Sunday, September 27, 2009

पत्राहीन नग्न गाछ- यात्री


पत्राहीन नग्न गाछ
लगै’ए कारी बस कारी, ठूठाकृति
अन्हार गुज्ज रातिमे
स्पन्दनहीन, रूक्ष, तक्षक शिशिर
पसरल अछि सबतरि ऊपर-ऊपर
नीचाँ किन्तु, तरबा तर दूबिक मोलाएम नवांकुर
बाँटि रहल रोमांचक टटका प्रसाद सौंसे शरीरकें
मोन होइ’ए, गाबी अन्हरिओमे वसन्तक आगमनी
आउ हे ऋतुराज,
नुकाएल छी कालक कोखिमे अनेरे!
दिऔ निश्छल आशीर्वाद
तकै’ए अहींक बाट घासक पेंपी
आउ हे ऋतुराज!

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...