Friday, January 01, 2010

'विदेह' ४९ म अंक ०१ जनबरी २०१० (वर्ष ३ मास २५ अंक ४९) PART IV

जिनगीक जीत:ः 5
बचेलाल स्कूल गेल। घड़ी पावनि रहने तँ खुलल मुदा विद्यार्थी नहि आयल। पहिने तँ बचेलाल भकचकेमे रहला जे छात्र स्कूल किऐक ने आयल मुदा किछु कालक बाद एकगोटेसँ भाँज लगलनि जे पावनि छी। अपन दृढ़ता रखैत बचेलाल चारि बजेसँ पहिने स्कूल नहि छोड़ैक विचार मनमे ठानि लेलनि। असकरे ओसार पर कुरसी लगा बैसि मने-मन अपन जिनगीकेँ संबंधमे सोचै लगल अखन घरि सोचैक जे प्रक्रिया बचेलालकेँ छलनि ओ माएक विचार सुनला बाद बदलै लगलनि। जहि ढंगसँ अखन धरि सोचै छला। ओ ढंग बदलने किछु स्पष्ट बुझै लगलथि। आखि उठा क’ आगू दिशि तकलनि ते बदलल सब कुछ बुझि पड़ै लगलनि। माय पर ध्यान पहुँचते अनायास मुहसँ निकललनि- ‘‘ओ (माय) साक्षात् सरस्वती छथि। हुनकासँ बहुत कुछ सीखैक अछि। जहिना मनुक्ख अपन विशाल शक्तिक भंडार रहितहु, अज्ञानवश नहि बुझि पवैत, तहिना तँ हमहू छी। हर मनुष्यकेँ अपन लक्ष्य निर्धारित क केँ जान-परानसँ लागि जेबाक चाही, तखने जिनगीक सार्थकता बुझि पड़तै। अखन धरि हमही जे बुझै छलौ ओकरा इमनदारीसँ निमाहैत छलौ मुदा ओ असथिर चालि अछि। जहिना कोनो स्थान पर पहुँचबा लेल क्यो धीमी गतिसँ चलैत तँ क्यो मध्यम गतिसँ। मुदा तेज गतिसँ चलनिहारकेँ जल्दी सफलतो भेटैत आ दोसरो काज करैक मौका भेटैत। चालि तेज कोना हैत? ई मुख्य प्रश्न अछि। मुदा अप्पन चलब तँ जिम्मा अछि। अनको बुझायब ओहने जरुरी अछि जेहने अपना बुझब। मुदा दायित्व तँ अपन अछि। हम शिक्षक छी। आठ घंटा समय लगाएव आ बच्चा सभकेँ पढ़ाएव अछि। मुदा चैवीस घंटाक दिन-रातिमे एक तिहाई भेल। अहिना पत्नियोकेँ देखैत छियनि। छोटका बच्चाकेँ बेसी काल माइये रखैत छथि। बड़की बच्चिया स्कूलेमे बेसी काल रहै अए। अंगना-घर बहारनाइसँ ल’ क’ भानसोमे संग साथ माइये दैत छथिन। तखन जवान औरतक काज कते बँचल? जरुर विचारमे कतौ कमी अछि। की पति-पत्नीक जिनगी सिर्फ बच्चेटा पैदा करब छी? की परिवारक खर्च जुटाएव सिर्फ मरदे टाक जिम्मा छी? की मरद दुनियाक कोनो कोनसँ पसीना चुबा कमाकेँ आनथि आ स्त्री घरक छहर देवालीसँ नहि निकलथि, यैह प्र्रतिष्ठा छी? औरत अपना पाएर पर नहि ठाढ़ होथि, एहिक लेल पुरुखे दोषी छथि, महिला नहि? की गुलामीक जिनगी सभक लेल कष्टकरे होइत छैक सुखद नहि? ऐहन ढेरो प्रश्न अछि जे सिर्फ बैचारिक समाधानसँ समाधान नहि हैत। किऐक तँ प्रश्न समस्या रुपमे (कार्यरुप) अछि। जकर समाधान काजे क’ सकैत अछि। मुदा काजो के तँ ढेरो बाधा अछि जे काज हुअए नहि दैत। तखन की कैल जाय? एते विचार मनमे उठिते बचेलाल कुरसी परसँ उठि अंगनामे टहलै लगल। जहिना अधसुखू जारन देलासँ धुँआ अधिक होइत, मुदा धधड़ा हेबे ने करैत, तहिना बचेलालोक मोनमे हुअए लगल। मुदा बिना धधड़ा भेने इजोत कोना हैत, एहिक बिचमे बचेलाल पड़ल।
एखन बचेलाल ने विद्यार्थीकेँ पढ़बैत शिक्षक छथि आ ने घरवाली ले पाँच सय नम्बर जर्दा पत्ती कीनिनिहार। ने एखन किसान परिवार कहौनिहार छथि आ ने आॅफिसक बड़ा बावूक जमाए। अखन बचेलाल मनुक्खक ओहि सघन बनमे बौआइत छथि जत्ते माटि पर पसरल हरियर-हरियर दूबि घास विशाल-विशाल गाछक निच्चामे अपन अस्तित्व हँसैत-खेलैत मौजसँ रखने अछि। की ओहि दूबि क’ अपन जिनगीसँ आनन्द नहि छैक? हाँ, जरुर छैक ओहो सजि-धजि अपन पूर्ण जुआनीमे आबि ओहि प्रियक (घसवाहक) प्रतिक्षामे दिन-राति तकैत रहै अए जे हमर अखुनका जे पुष्ट शरीर अछि ओ छीलि के ल जा ओहि गायक भोजन बनाओत, जे दूध सन अमृत दइ अए। की ओ दुबि अमृतक सृजनकर्ता हम नहि छी। बचेलालकेँ मनमे भेल जे एखन हम ओ बतहा बबाजी ने ते भ’ गेलौ जे शरीर स’ अलग भ’ नचैत अछि। टहलल-टहलल बचेलाल कल पर जा मुह-हाथ धोय पानि पीलक। जहिना धीपल लोहा पानिमे पड़िते सरा जाइत तहिना बचेलालोकेँ पाइन पीबितहि भ’ गेल।
पानि पीबि, धोतीक खूँटसँ मुह-हाथ पोछि बचेलाल घड़ी देखलक, त’ चारि बजैत। कुरसी उठा कोठरीमे द’, केबाड़ बन्न क, ताला लगा घर दिशि विदा भेल। आन दिनसँ भिन्न मन। जहिना नसेरीकेँ निसाँ कम भेला पर भक्क लगल रहैत तहिना बचेलालोकेँ होइत। रास्ताक सुधिये नहि! कत्त’ पाएर पड़ैत तकर सुधिये नहि। विचारक दुनियाँमे मन बौआइत। मनमे उठैत जे हमर शक्ति सुतल अछि। ओकरा जागाएव अछि, मुदा ओ जागत कोना? मनमे अबै लगलनि जे डेढ़-डेढ़ घंटा स्कूल अबै-जाइमे लगै अए जँ साइकिल कीनि लेब तँ अधा समयक बचत जरुर होएत। अधा समयक मतलब डेढ़ घंटा। ततबे नहि पाँच-दश मिनट देरियो भेने, तेज स’ चलि क’ समय पूरा लेब। नहाइ-खाइमे सेहो डेढ़-दू घंटा लगि जाइ अए ओहूमे अधा समय बचा सकै छी। भोरु पहर क’ विछान पर पड़ल रहै छी जे पहिनहु उठि सकैछी। अगर सब समय क’ बचा एकटा नव काज ठाढ़ क’ लेब तँ खुशीसँ सम्हारि सकै छी। ततबे नहि फजिलाहा समयसँ जत्ते करब, ओइसँ कते वेसी तेज औजारोक (जीवनोपयोगी मशीन) उपयोगसँ होएत। तहूसँ बेसी काजक उत्साह ऐने सेहो हैत। घर पर आबि बचेलाल घड़ी देखलक तँ बीस मिनट पहिने, आन दिनसँ, आबि गेल। ई कोना भेल? मन पाड़ै लगल तँ रास्ताक चलब मने ने पड़ै।
घर पर आबि बचेलाल दरबज्जेक चैकी पर कुरता, गंजी निकालि रखि बिना हाथ-पाएर धोनहि, चीत गड़े सुति, दुनू बाहि मोड़ि, चाइन पर ल’ आखि बन्न केने सोचै लगल। बाड़ीसँ अड़ूआ उखाड़ि सुमित्रा एक हाथमे खन्ती दोसरमे अड़ूआ नेने रस्ते परसँ बचेलालकेँ देखि, चुपचाप आंगन चल गेली। सुमित्रा मने-मन बुझि गेलखिन जे जहिना साइकिल परसँ गिरल आदमी हाथ-पाएर तोड़ि रोड पर चीते पड़ल रहै अए, सैह गति बचेलालो क’ भेल अछि। मुदा अंगनाक टाटक भुरकी देने रुमा बचेलालकेँ देखि मने-मन सोचैत जे आन दिन स्कूलसँ सोझे अपना कोठरीमे आबि कपड़ा निकालैत छलाह, मुदा आइ ऐना किऐक केलनि। मनमे शंका भेलनि जे भरिसक रास्तामे किछु भ’ गेलनि। धड़फड़ाइत अंगनासँ निकलि रुमा बचेलालक लगमे आबि पूछलखिन- ‘‘किछु होइ अए?’’
आखि खोलि बचेलाल रुमाकेँ देखि फेरि आखि मूनि लेलक। रुमाक करेजमे डर सन्हिया गेलि। मुह लग मुह ल जा रुमा पूछल- ‘‘की मन-तन खराब भ’ गेल?’’
आखि खोलि मन्द स्वर, मुदा सक्कत शब्दमे बचेलाल उत्तर देल- ‘‘नहि। किछु ने होइ अए। अखन ऐठामसँ जाउ। मनमे समुद्रक लहरि उठि रहल अए।’’
धड़फराइत रुमा, सासुकेँ कहै ले आंगन गेली। माथ परसँ साड़ी सड़कल रुमाक। सासु लग जा कहलखिन- ‘‘अखन अड़ूआ बनौनाई छोड़ि देथुन। बेटाक मन खराब भ’ गेलनि। ने बजै छथि आ ने मन उछटगर छनि। जना मुहक रंगो बदलल जाइ छनि। झब दे चलथु। देखथुन जे की भ’ गेलैनि।’’
दुनू हाथसँ अड़ूआ पकड़ि कत्तामे लगौने सुमित्रा रुमा दिशि देखि कहलथिन- ‘‘बच्चाकेँ किछु ने भेलनि। इस्कूल से अबैमे थाकि गेल हेता।’’
हड़बड़ करैत रुमा कहलकनि- ‘‘नै माए! नै। आनो दिन इस्कूलसँ अबै छला कि आइयेटा पाएरे ऐला। ऐना कहाँ आन दिन होइ छलनि। केहेन बढ़ियाँ आन दिन देखै छलिएनि?’’
सुमित्राक बाँहि पकड़ि रुमा घिचने-घिचने दलान पर अनलनि। दरबज्जा पर अबिते सुमित्रा रुमाकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँ, झब दे चाह बनौने आउ। हम अछेलालकेँ सोर पाड़ै छी।’’
रुमा चाह बनबै गेली। सुमित्रा अछेलालकेँ सोर पाड़ै गेली। जरना ले अछेलाल सुखल कड़ची टोनिअबैत। एकटा कड़ची तौड़ै काल चिरा गेल। ओकर काप अछेलालक ओंगरीमे लगि गेलै। उपरका चमड़ा कटि गेलै। चमड़ा क’ कटिते छड़-छड़ खून बहै लगलै। तावे सुमित्रो लगमे पहुँचली। खून बहैत देखि सुमित्रा मखनीकेँ लत्ता नेने अबै ले कहलखिन। लत्ता नेने मखनी दौड़ल आइलि। मखनी हाथसँ लत्ता ल’ सुमित्रा अछेलालक ओंगरीमे नुरियाकेँ बान्हि देलखिन। खून बन्न भ’ गेलै। टोनियेलहा कड़ची समेटि मखनी चुल्हि लग ल’ गेलि। अछेलालकेँ संग केने सुमित्रा बचेलाल लग ऐली। रुमो चाह नेने एली। सभ क्यो चाह पीबै लगलथि। चाहक चुस्की लैत बचेलाल अछेलालकेँ पूछलखिन- ‘‘कक्का, ओंगरीमे लत्ता किअए लटपटौने छी?’’
अछेलाल- ‘‘अखने कड़ची टोनिअबै छलौ कि काप लगि गेल। अपना टेंगारियो ने, जइसँ छकड़ितौ, तेँ हाथेसँ तोड़ै छलौ। खून बहै लगल तेँ लत्ता बान्हि देलिऐ।’’
बचेलालक गप सुनि-सुनि रुमाक मन असथिर होइत। मुदा तइयो आखि उठा-उठा रुमा बचेलाल दिशि देखैत। अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बच्चा, छुछे अहाँ खेतीक भार देलौ। बिना ओजारे खेती कोना करब? ने हर अछि आ ने कोदारि। ने घरमे नीक हँसुआ अछि आ ने खुरपी। ने कुड़हरि अछि आ ने टेंगारी। तखन छुछे हाथे कत्ते काज चलत?’’ गाममे देखिते छी जे ने ककरो क्यो कोनो चीज दइ अए आ ने गरीबी दुआरे सबके सब चीज छै। तखन कोना काज चलत?’’
़ अछेलालक बात सुनि बचेलाल मने-मन सोचै लगल जे साइकिलक दुआरे अपन समय नष्ट होइ अए। औजारक दुआरे अछेलाल कक्काक। मुस्की दैत सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चा, जहिना समाज परिवारकेँ आगू बढ़बैमे सहायक होइत तहिना बाधको अछि। ओना कहै ले सभकेँ-सभ नीके बात कहैत मुदा व्यवहारमे उनटा छै। अखन जइ सीमा पर ठाढ़ छह पहिने ओतै पहुँचैक उपाय करह। ओना बुझैमे नइ अबैत हेतह, मुदा छह ओइ स’ बहुत निच्चातेँ अपन सीमा स’ निच्चा कोन-कोन रास्तामे पछुआइल छह ओ बुझि ओकरा पुरबै पड़तह। जखन औझुका सीमा पर ठाढ़ भ’ जेवह तखन आगू मुहे डेग उठतह। एक भग्गू भ’ आगू डेग उठबै चाहवह ते कतौ ने कतौ लसकि जेबह।’’
सुमित्राक विचार सुनि बचेलालक मनमे आशाक टेमी भुकभुकाइल। हृदयमे मद्धिम इजोत भेल। मुस्कुराइत बचेलाल मायकेँ कहलक- ‘‘माए, तोहर बात मनमे गड़ि गेल। एखन काज करै जोकर चारि गोरे छी। दू परानी अछेलाल काका आ दू परानी अपने। तू तँ बूढ़िये भेलै। जखन स्कूलमे छलौ तखन मनमे उठल जे सब दिन पाएरे चारि कोस अबै-जाइ छीतेँ एकटा साइकिल कीनि लेलासँ अधा समय बँचत। जे समय उगड़त ओकर उपयोग आगूक काजमे करब। जाबे आगू बढ़ैक चेष्टा नइ करब तावे आगू कोना बढ़ब?’’
मूड़ी डोलबैत सुमित्रा बाजलि- ‘‘बच्चा! एखन दूटा रास्ता पकड़ैक छह। नोकरी करै छह तेँ नोकरियो आ दू बीघा खेत छह, ओहू मे जान फूकैक छह। जँ दुनू सुढ़िया क’ चलै लगतह तँ अनेरे घर उठैत देखबहक। बड़ चिक्कन बात अछेलाल बौआ कहलखुन। जाबे खेती करैक हथियार (औजार) नहि रहतह ताबे मुकाबला कोना करबहक?’’
सुमित्राक बात समाप्तो नहि भेलि कि बिचहि मे अछेलाल बाजल- ‘‘भौजी! काल्हि बेरु पहर जुगाय आबि क’ डेरिया पर बैसि रहल। हम अंगनामे बिछानक टुटल डोरी जोड़ैत रही। कने कालक बाद थूक फेकै ले उठलौ कि जुगायकेँ बैसल देखलिऐक। चोट्टै आंगन घुरि चक्का पर से तमाकुल चून ल चुनबैत डेढ़िया दिशि बढ़लौ। जुगाइक सुखल मुह देखि पूछलिऐ जे भाय किमहर-किमहर ऐलह? बड़ मन्हुआइल देखै छियह? किछु बजैक हिम्मते ने वेचारे के होय। तमाकुल देलियै। अपनो खेलहुँ। तमाकुल मुहमे लेलाक बाद जना बजैक हूबा भेलै। कहलक- ‘‘अछेलाल भाय, कहैक तँ साहस नहिये होइ अए मुदा तोहूँ कोनो बिरान नहिये छह, तेँ कहै छियह। देखबे करै छहक जे समय कते दुरकाल भ’ गेल अछि। ल’ द’ क’ चारि बीधा खेत छल। भगवान तीनिटा बेटी देने छथि। जेठकीक बिआह ते बाबूए सोझामे भेलै। दूटा बँचल। मैझलीक विआहमे सोमनसँ रुपैया कर्ज लेलहु। आशा छल जे खेतक उपजासँ कर्जा सठा लेब। मुदा पैछला तीन साल केहेन भेल से त’ बुझले छह। रुपैआ नइ देल भेल। एक दिन सोमन तना ने बजै लगल जे खिशि चढ़ि गेल। मनमे आइल जे एक्को घुर खेत बँचे वा नहि मुदा पाँच दिनक भीतर ओकर रुपैआ द’ देबै। मनमे तामस रहबे करै, डेढ़ बीघा खेत सस्तेमे बेचि क’ रुपैआ द’ देलियै। आब अढ़ाइये बीघा खेत बँचल अछि। छोटकी बेटी पनरह-सोलह बर्खक भ’ गेलि अछि। तेँ विआह करब जरुरी भ’ गेल अछि। कथा ठेमाइल अछि मुदा बिना खरचे दिन-ठेकान कोना करब? तेहेन भूत लोककेँ लगल छै जे सबके मचोड़ि-मचोड़ि खाइत अछि। सूदी रुपैआ लैत डर होइ अए। तेँ तोरा लग एलौ जे रुपैआक कोनो जोगार लगा दाय। जुगाइक बात हृदय क’ पघिला देलक। मुदा गरीबक हृदय पिघलनहि की? अपने त’ तेरह दण्डक संकराति बीतै अए तखन दोसरक मदति की करबै? मुदा मन आयल जे बचेलाल तँ नोकरी करै छथि तेँ हुनके कहबनि । समाजक बेटी आ अपना बेटीमे की अंतर होइ छै? जाबे विआह-दुरांगमन नइ भेल रहै छै ताबे माए-बापक समाजमे बेटी रहै अए, तकर पछाति त’ सदाके लेल चलि जाइत अछि।’’
अछेलालक बात ध्यानसँ सुनि बचेलाल मूड़ी गोति विचारै लगल। समाजमे हम नोकरी करै छी। रुपैआ कमाई छी। समाजोक तँ आशा हमरा कमाईमे छैक। अगर रुपैआ हम नहियो देबै तइयो कोनो ने कोनो तरहे विआह भइये जेतै। मुदा हमरा की बुझत? हमरा प्रति कत्ते घृणा बेचाराकेँ हेतै। जाबे जुआन बेटी ककरो घरमे रहै छै ताबे माय-बापक हृदय तिल-तिलकेँ जरैत रहैत छैक। ऐहन समयमे मदति मदति नहि जिनगीक पैघ बोझ उताड़ब हैत। हमर रुपैआ बैंकमे अछि। सुदिये कत्ते देत? जत्ते सुइद देत तइसँ बेसी महगी बढ़तै जइसँ रुपैआक मोले (अंसनम) कमतै। तखन तँ मूड़ोसँ कम भेटत। ओइसँ नीक जे बिना सुदिये रुपैआक मदति क’ दियै। एत्ते बात मनमे अबिते बचेलाल मूड़ी उठा माय दिशि तकलक। सुमित्रो बचेलाल दिशि तकलक। दुनू गोटेक विचार आखियेसँ भ’ गेल। बचेलाल माएकेँ कहलक- ‘‘माय, चारु भर ते अभावे-अभाव देखै छी। अभावके बिना मेटौने लोक कोना आगू मुहे ससरत? व्यक्तिसँ ल’ क’ परिवार आ परिवारसँ समाज धरि सभ अटकि गेल अछि। कोना ससरत? जहिना जिनगी रुपी जमीनमे नीच जमीनमे बहैत पानि ऊँच जमीनमे नहि चढ़ि पबैत, तोहूँमे जँ माटिक आड़ि बनल रहै, तखन तँ आरो मोसकिल होइत तहिना त’ जिनगीयोमे लोककेँ होइत। जिनगी तँ हवाक गतिसँ नहि चलि सकैत जे उपर-निच्चाक भेद नहि बुझि, चलैत।’’
मुस्कुराइत सुमित्रा बचेलालकेँ कहै लगलखिन- ‘‘बड़ सुन्नर बात बच्चा कहलह। निच्चाक पाइन जखन जमा भ’ मोटाइत अछि तखन उपर चढ़ैक आशा होइत। बाधा रुपी आड़ि तोड़ै ले साधनक जरुरत होइत। अखन धरि सामाजिक रीति-रिवाज, चालि-ढ़ालि ऐहेन बना देल गेल अछि जे एकटा डेग उठाउ तँ दोसर लसकत आ दोसर उठाउ त’ तेसर लसकत। मुदा धैर्य आ साहसक आवश्यकता सभकेँ अछि। एक स्थान पर ठाढ़ भ’ वा बैसि देखलासँ दूर धरि देखि पड़ैत, मुदा बातके गौरसँ बुझै पड़त जे जहिना आखिसँ निकलैत ज्योति पहिने लगसँ देखैत दूर तक देखैत अछि। सबसँ पहिने मनुक्खकेँ अपने देखै पड़तै। जँ अपनाकेँ देखि लेत तखन दुनिया देखैत रास्ता भेटतैक। जखने दुनियाक रास्ता पर चलब शुरु करत, तखन थाल-खिचार छोड़ि सक्कत माटि पर पैर पड़तै। अखन तोरा सोझामे तीनि तरहक काज उपस्थिति भेलि छह। पहिने अपना ले साइकिल कीनि लाय। जइसँ शरीरोक रकछा हेतह आ समयोक बचत। दोसर खेतीक सब समचा कीनि लाय।’’
मायक बात सुनि बचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका, काल्हि शनि छी। जेँ एत्ते दिन खगल तेँ एक दिन आरो खगह। हमहुँ जे एत्ते दिन पाएरे स्कूल गेलौ तेँ एक दिन आरो जायब। परसू रवि छी। छुट्टियो रहत। दुनू गोटे सबेरे जलखै क’ बाजार चलब। साइकिलो कीनि लेब आ खेतिओक सब ओजार। जुगाइयोक बेटीक विआहमे मदति क’ देबै। जे रुपैआ बैंकमे अछि ओ सब उठा परिवारसँ समाज धरिमे उपयोग क’ लेब। एक परिवारकेँ आगू बढ़ने तँ समाज नहि अगुआइत। समाजकेँ अगुुआइक लेल सब परिवार क’ अगुआइ पड़त। जहिना एकटा इंजन बड़का-बड़का कोठरीकेँ जोड़ि अपना गतिमे चलवैत अछि तहिना जँ समाजोके रास्ता पर आनि खिंचल जाय तँ ओहो ओहि गतिसँ जरुर चलत।’’
बचेलालक बिचार सुनि सुमित्रा बाजलि- ‘‘बौआ, तू साइकिल कीनिवह। अपने तँ एक्के बेर इस्कूल जेवह ऐवह। मुदा तकरबाद तँ साइकिल घरेमे पड़ल रहतह। तेँ समाजमे ककरो साइकिलक जरुरी हेतै तँ ओकरो दिहक। अपनो काज चलतह आ दोसरोक चलतै। जहिना पहिलुका लोक पोखरि खुनबै छला। जहिसँ अपनो काज होइत छलै आ समाजोक होइ छलैक। जाधरि समाजमे प्रेम नहि बढ़त, एक-दोसरकेँ मनुक्ख बुझि मदति नहि करत, ताधरि समाज लड़खड़ाइते रहत। जखन सब-सबहक लेल देह से ल’ क’ चीज धरि स’ ठाढ़ हैत, तखन समाज निश्चित आगू मुहे ससड़त। जहिसँ सबहक कल्याण हैत। जुगाइक बेटीक विआहमे रुपैआ जरुर दिहक। ओ जँ खेत भरना दिअए चाहतह तँ ओकरा कहि दिहक जे खेत बटाई वैह करै। वेचारा सुदियोसँ बँचि जायत आ उपजो हेतै। ओकरो तँ परिवार छै। ओहो तँ अन्ने खेतै।’’
साँझू पहर जुगाय अछेलाल ऐठाम आयल। अछेलाल सब काज सहिआइर पोखरि दिशि जाइक विचार करैत। जुगायकेँ देखि अछेलाल कहलक- ‘‘जुगाय भाय तोहर काज सुतरि गेलह। जखनसँ तू कहलह तखनसँ मनमे खुटखुटी पकड़ि लेलक। मुदा ककरोसँ कोनो बात करैक समय होइ छै। समय पाबि बचेलालकेँ कहलिएै। वेचारा मानि गेल। ओ तोरा रुपैआ सम्हारि देथुन। तोँ निश्चिन्त भ’ विआहक दिन-ठेकान करह।’’
अछेलालक बात सुनि जुगाय बाजल- ‘‘भाइ, अखनो दुनियाँमे नीक लोकक कमी नइ छै। जे अनका बेर पर ठाढ़ हैत, ओकरो बेर पर भगवान ठाढ़ हेथिन। हमहू तँ अपना मुहे हुनका (बचेलाल) किछु ने कहलिएनि। संगे चलह। अपने स’ कहबनि।’’
अछेलाल बाजलि- अखन तोरा कहैक काज नइ छह। नीक हेतह जे परसू रविदिन संगे बजार चलि रस्तेमे सब गप्प करब।’’
‘‘बड़बढ़िया भाय।’’ जुगाय कहि विदा भ’ गेल।
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जिनगीक जीत:ः 6
देवन क’ पाबि दीनमा आ भुखनी वेहद खुशी भेल। भुखनी क’ मनमे आयलि जे कमाइबला बेटा भगवान पठा देलनि। मनमे एकटा पैछला बात एलै। हमरा स’ एक दिन पहिने दुखनीक जनम भयलै बच्चेसँ दुनू गोड़े संगे रहबो करै छलौ आ खेलबो करै छलौ। जब कने नमहर भेलौ तब संगे पत्तो बीछी, गोबरो बीछि-बीछि आनी आ चिपड़ियो पाथी। धासो छिलै जाय आ बकरियो चरबी। बाधमे रखबारक खोपड़ी लग बैसि चैरखियो-चैरखी खेली। खेसारी मासमे, अंगनेसँ नून लेने जाय आ खेसारी मूड़ीक झक्खो बना-बना खाय। आमक जखन टुकले होय तखनेसँ बीछि-बीछि खाय। अंगने स’ चून पत्तामे लेने जाय आ खटहो आममे लगा दियै त’ ओहो खट्टा नइ लागे। जब ढेरबा भेलौ तब माइयेक संगे धानो-गहूम काटी आ लोढ़बो करी। खेसारियो मौसरीक बोइन करी। किछु दिनक बाद धानो-मड़ूआ रोपै लगलौ।
हमरासँ पाँच बरख पहिने दुखनीक वियाह भेलै। ओ सासुर बसै लागलि आ हमर वियाहो ने ताबे भेलि। दुखनीक बेटो ढेरबा भ’ गेलै, हमर लिधुरिये अछि। मुदा भगवान हमर दुख बुझलनि। कमाईबला बेटा अनासुरती पठा देलनि। दीनमा बुझैत जे बाँहि पूरैबला समांग भ’ गेल। दुनू गोड़े संगे खेतो तामब आ धानो-मड़ूआक रोपैन करब। एक जनक बोनि त’ बेसी हैत। जँ कहीं गिरहस्त, बच्चा बुझि देवनकेँ नइ अढ़ौत ते काजे ठीक्का ल लेब। अपने कने बेसी भीड़ पड़त त’ एकटा बोइनो बेसी हैत। तीनिटा कमेनिहार भेलौ। आब कोनो चीजक दुख नइ हैत। कपारमे जाबे दुख लिखल छल ताबे कटलौ। आब सुखक दिन आबि गेल।
पूस-माधक जाड़, दीनमा आ भुखनी कोना बितवैत रहय, देवन गौर स’ देखै लगल। ने घरमे सीरक आ ने एक्कोटा कम्मल। फाटल-पुरान साड़ी-धोती पहिर दुनू परानी दीनमा दिन वितवैत पहिलुका गुदरी-चेथरी साड़ी-धोती सरियाकेँ साटि, ओकरा सीबि सुजनी बनौने। वैह ओढ़ैत रहय। जइ दिन बेसी जाड़ होय तइ दिन अखरे पुआर पर सुति बिछानो ओढ़ि लियअ। सात हाथक एक्केटा घर तहिमे सब तूर हँसी-खुशीसँ रहैत। ओही घरमे भानसो होय चीजो सब रखै आ सुतबो करै। एक भाग भानस करैक चुलही, दोसर दिशि विछान आ बीचमे करसीक (सुखल गोबर) घूर लगबै। ओना घर गरम रहैक नीक व्यवस्था मुदा बिना लेबल टाटक घर रहने, चारु दिशिसँ ठंढ़ आबि घरो केँ पाइन जेँका ठंढ़ा क’ दैत। रातिमे जाबे भानस होय ताबे धिया-पूताक संग दीनमा घूर तपै।
एक दिन भोरहरबामे पछिया हवा चललै। दीनमाक दुनू पाएर (ठहुनसँ निच्चा) उघारे रहै। ठंढ़ी हवासँ दुनू पाएर कठुआके सुन्न भ’ गेलै। दीनमाक निन्न टूटल। ओछाइनसँ उठि वाहर जेबाक मन भेलै। जहाँ उठै लगल कि पाएर सोझे ने होय। उठि क’ बैसि पाएर टोबै लगल। ठेहुनसँ उपर बुझे आ निच्चा किछु बुझबे ने करैत मने-मन दीनमा सोचै लगल ऐना किअए भेल? जँ ठहुनसँ निच्चा पाएर दुइर भ’ जायत तँ चलब कोना? डरे दीनकाक छाती धक-धक करै लगल। घरवालीकेँ उठौलक। मुह उधारिते भुखनी कहलकै- ‘‘बड़ कन-कन्नी अछि, मुह झाँपिकेँ सुइत रहू।’’ कहि अपन मुह झाँपि लेलक। मुह झँपैत देखि दीनमा जोरसँ कहलकै- ‘‘हमरा पाएरमे भरिसक साँप काटि लेलक। सुन्न बुझि पड़ै अए।’’
सापक नाम सुनिते भुखनी धड़फड़ा क’ उठल। उठिके चुलही लग राखल छोलनी ल’ पाएरमे भिरा पूछलक- ‘‘केहेन लगै अए। की भीरौने छी?’’
दीनमा जवाब देलक- ‘‘आँखिसँ ते छोलनी देखै छी मुदा भिरल नइ बुझि पडै अए।’’
छोलनी राखि भुखनी बिठुआ कटैत पूछलक- ‘‘केहेन बुझि पड़ै अए?’’
दीनमा- ‘‘किछु बुझवे ने करै छी।’’
अखियास करैत भुखनी पूछलक- ‘‘छुछुनैरो-तुछुनैरोक बोली सुनलिएहेँ मध्यम तामससँ दीनमा कहलक- ‘‘से हम जगले छलौ। अखैन नीन टुटल ते उठिये ने भेल। तब बुझलियै।’’
मने-मन भुखनी बजै लागलि- ‘‘हे भगवान ऐहेन समैमे कोन दुख पठा देलह। दुखे पठबैके छेलह ते दिन-देखार पठैबतह। एत्ती रातिमे हम की करबै। हे भगवान कन्ना पार-घाट लागत।’’
भुखनीकेँ आहि-आलम करैत देखि दीनमा कहलकै- ‘‘अगियाशी करु। पछवा बहै छै। भ’ सकै अए ठंढ़ी लागि गेल हुअए।’’
ओछाइन पर पड़ल-पड़ल देवन सभ बात सुनैत। चुलहीसँ भूमहूर बला आगि निकालि भुखनी घूर पजारै लगल। शीताइल जरना रहने घूर पजरवे ने करै। धुँऐ बेसी होय। धुँआक दकसँ खोंखी करैत देवनो उठल। घरमे धुँआ भरि गेलै। धुँआ दुआरे कोइ किछु देखवे ने करै। देवन भुखनीकेँ कहलक- ‘‘मौसी! ओछाइनेक पुआर ल’ के घूरमे देही।’’
हथोरि के भुखनी एक मुट्ठी पुआर निकालि घूरमे देलक। धुँआ दुआरे भुखनीकेँ तते खोंखी होय जे फुकले ने होय। तरे-तर दीनमाकेँ तामस उठै। मनमे होय जे एहि मौगियाके दू घरमेचा दुनू कनगोजमे लगा दी। हम उठैबला नइ छी अइ मौगियाके कोनो लूरिये ने छै। मुदा फेरि होय जे एकटा दुख तँ लधले अछि, दोसर बेसाहनाइ नीक नै हैत। तेँ चुप्पे छल। घूर धधकलै। धुँआ सब हवाकेँ चाटि गेलै। घूर धधैकते शीशीमे सँ भूखनी तरहत्थी पर करु तेल लेलक। दुनू तरहत्थीमे मिला, आगिमे ताव लगा, दीनमाक ठहुनमे रगड़ै लागलि। कने कालक बाद दीनमाकेँ ठेहुनक गिरह हल्लुक भेलै। ठेहुन हल्लुक होइते दीनमा पाएर मोड़लक। अपने हाथे पाएरक गिरह टोवै लगल। पाएर टोबि दीनमा भूखनीकेँ कहलक- ‘‘कने डिबिया तेल आ करुतेल मिला तरबा रगड़ि दिअ।’’
डिबिया तेल आ करुतेल मिला भुखनी पतिक तरबा रगड़ै लागली। तरबा क’ रगड़िते दीनमाक झुनझुनी छुटि गेल। मन हल्लुक होइते दीनमा उठिके बहार भेल। बहारसँ आबि भुखनीकेँ कहलक- ‘‘जाड़क सुख धनीक लोककेँ होइछै। गरीब-गुरबाक हिस्सामे अनेरे भगवान जाड़ देने छथिन।’’
बसन्तक आगमन भेल। काल्हिये सरस्वती पूजा सेहो छी आ किसान सब हर ठाढ़ सेहो करत। समय सेहो गरमाइ लगल। छोट दिन सेहो रसे-रसे नमहर हुअए लगल। कत्ते हरवाह (हरजोतिनिहार) गिरहत बदलैक विचार क’ नवका (दोसर) गिरहत ठेमौलक। दीनमा ऐठाम सेहो कैकटा गिरहत आबि हर जोतै ले कहलक। मुदा दीनमा ककरो ने गछलक। किऐक तँ वसन्त पंचमीमे जे हरवाह जइ गिरहतक हर ठाढ़ करैत ओकरा सालो भरि हर जोतै पड़तैक। बन्हुआ काज दीनमाकेँ पसिन्न नहि। छुट्टा रहने बोनिहार स्वतंत्र भ’ काज करैत। जइ ठाम काज करैक मन हेतै तइ ठाम काज करत, बोइन लेत। अखन धरि गाममे यैह प्रथा चलैत जे हरबाहकेँ पाँच कट्टा खेत बटाई करैै ले भेटैत छल। मुदा एहिवेर अदहा लोक पंजाब-दिल्ली चलि गेल तेँ हरवाहक मंहगी भ’ गेलै। हरबाहि करैबला सब अपनामे विचारि लेलक जे हरबाहिक बोइन एक अढ़ैया (कच्ची) सँ बढ़ा पाँच किलो बोइन लेब नहि तँ हरबाहि नहि करब। संगे बटाई खेतक उपजा अदहा नइ दबै। तिहाइ देबै तइ पर जँ किसान तैयार हुअए त’ बड़बढ़िया, नइ तँ अपन-अपन हर अपने जोतह।
दश वरिससँ भुटकुमरा राधाकान्तक हर जोतैत अबै छल। ऐबेर हर ठाढ़ करैसँ तीन दिन पहिने जबाव द’ देलक। हर ठाढ़ होइसँ एक दिन पहिने राधाकान्त भुटकुमरा ऐठाम आबि हर ठाढ़ करै ले कहलक। भुटकुमरा हर ठाढ़ करैसँ इनकार करैत कहलक- ‘‘गिरहत पाँच किलो बोइन लेब। सब हरबाह अपनामे बैसि निर्णय केलक। जँ पाँच किलो हरबाही बोइन देवै तखन ते हर ठाढ़ करब, नइ तँ नहि ठाढ़ करब।’’
भुटकुमराक बात सुनिते राधाकान्तक उज्जर आँखि लाल हुअए लगल। मुदा अपनाकेँ सम्हारैत राधाकान्त कहलक- ‘‘गामक जँ सब गिरहत पाँच किलो बोइन तौलत तँ हमहू देबै। जँ से नहि देत त’ असकरे हमही किऐक देबै।’’
राधाकान्तक बात सुनि भुटकुमरा उत्तर देलक- ‘‘आन गिरहत आ आन हरबाह जे करै, मुदा हम पाँच किलो बोइन लेबे करब। जँ से नइ देब त’ हरबाहि नइ करब।’’
हरबाहि नइ करब सुनि राधाकान्त आगि-बबूला होइत भुटकुमराकेँ कहलक- ‘‘अगर सब गिरहत पाँच किलो देत त’ हमहू देवह। जँ नहि देत हमहूँ नहि देबह। मुदा काल्हि पाबनिक दिन छी तेँ हर ठाढ़ करबे करिहह।’’
भुटकुमराक मनमे एलै जे ई गिरहत सबहक चलाकी छी। जखने हर ठाढ़ करब तखने बन्हा जायब। जखने बन्हा जायब तखने बलजोरी, पनचैती बैठा, हर जोतेबे करत। तेँ अखुनके फरियेलहा नीक रहत। मुह चोरौने काज नै चलत। खुलिके खेलाइये पड़त। दृढ़ भ’ भुटकुमरा कहलक- ‘‘क्यो बोइन दइ वा नइ दइ, मुदा हम पाँच किलो नेने बिना हर ठाढ़ किन्नहु नहि करब।’’
भुटकुमराक सक्कत बोली सुनि राधाकान्त अकड़िकेँ कहलक- ‘‘क्यो किछु करे, मुदा तोरा पुरने बोइन पर हर ठाढ़ करै पड़तह जँ नहि करवह तखन बुझल जेतै।’’
जहिना राधाकान्त कठोर होइत बाजल तहिना भुटकुमरो कहलक- ‘‘अइं भागक सुरुज ओइ भाग किअए ने उगै मुदा भुटकुमरा अपन बात कोनो हालतमे बदलि नहि सकै अए।’’
तेबर वदलैत राधाकान्त कहलक- ‘‘हर नइ ठाढ़ करवह त’ हमर करजा चुका दाय। तोहू घर हमहू घर। जाबे करजा नहि चुकेबह ताबे गट्टा पकड़ि हर जोतेवे करवह।’’
भुटकुमरा- ‘‘बहुत गट्टा पकड़िनिहारकेँ देखलिऐ जँ तोरा हिम्मत हुअ-अ त’ गट्टा पकड़िके देखि लिहह। मरदक गट्टा छियैक मौगीक नहि।’’
राधाकान्त- ‘‘बड़बढ़िया, हर नहि ठाढ़ करैक मन छह ते नहि ठाढ़ करिहह। मुदा हमर करजा तँ देवह। चलह हमरा ऐठाम। बहीमे जत्ते लिखल हैत तत्ते द’ दिहह। तोहूँ घर हमहू घर।’’
राधाकान्तक बात सुनि भुटकुमराक मनमे एलै जे जँ कहीं ओइठाम जाय आ सब समांग मिलिके मारे। तखन ते नाहकमे मारि खा जायब। गुनधुन करैत भुटकुमरा कहलक- ‘‘एतै बही नेने आबह। जे बाकी हैतै से द’ देबह।’’
राधाकान्तक मनमे आयल जे जँ ऐठाम बही ल’ के आबी आ छीनिके निशान फाड़ि दियै, तखन तँ सब चैपट भ’ जायत।
दुनू गोटेमे गप-सप चलिते छल कि भुटकुमराक बेटा गुलेतिया पंजाबसँ आयल। तीनि साल पहिने गुलेतिया मामा गामक लोक सबहक संग दिल्ली गेल। दिल्लीमे नोकरी भेबे ने केलै। पनरह दिन घुरि-फिरि दिल्लीमे ठमौलक। मुदा कतौ गर नहि देखि पंजाब विदा भेल। गाड़ियेमे एकटा नवयुवक पंजावी सरदार जीसँ भेटि भेलै। सरदारजी दिल्लीमे पढ़ैत। ओहि सरदार जीक संग गुलेतिया पंजाब गेल। ओहि युवक सरदार जीक पिता सुभ्यस्त गिरहस्त। जहिना खेती-बाड़ी तहिना मालो-जाल। ओहिठाम गुलेतिया रहि गेल। पंजाब जेवा काल गुलेतिया कोनो चिन्हरवासे भेटि नहि केने रहै। अनका मने गुलेतिया हरा गेल। क्यो कहै जे गाड़ीमे चप्पा पड़ि गेलै ते क्यो कहै चोरीमे पकड़ा गेल। एखन जहलमे अछि। क्यो कहै अरब चलि गेल त’ क्यो कहै दलाल ठकिके बेचि लेलकै। क्यो कहै क्रिमिनलक गैंगमे अछि ते क्यो कहै पाॅकेटमारी करै अए। मुदा भेटि ककरो ने होय। जना-जना दिल्लीक लोक गप्प उड़बै तहिना-तहिना गामोमे समाद अबै। रंग-बिरंगक गुलेतियाक समाचार सुनि दुनू परानी भुटकुराक कान बहीर भ’ गेलै। सालभरि जखन भ’ गेलै आ गुलेतियाक कोनो चिट्ठी-पुरजी वा रुपैआ गाम नहि ऐलै तखन माइयों बाप छातीमे मुक्का मारि सबुर क’ लेलक। जइ सरदार ऐठाम गुलेतिया रहै छल ओ साझू पहरके गुलेतियाके खिस्सा-पिहानीसँ ल’ क’ खेती-पथारी, परिवार-कुटुम्ब सबहक संबंधमे कहै। मने-मन गुलेतिया तय क’ लेलक जे ने नोकरी करै ले दोहरा क’ आयब आ ने घर रुपैआ पठाएब। जइ दिन बुझि पड़त जे अपन कारबार ठाढ़ करै जोकर कमा लेलै तइ दिन सब हिसाब-बारी क, रुपैआ ल’ गाम चलि जायब। सैह केलक। गुलेतियाके देखि भुटकुमरा चिन्हबे ने केलक। पंजाबी पैजामा-कुरता, हाथमे काड़ा, खूब नमहर-नमहर केश-दाढ़ी गुलेतियाके रहै।
दरबज्जा पर अबिते गुलेतिया झोरा, एटैची राखि भुटकुमराकेँ गोड़ लगलक। माथ ठोकि भुटकुमरा आसिरवाद तँ द’ देलक, मुदा चिन्हलक नहिये। एक बेर मनमे एलै जे गुलेतिया ने ते छी, फेरि भेलै जे ओ त’ मरि गेल। राधाकान्त गुलेतियाकेँ देखि ससरि गेल। ताबे गुलेतियाक माइयो अंगनासँ मुह झपनेहि निकलि ओलती लग ठाढ़ भ’ गेलि। तरे-तर गुलेतिया हँसबो करैत आ चुप-चाप ठाढ़। टोलक धिया-पुता सभ हल्ला करैत- ‘‘हींगवला एैल, हींगबला एैल।’’ बजैत जमा हुअय लगल।
थोड़ै कालक बाद, अचताइत-पचताइत भुटकुमरा गुलेतियाकेँ पूछलक- ‘‘बौआ, अदहा-छिदहा चिन्हवो करै छिअह आ नहियो चिन्है छिअह, तेँ ठीकसँ अपन चिन्हारै दाय?’’
मुस्कुराइत गुलेतिया-पिताकेँ कहलक- ‘‘गुलेतिया छिअह।’’
गुलेतिया नाम सुनिते भुटकुमरा हक्का-बक्का भ’ गेल। आखिसँ नोर टघरैत, माय दौड़ल आबि दुनू हाथे भरि पाँजके पकड़ि छाती लगौलक। जना तेज हवाक बीच घनघोर बरखा होइत काल, उपरसँ ठनका खसैत आ पृथ्वीमे भूमकम होइत, तहिना भुटकुमरा ऐठाम बुझि पड़ै लगल। गुलेतिया मात्र पाइयेटा कमा क’ नइ अनलक। ओ अनलक जिनगी जिवैक ढेरो लूरि, ओ अनलक संकल्प, ओ अनलक कठिन मेहनत करैक उत्साह, ओ अनलक परिवार रुपी मोटा क’ उपर फेकैक उदे्ष्य।
राधाकान्त सोझे घर दिशि चलल। मनमे एलै जे, की आइ वेइज्जत भेलौ? प्रश्न उठितहि जबाव फुरलै इज्जत छीयै धन। तखन बेइज्जत कोना भेलौ। जँ ओकरा अपना हाथसे पाँच किलो बोइन तौलि देबै तखन ने बेइज्जती। मनमे हँसी उठलै- जे करजा तरमे दाबल अछि। दावल मात्र लेलहे नहि, ओकर जिनगी करजेक रास्तासँ चलैत अछि। तखन पानिमे रहि मगर से बैरि।
आन सालक हिसाबे अइ साल दीनमा दोबर खेत तमिया केलक। सरस्वती पूजा दिनसँ दीनमा खेत तमनीमे हाथ लगौलक जे वैशाखक जानकी नवमी दिन धरि तमैत रहल। तमनी त’ किछु दिन आरो चलितै मुदा बिहरिया हाल नइ भेने खेत सब सक्कत भ’ गेलै, तेँ छोड़ि देलक। आन सालसँ बेसी गरमी अइ बेर बैशाखेमे पड़’ लगलै। दीनमा घरसँ थोड़े हटि, बीच बाधमे एकटा आमक गाछ रहै। ओ गाछ जेहने नमहर तेहने झमटगर। सब तूर दीनमा ओहि गाछक निच्चामे वैशाख-जेठक रौद बितबैत। अखार चढ़िते घनघनौआ बरखा भेल। बरखाक आनंद, सभतूर दीनमा, बांधेमे लेलक। बरखाक आनंद लइ काल दीनमाक मनमे एलै अनेरे भगवानकेँ लोक बेइमान कहैत छनि। जँ ओ बेइमान रहितथि त’ एते आनन्द गरीब-गुरबाकेँ किऐक दितथिन्ह।
असकरे देवन वैसि मने-मन जोड़ै लगल जे साल लागि गेल। आब ऐठाम एक्को दिन नहि रहब। जँ एक्के ठाम रहि समय बिताएब तँ दुनिया कोना देखि पाएब। ककरोसँ किछु कहनहि बिना देवन नवटोल सँ विदा भ’ गेल।
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जिनगीक जीत:ः 7
नवटोलसँ देवन विदा भ’ गेल। देवन रस्तो कटै आ मने-मन सोचवो करै जे अगिला केहेन गाम हैत। दू तरहक विचार देवनक मन क’ घेरने। एक तरहक विचार होय जे आगूक मतलब नीकमे आगू आ दोसर तरहक विचार होय जे अधलामे आगू। फेरि मनमे उठलै जे नीकमे आगूक मतलब सेहो दू तरहक होइत। एकक मतलब होइत देहक सेवामे आ दोसरक होइत आत्माक (बुद्धि विवेक) सेवामे। फेरि मनमे उठलै आत्मा त’ प्रकाश स्वरुप होइत। तखन बिनु प्रकाषे होइत की? तहिना अधलो दू तरहक होइत। जकर आधार होइत, जाति, धरम आ धन। जना कोनो गाममे उच्च जाइतिक बोलवाला होय, तँ नीच जाइतिक लेल अधला भेलै। तहिना नीच जातिक बोलवाला बला गाम उच्च जातिक लेल अधला भेलै। तहिना धरमो आ धनोक आधारसँ होइत। बच्चा देवन जत्ते सोचै चाहै तते ओझराइल जाय। उम्मस रहने जना लोकक मन औल-बौल करैत तहिना देवनोकेँ होइत। रास्ता दिश धियाने ने रहलै। पैछला जना सभ कुछ विसरि गेल हुअए आ अगिलाक दरबज्जे बन्न देखै।
देवन बैसि रहल। मनमे कोनो विचार उठबे ने करै। सरदक समय रहने सुरुजेक किरिणिक रंग निन्नो आवि गेलै। मनमे किछु रहबे ने करै तेँ देह हल्लुक रहै । निन्नकेँ खुजल दरवाजा भेटिलै। देबनक देहमे घोसिया गेल। रस्ते पर देवन सुति रहल। बुद्धि-विवेक तँ पहिनहि सँ बच्चे छल, मायक कोरामे सुरुजक गरमी भेटिलै, निभेर भ’ सुति रहल। मुदा छोटके निन्न छलै। ज्ञान त’ जगलै मुदा देह पड़ले रहै। जना क्यो ज्ञान क’ कहलकै- ‘‘हइअ बटोही, सुतने रस्ता कटतह जे दुनिया देखवह। तेहेन बाधमे सुतल छह जे, खेतक आड़ि सबमे सापक बिल देखै छहक। जल्दी उठि क’ रास्ता नापह नइ ते साप आबि क’ धैय लेतह। पड़ले रहि जेवह।’’
देवन उठि क’ बैसल। चारु भर आखि उठा क’ तकलक। निनाइल आखि रहने साफ-साफ किछु ने देखलक। दुनू हाथसँ दुनू आँखि मीड़ि आंगुरसँ काँची निकाललक। काँची निकलिते फरिच्छ देखै लगल। उठि क’ ठाढ़ भेल। आगू बढ़ल। किछु दूर आगू एकटा गाम नजरि पड़लै। काते स’ हियासै लगल जे गाम नमहर अछि, की छोट? जत्ते गामक लग पहुँचैत जाय तत्ते आखि झलफलाइत जाय। गाम नमहर अछि की छोट, बुझिये ने पड़ै। दछिनवारि भाग देखलक जे एकटा खूब नमहर कोठा झलकै छै। खूब नमहर-नमहर तारक गाछ सभ सेहो छै। एक टकसँ देखि देवन उतरवारि भाग तकलक तँ देखलक कत्ते खुलोमे आ कते गाछक नीचोमे, दश-बारह हाथ नमती आ चारि-पाँच हाथ चैड़गर टाटकेँ मोड़ि घर बनौने। अदहा छिदहा खजूरक गाछ आ अदहा-छिदहा लताम, नेबोक गाछ बुझि पड़लै। देवन देखबो करै आ चलवो करै। गाम पहुँच गेल।
गाम पहुँचते देवन देखलक जे रास्ताक दहिना भाग एकटा औरत बताहि जेँका बगए बनौने, पाँच बर्खक बेटाकेँ कहैत- ‘‘इस्कूल जेमे की नै?’’
कुही भ’ भ’ कनैत बेटा कहलकै- ‘‘मरि जेबो मगर उसकूल नै जेबौ। माहटर सहायब अपनोसँ नमहर ठेंगा ल’ क’ मारै-इये।’’
बेटाक बात पर ध्यान नहि द’ माय (बुधनी) पुचकारि क’ कहलकै- ‘‘बौआ, नै पढ़मे ते वियाहो ने हेतौ।’’
‘‘नै हैत ते नै हैत।’’
माय-बेटाक बात देवन ध्यानसँ सुनवो केलक आ सोचबो केलक। रास्तासँ उतड़ि देवन बुधनीक अंगनाक बाट धेलक। डेढ़िया पर पहुँचते बुधनी देखलकै। देखिते बुधनी देवनकेँ पूछलकै- ‘‘बौआ, कत-अ रहै छह।’’
परिचित जेँका देवन उत्तर देलक- ‘‘हमरा गाम-ताम नइ अए। जत्ते मन-फुड़त रहि जायब।’’
छगुन्ता मे पड़ि बुधनी सोचै लगली। कहै अए गाम-ताम नै अए। कोराक बच्चा झूठ बाजत? माय-बाप त’ जरुर हेतै। फेरि मनमे एलै जे मनुक्खो त’ माले-जाल जेँका जिनगी बितवै अए। बगए-बानिसँ अनाथ बच्चा जेँका बुझि पड़ै अए। ने किछु खाइ ले छै आ ने भरि देह बस्तर देखै छी। पुनः बुधनी पूछलक- ‘‘माए-बाबू कत्त’ छथि?’’
निधोख भ’ देवन उत्तर देलक- ‘‘दुनू गोटे मरि गेेल। असकरे छी।’’
असकर सुनि बुधनी पूछलक- ‘‘ऐठाम रहबह?’’
मुस्कुराइत देवन कहलक- ‘‘हँ, रहब। मगर जहिया मन हैत तहिया चैल जायब।’’
देवनक बात सुनि बुधनी मने-मन सोचै लागलि। मनमे एलैनि हमहू त’ असकरे छी। आदमीक जरुरी हमरो अछि। जँ कने समरथ रहैत त’ खेतियो-पथारी करैत, मुदा तइयो तँ पुरुखे छी। कहलक- ‘‘बौआ, एत्तै रहि जाह।’’
देवनो रहै ले तैयार भ’ गेल। देवनकेँ राजी देखि बुघनी पूछलक- ‘‘रातिमे खेने छेलह कि नै।’’
देवन कहलक- ‘‘हँ, खेने छलौ। अखनी भुख नै अए।’’
बुधनीक मनमे आशा जागल। जहिना कोनो फूलक गाछकँे बकरी सभ पात खा लैत, सिर्फ डारि आ गोटे आधे फूलक कोढ़ी बचल रहैत, जे समय पाबि खिल उठैत, तहिना भेल। घर स’ विछान निकालि बुधनी देवनकेँ बैइसै ले बिछा देलक। देवन आ रमुआ (बेटा) बैसल। बुधनी अंगनाक काजमे लागि गेलि।
देवन रमुआकेँ पूछलक- ‘‘बौआ, बाबू कत्त’ गेलखुन?’’
रमुआ उत्तर देलक- ‘‘बौअ मैर गेल।’’
रमुआक बात सुनि देवनक मनमे एलै जे बपटुगर जेँका नै बुझि पड़ै अए। मुदा झूठ तँ नै कहने हैत।
वासन-कुसन अखारि, चुल्हि लग जारन राखि, पानि भरि बुधनी देवन लग आबि वैसि गेलि। बुधनीकेँ ओछाइन पर वैसिते देवन पूछलक- ‘‘अहाँक पति कहाँ छथि?’’
पतिक नाम सुनिते बुधनीक दुनू आखि नोराइ लगल। मुहक बोली क’ सोग धकिअबै लगल। दुनू चुप। ने देवन बजैत आ ने बुधनी। मुदा दुनूक चारु आखि आगू-पाछू, उपर-निच्चा, दहिना-वामा भागो देखै आगू बढ़ि एक ठाम भ’ गेल। एकठाम होइते बुधनी कहै लगलखिन- ‘‘बौआ! पौरुकाँ सालक गप छी। अखैन ते एकोटा नांगरि नै अैछ। असकरुआ छी। खूँटा परक महीस उठल। बड़ दुधगैर छेले। अपनो सब तुर दूध खाइ छेलौ आ बेचबो करै छेलौ। हाथ-मुट्ठीमे दू-पाइ, चैर पाइ रहिते छेलै। गौँवा सब मिलिके एकटा पारा पोसने अछि हमहू पाँच रुपैआ बेहरी देने रेहियै। बड़ सहठुल पारा छै। महीस उठल ते पारा लागि गेलै। दुनू एक्केमे खेबो करै आ रहबो करै। साँझ पड़ि गेलै। अनहरिया पख। तेँ दोसरे साँझसँ अन्हार गुप-गुप वुझि पड़ै। अन्हारेमे एकटा अनठिया पारा चलि एलै। भैसीक घर पैसि पारासँ लड़ै लगलै। रमुआक बाप, एकटा भराठ ल’ क’, अनठिया पाराकेँ भगवै चाहलखिन। लड़ब छोड़ि पारा हुनके खिहारिके पटकि सींगसँ हुरा लियै लगलनि। हम जोर-जोरसँ हल्ला करी-जे हौ लोक सभ रमुआ बापके पारा खुन क’ देलकनि दौड़े जा....., जाबे लोक सब जुटल ताबे हुनका अघमौगैत क’ देलकनि। छातीक हाँड़ थकुचा-थकुचा भ’ गेलनि। राति रहै। की करितौ? भरि राति हुनके टहल-टिकोरामे बीत गेल। गाममे डाकडर नै। ओ (पति) कखनो कुहरवो करथि आ कखनो निसपरान भ’ जाथि। तखन हुअए जे परान छूटि गेलनि। हाथसँ किछु-किछु करवो करी मुदा आखिसँ तते लोर खसल जे अँचरा भीज गेल। अपनो अहलदिली पैसि गेल। भोरे खाट पर उठा श्रीबाबू डाकडर लग गेलौ। जन्तर लगा-लगा डाॅक्डर सैब देखलखिन। देखिकेँ कहलखिन- ‘‘जत्ते दिन रोगी जीयत, तत्ते दिन कष्टे हेतनि। नइ बँचत। घरे पर ल’ जैअनु जाबे जीता ताबे सेवा करवनि।’’
डाकडर सैहबक बात सुनि हमरा चैन्ह आबि गेल। भुइयाँमे खसि पड़लौ।
बड़ी काल तक किछु बुझबे ने केलियै। जखैन मन नीक भेलि तखन बुझलियै जे दू-चारि दिनमे मरि जेताह। एक्केटा पिलुआ भेल छलै। मुदा मन नै मानलक। लोको सब कहलक जे मरथुन नहि। बड़का-बड़का ओझहा गुनी सब अछि। बढ़मोतरा बला ओझहा गाछ हँकै अए। ओकरा ऐठाम ककरो पठावहक। सैह केलौ। ओझहा आयल पूजा ढारलक, भौअ खेलायल। कहलक जे ठीक भ’ जेतहुन। पान सात सय रुपैआ खरच भेल। मुदा किछु ने भेलनि। एहिना-एहिना परोपट्टामे जते धाइम, भगता, तांत्रिक अछि, सबहक ऐठाम गेलौ। खरचो माइर भेल आ छुटबो ने केलनि। सातम दिन मरि गेला। ने अपने खेती करैक लूरि आ ने माल-जाल पौसैक। महीसो चैल गेल। गाछो-बाँस उपटि गेल। आब पनरह कट्ठा खेतेटा अछि। कन्ना जिनगी चलत से बुझवे ने करै छियै।’’
बुधनीक बात सुनि देवन सोचै लागल- ‘‘हमहू तँ बच्चे छी। अनायास मनमे एलै जे सिरिफ दीदीये (बुधनी) टा त’ खेतवाली नइ अछि। गाममे बहुतो खेतवला अछि। अनके सबकेँ पूछि खेती करब। तेइ ले चिन्ता की करब?’’
समाज समुन्दर छी। दोसराक सहारा ल’ पार-घाट लगायव।’’ एते बात मनमे अबिते देवनक मुहमेँ हँसी आयल। उठि क’ ठाढ़ भेल। बाड़ी दिशि घूमै ले विदा भेल।
चुल्हि पजारि वुधनी भानस करै लागलि। घुरि-फिरि क’ आबि देवन चुल्हियेक पाछूमे बैसल। भानस भेलै। देवनकेँ वुधनी खाइ ले देलक। खाइते काल देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘अहाँ क’ हम दीदी कहब आ रमुआकेँ बच्चा।’’
देवनक बात सुनि मुस्की दैत वुधनी बाजलि- ‘‘तोरा बेटा कहबौ। तीनू गोटेक संबंध स्थापित भ’ गेल। खेलाक बाद देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी! जत्ते खेत अछि ओ बेरु पहर हमरो देखा देव।’’
कनिये दिनमे देवनकेँ संगे वुधनी अपन खेत देखबै चललि। पनरहो कट्ठा खेत तीनि कोलामे बँटल। तीनू कोला देखि दुनू गोटे घुरि क’ आंगन आयल। आंगन आबि देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, हमरा खेत तमैक लूरि अछि। कोदारि अपना अछि की नइ।’’
देवनक बात सुनिते बुधनी घरसँ बीझेलहा ठेठा कोदारि निकालने आयलि। कोदारि क’ देवन निङहारि-निङहारि देखै लगल। कोदारि राखि देवन सोचलक जे काल्हि भोरे कोदारि क’ सिलौट पर रगड़ि धरगड़ बना लेब। दुनू गोरे एकके कोदारिसँ बेड़ाबेड़ी तामब।
भोर होइते देवन कोदारि पीजवै लगल। बुधनी जलखै बनवै लगलीह। तीनू गोटे जलखै खा खेत विदा भेल। खेत पहुँच देवन तमै लगल। तमबो करै आ गोलो फोड़े। थोड़े कालक बाद देवन थकि गेल। देवनकेँ थकिते बुधनी तमै लागली। जहिना-जहिना देवन तामि गोला फोड़ैत, तहिना-तहिना बुधनियो करै लगली। फेरि थोड़े खानक बाद वुधनी थाकलि कि देवन कोदारि पाड़ै लगल। दुनू गोटे मिला दश-बारह धुर खेत तामि गोला फोड़ि अंगना विदा भेल। रास्तामे देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, कोदारियेसँ हरक काज क’ लेब। जखन पानि हेतै बीआ पाड़ि लेब।’’ देवनक विचार सुनि बुधनी सोचै लागली जे कहुना-कहुना खेती कइये लेब। जखने खेत अबाद भ’ जायत तँ नइ सोलहन्नी त’ अठन्नियो चैवन्नियो उपजा हेवे करत। अदहो-छिदहो उपजा भेने नइ साल भरि त’ छओ महिना गुजर चलबे करत। अंगना पहुँचल। अंगना अबिते बुधनी पाएर पर एक चुरुक पानि द’ घरसँ विछान निकालि छाहरिमे बिछा, देवनकेँ आराम करै ले कहलक आ अपने भानसक जोगारमे लगि गेलि।
सब दिन दुनू गोटे खेत तामै लगल। महिनो ने लगलै, सब खेत दुनू गोटे मिलि तामि लेलक। जेठ मास। रौदसँ जमीन जरै लगल।। गाछ-बिरीछक पत्ता पीअर-भ’ भ’ गिरै लगलै। इनार पोखरिक पानि किछु उड़ै लगल आ किछु अपन जान बँचवै ले पतालक रास्ता पकड़लक। तीनि बर्खक बाद एहिबेर आम फड़ल। टुकला बिछै ले देवन रमुआकेँ संग क’ सब गाछीक आम देखलक। आम देखि देवन बुधनीसँ पूछलक- ‘‘दीदी! अहाँकेँ आम गाछ नइ अए?’’
आमक गाछक नाम सुनि बुधनीक आँखिमे आँसू अवै लगलै। जेहने दुख कमाईवला बेटामुइने, उपजल जजात दहेने, देनुआर गाइक बच्चा मुइने होइत तेहने दुख फड़ैवला आमक गाछ सुखने वा बेचने होइत। करेज असथिर करैत बुधनी देवनकेँ उत्तर देल- ‘‘बौआ! आमक गाछ तँ अपनो छल मुदा विपत्ति पड़ल तँ बेचि लेलौ बुधनीक बात सुनि देवनकेँ मनमे कचोट एलै मुदा किछु बाजल नहि। मने-मन सोचै लगल जे गाममे तत्ते आम फड़ल अछि जे मास दिन कतबो लोक खाइत तइयो उगड़बे करतै। जकरा बेसी हेतइ ओ बेचवो करत। देवन पूछलक- ‘‘सबसे बेसी आमक गाछी ककरा छै?’’
‘‘नसीबलाल काकाकेँ।’’
‘‘हुनका ऐठाम बेरु पहर जायब। हुनका कहबनि जे दूटा आमक गाछ हमरा हाथे बेचि लिअ। दूटा गाछ कीनने अपनो खायब आ फजिलाहा बेचि क’ हुनकर दामो द’ देवनि।’’
मेहनतक बले नसीवलाल काका बहुत किछु अरजि लेलनि। साले भरिक जखन नसीबलाल रहथि तखने पिता मरि गेलनि। असकरे मायटा परिवारमे। छोट बच्चाक ममता मायक हृदयकेँ हिला देलक। वेचारी सासुरसँ नैहर चलि ऐली। बेटीक बगए देखि माए बताहि जेका करै लगली। मने-मन भगवानकेँ गरिऐवो करति-जे केहेन चंठ छथि। अखन बेटी खइ-खेलाइक उमेरक अछि तखन ओ विपत्तिक पहाड़ गिरा देलखिन। मुदा पतिक बात- ‘‘जहिना बेटी हमरा घरमे जनमल आ सेवा केलिएैक तहिना जाबे जीबि, ताबे करवै।’’ सँ मन असथिर भेलै। नाना-नानीक छाहरिमे नसीवलालक पालन भेल। जहिना धीपल लोहा हथौरीक चोट खा नीक वस्तु बनैत तहिना नसीवलालोक जिनगीमे भेल। बच्चेसँ नानाक संग नसीबलाल रहि काजक लूरि सीखै लगल।
नसीबलाल जुआन भेल। नाना-नानी मरि गेलनि। अपन मेहनत आ लगनसँ ओ गुजरो केलक आ खेतो कीनलक। खेतीक आमदनीसँ गाय कीनलक, घर बनौलक। गाछी लगौलक। दिन-राति अपन जिनगीक लीलामे रमि गेल।
तीस बर्खक मेहनतसँ नसीवलाल गामक सबसँ पैघ गिरहस्त बनि गेल। खेती-बाड़ीसँ जे समय बचै ओहिमे पढ़वो-लिखवो करै। सदिखन मनुक्खक बीच रहै लगल। हृदय ऐहन विशाल भ’ गेलै जे ढेरो मनुक्खक बीच रहनौ, असकरेे बुझि पड़ै। जहिना मेघमे लाखो तरेगण रहनहुँ सूर्य अलग बुझि पड़ैत, तहिना।

देवन नसीवलाल ऐठाम पहुँचल। नसीवलाल अपराजित फूलक लत्ती टाट पर बान्हि-बान्हि सरिअबैत। अनभुआर देवनकेँ देखि पूछलखिन- ‘‘तोरा चिन्हलिअ नै बौआ?’’
पायर छूबि गोड़ लागि देवन कहलकनि- ‘‘काका, आब हम अही गाममे रहब। अपना घर-दुआर नइ अछि।’’
चैंकैत नसीवलाल पूछलखिन- ‘‘अइ गाममे कत्ते रहै छह?’’
‘‘बुधनी ऐठाम। वेचारीकेँ चारि-पाँच बर्खक बेटा छनि आरो क्यो ने।’’
नसीवलाल- ‘‘ऐठाम किअए ऐलह?’’
‘‘आमक मास छियै। वेचारीकेँ एक्कोटा आमक गाछ नहि छनि। तेँ सोचलौ जे अहाँ से दूटा गाछक आम मोल ल’ लेब। अपनो खायब आ बेचिकेँ दामो द’ देब।’’
उपर-निच्चा देवनकेँ निङहारि नसीबलाल कहलखिन- ‘‘दरवज्जा पर चलह। बैसिकेँ निचेनसँ गप करब। तोहर माए-बाप कत्ते छथुन?’’
माए-बापक नाम सुनि, देवन उदास भ’ कहलकनि- ‘‘दुनू गोरे मरि गेला। असकर बुझि घरसँ निकलि दुनिया देखै ले विदा भ’ गेलौ। सालभरि नवटोलमे दीनमा आ भुखनी ऐठाम रहलौ। साल पुरिते नवटोलसँ विकासपुर आबि बुधनी ऐठाम छी। आइह बेचारी अपनेक संबंधमे कहलनि। तेँ एलौ।’’
देवनक बात सुनि, नसीवलाल अपन जिनगी पर नजरि दौड़बैत, गंभीर भ’ कहलखिन- ‘‘हँ, हमरा बहुत आमक गाछो अछि आ आमो। अगर ओइ वेचारीकेँ नइ छैक, ते चलह, एकटा बरहमसिया आमक गाछी अछि। ओ देखा दइ छिअह। बारहो मास फड़बो करै अए आ खाइयोमे सुअदगर होइ अए। ओइमे जे तोरा पसिन्न हुअ-अ, दूटा गाछ ल’ लिह। ओकरे ओगरबो करिहह आ तामो-कोर कहियह। सालो भरि आम होइते रहतह।’’
नसीवलालक बात सुनि देवनक मन खुशी स’ नाचि उठल। आशाक दुनियामे देवन भ्रमण करै लगल। गाछी देखै दुनू गोटे विदा भेला। गाछी पहुँचते देवनकेँ बुझि पड़ल जे आमक ढेरीक बीच आबि गेलौ। नमगर-चैड़गर गाछी। मझोलका गाछक संग बड़को-बड़को गाछ। जहिना गाछ सबहक सुन्दर रुप तहिना आमसँ लदल गहना। एक-दोसर गाछमे एत्ते स्नेह जे सब अपन-अपन बाँहि समेटि-समेटि हटल। ने बड़का गाछ छोटका पर ओंगठल आ ने छोटका अपना क’ हीन बुझि दवाइल जइ गाछमे जत्ते बुत्ता तते बेसी फड़ल। नसीवलाल बीच गाछीमे ठाढ़ भ’ हियासैत आ देवन घुमि-घुमि सब गाछ देखैत सगरे गाछी देखि देवन नसीवलालक लग आबि कहलकनि- ‘‘अपने धन्य छी काका जे एते नमहर आ एते सुन्नर गाछी लगौने छी। हम तँ मोल लइक विचारसँ आइल छलौ मुदा अपने ओहिना दइ छी तेँ हम गाछीक ओगरवाहिये क’ देव हमर मेहनतक जे मजूरी हैत, ततबे लेब।’’
देवनक जिज्ञासाकेँ अंकैत नसीवलाल कहलथिन- ‘‘अखन तू बच्चा छह तेँ गाछी लगौनाई सीखह। ताबे एकटा गाछ वहिना ल’ लाय आमो खेवह आ आँठीकेँ रोपि अपनो गाछी लगा लेबह। जखन फड़ै लगतह तखन अपन गाछीक सेवा करियह।’’
नसीवलालक गप सुनि हँसैत देवन विदा भेल।
घर पर आबि देवन सब बात वुधनीकेँ कहलक। दोसर दिनसँ देवन टुकला विछैक विचार केलक। मनमे एलै जे टुकला बिछै ले नीक झोरा चाही। मुदा आइ तँ नइ अछि। तेँ दीदी क’ एकटा झोरा सिबै ले कहि दइ छियै आ आइ मौनिये ल’ क’ जायब। मौनी नेने देवन टुकला बिछै विदा भेल। गाछीमे टुकला पथार लागल। मने-मन देवन सोचलक जे अखन दोसर काजो ने अछि तेँ जँ सब टुकला क’ बीछि लेब आ सोहिकेँ आमील बना लेब ते माइर पाइ हैत। मनमे अबिते देवन टुकला बिछै लगल। मौनी भरिते देवन विदा भेल। घर पर आबि बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, गाछीमे टुकला पथार लागल अछि। अहूँ चलू। बड़का छिट्टा सेहो ल’ लिअ। मौनीमे बीछि-बीछि छिट्टामे राखब। तीनू गोटे टुकला बिछै विदा भेल। टुकला देखि बुधनीकेँ अचंभा लागि गेल। भरि छिट्टा बुधनी, मौनीमे देवन आ दुनू हाथमे रमुआ टुकला लेने आंगन आयल। आबि देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, अहाँ अंगनाक काज करु, हम टुकला सोहै छी।’’
देवन टुकला सोहै लगल। बुधनी भानस करै गेलि। पनरहे दिनमे, धान-चाउरक पथार जेँका, आमिलक पथार भ’ गेल। आमील सुखा-सुखा बुधनी दू कोठी भरलक।
अंतिम जेठमे झमझमौआ बरखा भेल। धरतीक ताप आ पानिक ठंढ़कक बीच हाथा-पाइ हुअए लगल। हाथा-पाइ करैत दुनू अलिसा क’ सुति रहल। पैछला सालक बात देवनकेँ मन पड़ल। जे बीआ बाओग करैक समय आबि गेल। मुदा कथीक बीआ वाओग हैत से वुझवे ने करैछी। बुधनियेक घर लग सजनाक घर। सजन गिरहस्त। देवनकेँ मनमे एलै जे सजन गिरहस्त छथि तेँ हुनकेसँ पूछि लेब, नीक हैत। सजन ऐठाम देवन गेल। हाल देखि सजन हरक सामान सभ, गठूलासँ निकालि, डेढ़िया पर झोल-झाल साफ करैत छल। देवनकेँ देखि सजन पूछलक- ‘‘बौआ, किमहर-किमहर ऐलह?’’
देवन- ‘‘अहींकेँ पूछै एलौ जे पानि भेलि हेन से कथीक बीआ अखन पाड़बै?’’
सजन बाजलि- ‘‘बौआ, गिरहस्ती तँ हम जरुर करै छी, सब काज करैक लूरिओ अछि। मुदा पढ़ल-लिखल तँ छी नहि! तेँ महीना लछत्तरक ठेकाने ने रहै अए। अखैन हरक सब सामान जोड़िया लइ छी आ बेरु पहर नसीवलाल कक्का ऐठाम जा क’ बुझि लेब। तोँहू संगे चलिहह। जे बुझैक हेतह से पूछि लिहौन।’’
‘‘बड़बढ़िया’’ कहि देवन चल आयल।
बेर टगिते देवन सजनक संग नसीवलाल ऐठाम विदा भेल। दरवज्जे पर बैसि नसीवलाल बेटाकेँ बीआ बाओग करैक संबंधमे कहैत रहथिन। देवन आ सजन पहुँचल। दुनू गोटेकेँ देखि नसीवलाल पूछलथिन- ‘‘दुनू गोटे किमहर-किहर चललियैक?’’
सजन कहलकनि- ‘‘काका, हम तँ अहाँसँ पूछि खेती करै छी। आइ भिनसरे देवन हमरासँ पूछै आयल। तखन हम हरक समचा जोड़िअवैत रही तेँ कहलियै जे बेरु पहर दुनू गोरे चलि क’ काका से बुझि लेब। तेँ एलौ।’’
मुस्कुराइत नसीवलाल कहलखिन- ‘‘पहिने तमाकू खुआवह। तखन गप्प-सप करब।’’
कहि नसीवलाल चुनौटी निकालि सजनक हाथमे देलखिन। सजन तमाकुलो चुनबै आ कहवो करनि- ‘‘काका, तेहेन बरखा भेल जे मन खुशी भ’ गेल। हूँ कारी भरैत नसीवलाल कहलखिन- ‘‘छोट-छीन बरखा होइत तँ रस्ते-पेरे रहि जाइत। मुदा झमकौआ बरखा भेने जमीनमे तेहेन हाल भेल जे गिरहत बीओ-बाइल खसा लेत आ दश दिन अफारो खेत जोतत।’’ घासो सभ, जे सूखा गेल छल ओहो पौनगत। जइसँ मालो-जालकेँ खोराकी बढ़तै।’’
चुटकीमे तमाकुल ल’ सजन नसीवलाल दिशि बढ़ौलक। वामा तरहत्थी पर तमाकुल ल’ नसीवलाल दहिना अैाँठासँ दू बेरि रगड़ि नाकमे अैाँठ भीरा नोइस ल’ तमाकुल मुहमे लेलक। नोइस लगिते छिक्का भेलनि। छिक्का होइते नसीवलालक मन हल्लुक भेलनि। मन हल्लुक होइते नसीवलाल कहै लगलखिन- ‘‘जेठ अंत भ’ रहल अछि। बड़ सुन्दर हाल भेल। पुरना ढंगक गिरहस्तीमे मड़ूआ, गरमा धान आ अगहनी (नीचला खेतक) बीआ खसबैक समय आबि गेल। आँखि मूनिकेँ लोक बीआ पाड़त। हमरा त’ बोरिंग अछि तेँ मकईओ तिलकै अए आ गरमाधान सेहो कटै छी। बैशाखा तरकारी (सजमनि, रामझिमनी, झिमनी, ठढ़िया साग इत्यादि) भरखैर निकलै अए। महिना दिन आरो चलत। रामझिमनी बरिसातिओ होइत। सजमनि झिमनी साग इत्यादि सेहो बरिसातिओ होइत तेँ ओहो सब लगाओल जायत। मुदा सबसँ पैघ बात अछि जे सब गिरहतो त’ एक रंग नहि अछि तेँ फुटा-फुटा अपन-अपन बुझै पड़तै।’’
नसीवलालक बात सुनि सजन संतुष्ट भ’ गेल। मुदा देवनक मनमे अनेको सवाल उपकि गेल। देवन पूछलकनि- ‘‘काका, हमरा दीदी केँ त’ पनरहे कट्ठा खेत अछि आ दुनू गोटे अनाड़िये छी। हम कोना की करब?’’
नसीवलाल- ‘‘तीनि गोरेक परिवारमे बहुत जमीन अछि। जँ ढंगसँ उपजा हैत ते सालो भरि गुजर क’ क’ उगड़वो करत।’’
उगड़व सुनि देवन उठि क’ ठाढ़ भ’ गेल। नसीबलाल देवनकेँ बैसवैत कहलखिन- ‘‘सबसे पहिने देवन सालकेँ मनसँ निकालि लाय। तीन तरहक मौसम होइछै आ तीनू मौसमक फसल सेहो होइ छै। तेँ अखन तू गरमाधान जे चारि मासमे भ’ जाइत। मडू़आ, तीमन तरकारीक खेती शुरु करह। कम्मे समयमे तीमन-तरकारी फड़ै लगतह जईसँ गुजरो चलतह। जे अपने भरि करबह ते खेवेटा करबह अगर जे वेसी करवह ते अपनो खेवह आ बेचि के गुजरो करबह।’’
देवन- ‘‘काका, बीआ कते स’ आनव?’’
नसीवलाल कहलथिन- ‘‘सब चीजक बीआ हम द’ दइ छिअह।’’
देवन- ‘‘तीनिटा कोली हमरा दीदीकेँ अछि। चारि कट्ठाक कोली गहीरगर अछि बाकी दूटा कोली मध्यम आ भीठ छनि अपने बुझा-बुझा कहि दिअ कोन कोलीमे कोन अन्नक खेती करब ध्यानसँ देवनक बात सुनि नसीवलाल कहलथिन- ‘‘नीचला खेतमे छिपगर धान रोपै परतह। किएक तँ ओहिमे अधिक पानि बसत। मुदा इमहर जे दूटा कोली बँचलह ओहिमेसँ जे मध्यम छह ओहिमे गरमा धानक किऐक तँ बहुतो किस्मक धान अछि जे 70 दिन स’ ल’ क’ 150 दिनक होइत। से खेती करह। जे नीक-जेँका उपजतह ते पाँच कट्ठामे कहुना-कहुना सात क्वीन्टल धान हेतह। एकटा कोलीमे मड़ूआ रोपि लाय। मड़ूआ कम्मे दिनमे होइ छै। जँ सवारी समय (अधिक बरखा) हेतै ते मड़ूआ काटि क’ तीनि मासी गरमा क’ लिहअ आ जँ रौदियाह समय हेतै ते राहड़ि, तेबखा, कुरथीमे सँ कोनो वाउग क’ दिहक। बाड़ी-झाड़ी छह की नहि?’’
देवन- ‘‘घरे लग अछि। पहिने ओइमे दूटा आमक गाछ छलै।, जे कटि गेलै।’’
नसीवलाल- ‘‘अगर दशो धुर हेतह तइओ सालो भरिक तीमन-तरकारी ओइमे उपजि जेतह। ओहिमे थोड़े साग वाउग क’ लिहअ। थोड़े रामझुंगनी रोपि लिअह। एकटा लत्ती सजमनि लगा लिहअ।’’
देवन- ‘‘काका, एकटा लत्ती कत्ते फड़त?’’
देवनक प्रश्न सुनि नसीवलालकेँ हँसी लगलनि। मुदा मनमे एलनि जे बच्चा अछि। तेँ नइ बुझै अए। बुझवैत कहलखिन- ‘‘बौआ, एकटा सजमनिक लत्ती जँ समढ़ि जाय त’ सय तक फड़त मुदा डेढ़ सय फड़बै लेल रोपिनिहारो केँ मुसताइज रहै पड़तै।’’
देवन- ‘‘की मुसताइज?’’
नसीवलाल- ‘‘जहिना लोक घर बनबै अए तहिना ओकरा ले बाँसक मजगूत खूँटा पर मचान बनवै पड़तह। कीड़ी-फतींगीक देखभाल करै पड़तह। जहिमे छाउर-गोबर, डी.ए.पी. खाद दिअए पड़तह ततबे नइ जखने लत्ती ठमकै कि यूरिया खाद, टौनिक दवाई देमए पड़तह। फल नीक होइ दुआरे पोटाश खाद सेहो देमए पड़तह।’’
अपनाकेँ कमजोर (पछुआइल) उपजौनिहार बुझि देवन कहलकनि- ‘‘काका, अहाँक विचार तँ मनमे जँचै अए, मुदा अखन त’ हम सभ तरहे पछुआइल छी। तेँ अखुुनका हमर स्थिति देखि रास्ता बता दिअ।’’
देवनक बात सुनि नसीवलाल कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, भगवानो गरीबकेँ मदति करै छथिन। भगवानक वास छनि माटि, पानि हवा आरो-आरो जगह। जइ ठाम (जइ खेतमे) जे जजात पहिले पहिल लगाओल जायत ओहि फसलकेँ माटि, पानि, हवा आ रौद अपन खजाना स’ आनि क’ द’ दैत। तेँ, देवन तोँ ठीक समयमे रोपि देखभल, कमठौन, आरो-ओरो जे जोगार छै, ततबे करिहह। मुदा करह। जखने करै लगवह दुख पड़ाइ लगतह। जत्ते करवह तते दुख भगतह।’’
नसीवलालक विचार सुनि देवन खिलखिलाकेँ हँसै लगल। देवनकेँ हॅसैत देखि नसीवलालक हृदय, जहिना जूरशीतल पावनिमे माए-बाप, बेटा-बेटीकेँ माथ पर जल द’ जुड़बैत, तहिना भेलनि। आँखि उठा दुनिया दिशि देखै लगलथिन। मनमे एलनि जे ई दुनिया तँ कर्मभूमि छी। देवन जरुर कर्मनिष्ठ बनत। मुदा कर्मनिष्ठोक रास्ता (साधना) तँ ज्ञाने क’ संग केने चलैत। अखन धरिक जे अनुभव अछि ओ देवनकेँ जरुर बुझा देवै। देवनकेँ बीआ दैत नसीवलाल कहलखिन- ‘‘बौआ, साग, तरकारीक बीआ अंदाजेसँ आ धान मड़ूआक बीआ तौलि क’ द’ दइ छियह। पाँच-पाँच किलो धानक बीआ अछि। एकरा पाँच धुर खेतमे पाड़ि लिहअ।’’
पाँच धुर सुनि देवन पूछलकनि- ‘‘पाँच धूर कोना बुझबै?’’
देवनक जिज्ञासा देखि मुस्कुराइत नसीवलाल कहै लगलखिन- ‘‘बौआ, एहि गाममे साढ़े छह हाथक लग्गी अछि। एक लग्गी, एक लग्गी एक धूर खेत भेलै। मुदा पुरुखा सभ तीनि-डेग, तीनि डेगकेँ एक धूर नापि छेलखिन।’’
देवन- ‘‘काका, सभ तरहक लोकक डेग तँ एकके रंग नहि होइत?’’
नसीवलाल- ‘‘बड़ सुन्दर बात बौआ पूछलह। तीनि डेगकेँ मतलब, ओहन डेग जे दू हाथसँ कनेक बेसी होय। दू हाथक डेगकेँ माने ने बड़का धाप आ ने सासुरक डेग। दुनू पाएरक दूरी डेढ़ हाथ होय। किएक त’ एक बीतक पाएर होइ छै। दुनू पाएरक नमती एक हाथ भ’ जाइत। तेँ डेगमे एक पाएरक आ डेढ़ हाथ बीचमे।’’
नसीबलालक बात सुनि देवन उठिकेँ ठाढ़ भ’ खिलखिला क’ हँसवो करै आ दुनू हाथे थोपड़ियेा बजवै लागल। मने-मन नसीवलाल सोचै लगला जे एत्ते खुशी देवन किअए भेल? पूछलखिन- ‘‘बौआ, ऐना किअए करै छह?’’
देवन- ‘‘काका, अहाँ हमरा धरती नपैक लूरि बता देलौ। आब हम जरुर दुनियाकेँ नापि लेब।’’
धान, मड़ूआक बीआ ल’ देवन विदा भेल। रास्तामे सजन देवनकेँ कहलक- ‘‘बौआ, तेहेन गामक लोक जहिया अछि जे ककरोसँ गप्पो करब मोसकिल भ’ जाइ अए। असकरे अपन दुख-धंधामे लगल रहै छी तेँ, नइ ते कोन जालमे के कखन ओझरा देतह से बुझवे ने करबहक।’’ आब त’ दू भाइ भेलौ, दुनू गोरे निचेनमे गप-सप करब।’’
साझू पहर सजन टहलल-टहलल बुधनी ऐठाम आयल। बुधनी भानस करैत छलि। एक्केटा डिबिया बुधनीकेँ। जे चुल्हि लग राखि भानस करैत। अंगना अनहारे। अन्हारे अंगनामे देवन आ रमुआ बैसि एक-दू सँ बीस तक गनैत। सजनकेँ देखि देवन वुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, डिबिया मोख लगमे द’ दिऔ। घरोमे इजोत हैत आ अंगनोमे हेतै।’’
बुधनी डिबिया मोख लग राखि देलक। सजनकेँ बैसबैत देवन कहलक- ‘‘भैया! गाममे के केहेन लोक अछि से हमरो बुझा दिअ। किऐक त’ आब हमहू अही गाममे रहब की ने।’’
देवनक बात सुनि सजन क’ मनमे भेलै जे देवन हमरा बेसी मानै अए। अपन बड़प्पन बुझि सजन कहै लगलै- ‘‘बर्ख पाचमक बात छी। जोगिनदरक गाय विआइल। बड़ सुन्दर पहिलेठे गाय छलै। जेहने रंग तेहने खाढ़। बसुलिया सींग मझोलका थूथून। आगूसँ देखैमे तते नीक लगै जे होय देखते रही। तहिना पाछूओसँ। ओना लोक कहैछै बड़दक आगू गायक पाछू। मुदा ओहि गायक जेहने थन तेहने थूथून। देशी गाय रहिते जरसिये जेँका बुझि पड़ै। दूधहो बढ़ियाँ होय। सब तूर मिलि जोगिन्दर सेवा करै। पहिलोठ गाय रहने दुहै काल गुदगुदी लगै। तेँ हनपटा जाय। ने बच्चा क’ पीबै दैइ आ ने दूहै देइ। दोसर दिन (वियेलाक एक दिन बाद) जोगिनदर ननुआकेँ कहलक। ननुओ गाय पोसैत मुदा अछि नेत-घट्टू। जोगिनदरकेँ ननुआ तेहेन चीज पीअबै ले कहलक जे पिअबितहि गाय बगदि गेल। ने घास खाय आ ने पानि पीवै। ने ककरो लगमे जाय देइ आ ने बच्चाकँे देखै चाहै। जहिना दारु पीबि मनुक्ख करै अए तहिना गाइयो करै। दुनू परानी हबो-ढ़कार भ’ भ’ कानल फिड़ै। बच्चा सेहो लर-तांगर जेँका भ’ गेलै। एक-फुच्ची दूध रतनासँ उठौना केलक। मुदा एक फुच्ची दूधसँ बच्चाके की होयतै। बड़ आशासँ बेचारा जोगिनदर गाय पोसने, जे बिआइत ते दश दिन दूध खा बेचि लेब, जहिसँ बेटीक विआहो क’ लेब आ उगरत ते एकटा बाछियो कीनि लेब। तेसर दिन जेागिनदर बुझलक जे ननुआ अन्ट-सन्ट दवाई द’ गायकेँ दुरि क’ देलक। जोगिनदर त’ बरदास केने रहल मुदा घरवाली ननुआकेँ गरिअबै लागलि। घरवालीकेँ गरिअबैत देखि जोगिनदर कहलकै- ‘‘गाइयो दुरि भेलि आ मारिओ खायब। देखै नै छियै जे गाममे सबसे जेरगर दियादी ननुआक छै। केहेन-केहेन हुरनेठगर समांग सबछै। मुह बन्न करु नइ ते अनेरे मारि खायब।’’
सय बीधा बाधक बीचमे, दू-अढ़ाइ कट्ठाक एकटा परती। परती पर एकटा साहोरक गाछ। नमहर तँ बेसी नहि मुदा सघन छोट-छीन अछार लोक ओतें बीता लैत। ओहि गाछ पर ठनका खसलै। साहोरक गाछ पर ठनका गिरब सुनि नसीवलाल भोरे देखै ले जोगिनदरे घर लग देने जाइत। दुनू परानी जोगिनदरकेँ कनैत देखलखिन। ससरि क’ नसीवलाल जोगिनदर लग जा पूछलखिन- ‘‘किअए दुनू परानी जोगिन्दर कनै छह?’’
नसीवलालक बात सुनि आरो हुचकि-हुचकि दुनू परानी कनै लागल। अंगनामे ढेरबा बेटी लुरुओ-खुरु करै आ आखिकेँ नोरो पोछै जोगिनदरक बेटा जेठ बहीनिसँ कहै- ‘‘दाय, कहै छेलै जे गाय बियेतै ते दूध देबौ, से कहाँ दइछै।’’ छोट भाइक बात सुनि बहीनिक हृदय बरफ जेँका पघिलैत। मुदा वेचारी की करैत। मुह पर हाथ सहलबैत बहीन कहलकै- ‘‘बौवा, अल्लू पकाके रखने छी। ओकरा चटनी क’ दइ छी। रोटी आ चटनी खा लिअ। भगवान कोनो गाम गेलखिन। जब खूँटा पर गाय अछि ते दूध खेवे करब।’’
अंगना स’ ल’ क’ दरवज्जा तकक दृश्य नसीवलाल देखैत। आशा जगबैत नसीवलाल जोगिनदरकेँ कहलखिन- ‘‘कनलासँ की हैतह? ऐहन कोन दुखछै जकर दवाई नइछै। मुह बन्न करह आ कहह जे की भेलह?’’
नसीवलालक बाहि पकड़ि जोगिनदर गायक-बच्चा क’ देखवैत कहलकनि- ‘‘काका! पाँच दिन गायकेँ बियेना भेल हेन, एक्को चैठी दूध नइ होइ अए। बच्चो क’ थन तर नै जाय दइछै। पा भरि दूध रतनासे उठौना लइ छी, ओइह पिया बच्चा क’ अखन धरि जिऔने छी। ने ते ऐहो मरि गेल रहिते।’’
मुह पर हाथ द’ नसीवलाल थोड़े काल गुम्म रहि, पूछलखिन- ‘‘बियेला पर की सब केलहक?’’
‘‘थन तर गाय जाइये ने दिअए। तखन ननुआ भैया क’ पूछलियै। ओ एकटा दवाई घरसँ आनिके देलक आ कहलक जे एकरा पीआ दिहक। सब ठीक भ’ जेतह।’’
मने-मन नसीवलाल विचारि कहलखिन- ‘‘नीक भ’ जेतह। दूधो हेतह। कानह नहि। हम बाधसँ साहोरक गाछ देखने अबै छी। तखन संगे डाॅक्टर ऐठाम चलिहह।’’
कहि नसीवलाल बाध दिशि विदा भेला। बाधक परतीपर जा साहोरक गाछ देखै लगलखिन। ठनका स’ साहोरक गाछ दू फाँक भ’ गेल छल। दुनू फाँक दुनू भाग गिरल। जहिना-जहिना ठनका निच्चा मुहे गेल तहिना-तहिना गाछो झड़कल। मनमे एलनि जे अखन धरि सब वुझैत अछि जे साहोरक गाछ पर ठनका नइ खसैछै मुदा आखिक सोझामे देखै छी। गाछक बगलेमे बैसि नसीवलाल सोचै लगला। थोड़े कालक बाद मनमे एलनि जे ई बात (साहोर पर ठनका नहि खसब) गाछी-विरछीमे भ’ सकै अए जइ ठाम आन गाछ नमहर-नमहर रहैत छैक आ साहोरक गाछ छोट। मुदा एक गछ्छामे त’ भ’ सकै छैक। एहि निष्कर्ष पर पहुँच नसीवलाल घुरि क’ घर दिशि विदा भेला।
दुनू परानी जोगिनदर, डेढ़िया पर बैसि, नसीवलालक प्रतिक्षा करैत। दुरेसँ नसीवलालकेँ अबैत देखि जोगिनदर रास्ता पर ठाढ़ भ’ गेल। जोगिनदरकेँ देखिते नसीवलाल कहलखिन- ‘‘अखने चलह। घर पर गेला स’ काजमे ओझरा जायब।’’
दुनू गोटे मवेशी डाॅक्टर ऐठाम विदा भेला। डाॅक्टर कमल, एकटा महीसि इलाज क’ क’ आयले छल, कि दुनू गोटेकेँ देखिते, हाँइ-हाँइ कल पर जा हाथ-पाएर घोए लगल। हाथ-पाएर धोएकेँ आबि कमल नसीवलालकेँ गोड़ लगलकनि। दुनू गोटेकेँ बैसवैत, आंगन जा घरवालीकेँ चाह बनवै ले कहलखिन। डाॅक्टर कमलक व्यवहार देखि जोगिनदरकेँ आश्चर्य लगै। डाॅक्टर कमल नसीवलाल लग आबि पूछलखिन। जोगिनदर सब बात कहलकनि। अलमारीसँ दवाइ निकालि टेवुल पर राखि, बुझवैत कमल कहै लगलखिन- ‘‘तीनि दिनक दवाइ देलौ हेन। छोटका पुड़ियामे बच्चाक दवाइ छी। दुनू साँझ खुरचनमे घोड़ि बच्चाकेँ देबै। आ दू रंगक दवाई गाय ले देने छी। रोटी संगे गायके खुआएव। दू खोराक देलाबाद गायक मन नीक हुअए लगत। काल्हि साँझसँ दुहवे करब। तीनि-चारि दिनमे गाय नीक भ’ जायत। अगर नइ ठीक हुअए ते फेरि आयब।’’
दवाई ल’ फेरि जोगिनदर डाॅक्टर कमलकेँ पूछलकनि- ‘‘कत्ते दाम भेल?’’
मुस्की दैत कमल कहलखिन- ‘‘पाँच रुपैआ भेल।’’
रुपैआ द’ जोगिनदर नसीवलालक संग विदा भेल। घर पर अबिते गायो आ बच्चोकेँ दवाइ पिऔलक। जहिना-जहिना डाॅक्टर कहने रहथिन तहिना-तहिना गाय नीक हुअए लगल। तेसर दिनसँ बढ़ियाँ जेका गाय दुहै दिअए लगल।
मास दिन सब परानी जोगिनदर दूध खा सात हजारमे गाय बेचि लेलक। ओहि रुपैआसँ बेटीक विआहो केलक आ एकटा डेढ़ सालक बाछियो कीनि लेलक। आँखि मूनि देवन सजनक बात सुनैत। जखन सजन चुप भ’ गेल तखन देवन आँखि खोलि कहलक- ‘‘भैया! अहाँ तँ हमर बन्न आखि खोलि देलौ।’’
देवनक बात सुनि जोगिनदर कहलक- ‘‘बौआ, ऐहेन-ऐहेन खिस्सा सबहक अछि। हम जे ककरो दरवज्जा पर नइ जाइ छी से अही दुआरे। जखन सैाँसे गामक लोकक किरदानी सुनबहक ते हेतह जे सैाँसे गाम लुच्चे-लफंगा अछि। ने कोइ एक्कोटा सत बजतह आ ने ककरो कोइ नीक करतह। जँ ककरो किछु पूछबहक ते तेहेन मीठ बोली कहतह जे बुझि पड़तह जे ऐहेन शुभचिन्तक गाममे दोसर नहि अछि मुदा तेहेन घुरछी लगा देतह जे पेपिआइत रहबह।’’
भानस क’ बुधनियो आबि बैसलि छलि। खिस्सा सुनि बुधनी सजनकेँ कहलखिन- ‘‘भैया, भानसो भ’ गेल, आब खा लोथु तखन जहिएथि।’’
हँसैत सजन कहलक- ‘‘कतौ आन ठाम छी। जहिना ई घर तहिना ओ घर।’’
बौआ देवन ऐहेन-ऐहेन बहुत बात अछि। दोसर दिन आरो सुना देवह। अखन रातिये बेसी भ’ गेल। तोँहू सभ खा -पीयह।’’
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जिनगीक जीत:ः 8
अधरतियेमे बचेलालक निन्न टूटि गेल। दू बेरि खोंखी क’ ओछाइने पर पड़ल रहल। एक करोटसँ दोसर करोट उनटि मनेे-मन सोचै लगल। अखन धरि हमर जिनगी की रहल? बच्चेसँ मन पाड़ै लगल। जखन तीनि वरखक रही तखने पिताजी स्वर्गवास भ’ गेला। मायक उपर परिवारक भार पड़लनि। ओ जना-तना घर सम्हारि चलवै लगली। औरत होइतहुँ परिवारकेँ सम्हारि, दुनू भाय-बहीनिकेँ पढ़ेबो केलक। मैट्रिक पास करा हमरा शिक्षक बनौलक। जे बहुुत मरदो बुते नइ होइ अए। एतइ प्रश्न उठैत जे की औरतकेँ मरदसे शक्तिहीन बुझल जाय? कथमपि नहि। पुरुखसे औरतकेँ कम बुझब नादानी क’ सिवा आओर की भ’ सकैत अछि। हँ, ई बात जरुर अछि जे आइ धरिक जे जिनगी औरतक रहल, ओ कमजोर जरुर बनौलक। जहिसँ पुरुष औरतक बीच नमहर दूरी अवश्या भ’ गेल अछि। जकरा समतल बनवैमे समय साधन आ श्रमक जरुरी अवश्य अछि। मुदा एकर अर्थ ई नहि जे समतल नहि बनि सकत। जहिना पुरुषमे असीम शक्ति होइत तहिना तँ औरतोमे होइत। एत्ते बात बचेलालकेँ मनमे अबिते अपन पत्नी दिशि नजरि दौड़ा क’ देखलनि। अपन पत्नीक चालि-ढालि देखि मनमे एलनि जे अदहा कोन चैथाइयो मनुखसँ कम क्रियाशील छथि। जँ ओ घर सम्हारि लोथु त’ हम नोकरीक संग किछु समाजोक सेवा करितहुँ। दरमाहासँ परिवारोक खर्च चलैत आ किछु समाजोक उपकार होइतै। मुदा से कहाँ होइ अए। एत्ते बात मनमे अबिते बचेलाल देवालमे टंगल घड़ी क’ चोरबत्तीसँ देखलक। रातिक एक बजैत रहै। चोरबत्ती सिरमाक बगलमे राखि पुनः सोचै लगल। आइ परिवा (परीब) छी। परीब रातिक चान घसकट्टो हाँसूसँ पातर बुझि पड़ैत। मुदा जहिना-जहिना दिन बढ़ैत तहिना-तहिना चानो बढ़ैत। बढ़ैत-बढ़ैत ओइह चान पुरनिमा दिन सुरुजे जेँका विशाल भ’ रातिके दिन जेँका बना दैत अछि। तहिना त’ मनुक्खोकेँ भ’ सकैत। मुदा मनुक्ख चानक गति नहि भ’ पबैत। ओइह चान पुरनिमाक परातसँ छोट हुअए लगैत आ छोट होइत-होइत अमावश्या दिन विलीन भ’ जाइत अछि। आखिर ओ (चान) कत्ते चलि जाइत अछि?
जँ कतौ चलि जाइत अछि तँ पुनः परातेसँ अबैत कोना अछि?
की मनुक्खोकेँ वहिना होइत? जहिना दुनियाँक बोध घटैत-घटैत व्यक्ति लग पहुँच जाइत तहिना त’ शक्तियो कमैत-कमैत एत्ते कम भ’ जाइत अछि। जे अस्तित्वो मृत्यु प्राय बनि जाइछ। पुनः बचेलालक मनमे प्रश्न उठल जे दुनियामे सबसँ श्रेष्ठ जीव मनुष्य मानल जाइछै। मात्र मानले नहि जाइछै। वास्तविक अछियो। दुनियामे जत्ते जीव-जन्तु अछि ओहिमे मनुक्खे टाकेँ विवेक होइत। आन-आन गुण त’ कमोवेश सभमे पाओल जाइ छै। आइ धरि मनुक्ख विवेकक उपयोग जत्ते बजैमे करैत अछि तकर एक अन्नियो जिनगीमे नहि क’ रहल अछि। ई दुनिया कर्मभूमि थिकैक आ मनुक्ख कर्मकार। मुदा से नहि बुझि उधिकांश लोक दोसराक श्रमकेँ लुटि अपन ऐश-मौजक जिनगी बनबैक पाछू विवेककेँ ताक पर राखि दैत अछि। जहिसँ मनुक्खक बनमे सदिखन आगि लगले रहै अए। आ ओ आगि ताधरि धधकैत रहत जाधरि विवेकक सीमा मजगूत नहि बनत। शुरुहेसँ जना-जना मनुख होशगर होइत गेल तना-तना अल्लढ़ मनुष्यकेँ जानबरक श्रेणीमे धकलैक गेल। धकलैत-धकलैत ऐहेन रास्ता बनि गेल जे सब-सभकेँ निच्चे मुहे धकलैत अछि। धकलाइत-धकलाइत जे सबसे नीचा पहुँच गेल अछि। ओकरा आगू मुहे बढ़ैक कोन बात जे तकलो ने होइ छेक। तकबो कोना करत? दुनिये उनटि गेलै। जिनगीक सभ रास्ता उनटि गेलै। उनटि गेलै विवेक। जहिसँ साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, दर्शन, एकोटा बाकी नहि रहल। जँ थोड़-थाड़ बँचलो अछि त’ वहिना, जना लछमन (लक्ष्मण) केँ शक्तिवाण लगला पर हनुमानकेँ सिर-सजमनि अनै ले कहलकनि आ ओ सिर-सजमनि नहि चीन्हि पहाड़े अनै ले मजवूर भेला, तहिना। सवाल उठैत अछि जे बिना अनुकूल दिशामे ऐने मनुक्खक कल्याण कोना भ’ सकैत अछि? कथमपि नहि भ’ सकैत अछि। मुदा मनुक्खेक भीतर ओहन शक्ति छैक जे क’ सकैत अछि। जँ मनुक्ख अपन शक्तिकेँ चीन्हि उपयोग करे, तखन।
ई बात मनमे अबिते बचेलाल केबाड़ खोलि, घरसँ निकलि, आंगन आबि अकास दिशि देखै लगल। सन-सन करैत अन्हार। आंगनसँ निकलि बचेलाल बाट पर आबि, उत्तरसँ दछिन आ दछिनसँ उत्तर मुहे जाइत रास्ताके, ध्यानसँ देखै लगल। एक्केटा रास्ता जहि पर उत्तर मुहे चललासँ उत्तरी ध्रुव पर पहुँचैत आ दछिन मुहे चललासँ दछिनी ध्रुव पर पहुँचैत आ दक्षिन मुहे चलला पर दछिनी ध्रुव पर। रास्ता ते एक्के अछि मुदा दिशा बदलने स्थानो बदलि जाइछै। एहिना त’ जिनगीयोक रास्ता अछि। एक दिशि गेने लोक पापी बनि जीबैत जबकि दोसर मुहे गेेने धर्मात्मा बनि जाइत अछि। मुदा प्रश्न उठैत जे असकर चलव आ समूहक संग चलबाक। समूहक संग चलने व्यबस्था बदलैत जबकि असकर चलने व्यवस्था नहि बदलैत। एत्ते मनमे अबिते, बड़बड़ाइत बचेलाल घर आबि विछान पर पड़ि रहल। अपने सवालो उठबैत आ जाबाबो तकैत। रुमाक निन्न सोहो टूटि गेलनि मुदा बचेलालक बड़बड़ेनाई सुनि गबदी मारि सुनै लगली पतिक बोलीमे रुमा संकल्प, धैर्य, उत्साह देखथि। जहिना आगिक धधड़ामे काँच बस्तु पकैत जाइत तहिना बचेलालमे साहस जगै लगल। साहसक संग धैर्य सेहो अवै लगलनि। आइ धरि जे बात रुमा पतिक मुहे कहियो ने सुनने छली ओ सुनै लगली जिनगीक रास्ता कोना बदलल जाय, ई बात बचेलालक मनकेँ झकझोड़ै लगल। बिना रास्ता बदलने आगू बढ़व कठिन? मुदा रस्तो बदलब तँ असान नहि। एहि गुनधुनमे बचेलालक मन, धोर-मट्ठा पानि जेँका, होइत। कछमछ करैत बचेलाल। कखनो पड़ैत त’ कखनो उठि क’ बैइसैत। मुदा रास्ता देखबे ने करैत। चीनक एकटा खिस्सा बचेलालकेँ मन पड़ल। चीनक एकटा पहाड़ी इलाकामे एक गोटे रहैत। घरसँ निकलि बाहर जेबामे ओकरा एकटा पहाड़ टपै पड़ैत छलैक। एक दिन ओकरा मनमे एलै जे पहाड़ काटि रास्ता बनौलासँ चलवोमे सुगम हैत आ समयोक बचत हैत। ओ आदमी छेनी, हथौरीसँ पहाड़ कटै लगल। कटिते समय दोसर गोटे देखलक। पहाड़ कटैत देखि ओ कहलकै- ‘‘ऐहेन पहाड़केँ कोना काटि सकबह?’’ छेनी-हथौरी रोकि ओ उत्तर देलकै- ‘‘जिनगी भरिमे जते कटत ओते त’ असान भ’ जायत। तकर उपरान्त बेटा काटत। एक नइ एक दिन पहाड़ कटवे करत जइसँ सुगम रास्ता बनबे करत। जे अबैवला पीढ़ीक लेल सुगम हैत।’’
खिस्साके ध्यानसँ सोचि बचेलाल आगूक जिनगीक लेल कार्यक्रम बनबै लगल। पतिक बोलीकेँ रुमा ध्यानसँ अंकैत। कोनो बात निक्को लगै आ कोनो अधलो। कोनो-कोनो बात बुद्धिक बखारीमे रुमाकेँ अँटबे ने करैत। रुमा मने-मन सोचै लागलि जे भरिसक हिनका कोनो बीमारी ते ने भ’ गेलनि। मुदा बीमारीसँ जे बड़बड़ेनाई होइछै ओ तँ जहिना-जहिना रोगक धक्का कम बेसी होइत तहिना-तहिना होइत। मुदा से नहि सुनै छी। एक रसमे बजैत छथि। अपन दहिना हाथ रुमा बचेलालक छाती पर द’ धड़कन देखै लगलीह। छाती पर हाथ परिते बचेलाल पूछलक- ‘‘अहूँ जागि गेलौ?’’
अपन विचार छिपबैत रुमा उत्तर देलकनि- ‘‘अखने नीन टूटल। अहाँ कखनसँ जागल छी?’’
गंभीर स्वरमे बचेलाल कहलक- ‘‘बारह बजे रातियेसँ जगल छी। निन्ने ने होइ अए।’’
‘‘हमरो किअए ने उठा देलौ?’’
‘‘उठबैक मन भेल मुदा सोचलौ जे जाबे अपने नइ जागव ताबे दोसरकेँ कोना जगा सकब? तेँ नइ उठेलहुँ।’’
सुमित्रा उठि क’, मोख लग राखल बाढ़नि ल’, अपन घर बहारि ओसार बहरै लगली बहारैत-बहारैत जखन बचेलाल घरक मुह लग गेली ते सुनलखिन जे घुनघुनाके बचेलाल रुमाकेँ किछु कहैत छथिन। बाहरब छोड़ि सुमित्रा बोली अकानए लगली। बचेलाल बजैत जे अपना परिवारमे दू गोटे जुआन छी। दूटा बच्चा अछि आ माय बूढ़ि छथि। जखन पिताजी मुइलाह तखन हम दुनू भाय-बहीनि बच्चे रही। जत्ते खेत अखन अछि ततबे ओेहू समयमे छल। असकरे माए दुनू भाय-बहीनिकेँ पोसबो केलक आ पढ़बो केलक। बहीनकेँ मिड्ल तक पढ़ा विआहो केलक। हमरा मैट्रिक तक पढ़ा शिक्षक बनौलक अपन विआहमे मायक विचार हम कटलौ। हुनकर मन रहनि जे गिरहस्तक बेटीसँ वियाह करब जबकि हम नोकरिया परिवारमे वियाह केलौ। हमहू आगू-पाछू नहि बुझियै। मुदा आब बुझै छी जे गलती केलौ। वियाह ते सिर्फ लड़के-लड़कीक नहि होइत अछि। जहिना उमेरक खियाल लड़का-लड़की (बर-कनियाँ) मे देखल जाइत तहिना परिवरो आ समाजोक खियाल हेवाक चाही। पुरुष-नारीक संबंध तँ सृष्टिक सृजनक एक प्रक्रिया छी। मुदा एहिसँ भिन्न जिनगी होइत। जे व्यक्ति, परिवार आ समाजसँ जुड़ल रहैत अछि। हम पढ़ल-लिखल, लहक-चहक परिवार बुझि विआह केलौ मुदा परिवार आ समाज दिशि नजरिये ने गेल। एखन धरि परिवार साधारण किसानक रहल जबकि अहाँक परिवार तीनि पुस्तसँ नोकरी करैत आइल अछि। नोकरिया परिवारक आ किसान परिवार चलैक ढ़ंग अलग-अलग होइत। दू तरहक चालि-ढालि, दू तरहक जीवैक ढंग दुनूक बीच होइछै। तेँ आब वुझै छी जे मायक विचार नीक छलनि। एत्ते सुनिते गहूमन साप जेँका रुमा फूफकार कटैत ओछाइनसँ उठि ठाढ़ भ’ गेली। ठाढ़ भ’ कहै लगलखिन- ‘‘हमर बाप-माय, खरचा दुआरे बोइर देलक। नइ ते नीक शहरमे अफसरनी बनि ठाठसँ रहितौ। अइ गाममे देखै छी जे ने एक्को बीत पीच सड़क अछि आ ने बिजली। ने एक्कोटा कोठा अछि आ ने कोनो सवारी। दम घोटि हम कहुना-कहुना जीवै छी। आ उल्टे ठका गेलौ अहाँ। बाह-बाह रे दुनिया।’’
केबाड़ लग ठाढ़ सुमित्रा, बचेलालक मुँहसे अपन गलती सुनि, मने-मन सोचै लगली, जे आब बचेलालकेँ होश जागल। होश जगैये मे मनुक्खकेँ देरी होइत अछि, मुदा जगला पर ते ओ अपन रास्ता बनवैत आगू बढ़ै लगैत अछि। जहिना सलाईक काठीसँ छोट-छीन आगिक लौ निकलैत अछि मुदा अनुकूल स्थिति पाबि ओ कत्ते विराट रुपमे बदलि जाइत, जे एक घरक कोन बात जे गामक-गाम के क्षण-पलकमे स्वाहा क’ दैत। ई बात मनमे अबिते सुमित्रा ओसारसँ निच्चा उतड़ि अंगना बहारै लगली। फूफकार भरल रुमाक बात सुनि बचेलाल बाँहि पकड़ि बुझबैत कहै लगल- ‘‘बिगड़ू नहि! बुझू। अखन धरिक जिनगीक जे नीक-अधला भेल ओकरा बिसरि, आबो होशसँ चलू।’’
पतिक बात सुनि रुमा धड़फड़ाकेँ कहलकनि- ‘‘हँ, आब पोथी-पतरा उलटा क’ जोतखी बनू। दिन गुनू। तकदीर देखू।’’
‘‘हँ, जिनगीक लेल ज्योतिक (ज्ञानक) जरुरत सबकेँ होइत। जाधरि मनुक्खमे ज्योति नहि आओत ताधरि अनभुआर बटोही जेँका कतय बौआएत तकर ठीक नहि। जाउ, घर-अंगनाक काज सम्हारु। हमरो बजार जाइक अछि। अछेलाल काका सेहो तैयार भेल हेता।’’
एत्ते कहि बचेलाल घर स’ निकलि हाँइ-हाँइ अपन क्रिया-कर्ममे जुटि गेल।
कने कालक उपरान्त जुगायक संगे अछेलाल पहुँच गेल। सुमित्रा आंगन बहारि डेढ़िया बहारति रहथि कि दुनू गोटेकेँ देखलनि। मुस्कुराइत सुमित्रा अछेलालकेँ कहलखिन- ‘‘बड़ बनल-ठनल भोरे-भोर देखै छी। की रातिमे नीन नहि भेल?’’
मने-मन अछेलाल सोचै लागल जे भौजी कोना बुझि गेलखिन?
मुस्कुराइत बचेलाल कहलकनि- ‘‘बारह बजे रातियेमे निन्न टुटि गेल भौजी। मन पड़ि गेल जे बजार जाइ ले बचेलाल कहने रहथि। तखनसँ निन्नो ने भेल। जहाँ कने निन्न अबै की चहा क’ उठी जे भोर भ’ गेलै। कौआ डकिते पर-पाखानासँ आबि तमाकुल चुनबैत रही कि जुगाय आबि गेल। काल्हिये जुगायकेँ कहि देने रहियै जे तोँहू बजार चलिहह। रस्तेमे निचेन से गप्पो करब आ बाजारक काजो करब। दुनू गोरे तमाकुल खा विदा भेलौ।’’
दुनू गोटेकेँ दरवज्जा पर बैसाय सुमित्रा चाहक जोगार करै लगली। जाबे बचेलाल धोती-कुरता पहिर तैयार भेल, ताबे चाहो बनि गेल। सभ क्यो चाह पीलनि। तीनू गोटे चाह पीबि, बाजार विदा भेल। गामक सीमा टपला बाद बचेलालकेँ अछेलाल कहलक- ‘‘बौआ, हम ते मुरुख छी। अहाँ पढ़ल-लिखल छी तेँ अहाँ जेँका कन्ना बुझबै। मुदा भौजीक गप्प सुनलासँ मने बदलि गेल। अखनो हुनका दखै छियनि जे भोरे सुति उठि अपन काजमे लगि जाय छथि। सब काज सम्हारि समय पर नहा-खा क’ आराम करै छथि। ने कोनो तरहक हरहर-खटखट आ ने कखनो मनमे क्रोध आ कि चिन्ता रहै छनि। जखन देखै छियनि तखन ठोर पर हँसिये रहै छनि। ने ककरोसँ मुहा-ठुठीसँ होइ छनि आ ने ककरो अधला गप कहै छथिन। गाम मे देखै छी जे हुनकर बतारी बुढ़िया सभ भोरेसँ गारि-गरौबलि, उकटा-उकटी शुरु क’ दैत अछि। गारि सुनैत-सुनैत जखन मन अकछा जाइ अए तखन भौजी लग आबि अपन दुख-धंधाक गप-सप करै लगै छी।’’

अछेलालक बात सुनि बचेलाल पूछलक- ‘‘ऐना किऐक होइछै?’’
मनुख त’ कुत्ता-बिलाई नइ छी जे एक-दोसरकेँ देखिते आखि गुड़ारि पटका-पटकी करै लगै अए।’’
मुँह सकुचबैत अछेलाल बाजल- ‘‘बौआ, देखै छी जे धिया-पूता सब खाइ ले कनै अए मुदा मौगी आ मरदाबा सब किअए झगड़ा करै अए। से नइ बुझै छी। जँ ककरोसँ पूछबै ते दोसर कहत जे फल्लाँ-फल्लाँकेँ चढ़बै छै। तेँ ककरो पूछबो ने करै छियै। गामोमे, तेनाहे सन लोक सबसँ बज्जो-भुक्की अछि। सदिखन अपन दुख-धंधामे लगल रहै छी।’’
अछेलालक बात सुनि बचेलाल जुगायकेँ कहलक- ‘‘भाय, अपनो दुनू परानी आ बेटो-बेटीक नाम से बैंकमे रुपैआ जमा अछि। ओहीमे से उठाके अहूँक बेटीक वियाह निमाहि देव। आ जँ आगुओ कोनो खगता हैत त’ ओहो सम्हारि देव। तेँ मनसँ चिन्ता हटा लिअ। एकठाम रहने एहिना-सबहक काज सभकेँ होइछै।’’
बचेलालक बात सुनिते जुगाायक मुहसँ हँसी निकलल। बिलाइल आशा मनमे पहुँचल। जहिना कतौ जाइमे रास्ता बदलैत तहिना जुगायक जिनगीक रास्ता चैबट्टी पर पहुँच, मुड़ै लगल। अपन मजबूरी देखबैत बचेलालकेँ कहलक- ‘‘भाय! पाइक दुआरे घरवालीकेँ डाक्टर लग नइ ल’ जाइ छी। बेचारी तीन सालसँ दुखकेँ अंगेजने अछि। पाइक लार-चार नै देखै अए तेँ चुपचाप देह मारने अछि। मुदा हम ते देखै छी जे दिनो-दिन खिआइले जाइ अए। जत्ते काज बेचारी पहिने करै छलि तेकर अदहो आब नै क’ होइ छै। मुदा की करब? खरचा दुआरे धिया-पूताके इस्कूलो ने जाइ दइ छियै। कहुना-कहुना दिन कटै छी। करजाक डर होइ अए। गाममे देखै छी जे तेहेन चंठ महाजन सब अछि जे एक के तीनि कहि घर-घरारी लिखैने जाइ अए। अखैन थोड़े खेत अछि तेँ दिके कि सिके गुजर क’ लइ छी। जँ ओहो चलि जाइत तखन ते अपनो आ धियो-पूतोकेँ भीख मांगै पड़तै। गामेमे देखै छी जे जनकाके पहिने जोड़ा बड़द छलै। करजामे फँसि गेल। सब सम्पत्ति बोहा गेलै। एहिना मुनेसरा करजे दुआरे गामसँ भागि नेपालमे बसि गेल। मुदा हमरा कुल-खनदानक मोह लगै अए। कोना बाप-दादाक धरारी पर, अनका हर जोतैत देखवै। अखैन तँ इहो आशा अछि जे मरबो करब ते अपन बाप-दादाक लगौलहा कलम-गाछीमे जराओल जायब। मुइलहा सब पुरखाक संग एक ठाम रहब। जिनगी ने थोड़ दिनक होइत मुदा मृत्यु तँ अधिक दिनक होइत अछि।’’
जुगायक बात सुनि बचेलालक मनमे आशा-निराशाक, सुख-दुखक हिलकोर उठै लगलै। जहिना शिकारीक तीर लगलासँ कोनो चिड़ै गाछ परसँ छटपटाके निच्चा गिरैत तहिना बचेलालक विचार कल्पना लोकसँ यथार्थ लोकमे गिरल। यथार्थलोकमे गिरिते बचेलालक हृदय, मोम जेँका, पघिलै लगल छल।
दुनू आखि उठा जुगायकेँ देखि कहलक- ‘‘भाय! बजार लग आबि गेलौ? आब ओ सब बात छोड़ू। बजारमे जे काज अछि से सब मन पाड़ि लिअ। नइ ते काज छूटि जायत। परिवारक गप करै ले त’ दुआर-दरवज्जा अछिये।’’
अछेलाल बाजल- ‘‘बौआ! इस्कूल जाइ-अबै ले पहिने साइकिल कीनि लेब। तखन खेती-बाड़ी ले कोदारि, खुरपी, हँसुआ, कुड़हरि, टेंगारी, पगहरिया कीनब। हमरा नजरिमे एतबे अबै अए।’’
अछेलालके चुप होइते धड़फड़ाकेँ जुगाय बाजल- ‘‘भाय, अपना टोलमे ने एक्कोटा लाइट अछि आ ने दड़ी। जखन कोनो नमहर काज बजरै अए तखन अंगने-अंगनेसँ बिछान, लालटेम आ बरतन मांगि-मांगि काज चलै अए। तेँ ओहो सब कीनब जरुरी अछि।’’
जुगायक बात सुनि मूड़ि डोलवैत बचेलाल कहलक- ‘‘जुगाय भाय! अहाँ बड़ सुन्नर काज मन पाड़ि देलौ। मनमे अपनो छल। मुदा सोचै छलौ जे सैाँसे टोल मिलाकेँ कीनब, नीक हैत। मगर सब एक्के रंग त’ नइ अछि। क्यो हुबगर छी ते क्यो खगल। ई सोचि चुप्पे रहि जाइ छलौ।’’
बचेलालक बात सुनि मुस्की दैत अछेलाल कहलक- ‘‘बौआ! सझिया चीज दू तरहक होइछै। एक तरहक जे अहाँ कहलियै। आ दोसर तरहक होइछै जे असकरे कीनि समाजमे द’ देब। जेकरा लोक धरम कहैछै।’’
धरमक नाम सुनितहि उत्साहित भ’ बचेलाल बाजल- ‘‘ओना हम रुपैआ जुगाय ले अनने छी, मुदा वियाहमे अखन देरिओ अछि आ हमरो रुपैआ बैंकमे अछिये। तेँ ई काज पाछुऐ करब। अखन जहि समानक चर्चा केलौ, से सब कीनि लिअ।’’
बचेलालक बात सुनि अछेलालोक आ जुगाइयोक मनमे खुशी भेल। बाजार प्रवेश करिते तीनू गोटे साइकिल दोकान पर जा साइकिल कीनलक। साइकिले दोकान पर दू-टा लाइटो कीनलक। साइकिलकेँ गुड़केने बचेलाल लोहा-लक्कड़ दोकान पर गेल। दोकान पर जा सभ लोहाक सामान कीनि, बोरामे राखि सुतरीसँ बान्हि साइकिलक कैरियर पर लादि, तीनू गोटे बरतनक दोकान पर गेल। बरतन दोकान मे दूटा पितरिया बरतन कीनि, दड़ी दोकान पर गेल। बीस हाथ नमती दड़ी कीनि, दोकानेमे राखि, ओही नापसँ कपड़ा दोकानमे जाजीम सेहो कीनलक। सभ सामान कीनि तीनू गोटे हलवाइक दोकान पर जा जलखै केलक। सभ सामान घर पर कोना जायत? तीनू गोटे गर अँटबै लगल। अछेलाकेँ गर अँटि गेल। बाजल- ‘‘एकटा बरतन हम कान्ह पर ल’ लेब आ एकटा जुगाय। एक-एकटा लाइट दुनू गोरे हाथमे लटका लेब। बाकी सब चीज साइकिल पर ल’ लेब। तीनू गोरे गप-सप करैत चलि जायब।’’
जिनगीक नव रास्ता भेटिने तीनू बचेलाल, अछेलाल आ जुगायक मन उधिआइत। बचेलालकेँ होय जे आइ रास्ता पर एलौ। अछेलालकेँ मनमे होय जे जाधरि मनुक्खकेँ काज करैक साधन नहि हेतइ ताधरि लूरि-वुद्धि रहनौ बेकार रहत। मुदा हाथमे औजार ऐने काजोक गति बढ़ैत आ अपने संतोष होइत। जबकि जुगायकेँ होय जे जइ दुआरे अपनो आ परिवारो अटकि गेल छल, ओ आगू ससरत। आइ धरिक दुख काल्हिसँ मेटा जायत। जहिना अन्हार राति समाप्त होइते दिनमे सभ कुछ देख पड़ैत तहिना तीनू गोटेकेँ होइत।
घर पर अबैत-अबैत मुन्हारि साँझ भ’ गेल। घर पर आबिते अछेलाल सुमित्राके सोर पाड़ि कहलक- ‘‘भौजी, लालटेन नेने आउ।’’ असकरक दुआरे सुमित्रा आंगन आ दरवज्जाक बीच ओलती लग विछान विछा, लालटेनके पछबरिया घरक कोनचरमे टाँगि, बैसलि छली। कखनो-कखनो उठि क’ सुमित्रा रस्ता पर आबि-आबि देखवो करैत।
अछेलालक आबाज सुनि सुमित्रा लालटेन नेने दुआर पर ऐली। नव-नव सामान देखि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे, जे काज आइ भेल ओ बहुत पहिनहि हेबाक चाहै छलै। मुदा देरियो भेने काज तँ भेलि। लालटेन राखि सुमित्रा, चोट्टे घुरिके आंगन जा, पुतोहूकेँ कहलनि- ‘‘कनियाँ बौआ आइल। झब दे चाह बनाउ।’’ कहि दरवज्जा पर ऐली। अछेलाल आ जुगाय ओसार पर बरतन आ लाइट रखि, साइकिल परक सामान उताड़ै लगल। बचेलाल कुरता-गंजी निकालि, चैकी पर रखलक। चप्पल क’ चैकी तर मे रखि धोतीके खोंसि फाँड़ बान्हि, गर लगा-लगा सभ चीज रखै लगल। साइकिलके ओसारक दावामे सेहो लगौलक। ताबे रुमा चाह बनौने ऐली। रुमा हाथसे चाह ल’ सुमित्रा तीनू गोटेकेँ हाथमे द’ पूछलखिन- ‘‘बौआ, पाइनियो पीबि।’’
अछेलाल- ‘‘नइ भौजी। अखैन ते चाहो ने पीवितौ। गरमा गेल छी। जावे दू डोल पानि देह पर नइ ढारब तावे ठंढ़ाइब नहि।’’
कातमे ठाढ़ भ’ रुमा सभ सामान देखैत। सामानो देखैत आ तरे-तर जरबो करैत। मने-मन विचारैत जे साइकिल लेलनिसे बड़वढ़िया, मुदा आन चीज किऐक लेलनि? अनेरे पायके दुइर किअउ केलनि? खुलिके त’ रुमा किछु नहि बजैत मुदा तरे-तर गुम्हरैत। तामसे आंगन जा चुल्हि लग बैसि अन्ट-सन्ट बचेलालकेँ कहथिन। अछेलाल आ जुगाय, चाह पीबि दरबज्जाक कोठरीमे सभ वस्तु सरिया क’ रखि देलक। अछेलाल जुगायके कहलक- ‘‘जुगाय जखन चाह पीबे केलौ ते तमाकुलो खाइये लाय।’’
जुगाय तमाकुल चुनबै लगल। अछेलाल सुमित्राके कहलक- ‘‘भौजी, जे मनमे छलै से आइ पूरा भ’ गेल। भिनसरमे दड़ियो उधारिके देखा देब। बड़ सुन्दर अछि। यैह दड़ी ते कत्ते दिन चलत।’’
सुमित्रा मने-मन खुशी होइत। ई दुनू गोटे तमाकुल खा, चलि गेल। बचेलाल धोती बदलि माय लग बैसि, सामानोक चर्चा करैत आ दामो कहैत। एक्के परिवारमे हर्ष-बिषाद लड़ै लागल...! बचेलाल मने-मन सोचैत जे कोनो नीक काज परिबारमे भेने, परिवारक सभ समांगके एक्के रंग खुशी किऐक ने होइछै? हँ, ई बात जरुर जे खास व्यक्तिकेँ खास वस्तु भेने खुशी जरुर होइछै, किन्तु दोसरके ओहिसँ जलन त’ नहि हेबाक चाही। मुदा औझुका जे वस्तु अछि ओ त’ व्यक्तिगत नहि छी? जखन जकरा जहि वस्तुक जरुरत हेतै से उपयोग करत। तइमे दुख कत्तसँ चलि आयल! रुमाक आवाज दुनू माय-पुत सुनैत रहथि। मुस्की दैत सुमित्रा बचेलालके कहलक- ‘‘बौआ! जहिना ककरो बिढ़नी काटि लइ छै आ दरदे छड़पटाइये तहिना कनि॰ाोंके भ’ रहलनि हेन। कमाइल पाइ तोहर खरच भेलह, हुनकर ते किछु नहि भेलनि? तोरा खुशी छह आ हुनका किऐक एत्ते दुख भ’ रहलनि?’’
सुमित्राक बात सुनि बचेलाल बाजल- ‘‘माय! हमहू तँ यैह सोचि रहल छी जे हुनका किऐक एत्ते दुख भ’ रहलनि अछि?’’
बचेलालके वुझबैत सुमित्रा कहलखिन- ‘‘बौआ, यैह छियै स्वभाव। मनुक्खक रोगक जड़ि। जेहन जेकर स्वभाव रहैछै, ओ ओहने काजके नीक वुझैत अछि, भलेही ओ अधले किअए ने होय। अखन तोहूँ थाकल छह। जँ नहाइकेँ मन होइ छह ते नहा लाए। अगर नहेवह नहि ते देहे-हाथ धोय लाय। मन चैन भ’ जेतह।’’
‘‘नहाइक मन त’ अपनो होइ अए। भरि दिन ठाड़हे छलौ। मुदा सब काज भ’ गेल।’’-बचेलाल कहलक।
सुमित्रा आंगनसँ बाल्टीन आ लोटा आनि बचेलालकेँ देलक। बचेलाल नहाइ ले कल पर गेल, सुमित्रा लालटेनक इजोतमे खुरपी, हँसुआ देखै लगली। नहा क’ बचेलाल सोझे अंगना जा खाइ ले बैसल। बचेलालकेँ ओसार पर देखि रुमा जोर-जोरसँ अन्ट-सन्ट बजै लगलि। गौरसँ रुमाक बात सुनि बचेलाल कहलक- ‘‘ऐना तामस किऐक उठल अछि? कोन अधला चीज देखलिऐ जे एत्ते बिगड़ल छी?’’
बचेलालक बात सुनि रुमा गरजिकेँ कहै लगलनि- ‘‘जखन लोकके मैत खराब भ’ जाइछै, तखन एहिना करै अए।’’
मने-मन बचेलाल सोचै लागल जे जत्ते अपन पुरुषत्वकेँ दाबि रखने छी तत्ते ओ कंठ पर चढ़ल जाइ अए। तेँ एक नै एक दिन मुह खोलै पड़त। असथिर मुदा सक्कत शब्दमे बचेलाल रुमाके कहलक- ‘‘बहुत सुनलौ। मुह बन्न रखू। अपन सीमा टपब ते बुझि लिअ हम पुरुख छी। जत्ते अहाँकेँ सिनेह केलौ तत्ते अहाँ हमरा कमजोर बुझैत गेलौं। आबो चेत जाउ!’’
बचेलालक बात सुनि रुमा चुप भ’ गेलि। किन्तु मुँहेटा...!
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जिनगीक जीत:ः 9
अदहा अखाढ़ बीति गेल। जेठुआ बरखाक बाद बीचमे दूटा अछार भेल छल। सबहक बीआ रोपाउ भ’ गेलै। अड़िया-लंघन बरखा भेल। पानि छुटिते गिरहस्त सभ कोदारि ल’ ल’ खेत दिशि विदा भेल। क्यो अपन खेतक आड़ि बन्हैत ते क्यो अपन खेतक पानि बहाबैत। क्यो आड़ि-कोन बनबैत ते क्यो हाँइ-हाँइ धानक बीआ उखाड़ैत। एक खेप सजन हरखाड़ा आ चैकी खेतमे राखि आयल आ दोहराके बड़द आ कोदारि लइ ले गाम पर आयल। सजन केँ घरवाली कहलक- ‘‘रोटियो पकिये गेल तेँ जलखै कइये लिअ। हमहू पानि पीबि बीआ उखाड़ै चलि जायब।’’
सजन हाथ-पाएर धोय जलखैयो करैत आ घरोवालीकेँ कहैत- ‘‘तीनि कठबा कोली रोपि लेब। हम जाइ छी, खेतो जोइत लेब आ कोनो-कान सरिया देबै। अहूँ जा क’ चारि जोड़ा बीआ खीचि लेब आ आबिके भानसो क’ लेब। अखन बीआ उपरेमे हैततेँ उखाड़ैमे देरियो ने लागत। ओना खेत जोतले अछि तेँ हमरो अबेर नहिये हैत। अखन जे कदबा आ बीआ उखरि जायत ते बेेरु पहर दुनू गोटे साँझ धरि रोपिओ लेब।’’
जलखै क’ सजन बड़द जोड़ि, खेत विदा भेल। दक्षिनबरिया बाध ऊँचतेँ गामक अधिक गिरहस्त ओही बाधमे। देवन आ बुधनी सेहो गेल। हरक जोगार नइ रहने देवन कोदारियेसँ खेत तैयार करैक विचार केने। देवन खेत तीन कोला आगू सजनक खेतसँ। तेँ सजनेक आड़ि पर देने तीनू गोटे देवन जाइत। देवनके कान्ह पर कोदारि देखि सजन पूछलक- ‘‘देवन, तोँहू अही खेतके रोपबह?’’
‘‘हाँ, भैया। पाँच कट्ठाक कोला अछि। दू-तीनि दिनमे रोपि लेब।’’-देवन बाजल।
सजन- ‘‘देवन! जा दुनू गोरे बीये उखाड़िहह। हमरो तीनिये कट्ठा खेत अछि। लगले भ’ जायत। तोरो खेत तँ तमले छह। एकटा चास क’ देबै तेही मे कदबा भ’ जेतह। पहिल पानि छियै, एक रत्ती अबेरे ने हैत मुदा तोरा त’ काज चलि जेतह। कदबा भेलि रहतह, निचेनसँ रोपैन करैत रहिहह। जखने खेतमे चैकी पड़ि जायछै कि पानि सुखैक डर कम भ’ जाइछै।’’
सजनक बात सुनि बुधनी मने-मन सोचै लागलि। जे नीक सगुनसँ निकललहुँ। अदहा काज ओहिना भ’ गेल। एक झोक जे दुनू गोरे बीआ उखाड़ब तेही मे तँ अदहा खेतक बीआ उखाड़ि लेब। खेतो जोताइये जायत। बीओ हल्लुके अछि, तखन ते रोपिनाइयेटा ने रहत। बैसि-उठिके दू दिनमे रोपि लेब। ‘रोपिलेब’ बुधनीक मनमे अबिते, खुशीसँ मन नाचि उठलै! सोचै लागलि जे पाँच कट्ठा खेत अषाढ़ भेने कहुना-कहुना तीन मासक बुतातक ओरियान त’ भइये जायत। तीनि मासक बुतात ले मिहनत कत्ते भेल। एहिना पनरहो कट्ठा अबादैमे आठ-दस दिन लागल। दुनू गोटे विदा भेल। सजनक खेतक आड़ि टपला बाद देवन बुधनीके कहलक- ‘‘दीदी, भरिगरहा काज सम्हरि गेल।’’
खेतमे पहुँचते बुधनी साड़ीके समेटि, खोंसि लेलक आ बीआ उखाड़ैमे, भीड़ि गेल। देवन कोदारिसँ खेतक कोन-कान तामै लगल। जाबे देवन तीनटा कोन, एकटा कोन पर बीये रहै, बनौलक ताबे बुधनी एक जोड़ा (दश आँटी) बीआ उखाड़ि लेलक। आड़ि बना देवन सेहो बीआ उखाड़ै ललग। हल्लुक बीआ देखि बुधनी देवनकेँ कहलक- ‘‘बौआ, उखाड़लो बीआ आठ दिन तक रहै छै। अगर सबटा बीआ उखड़ि जायत ते रोपिनाइयेटा ने रहत। एकटा काज ते सम्पन्न भ’ गेल रहत। जँ सब बीआ उखाड़ि लेब ते खेतो खाली भ’ जैत। जहिसँ जोताइयो जैत। नइ ते पाछू तामि-तामि रोपै पड़त।’’
बुधनीक बात सुनि देवन कहलक- ‘‘हँ, ठीके कहै छी दीदी। जाबे सजन भैया अपन खेत जोतत ताबे अपनो दुनू गोरे सबटा बीआ उखाड़ि लेब।’’
दुनू गोटे बीयो उखाड़ै आ गप्पो करै।
बेसी काज देखि सजन बड़द रबाड़िकेँ हँकै लगल। सजन हरो जोते आ मने-मन सोचबो करै जे मनुक्खेक काज मनुखकेँ होइत अछि। आइ जकरा हम नीक करबै, एक नइ एक दिन ओहो जरुर नीक करत! तहूँमे जे गरीब अछि ओ जँ नहियो बदला सठायत तइयो गरीबक उपकारकेँ लोक धरम कहैछै। काजो भरिगर नहिये अछि। पहिल दिन कदबा करै ले एलौ हेन, बड़दो सब कोनो थाकल थोड़े अछि। जहिना खेत सहगर अछि तहिना बड़दो जिड़ाले अछि। एकटा चास मेंहीकेँ क’ लेब आ समारक बेड़िमे लाभरो-जीभरकेँ क’ जोति लेब तइयो कदबा बनबे करत। तोहूँमे जरल जमीनमे बरखा भेल। खेत ओहिना माँड़-माँड़ भेल अछि।
थोड़े काल बीआ उखाड़ि देवन बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, ताबे अहाँ बीआ उखाड़ू, हम सजन भैयाकेँ देखने अबै छी।’’ कहि देवन सजन लग गेल। देवनकेँ देखिते सजन कहलक- ‘‘बौआ, कते बीआ उखाड़ै ले रहलह हेन? हमरा लगिचा गेल।’’
चोट्टे देवन घुरिकेँ खेत आबि बुधनीकेँ कहलक- ‘‘दीदी, हाँइ-हाँइ बीआ उखाड़ू सजना भैयाके कदवा लगिचा गेलै।’’ दुनू गोटे हाँइ-हाँइ बीआ उखाड़ै ललग। जहाँ तीनि गफ्फी बीआ भ’ जाय कि आँटी बान्हि लिअए। आँटी बन्हैत बुधनी कहलक- ‘‘बौआ, जहिना सजन भैया कदबा क’ देथुन तहिना हुनको कहिहनु जे आइ-काल्हि त’ अपने रोपब। जखन अपन खेत रोपा जैत तखन अहूँ क’ सम्हारि देब। किएक तँ हुनका बेसी खेत छनि। जँ अपनो दुनू गोटे हुनका रोपैन सम्हारि देवनि ते हुनको रोपनि अगते भ’ जेतनि।’’
अपन कदबा क’ सजन चैकी लधले बड़द आ हर कान्ह पर नेने बुधनीक खेत पहँुचल। खेत पहुँच बरहा लगले चैकी खोलि, घिसिओने दोसर खेतमे रखलक। हर लाधि सजन देवन लग आबि कहलक- ‘‘बौआ, बीआ तँ भइये गेलह। सब आँटीकेँ आड़ि टपा क’ राखि दहक। हमरा जोतै मे देरी नइ हैत।’’ सजन बैसि तमाकुल चुनबै लगल। बीआ टपा बुधनी सजनकेँ कहलक- ‘‘भैया, हमरा त’ पनरहे कट्ठा खेत अछि। जँ दू दिन सम्हारि दथि ते अगते काज हमरो ससरि जैत। हिनका ते बेसी खेत छनि, हमहू दुनू गोरे रोपि देवनि।’’
बुधनीक बात सुनि सजनक मनमे उत्साह बढ़लै! ठोरमे तमाकुल दैत सजन बाजल- ‘‘कनियाँ, बेसिओ खेत रहने रोपैनमे जन नइ लगबै छी, किअए नइ लगबै छी से बुझै छथिन। तेहेन गामक जन सब अछि जे सोलहो आना धियान ओकरा बोइने पर रहैछै। कहै ले आँटी गनिके उखाड़ै अए मुदा रोपै काल मूठक-मूठ बीआ गाड़ि देत। गिरहत हुअए कि जन, ओकरा मनमे ई हेवाक चाहियै जे खेती नीक जेँका होय। जखन खेती नीक जेँका हैत तखने ने उपजो नीक हैत। उपजा नीक हैैत तखने ने सबहक हालत सुधरत। से ककरो नेत म’ छइहे नहि।’’
बुधनी बाजलि- ‘‘भैया, सब रंगक लोक सब गाममे रहैछै। ने सब नीके होइत आ ने सब अधले। तखन ते लोकके अपने नीक-अधला देखि चलै पड़तै। क्यो किछु करह, मुदा सबकेँ अपने नीक बनैक कोशिश करक चाही ने?’’ तमाकुल खा सजन हर जोतै उठल हरक लागनि पकड़ि जहाँ एक मोड़ घुमल कि पूबरिया खेतमे (चारि कोला पूव) के हरबाह पटाक-पटाक मारैत सुनलक। पहिने ते हरवाहके कोनो शंके ने रहै जे हमरे मारै ले फुसियाहा अबै अए। मुदा जाबे किसुनमा हर ठाढ़ करै-करै ताबे मारि लागि गेलै। किसुनमा बुफगर। हर ठाढ़ क’ फुसियाहाके पकड़ि खेतेमे पटकलक। पटकिकेँ छाती पर बैसि किसुनमा मुहे-मँुह खूब चोटिएलक। सैाँसे बाध हल्ला भ’ गेलै। बीओ उखारनिहार आ हरो जोतिनिहार सब जम्मा भ’ गेल। दुनू गोटेक झगड़ा छोड़ा पूछै लगल। ताबे नवकी बीआ उखाड़व छोड़ि घर दिशि लफड़ल विदा भेलि। नवकी टोल पर जा पहिने फुसियाहा घरवालीके कहलक- ‘‘कनियाँ, तू अंगनामे छह आ घरवालाकेँ किसुनमा खुन क’ देलकह?’’ कहि नवकी लफड़ल किसुनमा अंगना गेल। किसुनमो अंगना जा किसुनमा भनसियाके कहलक- ‘‘कनियाँ! घरवला खून भ’ गेलह!’’
कना खून भेल?’’-किसुनमाक घरवाली बाजलि।
ऐँह की कहवह, फुसियाहा लाठी नेने गेल आ हाँइ-हाँइ देह पर चलबै लगल!’’
फुसियाहाक घरवाली किसुनमाकेँ अंगनेसँ गरिअबैत विदा भेलि। तहिना किसुनमोक घरवाली टोलसँ निकलि कनिये आगू बढ़ल कि दुनूक रास्ता एकठाम मिलि, एक्के रास्ता बाधक बनि जाइत। जइठाम दुनू रास्ता मिलैत तहि ठाम दुनूकेँ भेटि भ’ गेलै। एक दोसरके देखिते चिकैड़-चिकैड़ गारि पढ़ैत। एक ठाम होइते दुनूकेँ पकड़ा-पकड़ी भ’ गेलि। दुनू-दुनूककेँ झोंटा पकड़ने। घिचम-तीरा होइत-होइत दुनू गिरि पड़लि। मुुदा झोंटा दुनूक-दुनू पकड़िनहि। तरमे किसुनमाक भनसिया आ उपरमे फुसियाहाक। तरेसँ किसुनमाक भनसिया नाकेमे दाँत काटि लेलक। दाँत कटिते छड़-छड़ खुन फुसियाहा भनसियाकेँ बहै लगल। खुन गिरैत देखि फुसियोहोक भनसिया गालेमे दाँत काटि लेलक। ओकरो खून बहै लागलै। मुदा क्यो-ककरो छोड़ै ले तैयारे नहि।
अपना आंगन आबि नवकी भानस करै लागलि। नवकीकेँ, गामक लोक एहि दुआरे नवकी कहै जे पैछले साल वसुआसँ चुमौन क’ एहि गाम आइलि। नवकीक वसुआ चारिम पति। पहिल विआह नवकीकेँ रतुआर भेल। तीनिटा धियो-पुतो भेलि। एक दिन पतिसँ झगड़ा भेलै पड़ा क’ नैहर चलि आइल। धियो-पूतोकेँ छोड़ि देलक। साल भरिक बाद दोसर वियाह विसुनपुर केलक। नवकियोकेँ दोसर वियाह रहै आ घरोबला केँ। विसुनपुरोमे दूटा बच्चा भेलै। ओकरो छोड़िकेँ पड़ा गेलि। तखन तेसर केलक। तेसरोमे झगड़ा भेलै छोड़ि क’ पड़ा गेलि। चारिम सासुरमे नवकी। चारिम वियाह (चुमौन) चालिस-पेइतालिस बर्खक उमेरमे भेलै। तेँ गामक लोक सब नवकी कहैत।
फुसियाहा आ किसुनमा दुनू भजैत। दुनूकेँ एक-एक्केटा बड़द। खोतो कम्मे। अखाढ़क बरसा तेँ सबहक खेतो खसले आ बीओ रोपाउ। भोरहरबामे पानि भेल तेँ खेत रोपैक जोगार क्यो ने केने। सभ दिन अपन-अपन भाँजमे खेत जोतैत। पानि देखि फुसियाहा भोरे बड़दकेँ घरसँ निकालि, कुट्टी लगा, बीआ उखड़ै दुनू परानी खेत गेल। किसुनमोक खेत पनिआइल। हर खोलै बेरमे किसुनमा बड़द अनै फुसियाहा ऐठाम गेल। फुसियाहा घर पर नहि। तेँ दुनू गोटेमे भेटि नहि भेलै। भजैती बुझि किसुनमा बड़द लेने चल आयल। घर पर आबि अपना बड़दमे जोड़ि कदवा करै खेत गेल। थोड़े बीया उखाड़ि फुसियाहा हर लइ ले घर पर आयल। ते बड़दे नहि! हाथमे हरवाही पेना रहबे करै। किसुनमा ऐठाम आयल। ने बड़द ने किसुनमा घर पर। घर पर भाँज लगा फुसियाहा किसुनमाक खेत गेल। खेतमे किसुनमाके हर जोतैत देखलक। बिना किछु कहनहि-सुननहि किसुनमा पर पेना बरिसवै लगल। जाबे किसुनमा हर ठाढ़ करै-करै ताबे फुसियाहा सात-आठ पेना लगा देलक। थाल-पानि मे फुसियाहाकेँ पटकि किसुनमा खुब चोटियेलक। आन-आन हरवाह सभ दुनूकेँ छोड़ौलक। झगड़ा छुटलाक बादो दुनू-दुनूकेँ अनधुन गरिअबैत। दुनूकेँ सभ वुझा-सुझा, हर खोलि विदा केलक। अपन बड़द ल’ क’ फुसियहो विदा भेल। किसुनमा बड़दकेँ चरै ले छोड़ि देलक।
घर पर अबिते फुसियाहा घरवालीके देखलक। सैाँसे देह खून लागल। मुदा नाकक खुन बन्न भ’ गेल। घरवाली फुसियाहाकेँ सैाँसे, देह थाल लगल देखै। दुनू अंगनाक ओसार पर बैसि एक-दोसरकेँ देखैत। मने-मन फुसियाहा शपत खेलक जे किसुनमासँ बड़दक भजैती नइ राखब।
दुनूक भजैती छुटि गेल। गामक सभ अपन-अपन खेती करै लगल। ने एक्को धुर फुसियाहा धान रोपलक आ ने किसुनमा। किऐक तँ एकटा बड़दसँ हर कोना जोतैत?’’
साँझू पहर सजन वुधनीक ऐठाम आयल। भरि दिनक मेहनतसँ वुधिनियो आ देवनो थाकल। अंगनामे बिछान विछा वुधनी पड़ल (सुतल) आ देवन पाएरसँ जँतैत। सजनकेँ देखिते देवन कहलक- ‘‘आउ-आउ, भैया!’’
देवनक बात सुनिते वुधनी फुड़फुड़ा क’ उठि, देहक साड़ी सरिया, सजनके कहलक- ‘‘आबथु भैया। भरि दिन तते भीड़ भेलि जे देह दुखाइ अए तेँ देवनके जतै ले कहलियै।’’
सजनो बाजल- ‘‘आइ रोपनिक पहिल दिन छल, तेँ देह दुखाइ अए। जखन दू-चारि दिन एक लखाइत रोपैन करबै तखन अभियास भ’ जैत। तब देहमे दरद नै हैत।’’
बुधनी- ‘‘भैया! हमरा त’ कम्मे खेत अछि, हिनका ते बेसी छनि। आइ जे कदबा क’ देलनि, काल्हि तक ओकरे रोपब। एहिना ज दू दिन आरो सम्हारि देता तेहीमे हमर सब खेती भ’ जायत। अपन खेत जखन भ’ जायत ते हिनको जाबे हेतनि ताबे हमहू दुनू गोरे रोपि देवनि। अगते खेती दुनू गोड़ेक भ’ जायत।’’
सजन- ‘‘देखियौ कनियाँ, अगर लोक मिलानसँ काज करत ते सबहक काज असान भ’ जेतै। मुदा से नइ ने होइछै। आइये फुसियाहा आ किसुनमाकेँ देखलियै।’’
बिचहिमे देवन सजनकेँ कहलक- ‘‘भैया, ओइ दिन जे खिस्सा कहैत रहियै आ कहलियै जे दोसर दिन आगू कहब से कहियौ।’’
देवनक बात सुनि सजन अखियास करै लगल। मन पड़िते हँसैत बाजल- ‘‘अच्छा सुनह। (इशारा दैत) ओ रवियाक घर छियै। तूँ अनभुआर छह तेँ चिन्हा दैत छिअह। रविया आमक गाछी लगबैक विचार केलक। गाछ त’ पहिनहु रहै मुदा गाछ सब बुढ़हा गेलै। कैकटा सुखियो गेलै आ कैकटा बेचियो लेलक। सिर्फ एक्केटा पुरना गाछ बँचलै। जे कोनो साल फड़ै आ कोनो साल नै फड़ै। ओ हमरा आबिके पूछलक जे कोन-कोन आमक गाछ रोपी? आमक गाछ रोपब सुनि हमरा खूब खुशी भेल। खुुशी अइ दुआरे भेल जे समाजमे ककरो गाछी भेलासँ गामेमे आम बेसी हैत। अपनो खैत आ दोसरो खेतै। हमरो धिया-पूता टुकला बीछत। हम कहलियै- ‘‘रवि, नीक-नीक आमक गाछ(जे मीठो होय आ नम्हरो) रोपियह।’’ ओ कहलक जे- ‘‘गाछ कत-अ स’ आनव?’’
हम कहलियै- ‘‘अगर बजारमे कीनिवह ते ठका जेबह। कहतह कलमी आमक गाछ दइ छी आ भ’ जेतह सरही। तेँ आमक दोकानमे जा चुनि-चुनिकेँ नमहरका आम कीनि लिहह। गुद्दा खाकेँ सुआद देखि लिहक। जे नीक बुझि पड़तह ओकर आँठी रोपि दिहक। पनरहे दिनमे पिपही जनमि जेतह। आमक गाछकेँ पिपही लोक एहि दुआरे कहैछै जे आँठिक तरमे जे गुद्दा जेँका रहैछै ओकरा लोक सिलौट पर रगड़ि पिपही बनवैत अछि। तेँ ओकरा पिपही कहैछै। पिपहीकेँ ताक-हेर करैत रहिहह, जे बकरी छकरी ने खा। नमहर गाछके जँ बकरी खेबो करैछै ते निच्चासँ कनोजड़ि चलैछै मुदा पिपही वाला गाछकेँ खेने सूखि जाइछै। जखन पिपही कने नमहर हेतह ते ओकरा उखाड़ि ओकर मुसरा निच्चा दबाके काटि फेर रोपि दिहक। साले भरिमे डेढ़ हाथ-दू हाथक भ’ जेतह। तखन ओकरा थल्ला काटि दिहक। तीनिये सालमे फड़ै लगतह।’’
रविया सैह केलक। ओंगरी इशारासँ सजन छठुआक घर देखवैत देवनके कहै लगल- ‘‘ओ छठुआ की केलक ते रवियाक आमक गाछ गनि लेलक। बारहटा गाछ रहैक। अपन बाड़ीमे जनमल अनेरुआ बारहटा गाछ उखाड़ि क’ रखि लेलक। रातिमे रवियाक बारहोटा गाछ, उखाड़ि अपनामे रोपि लेलक आ अपन रवियामे रोपि देलक। रविया अनाड़ी, बुझबे ने केलक। तीनि सालक उपरान्त जब आम फड़ै लगलै, तखन रविया तजबीज करै लगल जे जेहेन आमक आँठी रोपने रही तेहेन त’ एक्केटा ने अछि। ऐना किऐक भेल? छठुआ अपन आमक बड़ाई जत्ते-तत्ते करै लगल। रवियाकेँ सेहो छठुआक आम देखि मनमे एलै जे जेहने आमक आँठी रोपने रही तेहने बुझि पड़ै अए। मुदा कहबै कोना?’’
‘‘रवियाक आंगनवाली आमक गाछ रोपैयेकालमे कबूला केने रहै जे पहिल बेरक फलसँ ब्राह्मण भोजन ब्रह्म स्थानमे करायव। जखन आम पकै लगलै, तखन सब गाछक आम मिला क’ दू चँगेड़ा सैंति क’ रखलक। एक मटकूरी दही पौरलक। एक अढ़ैया धानक चूड़ा कुटलक। बेरागन वुझि शुक्र दिनक नौत परोहित केँ द’ देलकनि। सबेरे आठ बजेमे पुरहित स्नान-पूजा क’ माथमे त्रिपुण्ड केने पहुँच गेलखिन। ब्रह्म स्थानक आगूमे सब सामान-चूड़ा, दही, चीनी, अँचार, आम, रखलक। पुरहितक नजरि आम पर पड़िते झुझुआ गेला, मुदा दही आ चूड़ा देखि सबुर भेलनि। रविया सब चीज परसलक। पुरोहित सब आमके बागि देलखिन, जे खट्टा अछि। खट्टा सुनिते दुनू परानी रविया तामसे आगि भ’ गेल। मुदा की करैत? चारि सालक मेहनत रविया, चोरकेँ उसरैग, छातीमे मुक्का मारि लेलक। फेरि रविया ओहि गाछीके उपटा दोहराकेँ रोपैक विचार केलक। हमरा आबिकँे पूछलक। हम कहलियै जे नसीवलाल कक्का ऐठाम चलि जा ओ सुतिहार छथि। ओ जना-जना कहथुन तेना-तेना करिहह।’’
‘‘रविया नसीवलाल काका ऐठाम पहुँच, पहिने पैछला खिस्सा कहलकनि। तखन गाछी लगवैक बात पूछलकनि। नसीवलाल काका रवियाके बुझवैत पूछलखिन- ‘‘कत्ते खेतमे गाछी लगेवह?’’
रविया बाजल- ‘‘बहुत खेतबला तँ हम नहिये छी। पाँचे कट्ठा उँचगर खेत अछि। जइ मे गाछी लगौने छलौ, ओहीमे लगाएव।’’
नसीवलाल- ‘‘बड़वढ़ियाँ। छअटा कलमी- एकटा बम्वई, एकटा रोहनिया एकटा जरदालू, एकटा मालदह, एकटा फैजली आ एकटा राइर-लगावह। एहि आमके रोपलासँ अदहा जेठसँ अदहा साओन धरि, बेराबेरी, चलैत रहतह। ई छबो आमक गाछ हम द’ देवह। पाइ-कौड़ी नइ लेबह। पाँचटा सरही सेहो रोपि दिहक। एकटा बेल, दूटा धात्री, एकटा गुलजामुन आ दूटा लतामक गाछ सेहो रोपिहह। सब मिलाके बढ़िया बगीचा भ’ जेतह। जँ सबटा कलमिये आम रोपवह त’ मौका-कुमौका मे जँ जारनक काज हेतह ते दिक्कत भ’ जेतह।’’
नसीवलालक बात सुनि रवियाक मन खुश भ’ गेल। नसीवलाल सेँ गाछ ल’ जा रविआ लगौलक। सभ गाछमे बेरही द’ देलक। दुनू परानी रविया गाछक ताक-हेरि करै लगल। ओइह गाछी अखन छै। दू सालसे फड़वो करैछै।
सजनक बात सुनि देवन कहलक- ‘‘भैया! आरो किछु कहिऔ?’’
देवनक जिज्ञासा देखि सजनक मुँहसँ मकईक लावा जेँका हँसी निकलल। हँसीकेँ कम करैत सजन हाथक इशरासँ तेतराक घर देखवैत कहलक- ‘‘ओ तेतराक घर छियै। वेचारा बड़ मुह सच्च। मुदा काज करैमे भूते छी। जहिना करीन पटबैमे तहिना कोदरवाहि करैमे। काज करैमे तेहेन पीतमरु अछि जकर जोड़ा गाममे नइछै। घरवाली बड़ होशगर। खानदानी घरक बेटी छी। ओना देखैमे पीरसियामे अछि मुदा रिष्ट-पुष्ट देह, पाँच हाथक नमगर-छड़गर। घर-आंगन स’ ल’ क’ खेत पथारक सब काजक लूरि। घरक जुइत अपने हाथमे रखने अछि। तेतरो निधैन रहै अए। घरवाली जैह करै ले कहलक सैह केलक। वेचारी घरक लछमी छी। खूँटा पर चारिटा माल रखने अछि। मालक सेबा तेहेन करै अए जे अनका सेहन्ता लगै छैक। जखन ओकरा बथान पर जेबहक ते हेत’ जे एत्तै बैसि रही। ने एक्को चोत गोबर कखनो थैरमे देखवहक आ ने थाल-खिचार। चानी जेँका थैर चमकैत रहैछै। माल-जाल पोसि क’ वेचारी सवा बीघा खेतो कीनलक, तीनिटा घरो बनौलक आ दुनू बेटीक वियाहो केलक। बेटिओ सब तेहेन लूरिगरछै जे नीक-नाहाँति गुजर करै अए। गामक क्यो ने कहि सकैत अछि जे तेतरा हमर एको-पाइ ठकने हैत। आ ने ककरो-कहियो गारि पढ़ने हैत। मुदा भगवानो कहियो वेचाराकेँ अधला नहि केलखिन। अगर कतौ जाइत रहत आ नजरि पड़तै ते सहटि के लगमे आबि तमाकुल खुऔत। अइ तीनि कोसीमे जँ कतौ नाच हेतै आ ओकरा भाँज लगतै ते आबिकेँ कहत। खेला-पीला बाद रातिमे घरवालीकेँ कहतै जे सजना भैयाक मन खराप भ’ गेलै तेँ ओ कहलक जे एतई आवि क’ सुतिहह। तेँ ओतइ जाइछी। बेचारी घरोवाली मन खराब सुनि मानि जायछै। दुनू गोटे नाच देखै जाइछी।’’
जइठाम नाच देखै जाइ छी तइ ठाम विपटा आ नटूआकेँ एक्को-दू रुपैया देबे करत।
बर्ख आठम, सजमनिया टोलक रुपलाल चैरी खेतक मोटका धानक बीआ सासुरसँ अनलक। वास्तवमे धानो नीक छलै। सैाँसे गामक गिरहस्त ओहि धानक प्रशंसा केलकै। पाँच मनक कट्ठा उपजबो केलै। ई गाम (विकासपुर) राघोबावूक जमीनदारीमे पहिने छल। राघोबावू अपन बेटीक वियाहमे खोंइछमे ई गाम द’ देलखिन। जइ दिनसँ खोंइछमे बेटीकेँ देलखिन तइ दिनसे उपजाक ससिये चलि गेलै। केहनो सुन्दर खेत आ केहनो सुन्दर धान होइते कट्ठा मनसँ बेसी हेबे ने करै। नइ ते आध मन, छअ पसेरी, पाँच पसेरी कट्ठा होय। मुदा जखन रुपलाल पाँच मनक कट्ठा उपजौलक तखन गिरहतक मनमे सुनगुनी एलै। तहियासँ गिरहत खेतमे खादो देमए लगल। आ जोतो-कोर बेसी करै लगल। बेसी उपजनमा धानक बीओ आन-आन गामसे अनै लगल। मुदा गामक बनावटो अजीव अछि। जत्ते धनहर खेत अछि ओ तीनि किसमक अछि। अधहा खेत गहीर अछि जकरा चैरी कहै छियै। छअ आना खेत उपरारि अछि आ दू आना निचरस। जइसँ की होइछै जे अधिक बरखा भेल त’ उपरका खेत उपजि जाइत आ निचला दहा जाइत। तहिना जँ कम बरखा भेल त’ निचला खेत उपैज जाइत आ उपरका मरहन्ना भ’ जाइत। मोटामोटी अदहा उपजा गिरहतकेँ होइत। मुदा तइयो किसान, भगवानक लीला बुझि, हँसैत-खेलैत समय बीता लैत।’’
रुपलालक धानक उपजा देखि तेतरा अपन स्त्री लड़ूबतीकेँ कहलक। लड़ूबती अपन पनरहो कट्ठा चैरी खेत ले पनरह सेर धान बदलि अनलक। ओइ धानके तेतरा नारक झट्टाक मोइर बना रखि लेलक। फागुन-चैत मे जखन चैरी खेत उखड़लै तखन खूब महियाकेँ जोइत धान वाओग केलक। बड़ सुन्दर धानक गाछ जनमलै। सभ दिन तेतरा दुनू परानी बेरा-बेरी जा-जा देखै। बीत भरि-भरिक जखन गाछ भेलै तखन दुनू परानी आठ दिनमे खुरपीसँ कमठौन केलक। बैशाखमे एकटा बिहड़िया हाल भेलै। कच्चे-बच्चेकेँ धान चलल। खेत भरि गेलै। अखाढ़मे डुमौआ बरखा भेल। आठे दिनमे धानक गाछ सड़किकेँ भरि-भरि जाँघक भ’ गेल। दुनू परानी तेतरा विचारलक जे सुरर्ा कमठौन करब। परात भने दुनू गोरे कमाइ ले गेल। आड़ि पर ठाढ़ भ’ दुनू परानी हियासि-हियासि धान देखै लगल। धान देखि लड़ूवती तेतराकँे कहलक- ‘‘तेहेन धान अछि जे थारी छिछलि जायत।’’ तेतराक मन सेहो गद्-गद् रहै, खिलखिलाके हँसै लगल। अपन खेत देखि तेतरा अनको-अनको खेतक धान देखि अपन धान से तुलना करै लगल। जेहेन धान तेतरा खेतमे छल ओहन आड़ि-पाटिमे ककरो नै। हँसैत तेतरा लड़ूबतीके कहलक- ‘‘अइ बेरि लछमी महरानी खुशीसँ तकलनि।’’ तेतराक बातमे अपन बात जोड़ैत लड़ूवती बाजलि- ‘‘जब भगवान दइ पर होइ छथिन ते छप्पर फाड़ि क’ दइ छथिन।’’ कहि दुनू परानी हँसै लगली हँसिते दुनू गोरे, कमठौन करै ले, खेतमे पैसल। कमठौन शुरु केलक। कनिये खानक बाद दुनू गोरेकेँ ठेंगी पकड़ि लेलक। बुझलक क्यो ने। खुन पीबि जखन ठेंगी लटकल तखन तेतराक नजरि पड़लै। नजरि परिते तेतरा फानिकेँ खेतक आड़ि पर ठाढ़ भ’ जोरसँ लड़ूबतीकेँ कहलक- ‘‘सबटा खुन ठेंगी पी ने जाइ अए। झब दे छोड़ाउ नइ ते जेहो देहमे खून बँचल अछि सेहो पीबि लेत।’’ तेतराक बात सुनि लड़ूबती खेतसँ उपर हुअए लागलि कि अपनो बाँहिमे ठेंगी लटकल देखलक। बाँहिमे ठेंगी लटकल देखि धड़फड़ाकेँ उपर हुअए लगल कि धानमे साड़ी लटपटा गेलै। साड़ी लटपटाइते आड़ि पर गीरि पड़लि। फेरि उठि पहिने लड़ूवती अपन ठेंगी छोड़ौलक। ठेंगीकेँ छोड़विते छड़-छड़ा क’ खून बाँहिसँ निकलै लगलै। चुटकीसँ माटि ल’ ठेंगी दाढ़मे लगौलक। खून बन्न भेलै। ताबे तेतरो अपन ठेंगी छोड़ा खेतमे फेकलक। फेरि कमाई ले खेतमे पैइसै लगल कि देखलक जे खेतमे सह-सह ठेंगी करै अए। मकठौन छोड़ि दुनू गोटे घर दिशि विदाभेल।’’
उपरका खेत सभ किसान अबादै लगल। पनरहे दिनमे सैाँसे गामक खेत अबाद भ’ गेलै। खेत ते अबाद भ’ गेल मुदा बरखो बन्न भ’ गेलै। उपरका खेत सभ सुखै लगलै। जेहो पानि खेतमे छलै ओहो बहि-बहि निच्चा खेतमे जमा भ’ गेल। जहिना जे गब किसान खेतमे रोपने छल ओहिना ओ लगि क’ ठाढ़। मने-मन सभ किसान सोचै लगल जे समय रौदियाह भ’ गेल। खेत सभमे दरारि फटै लगल। धानक निचला पात पीयर भ’-भ’ सूखै लगल। मुदा चैरी खेतक धान किसानक मुँहकेँ हरियर रखने।’’
‘‘दुर्गापूजासँ पाँच दिन पहिने एकटा अछार भेल। मुदा ओ पानि रस्ते-पेरे रहि गेल। मात्र चैरिये खेतटा मे ठेहुन भरि पानिक सलाढ़ पकड़ने। आब जँ आगू बरखा नहियो हैत तइयो चैरी उपजबे करत, ई बात सभ गिरहस्तक मनमे। हर्ष-विषादक बीच गामक सभ किसान। मुदा जहि गिरहस्तक अधिक खेत चैरीमे ओ बेसी खुशी आ जकर कम खेत ओ कम। तेतरा आ लड़ूबतीक खुशी अधिक। दुनू परानी तेतरा एहि दुआरे खुशी अधिक जे आन सालसँ बेसी धान हैत। डेढ़ बीघा खेत तेतराकेँ रहै। पनरह कट्ठा उपराड़ि आ पनरह कट्ठा चैरी। कोनो साल बीस मनसे बेसी धान नहि होय मुदा अइबेर नवका धानक आशा। चैरी खेतक धान, दुनू परानी तेतराकेँ नव उत्साह आ नव स्नेह दुनू परानीक बीच सेहो पैदा क’ देलक। जखन दुनू एकठाम बैसि परिवारक गप्प करै तखन पहिने चैरिये धानक चर्चा करैत।’’
‘‘गभहा सकरातिक(गभा संक्रान्तिक) दिन। आइ गामक सभ गिरहत अपन-अपन खेत जा कहत- ‘‘उखरि सनक बीट, समाठ सनक सीस’’ दुपहरेसँ दुनू परानीक बीच तेतराकेँ रक्का-टोकी हुअए लगल। रक्का-टोकीक कारण छल जे तेतरा कहैत जे हम चैरी जा कहवै। आ लड़ूबती कहैत जे हम जा कहबै। तेतरा कहैत जे पुरुख खेतमे जा कहैत, तेँ हम जायब। लड़ूबती कहै जे घरक गारजन जा क’ कहै छैतेँ हम कहबै। मुह दुब्वर तेतरा खिसिया लड़ूवतीकेँ कहलकै- ‘‘जाउ, अही जाकेँ कहिऔ।’’ मने-मन लड़ूवती सोचैत जे पनरहे कट्ठा खेत अछितेँ घूमि-घूमि सैाँसे खेत कहबै। अंगनाक सभ काज सम्हारि लड़ूवती खेत विदा भेलि। मनहूस भेल तेतरा दुआर पर बैसि, बीड़ी पीवि-पीवि मनकँे शान्त करै लगल। मन शान्त होइते तेतरा कुट्टी कटै लगल। घरक गोसाईकेँ गोड़ लागि लडू़वती सोचलक जे जँ क्यो रस्तामे टोकवो करत ते उनटिके जबाव नइ देबै। नइ त’ विधि भंग भ’ जायत। सनतौलिया आ बेटी अंगुरिया रस्ते कातमे मरहन्ना धान कटैत छलि। लड़ूवतीकेँ देखि सनतौलिया कहलकै- ‘‘एहिवेर हिनके बाजी सुतरल छनि। हमरा सबहक कपारमे आगि लगि गेलि।’’ सनतौलियाक बातक जबाव नहि द’ लड़ूवती मुह घुमा आगू बढ़ि गेली। जखन लड़ूवती दश लग्गी आगू बढ़लि तखन अंगुरिया मायकेँ कहलक- ‘‘एक्को बेर काकी बजवो ने कैल। संतोष दैत सनतौलिया बेटीकेँ कहलक- ‘‘बुच्ची, धने ऐहेन चीज छियै जे लोकके टेढ़ बना दइछै। भाय-भायमे गरदनि कटौबलि करा दइछै। स्त्री-स्वामीमे गरमेल करा दइछै। बाप-बेटामे खुन करा दइछै। तइ ले दुख किअए करै छैँ। दश कट्ठा अल्हुआ रोपने छी। कहुना-कहुना ते सय मन हेबे करत। कत्ते खेमे। अदहा बेचिके धान कीनि लेब। एक साँझ भात आ एक साँझ अल्हुआ उसनिके चाहे रोटी पकाकेँ खायब। कोनो की सबहक दिन कटतै आ हमर नइ कटत?’’
खेतक चारु आड़ि घूमि लड़ूवती धान क’ गोड़ लागि खेतमे धँसल। तर-तर गम्हरा धानमे। आंगुर सन-सन मोट। एकदम पोछल-पाछल शाही काँट जेँका। तरे-तर लड़ूवती खुशीसँ गदगद। चारि फेरा खेतमे लड़ूवती लगा, खेतसे निकलि मने-मन गोड़ लागि विदा भेलि। रास्तामे सोचै लागलि जे घरमे एक्कोटा नमहर कोठी नइ अछि, एत्त’ धान कत्ते राखब। से नहि त’ अखन महीना दिन धान हेबोमे लगत। तेँ एखने एकटा नमहर ढक बनवा लेब। अंगना अबैत-अबैत लड़ूवती तय क’ लेलक जे काल्हिये ढक बनौनिहारके कहि देबै। सूर्यास्त भेने तेतरा माल’ घर क’ ओसारक खूँटा लगा बैसल, मुस्की दैत लड़ूवती तेतराक लगमे आबि कहलक- ‘‘चैरीक धान ते फाटिकेँ उपजल अछि। घरमे एक्कोटा नमहर कोठी नइ अछितेँ एकटा नमहर ढक बनवा लिअ’?’’
तेतराक दिनका तामस पुनः जागि गेल। खिसियाकेँ पत्नीके कहलक- ‘‘ढक बनाउ की बखारी हमरा की पूछै छी? हमहू कोनो मनुखे छी? बहिया-खबास जेँका रहै छी आ रहब।’’
तेतराक कड़ुआइल बात सुनि कनडेरिये आँखिये लड़ूवती तेतराक आखिमे आखि गड़ा, दहिना हाथ माथ पर द’ पुचकारि क’ बाजलि- ‘‘ऐना जँ भैंसा-भैंसीक कनारि दुनू परानीमे लोक करै लगे तखन ते भ’ गेल। खेते देखैक मन अछि ते काल्हि जा क’ देखि आउ। खेत कतौ पड़ा जायत। तइ ले एत्ते तामस किअए केनेछी।’’
लड़ूवती अपन गल्ती अपन आखियेसँ मानि लेलक। तेतराक आखि गल्ती माफ करैत अपन बड़प्पनक आनन्द महसूस केलक। मुस्की दैत तेतरा कहलक- ‘‘छोटे-छोटे दूटा ढक बना लेब। एकटा बनोलासँ गड़बर भ’ जायत। एकछाहा ओते धान हैत तब ने। जँ से नइ हैत ते मोटका धानमे मेहिक्का धान कोना राखब?’’
मूड़ी डोलवैत लड़ूवती वाजलि- ‘‘कहलौ त’ ठीके। जकरा वेसी खेत रहैछै ओकरा वेसी धानो होइछै। तेँ नमहर-नमहर ढक वा बखारी बनवै अए। मुदा जे जेहेन गिरहत अछि ओ त’ ओहने कोठी आ कि ढक बनौत। गरीब-गुरबा भुरकुरी वा घइलेमे अन्न-पानि रखै अए।’’
दोसर दिन भोरे तेतरा ढक बनवै दे कहै ले लेलहा एहिठाम गेल। लेलहा गछि लेलक। दोसर दिन आबि लेलहा चारिटा भौर परहक अधपक्कू बाँस कटलक। दू दिनमे लेलहा चारु बाँस क’ चीड़ि-फाड़ि, छीलि-छालि क’ तैयार केलक। तेसर दिन ढक बनौनाइ शुरु केलक। लड़ूवती लेलहाकेँ कहलक- ‘‘भैया, एकटा मनही ढकिया सेहो बना दिहथि। छठिमे घाटो परक काज क’ लेब आ धान-तानक लड़ती-चड़ती हैत तँ धानो राखब।’’
मने-मन लड़ूवती छठि क’ हाथी कबूला केलक।’’
अगहन आयल। धनकटनी शुरु भेल। उपरका खेतमे त’ धान तेनाहे सन, मुदा तइयो जरलो-मरल धान काटि-काटि अनै लगल। पनरह अगहनसँ चैरी खेतमे हाथ लगल। तेतराक खेत बीचमे, तेँ पहिने किनहरिक धान कटत तखन ने रास्ता बनतै। रखवार किनहरिवला गिरहत सभकेँ धान कटै ले कहलक आ बीचक खेंतवलाकेँ कटैक मनाही क’ देलक। आठ दिन कटनीक उपरान्त तेतरा खेतक रस्ता खुजल। साँझेमे आबि रखवार तेतराकेँ कहि देलक। भोरे लड़ूवती भानस क’ दुनू परानी खेलक आ धान कटै विदा भेल। जाइसँ पहिने माल-जाल क’ खुआ-पीया लेलक। शीतलहरी दुआरे पानियो ठरल। रौदक पता नहि। आड़ि पर पहुँच, दुनू परानी तेतरा धानके निङहारि-निङहारि देखै लगल। धानक सीस ठारहे मुदा दाना एक्कोटामे नहि। लड़ूवतीक मनमे एलै जे भरिसक लोक चोरा क’ सुररि लेलक। तेँ रखवारकेँ तकै लगल। कनिये कालक बाद मनमे एलै जे कतका न’ सुररलक मुदा बीचला त’ नइ सुररने हैत। पाइनमे पैसि क’ धान देखै लगली। बीचोमे गक्कोटा धान नहि। झड़ल सीस देखि लड़ूवती हताश भ’ गेलि। अना भेल किअए? चारु आड़ि तेतरा घुरि-फिरि देखलक ते एक्के रंग बुझि पड़लै। ठकुआ क’ तेतरा आड़ि पर ठाढ़ भ’ गेल। ने किछु तेतरा बजैत आ ने लड़ूवती। दुनूक देहमे जना कनियो लज्जतिये नै रहल। एक त’ खेतक ठरल पानि, दोसर धानक सोग, कठुआ क’ लड़ूवती खेतेमे गिर पड़लि। अचेत। लड़ूवतीकेँ गिरल देखि तेतरा पजिया क’ कोरामे उठौलक। मूड़ी उठा-उठा लोककेँ देखैत जे सोर पाड़बै। मुदा लगमे क्यो नहि छल। कहुना-कहुना तेतरा लड़ूवतीकेँ उठा सुखलाहा खेतमे अनलक। लड़ूवती ओंघरा गेलि। जना एको-पाइ होशे नहि। मने-मन तेतरा सोचै लगल जे- ‘‘आब की करब?’’ किछु फुरबे ने करै। अनासुरती मनमे एलै जे पाएरक दुनू तरबा रगड़ने देहमे गरमी औतै, तखन उठि क’ ठाढ़ हैत। लड़ूवतीक तरबा तेतरा रगड़ै लगल। थोड़े कालक बाद लडू़वती आखि तकलक। आखि तकिते साड़ी सरिया लड़ूवती चुक्की माली भ’ बैसि गेली देह गरमाइते दुनू गोटे आंगन विदा भेल। अंगना अविते तेतरा घूर पजारलक। दुनू परानी भरि मन आगि तपलक।’’
बेरु पहर तेतरा हमरा ऐठाम आवि कहलक- ‘‘भैया, गरदनि कटि गेल। एक्कोटा धान खेतमे नइ अछि। जना क्यो सुररि नेने हुअए तहिना बुझि पड़ल।’’
हम पूछलियै- ‘‘धान सुररने छह कि झड़ल छह?’’
‘‘अगर सुररने क्यो रहैत ते अदहो-छिदहो तँ बँचल रहैत से एक्कोटा ने बँचल अछि।’’
हम कहलियै- ‘‘तोहर बीये खराब छेलह। अपने घरक बीया छेलह कि ककरो से नेेने छेलह?’’
-‘‘रुपलालसे नेने छलौ।’’
-‘‘ओइह तोरा ठकि लेलकह। उ चोट्टा औझुका ठक छी। गाममे ककरो नीक देखै चाहै अए। ओते जे चीज ढेरिऔने अछि से सबटा अपने कमेलहा छियै। मुह दुब्बर लोक डरे किछु कहबे ने करै छै तेँ छजल जाइ छै। जेहने चोट्टाक मुह छुटल अछि तेहने लठिधरो अछि। तेँ क्यो किछु कहबे ने करैछै। आब की करबह? सबुर करह।’’
टूटल आशा, विचलित मन, कनैत आखिसँ तेतरा कहलक- ‘‘भैया, एक्को कनमा धान नइ भेल। भरि साल की खायब?’’
आशा जगबैत हम कहलियै- ‘‘तोरा अपन सम्पत्तिक पते नहि छह। बहुत धन छह। एकटा बच्छा बेचि लेबह तेहिसँ छह मासक बुतात चलि जेतह। तकर बाद बुझल जेतै। तावे छह महीना कि कोनो हाथ पर हाथ ध’ बैसल रहबह।’’
‘‘जाइ छी भैया?’’
‘‘तमाकुल खा लाय।’’
‘‘तमाकुल खाइक मन नै होइ अए।’’
मन असथिर करह। कमाइवला बेटा लोकक मरि जाइ छै, सेहो सबुर लोक करिते अछि। तोरा ते खेतक उपजा गेलह। खेत छह ते फेरि ओइसँ नीक उपजा देखबहक।’’
अंगना आबि तेतरा सभ बात लड़ूवतीकेँ कहलक- लड़ूवतीक आखि लाल भ’ गेलि। जोर-जोरसँ बजै लगली- ‘‘रुपललवा गरदनि कट्टा छी। जेहने फौतिबा अपने अछि तेहने बौह छै। (तेतराकेँ कहलक) अहाँ अंगनेमे रहू, हम ओइ रुपललबा क’ सराध-बिटारि केने अबैछी। जाबे ओकरा सिरा आगू थूक नइ फेकबै, ताबे नइ बुझत।’’
विचित्र असमंजसमे तेतरा पड़ि गेल। कखनो होय जे अनेरे घरवालीकेँ कहलियै। त’ कखनो होय जे दुनू गोटे जा क’ रुपलालक दरवज्जा पर गरिआबी। फेरि होय जे रुपलाल समंगर अछि, बिना मारने छोड़त नहि। धनो गेल आ नाहकमे मारिओ खायब। अंतमे सोचलक जे भने अंगनासँ घरवाली गरिअबै अए। लड़ूबती अंगनेसँ रुपलालकेँ गरिअबैत रास्ता पर चलि आइलि। तेतरा आगूमे ठाढ़ भ’ बाँहि पकड़ि लेलक। जते तेतरा लड़ूवतीक बाँहि पकड़ि रोकैत तइसँ बेसी लड़ूबती कुदि-कुदि आगू बढ़ैक कोशिश करैत। आ चिकैड़ि-चिकैड़ि गरिऐवो करैत।’’
रास्ता धेने रुपलाल कतौसँ घर दिशि अबैत छल। लड़ूवतीक गारि सुनि चैंकि गेल मुदा आखि निच्चा केने अपना एहिठाम चलि आयल। हल्ला सुनि हमहू (सजन) गेलौ। तेतराक घरवालीकेँ देह परक साड़ी उधिआइल, केश खुजल, आखि लाल, गरैज-गरैज गारि पढ़ब सुनि कहलियै- ‘‘कनियाँ, चुप रहू। धैनवाद अहींकेँ दइ छी जे रुपलालके मुह पर गरिऐलौ। की करबै? जाबे अपना चीज नइ अछि ताबे एहिना ठक सब ठकत। देखबे केलियै जे रवियाक आमक गाछ छठुआ उखारिके रोपि लेलकै। चुप हौ, चुप हौ।’’
हमर बात सुनि बेचारी साड़ी सरिऔलक, माथ झपैत घुनघुना क’ बाजलि- ‘‘हिनका पैघ बुझै छिअनि भैया, तेँ बात मानि लेलिएनि, नइ ते आइ ओहि डकूबा के खापड़िसँ चानि तोड़ि दितिऐक।’’
आँखि मूनि देवन ध्यानसँ सजनक खिस्सा सुनैत। लड़ूवतीक बात सुनि आखि खुजलै। मने-मन देवन सोचै ललग जे रुपलालकेँ जत्ते सजा हेबाक चाहिऐकसँ नइ भेलै। किऐक ने भेल? शायद एकर यैह कारण रहल हैत जे समाजोमे शासक आ शासित लोक अछि। शासकक गलतीक जबाव देमएवला क्यो ने अछि। मुदा गरीब-गुरबाक गलती क’ उचितो स’ बेसी सजा देल जाइछै। कने काल गुम्म भ’ देवन सजनकेँ कहलक- ‘‘भैया, अहाँ गियानक बखारी रखने छी।’’
हँसैत सजन कहलक- ‘‘बौआ, रातियो बेसी भ’ गेल। भरि दिनक थाकल सेहो छी। तोहूँ खा क’ आराम करह आ हमहू जाइछी।’’
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जिनगीक जीत:ः 10
भोर होइते, एका-एकी टोलक लोक बचेलाल एहिठाम अबै लगल। लोककेँ अबैत देखि, सुमित्रा आंगन बाहरब छोड़ि, दरवज्जा पर आबि सभकेँ बैइसै ले कहै लगलखिन। सबहक मनमे जेहने खुशी तेहने जिज्ञासा। लोकक गल-गुल सुनि बचेलालो बिछानसँ उठि, लोकक बोली अकानै लगल जे कतौ किछु भ’ नेते गेलै। मुदा गल-गुलक तेहने बाढ़ि आबि गेल छल जे कोनो बात साफ-साफ बुझाइये ने पड़ैत। आखि मीड़िते बचेलाल दरवज्जा पर आबि देखलक। किछु गोटे चैकियो पर बैसल, किछु ठाड़हो आ किछु गोटे रस्ते-रस्ते अबितो। सबहक मन खुशी तेँ मुहमे हँसी। बचेलालकेँ सुमित्रा कहलक- ‘‘बच्चा, समाज सब, काल्हि जे दड़ी लाइट, बरतन कीनि क’ अनलह, वैह देखै ले एलखुन।’’
सुमित्राक बात सुनि बचेलाल कल पर जा माटियेसँ चारि घूसा दाँतमे लगा कुड़ूर क’ आयल। दरवज्जाक कोठरी खोलि सब सामान बचेलाल निकाललक। दड़ी आ जाजीमकेँ दरवज्जाक निच्चामे बिछा सभकेँ बैसवैत बचेलाल कहै लगल- ‘‘हम सिर्फ कीनिलहुँ मुदा छी अहाँ सभक। जिनका जाहिया काज हुअए, ल’ जायब। एहि दड़ी, जाजीम, लाइट आ बरतनकेँ अपन बुझि उपयोग करब।’’
बचेलालक बात सुनि सभ थोपड़ी बजौलक। अछेलाल सेहो आयल। सुमित्रा चाहक ओरियानमे आंगन गेली लोकक हिसाबे हुनका गरे ने अँटैन जे कथीमे चाह बनाएव आ पीबै ले कथीमे देब। घरमे चाहो-चीनी आ दूधो कम्मे अछि, अइ से पारो ने लागत। विचित्र असमंजसमे सुमित्रा। मुदा मनमे होइत जे दरवज्जा पर आइल समाजकेँ जँ चाहो ने पिऐवनि त’ घरक मोले कोन? अंगनेसँ सुमित्रा हाथक इशारासँ अछेलालके बजौलनि। सहटि क’ अछेलाल सुमित्रा लग आयल। अछेलालकेँ सुमित्रा कहलखिन- ‘‘बौआ, आइ पहिल दिन समाज दुआर पर ऐला, अगर चाहो नइ पीऐबनि ते केहेन हैत।’’ हूँ-हँ कारी भरैत अछेलाल कहलकनि- ‘‘हँ, इ त’ बड़ पैघ अपमान समाजकेँ हेतनि। आ समाजोसँ पैघ अपन घरक प्रतिष्ठाक हैत। सब चीज तँ अछिये तखन प्रतिष्ठाकँे मंगनीमे किऐक जाय देब। हम दूध नेने अवै छी। चाह-चीनी दोकान स’ ल’ आनब। चाह बनवै ले बड़का बरतन अछिये। पीबै ले जँ कप-गिलास नइ अछि ते दोकानेसँ सैकड़ा हिसाबसँ प्लास्टिकक गिलास कीनि आनव। कने करै पड़त मुदा असंभव काज त’ नहि अछि। जुगाइयोकेँ सोर पाड़ै छिएै। ओ दोकानक काज करत अहाँ चुल्हि पजारि बरतन चढ़ा दिऔ। जावे चुल्हि पजारि बरतन सरिआइब ताबे ऐहो दुनू काज भ’ जैत।’’
सुमित्रा बाजलि- ‘‘जुगायकेँ सोर पड़िऔ?’’
जुगायकेँ अछेलाल सोर पारि कहलक- ‘‘जुगाय तूँ कन्ने दोकान जा। चाह-चीनी, गिलास आ तमाकुल बीड़ी ,सुपाड़ी कीनने आबह। हौ भागमन्ते ऐठाम दश गोरे अबै अए।’’
जुगाय दोकान गेल आ अछेलाल दूध ले। इम्हर बचेलालक माय सुमित्रा हाँइ-हाँइ गिलासमे पानि ल’ चुल्हिकेँ शुद्ध करै ले छीटै लगली।
ओसार पर बैसि रुमा गुम्हरैत। बजैत किछु ने मुदा बिना आगिये मन क्षण-क्षण जरैत। जना सभ जान मारै पर लागल होय। खुशीसँ बचेलालक मन ओहिना दहलाइत जना पोखरिमे पानिक उपरका चीज हवामे।
चाह बनल। सभ क्यो पीवि, क्यो तमाकुल तँ क्यो बीड़ी, तँ क्यो सुपारीक टूक मुहमे द’ जूट बान्हि-बान्हि विदा भेल। जहिना पुरुखक जुटान बचेलाल ऐठाम तहिना टोलक बूढ़ि-पुरानक जुटान परती परहक जामुनक गाछक निच्चामे। ढेरवा बच्चियाँ सभक बैसार, पोखरिक मोहारक कनैलिक फूलक गाछक तरमे। सब अपना-अपनामे मस्त। जना ककरो घर-आंगनमे कोनो काजे ने होय, तहिना।
ठीठर, डोमन, कुजाइ आ बोतल संगे चारु गोटे ठीठरक दलान पर बैसल। सबहक मन खुशी। आइ धरि जे टोल भानस करैक बरतन, इजोत आ बिछानक लेल दुख भोगैत आयल ओ दुख पड़ा गेल। डोमन बोतलकेँ कहलक- ‘‘भाय बोतल, अपनो सबहक उपरमे किछु जिम्मा आबि गेल। ओना तँ गामक चीज भेल मुदा मुख रुपसँ अपना टोलक त’ भेवे कैल। अपना सभक जिम्मा भेल जे एक लगनमे दू या दूसँ अधिक काज नइ करब। किऐक तँ समान कम अछि। तेँ एक लगनमे एक्केटा वियाह करब नीक हैत।’’
डोमनक बात सुनि ठीठर कहलक- ‘‘बेस कहलहक डोमन। जतबे नुआ रहै ततबे पाएर पसारी। ओहो त’ बचेलालेकेँ धैनवाद दी जे एतबो केलक। कमाई ते बहुत लोक गाममे अछि मुदा ककरो ऐहेन बुद्धि किअए ने भेल? बन राखे सिंह आ सिंह राखे बन। जहिना बेचारा बचेलाल समाज कल्याण ले डेग उठौलक तहिना अपनो सभ डेगमे डेग मिला क’ चलह। ओइ वेचाराक परिवार लटपटा गेलै, मसोमाती कारोवार भ’ गेलै। मुदा तइयो ओइ मसोमातकेँ धैनवाद दी जे घर थथमारि क’ रखलक।’’
खेनाइ-पीनाइ, काज-उदयम जना सभ बिसरि गेल। चारु गोटे गप्प-सप करिते रहल।
नअ बाजि गेल। बचेलाल, अछेलाल आ जुगाय, तीनिये गोटे दरवज्जा पर रहल। जुगायकेँ बचेलाल कहलक- ‘‘जुगाय भाय, हम स्कूल जायब। अहाँ दुनू परानी डाॅक्टर ऐठाम पहुँच जायब। स्कूलसँ हम सोझे डाॅक्टर ऐठाम पहुँच जायब। जाबे आखि तकै छी ताबे ई दुनिया, जखने आखि मूनि देब दुनिया बिला जायत। तेँ शरीरक रोगके मजाक नइ बुझि दुश्मन बुझै पड़त। अखन अहाँक उमेरे की भेल हेन, तखन ते गरीबी लोकके अछैते औरुदे मारि दइछै। अखन अहूँ जाउ, घर परक काज देखियौ, हमहू नहा-खाके स्कूल जायब।’’
जुगाय उठिकेँ विदा भेल। अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बौआ, जहिना भूमकम भेला पर गाम दलमलित भ’ जाइछै तहिना आइ बुझि पड़ल।’’
बचेलालक मन खुशीसँ गद्गद। हँसैत कचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका, जहिना अहाँ असगर छी तहिना ते हमहू छी। जखन स्कूल चलि जाइछी तखन दुआर-दरवज्जा भकोभन रहैत अछि तेँ ऐहेन काज ठाढ़ क’ लेलासँ काजो चलत आ दरबज्जो सुन नइ रहत। अहँूकेँ एक्केटा घर अछि आ कम्मे घरारियो। तेँ एत्तै घर ल’ आनू। एकठाम घर भेलासँ दुनू गोटेक रक्छो हैत आ मालो-जालक सेवा हैत। खूँटा पर जे गाय अछि ओ पुरना नस्लक अछि, जहिसँ दूधो कम होइ अए। तेँ एकटा नीक गाय (जरसी) सेहो कीनि लेब। अपना चीज रहलासँ कोनो बेर- बेगरता नइ खगत। एत्ते दिन आन्हर जेँका छलौ जइसँ परिवार समाज नई बुझै छलौ। आब जखन नजरि खुजल तखन ई सब बुझै लगलिएै। हमरे रुपैआसँ बड़का-बड़का उद्योगपति कमा क’ मोट भेलि जाइ अए आ जे कमाई अए ओ बेटे-बेटीक पढ़ौनाइ-लिखौनाइ स’ ल’ क’ वियाह-दुरागमन करैत-करैत जिनगी समाप्त क’ लैत अछि। हमरो साइकिल भइये गेल। जत्ते समय बचत ओहिमे टोलक बच्चा सबके पढ़ा देबै। स्कूलमे दरमाहा भेटिते अछि तेँ ककरोसँ एक्को पाइ नइ लेबै। खेती करैक लूरि नइ अए मुदा पढ़ैक लूरितेँ अछि। तेँ खेतीक किताब पढ़ि, रेडियो सुनि खेती करैक लूरि अपनो सीखि लेब आ अहूँ सबके नव ढंगक खेतीक जानकारी देब। आब अपनो बुझै लगलौ जे शिक्षक भेनहुँ जिनगी जीवैक ज्ञान नहि अछि। जहियासँ स्कूल छोड़लौ आ शिक्षक भेलौ तहियासँ बड़ पढ़ैछी ते साँझू पहरकँे दू-चारि पाँती रामायण वा महाभारतक। सेहो पढ़ै नइ छी गाबि लइ छी। ओकरामे जे गूढ़ विषय छिपल छइ से बुझवे ने करै छी। जिनगी अन्हरायलकेँ अन्हराइले रहि जाइत अछि। जाबे सब मनुक्खके जिनगी जीवैक ढंग नइ हेतै ताबे जिनगी अपन कोनो माने नहि रखत। आब समयो भ’ गेल हमहू नहा-खा क’ स्कूल जायब।’’
साढ़े चारि बजे बचेलााल डाॅक्टर एहिठाम पहुँचल। दुनू परानी जुगाय तइसँ पहिने पहुँच चुकल छल। अपराहान समय भेने डाॅक्टर एहिठाम रोगियोकेँ बेसी भीड़ नहि। बचेलालकेँ देखि डाॅक्टर पूछलखिन- ‘‘मास्टर सहैव अपने देखाइब कि क्यो रोगी छथि?’’
जुगायके देखबैत बचेलाल उत्तर देलकनि- ‘‘डाॅक्टर सहैब, हिनके पत्नीके देखायब अछि।’’
डाॅक्टरक कुरसीक बगलमे एकटा इस्टूल राखल छलै। ओहि पर जा जुगायक पत्नी बैसली। डाॅक्टर हुनाका पूछै लगलखिन। सब बात सुनि डाॅक्टर बचेलालकेँ कहलखिन- ‘‘तीनि-चारि तरहक जाँच करबै पड़त। जाँचक रिपोट देखला बाद दवाइ लिखि देब। अखन तावे दू खोराक दवाइ द’ दइ छी, काल्हि बाजाप्ता लिखि देब। पनरहसँ बीस दिनमे मरीज नीक भ’ जेती।’’
डाॅक्टरक बात सुनि जुगायक मनमे घरवालीक नव जिनगी नचै लगल। वेचारा जुगाय घरवालीक आशा तोड़ि चुकल छल। जहिना पाइनिक वेगमे भसैत चुट्टीके खढ़क सहारा भेटिलासँ जिनगीक आशा होइत अछि, तहिना जुगाइयोकेँ भेल।
रुमाक दाबल क्रोध मिझाइल नहि तरे-तर धधैकते रहल। साँझू पहर बचेलाल टहलि-बुलि क’ आबि, हाथ-पाएर धोय दरवज्जा पर बैसल। सुमित्रा सेहो आबि, जरैत लालटेनकेँ तेज क’ देलनि। चाह नेने रुमा सेहो आइली। एक घोंट चाह पीबि पत्नीकेँ बचेलाल कहै लगल- ‘‘देखू, अखन तीनिये गोटे छी। तीनू गोटे एक्के परिवारक सेहो छी। परिवार एकटा संस्था होइत। जेकरा अहाँ मंदिरो, देवस्थानो कहि सकै छियै। जहिना पुजेगरी मंदिरकेँ जीवित रखैक लेल दिन-राति लगल रहैत अछि तहिना परिवारोकेँ जीवित रखैक लेल, परिवारक सभकेँ ओहि रुपमे करै पड़त। परिवारमे एकगोटे मिहनत करी आ दोसर गोटे बैसिकेँ रहै चाहबै त’ ओ घर कैक दिन ठाढ़ रहत। प्रश्न ईटा, खढ़-बाँसक नहि अछि। प्रश्न अछि मनुक्खक। जकर पहिल मानदंड अछि जे-मनुक्ख केहेन हेवाक चाही? नजरि उठा क’ देखबै ते बुझि पड़त जे अनेको चालि-ढ़ालिक मनुक्ख अछि। मुदा से नहि, मनुक्खक मानदंडकेँ आगूमे राखि विचार करबै तखन बुझि परत। सब मनुष्यक दायित्व होइत जे मनुष्य बनि जिनगी जीबी। आब कोनो बच्चा नइ छी। जँ कोनो काज वा बात अपने नइ बुझैत होय ते दोसर स’ बुझैमे कोनो मान-अपमानक बात नहि होइत।
जुगायक पत्नीक रोग रसे-रसे कमै लगलनि। जना-जना रोग कमैैत तेना-तना काजो करै दिशि शक्ति बढ़ैत आ अन्नो दिशि रुचि बढ़ै लगलनि। पत्नीक हालत सुधरैत देखि जुगाय दवाईक संग पथ्य आ गायक दूध सेहो उठौना क’ लेलक। आठ दिन बीतैत-बीतैत धनमाक (जुगायक पत्नी) देह चिष्टा गेलि। स्त्रीकेँ स्वस्थ होइत देखि जुगायक टूटल आशा पुनः जगै लगल।
अखन धरि रुमाक नजरि सासुक प्रति जेहेन हेबाक चाही से नहि भ’, क्यो छी, छलनि। सासुक प्रति पुतोहूक केहेन व्यवहार हेवाक चाही? से जना रुमा बुझिते नहि आ कि बुझिओ क’ अनठबैत। जँ किछु करै ले सुमित्रा पुतोहूकेँ अढ़बैत ते सुनिये क’ रुमा बड़बड़ा लगैत। करब ते दूरक बात। जे देखैत-देखैत सुमित्रा अढ़ौनाइये छोड़ि देलखिन। मनमे यैह छलनि जे जँ हम ककरो गारजन नहि छी ते हमरो गारजन क्यो ने छी। मने-मने गजैत जे सासु-ससुरक प्रति वा बेटा-बेटीक प्रति जे कर्तव्य होइत अछि ओ त’ नीक जेँका निमाहि चुकल छी, तेँ क्यो जिनगीमे आँगुर उठाक’ नहि देखा सकै अए। पुतोहू अपन कर्तव्य करती आ बेटा अपन करत। जँ बेटा-पुतोहू नहिये सेवा करत ते नहि करह। जाधरि अन्न खाइछी देहमे शक अछि ताधरि आखि निच्चा कोना क’ लेब। की फेरि दोहरा क’ जनम लेब? सब मनुक्ख अपन कर्मसँ मनुष्यता प्राप्त करैत अछि। आ जकरा मनुष्यता प्राप्त भ’ जाइछै। ओकरा देहक सुख-दुख थोड़े पथभष्ट बना सकत। कथमपि नहि! भ’ सकै अए जे पुतोहू हमरा बैधव्य वुझि निःसहाय बुझैत होथि? ई तँ जिनगीक क्रम थिकैक। की सब महिला पुरुषक (पति) अछैते मरै छथि? एकदम नहि। मरबाक कारण भिन्न अछि आ पारिवारिक संबंध भिन्न। भ’ सकै अए जे ओ (पुतोहू) अपन नैहरमे कोनो वैधव्य महिला केँ कष्टमय जिनगी देखने होथि वा पुतोहूक दुव्र्यवहार सहन करैत देखने होथि। एत्ते बात सुमित्राकेँ मनमे अबिते जना आखि गरमीसँ लाल हुअए लगलनि। निर्भीक स्वरमे मुहसँ निकललनि- ‘‘आन महिला हमरा नहि बुझथु। हम जिनगी क’ जनै छी तेँ जीवैक ढग बुझै छियै। ओ (पुतोहू) हमरा पैघ माए तुल्य बुझती त’ हमहू बेटी तुल्य वुझवनि, नइ तँ अपना मनक मालिक जँ छथि तँ हमहू अपना मनक मालिक छी।’’
मुदा किछु दिनसँ रुमाक बदलल (सुधरल) रुप सुमित्रा देखै लगलखिन। मने-मन तारतम्य करै लागली जे देखबै ले करै छथि वा जिनगीमे सुधार एलनि। मुदा सुमित्राक मन पुतोहूक दोषकेँ ओते महत्व नहि द’ बेटाकेँ बेसी बुझैत। किऐक त’ आन घरक मनुक्ख आन घर आबि एत्ते कोना बढ़ि सकत। बढ़ैक कारण होइछै। ओना कारण तँ अनेको अछि मुदा सबसँ महत्वपूर्ण कारण अछि पुरुखक दुर्बलता। जे पुरुख हाथी सन अबोध जानवरके बसमे क’ लैत, की ओकरा बुते सबोध स्त्रीकेँ मनुख बनाओल नहि हेतैक?
किछु दिन पहिने तक रुमा आंगनमे सबसे पाछू सुति क’ उठै छेली ओ आब सबसँ पहिने उठै लगली। उठि क’ बिना मुँह-कान घोनहि आंगन-घर बहारि, चीनमार नीपि, बरतन-वासन धोय, तखन अपन क्रिया कर्म मे लगै लगली सासुके माय तुल्य वुझै लगली मायक प्रति पुतोहूक जे कर्तव्य होइत ओ कर्तव्य पूर्ति हेतु रुमा जे अपने बुझैत से करै लगली। जे काज नहि बुझैत ओ सासुसँ सीखि-सीखि करै लगली। सुमित्रो, पुतोहूक बदलैत रुप देखि, बुझा-बुझा कहै लगलखिन- ‘‘कनियाँ! आइ धरिक जे अनुभव हमरा अछि ओ सीखि जिनगीमे उताड़ू। अहूँ जे नैहर स सीखि क’ आइल छी ओ नीक अधलाकेँ विचारि, अधलाकेँ छोड़ि नीककेँ पकड़ि चलू। अखन धरिक जे परिवारक व्यवहार रहल आ आइ जे समयानुकूल बदलाव आबि रहल अछि ओहि पर धियान द’ आगू बढ़ू। तखने समयक संग चलि सकब। जे क्यो एहि स अलग भ’ जीवै चाहत ओकरे मनमे सदिखन उत्तेजना (तनाव) रहतै। जहिसँ चैन मनसँ पड़ा जेतै।’’
सासुक विचारकेँ रुमा अंगीकार क’ चलै लगली।
पावनिक दिन। स्कूल बन्न। मुदा बचेलाल, पहिलुका जेँका नहि, भोरे चारि बजे उठि अछेलालकेँ सोर पाड़लक। जाबे अछेलाल अबैत तहिसँ पहिने सुमित्रो आबि गेली। तीनू गोटे गप-सप करै लागली बचेलाल अछेलालकेँ पुछलक- ‘‘काका, आब तँ खेती-बाड़ीक काज असानी स’ करैत हैब?’’
बचेलालक बात सुनि अछेलाल कहै लगल- ‘‘बौआ, एहिठामक गिरहस्तक जे रुपरेखा अछि ओ नीक कम आ अधला बेसी अछि। तेँ गिरहस्तक जिनगी आ खेतीक ढाँचा बदलै ले बहुत किछु करै पड़त। जाबे से नइ करब ताबे जे चाहैछी से नइ हैत। हम तँ सब बात बुझवो ने करै छी। अखन तक हम बोनिहार रहलौ तेँ गिरहस्तक जिनगी नीक-नहाँति कोना बुझवै? मुदा भौजी तँ नैहरसँ एहिठाम धरि गिरहस्ते परिवारमे रहबो केलनि आ बहुत दिन गिरहस्तियो केलनि तेँ हुनका बेसी अनुभव छनि। वैह कहती।’’
अछेलालक बात सुनि सुमित्रा मने-मन सोचै लगली जे अछेलाल त’ ठीके कहलक। मुदा हमहू तँ बूढ़ि भेलौ तेँ बहुत बिसरियो गेलौ किऐक त’ काजो बहुत छुटि गेल आ छोड़ियो देलौ। मुदा बिना माटि पर ठाढ़ भेने ने मनुख रास्ता पर आओत आ ने परिवार। जाबे मनुक्ख जमीन पर ठाढ़ नइ हैत ताबे आगू मुहे कोना ससरत? हँ, ई भ’ सकै अए जे हवा-बिहाड़िमे उड़ि क्यो बहुत आगू चलि जाय मुदा ओ अनिश्चित जिनगी हेतै। एक पीढ़ी बहुत आगू चलि जायत मुदा अगिला पीढ़ी ओहिसँ आगू बढ़त कि पाछू हैत, ई कहब कठिन अछि। किएक त’ जत्ते उपर जे चलि जायत ओ ओतै लसकि जायत। ने ओकरा जमीन पकड़ैक बोध हेतै आ ने आगू बढ़ैक रास्ता भेटितै। किएक त’ दू विचारधारा आ दू रास्ताक संघर्ष चलैत अछि आ आगू आरो मजगूत भ’ चलत। तेँ जाधरि दुनू रास्ताकेँ बिना बुझने जँ क्यो आखि मूनि चलै चाहत तँ ओ निश्चित लटपटेबे करत। मुदा प्रश्न अछि जहिना मनुक्ख समयक संग चलैत आयल तहिना चलैक। जे कठिन अछि। एत्ते बात मनमे अबिते सुमित्रा बजै लगली- ‘‘बौआ, कोनो परिवार ताबे नीक जेँका नइ चलि सकै अए जाबे परिवारक सब आदमी रास्ता ध’ नइ चलत। अपने परिवार छह, तूँ भरि दिन अपसियाँत रहै छह मुदा पुतोहू जनिक लेल धनि सन। जहिना ओ (पुतोहू) भरि दिन काजसँ छिटकैत रहैत छथि तहिना जँ तोहूँ छोड़ि दहक तखन घरक दशा की हेतह? मुदा जहिना तूँ नोकरी क’ कमा अनै छह तहिना जँ ओहो घरे पर काज करथि ते घरक उन्नति हेतह की नहि। तेँ परिवारमे जे जेहेन रहै ओकरा ओहि रुपमे मेहनत करक चाही? परिवारक जे गारजन होथि हुनको, आदमी देखि, काज ठाढ़ करक चाही, जहिसँ घरक आमदनियो बढ़त आ बेकारियो भागत। अहिना देखै छी बाढ़ि-रौदीक दुआरे सब परिवार निच्चे मुहे जा रहल अछि। मुदा बारह मासक सालमे चारि मास बरसातक होइत यैह चारि मास साल क’ संचालन करैत। मुदा तज्जुब लगै अए जे बरसातक चारि मास छोड़ि शेष आठ मासक कोनो महत्वे ने अछि। सबसँ दुखद बात तँ ई अछि जे एहि आठ मासक लेल गिरहस्त किछु सोचबे ने करैत। खेतीक मुख्य चीज पानि छी। जकरा दिशि लोक तकबे ने करैत। अगर खेत पटबैक उपाय लोक क’ लिअए त’ जहिना उपजामे बढ़ोतरी हैत तहिना फसलोमे। जखन लोके पानि, खाद नीक बीआ नइ बुझैत छल तखनो गिरहस्ती चलैत छल। अपन खेत एक बध्धु छह, एक ठाम नइ छह, मुदा थोड़े हटि-हटि क’ तँ छेबे करह। अगर बोरिंग गरा पटबैक जोगार क’ लाय त’ की वुझि पड़ै छह जे जहिना उपजा अखन खेतसँ अनै छी तहिना तबो आओत? जहिना चैबिसे घंटा दिन रातिमे देखै छहक जे रातिमे केहेन अन्हार रहै अए आ दिन होइते केहेन इजोत भ’ जाइछै। तहिना सब चीजक छह। अखन दू परानी तू छह आ दू परानी अछेलालो। चारि गोरे त’ समकस काज करै वला छह मुदा काज कत्ते होइ छह। ई हिसाब जोड़ि क’ काज शुरु करै परतह। अनाड़ी-धुनाड़ी जेँका कहवह जे, कोन काज ठाढ़ करब? मुदा आखिक सोझहामे छह जे खेतमे पाइनिक सुविधा बनौने, खेतमे सालो भरि फसिल लहलहेतह। खाद देवहक, नीक बीआ रहतह ते तत्ते उपजा हेतह जे घरमे रखैक जगह नइ रहतह। नारो-पात तते हेतह जे दूटा चारिटा माल हड़ाइले रहतह। माल पोसवह ते दुदहो खेबह आ बेसी हेतह ते बेचवो करवह। जते घरक आमदनी बढ़तह तत्ते ने आगू मुहे ससरवह।’’
मायक बात सुनि बचेलालकेँ भक्क खुजल। भक्क छुटिते मायके कहलक- ‘‘माए, आइ धरि एहि दिशि नजरिये ने गेल छल। मुदा आब देखै छी काज केनिहार लोक हँसी-खुशीसँ जिनगी बिता सेकै अए। काका, सबसे पहिने एकटा बोरिंग आ दमकलक जोगार करैक अछि। आइ तँ छुट्टी नइ अछि। परसू रवि छी। दुनू गोरे बजार चलि पहिने बुझि लेब। तखन जे जना गर लागत से करब।’’
अछेलाल- ‘‘बौआ, बैंकोवला सब बोरिंग दमकल दइछै। ओकरा साले-साल वियाज लगा रुपैआ दैत जेबै तइयो भ’ जायत।’’
बचेलाल- ‘‘जखन अपने एत्ते दरमाहा अछि तखन शौखक कर्जा किअए लेब। अखन जे रुपैया जमा छल से सठि गेल। मुदा अगिला सोमे के ते दस हजार रुपैआ भेटत। जेँइ एत्ते दिन बीतल तेँइ आठ दिन आरो बीतह। मुदा बिना उपारजनक साधन बनौने त’ आमदनी नहि बढ़त।’’
भोरे सुमित्रा उठि, दलान पर आबि बाढ़नि ल’ दरवज्जा बाहरैक ओरियान करितै रहति कि अछेलालो आयल। अछेलालक चुनौटीमे चून नहि, तेँ चून लिअए आयल। आन दिन अछेलालकेँ निन्न टूटिते, ओछाइन परसँ उठि, लोटामे रौतुके राखल पानि ल’ दू बेर कुड़ड़ा करैत आ जे पानि बचैत ओ पीबि, तमाकुल खा पराती गबै लगैत। मुदा आइ चूनक दुआरे पराती नहि गाबि चून ले आयल। आंगन स’ चून आनिकेँ देलखिन। चून ल’ अछेलाल तमाकुल चुनबै लगल। तेहि बीच दुनू गोटे गप-सप सेहो करै लगल। दुनू गोटेक गप-सपकेँ अकानि बचेलाल सेहो आबि क’ ठाढ़ भ गेल। सुमित्रा अछेलालकेँ कहैत रहथिन- ‘‘बौआ, जहिया अपन घर भरल-पूरल छल सासु-ससुर, पति जीवैत छलाह तखन हम जुआन छलौ। गामक चुनल गीतिहारि। गाममे जत्त’ कतौ कोनो काज होय त’ हमरा हकार अबिते छल। हमहू राति-दिन किछु बुझबे ने करियै। अपन अंगना-घरक काज सम्हारि हकार पूरै जाइ छलौ। हमर नैहर पचही परगनामे पड़ै अए। ऐठामक गीति-नाद, बोली-वाणी, चालि-ढालि अल्लापुर परगनासँ नीक अछि। मुदा अपना गाममे बेसी अल्लेपुरक सुआसिन बसै अए। गोटि-पङरा भौरो परगनाक अछि। पचही आ भौरक त’ बहुत किछु मिलबो-जुलबो करैछै मुदा अल्लापुरक दोसरे रंगक छैक। हँ, एकटा बात जरुर छै जे अल्लापुरक सुआसिन बेसी कमासुत होइछै। मरदे जेँका साड़ी क’ फाँड़ बान्हि लेत आ भरि-भरि दिन खेते-पथारमे काज करैत रहत। रौद-बसात किछु बुझवे ने करत। एक बेरक गप कहै छी। हमरा घरे लग पंडित काकाक घर सेहो अछि। पंडित काका इलाकाक सब संस्कृत विद्यालयमे पढ़ौनी केने छलाह। ओ तत्ते नियम-निष्ठावला छेलखिन जे कोनो विद्यालयमे शिक्षक सबसँ पटबे ने करनि। जाबे क्यो टोकनि नहि ताबे ओहो ककरो नहि टोकितिहीन। ने बिना काजे ककरो ऐठाम जाइ छेलखिन। ओना हुनका कखनो निचेनसँ बैसलि नहि देखिएनि। सदिखन कोनो ने कोनो काजमे लगले रहैत छलाह। एक दिन पछबरिया इलाकाक एकटा पंडित ऐलखिन। ओहो बड़ भारी पंडित। भिनसरे दुनू गोटे पूजा-पाठ क, दू-दू छिमड़ि केरा खेलनि आ शास्त्रार्थ करै ले वैसि गेलाह। पंडित काका की कहथिन आ ओ पंडित की कहनि से आन क्यो बुझवे ने करैत। गप्प-सप्पमे दुनू अपस्याँत। बड़ी कालक बाद पंडित काका तीनि बेरि थुक माटिपर फेकि देलखिन। ओहि पछबरिया पंडितक मुह कनै-कनै सन भ’ गेलनि। दुपहरमे खूब नीक जेँका खुआ-पीया, वेरु पहर धोती, कुरता, चद्दरि, पाग द’ अरिआतिकेँ विदा केलखिन।’’
हँ कहै छलौ जे सैाँसे गाम हकार पूरै छलौ। जखन अपने (पति) मरि गेला तहियासँ हकार पूरब छोड़ि देलौ।’’
‘‘अखुनका आ पहिलुका लोकके मिलबै छी ते अकास-पतालक अंतर बुझि पड़ै अए। हमरे दूटा बच्चा भेलि, ने एकोटा सूइयाँ लेलौ आ ने एकोटा गोटी खेलौ, तइयो कोनो रोग कहाँ दबलक। पहिल सन्तानक बेरिमे, सासु हाट परसँ सठौरा कीनि अनलनि, सैह खेलौ। अखन देखै छी जे हाट-बजार घूमै बेरिमे, सिनेमा-सरकस देखै बेरिमे, मेला-ठेला घूमै बेरिमे निरोग छी मुदा काजक बेरिमे जत्ते दुनियामे रोग छै से सबटा हमरे दबने अछि। जाइ जाउ आब काजोक बेरि भ’ गेल।’’
चाह पीवि, सभ दिन बचेलाल टोलक बच्चा सभकेँ पढ़बै लागल। जाबे स्कूल जेबाक समय होय ताबे पढ़वैत। ककरो से एक्को पाइ नहि लैत। टोलक सब धिया-पूता पढ़ैमे सुढ़िया गेल। बचेलालक अपनो प्रतिष्ठा बढ़ै लगल। बचेलालक काज देखि सुमित्रा मने-मन खुश होइत।
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जिनगीक जीत:ः 11
शिवकुमार आ रामनाथ फस्ट डिवीजनसँ मैट्रिक पास केलक। बिरड़ो जेँका रिजल्टक प्रचार भ’ गेल मुदा ने स्कूलमे रिजल्ट आयल आ ने अपने आखिये अखबारमे देखलक। शिवकुमार बचेलालक बेटा आ रामनाथ अछेलालक। रिजल्टक चर्चा त’ सभक कानमे पहुँचगेल मुदा बिना अपने देखने सोलहन्नी बिसवास कोना कयल जाय। शिवकुमारकेँ सोर पाड़ि बचेलाल कहलक- ‘‘बौआ! आन दिन त’ अखबारबला आठे बजे अखबार द’ जाइ छल मुदा आइ ऐबे ने कैल। तेँ झंझारपुर जा क’ अखबार कीनने आबह।’’
शिवकुमार आ रामनाथ, दुनू गोटे साइकिलसँ झंझारपुर अखवार आनै ले विदा भेल। बचेलाल मने-मन तारतम्य करै लगल जे बिना रिजल्ट निकलने, लोक कोना बुझलक? जे अखबारवला सब दिन अखबार वेचै अबैत छल ओकर अखबार रस्तेमे घोरि विद्यार्थियो आ गारजनो कीनि नेने हैत। तेँ भरिसक अखबार नइ बँचलै जे अपन गहिकी केँ दैति। स्कूलमे सेहो विद्यार्थी सब रिजल्ट देखै पहुँचै लगल। मुदा हेडमास्टर अखबारसँ अपन रजिष्टरमे लाल रंगक पेनसँ, प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी आ तृतीय श्रेणीक चेन्ह लगा, बहरामे रिजल्टक कटिंगकेँ टाँगि देलखिन। अछेलाल मने-मन खुश होइत। खुशीक कारण रहै जे एकटा मुरुखक बेटा, जे सब तरहे विपन्नताक जिनगी जीबैत, पास केलक। सुमित्राक मन एहि दुआरे खुशी जे जकरा जनमै स’ ल’ क’ अखन धरि सेवा केलहुँ ओ एकटा सीढ़ी पार केलक। रुमा तँ खुलि क’ नहि बजैत। मुदा मनमे अपन बेटा शिवकुमारकेँ मैट्रिक पास केने ओते खुशी नहि होइत जत्ते रामनाथक पास केने दुख।
रामनाथ आ शिवकुमार बुक स्टाल पर गेल। जे अखबारक होलसेलर। ओहि ठाम सब अखवार बिका गेल छल। दुनू गोटे अचताइत-पचताइत बाजार गेल। बाजारमे एकटा दोकानमे अखबार देखलक। शिवकुमार ससरि क’ दोकानदार लग जा कहलक- ‘‘अहाँ तँ अखवार पढ़ि लेलहुँ। हमरा एकर काज अछि। एहिमे मैट्रिकक रिजल्ट निकलल छै तेँ हमरा द’ दिअ। जे दाम अखबारक छैक ओ हम द’ दइ छी।’’ दोकानदार राजी भ’ गेल। मुदा आखि लाल करैत बेटा ओहि दोकानदारकेँ कहलकै- ‘‘दू रुपैआमे अखबार नइ दिऔ। आइ एकर दाम पचास रुपैआ हेतै।’’
बेटाक बात सुनि बाप कहलकै- ‘‘बौआ, कमाइ ले तँ एत्तेटा दोकान छह, तखन ऐहेन काज किऐक करबह?’’ तरंगि क’ बेटा कहलकै- ‘‘बाबू जँ अहाँ ऐहेन दयालु छी ते, लौका-तुम्मा ल’ के, वृन्दावन चलि जाउ।’’
लौका-तुम्मा सुनि पिताकेँ नरसिंह तेज भ’ गेल। बाघ जेँका झपटैत बेटाकेँ कहलक- ‘‘जिनगी भरिक कमाइक ई दोकान छी। एहि चारि कोसीमे हमरा सब इमानदार बनिया बुझै अए, तकरा हम माटिमे मिला देव।’’ गद्दी परसँ अखबार उठा, शिवकुमारक हाथमे दैत पुनः बाजल- ‘‘ बच्चा ल’ जाउ। एक्को पाइ दाम नइ लेब।’’
अखबार ल’ दुनू गोटे (शिवनाथो आ रामनाथो) अपन रिजल्ट देखलक। रिजल्ट देखि दुनूक हृदयमे खुशीक हिलकोर उठै लगलै। साइकिल पकड़ि विदा भेल। रास्तामे होय जे हवाई जहाज जेँका उड़ि क’ घर पहुँची। दुइयेटा विद्यार्थीकेँ प्रथम श्रेणी भेल छलै। एकटा शिक्षक, अखबार नेने बचेलाल ऐठाम आबि दुनू गोटेकेँ कहै एलखिन। ओहि शिक्षकक अपनत्व देखि बचेलालकेँ मनमे भेल जे अखनो नीक लोकक कमी नहि अछि। मास्टर सहैब जलखै क’ चाह पीविते रहति कि दुनू विद्यार्थी आयल। दुनू गोटे गुरुदेवकेँ प्रणाम क’ असिरवाद मंगलकनि।’’
सुमित्राक मन गद-गद। बचेलाल लग आबि कहलखिन- ‘‘बौआ मास्टरो साहैब छथिये। जते बच्चाकेँ घर पर पढ़बै छह सभके नोत द’ दहक। तोहर बेटा, मुदा हमरो तँ पोते छी, एहि खुशनामामे भोज क केँ सभकेँ खुआवह।
बीस वर्ख पहिने, ग्रामीणक सहयोगसँ, एकटा हाई स्कूल खुजल अछि। तीनि-चारि साल धरि मात्र दुइये सय विद्यार्थी स्कूलमे। शिक्षको सब पचासे रुपैआ दरमाहा पर शिक्षण करैत। देहातमे पढ़लो-लिखलक संख्या कम्मे। मुदा सब शिक्षकक मनमे ई धारणा बनल जे इलाकामे शिक्षाक प्रसार हुअए। तेँ किछु कष्ट उठेनहुँ जँ स्कूल चलै त’ किऐक ने चलत। सब शिक्षक अपन-अपन घरेसँ अबैत-जाइत। लगमे स्कूल भेने शिवकुमारो आ रामनाथो नाओ लिखेलक। स्कूलक पढ़ाइयो नीक होइत। अठमेसँ शिवकुमार फस्ट करैत आ रामनाथ सेकेण्ड। जे मैट्रिकक टेस्ट परीछा धरि करैत रहल। शिवकुमार साइंस रखने आ रामनाथ आर्ट। नवमा धरि बचेलाल दुनू गोटेकेँ, घरो पर खुब मेहनत कराबथि। पढ़ैक रास्ता दुनू सीखि लेलक। हिसाव (मैथमेटिक्स) मे जेहने तेज शिबकुमार तेहने तेज भूगोलमे रामनाथ। वार्षिक परीक्षामे सौकेँ सौ अंक शिबकुमार हिसावमे अनैत दू-चारि नम्वर कम रामनाथ भूगोलमे। सालमे एक्को दिन स्कूल दुनू गोटे नागा नइ करैत। दुनू गोटे स्कूल जाइ काल, पँच-पँचटा अंग्रेजी शब्द, अपन तरहत्थीमे लिखि घोकैत (याद करैत) जाइत। स्कूल पहुँचैत-पहुँचैत दुनू, दुनूकेँ सुना दैत। स्कूल लग पहुँच दुनू गोटे अपन तरहत्थी कल पर घो लैत। फेरि छुट्टी भेला पर पँच-पँचटा शब्द लिखि, घर पर अबैत-अबैत याद क’ लैत। जाड़क मासमे छोट दिन आ जाड़ भेने जँ विद्यार्थीकेँ किछु बिलंबो भ’ जाय ते हेडमास्टर, समय बुझि, हाजरी बनबा देथिन। हुनका मनमे यैह रहनि जे कने बिलंबोसँ त’ विद्यार्थी स्कूल अबै अए। तेँ विद्यार्थीक बीच काफी प्रतिष्ठा रहनि। शिक्षक सभकेँ ओ कहथिन-जे पढ़वेसँ बेसी छात्रमे पढ़ैक जिज्ञासा पैदा करु। जहि छात्रमे पढ़ैक जिज्ञासा जगि जाइत ओ निश्चित पढ़वे करत। जहिसँ हमरो-अहाँकेँ पढ़बैमे सहूलियत हैत। जहि विद्यार्थीकेँ किताब नइ रहै वा देह पर मैल-कुचैल कपड़ा देखथिन, ओकरा आॅफिसमे बजा परिवारक दशा पूछि। मदति सेहो करथिन। ओना हेडमास्टर सुखी सम्पन्न परिवारक रहथि। मुदा जहिना गरीबो मनुक्खक देहमे धनिकक बुद्धि धोंसिया जाइत तहिना हुनका सुभ्यस्त रहनौ गरीबक बुद्धि देहमे घोसिआइल।
स्कूलमे रिजल्टक कापी आ मार्कसीट आबि गेल। सभ विद्यार्थी अपन-अपन मार्क-सीट अनै स्कूल जाय लगल। शिवकुमारो आ रामनाथो गेल। दुनू गोटेक नम्बर, एक टकसँ हेडमास्टर देखि, दुनू गोटेकेँ पूछलखिन- ‘‘बौआ, आगू नाओ लिखेबह की ने? अगर जँ कोनो दिक्कत हुअअ ते कहिहह। अखन मार्क सीट नेने जा काल्हि दुनू-गोटे अपन-अपन पिताकेँ बजेने अबिहनु।’’
दुनू गोटे अपन-अपन नम्बर ल’ चलि गेल।
दिनेश बावूक (हेडमास्टरक) योगदान, स्कूल बनबैमे, अग्रगण्य छलनि। ओ अपनाकेँ सिर्फ शिक्षकँे नहि बुझति। आजुक शिक्षक जेँका सिर्फ दरमहे पर गिद्ध-दृष्टि नहि रखथि। ओ सोचथि जे जहिना अपन बेटा-बेटी तहिना छात्र-छात्रा। माय-बाप बेटा-बेटीकेँ जन्म दैत, पालति-पोसैत मुदा षिक्षक गुरु ओ ब्रह्मस्वरुप कुम्हार छथि जे मनुष्यकेँ चाक पर गढ़ैत। अपन परिवारोसँ दिनेश बावू बेहद खुशी रहैत छथि। दिनेशबावूक पिता लोअर प्राइमरी स्कूलक शिक्षक छलथिन। हुनके पढ़ाओल आ रास्ता देखओल दिनेशबावू। जहि स बी.ए. पास क’ हाई स्कलमे शिक्षक बनलाह। जखन बेटा (दिनेशबाबूक) एम.ए.पास क’ कओलेजमे प्राध्यापक भेलखिन, तखन दुनू परानीक हृदय ओहन सरोवर जेँका बनि गेलनि, जहिमे हजरो कमल फुलाइत। रंग-विरंगक चिड़ै-चुनमुनी विहार करैत। जबसँ दिनेशबावूक बेटा सुनील नोकरी शुरु केलनि तब से ओ (दिनेषबावू) अपन दरमाहा गरीब-गुरबा विद्यार्थीकेँ देमए लगलखिन।
बचेलाल आ अछेलाल, दुनू गोटे दिनेशबावूसँ भेटि करै विदा भेला। दुनू गोटे शिवकुमारो आ रामनाथोकेँ संग क’ लेलक। दिनेशबावू सेहो दुनू गोटेक प्रतीक्षेमे रहथि। दुनू गोटे दिनेशबावूकेँ प्रणाम क’ आफिसमे बैसल। बचेलाल दिनेशबावूकेँ पूछलखिन- ‘‘शिवकुमार आ रामनाथक माध्यमसँ अपने बजाओल।’’
दिनेशबावू- ‘‘हँ। बजबैक कारण अछि जे दुनू विद्यार्थी पढ़ैवला अछि तेँ दुनू गोटेक नाम बढ़ियाँ कओलेजमे लिखा दियौ।’’
बचेलाल- ‘‘विचार अपनो अछि। स्कूलक सब कागजात भेटला पर जत्ते जल्दी भ’ सकत ओते जल्दी नाओ लिखा देबै।’’
दिनेश- ‘‘स्कूलक सब कागजात आइये द’ दइ छी। जँ सम्हरि जाय तँ काल्हिये नाम लिखा दिऔ। नइ तँ परसु।’’
बचेलाल- ‘‘हमहू ते प्राइमरी स्कूलमे काज करै छी। काल्हि जा क’ परसुका छुट्टी ल’ लेब आ परसु जा क’ नाम लिखा आयब।’’
दिनेशबावू किरानीकेँ बजा सब काज कए देलखिन। दुनू गोटे बचेलालो आ अछेलालो विदा भ’ गेल।
दोसर दिन बचेलाल स्कूल जा छुट्टीक आवेदन द’ देल। साझू पहर सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘माए, काल्हि शिवकुमारो आ रामनाथोक नाओ लिखवै ले मधुवनी जायव।’’
काओलेजमे पोताक नाओ लिखायव सुनि सुमित्रा कहै लगलखिन- ‘‘बच्चा, शिवकुमार तोहर बेटा छिअह मुदा पोता तँ हमरो छी। रामनाथोकेँ जनमेसँ सेवा करैत एलौ तेँ ओकरो मदति करब उचित भ’ जाइ छह। बेचारा अछेलाल मुरुख अछि मुदा समांग जेँका तँ ओहो अछि। जब तू मैट्रिक पास केलह तब हमरो मन मे छल जे तोरा कओलेजमे नाम लिखा दिअ। मुदा घरक जरजर हालत देखि मनक बात मनेमे रहि गेल। मुदा तइ ले बहुत दुखो ने भेल। किऐक तँ दुख तखन होइत जखन पिता हाइ स्कूल धरि पढ़ने रहितथुन्ह। हम अबला रहितौ बहुत केलियह। मुदा आइ तोरा ले अनिवार्य भ’ जाइ छह जे कम स’ कम बी. ए. तक बेटाकेँ पढ़ा दहक। ओना रामनाथ ले ओ भार नहि छह मुदा ओकरो तँ बेटे बनौने छी। काल्हि जखन मधुवनी जेवह ते अछेलालोकेँ संग क’ लिहह। किऐक तँ ऐहन-ऐहन काज लोककेँ जिनगी भरि मन रहैछै। सिर्फ अछेलाले टाकेँ नहि रामनाथोकेँ मन रहतै।’’
निरमलीसँ जयनगर जाइ वाली गाड़ी पाँचे बजे निरमलीसँ खुजैत अछि। तेँ अपना स्टेशन (तमुरिया) साढ़े पाँच तक पहुँच जेवाक अछि। ई बात बचेलाल मने-मन सोचैत। साढ़े नअ बजे मधुवनी गाड़ी पहुँच जाइत अछि। दस बजे कौलेजक आॅफिसो खुजैत हैत। तेँ दस बजे आॅफिस पहुँच शुरुहेमे अपन काज केलासँ साढ़े तीन बजे धरि स्टेशन चलि आयब। जहिसँ वैह गाड़ी (जयनगर-निरमली) पकड़ि सबेर-सकाल घर पर चलि आयब। जेवा कालमे गाड़ीसँ उतड़ि टीशने कातक होटलमे सब खा लेब आ रिक्शा पकड़ि चलि जायब। ई सब बात बचेलाल अछेलालो आ दुनू बच्चोकेँ कहि देलक।
साढ़े चारिये बजे बचेलाल उठि तीनू गोटेकेँ उठा देलक। पर-पखानासँ आबि बचेलाल स्नान क’ लेलक। अछेलालो, शिवकुमारो आ रामनाथो नहा लेलक। पौने पाँच बजे गाड़ी पकड़ै चारु गोटे विदा भेल। छअ बजे गाड़ी तमुरिया पहुँच गेल।
चारु गोटेक टिकट शिवकुमार कटा नेने छल। चारु गोटे गाड़ीमे बैसि गेल। बचेलाल छोड़ि क्यो ने मधुबनी देखने। तेँ तीनूक मनमे रंग-विरंगक बात अबै लगल। बचेलाल अपन काजक हिसाव जोड़ैत जे ई काज पहिने आ ई काज पाछू करब। अछेलाल मने-मन सोचैत जे गाममे झगड़ा-झंझट क’ मधुबनियेमे लोक केश-फौदारी लड़ैत अछि। सेहो कोट-कचहरी देखवै। जहलो देखबै जे केहेन होइ छै। फेरि कहिया जायब कहिया नै, तेँ जब जाइये रहल छी ते सब देखने आयब।
साढ़े नअ बजे गाड़ी मधुबनी पहुँच गेल। गाड़ीसँ उतड़ि चारु गोटे विदा भेल। टीशने कातक होटलमे चारु गोटे खेलक। खेलाक बाद रिक्शा पकड़ि आर.के. कौलेज विदा भेल।
आॅफिस जा अपन सब कागजात किरानीकेँ देलक। सब कागजात देखि किरानी लगले नाम लिखि रसीद द’ देलकनि। बचेलाल रुपैआ निकालि द’ देलखिन। कितावक सूचि दैत कहलकनि जे पनरह तारीखसँ पढ़ौनी चलत। एगारहे बजे सब कालेजसँ विदा भेल। बाजार आवि किताबक दोकान गेल। दोकान जा कितावक सूचि दोकानदारकेँ द’ सब किताव दै ले कहलखिन। दोकानदार बचेलालकेँ दोकानक भीतरे बैसाय एक-एक विषयक तीनि-तीनि, चारि-चारि लेखकक किताब निकालि आगूमे देमए लगलनि। मने-मन बचेलाल सोचैत जे ओते तँ समय नहि अछि जे पढ़ि-पढ़ि क’ किताब चुनव। मुदा किताबक संस्करण देखि-देखि किताव छँटिअबै लगल। जइ विषयक दूटा किताव पसिन होइन ओ दुनू ल’ लथि। कोर्सक किताव कीनि एकटा हिन्दी शव्दकोष आ एकटा अंग्रजी शब्दकोष सेहो कीनि लेलनि। सब विषयक लेल काॅपि सेहो कीनलनि। बचेलालक विचार देखि दोकानदार मने-मन खुशी होइत। ओ नोकरकेँ चाह-पान अनै ले पठौलक। चाह पीवैत समय दोकानदार बचेलालकेँ पूछलकनि- ‘‘अपनेक की जीविका अछि?’’
मने-मन बचेलाल सोचै लगल जे हमरा जीविकासँ दोकानदारकेँ की मतलब छैक। मुदा जब पूछलक ते नहियो कहब नीक नहि। मुस्कुराइत बचेलाल कहलक- ‘‘लोअर प्राइमरी स्कूलमे शिक्षक छी।’’ शिक्षकक नाम सुनि दोकानदार एकटा ‘‘अष्टावक्र गीता’’ वहिना दैत कहलकनि- ‘‘जहिया मधुबनी आबी तहिया हमरो भेटि जरुर दी।’’ ‘‘वड़बढ़ियाँ’’ कहि बचेलाल कितावक दाम द’ विदा भेल। कितावक एकटा थाक शिवकुमार आ एकटा रामनाथ लेलक। अखबारमे चैपेत क’ बान्हल गीता अपने बचेलाल लेलक। रास्तामे बचेलाल सोचलक जे जखन आइले छी आ अढ़ाई-तीनि घंटा समयो अछि, तखन डेरो किऐक ने ठीक कइये ली। अखन हमहू छी। जँ डेरा ठीक भेल रहत तँ फेरि नहि आबै पड़त।
नबका-नवका, मोट-मोट किताब देखि शिवकुमार सोचैत जे सब विषयक काॅपियो भइये गेल, खूब मेहनतसँ पढ़ब। दश-दशटा अंग्रेजी आ हिन्दी शब्द सब दिन रटब। ओना सब विषयक अपन-अपन शब्द होइत छैक ओहो याद करै पड़त। जाबे काॅलेज खुजत ताबे सैह सब शब्द सीखि लेब जहिसँ क्लासमे बुझैमे परेशानी नइ हैत। सब विषय पढ़ै ले समय बाँटि लेब नइ तँ एकभग्गू पढ़व भ’ जायत। महत्व तँ सब विषयक छैक आ पासो त’ सब मे करै पड़त, तखने ने पासो हैत। नइ तँ कोनो विषयमे खूब नम्बर आओत आ कोनोमे फेल भ’ जायब। तेँ पहिने सब विषयक तैयारी ओहि रुपे करै पड़त जे पास नम्बर सब विषयमे आबे। तखन ने अधिक नम्वर आ नीक डिवीजनक तैयारी करब। रामनाथ व्याकरणक किताब खोलि क’ दोकाने पर देखने छल। जहिमे वैह सब देखने रहै जे हाइयो स्कूलमे पढ़ने छल, थोड़े विस्तारसँ अछि, तेँ कम्मे नव चीज पढ़ै पड़त। तेँ मने-मन खुशी होइत।
चारु गोटे आगू-पाछू स्टेशन दिशि अबैत छल कि एक गोटे आगूमे साइकिल रोकि बचेलालकेँ प्रणाम केलकनि। मूड़ि निच्चा केने बचेलाल चलैत रहति। प्रणाम सुनि मुह उठा क दुनू हाथ जोड़ि प्रणामक जबाव देलखिन। प्रणामक जबाव तँ द’ देलखिन मुदा चिन्हलखिन नहि। तेँ ओहि आदमी दिशि तकैत जना किछु मन पाड़ै लगलाह। ओ आदमी बुझि गेल जे भरिसक नहि चिन्हलनि। धाँय द’ ओ कहलकनि- ‘‘मास्सैब, हम रमेसरा छी। अइ ठाम कोओपरेटिभ बैंकमे नोकरी करै छी।’’
रमेसराक बात सुनिते बचेलालकेँ धक दे मन पड़लनि जे ई तँ पढ़ाओल विद्यार्थी छी। मुस्कुराइत कहलकखिन - ‘‘बौआ, तोहर तँ चेहरा देखि चिन्हवे ने केलियह। एक चेराक देह छेलह जे अखन हाथी जेँका भ’ गेलह। परिवारो एतै रखै छह?’’
विहुँसति रमेसरा कहलकनि- ‘‘अप्पन घर बना नेने छी। आइ एतै पहुँनाइ करै पड़त। हमर सौभाग्य जे अहाँ एत’ एैल छी। हमहू गाम कम्मे जाइछी। तोहूमे धड़फड़ाएल गेलौं आ धड़फड़ाइले ऐलौं। तेँ भेंटो-घाँट करै नइ जा होइ अए।’’
बचेलाल- ‘‘बाल-बच्चा कैकटा छह?’’
रमेसरा- ‘‘दूटा अछि। दू परानी अपने छी। चारि गोड़ेक परिवार अछि। अपने किमहर-किमहर आइल छलिऐक?’’
‘‘दुनू बच्चाकेँ कओलेजमे नाओ लिखवै आइल छलौ। आब रहै ले डेराक भाँज लगबैक अछि।’’ जँ नजरि पर कतौ एकांत डेरा बुझल हुअअ तँ ठीक क’ दाय।’’
जखन हम ऐठाम रहै छी तखन अपने केँ डेरा नइ हैत। पहिने चाह पीबि लेल जाउ। तखन आगूक गप-सप हेतइ।’’
एते कहि रमेसरा एकटा होटलमे सबकेँ संगे गेल। सभकेँ जलखै करा करा चाह पिऔलकनि। पान खुऔलकनि। पाँचो गोटे रेलवे स्टेशन दिशि चलला। मुसाफिरखाना आबि रमेसराकेँ बचेलाल कहलखिन- ‘‘अखन बैंकक समय अछि, तोँ जाह?’’
‘‘मास्सैव, आब बैंक नहियो जायब तइयो ने किछु हैत। बैंके काजसँ एक गोड़े ऐठाम नोटिश दइ ले गेल छलौ। तेँ अखन बाहरेक काजमे छी। काल्हिये जबाव देबै।’’
‘‘अखन गाड़ी अबैमे देरी अछि। ताबे डेराक भाँज लगा दाय। अच्छा एकटा बात कहअ जे होस्टल नीक हैत कि लौज?’’
मास्सैब, ने होस्टल नीक हैत आ ने लौज। मधुबनीक हवा ऐहन बिगड़ल अछि जे विद्यार्थी सब पढ़नाई छोड़ि-छोड़ि भरि दिन जातिवादीक गुट बना-बना झंझटे-फसादमे रहै अए। पढ़ैवला विद्यार्थी अपन-अपन अंगीतक ऐठाम रहि-रहि पढ़ैत अछि। हमरो डेरामे चारिटा कोठरी अछि।
तीनिये कोठरीसँ अपन काज चलि जाइ अए। एकटा कोठरी पड़ले रहै अए।’’
‘‘भाड़ा कोना की लेबहक?’’
मुस्कुराइत रमेसरा कहलकनि- ‘‘अपनेसँ भाड़ा नइ लेब। अहींक परसादे हम नोकरी करै छी। जहिना अहाँक विद्यार्थी तहिना तँ हमरो भाई भेला की ने?’’
‘‘दश-पाँच दिनक बात रहैत तँ ठीक छल मुदासे तँ नइ अछि।’’
‘‘भाड़ाक संबंधमे हम किछु ने कहब। एत्ते जरुर कहब जे दुनू बच्चाकेँ रहै ले डेरा जरुर देब।’’
असमंजसमे पड़ल बचेलाल अछेलालकेँ कहलक- ‘‘काका, अहीं भाड़ा कहिओ?’’
धड़फड़ा क’ अछेलाल पचास रुपैआ महिना कहि देलक। दुनू गोटे सहमत भ’ गेला। सहमत होइत बचेलाल रमेसराकेँ पूछलखिन- ‘‘खाइ-पीवैक जोगार कोना हेतइ?’’
‘‘चाउर-दालि गामसँ पठा देवइ। अपनो परिवारमे खेनाइ बनिते अछि ऐहो दुनू गोटे खेता।’’
‘‘चाउर-दाइलिक अतिरिक्तो तँ नोन-तेल, तरकारीमे खरच हैत। तइ ले सय रुपैया महीना सेहो देव।’’
‘‘बड़बढ़ियाँ।’’
सब जोगार लागि गेल। बचेलाल अछेलालकेँ कहलखिन- ‘‘काका अहाँ सब जा क’ डेरा देखि लियौ। हम एत्तै आराम करै छी।’’
तीनू गोटे केँ संग केने रमेसरा विदा भेल। स्टेशनसँ पूबारि भाग चकदहमे रमेसराक घर। एकांत जगह। सब केयो डेरा देखि लगले घुरि क’ आबि गेल। गाड़ीक टिकट कटौलक। थोड़े कालक बाद गाड़ी एलै। चारु गोटे गोसाइ उगले अपना स्टेशन पहुँच गेल।
स्टेशनसँ गाम अबैक रास्तामे अछेलाल बचेलालकेँ कहलक- ‘‘बौआ! औझुका दिन बड़ सगुनिया छल।’’
बचेलाल- ‘‘से की?’’
‘‘एक्के दिनमे कत्ते काज भेल। हमरा तँ होइ छल जे कै दिन लगत कै दिन ने। जाइये कालमे हमरा होइ छल जे धोती, चद्दरि ल’ लइ ले कही, मुदा नइ कहलौ।’’
‘‘कक्का, काज करैक ढंग होइछै। ओना संयोगो होइछै। जकरा काज करैक ढंग होइछै ओ कम्मे समयमे बहुत काज क’ लइ अए। आ जकरा ढंग नहि होइछै ओकरा कम्मो काजमे बेसी समय लगैछै। संयोग संयोग अइ दुआरे कहलौ जे जना कओलेज गेलौ आ किरानिये नहि रहैत। चाहे किरानियो रहैत आ कोनो कागजे निह रहितै। चाहे जाइ कालमे गाड़िये छूटि जाइत। यैह सब कुसंयोग छियै।’’
शिवकुमारक आ रामनाथक मन चटपट करैत जे कखन घर पर पहुँच किताब देखब। रामनाथ अखबारक विशेषांक सब गत्ता लगबै ले रखने छल। किऐक तँ बिना गत्ता लगौल कितावक उपरका पन्ना गन्दो भ’ जाइछै आ ओदरबोक डर रहैछै। स्टेशनसँ घरक दूरी चारिये किलोमीटर। तेँ अबैमे वेसी देरियो ने लगल। तहूमे घरमुँहा। घर पर अबिते शिबकुमार हाथ-पाएर धोय, अंगा निकालि दलानक चैकी पर बैसि दादी (सुमित्रा) केँ सोर पाड़लक। सुमित्राकेँ अबिते किताब सब देखबै लगल। किताब देखि सुमित्रा कहलक-‘‘ बौआ मन लगाकेँ पढ़ियह। औझुका दिन तोरा जिनगीक एकटा चैबट्टी पर पहुँचा देलकह। एहिठामसँ जिनगीक आगूक रास्ता खुलतह। अखन, ने तोरा कोनो घरक भार छह आ ने आन कोनो। मात्र पढ़ैक छह। अखन जत्ते मेहनत क के पढ़वह ओत्ते अपने गुण करतह। मैट्रिक धरि बापो पढ़ल छथुन, तेँ ओत्ते धरि सरस्वतीक वास घरमे भ’ गेल छह। आब आगू कोन रहथुन ई तँ तोरे पर छह। भगवान ककरो अधला थोड़े करै छथिन, ओ तँ सबकेँ नीके करै छथिन। तखन तोरे अधला किअए करथुन। रामनाथोकेँ अपन सहोदरे भाय जेँका वुझिहक।’’
शिवकुमारकेँ सुमित्रा बुझबिते छलि कि अछेलालो आयल। अबिते अछेलाल सुमित्राकेँ कहै लगलनि- ‘‘भौजी! एत्ते उमेर बीति गेल आइ मधमन्नी देखलौ। येह बाप रे बड़ीटा बजार छै। बड़का-बड़का दोकानो सबछै। जाइ कालमे ते नीक-नाहाँति नइ देखलियै किअए ते रिक्शा पर चढ़ल रही। मुदा अबै कालमे देखलियै। बड़कीटा कौलेज छै। मारे मास्टर आ मारे चट्टिया देखलियै। बचेलाल दुनू गोड़ेकेँ नाम लिखबैत रहे आ हम घूमि-घूमि देखबे करी। बड़का-बड़का कोठा। एकटा घरमे मारे साइकिल देखलियै। ओते गनलो ने होइत। एक गोरे ओइ ठीन बैठल रहै ओ हमरा कहलक- ‘‘भाइ जी, तमाकुल खाइ छी।’’ हमहू बुझलौ जे किअए ने तमाकुले लाथे किछु बुझिओ ली। हम कहलियै- ‘‘हँ।’’ ससरिकेँ ओकरा लग गेलौ। मुदा वेचाराकेँ एक्केटा कुरसी रहै, जइ पर उ बैठल रहै। हम बगलेमे ईंटा-समटीक बनौल कम्मे खड़ा देवाल रहै ओही पर बैसलौ। दुनू गोड़े गप-सप करै लगलौ। ओ कहलक जे अपना जिलाकेँ सब गामक विद्यार्थी अइ कौलेजमे पढ़ै अए। ऐह कत्ते कहब भौजी, ओते की मनो अछि।’’
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पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
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'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...