Friday, January 01, 2010

'विदेह' ४८ म अंक १५ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४८) PART IV

सुजित
सुजीतकुमार झा
जनकपुरधाम, ।
६अम शताब्दीॅक लोक नायक वृतचित्रमे

६अम शताब्दीॅमे मिथिलामे विशेष कऽ तिब्ब ती आ भुटानी आक्रमण बढल छल । उत्तर क्षेत्र सँ तिब्बदतीक आक्रमण बढल छल । ओहि समयमे सिरहाक महिसौथा (बर्तमानमे नेपालक सिरहा जिल्लाल) मे जन्मन लेनिहार सलहेश किराँती सभ संग समन्वमय कऽ संयुक्त शैन्य दस्ताक बनौलन्हि। आ कुशलता पूर्वक लडाइ लडि अपन देशक सीमा बचौने रहैत ।
सीमा केँ रक्षा कऽ मिथिलामे राज्यव करयबला दुसाध (पासवान ) जातिक ओहे लोक नायकक रुपमे चिन्ह ल जायबला सलहेशक विषयमे रंगकर्मी रमेश रञ्जंन झा वृत्तचित्र बनौलन्हिा अछि ।
जनकपुरक लोक सञ्चायर नामक संस्थांक प्रस्तुृति रहल सलहेश वृत्तचित्रमे हुनक जिवन,योगदान आ ओहि समयमे बाहिरी आक्रमण सँ मिथिलाकेँ बचौने इतिहास समेटल गेल अछि ।
२४ मिनेटक ओ वृत्तचित्र फेर सँ सलहेशक सम्पूमर्ण व्युक्तित्वृकेँ आम जनता लग स्म रण करा देलक मिथिलाञ्चिलक वरिष्ठर रंगकर्मी मदन ठाकुर कहैत छथि ।
वृत्तचित्रक लेखक एवं निर्देशक रमेश रञ्ज्न झाक अनुसार सलहेशक मिथिलाञ्च्लभरि मात्र नहि जतय कतौ मैथिल सभ रहैत छथि ओतयकेँ लोक हुनक योगदान आ कतेको शताब्दी पूर्व बिकेन्द्रीभकरण निति लागु कऽ जनताकेँ न्यातय देने स्मकरण करैत पुजैत आबि रहल अछि ।
ओहन व्य क्ति सँ अखनकेँ देश चलाबयबला नेता सभ सिखै बहुत आवश्यदक रहल हुनक कथन अछि ।

सलहेशक इतिहास
६अम–७अम शताब्दीँमे मिथिलाक महिसौथा स्थातनमे सलहेशक जन्मन भेल छल । सलहेशक जन्मनक समयमे मिथिलामे सामाजिक आ राजनीतिक आरजकता व्याेप्तम छल । छोट छोट ग्राम पिता बिचक अन्त रद्वन्दकमे आम जनता पिचायल छल । सलहेश तात्कारलिन सामन्तत विरुद्ध सुसंगठित शक्तिक निर्माण कऽ सभकेँ परास्तन करैत राज्यल स्था पनाक कएलन्हिस ।
पूर्वमे कोशी आ पश्चिथममे गण्डनकी उत्तरमे चुरे पर्वत शृंखला आ दक्षिणमे गंगा तक मैदानी भागमे सलहेशक शासन सत्ता स्थापपना भेल । बाहरी आक्रमणकारी सँ अहि क्षेत्रकेँ सुरक्षित बनाबय सलहेश अत्यनन्तह कुशल आ युद्धकलामे निपुण शैन्या शक्तिक स्थाापना कएलन्हिँ ।
आम जनताक जिविकाक माध्य्म कृषि आ पशु पालन तथा प्राकृतिक स्रोत साधनमे आम जनताक पहुँच सुनिश्चि त कएलन्हिे ।
किराँत सँगक सम्बचन्ध‍
मिथिलामे सलहेशक राज्यए स्था पना भेलाक बाद सभ सँ बडका चुनौती जनताकेँ एकजुट बनाएब आ इहे बलमे सीमाके सुरक्षित पारब रहल छल ।
मिथिलाकेँ गण्डतक , गंगा आ कोशी सँ एक प्रकारक सुरक्षा चक्र प्रदान छल । उत्तर दिस सँ मात्र मिथिलाके आक्रमण होएबाक बेसी खतरा छल । तिब्ब त आ भुटानक नरेश सँग संलग्नुता आ मिथिलाक खुँखार डाकु चुहर मलक सहयोगमे बेर बेर आक्रमण भऽ रहल छल ।
मिथिलाक मैदानी भूमि अन्न आ पशुधनक दृष्टिन सँ अत्यनन्तन समृद्ध भेलाक कारण आक्रमणकारी सभक अहि क्षेत्र उपर दृष्टिि छल । आक्रमण कऽ फिर्ता होबयबला तिब्बअती सैनिक सभ महाभारत पर्वत श्रृंखला में रहल किराती सभकेँ सेहो लुटपाट करैत छल ।
अर्थात मिथिला आ किराँत दूनु समान्यछ रुपमे आक्रमणक पीडा सँ ग्रस्ती छल ।
ओहि समयमे मैथिल आ किराँत संयुक्त सैन्य निर्माण करब आ सामुहिक प्रतिबाद करब सलहेसक प्रस्ताशब किराँती सैन्यिपति केवला किराँत स्वीरकार कएलन्हिा ।
किछ दिनक वाद पकरियागढ आ तरेगना गढ लडाइमे तिब्बात भुटान आ चोहरमलक संयुक्त सैन्य् शक्तिके परास्तन कऽ भुटानी नरेश सुंगके सलहेस बन्दीि बनाबय सफल भेल रहथि । अर्थात किराँत सँगक संयुक्त सैन्यत निर्माणक वाद बाहरी आक्रमणकारी पराजित होबय लागल छल ।
सलहेसक उपासक सभ हुनका देवताक रुपमे पूजा करय लागल छल । तकर निरन्त रता अखनो जारी अछि ।
सलहेसक समाजमे प्रभाव
तत्काकलिन समाजमे सलहेस अत्य्न्त न्या य प्रेमी शासक मानल जाइत छलाह । जातिय द्वन्द्वा बढल समयमे सलहेस सभ गोटेके संगठित कएलन्हि । सभ जाति के लोक सलहेसक नेतृत्वयके स्वीमकार कएलन्हिय । मिथिला समाजमे सलहेस आ हुनक सहयोगी पात्रके सयौ वर्ष वितलाक बादो कियो नहि विसरि सकल । सलहेसके न्या यक प्रतिमूर्ति मानल जाइत अछि ।
कोनो इच्छाय विमारी, भुख, ऋण , पीडा सँ मुक्तीक लेल अखनो सलहेसक कोवला कएल जाइत अछि ।
सलहेसक भाई मोतीरामके पहलमान सभ स्मतरण कऽ मात्र अखाडामें उत्तरैत अछि । जंगलमे लकरी आ अन्यस उत्पाेदित समान लाबय जायबला सभ हिंसक जानवर सँ बचय सलहेसक भगिना कारिकन्हाक आ वहिन वनसप्तीभके पूजा करैत अछि ।
अर्थात मिथिलाक समाजिक जिवनमे सलहेसक प्रभाव एखनो अत्यंधिक अछि ।


बिपिन
बिपिन झा
॥ कथं ’संस्कृतं’ संस्कृतम् ॥
(विशिष्टभाषाक रूप मे संस्कृत:- एक विमर्श)
संसारक प्राचीनतम उल्लिखित भाषाक रूप मे संस्कृत प्रथित अछि। संस्कृत शब्द दू शब्द “सम्” (अर्थात्, सम्पूर्ण) और “कृतम्” (अर्थात्, कयल गेल) (सम्+कृ+क्त) सऽ मिलकें बनल अछि| एहि शब्द कअर्थ होइत अछि- सम्पूर्ण, त्रुटिहीन| अन्यान्य भाषाक नामकरण क्षेत्रादिक नाम पर कयल गेल अछिमुदा संस्कृतक नामकरणक हेतु एकर संस्कारयुक्त होयब छैक। एतय संस्कारयुक्त होयबाक तात्पर्य एकरपरिष्कृत व्याकरण, सरलता एवं वैज्ञानिकता छैक। संस्कृत कें विशिष्ट स्थान प्रदान करय बला किछुअन्यान्य कारक सेहो छैक जेकरा अधोलिखित बिन्दुक माध्यम सऽ निर्दिष्ट कयल जा सकैत अछि-
• भाषावैज्ञानिक अध्ययन मे एकर प्रभूत योगदान (सन्दर्भ हेतु ऋग्वेद १/१६४/४५, ४/५८/३,१०/७१/१-२-३, १०/११४/८, यजुर्वेद १९/७७, अथर्ववेद९/१०/२-२१ द्रष्टव्य)।
• प्रमुख प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, कला, पुराण, काव्य, नाटक आदिपरक ग्रन्थक संस्कृत मे निबद्धता।
• हिन्दू धर्मक लगभग सबटा धर्मग्रन्थ संस्कृते मे निबद्ध अछि।
• एकताकऽ शिक्षा देनाई।
• संस्कृत भाषा क व्याकरण अत्यन्त परिमार्जित एवं वैज्ञानिक अछि। संस्कृत हेतु प्रथितव्याकरण अछि पाणिनि अष्टाध्यायी जे एकरा कम्प्यूटर फ्रेण्डली भाषा होयबा मे योगदानदेलकैक।
संस्कृत भाषा कऽ वैशिष्ट्य-
• अक्षर कऽ उच्चारण-
संस्कृत मे प्रत्येकव्यंजनक उच्चारण हेतु स्वरक योग सर्वथा अपेक्षित रहैत छैक। संगहि उच्चारणकवैशिष्ट्य ई अछि जे कतहु व्यतिक्रम नहि होइत अछि। उदाहरण हेतु ’अ’ कऽ १८ भेद होइत अछि।व्यतिक्रम नहिं भेलाक कारणे उच्चारण वैषम्य नहिं दृष्टिगत होइत अछि। एहि भाषाक विपरीत आंग्लआदि मे ई व्यतिक्रम स्पष्टतः दष्टिगत होइत अछि। उदाहरणतः come (कम) और coma(कोमा) मे‘co’ क दू टा भिन्न भिन्न उच्चारण भेटैत अछि|

• संस्कृत शब्दक निर्माण-
संस्कृत मे धातु-रूप, शब्द-रूप, प्रत्यय, उपसर्ग, और सन्धि आदिक सहायता सँऽ नवीन शब्द कनिर्माण सरल अछि| संस्कृत मे शब्दो क निर्माण पूर्णतः वैज्ञानिक ढंग सँऽ कयल जाइत अछि|।
• व्याकरण-
एकर व्याकरण आओर वर्णमाला कऽ वैज्ञानिकता क कारण सर्वश्रेष्ठता स्वयंसिद्ध अछि। प्राचीनकाल हो या आधुनिक काल, उत्तर भारत हो या दक्षिण भारत, संस्कृत का व्याकरण अपरिवर्तित रहलअछि|
• प्राचीनता
वैदिक ग्रन्थक प्राचीनता निर्विवाद रूप सँ स्वीकृत अछि। अस्तु संस्कृत हजारो वर्ष पहिने सविद्यमान अछि।
• संस्कारित भाषा-
संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं थीक, अपितु संस्कारित भाषा अछिएहि कारण एकर नामसंस्कृत अछि। संस्कृत कऽ संस्कारित करय बला छथि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योगशास्त्र क प्रणेता महर्षि पतंजलि ।
• सरल भाषा-
सामान्य रूप सँऽ संस्कृत वाक्य मे शब्द कें कोनो क्रम मे रखल जा सकैत छैक। जाहि सँऽ अर्थकअनर्थ नहिं होइत छैक। ई एहि कारण संभव छैक जे एतय प्रत्येक पद वैज्ञानिक तरीका (समुचितविभक्ति आदिक संग) सँ राखल गेल होइत छैक।उदाहरणतः – अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहंअहम् दुनू ठीक छैक।
• त्रुटिहीन भाषा-
ई भाषा संगणक आओर कृत्रिम बुद्धि क लेल सबसँऽ उपयुक्त भाषा मानल जाइत अछि। संस्कृतव्याकरण तर्कशास्त्रीय दृष्टि सँऽ उपयुक्त अछि अस्तु मशीनक भाषाक लेल पूर्णतः उपयुक्त अछि| Forbes magazine, (July, 1987) केर अनुसार “Sanskrit is the most convenient language for computer software programming.” [ref - http://www.stephen-knapp.com/indian_contributions_to_american_progress.htm]
• मष्तिष्क विकास
आधुनिक शोध सँऽ ई स्पष्ट अछि जे संस्कृतक अध्ययन स मानसिक दृढता और स्मरणशक्तिकविकास होइत अछि। [ref-http://www.galendobbs.com/theck/sanskrit.html]
• एकताक निर्वाहक-
संस्कृते एहेन भाषा अछि जे भाषाविवाद कें प्रश्रय नहिं दैत अछि। ई एकता केर गीत सुनवैत अछि।
अस्तु उक्त विविध बिदुक माध्यम सँऽ एतेक निर्विवाद अछि जे संस्कृत विशिष्ट भाषाक रूप मे विद्यमान अछि। एकटा प्रवाद सतत सुनवा मे अबैत अछि जे संस्कृत आब मृतप्राय अछि; एहि सन्दर्भ मे विभिन्न सन्दर्भक संग भ्रान्ति दूर करबाक प्रयास करब हम आगामी लेख मे। ता धरि विभिन्न राजनेता द्वारा संस्कृत मे शपथग्रहण करब, संस्कृत लेल जनमानस द्वारा समस्त वसुधाक अखण्ड मानैत कयल जारहल प्रयास आदि अपनें लोकनि कें उक्त प्रवादक जाल मे फँसवा सऽ वारित करत संगहिhttp://sanskritam.ning.com/ ई अन्तर्जाल श्रोत संस्कृतक जीवन्तताक झांकी प्रस्तुत करत।
बिपिनझाhttp://sites.google.com/site/bipinsnjha/home
अनमोल
अनमोल झा

रिलेशन-१

-गोर लगै छी। हम निखिल बजै छी।
-नीके रहू। कहू की समाचार छै गामक।
-ठीके छै चचाजी। कहलहुँ जे हप्ता दिनक एकटा काज अछि लखनऊमे। से अपनेक डेरापर रहबै। कोनो दिक्कत तँ नै ने हएत।
- दिक्कत। दिक्कत कोना नै हएत। एकटा घर, बरण्डापर खेनाइक समान। कोना रहै छी से हमहीं सभ बुझै छी। भातिज छी, दिक्कत थोड़े होमए देब अहाँकेँ। आऊ, एकटा होटल बुक कऽ देब। कोनो दिक्कत नै हएत..।

जितेन्द्र
जितेन्द्र झा

जनकपुरमे चक्काजाम कवि गोष्ठी



जनकपुरधामक साहित्यकार आ रंगकर्मी शुक्र दिन ११ दिसम्बरकऽ सडकपर कवितावाचन करैत मिथिला राज्यक माग कएल अछि । नेपालमे चक्काजाम हएब कोनो नव बात नहि , मुदा जनकपुरधामक साहित्यकार रंगकर्मी रचनात्मक चक्काजाम कएलक अछि । जनकपुरक प्रवेशद्वार रहल पिडारी चौकपर यातायात अबरुद्ध करैत कविगोष्ठी कएल गेल । चक्काजाम कवि गोष्ठीमे कविसभ नेपालक नव संविधानमे मिथिलाराज्यक ब्यबस्था हएबाक माग कएने छल । नेपालमे एखन नव संविधान लिखबाक प्रक्रिया चलि रहल अछि । आ एहि क्रममे विभिन्न समुदाय, वर्ग अपन अधिकारक लेल आवाज उठारहल अछि । नयां संविधानमे मिथिला राज्य आ मधेशीक हक अधिकार सुनिश्चित हएबाक चाही रंगकर्मी रन्जु झा कहलनि । गोष्ठीमे साहित्यकार डा. राजेन्द्र प्रसाद विमल, मिनापक अध्यक्ष सुनिल मल्लिक, सुनिल मिश्र,काशीकान्त झा, प्रमिला मिश्र, रमेश रंजन, रंजु झा, मदन ठाकुर सहितक सहभागिता छल । मिथिला राज्य संघर्ष समिति जनकपुर मिनापक सहभागितामा गोष्ठी कएने छल । चक्काजामक कारण जनकपुर महेन्द्रनगर सडक खण्डकमे सवारी साधन नहि चलि सकल छल । संविधान सभामे मिथिला राज्यक माग कमजोर पडि रहल समयमे एहि तरहक गोष्ठीसँ मिथिला राज्यक माग थोडबहुत चर्चा बटोरलक अछि ।

निमिष

‍ निमिष झा

मैथिलीक युगद्रष्टा

कोनो साहित्य्मे किछ साहित्यरकारसभ एहन होइत छथि जिनकर जन्मग कोनो घटनाक
रूपमे होइत अछि आ ओहि घटनासँ सम्बतन्धिकत सम्पूथर्ण साहित्य प्रभावित भऽ जाइत
अछि । ओहन साहित्यओकारक साहित्यि क व्यएक्तित्वप ओहि साहित्य क सर्वाङ्गीण
विकासमे वरदानसिद्ध होइत
अछि । ओहन साहित्यि क महापुरुष पूर्ववर्ती साहित्यि‍क परम्प रा आदिक सम्यभक
अनुशीलन पश्चाित अपन मान्यरता एवम साहित्यि‍क योजना निर्दिष्ट करैत छथि । अपन
कार्यसभक माध्यतमसँ युगान्तयकारी आ प्रभावशाली रेखा निर्माण कऽ अमरत्वद प्राप्ति
करैत छथि ।

मैथिली साहित्यतक इतिहासमे विद्यापति एकटा एहने अतुलनीय प्रतिभाक नाम अछि ।
सम्पूीर्ण मैथिली साहित्यव हुनकासँ प्रभावित अछि । हुनकर प्रभाव रेखाकेँ क्षीण
करबाक साहित्यिरक क्षमता भेल व्यपक्ति मैथिली साहित्य क इतिहासमे अखन धरि किओ
नहि अछि । विद्यापति मैथिली साहित्य क सर्वश्रेष्ठल कवि छथि । हुनकेमे मैथिली
साहित्य क सम्पूलर्ण गौरव आधारित अछि ।

इतिहासकार दुर्गानाथ झा ‘श्रीश’क शब्द।मे विद्यापति आधुनिक भारतीय भाषाक प्रथम
कवि छथि । ओ संस्कृथत साहित्य्क अभेद्य किलाकेँ दृढ़तापूर्वक तोड़ि भाषामे
काव्यथ रचना करबाक साहस कयलनि । हुनकरे आदर्शसँ अनुप्रेरित भऽ शङ्करदेव,
चण्डीथदास, रामानन्द। राय, कवीर, तुलसीदास, मीरावाई, सुरदास सनक महान
स्रष्टा सभ अपन भक्ति भावनाक माध्युमसँ अपन मातृ भाषाकेँ समृद्ध कयलनि ।

मैथिली साहित्यसमे विद्यापति युग ओतबे महत्व पूर्ण अछि जतबे अङ्ग्रेजी
साहित्यसमे शेक्सिपियर युग, नेपाली साहित्य मे भानुभक्त युग, बङ्गालीमे रवीन्द्रर
युग तथा हिन्दीसमे भारतेन्दुि
युग । विद्यापतिक रचनासभमे मिथिला पहिल बेर अपन वैशिष्टेय भक्तिभावना,
शृङ्गगारिक सरसता एवम् मौलिक साङ्गीतिक लय प्रस्फुशटित भेल आभाष कयलक अछि
। ओकर बाद विद्यापतिक पदावलीसभ जनजनक स्वयर बनि सकल तऽ मिथिलामे युगोसँ
व्यारप्तत असमानताक अन्तय करैत विद्यापतिक रचनासभ समान रूपसँ लोकस्वषरक रूप ग्रहण कऽ
सकल ।

वास्त वमे विद्यापति युगद्रष्टा् रहथि । ओ मैथिली साहित्यसक श्रीवृद्धिक लेल अथक
प्रयास मात्र नहि कयलनि, तत्कापलीन समयमे पतनोन्मु्ख मैथिल समाजक पुनर्संरचनाक
लेल सेहो मद्दत पहुँचौलनि । विद्यापतिक प्रादुर्भावक समयमे भारतीय उपमहाद्वीपक
प्रायः हरेक भागक सभ्यलता आ संस्कृरति सङकटपूर्ण अवस्थादमे छल । मुसलमानी
शासकसभक आतङक चरमोत्कयर्षमे रहल ओहि समयमे मैथिल संस्कृसतिक रक्षा आवश्यलक
भऽ गेल छल । ओहन अवस्थानमे विद्यापतिक आगमन मैथिली साहित्यक आ संस्कृातिक
विकासक लेल महत्वअपूर्ण वरदान सिद्ध
भेल । एक दिस मुसलमानी शासकसभक आक्रमण आ दोसर दिस बौद्ध धर्मक बढ़ैत
प्रभावक कारण समाजमे सिर्जित वैराग्यणक मनस्थि तिसँ आक्रान्तृ मैथिल सभ्य ता आ
संस्कृकति अपन उन्नियनक रूपमे सेहो विद्यापतिकेँ प्राप्तत कऽ अपन मौलिकता बचाबयमे
सक्षम भेल ।

विद्यापति अपन विविध रचनासभक माध्ययमसँ सामाजिक पुनर्संगठनक प्रक्रियाकेँ बल
देलनि । ओ समाजसँ पलायन भऽ रहल मैथिल युवासभकेँ समाज निर्माणक मूल
धारामे प्रभावित करएबाक लेल अथक प्रयास सेहो कयलनि । हुनकर एहने प्रयासक
उपज अछि शृङ्गगारिक रचना
सभ । मुसलमानसभक आक्रमणसँ पीडित आ पलायन भऽ रहल तत्काहलीन मिथिलाक
युवासभकेँ मुसलमान विरुद्ध प्रयोग कऽ मिथिलाक अस्तिकत्व रक्षा करबाक लेल
विद्यापतिक ई रचनासभ सहयोगी प्रमाणित भेल ।

तत्काालीन समयक लेल विद्यापतिक अहि प्रकारक चातुर्यकेँ कुटनीतिक सफलताक रूपमे
देखल जा सकैया ।

समाजमे व्यायप्तक असमानाता, कुरीति, अन्ध विश्वाास सहित विभिन्नआ विसङगतिसकेँ मानव
प्रेम एवम भाषा उत्थातनक भरमे विद्यापति अन्तक करबाक काजमे सफल छथि ।

विद्यापतिक सम्पूतर्ण रचनासभ शृङ्गगार आ भक्ति रससँ ओतप्रोत अछि । कतेको
विद्वानसभ विश्वू साहित्यामे विद्यापतिसँ दोसर पैघ शृङ्गगारिक कवि आन किओ नहि
रहल कहैत छथि ।

महाकवि विद्यापति तत्का लीन समाजमे प्रचलित संस्कृ त, अवहठ्ठ आ मैथिली भाषाक
ज्ञाता छलथि । ई तीनु भाषामे प्राप्तर रचनासभ अहि बातकेँ प्रमाणित करैत अछि


यद्यपी विद्यापतिक जन्म तथा मृत्युपक सम्बनन्धकमे विभिन्नछ विद्वानसभक विभिन्न‍ मत अछि ।
तथापि मिथिला महाराज शिव सिंहसँ ओ दू वर्षक जेष्ठत रहथि । अहि तथ्य्क आधार
पर विद्वानसभ हुनकर जन्म तिथिकेँ आधिकारिक मानैत छथि । कवि चन्दाम झा
विद्यापतिद्वारा रचित पुरुष परीक्षाक आधार पर विद्यापति राजा शिव सिंहसँ दू
वर्ष पैघ रहथि उल्लेतख कयने छथि । जँ ई तथ्ययकेँ मानल जायतऽ सन् १४०२ मे
राज्याैरोहणक समयमे राजा शिव सिंहक उमेर ५० वर्ष छल आ विद्यापति ५२ वर्षक
रहथि । अहि आधार पर विद्यापतिक जन्मे सन् १३५० मे भेल निश्चि२त अछि ।

डा.सुभद्र झा, प्रो. रमानाथ झा, पं. शशिनाथ झा आदि विद्वानसभ ई मतकेँ
स्वी कार करैत छथि मुदा डा.उमेश मिश्र, डा.जयमन्ति मिश्र सहितक विद्वानसभ विद्यापतिक
जन्म सन् १३६० मे भेल कहैत छथि ।

अहिना विद्यापतिक मृत्यु प्रसङ्गमे सेहो एक मत नहि
अछि । अपन मृत्यु्क सम्ब‍न्ध्मे मृत्युि पूर्व विद्यापति स्व यंद्वारा रचित पद विद्यापतिक
आयु अवसान कात्तिक धवल त्रयोदशी जानेकेँ तुलनात्मेक रूपमे अन्यु मत सभसँ
अपेक्षाकृत युक्ति संगत मानल गेल अछि । मुदा अहिसँ वर्षक निरुपण नहि भेल
अछि ।

विद्यापतिक जन्मत हाल भारतक बिहार राज्यँक मधुवनि जिल्लाभ अन्तसर्गत बिसफी गाममे
भेल छल । ई मधुवनी दरभङ्गा रेल्वेर लाइनक कमतौल स्टेमसन लग अवस्थिमत अछि । हिनक
पिताक नाम गणपति ठाकुर आ माताक नाम गंगादेवी रहनि । हाल विद्यापतिक
वंशजसभ सौराठमे रहति छथि ।

विद्यापति बालके कालसँ कुशाग्र वुद्धिक अलौकिक प्रतिभाक रहथि । अपन विद्वान
पिताक सम्पबर्कमे ओ प्रारम्भिधक शिक्षा ग्रहण
कयलनि । मुदा औपचारिक रूपमे प्रकाण्डि विद्वान हरि मिश्रसँ शिक्षा ग्रहण कयलनि ।
तहिना प्रकाण्डप विद्वान पक्षधर मिश्र विद्यापतिक सहपाठी रहनि । विद्यापति मैथिली
साहित्य्क धरोहर मात्र नहि भऽ संस्कृितक सेहो प्रकाण्ड विद्वान
रहथि । ओ मैथिली आ अवहठ्ठक अतिरिक्त संस्कृ्तमे सेहो अनेको रचना कयने
रहथि । हुनकर रचनासभकेँ तीन भागमे वर्गीकरण कयल जाइत अछि ।

क) संस्कृभत ग्रन्थर ः भू–परिक्रमा, पुरुष परीक्षा, शैवसर्वस्वमसार, शैवसर्वस्वशसार
प्रमाणभूत, लिखनावली, गङ्गा वाक्या–वली, विभागरि, दान वाक्याववली, गया पत्तलक,
दुर्गाभक्ति तरङ्गिणी, मणिमञ्जररी, वर्ष, व्रत्य्, व्या‍दिभक्ति तरङ्गिणी ।

ख) अवहठ्ठ ग्रन्थव ः कृतिलता, कृतिपताका

ग) मैथिली ग्रन्थव ः गोरक्ष विजय


१.मनोज २.राजदेव
१.कुमार मनोज कश्यप

घुरि आऊ निशा

आओर निशा अहाँ घुरि कंऽ नहि एलहुँ । व्याकुल, विदग्ध मोन संगे पथड़ायल आँखि पथ हेरैत रहि गेल । मुदा अहाँ के नहि एबाकं छल;से अहाँ नहि एलहुँ । दिमाग कंान मरोड़ैत आछ---'बुड़िबकं कंहाँ के! ओ भला किंयैकं एतहु! किंयैकं पागल बनि रहल छै ओकंरा पाछाँ ? तोहरा सँ ओकंरा कंोन रिस्ता; कंोन संबंध? दु पल के लेल भेंट किं भेलहु; अपन आधकंार जमाबऽ लगलै ओकंरा पर?' मोन कंहैत आछ---'कंोन रिस्ता से तऽ नहि जानि; मुदा ओ घुरि कंऽ एकं दिन आओत अवश्ये़।' निशा अहाँ अपना मुँह सँ भने कंोनो आश्वासन नहि देलहुँ; मुदा अहीं कंहु निशा हमर आँखि अहाँकं आँखि के मूकं निमंत्रण नहि देने छल? किं अहाँ झुकंल पलकं सँ मौन स्वीकृति नहि देने छल हुँ? तखन पेᆬर अहाँ घुरि कंऽ किंयैकं नहि एलहुँ निशा? हमर आँखि सदिखन स्टेशन, बस-स्टैंडकं भीड़ मे आहं के तकैत रहैत आछ जे कंखनो,कंतहु-ने-कंतहु भेटाईये जैब आ बिहुँसैत कंहब, 'हम आबि गेलहु रजत!'जखन-जखन हम श्रमजीवि ट्रेन पक़ंडबाकं लेल घर सँ निकंलैत छि तऽ लगैत आछ अहाँ स्टेशन पर पेᆬर भेटायब आ हँसि कंऽ बाजब--''हाय रजत! कंोना छि अहाँ? केहन संयोग जे हम सभ दोबारा स्टेशने पर सेहो गामे जाईत कंाल भेटलहुँ ।'' हम कंहितह ुँ- '' हम तऽ निके छी। आहाँ अपन वुᆬशल बताऊ? एतेकं दिन बाद भेंट भेल। हम तऽ कंहिया सँ आहाँकं बाट जोहि रहल छि।'' आहाँ चट्‌ट दऽ उत्तर दितहुँ --''अरे वाह! ने अपन पता बतेलहुँ; ने हमर पता लेलहुँ, पेᆬर भेंट हेबो कंरैत तऽ कंोना?'' पेᆬर हम सभ ट्रेन मे चढ़ि जयतहुँ। मुदा निशा अहाँ नहिये एलहुँ।

हमरा सभकं मिलन केहन संयोग छल! आहाँ आ आहाँकं पिताजी निचुलकंा बर्थ पर बैसल रही। ओ बर्थ हमर छल। तै हम अपन बर्थ लग आबि पुछने रहि तऽ आहाँकं पिताजी बाजल रहथि, 'ई बर्थ आह के होयत। हमर दुनू उपरकंा बर्थ आछ। आहाँ के कंष्ट नहि हुअय तऽ हम दुनू एहि पर बैसल रहि।' उत्तर मे स्वीकृति सूचकं मुड़ी डोलेबाकं आतरित्तᆬ हम किंछु नहि बाजि सकंल रहि। आहाँ कं अलौकिंकं सुंदरता हमरा मुग्ध केलकं रुप-माधुरी़ज़ेना आहाँ कंोनो दोसर लोकं सँ पृथ्वी पर उतरल होई ! कंाश! किं हम शृंगार रसकं कंवि रहितहुँ तऽ कंाव्य-घट कें अहाँकं सौंदर्य-माधुरी सँ बूंद-बूंद भरि दितहुँ। कंाश! किं हम कंोनो चितेरा होईतहुँ तऽ एहि प््रोरणा-प््रातिमूर्ती कें फलकं पर साकंार उकेरि दितहुँ। हम कंवि-चित्रकंार भने नहि; भावुकं-हृदयकं स्वामी तऽ अवश्ये छी।हमर निरीह आँखि जे कंविता हृदय पर कंविता अंकिंत केलकं; मस्तिष्कं मे जे चित्र उकेरलकं ओकंर बरोबरि कंोनो कंवि-चित्रकंार किं कंहियो कंऽ सकैत आछ?

आहाँ के शाईत मोन हेबे कंरत निशा, जे जखन बातकं सिलसिला चलि परलै तऽ हम अहाँकं नाम पुछने रहि। अहाँके किंछु बजबा सँ पहिने अहाँकं पिताजी उत्तर देलनि--''श्वेत निशा'' । ''सुंदर! अतीब सुंदर! श्वेत निशा यानि पुर्णिमाकं धवल ईजोरिया''-- हमरा मुँह सँ बहरायल रहय । ओहि पर आहाँ बाजल रहि--''ईजोरियाकं संगहि अन्हरियाकं शुरुआत सेहो़ ।'' एहि सँ पहिने किं हम एकंर दार्शनिकं व्याख्या सुनि पबितहुँ, आहाँकं पिताजी टोकंने रहथि, -''निशा! चायकं थरमश निकंाल। एकं-एकं कंप घरकं गर्मागर्म चाय भऽ जाय''। आहाँ एकं कंप चाय हमरो दिस बढ़ेने रहि। जखन हम मुड़ी डोला कंऽ लेबा सँ मना केलहुँ तऽ आहाँ कंटाक्ष कंयने रहि --''किंयैकं, हमरा हाथकं चाय नहि पियब कंी?'' मुदा, निशा आहाँ चाय अपना हाथ सँ कंहाँ देने रहि हमरा। चाय के कंप हमरा दिस आहाँकं पिताजी बढ़ेने रहथि। हम चायकं कंप बिना कंोनो प््रातिवाद के लऽ कंऽ पिबऽ लागल रहि; मुदा बेमजा ।आहाँकं आँखि जेना हमरा आँखि सँ कंहने रहै--'हम अपन हाथ सँ नहि दऽ सकंलहुँ एहि मे हमर कंोन दोष? बीच मे बाधा तऽ हमर पिताजी बनि रहलाह आछ।'

सत्ये हम अपन सुधि-बुधि बिसरि गेल रहि निशा। हमर कंान आहाँकं पूजाकं घंटी सन टुन-टुन आवाज सुनबाकं लेल व्यग्र छल। मोन होईत छल आहाँ संगे असीम कंाल धरि बात कंरैत रहि। मुदा आहाँकं पिताजी बिच मे आबि जाथि। हुनके सँ पता चलल जे आहाँ दिल्ली विश्वविद्यालय मे साहित्य के छात्रा छी; साहित्यिकं लेखन मे सेहो आभरुचि आछ। आहाँकं पिताजी बैंकं आधकंारी छथि आ गर्मी छुट्‌टी मे गाम जा रहल छी। हमरा सेहो पटना तकं जयबाकं आछ से जानि आहाँकं पिताजी कंहने रहथि, 'चलू बढ़िआ भेल ।गप्प-शप्प कंरैत हमरा सभकं सफर आसानी सँ कंटि जायत।'' तकंरा बाद किंछुये कंाल मे आहाँकं पिताजी ऊंघाय लागल रहथि । आहाँ सँ बात कंरबाकं यैह उपयुत्तᆬ समय भऽ सकैछ, से बुझि हम पुछने रहि-''आहाँ के बोतल मे पानि आछ किं?''तखने आहाँकं पिताजी हड़-बड़ाकंऽ बाजल रहथि- ''हँ!हँ!य़ैह लियऽ।'' जाबत आहाँ किंछु बजितहुँ; बोतल हमरा हाथ मे धरा देलनि। हमर ईहो प््रायत्न बेकंारे चलि गेल छल। हम मोने-मोन गुम्हरि कंऽ रहि गेल रहि अपन हत-भाग्य पर आ आहाँकं पिताजीकं दखलंदाजी पर। मुदा कंईये किं सकैत छलहुँ?

राति मे हमर मोन बेचैने रहल। आहाँ तऽ उपरकंा बर्थ पर निश्िचंत सुतल छलहुँ; मुदा हमर मोन आहाँकं सौंदर्य-पान लेल जागले रहि गेल। हम टॉयलेट जेबाकं बहाना सँ ठाढ़ भऽ कंऽ आहाँकं आनंद्य-सौंदर्य के अपलकं निहारैत रहलहुँक़ंोनो मूर्ति-शिल्पी जेना बड़ मनोयोग सँ स्वेत संगमरमर के तारासि-तरासि कंऽ ई आकंार देने हो़ यथा नाम, तथा रूप़़ओहने पूर्णिमाकं धवल चाँद सन मुख़डा़ग़ुलाबकं पंखुरी सन ठोऱ़क़ंाम-कंमान सन भौंह़़ अंग-प््रात्यंग सुघड़़़ज़ेना एकं-एकं टा कंविता़ । चेहरा पर लटकिं रहल अल्हड़ लट जेना कंहि रहल हो-'हम एहि ठाम नहि रहबई तऽ आहाँकं नजरि नहि लागि जयतै?'' तखने निशा आहाँ कंरोट पेᆬरने रहि। अपन चोरि पक़ंडल जेबाकं डऽरे हम टॉयलेट दिस चलि गेल रहि।

भोर मे ट्रेन कंखन पटना पहुँचि गेल से बुझियो ने पौलहुँ ; नहि जनि पौलहुँ जे हमरा सभकं मिलन एतेकं क्षणिकं होयत। ट्रेन सँ उतरि कंऽ जयबा कंाल आहाँ घुमि-घुमि कंऽ कंतेकं हमरा दिस तकैत रहलहुँपेᆬर भीड़ मे कंतहु गुमि गेलहुँ। निशा हम एकंनो ओहि भीड़ सभ मे आहाँ के ताकिं रहल छि़ऩहि जानि कंहिया भेटा जायब आहाँ।

२.राजदेव मंडल,ग्राम-मुसहरनियाँ, पो.- रतनसारा (निर्मली), जिला- मधुबनी (बिहार)
पिन कोड- 847452
कथा
रखबार

धान सँ भरल खेतमे गाछ सुतल अछि। पछिला साल तेहेन भयंकर बिहाड़ि आएल जे एकहिं थप्परमे गाछ केँ सुता देलक। तहिया सँ ई सुतलो अछि आ जागलो। एकर पाँच टा डारि पहरुदार जेँका ठाढ़ अछि आर टकटकी लागौने सौंसे बाधक पसरल गम्हरैल आ पाकल धान दिस ताकि रहल अछि।
‘‘खबरिदार, कियो भरल चासमे हाथ लगेबेँ तँ भारी डण्ड जरिमाना लगतउ।’’
ई शबद सुन-मसान बाध मे हवा पर हेल रहल अछि। आ एहि शबद केँ सभ नहि सुनैत अछि। सुनैत अछि चोइर कर्म मे संलग्न बेकती। ओकरा तँ अन्हार मे ठाढ़ गाछ लोक सन आ भुक-भुकाइत भकजोगनी हथबत्तीक इजोत सन बुझि पड़ैत अछि। चंचल मन आ भितरिया डर....। चोर कहुँ इजोत सहै।
ओना लोक कहैत अछि- ‘‘जे ई गाछ संगहि ई बाध देवगनाह अछि। आ गाछक खाली जगह मे ई पाँचोटा मोंटका डारि कतेक दिन सँ ठाढ़ आछि। ओ मुईल वा जीअत रखवार थोड़े भऽ सकत।
एहि भरल दुपहरिया मे असल रखबार तँ भेटत गामपर। चैबटिया गाछतर।
सरुपा, गणेशी, भोली आओर चोरेबाल ताशक पत्ता फेकबा मे अपस्याँत। बुइधक कैंची चलबैत पूरा तागद केँ साथ। जे हारि जएताह ओकरा साँझ मे मूढ़ी केँ जलखई आ चाह पियाबऽ पड़तैक। तैं सभ अपन दाव-पेंच लगेबाक लेल सतर्क।
ओना चिन्ताकेँ कोनो गप्प नहि। किछु गिरहतक धान पाकि गेल अछि। दू-चारि दिन मे कटि जएतैक। कटतैक किएक नहि। ओ सभ बुइधगर आ चंखार गिरहत अछि। धानक बीया शहर-बजार आ बाहर सँ मंगा केँ समे सँ पूर्व लगौने अछि। मास दिन पहिले काटियो लेत। नवका धान, बलौकिया बीज। बूढ़ सभ ओहिना चिचिआइत रहत- जे एहि अँगरेजिया धान में ताकत नहि होयत अछि। ई पुरनका राग अलापलासँ देस-दुनियाँ ठाढ़ थोडे़ रहतैक। ई तँ आगू बढ़ैत रहल अछि आ बढ़ैत रहत। नव अविसकार केँ रोकि सकैत अछि।
किन्तु एहि नवका धानक चोर बड्ड-बेसी चिड़ई-चुनमुनी आ जीव-जन्तु सँ लऽ कऽ लोंक-वेद धरि।
चोराक धान छोपताह रखवार। मूरही लेताह आ चाह पिबताह आ नाम लगतैन्ह चोर केँ।
चोरेबाल केँ गामक लोक कहबा मे सुभीताक लेल चोरबा कहैत अछि। चोरबा नाम रहितो ओ इमनदार अछि। किछु खेती सँ आ किछु रखवारिक धान बचा केँ हरेक साल जमीन किनैत अछि।
एहिना ढोलाय मड़र परिश्रम करैत आर ईमान के साथ रखवारि करैत छल। आई ओ सम्पन्न गिरहत बनि गेलाह। तहिना चोरबो बनि जाएत। कियक नहि बनत?’’
ओ अपन इमान बचैने अछि लगन लगा केँ काज करैत अछि।
असल चोर आ लुच्चा तँ अछि मुसबा रखबार। केकर जजैत आ फसिल कखन काटि छोपि लेत वा कटवा दैत से ककरो पता नहि। गामक कतेक लोक विरोध कएलक- ‘‘जे मुसबा केँ अगिला बरिस रखवार सँ हटा देबैक। किन्तु अगिला बरिस पुनः रखवारिक लेल एक नंबर पर मुसबा केँ नाम। एकर सबसँ पैघ कारण रामशरण सिंह। सिंह जी गामक सभसँ पैध गिरहत। सब दृष्टिकोण सँ। कुनक खेत-पथार केँ देखवा-सुनबा आओर रखवारिक पूर्ण जिमेवारी मुसबे पर रहैत अछि। बारहो मासक लेल। मुसबा केँ नामो बदलि गेल अछि। सभ गोटे ओकरा रखबारे कहैत छैक।
मुसबा केँ रखवार रहला सँ सिंह जी केँ दुई फैदा। रखवार सौंसे गामक किन्तु सिंहजीक खेती केँ विशेष देखभाल। दोसर ई जे बारह मासक मजदूरी मुसबाक भेटबाक चाही। किन्तु सिंह जी तीन मासक मजदूरी कम दैत छल। आ ई कहि संतोख दैत छल- ‘‘जे तीन मासक लेल तँ तू गामक रखवार रहैत छी। तोरा गाम दिश सँ रखबारि मे अनाज भेटतहि छौ। तैँ तीन महीनाक काटि केँ भेटतौक।’’
सब गप्प बुझितो मुसबा अपना समांग जेँका सिंहजीक खेती-पथारी केँ देखैत छल। आर अपना केँ धन्य बुझैत छल। ओ सोचैत छल- जे सिंहजीक किरपा रहत तँ हमरा कियो रखबारि सँ हटा नहि सकैत अछि। सँगहि समाज मे जे नीक-अधलाह करैत छी वा बजै छी तेकर बादो हमरा पर किछु नहि होइत अछि। सिंह जीक परभाव सँ बचल रहैत छी।
आब रखबारो चुनैत काल गाम मे बड्ड राजनैति होइत अछि। के बेकती कोन पैघ गिरहत सँ मिलल अछि आ केकर गप्पक परमुखता समाज देतैक। केकरा रखवार राखि लैत आ केकरा हटा देतैक से कहब मोसकिल।
पहिले ई सामाजिक व्यवस्था छल जे गामक पंचायत मे सबसँ बेसी जमीन-बाला मालिक जेकरा सभकेँ चुनि दैत छल ओ सभ रखवार भऽ जाइत छल। किन्तु बाद मे एहि गप्पक विरोध भेलैक। धन आ शिक्षा बढला सँ सभ जाति अपन-अपन सिर उठौलक। तँ आब सभ जाति सँ एक-एकटा रखवार राखल जाइत अछि। जेकर संख्या कम अछि तँ दू जाति मिलि एकटा केँ राखल जाइत अछि। ऐना मे के रखवार रहताह के हटताह से कहब मोसकिल। कोन गिरहकत सँ केकरा बेसी परेम भाव अछि। जे ओकरा लेल पंचायत मे लड़त। आ ओकर गप्प रहिये जाएत, कहब कठिन।
ओना रखवार बनैक लेल बहुत गोटे तैयार रहैत अछि। एहि सँ दू टा लाभ। अपना खेती केँ रखबारि नीक जेंका तँ होएतहि अछि। संगहि रखवारि सँ प्राप्त विशेष आमदनियो। तेँ एहि कारजक लेल बहुत गोटे तैयार। किन्तु बनताह तँ भाग्यवाला। तईयो किछु एहनो तेज आ गुणी बेकती अछि जे सब साल रखवार बनबे करताह।
ओहने बेकती अछि-मुसबा। पाँचो रखवार मिलि रखबारि वाला धान मुसबा एहिठाम जमा रखता। ओहिठाम दौनी करा केँ पाँचटा कुड़ी लागत आ सबसँ बड़का कुड़ी मुसबे उठा कऽ लए जएताह।
मुसबाक परिबारो मे कोनो बेसी काज नहि। रखवारकि लेल एकदम ठीक बेकती। राति-बिरैत न चोर-डकैतक डर आ नहि साँप-कीड़ा केँ। चाकर-चैरठ, भुटगर कारी देह। पैंतालीस बरख उमेर भेला बादो जुआन सन लगैत अछि। अकेल खड़ खाईवाला। गाम मे मारा-पीटी कएला केँ कारणे दूई बेर जहल सँ खिचड़ी खा कऽ आपस आएल अछि।
पत्नी दमा रोगक कारणे दिन-राति खोंखिआएत पड़ल रहैत अछि।
चारि बरस पूर्व एक राति पुतोह सँ थप्पर-मुक्का करैत छल। जुआन बेटा किमहरो सँ आएल। पत्नी केँ बेसी मारि लगैत देखि ओहो मुसबाक केँ मारय लागल। मुसबा करोध मे आबि मोटका डेढ़हथ्थी सँ बेटाक कपार फोड़ि देलक। ओहि दिन सँ बेटा-पुतोह भिन्न भऽ गेल। बेटा दिल्ली मे कमाइत अछि। आ जाईत काल ओ अपना पत्नी केँ भाला-बरछी देने गेल अछि। आर कहि गेल अछि- ‘‘जँ हमर बाप तोरा सँ झगड़तौ तँ सीधे भाला भोंकि दिहैक। ओ तोहर ससुर नहि काल छिओ।’’
एहि गप्पक पूरा पत्ता मुसबा केँ छै। तैं ओकरा कतउ डर नहि किन्तु आँगन मे डैरा जाइत अछि। हेओ अपनो गाछी बड्ड भुताह।
भरि दिन मुसबा बाधक ओगरबाहि करैत अछि आ साँझखिन केँ चैक पर सँ ताड़ी पीबि आबैत अछि। आर निंसा मे मातल अधरतियो मे अल्हा-रुदलक गीत गाबै लगैत अछि।
चोर-चहार धसबाहिनी बाध जाइते ओकरा डरे थर-थर कँपैत। कहीं मुसबा आबि गेल तँ कि होयत पता नहि।
बेसी काल मुसबा ओहि सुतलाहा गाछक झोंझि मे बैसल रहैत अछि। किन्तु एखन तँ ओहिठाम अछि-सुमनी।
सिहारबाली अर्थात सुमनी।
जोखन केँ पुतौह। कद-काठी बेस नमगर, छरगर गोर पतरिया चमड़ी।
ओकर पति फेकुआ चारि मास बाहर खटैत अछि तँ दू मास गामपर रहैत अछि। अगहन आ अखाढ़क समे मे गिरहतक काज करैत अछि।
सुमनी केँ तीन बरख पहिले एकटा संतान भेल रहैक। तेकरो छठिहारक राति पछुआ दाबि देलकै। तकर बाद सँ कोखि नहि भरल।
किन्तु सुमनी एहि बात सँ निराश नहि अछि। ओ बुझैत अछि जे आइ नहि काल्हि बाल-बच्चा हेबे करत। आब तँ शहर मे बड़का-बड़का डागदर बैसैत अछि।
ओकरा बाल-बच्चा सँ अधिक चिन्ता ख्ेाती-पथारी बढेबाक अछि। आओर ओ उन्नैत माल-जाल सँ उन्नैत करबाक लेेल परेशान रहैत अछि। तैं दुपहरिया केँ टह-टह करैत रौद मे सुमनी धास छिलबाक लेल निकलल अछि।
की करत बेचारी। घर-आँगनाक काज ओकरहिं करऽ पड़ैत अछि। बूढिया सौस हरदम बेमारे रहेत अछि। ससुर कखनहुँ-काल खेत-पथार देखि आबैत अछि। से बात ठीक। किन्तु दुआर पर आबितहिं बूढबा केँ अस्सी मन दुख सवार भऽ जाइत छैन्हि। आ अनका दरबज्जा पर खूब गप्प हाँकैत रहैत अछि। सबकेँ फरियाक कहैत रहैत अछि- ‘‘बेटाक बाहर चलि गेला सँ बेसी काजक भार हमरहिं पर पड़ि गेल। एको पलऽक पलखति नहि।’’
किन्तु सबटा फूसि। सबसँ अधिक खटनी सुमनी केँ। तइयो सुमनी अपना सौस-ससुर केँ निदादर नहि करै चाहैत अछि। कारण ई अछि जे बियाह मे सुमनीक बाप सँ एकोटा रुपया दहेजक नाम पर नहि लेलक। बादो मे एहि बातक लेल उलहन-उपराग नहि देलक। संगहि सुमनी जँ बेमार पड़ैत अछि तँ ओकरा ससुर दबाई-विरो करबा मे एको रती कोताही नहि करैत अछि, सौस दिन-राति सुमनीक सेवा-टहल मे लगल रहैत अछि। सुमनीक सब दिन सँ कनेक झनकाहि आ बाजै-भुकऽ मे टेटियाह। किन्तु सौस-ससुर ओकर बात केँ सहज भाव सँ स्वीकार करैत अछि तेँ सौस-ससुर आ पुतौह मे खूब गाढ़ परेम...।
जहिना माइक दुलारि तहिना सौसक दुलारी। कोनो बात मे अड़ि जाएव। अपना मोनक अनुकूल। ई लक्षण ओकरा बेदरहिं सँ अछि।
मात्र दूई दिन दियारी केँ रहि गेल अछि। जाहि सँ काज आरो बढ़ि गेल अछि। जिनकर घर टाट-बाँसक अछि। दिनभरि घर-आँगन मे गोबर-माटि सँ घरबा-दुअरबा खेलैत रहू। कतबो नीपब-पोतब तइयो एकटा कोनचार टूटले रहत। तइयो सब अपना पड़ोसिया सँ प्रतिस्पद्र्धा करैत काज मे व्यस्त।
गाछक छाँह मे बैसल सुमनी सोचि रहल अछि। सोचबाक नहि चाही। चोइर सँ पूर्व जँ कियो सोचय लागत तँ चोइर हेबै नहि करतैक। फेरि पुलिस-दरोगा, काम केँ। कोर्ट-कचहरी कोन कमाऽ कऽ। किन्तु चोरो केँ कखनहुँ-काल सोचय पड़ैत अछि। खास कऽ नवका चोर केँ। चोरो तँ बहुत प्रकारक होइत छैक। ताहू मे ई तँ चोर नहि चोरनी छल। तेँ बेसी सोचैत छलीह।
‘‘लार-पुआरक अभाव भऽ गेला सँ गाय-माल केँ सबसँ बेसी दिक्कत। आब जँ टगली बेर मे घास छिलब तँ साँझतक घास छिलैत रहि जाएब। बगल मे खसलाहा धान अछि। छाँह मे धान तँ हेतैक नाहि। ओहो गाछतर दबल अछि। ऐतेक बड़का गिरहतक अछि। दस मुट्ठी छोपि लेला सँ एकर की बिगड़तै। किन्तु हमर तँ बिगड़त। दुधगर गाय केँ खाइक तिरोटी भेला सँ दूध सूखि जएतैक। दोसर बहनजोग बाछी केँ भरि पोख धास नहि भेटला सँ ओ कमजोर भऽ जएतैक। एखन तँ बेबस आ लाचार छी, नचार केँ आगू बिचार की। एकरा कुकरम नहि कहल जा सकैत छैक।
एहि बेर सँ हम अपना पति केँ बाहर कमाऽ लेल नहि जाय देबैक गेल छैक। रुपया कमा कऽ आनबे करता। एकटा औरो खरीद लेब। तीनू गायकेँ पालब-पोसब आ दूध चैक पर उठौना लगा देबैक। तेना केँ रास्ता

कम्रशः आगाँ देल जाएत.........


३. पद्य

३.१. गुंजनजीक राधा- १६म खेप
३.२. कालीकांत झा "बुच" 1934-2009- आगाँ

३.३.उमेश मंडल (लोकगीत-संकलन)- आगाँ

३.४.१. रघुनाथ मुखिया २.कल्पना शरण-क्षितिजक साक्षात दर्शन

३.५.१. सतीश २.रूपेश ३. सुबोध
३.६. शेफालिका- तीनटा पद्य
३.७.१. महाकान्त ठाकुर २.शिव कुमार झा-दू टा गीत
३.८.१. निमिष २.धर्मेन्द्र


गुंजन
डॉ. गंगेश गुंजन

राधा-१६म खेप

बुझायल त एतबे जे अयलौं माएक गर्भ मे
नौ मास अपनहि निर्माणक नरक सहैत,माइयो के सहबैत
प्रतिपल भरि जीवनक पीड़ा
माएक एक-एक साँस के दुर्घट करैत हम
अपनहि जन्म सँ कएल विकट पराभव ओकरा लेल।
ओ यद्यपि कहैत छैक- सन्तानक जन्म महासुख !
हम तं सन्तान, की बुझी तकरा कही की ?
...मुदा पुनः-पुनः माएक गर्भ मे के रखलक हमरा ?
भरिसक पिता...वैह हुनके राखल जे,
होइत गेल विकसित बनैत गेल रधिया !
एक दिन...सुनै छी एहि गामक धरती पर
......खसल चेहों-चेहों करैत, यैह झरकलही देह।
सेहो सुनै छी, माए तँ हर्षित किन्तु भेला बहुत सुख-चिन्तित पिता।
भेलियनि जे बेटी, ककर दोख यदि दोखे त ?
जेना देलनि हमरा माएक गर्भ तेना देने रहितथि कोनो बेटा ।
बाधा की ? तें अपन काज केर फल सँ असंतुष्ट
माय पर थोपल दोख किएक, कथीक ? ओना,
जे हो आबि त गेबे केलियनि मायक कोरा-
एहि छोटोछिन घर-असोरा-आङन मे,
बाड़ीक ओलक गाछ जकाँ अपनहि टोंटी सँ विकसित होइत,
सौंसे चतरल गेल हरियर गाछ समान। भ त गेवे कएलौं।
जेहने भेलौं आब एतेक वर्ख धरिक भ गेलौं
बेसी बेटी त ओहिनो ओले बुझल-कहल जाइए-कबकब, समाज ।

राधाक मन बड़े बौआइत छैक। एक क्षण एत, दोसरे क्षण नइं जानि कत ? मन
खौंझाइत बड़ छैक जे ओ एहन आ एहने भेलि कियेक ? अपने भेल कि बना देल गेलि एना ?
की ? दुनू मे की ? बा एहू दुनू कारण सँ फराक किछु कारण ? बा एहि दुनूक मिज्झर एकटा
तेसर परिणाम थिक ओ ? बड़ व्याकुल होइत अछि-
किये रूसल छथि कृष्ण ?
आ कि हमहीं छियनि रूसलि हुनका सँ ! की ?
के करओ पुरबा साही एकर-
यदि रुसले अछि त ककरा सँ के ?...
राधाक कंठ सुखाएल-
ओह,जल पीबितौं दू घोंट !
पियास आकुल घैलची सँ ढारऽ गेली-
घैल रिक्त, ढन-ढन करैत...

(अगिला अंकमे)
स्व.कालीकान्त झा "बुच"
कालीकांत झा "बुच" 1934-2009
हिनक जन्म, महान दार्शनिक उदयनाचार्यक कर्मभूमि समस्तीपुर जिलाक करियन ग्राममे1934 ई0 मे भेलनि । पिता स्व0 पंडित राजकिशोर झा गामक मध्य विद्यालयक
प्रथम प्रधानाध्यापक छलाह । माता स्व0 कला देवी गृहिणी छलीह । अंतरस्नातक समस्तीपुर काॅलेज,समस्तीपुरसँ कयलाक पश्चात बिहार सरकारक प्रखंडकर्मचारीक रूपमे सेवा प्रारंभकयलनि । बालहिं कालसँ कविता लेखनमे
विषेश रूचि छल । मैथिली पत्रिका- मिथिला मिहिर, माटि- पानि, भाखा तथा मैथिली अकादमी पटना द्वारा प्रकाशित पत्रिकामे समय - समयपर हिनक रचना प्रकाशित होइत रहलनि। जीवनक विविध विधाकेँ अपन कविता एवं गीत प्रस्तुत कयलनि । साहित्य अकादमी दिल्ली द्वारा प्रकाशित मैथिली कथाक इतिहास (संपादकडाॅ0 बासुकीनाथ झा )मे हास्य कथाकारक सूची मे डाॅ0 विद्यापति झा हिनक रचना
‘‘धर्म शास्त्राचार्य"क उल्लेख कयलनि । मैथिली एकादमी पटना एवं मिथिला मिहिर द्वारा समय-समयपर हिनका प्रशंसा पत्र भेजल जाइत छल । श्रृंगार रस एवं हास्य रसक संग-संग विचारमूलक कविताक रचना सेहो कयलनि ।
डाॅ0 दुर्गानाथ झा श्रीश संकलित मैथिली साहित्यक इतिहासमे कविक रूपमे हिनक उल्लेख कएल गेल अछि |



!! भगवती वंदना !!

जनमि - जनमि कऽ बहुत भटकलहुॅ
सभदेवक डगरिया ।
आयल छी आखिर उदास भऽ,
अम्ब अहीक दुअरिया ।।

अहॅक कोर मे विष्णु सुतल,
सम्मुख ब्रह्या कानैत छथि ।
अहीक शक्ति बिनु स्वयं शिवो,
अपना केॅ शव मानैत छथि ।।

आन देव केर बात कोन सभ,
बनि गेला पमरिया ।
जनमि ............................................ ।।

प्रलय काल मे जीवक संग,
भगवानो केॅ सुतवैत छह,
तमसा देवि शक्ति तोरे सॅ
देव दनुज पावैत छह,
मोहगत्र्त ममतावत्र्तक ई,
जाइ भरल नगरिया,
जनमि .......................................... ।।

दुर्भाग्य आलस्य हटाकऽ
जगा दिअऽ नवचेतना,
सम्मोहित कऽ दियौ दुष्ट केॅ
भरू माॅ भीषण बेदना ।
हे माता मृतपाय पुत्र पर, ढ़ारू अमृत गगरिया ।
जनमि ............................................................ ।।






!! भौजीक अवाहन !!

कौआ माॅझे घर बड़ेरी पर भोरे सॅ कुचड़ै ।
भौजी अबिते हेती राॅची सॅ सगुन उचडै़ ।।

अपने भैया भात पसौलनि,
हमरो सॅ किछु काज करौलनि,
बारी सॅ तिलकोर पात किछु आनै ‘बूच’ रै ।।

कौआ ............................................................. ।

दुःखी मोन केॅ पोटि रहल छथि,
काॅच दालि केॅ घोटि रहल छथि,
पुरूखो हाथे दलिघोटना वर बढ़िया उसरै ।।

कौआ ............................................................. ।

जल्दी - जल्दी केश छटौलनि,
गुलरोगन केर तेल लगौलनि,
दहिन आॅखि फड़कै छनि लागथि बर खुश रै ।।

कौआ ............................................................. ।


भौजी औती ई रूसि रहता,
नोरे मे सभ व्यथा सुनौता,
हिनका खातिर आबि रहल छनि लेमनचूस रै ।।

कौआ ............................................................. ।






!! स्वप्न सुन्दरि !!

स्वप्न सुन्दरि अहाॅ जीवनक सहचरी ।
निन्न मे आउ अहिना घड़ी दू घड़ी ।।

भोग भोगल जते जे बनल कल्पना,
आब भऽ गेल अछि अन्तरक अनमना,
हऽम मानव अहाॅ देव लोकक परी ।
निन्न .................................................... ।।

मात्र उत्तापदायी बसंती छटा,
आब संतापदायी अषाढ़ी घटा,
काॅट लागनि सुखायल गुलाबी छड़ी ।
निन्न .................................................... ।।

रूप अमरित पिया कऽ अमर जे केलहुॅ,
विक्ख विरहक खोआ फेर की कऽ देलहुॅ ?
घऽर मे जिन्दगी गऽर मरनक कड़ी ।
निन्न .................................................... ।।

वेर वेरूक अहॅक फेर अभयागतम्,
अछि सदा सर्वदा हार्दिक स्वागतम्,
कप्प चाहक दुहू नैन मन तस्तरी ।
निन्न .................................................... ।।






!! कचोट !!

अहॅक लेल रंजन, हमर भेल गंजन ।
केहेन खेल ई, रक्त सॅ हस्त मंजन ।।
तरल नेह पर मात्र दुःखक सियाही,
जड़ल देह हम्मर अहॅक आॅखि अंजन ।
रचल गेल छल जे, सुखक लोक सुन्दर,
चलल अछि प्रलय लऽ तकर सुधिप्रभंजन ।
मृतक हम, अहाॅ छी सुधा स्वर्ग लोकक,
अहॅक लेल यौवन हमर गेल जीवन ।।





!! श्रृंगार वा वैराग्य !!

सध्यः अहाॅ, मुदा छी सपना एहि जीवन मे ।
सहजो सुख भऽ गेल कल्पना एहि जीवन मे ।।
विहुॅसल ठोर विवश भऽ विजुकल,
मादक नैन नोर केर नपना एहि जीवन मे ।
सहजो ..................................................... ।।

अछि केॅ कतऽ श्रृंगार सजाओत्,
आश लाश पर कफनक झपना एहि जीवन मे ।
सहजो ..................................................... ।।

दुनियाॅ हमर एकातक गहवर,
भेल जिअत मुरूतक स्थपना एहि जीवन मे ।
सहजो ..................................................... ।।

दीप वारि अहाॅ द्वारि जड़यलहुॅ,
घऽर हम लोकक अगितपना एहि जीवन मे,
सहजो ..................................................... ।।



!! अकाल !!

ई अकाल नहि, महाकाल अछि,
भूखक ऊक बान्हि नाड़रि सॅ,
चारे पर ठोकैत ताल अछि ।।1।।

फूके सॅ पताल खड़ड़ौलक,
अनावृष्टि केर आगि लगौलक,
एहि मंहगी क प्रचंड पसाही सॅ -
उनचास बसात जगौलक ?
हे देखह जड़ि रहल गाम घर,
आकाशे भऽ गेल लाल अछि ।।2।।

भारत आइ भेल अछि लंका,
बजि रहल अछि मरणक डंका !
बाॅचि सकत एहि वेर विभीषण केर -
कुटी अछि बड़का शंका ।
डोरि - डोरि सॅ बान्हल,
एहि वेरूक विभीषणक मंडमाल अछि ।।3।।

आंगन - आंगन हैया दैया,
वाहिनिक कोर मरै छथि भैया ।
पूत परेम छाड़ि धरती केॅ,
भरि - भरि कऽ धरै छथि मैया ।
वीसहुॅ आॅखि ओनारि दसानन,
घुटुकि घुटुकि हिलवैत भाल छथि ।।4।।





!! नोर !!

हंसलहुॅ एक बेर जीवन मे, बेरि - बेरि कनैत रहल छी ।
बसलहुॅ एक बेर जीवन मे, फेर - फेर उजड़ैत रहल छी ।।

चलि - चलि भटकि - भटकि कऽ कखनो,
कखनो कऽ हम दौड़ि रहल छी ।
एक बुन्न जीवन क लेल
मरि - मरि कऽ मरू मे बौड़ि रहल छी ।
अपन मोन केॅ उघबा कऽ आनक तन केॅ उछहैत रहल छी ।।
बसलहुॅ .................................................................................. ।।

एक - एक सायक क चोट केॅ,
गुनि - गुनि छोट ध्यान नहिं देलहुॅ ।
बड़ कचोट चालनिक रूप मे,
देखि - देखि चुप्पे रहि गेलहुॅ ।
ठोप - ठोप चारक चुआठ केॅ आॅगुर सॅ उपछैत रहल छी ।।
बसलहुॅ .................................................................. ।।

शिल्पक छाॅछ कल्पना पूरा,
भावक दही विचारक चूड़ा ।
आनलक जे बेगाड़ भूख मे,
पाबि रहल अछि खुद्दी गूड़ा ।
नवनीतक अछि लूट मुदा हम छाॅछी छोरक लैत रहल छी ।।
बसलहुॅ............................................................ ।।





!! श्रावणी !!

आशवर शीघ्र श्रावण मे औता पिया ।
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।
देखि हुनका सुखक मारि सहि ने सकब,
खसि पड़ब द्वारि पर ठाढ़ रहि ने सकब,
पाशतर थीर छाती लगौता पिया,
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।

भऽ उमंगित बहत आड़नक बात ई,
उल्लसित भऽ रहत चाननक गात ई,
पाततर पिक बनल स्वर सुनौता पिया,
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।
मन उमड़ि गेल बनि गेल यमुना नदी,
तन सिहरि गेल जहिना कदंबक कली,
श्वास पर धीर बंसुरी बजौता पिया,
प्यास पर नीर पावन बहौता पिया ।।





!! गामे मोन पड़ैए !!

रोटी एक्के कोण गय
बधुओ साग अनोन गय,
तैयो कलकत्ता मे रहि रहि,
गामे पड़ैए मोन गय ।।

गऽर गृहस्थी कलटि रहल अछि,
धीओ पूता विलटि रहल अछि,
अजुके मिथिला सॅ चलि अबियौ,
एलै टेलीफोन गय ।।

आन - आन सभ टलहा चानी,
रानी बनि बसलै राजधानी,
धूमि - धूमि कऽ भीख मंगै छथि,
हमर मैथिली सोन गय ।।

खेते लग करेह केर सोती
पानि पटा उपजायब मोती,
हुगली केर बाबू सॅ बढ़ियाॅ
कमला कातक जोन गय ।।

ताकल हावड़ा सॅ दमदम धरि
परतर नहि मोरतर वाली केरि
ईडेन गार्डेन सॅ सुन्नर अछि,
कोशी कातक बोन गय ।।
पड़लि पार्क माॅडर्न बाला छथि ,
पतिए चढ़ा रहल माला छथि,
तिरहुतनी अपना भोला लय
ताकय धतुर अकोन गय ।।




!! भगतालाभ !!

साधना - भावना
आॅठी - गुद्दा
साधना क गंगा जे चललीह से -
चलिते रहलीह आ-
बिनु घूरल सागर मे समा गेलीह!
ई छल, भगीरथ प्रयास ।
हा! हन्त!
साधना क सेहन्ता क ई अंत!
रहि गेल भावना क जऽल
जे नहिएॅ जा सकऽल ।
भरल रहल ओ आलय सॅ सागर धरि,
सिनेहक भंगिमा पर एक बेर धूरऽ लेल,
सुअवसर पावि घूरल,
आ तहिया सॅ -
गंगा लाल की हेतैक ककरो !
भऽ गेलनि गंगे केॅ -
भगतालाभ अर्थात् विद्यापति लाभ !!!!!






!! सिया सॅ रामक परतर !!

मानै छी सुनियौ रघुवंशी पुरूष अहाॅ बेजोड़ औ,
हमरा सिया सखी लग लेकिन लागै छी किछु थोड़ औ ।
अपने केॅ जन्मौलनि माता, सीता हमर सहज संजाता,
कतबो सुन्नर श्याम मुदा छी, कतबो गुनगर राम मुदा छी,
अपने नीलाकाश जानकी, लाली पसरल भोर औ ।।
मादक दृष्टि कमल दल लोचन मुस्की कामदेव मदमोचन,
नशा बनल चढ़ि रहल नेह अछि, बिसरल छी हम कतऽ देह अछि,
मुदा सियाक दिव्य दर्शन मे अमृते केर बोर औ ।।
धनुषा तोड़ल पाबि जुआनी, तहिये सॅ छी नामी गामी,
बाउ अधिक जुनि बनू गुमानी ताहि धनुखा केर सुनु पिहानी
तकरा बाल्यावस्थे मे ई उठा लेलनि कऽ कोर औ ।।
उच्च विचार आचरण सादा, सदिखन संयोगल मरयादा,
आइ कतऽ रहि गेल बपौटी, पिछरल चरण करीनक पौटी

फलक साधिका सीता हम्मर अपने फूलक चोर औ ।।
हमरा सिया ............................................ ।।





!! गौरी बनलि जोगिनियाॅ !!

रूसल पिया केर गौरी बनलि जोगिनिया,
पुनि हर बरब बनव कनियाॅ ।
सती विरह शिव मरूघट सेवल,
कयल भस्म अन्वेषण केवल,
बनि - बनि लावण्यक नोनिया ।।
पर्ण सलिल खासो पुनि त्यागलि,
युग-युग पिय तप मे लय लागलि
भागलि योगेशक निनियाॅ ।।
पुरबिल प्रीत रहल नहिं झाॅपल,
भेल प्रतीति सकल तन काॅपल,
बहल नैन प्रेमक पनियाॅ ।।
गौलक स्वर्ग तलातल नाॅचल
उमा अमि महिमा नम बाॅचल,
जय हे कैलाशक रनियाॅ ।।







!! काली रूप वर्णन !!

मइक चरण कमल लाले लाल गय,
भाल अढ़ूल फूल आॅचर पर,
उड़ियौलक परिमल लाले लाल गय ।।
श्यामल तन झाॅपल झोंटक बिच,
बिहुंसल अधर विमल लाले लाल गय ।।
लाले रंग लाल खप्पड़ अछि,
वरदायक करतल लाले लाल गय ।।
दया द्रवित विगलित छाती पर,
मुंडमाल लटकल लाले लाल गय ।।
उरसुमेरू उमड़लि पयस्विनी,
चुरूअक खून चुअल लाले लाल गय ।।
ममतामय मन भयदायक तन,
भद्रकालिका नाम् कमाल गय ।।





!! चलि अबियौ पटना सॅ गाम !!

बी0 ए0 कैये लेलहुॅ
एम0 ए0 ओ कऽए लियऽ
नहि लियऽ नौकरीक नाम
प्रियतम औऽऽऽ चलि आबि पटना सॅ गाम

हमरा नहि चाही घरवैया नोकरिहारा
सिलिक नहि चाही नहि सोनक सिक्कड़ि गारा
करबे एक्के संझे बरू टुटली मरैया
दू नमरी धंधा हराम ।।

अहाॅ घास काटब, हम चूल्हि केॅ पजाड़ि लेब,
अहाॅ हऽर लादब हम घऽर केॅ सम्हारि लेब,
हऽम आड़ि ठाढ़ि सजल रोहिणी नक्षत्र जकाॅ
अहाॅ हमर खेतक बलराम ।।

रहतै ने रौदी ई आद्र्रा बरसि जेतै
पनि एतै परती ओ निश्चय कदबा हेतै
अहाॅ धान रोपब ठेहूनिया दऽ दोहरि मे
जलखै मे गाड़ब हम आम ।।

थाकल झमारल घुरि आयब मुन्हारि साॅझ
पाटी ओछायब हम हॅसिते दुआरि माॅझ
लक्ष्मी बनि तड़वा हम रगरब हे नारायण
घऽर हम बैकुण्ठी धाम ।।

धन्य - धन्य मेहनति के गंगा जे बहबै छथि,
अपने पसीना सॅ धरती केॅ नहबे छथि,
खटि रहला भूखल पेयासे देहाते मे
हुनका दिय बिअनु विराम ।।

श्रमक कोन मानि? जतऽ बुद्धिक विलास छै,
पेरा दलाल गाल श्रमक पेट घास छै,
दिल्ली कलकत्ता आ बम्बई केर बात की ?
छोटो शहर बदनाम ।।

घूसखोर मच्छड़ उड़ीस जकाॅ जीवै छै
शोणित तऽ ओ - अवशिष्ट पीवै छै
हड्डी सुखायल अछि तैयो ओ अधिकारी
खगले केर तीड़ै छै चाम ।।





!! पहुना !!

हमरो नेने चलियौ, अहाॅ अपन गेह पहुना ।
हमहूॅ कऽ नेने छी, अहाॅ सऽ सिनेह पहुना ।।
अपने केॅ चाही वैदेही
हम सम देह एक ओ देही
हमरो बाप बनल छथि देखू ने विदेह पहुना ।
हमरो ......................................................... ।।

शून्य गगन केर श्याम घटा छी,
मरू पर उमड़ल दिव्य छटा छी,
मधुरी मुस्की लागै विजुकी क रेह पहुना ।
हमरो ......................................................... ।।

सभक जीवनक एक प्राण छी,
सगरो गगनक एक चान छी,
हहरै छाती जहिना सागरक रेह पहुना,
हमरो ......................................................... ।।

हॅसि हॅसि अहाॅ सॅ नयन जुड़यलहुॅ,
चलऽ काल हा ! ई की कयलहुॅ
दशा कतऽ अछि मोन कतऽ ई देह पहुना
हमरो ......................................................... ।।






!! बेटी बनलि पहाड़ !!

गेलै कतऽ विवेक विचार
भेलै केहेन लोकाचार
हाथक फुलडाली सन बेटी बनलै
माथे परक पहाड़ ।।

प्राणो सॅ जे अधिक पियरगरि,
पोसलि गेली अंक मे भरि - भरि ।
काल्हुक ई दुलरैतिन बेटी,
आइ घैल बनि लागलि घेंटी ।
आगाॅ भोगक पोरवरि पाछाॅ अपमानेक इनार ।।

बेटी अहाॅ बेटों सॅ बढ़िकऽ,
अयलहुॅ उड़नखटोला चढ़िकऽ
अपने तों लक्षमिनियाॅ देवी,
बापक मुदा सुन्न छह जेवी ।
हे देखू हरि गरूड़ त्यागि कऽ मांगि रहै छथि कार ।।
कम्मे दामे भीठ बुड़यलहुॅ
सोना पैंतीस ग्राम पुड़यलहुॅ ।
ब्याह राति केर खर्चा चाही,
बरियाती औता दस गाही ।
बाहर भीतर बल्ब जड़ै अछि माॅझे ठाम अन्हार ।।
म्ंागलनि दशरथ एक पाइ नहि,
बजला किछु रामो जमाइ नहि ।
श्री कृष्णक तऽ लव मैरेज छल,
हिस्ट्री हमर केहेन सुन्नर भल ।
मुदा आइ वृष भानु जनक कऽ रहला हाहाकार ।।
बेटा बनलै बेबस बकरा,
बापे कंठ पकड़लनि तकरा ।
जीवन जब्बह भेल मनुक्खक,
मानवता रहतै ककरा लग ।
घऽर घऽर मे बूचरखाना गामे गाम बजार ।।








!! हमर जिनगी !!

बिनु घनश्यामक बेकार हमर जिनगी,
धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।।
मेवा सड़ि जाऊ, फऽल फूलो सभ उसरि जाउ,
मधुवन जड़ि जाउ नन्द राजभवन पजड़ि जाउ,
सूखल जमुनिया केर धार हमर जिनगी ।
धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।।
भृकुटी पर क्रोध रहेॅ हृदय मे भरल सिनेह,
मक्खन मन अर्पित अछि नोक - झोंक दही देह,
ककरा सॅ करतै तकरार हमर जिनगी ।
धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।।
चोटी मे कस्तूरी एड़ी केसर कुमकुम
मलि मलि कऽ बौसथि ओ, हम तॅ रूसलि गुमसुम
कतऽ एहेन पेतै दुलार हमर जिनगी ।
धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।।
आगि जकाॅ दागि रहल चन्द्रमुखी केर उपाधि
सोना सन देह हमर भस्म करब जोगसाधि
पड़ल गोर्वधन पहाड़ हमर जिनगी ।
धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।।
भवसागर घाटपरक ज्ञानी घटवार कृष्ण
कर्मक पुरान नाव धर्मक पतवार कृष्ण
प्रेमी बिनु केॅ करतै पार हमर जिनगी ।
धिक - धिक जुआनी धिक्कार हमर जिनगी ।।

No comments:

Post a Comment

"विदेह" प्रथम मैथिली पाक्षिक ई पत्रिका http://www.videha.co.in/:-
सम्पादक/ लेखककेँ अपन रचनात्मक सुझाव आ टीका-टिप्पणीसँ अवगत कराऊ, जेना:-
1. रचना/ प्रस्तुतिमे की तथ्यगत कमी अछि:- (स्पष्ट करैत लिखू)|
2. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो सम्पादकीय परिमार्जन आवश्यक अछि: (सङ्केत दिअ)|
3. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो भाषागत, तकनीकी वा टंकन सम्बन्धी अस्पष्टता अछि: (निर्दिष्ट करू कतए-कतए आ कोन पाँतीमे वा कोन ठाम)|
4. रचना/ प्रस्तुतिमे की कोनो आर त्रुटि भेटल ।
5. रचना/ प्रस्तुतिपर अहाँक कोनो आर सुझाव ।
6. रचना/ प्रस्तुतिक उज्जवल पक्ष/ विशेषता|
7. रचना प्रस्तुतिक शास्त्रीय समीक्षा।

अपन टीका-टिप्पणीमे रचना आ रचनाकार/ प्रस्तुतकर्ताक नाम अवश्य लिखी, से आग्रह, जाहिसँ हुनका लोकनिकेँ त्वरित संदेश प्रेषण कएल जा सकय। अहाँ अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर सेहो पठा सकैत छी।

"विदेह" मानुषिमिह संस्कृताम् :- मैथिली साहित्य आन्दोलनकेँ आगाँ बढ़ाऊ।- सम्पादक। http://www.videha.co.in/
पूर्वपीठिका : इंटरनेटपर मैथिलीक प्रारम्भ हम कएने रही 2000 ई. मे अपन भेल एक्सीडेंट केर बाद, याहू जियोसिटीजपर 2000-2001 मे ढेर रास साइट मैथिलीमे बनेलहुँ, मुदा ओ सभ फ्री साइट छल से किछु दिनमे अपने डिलीट भऽ जाइत छल। ५ जुलाई २००४ केँ बनाओल “भालसरिक गाछ” जे http://www.videha.com/ पर एखनो उपलब्ध अछि, मैथिलीक इंटरनेटपर प्रथम उपस्थितिक रूपमे अखनो विद्यमान अछि। फेर आएल “विदेह” प्रथम मैथिली पाक्षिक ई-पत्रिका http://www.videha.co.in/पर। “विदेह” देश-विदेशक मैथिलीभाषीक बीच विभिन्न कारणसँ लोकप्रिय भेल। “विदेह” मैथिलक लेल मैथिली साहित्यक नवीन आन्दोलनक प्रारम्भ कएने अछि। प्रिंट फॉर्ममे, ऑडियो-विजुअल आ सूचनाक सभटा नवीनतम तकनीक द्वारा साहित्यक आदान-प्रदानक लेखकसँ पाठक धरि करबामे हमरा सभ जुटल छी। नीक साहित्यकेँ सेहो सभ फॉरमपर प्रचार चाही, लोकसँ आ माटिसँ स्नेह चाही। “विदेह” एहि कुप्रचारकेँ तोड़ि देलक, जे मैथिलीमे लेखक आ पाठक एके छथि। कथा, महाकाव्य,नाटक, एकाङ्की आ उपन्यासक संग, कला-चित्रकला, संगीत, पाबनि-तिहार, मिथिलाक-तीर्थ,मिथिला-रत्न, मिथिलाक-खोज आ सामाजिक-आर्थिक-राजनैतिक समस्यापर सारगर्भित मनन। “विदेह” मे संस्कृत आ इंग्लिश कॉलम सेहो देल गेल, कारण ई ई-पत्रिका मैथिलक लेल अछि, मैथिली शिक्षाक प्रारम्भ कएल गेल संस्कृत शिक्षाक संग। रचना लेखन आ शोध-प्रबंधक संग पञ्जी आ मैथिली-इंग्लिश कोषक डेटाबेस देखिते-देखिते ठाढ़ भए गेल। इंटरनेट पर ई-प्रकाशित करबाक उद्देश्य छल एकटा एहन फॉरम केर स्थापना जाहिमे लेखक आ पाठकक बीच एकटा एहन माध्यम होए जे कतहुसँ चौबीसो घंटा आ सातो दिन उपलब्ध होअए। जाहिमे प्रकाशनक नियमितता होअए आ जाहिसँ वितरण केर समस्या आ भौगोलिक दूरीक अंत भऽ जाय। फेर सूचना-प्रौद्योगिकीक क्षेत्रमे क्रांतिक फलस्वरूप एकटा नव पाठक आ लेखक वर्गक हेतु, पुरान पाठक आ लेखकक संग, फॉरम प्रदान कएनाइ सेहो एकर उद्देश्य छ्ल। एहि हेतु दू टा काज भेल। नव अंकक संग पुरान अंक सेहो देल जा रहल अछि। विदेहक सभटा पुरान अंक pdf स्वरूपमे देवनागरी, मिथिलाक्षर आ ब्रेल, तीनू लिपिमे, डाउनलोड लेल उपलब्ध अछि आ जतए इंटरनेटक स्पीड कम छैक वा इंटरनेट महग छैक ओतहु ग्राहक बड्ड कम समयमे ‘विदेह’ केर पुरान अंकक फाइल डाउनलोड कए अपन कंप्युटरमे सुरक्षित राखि सकैत छथि आ अपना सुविधानुसारे एकरा पढ़ि सकैत छथि।
मुदा ई तँ मात्र प्रारम्भ अछि।
अपन टीका-टिप्पणी एतए पोस्ट करू वा अपन सुझाव ई-पत्र द्वारा ggajendra@videha.com पर पठाऊ।

'विदेह' २३० म अंक १५ जुलाइ २०१७ (वर्ष १० मास ११५ अंक २३०)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. आशीष अनचिन्हार-  "कतेक रास बात" इंटरनेटपर मैथिलीक पहिल उपस्थिति नै अछि ...