Friday, January 01, 2010

'विदेह' ४८ म अंक १५ दिसम्बर २००९ (वर्ष २ मास २४ अंक ४८) PART II

जगदीश मंडल
जगदीश प्रसाद मंडल (1947- )

गाम-बेरमा, तमुरिया, जिला-मधुबनी। एम.ए.।कथाकार (गामक जिनगी-कथा संग्रह), नाटककार(मिथिलाक बेटी-नाटक), उपन्यासकार(उत्थान-पतन- उपन्यास)। मार्क्सवादक गहन अध्ययन। मुदा सीलिंगसँ बचबाक लेल कम्युनिस्ट आन्दोलनमे गेनिहार लोक सभसँ भेँट भेने मोहभंग। हिनकर कथामे गामक लोकक जिजीविषाक वर्णन आ नव दृष्टिकोण दृष्टिगोचर होइत अछि।



मौलाइल गाछक फूल
उपन्यास
जगदीश प्रसाद मण्डल

दू साल रौदीक उपरान्तक अखाढ़। गरमीसँ जेहने दिन ओहने राति। भरि-भरि राति बीअनि हौंकि-हौंकि लोक सभ बितबैत। सुतली रातिमे उठि-उठि पाइन पीबै पड़ैत। भोर होइते घाम अपन उग्र रुप पकड़ि लैत। जहिना कियो ककरो मारैले लग पहुँचि जाइत, तहिना सुरुजो लग आबि गेलाह। रस्ता-पेराक माटि सिमेंट जेकाँ सक्कत भऽ गेल अछि। चलबा काल पएर पिछड़ैत अछि। इनार-पोखरिक पानि अपन अस्मिता बचबैक लेल पातालक रस्ता पकड़ि लेलक अछि। दू सालसँ एक्को बुन्न पानि धरतीपर नहि पड़ने धरतीक सुन्दरता धीरे-धीरे नष्ट हुअए लगल अछि । पियाससँ दूबि सभ पाण्डुरोगी जेकाँ पीअर भऽ-भऽ परान तियागि रहल अछि। गाछ-पात बेदरंग भऽ गेल अछि। लताम, दारिम, नारिकेल इत्यादि अनेको तरहक फलक गाछ सूखि गेल। आम, जामुन, गमहाइर, शीशोक गाछक निच्चा पातक पथार लगि गेल अछि। दसे बजेसँ बाधमे लू चलै लगैत अछि। नम्हर-नम्हर दरारि फाटि धरतीक रुपे बिगाड़ि देने अछि। की खाएब? कोना जीब ? अपनामे सभ एक-दोसरासँ बतिआइत अछि। घास-पानिक दुआरे मालो-जाल सूखि कऽ संठी जेकाँ भऽ गेल अछि। अनधुन मरबो कएल। अनुकूल समए पाबि रोगो-बियाधि बुतगर भऽ गेल। माल-जालसँ लऽ कऽ लोको सबहक जान अबग्रहमे पड़ि गेल अछि। खेती-बाड़ी चौपट्ट होइत देखि थारी-लोटा बन्हकी लगा-लगा लोक मोरंग, दिनाजपुर, ढाका भगै लगल। जैह दशा किसानक, ओएह दशा बोनिहारोक। कहिया इन्द्र भगवानक दया हेतनि, एहि आशामे अनधुन कबुला-पाती लोक करै लगल।
तीनि दिनसँ अनुपक घरमे चुल्हि नहि पजड़ल। नल-दमयन्ती जेकाँ दुनू परानी अनुप दुखक पहाड़क तरमे पड़ल-पड़ल एक-दोसराक मूह देखैत। ककरो किछु बजैक साहस नहि होइत। बारह बरखक बेटा बौएलाल बोरापर पड़ल माएकेँ कहलक- ‘‘माए, भूखे परान निकलल जाइ अए। पेटमे बगहा लगै अए। आब नइ जीबौ !’’
बौएलालक बात सुनि दुनू परानी अनुपक आँखिमे नोर आबि गेलै। मूहक बोल बुताए लगलैक। लगमे बैसल रधिया उठि कऽ डोल-लोटा लऽ इनार दिशि बिदा भेलि। इनारोक पानि निच्चा ससरि गेलैक अछि, जहिसँ डोलक उगहनियो छोट भऽ गेल। कतबो निहुड़ि-निहुड़ि रधिया पानि पबै चाहैत, तैयो डोल पानिसँ उपरे रहैत। रधियाक मनमे एलै, जखन अधला होइबला होइ छै, तहन एहिना कुसंयोग होइ छैक। बौएलाल नइ बँचत। एक तँ पाँचटा संतानमे एकटा पिहुआ बँचल, सेहो आइ जाइए। हे भगवान, कोन जनमक पापक बदला लइ छह। इनारसँ डोल निकालि लहरेपर डोल-लोटा छोड़ि रधिया उगहनि जोड़ैले डोरी अनै आंगन आइलि। रधियाक निराश मन देखि अनुप पुछलक- ‘‘की भेल?’’
टूटल मने रधिया उत्तर देलक- ‘‘की हैत, जखन दैवेक डाँग लागल अछि, तखन की हएत। उगहनि छोट भऽ गेल तेँ जोड़ैबला डोरी लेल एलौं।’’
रधियाक बात सुनि अनुप घरेक ओसारेक बनहन खोलि देलक। खड़ौआ जौर लऽ रधिया इनारपर जा उगहनि जोड़लक। उगहनि जोड़ि पानि भरलक। पाइन भरि लोटामे लऽ रधिया आंगन आबि बौएलालकेँ पीबैले कहलक। पड़ल बौएलालकेँ उठिये ने होए। ओसारपर लोटा रखि रधिया बौएलालक बाँहि पकड़ि उठा कऽ बैसौलक। अपने हाथे रधिया लोटासँ चुरुकमे पानि लऽ बौएलालक आँखि-मुँह पोछलक। बौएलालक देह थर-थर कपैत। थरथरी देखि रधियोकेँ थरथरी पैसि गेलनि। लोटा उठा रधिया बौएलालक मूहमे लगबै लागलि आकि थरथराइत हाथसँ लोटा छुटि गेलनि, जहिसँ पानि बोरापर पसरि गेल। दुनू हाथे छाती पीटैत रधिया जोरसँ बजै लागलि- ‘‘आब बौएलाल नै जीत, जे घड़ी जे पहर अछि।’’
रधियाक बोल सुनि अनुप जोरसँ कनै लगल। अनुपक कानब सुनि टोलक धियो-पूतो आ जनिजातियो एक्के-दुइये अबै लगल। सबहक मूह सुखाइले। के ककरा बोल-भरोस देत। सबहक एक्के गति। अनुपक कानब सुनि रुपनी अंगनेसँ कनैत अबैत। रुपनी अनुपक ममिओत बहिन। अनुपक आङन आबि रुपनी बौएलालकेँ देखि बाजलि- ‘‘भैया, बौआक परान छेबे करह। अखन मुइलहहेँ नहि। किअए अनेरे दुनू परानी कनै छह। जाबे शरीरमे साँस रहतै, ताबे जीबैक आशा। चुप हुअ।’’ कहि रुपनी बौएलालकेँ समेटि कोरामे बैसौलक। तरहत्थीसॅं चाइन रगड़ै लागलि। बौएलाल आँखि खोलि बाजल- ‘‘दीदी, भूखसँ पेटमे बगहा लगै अए।’’
बौएलालक बात सुनि रुपनी बाजलि- ‘‘रोटी खेमे।’’
‘‘हँ।’’
बौएलालक बात सुनि रधिया घरमे धएल फुलक लोटा, जे रधियाकेॅं दुरागमनमे बाप देने रहनि, निकालि अनुपकेँ देलक। लोटा नेने अनुप दोकान दिश दौगल। लोटा बेचि गहूम किनने आएल। अंगना अबिते रधिया हबड़-हबड़केँ चुल्हि पजारि गहूम उलौलक। दुनू परानी रधिया जाँतमे गहूम पीसऽ लगल। एक रोटीक चिक्कस होइतहि रधिया समेटि कऽ रोटी पकबै आबि गेलीह। अनुप गहूम पीसै लगल। रोटी पका रधिया बौएलाल लग लऽ गेल। अपनेसँ रोटी तोड़ि खेबाक साहस बौएलालकेँ नहि होइत। छाती दाबि- दाबि रधिया बौएलालकेँ रोटी खुआबै लगली। सैाँसे रोटी बौएलाल खा लेलक। रोटी खाइत-खाइत बौएलालोकेँ हूबा एलैक। अपने हाथे लोटा उठा पानि पीलक। पानि पीबितहि हाफी हाेअए लगलैक। भुइँयेमे ओंघरा गेल। जाँत लगक चिक्कस समेटि रधिया चुल्हि लग आनि सूपमे सानै लगलीह। जांघपर पड़ल चिक्कस अनुप तौनीसॅं झाड़ि, लोटा-डोल लेने इनार दिशि बढ़ल। हाथ-पएर धोय, लोटामे पानि लए आंगन आबि खाइले बैसल। छिपलीमे रोटी आ नोन-मेरचाइ नेेने रधिया अनुपक आगूमे देलक। भुखे अनुपकेँ होए जे साैॅंसे रोटी मोड़ि-सोड़ि कऽ एक्के बेरि मूहमे लऽ ली, मुदा से नहि कए तोड़ि-तोड़ि खाए लगल। छिपलीक रोटी सठितहि अनुप रधिया दिशि देखै लगल, मुदा तीनिये टा रोटी पका रधिया चिक्कसक पथिया कोठीपर रखि देने। रधियाकेँ देखि अनुप चुपचाप दू लोटा पानि पीबि उठि गेल।
दिन अछैते नथुआ दौड़ल आबि, हँसैत अनुपकेँ कहलक- ‘‘गिरहत कक्का बड़की पोखरि उड़ाहथिन। काल्हिसँ हाथ लगतै। तोहूँ दुनू गोरे काज करै चलिहह।’’
नथुआक बात सुनितहि रधियाकेँ, जेना अशर्फीॅं भेटि गेल होए, तहिना भेलै। अनुपोक मूहसँ हँसी निकलल। अनुपक खुश‍ी देखि नथुआ बाजल- ‘‘अपने मुसना कक्का मेटगिरी करत। ओएह जन सबहक हाजरी बनौत।’’
नथुआ, अनुप आ रधियाक बीच गप-सप होइतहि छल आकि मुसनो धड़फड़ाएल आएल। मुसना दिशि देखि नथुआ बाजल- ‘‘मुसनो कक्का तँ आबिये गेला। आब सभ गप फरिछाकेँ बुझबहक।’’
मेटगिरी भेटलासँ मुसनाक मन तरे-तर गदगद होइत। ओना कहियो मुसना मेटगिरी केने नहि, मुदा गामक बान्ह-सड़कमे मेट सबहक आमदनी आ रोब देखने, तेँ खुशी। मने-मन सोचैत जे जकरा मन हैत तकरा जनमे राखब आ जकरा मन हैत तकरा नै राखब। ई तँ हमरे जुइतिक काज रहत की ने। जकरा मन हैत ओकरा बेसिये कऽ हाजिरी बना देबैक। पावर तँ पावर होइत अछि। जँ पावर भेटै आ ओकर उपयोग फाजिल कऽ के नहि करी तँ ओहन पावरे लऽ कऽ की हेतै ? जँ से नहि करब तँ मुसना आ मेटमे अनतरे की हैत। लोक की बुझत। मुस्की दैत मुसना अनुपकेँ कहलक- ‘‘भैया, काल्हिसँ बड़की पोखरिमे काज चलतै, तोहू चलिहह। दू सेर धान आ एक सेर मड़ुआ, भरि दिनक बोइन हेतह। तत्तेटा पोखरि अछि जे कहुना-कहुना रौदी खेपिये जेबह। सुनै छी जे आनो गामक जन सभ अबैले अछि, मुदा ओकरा सभकेँ माटि नहि काटै देबै।’’
मुसना बात सुनि बौएलाल फुड़फुड़ा कऽ उठि कहलक- ‘‘कक्का हमरो गिनती कऽ लिहऽ। हमहूँ माटि काटै जेबह।’’
-‘‘बेस बौआ, तीनू गोरे चलिहह। हमरे हाथक काज रहत। दुपहरमे भानस करैले भौजीकेँ पहिने छुट्टी दऽ देबइ।’’
कहि मुसनो आ नथुओ चलि गेल।
दोसर दिन भोरे, पोखरिमे हाथ लगैसँ पहिनहि चौगामाक जन कोदारि-टाला वा पथिया-कोदारि लऽ पोखरिक मोहारपर पहुँचि थहाथहि करै लगल। मेला जेकाँ लोकक करमान लागि गेल। जते गामक जन तहिसँ कैक गुना बेसी आन गामक। जनक भीड़ देखि मुसनाक मनमे अहलदिल्ली पैसि गेलै। तामसो आ डरोसँ देह थर-थर कपै लगलैक। मुसनाक मनमे एलै, हमर बात के सुनत। माथपर दुनू हाथ लऽ मुसना बैसि गेल। किछु फुरबे ने करैत। ठकमूरी लगि गेलैक। सौँसे पोखरि, गौआँसँ अनगौँँआ धरि, जगह छेकि-छेकि कोदारि लगा टल्ला ठाढ़ केने। सोचैत-सोचैत मुसनाक मनमे एलै जे गिरहत कक्का रमाकान्त -बाबूकेँ जा कऽ सब बात कहिअनि। सैह केलक। उठि कऽ रमाकान्त ऐठाम बिदा भेल।
तहि बीच गौआँ-अनगौआँ जनमे रक्का-टोकी शुरु भेल। अनगौआँ सभ जोर-जोरसँ बजैत जे कोनो भीख मंगैले एलहुँ। सुपत काज करब आ सुपत बोइन लेब। गौआँ जन सभ कहै जे हमरा गामक काज छी तेँ हम सभ अपने करब। सुखेतक भुटकुमरा आ गामक सिंहेसरा एक्के ठाम पोखरि माटि दफानने। दुनूक बीच गारि-गरौबलि हुअए लगलै। सभ हल्ला करैत तेँ ककरो बात कियो सुनबे नहि करैत। सभ अपने बजैमे बेहाल। गारि-गरौबलि करिते-करिते भुटकुमरो सिंहेसर दिशि बढ़ल आ सिंहेसरो भुटकुमरा दिशि। दुनूक बीच मूहसँ गारियो-गरौबलि होइत आ हाथसँ पकड़ो-पकड़ा भऽ गेल। एक-दोसरकेँ पटकि छाती पर बैइसै चाहैत। दुनू बुतगर। पहिने तँ भुटकुमरे सिंहेसराकेँ पटकलक किएक तँ सिंहेसराक पएर घुच्चीमे पड़ि गेलै, जहिसँ ओ धड़फड़ा कऽ खसि पड़ल। मुदा सिंहेसरो हारि नहि मानलक। हिम्मत कऽ के उठि भुटकुमराकेँ छिड़की लगा खसौलक।
दरबज्जापर बैसि रमाकान्त बाबू बखारीक धान, मड़ूआक हिसाब मिलबैत। हलचलाइत मुसनाकेँ देखि रमाकान्त पुछलखिन। मुसनाक बोली साफ-साफ निकलबे नहि करैत। मुदा तैयो मुसना कहै लगलनि- ‘‘काका, तत्ते अनगौआँ जन सब आबि गेल अछि जे गौआँकेँ जगहे ने हैत। कतबो मनाही केलियै कोइ मानैले तैयारे ने भेल। अपनेसँ चलि कऽ देखियौक।’’
कागज-कलम घरमे रखि रमाकान्त बिदा भेलाह। आगू-आगू रमाकान्त आ पाछू-पाछू मुुसना। पोखरिसँ फड़िक्के रमाकान्त रहथि आकि पोखरिमे हल्ला होइत सुनलखिन। मन चौंकि गेलनि। मनमे हुअए लगलनि जे अनगौआँ सभ बात मानत की नहि! अगर काज बन्न कऽ देब तँ गौँओ कामइ हैत। जँ काज बन्न नहि करब तँ अनगौँओ मानबे नहि करत। विचित्र स्थितिमे रमाकान्त। निअरलाहा सभ गड़बड़ भऽ जाएत। पोखरिक महारपर रमाकान्तकेँ अबितहि चारु भरसँ जन सभ घेरि लेलकनि। सभ हल्ला करैत जे जँ काज चलत तँ हमहूँ सभ खटब। ततमतमे पड़ि रमाकान्त अनगौआँ सभकेँ कहलखिन- ‘‘देखू रौदियाह समए अछि। सभ गाममे काजो अछि आ करौनिहारो छथि। चलै चलू, अहाँ सबहक संगे हमहूँ चलै छी आ हुनको सभकेँ कहबनि जे अपना-अपना गामक बोनिहारकेँ अपना-अपना गाममे काज दियौ।’’
आन सभ गामक लोक कोदारि, छिट्टा, टल्ला नेने बिदा भेल। रमाकान्तो संगे बिदा भेलाह। किछु दूर गेलापर रमाकान्त मुसनाकेँ इशारामे कहि देलखिन जे जखन आन गामक लोक निकलि जाएत तखन गौआँ जनकेँ काजमे लगा दिहक। तहि बीच क्यो जा कऽ सिंहेसरा घरवालीकेँ कहि देलक जे पोखरिमे तोरा घरबलाकेँ ओंघरा-ओंघरा मारलकौ। घरबलाक मारिक नाम सुनितहि सिंहेसराक घरोवाली आ धियो-पूतो गामे परसँ गरिअबैत पोखरि लग आबि गेल। मुदा तइसँ पहिने अनगौआँ सभ चलि गेल छल।
पोखरिक काज शुरु भेल। तीनू गोटे अनुप एक्के ठाम खता चेन्ह देलक। कोदारिसँ माटि काटि-काटि अनुप पथिया भरैत, रधिया आ बौएलाल माथपर लऽ लऽ महारपर फेकए लगल। बारहक अमल भऽ गेल। रमाकान्त घुरिकेँ आबि पोखरिक पछबरिया महारपर ठाढ़ भऽ देखै लगलथि। मुसना नजरि पड़ितहि दौड़ि कऽ रमाकान्त लग पहुँचल। मुसनाकेँ पहुँचतहि रमाकान्त आंगुरक इशारासँ बौएलालकेँ देखबैत पुछलखिन- ‘‘ओ के छी। ओकरा साँझमे कहिहक भेटि करै लेल।’’ कहि रमाकान्त घर दिसक रस्ता पकड़लनि। बारह बर्खक बौएलालक माटि उघब देखि सभकेँ छगुन्ता लगैत। जाबे दोसरो कियो एक बेरि माटि फेकैत ताबे बौएलाल तीनि बेरि फेकि दैत। बौएलालक काज देखि अनुप मने-मन सोचै लगल जे बोनिआतीसँ नीक ठिक्का होइत। मुदा हमरे सोचलासँ की हेतैक। ताबे मुसनो रमाकान्तकेँ अरिआति घुरि कऽ अनुप लग आबि कहलक- ‘‘भैया, मालिक दुनू बापुतकेँ साँझमे भेंट करैले कहलखुनहेँ।’’
मालिकक भेट करैक सुनि अनुपक हृदयमे खुशीक हिलकोर उठै लगल। मुदा अपना कऽ सम्हारि अनुप मुसनाकेँ कहलक- ‘‘जखन मालिक भेंट करैले कहलनि तँ जरुर जाएब।’’
सुरुज पछिम दिस एकोशिया भऽ गेलाह। घुमैत-फिरैत मुसना अनुप लग आबि रधियाकेँ कहलक- ‘‘भौजी, अहाँ जाउ। भरि दिनक हाजरी बना देने छी। भानसोक बेर उनहि जाएत।’’
रधिया आंगन बिदा भेलि। अनुप आ बौएलाल काज करिते रहल। चारि बजे सभ गोटे काज छोड़ि देलक। गामपर आबि अनुप दुनू बापुत नहा कऽ खेलक। कौल्हुक गहूमक चिक्कसक रोटी आ अरिकंचन पातक पतौरा बना पकौने छलि, ओकर चटनी बनौने छलि। खा कऽ तीनू गोटे अनुप, बौएलाल आ रधिया ओसारपर बैसि गप-सप करै लगल। अनुप रधियाकेँ कहलक- ‘‘भगवान बड़ी गो छथिन। सभपर हुनकर नजरि रहै छनि। देखियौ एहेन कहात समएमे कोन चक्कर लगा देलखिन।’’
गप-सप करितहि गोसाइ डूबि गेल। झलफल होइतहि अनुप दुनू बापुत रमाकान्त ऐठाम बिदा भेल। रस्तामे दुनू बापुतकेँ ढेरो तरहक विचार मनमे उठैत आ समाप्त होइत। ओना दुनू बापुतक मन गदगद।
दरबज्जापर बैसि रमाकान्त मुसनासँ जनक हिसाब करैत रहथि। मुसना जनक गिनतियो केने आ नामो लिखने। मुदा अपन नाम छुटल तेँ हिसाव मिलबे नहि करैत। अही घो-घाँ मे दुनू गोटे। तहि बीच दुनू बापुत अनुप पहुँचल। फरिक्केसँ अनुप दुनू हाथ जोड़ि रमाकान्तकेँ गोर लागि बिछानपर बैसल। बौएलालो गोर लगलकनि। बौएलालकेँ देखि रमाकान्त बिहुँसैत अनुपकेँ कहलखिन- ‘‘अनुप, तोँ अपन ई बेटा हमरा दऽ दए।’’
मने-मन अनुप सोचै लगल जे ई की कहलनि ? कने काल गुम्म भऽ अनुप उत्तर देलकनि- ‘‘मालिक, बौएलाल की हमरेटा बेटा छी, समाजक छिऐ। जखन अपनेकेँ जरुरत हैत तखन लऽ लेब।’’
अनुपक उत्तर सुनि सभ छगुन्तामेँ पड़ि गेलाह। मास्टर साहेब अनुपकेँ निङहारि-निङहारि देखै लगलथि। एकटा युवक, जे दू दिन पहिने भाग्यक मारल आएल छल, ओहो आशा-निराशामे डूबल। ओहि युवककेँ तीन बर्ख कृषि विज्ञानक पढ़ाइ पूरा भेल छलैक, खाली एक बर्ख बाकी छलैक। अपन सभ खेत बेचि पिताक बीमारीक इलाज करौलक, मुदा ओ ठीक नहि भऽ मरि गेलखिन। कर्जा लऽ पिताक श्राद्ध-कर्म केलकनि। खरचा दुआरे पढ़ाइयो छुटि गेलैक आ जीबैक कोनो उपायो ने रहलनि। जिनगीक कठिन मोड़पर आबि युवक निराश भऽ गेल छलाह। साल भरि पहिने बिआहो भऽ गेल छलनि। एक दिस बूढ़ि माए आ स्त्रीक भार दोसर दिस जीबैक कोनो रस्ता नहि। सोगसँ माइयोक देह दिने-दिन निच्चे मुहे हहड़ल जाइत। रमाकान्क उदार विचार सुनि ओ युवक आएल छल।
सभ दिन रमाकान्त चारि बजे पिसुआ भांग पीबैत छथि। दोसरि-तेसरि साँझ होइत-होइत रमाकान्तकेँ भांग क नशा चढ़ि जाइत छनि। भांग क आदति रमाकान्तकेँ पितासँ लागल छलनि। रमाकान्तक पिता न्याय शास्त्रक विद्वान्। ओना गाममे कम्मे-काल रहैत छलाह, बेसी काल बाहरे-बाहर। हुनके प्रभाव रमाकान्तक ऊपर। तेँ रमाकान्त जेहने इमानदार तेहने उदार विचारक सेहो। पोखरिक चर्चा करैत रमाकान्त मुसनाकेँ कहलखिन- ‘‘काल्हिसँ बौएलालकेँ दोबर बोइन दिहक।’’
दोबर बोइन सुनि, कने काल गुम्म भऽ मुसना कहलकनि- ‘‘मालिक, एक गोरेकेँ बोइन बढ़ेबै ते दोसरो-तेसरो जन मांगत। एहिसँ झंझट शुरु भऽ जाएत। झंझट भेने काजो बन्न भऽ जाएत।’’
काज बन्न होइक सुनि रमाकान्त उत्तेजित भऽ कहलकखिन- ‘‘काज किए बन्न हैत। जे जतेक काज करत ओकरा ओते बोइन देबैक।’’
रमाकान्तक विचारकेँ सभ मूड़ी डोला समर्थन कऽ देलकनि। समर्थन देखि गदगद होइत रमाकान्त कहै लगलखिन- ‘‘अखन बौएलालकेँ बोइन बढ़ेलहुँ, बादमे दू बीघा खेतो देबैक। मास्टर सहाएब, अहाँ रातिकेँ बौएलालकेँ पढ़ा दियौ। सिलेट-किताबक खरच हम देबै।’’
खेतक चर्चा सुनि मुसना रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘विपन्न तँ बौएलालेटा नहि, गाममे बहुतो अछि।’’
मुसनाक प्रश्नन सुनि रमाकान्तक हृदयमे सतयुगक हरिश्चनन्द्र पैसि गेलनि। उदार विचार, इमानमे गंभीरता, मनुक्खक प्रति सिनेह हुनक विवेककेँ घेरि लेलकनि। अखन धरि ने सुदिखोर महाजनक चालि आ ने धन जमा करैबला जेकाँ अमानवीय व्यवहार प्रवेश केने छलनि। नीक समाजमे जहिना धनकेँ जिनगी नहि बुझि, जिनगीक साधन बुझि उपयोग होइछ, तहिना रमाकान्तोक परिवारमे रहलनि। जखन रमाकान्तक पिता गाममे रहैत छलथिन आ कियो किछु मंगै अबैत तँ खाली हाथ घुरए नहि दैत छलथिन। जे रमाकान्तो देखथिन। सदिखन पिता कहथिन जे जँ किनको ऐठाम पाहुन-परक आबनि आ ओ किछु मांगै आबथि तँ हुनका जरुर देबनि। किएक तँ ओ गामक प्रतिष्ठा बचाएब होएत। गामक प्रतिष्ठा व्यक्तिगत नहि सामूहिक होइछ। तहिठाम जँ क्यो सोचैत जे गाम सबहक छिऐक, हमरा ओहिसँ कोन मतलब? गलती हेतैक। गाममे अधिकतर लोक गरीब आ मुर्ख अछि, ओ एहि प्रतिष्ठाकेँ नहि बुझैत अछि। तेँ जे बुझनिहार छथि हुनकर ई खास दायित्व बनि जाइत छनि। एहि धरतीपर जतेक जीव-जन्तुसँ लऽ कऽ मनुख धरि अछि, सभकेँ जीबैक अधिकार छैक। तेँ जे मनुख ककरो हक छिनै चाहै छैक ओ एहि भूमिपर सभसँ पैघ पापी छी। जनकक राज मिथिला थिकैक तेँ मिथिलावासीकेँ जनकक कएल रस्ताकेँ पकड़ि कऽ चलक चाही। जहिसँ ओ प्रतिष्ठा सभदिन बरकरार रहतैक।







सुखी-सम्पन्न रमाकान्त जेहने उदार तेहने इमानदार, एहि लेल समाजमे बुझल जाइत छथि। मरौसी जमीन तँ बेशी नहि मुदा पिताक अमलदारीमे जत्था बहुत भेलन्हि। पितो किनने तँ नहिये रहथिन्ह मुदा पुरस्कार स्वरुप पैघ-पैघ दरबार सभसँ भेटल छलनि। रमाकान्तक पिता मधुकान्त अध्यात्म, वैयाकरण आ न्यायशास्त्रक विद्वान छलथि। बच्चेसँ मधुकान्तक झुकाव अध्ययन दिशि देखि पिता बनारस पढ़ैले पठौलखिन। बनारसमे अध्ययन कऽ मधुकान्त तीन बर्ख काशीक एकटा न्यायशस्त्रक पंडित एहिठाम अध्ययन केने रहथि। अध्ययनक उपरान्त मधुकान्त पूर्ण रुपेण बदलि गेल रहथि। अध्ययन-अध्यापनक असुविधा दुआरे गाममे मोन नहि लगनि। ने अपन मनोनुकूल लोक भेटनि आ ने क्रिया-कला मे सामंजस्य होइन। तेँ जिनगीक अधिक समए अनतै बितबैत रहथि। जेहने प्रतिष्ठा मधुकान्तकेँ अपना राजमे, तेहने आनो-आनो राजमे रहनि। भारतीय चिन्तनक बुनियादी ढंगसँ व्याख्या करब मधुकान्तक खास विशेषता रहनि। सामाजिक व्यवस्थाक गुण-अवगुनक चर्च अनेको लेखमे लिखने रहथि, जे असुविधाक चलैत अप्रकाशिते रहलनि। तगमा, प्रशस्ति पत्र टांगि दरबज्जाक शोभा बढ़ौने छलाह। जखन गाममे रहैत छलाह, तखन सबहक एहिठाम जा-जा सामाजिक व्यवस्थाक कुरीति बुझबथिन। खास कऽ कर्मकाण्डक। तेँ समाजमे सभ चाहनि। अपनो जिनगीक बात दोसरकेँ कहथिन आ दोसरोक जिनगीक अध्ययन करैत रहैत छलाह। छल-प्रपंचक मिसिओ भरि गंध जिनगीकेँ नहि छुलकनि। समाजमे मनुक्ख कोना मनुक्खक बाधा बनि ठाढ़ अछि आ ओहिसँ कोना छुटकारा भेटतै, नीक-नहाँति मधुकान्त बुझथिन। सत्तरि जाड़ एहि धरतीपर कटलनि।
सभ दिन चारि बजे रमाकान्त भांग पीबि, पान खा टहलैले निकलि दोसर साँझ धरि घुरि कऽ घरपर अबैत छलाह। घरपर अबिते हाथ-पएर धोय दरबज्जापर बैसि दुनियादारीक गप-सप करैत छलाह। टोल-पड़ोसक लोक एका-एकी आबि-आबि बैसए। रंग-बिरंगक गप-सपक संग चाहो-पान आ हँसिओ-मजाक चलैत रहैत छलैक। मास्टर सहाएब हीरानन्द आ युवक शशिशेखर सेहो टहलि-बूलि कऽ अएलाह। चाह पीबि रमाकान्त शशिशेखरकेँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, अहाँ की चाहै छी ?’’
मजबूरीक स्वरमे शशिशेखर कहए लगलनि- ‘‘एहन दल-दलमे हम फँसि गेल छी जे एकटा पएर निकालै छी तँ दोसर धँसि जाइत अछि। एहिसँ कोना निकलब?’’
कृषि कओलेज मे प्रवेशक प्रतियोगितामे सफल होइतहि शशिशेखरकेँ सुखद भविष्यक ज्योति भेटलन्हि। बेटाक सफलता सुनि पिताक उत्साह हजार गुना बढ़ि गेलनि, जते जिनगीमे कहिओ नहि भेल छलनि। जहिना काँटक गाछमे अमरफल बेल फड़ैत, काँटक गाछमे गुलाबक फूल फुलाइत अछि, तहिना पछुआएल परिवारमे शशिशेखर भेलाह। शशिशेखरक पिता मनमे अरोपि लेलनि जे बीत-बीत कऽ खेत किए ने बीकि जाए मुदा बेटाकेँ कृषि वैज्ञानिक बना कऽ छोड़ब। शशिशेखरोक मनमे पैघ-पैघ अरमान अबै लगलनि। कृषि वैज्ञानिक होएब, नीक नोकरी भेटत, माए-बापक सेहन्ता कमा कऽ पूरा करब। सिर्फ परिवारेक नहि, जहाँ धरि समाजोक भऽ सकत सेवा करब। मुदा बिचहिमे समए एहन मोड़पर आनि देलकनि जे सभ अरमान हवामे उड़ि गेलनि। जहिना बीच धारमे नाओ चलौनिहारक हाथसँ करुआरि छुटि गेलापर नाओमे यात्रा केनिहार आ चलौनिहारकेँ होइत, तहिना शशिशखरोकेँ भेलनि। चारि सालक कोर्समे तीन साल पुरलाक बाद पिता दुखित पड़लखिन। चारिम सालक पढ़ाइ छोड़ि शशिशेखर पिताक सेवामे जुटि गेलाह। एक दिशि पिताक इलाज तँ दोसर दिशि परिवारक बोझ पड़ि गेलनि। आमदनीक कोनो स्रोत नहि, मात्र खेते टा। खेतो बहुत अधिक नहि। तहूमे अदहासँ बेसी बिकिये गेल छलनि। शशिक बचपनाक बुद्धि। जिनगी आ दुनिआसँ भेट नहि। छोट बुद्धिसँ पैघ समस्याक समाधाने नहि होइत छलनि। अंतमे निराश भऽ खेत बेचि-बेचि परिवारो आ पितोक इलाज करबै लगलाह। बीति-खेत बिक गेलनि। जहन कि दुनू समस्या परिवार आ इलाज बरकरारे रहलनि। बेबश भेल छलाह शशि। पितो मरि गेलखिन। कर्ज कऽ केँ पिताक श्राद्ध-कर्म केलनि। दुनियाँमे कतौ इजोत देखबे नहि करथि। सौँँसे दुनिया अन्हारे-अन्हार लगै लगलनि।
बेबस भेल शशि मने-मन सोचै लगलाह जे जँ हम ट्यूशनो पढ़ा कऽ अपनो पढ़व तहन परिवारक की दशा होएत ! ओतेक तँ ट्यूशनोसँ नहि कमा सकैत छी, जहिसँ अपनो काज चलाएब आ परिवारो चला लेब। अधिक कमाइक लेल अधिक समयो लगबै पड़त। जे संभव नहि अछि। अगर जँ सभ समए ट्यूशनेमे लगा देब तँ अपने कखन पढ़ब आ क्लास कोना करब। जहियासँ पिता मुइलाह तहियासँ माइयोक देह सोगसँ हहड़ले जा रहल छनि। एक तँ बूढ़ि छथि दोसर सोगसँ सोगाइल। मनुक्खमे जन्म लेलापर क्यो माए-बापक सेवा नहि करै तँ ओ मनुक्खे की ? मनुक्खक मात्र नकल छी। हम से नहि करब। चाहे दुनियाक लोक नीक कहै वा अधला, तेकर हमरा गम नहि अछि। डिग्री लऽ कऽ हम नीक नोकरी करब। नीक दरमाहा भेटत। जहिसँ खाइ-पीबै, ओढ़ै-पहिरै आ रहैक सुविधा भेटत, मुदा जिनगी तँ ओतबे टा नहि अछि। जिनगीक लेल ज्ञान, कर्म आ व्यवहारक जरुरत सेहो होइत अछि। जिनगी पाबि जँ मनुक्ख प्रतिष्ठित नहि बनि सकल तँ ओ जिनगिये की ? आइ जँ हम माएकेँ छोड़ि दिअनि आ हुनका कष्ट होइन, ओहि कष्टक भागी के बनत ? दिन-राति हुनका सेवाक जरुरत छनि, उठौनाइ-बैसोनाइ सँ लऽ कऽ खुऔनाइ-पिऔनाइ धरि। हम सभ ओहि धरतीक सन्तान छी जहि ठाम श्रवणकुमार सन बेटा जन्म लए चुकल छथि। यैह विचार शशिशेखरक पढ़ाइ छोड़ौलकनि। दुनियामे कोनो सहारा नहि देखि शशि रमाकान्त ऐठाम अएलाह। अपन जीवनक सभ बात शशि हीरानन्दकेँ कहलखिन। शशिक बातसँ हीरानन्दक हृदय पघलि गेल छलनि। हीरानन्द मने-मन सोचैत रहथि जे, जे नवयुवक देश सेवामे एकटा खूँटाक काज करत ओ अपनहि नष्ट भऽ रहल अछि, तेँ ओहन युवककेँ सोंगर लगा ठाढ़ करैक जरुरति अछि।
सोझमतिया रमाकान्त दोहरबैत शशिकेँ पुछलखिन- ‘‘नीक जेकाँ अहाँक बात हम नहि बुझि सकलौं?’’
बिचहिमे मास्टर साहेब रमाकान्तकेँ बुझबैत कहलखिन- ‘‘शशि महा संकटमे फँसि गेल छथि। हुनका अहींक मदतिक जरुरत छनि। तखने ओ उठि कऽ ठाढ़ हेताह।’’
मास्टर साहेबक बात सुनि धाँए दऽ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘अगर हमर मदतिसँ शशिकेँ कल्याण हेतनि तँ जरुर करबनि।’’
रमाकान्तक आश्वासनसँ शशिक हृदयमे भोरक सूर्य देखि दिनक आशा जगलनि। शशिक मूहसँ हँसी निकललनि। जिनगीक अमावश्या पूर्णिमामे बदलै लगलनि। गंभीर भऽ हीरानन्द शशिकेँ कहै लगलखिन- ‘‘चिन्ता छोड़ू। नव जिनगीक दिश डेग उठाउ। ई कर्मभूमि थिकैक। एहिठाम कर्मनिष्टे लोक मनुष्यक जिनगी पाबि सकैत अछि।’’
हीरानन्दक विचार सुनि शशि उठि कऽ ठाढ़ भऽ हुनक हाथ पकड़ि जिनगी भरिक मित्रताक व्रत लैत कहलखिन- ‘‘जहिना कोनो रोगाइल गाछकेँ माली तामि-कोड़ि, पानि दऽ पुनः नव जिनगी दैत अछि तहिना अहाँ दुनू गोटे हमरा देलहुँ। तहि लेल हम ऋणी छी। जहाँ धरि भऽ सकत सेवा करैत रहब।’’
शशिक विचार सुनितहि रमाकान्तक हृदयमे कर्णक रुप सन्निहा गेलनि। खुशीसँ गद्-गद् होइत कहलखिन- ‘‘बौआ, हम तँ पढ़ल-लिखल नहि छी। पिताजी गाममे नहि रहैत छलाह तेँ परिवार सम्हारै पड़ैत छल। ओना कोनो वस्तुक अभाव जिनगीमे ने पहिने भेल आ ने अखन अछि। जहिया पिताजी गाम अबैत छलाह तहिया बुझा-बुझा कऽ कहैत छलाह। अखनो मनमे ओएह विचार अछि।’’
रमाकान्तकेँ दू गोट बेटा। दुनू डाॅक्टरी पढ़ि मद्रासमे नोकरी करैत छन्हि। कहियो काल दू-एक दिनक लेल गाम अबैत छन्हि। दुनू भाइ मद्रासेमे बिआहो कऽ नेने छथि। दुनू कनिओ डाॅक्टरे छथिन। एक परिवारमे चारि डाॅक्टर, तेँ आमदनियो नीक छनि। दस बर्खक नोकरीमे कमा कऽ ढेर लगा लेने छथि। अपन तीन मंजिला मकान मद्रासेमे बनौने छथि। चारिटा गाड़ी सेहो रखने छथि। अपन क्लीनिक सेहो बनौने छथि। बेटा लग जेबाक विचार रमाकान्त बहुत दिनसँ करैत छलाह मुदा दुरस्तक दुआरे नियारियेकेँ रहि जाइत छलाह।
पुनः रमाकान्त बजलाह- ‘‘पोखरियोक काज सूढ़िआइये गेल अछि ओकरा सम्पन्न कए मद्रास जाएब। मद्राससँ अएलाक बाद अहाँक सभ जोगार कए देब। ताधरि अहाँ पत्नियो आ माइयोकेँ एहिठाम लए अबिअनु। एतै रहू।’’
बेरु पहर हीरानन्द आ शशिशेखर टहलै निकललाह। दरबज्जाक सोझे पोखरिक महारक निच्चामे, उत्तर पूब कोनमे एकटा भरिगर सरही आमक गाछ। दुनू गोटे ओहि गाछक निच्चा दुभिपर बैसि गप-सप करै लगलाह। हीरानन्द अपन खेरहा कहै लगलखिन। मैट्रिक पास केलाक उपरान्त मास्टरीक लेल इन्टरभ्यू देइले गेलौं। जखन ओहि ठाम गेलहुँ आ देखलिऐक तँ बुझि पड़ल जे इन्टरभ्यू मात्र दिखावा अछि। मोल-जोल तेजीसँ चलैत छल। मुदा सोझे घुमिओ जाएब उचित नहि बुझि रुकि गेलहुँ। मनमे आएल जे मोल-जोलक विरोध करी। संगी भजिअबै लगलौं। मुदा मोल-जोलक पाछू सभ लागल। एकोटा संग देमएबला नहि देखि मनकेँ असथिर केलहुँ। फेर भेल जे विरोध कऽ हंगामा ठाढ़ कए दियैक। मुदा दुनू पक्ष एक दिशहे, सिर्फ हमहीं टा कातमे। तामसे देह थर-थर कपैत छल। लाभ-हानिक हिसाब जोड़ी तँ हानिये बेसी बुझि पड़ैत छल। मुदा मन तैयो मानै लेल तैयार नहि हुअए। हुअए जे, जे बहालीक उपरका सीढ़ीपर अछि ओकरा चारि धौल लगा दिऐ। दस दिन जहलेमे रहब। फेर हुअए जे जखन डिग्री आ योग्यता अछि, तखन एहेन-एहेन नोकरी कतेको औत आ जाएत। फेर हुअए जे हजारो नवयुवक देशक आजादीक लेल खून बहौलक। हमरा बुते एतबो ने हैत। समुद्रक लहरि जेकाँ मनमे संकल्प-विकल्प उठैत आ शान्त होइत रहल। सभ केयो चलि गेल। हम असकरे रहि गेलहुँ। अचता-पचताकेँ बिदा भेलौं। डेगे ने उठैत छल मुदा तैयो घरपर एलहुँ। घरपर अबितहि पत्नी बुझि गेली। मुदा आशा जगबै दुआरे लोटामे पानि नेेने आगू आबि कहलनि- ‘‘थाकि गेल होएब। हाथ-पएर धोय लिअ, थाकनि कमि जाएत। जलखै नेने अबै छी।’’ जाबे हम पएर-हाथ धोलहुँ ताबे थारी नेने ऐलीह। पहिनहि जलखैएक ओरियान कए कऽ रखने रहथि। जलखै खा, दरबज्जेक चौकीपर कुरता खोलि कऽ रखि देलिऐ आ बाँहिक सिरमा बना पड़ि रहलौं। मुदा मनमे ढेरो रंगक विचार सभ उठै लगल। मुदा दू तरहक विचार सोझमे आबि गेल। पहिल विचार जे शिक्षकेक बहाली टामे घुसखोरी छैक आकि सभ विभागमे छैक? आँखि उठा-उठा सभ दिशि देखै लगलहुँ तँ बुझि पड़ल जे अहूसँ बेसी आन-आनमे अछि। जखन सभ विभागमे घुसखोरी अछि, तखन देश आगू मुहे कोना ससरत ? निच्चासँ ऊपर धरि एक्के रोग सगतरि पकड़ने अछि। मन औना गेल। मन औनाइते छल आकि दोसर विचार मनमे उपकल। मनकेँ असथिर कए सोचए लगलहुँ। अनायास मनमे आएल जे जहिना पुरबा-पछबा हवा धरतीसँ अकास धरि बहैत अछि, तहिना ई व्यवस्थाक हवा छिऐक। तेँ एकरा बदलैक एक्केटा रस्ता अछि व्यवस्था बदलब। मुदा व्यवस्था बदलब छौड़ा-छाैड़ीक खेल नहि छी। कठिन काज छी। व्यवस्था सिर्फ लोकक चालिये-ढालि धरि सीमित नहि अछि। ओ अछि मनुक्खक चालि-ढालिसँ लऽ कऽ ओकर बुद्धि-विचार विवेक धरि। मनुष्यकेँ जेहेन बुद्धि रहै छै, ओहने विचार मनमे अबै छै। जेहेन विचार मनमे अबैत छैक, तेहने ओ काज करैत अछि। तेँ जाधरि मनुक्खक बुद्धि नहि बदलत ताधरि ओकर क्रिया-कलाप नहि बदलि सकैत अछि। जाधरि-क्रिया-कलाप नहि बदलत, ताधरि व्यवस्था बदलब मात्र बौद्धिक व्यायाम हैत। तेँ जरुरत अछि मनुक्खमे नव बुद्धिक सृजन कए नव क्रिया-कलाप पैदा करब। नब क्रिया-कलाप अएलापर नव रस्ता बनत। नब रस्ता बनला पर कियो नव स्थानपर पहुँचत। नव जगह पहुँचलापर मनुक्ख मनुक्खक बराबरीमे आओत। आ छोट-पैघ, धनीक-गरीब, ऊँच-नीचक खाधि समतल हएत। तखन भक्क खुजल। भक्क खुजितहि हाइ स्कूलक शिक्षक देवेन्द्र बाबू मन पड़लनि। देवेन्द्र बाबू, सदिखन छात्र सभ केँ कहथिन- ‘‘मनुखकेँ कखनो निराश नहि हेबाक चाहिऐक। जखने मनुक्खमे निराशा अबैत छैक, तखने मृत्यु लग चलि अबै छैक। तेँ सदिखन आशावान भए जिनगी बितेबाक चाहिऐक। कठिनसँ कठिन समए किएक ने आबए मुदा विवेकक सहारा लए आगू डेग उठेबाक चाहिऐक।’’ देवेन्द्र बाबूक विचार मन पड़ितहि ओ संकल्प लेलनि, जहन शिक्षक बनैक लेल डेग उठेलहुँ तँ शिक्षक बनि कऽ रहब। चाहे जत्ते विघ्न-बाधा आगूमे उपस्थिति होअए।’’
जखन देवेन्द्र बाबू कओलेजमे पढ़ैत रहथि तखन आजादीक आन्दोलन देशमे उग्र रुप धेने छल। देवेन्द्रबाबू पाँच-सात संगीक संग पोस्ट आॅफिसमे आगि लगा देलखिन। पोस्ट-आॅफिस जरि गेलै। तीन दिनक बाद हुनका पुलिस पकड़ि लेलकनि। मारबो केलकनि आ जहलो लए गेलनि। जहल जाइसँ पहिने कने डरो होइत छलनि। लोकक मुहे सुनने रहथिन जे जहलमे खाइले नहि दैत छैक। ऊपरसँ साँझ-भिनसर दुनू साँझ मारबो करै छै। मुदा जहलक भीतर गेलापर देखलखिन जे हजारो देशप्रेमी क्रान्तिकारी जहलमे छथि। हुनका सबहक लेल जेहने घर तेहने जहल। एक बर्ख ओहो जहलमे रहलाह। ओहि बर्ख दिनमे ओ बहुत सिखलनि। जिनगीये बदलि गेलनि। आब देबेन्द्र बाबू सिर्फ अपने आ अपना परिवारे टा लेल नहि सोचथि। बल्कि ओ बुझि गेलखिन जे देशक अंग समाज आ समाजक अंग व्यक्ति वा परिवार होइत अछि। तेँ, सभकेँ अपनासँ लऽ कऽ देश धरिक सेवा करैक चाहिऐक। जहल सँ निकलि बी.ए.क फार्म भरलनि। बी.ए. पास केलापर हाइ स्कूलक शिक्षक बनलाह।
हाइ स्कूलमे बहूतो शिक्षक छलथि मुदा हुनकर जिनगी भिन्न छलनि। ट्यूशन माने खानगी पढ़ौनीकेँ पाप बुझि क्लासमे तेना पढ़बैत छलाह जे विद्यार्थीकेँ टयूशन पढ़ैक जरुरते ने रहैत छलैक। स्कूलक पजरेमे टटघर बना असकरे रहैत छलाह। महिनामे एक दिन गाम जा बालो-बच्चाकेँ देखथिन आ दरमहो परिवारमे दऽ अबथिन।
चौकीपर हीरानन्द पड़ले रहथि आकि एकटा अनठीया आदमी पहुँचलनि। ओ नहि चिन्हलखिन। मुदा दरबज्जाक लाज रखैक लेल आंगनसँ एक लोटा पानि आनि पएर धोय बैसैले कहलखिन। पुनः आंगन जा पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘एकटा अतिथि अएला हेन, तेँ झब दे चाह बनाउ।’’ कहि दरबज्जापर आबि ओहि आदमीक नाम-गाम पूछै लगलखिन। नाम गाम पूछि काजक गप उठबितहि रहथि आकि आंगनसँ पत्नी हाथक इशारा सँ चाह लए जाइले कहलखिन। इशारा देखिते गप्पकेँ विराम दैत आंगन चाह अनैले गेलाह। आंगन जा दुनू हाथमे दुनू चाहक गिलास लए दरबज्जापर आबि दहिना हाथक गिलास अतिथिकेँ देलखिन आ बामा हाथक गिलास दहिना हाथमे लऽ अपने पीबै लगलाह। गप्पो चलैत आ चाहो पीबैत रहथि तेँ पीबैमे देरी लगलनि। चाह सठलो नहि छलनि आकि आंगनसँ पत्नी जलखइक इशारा देलखिन। पत्नीक इशारा देखि हाथेक इशारा सँ थोड़े काल बिलमि जाइले कहलखिन। चाह पीबि लगले जलखै करब नीक नहि होइत अछि। हँ, चाह पीबैसँ पहिने जलखै नीक होइत छैक। चाह पीबि पान खा दुनू गोटे गप-सप करै लगलाह। अतिथिकेँ पुछलखिन- ‘‘किमहर-किमहर अहाँ एलहुँ?’’
अतिथि- ‘‘एकटा बूढ़ि हमरा गाममे छथि। सामाजिक संबंधमे दादी हेतीह। बिधवा छथि। बेटो नहि छनि। हुनका विचार भेलनि जे बच्चा सभकेँ पढ़ैले एकटा इस्कूल बनाबी। चारि बीघा खेत छनि। समाजोक सभ आग्रह केलकनि जे सम्पति तँ राइ-छित्ती भइये जाएत, तहिसँ नीक जे इस्कूल बना दियौक। अखन ओ दू बीघा खेत इस्कूलमे देथिन आ दू बीघा अपना लेल रखतीह। जखन दादी मरि जेतीह तखन चारू बीघा इस्कूलेक हेतै।’’
ध्यानसँ अतिथिक बात सुनि मुस्कुराइत हीरानन्द कहलखिन- ‘‘बडड् नीक विचार छनि।’’
‘‘ओहि इस्कूलकेँ चलबैले अहाँसँ कहै अएलहुँ।’’
“जरुर जाएब। राति एतै बीता लिअ। भोरे चलब।’
‘‘कोसे भरि अछि, दोसर साँझ धरि पहुँच जाएब।’’
‘एते अगुताइ किएक छी ? हमहूँ थाकल छी। भोरे चाह पीबि दुनू गोटे चलब।’’
हीरानन्दक आग्रह अतिथि मानि गेलाह। अंगनाक टाट लगसँ पत्नी दुनू गोटेक सभ बात सुनैत रहथिन। दुनू गोटे तमाकू खा लोटा लऽ मैदान दिस बिदा भेलाह। घुमैत-फिरैत दुनू गोटे तेसरि साँझमे घरपर अएलाह। घरपर आबि दुनू गोटे, दरबज्जापर बैसि, गप-सप करै लगलाह। भानस भेल, दुनू गोटे खा कऽ सुति रहलाह।
चारि बजितहि दुनू गोटेक निन्न टूटि गेलनि। जाबे दुनू गोटे पैखानासँ आबि दतमनि केलनि ताबे पत्नी आरती चाह बनौलनि। चाह पीबितहि रहथि आकि सूर्यक उदय भेल।
आजुक सुरुजमे एक विशष रंगक आकर्षण बुझि पड़ैत छलनि। सूर्यक रोशनीमे विशष आकर्षण छल आकि सबहक हृदयमे छलनि। आरतीक मनमे होइत छलनि जे पति नोकरी करै जा रहल छथि तेँ, विशेष आकर्षण। हीरानन्दक हृदयमे जिनगीक एक सीढ़ी बढ़ैक आकर्षण रहनि आ अतिथि मटकनक हृदयमे अपन बेटाक पढ़ैक आकर्षण छलनि।
चाह पीबि हीरानन्द झोरामे धोती-तौनी लए, दुनू गोटे गप-सप करैत बिदा भेलाह। गप-सपक क्रम मे बुझि पड़लनि जे स्कूल बनबैमे रमाकान्तक विशेष हाथ छन्हि। तेँ गाम पहुँचतहि मटकनकेँ कहलखिन- ‘‘पहिने रमाकान्तसँ भेट कऽ लेबनि तखन दादी ऐठाम जाएब।’’
दुनू गोटे रमाकान्त ऐठाम पहुँचलाह। साठि वर्षीय रमाकान्त गाएक नादिमे कुट्टी-सानी लगबैत रहथि। दलानपर दुनू गोटेकेँ देखि रमाकान्त हाँइ-हाँइ हाथ धोय, लग आबि बैसैले कहलखिन। हीरानन्द चौकीपर बैसलाह मुदा मटकन ठाढ़े रहल। मटकनकेँ रमाकान्त कहलखिन- ‘‘तूँ आगू बढ़ि जाह। हम दुनू गोटे पाछूसँ अबैत छी। जहन मास्टर सहाएब दुआरपर ऐला तँ बिना जलखइ करौने कोना जाए देबनि।’’
मटकन आगू बढ़ि दादीकेँ सभ समाचार सुना देलकनि। समाचार सुनि दादीक मन खुशीसँ नाचि उठलनि। दादीक मनमे हुअए लगलनि जे आब गामक बच्चा अन्हारसँ इजोत मुहे बढ़त।
जलखै कए आ चाह पीबि दुनू गोटे दादी ऐठाम चललथि। दादीक घर थोड़बे हटल। रस्तामे रमाकान्तक मनमे अबै लगलनि जे स्कूल तँ व्यक्तिगत संस्था नहि छी। सामाजिक छी। सामाजिक संस्थामे सबहक सहयोग हेबाक चाहिऐक। धन्यवाद भौजीकेँ दैत छिअनि जे अपन सभ सम्पति समाजकेँ दऽ रहल छथि। मुदा हमरो सबहक तँ किछु दायित्व होइत अछि। तेँ एहि लेल किछु करब जिम्मा भऽ जाइत अछि। मास्टर साहेबक भोजन आ रहैक जोगार हम कए देबनि। दरमाहा रुपमे खेतक उपजा हेतनि आ समाजक सभ मिलि कऽ जँ स्कूलक घर बना दै तँ सर्वोत्तम होएत। एते बात मनमे नचितहि छलनि आकि दादी ऐठाम पहुँचि गेलाह। दादीकेँ रमाकान्त भौजी कहथिन। किएक तँ समाजिक संबंधमे दादीक पतिसँ भैयारी रहनि। दादीयो मास्टर सहेबक रस्ता देखैत छलीह। भौजी ऐठाम पहुँचतहि रमाकान्त मटकनकेँ कहलखिन- ‘‘मटकन, स्कूल गामक एकटा पैघ संस्था छी। तेँ समाजो लोककेँ खबरि दहुन आ सभ मिलिकेँ बिचारि आगूक डेग उठाएब। ओना भौजीक तियागक प्रशंसा जते कएल जाए कम हएत। जहि सम्पतिक लेल लोक नीचसँ नीच काज करैले उतरि जाइत अछि, ओहि सम्पतिक तियाग भौजी कए रहल छथि। जखन मास्टर साहेब आबिये गेल छथि तखन हड़बड़ करैक जरुरति नहि। अखन सौंसे गाममे सभकेँ कहि दहुन आ बेरमे सभ एकठाम बैसि विचारि लेब।’’
बेर टगि गेल। समाजक सभ एका-एकी अबै लगलाह। सभक मनमे जिज्ञासा रहनि। तेँ सभ विशेष उत्सुक रहथि। सबहक बीचमे रमाकान्त कहलखिन- ‘‘समाजक सभ जनिते छी जे भौजी अपन सभ सम्पति बच्चा सबहक लेल दए रहल छथि। जाहिसँ हमरे अहाँक कल्याण होएत। मुदा हमरो अहाँक दायित्व होइत अछि जे हमहूँ सभ किछु भागीदार बनी। जाधरि हम जीबैत रहब ताधरि शिक्षकक रहैक आ भोजनक प्रबंध करैत रहबनि। अहाँ सभ स्कूलक घर बना दियौक।’’
रमाकान्तक विचारक सभ थोपड़ी बजा समर्थन कए देलकनि। मुस्कुराइत हीरानन्द कहलखिन- ‘‘घर बनैमे किछु समए लगत, तहि बीच अहाँ सभ अपन-अपन बच्चाकेँ पठाउ। हम पढ़ाइ शुरु कए देब।’’
मास्टरो साहेबक विचारकेँ सभ थोपड़ी बजा समर्थन कए देलकनि। थोपड़ी बन्न होइतहि दुखिया ठाढ़ भए अपन विचार रखैत बजै लगल- ‘‘खेती करै ले कत्तऽसँ हर-जन अनताह। जते बोनिहार छी सभ मिलि कऽ खेती कए देबनि। किएक तँ जहिना मास्टर साहेब हमरा सबहक सेवा करताह तहिना तँ हमहूँ सभ मिलिकेँ हुनकर सेवा करबनि।’’


छह माससँ सोनेलालक स्त्री सुगिया अस्सक छथि। परोपट्टाक डाॅक्टर, वैद्य, हकीम ओझा-गुनी थाकि गेल मुदा सुगियाक रोग एक्कैसे होइत गेलै, जे उन्नैस नहि भेलैक। फेदरति-फेदरतिमे सोनेलाल पड़ल। दिन-राति एक्को क्षण मन चैन नहि। कखनो डाॅक्टर एहिठाम जाइत, तँ कखनो दवाइ आनै बजार जाइत छलाह। कखनो बच्चाले दूध अनै जाइत, तँ कखनो माल-जालकेँ खाइ-पीबैले दैत छलाह। अपना खाइयो-पीबैक सुधि नहि रहैत छलनि। कखनो मनतरियाकेँ बजा अनैत, तँ कखनो साँढ़-पाराकेँ रोमएले खेत जाइत छलाह। स्त्री मरैक ओते चिन्ता नहि जते तीन बेटीपर सँ भेल चारिम बेटाक। कोरैलै बेटा जनमै काल सुगियाकेँ दुख पकड़ि लेलकनि। बच्चा जनमै काल तेहेन समए भऽ गेल छलैक जे सोनेलाल डाॅक्टर एहिठाम नहि जा सकलाह। एक तँ जाड़क मास, दोसर अनहरिया राति। कनिये-कनिये पछबा सिहकी दैत आ बरखा बुन्न जेकाँ टप-टप गाछ सभपर सँ पालाक बुन्न खसैत छलैक। समए देखि सोनेलाल बेवस भऽ गेलाह। पलहनिक घर लगमे रहितहुँ बजबै गेल नहि भेलनि। डरो होइन जे हम ओमहर जाएब आ एम्हर किछु भऽ जाइन। गुप-गुप अन्हार। हाथ-हाथ नहि सुझैत छलैक। विचित्र संकटमे सोनेलाल पड़ि गेलाह।
जहियासँ बच्चाक जन्म भेलै आ स्त्री बीमार पड़लनि, तहियासँ सोनेलालक कोनो दशा बाकी नहि रहलनि। मुदा सोनेलालो हिम्मत नहि हारलनि। जे क्यो जे दवाइ वा प्रतिकारक कोनो वस्तुक नाम कहनि ओ आनि सोनेलाल स्त्रीकेँ देथिन। अंतमे पाँच कट्ठा खेत पाँच हजारमे भरना लगा सोनेलाल लहेरियासराय जाइक विचार कऽ लेलक। बच्चो सभ छोट-छोट, तेँ घरो आ बाहरो सम्हारैक लेल आदमीक जरुरत भेलनि। घर सम्हारैले सारि आ लहेरियासराय जाइक लेल बहीनकेँ बजौलनि। स्त्रीक दूध सुखि गेलनि। तेँ बच्चाकेँ बकरीक दूध उठौना केने रहथि। बहीनोक छोटका बच्चा नमहर भऽ गेल छलैक। तेँ ओकरो दूध सुखि गेल छलैक। मुदा बच्चाक दशा देखि बहीन मसुरी दालिक झोरो खाए लगली आ बच्चोकेँ छाती चटबै लगलीह, जहिसँ कनी-कनी दूध पोनगै लगलनि।
लहेरियासराय जाइक तैयारीमे सोनेलाल लगि गेल। मालक घरमे टांगल खाटकेँ उतारि झोल-झार झाड़ै लगला। खाटक झोलो साफ केलक आ कतौ-कतौ जे जौर टूटल रहै, ओकरो जोड़ि-जोड़ि बन्हलक। बहीनकेँ सोनेलाल कहलक- ‘‘दाइ, नुआ बिस्तर आइये खीचि लए, भोरके गाड़ी पकड़ि कऽ चलैक छह। दस दिन जोकर चाउरो-दालि लइये लेब। चाउर तँ कोठियेमे छह, दालि दड़रै पड़तह। सब ओरियान आइये कऽ के राखि लाए।’’
बहीन- ‘‘भैया, तोहर कोन-कोन कपड़ा साफ कए देबह ?’’
“दाइ, एक जोड़ धोती, अंगा आ चद्दरि हम्मर आ तूँ अपनो कपड़ा खीचि लीहह। अखन तँ एकटा धोती पहिरनहि छी। अलगन्नीपर धोती छह, ओकरा अखने खीचि दहक जहिसँ नहाइ बेर तकमे सुखि जाएत। नहा कऽ ओकरा पहीर लेब आ पहिरलाहा धोतीकेँ खीचि लेब।’’
सोनेलालक सारि सेहो लगेमे ठाढ़। सारिकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँ दुआर-दरबज्जासँ कतौ बाहर नै जाएब। अंगने-दुआरमे बच्चो सभकेँ राखब आ मालो-जालकेँ खाइ-पीबैले देबइ। समए साल खराप अछि, तोहूमे अइ गाममे देखते छिऐ जे नव कबरिया छौँड़ा सभ भांग -गाँजा पीबि लेत आ अनेरो लोककेँ गरिअबैत रहत। जँ कियो उकट्ठे कऽ दिअए।’’
बहीन कोठीसँ मसुरी आ चाउर निकालि, अंगनेमे बिछानपर सुखै देलक। नवकुट्टिये चाउर, तेँ सुरा-फड़ा नहिये लागल छलैक। बहीन कपड़ा खिचै गेलि आ सारि मसुरी दड़रै लगली। सोनेलाल खाट ठीक कए दू टा बरहा दुनू भागक पाइसमे बन्हलनि। कपड़ा खीचि बहिन सोनेलालकेँ पुछलक- ‘‘भैया, कत्ते चाउर-दालि लऽ जेबहक?’’
सोनेलाल- ‘‘दाइ, दुइये गोरे खेनिहार रहब ने, तै हिसाबसँ चाउरो आ दालियो लऽ लेब। तीमन-तरकारी ओतै कीनब।’’
बहीन- ‘‘भैया, नून तँ ओतौ कीनि लेब मुदा मिरचाइ, हरदि आ कड़ू तेल एतै गामेसँ नेने जाएब। एकटा थारी एकटा लोटा आ दुनू छोटकी डेकची सेहो लइये लेब। डेकचियेमे सभ समान लऽ लेब, किएक तँ फुट-फुट कऽ लेलासँ अनेरे नमहर मोटरी भऽ जाएत। खाइयोक चीज-बौस रहत आ लत्तो-कपड़ा रहत, मुदा तैयो मोटरी नम्हरे भऽ जाएत।’’
सोनेलाल बाजल - ‘‘मोटरी नम्हरे हैत तेँ की करबै। जखैन गारामे ढोल पड़ल अछि तखन की करबै।’’
लहेरियासराय जाइक बहीन तैयारियो करै आ मने-मन सोचबो करै जे भगवान भारी बिपतिमे भैयाकेँ फँसा देलखिन। जँ कहीं भौजी मरि जेतै तँ भैया फटो-फन्नमे पड़ि जाएत। असकरे की करत ? बच्चो सभ लेधुरिये छै। कना खेती सम्हारत, धिया-पूताकेँ देखत आ माल-जालकेँ देखत। हे भगवान एहेन बिपति सात घर मुद्दइयो रहै ओकरो नइ दिहक। हमही की करबै? हमहूँ तँ असकरुए छी। हमरो चारिटा धिया-पूता, माल-जाल अछि। छी अइठीन आ मन टांगल अछि गामपर। मुदा एहेन बेरमे जँ भैयोकेँ नै देखबै तँ लोक की कहत। लोके की कहत? अपने मनमे केहेन लागत।’’
साँझ परितहि सोनेलाल टीशन जाइले दूटा जन तकै गेल। ओना तँ अपनो दियाद-बाद अछि मुदा बेरपर ककर के होइ छै। अचताइत-पचताइत सोनेलाल फुदिया ऐठाम पहुँचल। फुदियाक जेहने नाम तेहने काज। सोनेलालकेँ देखितहि फुदिया पुछलक- ‘‘किमहर-किमहर ऐलह, भाए?’’
“तोरेसँ काज अछि।’’
“की ?’’
“काल्हि, भोरका गाड़ी पकड़ब। रेखिया माएकेँ लहेरियासराय लए जेबै। अपनेसँ तँ चलै-फिरै वाली नइ अछि। खाटपर लऽ जाए पड़त। तेँ दू गोटेक काज अछि।’’
‘‘तोरा जँ हमर खूनक काज हेतह, हम सेहो देबह। तोहर उपकार हम जिनगी भरि नइ बिसरब। हमरा ओहिना मन अछि जे बेटी बिदागरी करैले तीन दिनसँ जमाए बैसल रहथि आ कपड़ा दुआरे बिदागरी नइ करियैक। मगर जहिना आबि कऽ तोरा कहलियह तहिना तोहीं रुपैआ निकालि कऽ देने रहह। एहेन उपकार हम बिसरि जाएब।’’
‘‘समाजमे एहिना सबहक काज सभकेँ होइ छै आ होइत रहतै। जेँ ई तोरापर भरोस छल तेँ ने एलौं। भोरेमे गाड़ी छै। तेँ गाड़ी अबैसँ एक घंटा पहिने घरपर सँ बिदा हैब।’’
“बड़-बढ़िया! चारिये बजेमे हमरा सभ दिन निन्न टुटि जाइ अए। समएपर हम दुनू भाइ चलि अएबह। तोहूँ अपन तैयारीमे रहिहऽ। भऽ सकै अए जे कहीं समएपर निन्न नहि टूटए तेँ एक लपकन चलि अबिहह।’’
फुद्दी एहिठामसँ आबि सोनेलाल बहीनकेँ पुछलक- ‘‘दाइ, सभ चीज एक ठीन सरिया कऽ रखि लाए, नै तँ जाइ काल हरबड़मे छुटि जेतह।’’
सोनेलालक बात सुनि बहिन मने-मन सोचै लगल जे कोनो चीज छुटि तँ ने गेल। बहीन भाइकेँ पुछलक- ‘‘भैया, एक बेर फेरसँ सभ चीजक नाम कहि दाए। अखने मिला कऽ सरिया लेब।’’
दुनू भाइ-बहीन एक-एक कऽ कऽ सभ वस्तुक नाम लेलक। सभ वस्तु देखि सोनेलाल बहीनकेँ कहलक- ‘‘दाइ, चारि बजे उठैक अछि, जँ भानस भऽ गेलह तँ अखने खाइ लेल दऽ दाए।’’
हाथ-पएर धोए सोनेलाल खाइले बैसल। चिन्तित मन, तेँ खाएले ने होए, मुदा तैयो जी जाँति कऽ कहुना-कहुना चारि कौर खेलक। खा कऽ मालऽ घर गेल। माल-जालकेँ खाइले दऽ, आबि कऽ सुति रहल। बहीन खा कऽ बच्चाकेँ छाती लगा सुति रहल। सुतले-सुतल बहीन भौजाइकेँ पुछलक- ‘‘भौजी, मन नीक अछि की ने?’’
‘’हँ ऽऽ।’’
ओछाइनपर पड़ल सोनेलालकेँ निने ने होए। बिचित्र द्वन्द्वमे पड़ल रहए। एक दिशि भोरे उठै दुआरे सुतै चाहैत, तँ दोसर दिस पत्नीक चिन्ता नीन आबै ने दैत। कछ-मछ करैत। कनिये कालक उपरान्त हाँफी भेलनि। निन एलनि। निन्न अबितहि चहा कऽ उठि बहीनकेँ पुछलखिन- ‘‘दाइ, भोर भऽ गेलै?’’
बहीनो जगले छलि, बाजलि- ‘‘भैया, अखने तँ खा कऽ कर देलहुँहेँ। लगले भोर कना भऽ जएतैक।’’
फेर दुनू गोटे सुति रहल। तीनि बजे दुनू भाइ फुदिया आबि डेढ़िया परसँ सोर पाड़लक- ‘‘सोनेलाल भाइ, हाँ सोनेलाल भाए, अखैन तक सुतले छह। उठह-उठह, भुरुकुवा उगि गेलै।’’
फुदियाक आवाज सुनि दुनू भाइ-बहीन धड़फड़ा कऽ उठल। आँॅखि मिरितहि सोनेलाल बाहर निकलि फुद्दीकेँ कहलक- ‘‘की कहिह, बड़ी रातिमे नीन भेल। भने तू आबि कऽ जगा देलह। हम चीज-बौस निकालै छी आ तू खाटकेँ सुढ़िआबह।’’
अन्हारक दुआरे बहीन दूटा डिबिया नेसलक। एकटा डिबिया ओसारक खुटा लग रखलक आ एकटा घरमे। खाट निकालि फुद्दी पाइसमे बान्हल बरहाकेँ अजमा कऽ देखलक जे सक्कत अछि आकि नहि। दुनू कात पाइसमे बान्हल बरहाकेँ देखि फुद्दी सोनेलालकेँ कहलक- ‘‘भाइ, बरहा तँ ठीक अछि। बाँसक टोन कहाँ छह ?’’
बाँसक टोन घरक पँजरेमे राखल। टोनकेँ ओंगरीसँ देखबैत सोनेलाल कहलक- ‘‘होइबएह छह।’’
टोन आनि फुद्दी डिबियाक इजोतमे देखै लगल जे गिरह सब छीलल छै आकि नहि। छीलल छलै। खाटपर बिछबैले सोनेलाल एक पाँज पुआर आनि फुद्दीकेँ कहलक- ‘‘तोरा अटिअबैक लूरि छह, कनी पुआर सरिया कऽ चौरस कऽ कऽ बिछा दहक।’’
पुआरकेँ सरिया फुद्दी कहलक- ‘‘भाइ, अइपर बिछेबहक की?’’
सोनेलाल घरसँ शतरंजी आ सिरमा आनि फुद्दीकेँ देलक। बिछान सरिया फुद्दी बाजल- ‘‘भाइ, रस्तामे कान्ह बदलै काल, कहीं भौजी गिरि-तिरि नहि पड़थि। तेँ पँजरोमे दुनू भागसँ डोरी बान्हि देबहऽ ?’’
फुद्दीक विचार सोनेलालकेँ जँचल। कने गुम्म भऽ बाजल- ‘‘की कहिह फुद्दी, दुख पड़लापर मनो बौआ जाइ छै। तोहूँ की अनारी छह जे नइ बुझबहक। जे नीक बुझि पड़ह, से करह।’’
खाटपर रोगीकेँ चढ़ा, दुनू भाइ फुद्दी कान्हपर उठौलक। कान्हपर उठबितहि सोनेलालकेँ मन पड़ल, कहलक- ‘‘फुद्दी, घरमे तँ धिये-पुते रहत, कियो चेतन नहिये अछि। साइरियो आइलि अछि, ओहो अनठिये अछि। तेँ, तूँ रातिकेँ एतै खैइहह आ सुतिहह।’’
‘बड़-बढ़िया’ कहि फुद्दी आगू बढ़ल। चाउर-दालि आ बरतन-बासनक मोटरी माथपर लऽ सोनेलाल निकलल। बच्चाकेँ छाती लगौने बहीनो निकललीह। डेढ़ियापर अबितहि सुगिया खाटेपर सँ बाजलि- ‘‘कनी अँटकि जाउ।’’
फुद्दी ठाढ़ भऽ पुछलक- ‘‘किअए रोकलहुँ?’’
खाटे परसँ सुगिया बजलीह- ‘‘हे सौध-गुरु, अगर निकेना घुरिकेँ आएब तँ पचास मुरतेक भनडारा करब।’’
फुद्दी खाट उठा बिदा भेल। रस्तामे केयो किछु नहि बजैत रहथि। मने-मन सभ रंगक बात सोचैत रहथि। फुद्दी सोचैत जे भगवानो केहेन बेइमान अछि जे सोनेलाल भाइ सन सुधा आदमीकेँ एहेन बिपति देलखिन। सोनालाल सोचैत जे तीन बेटीपर बेटा भेल, जँ घरवाली मरि जाएत तँ बेटो मरि जाएत। चुमौन करब तहिसँ बेटाक कोन गारंटी हएत। जँ कहीं बेटिये भेल तँ खानदानोक अंत होएत आ जिनगी भरि अपनो विआहे दानक बनर-फाँसमे सोहो पड़ल रहब।
बहीन सोचैत जे जँ कहीं भौजी मरि जेतीह तँ जिनगी भरि भैयाकेँ दुखे-दुख होइत रहतै।
स्टेशन पहुँचि सोनेलाल मोटरी रखि गाड़ीक भाँज लगबै गेल। टिकट कटैत देखि बुझलक जे गाड़ी अबैमे लगिचा गेल अछि। हमहूँ टिकट कटाइये लइ छी। टिकट कटौलक। कनिये कालक बाद गाड़ी आएल। दु गोटे फुद्दी आ सोनेलाल -तीनू गोटे सुगियाकेँ गाड़ीमे चढ़ौलनि। सोनेलाल गाड़ीमे उपरेमे रहलाह। मोटरी उठा कऽ फुद्दी देलकनि। मोटरी रखि सोनेलाल बहीनक कोरासँ बच्चाकेँ लेलनि। बहिनो चढ़लीह। गाड़ी खुजितहि दुनू गोटे फुद्दी खाट उठा घर दिशि बिदा भेल।
गाड़ी दरभंगा पहुँचल। छोटी लाइन दरभंगे तक चलैत। तेँ गाड़ी दू घंटा उपरान्त फेर घुरि कऽ निरमलिये जाएत। गाड़ीसँ यात्री सभ उतरै लगलाह। मगर सोनेलाल सबतुर बैसले रहलथि। मनमे कोनो हड़बड़ी नहिये रहनि, जखन सभ उतरि गेलाह तखन सोनेलाल सीट परसँ उठि बहीनकेँ कहलनि- ‘‘दाइ, तू एतै रहह, हम कोनो सबारी भजिऔने अबै छी।’’
कहि सोनेलाल गाड़ीसँ उतरि, प्लेटफार्मसँ निकलि बाहर एकटा टेम्पू लग पहुँचलाह। ड्राइवर निच्चामे ठाढ़ भऽ पसिन्जर सभकेँ देखैत रहैत। सिरसिराइत सोनेलाल ड्राइवरकेँ कहलखिन- ‘‘भाइ, हमरा डाकडर ऐठाम जेबाक अछि, चलबह?’’
सोनेलालक बोलीसँ ड्राइवर बुझि गेल जे देहाती आदमी छी, तेँ एना बजैत अछि। मुदा सोनेलालक प्रति ड्राइवरक आकर्षण बढ़ि गेलनि असथिरसँ ड्राइवर पुछलखिन- “रोगी कहाँ छथि।’’
‘‘गाड़ियेमे।’’
‘‘बजौने अबिअनु।’’
‘‘अपने पाएरे अबैवाली नइ छथि। पकड़िकेँ आनै पड़त।’’
गाड़ीकेँ सोझ कऽ ड्राइवर सोनेलालक संग प्लेटफार्मपर आएल। गाड़ी लग पहुँचि ड्राइवर रोगी आ समान देखि मने-मन विचारलनि जे एक आदमीक काज आरो पड़त। प्लेटफार्म दिशि नजरि उठा कऽ हियाबै लगल। गाड़ी साफ करै लेल दू गोटेकेँ नेने अबैत देखि जोर सँ ड्राइवर बाजल- “भैया”।
भैया सुनि झाड़ूबला आखि उठौलक तँ ड्राइवरकेँ देखलक। ड्राइवरकेँ देखितहि लफड़ि कए ड्राइवर लग आएल। ड्राइवर कहलकै- ‘‘भाए, एकटा दुखित महिला अइ कोठलीमे छथि, हुनका उतारि कऽ टेम्पूमे बैसाए दिअनु।’’
झाड़ू राखि दुनू झाड़ूओबला आ ड्राइवरो सुगियाकेँ उतारि टेम्पू दिशि बढ़लाह। सोनेलाल मोटरी लेलनि। आ बहीन बच्चाकेँ कन्हा लगा चललीह। सुगियाकेँ चढ़ा कऽ झाड़ूबला गाड़ी साफ करैले घुरै लगल। दुनू झाड़ूबलाकेँ रोकि सोनेलाल दसटा रुपैआ निकालि दिअए लगलखिन। रुपैआ देखि, अधबएस झाड़ूबला बाजल- ‘‘भाइ हमहूँ रेलवेमे सरकारी नोकरी करै छी। दरमाहा पबै छी। अहाँक मदति केलहुँ। अखन जै मुसीबतमे अहाँ छी, ओहिमे हमरा देहो आ रुपैयोसँ मदति करक चाही। मुदा गरीब छी, कहुना-कहुना कमा कऽ गुजर कए लैत छी। किएक तँ अहूँ बुझिते हेबै जे सभ दुख गरीबेकेँ होइ छै। धनीक लोक सोनाक मंदिर-मुरुतकेँ खोआ-मलाइ चढ़ा धरम करैत अछि। हमर भगवान यैह मरल-टूटल लोक छथि। हम सेवा केलहुँ। भगवान करथि जे हँसी-खुशीसँ अहाँ घर जाइ।’’
झाड़ूबलाक बात सुनि सोनेलाल अचंभित भऽ गेलाह जे जकरासँ लोक छुति मानैत अछि, ओकर आत्मा कतेक पवित्र छै।
टेम्पू आगू बढ़ल। थोड़े दूर गेलापर सोनेलाल ड्राइवरकेँ कहलखिन- ‘‘डरेबर सहाएब, हम अनभुआर छी। कहियो ऐठाम नइ आएल छी। अहाँ अइठीन रहै छी। सभटा बुझल-गमल अछि। तेहेन डाकडर लग चलू जे हमरा रोगीकेँ छुटि जाए।’’
‘‘बड़-बढ़िया।’’- ड्राइवर बाजल।
मने-मन ड्राइवर सोचै लगल जे अस्पतालमे भरती करौनाइ नीक नहि हेतनि। एक तँ अस्पतालमे बेवस्थो बढ़िया नहि छैक, दोसर जेकरे लागि-भागि छै तेकरे सभकेँ सभ सुविधो भेटैत छैक। तेँ सभसँ बढ़िया डाॅक्टर बनर्जी लग लए चलिअनि। डाॅक्टर बनर्जी रिटायर भए अपन घरो आ क्लीनिको बनौने।
बारह बजि गेल। डाॅ. बनर्जीक पहिल पाली आठ बजे भिनसरसँ बारह बजे होइत आ दोसर पाली चारि बजेसँ आठ बजे साँझ धरि होइत छलनि। सभ रोगीकेँ देखि डाॅ. बनर्जी डेरा जेबाक तैयारी करिते रहथि, टेम्पूकेँ ड्राइवर सोझे फाटकसँ भीतर ओसार लग लए गेल। टेम्पू देखि डाॅ. बनर्जी फेर बैसि रहलाह। टेम्पू रोकि ड्राइवर उतरि कऽ सोझे डाॅ. बनर्जी लग जा कहलकनि- ‘‘डाॅक्टर साहेब, रोगी अपनेसँ चलै-फिरैवाली नइ छथि, तेँ पहिने एकटा डेरा दिअनु।’’
आखिक इशारासँ डाॅ. बनर्जी कम्पाउण्डरकेँ कहलखिन। बगलेमे अपन डेरा रहनि। कम्पाउण्डर जा कऽ एकटा कोठरी खोलि कुन्जी सोनेलालकेँ दऽ देलकनि। कम्पाउण्डर घुरि कऽ आबि, नोकरकेँ संग कऽ स्ट्रेचरपर सुगियाकेँ लऽ जा सीट माने दुजनिया चौकीपर सुता देलकनि। स्ट्रेचर राखि कम्पाउण्डर डाॅ. बनर्जीकेँ कहलकनि- ‘‘सब व्यवस्था कए देलिअनि।’’
डाॅ. बनर्जी आगू-आगू आ कम्पाउण्डर, ड्राइबर आ सोनेलाल पाछू-पाछू। सुगियाकेँ देखितहि डाॅक्टरकेँ रोग चिन्हा गेलनि। मुदा आरो मजबूतीक लेल सुगियाकेँ पूछए लगलखिन। हताश मन सोनेलालक। मूह सुखाएल। आखि नोराएल। बहीनक आखिसँ नोरक ठोप खसैत। डाॅ. बनर्जी कम्पाउण्डरकेँ सूइ लगबैले कहलखिन। कम्पाउण्डर सूइ अनै गेल। सोनेलाल डाॅ. बनर्जीकेँ पुछलखिन- ‘‘डागडर सहाएब, रोगीक दुख छुटतै की नै?’’
सोनेलालक प्रश्नड सुनि डाॅ. बनर्जीक हृदय पघलि गेलनि। उत्साह दैत सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘चौबीस घंटाक भीतर रोगी टहलै-बुलै लगतीह। अखन एकटा सुइया दैत छियनि। पाँच बजे तक सुतल रहती। उठेबनि नहि। अपने निन्न टुटतनि। निन्न टुटलापर कुड़रा-आचमन करा चाह बिस्कुट देबनि।’’
ताबे कम्पाउण्डर आबि सुगियाकेँ सूइ लगौलक। सूइ पड़ितहि सुगियाकेँ निन्न आबि गेलनि। डाॅ. बनर्जी सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘आब अहाँ सभ खाउ-पीबू।’’
डाॅक्टर चलि गेलाह। ड्राइवर सोनेलालकेँ बुझबै लगलखिन- ‘‘पानिक कल बगलेमे अछि। भानस करैले चुल्हियो अछिये। अपने भानस करब। बाहर चलू, दोकान देखा दै छी। अाइसँ बाहर नइ जाएब। लुच्चा लम्पट बेसी अछि। जेबीसँ पाइ निकालि लेत। तेँ जतबे काज हुअए ततबे पाइ मुट्ठीमे नेने जाएब आ सामान कीनि लेब। आब हम जाइ छी। ऐठाम कोनो चीजक डर नइ करब। सभ भार डाॅक्टर साहेबकेँ छनि।’’
पाँच बजितहि सुगिया आखि खोललक। सुगियाक लगेमे सोनेलालो आ बच्चोकेँ कोरामे नेने बहीनो बैसलि। आखि खोलितहि सुगिया सुतले सुतल बाजलि- ‘‘किछु खाइक मन होइ अए।’’
सुगियाक बात सुनितहि सोनेलालकेँ मन पड़ल जे डाॅक्टरो सहाएब कहने रहथि। उठि कऽ चाह-बिस्कुट आनि सुगिया लग रखलक। कलपर सँ लोटामे पानि आनि कऽ कुड़रा करै ले देलखिन। बैसले-बैसल सुगिया कुड़रा कए चाहेमे डुबा-डुबा बिस्कुट खेलनि। चाह-बिस्कुट खा सुगिया मूह पोछलक। सुगियाक मूह पोछितहि सोनेलाल पुछलक- ‘‘मन केहेन लगै अए।’’
- ‘‘कनी हल्लुक लगै अए।’’
सोनेलालो आ बहिनोक मनमे खुशी आएल। मने-मन बहीन भगवानकेँ कहै लगलनि जे हे भगवान कहुना भौजीकेँ नीक कए दिअनु।’’
सुगियाकेँ सुधार हुअए लगल। तेसर दिनसँ सुगिया बुलै-टहलै लगलीह। दू बेर दिनमे डाॅक्टरो साहेब आबि-आबि देखथि। सभ तरहक तरदुत सोनेलाल करैले हरदम तैयार।
दसम दिन सुगियाकेँ डाॅक्टर साहेब छुट्टी दए देलखिन। सोनेलाल कम्पाउण्डरसँ सभ हिसाब केलनि। जते हिसाब सोनेलालकेँ भेलनि तेहिसँ पाँच सए रुपैआ अधिक लऽ सोनेलाल डाॅक्टर साहेबक आगूमे रखि देलकनि। रुपैया गनि डाॅक्टर साहेब फजिलाहा रुपैया घुमबैत कहलखिन- ‘‘जोड़ैमे पाँच सौ बेसी आबि गेल। ई पाँचो सए रखि लिअ।’’
डाॅक्टर साहेबक बात सुनि सोनेलाल कहलकनि- ‘‘गनैमे गलती नइ भेल। पाँच सए अहाँकेँ खुशनामा दै छी।’’
खुशनामा सुनि डाॅ. बनर्जी गुम्म भऽ गेलाह। मनमे एलनि जे बेचाराक बगए-बानि कहैत अछि जे पैंच-उधार कए आएल होएत, तखन देखू उद्गार। हमरा कोन चीजक कमी अछि जे एहि बेचाराक फाजिल पाइ हम छूबै। मन पड़लनि, जमीनदारीक समएक पुनाह। जमीनदार सभ सालमे एक बेर पुनाह करैत छलाह। जमीनदारक कचहरीमे पुनाह होइत छलैक। पुनाह होइसँ पनरह दिन पहिने रैयत सभकेँ जानकारी दए देल जाइत छलैक। जमीनदार दिशिसँ मोतीचूरक लड्डू बनाओल जाइत छलैक। एक रुपैआमे एक लड्डू हिसाबसँ देल जाइत छलैक। रैयतोमे दू विचारक रैयत रहैत छल। एक तरहक ओ छल जकरा खाली अन्नेक आमदनी छलैक। ओहि तरहक रैयतक हालत कमजोर छलैक। मगर दोसर तरहक जे रैयत होइत छल ओकरा अन्नक संग-संग नगदो आमदनी छलैक। जेना कोना-कोनो जातिकेँ दूध-दहीक, तँ कोनो-कोनो जातिकेँ तीमन-तरकारीक। कोनो जातिकेँ पानक तँ कोनो-जातिकेँ छोट-छोट कोल्हु इत्यादि। पुनाह धर्मसँ जोड़ल शब्द अछि। धार्मिक भावना सबहक मनमे रहैत छलैक। तेँ, एक-दोसरकेँ निच्चा देखबैक लेल मने-मन प्रतियोगिता करैत छल। एकटा लड्डूक दाम मुश्किलसँ दू पाइ होइत छल होएतैक। किएक तँ आठ अने चिन्नी आ रुपैआमे चारि सेर खेरही वा आन कोनो अन्न, जेकर लड्डू बनैत छलैक। प्रतियोगिता दू तरहक होइत छलैक। पहिल-व्यक्ति विशषमे आ दोसर जाति-विशेषमे। लोक खुब खुशी रहैत छलै। गामे-गाम मलगुजारीसँ बेसी, पुनाहमे जमीनदार रुपैआ असुल कए लैत छलाह। जहि समाजमे मलगुजारीक चलैत लोकक खेत निलाम होइत छलैक, ओहि समाजमे पुनाहक नामपर लूट सेहो चलैत छलैक। वैह बात डाॅ. बनर्जीकेँ मन पड़लनि। हँसैत डाॅ. बनर्जी सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘अहाँ, खुशी भए एहिठामसँ जा रहल छी, यैह हमर खुशनामा भेल। भगवान करथि परिवार फड़ै-फुलाए।’’
तीनू गोटे गामक रस्ता धेलनि। बच्चाकेँ सुगिया कोरामे लेने आ बहीन बरतनक मोटरी माथपर लेने। खालिये देहे सोनेलाल दरभंगा स्टेशन आबि गाड़ी पकड़लनि।
अपना स्टेशनमे उतरि तीनू हँसी-खुशीसँ गाम दिसक रस्ता धेलक। रेलवे कम्पाउण्डसँ निकलि सुगिया सोनेलालकेँ कहलनि- ‘‘जाइ काल पचास मुरते सौधक भनडारा कबुला केने रही। कबुला-पाती उधार नइ राखक चाही। काल्हि खन ओहो कबुला पुराइये लेब।’’
सोनेलालोक मन खुशी रहनि। चाउर-दालि घरेमे रहनि। रुपैयो किछु उगड़ले रहनि। मुस्कुराइत सुगियाकेँ कहलखिन- ‘‘काल्हि तँ भनडारा नहि सम्हरत। दही पौरैक अछि, हाटसँ तीमन-तरकारी, नोन-तेल आनै पड़त। चारि-पाँच दिनमे भनडारा कए लेब। अखन दाइयो आएले अछि।’’
दाइक नाम सुनि बहीन बाजलि- ‘‘भैया, तेहने गड़ूमे पड़ि गेल छेलह तेँ अपन सभ कुछ छोड़िकेँ छिअह। तूँ नै बुझै छहक जे हमरो कियो दोसर करताइत नै अछि । काल्हि हम चलि जेबह।’’
सोनेलालक मन गद्-गद्। जहिना चुल्हिपर चढ़ाओल पानि देल बरतनमे निच्चासँ आगिक ताव लगितहि निचला पानि गर्म भऽ उपर मुहे उठैत, तहिना सोनेलालक मन खुशीसँ नचैत रहनि। स्टेशनसँ थोड़ेके दूर एलापर सोनेलाल कहलक- ‘‘अहाँ दुनू गोरे अइठाम बैसू। लगले हम चीज-बौस किनने अबै छी।’’
सुगियो आ बहिनो, रस्ते कातमे आमक गाछक निच्चामे बैसलीह। सोनेलाल स्टेशन दिशि बिदा भेल। स्टेशने कातमे आठ-दसटा दोकान छलैक। एकटा दोकान माछक, दोसर मुरगी आ अण्डाक, एकटा सुधा दूधक, एकटा चाहक, एकटा पानक आ पान-छौ टा तरकारीक। सोनेलालक मनमे एलै जे पान-सात रंगक तरकारियो, दूधो आ राहड़िक दालियो कीनिये लेब। किएक तँ छह माससँ ने भरि पेट अन्न खेलहुँ आ ने कहियो मन असथिर रहल। तेँ आइ राति अपनो सभ परिवार आ फुद्दियो दुनू भाँइकेँ न्योत दए खुआ देबनि। रेलवेक कम्पाउण्डमे जे तरकारी, दूध, माछ इत्यादिक दोकान छलैक ओ स्थायी नहि। साधारण छपड़ी टाँगि-टाँगि दोकान चलबैत अछि। क्यो दोकानदार रेलवेसँ दोकानक पट्टो नहि बनौने। स्टेशनेक स्टाफ, दोकानदारकेँ दोकान लगबै देने अछि, जहिसँ बट्टीक बदला सभकेँ परिवार जोकर तरकारी सभ दिन भए जाइत छलैक। जहिया कहियो रेलवेक अफसरक आगमन होइत छलैक, तहिसँ पहिनहि स्टाफ दोकानदार सभकेँ कहि दैत छलैक। अपन-अपन छपड़ी सभ हटा लैत छल।
दोकान आ रेलवेक बीच मोड़पर ठाढ़ भए सोनेलाल सोचै लगल जे दोकानमे जे राहड़िक दालि बिकाइत ओ अरबा रहैत अछि। तेँ दालिकेँ उलबै पड़त। घरमे तँ लोक पहिनहि राहड़ि उला लैत अछि। बिनु उलौल राहड़िक दालि तँ खेसारिये जेकाँ होइत अछि। मुदा उलौलाक बाद आमील देल राहड़िक दालि तँ दालिये होइत। सभसँ नीक। लटखेना दोकान पहुँचि सोनेलाल एक किलो राहड़िक दालि, आधा किलो चिन्नी किनलक। दुनूक दाम दए तरकारीबला लग आबि सात-आठ रंगक तरकारी किनलक। तरै जोकर गोलका भाँटा-भाँटिन गंगाकातक बड़का परोड़, हैदराबादी ओल टेबि कऽ कीनलक। दू किलो सुधा दूध सेहो लेलक। सभ समानकेँ गमछामे बान्हि, हाथमे लटकौने घुरि कऽ सुगिया लग आएल। गमछामे बान्हल समान देखि बहीन पुछलक- ‘‘भैया, की सभ कीनि लेलहक?’’
बहीनक मनमे भेलनि जे धिया-पूता लेल भरिसक लाइ-मुरही कीनि लेलनि। मुदा मोटरी नमहर, तेँ पुछलकनि। बहीनक बात सुनि सोनेलाल हँसैत बाजल- ‘‘दाइ, खाइ-पीबैक समान सभ किनलहुँ। आइ सभ परानी मिलि नीक-निकुत खाएब। बेचारा फुदियो, नोकर जेकाँ राति कऽ घरक ओगरबाही करैत हएत। तेँ ओकरो दुनू भाइकेँ नोत दए खुआ देबइ। तेँ तीमन-तरकारी, दूध आ दालि कीनि लेलहुँ। भानस करै लेल तोहूँ तीनि गोटे- बहीन, स्त्री आ सारि- छेबे करह। एक्कोदिन तँ तोरो सभक मेजमानी होअए। दाइ, जते अनका भाइयोसँ सुख नहि होइत छै, तहिसँ बेसी तोरासँ भेल। तोहर उपकार जिनगीमे नहि बिसरब। भगवान तोरा सन बहीन सभकेँ देथुन।’’
सोनेलालक बात सुनि गद्-गद् होइत बहीन उत्तर देलकनि- ‘‘भैया, हम अपन काज केलहुँ। तोहर उपकार की केलियह। एहेन बेरपर जे तोरा नै देखितियह तँ हमरा सन बहीन ककरो रहिये कऽ की हेतै।’’
बहीनक बात सुनि सुगिया पतिकेँ कहलनि- ‘‘दाइ तँ औगुताइ छथि। कहै छथि जे काल्हि भोरे चलि जाएब। एकोटा धराउ घरमे साड़ियो ने अछि जे देबनि। बिना साड़ी देने कोना जाए देबनि। केहेन हएत ?’’
भौजाइक बात सुनि मुस्की दैत ननदि बाजलि- ‘‘भौजी, चारु बेटा-बेटीक विअाहमे तँ हमरा चारि जोड़ साड़ी रखले अछि। मुदा एहेन बेरिमे साड़ीक कोन काज छै। अपने तँ भैया पैंच-उधार लऽ कऽ काज चलौलक अछि। तइपर सँ हमरोले करजा करत। हमरा जँ दियौ चाहत तँ हम नै लेबै।’’
घरपर अबितहि परिवारसँ गाम धरि खुशीक बर्खा बरिसए लगल। तीनू बेटी सुगियाक गरदनिमे लटपटा गेल। बहिन -सुगिया- क बच्चाकेँ कोरामे लए मूह चुमै लगल। जहिना जाड़क मासमे गाछ-बिरीछ पालाक मारिसँ ठिठुर जाइत, मुदा गरमीक धबितहि नव रुप धारण करैत अछि, तहिना सभकेँ भेल। छह मासक तबाही, सोग, निराश सोनेलालकेँ छोड़ि पड़ा गेल। पास-परोसक जनिजाति सभ आबि-आबि सुगियाकेँ देखबो करैत आ बीमारीक समएक खिस्सो सुनैत छलीह। एक्के-दुइये सौसेँ अंगना धियो पूतोक आ जनिजातियोसँ लोकक भीड़ हटल। तीनू गोटे भानसक जोगारमे लागि गेलीह। कते दिनसँ सोनेलाल भरि इच्छा् नहाएल नहि छल। साबुन लए कऽ नहाएले गेल।
भानस भेलैक। सभ कियो भरि मन खेलनि। खाइते सभकँे ओंघी अबै लगलनि। सभ जा-जा कऽ सुति रहलाह।
पत्नीक संग सोनेलालकेँ लहेरियासराय जैतहि गाममे चर्च चलै लगल छल। एक दिशि जनिजाति सभ सोनेलालक बाहवाही करैत छलीह तँ दोसर दिशि मर्दा-मर्दीक बीच इलाजक खर्चक चर्च चलै लगल। सौसेँ गाम दुनू परानी सोनेलालेक चर्च चलैत रहए। सबेरे स्कूलमे छुट्टी दए खसल मने हीरानन्द चलि ऐलाह। सबेरे हीरानन्दकेँ आएल देखि रमाकान्त पुछलखिन- ‘‘सबेरे स्कूल बन्न कए देलिऐक?’’
ओना रमाकान्तोकेँ सोनेलालक संबंधमे बुझल छलनि मुदा जहि गंभीरतासँ हीरानन्द सोचैत रहथि, ओहि गंभीरतासँ ओ नहि सोचैत छलाह। तेँ मनमे कोनो तेहेन विचार नहि छलनि। हीरानन्द उत्तर देलखिन- ‘‘बच्चा सभकेँ पढ़बैमे मोन नहि लगैत छल, तेँ छुट्टी दए देलिऐक।’’
“किअए नहि पढ़बैमे मन लगैत छल।’’
चिन्तित भए हीरानन्द कहलखिन- ‘‘एक तँ बाढ़िक मारल बेचारा सोनेलाल ताहिपर सँ बीमारीक। तेहेन चपेटमे पड़ि गेला जे कोनो कर्म बाकी नहि छन्हि। यैह बात मनमे घुरिआए लगल। पढ़बैमे एक्को रत्ती नीके नहि लगैत छलै।’’
सोनेलालक बात सुनितहि रमाकान्तक मन मौलाए लगलनि। मौलाइत-मौलाइत जहिना हीरानन्दक मन रहनि तहिना भए गेलनि। पएरमे ठेस लगलापर जहिना केयो मूह भरे खसैत आ छातीमे चोट लगैत अछि, तहिना रमाकान्तक हृदयमे मनक चोट लगलासँ भेलनि। मुदा जोरसँ नहि कुहरि चुप्पेचाप कुहरै लगलथि। मनमे एलनि, जहि गाम मे चारि-चारिटा डाॅक्टर छथि ओहि गामक लोक रोगसँ कुहरै, कते दुखक बात छी। ऐहने डाॅक्टरकेँ लोक भगवान बुझि पुजनि कहाँ धरि उचित छी। जाहि पढ़ल-लिखल लोककेँ अपना गामसँ स्नेह नहि, अपन कुटुम्ब परिवार सर-समाजसँ स्नेह नहि छन्हि, अपने सुख भोगक पाछू बेहाल छथि। हुनका अनेरे दाइ-माए किअए छठियार दिन छातीमे लगा जीबैक असीरवाद देलकनि। फेर मोनमे एलनि, जहिना माल-जालकेँ डकहा बीमारी होइ छै, तहिना तँ मनुक्खोकेँ चटपटिया बीमारी होइ छैक। जे छनमे छनाँक कए दैत छैक। चारिटा बेटा-पुतोहू डाॅक्टर हमरे छथि जँ कहीं अपने आकि महेन्द्रक माइयेकेँ ओएह चटपटिया बीमारी भए जाइन तँ की करताह ओ सभ हमरा।
मन घोर-घोर, बाके बन्न भए गेलनि।
तीन दिनक बाद सोनेलाल भनडाराक कार्यक्रम बनौलनि। खाइ-पीबैक सभ ओरियान दिल खोलि कऽ केलनि। तुलसीफुलक अरबा चाउर, राहड़िक दालि, एगारहटा तरकारी, दही-चिन्नीक नीक व्यवस्था केलनि।
गाममे दू पंथक साधू। पहिल पंथक महंथ रमापति दास आ दोसर पंथक गंगा दास। राम-जानकीक मंदिर रमापति दास बनौने छथि। दुनू साँझ पूजा करैत छथि। मुदा गंगादासकेँ किछु नहि। सँवकान दुनू गोटेकेँ छन्हि। आन-आन गाममे सेहो दुनू गोटेकेँ सँवक छन्हि।
सोनेलालक मनमे, छल-प्रपंचक मिसिओ भरि लसि नहि, तेँ पच्चीस मुरते साधुक दल रमापति दासकेँ देलकनि आ पच्चीस मुरतेक दल गंगादासकेँ। दल देलाक बाद सोनेलाल दुआर-दरबज्जा चिक्कन-चुनमुन करै लगलाह। भानस करैक बरतन सभ माँजि-मूजि तैयार केलनि। खाइक लेल केराक पात काटि-धो कऽ सेहो रखलनि।
एक गाममे रहितहुँ दुनू पंथक बीच अकास-पतालक अंतर छलनि। पहिल पंथमे ऊँच जातिक बोलबाला जखनिकि दोसर पंथमे ऊँच जाति कम मुदा निम्न जाति बेसी। छूत-अछूतक कोनो भेद नहि। दिनुके भनडारा।
दोसर पंथक साधु सभ सबेरे आबि, चरण पखारि भजन शुरु केलनि। भजन शुरु होइतहि टोल-परोसक जनिजातियो आ धियो-पूता आबि कऽ सौँसे खरिहान भरि देलकनि। खरिहानेमे बैसारो केने रहथि। तीनटा भजन समाप्त भेलाक बाद रमापति दास चेलाक संग पहुँचलथि। संगमे सभ साधु रहथि। फरिक्केसँ दोसर पंथक साधु देखि रमापतिदास मने-मन जरै लगलथि। मुदा क्रोधकेँ दाबि दरबज्जापर पहुँचलथि। दरबज्जापर अबितहि रमापतिदास सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘हमरा सबहक बैसार फुटमे करु।’’
रमापतिदासकेँ प्रणाम कऽ सोनेलाल दलान दिशि इशारा दैत कहलकनि- ‘‘अपने सभ दरबज्जेपर बैसियौक।’’
सोनेलालक विचार सुनि रमापति दास मने-मन सोचै लगलथि जे जँ अखन दोसर ठाम बैसार बनबैले कहबैक तँ धड़फरमे संभव नहि होएत। जँ झगड़ा करै छी तँ ककरा सँ करु। बेचारा घरबारी की करत? घरवारीक लेल तँ जहिना हम दल देलाक बाद एलहुँ तहिना तँ ओहो सभ छथि। तेँ जेहने हम सभ तेहने ओहो सभ। अगर ओही साधु सभसँ कहा-कही करैत छी तँ दू धार्मिक पंथक बीच विवाद होएत। मुदा एहिठाम तँ भनडारा छी, पंथक नीक-अधलाक विवेचनक मंच नहि ! इहो करब उचित नहि। जँ अपनाकेँ उन्नैस मानि लैत छी तँ कायरता होएत। विचित्र स्थितिमे रमापतिदास पड़ि गेलाह। गुम्म-सुम्म भेल रमाापतिदास दरबज्जा आ खरिहानक बीच खुट्टा-ठाढ़। ने डेग आगू बढ़ैन आ ने पाछु होइन। जत्ते गोटे हमरा संग आएल छथि जँ हुनका सभसँ विचार पुछबनि आ ओ लोकनि हमरा मनक विपरीत विचार दैथि तखन की करब? आइ धरि तँ सेहो नहि केलहुँ। करब उचितो नहि। गुरु-चेलाक अन्तर समाप्त भऽ जाएत। रमापतिदासक मन औनाए लगलनि। चाइनपर पसीनाक रुप चमकलनि। ताबे कानपर रखनिहार हारमुनियमबलाक कान्ह अंगिया गेलैक, ओ आगू बढ़ि ओसारक चौकी पर हारमुनियम रखि देलक। हारमुनियम रखैत देखि ढोलकियो ढोलक रखि देलक। एहिना एका-एकी सभ अपन-अपन लोटा-गिलास धरि रखि देलक। मुदा बैसल कियो नहि। तकर कारण बिना चरण पखरबौने बैसब कोना? आ जाबे गुरु महाराज नहि बैसताह ताबे हम सभ कोना बैसब। सभकेँ अपन-अपन सामान -बाजा, लोटा, गिलास- रखैत देखि आ अपन गिलास-कमंडलकेँ सेहो राखल देखलथि। रमापतिदासकेँ गर भेटिलनि। रमापतिदास विक्षिप्त मने कहलखिन- ‘‘जखन सबहक मन अछि तखन किएक ने दरबज्जेपर बैसल जाए। घरवारियो तँ आदर करिते छथि।’’
एक दिशि रमापतिदासकेँ मन जड़ैत, दोसर ईहो खुशी जे स्वागत चरण पखरबा संग घरबारी हमरे बेसी महत्व देलनि। सभ कियो चरण पखारि बैसए लगलाह।
बिढ़नी जेकाँ सुगिया नचैत छलीह। कखनो घर जा दही देखि अबैत, जे कहीं बिलाइ ने आबि कऽ खा लिअए। तँ लगले ओसारपर राखल सामान आङन -चाउर-दालि, तरकारी- केँ देखैत जे कौआ ने आबि कऽ छुता दिअए। फेर लगले अंगनामे राखल टकुना, कराह, बालटीनकेँ देखैत जे धिया-पूता ने गंदा कए दिअए। तँ लगले आबि दलानक पाछूमे ठाढ़ भऽ टाटक भुरकी देने देखैत, जे लोकसँ भरल दरबज्जा-खरिहान अछि, कहीं मारिये ने शुरुह भए जाए। सुगियाक मनमे अहलदिल्ली पैसि गेलनि। मगज परक पसीना केशक तर देने गरदनिपर होइत गंजी तर देने सोनेलालक धोती भिजबैत रहैक।
भजन सुननिहारमे धिया-पूतासँ लऽ कऽ स्त्री-पुरुष धरि। मोतियाक माए पचास बर्खक बूढ़ि। भजन बन्न भेल देखि बुचाइदासकेँ कहलखिन- ‘‘हे यौ बुचाइ दास, बिना भजन गौने जे पंगहति करबै तँ पाप नै लिखत?’’
मोतिया माइयक कड़ूआएल बात सुनि बुचाइ दास उत्तर देलखिन- ‘‘बड़ी काल गाजा पीना भऽ गेल अछि, तेँ कने पीबि लै छी। तखन नाचो देखा देब आ कबीर सहाएब की कहलखिन सेहो सुना देब। कनिये काल छुट्टी दिअ। होअए हौ रघूदास, जलदी गुल दहक।’’
बिना साज बजनहि घुन-घुना कऽ कहै लगलखिन- ‘‘हटल रहियौ सन्तो बिलइया मारे मटकी।’’
बुचाइ दासक पाँती आ मूहक चमकी देखि धियो-पूतो आ जनिजातियो, खापरिमे देल जनेरक लाबा जहिना भर-भराकेँ फुटैत अछि, तहिना सभ हँसै लगलाह।
दलानोमे आ खरियानोमे भजन शुरु भेल। दोसर पंथक बैसारमे ढोलक, झालि, खजुरीक संग थोपड़ियो बजै लगल। मुदा पहिल पंथ दिशि पखाउज, झालर, हारमुनियाक संग सितार सेहो बजै लगल। एक सूर एक लय आ एक तालमे भजन शुरु भेल- ‘‘केशव! कही न जाए का कहिये!’’ मुदा दोसर पंथ दिशि भजन तते जोरसँ होइत जे पहिल पंथक भजन सुनाइये ने पड़ैत छल। महंथ रमापतिदास बाहर निकलि घुमबो करैत आ भजनो सुनैत रहथि। रमाओत भजनक अवाज दलानक घरसँ बाहर निकलबे नहि करैत छल। रमापति दास तामसँ माहुर होइत रहथि। मने-मन भनभनेबो करैत रहथि। सोनेलालकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘ई कोन बखेरा ठाढ़ कए देलिऐक?’’
थरथराइत दुनू हाथ जोड़ि सोनेलाल उत्तर देलखिन- ‘‘सरकार, हम अनाड़ी छी। नहि बुझलिऐक जे एना होइ छै। जे भऽ गेलैक से तँ भइये गेलैक। अपने तमसाइयौ नहि। जँ कनी गलतिये भऽ गेलै तँ माफ कऽ दियौक। अपने समुद्र छिऐक। नीक-अधला पचबैक सामर्थ्य अछि। अखन धरि भोजन बनबैक अहरियो नहि खुनल गेल अछि, आदेश दियौक।’’
तरंगि कऽ रमापतिदास कहलखिन- ‘‘हमर जते साधु छथि ओ फुटेमे अहरियो खुनता आ भोजनो बनौताह। तेँ बरतनसँ ल कऽ चाउर-दालि, तरकारी धरि सभ किछु हमरा फुटा दिअ।’’
‘बड़बढ़िया’ कहि सोनेलाल सभ किछु दू भाग कऽ देलकनि। चारि-चारि गोटे भानसक जोगारमे लगि गेलाह। दूटा अहरी, हटि-हटि कऽ खुनल गेल। सोनेलाल सभ बरतनो आ चाउरो-दालि आनि दुनू अहरी लग रखि देलकनि।
दलानक भजन बन्न भऽ गेल। मुदा खरिहानक भजन चलिते रहल। बुचाइ दास अगुआ मुरते। भजनिया सभ गोल-मोल भेल बैसल, तेँ बीचमे जगह खाली रहए। ओहि खाली जगहमे बुचाइ दास ठाढ़ भऽ आगू-आगू भजनक पाँतिओ गबैत आ नचबो करैत। बीच-बीचमे पाँतीक अरथो कहैत रहथि।
रमापतिदास सोनेलालकेँ हाथक इशारासँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘बड्ड अनघोल होइत अछि। भजन बन्न करबा दियौ।’’
बुचाइ दास लग आबि सोनेलाल बाजल- ‘‘गोसाइ सहाएब, भजन बन्न कऽ दियौ। महंथजीकेँ तकलीफ होइ छनि।’’
सोनेलालक आग्रह सुनितहि, के छोट के पैघ सभ एक्के बात कहै लगलनि जे हम सभ बिना भजन गौने पंगहति नहि करब।
सोनेलाल अबाक भऽ गेलाह। सौँँसे देह सोनेलालक कपैत। मुदा की करैत ? क्यो तँ बिन दले नहि आएल छलाह। तेँ सभ साधुक महत्व बराबरि बुझथि।
अंगनाक टाट लग ठाढ़ सुगिया मने-मन सोचैत जे जँ कहीं सौध सभ अपनामे झगड़ा कए बिना भोजन केनहि चलि जेताह, तखन तँ हमर कबुला पूरा नइ हएत। कबुला नइ भेने दुखो घुरि कऽ आबि सकैत अछि। आब जँ दुखित पड़ब तँ जीब की मरब, तेकर कोन ठेकान। हे भगवान सौध सभकेँ मति बदलि दियौन जे असथिर भए जेताह। मने-मन सौध-सौध जपै लगलीह।
दू बजैत-बजैत निर्गुण पंथ दिशि भोजन बनि कऽ तैयार भए गेल। भोजन तैयार होइतहि गंगादास सोनेलालकेँ कहलखिन- ‘‘भोजन बनि गेल तँ आब भोजनक जगह तैयार करु।’’
गंगादासक आदति सुनि सोनेलालक करेज आरो थरथर कपै लगल। ई केहेन हएत। एक दिशि साधु सभ भोजन करताह आ दोसर दिशि बनितहि अछि। एक तँ जखनेसँ सौध सभ दरबज्जापर ऐला तखनेसँ झंझट होइ अए। कहुना-कहुना अखैन धरि पार लगल, मगर आब आखरी बेरमे ने कहीं झगड़ा फँसि जाइन। बाढ़नि आनै लाथे सोनेलाल आंगन गेल। आंगनमे जा बाढ़नि ताकै लाथे बैसि रहल। बइसैक कारण रहैक समए लगाएब। कनिये कालक बाद सुनलक जे हिनको सबहक भोजन तैयार भऽ गेलनि। बाढ़नि नेनहि सोनेलाल अंगनासँ निकलि खरिहान आबि बाहरै लगल। खरिहान बहारि सोनेलाल पानिक छिच्चा देलक। छिच्चा दऽ खरही बिछौलक। खरही बिछबितहि साधु सभ हरे-हरे कऽ उठि खरहीपर बैसलाह। खरहीपर बैसितहि पात उठल। पत्ताक बँटवारा शुरु होइतहि रमापति दास अपन सत्तरिमे घुमि-घुमि जए-जएकार करै लगलाह। दोसर दिशि भजन मंगल शुरु भेल।
सभ साधु भोजन केलनि। भोजन कए सभ उठलाह। दोसर पंथ दिसक सत्तरिमे एक्कोटा अन्न वा कोनो वस्तु पातपर छुतल नहि। जखनिकि दोसर सत्तरिमे बरिआतीक भोजन जेकाँ छुतल। सभक उठितहि चारुभरसँ कौआ-कुकुड़ आबि-आबि खाए लगल।
भोजन कए दोसर पंथवला सभ ढोलक-झालि लए बिदा हुअए लगल। मुदा रमौत दिशि सँ दछिनाक तगेदा भेल। अनाड़ी सोनेलाल सिक्कीक चंगेरीमे पान-सुपारी लए बीचमे ठाढ़ रहथि। हाथक इशारासँ रमापति दास सोनेलालकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘आब हम सभ चलब तेँ झब दे दछिना लाउ।’’
सोनेलाल- ‘‘कोना की दछिना.....।’’
रमापतिदास- ‘‘एक सए एकाओन, स्थानक चढ़ौआ एक सए एक, हमर साधु सभकेँ एकाओन-एकाओन आ भोजन बनौनिहारकेँ एकासी-एकासी दऽ दियौन।’’
भोजन बनौनिहारक आ महंथजीक दछिना तँ सोनेलालकेँ जँचल, मुदा.....।
गंगादास आ बुचाइ दास सेहो सभ देखैत आ सुनैत। आँखिक इशारासँ गंगादासकेँ बुचाइ दास कहलखिन- ‘‘अधिकार अधिकार छी। जत्ते दछिना रमापति दासकेँ हेतनि तहिसँ एक्को पाइ कम हमहूँ सभ नहि लेब।’’
हिसाब जोड़ि सोनेलाल अंगनासँ रुपैआ आनि आनि रमापति दासक हाथमे दऽ देलकनि। रुपैआ ठीकसँ गनि रमापति दास सोेनेलालकेँ असिरबाद दैत उठि कऽ बिदा भेलाह। रमापति दासक पाछू-पाछू सोनेलालो अरिआतने किछु दूर धरि गेल। फेर घुरि कऽ आबि गंगादास लग ठाढ़ भऽ पुछलकनि- ‘‘गोसाइ सहाएब, अहाँकेँ दछिना कत्ते हएत?’’
सोनेलालक तड़पैत मोनकेँ गंगादास आँकि लेलखिन। दयासँ हृदय बरफसँ पानि बनै लगलनि। मूहसँ बोली नहि फुटनि। सोनेलालकेँ की कहथिन से फुरबे नहि करनि। बुचाइ दास दिशि देखि पुछलखिन- ‘‘की यौ बुचाइ दास, अहूँ तँ अगुआ मुरते छी, बिना अहाँ सबहक विचार लेने हम कोना जबाब देबनि। किएक तँ ऐठाम तीनटा प्रश्न अछि। पहिल दू पंथक अधिकारक सवाल अछि से दोसर पंथकेँ निच्चा मुहे जाएब हएत। आ तेसर, सोनेलाल कबुला पुरबैक लेल भनडारा केलनि। एक तँ बीमारीक फेरीमे पड़ि पस्त भेल छथि, तइपर सँ हमहूँ सभ भार दिअनि, ई हमरा नीक नहि बुझि पड़ैत अछि।’’
गंगादासक प्रश्नइ सुनि दोसर पंथक सभ साधु गुम्म भऽ मने-मन सोचै लगलाह जे की कएल जाए ? मुदा सोचबोक रस्ता अलग-अलग होइत अछि। एक्के प्रश्नशक उत्तर पेबाक लेल वैरागीक रस्ता अलग होइत अछि। जबनिकि रागीक विचार अलग। भलेही दुनू गोटे एक्के रंग विद्वान किएक ने होथि। ततबे नहि ई आध्यात्मिक चिन्तक आ भौतिकवादी चिन्तकक बीच सेहो होइत अछि। जबनिकि निष्पक्ष चिन्तकक अलग होइत अछि। पंथक बीच बँटल समाजमे निष्पक्ष चिन्तक होएब कठिन अछि। किएक तँ पंथ खाली वैचारिकते टा नहि होइत, व्यवहारिक सेहो होइत अछि। जे परिवार आ समाजसँ सेहो जोड़ल रहैत अछि। जहिसँ जिनगीक गाड़ी चलैत अछि।
कोनो विषय पर गंभीर चिन्तन करैक लेल एकटा आरो भारी उलझन अछि। ओ अछि भुखल आ पेट भरल शरीरक मन। मनकेँ बहुत अधिक प्रभाबित करैत अछि शरीरक इन्द्रिय। इन्द्रियकेँ संचालित करैत अछि शरीरक उर्जा। उर्जाक निर्माण करैत अछि उर्जा पैदा करैक वस्तु। ओ वस्तु अबैत भोजनसँ। मुदा सिर्फ भोजने टासँ उर्जा पैदा नहि होइत? उर्जा पैदा करैक दोसरो वस्तु अछि, जेकर भोजन शरीरक भोजनसँ अलगो होइत अछि।
बीच-बचाव करैत बुचाइ दास गंगादासकेँ विचार देलखिन- ‘‘गोसाइ सहाएब, हमहूँ सभ अपना धरमक सिपाही छी, तेँ मरैत दम तक पाछु हटब धोखाबाजी हएत मुदा पवित्र धरमक रक्षा करब सेहो हमरे सभपर अछि। तेँ सोनेलाल जते रुपैआ रमापति दासकेँ देलखिन, तते हमरो सभकेँ दऽ दौथु। छ मासक दुख-तकलीफ हम सभ सोनेलालक सुनबे केलहुँ तेँ हुनकर दुखमे हमहूँ सभ शामिल भऽ रुपैआ घुमा दिअनि।’’ सैह भेल। सभ कियो हँसी-खुशीसँ भनडारा सम्पन्न कए जए-जएकार करैत बिदा भेलाह।





मद्रास स्टेशन गाड़ी पहुँचतहि रमाकान्त नमहर साँस छोड़लनि। दू राति तीनि दिनसँ गाड़ीमे बैसल-बैसल रमाकान्त, पत्नी श्यामा आ नोकर जुगेसर तीनू गोटेक देह अकड़ि गेल छलनि। गाड़ीक रुकितहि रमाकान्त हुलकी मारि प्लेटफार्म दिस तकलनि तँ दोसरि-तेसरि लाइनपर गाड़िये सभकेँ ठाढ़ भेल देखलखिन। अपना सबहक स्टेशन जेकाँ नहि जे कखनो काल कऽ गाड़िओ अबैत आ भीड़-भाड़ नहि रहने पुलोक जरुरत नहि पड़ैत। सगतरि रस्ते। जेमहर मन हुअए तेमहर बिदा भऽ जाउ। गाड़ीयो छोट आ लाइनो तहिना। गाड़ीमे रमाकान्तकेँ अनभुआर जेकाँ नहि बुझि पड़लनि किएक तँ बिहारेक गाड़ी आ बिहारेक पसिन्जरो रहए।
गाड़ीसँ यात्री सभ उतड़ै लगलाह। तीनू गोटे रमाकान्तो अपन झोरा-मोटरीक संग उतरि, थोड़े आगू पुलपर चढ़ै लगलाह। पुलपर लोकक करमान लागल मुदा अपना सभ स्टेरशन जेकाँ ऐंड़ी-दौड़ी नहि लगैत। जकरा हियासिकेँ रमाकान्त अपनो चेत गेला आ श्यामो-जुगेसरकेँ कहि देलखिन। अखन धरि स्टेेशनमे दुनू कात गाड़िये देखथिन मुदा पुलपर जना-जना उपर चढ़ैत जाइत छलाह, तेना-तेना आनो-आनो चीज सभ देखै लगलखिन। पुलक सीढ़ीपर चलैत-चलैत श्यामो आ रमाकान्तोक जांघ चढ़ि गेलनि। पुलक ऊपर पहुँचतहि रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगे, मोटरी कतबाहिमे राखि दहक आ कने तमाकू लगबह। ताबे हमहूँ कनी बैसि लइ छी। चलैत-चलैत जांघ चढ़ि गेल।’’
जुगेसर मोटरी भुइयेँमे रखि तमाकुल चुनबै लगल। गाड़ीक जते चिन्हार पसिन्जर रहनि, सभ हरा गेलनि। नव-नव लोक पुलोपर आ निच्चोमे देखए लगलखिन। खाली लोकेटा नव नहि, ओकर पहिरेबो आ बोलियो। तमाकुल खा झोरा-मोटरी उठा तीनू गोटे पुल परसँ उतरि हियाबै लगलथि जे ककरोसँ पूछि लियनि। मुदा ककरो बाजब बुझबे नहि करथि। रमाकान्तो लोक सभकेँ देखैत आ लोको सभ रमाकान्तकेँ देखनि। तमाश दुनू बनल रहथि। रमाकान्त आ जुगेसरक धोती पहिरब देखि ओहिठामक लोक निङहारि-निङहारि देखैत रहथि आ रमाकान्तो तीनू गोटे ओहिठामक मरदो आ मौगियोक कपड़ा पहिरब देखि मने-मन हँसबो करथि। अनुभवी लोक सभ तँ बुझि जाइत छलाह जे बिहारी छथि। मुदा जकरा नहि बुझल छलैक ओ सभ ठाढ़ भऽ भऽ तजबीज करनि। एक जेर मौगी रस्ता धेने गप-सप करैत जाइत छलीह, ओ सभ अपने सभक मर्द जेकाँ ढेका खोंसने। मौगी सभक ढेका देखि श्यामा मुस्की दैत रमाकान्तकेँ कहलखिन- ‘‘देखियौ एहिठामक मौगी सभकेँ ढेका खोसने।’’
श्यामाक बात सुनि रमाकान्त हँसलनि मुदा किछु बजलथि नहि। रमाकान्त आँखि उठा-उठा चारु दिशि ताकि मने-मन सोचैत जे वाह रे एहिठामक सरकार। कते सुन्दर आ चिक्कन-चुनमुन बनौने अछि। कतौ बैसि जाउ। कतौ सुति रहू। सरकार बनौने अछि अपना सभ दिस, कोनो स्टेआशन एहेन नहि अछि जाहि ठाम भरि ठेहुन गंदगी नहि रहैत होअए। प्लेटफारमेपर केराक खोंइचा, पानक पीक, चिनिया बदामक खोंइचा, कागजक टुकड़ी, रंग-बिरंगक गुटखा सभक पन्नी छिड़ियाएल रहैत अछि। ततबे नहि ! जेरक-जेर भिखमंगा, पौकेटमार, उचक्का रेलवे स्टेड़शनसँ लऽ कऽ बस स्टेण्ड धरि पसरल रहैत अछि। मुदा एहिठाम तँ एक्कोटा नजरिये नहि पड़ैत अछि।
गाड़ीक झमारसँ तीनू गोटेक देह भसिआइत छलनि। मुदा की करितथि। जुगेसर तमाकुल चुनबै लगल। मने-मन रमाकान्त सोचथि जे बड़का फेरामे पड़ि गेल छी। की करब? मुदा किछु फुरबे नहि करैत छलनि। बड़ी काल धरि उगैत-डूबैत रहलाह। जहि गाड़ीसँ गेल रहथि ओहि गाड़ीक भीड़ छँटल। लोक पतराएल। तहि बीच एक गोटे मोटर साइकिलसँ आबि रमाकान्तेक आगूमे गाड़ी लगौलक। रमाकान्त ओहि आदमी दिशि तकै लगलथि आ ओहो आदमी रमाकान्त दिस तकै लगलनि। जेना नजरियेसँ दुनू गोटेक बीच चिन्हा-परिचय भऽ गेल होनि। रमाकान्त उठि कऽ ओहि आदमी लग जा, जेबीसँ पुरजी निकालि देखै देलखिन। पुरजीमे पता लिखल छलनि। पुरजी देखि ओ आदमी एकटा टेम्पूबलाकेँ हाथक इशारासँ सोर पाड़लनि। टेम्पूबलाक अबिते पता बता लए जाएले कहलखिन। तीनू गोटे टेम्पूमे बैसि बिदा भेलाह। मुदा ड्राइवर ने हिन्दी जनैत आ ने मैथिली। तेँ ड्राइवर संग कोनो गप-सप रस्तामे नहि होइत छलनि। स्टे्शनक हातासँ निकलितहि रमाकान्त आखि उठा-उठा बजारो दिशि देखैत आ लोको सभकेँ देखैत छलाह। बाजारमे ओते अन्तर नहि बुझि पड़नि, जते लोक आ बोलीमे। मने-मन रमाकान्त अप्पन इलाकासँ इलाका मिलबै लगलाह। अपना ऐठाम पिण्डश्यामा आ गौर वर्ण एकरंगाह अछि, मुदा एहिठाम पिण्डश्याम वर्णक लोक अधिक अछि। लोकक बाजबो दोसरे रंगक। जना मधुमाछी भनभनाइत अछि तहिना। मुदा अपना ऐठामक लोक जेकाँ ठक ओहिठाम नहि। बजारक रस्तासँ जाइत रहैत तँ गरीबी-अमीरीमे अन्तर बुझिये नहि पड़नि। मुदा अपना इलाकाक बजारसँ ओहिठामक बजार बेसी चिक्कन चुनमुन आ सुन्दर। गंदगीक कतौ दरस नहि बुझि पड़नि।
मुख्य मार्गसँ निकलि पूब मुहे एकटा रस्ता गेल छलैक। ओहि रस्तामे डाॅक्टर महेन्द्रक घरो आ क्लीनिको। मुदा जहि अस्पतालमे महेन्द्र नोकरी करैत रहथि ओ मुख्य मार्गमे छलैक। ओहि गलीक मोड़पर टेप्पू ड्राइवर तीनू गोटेकेँ उतारि भाड़ा लऽ आगू बढ़ि गेल। सड़कक दुनू भाग बड़का-बड़का मकान सभ अछि। ओहि मोड़पर तीनू गोटे मोटरी रखि बैसि रहलथि। गाड़ीक झमारसँ तीनूक देह-हाथ बथैत छलनि। ठाढ़ रहले नहि होइत छलनि। जहिना अमावस्याक रातिमे बादल पसरि आरो अन्हार कए दैत अछि तहिना रमाकान्तोकेँ होइत छलनि। एक तँ अनभुआर जगह दोसर बोलिक भिन्नता। बोली मनुष्य मनुष्यक बीच कत्ते दूरी बनबैत अछि ई बात रमाकान्त आइये बुझलनि। श्यामा मने-मन सोचैत जे हे भगवान केहेन जगह अछि जे अछैते मनुक्खे हम सभ हराएल छी। तीनू गोटे निराशाक समुद्रमे डूबल। मने-मन रमाकान्त सोचैत जे आब की करब? आइ धरि जिनगीमे एहेन फेरा नहि पड़ल छल। अपन सभ बुद्धि-अकील हरा गेल अछि। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, मन घोर-घोर भऽ गेल अछि। कनी तमाकू लगाबह।’’
जुगेसर तमाकुल चुनबै लगल। सभ सबहक मूह देखि पुनः नजरि निच्चा कऽ लैत छलाह। तहि बीच रमाकान्तक जेठ बेटा डाॅक्टर महेन्द्र फियेट कारसँ अस्पतालसँ घर अबैत रहथि आकि सड़कक कातमे तीनू गोटेकेँ बैसल देखलनि। पहिने तँ थोड़े धखएलाह, मुदा चिन्हल चेहरा तेँ मेन रोडसँ गाड़ी बढ़ा अपन रस्तापर लगौलथि। गाड़ी ठाढ़ कए महेन्द्र उतरि रमाकान्तकेँ गोर लगलनि। रमाकान्तकेँ गोर लागि महेन्द्र माएकेँ गोर लगलनि। गोर लागि महेन्द्र पिताक झोरा लए गाड़ीमे रखलनि। तीनू गोटे उठि गाड़ी दिस बढ़लाह। जुगेसर मोटरी गाड़ीमे रखलक। चारु गोटे गाड़ीमे बैसि आगू बढ़लाह। महेन्द्र अपने ड्राइवरी करैत रहथि। महेन्द्रकेँ गाड़ी चलबैत देखि माए पुछलकनि- ‘‘बच्चा, मोटर अपने हँकै छह?’’
“हँ”।
“डरेबर नइ छह?”
माएक प्रश्नइ सुनि महेन्द्र मुस्कुराइत कहलकनि- ‘‘जखन गाड़ीमे रहैत छी तखन दोसर काजे कोन रहैत अछि जे डरेबर राखब। अनेरे खरचा बढ़त।’’
घरक आगू गाड़ी पहुँचतहि महेन्द्र हार्न देलनि। गाड़ीक आवाज सुनि भीतरसँ नोकर आबि गेटक ताला खोलि देलकनि। महेन्द्र गाड़ी भीतर लए गेलाह। गाड़ी ठाढ़ कऽ महेन्द्र उतरि गाड़ीक तीनू फाटक खोलि तीनू गोटेकेँ उतारलनि। गाड़ीसँ उतरितहि रमाकान्त मकान दिशि तकलनि। तीनि तल्ला बड़का मकान। आगूक फुलवाड़ी देखि रमाकान्त मने-मन सोचै लगलथि जे सम्पति तँ गामोमे बहुत अछि मुदा एहेन घर....। अप्पन कोन जे परोपट्टामे एहेन मकान ककरो नहि छैक। मनमे उठलनि जे अपन कमाइसँ महेन्द्र एहन घर बनौलक आकि बैंक-तैंकसँ करजा लऽ कऽ बनौलक आकि भाड़ामे नेने अछि। ओना कहने रहथि जे जमीन कीनिकेँ मकान बनेलहुँ। मुदा एहेन घर बनबैमे पचासी लाखसँ उपरे खर्च भेल हेतैक। एतबे दिनमे कत्ते कमा लेलक।
आगू-आगू महेन्द्र आ तहि पाछू तीनू गोटे मकानमे प्रवेश केलनि। मकानक सिमेंट एहन जमाओल जे पएर पिछड़ैत। सभसँ उपरका तल्लामे लए जाए एकटा कोठरी रमाकान्त आ जुगेसरकेँ दोसर माएकेँ सुमझा देलनि। ताबे नोकर जलखइ आ पानि नेने पहुँचि गेलनि। हाथो-पएर नहि धोए रमाकान्त पलंगपर पड़ि रहलाह। पंखा चलैत रहए। दूटा पलंग कोठरीमे लगाओल रहए। दूटा टेबूल, एकटा नमहर अएना, रंग-बिरंगक देवी-देवताक फोटो देवालमे सेहो छलैक। नील रंगसँ कोठरी रंगल। दूटा अलङा अल्गा सेहो देवाल दिस राखल। खूब मोटगर गद्दीदार ओछाइन पलंगपर बिछौल। मसलन सेहो दुनू पलंगपर। पानिक टंकी सेहो कोठरीक मुहेपर केबारक बगलमे छलैक।
पलंगसँ उठि रमाकान्त कुरड़ा कऽ जलखै करै लगलाह। दू कौर खा पानि पीबि रमाकान्त चाह पीबै लगलथि। जुगेसरो जलखै खा चाह पीबै लगल। महेन्द्र ठाढ़े-ठाढ़ चाह पीबै लगलाह। चाहक चुस्की लैत रमाकान्त महेन्द्रकेँ पुछलखिन- ‘‘बौआ, मकान अपने छी?’’
“हँ।“
“बनवै मे कते खर्च भेल?”
खर्चक नाम सुनि मुस्की दैत महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बाबू, खर्च तँ डाएरीमे लिखल अछि तेँ बिना देखने नीक-नाहाँति नहि कहि सकै छी मुदा तीन लाखमे जमीन कीनलहुँ से मन अछि। जखन जमीन भऽ गेल तखन चारु गोटे कमेबो करी आ घरो बनबी। तेँ ठीकसँ बिना डायरी देखने नहि कहि सकैत छी।’’
चाह पीबि टेबुलपर कप रखि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘चारि दिन नहेला भऽ गेल। देहमे एक्को रत्ती लज्जति नहि बुझि पड़ै अए। तेँ पहिने नहाएब, खाएब आ भरि मन सुतब।’’
“बड़बढ़िया” कहि महेन्द्र कोठरीसँ निकलि नोकरकेँ कहलखिन- ‘‘भाइ, स्त्री आ भावो तीनू गोटेकेँ फोनसँ कहि दहक जे बुरहा-बुरही अएलाह अछि।’’
नोकरकेँ कहि रमाकान्त लग आबि महेन्द्र कहलखिन- ‘‘चलू। नहाइक घर देखा दै छी।’’
आगू-आगू महेन्द्र आ पाछू-पाछू रमाकान्त, जुगेसर चललाह। स्नान घरक केवाड़ खोलि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘दूटा जोड़ले कोठरी अछि, दुनू गोटे नहाउ।’’ - कहि दुनू कोठरीक बौल जरा देलखिन।
कोठरीकेँ निङहारि-निङहारि दुनू गोटे देखै लगलथि। पानिक झरना, टंकी, साबुन रखैक ताक, कपड़ा रखैक अलगनी इत्यादि। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगे, चाह पीलौं आ तमाकू खेबे ने केलहुँ। मन लुलुआइल अछि। जाह पहिने तमाकुल नेने आबह।’’
जुगेसर स्नान घरसँ निकलि कोठरी आबि, तमाकुल-चून लए आबि तमाकुल चुनबै लगल। तमाकुल चुना जुगेसर रमाकान्तोकेँ देलकनि आ अपनो ठोरमे लेलक। थूक फेकैत रमाकान्त बजलाह- ‘‘जुगे गाममे हमहूँ सम्पतिबला लोक छी मुदा आइ धरि एहेन पैखाना कोठरी आ नहाइक घर नै देखने छेलिऐक। सभ दिन खुल्ला मैदानमे पैखाना जाइ छी आ पोखरिमे नहाइ छी।’’
“कक्का, अपना सभ गाममे रहै छी ने। ई सभ शहर-बजारक छिऐक। जँ शहर-बजारक लोक गाम जेकाँ चाहबो करत से थोड़े हेतै। ऐठाम लोक बेसी अछि आ जगह कम छै, तेँ लोककेँ एना बनबै पड़ै छै। मुदा पोखरिमे लोक पानिमे पैसिकेँ नहाइत अछि आ ऐठाम पानि ढारिकेँ नहाइत अछि। जहिना अपना सभ कहियो काल लोटासँ पानि ढारि कऽ नहाइत छी। मुदा पानिमे पैसिकेँ नहेलासँ संतोख होइ छै, जे अइमे नइ हेतै।’’
‘‘एहेन जिनगी जीनिहारकेँ गाममे रहब पार लगतै?’’
“से कोना लगतै।’
‘‘बाबू हमरा बेसी काल कहै छलाह जे मनुखक शरीर देखैमे एक रंग लगनहुँ, जीबैक जे ढंग छैक ओ दू रंग बना दै छैक।’’
“अहाँक गप हम नइ बुझलौं काका।’’
‘‘देखहक, जे आदमी भरिगर काज सभ दिन करै अए ओकरा जहि दिन भरिगर काज नहि हेतै तँ देहो-हाथ दुखैतै आ अन्नो रुचिगर नहि लगतैक। तहिना जे आदमी हल्लुक काज करै अए आ जँ ओकरा कोनो दिन भरिगर काज करै पड़तै तँ ओकरो देह-हाथ ओते दुखेतै जे अन्नो ने खा हेतै।’’
“हँ, से तँ होइ छै। हमरो कए दिन भेल अछि।’
‘‘तहिना गामक लोक जे शहर-बजारमे आबि जिनगी बदलि लैत अछि ओ फेर गाम अही दुआरे नहि जाए चाहैत अछि।’’
“गामक लोक गरीब अछि काका ! खाए-पीबैसँ लऽ कऽ ओढ़े-पीनहै, रहै, दवाइ-दारु, पढ़ै-लिखैक सभ चीजक अभाव छैक, तेँ लोक नहि रहै चाहैत अछि।’’
महेन्द्र पिताकेँ स्नानघर पहुँचा घुमि कऽ अपना कोठरी आबि भाए डाॅक्टर रविन्द्र, पत्नी डाॅ. जमुना, भाबो डाॅक्टर सुजाताकेँ फोनसँ कहि देलखिन जे गामसँ माए-बाबू आ जुगेसर अएलाहहेँ। तीनू गोटेकेँ जानकारी दऽ अपने भंसा घर जाए मने-मन सोचै लगलथि, जे एहिठामक जे खान-पान अछि ओ हुनका सभकेँ पसिन्न हेतनि की नहि? तेँ गामक जे खान-पान अछि, सैह बनाएब नीक हएत। मुदा भनसिया तँ ऐठामक छी, तेँ बना सकत की नहि? तेँ अपनेसँ बनाएब नीक रहत। ओना भात-दालि आ रसगर तरकारी तँ भनसियो बना सकैत अछि। खाली तेतेरिक परहेज करैक अछि। तेतेरिक अलगसँ खटमिट्ठी बना लेब। जँ तरुआ तरकारी नहि बनाएब तँ पिता अपमान बुझताह। ओना दूधो-दही जरुरी अछि। मुदा एक्कोटा चीजसँ काज चलि सकैत अछि। दहियो तँ घरमे नहिये अछि। लगक दोकान सबहक दही दब रहै छै तेँ रविन्द्रकेँ कहि दियनि जे दरभंगाबलाक होटलसँ दही किनने आबथि। ई बात मनमे अबितहि महेन्द्र मोबाइलसँ रविन्द्रकेँ कहलखिन। रविन्द्र अस्पतालसँ सोझे दरभंगाबला होटल बिदा भेलाह। महेन्द्र अपनेसँ तिलकोरक पात, परोड़, झिंगुनी, भाँटा आ आलू तड़ै लगलाह। गैस चुल्हि, तेँ लगले सब कुछ बनि गेलनि।
पैखाना जाइसँ पहिनहि रमाकान्त हाथ मटिअबैले माटि तकै लगलाह। मुदा माटिक कतौ पता नहि। नहाइसँ लऽ कऽ हाथ धोए धरि साबुने। रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, बिना माटिये हाथ कोना मटिआएब?’’
रमाकान्तक बात सुनि मुस्कुराइत जुगेसर कहलकनि- ‘‘कक्का, जेहन देश ओहन भेस बनबै पड़ैत छैक। गाममे तरभरि दिन माटिये पर रहै छी, मुदा ऐठाम तँ माटिसँ भेंटो मश्किल अछि। किएक तँ देखते छिऐ जे माटि तरमे पड़ि गेल अछि। ने माटिक घर अछि आ ने रस्ता पेरा। साबुनो तँ गमकौए छी। की हेतै साबुनेसँ हाथ धो लेब।’’
कहलह तँ ठीके जुगेसर मुदा हाथ धोअब आ मनकेँ मानब दुनू दू बात अछि। हाथ धोइये लेब मुदा मन नहि मानत तँ ओ हाथ धोअब कना भेल?’’
“हँ कक्का, ई बात तँ हमहूँ मानै छी, मुदा गंदगी साफ करैक सवाल छै की ने से तँ हएत। मनकेँ बुद्धि ने चलबै छै, तेँ मनकेँ बुद्धि मना लेत।’’
‘‘तोहूँ तँ आब बच्चा नइ छह जे नहि बुझबहक। एकटा बात कहह जे लोक पेटमे खाइ अए। पेट भरै छैक, तखन लोक किअए कहै छै जे भरि मन खेलहुँ वा पेट भरलाक बादो कहै छै जे मन नहि भरल।’’
“अपना सब कक्का मिथिलामे रहै छिऐ ने। मिथिलाक माटियो पवित्र छैक। मुदा ई तँ मद्रास छी ने तेँ ऐठामक लोक जे करैत हुअए, सैह करब उचित।’’
‘‘बड़बढ़िया।’’ कहि दुनू गोटे अपन क्रिया-कलाप मे लगि गेलाह।
रमाकान्त आ जुगेसर स्नाने घरमे रहथि, तहि बीच रविन्द्र, जमुना आ सुजाता तीनू गोटे अपन-अपन गाड़ीसँ आबि गेलथि। सभक मनमे अपन-अपन ढंगक जिज्ञासा रहनि। तेँ गाड़ीसँ उतरितहि सभ, पिता रमाकान्त, ससुर रमाकान्तकेँ देखैक लेल उताहुल। मुदा कोठरी अबितहि पता चललनि जे ओ नहाइ छथि। नहाएब सुनि सभ अपन-अपन कपड़ा बदलै अपन-अपन कोठरी गेलथि। पेन्ट-शर्ट खोलि रविन्द्र लुंगी पहिरतहि माएक कोठरी दिस बढ़लाह। कोठरीमे पहुँचतहि रविन्द्र माएकेँ गोर लागि आगूमे ठाढ़ भऽ गेला। रविन्द्रकेँ माए चिन्हलकनि नहि, मुदा गोरक जवाब बिना चिन्हनहि दऽ देलखिन। रविन्द्र मुस्कुराइत रहथि। मुदा अनचिन्हार जेकाँ माए बेटाक मूह दिशि बकर-बकर देखैत रहैत। तहि बीच जमुना आ सुजाता आबि माए केँ गोर लगलनि। दुनू पुतोहूओकेँ माए असिरवाद देलखिन। रविन्द्र बुझि गेलखिन जे माए नहि चिन्हलनि। मुस्कुराइत रविन्द्र माएकेँ कहलखिन- ‘‘माए, हम रविन्द्र छी।’’
रविन्द्र नाम सुनितहि माए हक्का-बक्का भऽ गेलीह। अनायास मूहसँ निकललनि- ‘‘रविन्द्र।’’
चारि सालसँ रविन्द्र गाम नहि आएल छलाह। पहिने रविन्द्रक देह एकहारा छलनि। खिरकिट्टी जेकाँ। जे अखन मस्त-मौला भऽ गेलाह। पुष्ट देह भेने रविन्द्रक रुपे बदलि गेलनि। कोरैला बेटा होइक नाते माएक ममता बाइढ़िक पानि जेकाँ उमड़ि गेलनि। मूहक बोली पड़ा गेलनि। खाली आखिये टा क्रियाशील रहलनि। जे अश्रुधारासँ सिमसि गेलनि। आँचरसँ नोर पोछितहि ओ दिन मनमे नचै लगलनि, जहि दिन रविन्द्र एहि आँचरमे नुकाएल रहैत छल। सौझुका तरेगण जेकाँ श्यामाक हृदयमे सुखद जिनगीक मनोरथ सभ चमकै लगलनि। हाथक इशारासँ माए दुनू पुतोहूकेँ बैसै कहलखिन। दुनू पुतोहू माइक दुनू भाग बैसिलीह। दुनू कान्हपर दुनू हाथ दऽ सासु ओहि दुनियाँमे बौआइ लगली, जाहि दुनियाँमे दुखक कोनो जगह नहि होइत छैक। मुदा सुखोक तँ दूटा दुनिया अछि। एक दुनिया श्यामाक आ दोसर रविन्द्रक। जे दुनियाँ श्यामा दुनू परानीक भेल जाइत छलनि, ओ तियाग, करुणा, दयाक सवारीसँ वैरागक मंजिल दिशि बढ़ैत जाइत छलनि। जखनिकि दुनू भाए रविन्द्रक जिनगी अधिकसँ अधिक धन उर्पाजन कऽ दैहिक सुख दिशि बढ़ल जाइत छलनि।
रमाकान्त आ जुगेसर नहा कऽ कोठरी अएलाह। नहेलाक उपरान्त दुनू गोटेक देहक थकान मेटा गेलनि। नव-नव स्फूर्ति आ ताजगी आबि गेलनि। नव ताजगी अबितहि भूखो जगलनि। रविन्द्र कोठरीसँ निकलि पिताक कोठरी दिशि बढ़लाह। ताबे महेन्द्र सेहो पिता लग आबि भोजन करैक आग्रह केलकनि।
एम्हर सासु लग दुनू पुतोहू बैसि एक-दोसराक खानदान, परिवार आ मानवीय संबंध बनबैक लेल वस्तु-जात एकत्रित करै लगलीह। गामक देहाती जिनगी बितौनिहारि पचपन बर्खक माए आ बजारु जिनगी जीनिहारि दुनू दियादनी पुतोहू, तीनूक मन अपन-अपन जिनगीक रस्तासँ भ्रमण करैत रहनि। मुदा सासु-पुतोहूक रस्तामे कतौ संबंध नहि रहनहुँ मानवीय संवेदना आ जिनगीक व्यवहारिक प्रक्रिया तीनूकेँ लग आनि सटबैत रहनि। बीतल जिनगी तँ स्मृति आ इतिहास बनि जाइत अछि मुदा अबैबला जिनगीक रुप-रेखा तँ अखने निर्धारित होएत। एक सासु जिनगीक पचपन बर्खक अनुभव, तँ दोसरि-तेसरि आधुनिक शिक्षासँ लैस। सोचमे दूरी रहनहुँ, सभ एक्के परिवारक छी, ई विचार सभकेँ बलजोरी खींचि कऽ एकठाम सटबैत रहनि। सासुक मनमे प्रश्नँ उठैत छलनि जे हम हजारो कोस हटि कऽ बेटा-पुतोहूसँ दूर रहैत छी, हमरा पुतोहूक सुख कत्ते हएत ? समाजमे देखै छी जे अस्सी बर्खक बूढ़-पुरानसँ लऽ कऽ पेटक बच्चा धरि एक-ठाम रहि हँसी-खुशीसँ जिनगी बितबैत अछि। खाएब-पीब कोनो वस्तु नहि थिक। किएक तँ जकरा हम नीक वस्तु बुझै छिऐ ओहो भोज्य-पदार्थ छी आ जेकरा दब वस्तु बुझै छिऐ ओहो भोज्ये-पदार्थ छी। हँ, ई विषमता समाजमे जरुर छैक जे केयो नीक वस्तु थारीमे छुता कऽ उठैत अछि जे कुकूड़ खाएत आ कियो भुखल सुतैत अछि। मुदा हम देखै छी हजारो किस्मक भोज्य-वस्तु घरतीपर पसरल अछि जेकरा ने सभ चिन्हैत अछि आ ने उद्यम कऽ आनै चाहैत अछि। जखनिकि जमुना आ सुजाता सोचैत जे परिवारकेँ आगू बढ़बैक लेल सन्तान जरुरी अछि। नोकर-दाइक सहारासँ छोट बच्चाक पालन हएत सेवा नहि किएक तँ माए अपन बच्चाकेँ दूधो नहि पीआबै चाहैत। बच्चा जखन स्कूल जाए जोकर हएत तखन आवासीय विद्यालयमे भरती करा शिक्षा-दीक्षा होइत। शिक्षा प्राप्त केलाक बाद कमाइक जिनगीमे प्रवेश करत। जिनगीक एक चक्र इहो थिक। जे जमुना आ सुजाताक मनमे चकभौर लैत छलनि। श्यामाक मन अपन पारिवारिक खानदानी फुलवाड़ीमे औनाइत छलनि। ने आगूक रस्ता देखैत छलीह आ ने पाछूक।
आगूक रस्ता कठिन अछि आकि सघन आकि संवेदन रहित वा सहित अछि। एक-दोसर मनुष्यक संबंध हेबाक चाहिऐ, ओ जरुरिये नहि अनिवार्य आ आवश्यआक सेहो अछि। जे मनुष्य एहि धरतीपर जन्म लेलक, ओकरे ओतेक जीबैक अधिकार छैक जते दोसरकेँ छैक। जँ से नहि अछि तँ लड़ाइ-दंगाकेँ कोन शक्ति रोकि सकैत अछि? मुदा प्रश्ने जटिल अछि, आइ धरिक जे दुनियाक मनुक्खक जिनगी बनि गेल अछि ओ एतेक विषम बनि गेल अछि, जे सामूहिक मनुक्खक कोन बात जे दू सहोदया-सहोदर भाइक बीच समता रहब कठिन भऽ गेल अछि। तेँ की ?
भोजनालय। नमगर-चौड़गर कोठरी। देबालपर बहुरंगी फूलक चित्र बनाओल अछि। सुन्दर हल्का गुलाबी रंगसँ कोठरी ढओरल, एयरकंडीशन। गोलनुमा नमगर-चौड़गर खाइक टेबुल। जकरा चारु कात खेनिहारक लेल कुरसी लागल। पनरहोसँ बेसिये। देवालक खोलियामे साउण्ड बक्स। जहिसँ मधुर स्वरमे गीत होइत अछि।
भोजन करैक बाजारु व्यवस्थाकेँ महेन्द्र अपनौने। मुदा माता-पिताक अएलासँ आइ महेन्द्र धर्मसंकटमे पड़ि गेलाह। मने-मन सोचै लगलाह जे हम दुनू भाय आ दुनू दियादनी चारु गोटे तँ एक्के टेबुलपर खाइ छी मुदा माए तँ बाबूक सोझमे नहि खेतीह। ततबे नहि हमरा दुनू भाइक संगे तँ ओ खेताह मुदा दुनू पुतोहूक संग तँ नहि खेताह। अगर जँ जोर करबनि तँ कहीं बिगड़ि नहि जाथि। जँ बिगड़ि जेताह तँ आरो विचित्र भऽ जाएत। तखन की करब नीक होएत ? गुनधुनमे महेन्द्र। अनायास मनमे एलनि जे माए सँ विचार पूछि लिअनि। माए लग जा पुछलखिन- “माए, हमसब तँ एक्के टेबुल पर खाइ छी मुदा....?’’
महेन्द्रक बात सुनि माए बुझबैत कहलखिन- ‘‘बौआ, हमरो उमेर पचास-साठि बर्खक भेल हएत। आइ धरि जहि काजकेँ अधलाह बुझलिऐक, आब कोना करब? कते दिन आब जीबे करब! तइले किअए अपन बाप-दादाक बताओल रस्ता तोड़ब। एहन व्यवहार सिर्फ अपनेटा परिवारमे तँ नहि अछि, समाजोमे छैक। जाधरि ऐठाम छी ताधरि, मुदा गाम गेलापर तँ फेर ओएह व्यवहार रहत। तइले एहेन काज करब उचित नहि। गामक जिनगीक अनुकूल चलनि अछि। कोनो चलनि समाज आ जिनगीक अनुकूल होइत अछि। जे जिनगीक लेल नीक होइत अछि। भले ही दोसर तरहक जिनगी जीनिहारकेँ ओ अधलाह लगै।’’
माइक विचार सुनि महेन्द्र दू तोर कऽ खाएब नीक बुझलक। पहिल तोर मे अपने, जुगेसर आ पिता तथा दोसर तोरमे बाकी सभ कियो।
भोजन करितहि रमाकान्त हफुआय लगलाह। जुगेसर सेहो हफुआय लगल। हाथ-मूह धोए दुनू गोटे सुति रहलाह।
तीन रातिक जगड़ना। ताहिपर अन्नक निसां सेहो लागल रहनि। एक्के बेर चारि बजे रमाकान्तकेँ निन्न टुटलनि। नीन टुटितहि, सुतले-सुतल रमाकान्त देवालक घड़ीपर आखि देलनि। चारि बजैत। भांग पीबैक बेर भऽ गेल रहनि। भांग क आदति रमाकान्तकेँ पहिनहिसँ लागल रहनि। तेँ मद्रास अबैये काल झोरामे भांग क पत्ती लऽ लेने रहथि। श्यामा सेहो बुझि गेलीह जे हुनका भांग पीबैक बेर भऽ गेलनि। भांग क सभ समान- मरीच, सोंफ अननहि छी। सिर्फ पीसक जरुरत अछि। पलंग परसँ उठि झोरा खोलि भांग क सभ समान निकालै लगलीह। तहि बीच सुजाता ब्राण्डीक किलोबला बोतल आ गिलास नेने सासु लग आबि ठाढ़ भऽ गेलीह। खाइये बेरमे सासु पुतोहकेँ कहि देने रहथिन जे बुढ़ा सभ दिन चारि बजे पीसुआ भांग पीबैत छथि। भांगक संबंधमे सुजाता अनाड़ी रहथि। किछु नहि बुझल रहनि। मुदा ब्राण्डीक संबंधमे तँ बुझल रहनि। तेँ सुजाता, श्यामा आ रमाकान्त सभ अपन-अपन ढंगसँ से साकांछ रहथि।
पलंगपर सँ उठि रमाकान्त जुगेसरकेँ जगा टंकीपर मूह-हाथ धोएले गेलाह। खट-खुट अवाज सुनि श्यामा बुझि गेलीह। बोतल लऽ सुजाता तैयारे रहथि। मुदा सुजाताक मनकेँ मिथिलाक संस्कृति झकझोड़ैत रहनि। किएक तँ मिथिलाक संस्कृतिक व्यवहारिक पक्ष जनैत नहि छलीह, तेँ जहिना अनभुआर जंगलमे कोनो जानवर औनाइत रहैत, तहिना सुजातो। मने-मन सोचैत जे एहिठाम जहिना पुतोहू ससुरक बीच व्यवहार होइत अछि, तहिना मिथिलोमे होइत आकि नहि। दोसर प्रश्नक उठनि जे पढ़ल-लिखल समाजमे तँ पुरान व्यवहारो बदलि नव रुप लऽ लैत अछि। तेँ सुजाता हाथमे ब्राण्डीक बोतल आ गिलास रखने विचारक दुनियामे बौआइत छलीह। रमाकान्तकेँ भांग पीबैक समए भऽ गेल छलनि, तेँ विचारमे मधुरता आबि गेल छलनि। श्यामा आबि रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘अखन भांग नइ पिसलहुँहेँ। पुतोहू जनी एकटा बोतल रखने छथि, से की कहै छियनि?’’
भांग नहि पीसब सुनि रमाकान्तक मनमे कने क्रोध अबै लगलनि, मुदा बोतलक नाम सुनि दबि गेलनि। मुस्कुराइत रमाकान्त पत्नीकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी आ पुतोहूमे की अन्तर छैक। जहिना बेटी तहिना पुतोहू। ताहूमे छोटकी पुतोहू, ओ तँ कोरैला बेटीक सदृश्यन होइत। एक तँ दुनियामे कोनो संबंध अधलाह नहि छैक मुदा जखन ओ सीमामे रहैत अछि तखन। जखन सीमाक उल्लंघन लोक करै लगैत, तखन लाज आ परदाक जरुरी भऽ जाइत अछि। जे परम्परा बनि आगूमे ठाढ़ भऽ गेल अछि। मुदा ओहने पछिला व्यवहार निपुआंग मरि नहिये गेल अछि। तेँ नीक व्यवहार जिनगीमे धारण करब अधलाह तँ नहि।’’
रमाकान्तक बात सुजातो सुनैत छलीह। मने-मन खुशियो होइत छलीह जे ज्ञानवान ससुर छथि। मुदा बिना सासुक कहनहुँ तँ आगू बढ़ब उचित नहि। तेँ बोतल-गिलास नेने अढ़मे ठाढ़ छलीह। रमाकान्तक विचार सुनि श्यामा सुजाताकेँ कहै आगू बढ़लीह। पर्दाक अढ़मे ओ ठाढ़। कहलखिन- ‘‘जाउ! भगवान अहाँकेँ भोलेनाथ ससुर देने छथि। मुदा ससुर जेकाँ नहि पिता जेकाँ व्यवहार करबनि।’’
बामा हाथमे बोतल आ दहिना हाथमे गिलास नेने सुजाता ससुर लग आबि मुन्ना खोललनि आकि सौँँसे कोठरी महक पसरि गेल। गमकसँ हवोमे मस्ती आबि गेल। एक गिलास पीबि रमाकान्त जुगेसरकेँ कहलखिन- ‘‘जुगेसर, तोहू एक गिलास पीबह।’’
जुगेसर- ‘‘कक्का, अहाँ लग बैसि कोना पीब?’’
“अखन, ने तूँ छोट छह आ ने हम पैघ छी। सभ मनुक्ख छी। मनुक्ख तँ मनुक्खे लगमे रहि ने जिनगी बितौत।’’
तहि बीच सुजाता गिलास जुगेसरो दिशि बढ़ौलनि। जुगेसर एक्के सूढ़िमे सौंसे गिलास पीबि गेल। पेटमे ब्राण्डी पहुँचतहि गुदगुदबै लगलै। दोसर गिलास पीबितहि रमाकान्त सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी, किछु निमकी खाइ ले लाउ?’’
रमाकान्तक आढ़ति सुनि सुजाता गिलास-बोतलकेँ टेबुलपर रखि कीचेनसँ मद्रासी भुजिया दूटा प्लेटमे नेने अएलीह। एकटा पलेट रमाकान्तक आगूमे आ दोसर जुगेसरक आगूमे देलनि। दू-चारि फक्का भुज्जा फाँकि रमाकान्त फेर दू गिलास ब्राण्डी चढ़ा लेलनि। ओना भांगक निसां रमाकान्तकेँ बुझल, जे पीलाक उपरान्त घंटा-दू घंटाक बाद निसां अबैत अछि, मुदा ब्राण्डीक निसां तँ पीबितहि आबि गेलनि। ओना जुगेसर दुइये गिलास पीलक मुदा तेहीमे मन उनटि गेलै। सौँसे बोतल पीबि रमाकान्त ढकार केलनि। सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी, इलाइची देल पान खुआउ?’’
सुजाताकेँ बुझल। सासु पतिक खान-पानक संबंधमे सभ बात कहि देने छलखिन। दू खिल्ली पान, सुअदगर तेज जरदा डिब्बा, इलाइची, सेकल सुपारीक कतरा पलेटमे नेने सुजाता आबि रमाकान्तक आगूमे रखि देलनि। शराबक रंगमे जहिना रमाकान्त तहिना जुगेसर रंगि गेलाह। बजैक लेल दुनूक मन लुसफुसाइत। पान मूहमे लैत हि रमाकान्त सुजाताकेँ पुछलखिन- ‘‘बेटी, अहाँ डाक्टरी कोना पढ़लहुँ?’’
ससुरक सबाल सुनि सुजाता बगलक कुरसी पर बैसि, संकुचित भऽ कहै लगलनि- ‘‘बाबू जी, हमर पिता आ माए अपन महल्लाक कपड़ा साफ करैत छलथि। सभ दिना काज छलनि। एहिसँ जेना-तेना गुजर चलैत छलनि। एक्केटा घर छलनि। अनके कलपर नहेबो करै छलौं आ पानियो पीबै छलहुँ। पिता ताड़ी पीबथि। एक दिन साझू पहरकेँ ताड़ी पीबि अबैत रहथि। बहुत बेसी निसां लागि गेल रहनि। रस्तापर एकटा खाधि-गढ़ा रहए। ओहि खाधिमे ओ खसि पड़लाह। ओहि समए एकटा ट्रक, बिना इजोतेक, पास करैत रहए। ट्रक हुनका उपरे देने टपि गेलै कुड़कुट-कुड़कुट सौंसे शरीरक हड्डी भऽ गेलनि। हम सभ बुझबो ने केलिऐक। दोसर दिन भिनसरमे हल्ला भेलै। हमहूँ माए,भाए तीनू गोटे देखै गेलहुँ। देहक दशा देखि चिन्हबो ने केलिऐनि। मुदा कपड़ा आ चप्पल देखि मन खुट-खुट करै लगल। तीनू गोटे दुनू वस्तुकेँ चिन्हि गेलिऐक। तखन हुनका उठा कऽ आनि जरौलिऐनि।
बिचहिमे जुगेसर बाजि उठल- ‘‘अरे बाप रे।’’
जुगेसरक ‘अरे बाप’ सुनि सुजातक आखिमे नोर आबि गेलन्हि।
सुजाताक बात रमाकान्त आखि मूनि कऽ सुनैत रहथि। जुगेसरक बात सुनितहि आखि खोललनि। हृदय पसीज गेल रहनि। ताड़ी पीआकक बात सुनि रमाकान्त मने-मन विचारैत रहथि जे नशापान तँ हमहूँ करै छी मुदा ऐठामक जिनगी आ गामक जिनगीमे बहुत अन्तर छैक। ततबे नहि पेटबोनिया आदमीक सवाल सेहो अछि। हमरा सबहक ग्रामीण जिनगी शान्तिपूर्ण अछि। धनक अभाव तँ जहिना एतौ छैक तहिना गामोमे छैक। एहिठाम किछु गनल-गूथल उद्योग आ व्यापार कारोबारी अछि जे समृद्धशाली अछि। मुदा पेटबोनियो ओकरे देखौस करै चाहैत अछि, जहिसँ ओकर जिनगी अशान्त भऽ जाइत छैक। ओहि अशन्तिकेँ शान्ति करै दुआरे लोक सड़ल-गलल निसां पान करैत अछि। जहिसँ जिनगी बाटेमे टूटि जाइत छैक। एत्ते बात मनमे अबितहि रमाकान्त पलंगसँ उठि पीक फेकै निकललाह। बाहरक नालीमे पान थूकड़ि कऽ फेकि, टंकीमे कुरड़ा कऽ कोठरी आबि सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘बेटा, चाह पिआउ?’’
आँचरसँ आखि पोछैत सुजाता चाह आनै निकललीह। रमाकान्तक हृदयमे सुजाताक प्रति विशेष आकर्षण बढ़ि गेलनि। जना हनुमानक हृदयमे राम-लक्ष्मण बैसल, तहिना सुजातो रमाकान्तक हृदयमे एकटा छोट-छीन घर बना लेलनि। रमाकान्तक प्रति सुजातोक हृदयमे तस्वीर बनै लगलनि। आइ धरि जे बात सुजातासँ क्यो ने पूछने छलनि से बात सुनि ससुरक हृदय पघलि गेलनि। जरुर रमाकान्तक हृदयमे सुजाता अपन जगह बना लेलनि। चाह आनि सुजाता रमाकान्तोकेँ आ जुगेसरोकेँ देलनि। हाथमे चाह लैतहि रमाकान्त अपन अस्तित्व बिसरि गेलाह। सुजाताक आखिमे अपन आखि दए एक-टकसँ देखै लगलाह। आद्र भऽ रमाकान्त सुजाताकेँ कहलखिन- ‘‘ओहि समएक जिनगी ओहिना मन अछि आकि बिसरबो केलहुँहेँ ?’’
“बिसरब कोना ! ओ समए आ घटना तँ हमर जिनगीक इतिहासक एक महत्वपूर्ण कालखंड छी।’’
‘‘तकर बाद की भेल?’’
“हम, दू भाइ-बहीन छी। एगारह बरखक हम रही आ आठ बर्खक भाए। दुनू गोरे इस्कूल जाइत रही। महल्लेमे स्कूल। भाइ तँ छोट रहै तेँ कोनो काज नै करै मुदा हम माइक संग कपड़ो खीची, परतीपर सुखेबो करी, लोहो दिऐ आ माइयेक संग महल्लासँ कपड़ा आनबो करी आ दाइयो अबिऐ। ओहिसँ जे कमाइ हुअए तहिसँ गुजरो करी। पढ़ल-लिखल परिवारसँ लऽ कऽ बनिया-बेकाल धरिक परिवारमे आबा-जाही रहए। पढ़ल-लिखल परिवारमे जखन जाइ तँ फाटल-पुरान किताब मांगि ली। ओहिसँ पढ़ैले किताब भऽ जाए। खाइक जोगार कमाइयेसँ भऽ जाए। एहि तरहेँ मैट्रिक फस्ट डिबीजनसँ पास केलहुँ। जखन मैट्रिकक रिजल्ट निकलल रहै, तखन महल्ला भरिक लोक बाहबाही केलक। हमरो उत्साह बढ़ल। मनमे अरोपि लेलौं जे बी.एस.सी. करब। ओहि समए हमरा मनमे डाॅक्टरक विचार रहबे ने करए। कोना रहैत ? जतबेटा बुद्धि ततबे ने सोचितहुँ।
कओलेजमे एडमीशन शुरु भेल। महेन्द्र भैयाक कपड़ा दैले हम माए-भाइ आ हम तीनू गोरे भिनसुरके पहरकेँ एलहुँ। भैया ताबे अस्पतालेक क्वाटरमे रहैत रहथि। ओसारपर बैसि दाढ़ी बनबैत रहथि। माए कपड़ाक मोटरी रखि जमुना दीदीकेँ सोर पाड़ि कहलखिन- ‘‘मलिकाइन, कपड़ा लिअ।’’
हम-दुनू भाइ-बहीन ठाढ़े रही। कोठरीसँ निकलितहि दीदीक नजरि हमरापर पड़लनि। जमुना माएकेँ कहलखिन- ‘‘बेटी पास केलक, मिठाइ खुआउ।’’
जमुना दीदीक बात सुनि महेन्द्र भैया दाढ़ी बनाएब छोड़ि हमरा दिशि मूड़ी उठा कऽ तकलनि। बिना किछु बजनहि थोड़े काल देखि, फेर हाँइ-हाँइ दाढ़ी कटै लगलाह। दाढ़ी काटि, दाढ़ी कटैक सभ समान सैंतिकेँ राखि, हमरा सोर पाड़लनि। हमरा मनमे कोनो तरहक विचार उठबे ने कएल। किएक तँ तेसरा-चारिम दिनपर बरोबरि अबैत छलहुँ। दीदीकेँ भैया कहलखिन- ‘‘कने चाह बनाउ।’’ भैयाक बोली हम नइ बुझलिऐनि मुदा दीदी बुझि गेलखिन। ओ पाँच कप चाह बनौलनि। दू कप अपने दुनू परानी आ तीन कप हमरा तीनू गोरेकेँ देलनि। पहिल दिन हम भैयाक डेरामे चाह पीने रही। भैया, हमर नाम पुछलनि, हम कहलिऐन। मैट्रिक रिजल्ट संबंधमे पुछलनि। सेहो कहलिऐन। भैया नाम लिखबैसँ लऽ कऽ किताब-कापी धरिक भार उठबैत माएकेँ कहलखिन- ‘‘स्कूल-काओलेज तँ लगे महल्लेमे अछि तेँ बाहर जा पढ़ैक समस्ये नहि अछि। घरेपर रहि पढ़ि सकैत अछि। तखन स्कूल-कओलेजक खर्चसँ लऽ कऽ पढै़क सामग्री धरिक खर्च दुनू भाए-बहीनक हम देब।’’
भैयाक बात सुनि खुशीसँ हमर मन नाचि उठल। हम बड़ी काल धरि बकर-बकर भैयाक मूह देखिते रहि गेलहुँ। जाधरि डाॅक्टर बनलहुँ ताधरि भैया सभ खर्च दैते रहलाह।’’
सुजाताक बात सुनि रमाकान्तक मनमे एलनि जे जँ कनियो मदति गरीबकेँ कएल जाए तँ जिनगीक उद्धार भऽ सकैत अछि। पितो बहुत केलन्हि। बेटो केलक। बीचमे हम तँ किछु नहि केलहुँ। ओना दोसराक लेल रमाकान्तो बहुत किछु केनहुँ रहथि आ करबो करथि। मुदा सभ केलहा बिसरि गेलाह।
रातिक आठ बजि गेल। एका-एकी तीनिटा गाड़ी आएल। महेन्द्र अपन गाड़ी कोठरीमे रखि, कपड़ा बदलि, सोझे पिता लग अएलाह। महेन्द्रकेँ देखितहि रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बौआ, हम बेसी दिन नहि अँटकब। हम तँ दस गोटेमे समए बितबैबला छी। एहिठाम असकरमे नीक नहि लागत।’’
महेन्द्र- ‘‘गाड़ीक झमारल छी तेँ पहिने चारि दिन अराम करु। तकर बाद देखि-सुनिकेँ जाइक विचार करब।’’




मद्रास अएला रमाकान्तकेँ दस दिन भऽ गेलनि। दस दिन कोना बीतिलनि से बुझबे नहि केलनि। एहि दस दिनक बीच महेन्द्र अपने गाड़ीसँ तीनू गोटेकेँ उदकमंडलम्, कोडाइकनाल आ एकडि हिलस्टे शन सहित शुचीन्द्रम, रामेश्वछरम्, तिरुचेंदूर, मदुराइ, पलनी, तिरुचिरापल्ली, श्रीरंगम, तंजोर, कुम्बकोणम, नागोर, वेलांकण्णि, वैत्तीश्वररन कोइल, चिदम्बरम्, तिरुवण्णामलै, कांचीपुरम, तिरुत्तणि आओर कन्याकुमारी घुमा देलकनि। मुदा अपना सभसँ भिन्न रीति रेवाज, बेवहार आ जीबैक ढंग ओहिठामक लोकक बुझि पड़लनि। एकटा बात जरुर देखल जे अपना सभसँ ओ सभ अधिक मेहनतियो आ इमानदारो अछि।
भारतक आजादीक उपरान्त राज्य पुनर्गठन अधिनियमक अन्तर्गत चौदह जनवरी उन्नैस सौ उनहत्तरिमे मद्रास राज्यक नाम तमिलनाडु राखल गेलैक। पुरना केरलक किछु हिस्सा आ आंध्रप्रदेशक किछु हिस्सा जोड़ि कऽ एहि राज्यक निर्माण भेलैक।
तमिलनाडु द्रविड़ सभ्यताक केन्द्र अदौसँ रहल अछि। ई. पू. चारिम शताब्दीमे चोल, पाण्ड्य आ चेर राजवंशक समएमे द्रविड़ सभ्यता अपन चरम सीमापर फुलाएल-फड़ल।
तेरहमी शताब्दीक आरंभमे एहिठाम काकतीयेक शासन रहल। तेरह सौ तेइस ईस्वीमे दिल्लीक तुगलक सुल्तान काकतीय शासककेँ भगौलक। गोलकुंडाक कुतुबशही सुल्तान अखनुका हैदराबादक न्यो लेलक। सम्राट औरंगजेब सुल्तानकेँ हरा आसफ जा केँ गवर्नर बना देलक। मुगल शासनक आखिरी समएमे आसफ जा अपनाकेँ, निजामक उपाधि धारण कए, स्वतंत्र शासक घोषित कए लेलक।
सोलह सौ उनचालीस ईस्वीमे, ईस्ट इंडिया कम्पनीक पएर मद्रासमे जमि गेल ताधरि देशक अधिकांश भागमे अंग्रेजक अधिकार भए गेल छलैक। तमिलनाडुक पूबमे बंगालक खाड़ी, दछिनमे हिन्द महासागर, पछिममे केरल आ उत्तरमे कर्नाटक आ आन्ध्रप्रदेश अछि।
पैछला राति गप-सप करैत सभकेँ डेढ़ बजि गेलनि। गप्पक विषयो नमहर, सात दिनक देखल मद्रास छलनि।
अढाइ बजे भोरमे एकठाम गाड़ी दुर्धटना भए गेलैक। चारु गोट डाॅक्टरकेँ फोन एलनि जे जलदी दुर्घटनाक जगहपर अबियौक। फोन सुनि महेन्द्र तीनू गोटे रविन्द्र, जमुना आ सुजाताकेँ जानकारी दैत कहलखिन- ‘‘जल्दी तैयार भए चलै चलू।’’
एकहि गाड़ीसँ चारु गोटे बिदा भेलाह। दुर्घटनाक जगह पहुँचि महेन्द्र देखलखिन जे गाड़ी एकटा सड़कपर राखल रौलरसँ टकरा गेल अछि। जााहिसँ थौआ-थाकर भेल अछि। गाड़ीमे एक्के परिवारक आठ गोटे सवार रहथि। उद्योगपति परिवार। एकटा जवान आ एकटा बच्चाक मृत्यु भए गेल छलैक। एकटा बूढ़क माथ फटि गेल रहनि, जहिसँ अड़-दर्र बजैत रहथि। दोसर महिलाक छाती टुटि गेल रहनि। मुदा वायुपर ओहो बजैत छलीह। एकटा जुआन महिलाक दुनू जांघ टूटि गेल रहनि। दूटा ढेरबा बचियाक एक-एक आखि फुटि गेल रहनि आ एक-एक डेन टूटि गेल रहनि। अबोध बच्चाकेँ किछु नहि भेल छलैक। महेन्द्रक पहुँचतहि धाँइ-धाँइ अस्पतालक आनो-आनो डाॅक्टर, नर्स आ स्टाफो सभ आएल छलाह। थाना पुलिससँ लऽ कऽ जिला पुलिस धरि पहुँच गेलैक। डाॅक्टर आएल छलाह, सभ रोगी सभकेँ देखि विचार केलनि जे अस्पताले लए जाएब नीक होएत। डाॅक्टर सभक संगमे सिर्फ अल्लेटा। ने कोनो दवाइ आ ने कोनो औजार रहनि।
आठो गोटेकेँ, थानोक पुलिस आ अस्पतालोक कर्मचारी, उठा-पुठा कऽ अस्पताल अनलकनि। अस्पतालमे जाँच-पड़ताल होइतहि समए दू गोटेक मृत्यु भऽ गेलैक। बाकीक उपचार चलै लगलैक।
साँढ़े पाँच बजे चारु गोटे महेन्द्र डेरा पहुँचलाह। गाड़ीक हड़हरेनाइ सुनि रमाकान्तोक निन्न टुटि गेलनि।
सुतैक समए नहि देखि चारु गोटे गाड़ीसँ उतरि अपन-अपन नित्य-कर्ममे लगि गेलाह। ओछाइने पर पड़ल-पड़ल रमाकान्त सोचै लगलथि जे आइ एगारहम दिन छी मुदा एक्को-टा पोता-पोतीक मुँह नहि देखि सकलहुँ। जाहि परिवारमे पाँच-पाँचटा पोता-पोती रहत ओहि परिवारक बच्चासँ भेटि नहि होअए, कते दुखक बात छी ? माए-बाप, दादा-दादीक स्नेह बच्चाक प्रति की होइत छैक, तेकर कोनो नामो-निशान नहि देखैत। जहि बच्चाकेँ माए-बापक सिनेह नहि भेटितैक, ओहि बच्चाकेँ माता-पिताक प्रति केेहेन धारणा बनतैक?
हँ, ई बात जरुर जे दुनियाँक सभ मनुष्य-मनुष्य छी, तेँ सबहक प्रति सभकेँ स्नेह हेबाक चाहिऐक। मुदा जाहि परिवेशमे हम सभ जीबि रहल छी, जाहि ठाम व्यक्तिगत सम्पत्ति आ जबाबदेहिक बीच मनुष्य चलि रहल अछि, ताहि ठाम स्नेहो तँ खंडित होइत अछि। मनुष्यक जिनगी स्थायी नहि, अस्थाइ होइत अछि। उम्रक हिसाबसँ शरीर क्रियाशील रहैत अछि। जहिना बच्चाक उत्तरदायित्व माए-बापपर रहैत छैक तहिना रोगसँ ग्रसित वा अधिक बएस भेलापर जखन शरीरक अंग शथिल होअए लगैत छैक, तखन तँ दोसरेक सहाराक जरुरत होइत छैक। जँ से नहि होए तँ जिनगी कष्टमय हेबे करत। लोक एक राज्यसँ दोसर राज्य, एक देश सँ दोसर देश कमाइले जाइत अछि। किएक? एहि लेल ने जे अपनो आ परिवारोक जिनगी चैनसँ चलत।
महेन्द्रकेँ तीन आ रविन्द्रकेँ दू सन्तान। दुनू मिला कऽ पाँच भाइ-बहीन। महेन्द्रक जेठ बेटा हाइ स्कूलमे पढ़ैत, बाकी चारु नर्सरीमे। महेन्द्रक जेठ बेटा रमेश हाइ स्कूलक होस्टलमे रहैत अछि आ बाकी चारू आवासीय स्कूलमे रहैत अछि। महिना दू महिनापर महेन्द्र जाएकेँ खरचा पहुँचबैत छथि।
बाबा-दादीक जोर कएलापर बच्चा सभकेँ भेट करैक कार्यक्रम महेन्द्र बनौलनि। रवि दिन स्कूलो बन्न रहतैक, तेँ भेट-घाँट करैमे सुविधा सेहो होएतनि। सात बजे डेरासँ चलबाक कार्यक्रम बनलनि। रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर समएसँ पहिनहि तैयार भऽ गेल छलाह, मुदा भरि रातिक जगरना दुआरे महेन्द्र पछुआएल रहथि। ओंघीसँ देह भसिआइत रहनि। मुदा निन्न तोड़ैक दवाइ खाए रमाकान्त लग आबि कहलखिन- ‘‘बाबू, हम तँ भरि राति जगले रहि गेलहुँ। जखन ओछाइनपर गेलहुँ, निन्न पड़लो नहि रही आकि फोन आबि गेल जे एकटा गाड़ीक दुर्घटना भऽ गेलैक, जहिमे सबार एक्के परिवारक आठ गोटे छलाह, ओ पैघ उद्योगपतिक परिवारक छलाह। हुनके सभकेँ देखैत-सुनैत भोरमे एलहुँ।’’
बिचहि मे जुगेसर बाजल- ‘‘मरबो केलइ?’’
“हँ। जे दुनू मुख्य कारोबारी छलाह ओ मरि गेलाह। एक गोटेकेँ ब्रेन हेम्रेज भए गेलनि। ओ सभ दिन पगलाएले रहती। एक गोटेकें छातीक हड्डी थकुचा-थकुचा भए गेल छनि, ओ दू-चारि मासक मेहमान छथि। तीनटा अधमरु भएकेँ जीताह। एकटा चारि सालक बच्चा टा सुरक्षित अछि।’’
रमाकान्त महेन्द्रक बातो सुनैत आ मने-मन सोचबो करैत जे ईएह थिक जिनगी। अहीक लेल लोक एते नीचसँ नीच काजपर उतरि मनुखकेँ मनुख नहि बुझैत अछि। अनका बुझबैले धरमक नाटक रचि पूजा-पाठ, कीरतन-भजन करैत अछि। हजारो-लाखो रुपैआ खर्च कए पाथरक मूर्ति स्थापित करैत अछि। नीक-नीक प्रसाद चढ़बैत अछि। मुदा जाहि मनुष्यकेँ पेटमे अन्न नहि, देहपर वस्त्र नहि, रहैक घर नहि आ जीबैक कोनो ठेकान नहि, ओकरा तँ देखिनिहारो क्यो नहि। यैह थिक कर्मकाण्डक आडम्बर आ चक्रव्यूह।
रमाकान्तकेँ गंभीर देखि मुस्की दैत महेन्द्र कहलकनि- ‘‘बाबू, नोकरीक जिनगिये एहन होइत छैक। एक रातिक कोन बात जे एकलखाइत पाँचो राति जागल रहब तैयो किछु नहि बुझबैक। एहन-एहन दवाइ सब अछि जे खाइत देरी निन्न निपत्ता भऽ जाएत अछि। जाबत अहाँ सभ चाह-पान करब ताबत हमहूँ तैयार भऽ जाइत छी।’’
कहि महेन्द्र उठि कऽ तैयार होइ लगलाह।
चारु गोटे कारमे बैसि बिदा भेलाह। महेन्द्र अपने ड्राइवरी करैत रहथि। दुनू स्कूल एक्केठाम। एक दोसरसँ थोड़बे हटल रहै। चारु गोटे पहिने रमेशक होस्टल पहुँचलाह। छहरदेबालीक बीचमे होस्टल अछि। अबै-जाइक एक्केटा दरबज्जा, जहि दरबज्जामे लोहाक फाटक लागल। एकटा चौकीदार बैसल। दरमान महेन्द्रकेँ चिन्हैत रहनि। किएक तँ मासे-मास ओ अबैत छथि। चारु गोटे भीतर गेलाह। भीतरमे गारजन सभक लेल एकटा खुला घर बनल अछि, जाहिमे चारु कात कुरसी सजल। चारु गोटे ओहि घरमे बैसलाह। महेन्द्र रमेशकेँ समाद देलखिन। रमेश आबि पिताकेँ गोर लगलकनि। पिताकेँ गोर लागि रमेश ठकुआ कऽ आगूमे ठाढ़ भऽ गेल। ने रमेश बाबा दादीकेँ चिन्हैत आ ने बाबा-दादी रमेशकेँ चिन्हैत रहनि। ठकुआ कऽ ठाढ़ देखि रमेशकेँ महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बौआ, बाबा-दादीकेँ गोर लगिअनु।’’
महेन्द्रक कहलापर रमेश तीनू गोटेकेँ गोर लगलकनि। शिष्टाचार निमाहैत तेँ तीनू गोटे असिरवाद दए देलखिन। मुदा रमाकान्तक मनमे तूफान उठि गेलनि। सोचै लगलाह जे, जे पोता चिन्हबो ने करै अए ओ सेवा की करत ? पढ़नाइ-लिखनाइ, सभ मनुष्यक लेल जरुरी अछि। एहिसँ ज्ञान होइत छैक, जे जिनगी जीबैक ढंग सिखबैत छैक। मुदा जँ बच्चाकेँ परिवारसँ अलग जिनगी बना पढ़ाओल-लिखाओल जाए तँ ओ परिवारकेँ कोना चिन्हत आ परिवारक दायित्वकेँ कोना बुझत? परिवारोक तँ सीमा छैक। एक परिवार पैछला पीढ़ीकेँ जोड़ि बनैत, जे संयुक्त परिवार कहबैत। जे मिथिलाक धरोहर छी। आ दोसर अपने लगसँ आगू बढ़ि बनैत अछि, जे एकल परिवार कहबैत अछि। जहिमे लोक बापो-माएकेँ बीरान बुझि कुभेला करैत अछि। जँ एहि तरहक परिवारक संरचना होअए लगत तँ बापो-माएकेँ धिया-पूतासँ कोन मतलब रहतैक। तखन समाजक की दुर्दशा होएतैक ? जँ से नहि होएतैक तँ मनुष्य आ जानवरमे अन्तरे की रहतैक ? अखने देखि रहल छी जे अपन खून रहितहुँ बुझि पड़ैत अछि जे, जहिना हाट-बजार वा मेला-ठेलामे हजारो मनुक्खकेँ देखलोपर अनचिन्हारे-अनचिन्हार बुझि पड़ैत, तहिना तँ अखनो भए रहल अछि। एहिसँ नीक जे जहिना मनुष्यक समूहसँ परिवार बनैत आ परिवारक समूहसँ समाज बनैत तँ समाजेक सदस्यकेँ किएक ने अंगीकार कएल जाए, जहिसँ जिनगी हँसैत-खेलैत बीतैत रहत। पिताकेँ गुम्म देखि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘बाबू, एहिठामसँ चलू। एहिठाम सभ बच्चाक रुटिंग बनल छैक। अगर अपना सभ बेसी समए अँटकबै तँ बच्चाक रुटिंग गड़बड़ा जएतैक।
ममता भरल मनकेँ मारि रमाकान्त उठिकेँ ठाढ़ होइत कहलखिन- ‘‘हँ, हँ, चलू। ओहू बच्चा सभकेँ देखैक अछि।’’
रमेश चलि गेल आ इहो चारु गोटे गाड़ीमे बैसि बढ़लाह नर्सरी विद्यालय लगेमे रहै। महेन्द्रकेँ दरमान चिन्हिते रहनि तेँ, कोनो रोक-राक नहिये भेलनि। चारु बच्चाकेँ दरमान बजा अनलक। चारु बच्चा आबि महेन्द्रकेँ गोर लगलकनि। गोर लागि चारु बच्चा ठमकि गेल। हाथक इशारा सँ रमाकान्त आ श्यामाकेँ देखबैत बच्चा सभकेँ महेन्द्र कहलखिन- ‘‘बौआ, बाबा-दादी छथुन। गोर लगहुन।’’
महेन्द्रक कहलापर चारु बच्चा तीनू गोटेकेँ गोर लगलकनि। रमाकान्तो आ श्यामोक मन तरे-तर टूटै लगलनि। मुदा की करितथि? सोचै लगलथि जे की सोचि एहिठाम एलहुँ आ की देखि रहल छी। आब एक्को दिन एहिठाम रहब उचित नहि, मुदा जखन आबि गेलहुँ तखन तँ बेटे-पुतोहूक विचारसँ ने गाम जाएब। किछु देखैक लेल सेहो बाकी अछि। टूटल मने रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- ‘‘बच्चा सभकेँ देखिये लेलहुँ, आब ऐठाम सँ चलू। गामक सुरता खीचि रहल अछि। जल्दीये चलि जाएब।’’
पिताक बात महेन्द्र नहि बुझि सकलाह। जाधरि महेन्द्र गाममे रहलाह विद्यार्थिये छलाह। डाॅक्टर बनला बाद मद्रासे चलि अएलाह। जाहिसँ मद्रासेक परिवेशमे ढलि गेलाह।
बेर टगितहि चारु गोटे ब्रह्मचारी आश्रम बिदा भेलाह। बह्मचारी आश्रममे मंदिर नहि। मात्र दूटा घर। एकटा घर धर्मशाला जेकाँ सार्वजनिक आ दोसर घरमे ब्रह्मचारी जी अपने रहैत छलाह। ओहिमे एक भाग सुतबो आ भानसो करैत छथि। बरतन-बासन सभ एक भागमे सेहो ओहि घरमे रखने छथि। ब्रह्मचारी जी मिथिलेक। अद्वैत दर्शनक प्रकाण्ड पंडित छथि। नस-नसमे अद्वैत दर्शन समाएल छनि। ब्रह्मचारी आश्रम लगमे रहितहुँ महेन्द्र नहि जनैत छलाह। मुदा जखन रामेश्व रम् गेल रहथि तँ ओतै एकटा पुजेगरी कहलकनि।
मुख्य मार्गसँ ब्रह्मचारी आश्रम दस लग्गी पछिम। एकपेड़िया रस्ता तेँ महेन्द्र मुख्य मार्गक कतबाहिमे गाड़ी लगा, चारु गोटे आश्रम दिशि बढ़लाह। आश्रमक सीमापर पहुँचतहि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आखि उठा-उठा तजबीज करै लगलथि। ने कोनो तरहक तड़क-भरक आ ने लोकक भीड़ आश्रममे देखथि। घर तँ ईंटाक बनल छैक मुदा धर्मस्थान जेकाँ नहि बुझि पड़ैत छैक। साधारण गृहस्तक घर जेकाँ आश्रम। मुदा नव चीज दुनू गोटेकेँ बुझि पड़लनि। जे हम सभ मद्रासक जमीन छोड़ि मिथिला चल एलहुँ। ब्रह्मचारी जी करजानमे कच्चिया हाँसूसँ केरा गाछक सुखल डपौर सभ कटैत रहथि। केरा गाछक अढ़मे रहथि। तेँ ने ब्रह्मचारी जी रमाकान्त सभकेँ देखलखिन, आ ने रमाकान्त सभ ब्रह्मचारी जीकेँ। मुदा गाड़ीक आवाज ब्रह्मचारी जी सुनने रहथि। ओना गाड़ी तँ सदिखन चलिते रहैत अछि, तेँ गाड़ीक आवाजपर ब्रह्मचारी जी धियाने नहि देलनि। अपन काजमे मस्त रहथि।
एक बीघा जमीन आश्रममे। ओहिमे सभ किछु बनल रहैक। दू कट्ठामे दुनू घर, आंगन आ गाइक थैर रहनि। चारि कट्ठाक एकटा छोटबेटा पोखरि। पाँच कट्ठामे गाछी-कलम। दू कट्ठामे गाइयक लेल घासक खेती आ सात कट्ठामे अन्न उपजैत अछि।
सभसँ पहिने चारु गोटे पोखरिक घाटपर पहुँचलथि। पोखरिक घाट पजेबा-सिमटीक बनल। घाटपर ठाढ़ भए चारु गोटे पोखरिकेँ हियासि-हियासि देखै लगलथि। पोखरिक किनछरि मे पान-सातटा मिथिलेक बगुला चरौर करैत रहए। एक टकसँ रमाकान्त बगुलाकेँ देखि सोचै लगलथि जे जहियासँ ऐठाम एलहुँ, आइये अपन इलाकाक बगुला देखलहुँ। ओना बगुला तँ एतहुँ अछि मुदा मिथिलाक बगुला तँ दोसरे चालि-ढालिक होइत अछि। बगुला परसँ नजरि हटा पोखरि दिशि देलनि। पोखरिमेँ दस-बारहटा कुमहीक छोट-छोट समूह फूल जेकाँ छिड़ियाइल रहए। जे हवाक सिहकीमे नचैत रहए। तहि बीच दूटा पनिडूबी भुक दे जागल, जकरा अपना सभ पिहुओ कहै छिऐक। पिहुआकेँ तजबीज करितहि रहथि आकि एक जेर सिल्ली उड़ैत आबि पोखरिमे बैसल। तहि बीच जुगेसर रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘कक्का, ई तँ अपने इलाकाक पुरैनिक गाछ छी। फूलो ओहने बुझि पड़ै अए।’’
जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मूड़ी उठा पुरनि कऽ देखि कहलखिन- ‘‘हँ, हौ जुगेसर। छी तँ कमले।’’
हाथ-पएर धोए चारु गोटे घाटक उपरका सीढ़ीपर आबि ब्रह्मचारी जीकेँ हियाबै लगलथि। ब्रह्मचारी जीकेँ नहि देखि रमाकान्त सोचै लगलथि जे भरिसक ब्रह्मचारी जी कतौ गेल छथि। तहि बीच जुगेसरक नजरि करजान दिशि गेल। करजानमे ब्रह्मचारी जीकेँ देखि जुगेसर रमाकान्तकेँ कहलकनि- ‘‘काका, एक गोटे करजानमे काज कए रहल अछि। हम जा कऽ पूछि लइ छिअनि।’’
जुगेसरक बात सुनि रमाकान्तो आ महेन्द्रो आखि उठा कऽ देखलनि। मुदा ब्रह्मचारी जीक छुछुन चेहरा देखि रमाकान्तकेँ भेलनि जे कियो जौन मजदूर काज करैत अछि। तहि बीच ब्रह्मचारिये जीक कानमे रमाकान्तक आवाज पहुँचलनि, कानमे आवाज पहुँचतहि ब्रह्मचारी जी हाथक हँसुआ नेनहि पहुँचलथि।
ब्रह्मचारी जी अनेको भाषा आ बोलीक जानकार छथि। चारु गोटेकेँ देखि ब्रह्मचारी जी बुझि गेलथि। ई लोकनि मिथिलेक छथि किएक तँ जुगेसर आ रमाकान्तकेँ मिथिलेक ढंगसँ धोती पहिरने देखलनि। मुदा महेन्द्रकेँ देखि तत-मतमे पड़ल रहथि। श्यामाक साड़ी पहिरब देखि ब्रह्मचारी जीक मन मानि गेलनि जे ई सभ मिथिलेक छथि। मुदा रमाकान्त ब्रह्मचारी जीकेँ नहि चीन्हि पुछलखिन- ‘‘ब्रह्मचारी जी कते छथि?’’
ब्रह्मचारी जी साधारण धोती पहिरने रहथि। सेहो फाँड़ बन्हने। देहपर गमछा रहनि। ने बाबरी छटौने आ ने दाढ़ी रखने रहथि। ने गरदनिमे कंठी-माला आ ने देहमे जनेउ। मुस्कुराइत ब्रह्मचारीजी उत्तर देलखिन- ‘‘अहाँ सभ मिथिलासँ एलहुँ अछि। एना-ठाढ़ किएक छी। चलू बैसि कऽ गप-सप करब। ब्रह्मचारी जी अपने आबि जएताह।’’
कहि ब्रह्मचारी जी पोखरिक घाटपर हाँसू रखि हाथ-पएर धोए अंगनेमे मोथीक बिछान बिछौलनि। चारु गोटेकेँ बैसाए ब्रह्मचारी जी घरसँ एक घौर केरा निकालि अनलनि। केराक रंग-रुप देखि रमाकान्त बुझि गेलखिन जे ई तँ मिथिलेक गौरिया-मालभोग छी, अंठियाहा नहि छी। घौउरो नमहर। गछपक्कू, आँठी-आँठी जुआइल छलैक। सुआदो नीक हेतै, अपनेसँ पूर्ण जुआ कऽ पाकल अछि। धुकलाहा नहि छी। केराक घौड़ बीचमे राखल आ सभ किओ हाथ बगने। जुगेसर सोचैत जे खेने छी, पेटमे जगहे नहि अछि, नइ तँ सौँँसे घौड़ खा जइतियनि। रमाकान्त ब्रह्मचारी जीकेँ कहलकनि- ‘‘अखने, एक घंटा पहिने, भोजन केलहुँ, तेँ खाइक क्षुधा नहि अछि। मुदा ब्रह्मचारी आश्रमक परसाद छी, तेँ दू छीमी जरुर खाएब।’’
कहि दू छीमी उपरका हत्थासँ तोड़ि खेलनि।
रमाकान्तकेँ देखि महेन्द्रो आ जुगेसरो दू-दू छीमी तोड़ि खेलनि। श्यामा हाथ बगने रहथि। चुपचाप बैसल छलीह। श्यामाकेँ हाथ बागब देखि ब्रह्मचारी जी कहलखिन- ‘‘बहीन, अहाँ जाहि दुआरे हाथ बगने छी ओ हमहूँ बुझै छी। मुदा अपन मिथिलामे दुनू चलैन अछि। पतिक आगूमे पत्नीक नहि खाएब आ विवाहक प्रकरणमे समाजक माए-बहीन मिलि मौहक करैत छथि। जाहिमे पति-पत्नीकेँ संगे खुआओल जाइत अछि। तेँ अहूँकेँ लजेबाक नहि चाही। ई तँ सहजहि आश्रम छी। दोसर धर्मस्थानो छी।’’
ब्रह्मचारी जीक विचार सुनि श्यामाक मन डोललनि मगर व्यवहार मनकेँ रोकैत छलनि। असमंजसमे श्यामाकेँ देखि जुगेसर फनकिकेँ बाजल- ‘‘काकी, जब हमर घरनीक हाथ ढेकीमे कटि गेल रहनि, तखन हम अपने हाथे खुआबिअनि। अहाँ तँ सहजहि बृद्ध भेलहुँ।’’
जुगेसरक बात सुनि रमाकान्त मूड़ी झुका लेलनि। दू छीमी केरा श्यामो खेलनि। चारु गोटे केरा खा, पानि पीबि मूह पोछलनि।
ब्रह्मचारी जी रमाकान्तकेँ पुछलखिन- ‘‘एहिठाम अपने कोना-कोना ऐलिऐक?’’
महेन्द्र केँ देखबैत रमाकान्त कहलखिन- ‘‘ई जेठ बेटा छथि। डाॅक्टरी पढ़ि, नोकरी करै एहिठाम चलि अएलाह। सालमे एक बेर अपनो गाम जाइत छथि। बाल-बच्चा आ स्त्री आइ धरि गाम नहि गेलखिन अछि। तेँ दुनू परानीक मनमे आएल जे देशे-कोस आ बच्चो सभकेँ देखि आबी। तेँ एलहुँ?’’
महेन्द्र दिशि देखि ब्रह्मचारी जी पुछलखिन- ‘‘कते दिनसँ एहिठाम छी?’’
कनेक गुम्म भए समए मन पाड़ि महेन्द्र कहलकनि- ‘‘ई बाइसम बर्ख छी।’’
“एते दिनसँ एहिठाम रहै छी, मुदा कहियो भेट-घाँट नहि भेल।’’
अपन विबसता देखबैत महेन्द्र उत्तर देलखिन- ‘‘एक तँ नोकरी करै छी तहिपर डाॅक्टरी एहन पेशा छी जे भरि मन कहियो अरामो नहि कऽ पबैत छी। घुमनाइ-फीरिनाइक कोन बात। मुदा तैयो कहुना ने कहुना समए निकालि ऐबो करितहुँ से बुझले नहि छल।’’
“आइ कोना भाँज लागल? ’’
‘‘चारिम दिन रामेश्व रम् गेल रही, ओहिठाम एकटा पुजेगरी अपनेक संबंधमे कहलनि।’’
महेन्द्रक बात सुनि ब्रह्मचारी जी मुस्कुराइत कहए लगलखिन- ‘‘मासमे एक बेर हमहूँ रामेश्विरम् जाइ छी। समाजरुपी समुद्रक कातमे स्थापित रामेश्व र लग जाए समुद्रमे उठैत लहरिकेँ धियानसँ देखबो करैत छी आ बिचारबो करैत छी। दुनू तरहक लहरि समुद्रमे उठैत अछि- नीको आ अधलो। नीक लहरि देखि मन प्रसन्न होइत अछि आ अधला देखि मन जरै लगैत अछि। मुदा तैयो सोचैत रहै छी जे अधला लहरि बेसी उग्र नहि हुअए। आ नीक लहरि सदिखन उठैत रहए।’’
ब्रह्मचारी जीक विचार जना महेन्द्रक सुतल बुद्धिकेँ जगा देलकनि। अनायास महेन्द्रकेँ बुझि पड़ै लगलनि जे अन्हारसँ इजोतमे आबि गेलहुँ, आकि इजोतेसँ अन्हारमे चलि गेलहुँ। विचित्र स्थितिमे महेन्द्र पड़ि गेलाह। जाहि रुपमे माए-बाप आ जुगेसरकेँ अखन धरि देखैत छलाह ओ अनायास बदलै लगलनि। बीचसँ उठि महेन्द्र गाछी दिशि टहलै बिदा भऽ गेलाह। ब्रह्मचारी जी बुझि गेलखिन।
रमाकान्त ब्रह्मचारी जीकेँ पुछलखिन- ‘‘अपने मिथिला छोड़ि एहिठाम किएक आबि गेलहुँ ? जखनिकि ई इलाका दोसर धर्म, संस्कृति आ जातिक छी?’’
मुस्कुराइत ब्रह्मचारी जी कहै लगलखिन- ‘‘कोनो जाति पंथ आ संस्कृतिक आधार होइत छै जिनगी। जिनगीक आधार होइत छै मुनुक्खक बुद्धि, विचार आ कर्म। जखने मनुक्ख अपन सुपत कर्मसँ जिनगी ठाढ़ करैत अछि तखने धर्म, संस्कृति, विचार आ आचार सभ किछु बदलि, सही मनुक्खक निर्माण करैत अछि। जकरा हम महामानव धर्मात्मा आ उच्च कोटिक मनुष्य बुझैत छी, जे मिथिलांचलमे क्षीण भऽ रहल अछि। सोलहन्नी मरल नहि अछि मुदा दबाइत-दबाइत दुब्बर भऽ गेल अछि। मिथिलाक जे मूल बासी छथि हुनका अभिजात वर्ण वा कही तँ परजीवी वर्ण वा बाहरी लोक आबि सभ किछुकेँ बदलि, एहेन सामाजिक ढाँचामे ढालि देलकनि, जहि सँ अदौसँ अबैत संस्कृति दाबि अभिजात संस्कृतिकेँ बढ़ा देने अछि। जिनगीक सच्चाइकेँ दाबि बनौआ जिनगीमे बदलि देने अछि, जाहिसँ लोकक जिनगी वास्तविकतासँ हटि बौआ गेल अछि। ओना निर्मूल नष्ट नहि भेल अछि मुदा एतेक क्षीण जरुर भए गेल अछि जे नीक-अधलाहकेँ बेराएब कठिन भए गेल अछि। हम तँ सभ मनुष्यकेँ मनुष्य बुझैत छी। ने कियो कारी अछि आ ने कियो गोर। मुदा जिनगीक ढाँचा एहन बनि गेल अछि जे स्पष्ट रुपमे एक-दोसरसँ पैघ आ छोट बनि गेल अछि। ओना देखबै तँ बुझि पड़त जे सभ, एक दोसरसँ पैघ आ एक-दोसरसँ छोट अछि। मगर मकड़ा जेकाँ अपने पेटसँ सूत निकालि, जाल बुनि, ओहिमे सभ ओझरा गेल अछि।’’
ब्रह्मचारी जी आखि बन्न कए बजितहि रहथि आकि बिचहिमे रमाकान्त पूछि देलखिन- ‘‘अपने तँ प्रकाण्ड पंडित छी तखन मिथिलाकेँ किएक छोड़ि एहिठाम चलि एलहुँ ?’’
रमाकान्तक प्रश्नक सुनि ब्रह्माचारीजी गंभीर होइत कहै लगलखिन- ‘‘अहाँक बात हम मानैत छी मुदा पढ़ल-लिखलसँ मुरुख धरिक विचार एहेन बनि गेल अछि जहिमे नीक विचारकेँ सन्हिआइये नहि देल जाइत अछि। कहलो गेल छैक जे ‘असकर वृहस्पतिओ फूसि।’ ततबे नहि जेकरा कल्याणक जरुरत अछि ओहो नीक रस्ता धरैक लेल तैयारे नहि अछि! ‘जकरा लेल चोरि करी सएह कहै चोरा।’ की करबैक? जँ सिर्फ वैचारिके स्तरपर संघर्ष होए तँ संघर्ष कएल जा सकैत अछि, मुदा ततबे नहि अछि ? जिनगीक क्रियामे उपद्रव जे करैत अछि से तँ करबे करैत अछि जे जानोसँ खेलबार करैमे नहि चुकैत अछि ! अभिजात वर्ग एते सशक्त बनि गेल अछि जे जहिना कोनो साँढ़-पारा पाँकमे चलैत काल फँसि जाइत अछि आ परोपट्टाक नढ़िया, कुकुड़क संग गीध, कौआ आबि-आबि जीबितेमे आखि फोड़ि-फोड़ि खाए लगैत अछि, तहिना इमानदार मनुखोक संग होइत अछि। मुदा हारि मानैले नै हम तैयार छी आ ने मानब? जहिना नव सुरजक संग नव दिन शुरु होइत, तहिना नव मनुक्ख नव जिनगी बनबैक दिशमे बढ़ैत अछि, तेँ संतोष अछि।’’
रमाकान्त- ‘‘अपनेक परिवारमे के सभ छथि?’’
ब्रह्मचारी- ‘‘पिता गिरहस्त छलाह। पनरह बीघा खेत छलनि। ओहि खेतकेँ माता-पिता दुनू परानी उपजबै छलाह, जाहिसँ परिवार नीक जेकाँ चलैत छलनि। ओना रौदी-दाही होइते छलैक मुदा तैयो सहि-मरि कऽ ओहिसँ गुजर करैत छलाह। हम दू भाइ छी। घरे लग नवानी विद्यालयमे हम पढ़लहुँ किछु दिन लोहना पाठशालामे सेहो पढ़लहुँ। हमर छोट भाइ बच्चेसँ पिताजीक संग खेती करैत छलाह। नहि पढ़लनि। माइयो आ बाबूओ मरि गेलाह। हम विआह नहि केलहुँ। भाइकेँ विआह करा सभ किछु छोड़ि अपने घरसँ निकलि गेलहुँ। मनमे छल जे मिथिलामे जे कुरीति, कुव्यवस्था आ कुचालिमे समाज फँसल अछि ओकरा सुधारि सुरीति, सुव्यवस्था आ सुचालि दिशि लए चली। ताहि पाछू लगि गेलहुँ। मुदा वेबस भऽ छोड़ि चलि एलहुँ। कारण एहिठामक नियामक आ नियामकक पाछु पढ़ल-लिखल-जे अपनाकेँ पंडित बुझै छथि- लोकसँ लऽ कऽ अभिजात लोकनि, सभ मनुक्खक साँचकेँ ओहन बना देने छथि, जहिसँ कुपात्र छोड़ि सुपात्रक निर्माणे ने होइत। जकरा चलैत छीना-झपटी, बलात्कार चोरि, छिनरपन, जातीय उन्माद, धार्मिक उन्माद वा ई कहियौ जे मनुक्ख बनैक जते रस्ता अछि सभ नष्ट भऽ गेल अछि। सबहक जड़िमे सम्पति घुरिकऽ काज कए रहल अछि। जहि पाछू पड़ि सभ बताह भऽ गेल अछि। सभसँ दुखद बात तँ ई अछि, जे नीक सँ नीक, पैघसँ पैघ आ विद्वानसँ विद्वान धरि, बजताह किछु आ करताह किछु। जहिसँ समाजक बीच सत्य बजनाइ मेटा गेल अछि। एहेन समाजमे नीक लोकक रहब कोना संभव हएत। तेँ छोड़ि कऽ पड़ा गेलहुँ। देहक सुखक पाछू सभ आन्हर भऽ गेल अछि।’’
ब्रह्मचारी जीक बात सुनि रमाकान्तकेँ धनक प्रति मोह भंग हुअए लगलनि। सोचै लगलाह जे हमरो दुइ सए बीघा जमीन अछि, ओते जमीनक कोन प्रयोजन अछि। जँ ओहि जमीनकेँ निर्भूमिक गरीबक बीच बाँटि दिऐक तँ कते परिवार आ कत्ते लोक सुख-चैनसँ जिनगी जीबै लगत। जकरा लेल जमीन रखने छी ओ तँ अपने तते कमाइ छथि जे ढेरिऔने छथि। अदौसँ मिथिला तियागी महापुरुषक राज रहल, किएक ने हमहूँ ओहि परम्पराकेँ अपना, परम्पराकेँ पुनर्जीवित कए दिऐक। एते बात रमाकान्तकेँ मनमे अबितहि, ब्रह्मचारी जीकेँ पुछलखिन- ‘‘अपने एहि जिनगीसँ संतुष्ठ छी?’’
रमाकान्तक प्रश्न् सुनि हँसैत ब्रह्मचारी जी उत्तर देलखिन- ‘‘हँ, बिल्कुल संतुष्ट छी। एहिसँ नीक जिनगी की भए सकैत छैक। दुनियाक जते भाषा अछि, ओहि भाषाक उद्भव, विकास आ साहित्यक सभ पोथी पुस्तकालयमे रखने छी। ततबे नहि, दुनियामे जते धार्मिक सम्प्रदाए अछि ओकरो पुस्तक रुपमे रखने छी आ अध्ययन करैत छी। वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, संहिता, ज्योतिष, पुराण, रमाएणक संग बाइबिल, कुरान, गुरु ग्रन्थ सेहो रखने छी। सभ दर्शनक पोथी सेहो अछि। शरीर निरोग रखैक दुआरे किछु समए शारीरिक श्रम करैत छी, बाकी समए अध्ययन, चिन्तन-मननमे रमल रहै छी। मासमे एक दिन सभ धार्मिक सम्प्रदायिक पंडित सभकेँ बजा, अपन-अपन सम्प्रदाएपर व्याख्यान करबैत छी। एक दिन राजनीतिक व्याख्यान, एक दिन साहित्यिक व्याख्यान मासमे करबैत छी। एहि सबहक अतिरिक्त एक दिन किसान गोष्ठी, एक दिन चिकित्सा गोष्ठी, एक दिन विज्ञान गोष्ठीक संग आइक वैश्वीकरणक, दुनियामे विज्ञानसँ नीक-अधलापर विचार-विमर्श करबैत छी। समए कोना बीति जाइत अछि से बुझबे ने करै छी।’’
ब्रह्मचारी जी बजितहि रहथि आकि महेन्द्र सेहो आबि गेला। उन्मत्त पागले जेकाँ महेन्द्रक चेहरा बुझि पड़ैत छलनि। रमाकान्तो बाहरी दुनियासँ निकलि भीतरी दुनियाँक बाट पकड़ि लेलनि।
चारु गोटे ब्रह्मचारी जीक पएर छुबि गोर लागि चलैक विचार केलनि। चारु गोटेकेँ अरिआति ब्रह्मचारी जी गाड़ीमे बैसाए अपने घुरि गेलाह। गाड़ीमे कियो ककरोसँ गप-सप नहि करै चाहैत। सभ अपने-आपमे डूबि गेलाह। डेरा अबितहि रमाकान्त महेन्द्रकेँ कहलखिन- ‘‘बौआ, आब हम एक्को दिन नहि अँटकब। गामक सुरता खीचि लेलकहेँ, तेँ जते जल्दी भए सकै बिदा कए दिअ?’’
“बड़बढ़िया।’’ आइये टिकट बनबा लइ छी। एहिठामसँ दरभंगाक गाड़ी साप्ताहिक अछि तेँ अपना धड़फड़ेने तँ नहि ने होएत। अगर टिकटो बनि जाइत तैयो पाँच दिन रहए पड़त।’’
आठ बजे रातिमे सभ कियो एकठाम बैसि अपन गामक संबंधमे गप-सप करै लगलाह। गाममे अप्पन बीतल दिनक चर्चा करैत महेन्द्र बजलाह- ‘‘की जिनगी छल आ अखन की अछि, एहि विषयपर अखन धरि विचारैक अवसरे नहि भेटल। जहिना आकासमे चिड़ै-चुनमुनी उन्मुक्त भए उड़ैत अछि तहिना बच्चामे छल। ने कोनो चिन्ता आ ने फीकिर। जहिना मध्यम गतिसँ गाड़ी-सवारी चलैत अछि, तहिना छल। ने कोनो प्रतियोगिता परीक्षाक लेल चिन्ता आ नोकरीक जिज्ञासा छल। साधारण गतिसँ आई.एस.सी. पास केलहुँ आ मेकिल कओलेजमे नाम लिखा डाॅक्टर बनलौं। डाॅक्टर बनलाक बाद नोकरी आ पाइक भूख जगै लगल। जाहिसँ अपन गाम, अपन इलाका छोड़ि हजारो कोस दूर आबि गेल छी। एहिठाम आबि बजारु समाज आ संस्कृतिमे फँसि अपन परिवार, समाज सभ छुटि गेल। जते पाइ कमा सुख-भोगक कल्पना करै छी, ओते काजक बोझ बढ़ल जाइत अछि। फेर सुख-भोगक लेल समए कहाँ बचैत अछि। समएक एत्ते अभाव रहैत अछि जे कताक दिन अखबारो नहि पढ़ि पबैत छी। अखन धरिक जे विचार जिनगीक संबंधमे छल, आइ बुझै छी जे भ्रमक छल। एते दिन अपने सुख टाकेँ सुख बुझैत छलहुँ मुदा आब बुझि पड़ैत अछि जे अपने सुख टा सुख नहि छी। हर मनुष्यकेँ जिनगी चलैक जे आवश्यएक वस्तु अछि ओ पूर्ति हेबाक चाहिऐक तखने ओ चैनसँ जिनगी बिता सकैत अछि। मनुष्यसँ परिवार बनैत छैक आ परिवारसँ समाज। मनुष्योक कर्तव्य बनैत छैक जे सभसँ पहिने ओ अपना पएरपर ठाढ़ भए परिवारकेँ ठाढ़ करए। परिवार ठाढ़ भए जाएत तँ समाज स्वतः ठाढ़ भए आगू बढ़ै लगत। ओना सुख की थिक? सभसँ पहिने एहि बातक विचार कऽ लेबाक चाही। पंचभौतिक शरीर आ आत्माक संयोगसँ मनुष्य बनैत अछि। सुख-दुख, नीक-अधला आत्माक अनुभूति थिक, नहि कि शरीरक। ओना दुनियाँक जते मनुक्ख अछि सभकेँ एक स्तरसँ चलैक चाहिऐक, मुदा से तँ नहि अछि! दुनिया देशमे बँटल अछि आ देशक शासन व्यवस्था आ समाज खण्ड-पखण्ड भए भिन्न-भिन्न भाषा, भिन्न-भिन्न संस्कृति आ भिन्न-भिन्न जातिमे बँटल अछि, जाहिसँ खान-पान, रीति-रेबाज, चालि-ढालिमे भिन्नता छैक। कहैले तँ हमहूँ मनुक्खेक सेवा करैत छी, मुदा पाइक दुआरे हम पाइबलाक सेवा करैत छी। बिनु पाइबलाक सेवा कहाँ भए पबैत अछि, जकरा सभसँ बेसी जरुरत छैक। अभावमे ओ खेनाइ-पीनाइसँ लऽ कऽ घर-दुआर, कपड़ा-लत्ता, दवाइ-दारु, सभसँ बंचित रहि जाइत अछि। जेकर चलैत गरीब लोकक जिनगी जानवरोसँ बदतर बनि गेल छैक। ओ सभ मनुक्खक शक्लमे जानवर बनि जीबैत अछि। जहि मनुष्यक जरुरत ओकरा सभकेँ छैक ओ अपने पाछू तबाह अछि।’’
डाॅक्टर महेन्द्रक बात, सभ केयो धियानसँ सुनलनि। रमाकान्त कहलखिन- ‘‘बौआ, जइ गाममे तोहर जन्म भेलह आ जहि माटि-पानिमे रहि डाॅक्टर बनलह, ओहि गामक लोक उचित इलाजक दुआरे मरि जाए, कते दुखक बात थिक?’’
रमाकान्तक प्रश्नम सुनि सभ केयो गुम्म भए गेलाह। केयो किछु नहि बाजि पबैत रहथि। सभ सबहक मूह देखैत छलाह। हजारो कोसपर गाम अछि। कोना एहिठामसँ ओहिठाम इलाज भए सकैत छैक? सभक मनमे सवाल नचैत छलनि। बड़ी कालक बाद महेन्द्र मूह खोललनि- ‘‘बाबू, सवाल तँ एहन भारी अछि जे जबावे नहि फुरैत अछि। मुदा एकटा उपाए मनमे अबैत अछि।’’
“की?”
‘‘अहाँ गाम जाएब तँ दू गोटे एकटा लड़का, एकटा लड़की जे कम्मो पढ़ल लिखल हुअए, केँ एहिठाम पठा दिअ। ओहि दुनू गोटेकेँ ऐठाम राखि छह मास पढ़ा पठा देब। जे तत्काल इलाज करब शुरु कए देत। संगहि हम सभ चारि गोटे सालमे एक-एक मासक लेल जाइत रहब आ जहाँ धरि भए सकत तहाँ धरि इलाज करैत रहब। तहि बीच जँ कोनो जरुरी रोग उपकि जाए तँ फोनसँ कहि सेहो बजा लेब। नहि तँ लहेरियासराय अछिये।”
महेन्द्रक विचार रमाकान्तकेँ जँचलनि। मुस्कुराइत कहलखिन- ‘‘बौआ, गामक लोक तँ गरीब अछि, ओ कोना इलाज करा सकत?’’
गरीबक नाम सुनि धाँए दऽ रबिन्द्र उत्तर देलकनि- ‘‘बाबू, हम सभ बहुत कमाइ छी। जते इलाजमे खर्च हेतैक से देबै। ततबे नहि! अखन अहाँ जाउ, पहिने दू गोरेकेँ पठा दिअ। अगिला मासमे आएब, एकटा स्वास्थ्य केन्द्र बनाएब। जहिमे सबहक इलाज हेतैक।’’
रविन्द्रक विचारसँ सभक ठोरपर हँसी अएलनि। रमाकान्तक मनमे उठलनि- ‘‘हमरे दू सए बीघा जमीन अछि, मुदा छी कैक गोटे? जँ इमनदारीसँ देखल जाए तँ की हमहीं चोर नहि। महाभारतो मे कहल गेल छैक जे, जे जरुरतसँ बेसी सम्पत्ति रखने अछि, ओ चोर अछि। जे पिता जी बरोवरि कहैत रहैत छलाह। ओना अनका जेकाँ हम बेइमानी कएकेँ खेत नहि अरजने छी मुदा ढेरिया कऽ तँ रखनहि छी।
गप-सप करैत साढ़े दस बजि गेल। भानसो भए गेलैक। सभ केयो गप-सप छोड़ि खाइले गेलाह।
दोसर दिनसँ चारु गोटे बिदाइक जोगारमे लगि गेलथि। कतेक गोटेसँ दोस्ती चारु गोटेकेँ, जकरा सभक काज उद्यममे इहो सभ नोत पुरने। तेँ सभकेँ जानकारी देब उचित बुझि चारु गोटे अपन-अपन अपेक्षितकेँ जानकारी देमए लगलखिन। अपनो सभ फुट-फुट माता-पिताक बिदाइमे जुटि गेल।
एहि चारि दिनक बीच रमाकान्त टहलब-बुलब छोड़ि, दिन-राति आत्मनिष्ट भए, सोचमे डूबल रहै लगलाह। चाह पीबै बेरि चाह पीबि पान खा, भोजन बेरि भोजन कए, भरि दिन पलंगपर पड़ल-पड़ल जिनगीक संबंधमे सोचै लगलथि। अखन धरि एक्केटा दुनिया बुझै छेलिऐ जे आब दोसरो दुनिया देखै छिऐक। एक दुनिया बाहरी, जकरा उपरका आखिसँ देखैत छी, दोसर दुनिया शरीरक भीतर अछि, जहि दुनियाकेँ अखन धरि नहि देखैत छलहुँ। बाहरी दुनियासँ भीतरी दुनिया फुलवाड़ी जेकाँ सुन्दर अछि। जहिमे आशाक जंगल पसरल अछि।
पाँच बजे साँझमे मद्रास स्टेिशनसँ दरभंगाक गाड़ी खुजैत अछि। आरक्षित टिकट, मनमे बेसी हलचलो नहिये छलनि। गाड़ी पकड़ैक हलचल तँ ओहि यात्रीकेँ होएत जे साधारण बोगीमे टटका टिकट कटा सफर करैत अछि। मुदा आरक्षित बोगीमे तँ गनल सीट आ गनल टिकट होइत अछि। बाइली यात्रीकेँ तँ चढ़ै नहि देल जाइत अछि। दुइये बजेसँ सभ समान अटैची कार्टूनमे सैंति तैयार केलनि। रस्ताक लेल फुटसँ एकटा झोरामे खाइक सभ सामान सेहो दए देलकनि। दस लिटरा गैलनमे पानि। थर्मसमे चाह। पनबट्टीमे पान। एक कार्टून विदेश शराब जे डाॅक्टर सुजाता रमाकान्तकेँ आखिक इशारासँ कहि देने रहनि।
चारि बजे, परोठा-भुजिया खाए रमाकान्त, श्यामा आ जुगेसर तीनू गोटे नव वस्त्र पहीरि तैयार भए गेलाह। स्टेशनो लगे, तेँ बिदा हेबाक हड़बड़ियो नहिये। मुदा सामान बेसी तेँ गाड़ी खुजैसँ पहिनहि स्टेगशन पहुँचब जरुरी छनि। ओना गाड़ी मद्रासेसँ बनि कऽ चलैत तेँ सामानो रखैमे परेशनियो नहिये रहनि। सबा चारि बजे सभ डेरासँ बिदा भए गाड़ी पकड़ै चललाह।



छुट्टी दिन रहितहुँ हीरानन्द गाम नहि गेलाह। ओना लगमे गाम रहने शनिकेँ गाम आ सोमकेँ स्कूल खुजबासँ पहिने चलि अबैत छलाह। मुदा रमाकान्त नहि रहने, परिवारक सभ भार देने गेल रहथिन। गोसाइक धाही दैते ओ नहा, चाह पीबि बौएलाल ऐठाम चललाह। मने-मन यैह होनि जे रमाकान्त कहने रहथि जे मद्रास जाइ छी, धिया-पूताकेँ देखि-सुनि लगले घुमि जाएब। मुदा आइ पनरहम दिन भऽ रहल छनि अखन धरि किएक ने अएलाह। ओना दुरसो छैक आ परिवारोक सभ तँ ओतै छनि ते जँ बिलंबो भेलनि तँ स्वभाविके छैक। रस्तामे जे धिया-पूता देखनि हाथ जोड़ि-जोड़ि प्रणाम करनि। हीरोनन्द सभकेँ असिरवाद दैत आगू बढै़त जाइत रहथि। बौएलालक घरसँ थोड़े पाछुए रहथि आकि बौएलाल देखलकनि। देखितहि आगू बढ़ि, प्रणाम कऽ, संगे-संग अपना ऐठाम लऽ गेलनि। हीरानन्दकेँ पाबि बौएलाल बहुत किछु सिखबो केलक आ सुधरबो कएल। अपन एकचारी बैसारमे बैसबैत पानि अनै आंगन गेल। आंगनसँ लोटामे पानि नेने आबि पएर धोए लेल कहलकनि। लोटामे पानि देखि हीरानन्दक मनमे मिथिलाक वेबहार नाचि उठलनि। सोचै लगलथि जे पूर्वज कते विचारवान छलाह जे एते चलौलनि। पएर धोए हीरानन्द चौकीपर बैसलाह। बौएलाल चाह बनबै आंगन गेल। माएकेँ चाह बनबै नहि होइत छलैक। तहि बीच अनुपो बाड़ियेमे खुरपी छोड़ि, मटिआयले हाथे आबि मास्टर साहबकेँ प्रणाम कए चौकीक निच्चामे एकचारीक खुँटा लगा बैसल। मटिआएल हाथ देखि मास्टर साहेब पुछलखिन- ‘‘कोन काज करै छलौं ?’’
मटिआएल हाथ रहितहुँ अनुपकेँ संकोच नहि होइत छलैक। निःसंकोच भऽ उत्तर देलकनि- ‘‘बाड़ीमे गेनहारी साग बाउग केने छी, ओइमे तते मोथा जनमि गेल अछि जे सागकेँ झाँपि देने अछि, ओकरे कमठौन करै छलौं।’’
सागक कमठौन सुनि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘चलू, जाबे बौएलाल अबै अए, ताबे कनी हमहूँ देखि ली।’’
कहि उठि बिदा भेला। मास्टर सहैबकेँ ठाढ़ होइत देखि अनुपो ठाढ़ भऽ आगू-आगू बिदा भेल। धुर दुइऐकमे साग बाओग छलैक। साग देखि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘जिनगीमे आइये हम एहन गेनहारी देखलौं। ई तँ अद्भुत अछि। किएक तँ एक रंग पत्ताबला गेनहारी तँ अपनो उपजबै छी, मुदा ई तँ फूल जेकाँ लगै अए। अधा पात लाल आ अधा पात हरियर छैक। कत्तेसँ ई बीआ अनलौं ?’’
मास्टर साहेबक जिज्ञासा देखि अनुप कहै लगलनि- ‘‘हम सढ़ूआड़य नोत पुरै गेल रही। ओतए देखलिऐ। देखि कऽ मन हलसि गेल। ओतैसँ अनलौं। करीब दस बर्खसँ सब साल करै छी। खाइत-खाइत जखन डाँट जुआ जाइ छै, तखन छोड़ि दैत छिऐ। ओहिमे तत्ते बीआ भऽ जाइ अए जे अपनो बाउग करै छी आ जे मंगलक तेकरो दै छिऐ।’’
“अइ बेर हमरो थोड़े देब।’’
“बड़बढ़िया।’’
दुनू गोटे घुरि कऽ आबि पुनः एकचारीमे बैसलाह। तहि बीच बौएलालो चाह बनौने आएल। दुनू गोटेकेँ चाह दए आंगन जा, अपनो लेलक आ माइयोकेँ देलक। चाह पीबि, माए –रधिया- घोघ तनने दुआरपर आबि मास्टर सहेबकेँ गोर लगलकनि। सूखल शरीर, केश पाकल, आखि धसल रधियाक। रधियाक देह देखि मास्टर सहेबक मन तरे तर बाजि उठलनि- ‘‘हाए, हाए रे गरीबी, आगियोसँ तेज धधड़ा गरीबीक होइत छैक। पैंतीस-चालिस बर्खक शरीरक ई दशा बना दैत छैक।
मुस्की दैत एकटा आँखि उघारि रधिया बाजलि- ‘‘आइ हमर भाग जगि गेल जे मास्टर-सहाएब ऐलाह। बिनु खेने-पीने नइ जाए देबनि। जे कन-सागक उपाए अछि से बिनु खुऔने नइ जाए देबनि।’’
रधियाक स्नेह भरल शब्द सुनि हीरानन्दक आखि सिमसि गेलनि। दुनू तरहथीसँ दुनू आखि पोछैत बजलाह- ‘‘ओना तँ घुमैक विचारसँ आएल छलहुँ, मुदा अहाँ सभक स्नेह बिना खेने जाइ नहि दिअए चाहैत अछि। जरुर खाएब।’’
घरमे सुपारी नहि रहने बौएलाल सुपारी आनै दोकान गेल। तहि बीच मास्टर साहेब अनुपके पुछलखिन- ‘‘अहाँक पुरखा कते दिनसँ एहि गाममे रहैत आएल छथि?’’
हीरानन्दक प्रश्न सुनि अनुप छगुन्तामे पड़ि गेल। मने-मन सोचै लगल जे एहन बात तँ आइ घरि क्यो ने पूछने छलाह। मास्टर साहेब किएक पुछलनि। मुदा मास्टर-साहेबक उपकार अनुपक हृदयमे एहि रुपे बैसल छलनि जे आत्माक दोसर रुप बुझैत छला। हुनके पाबि बेटा दू आखर पढ़बो केलक आ मनुक्खोक रस्ता सिखै अए। हँसैत अनुप कहै लगलनि- ‘‘मास्टर सहाएब, हमरा बाउकेँ अपना घरारियो ने रहै। अनके जमीनमे घरो बन्हने रहै आ अनके हरो-फाड़ जोतए। अनके खेतमे रोपनि-कमठौन सेहो करै। हम धानोक सीस आ रब्बी मासमे खेसारियो-मौसरी लोढ़ी। अनके गाइयो पोसिया नेने रहै। सालमे जते पाबनि-तिहार होए आ अनदिनो जे करजा बरजा लिअए ओ ओही गाइएक दूधो बेचि कऽ आ लेरु जे होए, ओहो बेचि कऽ करजा सठाबै। एक दिन बाउक मन खराप रहै। गिरहत आबि कऽ भार बेटी ऐठाम दए अबै ले कहलकै। बाउक मन बेसी खराब रहै तेँ जाइसँ नासकार गेल। तइपर ओ बेटाकेँ सोर पड़लकै। बेटा एलै। दुनू बापुत हमरा बाउकेँ गरिऐबो केलकै आ अंगनाक टाट-फड़क उजाड़ि कऽ कहलकै जे हमर घरारी छोड़ि दे। हमर बाउ कतेक गोरेकेँ कहबो केलकै मुदा सभ ओकरे दिस भऽ गेलै। तखन हमर बाउ की करैत, तेँ माटिक तौला-कराही छोड़ि, थारी-लोटा, नुआ-बिस्तर, हाँसु-खुरपीक मोटरी बान्हि बाउ, माए आ हम तीनू गोरे ओइ गामसँ भागि गेलौं। गामसँ निकलि, बाधमे एकटा आमक गाछ रस्ते पर रहै, ओइठिन आबि कऽ बैसलौं। बाउकेँ बुकौर लगै। दुनू आखिसँ दहो-बहो लोर खसै। माइयो कानए। थोड़े खान ओइठिन बैसलौं। तखन फेर बिदा भेलौं।’’
बजैत-बजैत अनुपक दुनू आखिमे नोर आबि गेलै। अनुपक नोर देखि हीरोनन्दक आखिमे नोर आबि गेलनि। रुमालसँ नोर पोछि पुनः पुछलखिन- ‘‘तब की भेल?’’
अनुपक हाथ मटिआएल रहै तेँ हाथसँ नोर नहि पोछि गट्टासँ नोर पोछि पुनः बाजै लगल- ‘‘ई मात्रिक छी। नाना जीबिते रहए। हुनका एक्केटा बेटी रहनि। हमरे माए टा। जखन तीनू गोरे ऐठाम एलौं तँ ननो आ नानियो अंगनेमे रहए। नानी आ माए दुनू, बाँहिसँ दुनू गरदनिमे जोड़ि कानै लगल। बाउओ कनै लगल। नाना हमरा कोरामे उठा नोर पोछैत अंगनासँ निकलि, डेढ़ियापर बुलबै लगल। थोड़े खान नानी कानि, मोटरीकेँ घरमे राखि हाँइ-हाँइ चुल्हि पजारै लागलि। मुदा माए कनिते रहल।’’
बिचहि मे हीरानन्द पुछलखिन- ‘‘नाना गुजर कोना करैत छलाह?’’
“अहाँसँ लाथ कोन मासटर सैब। महिनामे आठ-दस साँझ भानसो ने होए। हम बच्चा रही तेँ नानी बाटीमे बसिया भात-रोटी राखि दिअए। सैह खाए छलौं।’’
अनुपक बात सुनि हीरानन्दक हृदय पघिलए लगलनि। अनुपकेँ कहलखिन- ‘‘जाऊ, काजो देखिऔ। बौएलाल तँ आबिये गेल।’’
मास्टर साहेबक आदेशसँ अनुप फेरो साग कमाइ ले चलि गेल। बौएलाल आ हीरानन्द रमाकान्तक चर्चा करै लगलाह। बौएलाल बाजल- ‘‘करीब पनरह दिनक धक लगि गेल हएत, अखन धरि बाबा किएक नहि अएलाह। बाजि कऽ गेल रहथि जे आठ दिनक भीतरे चलि आएब। किछु भऽ नै तँ गेलनि।’’
हीरानन्द- ‘‘अखन धरि कोनो खबरियो नहि पठौलनि, जे बुझितिऐ।’’
दुनू गोटे उठि कऽ बाड़ी दिशि टहलै बिदा भेला। अनरनेबाक गाछ देखि हीरानन्द हिया-हिया कऽ देखै लगलाह। पहिल खेपक फड़, तेँ नमहर-नमहर रहैक। गोर-दसेक फड़ नमहर आ जेना-जेना फड़ उपर होइत जाइत तेना-तेना छोटो खिच्चो। पान-सातटा फड़ छिटकल। जहिमे एकटा कऽ लाली पकड़ि नेने रहए। हीरानन्द बौएलालकेँ ओंगरीसँ देखबैत बजला‍ह- ‘‘बौएलाल, ओ फड़ तोड़ि लाए। खूब तँ पाकल नहि अछि मुदा खाइ जोकर भऽ गेल आछि। हम सभ तँ दँतगर छी की ने।’’
गाछ बेसी नमहर नहि। हाथेसँ बौएलाल ओहि फड़केँ तोड़ि, डंटीसँ बहैत दूधकेँ माटिपर रगड़ि देलक। दुनू गोटे घुरि कऽ आबि गेलाह। हीरानन्द चौकीपर बैसलथि आ बौएलाल अनरनेबा रखि आंगन गेल। आंगनसँ कत्ता आ एकटा छिपली नेने आएल। कत्तासँ अनरनेबाकेँ सोहि टुकड़ी-टुकड़ी कटलक। छिपली भरि गेल। भरलो छिपली बौएलाल हीरानन्दक आगूमे देलकनि। भरल छिपली देखि हीरानन्द बजलाह- ‘‘एत्ते हमरे बुते खाएल हएत। पान-सातटा खंडी खाएब। बाकी आंगन लऽ जाह।’’
बौएलाल सैह केलक। अनरनेबा खा पानि पीबि हीराननद बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘चलू, थोड़े टहलि आबी?’’
दुनू गोटे रस्ते-रस्ते टहलै लगलथि।
जाधरि दुनू गोटे टहलि-बूलिकेँ अएलाह ताधरि रधिया अरबा चाउरक भात, माछक तीमन आ माछक तरुआ बनौलनि। भानस कए रधिया चिक्कनि माटिसँ ओसार नीपि, हाथ धोए कम्मल चौपेत कऽ बिछौलक। थारी-बाटी, लोटा आ गिलासकेँ छाउरसँ माँजि धोलक। लोटा-गिलासमे पानि भरि कम्मलक आगूमे रखि बौएलालकेँ बजौने आबैले कहलक। आंगन आबि हीरानन्द कम्मलपर बैसि मने-मन सोचै लगलाह। भोजनसँ तँ पेट भरैत अछि मुदा मन तँ सिनेहेसँ भरैत अछि, जे भेटि रहल अछि। तहि बीच बौएलाल घरसँ थारी निकालि आगूमे देलकनि। गम-गम करैत भात तहिपर माछक नमहर-नमहर तरल कुटिया। जम्बीरी नेबोक खंड। बाटीमे तीमन। भोजन देखि, मुस्की दैत हीरानन्द रधियाकेँ कहलखिन- ‘‘अलबत्त ढंगसँ भोजनक व्यवस्था केने छी। देखिये कऽ पेट भरि गेल।’’
मास्टर साहेबक बात सुनि खुशीसँ रधियाकेँ नहि रहल गेलै, बाजलि- ‘‘माहटर बाबू, अहाँ पैघ छी। देबता छी। हमर भाग जे हमरा सन गरीब लोकक ऐठाम भात खाइ छी।’’
रधियाक बात सुनि ओ बुझि गेलखिन जे ओ भातकेँ कऽ अशुद्ध बुझि कहलनि। मुदा ओहि विचारकेँ झपैत कहलखिन- ‘‘बौएलाककेँ छोट भाइ बुझै छिऐ आ परिवारकेँ अपन परिवार बुझैत छी। तखन भात रोटी खाइमे कोन संकोच।’’
हीरानन्दक विचार सुनि रधियाक हृदय साओनक मेघ जेकाँ उमड़ि पड़लनि। मनमे हुअए लगलनि जे अपन जिनगीक सभ बात कहि सुनबिअनि। उत्साहित भऽ बजै लगलीह- ‘‘माहटर बाबू, एहनो दुख कटने छी जे एक दिन ममिओत भाए आएल रहै। घरमे एक्को तम्मा चाउर नइ रहै। चिन्ता भऽ गेल जे भाइकेँ खाइले की देबैक। तीन-चारि अंगना चाउर पैंचले गेबो केलौं मुदा सबहक हालति खराबे रहै। अपने ने रहै तँ हमरा की दैत। हारि कऽ मड़ुआ रोटी आ सीम-भाँटाक तीमन रान्हि कऽ भाइयोकेँ खाइ ले देलिऐ आ अपनो सब खेलौं। मुदा अखन तँ रमाकान्त कक्का परसादे सब कुछ अछि।’’
थारीमे बाटीसँ झोर ढारैत हीरानन्द पुछलक- ‘‘पहिलुका आ अखुनकामे कते फर्क बुझि पड़ै अए?’’
“माहटर बाबू, अहाँसँ लाथ कोन ! ओइ हिसाबे अखन राजा भऽ गेलौं। पहिने कल्लर छलौं। हरदम पेटेक चिन्ता धेने रहै छल।’’
मूहक भात आ माछ चिबबैत रहथि आकि दाँतक गहमे एकटा काँट गड़ि गेलनि। भात घोंटि आंगुरसँ काँट निकालि थारीक बगलमे रखि हीरानन्द पुछलखिन- ‘‘पहिने जत्ते खटै छलौं तइसँ अखन बेसी खटै छी आकि कम ?’’
“पहिने बेसी खटै छलौं। बोइन कऽ के आबी तखन अंगनाक काजमे लगि जाए। अंगनाक काज सम्हारि भानस करी। भानस करैत-करैत बेर झुकि जाए। तखन खाइ।’’
ओसारपर बैसल अनुप रधियाकेँ चोहटैत बाजल- ‘‘मास्टर सहाएबकेँ भोजन करै देबहुन आकि नहि?’’
अनुपक बात सुनि हीरानन्द बजलाह- ‘‘अहाँ तमसाइ किएक छिअनि। भोजनो करै छी आ गप्पो सुनै छी। जे बात काकी कहै छथि ओ बड्ड नीक लगै अए।’’
मास्टर साहेबक समर्थन पाबि रधियाक मनमे आरो उत्साह जगि गेलैक। होइ जे जते बात पेटमे अछि, सभ बात मास्टर साहेबकेँ सुना दिअनि। बाजलि- ‘‘माहटर बाबू बरखमे अधासँ बेसी दिन सागेक तीमन खाइ छलौं। माघ-फागुनमे, जखन खेसारी-मसुरी उखड़ै आ बोइन जे हुअए, दस-पाँच दिन दालि खाइ। नइ तँ बाड़ी-झाड़ीमे जे तीमन-तरकारी हुअए, से खाइ। बेसी काल सागे खाइ। खेसारी मासमे महीना दिन दुनू साँझ चाहे खेसारी साग खाइ नइ तँ बथुआ।’’
खेसारी सागक नाम सुनि हीरानन्द पुछलक- ‘‘खेसारी साग कोना बनबैत छी?’’
मास्टर साहेबक प्रश्नन सुनि अनुपोकेँ पछिला बात मन पड़ितहि खुशी एलैक। मुस्की दैत बाजल- ‘‘राड़िन बुते कतौ खेसारी साग रान्हल हुअए।’’
अनुपक बातकेँ धोपैत हीरानन्द बजलाह- ‘‘खेसारी सागमे कँचका मिरचाइ आ लसुनक फोरन दऽ हमरो कनियाँ बनबैत छथि। हमरा बड़ सुन्दर खाएमे लगै अए।’’
व्यंग्यक टोनमे अनुप बाजल- ‘‘अहाँ सबहक कनियाँक पड़तर राड़िनकेँ हेतै। हमही छी जे एहेन लोकक गुजर चलै छै। नइ तँ......?’’
व्यंग्यक भाव बुझि हीरानन्द चुप्पे रहलाह। मुदा फनकि कऽ रधिया एक लाड़नि चलबैत बाजलि- ‘‘नै तँ सासुरमे बास नइ होइतै?’’
अनुप- ‘‘मन पाड़ू जे जइ दिन अइठिम आएल रहए तइ दिन कोन-कोन लुरि रहए। जँ सासु नहि सिखबैत तँ कोनो लुरियो होइत?’’
पासा बदलैत रधिया बाजलि- ‘‘माए आ सासुमे की अन्तर होइ छै। जहिना अपन माए तहिना घरबलाक माए। सिखलौं तँ।’’
रधिया अनुप दिशि तकैत, अनुप रधिया दिस। मुदा दुनूक मनमे क्रोध नहि स्नेह रहैक। तेँ वातावरण मधुर रहैक। हीरानन्द सागक संबंधमे कहै लगलखिन- ‘‘अपना सबहक पूर्वज बहुत गरीब छलाह। अखुनका जेकाँ समयो नहि छल। बेसी काल ओ सभ सागे खाइत छलाह।’’
जेहने भोजन बनल, तेहने पवित्र बरतन छलनि। आ ताहूसँ नीक बैइसैक जगहक संग ऐतिहासिक गप-सप। जते वस्तु हीरानन्दक आगूमे आएल छलनि रसे-रसे सभ खा लेलनि। पानि नहि पीलनि, किएक तँ ने गारा लगलनि आ ने बेसी कड़ू रहैक। भोजन कए बाटियेमे हाथ धोए उठलाह। उठि कऽ बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘एते कसि कऽ आइ धरि भोजन नहि केने छलहुँ।’’
आंगनसँ निकलि एकचारीमे आबि सोझे पड़ि रहलाह। पड़ले-पड़ल अनुपो आ बौएलालोकेँ कहलखिन- ‘‘आब अहूँ सभ भोजन करै जाउ। हमरा सुतैक मन होइ अए।’’
हीरानन्दर अस-बिस करैत रहथि। लगले-लगले करौट बदलैत रहथि। मने-मन सोचै लगलाह जे एतबे दिनमे अनुप कते उन्नति कए गेल। उन्नतिक कारण भेलै सही ढंगसँ परिवारकेँ बढ़ाएब। जे परिवार जते सही दिशामे चलत ओ परिवार ओते तेजीसँ आगू बढ़त। मुदा जिनगीक रस्ता तँ बाँस जेकाँ सोझ नहि अछि। टेढ़-टूढ़ अछि, जहिसँ बौआ जाइत अछि। जिनगीक रस्तामे डेग-डेगपर तिनबट्टी-चौबट्टी अछि। जहिसँ लोक भटकि जाइत अछि। तहूमे जकरा रस्ताक आदि-अंतक ठेकान नहि छैक ओ तँ आरो ओझरा जाइत अछि। एहन-एहन ओझरी सभ जिनगीक रस्तामे अछि जहिमे ओझरेलापर कियो बताह भए जाइत अछि तँ कियो घर-दुआरि छोड़ि चलि जाइत अछि। क्षणिक सुखक खातिर स्थायी सुखक रस्ता छुटि जाइत छैक। क्षुद्र सुख पैघ सुखक रस्तासँ धकेलि एहन पहाड़ जेकाँ ठाढ़ भए जाइत छैक जे पार करब मुश्किल भए जाइत छैक। जिनगीक रस्ता एक नहि अनेक अछि मुदा पहुँचैक स्थान एक अछि। जते मनुख तते रस्ता अछि। एक मनुक्खक जिनगी दोसरसँ भिन्न होइत अछि। अनभुआरो आ बुझिनिहारो, अज्ञानियो आ ज्ञानियो लगले जिनगीक शुरुहेमे, नहि बुझि पबैत छथि जे कोन रस्ता पकड़लासँ सही जगहपर पहुँचब आ नहि पकड़ने छुटि जाएब। मनुक्खक उद्धारक बात तँ सभ सम्प्रदाइ, किस्सा-पिहानी सभ कहैत अछि, मुदा रस्तामे घुच्ची कते छैक जहिठाम जा लोक खसैत अछि, से बुझिये ने अबैत छैक! मुदा इहो तँ सत्य छैक जे निस्सकलंक जिनगी बना ढेरो लोक ओहि स्थानपर पहुँचि चुकल छथि आ ढेरो जा रहल छथि, जे जरुर पहुँचताह। भलेही हुनका भरि पेट अन्न आ भरि देह वस्त्र नहि भेटैत होनि। सुखल गाछ रुपी समाजकेँ जाधरि गंगाजल सन पवित्र पानिसँ नहि पटाओल जाएत ताधरि ओहिमे कोना कलश आ फूल फुलाएत ? अगर जँ समए पाबि कलशवो करत तँ किछुए दिनमे मौला जाएत। दुखो थोड़ दिनक नहि, जड़िआएल रहैत अछि। अनेको महान् व्यक्ति एहि दिशाकेँ देखबैक रस्ता अदम्य साहस आ शक्ति लगा केलनि, मुदा जड़िसँ दुख कहाँ मेटाएल? हमहूँ-अहाँ एहि मातृभूमिक सन्तान छी, तेँ हमरो अहाँक दायित्व बनैत अछि जे माएक सेबा करी। छठिआरे राति समाजक माए-बहीन कोरामे लए छाती लगौलनि, मुदा ओकरा बिसरि कोना जाइ छी? की सभ बिराने छथि? अपन क्यो नहि?’’
बेर खसैत हीरानन्द चलैक विचार करै लगलाह। बौएलाल चाह पीबैक आग्रह केलकनि। मुदा भरिआएल पेट बुझि हीरानन्द चाहक इनकार करैत कहलखिन- ‘‘खाइ बेरिमे पानि नहि पीने छलहुँ, एक लोटा पानि पिआबह।’’
आंगनसँ लोटामे पानि आनि बौएलाल देलकनि। लोटो भरि पानि पीबि हीरानन्द बाजलाह- ‘‘बुझि पड़ै अए जे अखने खा कऽ उठलौंहेँ। चाह नहि पीबह, सिर्फ एक जूम तमाकू खुआ दाए।’’
अनुप तमाकुल चुनबै लगल। तहि बीच हीरानन्द बौएलालकेँ कहलखिन- ‘‘तू तँ आब धुरझार किताब पढ़ै लगलह। आब तोहूँ पड़ोसिक बच्चा सभकेँ, जखन समए खाली भेटह, पढ़ाबह। एहिसँ ई हेतह जे कखनो बेकारी सेहो नहि बुझि पड़तह आ थोड़-थाड़ बच्चो सभ पढ़ै दिस झुकत।’’
पढ़बैक नाम सुनि अनुप बाजल- ‘‘मासटर सहाएब, ककरा बच्चाकेँ बौएलाल पढ़ाओत !” ओंगरीसँ देखबैत बाजल- “देखै छिऐ, ओ तीन घर कुरमी छी। ओकरासँ खनदानी दुश्मसनी अछि। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने हकार-तिहार।” फेर ओंगरी सँ देखबैत बाजल- “तहिना ओ घर मल्लाहक छी, भरि दिन जाल लऽ कऽ चर-चाँचरसँ लऽ कऽ पोखरि-झाखड़िमे मछबारि करै अए। जकरा बेचि कऽ गुजरो करै अए आ ताड़ी-दारु पीबिकेँ औत आ झगड़ा-झाटी शुरु कए देत।” ओंगरीसँ देखबैत-“तहिना ओ कुजरटोली छी। अछि तँ सभटा गरीबे, मुदा व्यवसायी अछि। स्त्रीगण सभ तरकारी बेचै छै आ पुरुख सभ पुरना लोहा-लक्करक कारोबार करै अए। जातिक नामपर सदिखन अराड़िये करैत रहै अए। तहिना हम दस घर धानुक छी। हमहीं टा गरीब रही, बोनि करै छलौं। आब तँ अपनो रमाकान्त देल दू बीघा खेत भऽ गेल, तेँ खेती करै लगलहुँ, नहि तँ सभ खबासी करै अए। जुआन-जहान बेटी सभकेँ माथपर चंगेरा दए आन-आन गाम पठबै अए। तेँ ओकरा सबहक एकटा पाटी छै आ हम असकरे छी। ने खेनाइ-पीनाइ अछि आ ने कोनो लेन-देन। आब अहीं कहू जे ककरा बच्चाकेँ बौएलाल पढ़ाओत?’’
अनुपक बात सुनि हीरानन्द गुम्म भऽ गेलाह। मने-मन सोचै लगलथि जे समाजक विचित्र स्थिति छैक। एहेन समाजमे घुसब महा-मोसकिल अछि। कने काल गुम्म रहि हीरानन्द कहलखिन- ‘‘कहलहुँ तँ ठीके, मुदा ई सभ बीमारी पहिलुका समाजमे बेसी छलैक। ओना अखनो थोड़-थाड़ छैहे, मुदा बदलि रहल छैक। आब लोक गाम छोड़ि शहर-बजार जा-जा कल-कारखानामे काज करै लगल अछि। संगे गाममे चाह-पानक दोकान खोलि-खोलि जिनगी बदलि रहल अछि। खेती-बाड़ी तँ मरले अछि तेँ एहिमे ने काज छैक आ ने लोक करै चाहैत अछि। करबो कोना करत ? गोटे साल रौदी तँ गोटे साल बाढ़ि आबि सभटा नष्ट कए दैत अछि। जहिना गरीब लोक मर-मर करैत अछि, तहिना खेतोबला सभ। खेतोबला सभकेँ देखते छिऐक बेटीक विआह, बीमारी आ पढ़ौनाइ-लिखौनाइ बिना खेत बेचने नहि कए पबैत अछि। ओना सबहक जड़िमे मुरुखपना छैक, जे बिना पढ़ने-लिखने नहि मेटाएत। धिया-पूताकेँ पढ़बैक इच्छा सभकेँ छैक मुदा ओ मने भरि छैक। बेवहारमे एको पाइ नहि छैक। इहो बात छैक जे जकरा पेटमे अन्न नहि, देहपर वस्त्र नहि रहतै, ओ कोना पढ़त?’’
हीरानन्द आ अनुपक सभ गप, बाड़ीमे टाटक पुरना करची उजाड़ैत सुमित्रा सुनैत छलि। बारह-तेरह बरखक सुमित्रा। अनुपक घरक बगलेमे ओकरो घर। तमाकुल खा हीरानन्द बिदा भेलाह। हीरानन्दकेँ अरिआतने पाछू-पाछू बौएलालो बढ़ैत छल। थोड़े दूर आगू बढ़लापर हीरानन्दकेँ छोड़ि बौएलाल घुमि गेल।
जाबे बौएलाल घुमि कऽ घरपर आएल ताबे सुमित्रो जरनाक कड़ची आंगनमे रखि बौएलाल लग आइलि। ओना परिवारक झगड़ासँ धिया-पूताकेँ कोन मतलब। धिया-पूताक दुनियाँ अलग होइत अछि। सुमित्रा बौएलालकेँ कहलक- ‘‘हमरा पढ़ा दे।’’
बौएलाल किछु कहैसँ पहिने मने-मन सोचै लगल जे हमर बाबू आ सुमित्राक बाबू राम परसादक बीच कते दिनसँ झगड़ा अछि, दुनूक बीच कताक दिन गरि-गरौबलि होइत देखै छी, तखन कोना पढ़ा देबइ। मुदा हीरानन्दक विचार मन रहै, तेँ गुनधुन करऽ लगल। कनी काल गुनधुन करैत सुमित्राकेँ कहलक- ‘‘पहिने ई माएसँ पूछि आ।’’
सुमित्रा दौड़ि कऽ आंगन जा माएकेँ पुछलक- ‘‘माए, हम पढ़ब।’’
माए- ‘‘कतए पढ़मे?’’
‘‘बौएलाल लग।’’
बौएलालक नाम सुनि माए मने-मन बिचारै लगली जे हमरासँ तँ कम्मो-सम्म, मुदा ओकरा (पति) सँ तँ बौएलालक बापकेँ झगड़ा छै। कने काल गुनधुन कए माए कहलकै- ‘‘जँ बौएलाल पढ़ा देतौ तँ पढ़।’’
खानदानी घरक बेटी सुमित्राक माए। आन-आन घरक बेटियो आ पुतोहुओ चंगेरा उघैत अछि, मुदा सुमित्राक माए कतौ नहि जाइत। अपने राम परसाद भार उघैत अछि। मुदा स्त्री नहि। जहिना कहियो अनुप आ रामपरसादक बीच भार उघैक सवालपर झगड़ा होइत, तँ सुमित्रा माएक विचार अनुप ि‍दसि रहैत छल। मुदा मरदक झगड़ामे कोना विरोध करैत। तेँ चुपचाप आंगनमे बैसि मने-मन अपने पतिकेँ गरिअबैत छलि, जे कोन कुल-खनदानमे चलि एलौं।
घुमि कऽ सुमित्रा आबि बौएलालकेँ कहलकै- ‘‘माइयो कहलक।’’
“ठीक छै। मुदा पढ़मे कखन कऽ। भरि दिन हमहूँ काजे उद्यममे लगल रहै छी आ साझू पहरकेँ अपने पढ़ैले जाइ छी।’’
दुनू गोटे गर लगबैत तए केलक जे काजक बेर सँ पहिने भोरमे पढ़ब। (क्रमशः)

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