Sunday, September 27, 2009

पत्राहीन नग्न गाछ- यात्री


पत्राहीन नग्न गाछ
लगै’ए कारी बस कारी, ठूठाकृति
अन्हार गुज्ज रातिमे
स्पन्दनहीन, रूक्ष, तक्षक शिशिर
पसरल अछि सबतरि ऊपर-ऊपर
नीचाँ किन्तु, तरबा तर दूबिक मोलाएम नवांकुर
बाँटि रहल रोमांचक टटका प्रसाद सौंसे शरीरकें
मोन होइ’ए, गाबी अन्हरिओमे वसन्तक आगमनी
आउ हे ऋतुराज,
नुकाएल छी कालक कोखिमे अनेरे!
दिऔ निश्छल आशीर्वाद
तकै’ए अहींक बाट घासक पेंपी
आउ हे ऋतुराज!

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...