रोग चमड़ाक दोषक कारणेँ होइछ।
बंस नहि पुरुखे पतित वंश नहि प्रत्युपत पूर्वज पतित अछि।
बंस बढ़े तऽ खउड़ा लागे जहिना-जहिना वंशक विकास होइछ तहिना-तहिना ओकर विनाश सेहो प्रारंभ भ’ जाइछ।
बंसमे जनमल कंस तऽ, बाप मायक नाम रखलक लुखी वंशमे कुपुत्रक जन्मक भेलापर माय-बापक समस्त कीर्तिक विनाश क’ दैछ तथा सतत उकठ्ठी सदृश काज करैछ।
बंसमे बानो, घर घुसि कानो वंशमे कपूत सन्ता,नक जनम भेलापर ओ घरमे घुसिया क’ कनैत रहैछ।
बइठने पहर चलने कोस बैसल रहलापर समय ओहिना बीत जाइछ, किन्तुह चलैत रहू तँ कतेक कोस चल जायब।
बइठल बनियाँ की करे, अइ कोठीक धान ओइ कोठी करे बनियाँकेँ जखन कोनो काज नहि रहैछ तखन ओ बैसल- बैसल एम्हखरक वस्तुत ओम्हओर करैत रहैछ।
बइठल बुढ़बा टिमकी फोर बूढ़ लोकनि बैसल-बैसल निरर्थक बात सतत बजैत रहैछ।
बइठल से बेगारी भला बेकार बैसल रहलासँ तँ नीक अछि जे किछु-ने-किछु करैत रही।
बइदक घोड़ी बिना मतलब के कहाँ जाय देo बइलदक घोड़ीह कतहु बेर्थ ने चले
बइद पनसारी आधे आध वैद्य एवं पसारी अपन हिस्साक आधा-आधा क’ बाँटैछ ।
बइदो घर बेआधि वैद्यक घरमे सेहो व्यािधि होइछ।
बइसल बिलाडि़ के तीन बखरा बिलाडि़ सतत घरमे बैसल रहैछ, मुदा भोजन काल ओ अपन हिस्साबक हेतु उपस्थित भ’ जाइछ।
बइसल बुढि़या दाओ बताबे वृद्ध बेकार बैसल रहैछ जे आन आनकेँ उसका क’ द्वन्द्व मे उपस्थित करबाक सतत चेष्टाब करैछ।
बइसल बुरि परक्कार मारे, सालमे बारह हाथक लंहगा फारे अकार्यक व्यफक्ति अपन समय निष्प्रलयोजन व्यरतीत करैछ।
बइसल राड़ देखल ने जाय राड़केँ कोनो-ने-कोनो काजदेब उचित।
बइसल से बेगारी नीक व्यलर्थ बैसल रहबासँ मंगनीमे कार्य करब नीक थिक।
बउआ रे भगलुआ, खीर खयबे कि अल्हुेआ ई लोकोक्ति बच्चा, सबकेँ दुलारक हेतु प्रयुक्तत होइछ।
बउआ ललितगर जुत्ता पुरान बौआ तँ देखबामे सुन्दतर छथि,मुदा हुनक जुत्ता पुरान छनि।
बक बुढ़यने कुड़ेर वृद्व भेलापर बगुला कुड़ेर बनि जाइछ।
बकरीक मुह सदिखन चलिते रहैछ बकरी सतत किछु-ने-किछु खाइते रहैछ तेँ ओकर मुह चलैत रहैछ।
बकरीक मूड़ी गोसइयाँ हाथ बकरीक माथ सतत भगवानेक हाथ रहैछ।
बकरिया कयलक पाउज, तऽ डनिया कहलक हमरे चरचा बकरी तँ पाउज क’ रहल अछि, किन्तुज ओकरापर डाइनक नतकर पडि़तहि ओ सशंकित भ’ जाइछ जे हमरे चर्चा क’ रहल अछि।
बकरी खढ़ खाय तऽ, डाइन कहे हमरे चरचा देo बकरिया केलक पाउज तऽ डनियाँ कहलक हमरे चरचा
बकरी राजी कसइये हाथ बकरी कसाइक ओतय प्रसन्नह रहैछ।
बकरी सन मुह, मूसर सन पोड़ा मुह कान तँ बकरी सदृश, मुदा शरीर अत्यकधिक हृष्टह-पुष्ट छनि।
बखारी देखि जुड़बअयलहुँ, तामा देखि झुझुअयलहुँ दरबज्जाहपर बखारी देखि क’ मन प्रसन्नअ भेल जे एतय अन्नरक सुविधा रहत, मुदा तामासँ नापि क’ कार्य होइत देखि मन झुझुया गेल।
बगड़ा के जेहन दूध नै, तेहन अनुरागे बड़ जकरामे गुण नहि रहैछ ओ अनुरागे बड़ देखबैछ।
बगड़ा चलल खंजनक चालि, अपनो चालि बिसरल बगड़ा खंजनक चालिक अनुकरण कयलक, मुदा परिणाम भेलैक जे ओ अपनो चालि बिसरि गेल।
बगलमे सोटा नाम गरीबदास सोटा बगलमे छनि, मुदा नाम रखने छथि गरीबदास ।
बगुला के माछ सऽ इयारी बगुला माछक संग मैत्री नहि करैछ।
बगुला मारले पाँखी हाथ बगुआकेँ मारलापर हाथमे ओकर अबैछ।
बघबा खाय चाहे ने खाय, ओकर मुह लहुआन लगबे करत बाघ-जीव जन्तु केँ खाय वा नहि, मुदा देखनिहारकेँ सतत बुझना जाइछ जे ओकरा मुहमे रक्तँ लागल अछि।
बघबा खाय ने खाय, लोहराइन महकबे करत बाघ खाच वा नहि खाय, मुदा ओतय सतत माँसक गंध अबैछ।
बचन दी त छाती नहि पीटी वचनक पालन अनिवाय्र अछि।
बचो गोतिया ने दीहो भात दियाद कतबो दुष्टह किएक ने होथु यद्यपि ओ भात नहि खोआबथि तथापि ओ जीवित रहथु।
बजने बजना खयने खाधुर बजक्कबर एवं खाधुर व्यिक्तिपर व्यंपग्यद।
बजर परे कहाँ, तीन कायथ जहाँ जतय तीन कायस्थ एकत्रित भ’ जाइछ ततय अवश्येय कोनो-ने-कोना विस्फो टक खुराफात होइछ, झगड़ा होइछ, बदमाशी होइछ इत्याइदि।
बजारक छीक सासुरक गरि ने लागे बजारक छींक एवं सासुरक गारि ककरो ने लगैछ।
बजारक मिठाइ जे चाहलक से खयलक मिठाइ बजारमे उपलब्धक अछि तेँ जकर इच्छा होइछ ओ सुगमता पूर्वक उपभोग करैछ।
बजारक सतुआ बापो खाय बेटो खाय बजारमे सतुआ बिकाइछ जकरा बापो खाइछ तथा बेटा सेहो।
बजिते छी तऽ हारलौं कोना जखन हम जवाब दइए रहल छी तखन हारि कोना मानि लिय?
बटइया खेत आ ऊढ़री बहुक कोन ठेकान बटाइ खेती तथा अपहरणक’ आनल बहुक कोनो ठेकान नहि जे ओ कखन हाथसँ निकलि जायत।
बटइया खेती आ सगही बहु नीक ने बटाइ खेती आ सगाइ क’ कए आनल पत्नीख कोनो स्थितिमे नीक नहि कहल जाइछ।
बड़ अपराध मौन पाय साध अपराधीकैँ मौन रहने कल्या’ण होइछ।
बड़का धरम दान दान सर्वोपरि धर्म थिक।
बड़का बड़के अछि पैघ व्यडक्ति सतत पैघे व्यणक्तिक होइछ।
बड़ घर जायब तऽ, ईटा ढोय ढोय मरब पैघ घरमे जायब तँ ईटा ढोयबामे प्राण चल जायत।
बड़ जाति बतिऔन, छौअ जाति लतिऔने पैघ जातिक लोकसँ वार्तालाप कयलापर कार्य होइछ, मुदा छोअ जातिक संग मारि-पीट नहि कयलासँ काज नहि चलैछ।
बड़द बिआएल गाय रहल बाँझ विपरीत कार्य-व्यालपारपर व्यंाग्यइ।
बड़ पुने रसबति मिलए रसबन्तछ प्रबल भाग्यबसँ अभीष्टोक सिद्धि होइछ।
बड़ बड़ गेला, तऽ चेथरु अयला सामर्थ्यगवान जखन असफल भ’ जाइछ, तखन सामर्थ्य‍हीन व्यलक्ति अपन सामर्थ्य क प्रदर्शनार्थ उपस्थित होइछ, तँ व्यंपग्यय।
बड़ बड़ गेला, तऽ बैजू अयला देo बड़ बड़ गेला, तऽ चेथरु अयला
बड़ बड़ घोड़ी टहने, लँड़होरी कहे कते पानि पैघ-पैघ घोड़ी पार करबामे झख मारि रहल अछि तथा लंगड़ी घोड़ी पूछैत अछि जे कतेक पानि अछि ?
बड़बड़ घोड़ी भासल जाय, नर घोड़ी कहे कते पानि पैघ-पैघ घोड़ी पानिमे भासि रहल अछि, किन्तुन नरघोड़ी जिज्ञासा करैछ जे कतेक पानि अछि ?
बड़ बड़ जन के भेंटक लाबा, पदनो के मिठाइ जतय प्रधान व्यभक्तिक कोनो स्वापगत-सत्का।र नहि भ’ रहल अछि ततय गौण यक्तिकेँ मिठाइ देल जा रहल अछि।
बड़ बड़ भूत कदम तर, कोन मूआ माँगी पूआ पैघ-पैघ भूत कदम वृक्षक नीचाँ कानि रहल अछि किन्तुघ के पुआक माँग करैछ ? मूआ = अधलाह देवी सतत खराबे करैछ
बड़ बड़ लजाय, तऽ लबरो ला मिठाइ पैघ-पैघ व्याक्ति लज्जित भ’ रहल अछि, किन्तु झूठ बजनिहार मिष्ठा न्न सँ सम्मअनित भ’ रहल अछि।
बड़ मन छल जे नोता जैब, छाँछक दही सोहारी संग खैब काल्पीनिक इच्छािक पूर्ति नहि भेलापर कहल जाइछ।
बड़ मरे बड़ाइ के, छौअ मरे दुलार के पैघ व्य क्ति अपन इज्जअतिक हेतु मरैछ, किन्तुय छोट व्यअक्ति सतत प्रेमक पयबाक आकांक्षी रहैछ।
बड़ सोझ तऽ हुँसुआ जकाँ ओ बड़ सोझ अछि, किन्तु् हँसुआ जकाँ ढेढ़ अछि।
बड़े बडे गेलन तऽ मोछ बाला अयलन जखन पैघ इज्ज ति वालाक कतहु गणना नहि होइछ ततय मोछ बालाक कोन गणना भ’ सकैछ ?
बड़े बड़े नाग पड़ल अछि आ ढो़ढ़ माँगे पूजा पैघ-पैघ विषयुक्तढ नाग पड़ल अछि, किन्तुन ढो़ढ़ जे विषहीन अछि ओ पूजा माँगि रहल अछि।
बड़े भूखल नहि दुहू करे खाय बेगर्ते आन्ह र रहनिहारपर व्यंअग्य ।
बड़े मियाँ के बड़ बात पैघ व्याक्तिक पैघ बात होइछ।
बड़े मियाँ तऽ बडे मियाँ छोटे मियाँ सुहान अल्लाा जे पैघ बात होइछ।
बढ़े ने से बूढ़ ने कहाय जकर लंबाइमे वृद्धि नहि होइत छेक से की बूढ़ नहि भ’ सकैछ ? साधारणतया छोट खूटक लोक अपन अवस्थान कम कहैछ, तँ व्यं ग्यथ।
बद नीक बदनाम ने नीक बदमाश होयब नीक अछि, मुदा कोनो कारणेँ बदनाम हैब कहियो नीक होइछ।
बदरीक बददरिया लओने खइली मेघ लागल रहलापर कनियाँकेँ समयक ज्ञान नहि रहलनि।
बदी अखाढ़ी पडि़बा बरिमे, दिन सताइस सूखा निकसे जँ अषाढ़ कृष्णाब प्रतिपदाक दिन वर्षा होइछ, तँ ओकर बादर सताइस दिन धरि वर्षा होयबाक कोनो संभावना नहि रहैछ।
बण्डा बैल बेलौआ पाही, एक जन मरलन आबा जाही एक बैल पोसब निरर्थक, कारण समीपवर्ती गाम बेलौआ अबैत-जाइत ओ मरि जाइछ।
बनक गीदड़ जइहें किधर जे गीदड़ वनमे रहैछ ओ कोम्हइरोनहि जा सकैछ।
बन काटे जन बोनिहार जंगल काटैत अछि।
बन टरय जल ने टरय जंगलमे फँसि गेलापर ओकरा काटि क’ पार कयल जा सकैछ, किन्तुक पानिमे घेरा गेलापर ओहिसँ मुक्ति नहि भेटि सकैछ।
बन तऽ राम जयबे करितथि, तऽ केकइ के अजस रामक वनगमन निश्चित छलनि, मुदा केकइकेँ निरर्थक कलंक लागि गेलनि।
बन बन फिरथि बालिक मारल सुग्रीव कहैछ, ‘बालिक डरे ओ वने-वने मारल फिरैत छी।‘
बनमे रहब बनमे खायब, बड़काक बात बड़के जान जहिना जे वनवासी अछि ओ वनक प्रसंगमे नीक जानकारी द’ सकैछ, तहिना पैघ व्य क्तिक वास्तसविकताक जानकारी पैघे व्य क्ति द’ सकैछ।
बनले इयार बिगरने भकुआ नीक स्थिति रहलापर अनेक व्यैक्ति मित्र भ’ जाइछ, किन्तु् काज बिगड़लापर सब मूर्ख बनबैछ।
बनले मल्लै बिगड़ने कुरमी पहलमान बनलापर सब संग दैछ, किन्तु बिगडि़ गेलापर कुर्मी बनि जाइछ।
बनारस जाइ तऽ तीन चीज सऽ बची, राँड़ साँढ़ ओ गली बनारसमे राँड़, साँढ़ एवं गलीसँ बाँचि क’ रहबाक चेतावनी अछि।
बनिया अपन बापो के ठकैछ बनियाँ अपन बाप पर्यन्तठकेँ ठीक लैछ।
बनियाक जी धनियाँ बरोबरि बनियाँक हृदय धनियाँक समान छोट होइछ।
बनियाक दाता ठाकुर हीन, बैदक पूत‍ बे‍याधि नहि चीन्हछ, भाटक चुपचुप बेसबक मेल, कहे घाघ पाँचे घर गेल दानशील बनियाँ, क्षुद्र जमीन्दातर, रोग चिन्हलबामे असमर्थ वैद्य-पुत्र, मौन रहनिहार भाट, अविवसनीय दरबारी तथा वेश्याँसँ मेलजोल रखानिहार प्रत्येयक स्थितिमे अपन अस्तित्वखक रक्षा नहि क’ पबैछ।
बनियाक बेटा किछु देखि खसैछ बनियाँक बेटा निराधर कतहु नहि खसैछ, प्रत्यु त ओ किछु देखि क’ खसैत अछि।
बनिया कहे छतीस आसन सऽ तउलब, गिरहस कहे कोठिए फोड़ब बनियाँ कहैछ, जेना तेना तौल क’ हम किछु-ने-किछु चोरा लेब, ताहिपर गृहस्थौ कहैछ, ‘तोरा जेना तौलबाक छौक तोँ तौल, कारण हम अन्ननक कोठी फोरि दैत छियौक।
बनिया के घेघ, गहिकी के उदबेग घेघ अछि बनियाँकेँ, मुदा उदवेग भ’ रहल छनि ग्राहककेँ।
बनिया खुसी भेल तऽ दमड़ी दान कयलक कोनो कारणेँ बनियाँ जँ अत्यनधिक प्रसन्न’ भ’ जाइछ तँ ओ एक दमड़ी दान करैछ।
बनिया तउले ने गहिकी कहे बस कर बनियाँ कोनो वस्तुक तौलबाक हेतु तैयार नहि, मुदा ग्राहक कहैछ जे आब रहय दे।
बनिया देबे ने पूरे तउल बनियाँ सौदा देबाक हेतु तैयार नहि अछि, किन्तुद ग्राहक ठीकसँ तौलबाक लेल कहैछ।
बनिया मारे जान, ठक मारे अनजान बनियाँ परिचित व्यरक्तिकेँ ठकैछ, किन्तुभ ठक तँ सतत अपरिचितक संग ठकापनी करैछ।
बनिया मीत ने बेसबा सत्ती, सोनरा साँच ने एको रत्ती बनियाँक कोनो स्थितिमे मित्र, वेश्यान सती-साध्वीक तथा सोनार सत्यिवादी नहि होइछ अर्थात् ओ बइमानक अवतार होइछ।
बनिया रीझे तऽ हर्रे दे जँ बनियाँ अत्यहधिक प्रसन्न होइछ तँ हर्रे सदृश तुच्छअ वस्तुक दान करैछ।
बने तऽ इन्द्रयजाल, ने तऽ जीबक जंजाल तंत्र-मंत्रक प्रयोग जँ कदाचित सफल भ’ जाइछ तँ लाभे-लाभ होइछ, अन्य’था ओ जानक हेतु जंजाल बनि जाइछ।
बयस भेल मोर, मन होइछ चिलका लितहुँ कोर अवस्था बेसी भेलापर कोनो वृद्धा अभिलाषा व्य्क्ते करैछ जँ बच्चाअ जन्मज लैत तँ ओकरा कोरा लितहुँ।
बरक ई हाल तऽ बरियातीक कोन हाल जखन वरक एहन दशा छनि तखन बरियातीक की दशा हैतानि? जखन प्रमुख व्य क्तिक कोनो पूछ नहि तखन साधारण व्य क्तिक दशा स्वछत: अनुमेय अछि।
बर कतय गेल तऽ गायमे ककरो ओयतय घटक आयल तँ वरक खोज होमय लागल।
बर कनियाँ के भेट ने ओठंगर ला मारि वर कनियाँक कतहु पता नहि, किन्तु विवाहक विधि ओठंगर कुटबाक हेतु मारि भ’ रहल अछि।
बर कनियाँमे झगड़ा, पंच बने लबड़ा पति-पत्नीछक झगड़मे पंच निष्प्ररयोजन भ’ जाइछ।
बर कनियाँ राजी, बीचमे दादा जी वर कनियाँ स्वे्च्छाकसँ एक दोसराक हेतु राजी अछि, मुदा बीचमे दादाजीकेँ अयबाक कोन प्रयोजन छनि ? निष्प्रजयोजन कोनो वस्तु्मे टांगा अड़यबाक नहि चाही।
बरक माथा जाल, बरियीक कोन हाल जखन वरक माथपर फाटल पाग छनि तखन बरियातीक वेश-भूषा केहन हैत से अनुमान सापेक्ष अछि।
बर के ने भेटय भुस्सा-, बरियात माँगे चूड़ा वर तँ बरियातसँ बेसी प्राप्ता करबाक अधिकारी होइछ, किन्तुे भुस्साध पर्यन्त नहि उपलब्धी भ’ रहल छैक।
बर के बार ने नउआ के बारह आना वरकेँ कोनो पूछ नहि भ’ रहल छनि, मुदा नौआकेँ बारह आना विदाइ भ’ रहल अछि।
बर के भुस्साआ ने बरियाती के चूड़ा बरकेँ भोजनमे भुस्साा पर्यन्तक नहि भेटि रहल छनि, किन्तु बरियातीकेँ चूड़ा खोआओल जा रहल अछि।
बर के मउरे ने, बरियाती के टोपी वर बिना मौरक अछि, किन्तु बरियाती टोपी पहिरने अछि।
बर गेला कोहबर तऽ, कनिया माय पुछलक कतय अयलहुँ विवाहोपरान्तल वर कोहबरमे प्रवेश कयलनि।
बर बीसे बीसा बीसा, बर ताकऽ एके दीसा, बर के सोभे कंठ दुइ माला, बर के चालि बड़ी निराला वरक अवस्थाि २० + २० + २० अर्थात् साठि वर्षक छनि।
बर भेल बुड़बक दहेज के लेत जखन वर मूख्र छथि तखन दहेज के माँगत? प्राप्तेकर्ता मूर्ख अछि, तँ प्राप्ति कोना भ’ सकैछ ?
बर मरि गेला कंगन ठामे वरक तँ मृत्युं भ’ गेलनि, मुदा कंगन जे हाथमे गेलनि ओ जहिनाक तहिना अछि।
वर मरे तऽ मरे कंगन ने टूटे वर भनहि मरि जाथु, मुदा हाथक कंगन नहि टुटबाक चाही।
बरसा बान्हि कऽ खेती करब वर्षाकेँ बसमे क’ कए खेती नहि क’ सकैछ।
बरहम सऽ छागर आतुर ब्रह्मकेँ छागर बलिदान देबाक अछि।
बरियात कतहु सऽ आओत, गीत गाइन तऽ गामहिक रहत बरियात कतहुसँ किएक ने आबय, किन्तुछ गीत गौनिहारि तँ अपना गामक रहत।
बरियात गेल सेमरा, लोढ़ा घुमिते अछि बरियात कतयसँ कतय चल गेल, किन्तुछ परिछनक लोढ़ा एखन धरि घुमा रहल अछि।
बरिया चोर सेन्हनपर गरजे मजगूत चोर सेन्हनपर गरजैत अछि।
बरियार चोर सेन्ह पर गाबे दमगर चोर सेन्ह्पर गाबि क’ लोककेँ जगयबाक प्रयास करैछ।
बरिया हारे तऽ मुहमे मारे बलवान व्येक्ति जँ कदाचित हारि जाइछ तँ ओ निर्बलकेँ मुहमे मारैछ।
बरिया हारे तऽ हूरे जीते तऽ थूरे बलबान व्येक्ति जँ हारि जाइछ तँ ओ हूरैत अछि, मुदा ओ विजयी भ’ जाइछ तँ थूरि दैछ।
बरिये मान बान बलवान व्य क्ति कतहु कोनो बन्धँन नहि मानैछ।
बरिस दिनक रस्ताू चलब, छओ मासक रस्ताद ने चलब एक वष्रक समय जाहि मार्गमे लागय ओ चलब नीकख्‍ किन्तुल छओ मासक मार्गक अनुसरण करब नीक नहि।
बरी चोर कन्हाक पार बलवान चोर दोसराक कान्हापर चढि़ क’ चोरि करैछ।
बरे बुड़बक बिदाइ के लेत मूर्ख व्यकथ्कलत सतत घाटामे रहैछ।
बरोक भाय कनियोंक भाय दुइ पक्षक समन्वकय कयनिहारपर व्यं ग्यन।
बरोबर तऽ बरोबर, उखडि़ चढि़ बरोबर उखडि़पर चढि़ क’ हम अहाँक बराबरी क’ सकैत छी अन्य था नहि।
बसकर मियाँ बसकर देखलहुँ तोहर लसकर क्यो मियाँकेँ संबोधित करैत कहैछ जे, ‘आब विशेष नहि बाजू, कारण अहाँक कतेक सामर्थ्यन अछि तकरा हम देखि लेलहुँ।
बसी रसी कतहु, आ चत्तड़ घसी कतहु रहैत छी कतहु, मुदा काज लेबाक हेतु अवसरपर अपन चुत्तड़ घसबाक हेतु एतय अबैत छी।
बहइत गंगामे हाथ धोयब सामान्यग रूपसँ चलि रहल कोनो व्यसवस्थारसँ लाभान्वित होयब ।
बहथि बड़द हकमथि कुकूर कम काज कयनिहार व्यकक्ति अधिक व्यकस्त्ता देखबैछ, तँ व्यं्ग्या।
बहसल जोलहिन बापक दाढ़ी नोचे जोहलाक बहसल बेटी ओकर दाढ़ी नोचैत अछि।
बहिन खटाइए माय मिरचाइ, कतय गेलौं यै बहु मिठाइ विवाहोपरान्तच माय एवं बहिन निरर्थक भ’ जाइछ तथा पत्नीा सर्वर भ’ जाइछ, तँ प्रयुक्त ।
बहिर बकाल, दुनियाँ अकाल बहिर एवं मूर्खक हेतु दुनियाँक सब बात निष्प्रंयोजन भ’ जाइछ।
बहिरा सुने धरम के कथा बहिर व्यनक्ति धर्मेपदेश नहि सुनैछ।
बहिरा से गहिरा बहिर व्य क्ति गंभीर होइछ, तेँ ओकर मनक थाह पायब कठिन अछि।
बहिरा से गहिरा बहिर व्य क्ति गंभीर होइछ, तेँ ओकर मनक थाह पायब कठिन अछि।
बहि मरे बहिया, बइसल खाय तुरुक नोकर काज करैत-करैत मरि रहल अछि तथापि ओकर पेट नहि भरैछ, किन्तु तुर्क बिनु कोनो काज कयने, बैसल-बैसल करैछ।
बहु अलछनी, ढेकी सुलछनी पत्नील जँ कुलक्षणी हो तँ क्षति नहि, मुदा ढेकी सुलक्षणी हैबाक चाही।
बहुक कमाइ खो रे मनसा ढिठगर हो पत्नीकक अरजल खरयनिहार अकर्मण्य व्यनक्तिपर व्यंनग्यय।
बहुक कहने मड़र पत्नीकक कहलापर वा प्रशंसा कयलापर क्यो। अपन समाजक प्रमुख बनि सकैछ।
बहु के नुआ ने, बिलाइ के गाँती पत्नीेक हेतु वस्त्रा पर्यन्तय नहि छनि, मुदा बिलाइक हेतु गाँतीक व्यसवस्थार होइछ।
बहु थिक इसरी, सब दुख बिसरी नीक पत्नीस ईश्व्र सदृश होइछ जकरा द्वारा लोक अपन सब पीड़ा बिसरि जाइछ।
बहुत जोगी मठ उजाड़ आदमीक अधिकतासँ कार्य होयबाक बदला ओ आर बिगारि जाइछ।
बहुत दिनपर खयलहुँ पान, दाँत निपोड़ने गेल परान बहुत दिनपर पान खयबाक अवसर आयलापर लोककेँ देखयबा लेल दाँत निपोड़ैत रहल।
बहुत बुद्धि बेयाधि आधिक बुद्धि विनाशक कारण होइछ।
बहुत मरदे बरद उपास, बहुत मउगी मरद उपास जहिना बेसी लोक रहलापर बड़द उपासले रहि जाइछ तहिना स्त्री क अ‍ाधिक्यउ भेलापर मर्द उपवास पड़ैछ।
बहुत लोक बहुत रोग भोग-विलासक आधिक्य्सँ शरीर रुग्नउ भ’ जाइछ।
बहुत सुत दलिद्दर निसानी अधिक पुत्रक हैब दरिद्रताक निशानी थिक।
बहुत हँसी हँसी ने करू थोड़बे हँसी भला, बहुत हँसी से राउत खयलनि लाठी लागल गेला बेसी हँसी-मजाक करब उचित नहि।
बहुते पूते ने बर, बहुते धन भगत संतानक आधिक्य लोककेँ विनम्र बना दैछ तथा धनाधिक्ययसँ लोक सात्विक भ’ जाइछ।
बहु ने धी, नढ़ेर भेल छी घरमे बहु-बेटी क्यो ने छनि तेँ छनि तेँ नढ़ेर जकाँ एम्होर-ओम्हिर घुमैत फिरैत रहैछ।
बहु ने बेटा, अपने पेटा घरमे ने तँ पत्नी, छनि आ ने बेटा।
बहु बहु करू बहु भेल बकरी, तीन चीज ला तंगे करे नोन तेल लकड़ी पत्नीगक नाम बारंबार नहि लिय।
बहु बहु करैत मन हो हरखित, नूआ लहठी जोड़ैत मन हो चरखी पत्नीजक रहलापर मन ठीके प्रसन्नठ भ’ जाइछ, किन्तु जखन साड़ी, लहठी जोड़य पड़ैछड तखन मन चिन्ता‍सँ विषाक्त, भ’ जाइछ।
बहु भेल मिसरी, सब दुख बिसरी पत्नीे सभक मिसरी मीइ होइछ तनिका देखितहि लोक अपन सब पीड़ा बिसरि जाइछ।
बहे बड़द हकमे कुकूर हर बहैछ, बड़द, मुदा घरमे बैसल कुकूर हकमैत रहैछ।
बाँझ ले जाने परसउती‍क पीड़ा बन्याले स्त्री प्रसवपीड़ाक की अनुभव क’ सकैछ ? जे भुक्तय भोगी नहि अछि ओ आनक पीड़ाक अनुभव की करत ? जकरापर बितैत छैक वह वस्तुात: जनैछ।
बाँझिन के आस करी मरारछिन के ने बाँझ स्त्रीसक आशा कबयल जा सकैछ, किन्तु् मराछिनक कोनो आशा नहि कयल जा सकैछ, कारण ओकर बच्चाा जनमि‍तहि मरि जाइछ।
बाँझिन घरमे बिलारिक दुलार नि:सन्तािन व्य्क्तिक हेतु बिलाइ अत्यकन्त प्रिय बनि जाइछ।
बाँटल भाय पड़ोसिया दाखिल जाहि भायसँ बँटबारा भ’ गेल अछि ओ तँ आब पड़ोसिया बनि गेल अछि।
बाँस करे ठाँय ठाँय नदी गुंगुआय, कमलक फूल दुनू अलगल जाय बाल-गोलपाल द्वारा एकर प्रयोग कयल जाइछ।
बाँस गुने बँसउर, चमार गुने अधउर बाँसक विस्तासर बाँसपर निर्भर करैछ।
बाँस डूबल जाय पोर गने के बाँस डूबि रहल अछिख्‍ मुदा ओकर गिरह गनि रहल अछि।
बाँस सऽ करची मोट बाँसक अपेक्षा ओकर करची मोट अछि।
बाइस टोला के गाम नाम फुचटी बाइस टोलक गाम अछि, किन्तु नाम अछि फुचटी।
बाइस के बारह, एक मुट्ठी चाउर ला, हमरा बेटा के मारह एक तँ बाइसकेँ बारह पढ़ा रहल छी।
बाग बन दुनू राखक चाही फुलबाड़ी एवं जंगल दुनू रखबाक चाही।
बागर अन्नेव, जोलहा धन्नेन मूर्ख एवं जोलहाक अन्नू एवं धनक क्रमश: कोनो मूल्यज नहि रहैछ, कारण ओकर अनुचित प्रयोग करैछ।
बाघक ने चिन्हेक बाभन के पूत ब्राह्मणक बेटाकेँ बाघ नहि चिन्हैूछ, कारण ओकरा कोनो मतलब नहि रहैछ।
बाघ ने देखल देखल बिलाडि़, ठग ने देखल देखल पनसारि बाघ देखलहुँ की बिलाडि़ तकर विवेचन नहि क’ पओलहुँ।
बाघ भइसाक लड़ाइ, झाड़ी पातक निनाय बाघ एवं भैंसाक बीचमे लड़ाइ भेल जकरा बीचमे पड़निहार घास पात सब नष्ट भ’ जाइछ।
बाछा कुदबे ने करे खुट्टा कूदे खुट्टामे बान्हकल बाछा नहि कुदैछ, मुदा खुट्टा कूदि रहल अछि।
बाजल बात पलटि नहि आबय कहल गेल बात आपस नहि होइछ।
बाजल मुह नपे बरजल जाय, चलल पयर ने बइसल जाय जे झगड़ा कयनिहार अछि ओकरा झगड़ासँ कथमपि नहि रोकल जा सकैछ।
बाजल लुक्खीो फूले कास, आब ने बरखा के आस लुक्खीु बाजय आ कास फुला जाय तँ वर्षा समाप्तिक सूचना भेटैछ।
बाजा छाजा केस, ई तीनू बंगला देस बंगालक संगीत, छप्प र एवं केश तीनू प्रसिद्ध अछि।
बाजे खुरदक नून नदारद दरबज्जारपर खरुदक बाजि रहल अछि, मुदा घरमे नोन पर्यन्त ने छनि।
बाझल बनिया दिए उधार साधारणतया बनियाँ उधार नहि लगबैछ, मुदा दुर्योगसँ ककरो एकबेर उधार द’ दैछ तँ वसूल करबाक हेतु ओ बारंबार उधार दैछ।
बाटक पोखरि तरपने गेल रस्ताप कातक पोखरिक पानि आयल गेल व्यतक्ति द्वारा व्यावहारक कारणेँ समाप्ति भ’ गेल।
बाट चलक आर बैसक बड़ बीच रस्ताल चलैत रहबाक चाही।
बाट चले के चेट्ठा ने, गहूँम माँगे बोइन बाट चलबाक शक्ति तँ नहि छनि, मुदा पारिश्रमिक लेताह गहूँम।
बाट चलै छी तैं नितराइ छी अनेक दन के दुइ कचरा, तोरा से जे मोर पिया सुन्नइर छथिर सोने मढल अँचरा आनसँ दुइ चूड़ी मंगनी क’ पहिरने छी तेँ ओकरा देखि क’ एतेक बेसी नितरा रहल छी।
बाट चलैत बटमारि रास्ताैमे चलबा काल झगड़ा कयनिहारपर व्यंतग्यच।
बाडि़क पटुआ तीत अपन वस्तुुकेँ लोक महत्त्व नहि दैछ।
बाढ़े पूत पिता के धरमा, खेती उपजे अपने करमा पिता द्वारा कयल पुण्याक प्रतापसँ सघ्ताद्व नक उन्नरति होइछ, किन्तुन खेती अपन भाग्यरक फलस्वतरूप नीक वा अधलाह‍ होइछ।
बातक चटपट, हिरदय कपट बात बड़ चिककन-चुनमुन करैत छथि , मुदा हृदयसँ ओतबे कपटी छथि।
बातक बतंगर निरर्थक कोनो बातकेँ बेसी तूल देलापर प्रयुक्तक।
बात करे के फरछिन, राति हो बा दिन राति हो वा दिन, कोनो समय किएक ने हो, बात स्पीष्ट करबाक चाही।
बात करे के सज्जनन से सज्ज्न बुझे बात, बात ने करे गदहा से जे घुमि कऽ मारे लात जँ कोनो समस्याजपर बात करबाक हो तँ सज्जोन व्यतक्तिसँ करबाक चाही, जे बुझि सकथि।
बातक लाख, करनीक खाक बात तँ बड़ पैघ-पैघ करैत छथि, मुदा ककरो रूपेँ परिणत नहि करैछ।
बात कहब सुप्पित, तीत लागे की मीठ उचित बात ककरो स्पैष्टत रूपेँ कहबाक चाही, चाहे ओ नीक लागय अथवा अधलाह।
बात कही फरिछा कऽ, चाहे तीत लागे चाहे मीठ देo बात कहब सुप्पात, तीत लागे की मीठ
बात छिलने रुक्खर, काठ छिलने चिक्कान बातकेँ बढ़ौलासँ ओ खराब भ’ जाइछ, किन्तु एकर विपरीत काठकेँ जतबे छिलल जायत ततबे ओहिमे चिकना‍हटि ओतबे अबैछ।
बातपर बात आयल बात पतिअइली, गहनमे बाछी दान कइली, ओही लेल दउड़ल अइली क्योल ककरोसँ कहि रहल अथ्छी जे बातपर बात चलल तँ बुझना गेल।
बात लअ हमरा सऽ, काम लट दादा सऽ हमरासँ जतेक बात लेबाक अछि से लिय।
बाते हाथी पाबी, बाते हाथी पाँउ अपन व्यथवहारसँ हाथी प्राप्ती कयल जा सकैछ अन्याप हाथीक पैरक नीचाँ जयबाक लेल प्रस्तुात रहय पड़ैछ।
बादल ऊपर बादल धाबे, तब भड़ड़ पानी बरसाबे वर्षा ऋतुमे जँ आकाशमे मेघ एक दोसरापर दौड़ैत अछि तँ अनुमान कयल जाइछ जे वर्षा निश्चतये हैत।
बानर कंठ कि मोतिक हार अनुपयुक्तक स्थाेनमे मूल्य़वान वस्तुगक महत्त्व नहि रहैछ।
बानरक खीस तबलापर क्रोधित भेल बानरपर जकरा तबला पर उतारैत अछि।
बानरक फुसरी देखा देखी गेल बानरक देहमे जँ छोट फुँसरी भ’ जाइछ तँ ओकरा देखतहि-देखतहि पैघ बना लैछ।
बानरक मुह कतौ नारियल खाय जे जाहि वस्तुखक उपयोग नहि जनैछ ओ ओहि वस्तु क प्राप्तप भेलोपर ओहिसँ लाभान्वित नहि भ’ सकैछ।
बानर की जाने आदीक स्बारद बानर आदीक स्वादद की जनैछ ? कोनो वस्तुआक जे जानकार नहि अछि ओकरा सँ कोनो विचारक अपेक्षा करब निरर्थक।
बानर गर नहि सोभय माल अयोग्यर व्यमक्तिक हाथमे मूल्य वान वस्तुक नहि शोभैछ।
बानर गर नहि सोभय माल अयोग्यर व्यमक्तिक हाथमे मूल्यवान वस्तु् नहि शोभैछ।
बानर गरमे गाँती बानर गरमे कतहजु गाँती शोभा पबैछ ? चंचल एवं क्षुद्र प्रकृतिक व्यैक्ति नीक वस्तुएक आदर नहि करैछ।
बानर मुहमे सोभे पान बानरक मुहमे पान कोना शोभा पाबि सकैछ ?
बानर हाथमे नारियल बानरक हाथमे नारियलक कोनो मूल्या नहि।
बान्ह ब लोटा बान्हमब डोर, करब उपदरब चारू ओर जखन लोटा-डोरी बान्हि क’ घरसँ बहरा जायब तखन चारू भाग उपद्रव करब।
बान्हतल मुट्ठी लाख बरोबरि जकरा कोनो खर्च नहि छैक ओ लाखक लाख टाका जमा क’ सकैछ।
बान्हक सऽ खत्ता ऊँच बान्हकक अपेक्षा जँ खत्ता ऊँच रहत तँ पानि नहि रोकल जा सकैछ।
बाप ओझा माय डाइन पिता ओझा छनि तथा माय डाइन।
बापक गरा उतरी, पूतक गरा कनखा बापक गर्दनिमे उतरी छनि तथा बेटाक गर्दनिमे कनखा।
बापक गरा उतरी, बेटाक गरा रुदराछ बातक गर्दनिमे उतरी छनि, बेटाक गर्दनिमे रुद्रराक्षक माला शोभित भ’ रहल अछि।
बापक नाम आँऊ आँऊ, पूतक नाम साहनसाह बापक नाम आँऊ-आँऊ छनि अर्थात् गबोंगा छथिन, मुदा ओकर बेटा अपनाकेँ शहंशाह कहैछ।
बापक नाम गेली कूची, बेटाक नाम चउहट्टा बापक नाम तँ गली-कुच्चीक छलनि, मुदा बेटाक नाम चौबटिया रखने छथिे।
बापक नाम झारपात, बेटाक नाम दुरगादास बापक नाम तँ झारपरत छनि, मुदा बेटाक नाम दुर्गादास।
बापक नाम दमड़ी, पूतक नाम छकउडि़या बापक नाम तँ दमड़ी साहु छनि, मुदा बेटाक नाम छकौड़ी रखने छथि।
बापक नाम लत्ती फत्ती, पूतक नाम कदीमा बापक नाम तँ लत्ती-फत्ती छनि, मुदा बेटाक नाम कदीमा।
बापक नाम सागपात, पूतक नाम परोर बापक नाम सागपात छनि, मुदा बेटाक नाम परोड़।
बाप कमाबे, बेटा उड़ाबे बाप प्राणक बाजी लगा क’ उपाार्जन करैत छथि, किन्तुट बेटा एहन बहरायल जे ओ सबकेँ उड़ा रहल अछि।
बापक बिबाहमे बेटाक पूजा अनटोटल काजपर व्यंकग्यु।
बापक मूड़ी काटे, आ पूत सऽ हाथ मिलाबे बापक तँ गर्दनि काअि रहल छनि, मुदा बेटासँहाथ मिलबैत छथि।
बाप के टीके ने बेटा के झोंटा बापकेँ टीक पर्यन्ता नहि छनि, मुदा बेटा पैघ-पैघ झोंटा रखने छथि।
बाप के नहि जुरे, तऽ नाकमे नथियाल झूले देo बाप के ने जुरलनि, तऽ कानमे सोन झुललनि
बाप के ने जुरलनि, तऽ कानमे सोन झुलनि बापकेँ कहियो कोनो वस्तुन नहि जुड़लनि मुदा बेटा-बेटीक कानमे सोना झुलि रहल छनि।
बाप के पादऽ ने आबय, बेटा बजायब संख पिताक आचरणक विपरीत पुत्रक आचरणपर व्यंपग्य ।
बाप के बली राज, भइया के निरधन राज बेटीक हेतु बापक राज्य्ग् अत्य न्त समृद्ध होइछ, किन्तुग भायक राज्य निर्धन ।
बाप गदहिया पूत बरहमचारी अयोग्यह बापक योग्य‍ पुत्र।
बाप गोनउरा पूत चउताल बुद्धिहीन व्यतक्तिक पुत्र बुद्धिमान होइछ, तँ प्रयुक्त होइछ।
बाप छल पेटमे पूत गेल गाया असंभावित परिकल्प नापर व्यंुग्यइ।
बाप जकर मरे से मासु भात खाय, आ पड़ोसिया गाया जाय जकर बापक मृत्युा भेलैक ओ तँ मासु-भात खा रहल अछि, मुदा पड़ोसिया ओकरा हेतु गया पिण्डि दानार्थ जा रहल अछि।
बाप जदि गुदड़ी, हम तू बरोबरी पिता तँ निर्धन छथि, किन्तुओ हम तोँ तँ बराबर छी।
बाप जनम ने खयलहुँ पान, दाँत निपोड़ने गेल परान कहियो पान तँ नहि खयलहुँ तेँ प्राण हमर चल गेल।
बाप टेनी माय कुलंग, बेटा भेल रंग बिरंग बाप नांङर छथिन, माय सेहो तदनुरूपेँ।
बाप दादा के घोड़े ने, दरभंगा धरि लगाम बाप दादा तँ कहियो घोड़ार नहि रखलथिन, मुदा हुनक बेटा कहैछ जे ओकर लगाम ततेक पैघ छल जे ओ दरभंगा धरि चल जाइत छल।
बाप नरकटिया, पूत भगतिया बाप तँ लोकक गर्दनि कटनिहार छथिन, किन्तु बेटा साधु सदृश कार्य करैछ।
बाप ने दादा तेसर पुस्तध साहुजादा बाप वा दादा धनिक नहि छलनि, मुदा बेटा अपनाकेँ अमीर कहैछ, तकरापर व्यंछग्यब।
बाप ने पढ़ल पढ़लहुँ हम बात तँ नहि पढ़ल छथि, मुदा हम तँ पढ़ल छी।
बाप पंडित पूत छिनार पिता तँ पंडित छथिन, किन्तुम बेटा छिनार।
बाप पूत बिसनी, तेरह गज के इजार बाप बेटा फैशनमे मस्तह अछि जकर पौजामाक तेरह गजक छैक।
बाप बङगउरा पूत उचतारा, तिनकर बेटा दुरगादास जकर बाप मूर्ख, तकर बेटा बड़ होशियार भेल, किन्तु पोता तँ ओकरोसँ बेसी होशियार बहरायल।
बाप बङगउरा पूत चउताल, तकर बेटा खबरदार बाप कोनो प्रकारेँ जीवनयापन करैछ, किन्तु ओकर बेटा सदिखन सर्तक रहि कार्य करैछ।
बाप बनिया पूत नबाब बाप तँ बनियाँक कार्य करैछ, किन्तुब बेटा नवाबक समान राजसी ठाठबासँ रहैछ।
बाप बेटा पंच बड़दक दाम तीन टाका बाप बेटा मिल क’ पंचैती करैछ तखन बड़दक दाम तीन टाका निर्धारित होइछ।
बाप भुसहुला पूत चौपार, नाती बैसल बीच दरबार बाप भुसखाँड़मे जीवन व्यधतीत कयलक आ बेटा मुक्ता़काशमे, मुदा ओकर नाती राजाक दरबारमे स्था‍न पौलक।
बाप भिखारी पूत भंडारी बाप भीक्षाटन क’ कए निर्वाह करैछ, मुदा बेटा भंडारी बनल अछि।
बाप मरल नरकटमे, पूत भेल भजनियाँ बाप सतत कष्टममय जीवन बितौलथिन,मुदा बेटा भजन करैत छथि।
बाप मरले कुमारे, माय मरले टुगर बापक अभावमे बच्चा। कुमार रहि जाइछ तथा मायक मृत्युच भेलापर ओ टुगर भ’ जाइछ।
बाप मुइलनि अन्हचरियामे, बेटाक नाम पाबर हाउस बापक जीवन कष्टहमय व्ययतीत भेल, किन्तु बेटाक सुखी भेलापर प्रयुक्तय।
बाप रहल पेटमे पूत गेल गाया पिताक जन्मेप ने भेल छल तइयो बेटा गयासँ घुरि क’ चल आयल।
बाप रहल पेटमे पूत गेल बरियात बापक जन्मेट ने मेल, किन्तुस बेटा बरियातसँ घुरि क’ चल आयल।
बाप सऽ पूत सबाइ बापक अपेक्षा बेटा ओहिसँ बढि़-चढि़ क’ अछि।
बाप सऽ बैर पूत सऽ सगाइ बापक संग तँ शत्रुता छनि, मुदा बेटाक संग विवाह करबाक बात सोचि रहल छथि।
बापे पूते नचनियाँ, छउड़ी भेल किरतनियाँ बाप बेटा मिल क’ नच करैद तकरा देखि क’ बेटी सेहो कीर्तन करैछ।
बापे पूते परापत भेल, नहि किछु तऽ थोड़बहुँ थोड़ बापक गुण अवगुण किछु-ने-किछु तँ बेटापर निश्चित रूपेँ पड़ैछ।
बाबाक कोदारि बड़ हल्लुेक बाबाक कोदारि बड़ हुल्लुँक लगैत अछि।
बाबाक घोड़ा हीं ! हीं ! हीं ! हीं ! घोड़ा तँ बाबाक छनि, किन्तुछ हमरा तँ ओहिसँ कोनो लाभक संभावना नहि।
बाबा कहने ने, ससुर कहने घी ककरो बाबा कहब तँ ओ तेल नहि किन्तु ससुर कहलापर ओ घी देबाक हेतु तैयार भ’ जायत।
बाबा के बखारी, धिया के उपास बाबाकेँ तँ बखारी छनि, मुदा बेटी उपवास क’ रहल छथि।
बाबाजीक दाढ़ी बाहबामे पार बाबाजीक दाढ़ी चावशी मे समाप्तक भ’ गेल।
बाबाजी के गाय ने भेल बाय भेल ब्राह्मण केँ गाय की भेटलनि हुनका ओ परेशान क’ देलक।
बाबाजी के बाबाजी, बजनियाँ के बजनियाँ अवसर अयलापर बाबाजी बनि जाइत छथि तथा बजनियाँ सेहो।
बाबाजी के बार,
परसादे पार बाबाजीक मूल्येवान वस्तुस प्रसादेमे समाप्त। भ’ गेलनि।
बाबाजी के बेल, हाथे हाथे गेल बाबाजीक बेल एहि हाथसँ ओहि हाथमे जाइत अबैत समाप्तह भ’ जाइछ।
बाबा दण्डोसत बचा जय सियाराम साधु-सन्तड आशीर्वाद देबाक क्रममे भगवानक नाम लैछ।
बाबा पेटेपर रहबै आतुर व्येक्तिक आतुरतापर प्रयुक्त ।
बाबा मरता तऽ बैल बिकायत बाबाक मृत्यू परान्त बड़द जायत।
बाबू ने भइया जे कराबे से रुपइया टाका सब कार्य करैछ।
बाबू भइया जाड़े मरे, गीदर बान्हेज गाँती पैघ-पैघ व्य क्ति जाड़े मरि रहल अछि, मुदा गीदड़ गाँती बान्हि रहल अछि।
बाभन आम, कैथ काम ब्राह्मणकेँ भोजन तथा कायस्थ केँ काज चाही।
बाभनक गाममे राड़ पजियार जाहि गाममे खाली ब्राह्मणे अछि ओतय राड़ पजियाड़ कोनो भ’ सकैछ? जतय विद्वानक आधिक्य़ अछि ततय जिम्मेसवारीक काज कोनो अज्ञानी व्यिक्ति करैछ, तँ कहल जाइछ।
बाभनक धन भिक्षा ब्राह्मणक धन भिक्षासँ निर्मित होइछ।
बाभनक बेटा बाबन बरिस धरि पोंगा बेटा तँ ब्राह्मणक छथि, किन्तुव बाबन वर्षक भ’ गेलाह तथापि पोंगा छथि।
बाभनक बेटी कलमा पढ़े ब्राह्मणक बेटी कतहु कलमा पढ़ैछ? जे कार्य जकरा हेतु निषिद्ध अछि जँ ओ वैह कार्य करैछ, तँ व्यंँग्यर।
बाभन कुकूर नउआ, अपन जातिक कटउआ ब्राह्मण, कुकूर एवं नौआ अपन-अपन जातिकेँ हानि पहुँचबैत अछि।
बाभन कुकूर भाँट, जाति जातिक काट ब्राह्मण, कुकूर एवं भाँअ तीनूकेँ अपन-अपन जातिमे कहियो मेल नहि रहैछ।
बाभ्ने कुत्ता बनिया, जँ देखे तऽ गुराय ब्राह्मण, कुकूर एवं बनियाँ सतत वक्र दृष्टिऍं देखैछ।
बाभन कुत्ता हाथी, ई तीनू कुखियाती ब्राह्मण, कुकूर एवं हाथी एहि तीनूक पेट भरब आसान नहि अछि।
बाभन के लहर सबा पहर ब्राह्मणक क्रोध किछुए क्षण रहैछ ।
बाभन खयलक गंगामे, मुसहर खयलक झंगामे ब्राह्मण-भोजन करौलासँ पुण्यख होइछ तथा मुसहरकेँ खोयलासँ कोनो लाभ नहि।
बाभन गेलन घर, एने ओने हर ब्राह्मण जखन घर चल गेलाह तँ हुनक अनुपस्थितिमे हरबाह हर एम्ह र-ओम्ह र चलायब प्रारंभ कयलक।
बाभन छोट, राड़ मोट ब्राह्मणक गरीब एवं राड़क अमीर भेलापर प्रयुक्तक।
बाभन जउाति अन्हएरिया राति, एक मुट्ठी चूड़ा ला दउड़ल जा‍थि ब्राह्मण जाति घनघोर अन्धहकारमे एक मुठ्ठी चूड़ा खयबाक हेतु दौड़ल कतहु जा रहल छथि।
बाभन नाचे कोइरी देखे ब्राह्मण नाचि रहल छथि तथा कोइरी देख रहल अछि।
बाभन पुछने गरह, ओझा बुझने डाइन विपत्ति विशेषमे ब्राह्मणसँ जिज्ञासा कयलापर ओ ग्रहक प्रकोप कहैछ, किन्तुल ओझासँ पुछलापर डाइन-योगिनक ।
बाभन बचन परमान ब्राह्मणक कथन प्रमाण सदृश होइछ।
बाभन बानर बान्हसल ने जाय ब्राह्मण एवं बानरकेँ बान्हि क’ नहि राखल जा सकैछ।
बाभन बानर हाथी, अपने जा‍ति के खाथि ब्राह्मण, बन्द्र तथा हाथी अपन-अपन जातिक विनाशक हेतु तत्प्र रहैछ।
बाभन बेटा लोटे पोटे, मूर बेयाज दुनू घोंटे ब्राह्मणक बेटा ओंघरा क’ मूल धन एवं ओकर व्‍याज दुनू पचा जाइछ।
बाभन भऽ चोरी करे बिधबा पान खाय, छतरी भऽ रन से भागे जनम अकारथ जाय ब्राह्मण भ’ चोरि करैछ, विधवा भ’ पान खाइछ तथा क्षत्रिय भ’ युद्ध-स्थवलसँ पड़ा जाइछ, तँ तीनूक जन्मक निरर्थक अछि।
बाभन भऽ जाड़े मरे, गीदर बान्हेि गाँती ब्राह्मण जाड़े मरि रहल अछि, किन्तु गीदरकेँ गाँती बान्हतल जा रहल अछि।
बाभन मन्तारी भाँट खबास, ओहि राजक हैत नास जाहि राज्यँक मंत्री ब्रह्मण होइछ तथा भाँट खबासी करैछ तँ ओहि राज्यरक विनाश अवश्यंकभावी अछि।
बारह डोम तेरह नाई, से बजाबे सिंग सहनाई की बारह डोम आ तेरह हजाम मिलि क’ सइनाईपर गीत गाबि सकैछ ? जकर जे व्यावसाय रहैछ वैह ओ काज क’ सकैछ।
बारह बरसक कोढि़, एकहि एतबारमे पार बारह वर्षसँ कुष्ट छनि, किन्तुट एकहि दिन सूर्य व्रत कयलापर कोना मुक्ति पाबि सकैछ?
बाहर बरस डिरियानी, तऽ एक बच्चाे बियानी बारह वर्ष काशी सेवन कयल, किन्तु मरबा काल मिथिलाक माटि लिखल छल।
बारह बरिस तप कयल, तऽ जोलहा भतार भेल बारह वर्ष धरि तपस्या, कयल तखन जोलहा पति भेटल।
बारह बरिसपर दतमति करती, कोहबरमे नहयती जे स्त्री बारह वर्षोपरान्तल दतमनि करैछ ओ कोहबरमे कोना स्नाबन करत ? म्लेच्छछ व्यबक्तिपर व्यंकग्य ।
बारह हरके जोतनियाँ, तनिका डाँर डाँराडोरि ने जकरा खेतमे बारह हर चलैछ तकरा डाँरमे डाँरडोरि पर्यन्तह ने छनि।
बारह हाथक ककरी, तेरह हाथक बीया ककड़ी तँ बारहे हाथक अछि, किन्तु ओकर बीया तँ तेरह हाथक अछि।
बारहे बोझा तऽ समधियार कोन बातक जखन बारह बोझमे एक बोझ बोइनमे बहरा जायत तखन हमरा तोरा बीचमे समाधियारक कोन लाभ ? अपनो व्यिक्तिक संग कोनो रियात नहि भेल तँ अपनत्वअ कोन बातक ?
बारीक पटुआ तीत अपन बाड़ीमे उपजल पटुआ तीत होइछ।
बारी गेने पात ने, घर गेने केरा केराक बारी गेलापर पात नहि भेटैछ, मुदा घर गेलापर केरा दैछ।
बारी ने झारी, तीनटा बखारी खेत पथार नहि छनि, मुदा दरबज्जापर तीन-तीनटा बखारी छनि।
बाल ने बच्चात, नीन परे अच्छाघ धियापुता नहि छनि तेँ निश्चिन्तद भ’ सुतैत छथि।
बाल बच्चान ककरो, घिउढ़ारी करथि मङरो धियापूता ककरो अछि, मुदा घीढ़ारी आन व्‍यक्ति करैछ।
बालूक भीत, परदेसीक पीरीत जहिना बालूक भीत शीघ्रहि ढनमना जाइछ तहिना पदेसी व्य क्तिक संग प्रेम कयलापर मनोरथ पूर्ण नहि भ’ सकैछ।
बासक आगू चास के पूछे बासक जमीनक समक्ष चासकेँ के पूछैक ? खेतक अपेक्षा बासक अत्यँधिक महत्त्व अछि।
बास ने पाबी उपाति लय मारी रहबाक स्थाीन तँ भेटि ने रहल छनि, किन्तुस उपाति रखबाक हेतु मारि क’ रहल छथि।
बासी जाने बिरतैत, परोसिया जाने अन्त समीपमे रहनिहार व्यतक्ति सब वृत्तान्तन नहि जनैछ तथा पड़ोसिया घरक भीतरक बात जनैछ।
बासी पानी जे पीये नित दिन हर्रे खाय, मोटी दतमनि जे करे ताके घर बैद ने जाय जे भिनसरे उठि क’ पानि पीबैछ, हर्रेक प्रतिदिन सेवन तथा मोटगर दतमनि करैछ तकरार घरमे वैद्य नहि जाइछ।
बासी बचे ने कुत्ता खाय घरक स्थिति एहन अधलाह अछि जे किछु ने बचैछ, जे बसिया वस्तु कुकूर खा सकय।
बासी भात कोनो भात ने, परदेस पिया के आस ने बासि भातक गणना भातक अन्त,र्गत नहि होइछ तथा परदेसमे रहनिहार पतिक कोनो आशा नहि कयल जा सकैछ।
बाहरक खाय घरक गीत गाय घरक बाहरी व्य क्ति सब खा रहल अछि, किन्तुह घरक व्य्क्ति उपास पड़ैछ।
बाहर घुट्ठी धरि धोती, घरमे आँकड़क रोटी बारह जाइत छथि तँ धोती घुट्ठी धरि रहैत छनि, मुदा घरमे आँकड़क रोटी खाइत छथि।
बाहर पुआबे तीन सेर के नेउरा घरे सूप ने दौड़ा बाहरमे आत्मत प्रदर्शन करैछ जे हमरा अनेक आभूषण अछि, मुदा घरमे आवश्य क वस्तुआक अभाव अछि।
बाहर बाबू भरल घमंड, घरमे मुसरी खीचे दण्ड अन्य त्र लोक धमण्डरमे चूर रहैछ, मुदा घरमे अन्न क अभावमे मूस दण्डद खींच रहल छैक।
बाहर बाला खा गेल घरक गाबे गीत बहरिया आबि क’ सब वस्तु‍ खा गेल, मुदा घरक लोक गीत गबैत रहि गेल अर्थात् अति‍थिक कारणेँ घरबैयाकेँ कष्ट होइछ।
बाहर लम्बीत लम्बीर धोती, घरे मसुरी के रोटी बाहर जाइछ तँ साफ धोती पहिरैछ, मुदा घरमे खयबाक लेल मसुरीक रोटी भेटैछ।
बाहर लम्बी लम्बी बात, घरे कोदो के भात बाहर तँ पैघ-पैघ बात कहैछा, मुदा घरमे कोदोक भात खाइछ।
बिअइली ने पझइली, अदनउरक बेथे मरली ने तँ बाल-बच्चा भेलनि आ ने पझैली तथापि प्रसव पीड़सँ मरि गेलीह।
बिआहक ओलि गओने सधायब विवाहक समय जे पीड़ाक अनुभव भेल तकर बदला द्विरागमनक समय लेब।
बिआहक बेर कुम्हगड़ रोपब विवाहक अवसरपर कुम्ह ड़ एहि आशासँ रोपब जे ओकर फलसँ विवाहोत्स़वपर तरकारीक काज चलत।
बिआह सऽ बिध भारी विवाह करब तँ आसान अछि, किन्तुर ओकर विध-व्यछवहार अत्यरन्त कठिन।
बिआही बहु पपिआही, सगही बहुन सिपाही प्रथम पत्नीप महत्त्वहीन किन्तुन दोसर सिपाही सदृश होइछ।
बिआही बहु पपिआही हुनका हुक्का चिलम चाही, सगही बहु सिपाही हुनका मोट गद्दी चाही जकरा संग सर्वप्रथम विवाह होइछ तकरा लोक उपेक्षाक दृष्टिएँ देखि हुक्काह-चिलम दैछ, किन्तुद द्वितीय पत्नीकक व्यमवहार सिपाही होइछ जकरा स्वाुगतार्थ सतत मोट गद्दी प्रस्तुकत करैछ।
बिढ़नी बिन्हुलकौ तुम्मात फुलौलकौ, फेर कन्हुीआइ छौ तोरेपर बारंबार एकहि बातक संकेत कयलापर प्रयुक्तए।
बितपन जानि कऽ लेलहुँ बजाय, अइपनक चाउर लेलनि चोराय बुद्धिमान जानि क’ बजा लेलियनि, किन्तुय अरिपन हेतु जे चाउर देलनियनि ताहिमेसँ ओ चोरा लेलनि।
बित्ते भरिक बित्तूबाबू साबा हाथक दाढ़ी, ओहि दाढ़ीमे बास करइ छनि बरहमा बिसनु मुरारी बित्तूबाबू तँ अपने मात्र एक बित्ताक छथि, मुदरा हुनक दाढ़ी सवा हाथक छनि, जाहिमे ब्रह्मा, विष्णुछ एवं मुरारी निवास करैत छथि।
बिधना एक मिलओलनि जोड़ी, एक अन्हारा एक कोढ़ी भगवान बड़ पैघ छथि तेँ ओ नीक जोड़ी मिलौलनि, कारण आन्होर अछि तथा दोसर कोढि़।
बिन आदतक खरिका बाय बरोबरि बिना अभ्यारसक खरिका करब बाय बरोबरि होइछ।
बिन आमिलक भाँटा की, बिना बापक बेटा की जहिना खटाइक अभावमे भाँटाक कोनो स्वााद नहि होइछ तहिना बापक अभावमे बेटाक कोनो मूल्यन नहि अर्थात् अनाथ भ’ जाइछ।
बिन खयने ढ़ेकार बिनु भोजनक लोक ढेकार करैछ जे लोक बुझय जे खूब खयने अछि।
बिन बहुक पिरीत ने पत्नीहकक अनुपस्थितिमे प्रेमक जागरण नहि भ’ सकैछ।
बिन बानक खरिका बाइ बरोबरि अनभ्यानसक खरिका बाय बरोबरि होइछ।
बिन बिआहे बेटी मरे ठाढ़े ऊखि बिकाय, बिन मारे मुद्दइ मरे तीनू काल टरि जाय विवाह-पूर्व बेटीक मृत्युर भ’ जाय, खेतमे लागले कुसियारक विक्री भ’ जाय तथा बिनु कोनो प्रतिवाद कयने दुश्मानक मृत्युय भ’ जाय तँ बुझबाक चाही जे सब काल समाप्तो भ’ गेल।
बिन भय होय न पिरीत बिना भयक प्रेम नहि भ’ सकैछ।
बिन मनक बिआह कनपट्टीमे सिनूर बिना मनक जँ विवाह होइछ तँ कनपट्टीमे सिन्दूनर देल जाइद।
बिन सरदारे सेनाक नास सेनाध्याक्षक अभावमे सेनाक विनाश भ’ जाइछ।
बिन सरमक खाइ, तऽ चोर कहाइ श्रमक अभावमे ज्ञानार्जन कथमपि संभव नहि।
बिना चान तिलक लिलार चरचराय बिनु चानन-तिलकक ललाट चरचराइत अछि।
बिना बजौने नौता गेलौं, कनियाँ माय पुछलनिर कतय एलौं बिनु बजाओल कतहु गेलापर अपमान होइछ।
बिना लौंग के सुपारी गदराइन लागे लवंगक अभावमे सुपारीक स्वादद किछु नहि होइछ।
बिनास काले बिपरीत बुद्धी लोकक जखन विनाश अबैछ तखन ओकर बुद्धि विपरीत भ’ जाइछ।
बिना सुमेरक माला की गृह स्वाेमीक अभावमे परिवरक महत्त्व नहि रहैछ।
बिनु खयने छुआ ने बुताय, बिनु देखने नयन ने जुडा़य बिनु किछु खयने क्षुधाग्निक शमन नहि होइछ तथा वस्तुु विशेष बिनु देखने आँखि नहि
बिनु घरनी घर भूतक डेरा पत्नीघक अनुपस्थितिमे घरमे भूत निवास करैछ।
बिनु छाया परकास नहि, बिनु काँटा गुलाब नहि बिना छाहक प्रकाश एवं बिना काँटक गुलाब नहि होइछ।
बिनु बजौने कनियाँ घर गेलहुँ, कनियाँ माय पुछलनि कतय अयलहुँ बिना बजौने कनियाँक घर गेलहुँ तँ कनियाँक माय पुछलनि जे कोम्हँर अयलहुँ? बिनु बजौने कतहु नहि जयबाक चाही मर्यादाक विनाश होइछ।
बिनु बजौने जायब, चिकरि भोकरि रहि जायब बिनु बजाओल गेलापर बातक कोनो मर्यादा नहि रहैछ।
बिनु बाभने उद्धार नहि शुभ एवं अशुभ कार्य सबमे ब्राह्मणक प्रयोजन पड़ैछ।
बिनु बिचारने जे करी, तऽ पाछाँ पछताइ सब काज सोचि-विचारि क’ करबाक चाही।
बिनु बेआरक पिपरक पात डोले, बिना बजाओल लबड़ा बोले पिपरक पात बिनु बसातकम डोलैछ तथा जे लबड़ा अछि ओ बिनु बजौनहुँ बजैछ।
बिनु सेबा मेबा नहि पाबी बिना परिश्रमक सफलता नहि भेटैछ।
बिपत पड़े जे कर गहे सोइ साँचो मीत विपत्तिमे असली मित्र सहायक होइछ।
बिपतमे बिपत समपतमे समपत विपत्ति असगरे नहि अबैछ, किन्तुज सम्प त्ति अकस्माित आबि जाइछ।
बिप्र टहलुआ चीक धन ओ बेटी के बाढ़, येहू से धन ना घटे तकरे बड़न से राड़ ब्राह्मणक सेवा, बकरी रूपी धनमे विकास, पुत्रीक संख्याघमे वृद्धि एहिमे संपत्ति खर्च कयलासँ जँ नहि घटैत अछि, तँ पैघ व्याक्तिसँ झगड़ा मोल लेलासँ संपत्तिक विनाश होइछ।
बिरीछक छाया, पुरुखक माया वृक्षक छाया एवं पुरुषक मायाक विश्वातस नहि कयल जा सकैछ।
बिलाइ के दूध औंटे के भारा बिलाइकेँ दूध औंटबाक कार्यभार देल गेल।
बिलाइ पूजि कऽ आयल छी बिलाइक पूजा क’ कए आयल छी।
बिलाडि़क भागे सीक टुटल भाग्यिवान व्यटक्तिक काज ओहिना भ’ जाइछ।
बिलाडि़ बान्हवल गेल, बदमास बान्ह ल गेल बिलाइ ओ बदमाश दुनूकेँ बान्ह ब कठिन अछि।
बिस खाइ ने माहुर खाइ, मरैक हो तऽ पुरनियाँ जाइ मरबाक हेतु विष-माहुर खयबाक कोनो प्रयोजन नहि, प्रत्युयत पूर्णियाँ गेलापर स्वयत: भ’ जाइछ।
बिस रस भरल कनक घट जइसन ऊपरसँ शुभ्र-शाभ्र, किन्तुइ अनतर्मनसँ दुष्ट प्रकृतिक व्यनक्तिक लेल प्रयुक्त‍।
बिसरू माय बाप सवुमिरू सोंटा माय बापकेँ बिसरि क’ अपन परिश्रमक आशा करू।
बिसुन बिलाडि़ डबरामे डेरा कहबाक हेतु तँ प्रतिष्ठित छथि, मुदा घर बनौने छथि डबरामे।
बिहाडि़क झोंकमे मच्छ्ड़ बिहाडि़मे मच्छेड़क महत्त्व नहि होइछ।
बीत खिया जाय, धनबाला ने खियाय धन क्षीण भेनिहार अछि, मुदा धनीवर्गमे कहियो कमी नहि अबैछ।
बीतल बयस देल भेल भारी, आब की लदबह हो बेपारी बड़द व्याेपारीकेँ संबोधित क’ कहैछ, ‘हमर अवस्था् बीत गेल।
बीसा हर बिसफी बहे, तइयो बिसफी पड़ले रहे बीस सय हर बिसफीमे प्रतिदिन बहैछ तथापि बिसफी पड़ले रहि जाइछ।
बीसी तीसी मकर पचीसी अगहनमे बीस दिन, पूसमे तीस दिन तथा माघ मासमे पचीस दिस धरि जाड़क समय मानल जाइछ।
बुआरी माछ के लेले छुच्छेा, लेलाहि मउगी के लेरे छुच्छेु बोआरी माछ आ लेलाहि मौगीकेँ सतत लेर चुबैत रहैछ।
बुच्चीर गे बुच्चीे ऊखडि़ चढि़ उच्चीम भुट्ट लोक ऊखरिपर चढि़ क’ ऊँच बनबाक प्रयास करैछ।
बुड़बक एक चलल ससुरारी, बाटहि भगबा लेलक उतारी मूर्ख सासुरक हेतु प्रस्था न कयलक, किन्तुी अपन मूर्खताक कारणेँ बाटहिमे अपन वस्त्रल उतारि देलक।
बुड़बक कनियाँ के नौ आना खोंइछ कनियाँ मूख्र छथि तेँ हुनका खोंइछमे मात्र नौ पाइ देल गेलनि।
बुड़बक कनियाँ के नौ आना खोइँछा मूर्ख कनियाँकेँ खोइँछमे नौ आना देल जाइछ।
बुड़बक कनियाँ के भैंसुर लोकनियाँ कनियाँ मूख्र अछि तेँ लोकनियाँक काय्र भैसुर क’ रहल अछि।
बुड़बकक बेटा काबिल मूर्ख व्येक्तिकबेटा जँ बुद्धिमान भ’ जाइछ तँ कहल जाइछ।
बुड़बक के धन होय, फहीमाँ मारी खाब मूर्खक धनकेँ चतुर व्य क्तिक उपयोग करैछ।
बुड़बक के भैंस लागल, सउसे गाम कटिया लऽ कऽ दौड़ल मूर्खक महींस दूध देमय लागल तँ सम्पू़र्ण गाम दूधक बासन ल’ कए चलल।
बुड़बक कोइली के बारहो मास बसन्तच मूर्ख कोइलीकेँ बारहो मास वसन्तत हैबाक अनुभव होइछ।
बुड़बक बक्खोे सरायमे डेरा बक्खोक मूर्ख अछि तेँ ओ धर्मशालामे डेरा देलक अछि।
बुड़बक गेला माछ मारे, टापी अयलन गमाय मूर्ख माछ मारय गेल तँ टापी गमा क’ आयल।
बुड़बक टुनाइ के रहिका बास टुनाइ मूर्ख छथि तेँ रहिकामे घर बनौलनि अछि।
बुड़बक दास गेलन चरबाही, तीन बड़दमे एको नाही तीन बड़दक चरबाही करबाक हेतु कोनो मूर्ख व्य क्ति गेल, जकर परिणाम भेल जे एकोटा बड़द वापस नहि भेल।
बुडबक देबी के कुरथी अच्छ त देवी मूर्ख छथिक तेँ हुनक पूजामे कुर्थीक अच्छ तसँ काज चलाओल जाइछ।
बुड़बक देस मझउआ, जहाँत भात ने पूछे कउआ मझौआ मूर्ख देश अछि जतय भातकेँ कौआ पर्यन्तर नहि पुछैत अछि।
बुड़बक धनइ के रहिका बास, कोठीमे चाउर घरमे उपास संपत्तिक अछैत मूर्ख धनइ रहिकामे घर बनौलनि तकर प्रमाण भेटैछउ जे कोठीमे चाउर रहलोपर उपवास करैछ।
बुड़बकक धन बुधियारक चटनी मूर्खक धन रहलापर बुद्धिमान सतत ओहि धनकसदुपयोग करय चाहैछ।
बुड़बक बकरी हुराड़ सऽ ठट्ठा मूर्ख बकरी अनेरे भेंडीसँ ठठ्ठा करैत अछि।
बुड़बकम बरन के अन्हाडर घरमे कनखी मूर्ख वर अन्हा र घरमे कनखी मारैत अछि।
बुड़बक बर के कुरथी अच्छ त मूर्ख वरक विवाहमे कुर्थीक अक्षत देल जाइछ।
बुड़बक बर के बथनाहा बिआह मूर्ख वरक विवाह बथनाहा गाममे आसानीसँ होइछ।
बुड़बक बर के रजाइ बिछौना वर मूर्ख अछि अतएव साँझे पत्नीआ संग सुतबाक हेतु उताहुल अछि।
बुडबक बरके साँझे बिछोना मूर्ख वरकेँ साँझ पडि़तिह ओछाओनपर चल जयबाक इच्छा रहैछ।
बुड़बक बारिक नोन तेल परसे मूर्ख व्यरक्तिक भोजनमे नोन, तेल परसैत अछि कारण ओ जँ बेसी परसि देत तँ कोनो क्षति नहि ।
बुड़बक मरला बिराने फिकीर मूर्ख दोसराक चिन्ताफमे नष्टन भ’ जाइछ।
बुडबक मरे बिराने फिकीर मूर्ख व्य क्ति अनेरे आनक चिन्तातमे निमग्न रहैछ।
बुड़बक महींस नाम कंजाइन महींस कोनो कार्यक नहि अछि, मुदा ओकर नाम कुंजाइन अछि।
बुड़बकम मियाँ बकरी खायमे राकस मुसलमान मूर्ख अछि तँ बकरी खयबामे राक्षस सदृश करैछ।
बुड़बक रसिया अन्हातर घरमे मटकी देo बुड़ब क बर के अन्हाकर घर कनखी
बुड़बक सिल्लीअ के बाँसक बीटमे खोंता मूर्ख सिल्लीी (एक प्रकारक चिड़ै जे सतत पानिमे रहैछ) बाँसक बीटमे अपन खोंता बनबैछ।
बुडबकहाक बहु सभक भउजाइ मूर्खक पत्नी सभक भौजी भ’ जाइछ।
बुड़बकहाक रहैत कबिलाहा पड़े मूर्खक लग धन रहैत धूर्त्त कहियो उपवास नहि पडि़ सकैछ।
बुडबकहा खेती अगिला साल जे नीक जकाँ खेती नहि करैछ ओ सतत आगू सालक प्रतीक्षा करैछ।
बुढ़बा टुक टुक ताके मुहा, छौंड़ा काटने जाइछ कान वृद्ध व्यकक्ति बसैल-बैसल मुह तकैत अछि, मुदा नवयुवक सभक कान काटैत अछि।
बुढ़बा भतार कयलहुँ दिबस गमाबे ला, पाकल पाकल दाढ़ी बुढ़बा छातीमे गड़ाबे ला परवरिशक हेतु वृद्ध व्यबक्तिक संग विवाह कयल, किन्तुब ओकर पाकल दाढ़ी छातीमे गरैत अछि।
बुढ़बा भतारपर तीन टिकुली वृद्ध पतिपर तीन टिकुली सटैत छथि जँ जवान पति रहितथिन तँ आर की करितथि ? निकृष्टन वस्तुि पाबि क’ कयनिहारपर व्यं ग्‍य।
बुढ़बा मंगलवार दिन कोनो काजक अनिश्चितापर कहल जाइछ।
बुढ़ायल तोता कतहु राम नाम पढ़य वयस्कय व्य क्ति आसानीसँ कोनो बातनहि सीखि सकैछ।
बुढ़ारीमे गेनहारी लटकन वृद्धावस्थाेमे फैशन कयनिहारपर व्यंनग्यग।
बुढ़ारीमे जौबन पैंच वृद्धावस्थाौमे यौवन पैंच लेलापर व्यनग्य‍।
बुढ़ारीमे साँय केलौं सेहो परदेसी वृद्धावस्थाामे विवाह कयल, मुदा ओहो परदेसी अछि।
बुढि़या के मरे के डर ने, जम के परिके डर वृद्ध व्येक्तिक मृत्यु सँ कोनो भय नहि मानबाक चाही, किन्तुस यमराज जँ पड़कि जायत ताहि सँ डरयबाक चाही।
बुढि़या घोड़ी के लाल लगाम प्राचीनतापर नवीनताक आवरणपर व्यं ग्यर।
बुढि़या मउगी लबडी, पानि भरे डबड़ी वृद्धा अपन स्वाडस्य् व केँ ध्या न राखि घी खिचडि़क सेवन करैछ।
बुढि़या है जहर के पुडि़या वृद्धाक क्रिया-कलाप जहरक समान होइछ।
बुद्धिक अजीर्नता बुद्धिमान व्यनक्ति मूर्खवत व्य।वहार करैछ, तँ व्यंधग्य ।
बुद्धिमान के इसारा काफी बुद्धिमान व्यइसक्ति सब किछु संकेततेसँ बुझि जाइछ।
बुद्धि सऽ बुद्धी अनूप तुच्छि वस्तुकक अपेक्षा मूल्येवान वस्तुककेँ उपेक्षाक दृष्टिऐँ देखलापर कहल जाइछ।
बुधिमन्ताद जे रहे घर बाढ़य दु:खा तीन, धन घटए ओ रीन बढ़ए दिन दिन देह मलीन बुद्धिमान व्यीक्तिक घर बैसि गेलापर विपत्तिक पहाड़ टुटि पड़ैछ।
बुधिया मरल नाता टूटल बुधिया मरि गेल आ संबंध टूटि गेल।
बुधियारक पैंच माने निरस्तािर बुद्धिमान व्य मिकत पैंचक तगादा नहि करैछ।
बुधियारक हो तेहन लथार, मारे घुट्ठी फुटे लिलार बुद्धिमान व्येक्ति एहन बुं‍द्धिमानीसँ कार्य करैछ जकर परिणाम अत्ययन्तं विध्वंससकारी होइछ।
बुरका बाली बुआ पाछाँ सऽ चूहा बुर्का वाली फुआक पाछाँ-पाँछा मूस लागल अछि।
बुरलेलक धन बुधियारक चटनी मूर्खक धनक उपयोग बुद्धिमान सुगमतापूर्वक करैछ।
बुरिबकहा खेती अगिला साल पश्चाकत्तापक स्थितिमे प्रयोग होइछ।
बूझब ने सूझब मूसर लऽ कऽ जूझब बिनु कारण जनने बुझने मुसर ल’ कए युद्धक तैयारी करब।
बूड़ल बंस कबीरक जनमल पूत कमाल कबीरक वंशमे एहन पुत्रक जन्मा भेलनि जे वंशक मर्यादा समाप्त् क’ देलकनि।
बूड़ल समयमे कोइरी भेल महतो अधलाह समयक फेरीमे कोइरी सभक सरदार बनि गेल।
बूढ़ कुकूर कतहु फाँसी पड़े जे व्युक्ति अकार्यक अअछि ओकरा फाँसीपर चढ़ा देल जाय ओहिसँ कोनो फलक प्राप्ति नहि भ’ सकैछ।
बूढ़ गाय के ईंटा लटकन गाय वृद्ध अछि तथापि ईंटा लटकन लागल छैक।
बूढ़ गाय सोहराइ के साथ गाय बूढ़ अछि, मुदा सोहराइमे भाग लेबाक आकांक्षी अछि।
बूढ़ घोड़ी के लाल लगाम बूढ़ व्य़क्ति जँ आधुनिक ढंगक वेश-भूषा धारण करैछ, तँ प्रयुक्त ।
बूढ़ पिया ले नीन किया कामै जकरासँ कोनो लाभक आशा नहि रहैछ ओकरा लेल क्योा छोटो कष्ट उठैबा लेल तैयार नहि होइछ।
बूढ़ बकरी के फुलबारी चरक‍ सौख बकरी वृद्ध अछि तथापि ओकरा फुलबारी चरबाक शौख भ’ रहल छैक।
बूढ़ बर कले कले घर वर वृद्ध छथि तेँ शनै:-शनै:- चलैत छथि।
बूढ़ बिआह करे तऽ पड़ोसिया के सुख बूढ़ व्यहक्तिक विवाह कयलासँ पड़ोसिया सबसँ बेसी लाभन्वित होइछ।
बूढ़ भेल बकरी, हुराड़ सऽ ठट्ठा बकरी बूढ़ अछि तथापि ओ हुराड़सँ ठट्ठा क’ रहल अछि।
बूढ़ भेलहुँ तऽ दूरि गेलहुँ बूढ़ भेलहुँ तँ हमर महत्त्व घटिगेल की ? बूढ़केँ सब अपमान करबाक चेष्टाि करैछ।
बूढ़ भेलहुँ नाक लगले अछि वृद्ध भ’ गेल छथि, मुदा अपन अभ्याैसमे कोनो परिवर्त्तन नहि अनैत छथि।
बूढ़ मरे भासा सड़े बूढ़केँ जखन मरबाक अवसर अबैछ तथा भाषा जखन अत्यरधिक प्राणवन्तष होइछ तखन ओहिमे नूतना अबैछ।
बूढ़मे एहन जबानमे केहन जखन वृद्धावस्थाममे एहन छथि् तखन युववावस्थावमे केहन हेतह ओ कल्पानातीत अछि।
बूढ़ सुग्गाथ कतहु पढ़य बूढ़केँ नहि सिखाओल जा सकैछ।
बूढ़ सुग्गा कतहु पोस मानय बूढ़ सुग्गा केँ पालतू नहि बनाओल जा सकैछ।
बूढ़ोमे छओ दाँत वृद्धावस्थादमे जँ क्योन नवयुकवक सदृश व्य्वहार करैछ, तँ व्यंकग्य्।
बून्दा बून्दर सऽ तालाब भरे छोट-छोट सहयोगसँ पैघ काज सम्पवन्ने होइछ।
बूरिमे बार ने आ भालू सऽ दोस्तीं शरीरमे शक्तिक अभाव, मुदा भालूक संग दोस्ती करेत छथि।
बूलि टहलि के खाइ, ढेरी लग ने जाइ फराकेसँ लाभ लेबाक प्रयास कयनिहारपर व्यंेग्य ।
बेकार से बेगार भला बेकार रहलासँ बेगारी करब उचित अछि।
बेगरते गेला बहु के बन्धिक राखय, बेचनामा कयने अयलाह बेगरता पड़लापर लोक नीचसँ नीच कार्यपर उतगरि जाइछ।
बेटबो नीक सइयों नीक, किरिया ककर खाउ बेटा साँय दुनू समान भावेँ प्रिय अछि तेँ किरिया ककर खाउ ? द्वन्द्व क स्थितिमे कहल जाइछ।
बेटाक ठेकान ने पहिने बेटाक डँराडोरि पुत्र जन्म क कोनो पता नहि, किन्तुक ओकरा हेतु पहिनेसँ डाँरोडोरिक व्य वस्थाव भ’ रहल अछि।
बेटा ने ताबे डँराडोरि देo बेटाक ठेकान ने पहिने बेटाक डराडोरि
बेटा भेल लोकि लेल, बेटी भेल फेकि देल बेटा जँ भेल तँ ओकरा कोरा-काँखि लगायब आ जँ बेटी भेल तँ ओकरा फेकि देब अर्थात् ओकर महत्त्व नहि।
बेटा मरब नीक, बिसबास उठब ने नीक पुत्रक मृत्युर भ’ जाय तकरा सहन कयल जा सकैछ, मुदा विश्वाउस समाप्तह भ’ जायब समुचित नहि।
बेटा मरे ने, सोना जरे ने जहिना सोन नहि जड़ैछ तहिना वास्तेविक बेटाक मृत्युि नहि होइछ।
बेटा सऽ घर भरैछ, बेटी सऽ घर सून होइछ बेटाक जन्मय भेलासँ घर भरि जाइछ, किन्तुभ बेटीक जन्मय भेलासँ घर खाली भ’ जाइछ कारण विवाहोपरान्त बेटी घर खाली क’ चल जाइछ।
बेटी आयल गेल सिंगार, सउतिन आयल बढ़ल सिंगार बेटीक जन्मर भेलापर स्वाीभाविक रूपेँ श्रृंगार-प्रसाधनमे कमी भ’ जाइछ, किन्तु सौतनिक अयलापर वृद्धि।
बेटीक बिआह धोतीओ सऽ मोतिओ सऽ बेटीक विवाह साधारण रूपेँ भ’ सकैछ तथा मोतीसँ सेहो।
बेटीक बिदाइ आ गुदरी के सिआइ जहिना बेटीक विदाइमे अधिक खर्च होठछ तहिना गुदरीकेँ सिबामे अत्यरधिक डोरा लगैछ।
बेटीक भार राजो ने सहय बेअभ्कभ भार एतेक कष्ट दायी होइछ जे राजा पर्यन्तक नहि सहन क’ सकैछ।
बेटी कुम्हातर के नाम रजरनियाँ बेटी तँ कुम्ह राक अछि, मुदा नाम रखने अछि राजरानी।
बेटी खकचोदनी जमाय पनबट्टा बेटी तँ कुरूप अछि, मुदा जमाय अत्यदन्ते सुन्दतर।
बेटी चमार के नाम रजरनिया देo बेटी कुम्हािर केनाम रजरनिया
बेटी चोरौलक दही ककरो ने कही, पुतहु चोरौलक घोर नगरमे सोर बेटी दही चोरा क’ खा गेलनि तकर संवाद तँ ककरो नहि कहलथि, मुदा पुतहु कनेक्शन घोर चोरा क’ पिलथिन तँ संपूर्ण नगरमे हल्ला कयलनि।
बेटी जनमे ने डेराइ, बेटी करमे डेराइ बेटीक जन्मन भेलासँ ओतेक डर नहि होइछ जतेक डर ओकर भाग्य अधलाह भेलासँ।
बेटी ध्नओ धरम दुनू लिए, चलय काल कनाइयो दिए बेटी ध्नि ओ धर्म दुनू ल’ लैछ तता सासुर जयबा काल कनाइयो दैछ।
बेटी बेआ ककरो, घीढ़ारी करे मँगरो बेटा बेटी ककरो छैक, मुदा घी ढारबाक काज क्योी क’ रहल अछि।
बेटी भेल तऽ तोहर, बेटा भेल तऽ हमर जँ बेटीक जन्मे भेल तँ अहाँक आ जँ बेटा भेल तँ ओ हमर।
बेटी माय रानी, बुढ़ारी भरे पानी बेटीक माय जँ रानी होथि तँ ओ वृद्धावस्थाँमे पानि भरैत छथि।
बेटी सासुरे नीक, कि सरगे नीक बेटीक सासुरेमे रहब सर्वथा उचित अन्य था ओकर मृत्‍यु भ’ जाय सएह नीक।
बेदिल चाकर दुसमन बरोबरि बिनु मनक नौकर दुश्मोन सदृश होइछ।
बेबानक खरिका बाँस बरोबरि बिनु अभ्याकसक खरिका करब बाँस धकेलबाक समान होइछ।
बेलक मारल बबूर तर गेल, बबूरक मारल बेल तर गेल बेल वृक्षक नीचाँ आश्रय लेब तँ बेल खसबे करत आ चोट लगबे करत।
बेलदारिन बेटी के नइहरे सुख ने सासुरे सुख बेलदारिन बेटीकेँ नैहर-सासुर कतहु ने सुख होइछ।
बेल पाकल तऽ कउआक बाप के की बेल पाकि गेल अछि ताहि सँ कौआकेँ कोनो लाभक संभावना नहि, कारण ओकरा कोनो फल नहि भेटि सकैछ।
बेल पाकल तऽ कउआ के की बेल पाकि गेल अछि ताहिसँ कौआकेँ कोनो फर्क नहि पड़ैछ।
बेल फुटने राइ छाइ पाकल बेल गाछसँ खसलापर राइ-छाइ अर्थात् बेकार भ’ जाइछ।
बेलज्जी बहुरिया घरपर नाचे निर्लज्ज‍ कनियाँ घरपर चढि़ क’ नाचैछ।
बेसबाक कमाइ सारीमे कि गारीमे वेश्या क धन स्त्रा भूषण एवं सवारी गाड़ीमे खर्च होइत अछि।
बेसबाक टूट सनियासी वेश्या वृत्ति जखन नहि चलैछ तखन संन्या सिनी बनि जाइछ।
बेसबाक भतार पइसा वेश्या क पति रुपैया-पैसा होइछ।
बेसबा पूत बसीठ वेश्यापक पुत्र कतहु वशिष्ठछ भ’ सकैछ ? दुष्टँ सज्जयन सदृश आचारण नहि क’ सकैछ।
बेसबा रूसल धरमो बाँचल वेश्यारक रुसलासँ धर्म बाँचि जाइछ।
बैठल बनियाँ की करे, एहि कोठीक धान ओहि कोठी मे करे बनियाँकेँ जँ कोनो काज नहि होइछ तँ एहि कोठीक करैछ।
बैठल से बेगारी भला बैसल रहलासँ नीक जे किछु किछु करैत रही।
बैद पनसारी आधे आध वैद्य एवं पन्साआरी अपन हिस्साह आधा-आधा क’ बाँटैछ।
बैल अगोतर गाय पछोतर बड़दक अगिला भाग तथा गायक पहिला भाग भारी हैबाक चाही।
बैल करी छोअ मोट साहु करी भारी बड़द छोअ खूटक तथा महाजन कोनो सम्प न्ना व्यसक्तिकेँ बनयबाक चाही जे अवसर विशेषपर कार्य दैछ।
बैल ने कूदे कूदे गोनू,ई तमासादेखे कीनू बड़द नहि कुदैत अछि, प्रत्युूत ओकरा बदला गोनू कुदैत अछि जकर तमाशा सब देखैत अछि।
बैल ने कूदे कूदे तंगा बड़द नहि कुदैत अछि, प्रत्युतत ओकरा बदला तंगा अर्थात् कुदैत अछि।
बैल बेसाहे चललह कन्तद बैल बेसाहिह दू दू दन्ता, काछ कसौटी साबर बान ई छाडि़ किनिहऽ मति आन, जबे देखिह रूपा धौर टका चारि दिअह उपरोर, ओहि पार जब दे‍खिह मैना एहि पार से दिअह बैना, जब देखियह बैरिया गोल उठ बैठ के करिहऽ मोल, जब देखियह करियाबा कन्तर कैल गोला देखह जनु दन्ति, सगर पताली भौआँ टेर अपन खाए परोसिया हेर, कैला काबर गोल टिकार ईहो हरिहँ दाम तोहार पत्नीो पतिसँ कहैछ जे खेती करबाक निमित्त बड़द कीनब आवश्यैक।
बैसनब बाबाजी के काँख तर बुआरी, की छी यौ बाबाजी तऽ तीमन तरकारी वाह्माडम्बजर करैछ जे हम बाबाजी अर्थात् निरामिष छी, किन्तुब व्यतवहार सामिष सदृश करैछ, तँ व्यं ग्या।
बैस भेल भोर, चिलका लेल कोर अवस्थाल समाप्तय भ’ गेल तथापि बच्चा कोरा लेबाक मन होइछ।
बैसल बनिआ की करय, एहि कोठीक धान ओहि कोठीमे धरे बिनु काजक लोक सब वस्तुं उनट-पुनअ करैत समय व्ती सबत करैछ।
बैसल बूरि परक्का‍ मारे, सालमे बारह हाथक लंगा फारे बैसल व्याकिमत उपद्रवी होइछ।
बैसली माँझे घुसुकि अइली कान्हे। बैसल छलहुँ बीच घरमे, किन्तुध घुसकैत-घुसकैत घरक कोनमे आबि गेलहुँ।
बोकन बथुआ अत्य धिक मूर्ख व्यँक्तिकेँ संकेत क’ कहल जाइछ।
बौआ लिखऽ अबैये , नै, मिटबऽ अबैये, दूनू हाथे कोनो काय्र करय तँ नहि आबय, किन्तुं ओकरा नष्टर करयमे सक्षम रहैछ, तँ प्रयुक्तट।
बौना चलल अकास छूबे छोट खूटक लोक कतहु आकाश छूबि सकैछ? शक्तिसँ बाहर काज कयनिहारपर व्यंखग्यक।
बौनी मउगी कउनी कूटे छोट खूटक स्त्रीककेँ खिसियाबाक हेतु कहल जाइछ।
बैसल बिलाडि़ के तीन बखरा बेकार बैसल रहब, मुदा भोजन खूब करब, तँ व्यंैग्यी।
बैसल सऽ बेगारी नीक बैसल रहलासँ नीक थिक ककरो बेगारी करब।
भँइसक आगाँ बीन बजाबे, भँइस गेल पगुराय महींसक आगाँ बीन बजाओल जाय, तथापि ओकारापर कोनो प्रकारक प्रभाव नहि पड़छै।
भँइसा जोते लोहिया खाय, तेकरा पापे पड़ोसिया जाय जे भैंसा जोतैत अछि तथा लोहाक बासनमे खाइत अछि तकर नाश तँ होइते छैक, ओकरा संगहि पड़ोसिया सेहो नष्टत भ’ जाइत अछि।
भँइसी के थान ने, गोसइयाँ के भाँड़ दूध ने तँ महीसक थनमे रहल आ ने गृहस्थ क घरमे, प्रत्युभत ओहिना नष्टत भ’ गेल।
भाँड़ोक छुइलहुँ पेटो ने भरल भोजनक बासन सेहो छूइल तथापि पेट नहि भरल।
भइ गति साँप छुछुन्नलर केरी, निगले अन्हतरा उगले कोढ़ी साँप छुछुन्नरक गति भ’ गेल, कारण कोढ़ी उगलैत अछितथा आन्हिर खा जाइत अछि।
भइया के न मोटरी बहिनियाँ के न लोर, जेहि बाटे अइलह भइया ताहि बाटे ओ साधरणतया भाय बहिनक ओतय किछु ल’ कए जाइछ।
भइये नाम भतिजबे गाम भायसँ नाम होइछ तथा भतीजासँ गामक प्रतिष्ठा होइछ।
भइये नाम भतीजबे नाम, बसल फूफू पहिले गाम पहिल बेर कन्याे नैहरसँ सासुर अबैछ तँ ओ सतत अपन भाय भतीजाक प्रशंसा करेछ।
भकसी झोंकाएब निरर्थक सबकेँ सतायब, तँ व्यंछग्या।
भखनी सौ बेर चढ़उनी एको बेर ने देवताकेँ मनौती मानैत छथि सय बेर, मुदा हुनका प्रसाद चढ़यबाक हेतु एक्कोय बेर नहि जाइत छथि।
भगत भगतक भऽ गेल सोर, भगतक मुहमे हाड़ गोड़ अमुक व्यडक्ति निरामिष छथि एहन हल्लान चारू भाग भ’ गेल, किन्तुग हुनका क्यो माछ-मासु खाइत देखि लेलक।
भगबान जकरा दैत छथि, तकरा छप्प‍र फाडि़ छप्प र फाडि़ कऽ दैत छथिा भगवान जकरा देत छथि तकरा छप्पदर फाडि़ क’ दैत छथि।
भजन आर भोजन एकान्त भला भगवत भजन आ भोजन एकान्ततमे करब नीक होइछ।
भट्टाक भटबर ठोपे तेल, खो जमइया ठेलम ठेल भटबर बनयबामे कम तेल लगैछ।
भतरो नीक पुतरो नीक, किरिया ककर खाउ देo साँयो नीक बेटो नीक किरिया ककर खाउ
भतारक मरलापर बापक देहरी पतिक मृत्युरपरान्तक बेटीकेँ पिताक आश्रय रहैछ।
भतारक रोटी ठट्ठा पतिक घर जा क’ रोटी खायब आसान कार्य नहि।
भतुआपर सितुआ चोख देo अब्ब लपर सितुआ चोख
भदबरिया पताल गैंची भादो मासमे गँइचा माछ आर बेसी कादोमे चल जाइत अछि जकरा पकड़ब आसान नहि।
भनहि विद्यापति ऊपर ऊपर जखन क्यो् कोनो बातक समर्थन ऊपरे-ऊपर करैछ, तँ कहल जाइछ।
भनहि विद्यापति सुनु रे भमरा, एते कुचेष्टा् होइत अछि हमरा जखन कोनो स्त्रीसक बदनामी कोनो पुरुषक कारणेँ होइछ तँ पुरुष प्रेमी ओहि दिस ध्याेन नहि दैछ, तखन आरे दुखमे उपर्युक्तफ अन्योँक्ति कहैछ।
भर ने करी भुँइहार के, पाछु ने धरी सियार के जहिना भूमिहार जापिर कोनो भरोस नहि कयल जाइछ तहिना सियारक पाछाँ लगलासँ कार्यसिद्धि नहि भ’ सकैछ।
भरल छथि दाइ, बजौने छथि भाइ बहिन सम्पात्तिक मलकाइन छथि तेँ भाय बजा क’ लए जा रहल छथिन।
भरल झोड़ी बहु के, छुछ बात भउजाइ के जखन संगमे पैसा रुपैया रहैछ तखन ओअपन पत्नीपक सम्माछन करैछ तथा छूछ बात मात्र भौजाइकेँ कहैछ।
भरल थारीमे लात मारब परसल थारीमे लात मारब अपशकुन मानल जाइछ।
भरल पूरल दाइ नेओने जाइ छनि भाइ, छूछ बिघुन दाइ घुरियो ने ताके छनि भाइ जाधरि बहिनकेँ सब प्रकारक सुख-सुविधा रहैत छनि ताधरि भाय बरो‍बरि हुनका बजा क’ अपना ओतय ल’ जाइत छथि।
भरले भर पुनु बिहिक सुभाव देo लोहे लोह धराबी
भरि गाओ ओझा, चलब ककरा सोझाँ संपूर्ण गाममे तँ हमर ओझे छथि तखन ककरो सोझाँमे चलब ? द्वन्द्व क स्थितिमे प्रयुक्ता।
भरि घर देओर, भतार सऽ ठट्ठा घर दिओरसँ भरल छनि तथापि पतिसँ हँसी-मसखरी क’ रहल छथि।
भरि घर देओर, भैसुर सऽ ठटठा घरमे देआरक अभाव नहि छनि, तथापि भैसुरसँ हँसी करैत छथि।
भरि दिन अहर पहर, साँझ खन तीन पहर दिनभरि एमहर-ओम्हभर करैत छथि, मुदा संध्या काल कार्य करब प्रारंभ करैत छथि।
भरि दे भरा दे, माथापर चढ़ा दे आलसी कहैछ जे घैलमे पानि भरि दिअ आ माथपर चढ़ा दिअ।
भरि पेट भात ने आ आराम ला पिरहा यद्यपि पेटमे भात नहि छनि, किन्तुछ सुखसँ पिड़हापर बैसल छथि।
भरि फगुआ बुढ़बा देओर लागे फागुन मास भरि वृद्ध व्य क्तिसँ सेहो दिओर सदृश व्यसवहार करैछ।
भरि हाथ चूड़ी ने तँ पट दऽ राँड़ भरि हाथमे चूड़ी पहिर क’ सधवा सदृश रहू अथवा पट द’ राँड बनि जाउ।
भरि हाथ लहठी तऽ धान के कूटत, सब पन खौकी चुल्हि के फूकत भरि हाथ चूड़ी छनि तेँ धान कुटबामे व्य वधान भ’ रहल छनि तथा घरक सब स्त्रीथ पानसँ मुह भरने छथि, तँ चुल्हि के फूकत ? असंगत कार्य कयनिहारपर व्यंकगय।
भरोसे दही जनमायब दोसराक आश्रय ल’ कए कार्य कयनिहारपर व्यंाग्यप।
भल घर बिआहल हो बाबा बोले के सकसीतन नव विवाहिता कहैछ, ‘बाबूजी अहाँ हमर एहन घरमे विवाह कयलहुँ जे हमरा बजबाक अधिकार सेहो नहि अछि’।
भल घर मध्या देलनि अछि बैन साधारण व्याक्ति कोनो पैघ व्य क्तिक संग उलझि जाइत अछि तखन व्यंतग्यो कयल जाइछ।
भल जन मरल भल राकस भेल, खुरपी लऽ कऽ कमाय गेल तुरन्तेम जन्मे लेलक तथा राक्षस बनि गेल।
भल पओलहि अलपहि कर तोस थोड़बहु नीक वस्तु सँ सन्तो ष करबाक चाही।
भल पिया हेता तऽ गुदरी देख लोभेता देo भल पिया होयता तऽ गुदडि़येपर लोटता
भल पिया होयता तऽ गुदडि़येपर लोटता हमर पति जँ नीक हैताह तँ फाटलो पुरान देखि क’ हमरापर मुग्धर भ’ जयताह।
भल भात के भल तीमन ने, भल नारी के भल पुरुष ने नीक चाउरक भातक संग नीक तरकारी ने भेटय आ नीक स्त्री केँ नीक वर ने भेटैछ, तँ समान रूपेँ कष्ट दायी होइछ।
भल भेल सइयाँ के कि बाघ लऽ गेल, बेगारी से तऽ बचलन कोनो स्त्रीऽ कहैछ जे नीक भेल जे हमर पतिकेँ बाघ उठा क’ लए गेल।
भल मन पाड़ल लाठी लाउ ठीके स्मडरण करौलहुँ, कनेक लाठी आनू तँ ।
भल मरल भल पिलुआ परल नीक भेल जे मरि गेल अन्यलथा पिलुआ फडि़ जाइत।
भल माय रहे तऽ, तेतरीक पात मे खीर खोआबे माय जँ नीक रहैछ तँ अपन बेटाकेँ इमलीक पातमे खीर खोअबैत अछि।
भल रहती रूपा, तऽ लोक लगइत लूफा रूपा जँ कदाचित नीक रहितथि, तँ हुनका लोक थोड़बे दुत्काकरैत ? स्वायं नीक रहनिहाकरकेँ ककरो किछु कहबाक दुस्साकहस थोड़बे होइछ?
भल हेती गोतनी तऽ रखती अपन पानी गोतनी जँ नीक हैतीह तँ अपन प्रतिष्ठालक रक्षा स्वनयं करती।
भलाक जुग नहि उपकार करबाक समय नहि रहि गेल अर्थात् ओकरा स्वी कार करबाक हेतु क्योथ प्रस्तु त नहि।
भला के संसार नइ नीक व्यसक्तिक हेतु ई संसार नहि अछि।
भला घोड़ा के एक चाबुक, भला आदमी के एक बात नीक घोड़ाकेँ एक चाबुक मारलापर ओ बिजलीक गतिसँ आगाँ भागैछ।
भला संग रहिहऽ तऽ खइहऽ गूआ पान, छोट संग बसिह तऽ कटइहऽ दुनू कान नीक व्य क्तिक संसर्गमे रहलासँ सर्वत्र सम्मा्न भेटैछ, किन्तु अधलाह व्य‍क्तिक संसर्गमे रहलासँ अपन इज्ज,ति समाप्तव करय पड़ैछ।
भले जन ने कर बिरस परिनाम नीक व्यनक्ति कार्यक फल नीके होइछ।
भसेड़ नीमन, घसेड़ ने नीमन खेतमे घास बेसी हो, तकरा राखल जा सकैछ, किन्तुक घसबाहकेँ ओकरा काटय देब उचति नहि, कारण ओहिसँ हानि होइछ।
भाँट गिरल कुइयाँ, भाटिन गिरल भुइयाँ, भटर कोंय भटर कोंय भाँट इनारमे तथा भाटिन भूमिपर खसली तेँ नेना-भूटका सब खिसिआबैत छनि-भटर कोंय-कोंय।
भाइक संगक, हथियार हाथक भाइक तथा हथियारक संग चलब सतत सुरक्षित होइछ।
भागमन्ततक एक हर सरंगमे बहैछ भाग्य्मन्तक व्यमक्तिकेँ सभठाम सुख भेटैछ।
भागल चोर कठउती हाथ चोर चोरि क’ कए पड़ायल, किन्तु कठौती एतहि छूटि गेल।
भागलपुरक भगलिया कहलगामक ठक, पटनाक देबलिया तीनू नामजद, सुनि पड़े भोजपुरिया तोरे तीनूक रग भागलपुरक भगल कयनिहार, कहलगामक ठक तथा पटनाक देवलिया तीनू प्रसिद्ध अछि।
भागबला के भूत कमाबे भाग्यावान व्य क्तिकेँ भूत सेहो कमाइत अछि।
भागैत भूत के लंगउटी बड़ी टा भागैत भूतक लंगौटी पैघ होइछ।
भाग्य बानक भूत कमाय भाग्य वान व्यतक्तिक कार्य भूत-प्रेत सेहो करैछ।
भाग्य बान के भूत कमाय भाग्य वान व्यभक्तिक हेतु भूत-प्रेत सेहो काज करैत अछि।
भात गलपैंच, आंगन गोउ़पैंच जकरा अहाँ भात खोआयब, ओहो अहाँकेँ भात खाय लेल देत।
भात छुटे तऽ छुटे संग ने छुटे खान-पान भनहि छुटि जाय, मुदा संग नहि छुटबाक चाही।
भात दालि ककरो, परोसे बैसलन मँगरो भोज ककरो द्वारा देल जाइछ, मुदा अवांछित व्यवक्ति ओकरा बाँटय आबि जाइछ, तँ प्रयुक्तक।
भाते उजबुज माड़ के पूछे जकरा भरिपेट भात भेटि जाइछ ओ माड़केँ किएक पूछत?
भादोक ओल की खाय राजा की खाय चोर भादो मासमे ओल सुगमतासँ नहि उपलब्धे होइछ।
भादोक गोबर ने नीपल सन के ने पोतल सन के भादोक गोबरसँ ने आँङन नीप सकैत छी आ ने ओकरा सुखाकेँ गोइठा ।
भादोक घाम आ साझीक काम भादो मासक रौद तथा सझिया काम दुनू अहितकर होइछ।
भादोक पछिया फूटे चिरोर भादो मासमे पछिया बसातसँ वर्षा नहि होइछ।
भादो के अन्ह रिया, ने की भादो के इजोरिया आसमान मेघाच्छायदित रहबाक कारणेँ भादो मासक अन्धाकार तथा इजोरिया दुनू समान रूपेँ प्रसिद्ध अछि।
भादो भदबा छाडि़ कऽ, केरा रोपी झारि कऽ भादोमास तथा भदबा छोडि़ क’ केरा सब दिन रोपल जा सकैछ।
भादोमे जनमल आ कहलक, एहन बाढि़ देखने ने छी अल्पे वयसक लोक जँ कोनो साधारणो वस्तु वा धटनाकेँ देखि आश्चरर्यित होइछ, तँ प्रयुक्त‍।
भाब घटे नीक सेर घटे से ने नीक कोनो वस्तुकक दरमे कमी आबि जाय से नीक, किन्तुम ओकर वजनमे कमी होयब नहि नीक।
भाब चले तऽ धूर चले, मन्दज चले कपास भाव चललापर अधलाहसँ अधलाह वस्तु नीक भावमे बिका जाइछ, किन्तु मन्दीा भेलापर तुर पर्यन्तछ नहि बिकाइछ।
भाबी सब सऽ उपर भावी सबसँ प्रबल होइछ जाहिपर ककरो अधिकार नहि।
भाबो भाब से, गोतनी रोआब से प्रेमसँ भाबो कोनो काज करैछ, किन्तु गोतनी रोआबसँ काज करैछ।
भाबो भाब सऽ, ससुर रोआब सऽ भाबो प्रेमसँ तथा ससुर रोआबसँ काज करैछ।
भामा कुटनी घर चल जयतन, सासु पुतोहु एक्केर रहतन झगड़ा लगैनिहार कुटनी तँ अपन घर चल जयतीह, मुदा सासु-पुतोहु तँ एकहि ठाम रहतीह।
भाय के ने मोटरी बहिन के ने नोर, भइया खड़े खड़े जो भाय जँ कदाचित खाली हाथे बहिनक ओतय जाइछ तँ एहन भायकेँ देखि क’ बहिन नोर पर्यन्तभ नहि बहबैछ तथा ओकरा ओतयसँ विदा क’ दैछ।
भाय कोसिलिया चाकर चोर, नारी कुलछनी मिरतुक हँकोर जकर भाय कोसल करब प्रारंभ करैछ, नोकर चोर बहरा जाइछ तथा स्त्री कुलक्षणी वा दुराचारिणी भ’ जाइछ तँ ओकर मृत्यु बुझबाक चाही।
भाय दूर पड़ोसिया नीयर अवसर विशेषपर भायसँ अधिक समीप पड़ोसिया भ’ जाइछ।
भाय बूझी तऽ भाब के, ने तँ अपन दाओ के ककरो प्रतिष्ठाब देलापर अपन भाय जकाँ होइछ, नहि तँ ओ अपन दावक होइछ।
भाय भइयारी भँइसीक सींग, जखनहि जनमल तखनहि भीन भाय-भैयारीक संबंध महीसक सींगक समान अछि जे जन्मभ लितहि पृथक् भ’ जाइछ।
भाय भउजाइपर बिकरम राजा भाय भौजाइ पर राजा बनब अर्थात् स्व छन्द रहनिहार व्य क्तिपर व्यं ग्यछ।
भाय भतीजा भरल छी, अन्नर बिना टगल छी घरमे संबंधीक अभाव तँ नहि अछि, मुदा अन्न क हेतु मुखापेक्षी छी।
भाय वैह जे बिपत्तिमे काज आबे यथार्थत: भाय वैह कहल जा सकैछ जे विपत्ति उपस्थित भेलापर काज अबैछ।
भाय सऽ जे करी चोरी, की हो निरधन की हो कोढ़ी जे व्यकक्ति भायसँ चोरि करैछ ओ निर्धन वा कोढि़ भ’ जाइछ।
भाय सन हित ने, भाय सन मुदइ ने भायक समान हित एवं दुश्मनन क्योव नहि अछि।
भाय सऽ ने जिती, भउजाइक कोंचा फारी भायसँ जखन परास्तह भ’ जाइछ तखन भौजाइक संग युद्ध प्रारंभ करैछ।
भार भरिया हगले धरिया भरियाकेँ ततबा भार भ’ गेलैक जे ओ धरियेकेँ घिना देलक।
भारी बियाज मूल के खाय उच्च दरक सूदिपर टाका ल’ कए कयल गेल व्या‍पारक मूल धन सेहो समाप्तओ भ’ जाइछ।
भारी मोटा सब अपने कपार जतेक भारी मोटरी अछि सब अपने माथपर ।
भितर तखन देबता पितर सर्वप्रथम लोक अपनाकेँ परितृप्तथ करैछ तत्पपश्चाात् देवताक आह्वान करैछ।
भिन भिन राज भिन्ना बेबहार भिन्नि-भिन्न राज्यवमे भिन्नब-भिन्न रूपक व्य्वहार होइछ।
भीख माँगि कऽ खाइ, बहिनीक दुआरि ने जाइ भीख माँगि क’ खायब नीक, बहिनक दरबज्जागपर नहि जयबाक चाही।
भीख माँगि कऽ खाइ, मुदा रहरी बोइन ने करी भीख माँगिक खायब नीक, मुदा राहडि़ बोइन करब नहि नीक ।
भीखमे भीख देली, तीन लोक जीति लेली निर्धन भीख दैछ तँ सोचैछ जे तीनू लोकपर विजय कयल।
भीखो माँगे आ आँखिओ देखबे जखन कोनो आदमी बल-प्रयोग क’ कए कोनो वस्तुदक माँग करैछ अथवा नीच आदमी रोब देखा क’ काज करैछ, तखन प्रयुक्त ।
भीतरीक फिट फाट देख रे नउआ, भीतरी महल हगइ छैन्हट कउआ घरक भीतर फिटफाट बड़ बेसी छनि तथा घरक भीतर कौआ बीट लगौने छनि।
भीतरी मारि सेहेजुआँ जाने जे व्यमक्ति सहनशील अछि वैह मारिक अन्त्र्वेदना बुझि सकैछ।
भीतिये लेबन बुढ़बे जेबन भीति नीपला पोतलासँ तथा बूढ़ खयला-पीयलासँ नीक रहैछ।
भुखले आन्हकर अघैले कोइरी भूखक कारणेँ आन्हहर बनल छी, अर्थात् आँखिक आगाँ अन्हाहर लगैछ तथा अत्यकधिक खा क’ कोइरी बनैछ।
भुखले आन्ह र खयने कोढि़ भूखक कारणेँ आन्हहर बनल, तथा भरिपेट भोजनोपरान्त आलस्यबक कारणेँ कोढि़ बनल अछि।
भुखले गेलहुँ बहु बेचे, अघेले कहलक बन्हेकी भूख लगलाक कारणेँ बहुकेँ बेचबाक हेतु गेलहुँ, किन्तुु जखन पेट भरि गेल तखन कहलहुँ जे हम बन्हबक राखय चाहैत छी।
भुखले सुमरी कोहबरक खीर भूख लगलापर कोहबरक खीरकेँ स्म रण क’ समय बितबैछ।
भुखले फक फक, खयने सक सक भूखल रहलापर लोक फक-फक करैछ, मुदा बेसी खयलापर अकसक करय लगैछ।
भुखले मन पड़े कोबराक खीर भूख लगला उत्तर कोहबरमे खायल खीर स्म रण होइछ।
भुट्टी लोक के घुट्ठीमे बुद्धि, पँच हत्थीु के ठरिआयल बुद्धि छोट खूटक लोककेँ घुट्ठी पर्यन्तर धरि बुद्धि रहैछ, किन्तु जे लम्बार रहैद ओकरा ओकर अपेक्षा बुद्धिक अभाव रहैछ।
भुन्नीा माछ के काँटे बड़, सगही के दुलारे बड़ भुन्नाा माछमे काँटक आधिक्य़ रहैछ आ सगही पत्नीद दुलारसँ छिडि़आइछ।
भुलली रे रघुआ, तोहर लाली पगिया हे रघु ! तोहर लाल पाग देखि क’ हम भूलि गेलहुँ।
भुलि गेलहुँ राग रंग भुलि गेलहुँ छकड़ी, तीन चीज मन रहल नोन तेल लकड़ी संपूर्ण राग-रंग अर्थात् ऐश-मौज बिसरि गेलहुँ।
भुसकउल विद्यार्थी के बस्ताग मोट जे पढ़बा-लिखबामे मन्द‍ बुद्धिक रहैछ ओकर बस्ताद मोटगर होइछ।
भुखल की ने करैछ जे भूखल अछि ओ किछु क’ सकैछ।
भुखल बानर खम्हाि नोचे बानर भूखल अछि तँ खम्हा नोचि रहल अछि।
भूख ने जाने जात कुजात, पिआस ने जाने धोबी घाट, नीन ने माने टूटल खाट भूखल व्यीथ्कततक हेतु जाति कुजातिक ध्या न नहि रहैछ, पिसासल व्यतक्ति धोबीघाट नहि बुझैछ आ निन्दहसँ मातल व्यपक्ति टूटल खाट नहि देखैछ।
भूख ने माने छूछ भात, नीन ने माने टूटल खाट भूख लगलापर छूछ भात सेहो नीक लगैछ तथा नीन लगलापर टूटल खाटपर सेहो नीन आबि जाइछ।
भूख मरे तऽ सातु खाय, मरली बहुक नइहर जाय सातु भूखमरीमे त्राण पयबाक निमित्त खायल जाइछ।
भूखमे गुलरि मेबा भूखल रहलापर गुल्लारि सेहो मेवा सदृश प्रिय लगैछ।
भूखल बंगाली भात भात बाजे भूखल बंगाली भात-भातक सतत रट लगौने रहैछ।
भूखल बापक धनपति बेटा धनवान बेटाक बाप भूखल मरल।
भूखलमे केबाड़ पापर भूखल रहलापर तुच्छर वस्तुो सेहो अनूप लगैछ।
भूखल सियार के पकुआ मेबा भूखायल सियारकेँ पकुआ सेहो मेवा सदृश बुझना जाइछ।
भूख सलोरे आगि धिधोरे भूख लगलापर भोजनोपरान्ते अत्येधिक आनन्दग होइछ, कारण ओ गलामे नहि अँटकैछ।
भुजा जरि गेल भार ला मारि भूजा भुजबाक हेतु देने छलहुँ ओकरा तँ जारि देलक, किन्तुँ ओ भारक हेतु मारि क’ रहल अछि।
भूजा सगरो भुजाओल, मुदा भार हमही लेब भूजा कतहु किएक ने भुजाओल गेल ताहिसँ कोन प्रयोजन, किन्तुम ओकर भुजाइ अर्थात् भार हमहीं लेब।
भूत के पाथरक चोट ने लागैछ भूतकेँ पाथर पर्यन्त क चोट नहि लगैछ अर्थात् ओकरापर कोनो प्रभाव नहि पड़ैछ।
भूल चूक लेनी देनी कोनो हिसाबमे कोनो प्रकारक त्रुटिक परिमार्जनक लेल प्रयुक्तर होइछ।
भूसा लेबऽ तऽ गहूँम दऽ, गहूँम देबऽ तऽ भूला लऽ भूस्साऽ लेबाक अछि तँ गहूँम दिअ तथा गहूँम देबाक अछि तँ भूस्सात लिय ।
भेख न पिबय कुसुम मकरन्दस गुणज्ञे गुणीक आदर करैछ।
भेखे भीख भेटैछ वेश-भूषाक अनुरूपेँ भीख भेटैछ।
भेटे सुपारी ने तोड़ी सुपारी सुपारिसँ भेट नहि छनि, मुदा गप्प हाँकि रहल छथि जे हम सुपारी फोडि़ सकैत छी।
भेडि़या धसान कोनो कार्यक संपादनार्थ अत्यिधिक भीड़ एकत्रित भेलापर व्यंरग्य ।
भेड़ी गेल भनसार, अर्र अर्र लगले अछि भेड़ी तँ भनसाघरमे चल गेल, मुदा लोक अनेरे ओकरा एखन धरि बजा रहल अछि।
भेल ने गेल छौड़ा पूत देखिये लेल कोनो प्रकारक सिद्धि तँ नहि भेल, मुदा ओ चाहैछ से क’ लेलक।
भेल पूत मरल जाय, ढीढ़ ला ओझाइ जन्मप लेलक ओ तँ मरि रहल अछि, किन्तुि गर्भक हेतु झाड़-फूक चलि रहल अछि।
भेल बिआह मोर करबह की, धीया छोडि़ कऽ लेबह की विवाह तँ सम्पकन्न, भ’ गेल आब हमर की करब ? बड़ बेसी हैत तँ हमर बेटी, जकरासँ अहाँक विवाह भेल अछि तकरा ल’ जायब।
भेल बेटी गेल सिंगार, भेल सउतिन भेल सिंगार एहन धारणा अछि जे बेटीक जन्मतक पश्चाात् मायक श्रृंगार समाप्तक भ’ जाइछ, किन्तुर सौतिन भेलापर ओ अपनाकेँ श्रृंगारसँ सजबैछ।
भेल भानसमे दूटा पाहुन, झोड़मे तकलहुँ तऽ घण्टोम ने भानस भेलापर पाहुनक आगमनसँ गृहपतिक हेतु भोजनमे समस्याग होइछ, तँ प्रयुक्तह।
भोग तऽ साधन जोग भोगसँ नीक योगसाधन थिक।
भोजक आगू रनक पाछू खैबा-पीबामे आगाँ तथा मारिपीटमे पाछाँ रहनिहारकेँ लाभ होइछ।
भोज कतहु घमगज्जहर कतहु भोज कतहु भ’ रहल अछि तथा हल्लास कतहुक।
भोजक बेरमे कुम्ह’ड़ रोपब भोजक अवसरपर कुम्हइड़ रोपल जाय जे ओकर फलसँ तरकारीक काज चलत।
भोज ने भात नइहरक समाद भोज भातक कतहु पता नहि, किन्तुे ओकर संवाद नैहर चल गेल।
भोज ने भात हर हर गीत कोनो भोज भातक आयोजन नहि भ’ रहल अछि ।
भोज भोज कऽ कुटल धाना, जेहन भोज भेल जे क्योत ने जान भोज अछि तेँ प्राणान्त क’ कए धान कुटलहुँ, किन्तु़ जखन खयबाक बेर भेल तखन वंचित क’ देल गेलहुँ ।
भोजमे ओज की भोजमे कृपणता करब उचित नहि।
भोजैतिन कानथि कनेक माड़ ला जे भोज कयलनि वैह कनेक माड़क हेतु कानि रहल छथि।
भोनू भाब ने जाने, पेट भरन सऽ काज सोझमतिया व्यजक्ति दुनियाँक हाल की जनैछ? ओकरा मात्र प्रयोजन रहैछ जे कोहुना हमर पेट भरय।
भोरक सपना सत्त भोरक स्वाप्न सत्य होइछ, एहन लोक मान्यसता अछि।
भोर भेल मनखु सब जागल, हुक्काछ चिलम बाजे लागल प्रात भेलापर प्रत्ये क व्य्क्ति अपन-अपन काज-धन्धा्मे लागि गेल तथा हुक्काि चिलम बाजय लागल।
भैंसक आगाँ बीन बजाबे, भैंस रहल पगुराय मूर्खकेँ कोनो प्रकारक ज्ञानक गप कहब निरर्थक भ’ जाइछ।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...