Friday, January 01, 2010

'विदेह' ४९ म अंक ०१ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ४९) PART V

जिनगीक जीत (आगाँ)

जिनगीक जीत:ः 12
विकासपुर ऐला देवनकेँ साल लगि गेल। सालभरिक समयो नीक रहलै। ने बेसी बरखा भेल आ ने काम। जँ बेसी बरखा होइत तँ दहार होइत जँ नहि होइत तँ रौदी। ऐहेन समय गोटे-गोटे साल संयोगसँ होइत। किऐक तँ अखन धरिक जे समय होइत आइल अछि ओ एहिना होइत आइल अछि। गोटे साल बेसी वरखा भेल तँ गोटे साल जरुरतसँ कम। समय नीक भेने उपजो नीक भेलै तेँ सभहक मन हरियर। चारिये मास- अखाढ़ स’ ल’ क’ आसिन धरि- सालक ताला-कुन्जी रखैत। मुदा आठ मास-कातिक स’ ल’ क’ जेठ-धरिक कोनो मोजरे ने होइत। यैह, अपन मिथिला किसानक इतिहास रहल। सालो भरि देवन नसीवलाल काकासँ खेतीक लूरि सीखि-सीखि खेती करैत रहल। देवनकेँ नसीवलाल काका खेतीक लूरियो सीखवथि आ बीओ-बाइल दैत रहलखिन। नसीवलाल काकाक बताओल रास्ता आ मदतिसँ बुधनीक टूटल मन जागृत भ’ अगिला सालमेँ हँसी-खुशीसँ प्रवेश केलक।
एक मनसँ उपरे वुधनी टिकुला आमक आमील बनौने छलि जे बहरवैया व्यापारी हाथे पाँच रुपैये सेर बेचलक। दू सय रुपैया भेलै। जइसँ तीनू गोटेक (वुधनी, देवन आ रमुआक) नुआ-वस्तर भ’ गेलै। दुनू आमोक गाछमे तत्ते आम भेलै जे मारि-धुसि क’ खेबो केलक आ तीनि सय रुपैया क’ बेचवो केलक। पनरह सेर अम्मटो बेचलक। पाँच सेर अपनो ले रखलक। जे कहियो काल खेबो करब आ मातृनवमी, जितिया ले रखबो करब। आमक आँठी, फकुआ बनबै ले, दुनू घरक चार पर अदहा फेकलक आ अदहा गाछ जनमै ले बाड़ीमे जमा केलक। जखन पिपहीमे हरियरी धेलकै कि सबके उखाड़ि-उखाड़ी बाड़ीमे एक-एक हाथ पर रोपि देलक। आठे-नअ मासमे डेढ़-दू हाथक गाछ सब भ’ गेलै। यैह बैशाखमे माटियो सक्कत भ’ गेलै आ गाछ रोपैक समयो आबि गेलै। सब गाछकेँ थल्ला काटि-काटि देवनो आ बुधनियो उखाड़ि लेलक। धानक नारक खोंचड़ि बना सब थल्लाकेँ बान्हि लेलक। मधुवनीक एकटा व्यापारी, जे नर्सरी खोलने, आबि पँच-पँच रुपैये छओ सौ गाछ कीनि लेलक। तीन हजार रुपैआ एक्के ठाम भ’ गेलै। अपनो ले देवन दसटा गाछ रोपि लेलक। मोटगर आमदनी देखि बुधनी देवनकेँ कहलक- ‘‘बौआ, चरि कठवा खेतमे चापाकल गड़ा लाय। ओइ दिन तोँ बजलो रहअ जे नसीवलाल काका कहलनि जे कम्मो खेत किऐक ने हुअए, मुदा पाइनिक जोगार भेने खेतक हस्तियो बढ़ि जाइछै आ उपजो।’’
घरक छप्पर पर जे आमक आँठी फेकने रहए ओ सूखि गेल। कातिकमे सब आँठी क’ उतारि लेलक। दुनू गोटे-देवनो आ बुधनियो सब आँठीकेँ सिलौट पर लोढ़हीसँ फोड़ि फकुआ (सुखल गुद्दा) एक दिशि रखलक आ बखलोइया दोसर दिस। बखलोइयाकँे चुल्हिमे जरा लेलक आ फकुआकेँ जाँतमे पीसि चिक्कस बना लेलक। ओहि चिक्कसकेँ रोटी पका-पका खाय। थोड़े फकुआकेँ देवन फोड़ि-फोड़ि सुपारी टूक जेँका बना मलसीमे रखि लेलक। जखन काज करै जाय तखन पान-सातटा टूक, डाॅड़मे खोंसि क’ नेने जाय आ सुपारिये जेँका खाय।
बारहे सयमे कल गड़ा गेलै। अट्ठारह सय रुपैया बँचिये गेल। ओइ अट्ठारह सयमे सँ, चारि सय रुपैये कट्ठा चारि कट्ठा खेत, अपने खेतक आड़िमे, कीनि लेलक। डेढ़ सय रुपैया रजिष्ट्रीमे खरच भेलै। कल गड़ौलासँ आठ कट्ठा खेतमे धान पटबैक ओरियान भ’ गेलै अखाढ़मे बुधनी अपन पनरहो कट्ठा रोपने छलि। ओना खेतमे जोत-कोड़ तेनाहे सन भेल रहै मुदा तइयो बीआ आ समयक परसादे डेढ़ मनक कट्ठा धान भेलै। जँ खेतमे नीक-जेँका जोत-कोड़ ढकिया-पथिया आ खाद पड़ल रहितै तँ दोबरोसँ बेसी धान होइतै मुदा से नइ भेलै। साढ़े बाइस मन धान देखि वुधनी मनमे जीवेक आशा जगि गेलै। जखन पति मरल रहए तखन बुधनी क’ जीवैक आशा टूटि गेल रहै। अगर बेटा नहि रहितै तँ वेचारी या त’ जहर-माहूर खा मरि गेल रहैत वा चुमौन क दोसर घर चलि गेल रहैत। मुदा खेतक उपजा आ अपन मेहनतक हूबासँ जीवैक आशा बना लेलक।
बरसात खतम भ’ गेलै। धानो सब आसिने-कातिकमे कटि गेलै। देवनकेँ नसीवलाल काका कहि देने रहथिन जे कम खेतवलाकेँ तरकारी खेती जरुर करक चाहिएै। एगारह कट्ठामे गहूमक खेती केलक आ चारि कट्ठामे तरकारीक खेती। एगारहो कट्ठामे गहूमक गाछ तँ नीक जनमलै मुदा पटबैक कोनो आशा रहबे ने करै। जइ बाधमे बुधनीक खेत ओइ बाधमे एक्केटा बोरिंग। जे बुधनीक खेतसँ बहुत हटिकेँ रहय। ने नाला ने पाइप। पटबै ले देवन औना-पौना क’ रहि जाइत मुदा नहिये पटै। संयोगसँ पूसमे एकटा बरखा भेलै। बरखाक पानि पीविते गहूमक गाछ हू-हू आ क’ उठलै। वियानो खूब केलकै। ओसो खूब गिरै। तेँ हाल अधिक दिन धरि धेने रहलै। ओहि हाल पर गहूम गम्हरा गेलै। गम्हरा देखि वुधनीकेँ मनमे आशा जगलै। पटौलहा गहूम जेँका तँ गहूम नहिये भेलै मुदा तइयो एक-तरहक भेलै। हरा-हरी पान-छ पसेरी कट्ठा गहूम भेलै। दुनू मिला क’ साढ़े छह मन गहूम भेलै। फगुआक सात-आठ दिन बाद गहूम कटल हेन।
नसीवलाल काका देवनकेँ कहने रहथिन जे चैतक-अन्हारमे वाओग खेरही बढ़िया हाइछै। तेँ चारिये दिनमे दुनू गोटे एगारहो कट्ठाकेँ तामि-कोड़ि खेरही वाओग क’ लेलक। अदहा जेठमे खेरही पकै लगलै। दुनू गोटे-वुधनियो आ देवनो-खेरही बीछि-बीछि तोड़ै लगल। अंतिम जेठ धरि सब खेरही तैयार क’ लेलक।
तरकारी खेती ले जे चारि कट्ठा रखने रहै, ओहि खेतक धान कटिते, तैयार करै लगल। अदहा कातिक अबैत-अबैत खेत तैयार क’ लेलक। नसीवलाल काका देवनकेँ कहने रहथिन जे तरकारी उपजबैक लेल पाइनिक ओरियान करै पड़त। जकरा पोखैर छै ओ पोखैरसँ पटबै अए। जकरा बोरिंग छै ओ बोरिंग से पटबै अए। मुदा जकरा ने पोखैर छै आ ने बोरिंग आ ने कल (चापाकल), ओ की करत? मुदा नसीवलाल काकाकेँ अपन जिनगीक अनुभव छलनि, ओ देवनकेँ कहने रहथिन जे चारि कट्ठामे जँ दूटा कूप खुनि ली, आ गर लगाकेँ खेती करी तँ, काज चलि सकै अए। खेत तैयार क’ देवन दूटा कूप खेतक दूटा कोन पर खुनि लेलक। कुपो खुनैमे देवनकँे बेसी भीड़ नहिये भेल। दुइये दिनमे एकटा कूप खुनि लिअए। छबे-साते हाथ खुनलासे पानि छूटि जाय। मुदा सबसँ कठिन बात ई अछि जे तरकारीमे तँ एक्के रंग पटौनियो नहि लगैत। किछु चीजक खेतीमे अधिक पटौनी लगैत आ किछुमे कम। बोरिंग जेँका तँ पानियो कूपमे नहिये होइत मुदा दुनू बेर-भिनसर आ साँझ-मिलाकेँ दस धुर तक खेत जरुर पटि जाइत। दुनू कूपमे बाँसक खूँटा गाड़ि दूटा ढेकुल गाड़ि नेने छल। जइसँ पटबैक ओरियान क’ नेने छल।
तरकारी खेती देवन दू हिसाबसँ केलक। पहिल अपन परिवारक लेल आ दोसर आमदनीक लेल। गिरहस्तक लेल कातिक धरम मास होइत किऐक तँ जत्ते रंगक अन्न, तरकारी आ फलक खेती (लगौनाइ) कातिकमे होइत ओते सालक कोनो मासमे नहि होइत। मसल्लोक खेती करैक मुख्य मास कातिके छी। परिवारमे सब कथूक-अन्न, तीमन तरकारी, फल, मसल्ला जरुरत होइत। नोकरिया वा व्यापारी परिवार तँ पाइ कमाइत आ सब चीज कीनि-बेसाहि क’ काज चला लैत। मुदा किसान जँ नहि करत तँ ओ आओत कत्तेसँ। ई सोचि देवन सब वस्तुक खेती करैक विचार केलक। जे किसान जते नमहर अछि ओ ओते बेसी करैत आ जे जत्ते छोट अछि ओ ओते कम करैत। संगे जहि किसानकेँ बेसी खेते छै आ अपने नोकरी करैत अछि वा खेते छै मुदा ने पानिक जोगार छै आ ने होशगर अछि ओहो पछुऐबे करत। मुदा जे किसान लूरिगर आ हिम्मतगर अछि, जँ ओकरा अपना साधनक-खेत, बोरिंगक कमी छै, तइओ ओ आगू बढ़िये जायत किऐक तँ अपना इलाकाक (मिथिलाक) सौभाग्य रहल जे पोखरिकेँ धर्मक वस्तु मानल गेल। आ ऐहेन-ऐहेन धरमात्मा (धर्मात्मा) सभ भ’ चुकल छथि जे गाहीक-गाही पोखरि खुनौने छथि। ऐहनो-ऐहनो गाम सब अछि जहिमे अठारह गंड़ासँ उपरे पोखरि अछि। ततबे नहि, उत्तरसँ दछिन मुहे दरजनो नदी बहि रहल अछि। ततवे नहि गामो सबहक जे बनावटि (बुनावटि) अछि जहिमे एक-चैथाइ सँ ल’ क’ तीन चैथाई धरि गहीर खेत (चैर) अछि जे अपना पेटमे जेठ-अखाढ़ धरि पानि भरने रहैत अछि। तइ परसँ बोरिंग, नहरि वा आन-आन सेहो साधन मौजूद अछि। तहिना माइटिक आछि। दुनियामे जत्ते किस्मक नीक माटि अछि ओ मिथिलाक धरोहर थिकैक। इन्द्रो भगवान कहियो-काल खिसिआ जाइत छथिन, नइ तँ बेसी काल खुशिये रहै छथिन। जीव-जन्तु आ चिड़ै-चुनमुनी एहि रुपे भरल अछि, जे सदिखन मनुक्खक सेवाक लेल, जे सतत् धरती माताक गोदमे रहि, रकछा (रक्षा) करैत अछि।
नसीवलाल काकाक विचारकेँ मनमे अरोपि देवन तरकारी खेतीमे जी-जानसँ पड़ि गेल। अपन परिवारकेँ लेल एक कट्ठा तरकारी- साग ठढ़िया, पालक। मुरै, गाजर, कोवी अल्लू, मटर अमाटर लगौने रहै, दस धुर मसल्ला-सेरसो, धनिया, लसुन, जमाइन, मेथी मिरचाइ आ पिऔज सेहो लगौने रहए। आमदनीक लेल- कोवी, टमाटर अल्लू लगौने। फागुन अबैत-अबैत बंधा कोबी आ टमाटर छोड़ि सब कटि गेल। ओना टमाटर माघेसँ तोड़व शुरु केने रहै, मुदा अखनो (फागुन) मनसम्फे रहबे करै।
तरकारी आमदनीसँ बुधनी एकटा घर बनौलक। ओना बेचारिक मनमे रहै जे एकटा बड़द कीनव। मुदा घरक जरजर हालत देखि विचार बदलि लेलक।
बुधनी ऐठाम देवन क’ ऐला बर्ख दिन भ’ गेल। बरखे दिनमे देवन बहुत किछु सीखबो केलक आ विकासेपुरमे किछु दिन आरो रहैक विचारो केलक। मुस्की दैत देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, बड़ सुन्दर गाम अछि। जइ गाममे नसीबलाल कक्का सन ज्ञानी आ खेतिहर लोक, सजन सन इमानदार आ बेर-बेगरतामे ठाढ़ रहनिहार लोक हुअए, ओ गाम किऐक ने नीक हैत।’’
अपन दुखड़ा सुनवैत बुधनी देवनकेँ कहलक- ‘‘बच्चा! जहिया रमुआक बाप मरि गेलखिन तहिया हुअए जे हमहू हुनके लागल मरि जाय। किऐक तँ ने कोनो लूरि छल आ ने क्यो कमा क’ खुऔनिहार, तखन दुख काटब छोड़ि दोसर रस्ते की छल। खेते बेचि-बेचि कइअ दिन खइतौ। मुदा रमुआ क’ देखि आखिसँ नोरो खसै आ देहो भुटकि गेल। मनमे आयल जे अखन ने रमुआ बच्चा अछि मुदा पाँच बरखक बाद तँ नोकरी-चाकरी करै जोकर भइये जायत। ताबे कुटौन-पिसौन क’ कहुना-कहुना गुजर करब। जँ कतौ चलि जायब वा जहर-माहूर खा मरि जायब तखन त’ वंश, खानदान उपटि जायत। मुदा तोरा पाबि आ नसीवलाल कक्काक देखओल रास्ता आ मदतिसँ आब बुझि पड़ै अए जे हँसी-खुशीसँ जिनगी काटि लेब। पैछला सुख ने भगवान छीनि लेलनि मुदा अगिला सुख तँ भगवान देबे करताह।’’
दोसर दिन भोरे देवन जलखै खा बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी! जत्ते बीआ-बाइल नसीवलाल काका देलनि, ओकर सवाई लगा सब चीज द’ दिअ। हुनका सब कुछ घुमा देवनि, जइसँ आगूओक रास्ता बनल रहत। नइ तँ मने-मन कहता जे देवन बेइमान अछि।’’
देवनक बात सुनि बुधनी घरसँ धान, गहूम, खेरही निकालि ओसार पर रखलक। हिसाब जोड़ि-जोड़ि देवन तीनू चीज ल’ मोटा बान्हलक। तीमन-तरकारीक तँ बीआ नइ रहै तेँ अंदाजेसँ सबहक दाम जोड़ि रुपैया लेलक। माथ पर मोटा ल’ देवन नसीवलाल ऐठाम विदा भेल।
नसीवलाल, दरबज्जा पर बैसि, बेटाकेँ बुझवैत रहथिन- ‘‘बौआ, मनुक्खक समरथाइ (जुआनी) जे होइछै, यैह जिनगीक सार अवस्था (मुख्य उमेर) थिक। एहि उमेरकेँ सदुपयोग (घरमक काजमे लगाएव) करक चाही। एहि उमेरमे जे जत्ते कठिन मेहनत करत ओकर जिनगी ओतेक सुन्दर बनतै। सुन्दरे जिनगी महामानवक जिनगी होइत। जत्ते मेहनत कैल हुअए ओहिमे कंजूसी नइ करी। कंजूसी केलासँ लोक चढ़ाइक रास्ता (आगू बढ़ैक) सँ भटकि जाइत अछि। तेँ इमानदारीसँ मेहनत करक चाही। जँ अपनासँ बेसी उपारजन हुअए तँ ओकरा बाँटि दी। बँटवाक प्रवृति बड़ पैघ वस्तु छी। किऐक तँ बँटलासँ जमा नइ होइत। संगे, जे अपने बँटनिहार अछि ओ दोसराक वस्तुक लोभे किऐक करत। लोभ तँ ओकरा होइछै जे संचय करै चाहैत अछि। जकरामे संचयक प्रवृति जगबे ने करतै ओकरामे लोभ आओत कोन रस्ते।’’
एते नसीबलाल बेटाकेँ कहिते रहथिन कि माथ पर मोटरी नेने देवन पहुँचल। देवनकेँ देखि नसीबलाल हँसैत कहलखिन- ‘‘देवन, बड़का मोटा माथ पर देखै छी। की आइ विकासपुरसँ विदा भ गेलियै?’’
नसीवलालक आगूमे मोटा रखि देवन कहलकनि- ‘‘काका, साल भरिसँ अपने ऐठामसँ मोटरी बान्हि-बान्हि बहुत चीज ल’ गेलौं, वैह दइ ले आइ एलौ।’’
नसीवलाल- ‘‘अच्छा, पहिने बैसू। भारी मोटा उठौने एलौ तेँ सुसता लिअ। तखन आगू गप-सप करब।’’
देवन बैसि पसीना पोछै लगल। पसीना पोछि देवन उठिकेँ कल पर जा भरि पेट पाइन पीलक। पानि पीबि आबि देवन कहै लगलनि- ‘‘काका, अहाँक असिरवादसँ हमरा दीदीक हालति एते सुधरि गेलै जे हँसैत जिनगी जीवि रहल अछि। हमरा तँ अपनेसँ बहुत आशा अछि। तेँ पैछला लेलहा दइ ले एलौ आ आगू जे लेब ओ आगू देब।’’
नसीवलाल- ‘‘बौआ, तोरा हम कोनो करजा देने रहियह जे तू घुरबै ले ऐलह। हम अपन काज केलौ, जइसँ तोरा लाभ भेलह। मोटा घुमौने जा। ई कखनो, मनमे नइ अनिहह जे काका खिसिया गेला। तेँ आब नइ देताह। सब मनुक्खकेँ अपन-अपन कर्तव्य होइत। जेकरा करब ओकर धरम होइत। जे हमहू केलौ। तोरो अपन कर्तव्य छह जे तोरा करै पड़तह। जहिना हम तोरा बुझेवो केलियह आ थोड़-थाड़ मदतियो केलियह, तहिना तोहू करह।’’
मोटा नेने देवन अपना ऐठाम चलि आयल। मोटा घुमल देखि बुघनी पूछलक- ‘‘बौआ, मोटा किअए घुमौने ऐलह?’’
ओसार पर मोटा रखि देवन उत्तर देलक- ‘‘दीदी, काका कहलनि जे कोनो हम करजा देने छेलियह जे घुमबै ऐलह। हम अपन कर्तव्य केलौ। तोहूँ जा अपन कर्तव्य करह।’’
असकरे नसीवलाल दरवज्जा पर बैसि, मने-मन सोचैत रहति जे चालीस बर्खसँ हम एहि गाम(विकासपुर) मे रहि अनबरत अपनो आ समाजोक उन्नतिक लेल सोचवो आ करबो करैत एलौ, मुदा अपने तँ आगू जरुर बढ़लौ मुदा समाज ओते नइ बढ़ि सकल जत्ते चाहैत छलौ। सवाल साधारण रहितौ जटिल अछि। जना पोखरिमे नमहर गोला फेकलासँ पाइनमे हिलकोर उठैत मुदा धीरे-धीरे असथिर भ’ ओहिना क’ ओहिना भ’ जाइत। जेना पहिने छल। ऐना किऐक होइत? समाजक तरमे ऐहन कोन शक्ति छिपल अछि जे पाइनिक हिलकोरकेँ शान्त क’ पुनः ओहि रुपमे ल’ अबैत।
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जिनगीक जीत:ः 13
चारि बर्खक उपरान्त शिवकुमार हिसाब (मेथमेटिक्स) सँ आ रामनाथ भूगोल सँ आनर्स केलक। दुनूकेँ आनर्समे सत्तरि प्रतिशतसँ उपरे अंक आइल छलै। कओलेजोक पढ़ाई नीक चलैत छल। अरुन कुमार दत्त प्रिसिपल रहथि। ओ अपनो मेथमेटिक्स क’ जानल-मानल विद्वान। दत्त साहेव मात्र विद्वानेटा नहि बल्कि एक कुशल शासक आ कुशल अभिभावक सेहो। अपने बच्चा जेँका विद्यार्थियोक संग व्यवहार करथि। जहि विद्यार्थीकेँ कोनो वस्तुक अभाव देखथिन ओकरा भरपूर मदति सेहो करथिन। सदिखन मोनमे रहनि जे हमरा कओलेजक विद्यार्थी कोना नीक जेँका पढ़त। औझुका शिक्षक जेँका, हुनकामे एकको पाइ जाति-पाँतिक भेद-भाव नहि रहनि। रिजल्ट निकलला बाद शिवकुमारो आ रामनाथो जाकेँ हुनका (दत्त साहेव) सँ भेंट केलकनि। दुुनूकेँ देखि दत्त साहेव वेहद खुशी भेलखिन। हँसैत अरुण कुमार दत्त दुनू गोटेकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ! आब अहाँ सब देशक सुयोग्य नागरिक भेलहुँ, अहीं सब पर देशक भविष्य निर्भर करैत अछि। तेँ एक सुयोग्य नागरिकक जे दायित्व होइत छैक, ओकरा अपन लगन आ इमानदरीसँ पूरा करब परिवार स’ ल’ क’ समाज होइत देश भरिक भार अहाँ सभक कन्हा पर अछि तेँ ओकरा नीक जेँका निमाहब। यैह हमर असिरवाद अछि।’’ दत्त साहेवक विचारसँ दुनू (शिवकुमारो आ रामनाथोक) गोटेक आँखिमे स्नेहक नोर आबि गेल। भरभराइल अवाजमे शिवकुमार दुनू हाथ जोड़ि कहलकनि- ‘‘गुरुदेव! अपनेक असिरवाद जिनगी भरि निमाहैक कोशिश करब।’’
बचेलाल, अछेलाल आ सुमित्रा, तीनू गोटे दरबज्जा पर बैसि शिवकुमारो आ रामनाथोक संबंधमे गप-सप करैत रहति। तीनूक हृदय खुशीसँ गद-गद। मुदा आगू की करब? से ककरो मनमे अबिते नहि।
बचेलाल बाजल- ‘‘काका! दुनू गोरे (षिबकुमार आ रामनाथ) बी. ए. पास तँ क’ लेलक। मुदा आगू की करवै?’’
बिना कोनो लागि-लपट क’ अछेलाल कहलकनि- ‘‘बौआ, हम तँ मुरुख छी, पढ़ै-लिखैक बात बुझबे ने करै छी, तेँ की कहब।’’
सुमित्रा दुनू गोटेकेँ सोर पाड़लक। शिवकुमारो आ रामनाथो आयल दुनू गोटेकेँ अबिते सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बौआ अहाँ दुनू गोरेक पढ़ाइसँ हमर छाती जुड़ा गेल। जखन बचेलालक पिता मुइला तखन हमरो हृदयमे छल जे बेटाकेँ खूब पढ़ाबी। मुदा सब तरहे दुखी रही तेँ मैट्रिके धरि पढ़ा सकलौ। मुदा आइ ओ इच्छा पूरि गेल। आब अहू दुनू गोरे पढ़ल-लिखल भेलौ तेँ आगू की करैक विचार अछि, से तँ अहीं सब सोचबै।’’
शिवकुमार कहलकनि- ‘‘दादी, काल्हि ललित मास्टर साहेव कहलनि जे मारवाड़ी काॅलेज दरभंगामे टीचर्स ट्रेनिंगक पढ़ाइ दू सालसँ होइछै। दस मासक कोर्स छैक। हमर मन होइ अए जे टेªनिंग क’ ली। जखन टेªंड भ’ जायब तँ कतौ ने कतौ, कोनो हाईस्कूलमे नोकरी भइये जायत।’’
शिवकुमारक बात सुनि बचेलालकेँ मनमे हूबा जगल। मारबाड़ी काॅलेजक नाम सुनि बचेलाल गुम्म भ’ किछु मन पाड़ै लगल। किछु कालक बाद मन पड़लनि जे बर्ख पाँचम धनश्यामपुर गेल रही। चुनावक समय रहै। ओहिठाम मारवाड़ी काॅलेजक उप प्राचार्य देवीदत्त पौद्दार सेहो चुनावी प्रचारमे आइल रहथि। ओ (देवीदत्त) सामाजिक कार्यकर्ता। मारवाड़ी रहितो अलग चालि-ढालिक लोक। एक्को मिसिया मारवाड़ी जेँका नहि बुझि पड़ैत। घुमैत-घुमैत, जत्ते हम रही ओतै ओहो चारि-पाँच गोटेक संग ऐला। जीप स्कूले पर लगा देने रहथिन आ पाएरे गाममे घूमैत रहति। जेही चैकी पर हम बैसल रही ओही पर ओहो आबि बैसलाह। हुनक नामक प्रचार तँ होइत रहै मुदा चेहरासँ नहि चिन्हैत रहिएनि। साधारण बगए-बानि। मारवाड़ी रहितो धुर-झाड़ मैथिली बजैत। चैकी पर बैसिते कहै लगलथिन- ‘‘जाधरि अपना देशमे समाजवादी शासन नहि हैत ताधरि किछु गनल गूथल धनीक (पूँजीपति) बहुसंख्यक गरीबकेँ लुटिते रहत। आ ओ ऐश-मौज करिते रहत। 1947 ई. मे अपना सबकेँ आजादी भेटल मुदा ओ पूर्ण आजादी नहि भेटल। नेँगड़ा आजादी भेटल। मोटा-मोटी सैह बुझू जे अंग्रेज भारतक गद्दी परसँ उतड़ल। कोनो देश कानूक-कायदासँ चलैत अछि। अपना ऐठाम अखनो ओकरे (अंग्रजेक) बनाओल कानूनसँ शासन चलैत अछि। तेँ सब गरीबकेँ एकजुट भ’ ओहि व्यस्थाके तोड़ै पड़त।’’ ओ बजिते रहथि कि हम पूछलिएनि- ‘‘समाजवाद ककरा कहै छै?’’
हमर प्रश्न सुनिते ओ (देवीदत्त पौद्दार) धाँय-धाँय कहै लगलथि। जना सब बात हुनका जीये पर रहनि, तहिना। ओ बुझा-बुझा कहै लगला- ‘‘उत्पादनक जे साधन अछि ओहि पर, व्यक्तिगत नहि, सामूहिक अधिकार समाजवाद होइत। जना खेत, खान आ कारखाना अछि। अखनो देखै छी जे एक-एकटा जमीनदार छथि जे सय कोन, हजार कोन जे लाख-लाख बीघा जमीन हथिऔने अछि। दोसर दिस देखै छी जे जोतैक लेल कोन बात जे घरो बन्हैक जमीन नहि छेक। तहिना खानोक अछि। जहि खानसँ अमूल्य वस्तु सब निकलैत अछि। ओहो किछु गनल-चुनल लोकक पल्लामे अछि। तहिना कारखनोकेँ देखै छी। एक-एकटा कारखानामे लाखो-लाख मजदूर काज करै अए, मुदा ओकरा कते दरमाहा भेटैक छैक।’’ एते कहि उठि क’ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘अखन चुनावी दौर छी तेँ समयक अभाव अछि।’’
हुनका संग हमहू उठि क’ ठाढ़ भेलौ। परिचय पूछलनि। हम कहलिएनि-एत एतैय कुटुमैतीमे आइल छी। हमर घर ऐठामसँ तीस-पेइतीस किलोमीटर उत्तर अछि। मधुबनी जिलामे पड़ैत छैक। तखन ओ कहलनि- ‘‘हम मारवाड़ी काॅलेजमे उप-प्राचार्य छी। जँ कहियो कोनो काज हुअए तँ भेटि करब।’’
एते बात मन पड़िते बचेलाल नमहर साँस छोड़ैत श्विकुमारकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ! काज (नाम लिखौनाइ) भ जेबाक चाही। काल्हि हम भोरुके गाड़ीसँ दरभंगा जा बुझि अबै छी। तखन जे-जना हैत से ऐलाक बाद कहब।’’
दोसर दिन भोरे गाड़ी पकड़ि बचेलाल दरभंगा विदा भेल। नअ बजे, गाड़ी दरभंगा पहुँचल। मुदा बचेलालकेँ काँलेज देखल नहि। स्टेशनसँ निकलि दोकानमे जलखै करै गेल। दोकानदारेकेँ बचेलाल काॅलेजक संबंधमे पूछलखिन। दोकानदार कहलकनि अहाँ देहातमे रहै छी, बौआ जायब। तेँ नीक हैत जे रिक्शा पकड़ि लिअ। ओ पहुँचा देत। बचेलालो सैह केलक। रिक्शावला काॅलेजक गेट पर बचेलालकेँ उताड़ि देलक। संयोगसँ देवीदत पौद्दारो तखने पहुँचलथि। दुनू एक-दोसर दिशि देखैत। चेहरा चिन्हार दुनू गोटेकेँ बुझि पड़नि। बचेलाल देवीतत्त पौद्दार केँ कहलखिन- ‘‘हमरा देवीदत्त बावूसँ भेटि करैक अछि।’’ देवीदत पूछलखिन- ‘‘कोन काज अछि? हमही छी।’’
प्रणाम क’ बचेलाल कहलखिन- ‘‘टीचर्स टेªनिंगमे दूटा विद्यार्थीकेँ नाम लिखबैक अछि।’’
देवीदत्त- ‘‘विद्यार्थी कहाँ छथि?’’
बचेलाल- ‘‘आइ बुझैइये ले एलौ। जँ भ’ जायत तँ काल्हिये तैयार भ’ क’ आयब।’’
देवीदत्त- ‘‘जाउ, भ’ जायत। काल्हि निश्चित चल आयब।’’
लगले बचेलाल घुमिकेँ स्टेशन आबि बारह बजे गाड़ी पकड़ि लेलक। दोसर दिन दुनू विद्र्थीक संग बचेलाल जा नाम लिखा देलक।
दस मासक उपरान्त दुनू- रामनाथो आ शिवकुमारो प्रशिक्षित शिक्षक (ट्रेंड टीचर्स) भ’ गेल।
जहि हाई स्कूलमे शिवकुमार आ रामनाथ पढ़ने छल, ओहि हाई स्कूलमे पहिलुका बैचक चारि गोट शिक्षक, मासे दिनक अन्तरमे, सेवा निवृत्ति भेला। सुदूर देहातमे स्कूल। चारु शिक्षक जगह पर नव शिक्षकक नियुक्तिक लेल भेकेन्सी भेल। अखवारोमे निकलल। मुदा ऐहेन हवा बहि गेल अछि जे नवयुवक गामक बातावरणमे रहै नहि चाहैत। इलाकाक जे पढ़ल-लिखल युवक अछि, ओ अधिकांश बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली जा क्यो कारखानामे तँ क्यो सेठ-साहूकारक दोकानमे, तँ क्यो सड़क पर रिक्शा चलबैत अछि। गाममे मात्र बूढ़-पुरान आ धिया-पूता मात्र रहि गेल अछि। जकरा चलैत किसान परिवार दिनानुदिन टूटि-टूटि नीचे मुहे ढड़कि रहल अछि। ने मेहनत करै वला लोक आ ने आधुनिक ढंगक खेती करैबला गाममे रहि गेल। जहिसँ ग्रामीण सम्पदा दिनानुदिन नष्ट भ’ रहल अछि। जाधरि देहात (ग्रामीण इलाका) मे पढ़ल-लिखल आ कर्मठ लोक जी-जाँति क’ नहि रहत ताधरि गामक उत्थान मात्र कल्पला बनि रहत। शहर-बजार देहातेकेँ श्रम-शक्तिसँ गन-गनाइत आगू मुहे बढ़ि रहल अछि जबकि गामक देश कहैबला भारत पाछू मुहे तेजीसँ ससरि रहल अछि।
स्कूलक हेड-मास्टरकेँ बुझल जे शिवकुमार आ रामनाथ शिक्षक प्रशिक्षण केने अछि। ओ (हेडमास्टर) एकटा पत्र शिवकुमारकेँ लिखि चपरासीकेँ पठौलखिन। पत्रमे लिखल छल-
प्रिय शिष्य शिवकुमार
अहाँकेँ बुझले हैत जे स्कूलमे चारि गोट शिक्षक सेवा निवृतत्त भेला। हुनका जगह पर नव शिक्षकक बहाली अछि तेँ अहाँ दुनू गोटे-शिवकुमार आ रामनाथ- अवश्य आवेदन दी। अहाँ दुनू गोटे छात्र रहि चुकल छी, संगे घर लग स्कूलो अछि। बहालीक पूर्ण आश्वासन तँ हम नहि द’ सकै छी किऐक तँ बहाली कमिटीक माध्यमसँ हैत। मुदा एत्ते जरुर आश्वासन दइ छी जे अनुचित बहाली नहि हैत।
प्रध्यानाध्यापक
शिक्षकक बहालीसँ पनरह दिन पहिने विज्ञापन निकलल। अखबारोक माध्यमसँ प्रसारित भेल। प्रध्यानाध्यापक चिट्ठी देखि शिवकुमारकेँ मनमे पूर्ण विश्वास भ’ गेलै जे हमरा दुनू गोटेक बहाली जरुर हैत। पराते भने दुनू गोटे, अपन सब कागजात नेने स्कूल पहुँचल। आॅफिससँ फारम ल’ ओकरा भरि, अपन सब कागजातक नकल (सच्ची पतिलिपि) लगा आवेदन द’ देलक।
आवेदन देनिहारक रफ्तार बहुत मन्द। पहिल-पहिल आवेदन शिवकुमार आ रामनाथे केलक। आवेदनक रफ्तार मन्द रहैक कारण छल जे गाम-घरमे बेसी पढ़लो-लिखल नहि। शहर-बजारक लोक गाममे नोकरी नहि करै चाहैत। बहालीक चारि दिन बँचल। अखन धरि मात्र दुइयेटा आवेदन पड़ल। स्कूलक सचिव स्कूल आवि प्रध्यानाध्यापककेँ पूछलखिन- ‘‘अखन धरि कतेक दरखास्त पड़ल?’’
प्रध्यानाध्यापकोकेँ नीक जेँका नहि बुझल। ओ किरानीकेँ बजा पूछलखिन। किरानी दुइयेटा दरखास्तक नाम कहलकनि। हेडोमास्टर आ सेक्रेट्रीओ गुम्म। दुनू गोटेक मनमे सैह होइत जे एते बेरोजगारी रहनहुँ आवेदन किऐक ने भ’ रहल अछि। मुदा दुनू गोटे गुम्मे-गुम्म रहि गेला। अंतिम दिन तीनिटा दरखास्त पड़ल। नियुक्तिक तिथि पूर्व निर्धारित। तेँ हेवे करत।
सब उम्मीदवार नियुक्तिक दिन पहुँचल। तीनि गोटेक समिति बनल छल। हेडमास्टर, सेक्रेट्री आ जिला शिक्षा पदाधिकारी ओहि समितिक सदस्य छलाह। बिना कोनो झड़-झमेल क’ नियुक्ति भ गेलै। एक गोटे अनट्रेन्ड छला तेँ हुनका नहि भेलनि। हाथक-हाथे चारु गोटेकेँ चिट्ठीयो भेटि गेलै।
घर पर आवि शिवकुमार दादी(सुमित्रा) केँ गोड़ लागि सब बात कहलक। गोड़ लागि रामनाथ पँजरामे चुपचाप ठाढ़। रामनाथकेँ सुमित्रा कहलक- ‘‘बेटा रामू, तोरा देखि हमरा एत्ते खुशी भ’ रहल अछि जेकर पारावार नइ अछि। शिवूक तँ बापो मास्टर छथिन मुदा तूँ ते उस्सर खेतक आमक गाछ जेँका भेलह।’’
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जिनगीक जीत:ः 14
शिवकुमारकेँ नोकरी होइते बचेलाल स्कूलमे त्यागपत्र द’ देलक। बचेलालक त्यागपत्रसँ सौँसे गाम टीका-टिप्पनी चलै लगल। किछु गोटेकेँ दुख एहि दुआरे होइत जे बेर-बेगरतामे पाइसँ मदति भ’ जायत। किछु गोटेकेँ खुशियो होइत। किऐक तँ भने आमदनी बन्न भ’ गेलनि। मुदा सुमित्राकेँ ने हरख (हर्ष) आ ने विस्मय। किएक ते ओ नीक नहाँति बुझैत जे जत्ते मनुक्खक भीतर कमाइक शक्ति छै, ओते तँ नोकरीमे नहिये होइ छैक। संगे नोकरियो तँ जिनगी भरिक लेल नहिये होइछै। जाधरि लोक जुआन रहै अए ता धरिक लेल नोकरी होइछै। मुदा जखन शरीरक शक्ति कमै लगै छैक तखन नोकरी छुटिये जाइछै। नोकरी छुटला पर दरमाहाक अदहो स’ कम पेंशन भेटैत छैक। जबकि उमेर बेसी भेने शरीरक सब अंग धीरे-धीरे कमजोर हुअए लगैछै, जहि लेल नीक-निकुत भोजन आ दवाईक जरुरत हुअए लगै छैक। मुदा पेंशन कम भेटने सब खर्च पूरा नइ क’ पबै अए। जहिसँ जिनगी बोझ बनि जाइछै। संगे गिरहस्त परिवारमे जे नोकरिया काज होइ छैक। ओहो करैक लूरि नहि भ’ पवैत छैक। जहिसँ नोकरिया लोक अथबल भ’ जिनगी जीवेत अछि। आब प्रश्न उठैत अछि जे नोकरी कत्त’ करी? चाहे तँ सरकारमे वा पूँजीपति ऐठाम। ई बात सत्य जे प्रजातंत्र शासनमे, सरकारो अपने होइत तेँ शासन पद्धति चलेबाक लेल सहयोग करब अनिवार्य अछि। नइ तँ शासन चलत कोना? मुदा जे सरकार गनल-गूथल लोकक सेवा करैबला होय, आ विशाल जनसमूह कँ लेल मात्र जहलेटा होय, ऐहन शासनमे कोन रुपे सहयोग कयल जाय। दोसर बात अछि जे कारखाना। कल-कारखानामे नोकरी केनिहारक संग जे व्यवहार होइत ओ की गुलामीसँ कम होइछै। अगर स्वतंत्र देशक नागरिककेँ गुलामीक जिनगी जीवै पड़ै, तखन आजादीक महत्वे की? जे देश गामक देश कहबैत आ गामक सम्पदा या तँ ठमकले रहै वा पाछुऐ मुहे ससरैत जाय तखन देशक उन्नति, कल्पना छोड़ि आरो की हैत। तेँ जरुरत अछि जे गामक सम्पदा-खेत, पोखरि नदी, इत्यादिक समुचित व्यवस्था दुनू दिशिसँ- सरकारो दिशिसँ आ गामोक श्रम शक्तिसँ- कयल जाय। ई के करत? हम गाममे रहनिहार जँ गाम छोड़ि बजार दिशि भागैए तखन कोना हेतैक? एहि सब बातकेँ तर्क-वितर्क करैत बचेलाल नोकरीसँ त्यागपत्र देलक।
साँझक समय। अन्हारक तृतीया रहने बेसी अन्हारो नै। बचेलाल, खेतसँ रिन्च-हथौरीक झोरा आ अछेलाल पटबैबला प्लास्टिकक पाइप आ कोदारि नेने घर पर अबैत। अबेर भेने रुमा दलानक आगूमे ठाढ़ भ’ दछिन मुहे रास्ता देखैत। आगू-आगू बचेलाल आ पाछू-पाछू अछेलालकेँ अबैत देखि रुमा ससरिकेँ थोड़े आगू बढ़ि बाजलि- ‘‘भगवान हमरो दुनू परानी पर खूब खुशी छथि। एक गोरे गोबर पाथै छी आ दोसर गोरे डीजल-मोबीलसँ देह-हाथ रंगै छै।’’
रुमाक बात सुनि अछेलाल भभा क’ हँसल, मुदा किछु बाजल नहि। मुस्की दैत बचेलाल बाजल- ‘‘अगर भगवान खुशी नइ छथि तँ जीवैक लेल एत्ते लूरि आ करैक शक्ति कोना देने छथि। काजके खेलौना बना कर्मशीले (कर्मनिष्ठे) टा खेलैत अछि।’’
एत्ते बजैत-बजैत दरबज्जा पर पहुँच गेल। दरवज्जा पर अबिते सब सामान रखि, सावुन ल’ स्नान करै बचेलाल कल पर गेल। सुमित्रा लालटेन लेसि, चारक बत्तीमे लटका देलक। रुमा चाह बनवै गेलि। जाबे बचेलाल नहा क’ दरवज्जा पर आयल ताबे रुमा चाह बना लेलक। चाह बना रुमा दरवज्जा पर आबि बचेलालक आगूमे राखि देलक। अछेलालो नहा क’ आबि गेल। तीनू गोटे चाह पीवै लगल। एक घोट चाह पीबि बचेलाल रुमाकेँ कहलक- ‘‘परिवारमे एहि रुपे काज केलासँ परिवार आगू मुहे ससरैत अछि। अखने देखियौ, जाबे हम नहेलहुँ ताबे अहाँ बनेलहुँ। माय लालटेन लेसि लेलक। दसे मिनटमे कत्ते काज भ’ गेल। अगर जँ अहलाइत-महलाइत सब करितौ ते कत्ते समय लगैत।’’
तीनू गिलास ल’ रुमा भानस करै आंगन गेलि। अछेलाल तमाकुल चुनबै लगल। बचेलाल मायकेँ पटौनीक संबंधमे कहिते छल कि ताबे गोनर आबि अछेलाल लग बैसल। अछेलाल अपनो तमाकुल खेलक आ गोनरोकेँ देलक। तमाकुल मुहमे लैत गोनर अछेलालकेँ कहै लगल- ‘‘भाय, अइ (एहि) सालसँ दुख पड़ा गेल।’’
उत्सुक भ’ अछेलाल पूछलक- ‘‘से की?’’
गोनर- ‘‘भाय! जहियासँ मोन अछि तहियासँ आइ धरि नदी कातक खेतमे एत्ते धान कहियो नै भेलि छल, जत्ते अइबेर (ऐबेर) भेल। बारह कट्ठाक कोला अछि, जइमे पनरह मनसे बेसी धान कहियो ने भेल छल। ऐबेर बारह क्वीन्टल धान भेल। जे खेत फागुनसँ अखाढ़ धरि परती बनल रहैत छल। गइबार-महीसबार सब गाइयो-महीसि चरबै छले आ गुल्लियो-डंडा खेलै छले। ओइमे एत्ते उपजा भेल जे सालो भरि बुतात चलत। घरवाली कहै छलि जे घरमे लछमी आबि गेलि। तेँ पाँचो मुरते साधूकेँ चूड़ा-दहीक भनडरा करब।’’
गोनर बजिते छल कि एका-एकी टोलक लोक अबै लगल। जना बरिआतीमे हँसी-मजाक होइत तहिना अपनामे सब करै लगल। हँसी-चैल समाप्त होइते एका-ऐकी अपन-अपन भरि दिनुका काजक गप शुरु केलक। अपन हूसलाहा काजक चर्चा, अपने मुहे क’ अपनो हँसै आ दोसरो हँसैत। एक हरफी सब अपन-अपन बात कहि चुकल। सबहक बात सुनि बचेलाल समूहेँकेँ पूछलक- ‘‘आगू की करैक विचार केने छी?’’
बचेलालक सवाल सुनि धनिकलाल बाजल- ‘‘भाय! एकटा नवका धानक बीआ मामा गामसँ अनलौ हेन। हमरे सोझामे दाउन (दौन) भेलै। ममिऔत भाय जोखलनि। जोखिकेँ कहलनि जे भाय चारि कट्ठामे छह क्वीन्टल धान भेल।’’
गोनर पूछलक- ‘‘देखैमे धान केहेन अछि?’’
धनिकलाल- ‘‘नमगर-नमगर, खूब मेही, उज्जर-उज्जर धान अछि। गमकबो करै अए।’’
गोनर- ‘‘भात केहेन होइछै?’’
धनिकलाल- ‘‘ऐह भैया, जखने थारी आगूमे औतह कि गम-गम करै लगतह। ओना हम ते टटके धानक चाउर कुटा क’ भात खेलौ, मुदा तइयो की कहबह।’’
गोनर- ‘‘कत्ते बीआ अनलह?’’
धनिकलाल- ‘‘एक्के पसेरी अनलौ। अइ से पाँच कट्ठा रोपाइत। अगिला साल तँ सबके वीआ देबइ।’’
गोनर- ‘‘तोँ ते एक्केटा खेतमे रोपबह। मुदा दू-दू आँटी जँ आनो बाधवलाकेँ देवहक ते ओहिसँ आनो बाधमे जँचा जाइत। किऐक तँ सब धान सब तरहक माइटमे एक्के रंग नइ धड़ै छै। ओहो जाँच भ’ जायत।’’
धनिकलाल- ‘‘बड़वढ़िया बात कहलह। जँ दश आँटी बीआ देलासँ सब बाधक उपजा जँचा जाइत, ओहो नीके हैत।’’
गाममे सिर्फ खेत पटबैक सुविधा भेलासँ गामक रुप-रेखा बदलै लगल। गृहस्तमे नव उत्साह जगल। अनिश्चितताक खेती निश्चिततामे बदलै लगल। जबकि खेतीक लेल पानि सिर्फ एकटा साधन छी। नीक वीआ, खाद, खेत जोतै-कोड़ैक औजार, नव ढंगक खेती करैक लूरि सब बाकिये अछि सिर्फ एकटा साधन भेलासँ उपजामे दोबर-तेबरक वृद्धि भेल। गृहस्तक बीच प्रेम-भाव सेहो बढ़ल। खेतीक जिज्ञासा सेहो बढ़ै लगलै। जइ किसान केँ गरीबी कखनो मुहमे हँसी नइ आवै दैत, ओहि किसानक मुहमे सदिखन हँसी-खुशी अबै लगल।
खाई-पीबै राति भ’ गेल। दरबज्जा खाली देखि शिवकुमार आ रामनाथ आयल। दुनू गोटेकेँ देखि बचेलाल पूछलखिन- ‘‘बौआ, पढ़बैमे मन लगै छह की नहि?’’
दुनू गोटे-शिवकुमारो आ रामनाथो कहलकनि हेँ।’’
दुनू गोटेकेँ मुहसँ हँसी सुनि बचेलाल कहै लगलखिन- ‘‘बौआ मनमे कखनो ई नै अनिहह जे दरमाहा लइ छियै तेँ पढ़बै छी। सब बच्चाकेँ अपन छोट भाई बुझि पढ़विहह। ओ (बच्चा) कोना पढ़त? एहि पर सदिखन ध्यान रखिहह। ओहि बच्चाक जिनगी ओहि अवस्थामे होइत जहि अवस्थामे उगैत सुरुजक होइत। उगैत सुरुजक समयमे जँ मेघ लगि जाइत छैक तँ रातिये जेँका दिनो बुझि पड़ैत छैक। तेँ जत्ते शक्ति अछि ओहिमे एक्को मिसिआ कलछप्पन पढ़बैमे नहि करिहह। अखन तक तू दुनू गोरे एकपेरिया रास्तासँ चलैत एलँह मुदा आब चैबट्टी पर पहुँच गेलह। तेँ चारु दिशि देखिकेँ चलै पड़तह। जना पहिल रास्ता भेल नोकरीकेँ इमानदारीसँ निमाहैक दोसर भेल परिवार, तेसर भेल माए-बाप आ चारिम भेल समाज। एकर संग-संग अपन अध्ययन सेहो अछि। आइ हाई स्कूलक शिक्षक भलहेँ, तेँ की एतबेमे अपनाकेँ समेटि क’ राखि लेवह। आगूक डिग्री प्राप्त कयलासँ कओलेजोक, शिक्षक भ’ सकै छह। जिनगीमे सतत चलैक कोशिश करक चाही। सतत चलनिहारे जिनगीक महत्व बुझैत अछि। हमही शिक्षक छलौ। स्कूलसँ त्यागपत्र द’ गृहस्तीक जिनगीमे प्रवेश केलहुँ। पहिनेसँ कनियो कम आनन्द अखन नहि होइत अछि नव-नव काजक लूरि सेहो सीखि रहल छी आ नव-उत्साहक संग जिनगी सेहो बीतबै छी। मुदा तइयो एकटा अभाव जिनगीमे अखन ध्रि रहिये गेल ओ अभाव थिक। देषाटन। धुमब-फीरब सेहो जिनगीक लेल बड़ पैध काज थिक। बिना घुमने-फीरने दुनियाँकेँ देखि कोना सकबै? कोन ठामक मनुक्ख केहन अछि, कोना रहैक अछि? कोन तरहक जिनगी जीवैत अछि। से त’ घुमलाक बादे बुझबै। अनेको पहाड़, अनेको पठार, अनेको झील, अनेको टावू, अनेको सागर, अनेको झड़ना, अनेको जंगल आ अनेको रंगक माटिक इलाकाक देश भारत अछि। अनेको तरहक प्राचीनसँ अद्यतन सभ्यता, संस्कृतिसँ सम्पन्न देश, बिना देखलासँ कोना बुझल जायत। पहाड़क उपर स’ ल’ क’ समुद्रक किनछरि धरि बसैवला लोक, हजारो रंगक फल-फूलसँ सजल देश बिना देखलासँ कोना कियो बुझि सकै अए। तेँ देशक भ्रमण सभक लेल ओहने जरुरत अछि जेहने जिनगीक दोसर-तेसर जरुरत। तेँ जे समय बीति गेल ओ तँ घूरिके नइ आओत मुदा जे बँचल अछि ओहिमे जहाँ धरि संभव भ’ सकत, ओ तँ पुरबैक कोशिश करब।’’
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जिनगीक जीत:ः 15

फागुन मास। मौसमक बदलल रुखि। समुद्री तूफान क’ चलैत, सओने जेँका मेघो लटकल आ हबो चलैत। कखनो-कखनो बून्दा-बुन्दी पानियो होइत आ हबो कम-बेसी होइत। कखनो काल तेज बरखो आ तेज हबो बहै लगैत जहिसँ सब जाड़े सिरसिराइ लगैत। समयक रुखि देखि, बाध-बोनक काज छोड़ि सब घरे-अंगनक आइ-पाइमे लगल। कियो-कियो घुर पजारि आगिये तपैत। देवन मने-मन सोचै जे फागुन सनक मासमे ऐना किअए होइ अए। मौसमोक कोनो ठेकान नइछै। जहिना लोकक कोनो ठेकान नहि जे, बाजत किछु आ करत किछु। तहिना भगवानोक कोनो ठेकान नहि। कहू जे फागुन सनक सुन्दर मास, तहिमे ऐना किअए होइछै। एते हवा कत-अ जमा छै जे एते बहिकेँ पछिम मुहे चलि गेल, मुदा अखनो धरि सठल हेन नहि! कहू जे कते आशा लगाकेँ लोेक मसुरी, खेसारी, केरावक खेती केने छल, उखाड़ि-उखाड़ि सब घर अंगनासँ ल’ क’ खरिहान धरि सुखै ले पसारने अछि आ ई पाइन सबके सड़ाओत। ने भुस्सी मालक खाइ जोकर रहत आ ने दाना। सब दाना पानिमे भीजि-भीजि सड़त। कने-मने जे जाड़ो चलि गेल छल, सेहो घुरि क’ चलि आओत। फेरि मनमे एलै जे भने हमहीं केने छी, जे खेसारी-मौसरीक खेतिये ने केने छी। गहूमक लेखेते सोना बरसि रहल अछि। अइबेर एक्कोटा मिरहिन्नी दाना नइ हैत। नसीबलाल कक्काक हिसाब ठीके छनि। जे कतिका धान, गहूम आ खेरही एक खेतमे करी। फगुनिया हाल भेल, मन खुशी क देलक। आठे दिनक बाद गहूम काटि लेब आ खेरही बाओग क’ देबइ। पटबीये खेत जेँका खेरही भुभुआकेँ जनमत। फँकलो-फुकल बीआ जनमिऐ जायत। मुदा पिऔजमे गरदनि कटि जायत। काल्हिये पटेलहुँ, तइ परसँ तेहेन बरखा होइ अए जे पनरहो दिनमे खेत फड़हर नइ हैत। जइसँ सड़त। मुदा की करबै? लोक अपना भरि ने सोचि क’ करै अए मुदा अनहोनी के के रोकत। असकरे देवन मालक घरक दलानमे बैसि सोचैत। एक्केटा घरमे, अदहामे माल बन्हैत आ अदहामे वैइसै-उठै ले दरबज्जा बनौने। असकरे देवनकेँ बैसल देखि बुधनीयो आइल। बुधनीकेँ बैसितहि देवन कहलक- ‘‘दीदी, आब हम छबे मास रहब। किऐक ते एगारह बर्ख छअ महीना भ’ गेल। तेँ जहियासँ हम एलहुँ तहियासँ कोन-कोन काज भेल आ कोन-कोन पछुआइल अछि, से दुनू गोरे हिसाब जोड़ि लिअ।’’
देवनके नहि रहब सुनि बुधनीक मनमे धक्का लगल। उदास भ’ बुधनी कहलकै- ‘‘बौआ, तोरा पाबि हमरा बहुत भेल। हमरा सन-सन कते लोक बौआ-ढहनाकेँ मरैत अछि। मुदा तू हमरेटा नहि हमरा कुल-खनदानकेँ जीया क’ रखले।’’
बुधनी देवनकेँ कहिते छलि कि सजन सेहो चद्दरि ओढ़ने आयल। सजनकेँ चैकी पर बैसबैत देवन कहलक- ‘‘भैया, कोन काज करै छेलह जे हाथ-पाएरमे थाल लागल देखै छिअह?’’
सजन- ‘‘बौआ कि कहिअ’ मालक घर छाड़ै ले खढ़ अटियाकेँ रखने छलौ। ओहो भीजि गेल आ घरो खूब चुबल। बड़दक देह परहक झोली भीजि गेलै। ओइह हटा क’ सुखलाहा बोरा देह पर देलियै। थैरमे पानि अटकि गेल छले, ओकरे खड़रिकेँ बहार केलौ। सैह थाल लगल अछि।’’
अदहा मुह झँपने, मुस्की दैत बुधनी बाजलि- ‘‘भैयाक जेहने बड़द मोटाइल छनि तहिना दीदीयो मोटाइल जाइ छनि।’’
बुधनी बात सुनि सजन खुशियो भेल आ मने-मन सोचोओ लगल जे ऐहेन बात किअए कहलनि। कनिये काल चुप रहि सजन कहलकनि- ‘‘कनियाँ, भनसिया मोटाइल जाइ अए कि फुलै अए, से अपनो मनमे अबै अए। आन चीज ते नइ देखै छियै, मगर अल्लू बर खाइये। से अल्लुऐ कोनो करामति तरे-तर करैछै कि की?’’
बात बदलैत बुधनी बाजलि- ‘‘आइ तँ हमरा बड़का पहपैट भेल गेल। कुसमयक बरखा होइ अए, एक्कोटा सुखल जरना काठी घरमे नइ अछि। कथि ल’ क’ भानस करब? गोरहो मचाने पर अछि आ चिपरी पाथि-पाथि, सुखा-सुखा जे भानस करै छलौ से सबटा भीजियो गेल।’’
सजन- ‘‘हमरो ते सैह होइत। मुदा एकटा सुखल ढेंग छलै ओकरे फाड़ि क’ चुल्हि लगमे द’ भनसियाकेँ कहलिये जे आइ खिच्चैड़ आ अल्लूक चोखा बनाउ। हुअए ते सेरसोक चटनी सेहो बनाएब।’’
बुधनी- ‘‘सेरसोक चटनी कोना बनबै छथिन?’’
-‘‘से नइ बुझल अछि। बड़ सुन्दर चटनी होइछै। जत्ते गोरे ले बनावी ओइ हिसाबसँ सेरसो ल’ ली। ओहि हिसाब से लसुन सेहो ल’ ली जम्बीरी नेबो हुअए ते बड़बढ़िया नै ते कागजियो नेबोसँ काज चलि जाइछै। हिसाबेसँ नून आ मिरचाइ सेहो ल’ ली। सेरसो, लसुन, नून-मिररचाइकेँ खूब हलसँ पीसि ली आ नेबो गाड़ि दिअए। भ’ गेल चटनी।’’
- ‘‘बाह, ई ते सब दिना चटनी हैत।’’
सजन आ बुधनीक बातकेँ विराम दैत देवन- ‘‘भैया, भने दुनू गोरे छी। ऐठाम ऐना हमरा साढ़े एगारह बर्ख भ’ गेल। छअ मास पुरिते हम चलि जायब। तीनू गोरे छी तेँ कहि देलहुँ जँ नइ कहितौ आ चलि जाइतौ ते अहू सब कहितौ जे बिना कहने-सुनने चलि गेल।’’
देवनकेँ प्रशंसा करैत सजन कहै लगलै- ‘‘तोरा पाबि बेचारीकेँ सबकुछ भ’ गेलै। खेतो-पथार भ’ गेलै, मालो-जाल भ’ गेलै, घरो-दुआर भ’ गेलै। रमुआ सेहो विआह करै जोकर भइये गेलै। हमरा बुझने आब वैहटा काज पछुआयल अछि।’’
सजनक बात सुनि देवन- ‘‘भैया, अपनो मनमे अछि। मुदा मन अचताइ-पचताइ अए। किऐक ते इलाका-इलाकाक कन्या अलग-अलग चालि ढालि आ जिनगी छैक। तेँ कोन इलाका कुटुमैती करी, ई बड़ भारी सवाल अछि। ओना समाजमे नवका हवा लगने किछु बदललै मुदा अखनो ग्रामीण इलाकामे सत्तरिसँ अस्सी प्रतिशत वैह छैक। अपना इलाकाक कुटुमैती, पूवमे भागलपुर, पछिममे मुजफ्फरपुर, दछिनमे गंगाकात आ उत्तरमे नेपालक तराई इलाका धरि होइ अए। मुदा सब जाइतिक नहि। राजपूत, भूमिहारक कुटुमैती पछिम आ दछिन अधिक होइत, जे भोजपुरी आ मगही भाषाक इलाका छी। जहिसँ एहिठामक (ऐठामक) भाषा पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ैत। किऐक तँ ओहि इलाकाक सुआसिनक संग भाषो आ व्यवहारो चलि अबैत। तहिना ब्राह्मणक कुटुमैती भागलपुर दिशि होइत, जहिसँ अन्तिका बोली आ भगलपुरिया व्यवहार सेहो चलि अबैत। मुदा पछुऐलहा जाइतिक कुटुमैती नेपालक तराइ सँ ल’ क’ अल्लापुर, धरमपुर, पचही, नारे दिगर, भौर परगनामे अधिक होइत। पचही परगनाक बोली आ व्यवहार अल्लापुर परगना आ नेपालक तराइ इलाकाक बोली आ व्यवहारसँ बहुत नीक अछि। मुदा जे मेहनती कन्या अल्लापुरक, नेपालक आ कोशी इलाकाक होइत ओ पचही, नारेदिगर आ भौरक नहि होइत। तें गरीब लोकक लेल अल्लापुर, कोशीइलाका आ नेपालक नीक होइत।’’
देवनक बातकेँ धियानसँ सुनि बुधनी मुस्कुराइत बाजलि- ‘‘हमरो नैहर भौरे परगनामे पड़ैत अछि। जाबे नैहरमे छलौ (दुरागमनसँ पूर्व) ताबे घास छीलब छोड़ि, ने दोसर काज केलहुँ आ ने लूरि भेलि। हँ, अंगना-घरक काज (नीपनाइ, बहारनाइ, कोठी पाड़नाई, चुल्हि पाड़नाई, भानस-भात केनाई) माय जरुर सिखा देलक। मुदा जिनगी जिबैक लेल तँ कमाईक (उपार्जन) लूरि जरुरी होइत, से नइ भेलि। अही ठीन देखै छी जे अल्लापुरवाली अछि जे पुरुखोक कान कटै अए। हर जोतनाई छोड़ि, ऐहेन एक्कोटा काज नै अछि जेकर लूरि ओकरा नइछै।’’
बुधनीक बात सुनि सजन कहलक- ‘‘कनियाँ, हमरा-अहाँ घरमे कमासुते कनि॰ााँ चाही।’’
बुधनी- ‘‘हँ भैया! ढोरबा कक्काकेँ देखै छथिन, दान-दहेजक लोभे केहेन चमचिकनी पुतोहू उठाकेँ ल’ अनलक जइसँ घरमे सदिखन मुहे फुल्ला-फुल्ली होइत रहैछै। ओहन पुतोहू हमरा नइ आनि दोथु। हमरा दान-दहेजक लोभ नइ अछि। पुतोहू कमासुत हुअए।’’
चारि मास बीति गेल। रमुआक विआहो भ’ गेल। जेहने पुतोहू बुधनी चाहैत छलि तेहने पुतोहू भेलै। मुदा समाज अखनो बुधनीकेँ उपराग दइते अछि जे ऐहेन दब खेनाइ बरिआतीमे कतौ ने खेने छलौ। जेहिना खेनाइ देलक तेहिना सुतै ले पटेरक पटिया आ नारक आँटीक सिरमा देलक। मुदा दही ओहन खुऔलक जे जिनगीमे नै खेने छलौ।’’
परसू देवनकेँ बारह बर्ख पूरि जायत। देवनक मनमे विचित्र द्वन्द उत्पन्न भ’ गेल। एक दिशि विकासक प्रक्रियामे आगू बढ़ैत समाजक मोह तँ दोसर दिशि दुनिया देखैक जिज्ञासा मनमे। तर्क-वितर्क करैत देवन एहि निष्कर्ष पर आबि गेल जे आर्थिक विकासक प्रक्रिया गाममे चलि रहल अछि मुदा दुनिया देखैक जिज्ञासा तँ बौद्धिक विकासक प्रक्रिया छी। विकास तँ ओहो छी। बिना बौद्धिक विकास भेने आर्थिको विकास तँ रास्ता ध’ क’ नहिये चलत। किऐक तँ जतबे ऊँचाई पर बुद्धि रहत ततबे तक ने आर्थिक विकास हैत। जहिसँ जिनगीक विकास अवरुद्ध भ’ जायत। मनुक्ख, समाज आ दुनिया कत्ते आगू तक बढ़त, ई तँ अखन अनुमानेसँ कहल जा सकैत अछि। जे सहियो आ गलतियो भ’ सकैत अछि। तेँ दुनियाँ देखब जरुरी अछि। जहिना वौद्धिक विकासक लेल देवनक मन छटपटाइत तहिना आर्थिक विकासक सुख सेहो शरीरकेँ अपना दिशि खिंचैत। किऐक तँ जहि देवनकेँ बच्चा सँ ल’ क’ किछु दिन पूर्व तक ने भरि पेट अन्न भेटल आ ने भरि देह बस्त्र। ने नीक घरक सुख भेटल आ ने बिसबासू जिनगी। एहि बीच देवनक मन आ शरीर खिंचा-तिरी करैत। कखनो देवन इमहर झुकैत तँ कखनो ओमहर। मुदा जिनगीक संकल्प मनुष्यकेँ सिद्धान्तनिष्ट बनबैत। ई विचार मनमे अबिते देवन बुधनी ऐठामसँ जाइक विचार पक्का क’ लेलक। पुनः। देवनक मनमे आइल जे विकासपुर छोड़ैसँ पहिने नसीवलाल कक्कासँ भेटि क’ लेब जरुरी अछि। किऐक तँ हुनके (नसीवलाल) पाबि हम अइ गाममे बारह वर्ख हँसी-खुशीसँ बितेलौ। खाली जिनगिये नइ बितेलौ बल्कि बहुत किछु अनुभवो केलौ आ सिखबो केलौ।
दोसर दिन भोरे सुति-उठिकेँ देवन नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। गायकेँ सानी लगा, हाथ धोय, नसीबलाल दरबज्जा पर आबि चैकी पर बैसि मने-मन सोचति रहति जे मनुष्य खूब पढ़ि-लिखि लिअए, खूब समृद्धिशाली बनि जाय। परिवारसँ ल’ क’ देश समृद्धिशाली बनि जाय, मुदा की ततबेसँ जिनगीमे शान्ति आ चैन आबि जायत? की मनुष्य-मनुष्यकेँ मनुष्य बुझै लगल? की मनुष्यक बीचसँ अपराध मेटा जायत? की मनुष्यक बीचसँ भोगक प्रवृत्ति समाप्त भ’ जायत?’’ एहि तरहक ढेरो प्रश्न नसीबलालक मनमे उपकै लगल। जहाँ कोनो प्रश्न पर गौरसँ विचार करै लगथि कि घौंदा जेँका प्रश्न मनमे उठै लगनि। फेरि मनमे उठलनि जे आइ अमेरिका सबसँ समृद्धि शाली आ शिक्षित देश अछि। अनेको देश ओकरासँ कर्ज ल’ क’ अपन विकास क’ रहल अछि। मुदा कि अमेरिकामे चोरी, डकैती, लूट, हत्या, बलात्कार नइ होइछै। की अमेरिकामे भिखमंगा नइछै? की अमेरिकामे सब मनुष्यकेँ मनुष्य बुझल जाइछै आ कि जानवरोसँ बदतर बुझल जाइछै। की अमेरिकामे माए-बहीनिक इज्जत-आवरु सुरक्षित छै? नसीवलालक मन जत्ते दौड़ैत तत्ते समस्याक बनमे ओनाइत। ने सोझ रास्ता देखैत आ ने भेटनि। मन असथिर करै दुआरे चुनौटीसँ चून आ तमाकुल निकालि चुनबै लगलाह। तमाकुल चुना मुहमे लेलनि। मन बहटरै दुआरे उठि क’ टहलै लगलथि। टहलैत-टहलैत थूक फेकै ले मुह उठौलनि कि देवनकेँ अबैत देखलखिन। देवन पर नजरि पड़ितहि मने-मन विचार करै लगलथि जे ऐहेन-ऐहेन बच्चा, प्रतिदिन कते मरैत हैत तेकर कोनो ठेकान नहि। मुदा एहि बच्चाकेँ धन्यवाद दी जे एत्ते पैघ संकल्पक संग हँसी-खुशीसँ जीवि रहल अछि। आव तँ जुआन भेल। आब तँ ओहन शक्ति ओकरा भीतर जगि चुकल छै जे किछु क’ सकै अए। एते बात नशीवलाल मने-मन विचारिते रहथि कि देवन लगमे आबि पाएर छुवि गोड़ लगलकनि। असिरवाद नसीवलालक मनेमे घुरआइते, तइसँ पहिनहि आखि देवनक जिनगीकेँ पढ़ै लगल। ने किछु देवन बजैत आ ने नसीवलाल। दुनू अप्पन-अप्पन दुनियाँमे। देवनक मन अंतिम असिरवाद तकैत आ नसीवलाल देवनक पुरुषत्व देखैत। उत्साहित मन, विचलित करेजसँ देवन कहलकनि- ‘‘काका, काल्हि हम अइ गाम (गा) से चलि जायब। तेँ आइ अंतिम असिरवाद लइ ले एलौ हेन।’’
नसीवलाल- ‘‘बौआ, तोरा हम अंतिम असिरवाद अखन कोना देवह? अखन तोरो नमहर जिनगी जिवैक छह आ हमहू अखन मरब नहि। एकटा दुनिया के खंड-पखंड क’ लोक देश, राज गाम, टोल बना नेने अछि। मुदा अछि तँ एक्केटा धरती। अही धरती पर तोहूँ कतौ रहबह आ हमहू कतौ रहब। दुनियाँक कोनो कोनमे चाहे तू रहअ कि हम, हमहूँ तोरा देखवह आ तोहू हमरा देखवह।’’
देवन कक्का, हम जे असिरवाद लइ ले एलहुँ, ओ दैहिक छी। बारह बर्खसँ दुनू गोरे एकठाम रहलौ, आब कने हटि हटिकेँ रहब। यैह जे कनी हटब अछि ओहि ले असिरवाद मंगै छी।’’
देवनक बात सुनि नसीबलाल मुस्की दैत कहलखिन- ‘‘असिरवाद कि कोनो मुहसँ कहला स’ होइछै ओ तँ हृदयक उद्गार छी। तोहूमे तू हमरासँ असिरवाद मांगह आ हम परसादी जेँका द’ दिअ, से कहूँ भेलै अए। जखन कौल्हुका नियार क’ नेने छह ते जरुर जइहह। मुदा आइ ऐठाम रहअ। खा-पीअ, भरि मन गप्पो करब। साँझमे चलि जइहह।’’
सूर्योदयसँ पहिनहि। सबतुर बुधनी सुतले छलि। गामोक सब सुतले। देवन उठि क’ उत्तर मुहे विदा भ’ गेल। जतबे वस्त्र पहिरने छल, बस ओतबे। ने किछु खाइ ले लेलक आ ने कोनो आन वस्तु। ज्ञानक भुख देवनकेँ एते लागल जे कोनो आन वस्तुक सुधिये नहि। मुदा जिनगी जीवैक लूरि ओ सीखि नेने छल। गामक सीमा पर पहुँच देवन मने-मन सोचै लगल जे गामो-घर देखि लेलियै आ गाम-घरक लोको देखि लेलियै तेँ आब देवस्थान दिशि जाय। एते बात मनमे अबिते देवन देवस्थान दिशि विदा भेल। जाइत-जाइत जखन बहुत दूर गेल तखन देखलक जे सइयो मंदिर, मस्जिद, गिरिजाघर अछि। देखि क’ अबूह लगि गेलै जे कते देखब। जँ सबकेँ देखै लगब ते कते बर्ख लगि जायत। मनुक्खक औरुदे कते होइछै। ठाढ़ भ देवन सोचलक जे छोटका स्थान सबके रस्ते-रस्ते देखि लेब आ बड़का-बड़का स्थानके भीतर जा-जा देखब। मन्द-मन्द हवा सिहकैत। रौउदोमे ओते गरमी नहि। मुदा अधिक चललासँ थकि गेल। रास्ताक कातेमे एकटा खूब झमटगर गाछ। गाछकेँ उपरसँ निच्चा धरि देखलक ते अनठिया गाछ बुझि पड़लै। गाछक निच्चामे दूबि पसरल। हरियर कचोर दूबि। मनमे भेलइ जे जेमा तँ जेबे करब मुदा थोडे काल ऐठान सुसता ली। गाछक निच्चामे देवन बैसि रहल। कनिये-काल बैसल कि मन अलिसाय लगलै। दुबिये पर पइर रहल। पड़ितहि निन्न आबि गेलै। कनिये काल पड़ल कि चहा क’ उठल। (निन्न टूटि गेलै) मनमे दू तरहक विचार उठै लगलै। एकटा विचार होय जे थाकल छी तेँ भरि मन अराम क’ ली। दोसर विचार होय जे जँ सुतिये क’ समय बीता लेब ते देखबै की। उठिकेँ ठाढ़ भेल। आगू तकलक ते झल बुझि पड़लै। दुनू हाथसँ दुनू आखि मीड़ि क’ पोछलक। आखिकेँ पोछितहि साफ-साफ देखै लगल। मुदा सब कुछ बदलैत बुझि पड़लै। जहिना चाउरसँ भात बनैत, दूधसँ दही बनैत। दुनियाँक सब कुछ तेज गतिसँ आगू मुहे बढ़ैत देखलक। ठाढ़ भ’ देवन हियाबै लगल जे कियो खाधि दिशि आखि मूनि क’ दौड़ल जाइ अए तँ कियो काँटक बोन दिस। कियो आगि दिशि दौड़ल जइ ते कियो सुन्दर फुलवारी दिशि। फेरि देवनक मनमे द्वन्द उठल। पहिल विचार उठलै जे बिना खाधिमे खसने खाधिक अनुभव कोना हैत? बिना आगिमे गेने आगिक ताप कोना वुझवै? फेरि मनमे उठलै जे जँ खाधिमे खसि पड़ब ते उपर कोना हैब। जँ आगिमे झड़कि जायब ते जीवि कोना? जँ मरिये जायब ते दुनियाँ कोना देखवै? असमंजस करैत पुनः बैसि रहल।
बैसले-बैसल देवनक मन उठै लगल जे मृत्युक रास्तामे जीवन छैक कि जीवनक रास्तामे मृत्यु। सुखक रास्ता दुख छैक आ कि दुखक रास्तामे सुख। पापक रास्तामे पुण्य छैक आ कि पुण्यक रास्तामे पाप। विचित्र सवाल देवनक मनमे अवै लगल गुलाबक फूल तोडै़ काल हाथमे काँट गरिते अछि। रास्ता पर चलनिहार पिछड़ि क’ खसिते अछि। मुदा कि काँट गरैक डरे लोक गुलाब फूल नहि तोड़ै। पिछड़ि क’ गिरै दुआरे लोक चलबे ने करै! अजीव प्रश्न देवनक मनमे उठै लगल। जिनगियेक पाछू तँ मृत्युओ छाँह जेँका सदिखन चलिते अछि। मुदा सवहक पाछू संकल्प अछि। जे कियो गुलावक फूल तोड़ैक संकल्प क’ लेत, ओ काँट गरैक चिन्ता नहि करत। जे आगिक गुण बुझि आगिमे जाइत ओ झड़कैक परवाह नहि करत। तहिना हमरो (देवन) दुनियाँ देखैक संकल्प मनमे अछि तेँ जाबे जीबि तावे चलिते रहब, भलेही रास्ता कतबो कठिन किऐक ने हुअए। ई बात देवनक मनमे अबिते फेरि उठि क’ विदा भेल।
उत्तर दिसक रास्ता देवन धेलक। थोड़े आगू बढ़ला पर काँटक बोन देखलक। बोन देखि देवन हियावै लगल जे कोना अइ बोनमे जायब। चिक्कन रास्ता तँ अछि नहि! हियबैत-हियबैत देखलक जे ने चिक्कन रस्ता अछि आ ने चैड़गर। मुदा खुरपेड़िया रास्ता जरुर अछि जइसँ मालो-जाल आ चरवाहो अबै जाइ अए। अपना दिशि देवन देखलक। देखलक जे हमरो तँ किछु अछि नहि मात्र देहेटा अछि। मनमे विसवास जगलै जे हमहूँ टपि सकै छी। आगू चलल। थोड़े आगू गेला पर देवन देखलक जे बोनक (काँटक बोन) पूबे-पछिमे नमती तँ बेसी छैक मुदा चैराइ तँ कम्मे छैक। बोन पाड़ भ’ गेल। रास्तामे कतौ किछु खेने नहि तेँ भूखो लगि गेलै। मुदा अइ बोनमे खाइक की भेटत। भूख क’ दबैत आगू बढ़ल। आगू बढ़ितहि देखलक जे फेरि दोसर बोन अछि। बड़का-बड़का गाछ-विरीछ ओहि बोनमे। मुदा काँट नहि, फलक बोन। अनेरुआ फलक गाछ तेँ सब रंगक फलक गाछ। एकछाहा नहि। हिया क’ देवन फल सबहक गाछ देखै लगल। रंग-विरंगक फलसँ लदल गाछ। गाछ देखि मन शान्त भेलै। शान्त चित्तसँ देवन सोचै लगल जे अखन तँ छोटके बनमे प्रवेश केलौ, तखन तँ एत्ते रंग-विरंगक फल चकचकाइत अछि, जँ अहूँसँ आगू बढ़ी तखन ते ओहूसँ बेसी, पैघ आ सुन्दर-सुन्दर फल भेटत। बड़का-बड़का गाछोक बन भेटत। तेँ जँ पैघ फल प्राप्त करै चाहै छी ते अइ छोटका फलक बोनकेँ टपि आगू बढ़ै पड़त। फेरि मनमे एलै जे चैबे से छबे नइ भ’ कहीं दुबे बनि गलौ, तखन तँ सब गुर गोबर भ’ जायत। मुदा नहि! जिनगीमे कोनो वस्तु प्राप्ति, दू तरहे होइत अछि। एक, वस्तुक प्राप्ति आ दोसर विचारक प्राप्ति। ओना कखनो काल दुनूक प्राप्ति भ’ जाइत मुदा कखनो काल विचारक प्राप्ति होइत, वस्तुक नहि। तेँ जिनगीमे कखनो एहि बातक चिन्ता नहि करक चाही जे प्राप्ति हैत कि नहि। सतत् मनुष्यकेँ आगू बढ़ैक उत्साह मनमे, आ कर्म करैक लेल डेग उठैक चाही। जिनगीमे हारि ककरा कहबै आ जीत ककरा कहबै? अंधकार प्रकाशक लड़ाई तँ सदिखन मनुष्यक भीतर चलिते रहै अए, जँ एक रुपमे अंधकार हारै अए ते दोसर अहूँसँ पैघ रुपमे, आगू आबि ठाढ़ भ’ जाइ अए। सूर्य सन प्रकाशमान सेहो अंधकारक चद्दैरमे झँपा जाइत अछि। हमरा सबहक बीच सेहो एकटा जबरदस भ्रम पसरल अछि जे पैछला जनमक केलहा एहि जन्ममे भेटै छैक। मुदा अहू प्रश्नकेँ दू दृष्टिये देखल जा सकैत अछि। पहिल, पैछला जन्म जे विकासक प्रक्रियामे एक-दोसरमे बदलैत जाइत आ दोसर जे एहि जन्मक पूर्व समय। जना अफसरक पूर्व समय विद्यार्थीक होइत। डाॅक्टरक पूर्व समय सेहो विद्यार्थीक होइत। मुदा हमरा सबहक बीच पहिल बातकेँ मानल जाइत, तेँ ई जबरदस्त भ्रम। जते बात देवन सोचैत तत्ते मन घोर-मट्ठा होइते जाइत। खिसियाकेँ देवन उठि क’ विदा भेल। मुदा उठि क’ विदा होइते तामस मिझहा गेलै। शरीरमे नव शक्तिक संचार भेलै। अपन संकल्प क’ माथ पर उठा साहससँ डेग उठवैत आगू बढ़ल।
देवनक पेटक भूख मिझा गेलै। शरीरमे नव शक्तिक संचार भेलै। अपन संकल्प क’ माथ पर उठा साहससँ डेग उठवैत आगू बढ़ल।
देवनक पेटक भूख मिझा गेल। मुदा मनक भूख बढ़िते। जाइत-जाइत जखन देवन किछु दूर गेल ते एकटा विशाल आमक गाछ देखलक। रस्ताक वामा भाग ओ गाछ। गाछमे काँचसँ पाकल धरि फल लटकल। निच्चोमे गिरल। गाछ लग ठाढ़ भ’ देवन सोचै लगल जे ई गाछ अनेरुआ (बिन रोपल) छी वा लगाओल अछि। चारु कात देवन आखि उठा-उठा देखै लगल। देवनकेँ बापक सुनौल एकटा खिस्सा मन पड़ल। बाप कहने रहै जे अपना एको धूर खेत नहि जे गाछी-कलम लगा दितियै। तीरथ-बरथ करै ले पाइ नहि, पूजा-पाठ करैक लूरि नहि, मुदा धरमक काज तँ सबके होइछै। तेँ रस्ता कातमे पाँचटा आमक गाछ रोपि देलयै। कहीं ओहने रोपिनिहार ते ने इहो रोपने अछि। पाँचटा पाकल आम बीछि देवन गाछक अलगलहा सिर पर बैसि खाइ लगल। आम स्वादिष्ट। पाँचो आम खा देवन सोचलक जे आइ एतै रहि जायब। दुबि मे हाथ पोछि, हाथेसँ मुहो पोछि लेलक। पानिक जरुरते नहि। असकरे देवन ओहि गाछक छाहरिमे पड़ि रहल। गाछक उपरमे अनेको रंगक चिड़ै-चुुनमुनी पकलाहा आमो खाय आ अपनामे गपो-सप करै। चोरो-नुक्की खेलय आ हँसियो-चैल करै। रंग-विरंगक चिड़ै रहनहुँ, सब अपन-अपन डारि पर बैसि अपना जिनगीक गप्पो करै। चीत गरे देवन पड़ल। तेँ गाछक उपर सब चिड़ै देखए। अगिला-पछिला सब जिनगी बिसरि देवन चिड़ै सबहक दुनियामे पहुँच गेल।
किरिण डूबि गेल। आनो-आनो गाछ परक चिड़ै सब ओहि गाछ पर अवै लगल। जना सबके बुझले रहै तहिना सब अपन-अपन ठौर ध’ लेलक। किछु काल धरि, जाबे साफ (इजोत) रहै, सब गप-सप करैत रहल आ जना-जना अन्हार पसरैत गेलै तना-तना ओहो सब गबदी मारैत गेल। तेसरि साँझ होइत-होइत सब (चिड़ै) सकदम भ’ गेल। देवनकेँ ओ गाछ कल्प वृक्ष जेँका बुझि पड़लै। नव-नव विचार रास्ता, नव-नव जिनगी जीबैक ढंग देवनक मनमे अबै लगल। बिचारेक दुनियामे, देवनकेँ कखन निन्न एलै से अपनो ने बुझलक।
पौ फटिते एकटा चिड़ै क’ नीन टुटलै। निन्न टुटिते ओ सबकेँ जगवै लगल। धीरे-धीरे फरिच्चो होइत गेलै आ चिड़ैइओ सब जगि गेल। जगितहि सब चिड़ै, अपन जिनगीक कर्म करै, उड़ि-उड़ि विदा भेल। चिड़ै के उड़ैत देखि देवनो उठल। उठिके अपन सैाँस देह देखलक। पानि तँ रहै नहि जे मुह-कान धोइत, मुदा हाथेसँ आखि कान पोछि विदा भेल। उबर-खाभर रास्ता। कतौ सोझ, कतौ टेढ़। कतौ भौक तँ कतौ खाइध। मगन भ’ देवन सरा-सरि आगू बढ़ैत जाय। रास्तामे जानवरक तँ कमी नहि मुदा मनुक्ख एक्कोटा नहि। किन्तु तइयो देवनक मनमे ने शंका आ ने घवड़ाहट। असकरे देवन आगू बढ़ैत जाय। किछु दूर गेला पर देवन बाजार जेँका देखलक। देवनक मनमे सवुर भेल जे आब मनुक्खसँ भेटि हैत। मुदा ओ बाजार नहि कसबा। छोट-छोट कारोवार चलैत। दुनू भाग घर बीच देने रास्ता। गोटे-गोटे घर पुरने ढंगक मुदा गोटे-गोटे टीप टापसँ सजल। मनुक्खोक वैह रुप। मुदा अकसरहाँ लोक रुढ़ि -वादी विचारसँ ग्रसित। किछु गोटे पुरान रुढ़िवादसँ जकड़ल तँ किछु नवकासँ। रुढ़िवादी रहितहुँ सबमे मिलान नहि! एक दोसरकेँ गरिअबैत। सब-सभकेँ कहैत- ‘‘तू गलत’, ते तू गलत।’’ रास्ता धेने देवन आगूओ बढ़ैत आ लोकक करतूतो देखैत। थोड़े दूर आगू बढ़ला पर देवन एकटा पैघ पीपरक गाछक निच्चामे एक मनडिल (मंदिर) देखलक। मनडिलक आगूमे यात्री सबकेँ रहै ले एकटा धर्मशाला सेहो। खाइ-पीबैक सेहो व्यवस्था। भानस करै ले एकटा भनसा धर सेहो। मंदिरक चारु कात फुलवारी। छोटका-छोटका फूलक गाछक संग बड़को-बड़को फूलक गाछ। जहिना रंग-बिरंगक गाछ तहिना रंग-विरंगक फूल सेहो गाछमे। पहिने तँ देवन कातेसँ (रस्ते परसँ) देखलक मुदा मनमे भेलइ जे भीतर (छहर देवालीक) जा क’ देखियै। अनभुआर जेँका भीतर प्रवेश केलक। रास्ताक बगलेमे इनार। पानि भरैक लेल ढेकुलमे डोल बान्हल। डोलमे लोहाक जंजीरक उगहनि बान्हल। इनार पर जा देवन डोलमे पानि भरि हाथो-पाएर धोलक, देह पर एक चुरुक छिटियो लेलक आ दोसर डोल पानि भरि पीबियो लेलक। पानि पीबि देवन पहिने मंदिर दिशि बढ़ल। मंदिरक ओसार पर महंथ जीकेँ एक गोटे ताड़क पातक बनाओल बड़का पंखा, पाएरक ओंगरीमे डंटाक निचला भाग लगा, ठाढ़े-ठाढ़ डोलबैत। दोसर गोटे महंथजीक पसारल पाएरमे कड़ूतेलसँ पालिश करैत आ तेसर गोटे महंथजीक बाँहिमे तेल लगा अमिठति। महंथजी असुआइल आखि बन्न केने। देवन, महंथजीकेँ देखि मने-मन सोचै लगल जे पकिया साधक जेँका बुझि पड़ैत छथि। किऐक तँ सौ बरिखा गाछक सील जेँका देह, हाथी पाएर जेँका दुनू जाँध आ क्वीनटलिया बोरा जेँका पेट महंथजीक। लालबुन्द शरीर, दाढ़ी-केश नमहर-नमहर। तीस-पइतीसटा अगरबत्ती एक्केठाम जरैत। रंग-बिरंगक सेन्टक शीशी, गमकौआ तेलक शीशी महंथ जीकेँ पजराक खिड़की पर राखल। पुनः देवनक मनमे एलै जे जखन ऐठाम धरि आबि गेलहुँ तखन भगवानक दर्शन आ महंथजीकेँ प्रणाम कइये लेबनि। ओसारसँ आगू बढ़ि देवन दर्शन क’ महंथजीकेँ ठाढ़े-ठाढ़ प्रणाम केलक। प्रणाम सुनि महंथजी आखि तकलनि। एक टकसँ देवनकँे देखि महंथजी मने-मन गुम्हरैत, जे पाएर छुवि किऐक ने गोड़ लगलक। देवन, अपना ढंग अपने लोक। ओ मने-मन विचारै लगल जे हमरा कोनो ऐठाम रहैक अछि जे खुशामद रहत। राही छी रास्ता ध’ क’ एलौ, कनीकालक बाद चलि जायब। मने-मन महंथजी गुम्हरितहि रहथि देवन बाहर चलि आयल। महंथजी पुजेगरीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘अखन जे एकटा दर्शनार्थी आयल छल, ओ हमरा उचक्का बुझि पड़ल तेँ ओकरा जल्दी हातासँ निकालू।’’
महंथजीक आदेश सुनि पुजेगरी देवनके तकै लगल। मंदिरक चारु भाग जे फुलवाड़ी लगाओल छलै देवन देखै ले चलि गेल। पुजेगरी धरमशालामे तकैत, देवन फुलवाड़ीमे फूल देखैत। एक गोटे (अनठिया बवाजी) केँ पुजेगरी पूछलक- ‘‘अखन कियो अनठियो आयल छल?’’
ओ वेचारे एक टकसँ पुजेगरी दिशि ताकि, बिना किछु बुझनहि-सुझनहि, कहि देलक- ‘‘जे आयल छल से चलियो गेलथि। नवका एक्को गोटे नइ छथि। हम ते परसुऐ एलौ आ आरो जे सब छथि ओ पहिनहिसँ छथि।’’
चोट्टे पुजेगरी घुरि महंथजी लग जा कहलकनि- ‘‘ओ चलि गेल।’’
देवन फूल सबकेँ तजबीज करै लगल। किछु फूल सुगंधित आ किछु नहि किछु देषी (भारतीय) फूल किछु विदेशी। सैाँसे फुलवाड़ी देखि देवन मंदिरक पाछुमे जे पीपरक गाछ रहै, ओकरा देखै लगल। गाछ पुरान बुझि पड़लै। किऐक तँ मोटका-मोटका डारि सब रहै। गाछो नमहर। मुदा गाछक एक सुखल आ दोसर भाग हरियर। गाछ देखि देवन सोचै लगल जे ऐना किअए छै, जे अदहा सुखलछै आ अदहा जीयल। छगुन्तामे पड़ि गेल। तत्-मत् करैत देवन गाछक जड़ि लग पहुँचल। गाछक जड़ियोमे बुझि पड़ै जे एक भागसँ सुखलछै आ एक भागसँ जीवितछै। मुह पर हाथ ल’ देवन विचारै लगल। किछु कालक बाद देवनक मनमे एलै जे भरिसक गाछक जड़िमे गराड़ लगलछै। गराड़ मनमे अबिते ओ एकटा सुखल मजगूत ठौहरी ल जड़िमे खोधिअबै लगल। चारिये आंगुर खोधिऐलक कि एकटा मोटगर गराड़केँ गाछक खोंइचा खाइत देखलक। खोंइचा खाइत देखितहि देवनक मनमे खुशी आयल। खुशी अबितहि देवन ओही ठौहरीसँ गराड़केँ निकालि कात दिशि फेकलक। माटि पर खसिते गराड़ क’ कौआ ल’ क’ मंदिरेक गुम्बज पर बैसि क’ खाय लगल। गराड़केँ फेकि देवन फेरि गाछक जड़िकेँ खोधिअबै लगल। मुदा जैड़िक माइटो सक्कत रहै आ गाछक सिरो सब रहै तेँ ठौहरीसँ खोध्आिइले ने होय। देवन छोड़ि इनार पर जा हाथ-पाएरमे लगल माटि क’ धोलक। इनार परसँ सोझे आबि धरमशालामे बैसि गेल।
कनिये कालक बाद रसोइया आबि, धरमशालामे बैसल आदमी सबकेँ, गनै लगल। निद्वन्द्व देवन। कोनो गम नहि। बगलमे बैसल बवाजी (दाढ़ी-केश बढ़ौने) के पूछलक- ‘‘अहाँ कते दिनसँ बवाजी छी?’’
देवन मुह देखि ओ बवाजी कहै लगल- ‘‘बौआ, अहाँ ते जुुआन-जहान छी। मुदा जखन पुछलौ ते कहबे करब। हम गिरहस्त परिवारक छी। चारिटा बेटा अछि। सबके वियाह-दुरागमन करा देलियै। सबके धियो-पूतो छै। हमर स्त्री मरि गेलि। चारु बेटा बराबरि क’ खेत बाँटि लेलक। हमरा सझिये रखलक। साल भ्ािर तँ बड़बढ़ियाँ तीन-तीन मास खुऔलक। मुदा दोसर साल चढ़िते सब अनठा देलक। कियो खाइ ले देबे ने करै। दू-चारि दिन, अपन जे हित-अपेछित सब रहै ओकरे ऐठाम खेबो केलौ आ बेटाक किरदानी कहबो केलियै। ओहो बेचारा सब आबि-आबि कहलकै। मुदा ककरो बातक मोजर नइ देलकै। घरसँ निकलैत मोह लगे। मुदा की करितौ। गामेक एकटा बवाजीक संग ध’ लेलौ। घुमैत-घामैत ऐठाम छी।’’
देवन- ‘‘ऐठाम कते दिन रहबै?’’
- ‘‘जाबे रहै देत ताबे रहब। जखन भगा देत तखन कोनो दोसर असथान पर चलि जायब।’’
देवन चुप भ गेल। मुदा मनमे ढेरो सवाल उठै लगलै। ओहिठामसँ उठि इनार पर जा क’ वैसि रहल। इनारक लहरामे ओंगठि मने-मन सोचए लगल जे सिर्फ ऐहेन परिस्थिति अही वेचारा टाकेँ नहि भेल। वल्कि ऐहेन परिस्थिति तँ सब गाममे होइ छै। तेँ ऐहेन समस्याक लेल समाजकेँ सोचए पड़त। सिर्फ सोचए नहि पड़त बल्कि समाधानक लेल किछु करैयो पड़त। गामे-गाम निःसहाय औरत, निःसहय पुरुख आ अपलांग-विकलांक सब अछि। जे अछैते औरुदे काहि कटै अए। तेँ सब गाममे, ऐहेन लोकक लेल, सार्वजनिक तौर पर व्यवस्था करै पड़त। एहि समस्या बीच देवनक मन ओझरा गेल। सोचैत-सोचैत सुति रहल। खेबो ने केलक।
रातिक बारह बजे। हवाक सिहकी चलक। हवाक सिहकीसँ देवनकेँ जाड़ हुअए लगलै। जाड़ होइतहि निन्न टूटि गेलै। निन्न टुटितहि इनार परसँ उठि धरमशालाक कोनमे आबिकेँ बैसि गेल। हवा जोरे होइत गेलै। देवन धरमशालासँ निकलि बाहर आबि अकास दिशि तकलक। अकास दिशि देखि बुझि पड़लै जे अन्हर-बिहाड़ि आओत तेँ घर (धरमशाला) सँ नीक बहरेमे रहब हैत। पुनः इनारक जगत (निचला लहरा) पर आबि क’ बैसि गेल।
महंथजी, पुजेगरी मन्दिरमे सुतल। हवाक ठंढ़सँ महंथजीक निन्न आरो कड़गर भ’ गेल। किऐक त’ मंदिर तीनि भागसँ घेरल। मात्र एक्के भाग अबै-जाइ ले खुजल। फोफ कटैत महंथजी आ पुजेगरी। संयोग स कर (करबट) घुमै काल महंथजी वामा हाथ महंथजीक छाती पर चल आयल। तेँ सपना सपनाइ लगल सपनामे महंथजी देखैत जे हम रथ पर चढ़ि स्वर्ग जा रहल छी। देवलोकक रथ। बड़का-बड़का घोड़ा ओहि रथमे जोतल। अप्सरा सब नचैत। देवलोककक दूत सब रथक आगू-पाछू अरिअतने चलि रहल अछि। जबर्दस्त अन्हर-बिहाड़ि उठल। महंथजी निन्न भेरि। बिहाड़िमे मंदिरक पैछला पीपरक गाछक सुखलाहा भाग टूटिकेँ मंदिर पर गिरल। ओना माइटिक तर तक गाछ सूखल, मुदा गाछक जड़ि चिराइल नहि। दू फेड़ा लगसँ टूटल। विशाल डारि। मंदिर पर डारिकेँ खसितहि पहिने मंदिरक गुम्बज टूटल तकर बाद सैाँसे मंदिर टूटि क’ गिर पड़ल। पुरान मंदिर तेँ टूटैमे देरियो नइ लगलै। महंथजी निन्न भेरि, तेँ मंदिरकेँ गिरैत बुझबे ने केलनि। तरमे महंथ जी आ पुजेगरी, तइ उपर मंदिरक ओसाराक छत आ तइ उपर गाछक मोटका डारि। महंथ जीकेँ उपर जखन, सबटा (दुनू) टूटि क’ लदा गेलनि तखन निन्न टूटलनि। मुदा निन्न टूटिनहि की? थकुचा-थकुचा देह भेल। मात्र साँसेटा चलैत। सेहो अवरुद्ध भ’ गेलनि। दुनू गोटे (महंथ आ पुजेगरी) ओहि तरमे दबि क’ परान त्याग केलनि। मुदा तइयो अन्हर कमल नहि। ओना आन दिनक अनहर ओहन होइत छल जे अबै छल आ लगले चलि जाइ छल। मुदा ओझुका अन्हर बड़ी खान धरि रहल।
धरमशाला मंदिर सँ हटल। चारु कात स खुलल तेँ हवाक झोंक एक भागसँ पइसे आ दोसर भागसँ निकलि जाय। धरमशाला गिरल नहि, बँचि गेल। इनार पर बैसल-बैसल देवन सब कुछ देखैत मुदा ने हल्ला केलक आ ने उठल। अन्हर चलि गेल। मुदा पाइन-पाथर नइ खसलै। अन्हरके जाइते धरमशालाक सब निकलि हल्ला करै लगल। जे मंदिर गिर पड़ल। महंथजी आ पुजेगरी ओहि तरमे दवाइल छथि। मुदा अन्हर तँ सिर्फ स्थाने (असथाने) भरि नहि आयल छल, सब अपन-अपन उधिआयल घर-अंगना सम्हारैमे लागल, तेँ कियो ने आयल।
पौ फटिते देवन विदा हुअए चाहलक, मुदा फेरि मनमे एलै जे जाइसँ पहिने कने महंथजीक अन्तिम दर्शन क’ लेब उचित हैत। रुकि गेल। मुदा अन्हारक दुआरे ने अखन धरि मंदिरक छज्जी परसँ गाछक डारि हटाओल गेल आ ने महंथजी छज्जी तरसँ निकालल गेल छेलाह। किएक तँ डारिओ छोट-छीन नहि जे दू-चारि गोटे धीचि (खिंची) के कात क’ दैत। बिना कुड़हरि स’ कटने डारि हटैवला नहि। जे अन्हारमे कोना होइत। डारिक तरमे मंदिरक छज्जी आ मंदिरक छज्जी तरमे महंथजी आ पुजेगरी। पुनः देवनक मनमे एलै जे जहि महंथजी आ पुजेगरीकेँ देखै ले अँटकल छी, ओ जीवित हेताह कि मुइल? तर्क-वितर्क देवन करै लगल। तर्क-वितर्क करैत देवनक मनमे एलै जे जखन मंदिरे गिर पड़ल महंथ आ पुजेगरी कोना बँचत। अनेरे हम कोन भाँजमे पड़ल छी। ऐठाम से रवाना भ’ जाय ऐठाम जते खिन रहब तते खिन असमसान (श्मशान) मे रहब हैत। असमसानमे रहि अनेरे किअए जिनगी (समय) गमाएव। ओह, जते जल्दी हुअए तते जल्दी ऐठामसँ विदा भ’ जाय। देवन विदा भ’ गेल। रास्तामे थोड़े दूर गेला पर देवनक मनमे उपकल जे मृत्यु की थिक?
आइ धरि देवनक मनमे ऐहन प्रश्न कहियो आइले ने छल, किएक तँ अखन धरि आखि से जे मृत्यु देखैत छल, ओकरे मृत्यु बुझैत। मुदा आइ, महंथजीक मृत्यु देखला पर, देवनक मनमे एहि दुआरे प्रश्न उठल जे लोकक मुहक सुनल बात झूठ बुझि पड़लै। लोकक मुहे सुनैत आयल छल जे जेहन करत ओकर मृत्यु ओहने हेतइ। मुदा महंथजी आ पुजेगरी तँ भरि दिन भगवानेक मंदिरमे रहि, हुनके टहल टिकोरा करैत, तखन ऐहेन मृत्यु की थिक ई प्रष्न उठितहि ऐवन सोचै लगल जे मृत्युकेँ जीवनक पूर्व पक्ष कहबै आ कि उत्तर पक्ष। पूर्व पक्ष एहि दुआरे जे नीक विचारक जन्म होइतहि पुरान (गलत) विचारक मृत्यु भ’ जाइत अछि। तहिना नव जीवक जन्म होइतहि पुरना जीवन समाप्त भ’ जाइत छैक। एहि द्वन्द्वमे देवनक मन नीक जेँका ओझरा गेल। पुनः दोसर प्रश्न मनमे उठलै जे हमर संगीत शास्त्री लोकनि सब गीतिकेँ अवसर विशेषक आधार पर गीतक निर्माण केलनि मुदा सोहर आ समदाउनकेँ किऐक जन्मोत्सवोमे आ मृत्योत्वोमे मानि लेलखिन। जबकि दुनू दू अवसर छी। एते बात मनमे अवैत-अवैत देवनक मन घोर-मट्ठा भ’ गेलै। जहिना नसेरी अपने धुनिये रास्ता कटैत तहिना देवनो आगू बढ़ैत जाय। चलैत-चलैत देवन बिन खेने-पीने, दुपहर तक चलिते रहल। ने भूख दिशि मन जाय आ ने पियास दिशि। जना कोनो सुधिये नहि। जाइत-जाइत देवन एकटा फूलक गाछ लग पहुँचल। फूलक गाछ लग पहुँचते देवनक भक्क खुजल। रुकि गेल। ओहि फूलक गाछके निग्हारि-निग्हारि देखै लगल। फूलक गाछ देखि देबनक मुहसँ अनायास निकलल- ‘‘ऐहेन फूल तँ आइ धरि नहि देखने छलौ।’’ सुन्दर आ सुडौल गाछ। जगह-जगह डारि फुटल। जेहने गाछक धड़ चिक्कन तेहने डारिओक। हरियर-हरियर, चैड़गर-चैड़गर पात नमहर -नमहर, लाल-लाल फूल। मखानी गुलाब जेँका फूलसँ लदल गाछ। एकान्त जगह। ओहि फुलक गाछ देखि देवन मने-मन सोचलक जे अखन (भरि दुपहर) एतै रहब। रहैक विचार क’ ओ फूलक निच्चामे बैसि रहल। मन्द-मन्द, शीतल हवा बहैत बारह बजेक समय। तेज धूप। गरमी स’ वायुमंडल गर्म होइत जाइत। राही-बटोही, जहाँ-तहाँ रुकि-रुकि, दुपहर वितबैक ठौर पकड़ि लेलक। भूख-पियास देवनक मेटा गेलै। गाछक निच्चेमे ओ चीत गड़े सुति फूल सबकेँ देखै लगल। आॅखि फूले पर रहै मुदा मन अपन जिनगी क’ उद्धेश्य पर पहुँच गेलै। जिनगीक उद्धेश्य पर मनकेँ पहुँचते देवन सोचै लगल जे मनुष्यक जिनगीक रास्तामे कहियो फुलवारी भेटैत तँ कहियो काँटक बोन। दुनूक बीच होइत जिनगी चलैत। मुदा काँटक बोन देखि मनुष्य घवड़ा जाइत जबकि फुलवारीमे सतत रहैक कोशिश करैत। मुदा फूले गाछमे काँटो होइत आ काँटे गाछमे फूलो। तखन मनुष्य कोना अगबे फूलवाड़ीमे रहि पाओत।
चारि बजि गेल। राही-बटोही अप्पन-अप्पन रास्ता-बाट ध’ चलै लगल। राही-बटोहीकेँ देखि देवनोक मनमे एलै जे सुतलासँ तँ नहि हैत, जँ किछु हैत त’ चलनहि। जँ आइ चलि क’ एहि फूलक गाछ लग नहि पहुँचल रहितहुँ त’ ऐहेन फूलक गाछसँ दर्शन कोना होइत। उठि क’ बैसि हियाबै लगल कि एकटा बटोहीकेँ उत्तरसँ दछिन मुहे अबैत देखलक। बटोहीकेँ देखि देवनक मन मे एलै जे भरिसक हमरे जेँका इहो बटोही अछि किअए तँ ने देहमे अंगा देखै छियै, आ ने माथ पर कोनो वस्त्र। सिर्फ हाथमे एकटा छोटे मोटरी लटकौने अछि। मुदा उत्तरसँ आबि रहल अछि तेँ उत्तर दिशाक रास्ता त’ जरुर वुझल हेतैक। किऐक तँ हमरो ओम्हरे जेबाक अछि। अबैत-अबैत बटोही ओहि फूलक गाछ लग आबि रुकि गेल। बटोहीक नजरि देवन पर आ देवनक नजरि बटोही पर। मुदा दुनूमे स’ कियो ककरो नहि टोकैत। दुनू मगन। अपना-अपना तालमे दुनू बेहाल। मुदा देवनक मनमे एलै जे हम बच्चा छी आ ओ बटोही चेतन छथि तेँ हमरा पूछब उचित हैत। देवन ओहि बटोहीकेँ पूछलक- ‘‘दादा, हमरा उत्तर मुहे जेवाक अछि तेँ अपने रास्ताक संबंधमे किछु बता दिअ?’’
देवनक बात गौरसँ बटोही सुनि कहलक- ‘‘बौआ, तू भूखल वुझि पड़ै छह, किऐक तँ तोहर मुह सुखाइल छह, तेँ पहिने खा लाय। हमरो ई मोटरी भारी लगै अए। तोरो पेट भरि जेतह आ हमरो जान हल्लुक भ’ जायत।’’
बटोहीक बात सुनि देवन किछु नहि बाजल। बटोही बुझि गेलै जे वेचारा भुखल अछि। खाइक इच्छा भ’ रहलछै तेँ ने किछु बाजल। उठि क देवन लग आबि मोटरी आगूमे द’ देलक। देवन मोटरी खोलकक ते देखलक जे खाइ-पीबैक ओहन विन्यास सब अछि जे आइ धरि खाइक कोन बात जे देखनहुँ नइ छलिऐक। भरि पेट खा देवन पुनः पुछलक- ‘‘दादा, अपने आगूक रास्ता (उत्तर दिशाक) बता दिअ?’’
बटोही- ‘‘आगूक रास्ता बुझि क’ कि करबहक?’’
-‘‘दादा, दुनियाँ देखैक खियालसँ घर स’ निकलल छी, तेँ दुनियाँक देखैक लिलसा मनमे अछि।’’
मुस्कुराइत बटोही कहै लगल- ‘‘दुनियाँ किछु ने छी। माटि, पानि, अकास, आ हवाक बनल एकटा गोला छी। अही सबसँ जनमि-जनमि, जइ दुनियाँकेँ देखैछी, ई ठाढ़ भेल अछि। मुदा सैाँसे एक रंग नहि भ’ एक भगाह भ’ गेल अछि। एक भाग निरोग अछि आ दोसर भाग सड़ल अछि। तहूमे सब स’ अजीब बात ई अछि जे एकरा (दुनियाँके) बीचोबीच एकटा रेखा खिंचल अछि, जकरा लोक विषुवत रेखा कहैछै। रेखा पूबे-पछिमे अछि। रेखाक दुनू भाग (समान दूरी पर) एक्के रंग रौद-वसात आ उपजा-बाड़ी होइछै। गाछो-बिरिछ एकरंगाहे अछि। मुदा सब कुछ एक रंग रहितहुँ, मनुक्ख दू रंग अछि। एक भागक अगुआइल अछि आ दोसर भागक पछुआइल। तहिना देखवहक जे दुनियाँक मनुक्खो दू दिशि भ’ गेल अछि। एक भागक खूब पछुआइल (अवनतिक शिखर पर) अछि। मुदा सब किछुमे विषमता रहितहु एक चीजमे समता अछि। ओ थिक नंगापन। जे अगुआइल मनुक्ख अछि ओ देखैमे दूध जेँका उज्जर धप-धप, गाय-महिसि जेँका ओकर देह आ हाथ-पाएर छै। खाइओ-पीवैक आ रहैओक व्यवस्था नीक छैक। मुदा ओ (महिला) सब जे कपड़ा पहिरैत अछि, ओ ओहन झकझकौआ मेही होइछै जे देखलासँ वुझि पड़तह जे कपड़ा पहिरनहि नइ अछि। ओहिना सैाँसे देह देखवहक। तहूमे जँ कतौ देखैमे झल बुझि पड़ह ते चश्मा लगा लिहह। तहिना दोसर दिशि देखबहक जे मनुक्खकेँ गरीबी ओहि रुपे जकड़ने अछि जे ने भरि पेट अन्न भेटै छै आ ने देहमे वस्त्र। तेँ अभावे ओ सब नांगट रहै अए। ने खाइ के ठेकान आ ने रहै के। ने वस्त्रक कोनो उपाय। तेँ नांगट रहै अए। देहक हाँड़ चारि लग्गी हटलेसँ गनि लेबहक। कंकाल जेँका ओकर देह। कारी खट-खट रंग, साबे जेँका केश बेचारी सबहक रहैछै। मनुक्खक समाजमे वस्त्रकेँ परदा मानल गेल अछि, आ अहीसँ इज्जत-आवरु देखल जाइछै। मुदा एकटा सवाल पूछै छिअह, कहअ जे दुनू (जकर चर्चा उपर भेल) औरतमे ककर इज्जत-आबरु बँचल छै आ ककर नहि?’’
बटोहीक बात सुनि देवन धड़फड़ा क’ बाजल- ‘‘जकरा देह पर वस्त्र छै ओ इज्जतदार।’’
बटोही- ‘‘धुः बूड़ि, एतबो ने बुझै छहक। अच्छा कोनो बात ने। तू अखन बच्चा छह तेँ नइ वुझै छहक। देखहक, लोके-लाज दुआरे ने लोक कपड़ा पहिरै अए। किऐक तँ मनुक्खमे बुद्धि-विवेक होइ छै। तेँ किछु अंगके गुप्त अंग मानल गेल अछि। जेकरा देह पर वस्त्र छै ओकरा पर आखि गड़ाकँे देखिनिहोरो बेसी अछि। जेकरा अंगके वस्त्र नहि झँपैत छैक। मुदा जेकरा देह पर वस्त्र नहि छैक, नरकंकाल जेँका अछि, ओकरा पर नजरिये केकर पड़त जे लोक-लाजक प्रश्न उठतै। आब कहअ जे केकर इज्जत-आबरु बँचल अछि जेकर बँचल छैक सैह ने इज्जतदार।’’
बटोहीक बात सुनि देवन मूड़ी डोलबैत हूँ-ह कारी भरलक।
बटोही- ‘‘आब दोसर बात सुनह। दुनियाँमे जते मनुक्ख अछि, सब मनुख छी। सभकेँ एक्के रंग सब अंग छै। हाथ, पाएर, मुह, नाक, कान इत्यादि। सब अन्न खाइ अए, पानि पीबै अए, कपड़ा पहिरै अए, रौद-वसात, पाइन पाथर, जाड़सँ बँचै दुआरे घरमे रहै अए। अस्सक पड़ला पर दवाइक जरुरत होइ छै। बुद्धिक दुआरे पढै़ अए। मनोरंजनक दुआरे नचवो करै अए आ गेबो करै अए। तेँ सबहक लेल एक रास्ता हेबाक चाही। नीक रास्ताकेँ धर्मक रास्ता मानल गेल अछि आ अधला रास्ताकेँ पापक। तखन आब तोँही कहह जे भदबरिया बेंग जेँका एते सम्प्रदाय किएक अछि? एक काजक लेल, रास्ता अनेको भ’ सकैत अछि, मुदा सबसँ नीक रास्ता तँ एक्केटा हैत। जखन एक्केटा रास्ता नीक होइत, तखन एते रास्ताकेँ कोन जरुरत। तइ ले लोक एते मारि-मरौबलि, गारि-गरौबलि किअए करै अए।’’
मूड़ी डोला देवन समर्थन केलक। देवनक मूड़ी डोलौनाइ आ मुहक रुखि देखि बटोही मनमे खुखी होय। मनमे खुशी एहि दुआरै होय जे हम्मर बात देवनक हृदयमे चुभि रहल अछि। ओरो आहलादित होइत बटोही कहै लगल- ‘‘बौआ, अजीव अछि दुुनियाँ। कहए तँ बहुत चाहै छी मुदा तोहूँ अनतै छह आ हमहू छी। तोहूँ कतौ जा रहल छह आ हमहू बाटेमे छी। मुदा तइओ जतबे समय अछि तेहिमे किछु बुझि लाय किऐक तँ जिनगीमे काज औतह। तहूमे अखन तू बच्चा छह बहुत दिन एहि धरती पर जीवैक छह। जहिना घर बान्हैक लेल एक्के ढ़ंग (लूरि) सँ अनेको घर बनैत, एक्के किताब पढ़लासँ अनेको लोककेँ ज्ञान होइत तहिना तँ जिनगीक आवश्यकताक लेल एक्के लूरिसँ काज चलि सकै अए। तखन एते रंग-बिरंगक चालि किअए महंथ (सम्प्रदाय चलौनिहार) किअए धरबैत अछि। जना देखहक जे कते अजगुत बात अछि जे कियो खा क’ पूजा करै ले कहै अए तँ कियो भुखले। तहिना कियो दाढ़ी-केश बढ़ा पूजा करैत अछि तँ कियो दाढ़ी-केश कटाकेँ। कियो माइटिक भगवान बना, तँ कियो पाथरक तँ कियो ओहिना(बिना भगवानक मूर्ति बनौने)। तहिना कियो मन्दिर बना, तँ कियो मस्जिद बना, तँ कियो गिरिजाघर बना, नहि जानि कते रंगक देवालय होइत, तँ कियो ओहिना (बिना मंदिर, मस्जिदेक) कियो भगवानकेँ परसाद चढ़बैत तँ कियो बिना परसादेक पूजा करैत। कियो ताड़ी-दारु पीबि, माछ-माउस खा पूजा करैत तँ कियो ओकरा अधला कहि निन्दा करैत। कियो नारी (औरत) के मुक्तिक मार्गक बाधा बुझैत तँ कियो नारियेक पूजाकेँ उद्धारक रास्ता बुझैत। अजीव अछि ई दुनिया आ अजीव अछि अहि दुनियाँक लोक। कियो वेश्याकेँ अधला बुझैत तँ कियो पूजा काल वेश्या नचवैत। कियो-ढोलक-झालि, मजीरा बजा कीर्तन-भजन करैत तँ कियो ओहिना बिना साजे-बाजकेँ।’’
जहिना कोनो खेलौना वा पढ़ै-लिखैक कोनो वस्तु ले बच्चा सब अपनामे छीना-छीनी करैत तहिना देवनक मनमे, हुअए लगल। देवनक मुहक बिजकब देखि बटोही मने-मन सोचै लगल जे वेचारा द्वन्द्वमे पड़ि गेल अछि। कखनो मन गुड़कि क’ इम्हर तँ कखनो ओमहर होइत। मन असथिरे ने भ’ रहल छैक। कने-काल बटोही गुम्म भ’ देवनक भावनाकेँ अँकै लगल। देवनक मन कखनो खुश होइत तँ कखनो चिन्तित भ’ जायत। कखनो मुहसँ हँसी निकलैत तँ कखनो कनै सन भ’ जाय। मुदा बटोही मने-मन हँसैत। मुदा मुहसँ बाहर हँसीकेँ निकलै नहि दैत। बटोहीक मनमे एलै जे आब विषय बदलि दी। बजै लगल- ‘‘बौआ, देखै छहक ने जे ककरो घरमे अन्न सड़ैत अछि तँ कियो भुखले रहै अए। ककरो गामक-गाम खेत छै ते ककरो घरो बन्हलै नहि छैक। ककरो धरमे कपड़ा सड़ै छै तँ कियो नंगटे रहै अए। कियो कोठा भीतर कोठा बनौने अछि तँ कियो गाछक निच्चामे रहै अए। ककरो बोरे-बोरा नून ते ककरो रोटियो पर ने होइत। कियो दबाइकेँ सड़ा-सड़ा पाइनमे फेकैत तँ कियो दवाइ बिना मरैत अछि। कते कहवह पहिनहि कहि देलियह जे अइ दुनियाँक एक भाग निरोग अछि तँ दोसर भाग सड़ल छै।’’
देवनक चेहरा उदास हुअए लगल। मुह मलीन, आखिक ज्योति बदलल, मुदा ज्ञानक भुख मनमे जगै लगलै। मने-मन देवन सोचै लगल जे जखन एतबे दूर ऐला पर एते भेटल तँ एहिसँ आगू गेला पर कते भेटत। ई बात मनमे अबिते देवन बटोहीकेँ कहलक- ‘‘दादा, जखन एते दूर आबिये गेलौ ते अगिला रास्ता बता दिअ। ओहो देखनहि घुमब।’’
मुस्कुराइत बटोही कहै लगल- ‘‘ऐठामसँ कोस भरि पर मनपुर अछि। जखन ओइठाँ महुँचबह ते देखबहक जे किछु गोटे पल्था मारि बैसल अछि आ मने-मन जिनगीक हिसाब जोड़ैत अछि जे जते समय खटै छी ओहिसँ जे उपारजन होइ अए, ओहिक भीतर अपन जिनगी क’ राखि जीबी। आ सैह करबो करैत अछि। मुदा भेड़िया-धसान लोककेँ देखवहक जे खड़क बैलून जेँका हवामे उड़ैत अछि आ कते फुइट जाइत अछि आ कते गिरैत अछि, तकर कोनो ठेकान ने छैक। तेँ तू ओहि बैसलाहा लोक सबहक दर्शन करिहह। ओकर दर्शन सीखि जिनगी बनबिहह। जिनगी की थिक? जिगी तँ वैह छी जे मनुक्ख बनि जिनगी जीबि लेब छी। मनपुरसँ कोस भरि आगू बुद्धिपुर अछि। जखन बुद्धिपुर पहुँचबह तँ देखवहक जे एहिठाम जत्ते लोक अछि सब जुआरी अछि। भरि दिन भरि राति जुऐ (जुअए) खेलाइत अछि। ओ पासा (जुआ खेलाइक) तीनि तरहक अछि। एक तरहक पाशा अछि जहिमे बाप-बेटा खेलाइत अछि। खेलाइत-खेलाइत अपनामे गारि-गरौबलि करै लगैत अछि। बाप बेटाकेँ कहै छै- ‘‘सार तू बेइमान छैँ?’’
तहिना बेटो बापकेँ कहै छै जे- ‘‘सार, तू बेइमान छह?’’
देखबहक जे बाप-बेटा सार-बहानचोद करै अए। मुदा ओहिठाम बेसी नहि अँटकियहह। देखिकेँ आगू बढ़ि जइहह। किऐक तँ ओ सार दुनू चोट्टा छी। जहिना छोटका माछक बोर द’ बंसी खेलेनिहार, बड़का माछ मारि लइ अए तहिना ओ सब छोटका गारि देखा फंसा लेतह आ गारि पढ़तह। तेँ देखि क’ तुरत हटि जइहह। दोसर पासा देखबहक जे भाई-भाई आमने-सामने बैसि जुआ खेलाइत अछि। खेलाइत-खेलाइत देखवहक जे दुनू एक-दोसर क’ बेइमानी करै लगैत अछि। जहिसँ गारि-गरौबलि, मारि-मरौबलि करै लगैत अछि। मुदा ओहो दुनू नमरी चोट्टा छी। तेँ ओकरो देखि क’ लगले हटि जइहह। जँ अँटकवह तँ धोखामे पड़ि जेबह। तेसर पासा जे देखवहक ओ असली पासा छी। ओहिमे देखबहक जे दू परिवारक लोक जुआ खेलाइत अछि। कसमकस खेल ओहि पासा पर होइत छै। दुनू खेलाड़ी सब तरहक शक्ति ल’ क’ खेलाइत अछि। गाइरिक जबाव गारिसँ, माइरिक जबाव मारिसँ, लाठीक जबाव लाठीसँ आ बम-बारुदक जबाब बम-बारुदसँ देल जाइछै। ओहि पासाकेँ देखि मनमे हेतह जे हमहूँ एक भाँज खेलि ली। ओहिठाम अटकि जइहह। जते दिन देखैक मन हुअ-अ तते दिन ओतइ रहिहह।’’
बटोहिक बात सुनि देवनक मनमे खुशी भेल। मुस्की दैत पूछलक- ‘‘ओहिठाम (ओइठिन) से कियो भगाओत तँ ने?’’
बटोही- ‘‘हँ, एक पासाक खेलाड़ी भगौनिहार अछि मुदा दोसर रखनिहार। जे बचैनिहार हेतह। ओकरा भाइ बुझि पीठि पर रहिहक। ओ जे जीतत तेहिसँ तोरो लाभ हेतह। ओ सिर्फ अपनेटा ले नहि खेलैत अछि तोरो ले खेलैत अछि।’’
बटोही- ‘‘ओहिठाम देखि आगू बढ़ि जहिहह। ओइठिनसँ विवेकपुर कोसे भरि आगू अछि। जखन बुद्धिपुरसँ आगू बढ़वह तँ विवेकपुर लगे बुुझि पड़तह। जाइ कालमे सेहो नइ बुझि पड़तह। मुदा बिना विवेकपुर गेने (पहुँचने) वापस नइ घुमिहह। जखन विवेकपुर पहुँच जेबह तखन विवेक बाबासँ भेटि हेतह। विवेके बाबाकेँ लोक ज्ञानेश्वर, धर्मगुरु, जगतपिता सेहो कहैत छनि। ओहिठाम देखवहक जे रंग-बिरंगक ढेरो घोड़ा अछि। एकसँ एक सुन्दर, एकसँ एक तेज चलैबला। ककरो बान्हल नइ देखबहक। ओहिना (बिना बन्हले) सब रहै अए। विवेके बाबाक टहलू हम छी। टहलि-टहलि दुनियाँ देखै छी।’’
देवन- ‘‘ऐठाम किअए आइल छलौ?’’
बटोही- ‘‘अही फुलकगाछकेँ देखै ले आइल छलौ। हँ, जे कहै छेलियह से सुनह। ओहिठाम पहुँचते विवेक बावा भेटि भ’ जेथुन। घोड़ा सब हीं-ही आइत देखबहक। अनेरे लगमे आबि-आबि चारु भरसँ घोड़ा सब घेड़ि लेतह।’’
देवन- ‘‘घोड़ा बदमाशियो करै छै?’’
बटोही- ‘‘नहि। हँ तखन एकटा बात जरुर छै जे गोटे-गोटे घोड़ा ऐहेन अछि जे घोड़ी देखि क’ थोड़े रस्ता काटि दइ छै, मुदा घूरि क’ फेरि रस्ता पर चलि अबै अए।’’
साँझ पड़ि गेल। मुदा अन्हार नइ बुझि पड़ै। बजैत-बजैत बटोही किमहर चलि गेल से देवन देखबे ने केलक। देवनो तँ असकरे चलनिहार तेँ मनमे कोनो शंके ने होय। मनमे होय जे आइ एतै रहि जाइ। फेरि मनमे होय जे जते रास्ता काटि लेब, ओते तँ अपने असान हैत। किऐक तँ जते चाहै छी ओ तँ केनहि हैत।
दोसर दिन भोरे देवन विदा भेल। पहिलुका जेँका देवन आब नहि। सोलहन्नी तँ नहि मुदा अठन्नी जरुर बदलल। रास्तामे मंदिर देखितहि आखि निच्चा केने आगू बढ़ि जाय। भिनसुरका समय तेँ रउदो बेसी तीख नहि। हवाक सिहकी चलैत तेँ चलैमे बेसी मन लगैत। जाइत-जाइत देवन एकटा बड़का मंदिर देखलक। शंखमरमरसँ बनल। हालेमे रंग-टीप भेने विशेष आकर्षक। मंदिरक चारु भाग छहर देवाली। सइयो बीधासँ उपर मंदिरक अगवास। छहर-देवालिएक भीतर एकटा नमहर पोखरि, करीब दस बीघाक कलम, जहिमे अगबे बम्बई आम। हजारोसँ उपर नारियलक गाछ। कमोवेश सब फल। पोखरिक मोहार पर धरमशाला। नहाइ ले पोखरिमे सिमटीक घाट बनाओल। रस्ताक तर देने बिजली तार। एक्केटा रास्ता। जहिमे लोहाक फाटक लगल। फाटकमे खूब नमहर पितरिया ताला झुलैत। चारि बजे भोरमे फाटक खुलैत आठ बजे साँझमे बन्न भ’ जायत। फाटक बन्न भेला पर ने बाहरक लोक भीतर आबि सकैत आ ने भीतरक बाहर जा सकैत। जे महंथजीक कड़गर आदेश छल। इलाकाक लोक महंथजीकेँ जेहने कड़गर बुझैत तेहने चरित्रवान। तेँ विशेष इज्जत। मंदिर लग पहुँचते देवनक मन डोलि गेल, जे कने भीतर जा क’ देखिऐक। थोडे़ काल रास्ता पर ठाढ़ भेल। बाहरोक लोककेँ भीतर जाइत देखलक आ भीतरोक लोककेँ बहराइत देखलक। देवन सेहो भीतर गेल।
भीतर पहुँच देवन हियासि-हियासि मनुक्खोकेँ आ मंदिरक व्यबस्थाकेँ देखै लगल। बड़ सुन्दर व्यवस्था बुझि पड़लै। चकचक करैत मंदिर। मंदिरक आगूमे पाइनसँ धुअल अग्नेय। अगरवतीक सुगंधसँ मंदिरक चारु भाग मह-मह करैत। फुलडालीमे फूल आ कियो तमही लोटामे तँ कियो पितरिया लोटामे जल ल’ पूजा करै ले जाइत। तँ कियो पूजा क’ घुमितो। मंदिरक आगूमे ठाढ़ भ’ देवन गोड़ लगलक। गोड़ लगिते देवनकेँ बुझि पड़लै जे जहिना ई तीर्थस्थान अछि तहिना तँ मनुक्खक देहो छैक। एकाकार भ’ गेल। अपना देहेमे तीर्थस्थान बुझि पड़लै। मंदिरसँ निकलि देवन धुमै लगल। फुलबारीक फूल देखि मन गद-गद भ’ गेलै। फुलवाड़ीसँ निकलि देवन सोझे धरमशालामे पहुँचल। धरमशालाक निच्चामे ठाढ़ भ स्थानोक बावाजी आ बाहरोसँ आयल यात्रीकेँ हियासि-हियासि देखै लगल। दुनू तरहक मंदिरक बाबाजी आ यात्री- लोक दू रंग देवनकेँ बुझि पड़लै। दुनू तरहक लोकमे, दू रंग विचार आ काज, देवन देखलक। दू रंग देखि देवन आरो लगमे जा देखै लगल। बाहरक जे यात्री रहै, ओकर मन आ हृदय पवित्र (षुद्ध) वुझि पड़लै। छल-प्रपंचसँ दूर। भगवानक प्रति श्रद्धा। मुदा मंदिरक जे बावाजी सब छल, ओकर चालियो-चलन आ मनो अषुद्ध बुझि पड़लै। यात्री सब परसँ नजरि हटा देवन स्थानक बावाजी सब पर गड़ाकेँ देखलक। बाबाजी सबकेँ देखै जे सब अपन-अपन रुप बना रहल अछि। कियो सैाँसे देह भस्म (छाउर) लगा, डाँड़मे मात्र चारि आंगुरक बिसटी पहिर रहल अछि त’ कियो सोलहन्नी सैाँसे देह छाउर ओंसि नंगे तैयार भ’ रहल अछि। कियो रेषमी धोती कुरता पहीरि साधारण तिलक लगा तैयार भ’ रहल अछि। ते कियो भिखमंगाक रुप बना रहल अछि। रुप बना सब कियो गांजा पीबि, कियो अफीम खा, कियो दारु पीबि ते कियो भाँग खा तैयार भेल। सबहक आँखि तरेगण जेँका चमकै लगल। अप्पन-अप्पन सब समान ओरिया क’ धरमषालामे रखि निकलै लगल। धरमषालामे मात्र बाहरक जे यात्री छल ओतबे रहल। ओहो सब अपन-अपन मोटरी सम्हारि जाइक तैयारी करै लगल।
रंग-बिरंगक रुप देखि, देवनक मनमे सबहक करतूत बुझैक जिज्ञासा जोरसँ जगल। मुदा कहत के? मने-मन देवन सोचै लगल जे के ऐहेन लोक भेटत, जकरा स’ पूछिबैक। गुन-धुन करैत देवन भनसिया (धरमषालाक रसोइया) लग पहुँचल। ओ सब (रसोइया) बरतन-बासन मँजैत। एकटा बरतन ल’ देवनो मँजै लगल। अनठिया देवनकेँ देखि एक गोटे पूछलकै- ‘‘भाइ, तू कते रहै छह?’’
भनसियाक बात सुनि देवनमे संतोष भेलै जे एकरासँ सब बातक भाँज लगि जायत। उत्तर देलक- ‘‘भाइ, हम त’ बहुत दूर देहातमे रहै छी। बहु दिनसँ अइ स्थानक विषयमे सुनै छलौ। मुदा ने बटखरचा होइ छले आ ने अबै छलौ। अइवेर खरचाक जोगार भ’ गेल ते आबि गेलौ।’’
भनसिया- ‘‘कते दिन रहबह।’’
देवन- ‘‘जते दिन मन लागत।’’
भनसिया- ‘‘बड़वढ़िया! हमरे सब संगे भंडारमे रहह। कोनो-कोनो काजो करिहह आ जे मन हेतह से खेबो करिहह।’’
देवन- ‘‘बड़बढ़िया।’’
देवनकेँ बात बुझैक जोगार भ’ गेलै। जोगार देखि देवन मने-मन खुष होइत पूछलक- ‘‘भाइ, अखन जे बावाजी सब निकलल ओ कखन घुरि क’ आओत?’’
-‘‘किरिण डूबैक समय।’’
- ‘‘भरि दिन कत’ रहत आ की करत?’’
देवनक प्रष्न सुनि हँसैत एक गोटे कहलकै- ‘‘कियो स्थानक नामसँ चंदा करत, हाथ देखि-देखि दैछना लेत। कियो भीख मांगत। इत्यादि।
- ‘‘जखन सबकेँ खाइ ले भेटिते छै तखन चंदा, दैछना आ भीख की करत?’’
- ‘‘जे भीख मांगत ओ एक्को पाइ स्थानमे जमा नहि करत मुदा जे रसीद काटि चंदा करत ओ अधा-अधी स्थानमे जमा करत।’’
- ‘‘बाकी रुपैआ ल’ क’ की करत?’’
- ‘‘देवनक बात सुनि सब भनसिया ठहाका मारलक। एक गोटे हँसित-हँसिते बाजल- ‘‘भने ऐठाम ऐलह। दू-चारि दिन रहह तखन सब किरदानी आखियेसँ देखबहक। मुहसँ कहला पर किछु विसवासो हेतह आ किछु नहिये हेतह।’’
- ‘‘महंथजी कोन मकानमे रहए छथि?’’
ओंगरीसँ देखवैत कहलकै- ‘‘ओ दू महला कोठा देखै छहक, ओकर निचला हन्नामे स्थानक राषन-पानी रहैछै आ उपरका हन्नामे आठ गो कोठली छै। आठो कोठली असकरे रखने अछि।’’
- ‘‘ओइमे सबके जा नइ दइछै। कने हमहू जा क’ देखितियै?’’
- ‘‘नै। ओइमे सब नइ जाइ अए। अगर देखै के मन हुअअ ते भिनसुरका पूजा समाप्त भेला पर कातमे ठाढ़ भ’ क’ देखिहक।’’
- ‘‘की सब होइछै?’’
- ‘‘पूजाक बाद सब अपन-अपन ठर पर चलि जाइ अए। तेकर वाद लीला शुरु होइछै। मुदा बेसी नइ कहबह। ओइ कोठा छोड़ि सैाँसे सब घुमि सकै अए। तेँ जलखै खा लाय आ सैाँसे देखि आबह।’’
- ‘‘बड़बढ़िया।’’ कहि देवन जलखै खा धूमै विदा भेल।
दछिन मुहे देवन विदा भेल। दछिनवारि भाग बजार जेँका बनल। कने हटि क’ देखला पर छोटे बुझाइ मुदा भीतर पैसितहि खूब नमहर देखि पड़ैत। उत्तरे-दछिने रास्ता। रास्ताक दुनू बगल डेरानुमा घर। पाइन, बिजली सैाँसे। बहरीक ओसार पर गद्दीदार कुरसी लगल। सइयोसँ उपरे डेरा, जहिमे ढ़ेरबा लड़की सँ ल’ क’ अधबयषू औरत धरि। मरदक नामो-निषान नहि। वेष्यावृत्ति सँ ल’ क’ गान विद्यामे सब निपुण। स्थानक धूप-आरती सँ ल’ क’ अप्पन वृत्ति धरि सबहक काज। रस्ते-रस्ते देवन आगूओ बढ़ै आ दुनू बगली देखबो करै। जाइत-जाइत देवन दछिनवरिया छोर लग पहुँचल। डेरा सबहक रुप-रंग देखि देवनक मनमे एलै जे किछु दिन एहिठाम रहब जरुरी अछि। बिना रहने नीक-नहाँति नहि बुझि सकब। जखन ऐठाम आबि गेलहुँ तखन सरिया क’ बुझने बिना चलि जायब बचपाना हैत। फेरि मनमे होय जे अबैत-अबैत कत’ आबि गेलौ। लोक अधलासँ नीक दिषि बढ़ैत अछि आ हम अधले दिषि चलि एलौ। फेरि मनमे होय जे अधला जगह होइछै, अधला काज होइछै, अधला विचार होइछै, मुदा ओहो तँ ज्ञान रुपमे होइत अछि। तेँ ज्ञान अरजन करब तँ अधला नहि छी। तहूमे अधला काज केनिहारो तँ कम नहि अछि। अगर जँ हम अधला काजके नहि जानब ते ओहि के अधला बुझि परहेज कोना करब। तत्-मत करैत देवन दछिनवरिया छोर पर ठाढ़ भ’ आखि उठा-उठा चारु भाग देखै लगल। पूबारि भागक डेराक ओसार पर एकटा शील भंग जुआन लड़की (बच्चा नहि भेल) देवन दिषि देखैत। ओहि लड़कीकेँ अपना दिषि देखैत देवनो ओकरे दिस तकै लगल। दुनू दुनूकेँ दखैत मुदा आखिमे आखि मिलितहि लड़की आखि निच्चा क’ लइत। देवनोक मनमे ओहि लड़कीक प्रति उत्सुकता जगलै। मुदा धड़फड़ा क’ पूछत की? बड़ी काल धरि देवन ओतइ ठाढ़ रहल। डरो होय तेँ मुह सुखल जाइ। देवनक उतड़ैत चेहरा देखि ओ लड़की पूछलक- ‘‘किनको तकै छिअनि?’’
देवन- ‘‘तकै नइ छिअनि। देखै ले एलौ हेँ।’’
- ‘‘आउ, ऐठाम आबिके बइसू।’’
बैसू सुनि देवन ससरैत आगू बढ़ल। एक बेर क’ ओ लड़की देवनो दिस मूड़ि उठा क’ देखैत आ फेरि मूड़ि निच्चो क’ लइत। जहिना कियो आन मुलूकक जहलमे जिनगी भरिक (आजन्म) सजा कटैत, जहि ठाम ने अपना मुलूकक एकोटा लोक रहैत आ ने घुरि क’ अपना मुलूक अबैक आषा रहैत, वैह दषा ओहि लड़कीकेँ मने-मन होइत। देवन आबि क’ ओसारक कुरसी पर बैसल। देवनक सुखल मुह देखि ओ (लड़की) मने-मन सोचलक जे भरिसक ई (देवन) भुखल अछि। मुदा देवनक मुह भूखसँ नहि डरसँ सुखल। ओ लड़की पूछलकै- ‘‘किछु खायब।’’
देवन- ‘‘अखने खेलौ हेँ। खाइक इच्छा नइ अछि।’’
-‘‘ऐठाम अहाँ किऐक एलौ? ई जगह मनुक्खक नहि छी।’’
ओहि लड़कीक बात सुनि देवन मने-मन चैंकि गेल। मुदा अपनाकेँ सम्हारि क’ बाजल- ‘‘अगर मनुक्खक रहैक जगह नइ छी ते अहाँ कोना रहै छी?’’
देवनक बात सुनि शान्तीक (ओ लड़की) दुनू आखिमे आँसू आबि गेल। मनक सीमाने पर बोली अँटकि गेलै। चकभाउर कटैत चिड़ै जेँका आखि घुमै लगलै। उपरसँ नीचा धरि देवनकेँ निङहारै लागलि। बड़ी काल धरि शान्तीक आँखि देवनके देखैत रहल आ मन जिनगीक समुद्रमे उग-डुम करै लगलै। ने किछु शान्ती बाजै आ ने देवन। दुनू दुनूकेँ पढ़ैत। बड़ी कालक बाद शान्ती देवनकेँ कहलक- ‘‘अहाँक प्रष्नक जबाब हम अखन नइ देव। भानसो नइ केलौ हेँ। अहूँ आयल छी। तेँ अखन भानस करै जाइ छी। निचेनमे अहाँ सवालक जबाव देब। ताबे अहूँ नहा लिअ।’’
देवनकेँ शान्ती ओसार परसँ उठा भीतर (कोठरी) ल’ गेल। भीतरमे आंगन जेँका बनल। चारु भरसँ छहरदेवाली। बाहरक केबाड़ शान्ती बन्न क’ देलक। भीतरेमे व्यवस्था। नहेवोक, भानसोक। छोटवेटा आंगन तेहिमे टहलबोक। शान्ती भानस करै ले चुल्हि पजारलक। देवन अंगा निकालि नहाइक जोगारमे लगि गेल। मुदा, जना शान्तीयोक मन आ देवनोक मन एक-दोसरकेँ सोर पाड़ै लगलै। टंकी पर देवन ठाढे़ आ चुल्हि लग शान्ती बैसलि। मुदा दुनू एक दोसर दिषि देखैत। जहिना अजेगर सापक आखिसँ आखि मिलला पर मनुक्ख वेवस (आँखिक आकर्षणसँ) भ’ हटि नहि सकैत तहिना देवनो आ शान्तीयोक बीच होइत। टंकी परसँ ससरि देवन चुल्हि लग आबि गेल। खुला देह। सिर्फ धोतियेटा पहीरने। शान्तीयो देहक आंगी निकलि सिर्फ सये-साड़ीटा पहीरिने रहलि। देहक चिन्ता ने देवनके आ ने शान्तीके जहिना बच्चामे भाइ-बहीनि नंगटे खेलाइत तहिना दुनू भाइ-बहीनि जेँका, एकठाम वैसि जिनगीक गप-सप करै लगल।
शान्ती- ‘‘अहाँ ऐठाम किअए एलौ?’’
देवन- ‘‘बहीनि, दुनिया देखैक खियालसँ घर स’ निकलल छी, तेँ ऐठाम एलौ हेँ। मुदा अहाँ किअए ऐहेन बात पूछुलहुँ?’’
देवनक बात सुनि शान्तीक हृदय दहलै लगलै। मन विचलित भ’ गेलै। वोली थरथराइ लगलै। नमहर साँस छोड़ैत शान्ती कहै लगलै- ‘‘भैया, जँ अहाँ ऐहिठाम पहुँच गेलहुँ ते नीक केलहुँ। किऐक तँ बिना देखने दुनियाँकेँ बुझवै कोना? जहि जगह पर आबि गेल छी, तहि ठाम दिनक क्रिया-कलाप भिन्न छै आ रातिक भिन्न। तेँ दिनके जे देखवै, ठीक ओकर विपरीत रातिके देखवै। ओना जँ अहाँ देखै ले आयल छी ते दिनको आ रौतुको, दुनू देखि लिअ। मुदा तइ सबसँ पहिने हमर जिनगी देखि लिअ।’’
शान्तिीक बात सुनिते देवनक मनमे जुआर-भाटा (ज्वार-भाँटा) उठै लगल। शरीर कपै लगल। जहिना तेज हवा, ठाढ़ भेल मनुष्यकेँ अपन झोका (गति) सँ ठेलि दैत तहिना देवन मन शान्तीक बातसँ घुसकै-फुसकै लगल। लाख परियास केनहु देवनक मन डोलै लगल। जहिना रथमे जोतल घोड़ा जखन अपन चालि पकड़ि लइत आ सहीस जँ कतवो छोर खींच कावू करै चाहैत तइयो किछु नहि किछु दूर घोड़ा बेकावू भ’ बढ़िये जाइत, तहिना देवनोक मन भ’ गेल। मुदा, मनके काबू करै दुआरे देवन मुह बन्न क’ आखियेसँ अध्ययनो आ गप्पो करै लगल। जहिना शान्तीक मनमे विचित्र स्थिति पैदा ल’ लेलक तहिना देबनोक मनमे। दुनू दुनूकेँ निङहारि-निङहारि देखै लगल। ने किछु शान्ती बजैत आ ने देवन। जना दुनूक मन, एकठाम भ’ धारक रेतमे भसिआइल जाइत। बड़ी कालक बाद देवनक मन असथिर भेल। ताबे चुल्हिक आगि सेहो मिझा गेल। जहिना गाइयक बच्चा, देह पर हाथ सहलेलासँ, आखि बन्न क’ असुआ जाइत तहिना शान्ती सब सुधि-बुधि बिसरि गेलि। मन असथिर होइतहि देवन पूछलक- ‘‘अहाँक जिनगी!’’
-‘‘ह, हम्मर जिनगी!’’
बिसमित भ’ देवन- ‘‘कहू।’’
शान्ति हमर जन्म एकटा सुभ्यस्त किसान परिवारमे भेल अछि। जखन सात-आठ बर्खक छलौ तखन माइक संग मेला देखै, गामसँ दू कोस हटि, गेलौ। सहस्र चंडी यज्ञ होइत रहै। नअ दिनक यज्ञो आ मेलोक कार्यक्रम रहै। तीनि दिन तक ते मात्र यज्ञेक कार्यक्रम चललै चारिम दिनसँ नाच-तमाषा शुरु भेलै। बड़का रास, थियेटर, नाच सब रहै। दिनमे यज्ञक प्रक्रिया, विषय कीर्तन आ छकड़वाजी चलै मुदा रातिक मेला जवरदस रहै। इजोतक ऐहेन व्यस्था रहै जे जहिना दिन तहिना राति बुझि पड़ै। दोकानो-दौड़ी तहिना पतिआनी लगा क सजल रहै। बगलमे पच्चीस-तीस बीधाक आमक गाछी रहै जहिमे मेला रहै। पाँचम दिन, हमरा गामक लोक सब मेला देखै गेल। हमहू माइक संग गेलौ। सैाँसे मेला, एक्के बेर, घुमैत-घुमैत दुखा गेल। सबकियो जा क’ एकटा आमक गाछक निच्चामे वैसि गेलहुँ। सबहक विचार भेलइ जे रौतुको मेला देखनहि जायब। खाइ-पीबैक कोनो कमिये ने रहै। ढेरो दोकान रहै।
आठ बजे रातिमे रासो आ थियेटरो शुरु भेल। दुनूक उँचगर मंच बनल रहै, तेँ कतौ से कतौक लोक असानीसँ देखए। इजोतक तेहेन व्यवस्था। दर्जनो जेनरेटर चलैत रहै। लोकोक तेहने भीड़। मरद-मौगी मिझराइले। करीब दस बजे, एक्के बेर सब जेनरेटर बन्न भ’ गेलै। बिजली गुम्म होइते सैाँसे मेला हल्ला हुअए लगलै। तहि बीच एक गोरे हमरा उठा लेलक आ दोसर गोरे मुह दाबि, भीड़सँ निकलि गेल। हम जे किछु बजवो करी ओ बोली निकलबे ने करै। तहूमे ततेक हल्ला होइत रहै, जे के सुनत। दुनू गोरे एकटा जीपमे बैसा देलक। जीपो अन्हार। तेँ नीक जेँका देखवो ने करियै। तीनटा जीप आगू-पाछू लगल। तीनू एक्के बेर खुजल। मेलासँ करीब अधा मील जीप गेल, मेलामे इजोत भेलइ आ हल्लो कम भेलइ। जीपक इजोतो बड़ल। जखन जीपमे इजोत भेल, तखन आठटा आरो लड़कीकेँ जीपमे देखलिऐक। मन उड़ि गेल छल। डर हुअए जे कतौ मारि देत कि फेकि देेत। अबधारि लेलौ जे आइ मरले छी। मन पड़ल अपन गाम, अपन परिवार आ अपन कुटुम-परिवार। मुदा की करितौ।’’
शान्तीक मुहसँ एते बात निकलितहि शान्तीयोक दुनू आखिसँ आ देवनो आखिसँ दहो-बहो नोरो निकलैत आ दुनू बोम फाड़ि कनै लगल। देवनक मनमे अप्पन मरल माए-बाप एलै आ शान्तीक मनमे जीवित माए-बाप। दुनूक देहमे, जेना एक्को पाइ लज्जतिये ने रहल। जना मुइलाक बाद मुरदा लड़-तांगर होइत, तहिना। घाड़ा-जोड़ी क’ दुनू छातीमे छाती लगा, कनै लगल। आखिसँ नोर खसै, मुहसँ दुख निकलै, आ छातीमे छाती सटौने पैछला जिनगीक अंत आ अगिला जिनगीक रुप-रेखा बनै लगलै। मुहमे मुह सटा, वोलीसँ नहि, दुनूक मन अप्पन-अप्पन शेष बात कहै लगलै। बड़ी काल धरि दुनू एक-दोसरसँ मिलल रहल। ताधरि दुनू सटल रहल जाधरि दुनूक मनक सब व्यथा नहि निकलि गेलै। जहिना अन्हार रातिमे दुनियाँक सब कुछ अन्हारक चद्दरि ओढ़ि सटि जाइत अछि, तहिना देवन आ शान्तीयो सटि गेल। मुदा सूर्य क’ उगितहि सब अलग-अलग भ’ जाइत तहिना सब व्यथा कहलाक बाद दुनू हटि गेल। दुनू हाथसँ दुनू आखि पोछि देवन शान्तीकेँ कहलक- ‘‘ऐठामसँ निकलैक कोन उपाय अछि?’’
शान्ती- ‘‘जखन फाटकक ताला खुलि जाइछै तखन बहरेबाक उपाय अछि। मुदा किछु ल’ क’ नहि छुछे देहे।’’
देवन- ‘‘पहिने एहिठामसँ निकलि चलू, तखन आरो गप-सप हेतइ।’’
चारि बजे भोरमे फाटकक ताला खुजल। ताला खुजलाक अधा घंटा बाद लोकक आवा-जाही शुरु भेल। पाँच बजे दुनू गोटे दस लग्गा आगू-पाछू विदा भेल। देवनो चारु भर तकैत जे कियो देखै ते ने अछि आ शान्तीयो। मुदा देखियो के कियो किछु ने पूछैत। फाटक टपिते शान्ती नव दुनिया देखलक। दुनियाँक सब कुछ नव। दुनू सोझे उत्तर मुहे विदा भेल। ने देवन शान्तीकेँ किछु पूछैत आ ने शान्ती देवनकेँ। जाइत-जाइत दुनू मनपुर पहुँच गेल। मनपुर पहुँचते दुनूक मनमे शान्ती एलै। दुनू एक दोसरसँ किछु पूछै चाहै कि तहि बीच ओहि बटोही (पछिला) केँ अबैत देखलक। ध्यान (धियान) से ओहि बटोहीकेँ देखितहि देवनक मुहसँ हँसी निकलल। ताबे ओहो (बटोही) लग आबि देवनकेँ पूछलक- ‘‘वौआ, तू अखन धरि एतै छह? हम ते विवेक पुर से घुरि क’ दोहरा क’ एलौ हेँ।’’
देवन- ‘‘दादा, रास्तामे शान्ती भेटि गेलि तेँ गप-सप करैमे समय लगि गेल।’’
बटोही- ‘‘बड़सुन्दर। भने दुनू गोटे एक संग भ’ गेलह। जे देखैक मन छेलह, से आब नीक नाहाँति देखबहक। अखन हम काजे जा रहल छी तेँ नइ अँटकवह।’’
देवन- ‘‘दादा, जतेकाल ऐठाम छी तते कालमे किछु कहि दिअ?’’
देवनक बात सुनि मुस्की दैत बटोही कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, सबहक इच्छा होइ छै जे हम्मर बात अधिकसँ अधिक लोक सुनए। मुदा ओहि सुनने हेतइ की? किऐक तँ जते मनुक्ख अछि, सभकेँ अप्पन-अप्पन जिनगी छैक। सब तँ एक ठाम ठाढ़ नहि अछि जे एकटा बात सुनने सरपट चालि पकड़त। जँ से होइतइ ते सब दौड़ैत रहैत। से कहाँ छै। तेँ जरुरी अछि जे सबसे पहिने अपने उठि क’ मनुक्खक रास्ता पर ठाढ़ होय। जखन मनुक्खक रास्ता पर ठाढ़ भ’ चलै लगब तखन जे गिरल मनुक्ख अछि ओकरा उठवैक कोषिष करक चाही। उठबैक दुनू उपाय अछि। ककरो बाँहि पकड़ि खिंचैक अछि ककरो पाछूसँ धक्का द’ धकेलैक अछि। यैह जिनगीक जीत छी जे हमरा केने कते मनुक्ख मनुष्य बनल।
‘‘हरि अनंत हरि कथा अनंता।’’
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'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

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