Monday, September 07, 2009

एलेक्ट्रिक गर्ल-रामानुग्रह झा




भारतक एकटा बुढ़बा जादूगर
अनने छल विश्वक मेलामे
सबकें देखयबाक हेतु फ्री
एकटा एलेक्ट्रिक गर्ल!

‘लोकतन्त्रात्मक’ मन्त्राद्रष्टा
लाठीसँ फोड़ि कपार
नादिरशाह आ हिटलरक
गाड़ि देने छल अहिंसाक कब्र तर

मुदा, ‘सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न’ लोक
उठा देलनि फ्री पास
आ लागू भेल अछि आब
एलेक्ट्रिक गर्लक देखबा लेल चमत्कार
केवल हाइ रेट आ स्टुडेन्ट्स कन्सेशन मात्रा।

अपूर्व अछि लागल मेला
लोक सभक ठेलम-ठेला
भरि रातिमे तीन बेर, तीन शो
तीन खेप बनैत अछि भरि राति
योजना, बजट आ सरकार
सब क्यो चानी काटि रहल अछि।

धन्य हे बुढ़बा जादूगर!
केहन अनलह तों एलेक्ट्रिक गर्ल!

एकटा चम्पाकली एकटा विषधर- राजकमल चौधरी




दशरथ झाक परिवार बड्ड छोट आ आंगन बड्ड पैघ। पहिने सभ भाइ संगहि रहै छलाह। आब दशरथ झा एहि पुरान, पैघ, उजड़ल, भांग-धथूरक जंगलसँ भरल आंगनमे अपन स्त्राी आ अपन सखा-सन्तानक संगें एकसरे रहि गेल छथि। दशरथक जीविका छनि-महींस। दुन्नू साँझ मिला क’ आठ-दस किलो दूधक प्रबन्ध एही एकटा महींससँ होइत छनि। महींसक अतिरिक्त डेढ़ बीघा खेत, आर किछु नइं। स्त्राी-रामगंजवाली घर-आंगनमे व्यस्त रहैत छनि, एकटा सन्तान स्कूलमे पढ़ैत छनि, दोसर सन्तान महींसमे, अर्थात महींस चरएबामे, आ बारहम बर्खक अन्तिम चरणमे छन्दबद्ध, मुग्ध, सुशील, आज्ञाकारिणी, प्रसन्नमुखी मात्रा एकटा कन्या...
कन्याक नाम थिक, चम्पा।
शशि बाबू अप्पन बासठि बर्खक जीवनमे जखन पहिल बेर, अपन निकटस्थ पड़ोसिया आ दूर-दूरस्थ सम्बन्धी, दशरथ झाक आंगनमे, बीच आंगनमे आबि क’ ठाढ़ भेलाह, तँ चम्पा देबाल पर गोइठा सैंति रहल छलीह। रामगंजवाली छलीह इनार लग... शशि बाबूकेँ देखिते ओ पानिसँ भरल बालटीन उठा क’, भनसाघरमे, सन्हिआ गेलीह। गामक सम्बन्धें शशि बाबू रामगंजवालीक श्वसुर स्थानीय छथि।
दशरथ झा हँसैत स्वरमे, खोशामदक तरंगित स्वरमे, बजलाह-एहन लाज करबाक कोन काज, शशि बाबू तँ अपन परिवारक लोक छथि... चम्पा, माइकेँ कहिअनु, एक लोटा पानिक प्रबन्ध करतीह। पानि माने, गरम पानि।
-गरम पानि किऐ, बाबूजी?-संयत स्वरमे चम्पा प्रश्न कएलनि। नहुँए स्वरमे भनसाघरसँ चम्पाक माइ बजलीह-गरम पानि माने, चाह। चम्पा, अहाँ दोकानसँ चाह आ चिन्नी ल’ आनू। हम पानि चढ़ा दैत छी।
दोकान जएबाक दुखसँ बेसी दुख आन कोनो काजमे चम्पाकेँ नइं होइत छनि। प्रत्येक बेर बजारक कोनो दोकानसँ घुरबा काल चम्पा सप्पत खाइत छथि, जे मरि जाएब, मुदा आब कहियो कोनो वस्तु उधार अनबाक हो, चाहे एक कनमा सुपारी, चाहे एक सेर कड़ ू तेल-चम्पे दोकान पठाओल जएतीह। चम्पा विरोध करतीह-हम नइं जाएब। जुगेसरक सवा टा टाका बाँकी छै। ओ हमरा उधार नइं देत।
मुदा, माइ कहथिन, किंवा दशरथ बजताह-अहाँ नइं जाएब, तँ आन के दोकान जाएत? ...चम्पा, जुगेसरकेँ कहबैक जे ओकर टाका हम पचा नइं जएबैक। काल्हिए हमर अल्लू उखड़त। हम अल्लू बेचि क’ ओकर टाका द’ देबैक।-चम्पाकेँ बूझल छनि, जे बाबूजी एक्को कट्ठा अल्लू रोपने नइं छथि। चम्पाकेँ बूझल छनि, जे बाबूजी एहिना जखन-तखन छोट-छोट बातक लेल मिथ्या बजैत छथि, फूसि बजैत छथि, सरासरि फूसि...।
मुदा, दछिनबारी टोलक सभसँ प्रतिष्ठित लोक आंगन आबि गेल छथि, पहिल बेर आएल छथि-बाबूजीकेँ शशि बाबूसँ निश्चय कोनो आवश्यक बेगरता छनि-चम्पा एतबा गप्प अवश्य बुझि रहल छथि। एतबा गप्प बुझबाक स्त्राी-सुलभ क्षमता हुनकामे छनि। अतएव, चम्पा माइकेँ बिना कोनो उत्तर देने, जुगेसर-बनियाँक दोकान दिस चलि गेलीह-भगवतीक प्रतिमा सन सुन्नरि, अल्प बयसक बुधियारि आ सुशील कन्या, चम्पा! आ शशि बाबूक संगें दशरथ पुबरिया कोठलीमे चलि गेलाह। चम्पा, चम्पाक माइ आ दशरथ एही घरमे रहै छथि।
देवाल पर एकटा पुरान कैलेन्डर टाँगल अछि। कैलेन्डरमे अंकित अछि, द्रौपदी-चीर-हरणक एकटा प्रचलित चित्रा। शशि बाबू जेना दशरथसँ कोनो महत्त्वपूर्ण गप्प सुनबाक लेल प्रतीक्षा करैत, बड़ी काल धरि एहि चित्रा दिस तकैत रहि जाइत छथि। द्रौपदी विवश छथि, विवस्त्रा छथि... क्रोधसँ उन्मत्त दुःशासन, गर्वसँ आन्हर भेल सुयोधन, ग्लानि आ संतापसँ माथ नीचाँ खसौने, लज्जित पाँचो पाण्डव... आ ऊपरसँ द्रौपदीक देह पर थानक थान साड़ी खसबैत श्री कृष्ण...।
राधारमण भगवान श्रीकृष्णक कैलेन्डरक चित्रामे मधुर-मधुर मुस्का रहल छथि।
शशि बाबू सेहो मोने-मोन मुस्कएलाह। बजलाह किछु नइं, मुदा, दशरथकेँ एतबा गप्प बुझबामे कोनो भांगठ नइं, जे हमरा आंगनमे आबि क’, हमरा कोठलीमे एहि पुरान पलंग पर बैसि क’ शशि बाबू प्रसन्न छथि। एही प्रसन्नताक आवश्यकता दशरथ झाकेँ छनि। शशि बाबू किछुए बर्ख पहिने धरि पुर्णियाँ जिला कचहरीमे हेड किरानी छलाह। आब स्थाई रूपें गामे रहै छथि। शशि बाबूक परिवार बड्ड पैघ। दू टा विधवा बहिन, तीन स्त्राीसँ चारिटा पुत्रा, आ चारू पुत्राक अपन-अपन छोट-पैघ परिवार। भिन्न-भिनाउज एखन धरि नइं भेल छनि। शशि बाबू जाबत जीवित छथि बँटवारा असम्भव।
तीन बेर विवाह करबाक उपरान्तो, शशि बाबू सम्प्रति स्त्राी-विहीन छथि। तेसर स्त्राी पाँचे बर्ख पहिने स्वर्गवासी भेलि छथिन। आब शशि बाबू वृद्ध भ’ गेल छथि, तथापि, परिवारक आ टाका-पैसाक सभटा कारबार ओ स्वयं करैत छथि, स्टील-सन्दूकक चाभी ओ एखनो अपने जनौमे रखैत छथि।
अहाँ हमर उद्धार नइं करब, तँ आन के उद्धार करत।-एही प्रेम-वाक्यसँ दशरथ अप्पन गद्य प्रारम्भ कएलनि। शशि बाबू जेबसँ पनबट्टी बहार क’ पान-जर्दा खा रहल छलाह। पनबट्टी बन्द क’ जेबमे रखलाक बाद, बजलाह-हमरासँ जे सहायता भ’ सकत, हम अवस्स करब मुदा, अहाँ स्पष्ट कहू, अहाँकेँ कतबा टाका चाही। ...कमसँ कम अहाँकेँ कतबा टाका...
दशरथ झा मोने-मोन हिसाब लगबैत छथि। चम्पाक विवाहक हिसाब। शशि बाबूसँ कतबा टाका पैंच मंगबाक चाही? कतबा टाका ओ द’ सकैत छथि? पाँच सै? सात सै? एक हजार? दशरथ झाकेँ बेटीक विवाह कोनो साधारण परिवारमे करबाक हेतु अन्ततः दू हजार टाका चाही। हिसाब जोड़ि लेलाक बाद, दशरथ बजलाह-पहिने चाह पीबि लेल जाए। टाका-पैसाक गप्प तकरा बाद कहब। हम की कहब, रामगंजवाली स्वयं अहाँसँ गप्प करतीह। अहाँसँ की नुकाएल अछि... अहाँसँ कोन लाज... अहाँ हमर अप्पन लोक छी।
चम्पाक लेल एकटा परम उपयुक्त वर दशरथ झा टेबने छथि। वरक पितासँ दशरथ झाकेँ मित्राता छनि। भरथपुर गाम, सहरसासँ तीन कोस उत्तर। वर सहरसा काॅलेजमे बी. ए.मे पढ़ैत अछि। रामगंजवाली विवाहक सभटा खर्च मोने-मोन निर्णय कएने छथि। जँ दस कट्ठा बेचि देल जाए, तँ पन्द्रह सै टाका अवश्य भेटत। तीन टा अशरफी घरेमे अछि। जँ शशि बाबू पाँचो सै टाकाक व्यवस्था क’ देथि...
चाह आ चिन्नीक पुड़िया माइ लग राखि, चम्पा ओसार पर ठाढ़ि छथि। साँझ पड़बामे आब कम्मे देरी अछि। आइ दुपहर खन पानि पड़ल छल-मूसलाधार वर्षा। आंगनमे थाल... सड़क पर थाल... चम्पा दोकान जाइत काल पिछड़ि क’ खसि पड़ल छलीह। माइ कहलखिन-अहाँ साड़ी बदलि क’ केश बान्हि लिअ’ ...जल्दी करू। शशि बाबू बेसी काल नइं बैसल रहताह। केश बान्हि लिअ’ ...ओसनी पर ललका साड़ी राखल अछि, से पहिरि लिअ’ ...जल्दी करू। शशि बाबूकेँ चाह आ पान द’ अबिअनु।
चम्पा इनार लग चल गेलीह। बालटीनमे पानि भरलनि। बड़ी काल धरि हाथ-पैर धोइत रहलीह। केहुनीमे लागल हरैद’क दाग छोड़ौलनि। कनपट्टी लगक मैल... भौंह परक मैल... मुदा, चम्पाक देहमे मैल कोनो ठाम नइं छनि, मात्रा मैलक भ्रम छनि हुनक मोनमे। कनिएँ काल पहिने दोकान लग खसि पड़लि छलीह, तँ अभिमन्यु चैधरीक भातिज, परीक्षित कतेक जोरसँ हँसल छल... लाजें रंगि गेल छलीह चम्पा, लाजसँ, क्रोधसँ, अपमानसँ आरक्त भ’ गेल छलीह। सन्देह भेल छलनि, परीक्षित कोनो अपशब्द सेहो बाजल अछि। यद्यपि परीक्षित मात्रा हँसले टा छल, बाजल नइं छल। चम्पा एहिना एही अल्पवयसमे सदिखन, मैलक भ्रमसँ, अपशब्दक सन्देहसँ, अपमानक सन्देहसँ व्यथित आ चिन्तित होइत रहै छथि।
हाथ-पैर धोलाक बाद ललका साड़ी आ ललका आँगी तकबाक हेतु चम्पा भनसाघरक ओसार पर अएलीह। माइ कहैत छथि, तँ मुँहमे पाउडर लगा क’ केश थकड़ि क’ ललका साड़ी पहीरि क’ शशि बाबूक हाथमे चाहक पेयाली देबैए टा पड़त। माइ जे कहथि, सैह करबाक चाही। सैह करैत छथि चम्पा। इच्छा नहियों रहै छनि, तैयो करैत छथि... जेना दोकानसँ उधार आनब, जेना ललितेशक आंगन जाएब... जेना एही तरहक आन कतेको काज करबाक इच्छा चम्पाकेँ नइं होइत छनि। चम्पा ओहि कोठलीमे प्रवेश नइं कर’ चाहैत छथि, जाहिमे पलंग पर बैसल छथि शशि बाबू आ निहोरा-मिनतीक मुद्रामे एकटा पीढ़ी पर नीचाँमे बैसल छथि चम्पाक बाबूजी, दशरथ झा। चम्पाकेँ लाज नइं होइत छनि, होइत छनि ग्लानि, आत्मवेदना, जे बाबूजी एहन लोक किऐ छथि, एहन दरिद्र आ एहन क्षुद्र... बाबूजी पलंग पर किऐ नइं बैसल छथि? ...कोन स्वार्थक कारणें एखन शशि बाबूक लेल चाह बनाओल जा रहल अछि? ...माइ एतेक अस्त-व्यस्त किऐ छथि?
अपने बैसल जाओ, हम दू मिनटमे अबैत छी-एतबा कहि क’ दशरथ कोठलीसँ बाहर भ’ ओसार पर अएलाह, लोटा हाथमे लेलनि, आ आँगनसँ बहरा गेलाह। शशि बाबू द्रौपदी-चीर-हरणक कैलेन्डर देखि रहल छथि, आ विचारि रहल छथि जे दशरथ झाकेँ टाका देल जाए, किंवा नइं देल जाए। बेसी संभावना तँ एही बातक अछि, जे टाका डूबि जाएत। मुदा, जँ टाका नइं देल जाए, तँ चम्पाक बियाह कोना होएतैक? ...आ दशरथ चल कत्त’ गेलाह? ओ कहैत छलाह जे रामगंजवाली अपने हमरासँ गप्प करतीह। ओ किऐ करतीह गप्प?
आगू-आगू रामगंजवाली, एक हाथमे हलुआक छिपली, दोसर हाथमे पानिक लोटा-गिलास नेने आ हुनका पाछूमे नुकायलि जकाँ, लाल साड़ी आ लाले आँगी पहिरने, बड्ड सकुचायलि, बड्ड लजबिज्जी चम्पा...
रामगंजवाली घोघ नइं तनने छथि। पैघ-पैघ आँखिमे सुन्दरता अवश्य छनि मुदा, स्त्राी-सुलभ लज्जा नइं। लज्जा स्त्राी-आँखिक आन्तरिक ज्योति थिक... रामगंजवालीक आँखि जेना पाथरक बनाओल गेल हो, सुन्दर, किन्तु, जकरामे कोनो आकर्षण-शक्ति नइं। चम्पाक हाथसँ चाहक पेयाली लैत काल शशि बाबू अनुभव कएलनि जे चम्पाक हाथ थरथरा रहलि छनि... जे चम्पाक अंग-अंग काँपि रहलि छनि। सौंसे कपार घामसँ भीजल... दुन्नू आँखि जेना नोरसँ झलफल-झलफल करैत... शशि बाबू अनुभव कएलनि, जँ कनियों काल चम्पा एहि ठाम ठाढ़ि रहतीह, तँ ठामहि झमा क’ खसि पड़तीह, बेहोश भ’ जएतीह।
माइक कोनो नव आज्ञाक प्रतीक्षा चम्पा नइं कएलनि। चाहक पेयाली शशि बाबूक हाथमे देलाक उपरान्त, चम्पा माइ दिस उपेक्षाक तीक्ष्ण दृष्टिसँ देखैत, चुपचाप कोठलीसँ बहरा गेलीह, आंगनमे एक छन ठाढ़ि रहलीह, आ आंगनसँ बहरा क’ अपन सखी, अन्नपूर्णाक आंगन दिस चलि गेलीह। चम्पा जखन बड्ड दुखमे डूबलि रहै छथि, तखन चुपचाप अन्नपूर्णाक घरमे जा क’ सूति रहै छथि।
दशरथ टाकाक विषयमे किछु नइं बजलाह... कतेक टाका चाही, आर की-की, से तँ अहीं सभ कहब-शशि बाबू चम्पाक तीव्र पलायनसँ एक रत्ती अप्रतिभ, आ एक रत्ती निश्चिन्त होइत, समीपमे ठाढ़ि भेलि, रामगंजवालीसँ जिज्ञासा कएलनि-दशरथ कहाँ छथि?
रामगंजवाली बजलीह-ओ बथाने दिस गेल छथि। अबिते होएताह... मुदा, हुनका रहलासँ की, आ हुनका नहिएँ रहलासँ की... हुनका अहाँसँ कोनो गप्प कहैत लाज होइत छनि। ओ नइं कहताह। हमहीं कहब। चम्पा हमर बेटी थिक; हम चम्पाक माइ छी। बेटी पर माइए टाकेँ अधिकार होइत छै, बापक कोनो अधिकार नइं। माइ अपन बेटीक लेल प्राण दैत अछि। हमहूं दैत छी। तें, हमहीं अहाँसँ गप्प करब।
रामगंजवालीक एहि निद्र्वंन्द्व, ओजस्वी आ स्पष्ट भाषणसँ शशि बाबू मोने-मोन सशंकित होइत छथि-की कह’ चाहैत छथि दशरथक स्त्राी?-शशि बाबू कनिएँ सम्हरि क’ बैसैत छथि, अपन पीठ तर तकिया राखि लैत छथि। दशरथ किऐ चल गेलाह? चम्पा किऐ पड़ा गेलीह? किऐ रामगंजवाली एतेक निकटतासँ आ एत्तेक भूमिका बान्हि क’ गप्प क’ रहलि छथि? शशि बाबू गामक लोक नइं छथि, सभ दिन शहरे-बजारमे रहलाह। शहरक लोक छथि शशि बाबू। नोकरी तेयागि क’, आब स्थायी रूपें गाम आएल छथि। गामक रीति-रेवाज, गामक राजनीति, गामक लोकक आचार, भाषा, आ व्यवहार बूझल नइं छनि। तें रामगंजवालीक भूमिकाकेँ बुझबाक उचित क्षमता शशि बाबूकेँ नइं छनि।
शशि बाबू पानक बीड़ा उठौलनि। जर्दाक डिबिया खोललनि। असली गप्प सुनबाक प्रतीक्षा कर’ लगलाह। रामगंजवाली एक बेर आंगनसँ भ’ अएलीह। चम्पा कत्त’ गेल? कोनो पड़ेसियाक आंगनक कोनो स्त्राी कोनटा लग तँ ठाढ़ नइं अछि? रामगंजवाली घुरि क’ कोठलीमे अएलीह।
-आब हमरा देरी होइत अछि। ...दशरथ कहाँ छथि?-शशि बाबू प्रश्न कएलनि। रामगंजवाली मुस्कएलीह। बजलीह-चम्पाक बियाहमे नहियों किछु तँ दू-सवा दू हजार टाका लागत। हमरा सभकेँ मात्रा एक बीघा दस कट्ठा खेत अछि। आ, एकटा महींस अछि। जँ दस कट्ठा खेत बेचब तँ एक हजार टाका भेटत। जँ महींस बेचब तँ भेटत पाँच सै टाका।
शशि बाबू बीचमे टोकलखिन-महींस किऐ बेचब? खेत किऐ बेचब? आ बेचि लेब तखन जीवन कोना चलत?
रामगंजवाली संभवतः इएह प्रश्न सुन’ चाहैत छलीह। तें ई प्रश्न सुनि क’ ओ हँसलीह, जेना कोनो सुखान्त नाटकक नायिका-अभिनेत्राी हँसैत अछि, ताही तृप्त मुद्रामे हँसि क’ रामगंजवाली बजलीह-अहाँ उचित कहलहुँ, जखन ई सभ बेटीक बियाहमे बेचिये लेब, तखन जीवन नइं चलत। अपने लात अपन पेट पर मारब उचित नइं, एतबा हम बुझैत छी। तें हम सभ, माने हमर मालिक, हम, आ हमर बेटी, चम्पा अहाँक शरणमे आएलि छी। ...अहीं, मात्रा अहीं हमरा सभक उद्धार क’ सकैत छी।
-अहीं हमरा सभक उद्धार क’ सकैत छी-रामगंजवालीक मुँहसँ ई गप्प सुनि क’ शशि बाबू विरक्त भ’ गेलाह। क्रोध भेलनि, जे हम किऐ एहि ठाम समय नष्ट क’ रहल छी। काल्हिए-परसूसँ दशरथ झा हजार बेर एहि वाक्यक आवृत्ति कएने छथि, जे शशि बाबू हुनक आ हुनक परिवारक उद्धार क’ सकैत छथि।
जखन कि उद्धार करबाक हेतु नइं, एकटा आन स्वार्थसँ शशि बाबू एहन असमयमे, एहन एकान्तमे दशरथ झाक आंगन आएल छथि। शशि बाबू योजना बना क’ कोनो काज करैत छथि। जीवन-रूपी शतरंज कोना खेलाएल जाए, कोना जीवित मनुष्य सभकेँ काठक पेयादा, किंवा काठक हाथी-घोड़ा बनाओल जाए, से मर्म हुनका बूझल छनि।
शशि बाबूकेँ घरडीहक स्थान बड्ड कम्म। परिवार बड्ड पैघ। आ, दशरथ झाक आंगन शशि बाबूक देबालसँ सटले छनि, पश्चिम दिस। जँ दशरथ झा अपन आंगनक पुबरिया हिस्सासँ बारह धूर जमीन शशि बाबूक हाथें बेचि लेथि, तँ तकर मूल्यक रूपमे चम्पाक विवाहमे हजार-बारह सै टाका देबामे शशि बाबूकेँ कोनो कष्ट नइं हेतनि। ...शशि बाबू उद्धार करबाक लेल नइं, बारह धूर घरडीह किनबाक लेल दशरथक आंगन आएल छथि। अस्तु, रामगंजवालीक गप्पसँ हुनका कोनो प्रसन्नता नइं भेलनि। ओ विरक्त भेलाह जे रामगंजवाली मूलकथा पर नइं आबि, व्यर्थ समय नष्ट क’ रहल छथि... लोक अनेरे सन्देह करत जे शशि बाबू किऐ अपन पड़ोसियाक आंगनमे एत्तेक कालधरि एकान्त कोठलीमे बैसल छथि। बड़ी कालक उपरान्त अपन मोनकेँ स्थिर क’, किंचित गम्भीर मुद्रा बना क’ कनिएँ हतप्रभ जकाँ, रामगंजवाली बजलीह-हम खेत नइं बेचब, घरडीह नइं बेचब, महींसो नइं बेचि सकैत छी। हमरा एक्केटा चम्पा नइं अछि, आनो सन्तान अछि। तकरा सभक मुँहमे जाबी नइं लगाओल जा सकैत अछि।
शशि बाबू पुछलखिन-घरडीह नइं बेचब, तँ की करब? कत्तेक टाका लेब हमरासँ?
रामगंजवाली उत्तर देलखिन-अहाँसँ बेसी नइं, पन्द्रह सै टाका हम सभ लेब। पन्द्रह सै टाका नगद, आ अपना मोने चम्पाकेँ अहाँ जे गहना, कपड़ा, साड़ी, जे देबै, से अपना मोने। अहाँ सन धनीक, बुझनुक, आ विद्वान लोकक संगें चम्पा भरि जीवन सुखी रहती, भरि जीवन आनन्द करती...
-अहीं हमरा सभक उद्धार क’ सकैत छी-शशि बाबू आब एहि गप्पक असली अर्थ बुझि गेलाह। एही कारणें एतेक भूमिका बान्हल जा रहल छल। शशि बाबू स्वयं चम्पासँ बियाह करथि-से दशरथ झा, आ रामगंजवालीक उद्देश्य। ई योजना स्वयं रामगंजवाली बनौने छथि। जँ साठि बर्खक स्वस्थ, सुन्दर, पराक्रमी वृद्ध, शशि बाबू, तेरह बरखक आत्ममुग्ध, लज्जामयी, स्पर्शहीन, नवीन चम्पा-कलीसँ बियाह करताह-तँ शशि बाबूक सम्पूर्ण राजकाज, सम्पूर्ण धन-सम्पत्ति पर रामगंजवालीक आ दशरथ झाक पंजीकृत अधिकार, अर्थात एकाधिकार भ’ जएतनि, आ महारानी जकाँ, वृद्ध शशि बाबूक संसारमे पटरानी जकाँ राज करतीह हमर चम्पा, हमर चम्पा-कली।
चाह देबाक लेल चम्पा आएल छलीह। शशि बाबूकेँ अवस्से पसिन्न भेल छथिन हमर कन्या, हमर दुलारि-सुकुमारि कन्या। एहन पैघ-पैघ आँखि, एहन सरल-निश्छल स्वभाव, एहन बुद्धि-विचार गाम भरिमे आन कोनो धीयाकेँ नइं छै।
एक बेर अपने दलान पर अपन मित्रा-मण्डलीक समक्ष हास्य कएने अवस्स छलाह शशि बाबू। कहने छलाह, जे मोन होइत छनि जे फेर एकटा विवाह क’ लेथि। मुदा, ई गप हास्ये छल, विनोदे छल, सत्य नइं। विवाह करबाक, बासठिक एहि विचित्रा बयसमे, विवाह करबाक कोनो आकांक्षा शशि बाबू नइं रखैत छथि। मुक्त-हृदय लोक छथि ओ, आब कोनो जाल-जंजालमे नइं पड़ताह।
अतएव, पलंगसँ नीचाँ उतरि क’, धरती पर ठाढ़ होइत, शशि बाबू कठोर आ कठिन स्वरमे बजलाह-अहाँक गप्प हम सुनलहुँ। ...दशरथ झाकेँ अहाँ कहि देबनि, हम एतेक मूर्ख नइं छी। बेसी नइं, चम्पा हमर बेटी, कल्याणीसँ बाइस बर्ख छोट छथि, आ हमर बेटीक बेटी, मुन्नीसँ चारि बर्ख छोट छथि। हम चम्पासँ कतेक बर्ख पैघ छी? अहाँक पति देवता, दशरथ झा हमरासँ कतेक बर्ख छोट छथि, रामगंजवाली? ...अहाँक मोनमे एहन विचार कोना आएल?
रामगंजवाली परम विषाक्त आ परम विरक्त दृष्टिसँ एक बेर शशि बाबू दिस तकलनि। शशि बाबू आतंकित भ’ गेलाह। जेना हुनक सोझाँमे कोनो स्त्राी, कोनो रामगंजवाली कनियाँ ठाढ़ि नइं हो, जेना हुनका सोझाँमे फन काढ़ने, कोनो विषधर ठाढ़ हो... कोनो भयावह विषधर...
रामगंजवाली शशि बाबूकेँ कोनो उत्तर नइं देलखिन। कोनो वाक्य नइं, कोनो शब्द नइं, विषधरक उत्तर होइत छै ओकर विष, ओकर विषदन्त!
मुदा, विधिक ई केहन विधान अछि, जे एहि सामाजिक घटनामे, शशि बाबू विषधर नइं छथि, विषधर छथि चम्पाक माइ, रामगंजवाली!

(मिथिला मिहिर,15 जून 1975 सँ साभार)

की हमरा लोकनि सभ्य नहि होयबाक लेल अभिशप्त छी?

मैथिलेतर समाज मे भाषा आ संस्कृति एकटा एहेन सूत्र रूप मे ख्यात रहल अछि जे जाति, धर्म आ भौगोलिक देबाल केँ अर्थहीन बना देलक। हमरा देशक बगल मे बांग्लादेशक उदय एहि बातक प्रमाण अछि, जतए भाषा-संस्कृतिक प्रति प्रेम धर्म आ जाति सँ ऊपर साबित भेल। तहिना कइक टा मलयालम भाषी ईसाई आ मुसलमान आ हिंदू मित्र सब सँ भेंट भेल अछि जिनका लेल भाषा-संस्कृति सं बढ़ि कए और किछु नहि अछि। मुदा से मिथिलाक नाम पर कार्यक्रम कयनिहार, संस्कृतिक व्यापार कयनिहार आ भाषाक नाम पर भावनाक दोहन कयनिहार मैथिल सब एको रत्ती नहि बुझाइत अछि. हमरा लोकनि जहिना-जहिना सभ्य, सुशिक्षित आ आर्थिक रूप से नीक भेल जाइत छथि तहिना, तहिना मध्यकालीन मानसिकता आ जातिवादक रोगाह विषाणु सँ ग्रसित भेल जाइत छी?

काल्हि दिल्ली केर एलटीजी सभागार मे आयोजित कार्यक्रम मे जातिवादक एतेक घिनौन आ निर्लज्ज प्रदर्शन देखलहुं, जकरा बाद एहि तरहक तथाकथित सांस्कृतिक कार्यक्रम सब मे जयबाक कोनो उत्साह संभवतः आब भविष्य मे नहि होयत. मिथिलांगनक नाम पर जाहि अश्लील ढंग सँ ओहिठाम कायस्थांगन केर प्रर्दशन चलि रहल छल, से अत्यंत निराशाजनक छल। एहि संस्था केर पत्रिका, वेबसाइट सब ठाम लालदास, लाभ, मल्लिक, दास आ कर्ण जीक अलावा और कोनो जी नामो लेबाक लेल नहि छलाह। मंच पर होइत उदघोषणाक अनुसार मैथिली मे मात्र दू गोट साहित्यकार गणनीय छथि-ब्रजकिशोर वर्मा मणिपद्म आ श्रीमती शेफालिका वर्मा। एकर अलावा जँ जातियो धरि ओ सीमित रहितथि तँ हुनका उपेन्द्र दोषी, सोमदेव आ रमानंद रेणु मोन पड़ितथिन, मुदा सेहो नहि। ई कोन तरहक मानसिकता अछि जे मिथिला-मैथिलीक नाम पर एहेन-एहेन काज अत्यंत निर्लज्जतापूर्वक करैत अछि?

अत्यंत दुखक बात अछि कि हमरा लोकनि कायस्थ बनबाक लेल उताहुल छी, सोति बनबाक लेल अपस्यांत छी, ब्राह्मणत्व रक्षा लेल चिंतित छी आ संस्कृतिक नाम पर जातिवादि अस्मिताक खतरनाक खेल मे निमग्न छी. की एहि सब चीज के छोड़ि केँ मात्र मैथिल नहि भ सकैत छी हमरा लोकनि?

एहिना कोलकाता सँ एकटा पत्रिका बहराइत अछि-कर्णामृत। भगवानक चंद्रामृतक तर्ज पर कर्ण लोकिनक कर्णामृत। जा हे मैथिल। मिथिलामृत निकलितए तँ एकटा सार्थक बात होइतए। प्रशंसनीय काज होयतै, मुदा जातिक कट्टरता से थोड़े बुझैत छैक। ओ तँ जेना होयत तहिना स्वयं केँ सर्वश्रेष्ठ घोषित करबाक लेल, जातीय आत्मश्लाघा केर प्रदर्शन लेल कर्णामृत प्रकाशित करबै करत. काल्हि मिथिलांगनक स्टेज पर नामो लेबाक लेल एक्को गोटे कायस्थ छोड़ि आन क्यो जँ रहितथि तँ बुझितहु जे वास्तव मे मिथिला आ मैथिलीक लेल कोनो संस्था दिल्ली मे अलख जगा रहल अछि. मुदा से नहि भ रहल अछि. एतेक दिन मैथिलीक छाती पर मिथिलाक ब्राह्मण लोकनि (विशेष क कए दरभंगा-मधुबनी केर आ ओहो ठाम सोति बेशी) सवार रहलाह आ आब कायस्थ लोकनि ताहि लेल अश्वमेधक घोड़ा छोड़लनि अछि। एहि सँ जँ मैथिली भाषा बांचि गेल तँ बुझु जे गरीब आ देहातक आम जनता बड्ड जिद्दी छथि-जनिका दम पर भाषा बचल अछि। अन्यथा दिल्ली मे एहेन मैथिल परिवार बहुत कम अछि, जकर नेना मैथिली मे गप करए-व्याकरणहीन आ उच्चारणदोष सँ भरल हिंदीये टा मे जवाब भेटत।

नेना भुटका - दयावान बालकक कहानी

दयावान बालकक कहानी

फ्रांस शहरमे एकटा लड़का आर एकटा ओकर बहिन छल। दुनू भाइ-बहिनक बीचमे बड़ प्रेम छल। लड़काक नाम नेपोलियन छल आर लड़कीक नाम इलायजा छल। दुनू गोटे बड़ नटखट छल। एक दिन दुनू भाइ-बहिनक बीचमे तय भेल जे सभसँ तेज के दौड़ब।
ई बातपर दुनुक बीच तय भेल जे- जे जीतब से पार्टी देब। दुनू भाइ-बहिन दौड़ै लागल। दौड़ैत-दौड़ैत दुनू गोटे एकटा लड़कीसँ टकरा गेल। से ऊ लड़की केर माथापर एकटा टोकरी छल। लड़की आर ओकरा माथापरक टोकरी जकरामे फल सब रहै से रोडपर खसि गेल। लड़कीकेँ क्सि कए चोट लागल। दुनू भाइ-बहिन मिलि कऽ ऊ लड़की केँ उठेलक आर पुछ्लक- चोटो लगल ये अहाँकेँ। ई बातपर लड़की कहलक जे कसि कऽ लागल छल। दुनू भाइ-बहिन मिलि केँ लड़की केर टोकड़ी आर ओकरामे फल छलै सेहो, सभकेँ उठाय, ओकरा अपन संगे अपन घर लेलै चल गेल। ओतए ओकर माँ छै, से कहलक जे ई अहाँ ककरा अपन संगमे लेले ऐलो ये। तँ दुनू भाइ बहिन कहलक जे हम दुनू गोटे दौड़ैत छलौ, ई हमरासँ टकरा गेल आर एकर माथा परक टोकरीमे छ्लै फल, सब सड़कपर बिखरि गेल आर एकरा चोट सेहो लागि गेल छलै। से हम एकरा अपन संगेमे लेले ऐलोँ। एकरा एकर फलक पैसा दऽ दियौ। ई बातपर हुनकर माँ गुस्सा गेल आर कहलक- एना अहाँ सब किए करैत छी। आर घरक अन्दर गेल, पैसा आनिकऽ ऊ लड़कीकेँ दैत पुछलक जे अहाँ एतना कम उम्रमे एहन भारी समानकेँ ठा कऽ कतए जाइ छलौँ। तँ जाएकऽ लड़की कहलक- हमर बाबू बड़ बीमार छल। एकरा बेच कऽ हम अपन बाबूकेँ डॉक्टरक पास लै जेतौँ। लड़कीकेँ ई बात सुनिकऽ दुनू भाइ-बहिन आर हुनकर माएकेँ बड़ दया लागल आर कहलक जे अहाँ केर घर कतए ये, से हम सब अहाँक संगमे अहाँक घर चलब। ई बातपर लड़की केर आँखिमे आँसु आबि गेल आर कहलक- चलू, अहाँ सभ हमर घरक लेल। दुनू भाइ-बहिन, हुनकर माए, ऊ लड़की केर संग बिदा भेल आर लड़कीक घर पहुँचल तँ देखलक जे एकटा अधवयसू आदमी एकटा चौकीपर सुतल ये आर खाँसि रहल ये, जकरा देखने से लागैत छल जे ई आब नै बचत। दुनू भाइ-बहिन आर हुनकर माए ओकरा अपन गाड़ीमे डालि कऽ अस्पताल लेले गेल। ओकरा अस्पतालमे भरती करबाएकऽ कहलक- जे खर्च आएत हिनका ठीक होएबाकमे, सब हम देब। आर दुनू भाइ-बहिन मिलिकऽ हुनकर खूब सेवा कएलन्हि। लड़कीक बाबू जल्दीए ठीक भऽ गेलाह आर अपनासँ चलिकऽ घर पहुँचलाह। आर ऊ दुनू भाइ-बहिनकेँ ओ सभ बड़ आशीर्वाद दैत छलै। ई लड़का आगू चलै केर बाद फ्रांस देशक शासक बनल। आर बहुत दिन तक राज केलक।





आशिष चौधरी गाम – चरैया,
जिला – अररिया।

निवेदन:-

१.धीमेश्वर स्थान- बनमनखीसँ उत्तर ३ किलोमीटरपर धीमा गाँव अछि। एहि स्थानक बारेमे जे ई बहुत पुरान अछि, से सुनै छी। पहिले एतए मन्दिर नै रहै मुदा बादमे एत्तऽ विशाल मन्दिर बनल आर एकटा पोखरि सेहो अछि। आर एक बात जे ई अपने आप प्रकट भेला-ए। ई मन्दिरसँ सटल एकटा माँ दुर्गाक सेहो प्राचीन मन्दिर ये। जे मन्दिरक बारेमे ओइ अगल-बगल गामक लोक सब कहै ये जे कोनो प्रार्थना अगर मनसँकरल जाइ-ए, ते माँ भगवती जरूर पूर्ण कए दैत अछि।

२.अररिया जिलासँ ३० किलोमीटरपर भरगामा प्रखण्ड अछि। वैह प्रखण्डमे भरगामा गाममे एकटा चण्डी स्थान बाधमे अछि, जकर बारेमे बुजुर्ग सभ कहै ये जे ई अपने-आप प्रकट भेल अछि आर ओए ठाम कोनो प्रार्थना आइ तक पूरा नञि होबए के प्रश्न ने अछि। एकटा खास बात ये जे ओइ ठाम के भगवती के गेट मंगलवार दिन टा खुलै ये। आर गाछ सभ जे ये, अगर ओकरा कियो काटए के कोशिश करै ये से खुन बहे लगे ये, जेना मनुखक खून बहै ये ओहिना। ओत्तऽ आइ वरु जेना मन्दिर बनल अछि वैहने। ओत्तऽ मंदिर अगर बनाबे चाहे ये ते नै बनबे सके ये।
हुनके समर्जपित, जय मां।

नेना भुटका - किसानक कहानी

किसानक कहानी

एकटा किसान ओर किसानक कनियाँ छलै। किसानक शादी केर बहुत दिन बीतल लेकिन किसानक कनियाँ केर बाल-बच्चा नहि होबैत छलाह। दुनू गोटे ई बात लक बड परेशान रहैत छलाह। बहुत मन्नत माँगेक केर बाद किसानक कनियाँ केर एकटा बेटा भेल जकर नाम सौरभ राखलक। जे कुछ दिनक बाद बीमार पडल, ओर फेरो बाद में मरि गेल। ई बात सँ किसान ओर किसानक कनियाँ बड दुःखी रहै छलै। एक दिनक बात अछि एकटा साधु-महात्मा किसानक घर आएल ओर किसानक कनियाँक केर कहलक जे अहाँ चिंता नहि करू अहाँक चारिटा बेटा होएत, लेकिन ओकर सभक नाम अहाँक बिगाडि के राखय पडैत अगर अहाँ ऎना नहि करब तँ अहाँ केर बेटा फेर नहि बचत। ई गप्प पर किसान कहलक बाबा अहाँ जे कहलो हम दुनू गोटे वैह करब हम अपन बेटा केर नाम बिगाडि केर राखब। सँ साधु बाबा ठीके कहलक छलै जे अहाँ केर चारिटा बेटा हैत। किसानक कनियाँक एक-एक करि चारिटा बेटा भेल जकर नाम किसान ओर किसानक कनियाँ दुनू गोटे मिलकेर नाम राखलक। पहिल केर नाम छलै- ‘टुटल’, दोसेर केर नाम छलै- ‘सडल’, तेसिर केर नाम छलै- ‘फाटल’ ओर चारिम केर नाम छलै- ‘पंक्चर’। किसानक चारो बेटा जब पैघ भेल तँ किसान ओर किसानक कनियाँ बड चिंता होबे लागल जे एकर सभक बियाह कोना हैत। कुछ दिनक बाद एकटा लडकी बला किसानक घर पर आयल तँ किसान कँ लागल जे आब हमर बेटा सभक बियाह भ जाएत। से किसान अपन पहिल बेटा केर आवाज लगेलक ‘टुटल’ कुर्सी लाबु। ई बात सुनि केर लडकी बला कहलक नहि नहि हमरा सभ नहि बैठब तँ किसान कहलक एना कोना हैत अहाँ सभ मिठाई खाय लिअ ओर अपन दोसेर बेटा केर आवाज देलक ‘सडल’ मिठाई लाबु तँ लडकी बला कहलक हमरा सभक चीनीक बीमारी छलै सँ हमरा सभ मिठाई नहि खायब। तँ लडकी बला कहलक जे आबि हमरा सभ घर लेल जायब से हमरा सब के बिदा करू। किसान कहलक पहिले हम अहाँ सभक बिदाई करब तबने किसान अपन तेसिर बेटा केर आवाज देलक ‘फाटल’ धोती लाबु तँ लड्की बला के भेल ई हमरा फाटल धोती बिदाई करत से लडकी बला कहलक नहि नहिफेर आयब नहि वैह दिन बिदाई करब आय हमरा सभके बिदा करू। तँ किसान अपन चारिम बेटा जे कि सबसे छोट छलै ओकरा आवाज देलक ‘पंक्चर’ गाडी निकालु ओर हिनका सभ केर छोडि आबु। तँ लडकी बला के भेल जे ई हमरा पंक्चर गाडी में बिदा करत। सँ लडकी बला ओतए सँ भागि गेल। किसान अपन माथा पर हाथ धरि कए कहैत छलै जे आब हमर बेटा सँ बियाह के करत।

आशिष चौधरी गाम – चरैया,
जिला – अररिया।

नेना भुटका - नढियाँ – खढियाँक कहानी

नढियाँ – खढियाँक कहानी

एकटा छलै नढिय़ाँ, एकटा छलै खढियाँ। दुनू गोटे में बड नीक दोस्ती छलै। दुनू गोटेक खाना संगेक में बने छलै। दुनू सभ दिन नीक-नुकून खाएक छलै। एक दिन दुनूक ईच्छा भेल जे आए खीर खायल जाए। सँ दुनू मिलकेर खीर सामग्री आनलक ओर दुनू मिलकर खीर बनोलक खीर बनलाक बाद नढियाँ कहलक जे आबि खीर परोसु तँ खढियाँ छलै बड तेज से खढियाँ कहलक जे हम दुनू गोटे बड नीक सँ खीर बनोले छलौ से दुनू गोटे चलु नहायक लेल नहायक बाद दुनू गोटे मिलकर खीर खायब नढियाँ कहलक ठीके कहै छलै। चलु नहायक बाद खीर खायब सँ दुनू गोटे गेल नहायक लेल पोखेर गेल। दुनू गोटे पानी केर अंदर गेल तँ खढियाँ पानी केर अंदरे-अंदर अपन घर पँहुच केर सभटा खीर खाय लेलक ओर वैह खीरक बर्त्तन में पैखाना करि देलक। ओर उ बर्त्तनक ढक्कन वैह ना राखि देलक जैहना पहिले सँ राखल छलै। फेर पानी केर अंदरे-अंदर पोखरि के अंदर पँहुचि गेल जतै नढियाँ पहिले सँ नहाय रहल रहै। फेर खढियाँ कहलक चलु आब खायक लेल। फेर दुनू गोटे घर पँहुचल तँ खढियाँ कहलक नढियाँ सँ अहाँ खीर परोसु बड जोर सँ भुख लागल अछि। नढियाँ गेल बर्त्तनक ढक्कन जैहना हटैलक तँ नढियाँ केर होंशि उडि गेल ओर ओकरा बड जोरक गुस्सा आएल सँ नढियाँ कहलक खढियाँ सँ ऎना कोना भेल, ऎना के कयलक। वैह दिन सँ नढियाँ – खढियाँक दोस्ती टुट गेल जे आइ धरि तक नहि जुटल अछि।

आशिष चौधरी गाम – चरैया, जिला -= अररिया।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...