Sunday, February 07, 2010

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मोहावरा वाक्यर प्रयोग पहिल पंक्ति मात्र
अंगरेजी ने फारसी बाबूजी बनारसी

यद्यपि अंग्रेजी एवं फारसीक कोनो जानकारी नहि छनि तथापि अपनाकेँ बनारसक रहनिहार कहैत छथि।
अंडा पेटेमे रहल ता बच्चाा उडि़ गेल अंडा एखन पेटमे अछि तावत ओहिसँ निकलि क’ उडि़ गे।
अंडा सिखाबे बच्चा के, चें चें ने कर अंडा बच्चाेकेँ संबोधित क’ कहैछ जे ‘एखन चें चें नहि कर’।
अंडा सेबे केओ, बच्चा लेबे केओ अंडाक भरण-पोषण कयलक क्योल, मुदा जखन बच्चा तैयार भेल तँ ओकरा आन व्य क्ति ल’ लेलक।
अंडीक खेतमे बघंडीक खम्हा’ अंडीक खेतमे ओकर बघंडीक खम्हा लगाओल गेल।
अंडी के कोरो बघंडी के बाती, केहन घर छारले रे पोदिनमा के नाती पोदिनमाकक नाती एना घर छाड़लक, जाहिमे अंडीक कोड़ो तथा बघंडीक बत्ती लगौलक।
अंत भल तऽ सऽ सब भला कार्य प्रारंभ कयल गेल ओकर समाप्ति धरि जँ नीक रहैछ, तँ बुझबाक चाही जेसब ठीके अछि।
अँगुरी काटि कऽ घाब आङुर काटि क’ घाव क’ रहल छथि।
अँचरापर एकन्नी ,साँयक कोन कम्मी। जाधरि युवावस्थाघ अछि ताधरि स्वा मीक अभाव नहि रहत ।
अइठें कुइठें गोनुआ मोट अँइठ-कुइठ खा क’ गोनू मोट बनि गेल।
अँइठैत छी माँठल छी , सिक्काो झुलैत छी हम अँइठल छी, माँठल छी तँ सिक्कानपर झुलैत छी।
अकरहर करब जे कहियो ने भेल अछि एहन कार्य कयनिहारकेँ लक्ष्यछ क’ कए कहल जाइछ।
अकाल नहि काल अछि अकाल नहि पड़ल अछि, प्रत्यु त साक्षात् काल आबि गेल अछि घनघोर अकाल भेलापर कहल जाइछ।
अकास काँकोड़ जकाँ मुह बनायब विचित्र रूपक आकृति-प्रकृति कयनिहारकेँ लक्ष्यर क’ कए कहल जाइछ।
अकीलक कोताही कोनो कार्यक संपादनार्थ संपादनार्थ बुद्विक कृपणता कयलापर कहल जाइछ।
अकील जऽ बजारमे भेटैत, तऽ केओ मुरखे ने रहैत बुद्धि जँ बजारमे भेटैत तँ सब केओ बुद्धिमान बनि जाइत।
अकीलमन्‍द के इसारा काफी बुद्धिमानक हेतु इशारा पर्याप्ती होइछ।
अकीलमन्दन के इसारा, मुरुख के थापड़ बुद्धिमान व्यतक्तिकेँ संकेत कयलापर ओ यथार्थाताक विषयमे बुझि जाइछ, किन्तुा मूर्खकेँ जाधरि थापड़ मारि क’ नहि बुझाओल जाइछ ताधरि ओ नहि बुझैछ।
अकुलिनि बिआही, कुलक उपहास अकुलीनक ओतय विवाह कयलासँ कुलक उपहास होइछ।
अकेले मियाँ कानता, कि कबर खनता देo एकसरे मियाँ कबर खोदिहें कि कनिहैं
संo स्त्रीम रतनं दुएकुच्चाैदपि मनु

अक्का मे चक्काम, साँय के कहलहुँ कक्का स्वेाच्छाकचारी वयक्ति जँ निरर्थक समबोधन करैछ, तँ प्रयुक्ता।
अखार मास पूनी उमस बादल घेरे चन्द , घाघ कहे घाधिन से होबे परमानन्द‍ आषाढ़ मासक पूण्रिमाक दिन अत्यहधिक गर्मी पड़ैछ तथा चन्द्रिमा मेघसँ घेरल रहैछ, तँ घाघ घाघिनसँ कहैछ, ‘एहि वर्ष नीक वर्षा होयबाक उपजा नीक हैत आ ालोक आनन्द मनाओत।
अखारमे घुमि फिरि मलपुआ खाय,अगहनमे पुछैछ जे कतेक भेल आषाढ़ मासमे घुमैछ-फिरैछ एवं नीक-निकुत सर-कुटुम्बछक ओतय खयबामे समय व्युतीत करैछ आ अगहनमे जिज्ञासा करैछ जे कतेक उपजा भेल ? तात्पजर्य जे आषढ़मे कोनो कार्य नहि करैछ ओ अगहनमे फसिल कतयसँ काटत ? यथासमय परिश्रम नहि कयनिहारपर व्यंछग्यथ।
अगड़म बगड़म काठ कठम्ब र बिनु कोनो अर्थक बात कयनिहारपर व्यं ग्या।
अगता खेती अगता बेटा अग्रिम कयल खेती तथा अग्रिम बेटा प्रत्येकक दृष्टिएँ लाभप्रद होइछ।
अगता खेती आगे आगे, पछता खेती भागे जोगे प्रारंभिकावस्थागमे कयल गेल खेती उत्तम होइछ, किन्तुम देरीसँ कयल गेल खेती भाग्यंक संयोगसँ उपजि जाइछ।
अगता खेती पछता बेटी अगता खेती निश्चबये लाभप्रद होइछ, मुदा पछतिया बेटी भेलापर पश्चाचत्ताप होइछ।
अगरसोची सदा सुखी जे पहिने खूब सोच विचारि क’ कार्य करैछ तँ ओ सतत सुखरी रहैछ।
अगरायल बेटी बरक आँखि फोड़े अत्ययधिक दुलारू बेटी अपन स्वाकमीक आँखि फोड़बाक हेतु सतत तत्प र रहैछ।
अगस्तिक जात्रा कोनो कार्यकेँ विलम्ब सँ सम्प न्नव करबाक स्थितिमे प्रयुक्तम।
अगहन अमाबस चइतक आठ, जतय जतय मन करे ततय ततय काट अगहनक अमावास्यात तथा चैत्रक कृष्ण् पक्षक आठ दिन बितलापर धान एवं रब्बी क कटनी करबाक चाही, अर्थात फसिल पाकि क’ तैयार भ’ जाइछ।
अगहन उपास कालक कोन डर जँ अगहन माससँ उपवास प्रारंभ भ’ गेल तँ कालसँ कतेक काल धरि लोक डेरायत ? अगहनमे ध्नतकटनी होइछ।
अगहन घटल झखब कतेक जँ अगहनेसँ खर्ची घटि गेल तँ कतेक डेरायब ? आगाँक चिन्ता भगवानक हाथमे छनि, कारण सालो भरि उपवासक ई पर्व लगले रहत।
अगहनक तेरह चइतक आठ, जतय जतय मोन करय ततय ततय काट तेरह दिन अगहन बितलापर तथा आठ दिन चैत्र बितलापर ध्न कटनी एवं रब्बी क कटनी प्रारम्भल भ’ जाइछ।
अगहन दुन्ना् पूस सबाइ, माघ मास घरहुँ सऽ जाइ अगहनमे वर्षा भेलापर रब्बीटक दुन्नास होइत अछि।
अगहन मे जे बरिसे मेघ, धन ओ राजा ध्नज ओ देस धन्य ओ राजा थिकाह जनिका राज्यामे अगहन मासमे वर्षा होइछ।
अगहनमे मूस के सात बहु अगहनमे मूसकेँ सेहो सात पत्नी होइछ।
अगहनमे मूसो के तेरह टा बहु तुo अगहनमे मूस के सात बहु
अगुतयले कतहु गुल्लमर पाकल अत्यमधिक शीघ्रता कयलासँ गुल्लर नहि पाकि सकैछ।
अगुतायल कुम्हैिन टीट सऽ माटि खूने देo अगुतायल कुम्है न नह सऽ माटि खूने
अगुतायल कुम्हैिन नह सऽ माटि खूने अगुतायल कुम्हैिन नहसँ माटि खूनब प्रारंभ करैछ ।
आगि लगा छउड़ी बड़ तर ठाढ़ आगि लगा क’ छौंड़ी गाछक नीचाँमे ठाढ़ भ’ तमाशा देखि रहल अछि।
अगिला के घास ने पछिला के पानी जे आगाँ अछि तकर सम्मा न नहि भ’ रहल अछि, मुदा पछिला व्यिक्तिकेँ अत्यअधिक सम्मादन भेलापर कहल जाइछ।
अगिला खेती आगाँ आगाँ, पछिला खेती भाग संजोगे पहिने कयल खेती प्रत्येदक दृष्टिसँ लाभप्रदा होइछ,य मुदा बादमे कयल खेती भाग्यँवश वा संयोगेसँ नीक होइछ।
अगिला भेल पछिला, पछिला भेल अगिला आगाँक व्य क्ति पडि़ गेल तथा पाछाँ जे छल ओ आगाँ भ’ गेल ।
अगिया खढ़ खा जनमौने अछि ककरो नेना-भुटका जखन अगत्ती सदृश करैछ तखन ओकर व्यभवहार देखि क’ ओकर माय-बापकेँ लक्ष्य क’ कहल जाइछ।
अघायल बगुला के पोठी तीत बगुला अघायल अछि तँ ओकरा पोठी माछ पर्यन्तघ तीत लागि रहल छैक।
अघायल भैंस तइयो अढ़ाय कट्ठा महीस अघायल अछि अर्थात् ओकर पेट भरल छैक तथापि अढ़ाय कट्ठा फसिल खा जाइत अछि।
अच्छ त थोर देबता बहुत अक्षत कम अछि, मुदा देवताक संख्याे अय्ष धिक।
अछइत अन्न् रहे उपास अन्न रहितहुँ उपास पड़ैछ।
अछइत नुआ जाड़े मरे वस्त्रु रहितहुँ काँपि रहल अछि।
अछइत नुआ सहोदर नाँगट वस्त्रु रहितहुँ सहोदर नाँगट अछि।
अछोह कुकूर भूकब बिनु कोनो आधारक कुकूर नहि भूकैछ।
अछूता दूधक बिलाइ रखबार बिलाइ थोड़बे जनैछ जे कोन दूध अछूत अछि आर कोन दूध छतायल।
अजगर के दाता राम अजगर सदृश विशाल जानवरकेँ सेहो भगवान भोजन दैछ।
अज्जनर चूल्हाक चूल्हा। छब्बेत मास पजरेला, हमहूँ पंडित धैरजधारी बरख दिन रहेला परिस्थिति विपरीत भेलापर धैर्य धारण कयनिहार लोभी व्य क्तिक प्रसंगमे प्रयुक्तब होइछ।
अटकत से भटकत जकरा काज रहैछ ओ दौड़ैत अछि।
अड़कल कनिया के चड़कल बर कनियाँ एवं वन समान रूपेँ मूर्ख अछि।
अडि़या नघाओ एतेक बेसी वर्षा हैब जे आरिक ऊपरसँ पानि बहय लागय।
अडि़या बड़द जंजाल अंडकोषबाला बड़द अर्थात् साँढ़ गृहस्थ।क हेतु जपाल भ’ जाइछ।
अढ़नी दुसलनि बढ़नी के, सूप दुसलनि चलनी के,
जनिका सहस्सिर गो छेद, अढ़नी बढ़नीक एवं सूप चालनिक परस्प र निन्दाब कयलक जे हास्यारपद अछि, कारण ओकर स्वढरूपे एहि विषयकेँ स्पाष्ट, करैछ।
अढ़ब गढ़ब सिक्काव चढ़ब, टूटत सिक्का भुँइयाँ खसब अत्ययधिक प्रयासोपरान्त तँ सिक्का‍पर चढ़लहुँ अर्थात् अत्ययधिक ऊँच पदपर चढलहुँ, परन्तुा साधनक समाप्ति भेलापर पतन भ’ जाइछ।
अढ़ाय हाथक ककड़ी, नो हाथक बीया ककड़ी तँ अढ़ाय हाथक अछि, मुदा ओकर बीया नौ हाथक अछि।
अति भक्ति चोरक लच्छिन अत्यभधिक भक्ति क्योन ककरो प्रति प्रदर्शित करैछ, तूं बुझबाक चाही जे पश्चापत जा क’ ओ अधलाह करत।
अतिसय बुद्धि बेयाधिक लच्छकन अत्ययधिक बुद्धि सेहो नाना प्रकारक रोगक लक्षण निर्देश करैछ।
अतिसय लोभ बकुलबे कीन्हा , छनमे परान ककोड़बे लीन्हान बगुला अत्य्धिक माछक हेतु लोभ प्रदर्शित करैछ तकर परिणाम होइछ जे एकिहि क्षणमे काँ कुर ओकर प्राण ल’ लैछ।
अददीक चानन लिलार चरचराय कृपण व्यनक्तिक चानन लगौलासँ ललाट चरचाय लगैछ।
अदन्त घोड़ी दू दन्त गाय,माघ महिना भँइस बियाय, सब मिलि गिरहथ के खाय, बिनु दाँतक घोड़ी, दू दाँतक गाय एवं माघ मासमे जँ महीस बिआछ, तँ ओ सब मिल क’ गृहस्थीक विनाश करैछ।
अदरक बड़ सुख,कलउलक बड़ दुख जतय अत्य धिक आदर-सम्मा।न होइछ ततय कलउ अर्थात् भोजन काल ममा्रन्तअक पीड़ा होइछ।
अदर काकी, छरहर पाकी आर्द्रा नक्षत्रमे वर्षा भेलापर खेतमे पाँक अधिक होइछ।
अदरा गेल तीन गेल सन साठी कपास, हथिया गेल सब गेल अगिला पिछला आस, आर्द्रा नक्षत्रमे होइछ तँ सन, साठी एसं रुदयाक उपला नहि होइछ, किन्तुा हस्तद नक्षत्र मे जँ वर्षा नहि भेल, तँ आगाँ-पाछाँ अर्थातद्य धान एवं रब्बी क आशा विलीम भ’ जाइछ।
अदरा धान पुनरबस पइया, गेल गिरहथ जे बोए चिइया आर्द्रा नक्षत्रमे जँ वषा्र होइछ तँ सन, साठी एवं रुइयाकह उपजा नहि होइछ, किन्तुर हसत नक्षत्र में जँ वर्षा भेल, तँ आगाँ-पाछाँ अर्थात् धान एवं रब्बी्क आशा वि‍लीन भ’ जाइछ।
अदरा धान पुनबस पइया, गेल गिहथ जे बोए चिरइया आर्द्रा एवं पुनवसफ नक्षत्रमे जँ कदाचितद्य वर्षा नहि होइछ तँ गृहस्थ् धान कोना रोपत ? ओकरा पश्चातत्ताप करय पड़ैछ।
अधजल गगरी छलकत जात घैलमे पानि आधा अछि तँ छिलकि रहल अछि।
अधरम सऽ धन नहि अधर्म कयलासँ धन नहि भ’ सकैछ।
अधिक जोगी मठ उजार योगीक संख्या मे अधिकता भेलासँ उजडि़ जाइछ।
अधिक भक्ति चोरक लच्छयन देo अति भक्ति चोरक लच्छछन
अधिक सेबा ओछ फल सेवा तँ बेसी कयल,मुदा ओकर फल तदनुरूप नहि भेटलापर प्रयुक्त ।
अनकर आटा अनकर घी, चाबस चाबस चाबस बाबा जी दोसराक आटा, दोसराक घी रहैछ तँ भानस कयनिहार बाबाजी स्वे च्छा सँ रान्हैाछ।
अनकर आस परे उपास, अपन आस कर कबिलास दोसरापर आशा लगौला सन्ताय सतत उपवासे होइछ।
अनकर करम कहाँ पाइ, अपन करम माथा चढ़ाइ दोसराक भाग्यँकेँ के पाबि सकैछ ? अपन जे कर्म अछि तकरे माथपर चढ़यबाक चाही।
अनकर कूटल अनकर पीसल, पहुँचा धरि भीतर पइसल दोसराक द्वारा कूटल आ पीसल जाय तखने हाथ पहुँचा धरि मुहमे जा सकैछ।
अनकर केराइ मूड़ केओ चिबाइ दोसराक केराओ जँ मंगनीमे भेटि जाय, तँ माथमे पीड़ा ।
अनकर कैल धैलपर जय जगरनाथ दोसराक द्वारा जँ बनाओल जाय तँ जय जगन्ना थ अर्थात् भोजन करबामे कोन आपत्ति? आन द्वारा सब कार्य कयल जाय फल प्राइज़ हेतु उपस्थित रहैछ, तँ व्यंाग्ये।
अनकर खहियऽ गा बजा कऽ, अपन खहियऽ टट्टी लगा कऽ दोसराक ओतय खयबामे लोक निर्मम भ’ जाइछ, किन्तुन वैह जँ भोजनार्थ ओकरा लग उपस्थित होइछ तँ ओ अपना बेर टाट लगा लैछ।
अनकर खेती अनकर गाय, ओ पापी जे मारल जाय आनक खेतमे आनक गाय चरि रहल अछि जाहिसँ हमरा कोन प्रयोजन जे हम ओकरा मारि क’ हटाबी ? निष्प्रओयोजन ककरो कोनो कार्यमे हस्क्षे प नहि करबाक चाही।
अनकर गहना छाले ने, छीन लेबे तऽ लाजे ने अनकर आभूषण कथमपि शोभा नहि दैछ।
अनकर गोर धोय नउनियाँ, अपन धोइत लजाय विवाहादिक अवसरपर हजाम वा हजामिन अनकर पैत तँ धो दैछ, मुदा अपन धोयबाक जखन अवसर अबैछ तँ लजा जाइछ।
अनकर घर थूको के डर, अपन घर भरिपोख हग आनक घरमे थूक फेकबामे सेहो डर होइछ, मुदा अपन घरमे सब सर्वतन्त्रर स्वभतन्त्रय रहैछ अर्थात् इच्छारनुरूपे काज करैछ।
अनकर चीज चमकउआ, छीन लेत तऽ मुह भऽ जायत कउआ दोसराक कोनो वस्तु नीक अवश्यत लगैछ, किन्तु जखन ओ ल’ लैछ तँ पहिरनिहारक मुह कौआ सदृश भ’ जाइछ।
अनकर चूड़ा दहीपर जय जगरनाथ चूड़ा-दही तँ आन व्यथक्तिक छैक तखन हमरा भोजन करबामे कोन आपत्ति? दोसरा द्वारा देल भोजनपर ‘जय जगन्नाकथ’ करबामे निर्लज्जपता प्रदर्शित कयनिहारपर व्यंमग्य ।
अनकर चोकर अनकर घी, ओझा बाप के लगतनि की चोकर आ घी आनक अछि, तँ ओढाल बापकेँ की लगत नि ? आनक वस्तुपकेँ निर्ममतापूर्वक खच्र कयनिहारपर व्यंलग्यप।
अनकर जनमल ने अप्प्न होय दोसराक जनमल सन्ता्न कहियो अपन नहि भ’ सकैछ।
अनकर डाबा अनकर घी, हमरा अहाँ के लागँए की बासन अनकर अछि, घी सेहो दोसरिेक तखन ओकरा परसबामे हमरा अहाँकेँ की लगैछ? आनक वस्तुँक निर्ममतापूर्वक उपयोग कयलापर व्यंनग्य ।
अनकर दालि चाउर अनकर घी, अनका परसबामे लागे की जखन चाउर, दालि एवं घी सेहो दोसरेक अछि तथा परसबाक अछि दोसरेकेँ, तखन हमरा की लगैछ? अन्यो व्य क्तिक सम्पित्तिकेँ निष्ठुीरतापूर्वक व्ययय कयलापर व्यं्ग्य्।
अनकर दालि चाउर अपन पेट,
बहुत दिनपर भेल अछि भेट चाउर एवं दालि दोसराक अछि, मुदा पेट तूं अपनहि अछि।
अनकर धनपर चोर राजा अनकर धन खर्च करबामे कोनो ममता नहि रहैछ।
अनकर धनपर बिरम राजा अनका संपत्तिपर अपनाकेँ विक्रमादित्यत राजा घोषित करैत अछि।
अनकर धनपर लछमी नारायन दोसराक धनकेँ निर्ममतापूर्वक उड़ायब वा आकर दुरुपयोग करबाक स्थितिमे कहल जाइछ।
अनकर धन पाबी, तऽ नौ मन तउलाबी अनकर ध्नप जँ भेटय तँ नौ मन तौला लेल जाय।
अनकर पहिर कऽ साजे बड़, छीन लेलक तऽ लाजे बड़ आनक वस्त्राेभूषण धारण करब निश्चकये नीक लगैछ, किन्तुा जखन ओ अपन वस्त्राछभूषण ल’ लैछ तखन लोक लज्जित भ’ जाइछ।
अनकर पूत माछ मारे तऽ नयन नोर,अपन पूत माछ मारे तऽ पात बहे झोर अनकर काजपर ईर्ष्यात आ अपन सब काज प्रिय होइछ, तँ कहल जाइछ।
अनकर बडुकी अनकर घी, हमरा अहाँ के लागय की, बडुकाय सुआहा बासन एवं घी सेहो आनक अछि।
अनकर बेटी आन सन, अपन बेटी परान सन दोसराक बेटी आने सदृश होइछ, किन्तुक अपन बेटी प्राणसँ बढि़ क’ होइछ।
अनकर भतापर तीन टिकुली, दोसराक स्वाकमीपर एक के कहे तीन-तीन टा टिकुली सटैछ।
अनकर मद अनकर महुआ, नाचे चोर बजाबे सहुआ अन्ये व्यकक्तिक शराब अन्य व्यीक्तिक महुआ, शराब पिबनिहार चाेरक समान नृत्य करैछ तथा बेचनिहार साहु आनन्दित अछि।
अनकर सुधर बर पानीक हिलकोरा, अपन कुबज बर सतुआ भरि कौरा आनक सुन्दबर स्वारमी पानिक हिलकोर सदृश क्षणहिमे विलीन भेनिहार होइछ, किन्तु् अपन कुब्जाा वर सतुआक कौर सदृश प्रिय होइछ।
अनकर सुनरी लौड़ाक मुनरी, अपन कानी सुते चितानी आन व्युक्तिक सुन्दारि स्त्रीन बेकार होइछ।
अनकर सुन्नचर बर पानीक हिलकोरा, अपन कुबज बर लऽ सुतब कोरा दोसराक सुन्द‍र वर पानीक बुलबुला सदृश होइछ, कारण ओ क्षणहिमे बनैछ तथा विलीन भ’ जाइछ।
अनकर सेनुर देखि, अपन कपार फोड़े दोसराक सिउँथपर सिन्दु र लागल देखि अपन कपार फोड़ब सर्वथा निराधार अछि।
अनकर हजार, हमर चूल्हिक पजार दोसराक हजारक हजार वस्तु हमरा हेतु चूल्हिक छाउरक समान थिक।
अनका उमते हँसी, अपना उमते कानी दोसरक ओतय जँ कोनो विपत्ति पडैछ तँ सब हँसैछ, किन्तुप अपना ओतय जँ क्योू सनकि जाइछ, तँ सब कनैछ।
अनका कमाइपर तीन टिकुली दोसराक कमायल धनपर तीन टिकुली सटैत अछि।
अनका कमाइपर नून बुकबा आनक कमायल धनपर मौज उड़बैछ।
अनका दूस गे लड़ी, अपना तऽ जड़ल बड़ी दोसराकैँ दुसबामे तँ अग्रगण्यअ रहैछ, मुदा अपने तँ जड़ते बड़ी पकौलनि अछि।
अनका दूस गे लबड़ी, अपना तऽ काँचे बड़ी क्यो लबड़ी स्त्रीिकेँ कहैछ, अहाँ आनक निन्दाू किएक करैत छी ? अपने तँ काँचे बड़ी पकौलहुँ अछि।
अनका पंडित कहि सुनाबै, अपना बेरमे मुह बनाबै दोसाराकेँ उपदेश देब आसान अछि, किन्तुँ अपना बरमे सब सिद्धान्ता समाप्त भ’ जाइछ।
अनकापर ढेप चलाबे, तऽ अपनापर बज्जपर खसारबे जे दोसरापर ढ़ेप फेकैछ तकरापर भगवान बज्र खसबैत छथि।
अनका पाँडे दिन देखथि, अपने सुख जे बू‍कथि पंडित दोसराकैँ नीक दिन देखि दैछ, मुदा स्वियं काज अधलाहे दिनमे करैछ।
अनका पाबनि हमरा की, एतेक देतन हैत की दोसराक घरमे पाबनि-तिहार भ’ रहल अछि ताहिसँ हमरा कोन प्रयोजन? एतेक हाथ उठा क’ देत ताहिसँ हमरा की हैत ?
अनका बंसे बंस बने, अपना बंसे बंस डूबे जहिना नीक कुल-शीलमे कयला सन्ताे वंश बनि जाइत अछि तहिना दोसराक अधलाह वंशक संग सम्पतर्क भेलासँ अपन वंश सेहो डूबि जाइछ।
अनका बेत्थे हँसी, अपना बेत्थेव कानी दोसराक पीड़ापर लोक हँसैछ, किन्तुे वैह पीड़ा जखन अपन माथपर अबैछ, तँ लोककेँ वास्तनविकताक आभास
अनका बेर दबको , अपना बेर हबको जखन ककरो किछु देबाक प्रश्नक उपस्थित होइछ तखन तँ नुका रहैत अछि, मुदा जखन किछु लेबाक बेर अबैछ तँ बिनु बिचारने असन्तो षी सदृश हबकि लेबाक हेतु प्रस्तु त रहैछ।
अनका मड़बा बड़ बड़ गाल, अपना मड़बा चुतर पर हाथ दोसराक विवाह-मंडपपर बड़ पैघ-पैघ कथा कहबाक लोलक अभ्या-सी रहैछ, किन्तुघ अपना ओतय जखउन विवाह होइछ तखन सब उपदेश समाप्ति भ’ जाइछ।
अनका लोमरिया सगुन बताबे, अपने कुत्ता से नोचबाबे लोमड़ी तूं आनकेँ सगुन बतबैछ, मुदा अपनाकेँ कुकूरसँ नोचबबैछ।
अनखाती बहुरिया के, पसेरी भरिक कौर अल्पतभोजी कनियाँ एक-एक पसेरीक कौर मारैत अछि।
अनजान रहला सऽ दुरनामो नीक अपरिचित रहलासँ नीक अछि दुर्नामी भ’ प्रसिद्धि पाबी।
अनजान सुजान महाकलियान मूर्ख एवं ज्ञानी समान रूपेँ रहैछ।
अनठउनीद मउगी के सात टा साँय, घुरि कऽ देखलक तऽ अपन साँय अनठौनी स्त्री केँ सात स्वा’मी रहैछा, किन्तु जखन अपन स्वा‍मीपर नजरि पड़ैछ तखन सती-साध्वीर बनि जाइछ।
अनदेखल चोर बाप बरोबरि जाहि चोरकेँ देखि नहि सकलहुँ ओकरा बापक समान मानबाक चाही, कारण जँ ओ पकड़ायल नहि तँ ओहि सोचबे निराधार अछि।
अन धन अनेक धन, सोना रूपा कतेक धन अन्‍ने वास्तोविक संपत्ति थिक।
अन धन लछमी घर आउ, दरिदरा बाहर जाउ लक्ष्मीउक आगमनक हेतु प्रतिक्षित रहब आ दरिद्राकेँ बाहर करबाक प्रयास प्रत्येतक व्यदक्ति करैछ, तँ प्रयुक्त ।
अन बिनु कल नइ, साँय बिनु पल नइ अन्नानभावमे लोक जीवित नहि रहैछ तथा पतिक अभावमे स्त्रीे एक क्षण नहि रहि सकैछ।
अनमहो बिआह कोंकड़ी सिनूर अन्योमनस्क विवाहमे तँ सींथक बदला कनपट्टीमे सिन्दू्र पड़ैछ।
अनरीतक रीत, बानर गाबे गीत नियमक विरुद्ध कार्य करब ओहने होइछ जेना बानर गीत गबैत अछि।
अनि से संग नै, तीन सेर से कम नै नियमक विरुद्ध कार्य करब ओहने होइछ जेना बानर गीत गबैत अछि।
अन से संग नै, तीन सेर से कम नै जकरा अन्न सँ कहियो भेट नहि होइछ, ओकरा जखन भेटैछ तखन ओ तीन सेरसँ कम नहि खाइछ।
अनहिसका के चन्दतन भौंह चरचराबे अनभ्याासक चानन लगैलासँ भौंह चरचाय लगैछ।
अनायासे घरमे साँप खसि पड़त तऽ छोड़ब किएक बिना कोनो प्रयासक जँ अनुपलब्ध वस्तुन भेटि जाय तँ ओकरा छोड़बाक प्रश्नो कमत उठैछ ? लोक ओकरा स्वी्कार करैछ।
अनुरागी पिया जाड़ होइये, उठ नरही आगि ताप पत्नीा पतिसँ कहैछ, ‘ हमरा बड़ जाड़ भ’ रहल अछि’ ।
अनेर गाय के राम रखबार अनाथ गायक रक्षक थिकाह।
अनेर बाबू जन लेब, नइ सात बापते हम अपने छी असहाय व्यीक्ति कार्यक खोजमे जिज्ञासा करैछ तँ उत्तर भेटैछ, ‘ हम सात बापते हम अपने छी।‘
अन्तप भला तऽ सब भला कोनो कार्यक जँ अन्तऽ बढि़याँ भ’ जाइछ तँ पछिला सब गलती क्षम्य भ’ जाइछ।
अन्ती बदलि कऽ खन्तीय अपन पुस्तैलनी वस्तु़केँ समाप्तज क’ अधलाह वस्तुु प्राप्त करब।
अन्नुक लकड़ी कन्न्क घी, हमरा अहाँ के लागय की अन्ना एवं घी दुनू वस्तुर दोसराक अछि तखन हमरा अहाँकेँ की लगैछ ? अर्थात् जेना जे भ’ रहल अछि ओ होमय दिऔक।
अन्न नै खैतौं, तऽ देबते कहैतौं अन्न मनुष्यौक हेतु अनिवार्य अछि, किन्ुिन देवताकेँ एकर पयोजन नहि पड़ैछ।
अन्ना भरल बुढि़या, साग भरल पथिया जहिना नीक-निकुत खयलापर बूढ़ बेसी दिन जीवित रहैछ तहिना एक पथिया साग रान्हीलापर भरि घर होइछ।
अन्नहमुख घरमे नाती भतार जाहि घरमे नातीकेँ पतिक समान होइछ तकरा सत्येन अनुपम कहल जा सकैछ।
अन्नेस तारैछ, अन्ने मारैछ नियमित रूपेँ आहार कयला सन्ताअ स्वानस्य्हा ठीक रहैछ, किन्तुन अनियमित रूपेँ आहार कयलासँ अन्न सेहो प्राणक हेतु घातक सिद्ध होइछ।
अन्ह रक आगाँ बियनि अन्ह रक आगाँ पंखा हँकुलासँ कोना लाभ्छाक नहि होइछ।
अन्हहरक आम आम अन्ह रमे खसल अछि।
अन्हा र गुज्जख रातिमे तीर चलायब घनघोर अन्हाहर रामि तीर चलबैत अछि।
अन्हा र गेल की चोर अन्धाकारमे चोर पड़ा जाइछ।
अन्हा र घरमे इजोत अन्धाकारमे चोर पड़ा जाइछ।
अन्हा र घरमे साँपे साँप प्रकाशाभावक कारणँ घरमे सर्वत्र साँप होयबाक संभावना रहैछ।
अन्हारा आगू रोइ, अपन दीदा खोइ आन्हारक आगाँ अपन विपत्तिक बखान कयला सन्ताक अपनहि उपहास होइछ, कारण ओकरापर एकर कोनो प्रभाव नहि पड़ैछ।
अन्हछरा के जगने की, धधरा तपने की जहिना आन्हा र जागल वा सूतल रहैछ तथापि कोनो अन्त र नहि पड़ैछ तहिना पोआरक धधरा तपलासँ ।
अन्हा रा के जूजि सुंघाबे, तऽ कहे फूटि महके आन्हार किछतु देखि नहि सकैछ तँ वास्त विकताक प्रसंगमे अपन उचित विचार नहि दैछ।
अन्हदरा के सुतने की, अन्हनरा के जगने की आन्हदर जँ सूतल रहय अथवा जागल ओहिसँ कोनो अन्तजर नहि अबैछ।
अन्हँरा गाममे कनहा राजा आन्हँरक गाममे जे कनाह रहैछ वैह राजाक स्पोमे प्रतिष्ठित रहैछ।
अन्हकरा चाहे दूनू आँखि आन्हकर व्यहक्तिकेँ आर किछु ने चाही, मात्र दुनु आँखि।
अन्ह रा लेखँ दिन रात बरोबरि अन्हाआर व्यँक्तिक हेतु दिन हो वा राति दुनू एक समान अछि।
अन्हमरा सियार के पकुआ मेबा गीदर आन्हछर अछि तेँ ओ पकुआकेँ मेवा बुझैछ।
अन्हछरी गोरइया के कनसारीमे खोंता गोरैया आन्ह।र अछि, तँ कनसारीमे खोंता लागौने अछि जे ओ कतय जायत।
अन्हनरी बिलाइ के कोनेमे सिकार बिलाइ आन्ह र अछि तँ कोनमे दबकि क’ शिकार करैछ।
अन्हररी बिलाइ माड़े तिरपित बिलाइ आन्हीर अछि तेँ माड़केँ दूध बुझि पिबैछ।
अन्हछरी सिल्ली के हरौती बीटमे खोंता सिल्ली आन्ह्र अछि तेँ हरौती बाँसक बीटक झोझमे खोंता लगौने ।
अन्हेझर नगरी चउपट राजा, टके सेर भाँजी टके सेर खाजा नगरमे अराजकता अछि, कारण राजा मूर्ख छथि तेँ एक टाका सेर तरकारी तथा ओहि भावमे मिठाइ बिकाइछ।
अन्हे र नगरी चौपट राजा असक्षम राजा रहलासँ नगरमे अराजकता पसराब भस्वा भविक।
अपन अकील आ आनक धन बेसी बुझाइछ प्रतयेक व्यआकितकेँअपन बुद्धि तथा दोसराक ध्नत सतत बेसी बुझबामे अबैछ, तँ प्रयुक्ता।
अपन अपन चाजिलमे सब मस्तब प्रत्ये क इज्जबति अपनहि हाथमे अछि।
अपन काका मरि हरि गेलन, अनकर काका अपन भेलन अपन व्यनक्तिकेँ अपन नहि बुझि आनकेँ अपन बुझनिहारपर व्यंतग्यन।
अपन कान अपनहि हाथे ने छेदल जाय अपन कान क्योि अपने हाथे नहि छेदि सकैछ।
अपन काने तऽ कोर लागे,
अनकर काने तऽ झर पड़े अपन सन्ताडन जखन कनैछ, तँ प्रत्येतक करेज फाटे लगैछ।
अपन करनी, पार उतरनी अपनहि कार्य कयलासँ लोक फल पबैछ।
अपन काइ, अनका लगाइ अपन दोष जखन दोसरापर लगाओल जाय, तँ व्यं ग्यप।
अपन खिया कऽ कतेक बुझायब अपन व्याय क’ कए आनकेँ कतेक बुझाओल जा सकैछ ? स्वाकथी्र व्यओक्तिपर व्यंओग्यय।
अपन खेत भम लोटय, पाही जोते जाय अपन खेतकेँ क्यो् जोजनिहार नहि, मुदा आन गामक खेत जोतय जा रहल अछि।
अपन गट्टी, भरि पनबट्टी अपन अधिकार अछि तँ पानकेँ डिब्बा मे छी।
अपन गरज सऽ लोक, गदहो के बाप कहैछ अपना गर्जें लोक गदहा पर्यन्तगकेँ बाप कहैतअछि।
अपन गारि, अपन दुआरि अपना गर्जें लोक गदहा पर्यन्तिकेँ बाप कहैत अछि।
अपन गुड़ चोरा कऽ खायब, अनकर बेटा के नइ कनायब अपन गुड़ क’ खायब, दोसराक बाल-बच्चाुकेँ नहि देखय देबजे ओ ओहि हेतु कानत।
अपन घरक छेद ककरो ने कही अपन दोष अनका नहि कहबाक चाही, कारण ओहिसँ लोकोपवाद बेसी होइछ।
अपन घरमे सब राजा अपन घरमे हीनसँ हीन व्यकक्ति सेहो शानसँ रहैछ।
अपन घर हगि भर, दोसराक घर छै जे डर अपना घरमे मलत्या,ग कयलोपर क्यो कोनो आपति नहि क’ सकैछ, परन्तुो दोसराक घरमे छीकबामे सेहो डर लगैछ।
अपन घरे साँझ ने, अनका घरे मूसर सन बाती अपना घरमे साँझ देबाक सामर्थ्यन नहि, मुदा अनकर घरमे दीप जरयबाक हेतु खूब मोटगर बातीक प्रयोग करैछ।
अपन चिक्कीस आन खाय, चोकर लेल हरान जाय अपन आटा आन खा रहल अछि आ ओकर हेतु निरर्थक परिश्रम क’ रहल अछि।
अपन चीलम भरब आ, दोसराक घरमे आगि लगायब चीलम तँ हमरा भरबाक अछि ताहिसँ दोसराक घरमे आगि लागि जाय, ताहिसँ हमरा कोन प्रयोजन? अपन स्वातर्थसिद्धि भेलापर आनकेँ उपेक्षा, तँ व्यंिग्यस।
अपन चोकर आन खाय, चोकर ला बेहाल जाय अपन अन्नय तँ आन खा रहल अछि ताहि हेतु तँ कोनो चिन्ताँ नहि, मुदा चोकरक हेतु निरर्थक चिन्ताि करब।
अपन छाब ने छेड़े खेसारी अपना तँ कोनो उपाय नहि छनि, दोसराक हेतु तैयारी क’ रहल छथि, तँ प्रयुक्तह।
अपन छीया परोसियाक नाम अमत्यायग तँ स्वछयं कयलक, परन्तुत नाम लगा रहल अछि पड़ोसियाक ।
अपन जीबन जीबन, अनकर जीबन तीमन अपन जीवनकेँ लोक वस्तु त- जीवन बुझैछ, मुदा आनक जीवनकेँ तरकारीक समान बुझैछ।
अपन टाँग उघारु, अपनहि लाजे मरु अपन टाँग उघारलासँ लोक अपनहि लाजे मरैछ।
अपन टेटर निहारबे ने करब, दोसराक फुल्लाट निहारब अपन टेटर दिस लोकक ध्याबनाकर्षित नहि होइछ, परन्तुब दोसराक फुल्लाज दिस स्व त- ध्याटन चल जाइछ।
अपन ठीक नइ, अनकर नीक नइ अपन वस्तु ठीक नहि आ दोसराक वस्तुन सेहो नीक नहि अछि।
अपन डफली अपन राग स्वेडच्छा चारी व्यकक्तिक प्रसंगमे प्रयुक्त‍।
अपन तेल खोइछामे राख, हमर टोइया दऽ दे अपन तेल अपन खोइछमे राखू आर हमर बासन द’ दिअ।
अपन थीक ने, आनक नीक ने अपना तँ किछु नहि छैक, मुदा दोसराक जे छैक से नीक नहि लगैछ।
अपन दही के गोआरिन अम्महत ने कहैछ अपन दहीकेँ गोअ‍ारिन कथमपि खट्टा नहि कहैछ।
अपन धन सपरा, गोतिया धन कलपना अपना लग तँ धन नहि छनि, अर्थात् स्वाप्नि भ’ गेलनि, परन्तु् गोतियाक धन देखि कलपि रहल छथि।
अपन धिया निमन रहती, तऽ बिरान पारैत गारी अपन बेटी जँ नीक रहैत तँ दोसर व्य’क्ति कहियो गारि नहि पढ़ैत।
अपन नयन गमा कऽ, दर दर माँगी भीख अपन आँखि गमा क’ प्रत्येाक व्यसक्त्कि सगुन बना रहल अछि।
अपन नाक कटि जाय, दोसराक सगुन बिगडि़ जाय अपन सर्वस्थ गमा क’ दोसराक अनिष्टत कयनिहार दुष्टा व्य क्तिपर व्यंाग्य्।
अपन पराभब, बजितो लाघब अपन पराजय बजितो लज्जाज होइछ।
अपन पिया मारता तऽ मारता, भात तर छाली देबनि से गुन तऽ मानता स्वाामी जँ मारैत छथि ताहिसँ की ? भात तरमे छाली नुका क’ देबनि से गुण तँ निश्चछये मानताह।
अपन पूत अनलनि मछरी कराही झोर, अनकर पूत अनलनि मछरी नयन बहे नोर अपन बेटा माछ मारि क’ अनलनि तँ आकरा सुस्वाछदु मसल्ला द’ कए कराहीमे झोर लगाओल, परन्तुा अनकर पूत माछ अनलक तँ ओकरा देखि क’ आँखिसँ नोर बहय लागल।
अपन पूत के केओ कनाह कहैछ अपन बेटाकेँ क्योन कनाह नहि कहैछ।
अपन पूत ने पूरल आस, नाती सऽ देह गाया बास अपन बेटासँ तँ कोना आशाक पूर्त्ति नहि भेल तें नातिक द्वारा श्राद्ध कयलासँ गायावासक सुख प्राइज़ भेल।।
अपन पूत लाते, अनकर पूत भाते अपन बेटा जँ मारबो करैछ तँ नीक लगैछ, परन्तुट दोसराक बेटा जँ भातो खोअबैछ तँ ओ नीक नहि लगैछ।
अपन पेट कुकूरो पोसैछ अपन पेट कुकूर पर्यन्त पोसि लैछ।
अपन पेट भरऽ दिअ, धिया पूता के मरऽ दिअ अपन पेट भरि दिअ।
अपन फुल्लीि ने निहारे, दोसरा के टेटर निहारे अपन दोषपर ध्याअन नहि द’ आनक दोषक उपहास कयलापर व्यंीग्यि।
अपन बड़द कुड़हडि़ए नाथब, ताहि सऽ अनका की अपन बड़दकेँ कुड़हडि़सँ नाथब ताहिसँ दोसराकेँ कोन प्रंयोजन अछि ? अपन काज स्वेाच्छाोपूर्वक कयनिहारपर कहल जाइछ।
अपन बड़ाइ अपने जनु सुनू, दोसराक बुराइ अपने जनु करू अपन प्रशंसा स्वकयं नहि सुनबाक चाही तथा दोसराक खिधांस नहि करबाक चाही।
अपन बड़ाइ कयलनि मनको दाइ मनको दाइ अपन प्रशंसा स्वायं कयलनि।
अपन बियाह भऽ गेल आ सुध बीत गेल अपन काजक पश्चाेतद्य आनक काजमे विघ्ना उपस्थित भेलापर प्रयुक्तव।
अपन बेटी दाइ, बाबा बेटी राइ छाइ अपन बेघ्टीा सभक हेतु प्रिय होइछ, परन्तु बाबाक बेटी बहिन छाउर सदृश निष्प्र योजन होइछ।
अपन भइया रहितथि डोली लागल जइतिथ, अनकर भइया मुहो से ने बाजे जँ कदाचित् अपन भाय रहितथि तँ विवाहोपरान्तुन डोली लागल चलि‍तथि, किन्तु जेँ अपना भाय नहि अछि तेँ आनक भरि मुह बजितो नहि छथि।
अपन भरल अछि आँत, साँय ला जोहइत छी जाँत अपन पेट भरल अछि तेँ निश्चिन्तो छी।
अपन भरल अनकर जरल, केओ ने देखलक अपने भरल-पूरल रहलापर दोसराकेँ अभावग्रस्तक रहलापर क्योो ध्यारन नहि दैछ।
अपन भूख तऽ चूल्हि फूक,
सॉयक भूख तऽ माथा दूख अपना जखन भू3ख लगैछ तँ झट द’ चूल्हि पजारबाक उपक्रम करैछ, किन्तुछ जखन स्वाजमीकेँ भूख लगैत छनि तँ माथा दुखैबाक बहना करैछ।
अपन भूत अपने नेबारय अपन भूतक शांति वा निवारण लोक स्ं वय करैछ।
अपन मनक मउजी, बहु के कहलनि भउजी अपना मने मस्ति छथि तेँ तँ पत्नीउकेँ भौजी कहि रहल छथि।
अपन म3न किछु आर अछि, करताक मन किछु आर अपन मनमे तँ किछु आर अछि, किन्‍तु भगवानक मनमे किछु आर।
अपन महीस कुड़हडि़ये नाथब, ताहि सऽ अनका की अपन महीसकेँ जँ कुड़हडि़सँ नाथब ताहिसँ आनकेँ कोन प्रयोजन ? मनमौजी कार्य कयनिहारपर व्यंोग्य ।
अपन मामा मरि हरि गेलन, जोलहा धुनियाँ मामा भेलन अपन मामा तँ मरिहरि गेलाह कहिया ने, मुदा ओहि स्‍थाानपर जोलहा धुनियाँ आब मामा भ’ गेल।
अपन मीठा, अनकर तीत अपन सब वस्तु, सबकेँ प्रिय लगैछ तथा अनकर नीको वस्तुह अधलाह लगैछ, तँ प्रयुक्तो।
अपन मूड़ी बाचे तऽ, अनकर मूड़ी बेल बरोबरि अपन माथा बाँचि गेल तँ दोसराक माथ बेल बरोबरि होइछ।
अपन लाख गमा कऽ, दर दर माँगे भीख अपन बहुमूल्यक वस्तुक गमा क’ दर-दर भीख माँगैत अछि।
अपन ला जएह सएह, पंच लोक के घीउ हमरालोकनिकेँ हो वा नहि हो, मुदा पंचलोकनिकेँ घी अवश्यह भेटबाक चाही।
अपन साउस तऽ एहन, पितिया साउस कहे बइसह अपन सासु एहन छथि जे सतत उपेक्षा करैछ, किन्तुत पितिया सासु बैसबाक आग्रह करैछ।
अपन सिमानपर कुकूरो बरिया अपना क्षेत्रमे कुकूर सेहो शेरक समान होइछ।
अपन हाथ गेल, तपत भात गेल स्व यं भोजनक विन्याभस कयल तेँ गरमागरम भात भेटल।
अपन हारल बहुक मारल, आन के ने कही स्व यं पराजित भेलापर तथा पत्नीे द्वारा मारि खयलापर लोक नहि बजैछ, कारण ओहिमे
अपनहि आय माय, आन के ने कही स्वहयं पराजित भेलापर तथा पत्नीी द्वारा मारि खयलापर लोक नहि बजैछ, कारण ओहिमे बेइज्जलती होइछ।
अपनहि आय माय, अपनहि गिरथाइन स्वहयं मलिकाइन छी तथा स्वायं पड़ोसिन तँ सब काज स्वायं संपादित करैत छी।
अपनहि बारिक भोज भोजमे जँ स्व‍यं बारिक छी तखन कोनो वस्तु क कमी नहि हैत।
अपनहि माल जाय, आ अपनहि चोर कहाबी अपनहि धन जा रहल अछि आर अपनहि चोर बनि रहल छी।
अपना के जुरे ने, अनका ला दानी अपन व्य क्तिगत उपयोगार्थ तँ वस्तुव छनिए ने, मुदा आनक हेतु दानी कहबैछ।
अपना खुट्टापर कुकूरो बली अपन सीमाक अन्तेर्गत कुकूर सेहो बलवान रहैछ।
अपना गलीमे कुत्तो भूके देo अपना खुट्टापर कुकूरो बली
अपना गाममे आगि लागे, आन गाममे धूआँ आगि तँ लागल अछि अपन गाममे, किन्तु ओकर धूँआ आन गाममे देखबामे अबैछ।
अपना घरक छेद ककरो ने कही अपना घरक दोष ककरो ने कहबाक चाही।
अपना घरक घरनी, अपना चाउरक चोरनी स्वनयं घरक मलिकाइन छथि तथापि चाउर अर्थात् चोरा क’ बेचि क’ कोसल कयलनि।
अपना घरमे बिलाडि़यो बाघ अपन घरमे बिलाडि़ बाघ सदृश रहैछ अर्थात् अपन घरमे व्य क्ति सेहो बली होइछ।
अपना घरमे भिखमंगो राजा अपना घरमे निर्धन व्य क्ति सेहो राजाक समान होइछ।
अपाना घर सतुआ ने,
अनका घर पेड़ा अपन घरमे सातु पर्यन्ते नहि भेटैत छनि, मुदा दोसराक घर गेलापर पेड़ा माँगैत छथि।
अपना घरे दिया ने बाती, अनका घरे मूसर सन बाती अपना घरमे चिराग-बत्तीक कोनो पता ठेकान नहि छनि, किन्तु आनठाम अर्थात् दोसराक घरमे मशाल बारैत छथि।
अपना दिल से जानिए, पराये दिल के हाल अपनहि मनसँ आनक मनक बात बुझबामे बुद्धिमानी अछि।
अपना नीक लागे, नगरक लोक थूक मेले श्रृंगार-प्रसाधन जे कयलक अछि ओ अपना तँ नीक लगैछ, किन्तुक नगरक लोक तँ देखि क’ थूक द’ रहल छैक।
अपना ने भेल भाइ, पर ने कहलक दाइ अपना तँ भाय नहि अछि तेँ क्योप बहिन नहि कहलक।
अपना बहु के किछुओ कहब, ताहि सऽ अनका की हम अपन पत्नी केँ किछु कहब ताहिसँ आनकेँ कोन प्रयोजन ? ककरो घरक संबंधमे दोसरा द्वारा दखल देलापर एहन कहल जाइछ।
अपना बिनु सपना अपन व्यनक्तिक अनुपस्थितिमे सब सम्ब न्ध निष्प्रनयोजन भ’ जाइछ।
अपना मन के बात, फकिरबा रोटी पकयबे की भात फकीर, अपना मनक बात अछि।
अपना मनमे सब बादसाह अपन मोनक अनुसारेँ सब राजाक समान रहैछ।
अपना ला आली माली, साँय ला तीन माली अपन कार्य तँ नहि भ’ रहल छनि, मुदा स्वाकभीक हेतु सब कार्य करबाक हेतु तत्पुर रहैछ ।
अपना ला भिखारी, सेबक ला घोड़ा अपना हेतु तँ भीखमंगा छथि, मुदा अपन सेवकक हेतु घोड़ाक व्यंवस्ज्ञा करैत छथि।
अपना ला लल्लो, जगत्तर ला दानी अपना हेतु तँ किछु ने छनि, मुदा संसारक हेतु दानी कहबैछ।
अपना ला लल्लब, तऽ गोइठा बीछऽ चल अपने तँ निर्धन अछि, किन्तुठ दोसरकेँ जीवन निर्वाहार्थ गोइठा बिछबाक हेतु प्रोत्सा्हित करैछा, तँ व्यंदग्यव।
अपना ला लल्ल‍, भीख माँगे चल अपने तँ खगल छथि, तेँ भीख माँगबाक आग्रह करैत छथि।
अपना ला लाली, दमाद ला छाली अपना हेतु तँ किछु-ने-छनि, मुदा जमायकेँ छाल्हीे खोआ रहल छथि।
अपना ला लीरी बीरी, दीदी ला खीर पूरी अपना हेतु तँ भोजनक कोनो उपाय नहि छनि, मुदा दीदीक हेतु खीर-पूरीक व्युवस्था करैछ।
अपना लेल हेमना, आ जमाय लजेल फेमना अपना लेल तँ अभाव छनि, मुदा जमायक स्वा गत-सत्का रपर व्यंरग्यज।
अपना लेल भात दालि पिया लेल केला, एहन कऽ ने छँउक देबनि घुरि के ने ऐला अपना हेतु भात दालिक व्यनवस्थाु करैछ, किन्तुे स्वा मीक हेतु केराक व्यथवस्थाम कयलनि, पत्नी् पतिक हेतु एहन व्य‍वस्थास कयलनि जे ओ पुन: घुरि क’ नहि अयलाह।
अपना लेल लल्लन, गोइठा बीछे चल अपने तँ स्व्यं निर्धन छथि तेँ दोसराकेँ प्रोत्सासहित करैछ जे गोइठा बीछबाक हेतु चलू।
अपना सऽ जर पड़ोसिया सऽ नाता, एहन बुद्धि जनु दिअऽ बिधाता अपन व्य्क्तिकेँ देखितहि ज्वबर भ’ जाइत छनि, किन्तुे पड़ोसियाक संग नीक संबंध छनि।
अपनुक कुमति अपने नहि जाने,
की उपदेस अजाने अपब दुर्बुद्धिक प्रसंगमे अपने नहि जनैत छथि तथा दोसराकेँ उपदेश द’ रहल छथि।
अपने आटा अपने घी, अपने छानी अपने ली अपन आटा, अपन घी छनि, अपने छानैत तथा अपने ल’ रहल छथि।
अपने उढ़रल जाइ, तऽ बिध बिधाता उढ़ारने जाइछ स्वायं उढ़रल जा रहल अछि तथा दोष द’ रहल अछि जे हमरा भगवान उढ़ारने जा रहल छथि।
अपने कउआ बिष्ठा खाय, अनका सगुन दिये अपने तँ अधलाह कर्म करैछ, किन्तुक आनकेँ शुभ संदेश दैछ, तँ प्रयुक्ता।
अपने करनी, पार उतरनी अपन कर्त्तव्य क अनुरूप लोककेँ फल भेटैछ।
अपने कूटे अपने खाय, घर बहु ने आङन माय अपने कुटैछ, अपने खाइछ, घरमे ने पत्नीह छनि आर ने आङनमे माय।
अपने खाइ आ बिलाइक नाम लगाइ खाइत छथि स्वियं, किन्तुआ नाम लगा रहल छथि बिलाइक।
अपने खाइ बिलाइक नाम लगाइ,
से महातम कतय जाइ अपने खाइत छथि, किन्तुा बिलाइक नाम लगा रहल छथि एकर महात्य्इ कतय जायत ? चोरि स्व‍यं करैछ, किन्तुा दोषी आनकेँ बनयबाक प्रयास कयनिहारपर व्यंँग्या।
अपने गरजे आन्हगर अपन गर्जसँ लोक आन्ह र भ’ जाइछ।
अपने गेने हेहर भेली, पात ओछऔने दूरि गेली कतहु बेसी अयला गेलापर लोकक सम्मापन समाप्ते भ’ जाइछ।
अपने जाय जजमानो के नेने जाय अपने तँ स्वनयं जाइते अछि संगहि संग यजमानकेँ सेहो नेने जा रहल अछि।
अपने तेले नाची अपन तेल खर्च क’ नाचि रहल छथि।
अपने दुख से भेलहुँ बाउर, के कूटे सरकारी चाउर स्वायं तँ कष्टहसँ पीडि़त छी, तखन सरकारी चाउर के कूटत ? अपने पीड़ासँ पीडि़त व्यरक्तिकेँ आनक कार्य करबाक अथवा करयबाक पलखति कतय ?
अपने नहाइत छी, बार दहलाइत अछि पोखरिमे स्नाीन क’ रहल छी कीदन दहा रहल अछि।
अपने नीक तऽ आनो नीक जखन अपने नीक रहब तखने आनो व्यहक्ति अहाँक प्रति नीक व्यनवहार करत।
अपने नीने सूतब, अपने नीने जागब लोक अपने नीनसँ सुतैछ तथा अपने नीने जगैछ।
अपने पैरमे कुड़हडि़ मारब एहन काय्र करब जाहिसँ अपने क्षति हो तँ, कहल जाइछ।
अपने फंदा सऽ गरमे फाँसी लोक अपन चालिसँ फाँसीपर झूलि जाइछ, तँ कहल जाइछ।
अपने बइमान तऽ जगत्तर बइमान जे व्यइक्ति स्वबयं बइमान रहैछ ओकरा संपूर्ण संसार बइमान बुझना जाइछ।
अपने बेगरते आन्हार देo अपने नीक तऽ आनो नीक
अपने भल ने पर पढ़े गारी स्वेयं तँ नीक नहि अछि, तेँ कहैछ जे हमरा दोसर गारि पढ़ैछ।
अपने मने बाबू खेदू राय अपना मनसँ अपनाकेँ बाबू खेदू राय कहैछ।
अपने मरने लोक सरग ने देखैछ स्वेयं मरलासँ क्यो स्वरर्ग नहि देखि सकैछ।
अपने मियाँ दर दरबार, अपने मियाँ चूल्हिक छाउर अपने तँ मियाँ दरबारक काजमे व्ययस्ता रहैछ, किन्तुा घरमे चूल्हिक छाउर सदृश हुनक गणना होइछ।
अपने मियाँ सूबेदार, घरमे बीबी झोंके भार घरसँ बाहर तँ अपने मियाँ सूबेदार बनल रहैछ, मुदा घरक स्थिति एहन छैक जे पत्नीब भार झोंकि क’ करैछ।
अपने मुरगी अपने पथार, मियाँ धुनैछ अपन कपार पथारकेँ अपनहि मुर्गी क्षति पहुँचा रहल छैक ताहि हेतु मियाँ अपन कपार धुनि रहल अछि।
अपने मुसरी सन्हिआयत नै, खरतर नेने जाथि असंभव कल्प ना कयलापर व्यंनग्यन।
अपने मुह मियाँ मिट्ठू अपना मनसँ मियाँ श्रेष्इा बनल अछि।
अपने लिटिये अगोर अपन लिट्टीक हेतु प्रतीक्षा कथीक ? अपन वस्तुिक हेतु प्रतीक्षा करब अनुचित।
अपने हढ़ाबी, आ धी पुतोहु के सिखाबी स्वेयं तँ कुमार्गमामी छथि, मुदा बेटी-पुतोहुकेँ ओहिसँ पृथक् रहबाक संकेत दैछ।
अपहत मरे ने, छतहर फूटे ने जहिना पापी व्यँक्तिक मृत्यु शीघ्र नहि होइछ तहिना घैल शीघ्र नहि फूटैछ।
अफजल पियबा मरियो ने जाय, सूते के बेरिया चित फरियाय पत्नीर पतिक प्रसंगमे कहैछ, अफजलक मृत्युि नहि होइछ, जँ मृत्युफ भ’ जाइत तँ पिण्डु छुटि जाइत।
अबकी फगुआ एहिना गेल एहि बेरक फगुआ ओहिना समाप्त भ’ गेल ।
अबकी मोघे जाड़ ने जाय माघसँ जाड़क अन्ते नहि भ’ जाइछ।
अबर कुटनिहार दउर दउर फटके कमजोर कुटनिहार आराम पैबाक हेतु बारंबार फटकैत अछि।
अबर गोतिया सराप के आसा कमजोर गातियाकेँ श्रापक आशा रहैछ।
अबर धुनियाँ जिस्ता भारी धुनियाँ तँ कमजोर अछि, मुदा ओकर जिस्ताँ बढ़ भारी अछि।
अबसर चूकल डोमनी, गाबे ताल बेताल डोमनी अवसर चुकि गेल अछि तेँ ओ ताल बेताल अर्थात बिनु कोनो राग-रागिनीक गीत गबैछ।
अबसर बहलापर पछताब अवसर व्यातीत भेलापर पश्चा त्तापक अतिरिक्ता आन कोनो उपाय नहि रहैछ।
अबहेलाक बिआह, कनपट्टी सिनूर अवहेलनाक विवाहक परिणाम होइछ जे सिंउथक बदला कानक बगलमे सिन्दूेर देल जाइछ।
अबिते अइली चूल्हि बेगरइली, तपते कंगन खोलली विवाहोपरान्तू कनियाँ प्रथमे सासुर अयली तथा चूहिल्‍ पजाड़लनि अर्थात् घरक काज-धन्धाूमे लागि गेलीह।
अबिते अइली लऽ जोगरइली, कोहबर छोडि़ कऽ लिट्टी लगइली विवाहोपरान्त् कनियाँ जखन प्रथम सासुर अबैछ तँ ई अपेक्षा कयल जाइछ जे हुनका अधिकाधिक सुख-सुविधा देल जाय, किन्तुख परिस्थितिसँ बाध्य भ’ कोहबर जयबाक बदला भानस घरमे लिट्टी लगायब प्रारंभ कयलनि।
अबिते रोहिन कादो करे अदरा फुहिआय, कहे भाँड़ सुन भंडिनी कुत्ता भात न खाय रोहिन नक्षत्रमे मुसलाघार वर्षा भेलापर खेत कादो-कादो भ’ जाइछ तथा आर्द्रा नक्षत्रमे फूँही-फाँही होइछ, तँ धान एतेक बेसी होइछ जे कुत्ता पर्यन्ता भात नहि खाइछ।
अबैत अयलाह जाइत होइ छन्हि लाज अयबाक बेर तँ आबि गेलाह, मुदा जयबा काल लज्जा भ’ रहल छनि।
अबैत बहु जनमइत बच्चाग, सब के नीक लगैछ घरमे नव कनियाँक अगमन तथा नवजात शिशु सबकेँ नीक लगैछ।
अबैत लछमी के केओ लात मारे लक्ष्मीमक आगमनपर लात नहि मारबाक चाही अर्थात् आदर सम्मा न करबाक चाही।
अब्ब र देबी के जब्बनर बोका देवी तँ कमजोर छथि, मुदा हुनका ओतय जे बलि देल जा रहल अछि तकर पाठा बलवान अछि।
अब्बनलक बहु गाम भरिक भउजाइ कमजोर व्य।क्तिक पत्नी गाम भरिक सदृश होइछ।
अब्ब।लपर सितुआ चोख कमजोर व्य।क्तिकेँ काटबाक हेतु सितुआ सेहो तेज होइछ।
अब्ब ल भँइसुर दिअर बरोबरि कमजोर भैंसुरक संग भावो देओर सदृश व्योवहार करैछ।
अभागल गेलाह सासुर, तऽ ओहू ठाम मट्ठा भात अभागल व्याक्ति सासुर गेलाह तँ ओतहु हुनक सत्कावर मट्ठा भातसँ भेलनि।
अभाबे सालि चूर्णं बा अभावास्थािमे गहूँमक बदला चाउरक चूर्णसँ काज चलैछ।
अमीर के उगलल, गरीब के आहार धनिक व्यउक्ति जे उगलि दैछ तकरा गरीब आहार बना लैछ।
अमीर के जान पिआरी, फकीर के दम भारी धनवान व्याक्तिकेँ जीवित रहबाक अभिलाषा रहैछ, किन्तुे जे निर्धन अछि ओकरा डेग-डेगपर कष्अन होइछ।
अम्मा रहितथि दुख कलि सुनबितहुँ, गंगा रहितथि पइसि नहबितहुँ माय जँ रहितथि तँ अपन पीड़ाक प्रसंगे कहि दितियनि, गंगा नदी जँ रहितथि तँ स्नादन क’ पापसँ मुक्तत भ’ जइतहुँ।
अयलहुँ गओने, परली सुखबने गौनामे प्रथमहि प्रथम सासुर अयलहुँ जे नीक-नीक भोजन भेटत जाहिसँ स्वानस्य्भे पुष्अे रहत, मुदा कार्याधिक्यवक कारणेँ स्वाअस्य्जन नष्ट् भ’ गेल।
अयलहुँ ने गेलहुँ, फल्लाँाबहु कहओलहुँ ने तँ सासुर गेलहुँ आ ने ओतय सँ वापस अयलहुँ, किन्तुय फल्लाँाक पत्नीणक रूपमे प्रख्याात भेलहुँ।
अयलहुँ ने गेलहुँ से सुनथि फकरा, बइसल बिलाइ के तीन बखरा कोनो वस्तु प्राप्तफ करबाक निमित्त अनवरत प्रयास करैछ, मुदा प्राप्ति नहि होइछ, किन्तुस घरमे बैसल रहैछ तकरा तीन हिसा भेटैछ।
अरकाहीक जोगी के, गाँडिमे लागल जट्टा नव योगीकेँ कीदनमे जट्टा लागल रहैछ।
अरकाहीक हजामनि के बाँसक नहरनी नव हजामनि बाँसक नहरनीसँ नह काटैछ।
अरकी के धिया दुआरिए ठाढि़ नव युवती सतत दरबज्जाठपर ठाढि़ रहैछ।
अरजऽ ला भीम भोगऽ ला भगबान उपार्जित करैछ भीमकाय व्य क्ति आ ओकर उपयोग करैछ भाग्यमवान व्ययक्ति।
अर तीत पर तीत पिया तोरा से, निजगुत हाल कोसिलबा से स्त्री अपन स्वाेमीसँ कहैछ जे अहाँपर तँ हमर विश्वा स अछिए, किन्तुछ वास्त विक बात हम कोसिलबासँ कहब, जे हमर प्रमी अछि।
अदरा धान पुनरबस पैया, गेल किसान जे बोय चिरैया आर्द्रा नक्षत्रमे धान रोपलापर नीक होइछ।
अदरा बरसे सभ किछु हौं, एक जबास एतर दिन भौं आर्द्रा नक्षत्रमे वर्षा भेलापर सब किछु होइछ।
अरथा के अठन्नीर, दोहरा के चउअन्नीम अनठा क’ काज कयनिहार बेसी पारि‍श्रमिक पबैछ, किन्तुज जे मनसँ काज कयलक ओ कम पौलक, तँ व्यंाग्यँ।
अरथी मउगी के कुरथी झोर अलिबटाहि मौगी कुरथीमे झोर लगा देलक।
अरथे धरमक मूल धर्मसाधनाक निर्मित अथ्र्ज्ञग परमावश्य क अछि।
अरबगेल गेल मोगल भऽ आयल बोले अरबी बानी,
आब आब कहि पिया मोर मुअल खटिया तर रहल पानी हमर प्रियतम अरब गेल आ ओतयसँ धुरि क’ आयल तँ मोगल बनि गेल, अरबी बोली बाजय लागल।
अरबा चूड़ा गाय के दूध, खो ढोलकिया हो मजगूत अरबा चूड़ा तथा गायक दूध खयला सन्ता ढोलक बजौनिहार मजगूत रहैछ।
अरबा छडड़ी के दस गो नउड़ी नवयुवतीकेँ दस दासी रहैछ।
अरबा बाभिन के तरबा तेल नवयुवती ब्राह्मणी तरबामे तेल लगबैछ।
अरल छी बेह बरल छी, कोंचा तरमे झाँपने ने छी, भऽ परल तऽ कऽ छोड़ब कोनो वस्तुछक प्राप्तिक हेतु अडि़ जायब, ओकरा बिनु प्राप्ति कयने नहि छोड़लापर व्यं ग्यि।
अरिया के गरिया भला पाहीके ना डूब कोनो वस्तुरक प्राप्तिक हेतु अडि़ गेल अछि।
अर्र बर्र गबइ छी, तेल अँकुरी पबइ छी अंट-संटगीत गाबि क’ तेल अंकुरी पयबाक अधिकारी बनि जाइत छी।
अरिके धनियाँ अगरैली, तऽ बिरहस्तकप के नहैली नवकनियाँ अत्यअन्त, प्रसन्नत भेलहि तँ वृहस्पाति दिन स्ना,न कयलनि।
अरिया चोर पड़ोसिया छिनार ने पकड़ाय आरिक बगल खेतबाला जँ चोरि करैछ तथा पड़ोसिया जँ छिनार रहैछ तँ ओ कहिओ नहि पकड़ाइछ अर्थात् ओकरा पकड़ब कठिन अछि।
अरिया धिया खयसलनि बइर अँटकल बीआ दुलारू बेटी प्रथम बैर खयलनि तँ कंठमे बीया अँटकि गेलनि ।
अरेर मरेर के झोपड़ा राम रखबैया निर्धनक भगवान रक्षक होइत छथि।
अलकल के ढीर भेल, मडुआ पिसैत दिन गेल कतेक दिनक पश्चाकतृ स्त्रीआ गर्भवती भेलीह तथापि सुखपूर्वक समय नहि व्यततीत भेलनि अर्थात जकर वस्तहविकताक पता लगायब कठिन अछि।
अलग बलग पौती, तऽ तीन सेर मटकौती जँ मुफ्तमे भटि जाय तँ हुनक भोजन तीन सेर छनि।
अलगी के ढ़ीर भेल, परमरिया के साहि पड़ल अलगी स्त्रीरकेँ गर्भ भेलनि तँ पमरियाकेँ पहिने साहि अर्थात् निमंत्रण भेटि गेलनि।
अलगी बलगी दुरगिन नाम, साँय रखलक सतभतरी नाम पतिसँ पृथक् रहनिहारि मलिलाक नाम समाजमे उपेक्षित रहैछ तथा पति सेहो ओकरा सात पतिबाली स्त्रीा कहैछ।
अलगी बिलारि के फरके डेरा पृथक रहनिहार बिलाडि़क पृथके डेरा रहैछ।
अलबेली पकौलनि खीर, दूधक बदला देलनि नीर अपडंगाहि स्त्रीी खीर रान्हदलनि जाहिमे दूधक बदलामे पानि देलनि।
अल्लीे बल्लीत धनुखधारी, बेंग मारे पेटकुनियाँ पारी दुबग्लि व्य्क्ति धनुष धारण कयलक तँ पेटकुनियाँ पाडि़ क’ बेंगकेँ मारलक।
अल्हुनआमे पीढि़या सगाइमे गीत अल्हुनआ खैबा काल पीढ़ीक तथा सगाइ अर्थात् दोसर विवाह काल गीतक कोन प्रयोजन ? बेमेल कार्यपर व्यंाग्ये।
असकतिया छे रे तऽ की बाबू , डिबिया मिझा दे आँखि मुनि लियऽ, तऽ बुझब डिबिया मिझा गेल कोनो आलसीकेँ क्योझ कहलक डिबिया मिझा देबाक हेतु।
असकतिया पड़ल कुँआमे, तऽ कहलक जे राति बीच रहे दे आलसी कुँआमे खसि पड़ज तँ कहलक जे राति बीच हमरा विश्राम करय दे।
असगर जनियाँ, तेँ पदमिनियाँ एसगर जान छनि तेँ पद्मिनी बनल छथि।
असगर पूत कमाइ करे, घर करे कि कचहरी करे घरमे असगर अछि।
असगर बृहस्पछतियो झूठ असगर वृहस्पछति झूइ छथि।
असगर मियाँ कब्बरर खोदिहें कि कनिहें असगर मियाँ क्र खनत आ कि कानत? असगर व्याक्ति की-की करत
असरफीक लूट कोइलापर छाप अशर्फीक लूट भ’ रहल अछि आर कोइयापर पहरेदारी कयल जा रहल अछि।
असरेसा मग्धाद रोपे, घने बान्हेट तोपे अश्लेाषा एवं मग्धाे नक्षत्रमे सघन धनरोपनी कयलापर तथा पानिकेँ बान्हि क’ रखलापर धान होइछ।
असरेसा रोपे असके, ककुँड़ा ने घसके अश्लेाषा नक्षत्रमे सघन रोपनी करबाक चाही जे काँकुड़ पर्यन्तम नहि घसकि सकय।
असल बेआ मरत ने, असल सोना जरत ने वास्त्र विक पुत्र एवं वास्तनविक सोना ने तँ मरैछ आ ने जड़ैछ।
अस्सीआ आमद चउरारसी खरच आमदनी तँ अस्सी छनि, मुदा खर्च ओहिसँ बेसी चौरासी करैछ।
अस्सीच खस्सी माल पुरान, ई सब बेचथि चतुर किसान चतुर कृषक अपन प्राचीन वस्तुसकेँ बेचि क- नव वस्तुकसँ ओकरा स्थाुनापन्नच करैछ।
अस्सी् चुटकी नब्बेस ताल, तब जाने खइनी के हाल अस्सीक चुट्की तथा नब्बेस ताल देलापर खैनी बनि क’ खयबाक योग्यब होइछ।
अस्सीक बथुआ नबे पतार, जुग जुग जीए सनकसार बथुआ अस्सील वर्ष, पतार नब्बेग वर्ष तथा सनकसार युग-युग धरि जीवित रहैछ।
अस्सीर बरसक उमर मियाँ मासूम उमर मियाँ तँ अस्सीक वर्षक छथि, मुदा नाम छनि मासूम।
अहदी गिरल कुँआ एतहि तऽ चैन आलसी व्यलक्ति कुँआमे खसल तँ कहलक जे हमरा एतहि आनन्दए अछि।
अहाँक दालि चाउर हमर टोकना, आउ दुनू गोटे करू भोजना चाउर दालि अहाँक अछि, टोकना हमर अछि तेँ दूनू गोटे मिल क’ भोजन करू।
अहाँ गर्म कऽ कऽ सरबत पिबैत छी क्रोधित भ’ मीठ-मीठ बात कहनिहारपर व्यंधग्यर।
अहीरक की जजमान, लपसीक की पकमान जहिना अहीरक यजमान नहि भ’ सकैछ तहिना लपसीक पकमान असंभव अछि।
अहीरक पेट गहीर, बाभनक पेट मदार अहीरक पेट गहीर तथा ब्राम्हिणक पेट ढोल सदृश होइछ।
आँखि आगू नाक, सूझे की खाक आँखि आगू तँ नाक सुझतनि की खाक।
आँखि उठे तऽ मुह बाबी, मच्छर काटे तऽ गोड़ हउआबी जहिना आँखि उठलापर तकबाक प्रयास करबामे मुह स्वात5 खुजि जाइछ तहिना मच्छमर काटलापर लोक स्व त: पैर हइबाय लगैछ।
आँखि एको ने कजरउटी दस गो आँखि नहि छनि, मुदा कजरौटी दस गो चाही।
आँखिक आन्हनर, नाम नयनसुख छथि आँखिक आन्हरर, मुदा नाम रखने छथि नयनसुख।
आँखिक ओट, पहाड़क ओट परोक्ष भेलासँ पहाड़ पर्यन्तओ ओटमे पडि़ जाइछ।
आँखिक देखल, कानक सुनल आँखिक देखल बातपर विश्वासस कयल जा सकैछ, मुदा कानक सुनल कोनो बातपर विश्वादस नहि करबाक चाही।
आँखिक देखल दूर करू, भलामानुसक कहल करू आँखिक देखलपर विश्वा स नहि करबाक चाही, प्रत्युात श्रेष्ठा व्य क्ति जे कहथि ओहिपर विश्वा स करब समुचित।
आँखि कनाह नीक, देस कनाह ने नीक कनाह व्यहक्ति नीक होइछ, मुदा देशक कनाह हैब समुचित नहि।
आँखि करे मुलुर मुलुर मुह भकुरा, कहाँ सऽ आयल छी देब ठकुरा आँखि मुलुर-मुलुर क’ रहल छनि।
आँखिक लेखेँ पीठ पछुआड़ आँखिक हेतु पीठ सेहो पाछाँ पडि़ जाइछ।
आँखि कानमे चारि आङुर कऽ फर्क जाहि वस्तु क प्रत्यछक्ष दर्शन नहि हो ताहिपर विश्वासस नहि करबाक चाही।
आँखि चले भौं चले दुनू पिपनी, सब रंग के बात बाजे मउगी कुटनी जकर आँखि, भौं एवं पिपनी समान रूपेँ चलैछ तथा सात रंगक बात बजैछ ओहि स्त्रीथकेँ कुटनी बुझबाक चाही।
आँखि दुनू डिबडिब बंगामे चरबाही यद्यपि आँखिक जे अवस्थ्ाा छनि ताहिसँ कोनो कार्य करबाक योग्यव नहि छथि, तथापि बंगाल जा क’ नोकरी करबाक अभिलाषा छनि।
आँखि देखि साख पूछी आँखिसँ जे वस्तुू देखल अछि ताहि प्रसंगमे साक्ष्यजक
आँखि नदारत नाम नयनसुख आँखि नहि छनि मुदा नाम रखने छथि नयनसुख।
आँखि ने कान दीपना नाम आँखि कान किछु ने छनि, मुदा नाम रखने छथि दीपना।
आँखि नोर, दाँत निपोर देo आँखिमे नोर पअहरन पटोर
आँखि फूटत तऽ भौं सऽ देखब आँखि जँ फूटि जायत तँ भाँहसँ कोना देखब? जँ मुख्यह वस्तुर नष्टप भ’ जायत तँ कथीसँ काज करब ?
आँखि बन्द डिब्बाह गायब आँखि भौं नीक नहि छनि, मुदा चरबाही करैत छथि बंगालमे, तात्प र्य रूप-गुण किछु ने छनि, मुदा बरोबरि इश्क‍ फरमबैत छथि।
आँखिमे नोर, पहिरन पटोर सासुर जयबाक निमित्त पटोर तँ पहिरि लेलनि, मुदा आँखिमे नोर भरल छनि।
आँखि मुनने कऽ खाइ, लडि़का ने परिकाइ आँखि बन्दे क’ भोजन करबाक चाही, मुदा बच्चाब सबकेँ नहि पडि़कयबाक चाही।
आँखिमे लोर, दाँत निपोर यद्यपि आँखिमे नोर भरल छनि तथापित हँसि रहल छथि।
आँखि हय ने तीन गो कजरौटा आन्ह र अछि तथापित कजरौटा रखने अछि तीनटा।
आँत भारी तऽ माथो भारी पेटमे अन्नऽ गेलापर कोनो करबाक मन नहि करैछ।
आँखि हय ने तीन गोअ कजरौटा आन्ह र अछि तथापि कजरौटा रखने अछि तीनटा।
आँत भारी तऽ माथो भारी पेटमे अन्नऽ गेलापर कोनो कार्य करबाक मन नहि करैछ।
आँतर खोतर दण्डथ करे, दइब ने मारे अपने मरे अनियमित दण्ड -बैसक कलासँ मनुष्यर मृत्युतक करण स्वरयं बनैछ, ओकरा भगवान नहि मारैछ।
आँत साफ तऽ माथो साफ हृदयक साफ व्यथक्ति मन-मष्तिकसँ पूर्ण स्वयस्थ‍ रहैछ।
आँधी के आगाँ बेनाक बसात अन्ह रक अगाँमे पंखाक बसात बेकार भ’ जाइछ।
आ आ गे दगरिन गोर तोरा लागहुँ, बेथास पिड़ाय गेल टाँग तोरा मेलहुँ गर्भवती महिला दगरिनकेँ संबोधित करैछ, ‘तोरासँ हमर प्रार्थना अछि जे हमरा पीड़सँ शीघ्र मुक्तह करा दे।
आइ काल्हु्क कनियाँ अपने मुह बर तकैछ आई सूर्य कोम्ह र उदित भेल अछि? असंभव काय्र भेलापर व्यंुग्ये।
आइ खाय आ काल्हि के झखे, ओकरा गोरख संग ने रखे जे आइ भोजन करैछ, किन्तुि ओकरा सतत चिन्ताभ रहैछ जे काल्हि भोजन कोना भेटत।
आइ भेल मँगनी काल्हि हमर बिआह, टुटिगेल टंगरी रहि गेल बिआह आइ मंगनी अर्थात् विवाह स्थिर भेल, काल्हि विवाह भ’ जायत, किन्तुत अकस्मावत टाँग टूटि गेलाक कारणेँ विवाह स्थ गित भ’ गेल।
आइ माइ के ठोप ने, बिलाइ के भरिमांग अपन सर-संबंधीकेँ तेल-सिन्दूंर एवं ठोप नहि भेलनि, मुदा बिलाइ केँ भरि माँग सिन्दूलर लगाओल गेल।
आइ माइ के बाती ने, बिलाइ के गाँती अपन सर-संबंधीकेँ वस्त्र देलनि, मुदा बिलाइकेँ गाँती बान्हधल गेल ।
आकास बन्हगलहुँ पताल बन्हगलहुँ, घरक टाट मुदा खुजले रहि गेल जाहि कार्यकेँ प्रमुखता देबाक चाही ओकरा नहि द’ गौण कार्यकेँ प्रमुखता देलापर कहल जाइछ।
आखिर मरबे करब,रुपइया जोडि़ कऽ की करब जे जन्मब लेलक अछि तकर मृत्युी निश्चिते अछि तखन रुपैया5पैसा जोडि़ क’ अर्थात संयोगि क’ रखबा कोन प्रयोजन ? अर्थात् टाकाक सदुपयोग करबाक चाही।
आगाँ कुऑं पाछाँ खाइ आगाँमे इनार अछि पाछाँमे खाधि, तँ कोम्हेर जायब? उभय संकटक स्थितिमेकहल जाइछ।
आगाँ कुब्बलर पाछाँ कुब्ब्र, हमर भतार बड़ सुन्नबर आगाँ पाछाँ कुबर उगल छनि तथापित पतिसँ के सुन्दरर हैत? व्य्क्ति विशेषपर व्यंँग्यग।
आगाँ के आगे, पाछाँ के भागे आगाँ रहनिहार व्य,क्ति सतत लाभन्वित होइछ, पाछाँ रहनिहार व्य क्ति भाग्यहक भरोसे रहैछ।
आगाँ चली तऽ पाछाँ नहि देखी आगाँ बढ़बा काल पाछाँ घुमि क’ नहि देखबाक चाही।
आगाँ चले तऽ भड़ुआ, पाछाँ चले तऽ गुड़ुआ आगाँ-आगाँ भड़ुआ चलैछ तथा पाछाँ-पाछाँ गड़ुआ चलैछ।
आगाँ चुरकी पाछाँ टीक, ई हे गुण्डाड थीक आगाँ पैघ-पैघ बाबरी तथा पाछाँमे टीक हो तँ अनुमान करबाक चाही जे ई निश्चाये गुण्डाम थिक।
आगाँ तार पाछाँ तार, बीचमे सरदार आगाँ पाछाँ तार अछि बीचमे सरदार अछि।
आगाँ दउड़, पाछाँ चउड़ आगाँ दौड़ा देलक ओएह परोक्षमे चौड़ करैछ।
आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा स्वँच्छँन्द व्यैक्तिपर व्यंयग्यं।
आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा, बिना छान के कूदे गदहा आगाँ पाछाँ क्योा नहि छनि तेँ बन्धान विमुक्तछ भ’ विचरण करैछ।
आगि आ फूसक दुसमनी आगि एवं खढ़केँ शत्रुता थिक।
आगि कहनले मुह ने पाके आगि कहलासँ मुह नहि पाकि जाइछ।
आगि जारि पुनि आगिहिक काज आगि पजारबाक हेतु पुन: आगिक प्रयोजन पड़ैछ।
आगि लगलापर इनार खूनब कोनो संकट उपस्थित भेलापर ओहिसँ त्राण पैबाक निमित्त साधनक इन्त जाम तत्काजल कयलापर व्यं्ग्यन।
आगि लगन्तें झोपड़ी, जे निकसे से लाभ घरमे जँउ आगि लागि जाय, तँ जैह वस्तुक बहार भ’ जाय सैह लाभक बात थिक।
आगि लगा कऽ पाछाँ घइल कोनो संकट उपस्थित भेलापर ओहिसँ त्राण पयबाक निमित्त साधनक इन्त जाम करब।
आगि लगा कऽ जागो अलगे ठाढ़ आगि लगा क’ जागो पृथके ठाढ़ अछि।
आगि लगाय छउड़ी बड़ तर ठाढ़ आगि लगा क’ छौड़ी बड़क गाछक नीचाँमे ठाढ़ भ’ कए तमाशा देखि रलहल अछि।
आगि लागल घर सऽ, जे निकसे से लाभ सर्वस्वल नष्अ भेलासँ जे नकलि जाय वैह लाभदायक अछि।
आगि लागौ मड़बा बज्जषर खसौ कोहबरबा, हमरा तऽ तीन पूड़ी सऽ काज विवाह मण्डा़पमे लागि जाय वा कोहबरमे बज्र खसि पड़य ताहिसँ हमरा कोन प्रयोजन ? हमरा तँ बिलौकीक तीन पूड़ीसँ प्रयोजन अछि।
आगूक चाप पाछूक उलाड़ बैलगाड़ीपर आगाँक चाप नीक होइछ, मुदा पाछाँ उलाड़ भेलापर उनटि जाइछ।
आगू नाथे ने पाछू पगहा, ताहि कारने नाचै गदहा देo आगू नाथ ने पाछू पगहा
बिना छान के कूदे गदहा
आगू नाथ ने पाछू पगहा, बिना छान के कूदे गदहा देo आगाँ नाथ ने पाछाँ पगहा
बिना छान के कूदे गदहा
आगू ने सम्हाकरब, पाछू घुरुसुर करब प्रारंभिकावस्थाेमे जँ कोनो काजकेँ नहि सम्हांरि क’ करब तँ पाछाँ जा क’ पश्चांत्ताप करय पड़त।
आगू ने सम्हाचरी पाछू घुरु खुर भारी देo आगू ने सम्हाूरब,
पाछु घुरुसुर करब
आगू भात, पाछू लात आगाँमे भात खोअबैछ, मुदा पाछाँसँ लात मारैछ।
आ गेल लबड़ी टीका गेल माँग, फेर तऽ हमही लबड़ी आयल तथा हम माँग टीक देल, पुन: टीक देला, पुन: हमही समयपर काज देल।
आङन अछि गोड़ पँइच, भात अछि गल पँइच अहाँ जकरा ओतय जयबैक वैह अहाँक ओतय आओत, अहाँ जकरा ओतय भात खायब वैह अहाँक ओतय भात खायत।
आजन ने सहाइ, आँखिक गेने सहाइ आँखिमे आँजन लगायब सहन नहि होइछ, मुदा आँखि चल गेलापर कोना सहन हैत ? थोड़ कष्ट सहन नहि क’ पैघ विपत्तिकेँ नोतबाक स्थितिमे कहल जाइछ।
आजुक जनमल गोर लागे दे बूढ़-पुरानसँ नवयुवक सम्मा नक आकाङ्क्षा रखैछ, तँ व्यंुग्ये।
आजुक बउआ काल्हुाक नानी जे आइ बच्चाल अछि वैह काल्हि नानी बनि जाइछ।
आजुक बनियाँ काल्हु क सेठ जे आइ बनियाँ अछि ओ काल्हि सेठ बनि जाइछ।
आट गायन बाट गायन, चूल्हिक दुआरि गायन गीत गायनक अनेक प्रकार होइछ।
आटाक चिराग घर राखू तऽ मूस खाय,बाहर राखू तऽ कउआ लऽ जाय दीप आटाक बनल अछि तँ ओकरा घरमे रखैत छी तँ मूस खा जाइछ।
आटाक संग घून पिसाय आटाक सँग घून सेहो पिसा जाइछ।
आटा भगजोगनी, रोटी खकचोदनी आटा तँ भगजोगनी सदृश उज्ज,र दप-दप छल, मुदा रोटी किएक अधलाह भ’ गेल ? साधन-सम्पमन्न रहलोपर कार्य अधलाह होइछ, तँ व्यंजग्यप।
आटा भे गील बनैछ ने लोइ, जउबन भेल ढील पुछैछ ने कोइ जहिना आँटा गील भेला उत्तर ओकर ने लोइया बनैछ आ ने तँ रोटी, तहिना यौवन ढील भ’ गेलापर क्योक नहि पूछैछ।
आठ आना पर दुरगापाठ सतनारायन सूकी, येहूपर जे ने सुने सेहू करम के चूकी आठ आना दक्षिणा देलापर दुर्गापाठ, चारि आना दक्षिण देलापर सत्य नारायणक पूजा होइछ।
आठ जोलहमे नौ हुक्का्, ताहिपर होइछ थुक्क म थुक्कार जोलहाक संख्या आठ अछि, हुक्काहक संख्या नौ तथापि सब मिलि क’ आपसमे झागड़ा क’ रहल अछि।
आठ बार नौ त्यौ हार हिन्दू समाजमे व्रत-त्यो हारक प्रधानता रहैछ।
आठे बड़द, पराते मरद बड़द आठ दिनक पश्चाजत् तथा पुरुष एकहि दिनमे भोजनाभावक कारणेँ दुब्ब र भ’ जाइछ।
आतुल काम दरब सऽ होय कोनो कार्यमे शीघ्रतासँ पैसा खच्र कयलासँ भ’ जाइछ।
आदमी जानी बसने,
सोना जानी कसने जहिना सोनाक परिशुद्धताक जानकारी, तँ कसौटीपर कसले उत्तर होइछ तहिना कोन आदमी केहन अछि तकर वास्त वतिक जानकारी तखने होइछ जखन ओ लगमे रहब प्रारंभ करैछ।
आदमीमे एक नउआ देख,पंछीमे एक कउआ,
गाछीमे एक झउआ देखल, नउआ कउआ झउआ आदमीमे नौआ, पंछीमे कौआ तथा वृक्षमे झौआ अपन धूर्त्तताक हेतु प्रख्याकत अछि।
आदमी हाँकी आगू से मनुष्याकेँ आगाँसँ चलयबाक प्रयास करबाक चाही।
आदर ने मान , सात बेर सलाम आदर सम्मानन तँ किछु ने छनि, मुदा सात बेर अनेरे सलाम कयल जाइत छनि।
आदर सऽ अहु कटहर ने खाय, नेड़हा लऽ बहु घुसकल जाय सम्मा न पूर्वक कनियाँसँ कटहर खैबाक आग्रह कयल जाइछ तँ नहि खाइछ, मुदा नेढ़ा हेतु स्व यं घुसकल जाइछ।
आदरे बु‍हरिया कटहर ने खाय, मोछा ला पिछुआड़ा जाय सम्माछनपूर्वक बहुकेँ कटहरक कोआ देल गेल, मुदा ओ नहि खयलक आ परोक्षमे कटहरक मोछा ल’ कए खाइछ।
आदि घी ने अन्तन दही, ताहि भोजन क गीरब कही भोजनक प्रारम्भनने घी एवं अन्तरमे दही अनिवार्य अछि अन्युथा ओकर गणना भोजनमे नहि होइछ।
आदि ने दिजै आदरा अन्तन न दिजै हस्तन, कहे घाघ दोनो गए पण्डित ओ गिरहस्तद वर्षाऋतुमे आर्द्रा नक्षत्रक प्रांरभमे तथा हस्त नक्षत्रक अन्तनमे जँ वर्षा नहि होइछ तँ घाघ कहैछ जे गृहस्थ अत्यकन्तर दुखी रहत कारण उपजाबारी नहि हेतैक।
आदि बिरोध नीका, अन्तय बिरोध ने नीक कोनो कार्यक जँ विरोध करबाक हो तँ प्रारम्भ्मे करबाक चाही।
आदि भ्रष्टक नीक, अन्त भ्रष्टी ने नीक कोनो कार्यक प्रारं‍भिकावस्थ हिमे अपन मुह मोडि़ लेबाक चाही।
आदी गुड़ कपास, नफा खाय बसात आदी, गुड़ एवं रुइयामे बसात लगलासँ ओकरमे खराबी आबि जाइछ।
आदी मिरचाइक कोन संग आदी एवं मिरचाइ दुनू एक दोसाराक विरोधी अछि अतएव दुनूक मिलना अनुचित अछि।
आध घर धूम धाम आध पर हुकरा एकहि ठाम आधा पर धूमधम मनाओल जा रहल अछि तथा आधा घर हुकरि रहल अछि।
आध पेट भोजन जबानी मउगति दुनू बरोबरि आधा पेअ भोजन करब आ युवावस्था क मृत्युअ समाने अछि।
आधा कहे से मरद बुझे, सउसे कहे से बड़द बुझे बुद्धिमान व्यदक्तिक हेतु इशारा पर्याप्तल मानल जाइछ, किन्तु् सब बा‍त फरिछा क’ मूर्खकेँ कहल जाइछ।
आधा गाम दिबाली, आधा गाम फाग आधा गाममे दीपावली भ’ रहल अछि तथा आधा गाम फगुआ मना रहल अछि ।
आधा घर खरहर, आधा घरत भीत आधा घर खरक बनल अछि तथा आधा घर माटिक भीतक।
आधा घर देउकुर, आधा घर भरसाइ आधा घरमे देवताकेँ स्था पित कयने छनि तथा आधामे भट्ठी चलैत छनि।
आधा घर टटउ, आधा घर भीतउ आधा घर टाटक छैक तथा घर भीतक।
आधा चितरा राइ मुरइ, आधा चितरा जौ केराइ आधा चितरा नक्षत्रमे वर्षा भेलापर राइ, मुरइ , जओ आ केराओ होइछ।
आधा छोडि़ सउसे जे धाबे , एहन डूबे जे थाह ने पाबे अपन एक अंशकेँ छोडि़ क’ संपूर्ण प्राप्तर करबाक जे अभिलाषा करैछ तकर परिणाम होइछ जे ओकर अपन एक अंशक संगहि संग संपूर्ण मूल धन डूबि जाइछ।
आधा तजे पण्डित, सरबस तजे गँबार चतुर व्यपक्ति आधा गमाक क’ संतोष क’ लैछ, मुदा जे मूर्ख होइछ ओ अपन सर्वस्वष गमा क’ दम लैछ।
आधा तितिर आधा बटेर कोनो कार्यक आधा स्वूरूप किछु एवं आधा किछु रहलापर प्रयुक्ता होइछ।
आधा माघे, कम्ब‍र कान्हे आधा माघ समाप्तर भेलापर कम्बरल कान्हेघपर रहैछ, कारण जाड़क आधिक्ये होइछ।
आधा मारि धररिया खाय मारि-पीटमे आधा मारि छोड़ौनिहारेकेँ लगैछ।
आधा मुरगी आधा बटेर देo आधा तितिरि आधा बटेर
आधा राटी बस, कायथ छऽ कि पस, तीन राटी पट्टा, कायथ छऽ कि ठट्टा भोजन काल कोनो कायस्थ, कहलक, ‘हम कायस्था छी तेँ हमरा आधा रोटी देब।
आधा हाल समदिया जाने आधा बात तँ संवाद ल’ गेनिहार व्याक्ति जानि जाइछ अर्थात ओ गोपनीय नहि रहैछ।
आनक कमाइपर तीन टिकुली, एगो कच्ची एगो पक्कीत एगो लाल बिन्दुगली दोसरा द्वारा उपार्जित धनपरन लाल-पीअर काँच-पाकल टिकुली सटैत अछि।
आनक धनपर मदन गोपाल दोसराक धनपर मदन गोपाल बनैत अछि।
आनक धन्धाप आन करे, आँड़ पिचा पिचा कऽ बानर मरे दोसराक धन्धाऽ जँ दोसर करैछ, तँ ओकर दुखद परिणाम भोगय पड़ैछ।
आनक मउगी आनक चिन्ताग, कनही के भतार के चिन्ताि अधिकांश स्त्रीिक ई स्वकभाव होइछ जे ओ आनक चिन्तातसँ सतत चिन्तित रहैछ, मुदा कनही एक एहन स्त्रीस अछि जकरा सतत अपन भतारक चिन्तार लागल रहैछ।
आनक मिरचाइ पाइ, तऽ आखिओमे लगाइ मँगनीमे जँ मिरचाइ भेटि जाय तँ ओकरा आअखिमे सहो लगाओल जाइछ।
आनक हाथ, नित उपास दोसरापर अबलंवित रहनिहार व्यसक्तिकेँ प्रतिदिन उपवास करय पड़ैछ।
आन के आन के चिन्ता , भानो के भतार के चिन्तान दोसराकेँ दोसराक चिन्ताै रहैछ, मुदा भानोकेँ सतत चिन्तान रहैछ।
आन के चीज छाजे ने, छीन ले तऽ लाजे ने मँगनीक वस्तु कतहु शोभा दैछ? चीजबाला जखन छीन लैछ तथापि लज्जाक नहि होइछ।
आन देत खोंटि कऽ हैब मोट दोसर जँ खोटि क’ देत तँ ताहिसँ मोट थोड़बहि भ’ जायब ? ककरो दानसँ क्योब धनवान नहि भ’ जाइछ।
आन देसक बगुला, आन देसमे बकलोल एक देशक बगुला जखन दोसर देशमे जाइछ तँ ओ बकलोल कहबैछ।
आन सऽ मारे तान सऽ मारे, तइयो ने मरे तऽ रान से मारे आनसँ जँ नहि मरैछ, तँ तानसँ मारबाक प्रयास करैछ।
आनी ने छोड़े बानी, जोलहा ने छोड़े अपन तानी जहिना घमंडी व्यनक्ति अपन बोली-वाणीमे परिवर्त्तन नहि अनैछ तहिना जोलहा अपन तानी-भरनी कथमपि नहि छोड़ैछ।
आसी सऽ बानी, रंग सऽ पहचानी बोली-चालीसँ ककरो नीक एवं अधलाह गुण जानल जा सकैछ।
आनी से बानी, बोली से पहचानी देo आनी सऽ बानी
रंग सऽ पहचानी
आनी से बानी चालि से पहचानी, हमरा सऽ सखी बड़ी सियानी एक सखी दोसर सखीसँ कहैछ, ‘अहाँक रहस्यीमय वाणी तथा चालिसँ हम अहाँकेँ नीक जकाँ चिन्हय गेलहुँ ।
आनो के आन चिन्ता‍, रानी के रजबेक चिन्ता आन व्य क्तिकेँ आन विचार अबैछ, किन्तुच रानीकेँ सतत राजाक चिन्ताव रहैछ।
आन्हकर आँखि लेल आँजन निष्प्र योजन कार्यपर व्यं ग्यक।
आन्हपर आगाँ रोइ, अपन दीदा खोइ आन्हपर व्यँक्तिक आगाँ कानलासँ अपन उपहास होइछ।
आन्हसर कनिया बहीर बर , अन्हसरा धुन्ह रा भीतर कर कनियाँ आन्ह र अछि तथा बर बहीर तेँ दूनूकेँ शीघ्रतासँ घरक भीतर करू।
आन्हकरक बिआहमे आफदे आफद आन्हकर व्यआक्तिक विवाहमे अनेक संकट उपस्थित होइछ।
आन्हथरक बेटा आन्हकर जे जेहन रहैछ तकरा फलो भगवान तदनुरूपेँ दैत छथि।
आन्हररक हाथ बटेर आन्हररक हाथमे बटेर आयल जकर ओ समुचित व्यदवस्थाब नहि क’ सकैछ।
आन्हिर की जाने बसन्तथ बहार जकरा कोनो वस्तुकक दर्शन नहि होइछ ओ ओकर विशेषताक संबंधमे की जानत ? अज्ञान व्याक्ति नीक वस्तुहक महत्त्व नहि बुझैछ।
आन्हछर कुकूर बसाते भूके आन्हछर कुकूर बसातक आहकटि पाबि क’ भूकय लगैछ।
आन्ह र कूटे भेमर कूटे, हमरा चाउर सऽ काज आन्हऽर अथवा कुरूप कुरूप व्योक्ति धान किएक ने कुटे हमरा तँ चाउरसँ प्रयोजन अछि।
आन्ह र के आन्हार कहने मुह बिधुआय आन्ह र व्यआक्तिकेँ आन्हबर कहलापर ओकरा अपार कष्अुक अनुभव होइछ।
आन्ह र के अन्हावरमे बड़ सुझैछ जे आन्ह्र अछि तकरा अन्धेकारमे की सुझत ? विपरीत अथवा बेमेलक बात कलहापर व्यंेग्यत।
आन्हपर गाय के राम रखबार आन्हपर गायक रक्षक भगवान छथि।
आन्हपर गाय धनमक रखबारी गाय आन्ह‍र अछि तेँ धर्मक रखबार अछि।
आन्हआर गुरू बताह चेला, माँगे गुड़ तऽ देबे ढेला गुरु आन्ह र छथि तथा हुनक चेला बताह छनि, तेँ जँ माँगैत छथि गुड़ तँ ओ ढेला दैछ।
आन्ह र गुरू बहीर चेला, दुनू नरकमे ठेलम ठेला गुरु आन्ह र छथि तथा चेला बहीर, तेँ तँ नर्कमे दुनूक ठेलम भ’ रहल छनि।
आन्हमर चाहे दुनू आँखि आन्हमर व्येक्तिक सतत अभिलाषा रहैछ जे ओकरा आँखि भेटि जाय।
आन्ह र पीसे कुकूर खाय आन्ह र जँ आटा पीसत तँ कुकूर खयबे करत।
आन्ह र बइमान बिनु आँखिक व्य क्ति जखन बइमानीपर आबि जाइछ तखन व्यंमग्य ।
आन्हजर बगुला के मुह मारे गरइ बगुला आन्हखर अछि तेँ गरइ (एक प्रकारक माछ) ओकरा मुह मारि रहल अछि।
आन्हार बगुला कोदो खाय बगुला आन्हखर अछि तेँ माछक बदला ओ कोदो खाइछ।
आन्ह र मुल्लाि टुटल मसजीद मुल्लाा आन्हलर छथि तेँ टुटल मस्जिदमे नमाज पढ़ैछ।
आन्ह र रसिया एनापर मरे आन्ह र व्ययक्ति सतत एना देखबाक हेतु उत्सुपक रहैछ।
आन्हुर लेखे राति दिन बरो‍बरि आन्हुर व्येक्तिक हेतु रातिदिन एक समान होइछ।
आन्ह।र सिपाही कनही घोड़ी, बिधि मिलौलन्हि नीके जोड़ी सिपाही आन्हीर अछि, मुदा चढ़ल अछि कनाहि घोड़ीपर।
आन्ही मे बगुला के पता अन्हीरमे कतहु बगुलाक पता चलय ? विकट स्थितिक सामना समार्थ्य वान व्याक्तिए क’ सकैछ।
आप डूबे बभना जजमाने लऽ डूबे ब्राह्मण अपने तँ डुबिए रहल छथि संगहि संग हुनक यजमान सेहो डूबि रहल छनि।
आप मियाँ उल्लू पढ़ाबे चलला तोता मियाँ स्वउयं तँ मूर्ख छथि, किन्तु तोताकेँ पढ़यबाक प्रयास क’ रहल छथि।
आप मियाँ मङरो दुआरे दरबेस अपने मियाँ भीक्षाटन क’ जीवकोपार्जनन करैछ तथापि ओकरो दरबज्जाेपर भीख माँगनिहारक भीड़ अछि।
आप भला तऽ जग भला जँ क्योत अपने नीक अछि तँ संसार सेहो नीक अछि ओकरा हेतु।
आपरपर धन भेल, गाँडि़ बाटे दम गेल नव धनिक वाह्माडम्बगर बेसी करैछ, तँ प्रयुक्त ।
आपरपर धन भेल, बेङ महाजन भेल नव-नव धन भेलनि तँ बेङकेँस महाजन बनौलनि।
आपरूप भोजन पररुप सिंगार भोजन अपन रुचिक अनुकूल तथा श्रृंगार-प्रसाधन आनक अनुकूल रहब समुचित ।
आपे अछइतें बाबा ने लागे जँ आयु अछि तँ कोनो बाधा नहि होइछ।
आब आब के पूता मरलन खटिआ तरमे पानी, एहन पाठ ने पढ़ला पूता अपने सिर बिसानी आब-आब करैत बेटाक मृत्यप भ’ गेल, मुदा पानि तँ खटिआक नीचाँमे पड़ले रहि गेल।
आब की मैञा मैञा, आब तऽ सैञा सैञा नव युवतीक नव प्रवृत्तिपर व्यंबग्या।
आबत हाही जाइत सन्तो्ख सम्पति अयलापर हाही लागल रहैछ, मुदा जखन जाय लगैछ तखन सन्तोलषक अतिरिक्तल कोनो उपाय नहि रहैछ।
आब पछतेने हैत की, चिडि़या चुगल खेत समय बितलापर पश्चा त्ताप निष्प्रलयोजन होइछ।
आबा जाही गाजीपुर, चुड़ा दही हाजीपुर आयब-जायब तँ करैत छथि गाजीपुरा, मुदा बेरमे हाजीपुरमे उपस्थित भ’ जाइछ।
आबि जेती ननदो, टिका जेती माँग,
फेरु तऽ हमही ननदि अयलीह, माँग टीका क’ चल गेलीह।
आबे के अबेर जाय के सबेर, बसिया कलउ तीन तीन बेर अबैत छथि देरीसँ, मुदा जाइत छथि सबेरे।
आबे तऽ भाबे ने,
चल जाय तऽ मन पछताबे जे वस्तुऽ लगमे छल तहिया मन नहि लागल तथा जहिया हाथसँ निकलि गेल तँ पश्चातत्ताप होइछ।
आम इमलीक कोन संग आम इमलीक मिलन असंभव अछि। पक्ष एवं विपक्षक भेट भेलापर वास्तषविकताक जानकारी होइछ।
आम उखरले दोबर, कटहर उखड़ले गोबर आमक गाछकेँ एक स्थालनसँ उपारि क’ दोसर स्थाँनपर लगौला उत्तर ओहिमे नीक फल होइछ।
आमक आम, आँठीक दाम आमक जतेक आमदानी भेल ओ सब नेबोक व्यामपारमे समाप्त भ’ गेल।
आमक लकड़ी नीमक खडि़का, खोलू केबाड़ नइ तऽ हैत लडि़का एक प्रकारक बुझौलि थिक, जकर प्रयोग लोक विभिन्नब अवसरपर करैछ।
आमक लकड़ी बेलक पात, लउआ बाभन बरक बाप विवाहोवसरपर वरक संग नौआ हँसी करैछ।
आम खयबा सऽ काज, की गाछ गनबा सऽ काज आम खयबासँ काज अछि अथवा वृक्ष गनलासँ ? फल प्राप्तिक प्रयास करबाक चाही।
आम जामुन एको ने आयल मारल गेल सिसकारी, कन्हाग चितरा मुह मारलक उपजल छुच्छेो खोसारी एहन समय आयल जे आम जामुन किछु ने फड़ल।
आम पालक, कटहर डालक गछपक्कू आमक अपेक्षा पालपर पकाओल आम तथा कटहर गछपक्कू खयबा योग्यत होइछ।
आय आम की जाय झटहा झटहा चलयबाक परिणाम इएह हैत जे आम टुटि क’ खसत अथवा झटहा बेकार चल जायत।
आय छूटल बाय भेल एक बिमारी छूटल दोसर पुन: प्रांरभ भ’ गेल।
आय बजर कान्हु चढ़ल वज्र आबि क’ का‍न्हा चढि़ गेल।
आय माय के ठोप ने, बिलाइ के काजर सर-संबंधी जे हकार पुरय अयलथिन तनिका सिनूर काजर किछु ने देल गेलनि मुदा बिलाइकेँ काजर कयल गेल ।
आय माय के ठोप ने, बिलाइ माथा ठोप देo आय माय के ठोप ने
बिलाइ के काजर
आय माय के भेटक लाबा, पदनो के मिठाइ सर-संबंधीक स्वबगत तँ भेंटक लाबासँ कयल गेलनि, मुदा उपेक्षित जे छलीह तनिक स्वािगत मिष्टाेरन्नलसँ भेलनि।
आय माय के माथे तेल न, बिलाइ माथा तेल देo आय माय के ठोप ने
बिलाइ के काजर
आयल अगहन फुलल गाल, चइत महीना उहे हाल अगहन अयला उत्तर गाल फलि गेलनि किएक तँ धनकटनी प्रारंभ भेल मुदा चैत्र मासमे जखन घरमे अन्नर घटि गेलनि तँ वैह हाल भ’ गेलनि।
आयल कन्या गत फुलायल काँस, बाभन कूदे नौ नौ बाँस ककरो ओतय घटक अबैछ तँ सबसँ बेसी प्रसन्ता घटक होइत छनि ब्राह्मण (पुरोहित) केँ, किएक तँ यजमानक ओतय विवाह सम्प न्नत हैत तँ दान-दक्षिणा भेटत।
आयल चइत सुहाबन, फुरही के मइल छुड़ाबन चैत्रमास सोहाओन आयल।
आयल तऽ ईद बरियात, ने आयल तऽ जुम्मे रात जँ आबि जायत बरियात साजि क’ तँ विवाह सम्पतन्ना भ’ जायत अन्येथा जुम्मार रहत।
आयल पानि गेल पानि, बाटे बिलायल पानि पानि जहिना आयल तहिना चल गेल अर्थात् रस्ताहमे ओ बिलीन भ’ गेल।
आयल बहु आयल काम,
गेल बहु गेल काम घरमे जतबे बेसी लोक रहैछ काजक आधिक्यत ततबे रहैछ।
आयल सउतिन करऽ सिंगार सौतिन जखन आबिये गेल तखन श्रृंगार- प्रसाधनक अधिक प्रयोजन होइछ।
आयल सउतिन भेल सिंगार, भेल बेटी गेल सिंगार घरमे सौतिन आयल अछि तँ श्रृंगार-प्रसाधन करबाक चाही।
आरसी ने पारसी, मियाँ जी बनारसी आरसली-फारसी किछु ने जनैछा, मुदा अपनाकेँ बनारसी कहैछ।
आरी जाइत कपार लाठी, बीच बंगामे चरबाही अपने तँ खेतक आरिपर चलनिहार पर्यन्त केँ लाठी मारैत छथि, मुदा दोसराक खेत द’ कए चरबाही करैत छथि।
आल फुलल गाल फुलल मडुआ गुजरानी,उ फलनी के पेट भेल फलना बउरानी ककरो कचकचयबाक हेतु प्रयोग होइछ।
आलस निदश आ जम्हातइ, ई तीनू अछि कालक भाइ आलस्या, निद्रा एवसं हाफी ई तीनू कालक लक्षण थिक।
आलसी पड़लन कुआँमे, तऽ राति बीच रहे दे आलसी व्यदक्ति इनारमे खसि पड़ल।
आलसी लेखँ गंगा बड़ी दूर आलसी व्यँक्तिक हेतु गंगा सेहो बड़ दूर भ’ जाइछ।
आलू खा कऽ चालू विशेष चतुर बननिहर व्यकक्तिपर व्यं़ग्यल।
आल्हा ने लोरिकायन, दुनू साँझ रामायन ने तँ आल्हाब गबैछ आने तँ लोरिकायन, प्रत्युलत दुनू साँझ रामायणक पाठ करैछ।
आसकती खसल कुआँमे, तऽ कहलक एतकहि नीक देo आलसी पड़लन कुआँमे
तऽ राति बीच रहे दे
आसकती बहुरिया घसकती ने, पइला लऽ कऽ मसकती ने पत्नी केँ आलस्य़ एतेक बेसी छनि जे ओ एक स्थासनसँ दोसर स्थाकनपर नहि जैती तथा बासनमे राखल वस्तुर नहि खैती।
आसक माय निरासक बाप, संपतिक बहिन बिपतिक इयार जकर माय जीवित रहैछ तकरा आशा बनल रहैछ, मायक मृत्यु परान्त बापसँ निराशा भेटैछ।
आस भेल निरास, सतुआ ढारलहुँ पानि कोनो आशाक पर्त्ति नहि भेलापर अन्तहत: परिस्थितिसँ समझौता कयलापर प्रयुक्तु।
आसा मरे निरासा जीबे आशान्वित रहि लोक जीवित रहि सकैछ, मुदा निराश भेलापर ओकर जीवन समाप्तक भ’ जाइछ।
आसिन कातिक जे नर सोबे, ताके नाम बिधाता रोबे आश्विन एवं कार्तिक मासमे दिनमे जे सुतैछ तकरा नामपर भगवान सतत विलाप करैछ जे ई कोना स्वगस्थि रहत।
आसिन के टूटल मरद, चइत के टूटल बड़द ने सम्ह,रे आश्विन मासक दुबरायल पुरुष तथा चैत्र मासक दुबलायल बड़द पुन: नहि सम्हबरि सकैछ।
आसिन मास बहे इसान, घर घर कापे गाय किसान आश्ख्विन मासमे ईशान कोणसँ जँ बसात बहैछ तँ एतेक वर्षा होइछ जे फासिल तँ नष्ट भ’ जाइछ संगहि जाड़क कारणेँ गाय एवं किसान सेहो थरथरा जाइछ।
आसी सऽ मच्छेर कासी गेल, बनगाम चेनपुर कयलक कचहरी, उठ गे बुढि़या जोर घूर, धिया पूता के कयलकउ भूर,
कोना कऽ बाबू जोड़ब घूर, हमरो पीइ पर तीन टा भूर, अइ घर डगरा ओइ घर सूप,
मच्छूर के मारओ चुप्पे चूप मच्छूरसँ कोना त्राण भेटि सकैछ ताहि प्रसंगमे कहल जाइछ।
आहि आहि आहि बड़ मथबाहि,
धान कूट रे मनसा हम भूख मरे छी धरनछ कयनिहार स्त्रीभ सतत एहन नाटक करैछ जे हम तँ पीड़ासँ मरि रहल छी।
आहि आहि बड़ सुलबाहि, घुरि बइस रे मनसा हम पूर पेटे छी पत्नीह पतिसँ कहैछ, हमरासँ कोनो प्रकारक आशा करब सर्वथा निराधार अछि, कारण हमरा सुलबाइ भ’ रहल अछि तथा हमर आखरी मास अछि।
आहे माहे गोजा रोरी खाहे जाहि रूपक आर्थिक स्थिति रहैछ तदनुरूपेँ अपन सब सर-संबं‍धीक संग निर्वाह करैछ, तँ कहल जाइछ।
इँगुर सेनुर किएक अनलहुँ, गुड़ अनितहुँ तऽ चटितुँ इँगुर एवं सिन्दूँर किएक अनलहुँ, गुड़ अनितहुँ तँ ओकरा चटिहुँ।
इग्गै र बाभन तिग्गै।र खोंपा, चलय बाभन झुलय खोंपा एहन ब्राह्मण अछि जकर तेहन खोंपा छैक जे चललापर झूलि रहल अछि।
इडिल मिडिलक छोडू़ आस, खुरपी लऽ कऽ घास मिडिल पास करबाक आशाक परित्या ग क’ दिअ आ खुरपी ल’ कए घास छीलू।
इतर पितर कोनो गहना छी देह तोड़ना छी, सोना चानी सब गहना छी पेट भरना छी पितरक गणना आभूषणक अन्तार्गत नहि होइछ, प्रत्युनत ओ देह तोडि़ दैछ।
इन घर नीन चान घर चोरी, जम घर मरन राज घर भोगी खाट बुनलाक बादओकर घर गनबाक प्रथा अछि।
इन्नेु उन्ने की देखइ छी, अइमे गेल छइ माघक फार एम्हा-ओम्ह‍र की देखैत छी एहिमे माघक फार लागल अछि।
इयारक गोस्सा। ऊपर प्रेमीक क्रोध पतिपर किएक उतारैत छी ? यथार्थत: अपराधी क्यो अछि, किन्तुइ क्रोध ककरोपर उतारल जा रहल अछि।
इयारबाक ढेहा लेल छह कोनो कारणेँ नायिका अपन प्रमीसँ नाराज भ’ जाइछ तँ ओकरासँ निरर्थक विवाद सतत करैत रहैछ।
इयैह खायल अखाढ़ बहब इएह खायल-पीयल आषाढ़ मासमे कार्य करब।
इयैह खैत अरसौती, कमायत परसौती नीक-निकुत भोजन अरसौती करैत अछि, किन्तुै काज करय पड़ैछ परसातीकेँ।
इयैह ले वैह ले पार कोनो अपराधसँ लंक ल’ कए पड़ा गेलापर कहल जाइछ।
इरखे नाङरि कटाबी, तऽ छौ मास बेत्थेा मरी ईर्ष्याछवश नाङरि कटबा ली, तँ छौ मास ओकर मरैत रही।
इसक नुकौने ने नुकाइछ प्रेमककेँ कतबो नुकाओल जाय तथापि ओ नहि नुका सकैछ।
इसक सउखीन आ खरचा के कोताही फैशने करबाक इच्छाक तँ बड़ बेसी छनि, मुदा ओहिपर खर्च करबामे कृपणता सेहो तहिना करैत छथि।
इसकी मूइला माघमे, सराध भेलनि बैसाखमे शक मिजाज व्य क्तिक मृत्यु तँ माघमे भेल, मुदा श्राद्ध वैशाखमे ।
इसखीक मौगति माघ मास इश्कक मिजाजक मृत्युम माघ मासमे होइछ।
इसखीक सेआखे बड़ इश्की बड़ बेसी शौक करैछ।
इस जाय मुदा टीस ने जाय क्रोध भनाहि समाप्त भ’ जाइछ मुदा मनक पीड़ा यथावत रहैछ।
इस्सू सऽ बिस्सू पहलमान इस्सू सँ बढि़ क’ पहलमान विस्सूम छथि।
इह सुतल पड़ल जे इहे अरजइ छथि,आनक तरकी बलहु बेचइ छथि अपने तँ सतत सुतले रहैछ तथा गर्व करैछ जे हमही उपार्जन करैत छी, किन्तु वास्विीकता एहिमे अछि जे दोसराक तरकी बल पूर्वक बेचि रहल अछि।
इहे मुहँ हो मियाँ, इहे मुहँ रे मियाँ एही मुहसँ हो मियाँ तथा रे मियाँ कहब।
ई आँगुर कटने अपने घाओ, ओ आँगुर कटने अपने घाओ ई आँगुर कटैत छी तँ अपने घाव होइछ तथा ओ आँगूर कटैत छी तँ अपने घाव होइछ।
ई एतेक डूबि कऽ पानि पीबइ छथि, जे एकादसीक बापो ने जाने क्योक एतेक डूबि क’ पानि पीबैछ जे एकादशीक बापकेँ एकर पता ठेकान नहि चलैछ।
ई कान सऽ सुनी, ओहि कान सऽ बहार करी एहि कानसँ सुनि क’ ओहि कानसँ बहार कयनिहार व्युक्ति छथि।
ई गुड़ खयने, कान छेदयने गुड़ खा क’ छेदा लेब।
ई घोड़ी घास ने खाय घोड़ी घास नहि खाइछ।
ई जनु बुझू पिया हीते, जेहन करइला तेहने तीते देo ई जनु बुझी सइयाँ मीठ
जेहन करइला तेहने तीत
ई जनु बुझी सइयाँ मीठ, जेहन करइला तेहने तीत ई नहि बुझबाक चाही जे हमर स्वायमी अत्यिन्ती स्नेाही छथि।
ई जाड़ गोनर सहत एहि बेड़क जाड शीतल पाटीसँ नहि सहल जा सकैछ।
ईइ बकरीद सबराति कुटनी, दाहा करे हाय हाय फगुआ बिसनी ईद, बकरीद, शबेबरातक अवसरपर कुटनीक प्रयोग जाइछ, किन्तुस दाहामे मृत्युीयोग रहैछ तेँ हाय-हाय कयल जाइछ।
ईद बकरीद सबे बराति, सब के गाँडि़ मारे तिलसकराँति ईद, बकरीद एवं शबेबरात मुसलमानक पर्व थिक तथा तिलासंक्रान्ति हिन्दूवक।
ई धिया जीती तऽ तीन नाम धरौरती ई बेटी जँ जीवित रहती तँ तीन नाम रखा देतीह।
ई नहि बुझी डाक निरबुद्धि, नासहि काल बिनासहि बुद्धि ई नहि चाही जे डाक निर्बुद्धि छलाह ।
ई बजार ककर, लेबे देबे तकर क्योा ककरोसँ पुछलक, ई बजार ककर छैक? उत्तर भेटलनि जे, क्रय-विक्रय कयनिहारक ।
ई बरही गाम कमओता, जनिका ने रुखान ने बसिला ई बरही की गाम कमयताह जनिका ने तँ रुखान छनि आ ने बसिला।
ई बुडि़बक गाम कमऔताहा, जनिका रसिला ने रुखान देo ई बरही गाम कमऔताह
जनिका ने रुखान ने बसिला
ई बूंद सऽ भेट कहाँ एहि उत्तम बूंदसँ भेट कतय ? अपन वस्तु्क प्रशंसा लोक स्वँयं करैछ।
ईरखे नांगरि कटाबी, तऽ छओ मास ब्येथे मरी आक्रोशशवश कोनो एहन काज करब व्यरथासँ अत्य धिक पीडि़त भेलापर प्रयुक्त होइछ।
ई लाजक पिआजु कीनि कऽ खयने छथि ई लाजबीच बेचि देने छथि।
ई लोहारक कुच्चीच, आगि पानि दुनूमे लोहारक कुच्चीच आगि पानि दुनूमे समान रूपेँ चलैछ।
ईसरक दरबारमे देर अछि अन्हे र ने भगवानक ओतय न्यारयमे विलम्बह संभव अछि, किन्तुय उचितक त्या ग नहि।
ई हाथ दाँत काटी तऽ अपने घाओ, ओ हाथ दाँत काटी तऽ अपने घाओ ई हाथसँ दाँत काटी तँ अपने घाव, ओहि हाथमे दाँत काटी काटी तथापि अपने घाव होइछ।
ई हाथ दिअ, ई हाथ लिअ जे जेहन करैछ ओकरा ओकर तेहने फल तत्काहल प्राप्ते भ’ जाइछ।
ईहे मियाँ दर दरबार, अपने मियाँ चुल्हिक छार मियाँ स्वायं घर एवं दरबारक काज-धन्धाा करैछ तथा चूल्हि पजारि क’ भानस-भात सेहो करैछ।
उकटीक खाय के, निकुटी के ने उकटी जँ ककरो खोअबैछ तँ बारंबार ओकर चर्चा करैछ, किन्तु ओहूसँ अधलाह अछि निकुटी अर्थात् कृपण, जकर निश्चित रूपसँ नहि खयबाक चाही।
उखडि़मे मुह देल, तऽ हडिया बिआबै चाउर उखडि़मे बेसी छाँटलापर क्षीण भ’ जाइछ जाहिसँ ओ हाँड़ीमे पसरैत अछि।
उखड़ीमे धान, तऽ ककबा आन उखडि़मे जँ धान रहैछ तँ माथमे ककबा पड़ैछ।
उखडीमे मूड़ी देब, तऽ चोटक कोन डर जखन उखडि़मे मूड़ी द’ देलहुँ तखन ओकर चोटक कोनो भय नहि।
उखरल बार की, फुफा बाप अयलन पाहुन फुफाक बाप पाहुन बनि क’ अयलाह ताहिसँ केशो नहि उखरि सकैछ।
उखरे बार ने, नाम बरियार खाँ नाम तँ छनि बरियार खाँ, मुदा एक केशो उपाडि़ सकैछ।
उगत उगे मह भरे, बिस्वुत उगे जाय नाम तँ छनि बरियार खाँ, मुदा एक केशो नहि उपाडि़ सकैछ।
उगत उगे मह भरे, बिस्वुत उगे जाय सूर्योंदयक संगहि-संग जूं कदाचित इन्द्रंधनुष उदित भ’ जाइछ तँ बुझबाक चाही जे अकाल निश्चषये पड़त।
उगह चान की लपकह पूरी, धिया पूता के मोचड़ह मूड़ी भाद्र शुक्लू चतुर्थीकेँ चौठचन्द्रकक पूजा मिथिलामे सर्वत्र प्रचलित अछि।
उगे अगस्तस बन फूले कास, अब नहि बरखा के आस अगस्तक फूल आ वनमे कास फुला गेलापर वर्षाक सम्भातवना नहि रहैछ।
उचरिंग के कोहबरमे संच उचरिंग केँ कोहबरोमे शांति नहि भेटैछ।
उचरिंग चढ़लन बकुचा, कहलन सब धन हमरे अल्पमबुद्धिक व्य,क्तिकेँ अकस्मावत अधिकार प्राप्तच होइछ तँ ओ सतत न्यािय विरुद्ध काज करैछ, तँ व्यं ग्यक।
उच्चार चढि़ चढि़ तेखा, सब घर एके लेखा पैघ-पैघ घरमे जा क’ देखलासँ सबठाम एकहि रूपक दृश्य भेटलापर प्रयुक्तँ होइछ।
उचित कहने संग बिधुआय उचित कहलापर मित्र सेहो असन्तुलष्टत एवं विमुख भ’ जाइछ तखन आनक कोन कथा।
उचित कहैत घर झगड़ा उचित कललापर घरमे झगड़ा भ’ जाइछ।
उछले कूदे तोरे तान, ताके दुनिया राखे मान जे अत्यदधिक उछल-कूद करैछ, संसार सेहो ओकरे प्रतिष्ठा दैछ।
उजरल गाममे ऊँट आयल, तऽ लोक कहलक बलबल कोनो मूर्खक गाममे ऊँट गेल तँ लोक ओकरा बलबल कहि संबोधित कयलक।
उजार गाममे मुरार महतो उजड़ल गाममे मुरार महतोकेँ अत्योधिक प्रतिष्ठाम देल जाइछ। जतय प्रज्ञावान व्यकक्ति अभाव रहैछ अल्परज्ञानी व्ययक्तिकेँ महत्त्वक दृष्टिएँ देखल जाइछ।
उटक्किर पंचे ड़ेढ सौ अन्दािजसँ कोनो बात कलापर व्यं्ग्यम।
उठऽ बहुरिया साँस लऽ, ढेकी छोडि़ जाँत लऽ उठू हे कनियाँ ! कनेक्शन साँस ल’ लिय।
उडि़यायल सतुआ पितर के दान सतुआ उडि़या रहल तेँ पितरकेँ दान द’ देलियनि ।
उडि़यस मारि कऽ हाथ गन्हैकब उड़ीस मारि क’ हाथ मँहकायब।
उढ़रबाक मन ने तऽ, बाबा खिसिऔता प्रमीक संग भागबाक इच्छाै तँ छनि ने, कहैछ जे बाबा क्रोधित हैताह।
उढ़री के ने गामक ठेकान, ने नामक ठेकान जे परिवारक परित्याेग क’ तकर गामक प्रसंगमे जिज्ञासा करब सर्वथा अनुचित अछि।
उढ़री बहु छप्पारमे साँप बताबे दुश्च रित्र स्त्री छप्पछरमे साँपक हल्लाि करैछ।
उत तब इतकी जे व्यइक्ति क्षणहिमे अपन विचार परिवर्तित करैद तथा कोनो विषयपर स्थिर नहि रहैछ तकरा प्रसंगमे कहल जाइछ।
उतर गरजे दक्खिन बरिसे मेघ उत्तर दिशामे जँ मेघ गर्जन करैछ तँ बुझबाक चाही जे वर्षा दक्षिण दिशामे हैत।
उतर गरु दक्खिन बरिसे मेघ, कोना बिद्य पढ़े अकेला जँ गुरु कतहु होथि तथा चेला कतहु तँ एहना स्थितिमे विद्यामे कोना विकास हैत ? पठन-पाठन संभव नहि।
उतराचौरी ढक्कान बिगाड़ी उतार-चढ़ाबक बात कहि क’ कए घरकेँ बिगाडि़ देनिहारपर व्यं ग्य ।
उतरा जानि बनियाह बान्ह उतरा नक्षत्रमे जानि क’ खेतक आरि ऊँच क’ बन्हाबाक चाही।
उतरामे जनि रोपह भाइया, तीन धान हो तेरह पइया उत्तर फाल्गु नी नक्षत्रमे धान नहि रोपबाक चाही।
उतरामे जे बहे उतराही, अँगने गगरी भर बहुराही उतरा नक्षत्रमे जँ उत्तर दिशासँ बसात बहैछ तँ वर्षा अत्येधिक होइछ।
उतरि गेल लोय, तऽ की करत कोय जखन युवापस्थाे उतिर गेल तखन के की करत ? निरपराध भ’ गेलापर क्योो किछु नहि क’ सकैछ।
उत्तर के राजा दक्खिन के मेघ, परजाक भागे अबैछ उत्तर दिशासँ राजा तथा दक्षिण दिशासँ मेघ प्रजाक सैभाग्यासँ अबैछ ।
उत्तम खती मद्धम बान, अधम चाकरी भीख निदान खेती सर्वोत्तम अछि, किन्तुक अन्यक व्य।वसाय मध्य म।
उदन्तस घोड़ी दू दन्तछ गाय, माघे भँइस गोसइयें खाय बिनु दाँतक घोड़ी, दू दाँतक गाय तथा माघ मासमे जँ महीस बिआय तँ मालिकक मृत्युज भ’ जाइछ।
उधारक बाप तगादा तगादा उधारक बापक समान अछि।
उधार दऽ कऽ दुसमनी लेब बनियाँ ककरो उधार दैछ ओ शत्रुता मोल लैछ।
उधोक टोपी माधोक माथ उधोक टोपी माधोक माथपर छनि।
उनटा गंगा बहायब स्वा भाविक विषयकेँ अस्वालभाविक रीतिएँ प्रस्तुपत कयलापर कहल जाइछ।
उनटा बयना पुनटा बयना, बाँझ घरमे केहन बयना बैन तँ परस्पनर लेन-देन थिक।
उनटे चोर कोतबाल के डाँटय चोर उनटे कोतवालककेँ डाँटि रहल अछि।
उनटे चोर बैकुंठे जाय चोर उनटे वैकुण्ठ जा रहल अछि।
उनटे चोरा मारा मारी चोर उनटे अपनहिमे मारा-मारी क’ रहल अछि।
उनैस बीसक फरक प्रत्येसक वस्तुामे कम वा बेसी होइछ।
उपकारक घपकार उपकारक बदला अपकार कयनिहारपर व्यंरग्य ।
उपजल आङन पोआरहि चिन्हीह उपजा बाड़ी केहन भेल अछि तकर यथार्थताक पता आङनमे राखल पोआरहिसॅं भ’ सकैछ।
उपर सऽ महकारी, तरमे बीया कारी जेहन देखबा सुनबामे छथि तकर विपरीत हुनक स्वबभाव सेहो छनि।
उपाय किछु ने मन बड़ पैघ प्रयास किछु ने करैछ, मुदा मनोकामना बड़ पैघ बनबैत अछि।
उपासक राति बड़ पिआर उपवासक राति अत्यिन्त प्रियगर होइछ।
उपास सऽ पुतोहुक अँइठ भला उपवास करबाक बदलामे पुतोहुक अँइठ खायब नीक अछि।
उरंतमे बगेड़ी, गरंतमे ओल, जलन्तछमे रोहू आकाशमे उड़निहारमे बगेड़ी, माटिक नीचाँ रहनिहार ओल, तथा जलमे रहनिहार रोहु माछक स्वालद अत्यतन्ति प्रियगर होइछ।
उरिदक भाओ पूछी, तऽ बाङ नो पसेरी भाव पूछि रहल छियनि उड़ीदक, मुदा कहि रहल छथि जे बाङ नौ पसेरी एक रुपैयाक।
उलकी भुलकी सब केओ दी, बित्ता भर लगुरी केओ ने दी विभिन्ने प्रकारक बात बनयबामे सब दक्ष रहैछ, मुदा प्रयोजन पड़लापर एक बीत पुरान वस्त्रो क्योो ने दैछ।
उलटा साँप सपहेरिये काटे साँप उनटि क’ साँप पकड़निहारकेँ काटि लैछ।
उलुआक बेटा भेल, उतपाती नाम धरायल मूर्ख व्याक्तिकेँ जखन सन्ता न भेल तँ ओकर नाम उपतपाती राखल।
उसकायल आँच आ ठुनकायल पुतोहु ने सुधरैछ आँच शनै:-शनै: लगैछ तँ नीक।
उसिना चाउर दालि खेसारी, मगध देस जनि जाइ मुरारी मगध देशमे रहनिहार उसिना चाउर एवं खेसारीक दालि खाइछ, अतएव ओतय कन्याीक विवाह नहि करबाक चाही, कारण भोजन जनित कष्टक होइछ।
ऊँच चढ़ी कऽ देखल, घर घर एके लेखल पर्वतपर चढि़ क’ देखल तँ ओतयसँ पृथ्वीरक वस्तु समान दृष्टिगत भेल।
ऊँच दोकानक फीका पकमान दोकन तँ निश्चकये ऊँच अछि, मुदा ओकर पकमान फिक्काच अछि।
ऊँच नीच चास,धीए पूते बास खेत ऊँच नीचमे रहलापर ओहिमे नीक होइछ तथा घरमे धीयापूता रहलापर घरक सौन्दतर्य बढ़ैछ।
ऊँच बरेड़ी फोफड़ बाँस, रीन खाइ बारहो मास घर तँ ऊँच छनि, मुदा ओहिमे फोफड़, बाँस लागल छनि, किन्तुा कर्ज बारहो मास खाइत छथि, अर्थात् घरमे उपजाबाड़ीक अभाव रहैछ।
ऊँच हबेली फोफड़ बाँस,रीन खाय बारहो मास जाहि हबेलीमे ताहिमे वाला बाँस लागल छैक, मुदा कर्ज तँ सब दिन ल’ कए जीविकोपार्जन करैछ।
ऊँचा चढि़ चढि़ देखा, घर घर एकहि लेखा पैघ-पैघ व्य क्तिक घर जा क’ देखलहुँ, मुदा सब ठाम एकहि रूपक व्यघवस्था् अछि।
ऊँचे चढि़ बइसिहो, कोइली संग कुहुकिहो ऊँच स्था नपर बैसि क’ कोइलीक समान मधुरवाणी बजबाक कामना कयल जाइछ।
ऊँटक आगाँ बूटक ढेरी ऊँटक आगाँ जँ बूटक ढेरी राखल जायत तँ ओ थोड़बहि छोड़त ? जकर जे भोग्यक अछि ओकरा आगाँ देलापर ओ ओकरा नहि छोडि़ सकैछ।
ऊँटक ऊँचाइक गियान ने ऊँट कतेक ऊँच अछि तकर वास्त विकताक ओकरा कोनो ज्ञान नहि रहैछ।
ऊँटक ऊँट, बलियाँक लूट बनियाँक ओतय जखन ऊँटक चोरि होइछ तँ ओकरा संग-संग आनो-आनो वस्तुकक चारि भ’ जाइछ।
ऊँटक चोरी झुकल झुकल ऊँटकेँ चुप्पकहि चाप नहि चोराओल जा सकैछ।
ऊँटक पनाह पच्छिम भर ऊँटक प्रकृति होइछ जे ओ सतत पश्चिम दिशामे भागैछ।
ऊँटक पाद ने जमीनक ने आसमानक ऊँट जे बसात छोड़ैछ ओ ने तँ पृथ्वी पर अबैछ जे आसमानमे जाइछ।
ऊँटक मुहमे जीरा, चमारक मुहमे खीरा जहिना ऊँटक मुहमे मुहमे जँ जीरा समान अल्पाभोजन देल जाय तँ ओकर कोनो महत्व नहि होइछ तहिना चमारकेँ खीरा मात्र खैबाक हेतु देल जायत तँ ओकरा की भ’ सकैछ ? पेटूक काज कम भोजन सँ नहि चलि सकैछ।
ऊँटक मुहमे जीरक फोरन बहुभोजी ऊँटक आगाँ अल्पाभोजन देला सँ की हैत ? आकृति-प्रकृाति अनुपातमे भोजन नहि भेटलापर व्यंँग्यभ।
ऊँट कोन करोअ बैसइत अछि पता नहि जे ऊँट कोन करोट बैसैछ।
ऊँट गेल सिंघ माँगे, कान हेरौने आयल ऊँट सिंघ माँगबाक हेतु कतहु गेल, किन्तुन ओकर परिणाम भेलैक जे ओ कान पर्यन्ता हेरा क’ ओतयसँ चल आयल ।
ऊँट घोड़ा भाइस गेल, गदहा पुछे पानि नदीमे जालाधिक्यगक कारणँ ऊँट, घोड़ा भसिया गेल, मुदा गदहा पूछि रहल अछि, कतेक पानि? जतय पैघ व्यूक्ति हारि मानि क’ बैसि जाइछ ततय छोअ व्यिक्ति कार्य करबाक साहस करैछ, तँ कहल जाइछ।
ऊँट चोराइ खले खले देo ऊँटक चोरी झुकल झुकल
ऊँट डूबे खच्च र थाह माँगे ऊँट डूबि रहल अछि, मुदा खच्चइर थाह माँगि रहल अछि।
ऊँट बउराय तऽ पच्छिम जाय देo ऊँटक पनाह पच्छिम भर
ऊँट बहि गेल गदहा पूछए कतेक पानि देo ऊँट डूबे खच्चनर थाह मांगे
ऊँट बिदारथी बानर, तीन जाति गाँडि़ आन्हबर ऊँट विद्यार्थी एवं बानरक प्रकृति एक समान चंचल होइछ, जे जगत्प्रतख्या त अछि।
ऊखरिमे मुह देल, तऽ मुसकरक कोन डर देo उखरिमे मुह देल, तऽ मुसरक कोन डर
ऊगत जगे मही भरे, बिसबत जगे जाय वर्षाक प्रारम्भमे जँ इन्द्रदधनुष उगि जाय तँ वर्षासँ पृथ्वीभ भरि जायत।
ऊजर धोती मुहमे पान, घरक हाल जाने भगबान नीक वस्त्र पहिरने तथा मुहमे पान खयने छथि, मुदा घरक हाल भगवाने जनैत छनि।
ऊपर अँकबार तरे छिटकी देखैबाक हेतु ऊपरसँ तँ गाला लगबैत अछि, मुदा नीचासँ छिटकी मारि क’ खसा दैछ।
ऊपर ऊपर जपू माला, मन छतीसो कला ऊपरसँ देखौबाक हेतु तँ माला जपैछ, मुदा तरे-तरे अनेक दाव-पेंच लगबैछ।
ऊपर ऊपर डीठ, कोन गुल्लेर मीठ ऊपर-ऊपर तँ डीठ देखबैछ, मुदा कोन गुल्लपर मीठ अछि ताहि प्रसंगमे किछु नहि कहैछ।
ऊपर ऊपर पूरी, तरे तर छूरी ऊपरसँ नीक-नीक बारत कहैछ, मुदा तरे-तरे अनिष्टर करबाक हेतु प्रयत्न शील रहैछ, ताहिपर व्यंीग्या।
ऊपर ऊपर बाबाजी, तरे तर दगाबाजी ऊपरसँ बाबाजी बनबाक अभिनय करैछ, किन्तुब तरे-तर दगाबाजी करैछ।
ऊपर झापर पिअउ सऽ, निजगुत हाल गेनस सऽ अपन स्वा मीसँ ऊपर- झापरवला अर्थात् अवान्तवर कथा कहैछ, किन्तुप वास्तअविक बात तँ अपन प्रेमी गणेशसँ कहैछ।
ऊपर तर, नीचाँ झर ऊपरसँ नीक-निकुत खाइछ, मुदा ब्याुज करैछ जे हमर पेट ठीक नहि अछि।
ऊपर मने माइ गे माइ, तरक मने सासुर जाइ सासुर जयबा काल बेटी भोकारि पारि माइ गे माइ कहि क’ कानैछ, परन्तु् मनमने सासुर जयबाक प्रबल उत्कंाठा रखैछ।
ऊपर माला, नीचाँ भाला ऊपरसँ माला ल’ कए भगवानक नाम जपैछ, मुदा नीचाँसँ भालासँ प्रहार करैछ।
ऊपर मीठ, नीचाँ तीत देखयबाक हेतु तँ ऊपरसँ मीठ बात करैछ, मुदा भीतरसँ द्वेष भावना रखैछ।
ऊपर सऽ फीट फाट, नीचाँ मोकामा घाट ऊपरसँ नीक जकाँ सजने-धजने अछि, मुदा नीदचाँसँ तँ मोकामाघाअ सदृश अपरिष्कृित अछि।
ऊपर सऽ राम राम, भीतर सऽ कसाइ काम ऊपरसँ राम-राम कहैछ, परन्तुत भीतरसँ दुष्अ सदृश कसाइक काज करैछ।
ऊपर सऽ राम राम, भीतर सऽ सिद्ध काम लोकक आगाँ तँ भगवानक नामक जपि भ्रम करैछ, मुदा भीतरसँ भगवानसँ प्रार्थना करैछ जे सब कार्य सिद्ध हो।
ऊपरा मोने माय गे माय, भीतरा मोने ससुरा जाय देo ऊपर मने माइ गे माइ, तरक मने सासुर जाइ
ऊसर खेतमे केसर ऊसर खेतमे मूल्येवान वस्तुतक उपजा नहि भ’ सकैछ।
ऊसर खेती करम के नास ऊसरमे खेती कयलासँ भाग्य नष्टम ीा’ जाइछ।
एक अनार सै बिमार अनार तँ एकहि टा अछि, किन्तुम रोगीक संख्याँ एक सै अछि।
एक अहारी, सदा बरहमचारी एक प्रकारक भोजन कयनिहार व्यीकित सतत ब्रह्मचारीक जीवन व्यबतीत करैछ।
एक अहीर एकहि गाय, ने लागे तऽ छुच्छेर जाय एक अहीरकेँ एकहि गाय छलैक ओ जखन दूध नहि दैछ, बिसुकल रहैछ, तँ ओ पराभवमे रहैछ।
एक आना के मुरगी, नौ आना के मसल्ला मुर्गी तँ एकहि आनाक अछि, मुदा ओहिमे नौ आनाक मसाला लगाओल गेल।
एक ईर घाट, दोसर बीर घाट एक व्यघक्ति एक घाटपर अछि तँ दोसर घाटपर।
एक कओर खाइ छी, गायमे जाइ छी खयबाक हेतु तँ एक ग्रास मात्र भेटैछ, मुदा गायक चरबाही करय पड़ैछ।
एकक साइ दोसराक बधाइ एक भाग अर्थात देल जा रहल अछि तँ कोनो दोसर भाग बधाइ।
एक कान सऽ दुइ कान, दुइ कान सऽ बिआबान एक कानसँ दोसर कान गेलापर गोपनीय बात शीघ्रहि पसरि जाइछ।
एक गाछ हर्रे, भरि गाम खोंखी हर्रेक तँ एकहि गाछ अछि, किन्तुन खोंखी संपूर्ण गाममे भ’ रहल अछि अर्थात् ककरा देल जाय ककरा नहि देल जाय इएह समस्याय उपस्थित होइछ।
एक गाम दुइ गाम भोज भेल, कुकूरक मन हुलबुल भेल एक दुइ गाममे भोज भेल तँ कुकूरक मन हुलबुला गेल जे ओ कतय जायत? ओछी व्यबक्तिकेँ थोड़बहि संपत्ति भेटैछ तँ ओकर मन अस्थ्रि एवं चंचल भ’ जाइछ।
एक गाम माँगी तइया एके तम्माि, दस गाम माँगी तइया एके तम्मा् एक गाममे भीझाटन कयलहुँ तँ एक तम्मा अन्ना भेटल।
एक गाममे नङटा बसे, छनमे काने छनमे हँसे कोनो गाममे नङटा रहैत छल ओ क्षणहिमे हँसैत छल तथा क्षणहिमे कनैत छल।
एक घर माँगलहुँ तऽ साबा सेर, दस घर माँगलहुँ तऽ साबा सेर कतबो परिश्रम किएक ने करू जे भेटबाक अछि वैह भेटत।
एक घड़ीक रंग ढंग, छोड़ सइयाँ मोर संग पत्नी़ पतिसँ कहैछ ‘एक क्षण तँ प्रेम प्रदर्शित करैछ तत्तँश्चाइत् पुन- वैह हाल।
एक घड़ी किरतन, नओ घड़ी फिरतन कीर्तन तँ एकहि क्षण करैछ तथा नओ एम्हतरसँ ओम्हरर भ्रमणशील रहैछ।
एक घोड़ा घास खाय, एक घोड़ा हीं हीं एक घोड़ा तँ घास खा रहल अछि, किन्तुु दोसर घोड़ा ही ! ही! क’ रहल अछि।
एक चुप्प़ हजार के हराबे झगड़ाक अवसपर जँ एक पक्ष चुप्पीे साधि लैछ तँ दोसर पक्ष क्षणहिमे चुप्प भ’ जाइछ।
एक छउड़ी बुलकी, जेने देखे चूड़ादही, ओने मारते हुलकी बुलकी नामक एक छौंड़ी अछि जे जेम्हदर चूड़ादही देखैछ ओही भाग चल जाइछ।
एक जौक सोलहा रोटी, भगत खाय भगतिनी मोटी जौक सोलह रोटी पकाओल गेल।
एक टकाक चटाइहह, नओ टाका बिदाइ चटाइ तँ एक टाकाक अनलनि, मुदा ओकर विदाइ नओ टाका देमय पड़ल।
एक टाकाक लाइ, नौ टाका बिदाइ आमदानीसँ बेसी खर्च कयलापर व्यंाग्यओ।
एक आ गीदर, तोहर माय कनियाँ , हमहीं बर क्यों ककरो कहलकैक, ‘गीदर एकहि अछि, तोहर माय कनियाँ छौ।
एकटा पइसा भेलउ गे छउड़ी, खन खोंइछा खन पउती ककरो एक पाइ भेलैक कि ओकर मन हुलबुला गेलैक।
एकटा बेटा के बेटा, एकटा टाका के टाका एक मात्र पुत्रकेँ पुत्र नहि कहल जा सकैछ तथा एक टाकाकेँ टाका नहि।
एकटा बेटा बेटी की, एखटा टाका टाका की एक बेटाक गणना बेटामे तथा एक टाकाक गणना टाकामे चल गेल।
एकटा मुरगी दू ठाम हलाल मुर्गी एकहिटा अछि, मुदा ओकरा दुइ ठाम हलाल कयल गेल।
एक तऽ अपने डाइन, दोसर ओझा सऽ बिआह एक तँ पहिनहिसँ डाइन छल ताहिमे ओझाक संग विवाह भ’ गेलैक।
एक तऽ अपने तीत करइला, ताहि पर पड़ल जरल मंगरइला करैला तँ स्वरयं तीत होइछ ताहिमे जड़ल मंगरैल पडि़ गेल।
एक तऽ अहीर दोसर जबान, तेसर भऽ गेलैक नौ मन धान एक तँ जातिसँ अहीर अछि, ताहूपर नवयुवक आ ताहूमे ओकरा नौ मन धान भ’ गेलैक तकर मालिक बनि गेल।
एक तऽ करइला तीत, दोसरे नीम चढ़ल करैला स्वलयं हरहर तीत होइछ ताहिपर ओ नीमपर चढि़ गेल जाहिसँ ओहिमे नीमक नितौंस आबि गेलैक।
एक तऽ करिया काका गोरे बड़, ताहिपर नहयने आबथि करिया काकाक रंग उज्जेर छनि, ताहिपर नहयने आबि रहल छथि।
एक तऽ करैला दोसर नीम चढ़ल देo एक तऽ करइला तीत दोसरे नीम चढ़ल
एक तऽ कुकूर दोसर नौता कुकूर तँ बिनु बजओने अबैछ, दोसर ओकरा निमंत्रित कयल गेल तेँ ओकर स्थिति अनुमान सापेक्ष अछि।
एक तऽ खाय के धोबी घर दोसरे छूछ एत तँ धोबीक घरमे खयालहुँ, ताहूमे रुख-सुख।
एक तऽ गउरा अपने गोर, दोसर लेली कमरी ओढि़ एक तँ अपने गोर छथि (व्यं ग्य मे कारी छथि) ताहि परसँ कारी कम्ब ल ओढि नेने छथि।
एक तऽ गिरल गाछ सऽ, दोसरे मारलक मुँगड़ी एक तँ गाछ परसँ नीचाँ खसि पड़ल ताहि परसँ मुँगरीक मारि पड़ल।
एक तऽ चुड़ैल, दोसरे चढ़ल भूत एक तँ भगवान स्वररूप देलथिन चुड़ैल सदृश ताहि परसँ भूत सेहो लगैत छैक।
एक तऽ चोरी, ताहिपर सीनाजोरी एक तँ चोरी करैछ किछु कहलापर सेहो करब प्रारंभ करैछ।
एक तऽ चोरी, दोसर सीनाजोरी अधलाह काज क’ कए आँखि देखायब।
एक तऽ छउड़ी अपने छिनारि, दोसरे लगौलनि कुल परिबार एक तँ छौड़ी छिनारि अछि तथा अपन कर्त्तव्याीकर्त्तव्यआक पूर्ण प्रभाव छोडि़ देलक।
एक तऽ दुब्ब र, दोसर अखार एक तँ पहिनहिसँ दुबरायल अछि ताहि परसँ अषाढ़ मास आबि गेलैक।
एक तऽ नागिन, दोसर पाँखि लागल नागिन सदृश तँ अपनहि छल जाहिमे आब तँ पाँखि लागि गेलैक।
एक तऽ बंगाली दोसर तोतराह बंगालीक बाजब तँ एक ओहिना बुझबामे नहि अबैछ, ताहूमे ई तँ तोतराह अछि तेँ ओकर बाजब-भूकब अस्पेष्टा अछि।
एक तऽ बउआ अपने गोर, दोसरे अयली कम्म र ओढि़ एक तँ बौआ गोरे बड़ छथि अर्थात करूप छथि ताहि परसँ कम्म र ओढि़ नेने छथि।
एक तऽ बच्चास सुनरे बड़, दोसर नहैने आबथि एक कुरूप व्य‍क्ति स्ना़नोपरान्तह आर अधलाह लगैछ देखबामे।
एक तऽ बिदेसी दोसर तोतराह विदेशी हैबाक कारणेँ भाषा तँ ओहिना अस्पशष्टण अछि ताहूमे तोतराइत अछि।
एक तऽ बूढ़ दोसर ढहलेल ओहिना तँ बूढ़ छथि ताहूमे ढहलेल थिकाह।
एक तऽ बेलबा अपने गोर, दोसरे कइली लुका इजोर एक तँ ओहिना अपने कारी खोरनाठ अछि ताहूपर जानि बूझि क’ अपन प्रदर्शन क’ रहल अछि।
एक तऽ भालू, दोसरे कान्ह पर कोदारि भालूक गणना ओहिना भयंकर जानवरमे होइछ।
एक तऽ मियाँ अपने बौड़ाह, दोसरे खयलक भाँग एक तँ अपने सनकल अछि ताहिपर भाँगक नीसा क’ लेलक।
एक तऽ राकस दासेर नौतल राक्षस तँ ओहिना अछि ताहिपर निमंत्रित ।
एक तऽ साँयक बहु,दोसरे बेटाक माय, हम जायब धान कुटे हम अपन पतिक प्राण पिआरी छी, हमरा बेटा सेहो अछि तेँ हम धान कोनो कुटब ? प्रत्येहक साधनसँ सम्पनन्न? रहलोपर कोनो व्यतक्ति काज किएक करत ?
एक तऽ सिब अपने बउरा, दोसरे खयने भाँग शिव तँ स्वअयं बौराह थिकाह ताहूपरसँ भाँग खा नेने छथि।
एक तऽ हुनक मुहे बड़ सुनर, दोसरे भरि मुह पिआजु एक तँ हुनक मुह स्व़यं सुन्दार छनि ताहिमे भरि मुह पिआज रखने छथि।
एक तन्दुपरुस्तीव हजार नियामत एक मात्र स्वारस्य्ं क रक्षार्थ अनेक नियमक पालन करय पड़ैछ, तँ कल जाइछ।
एक तामा दालिमे कै कनमा नोन ई एक बुझौअलि थिक, जकर अभिधेयार्थ स्पकष्टै अछि।
एक तेली मारग मिले महा असगुन हाये, सौतेली घरमे बसे सगुन कहाँ से होय जहिना यात्रा पहर रस्ता मे जँ तेली भेटि जाय तँ ओकर दुष्प रिणाम अत्यलन्तय भयानक होइछ, तहिना सतमाय घरमे रहैछ तँ कोनो स्थितिमे सगुण नहि बनि सकैछ।
एक दिन चम्पात ऐस भयो तऽ सपरपर लेलहुँ चढ़ाय,आब चित्त गेल गुलाबपर तऽ चम्पाढ भेल बलाय कोनो प्रेमिका अपन प्रेमीक संबंधमे कहैछ, ‘हमर प्रेमी एक दिन हमरा एतेक बेसी मानैत छलाह जे ओ सतत हमरा माथेपर चढ़ौने रहैत छलाह, किन्तुे आब हुनक चित्त गुलाब अर्थात् अन्यद प्रेमिकापर चल गेलनि अछि तेँ हम बलाय भ’ गेल छियनि।‘
एक दिन जितिया नौ दिन पारन जितिया तँ एकहिन दिन होइछ, मुदा ओकर पार्वण नौ दिन धरि चलैछ।
एक दिन पहुना, दोसर दिन ठेहना, तेसर दिन केहुना पाहुनक सत्कानर एकहि दिन होइछ।
एक दिन मुन्सी जोतलनि हर, कुथलैन्हि पादलैन्हि लगलैन्हि जर एक मुंशीजी (कायस्थह) हर जोतलनि जाहिमे निम्नांैकित उपद्रव भेलनि कुथलनि, पादलनि तथा ज्वैर भ’ गेलनि।
एक दिन मेहमान, दोसर दिन बलाय जान पहुनाइ एकहि दिन ठीक होइछ तत्पाश्चातत् अनेक समस्या अबैछ।
एक दिन रहलैन्हि रंग, तऽ साँय खुऔलनि संग, एक दिन उठलैन्हि रिस्सा , तऽ भारि एँड़े कयलकैन्हि भरकुस्सा‍ पत्नी् कहैछ पतिक प्रसंगे, ‘एक दिन पति प्रसन्ना छलाह तेँ अपना हाथेँ अपनहि थारीमे भोजन करौलनि।
एक दिन संग बहु लग सूती, एक दिन जूजि अइठ कऽ मरी सब वस्तु संयोगपर निर्भर करैछ।
एक दिन साउस बड़ आदर कयलैन्हि बसिया भात आ दूधे, एक दिन साउस खोरनाठ लऽ मारलैन्हि तपत भात आ छूछे कोनो पुतहु कहैछ जे ‘एक दिन सासु अत्य धिक सम्मातन कयलनि तँ बसिया भात आ दूध खयबाक हेतु देलन।
एक दिन सात रोटी बास, एक दिन एक ठक दऽ उपास एक दिन एतेक बेसी भोजन जाइछ जे सात रोटी बाँचि जाइछ तथा एकदिेन एहनो होइछ जे उपवासक स्थिति आबि जाइछ।
एक नगर दुइ बेर रे एकहि कार्यक हेतु बारंबार दोहराबय पड़य, तँ कहल जाइछ।
एक नरी सोलह ताग एकहि कार्यक हेतु बारंबार दोहराबय पड़य, तँ कहल जाइछ।
एक नरी सोलह ताग एक नलीमे सोलह ताग अछि।
एक नारी सदा बरहमचारी एक स्त्री क संग भोग कयनिहार पुरुषक गणना ब्रह्मचारीक अन्त र्गत होइछ।
एक पंथ दुइ काज रस्ताथ तँ एकहि आ अछि, मुदा कार्य कयनिहार दुइ।
एक पूत कउआ, सेहो बेत बउआ बेटा तँ एकहि टा अछि जे कौआ सदृशउ कारी अछि तथा मूर्ख एवं बताह अछि।
एक पूत सऽ निपूत भला एक बेटाक अपेक्षा बिना बेटाक रहब विशेष समीचनी अछि।
एक पैजामा दुइ भाय, फेरा फेरी कचहरी जाय पैजामा एकहि टा अछि, किन्तुक ओकरा पहिररनिहारक संख्याि दुइ।
एक पोठपर नौ रोट एक पोटी माछपर नौ गोट रोटी खा गेल।
एक बजाबय चउदह आबे इहे एतय के रीत, बाहर बाला खा गेल घर बाला गाबे गीत क्यो ककरो एक व्यखक्तिकेँ निमंत्रित कयलक।
एक बड़द एकाबन खुट्टा बड़द तँ एकहि टा अछि, मुदा ओकरा बान्हतबाक हेतु एकावन गोट खुट्टा गाड़ल गेल।
एक बर चून दोबर कथ, तेबर कसइली मिले रस चून सँ दुइ गुण कथ तथा तीन गुण सुपारी देलापर पानमे वास्ततविक स्वााद अबैछ।
एक बापतेक नौत, सब बापतेक ब्यौंमत निमंत्रण तँ देल गेल एक बापतेकेँ, मुदा सब बाल-बच्चाकक व्य्वस्थाब भ’ गेल।
एक बिगड़े तऽ दस समझाबे, दस बिगड़े तऽ के समझाबे एक व्य क्ति जँ अप्रसन्न भ’ गेल।
एक बेटी माँगलहुँ दू टा भेल, कथी ला माँगलहुँ जपाल भेल भगवानसँ एक बेटीक याचना कयलहुँख किन्तुँ दुइ भ’ गेल।
एक बेटी लाइ दोसर मिठाइ, तेसर भेल तऽ तीनू बलाय एक मात्र कन्यान लाइ सदृश हल्लुेक होइछ।
एक बेर जोगी,
दुइ बेर भोगी,
तीन बेर रोगी योगी व्यनक्ति दिनमे एकबेर, भोगी दुइबेर, किन्तु् रोगी तीनबेर वा ओहि सँ बेसी शौच जाइछ।
एक भाग चारू बेद, एक भाग चतुराइ चतुरता सर्वश्रेष्ठी गुण थिक।
एक भालू दोसरे कान्ह पर कोदारि खतरनाक व्यसअक्तिपर व्यंपग्य ।
एक मनक रानी के नौ मनक बुलकी अप्रासंगिक एवं अतिशयोक्तिपूर्ण प्रयोग भेलापर व्यंंग्यत।
एक मन बिद्याक लेल सय मन बुद्धि विद्योपार्जनक हेतु पर्यान्त् ज्ञान अपेक्षित।
एक मेयानमे दुइ तरुआरि एम म्याननमे दुइ तरुआरिक समावेश असंभव बुझना जाइछ।
एक मास रीतु आगे धाबे, जेठ अखार कहाबे वर्षा ऋतुक आभास एक मास पूर्वहि भेटैछ तेँ जेठ मास अषाढ़ कहाबय लगैछ।
एक मियाँ बुडबक दोसरे तोतराह एक तँ मियाँ मूर्ख अछि ताहूपर तोतरा रहल अछि।
एक राकस दोसरे हाथमे लुकाठी शैतान व्योक्तिकेँ अधिकार भेटलापर ओ अधलाहे कार्य करैछ।
एक रती चिक्क स, सब के लागल हिस्सा क चिक्कास तँ एकरती अछि ताहि लेल सब अपना अपनीकेँ हिसका लगा रहल अछि।
एक रोटी गप चप एक रोटी बखरा, साँझे ऐता साँय फेरु लेता बखरा भानस भात बना क’ क्यो, एक रोटी शीघ्रहि खा लेलक, तत्प श्चासत् एक रोटी अपन हिस्साकक खयलक।
एक लबड़ी दू लबड़ी, तीन लबड़ी सऽ घर बिगड़ी घरमे एकाध मिथ्या भाषिणी नारी रहय तँ कोनो हर्ज नहि, मुदा जखन घर-घरायन मिथ्यारभाषी बनि जाइछ तँ ओ घर निश्च ये बरबाद भ’ जाइछ।
एक लाख पूत सबा लाख नाती, ओकरा घरमे दिया ने बाती परिवार तँ एतबे विशाल छनि जे एक लाख बेटा छनिप तथा सबा लाख नाति किन्तुख सब अकार्यक।
एक लोटा सात भाय, बेरा बेरी पयखाना जाय लोटा तँ एकहिटा अछि, मुदा भायक संख्याच सात, तेँ बेरा-बेरी क’ कए पैखाना जाइत छथि।
एक सखबाड़ चारि खण्डाब, पात्र पुरहित पंडित पण्डाा मैथिल ब्राह्मणक सखबाड़ मूलवंशक चारि भागमे विभाजित भेज ले पश्चावत् जा क’ महापात्र, पुरोकहित, पंडित एवं पण्डातक रूपमे प्रख्या त भेल।
एक साधे सब सधे, सब साधे सब जाय एक बेरमे एकहि कार्य भ’ सकैछ।
एक सारी फेरा फेरी सारी तँ एकहिटा अछि, किन्तु व्यपक्ति संख्याँ अधिक तेँ फेर बदलि क’ पहिरैत अछि।
एक सेरक मुरगी, नौ सेर मसल्लाु मुर्गी तेँ एकहि सेरक छल, किन्तु ओकरा रान्हीबामे नौ सेर मसल्लाम लागि गेल।
एक हर हत्याग दुइ हर पाप, तीन हर खेती चारि हर राज गृहस्था हेतु एक हर ओकर हत्या्क समान थिक।
एक हाथक ककड़ी, नौ हाथक बीआ ककड़ी तँ एकहि हाथक अछि, किन्तुक ओकर बीआ नौ हाथक।
एक हाथमे कारिख दोसरमे चानन ऊटपटांग कार्य कयलापर प्रयुक्तन होइछ।
एक हाथ बाँहि पिया देखबहो कि नहि पति-पत्नी क हास-परिहासपर व्यंरग्य्।
एक हाथे थपड़ी ने बाजे झगड़ा एकहि दिससँ नहि होइछ।
एक पटोरबे नौ रे नौ, कहब मुनसे लागतो रीस, तोरा लगा कऽ पूरे बीस कोनो पुरुष अपन विवाहोपरान्तह कहलक, -एकहि सारीसँ नौ टा विवाह कयल।‘
एकहि रोटील बस, कैथ छल कि पस एकहि रोटीमे अहाँकेँ सन्तोैष भ’ गेल ? अहाँ कायस्थ छी कि की छी? कायस्थल साधरणतया अल्पहभोजी होइछ।
एकहि लकड़ी सऽ सब के हाँकब एकहि प्रकारक व्यऽवहार प्रत्ये कक संग करब, तँ व्यंजग्यत।
ए कुकूर दफबबर किएक, तऽ दू घरक आबाजाही कुकूरसँ क्यो पुछलक जे दुब्ब र किएक? उत्तर भैटलैक जे घर-घर भ्रमण करय पड़ैछ।
एके नरैना सोधल सातो घरैना नारायण नामक एकहि व्यघक्ति अछि जे सातो घरकेँ सत्या नाश कयलक।
एके फूँके चानी चाँदीकेँ एकहि बेर फकलासँ ओकर यथार्थ स्थितिक जानकारी भेटि जाइछ।
एके बहुरिया पाँच तोहर बर, कोनो सूते दुआरि कोनो कोहबर कनियाँ तँ एकहि अछि, मुदा वरक संख्या पाँच ।
एके भले सपूत तऽ, सब कुल नीक कहाय संपूर्ण वंशमे जँ एकहि सुसन्ता नक प्रादुर्भाव होइछ तँ ओ संपूर्ण वंशक प्रतिष्ठा‍केँ आगाँ बढ़बैछ।
एके माघे जाड़ ने जाय एकहि माघसँ जाड़क समाप्ति नहि होइछ।
एको पानी जे बरिसे सबाती,
कुमरिन पहिरे सोना थाती स्वािती नक्षत्रमे एक वर्षा भेलापर कुर्मी महिला सोनाक बाली कानमे पहिरैछ।
एको पानी जौं बरिसे सबाती,कुरमिन पहिने सोना पाती स्वाेती नक्षत्रमे जँ वर्षा प्रारंभ भ’ जाइछ तँ फसिल स्वााभाविक रूपेँ अति उत्तम होइछ।
एकौनिया पूत अढ़ाय हाथ करेज वंशमे एकहि पुत्रक जन्मक भेल जाहिसँ सभक करेजा अढ़ाय हाथक भ’ गेल।
एक्केरटा गुडि़या ढोढ़ी धरि हार छोट खूटक स्त्रीा पैघ हार धारण करैछ, तँ व्यंखग्यग।
एखन ठोरोक दूध ने सुखायल अछि नेना रहितहुँ सियान सदृश बातकयलापर व्यं ग्यन।
एखन तऽ दूधोक दाँत ने टुटल अद्यावति दद्धा दाँत यथावत लगले छनि।
एखन दिल्लीद दूर अछि कार्य पूर्ण होयबामे अत्य धिक विलम्बक रहलापर कहल जाइछ ।
एगो छउड़ी के नौ लगबार, तकरो लऽ गेल गामक कोतबाल छौड़ी तँ एकहिटा अछि, मुदा ओकर प्रेमीक संख्यात नौ अछि तथापि ओकरा गामक कोतवाल उठा क’ लए गेल।
एगो छउड़ी बुल्की’, जेम्हमर देखे चूड़ादही, तेम्हउर मारे हुल्की बल्कीउ नामक एक छौंड़ी अछि।
एगो माँगलहुँ दूगो भेल, कथी ला माँगलहुँ भरि घर भेल सन्ताहन प्राप्तिक हेतु क्योम प्रार्थना करैछ जे, हे भगवान ! हमरा सन्ताहन दिअ।
एगोमे आबा जाही, दोसरे बिछौना चाही ककरो जँ किछु सुविधा देल जाइछ तँ ओ आयब-जायब प्रारंभ करैछ।
एगो रहरी सब दिन बहरी राहडि़ एहन फसिल अछि जे सब दिन घरसँ बाहरे रहैछ।
एडि़याओल नीक, देरिआओल ने नीक एँड़ी मारि क’ पृथक् क’ देब समुचित, किन्तुम ओकरा अत्यपधिक प्रश्रय देब अनुचित।
एतनीटा घर तइमे कनियाँ बर, तइमे फुदफुद कर छोट घर अछि ताहिमे कनियाँ वर रहैछ, ताहूमे फुदको दाइ फुद-फद करैछ।
एतने करी जे ओर निबहें एही रूपक कार्य करबाक चाही जे सब दिन धरि चलि सकय।
एत बड़ बरिआत बगइचामे डेरा एतके पैघ बरियात आयल अछि जकरा टिकाओल गेल अछि गाछीमे ।
एतबे नफा करी जतेक आटामे नोन मनुष्यफकेँ नफा एतबे करबाक चाही जतेक नोन आटामे मिल जाय।
एतय ने लागे राउर माया एहि ठाम कोनो प्रकारक दया-धर्म काज नहि करैछ।
एतहु लउका ओतहु लउका लउका के तरकारी, कोन घाट सऽ लउका चल आयल सुसरारी सजमनि कतयसँ आयल से नहि जानि, कारण सब ठाम एकरे तरकारी भेटैछ।
एतेक दिनपर भेट, तहन बज्ज र सन कथा बहुत दिनक पश्चाेत् तँ भेट अछि ताहिपर मधुर कथाक बदला बज्र सन कथा कहैछ।
एना कयने कय दिन निबहत, जाबत निबहत ताबत निबहत एक मित्र दोसर मित्रसँ कहैछ, एहि प्रकारें काज कयने कतेक दिन धरि चलत ? एहिपर उत्तर भेटैछ, जावत धरि निर्वाह हैत तावत धरि।
एना करबह तऽ गोड़ काटबो, एना करबह तऽ हाथ काटबो, एना करबह तऽ नाक काटबो कोनो व्य क्तिक अत्यबधिक उपद्रवी स्वकभावक कारणेँ चेतावनी देल जाइछ, तँ व्यंीग्यक।
एने कादो ओम्हार खीच, भाँट पड़ला बीचो बीच कादो खीचक दलदलमे भाँट बेचारे पडि़ गेलाह।
एल पानि गेल पानि, बाटहि बिलैल पानि पानि प्रारम्भा भ’ तुरत समाप्त़ भ’ जाइछ, तँ प्रयुक्त् ।
एली हे गुन अगरो, माथ मुरौलनि सगरो बदनाम व्यनक्ति सगरो बदनामे रहैछ।
एलौं महल, कयलौं टहल महल गेलापर कोनो-ने-कोनो काज करहि पड़ैछ।
एसगर पूत कमाइ करे, घर करे की कचहरी करे बेटा तँ समांगसँ एसगर अछि।
एसगर पूत कमाइ करे, घर करे की बाहर करे पुत्र एसगर अछि तेँ ओ धनोपार्जन करत, कि घरक काज-धन्धाा कि बाहरक ? असगर व्यघक्तिक अत्यधधिक कार्य व्यरवस्त तापर व्यंरग्यक।
एसगर हँसइत नीक ने कनइत,नीक ने कनइत जे व्यँक्ति असगर अछि ओ जँ हँसैछ वा कनैछ दुनूमेसँ कोनो ने नीक लगैछ।
एहन घसकट्टाक ओहन कमलगट्टा वर तँ घास काटबामे सिद्धस्तल अछि, मुदा पत्नी तँ कमल फूल सदृश सुकोमल।
एहन चूड़ा कूटब किए, धान बीछि खायब किए चूड़ा किएक एहन कूटब जकरा खयबा काल धान बिछबाक स्थिति उत्परन्नल भ’ जाय ? एहन कार्य किएक करब जाहिमे आगाँ जा क’ पश्चाबत्ताप करय पड़य ?
एहन चोरि करइत छी, जे भगबानो ने जनैछ क्यो कहैछ जे, हम एहन चोरि करैत छी जे भगवान पर्यन्ते नहि जानि सकैछ।
एहन झाँपन झाँपनियाँ, भाप ने निकले आँ‍गनियाँ कोनो वस्तुझकेँ एहि प्रकारेँ झाँपितोप देब जे ओकर वाष्पु पर्यन्त आङनमे नहि आबि सकैछ।
हएहन नइहर जायब किए, अपने सऽ आयब किए एहन नैहर किएक जायब जे स्व यं अयबाक स्थिति उत्पएन्नव हो ? एहन काज किएक करब जाहिसँ अपमानित होमय पड़य ? बिनु सोचने-विचारने उटपटांग कार्य कयल जाइछ, तँ प्रयुक्त होइछ।
एहन पूत पंडित भेलन, ईंटा बान्हि कचहरी गेलन पुत्र पढि़-लिख क’ एहन पंडित बनलह जे ईंटा बान्हि क’ कचहरी गेलाह।
एहन पुत्र पंडित भेलन, सब जजमान सरग लऽ गेलन पुत्र पढि़-लिखि क’ एहन पंडित बनलाह जे सब यजमान स्व र्ग चलि गेलाह।
एहन बूढ़ बड़द के, के बान्हि कऽ भुस्साढ देत बूढ़ व्य‍क्ति अकार्यक भ’ जाइछ।
एहन मउगी सियानी, पैंचा माँगे पानी चतुर स्त्रीय पानि सेहो पैंच मांगैछ।
एहन मुह मसुरीक दालि ककरो द्वारा योग्य तासँ अधिक प्रदर्शन कयलापर प्रयुक्तद होइछ।
एहन साउसक करेज रे करेज, बड़का थरिया देलनि दहेज रे दहेज वस्तु त- सासुक हृदय धन्यर छनि जे एतेक पैघ थारी दहेजमे देलनि।
एहन हैत कथी लय, एहन करबे कथी लय, धोतीमे सारी मिलायब कथी लय एहन किएक हेतैक ? कोन उद्देश्यरसँ एहन हैत? धोतीमे सारी मिलयबाक कोन प्रयोजन? निष्प्र योजन एवं निरुद्देश्य कार्य कयनिहारपर व्यं ग्य्।
एहि कान सऽ सुनब, ओहि कान सऽ बाहार करब एहि कानसँ सुनैत अछि तथा ओहि कानसँ बहार करैत अछि।
एहि नगरीक इहे बेबहार, खोलू ढेका उतरू पार एहि नगरक सर्वदासँ इएह व्यवहार रहल अछि जे लोक अपन ढेका खोलि क’ नदी पार उतरैछ।
एहि मुहे राजा छिर करपूर, एहि मुहे झरकल माछ भरिपूर जखन राजा छलाह तँ जाहि मुहसँ अमृत एवं कर्पूर संयुक्ता अनेक खाद्य पदार्थक उपभोग करथि किन्तुत आब परिस्थितिवश झड़कल माछ पर्यन्तत भरिमन नहि भेटैत छनि।
एहि रउताइन के अइसन जीउ, एक सेर चाउर लेल नौ सेर धीउ जिबलाहि स्त्रीौ अपन चटकार प्रवृत्तिक कारणेँ भोजनपर अत्यरधिक व्याय करैछ।
एही रहड़ीक पुरी कचउरी, एही रहड़ीक दालि एही रहड़ीक कयलहु दालि, एही रहड़ीक कयलहु खिखरा, बहु मोटायल गाल राहडि़ एहन वस्तुर अछि जकर विविध खाद्य-पदार्थ बनाओल जाइछ जकरा खा क’ लोकक गाल फुलि जाइछ अर्थात् मोटा जाइछ।
ऐँ करू ई करू, मैंयाँ कहलकै पकले क्योर किछु करय, किन्तुल श्रेष्ठहजनक बात सर्वोपतिर होइछ।
ऐ छूँछा के पूछा साधनहीन व्यपक्तिकेँ क्योा ने पुछैछ।
ऐबह तऽ जयबह कतऽ जखन एतय आबि तखन जायब कतय ? कोनो धूर्त्त अपन धूर्त्तत्तासँ निर्दोषकेँ अपन जालमे फँसा लैछ, तँ व्यंदग्य ।
ऐ समधि अल्हुैआ, तऽ ओहो भरि पेट क्योध व्यूक्ति अपन समधिसँ जिज्ञासा कयलथिन जे ‘समधि औ ! अल्हुञआ खायब ?’ समधि कहलथिन, ‘हँ, मुदा भरि पेट हैबाक चाही।
ओइसन गुलाबक, फल तइमे काँट ओहन सुन्दकर गुलाबक फूल अछि ताहिमे काँट अछि।
ओएह घोड़ा चढ़नी, ओएह घोड़ा लदनी घोड़ा तँ एकहि अछि जकरापर चढलो तथा लादलो जाइछ।
ओएह धनुआ ओएह पाथर जे धनवान अछि ओएह सब किछु अछि।
ओएह मुह पान खोआबे ओएह मुह जुत्ता अपन मुहक कारणेँ लोक पान दोसरासँ खाइछ तथा जुत्ता सेहो, तखन प्रयुक्तइ।
ओकर जुत्ता ओकरे कपार जे जाहि प्रकारक काज करैछ तकरा तदनुरूप फलक प्राप्ति होइछ।
ओकरे टाँड़ा तेल ओकरे टाँड़ामे तेल थोड़बहि छैक? क्ज्ञैमन्ज्ञैर व्येक्तिपर आधारित हैब सर्वथा निराधार अछि।
ओकीलकम हाथ परायाक जेबी ओकील सतत अपन हाथ दोसराक जेबीमे दैछ।
ओ गायक ई गाय बहिनधी ओ गाय एहि गायक बहिनक बेटी अछि।
ओ गुड़ कहाँ जे माछी खाय ई ओ गुड़ अछि जे माछी खा सकत।
ओ धी जरुआ तीन तीमन संग नोन तेल मिरचाइ, हम कुल मन्ती खाइ दही दूध मिठाइ पत्नीू पतिक प्रसंगे कहैछ, ‘हमर पति धीजरुआ अछि जे तीन तरकारी नोन, तेल एवं मिरचाइक संग खाइत अछि।
ओछ पूँजी महाजने खाय कम मूलधन रहलापर महाजनक ऋण चुबैबामे मूलधन सेहो समाप्तच भ’ जाइछ।
ओछ सऽ पिरीत, बालूक भीत नीच व्यिक्तिक संग प्रीति करब बालूक भीत ठाढ़ करबाक समान थिक।
ओछ सऽ मुह लगाएब, आ अपन इज्जऽत गमाएब ओछ प्रकृतिक लोकसँ मुह लगयबाक अर्थ थिक अपन इज्जलति पानिमे मिलायब।
ओछीक हाथ लागल कटोरी, पानि पी पी मरल पड़ोसी कृपणस व्य़क्तिक हाथमे भंडारक कुंजी अछि तेँ ओ ककरो यज्ञ-परोजनमे खाय नहि दैछ, प्रत्युहत सब पानि पी-पी दक’ प्राणान्ता क’ रहल अछि।
ओछीक रीन ने खाइ, अकुलिनि धी ने बिआही निम्न श्रेणीक लोकसँ ऋण नहि लेबाक चाही तथा छोट कुलक कन्याोक संग विवाह सेहो वर्जित अछि।
ओछी के घर खाना, जनम जनम के ताना नीच व्यघक्तिक ओतय जँ कदाचित् खायब तँ जीवन पर्यन्त‍ ओकर उलहन सुनय पड़त।
ओझा ओ ओझा पाकल मोछ गड़इए, गड़इए तऽ गड़य दिऔ दुइ चारि दिन गड़त, ठेला पड़त तऽ नीक लागत कोनो वस्तुडक अभ्या सोपरान्त ओ पीड़ादायक नहि होइछ।
ओझाक गाय छूटल बाय भेल जखन ककरो कोनो वस्तुे सुख नहि द’ कए विपत्तिक कारण भ’ जाइछ तँ कहल जाइछ।
ओझा गेलाह घर, हाथ बिहाथक धर अपन कर्त्तव्य अपनहि नहि क’ कोनो कार्यक भार अन्यस व्यहक्तिपर जानि बूझि क’ दए दैछ तकरा लक्ष्यु क’ कहल जाइछ।
ओझा पुछले घोख, बइद पूछले रोग कोनो वस्तुघक प्रसंगे ओझा गुणीसँ जिज्ञासा कयलापर ओ भूतप्रेत संबंधी बात कहैछ, किन्तु ओही विषयपर वैद्यसँ जिज्ञासा कयला उत्तर ओ रोगक प्रसंगमे कहैछ।
ओझा लेखे गाम बताह, गामक लेखे ओझा बताह ओझाक हेतु गाम बताह अछि, गामक हेतु ओझा।
ओझा बिआह कयल गाम सुख ला ओझा विवाह कयलनि गामक सुखक हेतु।
ओढ़े के किछु ने दरी बिछौना ओढ़बाक हेतु चादरि आदि किछु ने छैक, मुदा बिछाओनमे दरीक व्यकवस्थाे कयल गेल अछि।
ओढ़े के लुगरी, बिछाबे के गलैचा ओढ़बाक हेतु रजाइक अभाव अछि, मुदा घरमे गलैचा बिछाओल गेल अछि।
ओमहर बँटइ छी, एमहर देखइ छी अहाँ ओम्ह र रहल छी तथा एम्हछर हमरा दिस देखि रहल छी।
ओलती के पानी बडे़री ने चढ़े ओरिआनीक पानी बड़ेरीपर नहि चढि़ सकैछ।
ओलती तरक भूत, सत्तर पुरखाक नाम जाने ओरिआनीमे भूतक निवास अछि तँ ओ सत्तरि पूर्वजक नाम जनैछ।
ओलती तर के बास, बइरी तर के चास ओरिआनीक नीचाँक बास तथा शत्रुक दसंग खेती करब कहियो फलदायक नहि होइछ, कारण एहिमे अनेक कष्टकक सामना करय पड़ैछ।
ओल सन बोल कटाह बोली कहलापर कहल जाइछ।
ओलाबे ने बोलाबे, सहदेव बहु चाची बिनु बजौनहि ओ अपनाकेँ सहदेवक पत्नीबकेँ चाची कहैछ।
ओस चटने पिआस जाय ओस चाटलासँ कतजहु प्याीस जा सकैछ? कोनो पैघ कार्यक हेतु अल्पै साधनक प्रयेग कयलापर कहल जाइछ।
ओही बाँस के डाला डाली, ओही बाँस कि सूप चङेरी बाँस एकहि रहैछ, मुदा ओहिसँ डाला, डाली, सूप-चेङरी आदि विभिन्नु रूपक वस्तु, बनाओल जाइछ।
औंक बौंक चौंक चीरा, जाउँ बजार खाउँ खीरा धीयापूता द्वारा एकर प्रयोग खेल-खेलमे कयल जाइछ।
औठली अठारह आना, ठाढ़ चुच्चीा बारह आना, गलल पचल सोढ़ तीन आना जकर यौवन अंकुरित भ’ रहल छैक तकर मूल्यौ अठारह आना, जे पूर्ण युवती अछि तकर मूल्यअ बारह तथा जे वृद्धावस्थार प्राप्त कयने अछि ओकर मूल्यब साढ़े तीन आना अछि।
औनायल बिहाडि़ के, गामहि दऽ रास्ताण बिहाडि़ औनायल रहैछ तेँ गाम द’ कए रस्ताि भ’ जाइछ।
औरियाहा पूत के ओर समहारी, बासी भातमे बैन डोलाबी जिद्दी पुत्रकेँ परतारबाक बसिया भातमे बैन डोलाओल जाइछ।
औरो के आर खिस्सा , लाड़ो भतार खिस्सा आन व्य क्ति तँ आनहि रूपक चर्चा करैछा, मुदा लाड़ो सतत अपन स्वाहमीक चर्चा करैछ।
औसरार मारि कऽ हाथ गन्हैहलहुँ तेलचट्टा मारि क’ हाथ गन्हाच लेलहुँ।
कंकक लेखेँ मड़ुआ अन कंक पक्षीक हेतु मड़ुआ सेहो अन्न होइछ।
कंगाल के मड़ुआ मीठ कंगालकेँ मड़ुआ सेहो मीठ लगैछ।
कंगाल से जपाल गील दरिद्र बनि क’ रहबाक अपेक्षा कठिनतामे ओझरायल रहब नीक बात थिक ।
कंगालीमे आटा गील निर्धन व्यटक्तिक आटा सतत गीले रहैछ।
कंठी भऽ गेल संठी गर्दनिक तुलसीमाला सारहीन संठी सदृश भ’ गेल।
कउआ खयला सऽ केओ अमर होइछ की कौआ खयलासँ क्योर अमर भ’ सकैछ ? लोकविश्वालस अछि जे कौआ अमर होइछ, मुदा ओकरा खा लेलासँ क्योज अमर नहि भ’ सकैछ ।
कउआ चढ़ल चारपर उतरत कोना देo कउआ चढ़ल ढेकीपर उतरत कोना
कउआ चढ़ल ढेकीपर उतरत कोना कौआ ढेकीपर चढि़ गेल आब उतरत कोना ? अतिसाधरण कार्य करबामे बुद्धि नहि कार्य करैछ, तँ व्यंुग्यक।
कउआ चलल बास कऽ, जोलहा चल घास कऽ कौआ संध्यासकाल खोंतामे विश्रामार्थ गेल।
कउआ चलल बास कऽ, तेली चल घास कऽ तुo कउआ चलल बास कऽ जोलहा चलल घास कऽ
कउआ चलल बास के, बुड़बक चलल घास के उचित समयपर समुचित कार्य नहि कयलापर कहल जाइछ।
कउआ चलल हंसक चालि सिखय, अपनो चालि बिसरि गेल कौआ गेल हंसक चालि सीखय अपनो चालि बिसरि गेल।
कउआ टरटराइये, धान सुखाइये कौआ काँव-काँव क’ रहल अछि तथा धान सुखा रहल अछि।
कउआ नहान कौआ सदृश स्नाछन करैछ।
कउआ से कउआक गेल्हा बुधियार कौआक अपेक्षा ओकर बच्चान बेसी बुद्धिमान होइछ।
कउड़ी गेंठक, जोरु संगक पैसा-कौड़ी तथा पत्नीु संग रहलापर ओकर मर्यादा रहैछ।
कए खेती परदेस जाय, तकर जनम अकारय जाय खेती क’ कए जे परदेस चल जाइछ तकर जन्म निरर्थक भ’ जाइछ।
ककड़ीक चोर कतहु फाँसी पड़े ककड़ी चोरौनिहारकेँ कतहु फाँसी देल जाइछ? तुo ककड़ीक चोर के कनइठिए बहुत
ककड़ीक चोर के कनइठिए बहुत ककड़ी चोरौनिहारक कान अँइठि देब पर्याप्तर अछि।
ककड़ीक बंस गेल, आगू पीछू टेढ़ भेल ककड़ीक वंश समाप्तइ भ’ गेल, किएक तँ ओहिमे जे फल लागल अछि ओ एकोटा सोझ नहि अर्थात् सब टेढ़-मेढ़ अछि।
ककर जाँतक पीसल खाइ छह अत्यजधिक मोटायल व्याक्तिपर व्यं ग्या।
ककरो कुटिया ककरो झोर, ककरो आँखि सऽ खसइ छइ नोर ककरो कुटिया (माछक टुकड़ी) भटेलैक तँ ककरो मात्र झोर तथा ककरो ओहो नहि भेटलैक ताहिसँ आँखिसँ नोर झहरि रहल छैक।
ककरो बोरे बोरे नून, ककरो रोटियोपर नै नून ककरो रोटीक संग खयबाक लेल सेहो नोन नहि छैक तथा ककरो बोराक-बोरा छैक।
ककरो भाँटा बइर, ककरो भाँटा पंथ भाँटा ककरो अपकार करैछ तँ ककरो पंथ सदृश उपकार करैछ।
ककरो सीता सीतल, ककरो सीता बाँतर ककरो सीता फल शीतलता प्रदान करैछ तँ ककरो बाँतर एवं अहितकर होइछ।
ककोड़बाक बिआन ककोड़बे खाय काँकुरक बच्चा काँकुरेकेँ खा जाइछ ।
कखनो गाड़ीपर नाओ, तऽ कखनो नाओपर गाड़ी कखनो नाओपर गाड़ी चढ़ैछ तँ कखनो गाड़ीपर नाओ।
कगनमा हम बधइया लेबो हे ककरो बेटा-बेटी होइछ तँ पौनी-पसारी सोनाक कंगना इनाम माँगैछ।
कऽ धऽ अयलनि हीरा, माड़ पसौलनि जीरा, एहि ले मुह पुलौलनि हीरा, ताहि ले नेप चुऔलनि मीरा भोजन बनयबाक सब ओरिआओन कयलनि हीरा, मुदा माड़ पसा देलनि जीरा।
कचहरी के बाँकी बनमे असूल जे कचहरीमे कहबाक छलैक ओ वनमे कहलक।
कचहरीमे भीतो हाथ पसारइछ कचहरीमे देवाल पर्यन्तइ हाथ पसारि क’ पैसा माँगैछ।
कटहर के कोआ तूँ चोभब, तऽ मोटका मुङड़ा की होइ प्रधान वस्तुइक उपयोग करब आ अप्रधान वस्तुनकेँ गौण कयलापर व्यं ग्यस।
कटि ने चलैन्हि, तऽ केराक भार डाँर तँ नहि चलैत छनि, मुदा भार ढोयताह केराक।
कटि ने धोय, से भगते होइ वस्तुेक अभावमे किछु बनि जयबाक आकांक्षा रखनिहारपर व्यंकग्यय वा निर्दिष्ट स्थाकनपर पहुँचबाक हेतु श्रेणीबद्ध मार्गकेँ त्याकगि उपरे-उपर पदकेँ प्राप्तर करबाक आकांक्षीपर व्यंिग्यक।
कटिया कुम्हा्र के, दूध जजमान के दूधक बासन कटिया तँ बनबैछ कुम्हा र, मुदा ओहिमे दूध तँ यजमान रखैछ।
कटे जजमान के सीखे नउआ केश काटबा काल यजमानकेँ कटि जाइत छनि, मुदा नौआ केश काटबाक कला सीख जाइछ।
कड़रिक गाछपर सितुआ चोख केराक गाछपर सितुआ सेहो चोखगर भ’ जाइछ।
कड़रिक थमपर सितुआ चोख देo कड़रिक गाछपर सितुआ चोख
कतउ बोरे बोरे नोन, कतउ रोटियोपर ने नोन कतहु बोराक बोरा नोन पड़ल अछि तँ कतहु रोटीपर खयबाक हेतु सेहो नहि उपलब्धो होइछ।
कतऽ गेलहुँ तऽ कतहु ने क्योग प्रश्न कयलक, ‘कतय गेल छलहुँ।’
कतबो कउआ बने गबइया, करबे करतइक हें हें, कतबो कहियो ने बकरी देबी, करबे करतइक भें भें कौआ गबैया किएक ने भ’ जाय तथापि ओ हें-हें करबे करत।
कतबो गोआर पिंगल पढ़े, एक बात जंगक के कहे गोआर छन्दह-शास्त्रभक पंडित किएक ने भ’ जाय तथापि ओ सब बात जंगल केँ कहबे करत।
कतबो घर लारी, तइयो सइयाँ मारी पत्नीघ कहैछ, ‘कतबो परिश्रम क’ कए घरक व्य वस्थाल करैत छी तथापि पति मारैत छथि।’
कतबो डोलाएब कटिअहि धार जिद्दी व्यबक्तिक जिद्दक अधलाहि फल होइछ तथपि कतबो समझौला-बुझौलापर ओ अपन जिद्दपर अडिग रहैछ।
कतबो दूहब कटिये भर कतबो महींस वा गायकेँ दूहब तथापि एकहि कटिया दूध होयत।
कतबो राड़ पाग समहारथि, फेर राड़क राड़े राड़ कतबो पागकेँ सम्हा।रि क’ किएक ने चलैछ तथापि ओ राड़क राड़े कहबैछ।
कतय गरजल, कतय बरसल क्रोधक कारण क्यो़ अछि, किन्तुए ओकर फल ककरो भोगय पड़ैछ।
कतय जाइ छेँ डगरे डगरे, माय कतय रहइ छउ नगरे नगरे ककरोसँ क्यो पुछलक, ‘कतय जा रहल छेँ ?’ जबाब देलक ‘डगरे-डगरे।
कतय रसे कतय बसे, खयबाक बेर मसिअउत भाय कतय रहैछ ? कतय बसैछ ? तकर कोनो जानकारी नहि, मुदा खयबाक अवरपर कहैछ हम अहाँक मसिऔत भाय छी।
कतय रसे कतय बसे, कतय आबि कऽ गाँडि़ घसे देo कतय रसे कतय बसे, खयबाक बेर मसिअउत भाय
कतय राजा भोज, कतय भोजबा तेली बेमेल दुइ व्यसक्तिक तुलना कयलापर प्रयुक्तक होइछ।
कतय सुनल अछि, जुडि़ हो आगि कतहु सुनलहुँ अछि जे आगि शीतल होइछ ? व्यँक्तिक स्वोभावमे परिवर्त्तन नहि होइछ।
कतहु भूख मरे, कतहु लड्डू सरे क्यो भूखे मरि रहल अछि आर कतहु लड्डू सरि रहल अछि।
कतहु सत सत कमोट, कतहु खेत भासल जाय खेतमे कोनो ठाम सात बेर कमोट कयल गेल, मुदा कतहु कमोटक अभावमे खेत भासि रहल अछि।
कतिका चूए चो ले मूए, जौँ रोहिनी नहि कादो करे जँ कदाचित कतिका नक्षत्रमे वर्षा भ’ जाइछ तँ रोहिनी नक्षत्र मे वर्षाक अभाव रहैछ।
कतिका चूए तीन ले मूए राहर रेँड़ कपास, जौँ रोहिन दधि कादो करे हरे दास उच्चा स कतिका नक्षत्रमे वर्षा भेलापर रा‍हडि़, अण्डीछ, कपास मारि जाइछ।
कदम तरु चढि़ भड़कछ मार कदम्बर वृक्षपर चढि़ कच्छीन भिड़ने अछि।
कदुआपर सितुआ चोख तुo कड़रिक गाछपर सितुआ चोख
कननी के दालि भात, हँसनी के उपास जे भोजनकम हेतु सतत कनैत रहैछ तकरा भात दालि भेटैछ।
कन बचा कऽ धन सँइती एक-एक कण बचौला उत्तर धन एकत्रिंत होइछ।
कनबा के मोन छल, आँखिमे गड़ल खुट्टी निरर्थक बहन्ना क’ अनुचित क्रिया-कलाप कयलापर कहल जाइछ।
कनहा कुकूर माड़े तिरपित कुकूर कनाह अछि तेँ माड़सँ शीघ्रहि तृप्तच भ’ जाइछ।
कनहा बिआहमे सौ आफत कनाह व्यहक्तिक विवाहमे अनेक विपत्ति बथान अलग अछि।
कनही गायके भिन्नेक बथान गाय कनाहि अछि तेँ ओकर बथान अलग अछि।
कनही बिआहमे सौ आफत कनाह व्यहक्तिक विवाहमे अनेक विपत्ति उपस्थित होइछ।
कनही बिलाइ के घरहि सिकार बिलाइ कनाहि अछि तेँ घरहिमे अपन शिकार करैछ।
कनही बिलाइ माड़े तिरपित कनाहि बिलाइ माड़े सँ तृप्तिक अनुभव करैछ, कारण ओ सब वस्तुु नहि देखैछ।
कनिआइन दिसक पीसी, बर दिसक मउसी ई कनियाँक पीसी छथि तथा वरक मौसी।
कनियाँ आयल घर तऽ, बरक बाप के लागल हगबास कनियाँ जखन घर अयलीह तखने बरक बापकेँ पैखाना लागि गेलनि।
कनियाँक आँखिमे नोरे ने, आ लोकनियाँ भोकारि पाड़े कनियाँ सासुर जा रहल अछि तकरा आँखिमे नोरक कोनो ठेकान नहि, मुदा संग गेनिहारि लोकनियाँ भोकारि पाडि़ क’ कानि रहल अछि।
कनियाँक पटोर भीजल बापक नोर सऽ दुलारू बेटीक सासुर जयबा काल बाप बेसी कनैछ जाहिसँ ओकर भीजि जाइछ।
कनियाँक भाय, बरक भाय कनियाँ एवं वर दूनू पक्षक भाय छथि।
कनियाँ काने जाड़ हथिया हाथे जाड़, चितरा चिते जाड़ सेबाती सबे जाड़ उतराषाढ़ नक्षत्रमे कानमे, हस्त नक्षत्रमे हाथमे, चित्रा नक्षत्रमे हृदयमे तथा स्वातति नक्षत्रमे संपूर्ण शरीरमे जाड़ लगैछ।
कनियाँ के खोंइछे ने, बर माँगे दहेज कनियाँकेँ खोंइछ देबाक कोनो उपाय नहि, मुदा वर दहेज माँगि रहल अछि।
कनियाँ के माड़े ने लोकनियाँ के बुनियाँ कनियाँकेँ पीबाक हेतु माड़ पर्यन्ते नहि भेटैछ, मुदा संग अयनिहारि नउड़ीकेँ खयबाक हेतु बुनियाँ देल जा रहल अछि।
कनियाँ छथि कोटमे, बोल छनि बजारमे परदामे रहनिहारि कनियाँक स्वहर एतेक उच्चम छनि जे दूरक लोक सुनैछ।
कनियाँ बर के भेटे ने, ओठंगर ला मारि कनियाँ-वरकेँ एखन भेट नहि भेल अछि, मुदा ओठंगर कुटबाक हेतु मारि भ’ रहल अछि।
कनियाँ बर कोहबर गेल, अगुआक मुह कीदन भेल शुभ-शुभ क’ कए कनियाँ वर तँ कोहबरमे प्रवेश कयलक, किन्तु जे अगुआ छल तकर मुह अपन सनक भ’ गेललैक ।
कनियाँ मनिया झिंगगा के झोर, कनिया माय के लऽ गेल चोर एहि लोकोक्तिक कोनो विशेषार्थ नहि, प्रत्युेत बच्चाो सब नव कनियाँकेँ खिसिअबैछ।
कनियाँ माय माड़ला सिहकथि कनियाँ माय माड़क हेतु लालायित अछि।
कनियाँ रहे कोनमे, बोल जाय बनारस कनियाँ तँ कोनेमे अछि, मुदा एतेक जोरसँ बजैछ जे ओकर बोली बनारस चल जाइछ।
कनियाँ सऽ बर दुन्नाा कनियाँक अपेक्षा वर दुइ गुणा बेसी अछि।
कनी टा भाल मियाँ, बड़की टाक दाढ़ी भाल मियाँ तँ अपने कनेकटा छथि, मुदा हुनक दाढ़ी बड़ पैघ छनि।
कनी रने बने रहू रहू, जहिया सऽ मरल झगुरआ माय, तहिया सऽ मौका आइ देखाय एखन वनमे छलहुँ जे झगुरआ मायक मृत्युमपरान्तु आइ हमरा देखबाक अवसर भेटल अछि।
कपटी मित्र कोसिलिया भाय, बुड़बक बेटा ठेंठ जमाय कपट व्यंवहार कयनिहार मित्र, घरक वस्तुट बेचि क’ कोसल कयनिहार भाय, मूर्ख बेटा तथा भुट्ट जमायसँ बाँचल रहब श्रेयस्कयर अछि, अन्यचथा अहितक संभावना।
कपड़ाक भीतर सब नाङट वस्त्र तँ आवरण मात्र अछि, किन्तुब ओकरा भीतर सब नाङट रहैछ।
कपड़ा पेन्ही तीन दिन, बुध बेरहसपत सुक्क र दिन नव वस्त्र् बुद्ध, वृहस्पवति एवं शुक्र दिन धारण करबाक चाही।
कपूत से निपूत भला कुपात्र पुत्रक अपेक्षा निपुत्र रहब श्रेयस्कनर ।
कबीर दास के उनटे बानी, बरसे कम्म र भीजे पानी कबीरदासक उनटा कथन छनि।
कबीर दास के उनटे बानी, पहिने खानी तब असनानी कबीरदासक उनटे वाणी छनि, कारण पहिने खाइत छथि तत्प श्चा त् स्नापन।
कम कऽ जोतियो ढेर के घसियो ऊचै बन्हियो आरि, नहि उपजे तऽ सहर के दिहो गारि कम जोतबाक चाही, मुदा हेंगा खूब देबाक चाही एवं उच्ची क’ आरि बान्हेबाक चाही।
कमजोर काठ कीड़ा खाय कमजोर काठकेँ कीड़ा खा जाइछ।
कमयने भात, बइसने उपास काज करैत रहब तँ भात भोजनार्थ भेटत अन्यकथा बेकारी भेलापर उपवास करय पड़त।
कमरी बारह आना, मुँगड़ी अठारह आना कटहरक कमरीक दाम बारह आना, मुदा ओकर नेढ़ाक दाम अठारह आना अछि।
कमलक कोंढ़ी ला ढेंग कोकनल कमल सदृश कन्या क हेतु एहन वर आयल जे कोकनल ढेंगक समान अछि।
कमाइ ने धमाइ, रोज चाही मलाइ काज-धन्धा तँ किछु नहि करैछ, मुदा खयबाक हेतु प्रतिदिन मलाइ चाही।
कमाउ डेराइत आबे, निखट्ट लड़इत आबे कार्य कयनिहार व्यइक्ति अपन जीविकाक प्रति सतत सर्तक रहैछ, किन्तुअ कामचोर व्यतक्ति सतत युद्धक मुद्रामे ।
कमान से निकलल तीर, मुह से निकलल बात तीर जँ तरकससँ बहरा जाइछ तथा जे बात मुहसँ निकलि जाइछ ओ कोनो स्थितिमे वापस नहि अबैछ।
कमानी ने धमानी, सनहक लऽ कऽ डिरियानी काज धन्धाध तँ किछु ने करैछ, मुदा बासन ल’ कए खयबाक बेर उपतिस्थैत रहैछ।
कमानी ने धमानी, सनहक लऽ कऽ दउड़नी देo कमानी ने धमानी सनहक लऽ कऽ डिरियानी
कमाय कमरा के भोगे दुर्गादत्त कमार परिश्रम क’ कए उपार्जन करैछ, मुदा ओकर भोग करैछ दुर्गादत्त नामक व्याक्ति विशेष।
कमाय कोपीनबाला, खाय टोपीबाला अथक परिश्रमोपरान्तद कोपीन धारण कयनिहार अर्थात् गरीब कमाइत अछि, मुदा उपार्जित वस्तुबक भोग करैछ धनिकवर्ग ।
कमाय धोतीबाला, खाय टोपीबाला काज-धन्धा करैछ धोतीवला, मुदा भोजन करबाकाल टोपीवला उपस्थित रहैछ।
कमाय लँगोटिया, खाय लमधोतिया गरीब जी जानसँ श्रम क’ कमाइत अछि, किन्तुी मौज करैछ पूँजीपति वर्ग ।
कमायो चमड़ा, भोगे दुनिया दूत परिश्रम क’ कए उपार्जन करैछ चमार, मुदा ओकर भोग करैछ दुनियाँक लोकसब।
कयल धयलपर जय जगरनाथ भोजनाक सब व्यजवस्थाब भ’ गेलापर जय जगन्ना थक बेर आबि क’ उपस्थित भ’ जायब।
करम बेबसाय आधा आधी पूर्ण उद्यम कयलहु सन्ताि लाभ नहि होइछ, तँ प्रयुक्त होइछ।
करमे फल सऽ कलेस कम्रक अनुसारेँ क्लेनश होइछ, तँ प्रयुक्तज ।
करघा छोडि़ तमासा जाय, नाहक चोट जोलहा खाय एकबेर एक जोलहा करघा छोडि़ क’ तमाशा देखय गेल।
करजा काढि़ करजा लगाबथि टाटी घर ताला, सारक संग बहिन पठाबथि तीनू मुह काला कर्ज ल’ कए कर्जा लगौनिहार, फूसक घरमे ताला लगौनिहार तथा सारक संग अपन बहिन पठौनिहारक प्रतिष्ठां समाप्त भ’ जाइछ।
करजानमे पात ने घरमे केरा केराक बाड़ीमे केराक गाछमे एकोटा पात नहि अछि, मुदा घर गेलहुँ तँ केरा खयबाक हेतु देलक।
करड़ीक थम्हमपर सितुआ चोख निर्बल व्यहक्तिपर प्रहार कयनिहारपर व्यंेग्य ।
करनिए ने जाइ, कहतु के जाइ काज करबाक अछि, प्रत्यु त बांरबार एकहि विषय कहलासँ बदनामी होइछ।
करनी आ कहाउत एक्के लोकव्य वहार देखि वैह करैछ, जे कहावतमे भेटैछ।
करनी कुकूर घीउ पंथ काज कुकूर जकाँ करैछ, मुदा भोजनमे घी सदृश चिक्कजन चुनमुन एवं सुस्वा दु चाही।
करनी कुत्ताक नाम लछनदेब काज तँ कुकूर सदृश करैछ, मुदा नाम छनि लक्ष्मूणदेव ।
करनी के ओर ने काजक अन्तर ने अछि।
करनी खाकक, बात लाखक करनी तँ छाउर सदृश छनि, मुदा एक-एक लाखक बात करैत छथि।
करनी देखियह मरनीक बेरिया, पेट देखियह पबनिक बेरिया ककरो जीवनक उपलब्धिक लेखा-जोखा मृत्यूीपरान्तेे कयल जाइछ।
करनी ने करतूत, खाय के अढ़ाय सेर काज-धन्धा करबाक नामपर किछु ने, मुदा खयबाक बेर अढ़ाय सेर।
करनी ने करतूत, खायमे मजगूत तुo करनी ने करतूत खाय के अढ़ाय सेर
करनी ने करतूत, लड़बामे मजगूत काज-धन्धा नहि करैछ, मुदा सभक संग झगड़ा करबामे अत्य न्तह समर्थ अछि।
करनी ने धरनी, धिया ओठ बिदोरनी छौंड़ह काज-धन्धाि तँ किछु ने करैछ, मुदा सभठाम जा क’ मात्र हँसैछ।
करनी ने धरनी छिनरी नाम काज-धन्धाी तँ किछु ने छैक, मुदा नाम छैक सुवर्णी ।
करनीमे जेहि सेहि बातमे सफाइ, सनहकमे भात अछि जेठ भाय खाइ कोनो कार्य देलापर एम्ह र-ओम्ह,र करैछ, किन्तुा भोजनकाल अपन बासन ल’ कए उपस्थित होइछ तथा भात माँगैछ जे जेठ भाय खयताह।
कर ने तऽ डर की जखन अनुचित कार्य नहि करैत छी तखन डर कथीक ?
करबौ मनसा तीन काज, खेबौ हगबौ सुतबौ साथ पत्नी अपन काजक विवरण पतिकेँ दैछ जे हम सुस्वा दु भोजन तथा मल त्यादगक करब आ संगमे सूतब।
करमइतक भाग खेतक आरि ककर भाग्यग केहन अछि तकर वास्ताविकताक जानकारी ओकर खेतक आरिपर गेलापर होइछ।
करमइता के एक हर अकासे बहे भाग्यावान व्येक्तिक एक हर सतत आकाशमे बहैछ।
करम टगे तऽ टगे, रोहिन ने टगे, बान्हगल कोइरी की करे भाग्यग टरि जाय तँ टरि जाय, मुदा रोहिन नक्षत्र नहि टरय।
करम बहुसाबे आधे आध कोनो व्याक्तिक उन्नितिमे भाग्या तथा अध्य वयसाय दुनू आधा-आधी रहैछ।
करम बीसाबे आधे आध भाग्यी आ प्रयास आधा-आधी रहैछ।
कर भला तऽ हो भला नीक यकनिहारकेँ नीके फलक प्राप्ति होइछ।
करम सराही खेतक आरी देo करमइतक भाग खेतक आरि
करम हीन खेती करे, बड़द मरे रउदी परे भाग्यीहीन व्य,क्ति जँ खेती करैछ, तँ बड़द जाइछ तथा रौदी पडि जाइछ।
करमहीन खेती करे, बड़द मरे सूखा परे देo करम हीन खेती करे, बड़द मरे रउदी परे
करम हीन सागर गये जहँ हीराक खानि, कर पसारे घोंघा मिले देखो करमक हानि कर्महीन समुद्र लग गेल जतय रत्न -जवाहरक खान अछि, किन्तुे परिणाम भेल जे ओकर स्प र्शक फलस्वतरूप ओ सब सितुआ भ’ गेल।
करमे खेती करमे नारि, करमे मिले हित दुइ चारि भाग्युहिसँ खेतमे नीक उपजा होइछ, नीक पत्नीु भेटैछ।
करमे प्रधान तऽ राम के कोन निहोरा जखन भाग्येन प्रधान अछि तखन भगवत-भजनक कोन प्रयोजन ?
करसीक आगि सुनगइत सुनगइत सुनगइछ करसीक आगि शनै:शनै: सुनगैछ।
करिआ मेघमे मामा हो मामा, उजरा मेघमे माय करिया मेघ देखि मामाक तथा उजरा मेघ देखि मायक तथा उजरा मेघ देखि मायक स्मिरण होइछ।
करिगहि छोडि़ तमासा जाय, नाहक चोट जोलहा खाय करघा छोडि़ जोलहा तमाशा देखबाक हेतु गेल जतय ओकरा भयंकर घाटा उठाबय पड़लैक।
करिया अच्छरर भँइस बरोबरि करिया अक्षर तँ वस्तुँत: भैंस सदृश होइछ।
करिया खस्सी के करेज ने कारी खस्सीीकेँ हृदयक अभाव होइछ।
करिया नागमे बिजुली डाक कारी नागमे बिजलीक डाक लागल अछि।
करिया बाभन गोर चमार, कायर छतरी महाहतिसार कारी ब्राह्मण एवं गोर चमारक संग केहनो स्थितिमे नदी नहि पार करबाक चाही।
करिया मेघ डेराओना, उज्ज र मेघ बरसाओन कारी मेघ मात्र डेरबैछ वस्तुचत: ओ पानि नहि बरसबैछ, मुदा उज्जुर मेघ पानि बरसयबामे सहायक होइछ।
करी ने खेती पड़े न फन्दस, घर घर नाचे मूसर चन्द़ कृषि कर्म कयलापर अनेक झमेला होइछ।
करी मनक, सुनी सभक बात सुनबाक चाही प्रत्येीक व्योक्तिक, करबाक चाही अपन मनक।
करू खेती भरू दण्डक खेती करबाक अर्थ अछि दण्डड भरब।
करू बहुरिया लूरू खूरू, दुनू साँझक एके बेर हुरू कनियाँ सतत हल्लु क काज करैत रहैछ, मुदा भोजनमे एतेक प्रवीण अछि जे दुनू साँझक एके बेरि खा लैत अछि।
करे आरपर, पड़े जानपर दोसराक जे अनिष्टा करैछ ओकरा अपनहि जानपर पडि़ जाइछ।
करे गोतपर, परे पूतपर गोतियाक जँ अनिष्ट करब तँ ओकर प्रभाव अपन पुत्रपर पड़त।
करेजा तर, पइसा धर आनन्द लेबाक अछि तँ ओहि निमित्त खर्च करू।
करेजापर मूंग दररब ककरो निरर्थक तंग कयलापर व्यंहग्य्।
करे दाढ़ीबाला पकड़ल जाय मोछबाला अपराध करैछ दाढ़ीवला, मुदा पकड़ल जाइछ अछि मोछवला।
करे न खेती पेर न फन्दा, पर घर नाँचे मुसर चन्दी जे खेती नहि करैछ ओकरा कोनो तरद्दुत नहि होइछ, ओ विशिष्टो भ’ कए घर-घर घूमल करैछ।
कलकत्ता के कमाइ, हबरे गमाइ जतय उपार्जन कयल ओतहि गामा देल जाइछ, तँ प्रयुक्ते।
कलकुसरी के भरि देह फुसरी काजसँ जी चरौनिहार आलसी प्रकृतिक व्यसक्ति सतत कोनो-ने-कोनो बहन्ना बनबैछ, प्रयुक्त‍।
कलफुसरी के दुइटा फोंसरी भेल, एकटा फूटि गेल एकटा काँचे अछि घावक बहन्नाद बना क’ काजसँ जी चोरौनिहार कामचोरपर व्यंकग्य ।
कलबारक लडि़का भूखे मरे, लोक कहे दारू पीने अछि कलवारक बेटा तँ भूखे मरि रहल अछि, मुदा लोक कहैछ जे ओ दारु पीने अछि।
कलिजुगक उपकार हत्याद बरोबरि कलियुगमे ककरो उपकार करब हत्याो सदृश होइछ।
कलिजुगक धियापूता सब दूध भात ने खाय, जेमहर देखे तमाकूक लसफस तेमहर घुसकल जाय कलियुगक बच्चाा सब दूध भा‍त नहि खाइछ, प्रत्युसत जेम्हसर तमाकू देखैछ तेम्हपरे घुसिक क’ चल जाइछ।
कल्ला पर मसल्लाज पीसब ओ कल्ला पर मसल्लाज पीस रहल अछि।
कसबिनक घर जाइ, तऽ चतुड़ फेरि बतियाय वेश्या क घर गेलापर ओ सोझ मुह बात नहि कहैछ।
कसाइक सरापे गाय मरे कसाइक श्रापसँ कतहु गाय मरल अछि ? ककरो चाहलासँ ककरो अधलाह नहि होइछ।
कह पड़ोसी मोर सन, हम कहबउ तोर सन पड़ोसिया यौ! हम अहाँक प्रसंगमे कहब तथा अहाँ हमरा प्रसंगमे ।
कहने राड़ दुन्ना राड़केँ जँ कोनो कार्य कहल जाय तँ ओ अपन रड़पनी देखबैछ।
कहलक मनसा सुन पहिरयबो नौ नौ सेरक चूड़ी, घर गेलहुँ तऽ देखय देलक टुटले सूप चङेड़ी कोनो नव परिणीता कहैछ, ‘स्वायमी प्रतिज्ञा कयलनि जे सासुर जायब तँ अहाँकेँ नौ-नौ सेरक सोनाक चूड़ी पहिरबाक हेतु देब’ ।
कहऽ लगलौं यौ, कहा गेल हौ, तोँ हमरा मारबेँ रौ ककरो सम्बोँधनमे व्याक्तिक्रम भेलापर प्रयुक्तब।
कहल न बुझल हृदयक सून हृदयहीन व्यहक्ति कहला-सुनलापर नहि पसिझैछ।
कहलापर धोबिया गदहापर ने चढ़ैछ। कहलापर धोबी गदहापर नहि चढ़ैछ।
कहला बेगर कहनी टेढ़ कहला बिनु बात टेढ़ अछि।
कहाँ गाय के नइहर, कहाँ परजा के देस गायकेँ ने तँ कतहु नैहर होइछ आ प्रजाक ने कोनो देश।
कहाँ गेलहुँ कतहु ने कतय गेल छलहुँ, उत्तर भेटैछ कतहु नहि।
कहाँ घाओ, कहाँ पाओ घाव कतहु अछि, किन्तुभ पाओ कतहु देल जा रहल अछि।
कहाँ रसे कहाँ बसे, कहाँ आबि कऽ चूतर घसे कतय रहैत अछि, कतय बसैत अछि आ कतय आबि क’ खुशामद क’ रहल अछि।
कहाँ राजा भोज, कहाँ भोजबा तेली दू पैघ अन्तोरक स्थितिवलाक पापस्पहरिक तुलना कयलापर कहल जाइछ।
कहाँ राम राम, कहाँ टाँय टाँय सुग्गााकेँ राम-राम कहबाक हेतु सिखाओल जाइछ, तँ ओ टाँय-टाँय करैछ।
कहाबे के जमीदार, जलपान नदारत कहबैत छथि जमीन्दा र, मुदा घरक एहन व्यैवस्थार छनि जे जलखइ पर्यन्तर ने जुटैत छनि।
कहाबे के बीबी, चोराबके के चमरख कहबैत छथिब तँ पत्नीा, किन्तुन चोरि करैत छथि चमरख।
कहाबे के बुलबुल, गीले के गूलर ओ अपनाकेँ तँ बुलबुल कहैछ, मुदा गूलर गीरि जाइछ।
कहाबे ला बड़का, चोराबे ला छुच्छीम कहबैत छथि प्रतिष्ठिम व्यलक्ति, मुदा चोरबैत छथिै छुच्छीठ।
कहाबे ला रानी, चोराबे ला उचउटी कहबैत छथि रानी आ चौरबैत छथि चमौटी ।
कहाबे ला रानी, चौराब ला चमरख देo कहाबे ला रानी चोराबे ला चमउटी
कहाबे ला सेख, कटाबे ला छुच्छीब कहबैत छथि शेख, मुदा कटबैत छनि नुन्नीछ।
कहाबे ले सैयद, चोराबे ले छुच्छीु कहबैत छथि सैयद, मुदा एतेक नीचाँ चल जाइत छथि जे चोरि करैत छथि छोट वस्तुछक।
कहीं तीन तीन कमउट, कहीं खेत भासल जाय असंतुलित कार्य कयनिहारपर व्यंाग्यी।
कहीं साइ कहीं बधाइ, कनने पीटने जन पतिआइ कोनो ठाम साइ अर्थात् ब्या ना देल, किन्तु बाजा कतहु बाजिं रहल अछि।
कही आन, कुरिआबी कान कहबाक अभिप्राय जानिओ क’ ओहिपर ध्याकन नहि देलापर कहल जाइछ।
कही तऽ माय मारल जाय, ने कही तऽ बाप कुत्ता खाय जँ बजैत छी, तूं माय निष्प्रतयोजन मारि खाइछ, आ नहि बजैत छी तँ पिता कुकूरक ऐंठि खा लेताह।
कहियनि खेतक, सुनथि खरिहानक कहल जाय किछु आ सुनल जाय किछु, तँ प्रयुक्तक।
कहियो गाड़ीपर नाओ, कहियो नाओपर गाड़ी परिस्थितिक अनुसारेँ एक दोसरापर आश्रित होयब।
कहीं भूख मरे, कहीं लडडू सरे आर्थिक विषमतापर व्यंएग्यह जाइछ।
कही से ने थोड़, से घरे सऽ थोड़ जे कतहुसँ नहि होइछ ओ अपन घरेसँ भ’ जाइछ।
कहे आम सुने इमली कहल जाइछ आम आ सुनैछ इमली।
कहे कबीर एक लक्कनड़ चाही, बरगद पीपर पाकड़ चाही कबीरदास कहैत छथि बरगद, पीपर एवं पाकडि़क एक दातमनि चाही।

कहे कबीर जे हम करबे करबो, नहि करब तऽ हम करबे की करबो कबीरदास कहैछ जे कोनो कार्य विशेष हम करबे करब।
कहे खेतमे सुने खरियान कहल जाइछ खेतकेँ, मुदा सुनैछ खरियान।
काँकुर देखलक बिरनाबन काँकुर कतहु वृन्दाबवन जा सकैछ।
काँकोड़ बिआन काँकोड़हिा खाय मादा काँकोड़क बच्चानक जन्म‍ लेलाक बाद ओकरा मारि क’ खा जाइछ।
काँखि तर मोटटी, सलाम भाइ चुल्हाे काँखि तर मोटरी ल’ चूल्हिकेँ सलाम क’ विदा भेलहुँ।
काँच कांचन नहि जानय मूल गूणज्ञ व्य क्ति गुणक महत्त्व बुझैछ।
काँच घइल मुङराक आस घैल काँच अछि तँ ओकरा फोड़बाक हेतु मुङराक कोन प्रयोजन ? निर्बलकेँ दण्डित करबाक हेतु विशेष लामकाफक प्रयोजन नहि पड़ैछ अथवा खढ़केँ खोंटबाक हेतु तरुआरिक प्रयोजन नहि।
काँस कसउटी सोकन बान, ई छाडि़मत कीनिहऽ आन बड़द कनेक्शन कारी हल्लुोक उज्जडर रंगक, एहिसँ अतिरिक्‍त आन नहि कीनबाक चाही।
काका करू काकी करू माय बरोबरि नहि, रोटी करू बाटी करू भात बरोबरि नहि माय सदृश काका-काकी आ भात सदृश रोटी नहि भ’ सकैछ।
काछे मरद कसउटी आधा, गये मरद जे भगबा साधा कच्छास पहिरलासँ मर्द चुस्ते एवं मस्त्ब‍ रहैछ, किन्तुँ आधा पुरुषत्वव समाप्त‍ भ’ जाइछ।
काज एकोटा ने, छुट्टी एको छन ने निरर्थक व्येवस्तुता प्रदर्शित कयनिहारपर व्यं्ग्य ।
काजक बेरमे दाइ, खाइ बेरमे छिनारि काजक बेरमे अपनत्व जोड़ब आ खयबाकाल उपेक्षा करब, तँ प्रयुक्ति ।
काजक माय घर करू, पूतक माइ बाहर करू काजुल मायकेँ घरमे रखबाक चाही तथा जे बेटा मात्र माय कहैछ तकरा घरसँ निकालि देबाक चाही।
काज करे नथबाली, नाम लागे चिरकुटही के सब काज करैछ नथवाली, मुदा नाम लागि जाइछ चिरकुटहीक।
काज ने धन्धाी, अढ़ाय रोटी बन्धात काज-धन्धाी किछु ने करैछ, मुदा अढ़ाय सेर भोजन अवश्यध करैछ ।
काजने धन्धा , नौ रोटी बन्धाु बिनु परिश्रमक अत्यकधिक लाभ उठौनिहाकरक आकांक्षाकपर व्यंकग्यि।
काजर सेनुर जड़ल, तऽ पेट बज्जार खसल काजर एवं सिन्दूकर तँ जडि़ गेल, आब तँ पेट पर्यन्तनपर आफत भ’ गेल।
काज से काज, की करकट से काज काजसँ प्रयोजन अछि कि निरर्थक विवाद कयलासँ ? जे नीक कार्यकर्त्ता अछि, मुदा ओकर वाणी कर्कश छैक तथापि बुद्धिमान ओकरासँ काज लैछ।
काजीक पिल्लीै मुइल तऽ सब केओ संग गेल, काजी मुइला तऽ केओ ने गेल काजीक कुकूरक मृत्युत भेल तँ ओकर अन्तिम संस्कामरक हेतु सब क्यो गेल, मुदा काजीक मृत्युापरान्तु अन्तिम संस्का,रमे क्योकन ने गेल।
काजी काज करे, फुरही बोली भरे कार्य कयनिहार कार्य करैछ, किन्तुि फूहड़ तँ मात्र करैछ ।
काजुल काज करे, कुलहड़ी बेलाड़ दिये देo काजी काज करे फुरही बोली भरे
काटे बार ने नाम तलबार कटैत अछि बार नहि, मुदा कहबैछ तलवार।
काठक घोड़ा नहि चलैछ निर्जीव वस्तुनमे प्राण कतयसँ आबि सकैछ ?
काठक हाँड़ी एकहि बेर चढ़ैछ काठक हाँड़ी अगिपर एकहिबेर चढ़ैछ।
कातिक कुतिया माघ बिलाइ, चइत चिड़इ सदा लुगाइ कार्तिकमे कुकूर, माघमे बिलाइ, चैत्र मासमे चिड़ै-चुनमुन्नी एवं स्त्री सतत कामोन्मसत्त रहैछ।
कातिक जऽ औड़ा तर खाय, कुटुम्बी सहित बइकुण्ठेऽ, जाय कार्तिकमे धात्रीक नीचाँ भोजन कलासँ अत्यतधिक पुण्यँ होइछ, कारण कार्ति‍क पुण्यि मास थिक।
कातिक जाड़ा जनम लियो है अगहनमे लड़काई, पूसे जाड़ा धूम मचाबे माघे सिरक भराई कार्तिकसँ जाड़क प्रारंभ होइछ, अग्रहणमे ओ शैशवावस्थारमे रहैछ, पौषमे ओ धूम मचा दैछ, मुदा माघमेबिनु सिरकक काज नहि चलैछ।
काते काते लौका, बीचमे गुँहखौका बच्चाक सभी द्वारा एक दोसराकेँ खौंझैबाक हेतु प्रयोग करैछ।
कानक मन भेल तऽ, आँखिमे गड़ल खुट्टी कानबाक इच्छा भेलैक तँ लाथ कयलक जे हमरा आँखिमे खुट्टी गडि़ गेल अछि।
कान कुइस कोते गरदनियाँ, ई तीनू से हारे दुनियाँ कनाह, कुइड़ तथा टेढ़ गर्दनवला व्यसकित साधारणतया दुष्टर प्रकृतिक होइछ, तेँ तीनूक व्य वहारसँ लोक सतत सशंकित रहैछ।
कान छल तऽ सोन ने, सोन भेल तऽ कान ने जहिया कान छल तहिया सोन नहि छल।
कानल कनियाँ रहिये गेल, कानी छटायल बर चलिये गेल कनियाँ कानि-खीझ क’ रहि गेलीह, मुदा वर तँ कानी छटा क’ चल गेलाह।
कानल कनियाँ रहिये गेल, घोड़ा चढ़ल बर चलिये गेल सासुर जयबाक हेतु कनियाँ कनली, मुदा कोनो कारणेँ ओ नहि जा सकली।
काना फूसीमे खरगपुरक राज गेल चुगलीक कारणेँ खड़गपुर राज्य क अन्ता भ’ गेल।
कानी आँखिमे काजर कयलहुँ, सइयाँ के पतिआबे गेलहुँ कनही आँखिमे काजर लगा क’ अपन स्वा मीकेँ देखाबय गेलीह जे हुनका नीक लगतनि तथा ओ बुझताह जे वस्तुगत: हम कनाहि नहि छी।
कानी की खीझो, बेटी ससुरा जायत बेटी कानथु वा खीझथु हुनका तँ सासुर जयबाक छनि।
कानी गाय के भीने बथान तुo कनही गाय के भिन्नेत बथान बथान>वत्सक स्थानन (सं.)
कानी धिया कोनमे, सोन पूत बनमे कनाहि बेटी सतत कोनामे रहैछ, मुदा सोन सदृश पुत्र तँ सतत वन-वन भ्रमण क’ कए उपार्जन करैछ।
कानी धिया रानी भेल, पटोरे पोछ‍थि नोर कनाहि बेटी रानी बनि गेलीह, किन्तुद बहुमूल्यट पटोरमे नोर पोछि लेलनि।
काने लागल कानी, बजााबय लागल ढोल कनही कानि खीझ क’ ढिढोरा पिटय लागल।
कापर करू सिंगार, पिया मोरा आन्हगर हे पत्नीक कहैछ ककरापर श्रृ़गार-प्रसाधन करू, स्वाीमी तँ आन्हपर छथि, तेँ ओ नहि देखि सकताह।
का बरसा जब कृसि सुखाने, समय चूकि पुनि का पछताने रामचरितमानसक कथन लोकोक्ति रूपमे प्रचलित भ’ गेल, जकर अर्थ स्पाष्ट, अछि।
काबिल मखलाह तीन ठाम बुद्धिमान व्यीक्ति अनेक स्थाचनपर धोखा खाइछ, तँ प्रयुक्तन होइछ।
काबुलमे की गदहा ने होइछ की काबुलमे गदहा नहि होइत अछि ? मूर्ख सर्वत्र होइछ।
कामक बात मोरा कलही नाम, दिनमे झगड़ा रातिमे उपास काजक बात कहैत छी, तँ सब कहैत अछि झगड़ा कयनिहार अछि।
काम करे नथबाली, लग जाय चिरकुटही के देo काज करे नथबाली नाम लागे चिरकुटही के
काम ने काज के, दुसमन अनाज के कोनो काजक लोक नहि, मुदा भोजन करबामे बहादुर।
काम ने धन्धा।, सात रोटी बन्धास देo काज ने धन्धा, अढ़ाइ रोटी बन्धा
कायथ किछु लेलेँ देलेँ बराहमन खिऔलेँ, धान पान पनिऔलेँ और राड़ जाति लतिऔलेँ कायस्थत घूस-घाससँ, ब्राह्मण भोजनसँ, धान आ पानकेँ पनिऔलासँ तथा राड़ जाति लतिऔलासँ काज करैछ।
कायथ कुरकुट कौआ, तीनो जात पोसौआ कायस्थु, मेहतर आ कौआ तीनू एक दोसराक सहायतार्थ प्रस्तुमत रहैछ।
कायथ के कागजेमे सुझै कायस्थ मात्र कागत देखि सब बात फरिछबैछ तथा समाधानक रस्ता देखबैछ।
कायथ से धोबी भला ठग से भला सोनार, देबता से कुत्ता भला पण्डित से भला सियार कायस्थयसँ धोबी, ठकसँ सोनार, देवतासँ कुकूर एवं पण्डितसँ गीदर होइछ।
कार गोर भइयाक सार कारी होथु वा गोर ओ तँ भइयाक सार छथि।
कारज धीरे होत है, काहे होत अधीर कोनो कार्य धैर्य धारण कयलासँ सम्पहन्न् होइछ।
काराबार दाइ के, नाम भउजाइ के सब काज तँ कयलनि ननदि, मुदा नाम भेलनि भौजीक।
कारी अक्षर महीस बरोबरि निरक्षर व्यमक्ति हेतु अक्षर महीसक समान थिक।
कारी छी तऽ कारी छी, राम के दुलारी छी कारी व्य क्ति आत्मह-संतुष्टिक हेतु कहैछ जे राम सेहो कारी छलाह तेँ हम सहजहिं रामक प्रिय छी।
कारी बाभन गोर सूद्र, तकरा डरेँ काँपे रूद्र कारी ब्राह्मण आ गोर शूद्रक डरेँ महादेव पर्यन्तर काँपैत छथि, तखन साधारण लोकक कोन कथा ? दुनू सर्वथा अविश्व सनीय होइछ।
कारी भँइस अन्हआरिया राति, बज्जयर परे अहीरक जाति, होइत परात हथकरिये लेब, पगहा खोलि अहीर के देबु कोनो जोलहा एक भैंस खरीदलक।
कारी मुह चकनक रिक्कार, माय कहे हमर इहे बेटा निक्काा बेटा कुरूपो रहैछ तथापि मायक हेतु ओ अत्य धिक प्रिय होइछ।
काल जाय कलंक ने जाय समय व्तीकलंत भ’ जाइछ, मुदा कलंक नहि मेटाइछ।
काल ने ककरहु राखय थीर समय बलवान अछि जे ककरो स्थिर नहि राखि सकैछ।
काली के धन जगधर बेहबरिया वस्तुकत: धन तँ कालीक छनि, मुदा लहना-तगादाक काज जगधर करैछ।
काली है कजरारी, गोरी है बिदोरी अपन वस्तुजक उपयोगिता आ आनक वस्तुसक निन्दाय कयलपर प्रयुक्ता।
काल्हि कुमार आइ राकस भेल काल्हि धरि तँ सज्जकन छल, मुदा आइ राक्षस भ’ गेल।
काल्हि के देखलक अछि भविष्य क कोनो निश्चितता नहि होइछ, तेँ काल्हि भरोसे कोनो काज छोड़ब सर्वथा अनुपयुक्तो ।
काल्हि सकराँति परसू भदबा यात्रापर बहार होयबासँ पूर्व विचार करब।
काल्हुपक नीपल गेलऽ दहाय, आजुक नीपल देखऽ हे दाय काल्हि जे नीपल ओ तँ दहा गेल, आइ जे नीपलहुँ अछि तकरा हे दाइ माय देखू।
काल्हुँक बनियाँ आजुक सेठ काल्हि धरि जे बनियाँ छल आइ अकस्मा त् सेठ बनि गेल अछि।
कास पितर किछु गहना छी देह तोड़ना छी, गंजी फंजी किछु नुआँ छी देह झपना छी, छोअ सइयाँ किछु सइयाँ छी गोड़ जतना छी


जहिना कासा, पीतरक गणना आभूषणमे नहि होइछ तहिना गंजी इत्याीदिक गणना वस्त्रइक अन्ततर्गत नहि भ’ सकैछ।
कासा दी बासा ने दी सब वस्तुबक व्ययवस्थाभ क’ देबाक चाही, किन्तुत निवास स्थाीनक नहि।
कासा पितर किछु गहना छी देह तोड़ना छी, बुढ़बा भतार कोनो भतरा छी गोर जतना छी जहिना कासा पीतरक गणना आभूषणक अन्तार्गत नहि होइछ तहिना वृद्ध स्वाीमीक गणना स्वाामीमे नहि।
कासीक कंकर भज सिब संकर काशीक कंकड़-पाथर पर्यन्त सतत शिवंशंकर नाम जपैछ।
कासी कुसी चौठी चान, आब की रोपबह धान किसान कास फुला गेलापर, कुसी अमावस्याब तथा चौठचन्द्रग भ’ गेलापर गृहस्थ केँ धनरोपनी नहि करबाक चाही।
कासी चुतड़ बनारस पिढि़या चूतड़ तँ काशीमे छनि, मुदा पीढ़ी छनि बनारसमे।
कि जाने बाभन की जाने बाभन के बहिया, गोआर कोइरीक जान गेल कहिया गोआर एवं कोइरीक जान कहिया गेल एहि विषयमे ने तँ ब्राह्मण जनैछ ने तँ हुनक नोकर।
किछु कयलनि कबिता कहलनि भनिता किछु काज तँ कवितो कयलक आ किछु ओकर व्या ख्या कार सेहो।
किछु खनहन, किछु मोटरी बनहन किछु खयलनि आ किछु मोटरी बान्हि क’ लए गेलाह।
किछु खेनहुँ बल, किछु देखनहुँ बल खयलासँ तथा अपन आमदनी देखलासँ बलक वृद्धि होइछ।
किछु तोर किछु मोर, किछु खा गेल चोर किछु तोहर, किछु हमर आ किछु चोर खा गेल।
किछु धार से कटैछ, किछु भार से कटैछ किदु हथियारक धारसँ कटैछ तथा किछु ओकर वजनसँ।
किछु लोहोक दोस, किछु लोहारोक दोस किछु लोहाक दोष ओकरा संगहि किफछ दोष लोहाराकेक होइछ।
कि दुख जाने दुखिया कि दुखियाक माय, कि दुख जाने सिधरी थोड़हि जल उबियाय दु:खी व्य क्ति तथा ओकर माय दु:खक अनुभव करैछ।
कि पर गने कि पर भेने, नाच गाबे अपना भेने आनक ओतय हँसी-खुशी मनयबामे कोनो लाभक संभावना नहि।
कि पेटी दे कि बेटी दे असामाजिक तत्त्व ककरोसँ धन अथवा इज्जातिक मांग करैछ, तँ प्रयुक्तत।
किम्बाि हाथे छोट, किम्बा नदी मार्गे दूर कोनो वस्तुतकेँ प्राप्त करबामे असफलता भेटलापर साध्या एवं साधनक बीचक अन्तारपर विचार करबाक स्थितिमे प्रयुक्तस।
किरपिन मउगी के दुन्नार खरच कृपण व्यउक्तिकेँ दुन्नाख खच्र होइछ।
किरिया करम पाछु पड़ल, गरा उदाराछ पड़ल क्रियाकर्म तँ सब पाछाँ चल गेल, मुदा गर्दनिमे रुद्राक्षक माला पडि़ गेल।
किरिया पान के बेरिया गारीत तरकारी निर्लज्जा व्यगक्तिक हेतु किरिया खायब तँ पानक सदृश तथा गारि तरकरीक समान होइछ।
की कहू किछु कहल ने जाय, नो मन आटा बकरी खाय हमरा किछफ नहि कहबाक अछि।
की जै पूता सोई, जाने हँडि़या खुदबुद होई मायक बेटाकेँ कहैछ, ‘रे पूत, काज-धन्धाी कर, जाहिसँ हाँड़ी खुदबुदेतौ अन्या था उपवासे।
की धन खाय गोरी, की धन खाय घोड़ी, की धन खाय रोड़ी धनक विनाश वस्तुैत: तीनिए वस्तु सँ होइछ, सुन्दुरी, घोड़ी तथा रोडीसँ ।
कीर्ति करी,जीबि‍त रही व्य्क्तिकेँ एहन कार्य करबाक चाही जाहिसँ मृत्यु परान्तोए कीर्तिक कारणेँ चर्चित रहि ओ जीवित रहथि।
की परसइ छी फूसि फासि, तऽ किछु लगौने जाउ की परसि रहल छी फूसि-फासि ? तँ किछु हमरो देने जाउ।
की पैरमे मेहदी लागल अछि कोनो काचचोरकेँ लक्ष्यल क’ कहल जाइछ जे पैरमे मेहदी थोड़बहि लागल अछि जे काज कयलासँ झरि जायत।
कुआँक माटि कुएँमे लागे इनार काल जे माटि बहराइछ ओकरे ईटा बना क’ पुन: इनारमे लगाओल जाइछ तथा ओकर लगपासक सहन कयल जाइछ।
कुकूर कतहु आगि पाके कुकूर कतहु आगिमे जड़ल अछि ? धूर्त्तव्यकक्तिकेँ ठकब श्रमसाध्य अछि।
कुकूर कतहु घूर पाके घूरक आगिमे कुकूर नहि पाकि सकैछ।
कुकूरक जाति हुलबुलिए गेल कुकूर भोज-भातक अ‍ाधिक्य देखि क’ हुलबुल करय लागल।
कुकूरक नाङरिमे कतबो तेल लगाएब, ओ टेढ़क टेढ़ रहत कुकूरक नाङरिमे कतबो तेल किएक ने लगाओल जाय तथा ओकरा सोझ करबाक चेष्टाज कयल जाय तथापि ओ सोझ नहि भ’ सकैछ।
कुकुरक पीठ पोछी तऽ मुह चाटे कुकूरक पीठ पोछब तँ ओ मुह चाटत।
कुकूरक पेट कतहु घी पचे कुकूरक पेटमे घी नहि पचि सकैछ।
कुकूरक भागे सीक टुटल कुकूरक भाग्युसँ सीक टुटि क’ खसि पड़ल।
कुकूर के कतहु घी पचे कुकरक पेटमे कतहु घी पचैछद्य।
कुकूर जकाँ अछाहे भूकब छाया देखि क’ अनेरे कुकूरक समान हल्लाे करब, तँ प्रयुक्तर।
कुकूरके पोँछ बारह बरिस, गाड़ी तखनहुँ टेढ़ै के टेढ़े देo जौर जडि़ गेल ऐंठन नहि गेल
कुकूर भेल जिलेबीक रखबार कुकूर जिलेबीक रखबरी की कतर ? ओ देखतहि-देखतहि सब खा जाइछ।
कुकूर मरथि खाय बेगर, डन्डा दिऐन्हि लोक कुकूर तँ खयबाक हेतु मरि रहल अछि, किन्तुत लोक ओकरा ठेङासँ मारि रहल अछि।
कुकरमिए नाम, की सुकरमिए नाम कुकृत्य वा सुकृत्यु एही दुनूसँ लोक चीन्हिल जाइछ।
कुकूरे देखलक बिनाबन देo कुकूर देखलक बिरनाबान
कुकूरो ने पूछे खेसारी के दालि, बिना हर बैल के कुकूर पर्यन्ते खेसारीक दालि नहि पुछभ्ैछ, कारण ओकरा उपजैबामे हर बड़दक प्रयोजन नहि पड़ैछ।
कुचालिक संग हँसी, जीउ जान के फाँसी दुश्च रित्र व्यछक्तिक संग हँसी करब नीक नहि, कारण कखनो एहन स्थकति आबि जाइछ जे प्राण अवग्रहमे पडि़ जाइछ।
कुजड़नीक अगारी, कसाइक पिछारी कुजड़नीसँ आगाँसँ मोलजोल करी, मुदा कसाइसँ पाछाँसँ।
कुटनी के की भेल, साँय बेटा के गारी भेल, दुनू कानमे बाली भेल कुटनीकेँ कुटनपनक पुरसकार भेटलनि साँय-बेटाक गारि आ दुनू कानक बाली।
कुटनी पिसनी के एक बखरा, बइसल बिलाइ के तीन बखरा परिश्रम कयनिहारकेँ एक हिस्सा, भेटल तथा बैसल रहतिनहार बिलाइ, जे कोनो कार्य नहि कयलक तकरा तीन हिस्सा, भेटलैक।
कुटनी से तऽ राम बचाबे, पिआरी भऽ कऽ पत उतराबे हे राम! हमर प्रार्थना अछि जे कुटनीसँ रक्षा करू।
कुटि पीसि अयलनि हीरा, माड़ पसौलनि जीरा हीरा नामक व्यनक्ति कुटलनि, पिसलनि तथा जीरा नामक व्यनक्ति जा क’ माड़ पसौलनि।
कुटि पीसि खो मउगी बहु हमर हो, नुआ फाटउ तऽ नइहर जो पति पत्नीतसँ कहैछ जे अन्न कूटि-पीसि खो आ हमर पत्नी बनल रह।
कुटुमक खायल दाम, आ कुकूरक खायल चाम संबंधीक आदर-सत्का रमे अपना आपकेँ विनाश कयनिहारक तथा कुकूरक खायल चामक कतयहु अन्तक ने होइछ।
कुटे पीसे माय, खाय जमाय माय कुटान-पिसान करैछ, मुदा सब जमाय खा जाइछ।
कुठाम घाओ भँइसुर ओझा गुप्तांागमे घाव भ’ गेल छैक तथा भैंसुर ओकर झाड़-फूँक क’ रहल छथिन।
कुड़ाक बैल आर फेर, आर फेर आर फेर मँगनीक बड़दसँ लोक निर्ममतापूर्वक काज लैछ, तँ व्यंमग्यक।
कुत्ता कहे कुत्ती सऽ बेपारी डेरा जाउ, खाइ ले ने पीबै ले ने लाठी खाइ ले जाउ लोभग्रस्त भ’ कए जँ कृपणक ओतय जाबय तँ तिरस्कृलत होयबाक संभावना बेसी रहैछ, तँ प्रयुक्ता ।
कुत्ता के घी ने पचे देo कुकूरक पेटमे कतहु घी पचे
कुत्ता गोरे जायब, बिलाइ गोरे आयब कुकूर एवं बिलाइ चलबामे बड़ तेज होइछ।
कुत्ता चोर से मिल गेल, तऽ पहरा के देत कुकूर जँ चोरसँ मिल जाइछ तँ पहरा देबाक कार्य के करत ? रक्षके जखन भक्षक भ’ जाइछ तखन प्रयुक्तर।
कुत्तो बइसइछ तऽ, दुम हिला कऽ कुकूर जतय बैसैछ ततय अपन नाङरिसँ झाडि़ पोछि क’।
कुदिना हितजन अनहित रे थिक जगत सुभाब ई जगजिहिर अछि जे विपत्तिमे अपन व्यगक्ति सेहो आन भ’ जाइछ।
कुपात्र से निरबंस भला कुपात्र बेटाक अपेक्षा बिनु बेटा-बेटीक रहब नीक थिक।
कुपूत से निपूत भला देo कुपात्र से निरबंस भला
कुबंस से निरबंस भला वंशक अधलाह भेलासँ नीक अछि निरवंश रहब।
कुमार करइला कातिक दही, मरे ने तऽ परे सही कार्तिक मासमे करैला आ दही भोजन कयलापर मृत्यु संभावित अछि अथवा रोगी बनब निश्चित।
कुमार के सदा बसंत अविवाहित व्य क्तिकेँ सतत वसंत बहार रहैत छैक।
कुमारि कनियाँ के बर आऽ, धरती के बीया भेटिये जाइछ जहिना कुमारि कन्यारकेँ क्योस-ने-क्योर वर भेटि जाइछ तहिना धरती केँ आबाद करबाक हेतु बीया कोनो-ने-कोनो रूपेँ भेटि जाइछ।
कुमारि छलहुँ तऽ तेलो छल, बिआह भेल तऽ सेहो ने जखन कुमारि छलहुँ तखन माथमे लगैबाक हेतु एकाध बून्दँ तेलो भेटि जाइत छल, मुदा विवाहोपरान्तत एहन विषम स्थिति आबि गेल जे ओहो ने भेटैछ।
कुमारि बेटी मरे, तऽ तीन लोक तरे कुमारि कन्यामक मृत्यु भेलापर तीनू लोक तरि जाइछ।
कुभ्भी जल कर जेहन पि‍रीति कुम्भीइ जलक अभावमे अपन अस्त्स्वि समाप्तइ क’ लैछ।
कुम्हाइरक घर चुक्काअक दु:ख कुम्हाइरक घरमे चुक्का‍क कोन कष्टख ? जतय जाहि वस्तुभक आधिकय अछि ततय ओकर अभाव दृष्टिगत हो, तँ व्यंकग्यष।
कुम्हाृरक घर बासनक अकाल देo कुम्हासरक घर चुक्कागक दुख
कुम्हारा सूते निचेत माटि ने लऽ जाय चोर कुम्हाृर निश्चिन्तत भ’ सुतैछ, कारण ओकर संपत्ति माटिकेँ चोर ने ल’ जा सकैछ।
कुम्हैिनक बेटी क नइहरे सुख ने सासुरे सुख कुम्हािरक बेटीकेँ ने तँ नैहरमे सुख भेटैछ आ ने सासुरमे ।
कुरमी ओ कहार, हुचुकि हुचुकि कोदरि पार कुरमी एवं कहार अत्यटन्तु परिश्रमी होइछ तेँ कोदरि पाड़बामे पटु होइछ।
कुसियारमे बेसी रस भेलापर फाटि जाइछ कुसियारमे रसाधिक्यभसँ ओकर पोर फाटि जाइछ।
कुसी अमाबस चउठी चान, आब की रोपबही धान किसान, जय बोझ बीआ तय बोझ धन कुशोत्पानटन अमावस्याय एवं चौठचन्दतक पश्चा्त् धान रोपब लाभप्रद नहि होइछ, कारण जतेक बोझ धानक बीआ लगैछ ततबे बोझ धान होइछ।
कूँड़ाक बालु ओलपइल भूजा भुजनिहार कूँड़ाक बालु कखनो कूँड़ामे रखैछ तँ कखनो जमीनपर।
कूटल दबाइ आ मूरल बइरागी ने चिन्हाबय विभिन्ना प्रकारक औषधकेँ जँ एकसंग कूटि देल जाइछ तथा अनेक बैरागी जँ एक स्थाजनपर एकत्रित होइछ तँ ओकरा पृथक् कष्टज साध्यक भ’ जाइछ।
कूटली ने पिसली भरली पानी, बइसल खाली मथुरा के रानी मथुराक रानी ने तँ कूटैछा, ने पिसैछ आ ने पानि भरैछ।
कूटे पीसे पानी भरे, तीन काम नउरी करे कूटब, पीसब तथा पानि भरबाक कार्य नउड़ी करैत अछि।
कूटे हर्रे खाय बहेड़ा हर्रे कुटैत अछि आ बहेड़ा खाइत अछि।
कूदे फाने तोरे तान, ताके राखे दुनियाँ मान एम्ह र-ओम्हतर दौड़-बरहा कयनिहारक सम्माफन सब करैछ, किन्तु़ सोझ व्ययक्तिक सम्माफन क्योर नहि करैछ।
कूदैत कूदैत नचनियाँ भऽ जाय कुदबाक अभ्यािस करैत-करेत लोक नाच सीख जाइछ।
कूप न आबय पथिकक पास पिपासित पथिकक लग इनार नहि अबैछ।
कृपिन कोठली खिखिर बिल दूनू एक समान, डालैतमे सुख उपजत घैंचत परान कृपणक घर एवं खिखिरक बिल एक समान रहैछ।
केओ काने आन जान ला, केओ काने खोंइछाक धान ला कन्यााक विवाहोपरान्तक इएह अभिलाषा रहैछ जे ओकरा नैहरासँ आनजान बनल रहे, जे विदा होयबा काल खोंइछक धान मात्र ओकरा भेटैत रहैक।
केओ खाइते खाइते मेर, केओ कमाइते कमाइते मरे ककरो अन्ना धिक्य रहैछ तँ ओ खाइते-खाइते मरि जाइछ तथा क्यो अन्नाैभावक कारणेँ कमाइते-कमाइते मरि जाइछ।
केओ नाके टेढ़, केओ नकमुनिए टेढ़ ककरो नाक टेढ़ रहैछ तँ ककरो नाकक आभूषण टेढ़।
केओ ने बेकत कहए निज चोरि अपन चोरिक कथा क्योज व्यकक्तू नहि करैछ।
केओ पुछबो ने करे, बटोही टर टर करे क्योप कोनो बातक राय मोसबिरा ने करैछ तथापि अपना मने टर टर सबमे सलाह दैछ।
केओ मायक पेट सऽ नेने ने अबैछ सब वस्तु क्यो मायक पेटसँ सीख क’ नहि अबैछ प्रत्यु‍त सांसारिक माया-माहेमे सब वस्तुपक ज्ञानार्जन करैछ।
केओ मूए केओ जीए, सुथरा घोर बतासा पीए क्योा मरे वा जीवित रहे, सुथरा फकीर सतत बतासा पानिमे घोरि क’ पीबैछ।
केओ मोलमे भारी, केओ तउलमे भारी कोनो वस्तुाक दाम अधिक रहैछ तँ कोनो वस्तुोक वजन भारी होइछ, जेना सोना आ लोहा।
केकर केकर धरी नाम, कम्म,र ओढ़ने सउँसे गाम ककर-ककर हम नाम गनाबी।
केकर खेती केकर गाय, कोन पापी हाँके जाय आन व्यजक्तिक खेतमे आन व्यमक्तिक गाय सब फसिल चरि रहल अछि तकरा तेसर व्यफति देख रहल अछि।
केकर खेती केकर गाय, पापी होए जे हाँके जाय आन व्यजक्तिक खेतमे आन व्यरक्तिक गाय सब फसिल चरि रहल अछि तकरा तेसर व्यफक्ति देख रहल अछि।
केकर खेती केकर गाय, पापी होए जे हाँक जाय ने तँ अहाँक खेत अछि ने अहाँक गाय अछि तखन ओकरा बैलयबाक कोन प्रयोजन ? परोपकारक कोन प्रयोजन अछि ?
केकरा कहबइ के पतिअयते, जेकरा कहबइ से लतिअयते एहि घटनाक प्रसंग हम ककरा कहब, के विश्वानस करत, जकरा कहब सैह लतिआओत।
केकरो घर जरे, केओ आगि तापे केकरो घर जरि रहल अछि तथा क्योग आगि रहल अछि।
के गनए गेनस के गणेशक गणना के क’ सकैछ ?
केतनो अहिरा होहिँ सेयाना, लोरिक छाडि़ न गाबहि आना अहीर कतबो ज्ञानी किएक ने भ’ जाय तथापि लोरिक छोडि़ आन किछु नहि गाबि सकैछ।
केतारीक जारनि संगे कुसियारक जारनि ओकर पात ओकरा संगे रहैछ।
केदन कहलक ककर दन परि कोनो बातपर क्योन कहलक जे ककर दन बात।
केदन देखलक बरियारक गाछ, तऽ कहलक बिरनाबन इहे क्यो बरियारक गाछ देखि हल्लाऽ कयलक जे वृन्दाावन अछि।
केराक बारीमे भूत बाजै छै, हम की झूठ बाजै छी केराक बारीमे भूत बाजि रहल अछि।
केस उपारने मुरदा हल्लुरक मुर्दाक दुइ चारि केश उपारि देलासँ ओकर भारमे कोनो परिवर्त्तन नहि होइछ।
केस नइ बनहइत छी, साँय के तोक रखैत छी स्वा मीकेँ प्रसन्नो रखबाक उद्देश्येँ हम केशक विन्याीस करैत छी अन्यसथा हमरा केश बन्हयबाक कोन प्रयोजन ? दोसराक प्रसन्नासर्थ कार्य कयनिहारपर व्यं ग्य ।
केहन केहन गेला, तऽ मोछ बाला एला सामर्थ्यनवला व्य‍क्तिक प्रयास कोनो कार्यमे विफल भेलापर सामर्थ्य हीन व्यिक्ति द्वारा पुन: प्रयासपर व्यंहग्यर।
कैंचा ने कौड़ी, उतान हो गे छउड़ी बिनु पैसा रुपैया व्य,य कयने इलबाइस कोना भ’ सकैछ ?
कैथ आ कबूतर के छुतका ने उतरे कायस्थक एवं कबुतरकेँ अशौच नहि कहियो उतरैछ।
कैथ कउआ राड़, तीनू जाति अगोर कायस्थआ, कौआ एवं राड़ ई तीनू जाति सतत अगोरने रहैछ जे कखन कतयसँ की लाभ हैत।
कैथक गाममे गिदर पटबारी कायस्था गाममे गीदर पटबारी बनि गेल अछि।
कैथक छोट गोआरक मोट कायस्थोक बच्चाग दुब्बगर-पातर होइछ।
कैथक बच्चाो कभी ने सच्चाद, जब सच्चाब हरामीक बच्चाच प्राचीन समयसँ ई मान्य ता अछि जे कायस्थन कहियो सत्य‍भाषी नहि होइछ।
कैथक बेटा मरल भला, ने तऽ पढ़ल भला कायस्थेक बेटा पढ़ल-लिखल जँ नहि अछि तँ ओहिसँ नीक जे ओकर मृत्युा भ’ जाय।
कैथक लाबा कोइरी खाय कायस्‍थक आनल लाबा कोइरी कोना खा सकैछ ? कायस्था धूर्त्त होइछ।
कैथ किछफ लेने देने बाभन खोऔने, धान पान पनिऔने आ राड़ लतिऔने कायस्थनकेँ किछफ देन-लेन कयलासँ, ब्राह्मणकेँ भोजन करौलासँ, धान एवं पानकेँ पनिऔलासँ तथा राडकेँ लतियौलासँ ओ अनुकूल रहैछ।
कैथ कुकुर कउआ, तीनू जाति पोसउआ कायस्थक कुकूर एवं कौआ ई तीनू जाति पोस मानैछ।
कैथ गाममे चमार पटबारी कायस्थमरक गाममे कतहु चमार पटबारी भ’ सकैछ ? जतय अधिकांश बुद्धिमाने अछि ओतय पढ़बा-लिखबाक कार्य आन कोना क’ सकैछ ?
कैथ ने रहितुहुँ तऽ अजाति भऽ जइतहुँ जँ कायस्थि नहि रहितहुँ तँ एखन धरि जातिसँ क’ देल गेल रहितहुँ।
कैथ पहलमानय, पुदीनामे अलान कायस्थल पहलमान पुदीनामे अलान लगा रहल अछि।
कैथ बाभन भेल मनचुरिया, काज करे जोलहा धुनिया कायस्थध एवं ब्राह्मण जे परंपरासँ उच्चध जातिक छल ओ अपन व्यबवहारसँ आब निम्न जाति जातिक भ’ गेला, किन्तुक ओकर विपरीत जोलहा धुनियाँ जे निम्नतजातिकछल ओ अपन व्यँवहारसँ आब उच्चन जातिक बनि गेल।
कैल गाय के लाल बथान अप्रधानकेँ प्रधान स्थािन देलापर व्यं ग्यि।
कोइरिन के घेघ, आ गहिकी के अनसोहाँत कोइरिनकेँ घेघ अछि आ ग्राहककेँ अनसोहाँत लागि रहल छैक।
कोइरिन के घेघ, आ गहिकी के उदबेग घेघ कोइरिनकेँ छैक आ पीड़ा भ’ रहल छैक ग्राहककेँ ।
कोइरीक गाममे धोबी पटबारी कोइरीक गाममे धोबी बनल अछि।
कोइरी कुम्हा र के बास ने पाबे बाभन आ टाभन कोइरी कुम्हा रकेँ रहबाक तँ कोनो ठेकान ने अछि तँ फेर ब्राह्मण केँ के पुछैछ ?
कोइलाक दलालीमे हाथ कारी कोइलाक दलालीमे हाथ कारी भ’ गेल।
कोउ घर कानन कोउ घर गीत, देखह हे माय नगरक रीत एहि नगरक इएह रीति अछि जे कोनो घरमे कन्नाएरोहट भ’ रहल अछि तँ कतहु गीत।
कोउ नृप होहि हमहि हानी, चेरि छाडि़ ने होएब रानी क्योो राजा होथि ताहिसँ हमरा कोन प्रयोजन? हम नउड़ी छोडि़ क’ रानी नहि बनि सकब।
कोखिक आँच सहल जाय, भथिीआनक आँच ने सहल जाय नि: सन्ता न छी तकर पीड़ासँ तँ सहनशील बनि गेल छी, मुदा सहवास जनित ज्वागलाक सहन करब अत्यहन्तज कष्टलसाध्य अछि।
कोखिया जनमइननी, बरिया उपजइनी जहिना अपना कोखिसँ जनमौनिहारकेँ अतिशय आनन्दक अबैछ तहिना अपन खेतमे उपजा भेलापर आनन्दब होइछ।
कोठा देखि लोभेलौं, तम्मा देखि झुझुयलहुँ साधन-सम्प न्नत रहलोपर क्रिया तदनुरूप नहि कयलापर कहल जाइछ।
कोठा बाला रोबे, छप्प‍र बाला सोबे समपन्ना व्यइक्ति दुखमे रहैछ तथा विपन्ने सुखमे, तँ प्रयुक्तत।
कोठीपरक बेन छह, अइ हाथ करे हाथ पाबे जहिना ककरो बैना देब अदलाक बदला अछि, तहिना एहि हाथसँ करैछ तँ ओहि हाथसँ फल भेटैछ।
कोठीमे चाउर, घरमे उपास कोठीमे चाउर भरल अछि, मुदा घरमे उपास चलि रहल अछि।
कोढि़ कटनिहार के मुङरा सन आँटी, आरिपर बइसल गिरहथ डाँटी काज करबामे कोढि़ अछि, मुदा धनकटनीमे मुङरा सन आँटी बान्हैटछ तकरा देखि क’ गृहस्थस डाँटि रहल अछि।
कोढि़ कमउआ के मूँगर सन आँटी काज करबामे कोढि़ अछि, मुदा मुँगरा आँटी बान्हैबछ।
कोढि़ बड़द के फुककारे बहुत कोढि़ बड़द फुफकार बड़ दैछ।
कोढि़या चाहै हऽ आलसी व्य क्ति कोनो-ने-कोनो बहन्नाओ बना क’ सतत अपन कर्त्तव्य सँ हटबाक चेष्टा- करैछ, तँ कहल जाइछ।
कोढि़या रिसाबे, भरि घर छेरे आलसी जँ क्रोधित होइछ तँ भरि घर मलत्याँग करैछ।
कोढि़ होयब ढेरि आय काजसँ जी चोरौनिहार व्यँक्ति अनेक उपाय करैछ।
कोतह गरदन कल्लाह दराज नखुना नैन कबूतर बाज, करिया बाभन गोर चमार बानर कान ऊँट भुइँहार, इनका संग न उतरी पार भोरे बिसरे गीता मार छोट गर्दनिवला, पैघ कल्लानवला, कारी ब्राह्मण, गोर चमार, एक आँखिक वानर, ऊँट आ भूमिहार नाओपर हो, तँ नदी नहि करबाक चाही।
कोदोक चाउर को बड़ कोन छोट कोदोक चाउर अत्योन्त छोट-छोट होइछ तेँ ई निर्णय करब कठिन अछि जे कोन छोट अछि कोन पैघ।
कोदो दऽ कऽ पढ़लक तुच्छद अन्नअ द’ कए विद्योपार्जनपर व्यंेग्या।
कोदो मड़ुआ अन्नन नहि, जोलहा धुनियाँ जन नहि जहिना कोदो एवं मड़ुआक अन्ननक अन्तार्गत गणना नहि होइछ, तहिना जोलहा धुनियाँ कहियो नीक जन-बोनिहार नहि भ’ सकैछ।
कोन घीक टारा हम हेरा देल हम हुनक कोन घीक बासन हेरा देलियनि ? तात्पीर्य हम ककरो अनिष्अ नहि कयल अछि।
कोन पुरुखक भेलहुँ गाय, चालनि लऽ दुहाबे जाय कोन पुरुषक हम गाय भेलहुँ जे चालनि ल’ कए दूध दुहबाक हेतु अबैछ ।
कोन पूत हैत जे गायामे पिण्ड देत कोन एहन सुपुत्र हैत जे गया जा क’ पिण्डहदान करत ?
कोन भेखमे नारायन भेटताह कोन भेषमे भगवान भेटि जयताह, से के जनैछ ?
कोन रूपपर एतेक सिंगार कोन सवरूपपर एतेक श्रृंगार-प्रसाधन क’ रहल छी ? स्वारूपक अनुरूपेँ श्रृ़गार प्रसाधन शोभा दैछ।
कोय ओले कोय डोके कोय पैंइचे क्योओ ओलैत अछि, क्योु डोकैत अछि तथा कयो पैंचैत अछि।
कोय कहे कोय ने, कहाबी सब केओ क्योक खाइत-खाइत मरैत अछि, मुदा क्योत खयबाक अभावमे मरि जाइछ।
कोय गाछ काटे, कोय गाछ काने जखन वनमे गाछ काटल जाइछ तखन दोसर गाछकेँ एहि बातक चिन्ताे रहैछ जे आब तँ हमरे पारी अछि।
कोय ने रहल बिनु दाँत खिसौटने अवसर अयलापर सब अपन दाँत दोसराक समक्ष निपोडि़ दैछ।
कोरमे चिल्का़, नगर भरि सोर बच्चा तँ गोदीमे अछि, मुदा ओकरा खोजबाक हेतु संपूर्ण शहरमे प्रयास भ’ रहल अछि।
कोरामे ने नर, नगरमे सोर देo कोरमे चिल्हमका नगर भरि सोर
कोरामे नेना, भुतलाल कोना बच्चाे जखन कोरामे छल तखन ओ भुतिया कोना गेल ? अदभ्ज्ञु त कार्यप्रि व्यंेग्यो।
कोरामे बइस कऽ, आखिमे आंगुर जकर साहचर्यमे रही तकरे अनिष्टख करबाक उपक्रम करी, ताहिपर व्यंंग्यर।
काकेल्हुरआरक बड़द के गुड़क चेकी कोल्हुहआरमे काज कयनिहार बड़दक नजरि सतत गुउ़क चेकीपर रहैछ।
कोल्हुउक बड़द कतबो कठिन परिश्रम कयलो सन्ता लक्ष्यठक प्राप्ति नहि होइछ, तँ प्रयुक्त्।
कोल्हुठक बड़द हेतु, घरे पचास कोस कोल्हुठमे जोतल बड़दक हेतु घर पचास कोस होइछ।
कोल्हुठमे देलिऐ घानी, नीचा लगौंलौं टारी शीघ्रतामे फलक प्राप्तिक आशा करब निराधार, तँ प्रयुक्त ।
कोल्हुर सऽ उठलनि तऽ, भुसखारेमे फुकलनि कोल्हु सँ उठि क’ भुसखरामे आगि लगा देलनि।
कोस कोसपर पानी बदले, चारि कोसपर बानी कोस-कोसक अन्तकर भेलापर पानि जाइछ।
कोस ला मारि साधारण-सँ-साधरण बात ल’ कए परस्प र असाधरण वैमनयस्तास उपस्थित भेलापर व्यंरग्यँ।
कोहबरक कनियाँ जनमउटी बच्चा , जहिना राखब तहिना रहत नवविवाहिता कनियाँ आ जनमौटी बच्चाचपर जाहि रूपक नियंत्रण राखब ओ तदनुरूपेँ रहत।
कोहबरक टेढ़ टेढ़ पत्नीक जँ कोहबरमे बात नहि मानय तँ बुझबाक चाही जे सब दिन ओ ओहिना टेढ़ रहत।
कौड़ी कौड़ी कैल बटोर, रुपैया भेल तऽ लऽ गेल चोर कृपण धन संचय करैछ।
कौन गोत कौन माँग गोत्र की तथा की माँग करैछ ? कोनो व्यबक्ति द्वारा अपन पात्रानुरूप वस्तु क माँग नहि कयलापर कहल जाइछ।
कौरे कौरे पेट बढ़े, छौए छौए खेत बढ़े जहिना एक-एक ग्रास प्रतिदिन बेसी खयला सन्ता पेट बढि़ जाइछ तहिना एक-एक छौ आरिकेँ छाँटलासँ खेतक लंबाइ-चौड़ाइ बढि़ जाइछ।

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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...