Wednesday, September 23, 2009

जाती

जाति
उच्च जातिक बात सुनिते
आँखि मे किछु गड़ि रहल छै।
हम रहब चुपचाप तैयो
लोक अपने जड़ि रहल छै।
की केलहुँ हम कर्म अनुचित
जन्म भेटल उच्च कुल मे।
धैर्य स्व अभिमान भेटल
आत्मबल संतोष मन मे।
रक्त मे शुभ संस्कारक
बहि रहल अछि धार निर्मल।
प्रज्ज्वलित अछि भाल एखनहुँ
तेज सँ परिपूर्ण प्रतिपल।
कर्म मे विश्वास सदिखन
के हमर पुरषार्थ कीनत।
धर्म मे अछि आस्था ओ
के हमर अधिकार छीनत।
राजनीतिक स्वार्थ के ई
नीति आरक्षण उपज अछि।
योग्य जन छथि कात लागल
ज्ञानहीनक उच्च पद अछि।
अछि उचित नहि कर्म एखनहुँ
ज्ञान के पथ द्वेष बाँटब।
जाति के सीढ़ी बना क’
दान मे सम्मान बाँटब।
किरिण फुटतै फेर अपने
भोर के प्रतिबद्धता सँ।
हम रहब बढ़िते , अहाँ नहि
रोकि पायब दुष्टता सँ।
सतीश चन्द्र झा, राम जानकी नगर,मधुबनी

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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