Sunday, August 30, 2009

विद्यापतिक शिवसिंह- रमानाथ झा

विद्यापतिक शिवसिंह



अपन अनुपम कृति कीतिलताक प्रस्तावनामे विद्यापति कहने छथि जे



तिहुअन खेत्तहिं काञि तसु कित्ति-वल्लि पसरेइ।

अक्खर खम्हराम्भ जइ मञ्चा-बन्धि न देइ।।



आशय स्पष्ट अछि। संस्कृतमे कहबी छैक जे "कीर्त्तिरक्षरसम्बद्धा"। ताहिमे कीर्त्तिमे
वल्लीक आरोप कए कवि साज़् रूपकक विच्छित्ति दए अपन उक्तिकें कविताक स्वरूप देल

अछि। एहिमे सन्देह नहि जे काव्यप्रतिभा जन्मजात होइत अछि ओ कविक ह्यदयक उमड़ैत भाव
स्वतः भावानुकूल वाणी द्वारा कवितारूपें निःसृत होइत अछि। भवभूति कहने छथि जे "पूरोत्पीड़े
तड़ागस्य परीवाहः प्रतिक्रिया" ओ शोक एवं क्षोभमे भलहिं प्रलापहिं ह्यदय धैर्य प्राप्त करओ परन्तु
कविता-रूप परीवाह अनायास ओहि ह्यदयक हेतु होइत छैक जे आनन्दक भावसँ उमड़ल रहैत
अछि। बहुजनसुखाय बहुजनहिताय अवश्ये कविताक रचना होइत अछि मुदा ई मानए पड़त जे
ओकर प्रथम लक्ष्य रहैत अछि स्वान्तः-सुखाय। तें ई मानबामे कोनो विप्रतिपत्ति नहि जे विद्यापति
अपन बहुविध कविताक रचना अपनहि आनन्दक अतिरेकमे कएल। तथापि ओहि स्वान्तःसुखाय
लाभक सज़् सज़् अपन आश्रय, अपन मित्र, अथवा अपन हितैषीकें अमरत्व प्रदान करब सेहो
हुनका उद्देश्य अवश्य छलैन्हि, नहि तँ अपन गीतक भनितामे एतेक व्यक्तिक नाम दए दए ओहि
सबहुँ व्यक्तिक कीर्त्तिवल्लीकें पसरबाक हेतु ओ अक्षरक खाम्ह बनाए मचान नहि बान्हि जैतथि।



मिथिलाक इतिहासमे शिवसिंह ओ विद्यापतिक साहचर्य बड़ मधुर प्रसज़् अछि। शिवसिंह
जँ राजकुलमे

उत्पन्न भेल छलाह तँ विद्यापति राजमन्त्रीक कुलमे, ओ सए वर्षसँ अधिक दिन धरि मिथिला-
राज्यक शासनसूत्र ओ मैथिल समाजक नेतृत्व हिनकहि घरमे छलैन्हि। महाराज शिवसिंहक ओ
बालसखा छलाह, अन्तरज़् मित्र छलाह, वि•ास्त सचिव छलाह,महाराज-पण्डित छलाह,
राजकवि छलाह। शिवसिंह बड़ प्रतापी राजा भेलाह। मिथिलामे कहबी छैक जे



पोखरी रजोखरि आ'र सब पोखरा।

राजा शिवैसिंह आ'र सब छोकरा।।



परन्तु शिवसिंहक सभटा प्रताप विस्मृतिक गर्तमे गड़ि गेल रहैत ओ ई फकड़ा मात्र
हुनक प्रतापक गौरवकें ख्यापित करैत हुनक नामकें मन पाड़ैत रहैत यदि विद्यापति अपन
अनेकानेक रचनामे हुनका अमर नहि कए गेल रहितथि। पुरुष-परीक्षाक अवसन्न-बिद्य-कथामे
विद्यापति राजा ओ कविक सम्बन्धक प्रसज़्मे कहैत छथि जे सृष्टिक आदिकालहिसँ जे राजा
लोकनि वाक्कलागौरवक हेतु कवि लोकनिकें आराधि आराधि गैल छथि



तेषां नाम सरस्वती-परिणतावद्यापि संगीयते।

जाताः के न मृता न के तदितरे ज्ञाता न गेहाद् बहिः।।



वस्तुतः "यशसां स्थापनस्थानं कविभाषितं" ई कथा जतेक शिवसिंह-विद्यापतिक प्रसज़्मे
चरितार्थ भेल अछि ततेक आओर कहाँ देखैत छी?



ओना तँ विद्यापति अपन प्रभु शिवसिंहक कीर्तिकपताका सएह फहराए गेल छथि परन्तु
कीर्त्तिपताका नष्ट भए गेल लुप्तप्राय अछि। कीर्त्तिपताका कहि जे ग्रन्थ प्रकाशित भेल अछि
तकर प्रस्तावनामे "जगतसिंह"क कीर्तन अछि! परन्तु जतबओ विद्यापतिक रचना उपलब्ध अछि,
निश्चित रूपसँ विद्यापतिक रचना प्रमाणित होइत अछि, ततबहुसँ शिवसिंहक सम्बन्धमे बहुतो
ज्ञातव्य विषय ज्ञात भए जाइत अछि। आश्चर्य होइत अछि जे शिवसिंह जे किछु विद्यापतिक हेतु

कएने होइथिन्ह ताहिसँ ओ बुझने होएताह जे ओ अपन बाल-सखाकें उपकृत करैत छथि, कवि
अपनहु एकरा उपकारे मानने होएताह, ओ सबसँ बेसी तँ ओहि समयक लोक सब--कतोक तँ
ईष्र्यालु समेत भए--इएह कहने होएताह जे महाराज अपन बालसङ्गीतकें धन ओ सम्मान सब
कथूसँ परिपूरित कए देल। परन्तु आइ जखन दुहू महापुरुषक परस्पर सम्बन्धक दिशि दृष्टिपात
करैत छी तँ स्पष्ट प्रतीत होइत अछि जे उपकार तँ विद्यापति कएलथिन्ह शिवसिंहक जे हुनका
अमर कए गेलथिन्ह। राजा जे किछु देलथिन्ह से अनित्य छल, नष्ट भए गेल, लोक बिसरि
गेल, परन्तु कवि जे किछु हुनका दए गेलथिन्ह से नित्य अछि, एखन पर्यन्त ओ ओहिना अछि
वा ई कहू जे जँ जँ लोककें ओहि समयक स्मृति क्षीण भेल जाइत छैक तँ तँ अन्धकारक प्रकाश
जकाँ महाकविक वाणीमे उपनिबद्ध शिवसिंहक कीर्त्ति आओर तीक्षणतासँ आलोकित भए रहल
अछि।



विद्यापतिक रचनामे शिवसिंहक प्रसज़् यावतो वर्णनक संग्रह कए ओकर क्रमबद्ध अध्ययन
एक गोट बड़े रोचक ओ उपादेय विषय होइत परन्तु ताहि हेतु एक गोट क्षीणकाय निबन्ध
पर्याप्त नहि होएत। पुरुष-परीक्षामे अनेक ठाम शिवसिंहक प्रशंसा अछि, स्तुति अछि। कमसँ कम
दू गोट गीत केवल शिवसिंहक वर्णनमे उपलब्ध अछि। परन्तु सबसँ चमत्कारक अछि
विद्यापतिक ओ गीत सब जाहिमे भनितामे शिवसिंहक नामतः उल्लेख अछि। विद्यापतिक भनिता
केवल विधि-रक्षार्थ टा नहि अछि, कवि ओहिमे केवल अपन नाम वा उपाधि अथवा अपन आश्रय
किंवा जनिक प्रमोदार्थ ओहि गीतक रचना भेल तनिक नामक कीर्तन मात्रे कएकें नहि छोड़ि देने

छथि, अपितु ओहिमे बहुधा ओ अपन उक्ति बड़े मार्मिक रूपसँ अभिव्यक्त कएने छथि।
गोविन्ददासहुक रचनामे भनिता एहिना सार्थक अछि, साभिप्राय अछि। हुनक परवर्ती कवि
लोकनि भनिताकें केवल व्यवहार बनाए लेल। ताही कारणें विद्यापति वा गोविन्ददासहुक
भनिताक महत्त्व साधारणतया लोककें आकृष्ट नहि कए सकलक ओ विद्यापतिक भनिताक
स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन एकन पर्यन्त नहि भेल अछि। केवल श्रद्धेय डाक्टर श्रीविमानविहारी
मजुमदार साहेब एकर महत्त्वकें बुझलैन्हि अछि। हुनक एक गोट लेख एहि प्रसज़् बिहार रिसर्च
सोसाइटीक जर्नलमे 1942 मे प्रकाशित भेल छल तथा विद्यापतिक गीतक जे संग्रह ओ
सम्पादित कएल अछि ताहिमे भनिताक क्रमसँ गीतक वर्गीकरण कए एक भनिताक सबटा गीत
ओ एकत्र संगृहीत कए देल अछि तथा ओकर विस्तृत भूमिकामे एहि भनिता सबहिक विचार
सेहो ओ बड़े वैज्ञानिक रीतिसँ कएल अछि। यद्यपि ओ विचार सर्वाशें पूर्ण नहि अछि, केवल
भनिताक विचारक दिग्दर्शन मात्र कराए देल गेल अछि, मुदा एहिमे कोनो सन्देह नहि जे
श्रीमजुमदार साहेब जे काज कएल अछि ताहिसँ विद्यापतिक भनिताक स्वतन्त्र रूपसँ अध्ययन
करबाक केवल सामग्री मात्रे संकलित नहि भेल अछि, अपितु ओकर अध्ययन ओ अनुशीलनक
प्रकार सेहो प्रदर्शित भेल अछि।



ई कथा आब सर्वविदित अछि जे राधाकृष्ण विषयमे सख्यभाव मानि महाप्रभु चैतन्यदेव
विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतकें भक्तिक भावसँ देखथि। महामना ग्रिअरसन साहेबकें एहि गीत
सबमे जतए कतहु माधवक नाम नहिओ अछि तथापि केवल नायकहुसँ परमात्मा एवं राधा किंवा
नायिकासँ जीवात्मा प्रतिभासित होइन्ह। एही देखाउसिमे आब अन्यान्यो कतेक जन विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीतमे मधुर रसक परिपाक मानए लगलाह अछि। परन्तु श्रीमजुमदार साहेब एहि
गीत-सबहिमे भनिताक सज़् शेष पदक समन्वय कए ई देखाओल अछि जे शिवसिंह-नामबला

गीत सबमे जतहु माधव ओ राधाक नाम अछि ततहु कवि हुनका नायक ओ नायिकाक च्र्न्र्द्रड्ढ
क रूपमे, आदर्श जकाँ, देखैत छथि, भक्तिभावसँ नहि। गीत-संख्या 164मे नायिका विलाप करैत
छथि जे "सखि हे कतहु न देखिअ मधाई" ओ भनितामे विद्यापति हुनका आ•ाासन दैत छथिन्ह
जे "लखिमा-देविपति पुरहि मनोरथ आबहि शिवसिंह राजा"। गीतसंख्या 175 मे विरहिणी
नायिकाक मनोरथ जे जखन आओब हरि रहब चरन गहि चान्दे पुजब अरविन्दा। कुसुम सेज
भलि करब सुरत केलि दुहु मन होएत सानन्दा। इत्यादिक अन्तमे ओकरा आ•ाासन दैत कविक
उक्ति भनितामे द्रष्टव्य थिक जे



भनहि विद्यापति सुन वर जउवति अछ तोकें जिवन अधारे।

राजा शिवसिंह रूपनराएन एकादस - अवतारे।।

गीतसंख्या 177 मे

"माधव कठिन - ह्यदय परवासी

तुअ पेयसि मोयँ देखलि वियोगिनि" इत्यादि

सखी नायकसँ नायिकाक विरहावस्थाक करुण वर्णन कए अन्तमे कहैत अछि जे

"राजा शिवसिंह रूपनराएन करथु विरह उपचारे"।।

एहि गीत सबमे मधाइ, हरि वा माधवसँ परमात्मा तँ नहिए अभिप्रेत छथि, साधारण
नायकक द्यन्र्द्रड्ढ "प्रतिनिधि" सेहो नहि, प्रत्युत अभिप्रेत छथि स्पष्टतः राजा शिवसिंह जनिका हेतु
"एकादश अवतारा" विशेषतः विचारणीय थिक। अतएव श्रीमजुमदार साहेब एहि विषयक विचार
तँ कएल निष्पक्ष भावसँ, वैज्ञानिक रीतिसँ, परन्तु निष्कर्ष हुनक आंशिके सत्य प्रकट भेल, पूर्ण
सत्य धरि की तँ ओ नहि गेलाह अथवा वैष्णव सिद्धान्तक संस्कारक प्रभावसँ से कण्ठतः
स्वीकार नहि कएलैन्हि।



मिथिलाक संस्कृति ओ परम्परामे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीत कहिओ भक्ति-भावसँ नहि
देखल गेल। मधुर रसक कल्पनासँ मिथिलाकें कहिओ परिचय नहि। मिथिलामे विद्यापतिक
श्रृङ्गारक गीत विशुद्ध

श्रृङ्गाररसक गीत बुझल जाइत छल ओ एखनहु बुझल जाइत अछि। गीतमे राधा ओ कृष्णक
लीलाक वर्णन अछि तें एकर रसमे कोनो अन्तर नहि बुझल गेल वा मानल गेल। गाथा-सप्तशती
पर्यन्तमे (काव्यमाला 447) "कान्ह"क प्रयोग साधारण नायकक हेतु भेल-अछि ओ मिथिलहिमे
नहि बङ्गालहुमे जे लोकगीत प्रचलित अछि ताहिमे केओ रमणी अपन रसिक स्वामीकें कान्ह,
मधाई प्रभृति शब्दें उल्लेख करैत अछि। एहि परम्परागत संस्कारक पुष्टि हमरा विद्यापतिक
गीतसबसँ, विशेषतः हुनक गीतक भनितासँ होइत रहल अछि, ओ तें अपन सम्पादित पुरुष-
परीक्षाक भूमिकामे हम एहि कथाक प्रतिपादन कएने छी जे विद्यापतिक कुष्ण ओ राधाकें
परमात्मा ओ जीवात्मा तँ नहिए बुझबाक थिक; प्रत्युत हमरा तँ इएह प्रतीत होइत अछि जे
विद्यापति कृष्ण ओ राधाक रूप ओ लीलाक व्याजें शिवसिंह ओ लखिमाक रूप ओ लीलाक
वर्णन कएने छथि, विद्यापतिक कान्ह थिकथिन्ह शिवसिंह ओ राधा थिकथिन्ह लखिमा। हम
बुझैत छी जे एहि प्रसज़् हमर जे दृष्टि अछि से ओएह जे श्रीमजुमदार साहेबक छैन्हि; भेद एतबे
जे हम निस्संकोच पूर्ण सत्यक प्रतिपादन कएल अछि परन्तु श्रीमजुमदार साहेब जेना सशङ्क

रहथि, गेलाह अछि तँ सत्यक दिशामे अवश्य परन्तु पूर्ण सत्य प्रकाश नहि कएल।



परन्तु हमर सम्पादित पुरुषपरीक्षाक भूमिकाक समालोचनामे श्रद्धेय श्रीमजुमदार साहेब
हमर एही कथाक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएल अछि। श्रीमजुमदार साहेब बड़ पैघ विद्वान
छथि, इतिहास विचक्षण छथि ओ विद्यापतिक प्रसज़् हुनक पाण्डित्य देशमे ककरहुसँ न्यून नहि
कहल जाए सकैत अछि, अतएव हमरा अत्यन्त आश्चर्य अछि जे हुनक सदृश निष्पक्ष विचारक
हमर ओहि उक्तिक सज़् अपन वैमत्य प्रकट कएलैन्हि अछि जाहि हेतु हमरा प्रचुर प्रमाण अछि
ततवे नहि, किन्तु जाहि प्रसज़् हमरा सबसँ बेशी बल स्वयं श्रीमजुमदार साहेबक विचारसँ भेटल
छल। तें हम एहि विषयक पुनर्विचारमे प्रवृत्त भेल छी ओ एहिमे हमर विचारसरणि ओएह रहत
जे श्रीमजुमदार साहेबक रहलैन्हि अछि तथा आधार रहत श्रीमजुमदार साहेबहिक संगृहीत ओ
सम्पादित विद्यापतिक गीतावली।



एहि संग्रहमे विद्यापतिक रचित कहि गोट हजारेक गीत अछि जाहिमे प्रायः आधा
भनिता-रहित अछि। नेपालक पोथीक लेखक महोदय तँ भनिताक महत्त्व बुझबे नहि कएलथिन्ह
ओ अन्तमे भनइ विद्यापतीत्यादि लिखि भनिताक अध्ययनक मार्गे अवरुद्ध कए देल। हमरा ई
वि•ाास नहि होइत अछि जे विद्यापतिक कोनो गीत भनिता-विहीन छल, ई केवल लेखकक
अनभिज्ञता ओ अपाटव सूचित करैत अछि जे गीतमे भनिताक पदकें निष्प्रयोजन बूजि ओकरा
छोड़ि देल गेल। तथापि एहि गोट हजारेक गीतमे दू सएसँ किछुए अधिक गीत अछि जाहिमे
भनितामे शिवसिंहक नाम अछि। एहिमे एक सए सत्ताइस गोट गीतमे शिवसिहंक सज़्-सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि तथा सात गोट गीतमे शिवसिंहक सज़्-सज़् हुनक पाँचो अन्यान्य स्त्री,
मधुमति (18) सुषमा सोरम (95) रूपिनि (166) ओ मोदवती (169)क नाम अछि जाहिमे
सुषमाक नामक गीत तीनि गोट (51, 102, 205) अछि ओ चारिम (148) मे सुषमाक सज़्
लखिमाक नाम सेहो अछि। एकर प्रामाणिकता एहीसँ सिद्ध अछि जे पञ्चीमे सेहो शिवसिंहक
छओ गोट विवाह उल्लिखित अछि ओ एहि छबो महादेवीक परिचय उपलब्ध अछि।



ई हमर कहबाक तात्पर्य ने पहिने छल ने एखनहु अछि जे विद्यापतिक सब गीतक
भनिता साभिप्राये अछि अथवा शिवसिंह नामबला सब गीतमे हुनकामे कृष्णत्वक आरोप अछि।
तकर तँ प्रयोजनो नहि अछि। एकहु दु ठाम विद्यापति यदि स्पष्ट शब्दें शिवसिंहकें कृष्ण कहल
अछि अथवा मानल अछि तँ ई कथा सिद्ध भए गेल। ओ से विद्यापति एक दू ठाम नहि अनेक
ठाम, अनेक प्रकारें, अनेक भङ्गिमासँ कहल अछि। केवल कान्ह वा माधव, कन्हाइ वा मधाइ
प्रभृति शब्दक प्रयोगहिसँ हम एकर आरोप नहि मानि लेब, कारण, जे कथा हम पूर्वहुँ कहल
अछि केओ नायिका अपन ह्यदयज़्म स्वामीकें अपन "कान्ह" कहैत अछि, सब रमणीकें अपन

रसिक प्राणे•ार कृष्णाहिक अवतार होइत छथिन्ह। हमरा तँ स्पष्ट शब्दें शिवसिंहमे कृष्णाक
आरोप चाही ओ तकर दृष्टान्त हम एहिठाम श्रीमजुमदार साहेबक संस्करणसँ उपस्थित करैत
छी।



सबसँ पूर्व शिवसिंहक रूप-सौन्दर्यक वर्णन देखल जाए। शिवसिंह

पुहबी नव पचवाने (39)

तीनि भुवन महि अइसन दोसर नहि (50)

रूपे अभिमत कुसुमसायक (92)

पुहविहि अवतरु नव पँचवाने (127)

परतख पँचवाने (139)

जनि ऊगल नवचन्द (113)

मेदिनि मदन समाने (151) इत्यादि शब्दें वर्णित छथि। हुनक रसिकताक वर्णन अछि :-

रतन सनि लखिमा कन्त। सकल कलारस जे गुनमन्त (48)

सकल कला अवलम्ब (104)

रायनि मह रसमन्ता (109)

राय रसिक (122)

केलि कलपतरु सुपुरुष अवतरु नागर कुरुवर रतने (185)

रस आधार (93)

रसवन्ता गुणानिवास (127) इत्यादि।

"सिंह सम शिवसिंह भूपति" (9) सँ हुनक शौर्यक वर्णन कए हुनक वदान्यताक कीर्तन
कएल गेल अछि यथा

महोदार (20)

सकल जन सुजन गति (111)

सकल अभिमत सिद्धिदायक (93) इत्यादि।

ताहि सज़् हिनक पिताक नामक कीत्र्तन--

देवसिंहनरेन्द्रनन्दन (8)

गरुड़नराएननन्दन (52),



हिनक छबो पत्नीक उल्लेख, तिथिक उल्लेखक सज़् हिनक पिताक मृत्यु ओ हिनक
सिंहासनाधिरोहणक वर्णन (8), हिनक विजयक वर्णन (9) इत्यादि सब कथाकें मिलाए
शिवसिंहक व्यक्तित्वक एक गोट सुन्दर चित्र अङ्कित भए जाइत अछि। ताहि सज़् हिनक
शरीरक श्याम वर्ण अनेक ठाम अनेक रूपें कहल अछि, यथा,

राजा शिवसिंह रूपनराएन साम सुन्दर काय (34)

सपन देखल हम शिवसिंह भूप

बतिस वरस पर सामर रूप (920)

जकरा पुरुषपरीक्षमे "चारुपाथोदनील", सजलजलदवर्णसुन्दर, कहल गेल अछि।



एहिसँ स्पष्ट अछि जे शिवसिंह श्यामवर्णक सुन्दर कान्तिक नवयुवक छलाह जनिक रूप
मनोमोहक छल अतएव जखन हुनका रसिकशिरोमणि कहबाक भेलैन्हि तखन विद्यापति एहि
वर्णसाम्यसँ बलित कहबाक भए हुनका श्रृज़्र-रसक अधिष्ठातृ देवता वृन्दावन-विहारी कृष्णहिक
अवतार कहि देल। शिवसिंहकें ओ कहल अछि

परतख देव (180)

कान्हरूप सिरि शिवसिंह (77)

अभिनव कान्ह (101)

अभिनव नागर रूपे मुरारि (90);



जनिका केवल ओएह टा नहि समस्त संसार हरिक सदृश बुझए "हरि सरीसे जगत
जानिअ" (41) ओ तें विद्यापति वारंवार हुनका "एकादस अवतारा" (89, 175, 197) कहि कहि
अपन भक्ति प्रदर्शित करैत छथि तथा हुनक रसिकता, श्रृङ्गार प्रवणता, कामकला-कुशलता
व्यञ्जित करैत छथि। ई सब ततेक स्पष्ट अछि, व्यक्त अछि जे एहि प्रसज़् आओर किछु कहब
व्यर्थ।



तथापि एक गोट गीत आओर विचारणीय थिक। गीत संख्या 35 मे केओ रमणी अपन
स्वप्नक समाचार अपना सखीसँ कहैत अछि।



हरि हरि अनतए जनु परचार।

सपन मोए देखल नन्दकुमार।।



परञ्च भनितामे विद्यपति ओहि नागरीकें बुझबैत कहैत छथिन्ह जे

.................अरे वर जउवति जानल सकल भरमे।

शिवसिंह राय तोरा मन जागल कान्ह-कान्ह करसि भरमे।।

आओर ई वरयुवती स्वप्नमे जे स्वरूप देखल (जकरा ओ नन्दकुमार बुझलक) तकर
वर्णन अछि--

नील कलेवर पीत वसन धर चन्दनतिलक धवला।

सामर मेघ सौदामिनि मण्डित तथिहि उदित शशिकला।।

ओहि स्वरूपकें वरयुवती नन्दकुमार मानल से ओकर भ्रम छल। श्यामवर्ण, पीताम्बर,
•ोतचन्दनतिलक-त्रिपुण्डलसित भाल ओ स्वरूप राजा शिवसिंहक छल। केहन मार्मिक रूपसँ
भ्रान्ति प्रदर्शित अछि, केहन चमत्कारक व्यङ्ग्य स्फुट होइत अछि से सह्यदयसंवेद्य अछि,
कहबाक प्रयोजन नहि।



एकर पुष्टि पुरुष-परीक्षासँ सेहो होइत अछि। ओहिमे शिवसिंह वीर लोकनिमे मान्य,
सुधी लोकनिमे वरेण्य, विद्वान् लोकनिमे अग्रविलेखनीय कहि वर्णित छथि जाहिसँ "वीरः सुधीः
सविद्यश्च" ई जे पुरुषक लक्षण एहि ग्रन्थमे प्रतिपादित अछि ताहि तीनूक प्राशस्त्य हिनकामे
कहल अछि तथा हिनक शौर्यक प्रसज़् कहल अछि जे गौड़े•ारक सज़् युद्धमे ओ से यश अर्जित
कएल जे चारू दिशि कुन्दकुसुम सदृश शुभ्र आलोकित छल। परन्तु सबसँ महत्त्वपूर्ण अछि
ओहि ग्रन्थक तृतीय परिच्छेदक अन्तमे उपलब्ध ओ श्लोक जकरा ग्रन्थसँ कोनो सम्बन्ध नहि,
छैक, केवल शिवसिंहक गुणकीर्तन थिक :-



लक्ष्मीपती सर्वलोकाभिरामौ चन्द्रननौ चारुपाथोदनीलौ।

द्वौ पुरुषौ लक्षणौस्तैरुपेतौ नारायणो रूपनारायणो वा।।



एकर प्रथम दुहु चारणमे चारि गोट पद अछि जे चारि गोट लक्षण थिक ओ श्लोकक

उत्तरार्धमे कहल अछि जे एहि चारू लक्षणसँ युक्त दुइए गोट पुरुष छथि, एक तँ पुरुषोत्तम
नारायण ओ दोसर शिवसिंह रूपनारायण। चारू गोट लक्षण श्लेषसँ युक्त अछि जे दुहूमे
चरितार्थ होइत अछि। यथा नारायण छथि लक्ष्मीक पति ओ शिवसिंह 'लखिमादेइरमाने" वारंवार
वर्णित छथि। दुहू सब लोकमे अथवा सब लोकक हेतु सुन्दर छथि

जे कथा गीतमे "परतख देव" वा "परतख नव पँचवाने" वा "तीनि भुवन महि अइसन दोसर
नहि" शब्दें कहल अछि। चन्द्रमाक सदृश लोकलोचनाह्लादकर दुहूक मुख अछि जे कथा गीतमे
"जनि ऊगल नव चन्द" शब्दें कहल अछि अथवा जे कथा दोसर गीतमे ऊपर प्रदर्शित अछि,
शुभ्रत्रिपुण्डक उपमा चन्द्रमासँ, नवचन्द्रसँ देल गेल अछि। तथा घनश्याम तँ नारायणक नामे
अन्वर्थ थिकैन्हि ओ शिवसिंहक "सामर रूप" "साम सुन्दर काय" एहिसँ अभिव्यक्त अछि।
अतएव पुरुष-परीक्षाक एहि श्लोकसँ ओही कथाक पुष्टि होइत अछि जे भनितामे "हरि सरीसे
जगत जानिअ" "अभिनव नागर रूपें मुरारि" "अभिनव कान्ह" अथवा "एकादश अवतारा" इत्यादि
शब्दें कहल अछि। शिवसिंहक रसिकताक प्रसज़्, तहिना, पुरुष-परीक्षाक विदग्धकथामे
विक्रमादित्यक वैदग्ध्यक कथा कहि अन्तमे विद्यापति कहैत छथि जे "साम्प्रतमपि"--एखनहु,
कलावती कविता अथवा कलावती कामिनीक वेत्ता राजा शिवसिंह छथि--"तां वेत्ति राजा
शिवसिंहदेवः"।



एहि कथाक पुष्टि कीर्त्तिपताकासँ सेहो होइत तथा ओहिसँ सम्भवतः ई कथा निर्विवाद
सिद्ध भए जाइत, परन्तु कीर्त्तिपताका जाहि रूपमे उपलब्ध अछि ताहिसँ कोनो प्रयोजन सिद्ध
नहि भए सकैत अछि। हमरा जे कीर्त्तिपताका उपलब्ध अछि तकर श्रृंज़्र भागमे एक गोट श्लोक
जे हमरा सम्पूर्ण पढ़ल भेल अछि तकर आशय अछि जे रामावतारमे भगवानकें सीता-विश्लोषक
कष्ट भोगए पड़लैन्हि तें कृष्णावतारमे भगवान श्रृङ्गारक मूर्त्ति भए अवतीर्ण भेलाह। से जेहने
द्वापरमे भगवान् कृष्ण, तेहने सम्प्रति अहाँ छी। सत्ये



संसारे भोगसारे स्फुटमवनिभुजां श्रीफलं वा किमन्यत्।



एहि श्लोकक "साम्प्रतं तादृशस्त्वम्" मे "त्वं" सँ ककर अभिप्राय से तँ बुझल नहि होइत
अछि--जे पाठ उपलब्ध अछि ताहिसँ शिवसिंहक धरि नहि--परन्तु एतबा तँ स्पष्टे अछि जे
रसिक राजाकें कृष्णाक अवतार कहब विद्यापतिक हेतु कोनो अभिनव कथा नहि भेल। तें
अन्यथा उपलब्ध-प्रमाणक बल पर कहि सकैत छी जे स्वरूपतः, स्वभावतः, चरित्रतः, शिवसिंहकें
कृष्णक अवतार मानि लेब कनेको अत्युक्ति नहि भेल।



एहि प्रसज़् ई शङ्का नहि कत्र्तव्य थिक जे नररूप शिवसिंहकें नारायणक सदृश कहब,
हुनका भगवानक एगारहम अवतार मानि स्तुति करब अनुचित थिक, मिथ्या-स्तुति थिक, धार्मिक
किंवा नैतिक दृष्टिसँ धृष्टता थिक। शिवसिंह साधारण मनुष्य तँ छलाह नहि, ओ राजा छलाह
ओ मनु कहैत छथि जे "महती देवता होषा नररूपेण तिष्ठति"। स्वयं भगवान् गीतामे कहने छथि
जे :



यद्यत् विभूतिमत् सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंशसम्भवम्।।



राजा शिवसिंह निश्चय विभूतिमान् छलाह, श्रीमान् छलाह, ऊर्जिततम छलाह। हुनका
"प्रत्यक्ष देव" कहब आर्यजातिक राजत्व-भावनाक अनुकूल बुझबाक चाही, प्रतिकूल तँ कहिओ
नहि, विरुद्ध तँ ओ नहिए भेल। ओ तखन एहि "केलि-कल्पतरु" "रायनि मह रसमन्ता" "सकल
कला अवलम्ब" "पुहुबी नव पँचवाने" शिवसिंहकें यदि कोनहु देवताक अवतार कहबाक भेल,
हुनक चरितक समता कोनहु देवताक लीलासँ देखएबाक भेल तँ कृष्णासँ विशेष सज़्त दोसर
कोन देवता भए सकैत छलाह।



अतएव श्रीमजुमदार साहेब हमर एहि कथासँ सहमत नहि होथु परन्तु हम तँ जतेक एहि
विषयक विचार करैत छी ततेक हमर वि•ाास दृढ़ भेल जाइत अछि जे विद्यापति केवल अपन
गीतहिटामे नहि, अन्यत्रहु शिवसिंहकें कृष्णाक अवतार मानैत छलाह। शौर्यमे, वीर्यमे, चातुर्यमे,
सौन्दर्यमे, वर्णमे, रसिकतामे,

कामिनीमनोमोहकतामे, कामकेलिप्रवणतामे, श्रृङ्गारिकतामे, अनेकधा, विद्यापति दुहूक समता
प्रदर्शित कएने छथि। ई सत्य जे सब गीतमे, सब गीतक भनितामे, ई नहि भेटत; शिवसिंह-
नामबला गीतहुमे सब ठाम एकर

उल्लेख नहि अछि। परन्तु तकर प्रयोजनो नहि छैक। एकहु ठाम यदि एहि कथाक स्पष्ट
उल्लेख अछि तँ कविक भाव व्यक्त भए गेल ओ तखन अन्यत्र तँ व्यङ्ग्यरूपें ओकर उपलब्धि
सुगम भए जाएत। तें हम कहने छी ओ पुनः कहैत छी जे विद्यापतिक श्रृङ्गारक गीतमे जतए
शिवसिंहक नाम छैन्हि ततए यदि माधवक उल्लेख अछिओ तँ माधवसँ हमरा शिवसिंहक प्रतीति
होइत अछि। तथा ई सर्वथा काल्पनिक नहि अछि किन्तु स्वयं विद्यापतिक अनेको गीतक
भनितामे, कए गोट गीतहुमे, ई कथा स्फुट अछि। विद्यापतिक शिवसिंह वस्तुतः रूपनारायण
छलाह तथा विद्यापति हुनका नर-रूपमे नहि, नारायणक रूपमे प्रत्यक्ष-देव मानैत छलाह,
प्रत्यक्ष-देव आनन्दकन्द कृष्णक एकादश अवतार कहि हुनका अमर कए गेल छथि।

पेटार ११

अपन गप

गजेन्द्र बाबूक इच्छा छनि जे एहि संग्रह लेल हम एकटा प्रस्तावना लिखी। हुनका निराश करबाक मन नहि होइत अछि । तैं, हुनक इच्छाक सम्मान मे बस एकाध टा गप कहऽ चाहैत छी।
हमरा बुझाइत अछि जे हमर रचना और किछु नहि, देश-कालक प्रति हमर प्रतिक्रिया थिक। हम अपन समयक सार-तत्व केँ प्रतिबिम्बित करऽ चाहैत छी। जीवन लेल जे किछु नीक आ श्रेयस्कर अछि, हमर रचना तकरे हासिल करऽ चाहैत अछि। हम एहन मनुक्ख गढ़ऽ चाहैत छी जे सब सँ प्रेम करय। आ प्रेम वएह कऽ सकैत अछि जे सत्यक सर्वाधिक निकट हएत।

सुभाष चंद्र यादव
सहरसा, १८.०१.२००९
अनुक्रम
अपन-अपन दुख 1
असुरक्षित 4
आतंक 9
ओ लड़की 14
एकटा अंत 19
एकटा प्रेम कथा 23
एकाकी 28
कनियाँ-पुतरा 33
कबाछु 36
कारबार 39
कुश्ती 43
कैनरी आइलैण्डक लॉरेल 47
तृष्णा 52
दाना 58
दृष्टि 61
नदी 65
परलय 67
बनैत-बिगड़ैत 72
बात 76
रंभा 81
हमर गाम 85

अपन-अपन दुख
ओहि राति पत्नीइ दुखित छलीह। पीठ मे दर्द होइत रहनि। घरक भितरिया बरंडा पर खाट पर पड़ल छलीह। निन्न नहि होइत छलनि। धीयापूता क आवाजाही, गपशप, खटखुट निन्न नहि होअय दनि। ओ अति ध्वनिग्राही छथि। सेंसिटिव माइक्रोफोन जकाँ छोट-छोट ध्वनि-तरंग सँ कम्पित भऽ जाइत छथि।धीयापूता केँ बरजैत छथिन—अनेरो टहल-बूल नहि, हल्ला-गुल्ला नहि कर, रेडियो नहि बजा। कतेको बेर अड़ोस-पड़ोस सँ अबैत टी.वी. या रेडियोक आवाज सुनि कऽ पुछैत छथिन—‘अपन रेडियो बाजि रहल अछि ?’
सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। धीयोपूतोक अपन संसार छैक। ओ सभ कखनो मायक बात सुनैत अछि, कखनो नहि सुनैत अछि आ संसारक अपन कल्पनाक रमणीयता मे डूबल रहैत अछि। अवहेलना सँ पत्नीनक खौंझ बढ़ऽ लगैत छनि। तनाव चरम सीमा पर पहुँचि जाइत छनि तऽ चिकरि उठैत छथि आ धीयापूता केँ सरापऽ लगैत छथि। धीयापूताक कोमल भावुक संसार आइना जकाँ चूर भऽ जाइत अछि।
ओहि राति हम कनेक देरी सँ घर घूरल रही। देर सँ घुरब पत्नीसकें पसिन्न नहि छनि। हमर ई दिनचर्या हुनका लेल घोर आपत्तिजनक आ विपत्तिजनक। देर सँ घुरबाक अर्थ अछि देर सँ सूतब आ देर सँ सुतबाक अर्थ अछि पत्नीवकेँ देर धरि कम्पित करैत रहब।
तऽ ओहि राति घर पहुँचला पर परिस्थिति बूझबा मे भांगठ नहि रहल जे भानस –भात नहि भेल अछि, पत्नीू कोनो कारणे सूतलि छथि। एना कतेको बेर भेल अछि। सूतलि रहथु , विघ्नू नहि होनि ई चेष्टा करैत धीयापूताक सहयोग सँ हम भानसक उद्योग मे लागि गेल रही। मुदा पत्नीह निन्नमे नहि छलीह; कलमच पड़ल छलीह। एहि परिस्थितिक लेल जेना सफाइ दैत आ अपन जागरण तथा कष्टछ केँ जनबैत पत्नी अचानक चनकि उठलीह—‘आब अखन सँ शुरू भऽ गेलैक गाँड़ि घुमौनाइ। हौ बाप, ई सभ कखनो चैन नहि दैत अछि। भगवान, मौगति दैह !’


एकटा सनसनाइत तीर सन शांति पसरि गेल। पत्नी उठि कऽ दोसर कोठली चल गेलीह।
घंटा- दू घंटा बीतल। ओहि दिन बहुत थाकल रही। सोचलहुँ खा कऽ सूति रही। पत्नीत केँ जखन निन्न टुटतनि, खा लेतीह। निन्न मे उठा देला पर हुनका फेर निन्न आयब कठिन होइत छनि। तेँ हुनक भिड़काओल केबाड़ केँ आस्ते-आस्ते ठेलि चद्दरि लेबा लेल भीतर गेलहुँ। मुदा हमर पदचाप आ उपस्थिति सँ हुनक निन्न टूटि गेलनि। हुनका जागल बूझि हम कहलियनि-खा लियऽ।’ ओ करोट फेरलीह, बजलीह किछु नहि।
हम दोसर कोठली मे जा कऽ सूति रहलहुँ। पता नहि कतेक राति भेल हेतैक। हमरा क्यो जगा रहल छल। निन्न केँ ठेलैत हम अख्यास करऽ लगलहुँ के अछि, की कहि रहल अछि। ठीक-ठीक मोन नहि पड़ैत अछि, मुदा लगैत अछि हमर आँखि नहि खुजल रहय। कान मे पत्नीक स्वर आयल, लेकिन बुझायल नहि ओ की कहि रहल छथि। पुछलियनि –‘की कहैत छी?’
कहलनि—‘की भेल अछि? एना कियैक करैत छी?’
हम सोचय लगलहुँ , हमरा की भेल; हम कोना करैत रही। तखन ध्यान गेल, गला मे कफ फँसल अछि। खखारि कऽ ओकरा गीड़ैत अन्दाज कयलहुँ हम घर्राइत रहल होयब आ पत्नीि डरि गेल हेतीह।
हम फेर लगले निन्न पड़ि गेलहुँ। पता नहि कतेक समय बीतल हेतैक। घंटा कि आध घंटा। पत्नीक आवाज कानमे आयल-‘सुनै नइँ छिऐ ?’ पुछलियनि- ‘की?’
कहलनि—‘लोककेँ सूतऽ देबैक कि नहि ?’ देखलियनि चौकी सँ कने हटि कऽ ठाढ़ि छलीह। हमरा भेल हम फेर घर्राय लागल होयब। गरामे अटकल कफ केँ घोंटैत स्नेह सँ पत्नी केँ पुछलियनि-‘भोजन कयलहुँ?’
पत्नीो कोनो जवाब नहि देलनि आ चल गेलीह। भेल जे खा लेने हेतीह तेँ नहि बजलीह। एहि बेर निन्न तुरन्ते नहि आयल। चिन्ता भेल कफ किएक बढ़ि गेल अछि। मोन पड़ल पत्नी कतेक डेरा गेल छलीह। फेर पता नहि कखन निन्न पड़ि गेल।
भोरमे पत्नी सँ पुछलियनि—‘रातिमे दू-दू बेर किएक जगौने छलहुँ’, तऽ कहलनि-‘पारा जकाँ डिकरैत छलहुँ तेँ।’
हमरा एहि जवाबक आशा नहि रहय, तेँ एहि पर हठात विश्वास नहि भेल। पहिने एना कहियो नहि भेल रहय। हमर ठड़ड़ सँ अकच्छ भऽ कऽ ओ कहियो जगौने नहि छलीह। तखन हमर ओ कफ आ घरघरी कोनो भ्रम रहय ? हमरा भीतर जेना किछु कचकल। कने चुप रहि पुछलियनि—‘खयने छलहुँ कि नहि ?’ कहलनि—‘हँ, लोक ताला मारने रहैत छैक आ हम खा लैत छिऐक।’
हमरा बुझा गेल रातिमे धीयापूता खा-पी कऽ सूति गेल होयत आ भनसाघर मे ताला लगा देने हेतैक। पत्नी अपन भूख आ हमर फोंफसँ कुपित भऽ कऽ हमरा उठबैत छल हेतीह। हम उठि गेल रहितहुँ तऽ ओ खइतथि आ खइतथि तऽ निन्न पड़ि जइतथि। ओ तामसे भेर भेल भूखल रहि गेलीह। ठड़ड़ आ घरघरीक दू टा संसार अछि। सभक अपन-अपन संसार होइत छैक। संसारक अपन-अपन सुख होइत छैक, अपन-अपन दुख होइत छैक।
असुरक्षित
द्रेनसँ उतरि कऽ ओ स्टेशनमे टांगल घड़ी देखलक। पौने दू। ओ ठमकि कऽ सोचय लागल। की करय ? चलि जाय ? या राति एत्तहि बिता लिअय? भरि रस्ता ओ अही गुनधुन मे पड़ल रहल आ अखनो छ पाँच कऽरहल अछि। स्टेशन सँ घरक बीस-पच्चीस मिनटक रस्ता ओकरा बड्ड भारी लागि रहल छलै। जाड़क एहि निसबद राति मे सड़क़ एकदम सुनसान हेतै। समय साल बड्ड खराब छै। कखन की भऽ जेतै तकर कोनो ठेकान नहि।
ओना ओकरा लग तेहन किछु नहि रहै। पचास-साठि टा टाका, एगो दामी चद्दरि आ पिन्हनावला कपड़ा। लेकिन जँ इहो सब छिना गेलै तऽ फेर ओ जल्दी कीनि नहि सकत। ओ स्टेशनक सिमटीवला ठरल बेंच पर बैसि गेल आ सोचय लागल।
परसू खन जाइतो काल ओ रातिए मे गेल रहय। जतय गेल रहय, ओतुक्का सीधा गाड़ी रातिए मे भेटै छै आ ओतय सँ साँझमे चलि कऽ एतय अखन दू बजे रातिमे पहुँचल अछि। जहिया जाइत रहय, तहिया साँझे सँ ओकर मन भारी रहै। मनमे अनेक तरहक आशंका आ भय समा गेल रहै। ट्रेन एक बजे रातिमे रहै। एहि जड़कालामे एतेक रातिकेँ स्टेशन गेनाइ ओकरा पहाड़ बुझाइत रहै। ओना ओ जतेक बेर निकलैत अछि, ओकरा लगैत रहैत छैक भऽ सकैत छै ई ओकर अंतिम यात्रा होइ।
जाइत काल ओ बहुत चिन्तित आ उद्विग्न रहय। घरक लोक ओकरा खा-पी कऽ थोड़े काल सूति रहऽ कहलकै। फेर बारह बजे उठत आ चल जायत। लेकिन ओ बुझैत रहय ओकरानिन्न नहि हेतै। जँ कदाचित निन्न पड़ियो गेल तऽ बारह बजे उठि जायत तकर कोन गारंटी। आ जँ उठियो गेल तऽ सीड़क तर गरमा गेला पर बिछौन छोड़ ऽ मे कतेक आलस आ कष्ट हेतै ! मुदा ई सब बात कोनो तेहन बात नहि रहै। ओकरा सबसँ बेसी चिन्ता एहि बातक रहै जे एतेक राति कऽ ओ जायत कोना? जाड़क एहि सुनसान रातिमे असकरे स्टेशन जायब ओकरा भयावह बुझाइत रहै। एतेक राति कऽ ने रिक्शा भेटै छै, ने सड़क पर एक्को टा आदमी।
ओ तय केलक जे आठ बजे निकलि जायत। स्टेशनक बगल वला हॉलमे आखिरी शो सिनेमा देखत आ ट्रेन पकड़ि लेत। हॉलमे जाड़ो सँ बचल रहत। घरक लोक ओकर एहि निर्णय सँ अचंभित भेल। पहिने कहियो ओ एना नहि कयने रहय। ओकर चिंता आ डर देखि कऽ घरक लोक विरोध नहि केलकै। ओ अपन निश्चित कयल कार्यक्रमक अनुसार घरसँ आठ बजे निकलि गेल। सितलहरी तेहन रहै जे एतेक सबेरे सबटा दोकान बन्न भऽ गेल छलै। सड़क पर ओकरा दुइए टा आदमी भेटलै। एकटा के भेदी दृष्टि सँ तऽ ओ डेराइयो गेल रहय। हॉल पर ओ सवा आठ बजे पहुँचि गेल आ नौ बजे धरि टौआइत रहल। घर पर रहितय तऽ आराम करैत रहितय। हॉल पर बइसइयोक ठहार नहि रहै। ओ देबालक टेक लेने ठाढ़ रहल। आब ओकरा ट्रेन छुटबाक चिंता हुअय लगलैक। खोंचावला, पानवला अ गेटकी सँ पता लगेलक सिनेमा कखन खतम हेतै; फ़िलिम लंबा तऽ ने छै?
शो टुटिते एक गोटय सँ टाइम पुछलक। सवा बारह। गाड़ी नहि छुटतै। तइयो ओ अपन चालि तेज केलक आ स्टेशन दिस जाइ वला रेलामे सन्हिया गेल। स्टेशन पहुँचि कऽ ओकरा पता चललै गाड़ी बहुत लेट छै। दू सँ पहिने नहि खुलतै। ओ टिकट कटेलक आ सिमटी वला बेंच पर बइस कऽ प्रतीक्षा करय लागल। भरिसक इएह बेंच रहै, जइ पर अखन बैसल सोचि रहल अछि। आ सोचि की रहल अछि, परसुक्काब बात मोन पाड़ि रहल अछि।

सोचबाक लेल छइहो की? गुंडा-बदमाशक डर। पहिने कोनो डर नहि रहै। ओ बहुत-बहुत राति कऽ कतयसँ कतय गेल अछि। नि:शंक। बेधड़क। लेकिन आब राति कऽ निकलबाक साहस नहि होइत छै। अखबारमे रोज लूटपाट आ हत्याक समाचार पढ़ि-पढ़ि कऽ आ लोकक अनुभव सुनि-सुनि कऽ जी मे डर समा गेल छै। ओ उधेड़बुन मे पड़ल किछु तय नहि कऽ पाबि रहल अछि जे की करय। घर चलि जाय कि स्टेशने पर भोर कऽ लिअय। रिक्शा भरिसक्के भेटतै। भेटियो जेतै तऽ रिक्शावलाकेँ गुंडा की
गुदानतै ! जँ रिक्शेवला गुंडा निकलि गेल, तखन ओ की करत ? आब ककरो पर भरोस नहि रहलै।
ढील पड़ि गेल मफ़लरकेँ ओ कसि कऽ लपेटलक आ चद्दरिसँ मूड़ी आ टांगकेँ नीक जकाँ झाँपलक। मुदा एहि झाँप-तोपसँ जाड़ नहि भागलै। निफ़ाह प्लेटफ़ार्म पर पछिया सट-सट लगै आ सौंसे शरीर केँ छेदने चल जाइत रहै। पोन ठरि कऽ पानि भऽ गेल छलै। ओ छने-छन अपन आसन बदलि रहल छल। पछिला दू राति सँ ओ सूति नहि सकल आ ट्रेनमे झमारल गेल \ थकनी आ जगरनामे और बेसी जाड़ होइ छै। घर चल जइतय तऽ सीड़कमे गरमा कऽ सूति रहितय।
ओ विचारलक जे टहलि कऽ रिक्शा देख आबय। भेटलै तऽ चल जायत। लेकिन रिक्शा पड़ाव पर क्यो कत्तहु नहि रहै। अन्हारमे एकटा रिक्शा लागल छलै। देखलक सीट पर एक गोटय घोकड़ी लगा कऽ पड़ल अछि। ओ एक-दू बेर हाक देलकै। मुदा ओ आदमी नहि उठलै। ओ फ़ेर पेशोपेश मे पड़ि गेल। कनेक दूर पर एक आदमी असकरे चलल जाइत रहै। ओकरा पर नजरि पड़िते ओ झटकि कऽ विदा भेल जेना ओकरा पकड़ि लेत आ संग-संग घर धरि पहुँचि जायत। ओ थोड़बे दूर झटकल गेल होयत कि ओकर चालि मंद पड़ि गेलै। कोनो जरूरी नहि जे ओ आदमी ओम्हरे जेतै, जेम्हर ओकरा गेनाइ छै। लेकिन कोनो अज्ञात प्रेरणावश ओ धीरे-धीरे बढैत गेल। आगॉं जा कऽ एकटा मोड़ रहै। जखन ओ मोड़ पर घूमल आ हियासलक तऽ ओहि आदमी के दूर-दूर धरि कोनो पता नहि रहै। नहि जानि ओ आदमी कतय अलोपित भऽ गेलै। कतहु नुकायल ओकर प्रतीक्षा तऽ ने कऽ रहल छै ! अचानक ओकर देह डरसँ सिहरि उठलै। ई डर बेसी काल टिकलै नहि। ओ कनेक और आगाँ बढ़ल तऽ ओकर कलेजा थिर हुअय लगलै।
जाड़क पीयर मलिन इजोरिया पसरल छलै। भरिसक पछियाक कारणे कुहेस नहि रहै। स्टैण्ड मे लागल भोरका बस दूरे सँ देखा रहल छलै। अपराधक एकटा अड्डा ईहो रहै। एहिठाम कैक बेर कैक आदमी के सामान छिनायल रहै। स्टैण्डक घेरा लग पहुँचिते ओकर आशंका बढ़ि गेलै। स्टैण्ड निर्जन आ सुनसान पड़ल छलै। राति कऽ ई जगह बड़ भयाओन लगैत रहै।
स्टैण्ड सँ निकलि गेला पर ओकर डर कमि गेलै।लेकिन अखन ओ अदहे दूर आयल छल। बचलहा रस्ता बहुत दूर बुझाइत रहै। पुलिसो कतहु नहि छलै। सड़क कातक दोकान दौड़ी, घर-दुआर सब बंद रहै। एक्को टा कुकूरो नहि देखाइत रहै। जाड़मे ओहो सब दुबकल होयत।नमडोरिया सड़क पर ओ असकरे चल जा रहल छल। कैक बेर अपनो जुत्ताक आवाज सुनि क्ऽ लगै क्यो पछुअयने आबि रहल अछि आ जी सन्न सिन रहि जाइ। खट-खुट सुनि कऽ छाती धड़कि उठै।
ओकर घर अदहोक अदहा रहि गेल छलै। ओकरा भरोस भेल चल जाइत रहै जे आब ओ बचि गेल।आब किछु नहि हेतै।ओ सकुशल घर पहुँचि जायत। ठीक तखने ओ आवाज सुनलक। आवाज पाछाँ सँ आयल छलै। क्यो किछु बाजल रहै।ओकर जी सनाक सिन उठलै। ओ पलटि कऽ ताकलक। मुदा क्यो देखेलै नहि। ओकरा भेलै क्यो अपन घरमे किछु बाजल होयत। ओ बढ़ैत गेल।
के छी ?’-पाछाँ सँ क्यो पुछलकै।
ओ घुमि कऽ देखलक।
एक आदमी ठाढ़ छलै। ओ कोनो जवाब नहि देलक आ बढ़ैत रहल। 'अय के छिअय ? ठाढ़ रहऽ।’-ओकर एहि आदेशसँ ओ भयभीत भऽ गेल आ अपन चालि तेज कऽ देलक। ओ आदमी अपराधी बुझा रहल छलै। अखन जँ ओ आदमी आबिकऽ ओकरा घेरि लै तऽ ओ कतबो चिचिआयत क्यो नहि एतै। आब राति-बिराति मुसीबत मे पड़ल लोकक लेल क्यो नहि निकलै छै। ओ दसे डेग आगू बढ़ल होयत कि पलटि कऽ ताकलक। ताकिते ओ आतंकित भऽ उठल। ओ आदमी दौड़ल आबि रहल छलै।
ओ भागल। ओ भागल जा रहल अछि।

आतंक
ओ कहियो हमरा संग बी. ए. मे पढ़ैत रहय। ओकरा सँ जँ फेर भेंट नहि होइत तऽ मनो नहि पड़ितय जे ओ कहियो संग-संग पढ़ैत छल। हम ओकरा चिन्हबो नहि कयलिऐक। वैह चिन्हलक आ नाम लैत टोकने रहय—'चिन्है छी ?'
ओकर आत्मविश्वास आ मैत्रीपूर्ण स्वरसँ कनेक चकित आ प्रसन्न होइत हम मोन पाड़य लागल रही जे ओ के अछि।
एम. पी. क एलेक्शन होमय बला रहैक। हम एलेक्शन ड्यूटीमे आयल रही।ओहो एलेक्शने ड्यूटी मे होयत। ढेरी लोक एहि काजसँ आयल रहय। ओ स्नेह-भाव सँ मुस्किआइत रहय जेना बिसरि जेबाक उलहन दैत हो। ओकर मुस्कीसँ हम अपनाकेँ असहज आ हास्यास्पद अनुभव करऽ लागल रही। एहन स्थितिमे ओकरा चिन्हब आ ठेकनायब मुश्किल छल।
'नहि चीन्हि सकलहुँ।'-हम हारि कऽ कहलिऐक। ओकरा नहि चीन्हि सकबाक हमरा ठीके अफसोस भेल रहय। 'हम हरिवंश !'-ओ अपन परिचय देलक।
'अरे, हरिवंश ! ओह, एकदम्मे नहि चीन्हि सकलहुँ। ततेक दिन भऽ गेलै आ एहि बीच अहाँ ततेक बदलि गेलहुँ जे चिन्हब कठिन छल। हम कहियो अंदाजो नहि कऽ सकैत रही जे अहॉं सॅं एतेक दिनक वाद आ सेहो एहिठाम भेंट भऽ जायत। कतऽ छी ?’-अपन न्यूनता केँ झाँपक लेल हम एक्के साँसमे ई सभ कहि गेल रही।
हरिवंश हमर मित्रक मित्र रहय।ओकर संग-साथ मे कतेको समय बीतल होयत। मुदा ने हम ओकर आत्मीय बनि सकलिऐक ने वैह हमर आत्मीय बनि सकल। हमर आ हरिवंशक बीचक सम्बन्धकेँ फरिछायब कठिन अछि। ओकरा औपचारिके कहब बेसी ठीक होयत। भेंट तऽ होइत रहय, किन्तु भेंटक आवॄत्तिक अनुपातमे जे घनिष्ठीता हेबाक चाही से नहि भेल। सिल पर पड़त निसान बला कहबी टा चरितार्थ भेल। हम एक-दोसराकेँ चीन्हि गेलहुँ फेर कहियो नहि बिसरबाक लेल। तखन ई सभ कोना घटित भेल ? हम कोना ओकरा बिसरि गेलिऐक ? भरिसक हरिवंश सँ भीतरी लगाव नहि हेबाक कारणे एना भेल हैत वा जीवनमे आयल अनेक परिवर्त्तनक कारणे भेल होइ। लेकिन तखन ओ किएक ने बिसरल ? ओकरा बिसरब भरिसक हमरे स्मॄति-दोषक परिणाम छल।
हारिवंश जे कहलक ताहिसँ पता चलल जे ओ हमरे कामत वला ब्लॉकमे बी. डी ओ. अछि आ अखन एलेक्शनमे ट्रांसपोर्टबला काज सम्हारय आयल अछि। ई जनिते हमर स्वार्थ-बुद्धि सक्रिय भऽ उठल। कामतबला ब्लाकमे कैक सालसँ लसकल दाखिल खारिजबला काज मोन पड़ि गेल आ अखन जे ट्रांसपोर्टबला काजसँ आयल छी से हरिवंशक रहने कोनो बढ़ियाँ जीप भेटि जायत। नहि तऽ कोन ठेकान जे जीपक बदलामे ट्रेक्टरे दऽ दिअय। हमरा दिमागमे ईहो बात तुरंत आबि गेल जे आब एलेक्शनक एहि हूलिमालि आ बालु-गरदासँ जान बचत; जल्दिए छुटकारा भेटि जायत। अपन ई सभ फायदा देखि हरिवंशक प्रति जेनाअतिरिक्त स्नेह उमड़ि आयल। ओहि स्नेह-प्रवाहमे हम ओकरा कहलिऐक-'अरे वाह ! अहाँ तऽ हमर कतेको काज कऽ सकैत छी। एकटा तऽ ई जे अहींक ब्लाक मे हमर दाखिल-खारिज वला काज कैक सालसँ अटकल अछि आ दोसर जे हमरा नीक सन जीप दिआ दिअऽ।’
ई सभ सुनि हरिवंशक चेहरा पर जे स्नेहसिक्त दोस्ताना मुस्की रहैक से लुप्त भऽ गेलैक आ तकर बदलामे एकटा कामकाजी उबाऊ भाव आबि गेलैक। ओ बाजल—'कहियो ब्लाक आउ, भऽ जेतै।’ आ गाड़ीवला कागज हमरा हाथसँ लैत एकटा टेबुल दिस बढ़ि गेल।हम ओकर पछोर धऽ लेने रही। हरिवंशक मुँह-कान आ देह-दशा सम्पन्न लोक जकाँ गोल-ठोल आ भरल-पूरल रहैक।ओकर फूलपैंट-कमीज साफ झकझक आ क्रीजसँ तनल रहैक। जूता चमचमाइत रहैक। ओकर पहिरावा उच्चपदस्थ पदाधिकारीक अनुरूप दर्प आ प्रभुत्व बला प्रभाव छोड़ैत रहैक। टेबुल लग पहुँचि टेबुलक चारूकात घौदिआयल लोककेँ ठेलैत आ 'हटू’ कहैत हरिवंश कुरसी पर जा कऽ बैसि गेल।हम कुरसीक कातमे ठाढ़ भऽगेल रही। ओहिठाम और कोनो कुरसी नहि रहैक जे हरिवंश हमरा बैसऽ लेल कहैत। कागजी औपचारिकता पूरा केलाक बाद ओ हमरा जरूरी कागज सभ दऽ देलक। हम ओहि स्थान दिस विदा भऽ गेलहुँ जतय जेबाक लेल ओ कहने रहय। गाड़ीक ड्राइवर कोम्हरो चल गेल छलै आ ओकर प्रतीक्षा मे हमरा आध घंटा आरो बिलमय पड़ल। ओहि आध घंटामे हरिवंश सँ एक बेर और भेंट भेल आ कनेक काल घरौआ गपशप होइत रहल। बाल-बच्चा, ओकर पढ़ाइ-लिखाइ आ आन दोस्त मित्रक सम्बन्ध मे।
वोटक गिनतीक समय हरिवंश सँ देखा-देखी भेल, गप्प नहि भऽ सकल। यद्यपि ओकरा देखिते हमरा भीतर बिजली जकाँ एकटा भावावेग चमकल , मुदा परिचय आ मित्रताक सुखायल स्रोतक कारणे ओ भावावेग बिला गेल। हरिवंश किछु नहि बाजल। ओ मौका अनौपचारिक गपशप लेल रहबो नहि करैक। ओ अपन वरिष्ठ पदाधिकारी सभक बीच बैसल रहय।
एहि सुखायल भेंटक कैक मास उपरान्त एक दिन ओ बजारमे टकरा गेल। ओ हाथमे झोरा लेने तरकारी कीनय जाइत रहय।ओहि दिन ओ हमरा व्यस्त आ अन्यमनस्क बुझायल। जल्दी-ज्ल्दी मूर-टमाटर बेसाहलक आ चलि गेल। हम ओकरासँ हालचाल पूछितिऐक, लेकिन ओकर चेहरा देखि कऽ हालचाल पुछनाइ नीरस आ फालतू बुझायल। मुदा निरर्थकताक अनुभव करितो जे गप हम शुरू कयलहुँ सेहो निरानंदे छल। हम ओकरा कहलिऐक-'एहि बीच कतेको बेर सोचलहुँ जे ब्लॉक जाइ, लेकिन सोचिए कऽ रहि गेलहुँ।’
आउ। कोनो सोम वा बुधकेँ आउ, जहिया कर्मचारी रहैत छैक।’-नितान्त व्यावहारिक आदमी जकाँ कारोबारी अंदाजमे ई कहैत ओ चल गेल।
बहुतो दिन बीतल। हम सोचि कऽ रहि जाइ। लेकिन एक दिन ठानि लेलहुँ जे आइ जेबाक अछि। ब्लॉक पहुँचैत छी तऽ हरिवंशक पते नहि। ओ राँची चलि गेल रहय। दुर्भाग्य् ! बादमे जहिया कहियो ब्ला।क जाय दिआ सोची तऽ हुअय जे नहि जानि हरिवंश ओतय होयत कि नहि आ एहि दुविधामे गेनाइ टरैत रहल। किन्तु एनामे काज कहियो नहि भऽ सकत, ई सोचि विदा भेलहुँ। भरि रास्ता मन भारी रहल ! ब्लॉकक गेट पर जे पहिल व्यक्ति भेटल तकरा सँ पुछलिऐक जे हरिवंश अछि कि नहि। हरिवंश अछि ई जानि मन हल्लुक भेल। हरिवंशकेँ ताकय लगलहुँ। ब्लॉक वला मकानक आगू मैदानमे हरिवंश कुरसी-टेबुल लगौने बैसल रहय आ करीब डेढ़ सौ आदमी ओकरा घेरने रहैक। ओ वृद्ध लोककेँ भेटय वला पेंशनक सत्यापनमे लागल रहय। एहन समयमे लोककेँ ठेलि- धकिया कऽ ओकरा लग पहुँचब कठिनाह छल आ उचितो नहि बुझाइत रहय। पता नहि ओहिठाम बैसक लेल फाजिल कुरसियो हेतैक कि नहि। तेँ प्रतीक्षे करब श्रेयष्कर बुझायल। चाह पीलहुँ , पान खेलहुँ आ तकर बाद भीड़ छँटबाक बेचैन प्रतीक्षामे एम्हरसँ ओम्हर टहलैत रहलहुँ।
हरिवंश अपन चेम्बरमे बैसि गेल रहय। जखन हम ओकर चेम्बर मे प्रवेश केने रही तखन एक व्यक्ति और कुरसी पर बैसल छल। हाथ मिलबऽ लेल हाथ बढ़ाबी आ एकरा अपन हेठी बूझि जँ ओ हाथ नहि बढ़ौलक तऽ भारी अपमान होयत, ई सोचि हम एकटा हाथ उठा ओकर अभिवादन केलिऐक। जेना मोन पड़ैत अछि, जवाबमे ओ भरिसक हाथ नहि उठौने रहय ने बैसऽ लेल कहने रहय। अभिवादन करैत आ ओकर संकेतक प्रतीक्षा केने बिना हम बैसि गेल रही। स्निग्ध आ कोमल किंतु अल्पजीवी मुस्की संगे ओ हमरा सँ पुछने रहय-'कोना छी ?’
'बस चलि रहल छै।,-हमर एहि शुष्क औपचारिक उत्तरसँ वार्त्तालाप भंग भऽ गेल।
खाद-बीज, सीमेंट, पंपसेट आ बोरिंग बला आवेदक सभ एक-एक कऽ आयब शुरू कऽ देलकैक।
'खाता नंबर की अछि ?’-बोरिंग बला एकटा आवेदकसँ हरिवंश प्रश्न केलकै।
'नहि मोन अछि।'
'खेसरा नंबर ?'
'नहि मोन अछि।'
'कतेक रकबा अछि?'
'पता नहि।'
'भागू एतय सँ।'- कहैत ओकर आवेदनकेँ हरिवंश नीचा फेकि देलकै। ओ व्यक्ति हतप्रभ भेल किछु काल ठाढ़ रहलै आ दरखास्त उठा धड़फड़ाइत निकलि गेलै।
लोक एहिना आबय, हरिवंश किछु पूछै आ ओकर दरखास्त फेकि दैक। एहि समस्त कार्य-सम्पादनमे ओकर आवाज अत्यन्त कर्कश आ चेहरा कठोर रहैक। ई देखैत-देखैत हमरा घबराहटि होअय लागल। बुझायल जेना हमहीं आवेदक छी आ हरिवंश हमरे डाँटि आ अपमानित कऽ रहल अछि। हरिवंश अज्ञात ढँगसँ भीतरे-भीतर हमरा आतंकित कऽ देने छल।
अंत मे ई कहि दी जे हरिवंश दाखिल खारिज लेल सी. ओ. सँ हमर परिचय करा कऽ चल गेल, लेकिन ओ काज अखन धरि नहि भेल अछि। हरिवंशक आदमी हेबाक कारणे घूस नहि देत, भरिसक यैह सोचि सी. ओ. काज नहि कऽ रहल अछि। हम फेर जा कऽ हरिवंश केँ नहि कहलिऐक। हरिवंश सँ भेंट करबाक इच्छे नहि होइत अछि। ब्लॉकक नाम लैते हरिवंशक ओ रूप मोन पड़ैत अछि आ घबराहटि होअय लगैत अछि।
ओ लड़की
एक-दोसराक सोझा-सोझी बनल तीन टा होस्टल रहै, दू टा लड़काक आ एकटा लड़कीक। ओहि तीनूक बीचोबीच एक टा छोट सन मकान रहै।ओहि मकान मे छात्र-छात्राक मनोरंजन लेल टेबुल टेनिस, चाइनीज चेकर, शतरंज सन खेलक व्यवस्था रहै। मकानक अगुअइत मे चाह, पान आ फलक एक-एक टा दोकान रहै।
होस्टल शहर सँ हटि क’ एक टा सुरम्य पहाड़ी पर बनायल गेल रहै। ओहिठामक वातावरण एकदम शांत आ अध्ययन-मनन के अनुकूल रहै। ओतय अबाध स्वतंत्रता रहै। कोनो चट्टान पर बैसि कए अहाँ घंटाक घंटा चिन्तन मे लीन रहि सकैत छलहुँ या प्रेमिका संगे रभसल सपनामे डूबल रहि सकैत छलहुँ।
मुदा एहि आधिदैविक आ रूमानी वातावरण पर दिनकें उदासी पसरल रहैत छलै। लड़का-लड़की पढ़ै-तढ़ै लए निकलि जाइ आ होस्टल भकोभन्न आ सून पड़ि जाइ। मुदा साँझ पड़िते ओहिमे जीव पड़ि जाय। लड़का-लड़कीक चहल-पहल आ गनगनी कोनो पाबनि-तिहार सन लगै। हैलो, हाय आ हाउ आर यू सन कथनी हवामे उड़ैत रहै। धनीक घरक ई लड़का-लड़की बेसी कए अंगरेजी बाजइ आ तखन एहन लगै जेना अहाँ हिन्दुस्तान मे नहि, लंदन या न्यूयार्क मे होइ।
साँझ पड़िते होस्टलक बीच ओहि छोटका मकानक चारूकात लड़का-लड़की जमा हुअय लागै। किछु ठाढ़े ठाढ़ आ किछु सिमटी वला बेंच पर बैसि कए गप्प करै आ बहस करै। कोनो-कोनो बेंच पर खाली प्रेमीक जोड़ा बैसल रहै। ई क्रम बड़ी राति धरि चलैत रहै। एहनो होइ जे साँझ पड़िते मोटरसाइकिल आ कार सँ शहरक लड़का आबै आ अपन –अपन प्रेमिका कें ल’क’कतहु निकलि जाइ आ दू-चारि घंटामे छोड़ि जाइ। क्यो-क्यो होस्टले लग कार लगा क’ कारे मे अपन प्रेमिका सँ गप्प करैत रहैत छलै।
एहने कोनो साँझक गप्प छियै। ओहि दिन नवीन भरि दिन होस्टलक अपन कोठलीमे बैसल पढ़ैत रहल छल। पढ़ैत-पढ़ैत ओकर माथ भारी भ’ गेलै।गोसांइ डूबि गेल रहै आ पछबरिया क्षितिज पर ओकर लाली पसरल रहै। नवीन बिना स्वेटर पहिरने चाह पीबा लेल निकलि गेल। होस्टलक मेसमे खाली भोरे टा कें चाह भेटै। तें नवीन धीरे-धीरे ओहि मकान दिस बढ़य लागल, जतय चाहक दोकान रहै। होस्टल सँ बाहर निकलिते ठंढा हवाक झोंक सँ ओकर देह सिहरि उठलै। मुदा स्वेटर पहिरय ल’ ओ घूरल नहि। दलकी वला जाड़ नहि रहै। हवा सँ ओकरा ताजगी भेटलै आ माथ जे भारी रहै से हल्लुक होब’ लगलै। मकानक आसपास अखन भीड़ नहि रहै। बेंच पर किछु जोड़ा रहै आ दोकान पर किछु लोक। एकटा कार लागल रहै। कारमे एकटा लड़का आ एकटा लड़की बैसल चाह पिबैत रहै। भरिसक चाह खतम भ’गेल रहै आ ओ दुनू खलियाहा कप थामने बैसल रहै। बुझेलै जेना लड़काकें एकाएक ई बोध भेलै जे ओ अनेरे हाथमे खलियाहा कप ल’क’ बैसल अछि आ ओहि बेकारक बोझ हटाब’ लेल कपकें कारक सीट पर राखय चाहलक। लेकिन लड़की ओकरा एना करय नहि देलकै। ओ लड़का वला कप ल’ क’ अपन कप पर राखि लेलकै। नवीन कें लगलै जेना ओ लड़की आब कार सँ निकलतै आ अँइठ कप राख’ चाहक दोकान पर जेतैक। मुदा ओ ओहिना बैसल रहल। जखन कि सम्हारय खातिर ओ बेर-बेर कप दिस देखै आ एना कयलासँ ओकर ध्यान गप दिस सँ हटि जाय, तइयो जानि नहि कते रसगर गप्प चलैत रहै जे छोड़ल नहि जाय।
कार लग पहुँचि क’ नवीन उड़ती नजरि सँ दुनूकें देखलक आ उदासीन भावें आगू बढ़ि गेल।
'एक्सक्यूज मी !'- पाछूसँ लड़कीक आवाज आयल।ओ नवीनकें बजबैत रहै।आवाज सुनि क’ नवीन कें आश्चर्य भेलै। कियैक बजा रहल छैक ई अपरिचित लड़की ? ओ पाछू घूमि क’ आश्चर्य सँ लड़की कें देखलकै। लड़की जींस आ उजरा कुरता पहिरने रहै।घूमिक' तकिते लड़की पुछलकै-'आर यू गोईंग टू दैट साइड ?'
सवाल खतम होइते नवीनक नजरि लड़्कीक चेहरा सँ उतरि क’ ओकर हाथक कप पर चलि गेलै आ ओ अपमान सँ तिलमिला गेल। ओकरा भीतर क्रोध आ घृणाक धधरा उठलै। की ओ ओहि दुनूक अँइठ् कप ल’ जायत ? लड़कीक नेत बुझिते ओ जवाब देलकै-'नो'। ओकर आवाज बहुत तेज आ कड़ा रहै आ मुँह लाल भ’ गेल रहै। ओकरा एहि बातक खौंझ हुअय लगलै जे ओकर जवाब एहन गुलगुल आ पिलपिल किए भ’ गेलै।ओ कियैक नहि कहि सकलै-'हाउ डिड यू डेयर? ' तोहर ई मजाल! मुदा ओ कहि नहि सकलै। साइत निम्न वर्गीय दब्बूपनी आ संस्कार ओकरा रोकि लेलकै।
नवीन पान वला दोकान पर जा क’ ठाढ़ भ’ गेलै। ओ ऊपर सँ शांत बुझाइतो भीतरे-भीतर बहुत उत्तेजित रहै। ओ खाली ठाढ़ रहै। बाहरी दुनिया सँ निर्लिप्ती।
'क्यात लोगे साहब ?’-विचित्र नजरि सँ तकैत पानवला पुछलकै त’ ओ अकबका गेल।ओकरा की लेनाइ रहै ? कनी काल धरि ओ किछु सोचिये नहि सकल। 'हँ, सिगरेट।’-ओ दोकनदार कें कहलकै। सिगरेट धराए क’ नवीन सोचय लागल ओकरा त’ चाह पिबै लेल जेनाइ रहै, फेर एतय कियैक रूकि गेल। की ई देखाब’ लेल जे देख हम ठीके ओम्हर नहि जा रहल छी ? कते फोंक आ डेरबुक अछि ओ ? तोरा हिम्मत कोना भेलौ ? कियैक नहि कहि सकलै ओ! की ओ ठीके दब्बू अछि ? आ दब्बूपनीए कारणे ओकरा मुँह सँ निकलि गेलै-नो ? भरिसक ई बात नहि छैक। मरजाद आ शालीनताक लेहाज नहि होइतै त’ चाहक बदला ओ पानक दोकान पर किए ठाढ़ होइत। मुदा ई शालीनताक ढोंग नहि भेलै ?
नवीन बेचैन रहै आ जल्दी-जल्दी सिगरेटक सोंट मारैत रहै।ओकरा ई बात परेशान कयने रहै जे लड़कीक मनमे एहि तरहक प्रस्ताव करबाक विचार अयलै कियैक। की ओ अपनाकें श्रेष्ठ आ हमरा नीच आ तुच्छ बूझि लेने रहै ?हँ, साइत यैह बात रहै। नवीन सोच मे पड़ल रहै। सिगरेट जरि क’ आब ओकर अंगुरी जरबय लागल रहै। सिगरेट फेकि क’ ओ चाहक दोकान पर चलि गेल।
नवीन एखनो क्षोभ आ तामसमे रहै। चाहक चुस्कीह संग ओकर नस कने ढील भेलै आ लड़कीक ओहि समयक चेहरा ओकर दिमाग मे अएलै, जखन नवीनक 'नो कहला पर ओ ठकुआ गेल रहै। ओकर बिधुआयल मुहेंठक लेल नवीन कें अफसोस भेलै। ओ सोचय लागल जँ कप लइये लितियै त’ की भ’ जइतियै। एहि सँ ओकर चरित्रक उदारता आ भद्रते सोझाँ अबितै। ओ छोट नहि भ’ जाइत, ई ओकर बड़प्पन होइतै। ओहिठामक जीवनमे ककरो कोनो छोट-मोट मदति करब आम बात रहै आ ई ककरो खराब नहि लागै। सहयोगक एहन भावना सँ नवीन अपरिचित नहि रहय। तइयो पता नहि की रहै जे ओ भड़कि गेल रहै।
नवीन कें लगैत रहै ओकर दुनिया अलग छै आ ओहि लड़कीक दुनिया अलग। दुनूमे कोनो मेल नहि छैक। ओहि लड़कीक दुनिया चाहियो क’ नवीनक दुनिया नहि भ’ सकैत छलै आ नवीनक दुनिया लेल ओहि लड़की मे कहियो कोनो चाहत नहि भ’ सकैए। नवीन कें बुझेलै साइत सम्पन्नताक चिक्कन चाम आ रौद-बसातक सुक्खल चामक अन्तरे ओकरा भड़का देने होइ। ओ निश्चय नहि क' पाबैत रहै। कहीं एहन त ‘नहि जे ओ लड़की अकारण ओकरा नीक नहि लागल होइ आ ओ भभकि उठल हो ? मुदा से बुझाइत नहि रहै। भरिसक ओकर भंगिमा, ओकर स्वरमे किछु रहै। ओकर अनुरोध मे अधिकारक भाव रहै, याचनाक नहि।
नवीन ओकर आकृतिकें मोन पाड़्य लागल। ओकर चेहरा मरदाना रहै। जनीजाति मे जे लाज आ कोमलता होइ छै, ओकरामे से नहि रहै। ओहि लड़कीमे किछु एहन रहै जे कठोर रहै आ विकर्षित करैत रहै। नवीन सोचैत रहल। ककरो ने ककरो गलती जरूर रहै। या त’ ओहि लड़की के प्रस्ताव ठीक नहि रहै या नवीनक प्रतिक्रिया उचित नहि रहै। दुनूमे क्यो दोषी रहल हेतै या दुनू दोषी हेतै या दुनूमे क्यो नहि। कोनो कारणो जरूर रहल हेतै। कारण आरो भ’ सकैत छल। ठीक-ठीक किछु नहि कहल जा सकैए। खाली एतबे साँच छै जे लड़की उदास भ’ गेल छलै आ नवीन दुखी रहै आ सोचने चल जाइत रहै।
एकटा अंत
समदियाकेँ देखिते माथ ठनकल। कतहु ससुरकेँ ने किछु भऽ गेलनि ! ओ बहुत दिनसँ दुखित रहथि। डाक्टरो जवाब दऽ देने रहनि। हम एक मास पहिने देखि आयल रहियनि। हमर पत्नी सात-आठ मास पहिने गेल छलीह। फेर आनो बेटी सभ भेंट कऽ अयलनि। सभ क्यो हुनक मृत्युक प्रतीक्षामे रहय।
'कका खतम भऽ गेलथिन’-समदिया बाजल।
'कहिया हौ ?'-पत्नी चकित होइत पुछलथिन आ जा समदिया 'चारि दिन पहिने’ बाजल ता पत्नीक क्रंदन शुरू भऽ गेलनि। ओ कनैत रहलीह आ बीच-बीचमे अपन उलहन, अपन पछतावा जनबैत रहलीह। बाकी सब शोकाकुल मौनमे डूबि गेल।
बुझाइत अछि ससुर देह त्यागि एत्तहि चल आयल छथि आ हमर सभक मन-प्राणमे बसि गेल छथि। चेतनामे हुनक स्मृति निरन्तर चलि रहल अछि।खाइत-पिबैत, उठैत-बैसैत दिन-राति हुनके चर्चा होइत अछि। हमरासँ पत्नी केँ शिकायत छनि जे हमरे कारणे ओ अपन पितासँ अंतिम समयमे भेंट नहि कऽ सकलीह। हम कहि देने रहियनि जे ठीक छथि। आइसँ एक मास पहिने ओ ठीके नीक रहथि। लेकिन एकटा बात हम नहि कहने रहियनि। ओ कहऽ वला बात नहि रहै। मात्र एकटा पूर्वाभास। जखन हुनकासँ विदा लेबऽ गेल रही तऽ हुनकर आँखिमे ताकने छलियनि। ओहो हमर आँखिमे ताकने छलाह। आ हमरा दुनूकेँ बुझायल रहय जेना ई ताकब अंतिम ताकब थिक, जेना आब फेर कहियो भेंट नहि होयत।
सएह भेल। ओ चल गेलाह। आब नहि भेटताह। लेकिन ओ दृष्टि मनमे अखनो ओहिनाक ओहिना गड़ल अछि आ हुलकी मारैत रहैत अछि। अइ अनुभव दिआ हम पत्नी केँ किछु नहि कहलियनि। गोपनीय नहि होइतो ई ततेक व्यआक्तिगत रहै जे एकरा बँटबाक इच्छा नहि भेल। व्य क्तिक जीवनमे एहन बहुत रास अनुभूति होइत छैक जे ओ ककरो नहि कहैत अछि; जे ओकरे संग चल जाइत छैक।
हमसभ ससुर संग बीतल समय आ प्रसंग मोन पाड़ैत रहैत छी; एक-दोसरकेँ सुनबैत छी। वात्सल्य स्नेह आ प्रेमसँ भीजल क्षणकेँ स्मरण करैत पत्नी भावुक भऽ जाइत छथि, कंठ अवरूद्ध भऽ जाइत छनि आ आँखि नोरा जाइत छनि। ओ बजैत छथि-'बाबू कहियो हमरा बेटी नहि कहलनि; सभदिन बेटा कहैत रहलाह। पछिला बेर चलैत काल भेंट करऽ गेलियनि तऽ पुछलथिन-चूड़ी नहि पिन्हलह ? आब के एतेक निहारि-पिहारि कऽ देखत जे चूड़ी नव अछि कि पुरान ?’ पत्नी सोगमे डूबि जाइत छथि।
हमसभ हुनक अंतिम अवस्थाक कष्ट, उपेक्षा आ निराशाक चर्च करैत छी। परिवारक के कतेक सेवा केलकनि, के कतेक अवहेलना, तइपर टीका-टिप्पणी करैत छी आ सोचैत छी हमहीं सभ की केलियनि, किछु नहि।
नह-केशसँ एकदिन पहिने सासुर पहुँचैत छी।मृत्यु जे शून्यता आ नीरवता छोड़ि गेल अछि, कन्नारोहटि तकरा तोड़ैत रहैत अछि। भोज-भातक गप आ ओरिआन चलि रहल अछि। हमरा लगैत अछि श्राद्धक कर्मकांडमे व्यस्त भऽ कऽ लोक सोग बिसरि जाइत अछि। कर्मकांडक और कोनो सार्थकता नहि छैक।
हमर एकटा साढू अखने आयल छथि-केश कटेने। जहिया समाद गेल हेतनि, तहिये या अगिला दिन कटेने हेताह। हमरा सन सम्बन्धी लेल तीन दिन पर केश कटेबाक विधान अछि। हमरा चारि दिन पर खबर भेटल रहय आ हम सोचने रही जे केश नहि कटेबा लेल एकरा ढाल बनाओल जा सकैत अछि। लेकिन साढूक मूड़ल माथ देखि बुझायल जेना ई तर्क ठठऽ वला नहि अछि। हम चिन्तित भऽ जाइत छी।एहि लेल नहि जे बेलमुंड भऽ गेलापर देखऽ मे नीक नहि लागब। केश तऽ हम नहिए कटायब। तँइ बेलमुण्ड हेबाक तऽ प्रश्ने नहि अछि। लेकिन विरोध बहुत होयत। हम उठल्लू भऽ जायब। एकरे चिन्ता अछि।
नह-केश दिन ठाकुर भोरे चल आयल अछि। केशकट्टी चलि रहल छैक। हम दू-तीन बेर टहलि कऽ एहि कर्मकेँ देखि आयल छी। एकबेर एक गोटय पुछबो केलक—'कटेबै ?’ हम हाथसँ अस्वीकृतिक मुद्रा बना घूमि गेलहुँ। ओ सोचने होयत बादमे कटेताह। हमर एकटा आर साढू आबि गेल छथि। आ केश कटवा रहल छथि। एकटा क्षण एहन अबैत अछि जखन घरक सभ पुरूखक माथ छिलायल अछि आ एकमात्र हम विषम संख्या सन बचल छी। आब कतेको गोटय पूछऽ लागल अछि-'केश नहि कटेबै ?' 'की हेतै ?' कहैत हम टरि जाइत छी।
आब ककरा-ककरा बुझौने घुरियौ जे हमरा एहि कर्मकांडमे विश्वास नहि अछि। बुझेबो करबै तऽ क्यो बुझऽ लेल तैयार होयत ? लेकिन हमर केश सभक आँखिमे गड़ि रहल छैक ; अनटेटल आ अनसोहाँत लागि रहल छैक।
हम दाढ़ी बना रहल छी। सोचने छी तकर बाद नह काटि लेब। सासुक नजरि हमरा पर पड़ैत छनि। बेटीसँ पुछैत छथिन-'दुल्हा केश नहि कटेलथिन ?’ हमर पत्नीकेँ खौंत नेस दैत छनि। हमरा दिस तकैत फुफकार छोड़ैत छथि—'आ गय, पापी छै, पापी। पता नहि बाप मरल रहै तबो केश कटेने रहै कि नहि !'
हमरा तामस उठैत अछि; दुख होइत अछि, लेकिन चुप रहि जाइत छी। केश कटा कऽ हमर दुनू साढू निश्चिन्त छथि। एकटा तऽ पी रहल छथि आ कखनो आयोजन तऽ कखनो सारि-सरहोजिक आनंद उठा रहल छथि।
केश कटा लेने रहितहुँ तऽ हमरो लेल सब किछु आसान आ अनुकूल रहितय।लेकिन विश्वास आ आत्माक खिलाफ कोनो काज करब हमरा बूते पार नहि लागि सकैत अछि। केश कटेने मृतात्माकेँ मुक्ति आ स्वर्ग भेटि जेतैक आ नहि कटेने नरक ? एहन विचार हमरा लेल हास्यास्पद अछि। तखन केश कटेबाक कोन तुक? की एहि लेल जे देखू हम हुनक सम्बन्धी छी आ शोकाकुल छी ? सम्बन्ध आ सोगक एहन प्रदर्शन हमरा बहुत अरुचिकर बुझाइत अछि। हमर वश चलितय तऽ सब कर्म आ भोज-भात बंद करबा दितियै।सोचि लेने छी जे लिखि कऽ चल जायब जे हमर मृत्युक बाद ई सभ नहि हो।
बुझाइत अछि हमर पितिऔत सारकेँ क्यो हुलका देने छनि।ओ धड़धड़ायल अबैत छथि आ हमर डेन पकड़ि घीचने ठाकुर लग लऽ अनैत छथि—‘ठाकुर, छिलह तऽ।' ठाकुर आदेश सुनियो कऽ उठैत नहि अछि। सार हमर कनहामे लटकि जोर लगा कऽ हमरा बैसाबऽ चाहैत छथि। हम बूझि नहि पबैत छी जे ओ चौल कऽ रहल छथि कि गंभीर छथि।हम छिटकि कऽ एकटा कुर्सी पर बैसऽ चाहैत छी।लेकिन जा-जा बैसी ताहिसँ पहिनहि ओ कुर्सी खींचि लैत छथि आ हम खसैत-खसैत बचि जाइत छी। लोक हाँ-हाँ ‘ करैत अछि। हम क्रोध आ अपमानसँ तिलमिला उठैत छी—‘बहानचोद, चोट्टा, उल्लू !’
‘ईह रे बूड़ि, बुधियार बनैत छथि !भोज परक पात छीन लेब सार।'- कहैत ओ चल जाइत छथि।
क्यो कुर्सी पर बैसा दैत अछि। हम बैसि जाइत छी। भीतरसँ खौलैत। 'की भेलै ? की भेलै?’—पूछैत आँगनसँ कैक गोटय आबि गेल अछि। हम उठि कऽ आँगन चलि दैत छी।
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एकटा प्रेम कथा
कहियो-कहियो ओहि लड़कीक फोन अबै। रिसीभर उठा कऽ 'हलो’ कहिते ओम्हरसँ आवाज अबै- 'कने, प्रेमी केँ बजा देबै ?’
ई सुनिते खौंझ आ तामस सँ जी जरि जाय।खौंझ आ तामस खाली ओही लड़कीक फोनसँ होइत हो, से बात नहि। तामस सब पर होइ जे ककरो बजा देबा लेल फोन करै। ओ तऽ कहुना लड़किए रहय। फोन जँ लड़की आ जनीजातिक हो तऽ मरद-पुरुखक रवैया ओहुना कने लरम आ मोलायम होइत छै।
जहिया पहिल बेर ओकर फोन आयल रहै तऽ हम पुछने रहिअइ- 'अहाँ के छी ?’ हमर मतलब ओकर नामसँ रहय। लेकिन ओ अपन नाम नहि बतेलक। बाजल- 'हम नया बजारसँ बाजि रहल छी। खाली एतबे कहला सँ ओ बूझि जेतै।’
'फोने पर रहब आकि फेर करब ?'-हम अनमनायल जकाँ पुछलिऐ।
'पाँच मिनटमे फेर करै छी।' –कहि कऽ ओ फोन राखि देलक।
हम मन मारि कऽ ओहि कोठली गेलहुँ, जकर खिड़की सँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै। ओकर मकान हमर मकानक पंजरामे रहै। 'प्रेमी ! रे, प्रेमी !' हम दू-तीन बेर जोर सँ हाक देलिऐ। ओ कोठलीसँ बाहर निकलल तऽ कहलिऐ- 'नया बजारसँ फोन छौ।’ ओ हमर घर दिस आबय लागल। आब या तऽ ओ छहरदेवाली फानि कऽ चोट्टे चल आयत या कने आगाँ बढ़ि कऽ बिना फानने भीतर चल आयत किऐ तऽ ओहिठाम छहरदेवालीक ऊँचाइ भरिए ठेंगहुन छै।
ओ घर ढुकिते रहय कि फोनक घंटी बजऽ लगलै। फोन सुनऽ लेल बाहर सँ क्यो अबै तऽ हम ओहि कोठलीसँ निकलि जाइ। आन लोकक फोन सूनब या ओकरा पर पहरेदारी करब हमरा शिष्ट आचरण नहि बुझाइत रहय। कोठलीसँ बाहर निकलैत आ घरक भीतर एम्हर सँ ओम्हर जाइत-अबैत जे सुनबा मे आयल ताहि सँ ई बुझायल जे प्रेमी साँझ खन ओहि लड़कीसँ भेंट करतै। ओ लड़की के छलै आ प्रेमी सँ ओकरा कोन काज छलै, से जनबाक इच्छा तऽ बड्ड रहय, मगर प्रेमी सँ ई सब पूछब मोसकिल छलै। ओ अठारह-बीस सालक जवान रहय आ हम ओकर बापक उमेर के। ओहुना ओ घुन्ना स्वभावक लड़का रहै। ओ इंटरक विद्यार्थी छलै, लेकिन पढ़ाइमे ओकर मन नहि लगै। ओ टी.भी. देखय, गाना सुनय, क्रिकेट खेलय आ दोस-महिम सँ गप्प लड़ाबय।
नहि जानि ओहि दिन साँझकेँ प्रेमी ओहि लड़की सँ भेंट केलकै कि नहि; लेकिन दुइए-चारि दिनक बाद लड़की फेर फोन केलकै। वएह पुरान आग्रह। बाजक ओहने ढंग। कने संकोच, कने घबराहट आ कने डर। बेर-बेर पुछलो पर ने तऽ ओ अपन नाम बतेलकैआ ने काम। तखन एतबा जरूर कहलकै जे ओ प्रेमीक मामा कत’ सँ बाजि रहल अछि। तऽ की ओ प्रेमीक ममिऔत बहीन छिऐ? जँ ममिऔत बहीन छिऐ तऽ बेर-बेर वएह टा किऐ फोन करै छै ? क्यो दोसर किऐ नहि करै छै ? मामा, मामी, ममिऔत भाइ -एहि मे सँ क्यो तऽ कहियो करितइ। हमर मन मे कतेको सवाल आबय, मगर जवाब कोनो नहि। संदेह आ असमंजस उपलाइत रहय।
आइ-काल्हि लड़कीक घरक लोक दिलफेक किसिमक लड़का सभक फोनसँ चिंतित आ फिरीशान रहैत अछि। मगर एतय मामला उन्टे छलै।
कहियो काल हमरा बुझाय जेना प्रेमीक रुचि लड़कीमे नहि छै। फेर सोची जे से रहितइ तऽ प्रेमीक उदासीनता लड़कीसँ बहुत दिन धरि छिपल नहि रहितइ। जँ प्रेमी ओकरा नहि चाहितिऐ तऽ लड़की बेर-बेर फोन किऐ करितइ ?
तकर बाद फोन आयब बन्न भऽ गेलै। किछु दिनक बाद पता लागल जे प्रेमी मोबाइल कीन लेलक अछि। आब ओ लड़की सीधे प्रेमीसँ सब तरहक गप्प करैत हैत। भरिसक इएह सोचि कऽ प्रेमी मोबाइल किनने हो। हमरा लागल जेना हमर किछु छिना गेल हो। हमरा लेल आब ई मामला सभ दिनक लेल अज्ञात आ रहस्यमय भऽ गेल रहय।
लेकिन नहि, जीवनमे कोनो चीज अंतिम नहि होइत छै। भरिसक एक साल बीतल हेतै। एक दिन सांझुक पाँच बजे फोनक घंटी बजऽ लगलै। हेतै ककरो। हम अन्यमनस्क भाव सँ सोचलहुँ। कैकटा भटकल फोन अबैत रहैत छै। मगर नहि, ओम्हरसँ कोनो लड़कीक आवाज एलइ, पातर-मधुर आवाज आ फोन कटि गेलै। हम सोचमे पड़ल रही कि फोनक घंटी फेर बज्ऽ लगलइ।
हलो !'-हम रिसीभर उठा कऽ कहलिऐ। '
कने, प्रेमीकेँ बजा देबै ?'
अरे ! ई तऽ वएह लड़की छिऐ। अपन नाम आ काम बतेने बिना प्रेमीकेँ बजा देबाक अनुरोध करयवाली। ओ बहुत दिनक बाद फोन केनेछल, तैं खौंझ तऽ नहि भेल, लेकिन मनमे थोड़े उदासीनता पसरि गेल।
'देखइ छिअइ।'-हम कहलिऐ।
'पाँच मिनट मे हम फेर करै छी।'
'ठीक छै।'—हम विरक्त सन कहलिऐ।
देखिऐ या नइँ देखिऐ, एहि दुविधामे पड़ल-पड़ल हम ओहि कोठलीमे पहुँच गेल रही, जाहि कोटलीक खिड़कीसँ प्रेमीक कोठली देखाइत रहै। लेकिन पहिने जकाँ हम प्रेमीकेँ हाक नहि देलिऐ। आइ-काल्हि प्रेमीक माय-बाप एतहि छै। खिड़की सँ ओहि पार तकिते ओ दुनू अभरल। मकानक मरम्मत होइत रहै। प्रेमीक कतहु अता-पता नहि छलै। भरिसक कोठलीक भीतर हो। हम ठाढ़ भेल देखैत रहलिऐ। भऽ सकैत अछि प्रेमी कोठलीसँ बाहर निकलि आबय। आयल तऽ फोन दिआ कहबै।एक बेर भेल जन सँ पुछिऐ प्रेमी छै कि नहि, फेर छोड़ि देलिऐ। सोचलहुँ फोन उठेबे ने करबै। लेकिन एहन भऽ नहि सकल। ओ पांच मिनटक अंदरे फोन केलकै आ हम उठाइयो लेलिऐ।
'प्रेमी नहि छै। कतहु निकलल छै। ओकर माय-बाप आयल छै। घरक काज चलि रहल छै।’—अपन निष्ठामे खोटक अनुभव करैत हम एक साँसमे ई सब कहि गेलिऐ। ओ निराशा आ सोचमे डूबल बाजल—'अच्छाऽ !’ हम पुछलिऐ-'अहाँ के बाजि रहल छी ?’एकर ओ सोझ जवाब नहि देलक। बातकेँ ओ जहिना घुमेनाइ-फिरेनाइ शुरू केलकै, हमरा बुझा गेल ओ पहिनहि जकाँ सवालकेँ टारि देत। लेकिन आब ओ बेसी अनुभवी, पटु आ सियान भऽ गेल छल। ओकरामे साहस आ निर्भीकता आबि गेल छलै।
'अकल, हम नया बजारसँ बाजि रहल छी।'-ओ आवाज सँ हमर उमेर ठेकना लेलक, तैं अंकल कहि रहल अछि;हम सोचलहुँ। ओकर अंकल कहनाइ कने खटकल, फेर लगले सामान्य भऽ गेलहुँ।
'ठीक छै, नया बजारसँ बाजि रहल छी, मगर छी के, से न बताउ ?’-अपन स्वरमे बहुत नरमी अनैत हम धीरे-धीरे कहलिऐ।
'हम प्रेमीक ममिऔत बहीनक सखी भेलिऐ।’-आब ओ सहज भेल जाइत रहय। तइयो अपन नाम तऽ ओ नहिएँ बतेने रहय। हमरा लागल ओ जरूर नाज-नखरावाली, शोख आ चंचल होयत। ओकर गप करबाक ढंग मोहक रहै।
'अहाँ अपन नाम नहि कहब ?’-हम जेना गोहारि केलिऐ।
'रितु।हमर नाम रितु अछि।’-हमर अभ्यर्थना सँ जेना ओ पघिल गेल रहय। आब ओकरा कोनो हड़बड़ी नहि छलै आ ओ निचेन सँ गप्प कऽ रहल छल।
'किछु कहबाक हो तऽ कहू, हम ओकरा कहि देबै।’-हम प्रेरित केलिऐ। ओ सोचमे पड़ि गेल फेर पुछलक- 'अहाँकेँ ओकर नवका मोबाइल नम्बर बूझल अछि?’
हम कहलिऐ- 'न्न, मगर हम पूछि कऽ राखब।
'ओकरा कहि देबै काल्हि एगारह बजे फोन करबै।’
मन पड़ल काल्हि तऽ हमरा दस बजे कतहु निकलबाक अछि, तैं कहलिऐ-'एगारह बजे नहि, दस बजे करब।’
'ठीक छै।’-ओ कहि तऽ देलकै, लेकिन हमरा लागल जेना ओकरा अपन बात पर संदेह होइ। ओ फोन राखि देलक। फोन पर रहल ओकर संग आब छूटि गेल छल।आइ ओ बड़ी काल धरि आत्मीय जकाँ गप्प केने रहय। फोन राखि देलाक बादो हम ओत्तहि ठाढ़ रहि गेल रही, जेना किछु और कहबाक हो, किछु और सुनबाक हो। हमरा छगुन्ता भेल, ओहि लड़की लेल हम किऐ उदास भऽ रहल छी ?
दस बजे। काल्हि दस बजे। कोनो मंत्र जकॉं इ हमर भीतर बजैत रहल आब प्रेमी केँ ताकय पड़त। काल्हि दस बजे सँ पहिने बतबय पड़त जे ओकर फोन आबऽ वला छै। साँझे मे कहि देनाइ ठीक हेतै। भोरमे छुट्टी नहि रहत।जँ ओ खिड़कीसँ देखा गेल, तखन तऽ कोनो बाते नहि, नहि तऽ ओकर खोजमे चक्कर काटय पड़त। साँझ केँ बेसी काल ओ किरानाक एकटा दोकानमे बैसल रहैत अछि। पहिने ओत्तहि देखबै।नहि भेटल तऽ ओकर घर जाय पड़त। लेकिन घर पर तऽ ओकर माय-बाप छै ! माय-बापकेँ लड़कीक फोन दिआ कहब ठीक नहि हेतै। खैर, देखल जेतै। अखन तऽ बहुत समय छै। भऽ सकैत छै ओ खिड़कीसँ देखाइए जाय। हम बेर-बेर खिड़की लग जाय लगलहुँ। ओतय जाइ, कनी काल ठाढ़ रही आ थाकि कऽ घूरि जाइ। अपन छाहे जकाँ ओ लड़की हमर संग-संग चलि रहल छल, प्रेमी नामक रौदमे कखनो पैघ आ कखनो छोट होइत। रितु आ प्रेमीक चुम्बकत्व हमरा आविष्ट कऽ लेने छल। ओहि दिन प्रेमी नहि भेटल। राति मे हम सपना देखैत छी जे ओ दुनू आयल अछि। घरमे हम असकर छी। दुनू केँ कोठलीमे बैसा कऽ हम बाहरमे टहलि रहल छी। कोनो चीजक खसला सँ निन्न टूटि जाइत अछि। रौद भऽ गेल छै। मन पड़ैत अछि आइ दस बजे रितुक फोन एतै। प्रेमीकेँ कहबाक अछि। हम बिछान छोड़ि उठि जाइत छी।
तृष्णा
हमरा लागल अखिलनकेँ किछु भेल छैक। जखन ओ कलकत्तासँ घुरि कऽ आयल रहय, हमरा तखने खटकल छल। मुदा ओ थाकल – झमारल रहय, तेँ हम किछु नहि पुछलिऐक। ओ बदलि गेल छल। कोनो गप्प नहि करय; चुप आ उदास रहय। ओकर चेहरा देखला सँ बुझाइ जेना ओ कोनो विचार या स्मृतिमे डूबल हेरायल हो। 'की भेल छौ?' पुछला पर ओ बाजल –'नहि, किछु नहि।' लेकिन ओकर स्वरमे आ ओकर चेहरा पर हमरा वेदनाक स्पष्ट अनुभूति बुझायल। फेर दिन भरि अखिलन सँ कोनो गप्प नहि भेल।
रातिमे अचानक कोनो सपनासँ निन्न टूटि गेल। सपनाकेँ मोन पाड़ैत चाहलहुँ, जे सूति जाइ। ठीक तखने चौंकि गेलहुँ। अखिलन, जे बगल वला बिछौन पर सुतल रहय, कुहरैत बाजल—'ओह, श्रीलता !' लागल जेना ओकरा कोनो पीड़ा भऽ रहल हो आ सहायता लेल ओ श्रीलताकेँ सोर पाड़ैत हो। चकित भेल हम ओकर बिछौन दिस तकलहुँ। इजोरियाक् हल्लुक इजोतमे देखल मूड़ी तर पड़ल गेड़ुआकेँ अखिलन बेर-बेर हाथसँ मीड़ि रहल अछि। ओ निश्चय जागल छल आ कोनो बेचैनीमे छटपट कऽ रहल छल।
ओहि राति फेर सूति नहि भेल। बहुत जिद्द कयला पर अखिलन जे खिस्सा सुनौलक ताहिसँ मन भारी आ उदास भऽ गेल। खिस्सा सुनबैत ओ रहि –रहि कऽ अपन छातीकेँ मुट्ठी मे पकड़ि लैत छल जेना छातीमे दर्दक हूक उठैत हो।
अखिलन कहऽ लागल –भोरे –भोर कलकत्ता लेल गाड़ीमे सवार भेलहुँ तँ सामने वला बर्थ पर एकटा अधवयसू बैसल सिगरेट पिबैत रहय। बादमे जानल जे ओकर नाम संतोष कुमार मंडल छल। ओ बंगाली रहय आ शौकिया चित्रकार। हैदराबादमे कोनो नौकरी करैत रहय। ओ हमरा बहुत ध्यानसँ देखलक आ पुछलक जे हम कतऽ जायब। फेर अपने कहऽ लागल—गाड़ीमे सवार होइसँ पहिने हम रिजर्वेशन चार्टमे अगल –बगल वला यात्रीक नाम, उमर आ गंतव्य जरूर देखि लैत छी। ओकर ई सतर्कता पहिने तँ प्रभावित कयलक, मुदा लगले जासूसी सन बुझायल।
धीरे धीरे आओर मोसाफिर आयल—एकटा नव दम्पत्ति, युवक सुधीर आ एकटा प्रौढ़ महिला। मंडल बहुत गप्पी आ सहमिल्लू रहय। ओ जल्दिए सभसँ परिचय कऽ लेलक आ गपसपमे लागि गेल। नव दम्पत्ति हनीमून लेल दार्जिलिंग जाइत रहय। सुधीर अपन भाइसँ भेंट करऽ कलकत्ता जाइत रहय। प्रौढ़ महिला पता नहि कतय जाइत रहय। ओ बेसी काल गंभीरे बनलि रहलि। खाली बीच-बीच मे कोनो हँसी वला गप्प पर मुसकाइत रहय। बादमे कोनो स्टेशन पर ओ एकटा तेलुगू पत्रिका कीनलक आ ओहिमे व्यस्त भऽ गेलि।
स्थिर रहब मंडलक स्वभाव नहि रहैक। ओ कखनो पानि पीबा लेल उठय तँ कखनो चाह पीबा लेल। कखनो सिगरेट जराबऽ लेल सलाइ ताकऽ लागय तँ कखनो दोसर कातक बर्थपर बैसल बंगाली परिवार सँ गपसप मारि आबय। अही सभक बीच पता नहि कतय वारंगल कि विजयवाड़ामे एकटा युवती हमर सभक बर्थ लग आयलि। एकटा सामान्य साधारण युवती। हमर बर्थ पर बैसलि महिला सँ बैसबाक अनुमति मँगलक। बर्थ अपन नहि रहबाक कारणे महिला असमर्थता प्रकट केलक तँ हम ओहि युवतीकेँ बैसि जयबाक इशारा कयल। मंडल, जे ऊपरका बर्थ पर पड़ल छल, ओहि युवतीकेँ गौर सँ देखलक। युवती थोड़े काल धरि असहज बनलि रहलि, फेर सामान्य भऽ गेलि। जखन कंडक्टर टिकट जाँचय आयल तँ युवती कने आशंकित भेलि, मुदा जुरमाना दऽ कऽ फेर निश्चिन्त भऽ गेलि। ओ जुरमाना दैत रहय, ठीक तखनहि ओ पहिल बेर आकृष्ट कयलक। कंडक्टर नोट पकड़ि लेलक आ टिकट बनबैत रहल। टिकट देखला पर युवती चौंकि उठलि। अपन गलतीक अनुभव कयलक आ पर्स सँ आओर पाइ निकालि कंडक्टरकेँ देलक।
'लेकिन एहिमे आकृष्ट करऽ वला कोन चीज रहैक ?’- अखिलनसँ हम पुछलिऐक।
अखिलन कहलक - 'भगिमा। ओकर भंगिमामे किछु एहन सौन्दर्य रहैक, जकरा मात्र अनुभव कयल जा सकैत अछि; कहल नहि जा सकैछ।’
अखिलन कने काल चुप भऽ गेल। हमरा लागल ओ श्रीलताक ओहि अदाकेँ फेर सँ पकड़बाक प्रयत्नज कऽ रहल अछि जेओकर हृदयमे सीधे उतरि गेल रहैक।
टोकि देलासँ खिस्साक प्रवाह टूटि गेलैक। ओकर छोर पकड़ि आगू बढ़ेबामे अखिलनकेँ थोड़े समय लगलैक।
हमरा बुझेबाक प्रयास करैत ओ बाजल– 'युवतीक व्यरक्तित्व मे किछु एहन लय आ गति छलैक, जे हमरा आकृष्ट कयने छल। ओ बहुत संवेदनशील आ सलज्ज छलि। खैर।’
हमरा लागल अखिलनक हृदय दर्दसँ टीसि उठल होइ।
परिचय आ गप करबामे प्रवीण मंडल जखन नीचा उतरल तँ ज्ञात भेल ओहि युवतीक नाम श्रीलता छलैक।
'खूब भालो नाम।’ मंडल बाजल।
श्रीलता बिजनेस मैनेजमेंटक कोर्स करैत रहय। ओकर हाथमे मैनेजमेंटक कोनो किताब रहैक जे सुधीर लऽ कऽ देखऽ लागल। मंडल दोसर कातक बंगाली परिवार लग चल गेल आ ओहि परिवारक एकटा किशोरीक चित्र बनबऽ लागल। अपन चित्र पर प्रसन्न होइत किशोरी बाजलि 'थैंक यू अंकल।' परिवारक सभ सदस्य चित्र देखलक आ मंडलक प्रति कृतज्ञ भेल। किशोरक माय बाजलि— ‘ओ माँ, आपनी तो खूब भालो स्केच तूल छेन।’
मंडल अपन बर्थ पर घुरि आयल। सिगरेट पीलक आ ओहि नव विवाहिताक चित्र बनबऽ लागल जे हनीमून लेल दार्जिलिंग जाइत रहय। नव विवाहिता मंडलक ठीक सामने बैसलि छलि। मंडल किछु रेखा खींचय आ रूकि कऽ नव विवाहिता दिस ताकऽ लागय। चित्रक प्रति सभ क्यो उत्सुक रहय। तैयार होइते ओ एक हाथसँ दोसर हाथ जाय लागल। जखन ओ हमरा लग आयल तँ चित्र देखि धक्का सन लागल। नव विवाहिताक चित्र एहन छलैक जाहिसँ ओकरा चिन्हल जा सकैत रहय। मुदा ओकर नीचा एकटा दोसरो चित्र रहैक—स्त्री–पुरुषक; पुरुष स्त्री दिस टकटकी लगा कऽ देखैत। यद्यपि चीन्हऽ योग्य स्पष्टता आकृतिमे नहि रहैक, तथापि हमरा बूझऽ मे भांगठ नहि भेल जे ई दुनू आकृति हमर आ श्रीलताक अछि। हम मंडल दिस तकलिऐक। ओ पहिनहि सँ हमरा दिस तकैत छल आ नजरि मिलिते बाजल –'इटस नोट यू।’ जेना ओकर मोनमे कोनो चोर होइ।
श्रीलता खिड़की सँ बाहर तकैत छलि। साँझ पड़ि रहल छलैक। मंडलो सिगरेट पिबैत खिड़की सँ बाहरक दृश्य देखऽ लागल। तखने पता नहि कोम्हरसँ एकटा बंगाली युवक आयल आ मंडल संगे गपमे लागि गेल। ओ हैदराबाद विश्वविधालयमे नाम लिखा कऽ घर जाइत रहय आ बहुत उत्साहमे रहय। रवीन्द्र संगीतक चर्चा भेलै तँ मंडल श्रीलता सँ पुछलकै –'डू यू नो रवीन्द्र नाथ टैगोर?'
‘आइ एम अफ्रेड, आइ डोंट।'-श्रीलता कने संकुचित भेलि।
‘शी मस्ट बी नोयिंग पोतन्नाइ।’- जेना हम श्रीलता केँ सहारा देबा लेल बाजल होइ।
‘याह, आइ नो पोतन्ना वेरी वेल।’- श्रीलता उत्साहित भऽ उठलि।
बंगाली युवक आ मंडल रवीन्द्र संगीत गाबऽ लागल। मंडलक गला नीक रहैक।
हमरा भूख लागि गेल छल। दूपहरमे जे केरा किनने रही से पड़ले रहय। ओहि मे सँ दू टा छीमी तोड़ि हम श्रीलता दिस बढ़ाओल, मुदा ओ लेलक नहि। सुधीर, मंडल, युवक आ नव दम्पत्तिकेँ केरा देलाक बाद हम श्रीलता दिस फेर ताकल।
‘हैव इट श्रीलता। यू मस्ट बी हंग्री।’-हमरा स्वरमे किछु एहन उत्कट स्नेह आ याचना रहय, जे ओ चौंकि कऽ हमरा दिस देखऽ लागलि। फेर एकटा केरा लेलक आ संकोच तथा लज्जावश धीरे-धीरे खाय लागलि। श्रीलता विजयवाड़ामे पढ़ैत छलि आ अखन चारि दिनक छुट्टीमे घर विशाखापतनम जाइत छलि। ट्रेन लेट भेल जाइत रहैक आ ओहि संग श्रीलताक बेचैनी बढ़ल जाइक। श्रीलता सँ आओर गपसप भेल। ओ पाँचम दिन घूरति।
‘अहाँ कहिया घुरब ?'-ओ हमरासँ पुछने छलि।
विशाखापतनम आबि रहल छलैक। ओ उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलि। परिचित शहर-घर आबि गेलाक निश्चिन्तता आ दिन नीक तरहेँ कटि जयबाक संतोषसँ ओकर चेहरापर प्रसन्नताक लहरि अयलैक। कृतज्ञता आ सदभावना प्रकट करैत ओ मुस्कुरायल आ सभसँ विदा मँगलक। मुदा ओकरा दिस क्यो ध्यान नहि देलकै। सभ गप्पमे बाझल छल। ओ हमरा दिस तकलक आ एकटा स्निग्घ कोमलताक भाव चेहरा पर लेने विदा भऽ गेलि।
तीन-चारि मिनट बीति गेल। स्टेशन अखनो आयल नहि छल। हमरा आश्चर्य भेल ओ एतेक पहिनहि गेट पर किएक चल गेलि। हमरा अचानक एकटा विकलता घेरि लेलक। ओकरा देखबाक विकलता, गप्प करबाक विकलता। आ ठीके, हम सीटपरसँ उठि गेलहुँ। गेट लग पहुँचिते ओ हमरा देखलक आ देखते मुस्कुरायलि। ओकर मुस्की औपचारिकताक कारणे आनल गेल बलात् मुस्की नहि छल; ओ स्वत: स्फूर्त्त आ हार्दिक छल।
मंत्रमुग्ध सन ओकरा दिस तकैत हम आगाँ बढ़लहुँ आ कनेक दूरी पर डिब्बासँ सटिकऽ ठाढ़ भऽ गेलहुँ। ठाढ़ होइते ओ पल भरिक लेल हमरा दिस मुस्कुराइत तकलक आ संकोच तथा लज्जावश मूड़ी झुका लेलक। फेर पता नहि कोन प्रबल आन्तरिक प्रेरणासँ अगिले क्षण हमरा देखऽ लागलि। आँखिमे आ ठोर पर वैह मधुर आ कोमल मुस्की लेने। ओकर माधुर्य आ कोमलतामे नहाइत हम निरन्तर ओकरा देखने चल जाइत रही। बुझाइत रहय हृदयमे प्रेमक स्रोत फूटि पड़ल हो आ हम ओकर अनन्त प्रवाहमे भसिआयल चल जाइत होइ।
गेट लग श्रीलताक आसपास किछु आओर लोक ठाढ़ रहय। भरिसक अहीसँ घबरा कऽ श्रीलता बाजलि – 'इट वाज ए नाइस कम्पनी।' हम सहटि कऽ ओकर आओर लग चल अयलहुँ। कहऽ चाहलहुँ – 'आइ वांटेड टू हैव ए लास्ट लुक ऑफ यू। मुदा लोक-भयक कारणे कहा गेल –'आइ वांटेड टू सी यू ऑफ।'
श्रीलता किछु नहि बाजलि।
‘अहाँ चारिम दिन नहि घुरि सकैत छी, श्रीलता ?'
‘नहि, हमरा कैकटा काज करऽ पड़त। मजबूर छी।'
गाड़ी प्लेटफार्म पर लागि रहल छल। संग छूटि जेबाक आसन्न अवश्यम्भाविता सँ हम अस्थिर भऽ गेल रही।
‘अहाँकेँ स्टेशनक गेट धरि छोड़ि आबी ?'- हमर एहि प्रस्तावसँ श्रीलता डेरा गेलि। गेटपर ओकर भाइ प्रतीक्षा करैत हेतैक।
‘नो, नो। थैंक्स।’- श्रीलता घबराइत बाजलि आ एहि तरहेँ धड़फड़ायल चलिदेलक जेना हम ओकरा खेहारने अबैत होइएक। ओकर एहि व्यवहारसँ स्तम्भित आ विमूढ़ भेल कने काल हम ठाढ़े रहि गेल रही। फेर तेजीसँ चलैत जखन प्लेटफॉर्मक गेट लग पहुँचल रही तँ ओतय क्यो नहि रहय। श्रीलता चल गेल छलि।
भारी मने धीरे – धीरे डेग उठबैत हम अपन डिब्बामे घुरि आयल रही।
अचानक लागल जेना बहुत थाकि गेल छी। जा कऽ ऊपरका बर्थपर पड़ि रहलहुँ। पड़िते करेज टीसि उठल। नीचा गपसपसँ जे हल्ला होइत रहैक से असहनीय लागऽ लागल। होइत रहय सभकिछु निस्तब्ध आ शांत भऽ जाय। फेर लागल जेना हल्ला बहुत पाछू छूटि गेल अछि आ सामने श्रीलताक दिव्य आ कोमल चेहरा आबि गेल अछि –शीतल आ स्निग्ध ज्योत्सना सन निर्मल मुस्की छिटकबैत। फेर ओकर भयभीत आकृति मोन पड़ैत रहल। फेर श्रीलता ... शून्य प्लेटफॉर्मक गेट।
भोरमे निन्न टुटिते श्रीलता मोन पड़ल आ बड़ी काल धरि उदासी आ अवसाद घेरने रहल।
कलकत्तासँ हम चारिम दिन नहि घुरलहुँ। पाँचम दिन घुरल रही, जाहि सँ श्रीलतासँ फेर भेंट भऽ सकय। विशाखापतनम आबि हम हरेक डिब्बा आ प्लेटफॉर्म सगरे श्रीलताकेँ तकलहुँ ; एकबेर नहिकैक बेर। ओ कतहु नहि छलि। की भऽ गेलैक श्रीलताकेँ ? दुखित तँ ने पड़ि गेल? या हमरे कारणे काल्हिए चल गेलि ?
हम खिन्न आ निराश भऽ कऽ अपन बर्थपर चल आयल रही। गाड़ी खुजैत काल लगैत रहल श्रीलता अखने दौड़लि आओति आ कूदिकऽ डिब्बामे चढ़ि जायत। विशाखापतनमक छुटैत हरेक घरक खिड़की आ बालकोनीकेँ हम एहि आशासँ देखने चल जाइत रही जे श्रीलताक झलक भेटि जाय। लेकिन ओ हमर दुराशा मात्र छल। पता नहि आब कहियो श्रीलतासँ भेंट होयत कि नहि।
अखिलन ई कहि चुप भऽ गेल। हमरा किछु नहि फुरायल अखिलनकेँ की कहिऐक। हम सोचऽ लगलहुँ अखिलन आब की करत। भऽ सकैत अछि ओ विजयवाड़ा आ विशाखापतनमक चक्कर काटऽ लागय आ अखबारमे विज्ञापन बहार करबाबय। ओ आओर की कऽ सकैत अछि ? हमरा लागल अखिलन केँ श्रीलता नहियो भेटतैक, तइयो ओकर स्नेहक स्मृति रहि जेतैक आ अखिलनक आत्माकेँ आलोकित करैत रहतैक।

एकाकी
आब कोनो चीजक कोनो ठेकान नहि रहलै। कुसेसर सोचैत रहय जे डाक्टर राउण्ड पर एतै तऽ अस्पतालक एहि नरकसँ फारकती लऽ कऽ ओ घर चल जायत। भोरे सँ ओकर मन खनहन बुझाइत रहै। ओकरा दोसरे सन बुझाइत रहै जेना आब ओ नीके भऽ गेल हुअय। भर्ती भेल छल तखन बहुत तेज बोखार रहै आ होइ जे नहि बचब। जाधरि बेसोह रहल, घरनी रहलै। बोखार कने उतरलै तऽ चल गेलि। घर पर छोट-छोट बच्चा रहै।
अस्पतालमे अटकब कुसेसरकेँ आब नीक नहि लागैत रहै। घर जेबाक आसमे बिछौन पर पड़ल-पड़ल पूरा दिन बीत गेलै। साँझ पड़ि गेलै तइयो डाक्टर नहि एलै। ओकरा बुझेलै जे आब आइयो ओकरा नहि जा भेलै। ओकर मन भारी आ उदास भऽ गेलै।
भादोक स्याह अन्हार पसरि गेलै। सब चीज रहस्यमय आ भयाओन बुझाय लगलै। एकटा रोगी नहि जानि कहिया सँ बेहोस पड़ल छलै। ओकरा पानि चढ़ैत रहै। एकटा बूढ़, जकरा खाली हाड़े टा बचल रहै, अथबल भेल पड़ल छलै।पता नहि ओकरा कोन रोग रहै।
घंटी भेलै। वार्डक मुँहथरि पर रोगी सभक खाइक एलै। एकटा असकरुआ रोगी दालि लेबाक खातिर कुसेसर सँ गिलास माँगि कऽ लऽ गेलै। सगरे ततेक घिनायल आ गंध टुटैत रहै जे कुसेसरकेँ अस्पतालमे मन नहि बसै। ओ खाइक नहि लेलक। बिछौन पर पड़ल रहल। ओकरा कमजोरी रहै। बेसी काल बैसने डाँड़ दुखाय लगै।
कोनो चीज क्यो देखऽ वला नहि छै। ओ घर गेल कि नरक मे पड़ल अछि, ताहिसँ ककरा कोन मतलब छै। इएह सभ सोचैत ओ खौंझायल चल जाइत रहय कि तखने एकटा मित्र एलै। मित्र कैँ देखि ओकरा अतीव प्रसन्नता भेलै। मित्र कैक बेर जेबा ले उठलै, लेकिन कुसेसर ओकरा रोकि लैत रहै। ओकरा होइ मित्रक जाइते जेना सभ चीज छूटि जेतै। बैसल-बैसल मित्र अकच्छ भऽ गेलै। तखन मित्रक संग ओहो विदा भेल। सोचलक कोनो दोकानमे किछु खा-पी लेत आ ओतबा काल अस्पताल सँ दूर रहत।
मित्रकेँ विदा कऽ कऽ जखन ओ दोकानसँ घूरल तऽ रातिक एगारह बजैत रहै। सभ सूति गेल छलै। दू-तीन गोटय जागल रहै। मेघौन आ गुमकी कऽ देने छलै। कुसेसर लोहाक पलंग केँ घीच कऽ खिड़कीक बीचोबीच केलक। बिछौन ठीक केलक। एतबे सँ ओ थाकि गेल आ ओकरा पियास लागि गेलै। पानि दूरसँ आनय पड़ैत रहै। अन्हार आ थाल-कीच मे ओतेक दूरसँ पानि आनब अबूह बुझाइत रहै। एहिठाम वार्ड मे ओ ककरा कहतै आ के आनि देतै। की करय-ओ सोचैत रहल। राति भरि पियासल रहि जाय ? ओकरा बुझेलै जेना ओ एकदम असकर पड़ि गेल हुअय।
दोकान सँ जखन ओ घूरल रहय तऽ वार्डमे ढुकिते ओकरा भेलै ओ बेकारे अस्पताल मे रहि गेल। ओकरा तखने चलि जेबाक चाही छल जखन साँझ केँ डाक्टर राउण्ड पर नहि एलै। अस्पतालमे रहि कऽ ओ की कऽ रहल अछि। आब कोन बेमारी ओ ठीक कराओत ? डाक्टरसँ देखेने बिना जँ ओ चलि जाइत तऽ की भऽ जइतिऐक। ओ मरि थोड़े जाइत। ई सभ बात ओकरा पहिने किएक नहि फुरेलै ? कुसेसर बहुत पछताय लागल।
ओकर घर डेढ़ कोस पर रहै।आब एतेक रातिकेँ घर जेबाक समय नहि रहलै। रिक्शो नहि भेटतै।
कुसेसर कछमछ कऽ रहल छल। मच्छर कल नहि पड़य दैत रहै। पानि रहितैक तऽ निन्न वला गोटी खा कऽ ओ सूति रहैत। दू-तीन बेर मुँह-तुँह झाँपि ओ सुतबाक कोशिश केलक। लेकिन गुमार लागऽ लगैक आ होइ जेना दम औनाय जायत।
कुसेसर वार्डसँ बाहर निकलि आयल। पानि-थाल टपैत कल पर गेल। पानि पीलक। फेर घूमल। लेकिन वार्ड दिस घुमिते ओकर मन भारी भऽ गेलै। ओ ठमकि गेल। चारू कात हियासलक। दूर एकटा रिक्शा अभरलै। कुसेसर बड़ी काल धरि ठाढ़ भेल सोचैत रहल। दू बजि गेल हेतै। तीन घंटामे भोर भऽ जेतै। आब एतबा काल ले की हेतै। ओकरा बिलमि जेबाक चाही। ओ वार्ड दिस घूमल। लेकिन ओकरा बुझेलै जेना क्यो पयर छानि लेने हो। घर जेबाके छै तऽ बिलमि कऽ की करत ?
ओ रिक्शा लग पहुँचल। रिक्शावला रिक्शे पर घोंकड़ी लगेने निसभेर सूतल छलै। हिला—डोला कऽ जगेलक, लेकिन जेबा ले तैयार नहि भेलै। ओकरा भेलै पयरे चल जाय। सामान काल्हि आबि कऽ क्यो लऽ जेतै। एहि अन्हार गुज्ज रातिमे असकर एतेक दूर जायब ओकरा भयाओन बुझेलै। ओ दुविधामे पड़ल बढ़ल चल जाइत छल, लेकिन बहुत धीरे –धीरे जेना टहलि रहल हो। ओकरा अखनो विश्वास नहि रहै जे ओ ठीके घर चल जायत। सड़क कातक कोनो—कोनो दोकानमे ढिबरी बरैत रहै। दूरसँ बुझाइ जेना ओ सभ खूजल हो। लेकिन सभ निसबद आ बेजान रहै।
अचानक पानि झिसिआइ लागलै। चेहरा पर पड़ैत फूही ओकरा बहुत शीतल आ सुखद बुझेलै। भेलै एकदम भिजैत चल जाय। लेकिन भीज गेला पर सर्दी भऽ जेतै आ ओ फेर दुखित पड़ि जायत। ओ आपस वार्ड चलि आयल।
वार्डमे भिनसरबाक निस्तब्धता छलै। पानि झिसिआइत रहै आ हवा सिहकैत रहै। एक-आध टा मच्छर अखनो लागैत रहै। कुसेसर मूड़ी गोंति कऽ सुतबाक चेष्टा करऽ लागल। निन्न जेना अलोपित भऽ गेल रहै।
पता नहि कते काल एना रहलै। क्यो कानब शुरू केलकै। कुसेसर अकानैत रहल। बुझाइत नहि रहै आवाज कतऽ सँ आबि रहल छै। क्यो मद्धिम स्वरमे कानैत रहै। ओकर कानबमे तेहन वेदना छलै जे कुसेसर विचलित भऽ गेल। जेना खिंचायल चल जा रहल हो तहिना बिछौन छोड़ि आवाजक दिशामे ओ विदा भऽ गेल। मद्धिम स्वरक कारणे बुझाइ जेना कतौ दूरमे क्यो कानि रहल हो। लेकिन ओ वार्डक मुँहे लग छलै। एकटा अधेड़ स्त्री कानैत रहै। मुँह-तुँह झाँपि कऽ ओ चित्त पड़लि छलै। देखने सँ लगै जेना सूतल हो।
एहि स्त्रीकेँ की भेल छै ? वार्डक मुँहथरि पर ठाढ़ भेल कुसेसरकेँ छगुन्ता भेलै। बड़ी कालक बाद ओहि बाटे जाइत आदमी कहलकै---ओकर घरवला मरि गेल छै। ओकर झाँपल—तोपल लहास वार्डक गेटे लग कुसेसरक बगलमे पड़ल छलै। ओहि रोगीकेँ दिनमे एक बेर कुसेसर देखने रहै। ओकर जर्जर शरीर केँ देखिते कुसेसरकेँ अपन पिता मोन पड़ल छलै।
जखन ओ दोकान चल गेल रहय ओही बीच ओ मरल हेतै। कुसेसरकेँ एकदम पता नहि चललै। एगारह बजे रातिमे जखन ओ घूरल रहय तखनो लहासक बगले देने गेल रहय, लेकिन ओकर ध्यान नहि गेलै। तखनो लहास झाँपल रहै आ नीचामे धूपबत्ती जरैत रहै।
एना होइत छै। सोगमे लोग कानैत—कानैत सूति रहैत अछि आ निन्न टुटिते फेर कानय लगैत अछि। ओहि स्त्रीक विलाप एहने रहै।
कुसेसर अवसन्न आ उदास भेल ठाढ़ छल। पानिमे तीतल जड़ौन हवाक झोंक आबि रहल छलै। स्त्रीक विलाप पानि—बुनी वला ओहि कारी स्याह भदवरिया रातिकेँ और भारी बना रहल छलै। स्त्रीक विलाप कुसेसरक कोंढ़क भीतरी तहमे पैसि रहल छलै आ ओकरा भेलै जेना आब ओ फाटि जेतै। ओ ओहिठामसँ हटि गेल। लेकिन अपन बिछौन धरि जाइत—जाइत ओकर बुक भांगि गेलै। ओ बिलखय लागल। फेर अपनाकेँ सम्हारलक। चुप भेल। भोर भऽ रहल छलै आ ओकरा घर जेबाक रहै।




कनियाँ-पुतरा
जेना टांग छानै छै, तहिना ऊ लड़की हमर पएर पाँज मे धऽ लेलक आ बादुर जकाँ लटैक गेल। ओकर हालत देख ममता लागल। ट्रेनक ओइ डिब्बा मे ठाढ़ भेल-भेल लड़की थाइक कय चूर भऽ गेल रहै। कनियें काल पहिने नीचे मे कहुना बैठल आ बैठलो नै गेलै तऽ लटैक गेल।
डिब्बा मे पएर रोपै के जगह नै छै। लोग रेड़ कय चढ़ै-ए, रेड़ कय उतरै-ए। धीया-पूता हवा लय औनाइ छै, पाइन लय कानै छै। सबहक जी व्याकुल छै। लोग छटपटा रहल-अय।
हम अपने घंटो दू घंटा सऽ ठाढ़ रही। ठाढ़ भेल-भेल पएर मे दरद हुअय लागल। मन करय लुद सिन बैठ जाइ। तखैनिये दूटा सीट खाली भेलै, जइ पर तीन गोटय बैठल। तेसर हम रही जे बैठब की, बस कनेटा पोन रोपलौं। ऊ लड़की ससैर कय हमरा लग चैल आयल। पहिने ठाढ़ रहल, फेर बैठ गेल। फेर बैठले-बैठल हमर टांगमे लटैक गेल। जखैन ऊ ठाढ़ रहय तऽ बापक बाँहि मे लटकल रहय। ओकरा हम बड़ी काल लटकल देखने रहिऐ। ओकर बाप अखैनियों ठाढ़े छै। छोट बहीन आ भाय ओकरे बगल मे नीचे मे बैठल औंघा रहल छै।
ऊ जे टांग छानने ऐछ, से हमरा बिदागरी जकाँ लाइग रहल-अय। जाइ काल बेटी जेना बापक टांग छाइन लै छै, तेहने सन। ने ऊ कानै-अय, ने हम कानै छी। लेकिन ओकर कष्ट, ओकर असहाय अवस्था उदास कऽ रहल-अय। हम निश्चल-निस्पंद बैठल छी। होइए हमर सुगबुगी सऽ ओकर बिसबास, ओकर असरा कतौ छिना नै जाय। हाथ ससैर जाइ छै तऽ ऊ फेर ठीक सँ टांग पकैड़ लै अय।
लड़की दुबर-पातर आ पोरगर छै। हाथ मे घड़ी। प्लास्टिकक झोरा मे राखल मोबाइल। लागै छै नौ-दस सालक रहय। मगर कहलक जे बारह साल के ऐछ। सतमा मे पढ़ै-अय आ ममिऔत भाइक बियाह मे जा रहल-अय।
बेर-बेर जे हाथ ससैर जाइत रहै से आब ऊ हमर ठेंगहुन पर मूड़ी राइख देलक-अय। जेना हम ओकर माय होइ अइ। ओकर माय संग मे नै छै। कतय छै ओकर माय? जकर कनहा पर, पीठ पर, जाँघ पर कतौ ऊ मूड़ी राइख सकैत रहय। हम ओकर माथ पर हाथ देलिऐ। ऊ और निचेन भऽ गेल जेना।
एक बेर गाड़ीक धक्का सऽ ऊ ससैर गेल; सोझ भेल आ ऑंइख खोललक। एक गोटय कहलकै- दादा कय कसि कय पकड़ने रह।
अंतिम टीशन आइब रहल छै। सब उतरै लय सुरफुरा लागल-अय। अपन-अपन जुत्ता-चप्पल, कच्चा-बच्चा आ सामान कय लोग ओरियाबय लागल-अय। राइत बहुत भऽ गेल छै। सब कय अपन-अपन जगह पर जायके चिन्ता छै। बहुत गोटय ठाढ़ भऽ गेल ऐछ। ऊ लड़कियो। हमहूँ ठाढ़ भऽ कऽ अपन झोरा उतारै छी। तखनियें नेबो सन कोनो कड़गर चीज बाँहि सऽ टकरायल। बुझा गेल ई लड़कीक छाती छिऐ। हमर बाँहि कने काल ओइ लड़कीक छाती सऽ सटल रहल। ओइ स्पर्श सऽ लड़की निर्विकार छल; जेना ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सऽ सटल हो।
ओकर जोबन फूइट रहल छै। ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ।
टीशन आइब गेलै। गाड़ी ठमैक रहल छै। लड़की हमरा देख बिहुँसै—अय; जेना रुखसत माइंग रहल हो। ई केहन रोकसदी ऐछ! ने ऊ कानै छै, ने हम कानै छी। ऊ हँसै-अय, हमहँ हँसै छी। लेकिन हमर हॅसी मे उदासी अय।
कबाछु
ओ बेंच पर बैसल ट्रेनक प्रतीक्षा करैत रहय।
'शी-इ-इ।’ वला सिसकारी सुनिते ओकर छाती धक सिन उठलैक। बिन देखनहि ओकरा बुझा गेलैक, चम्पीवला आबि रहल छैक। आबिते नून—लस्सा जकाँ सटि जेतैक।
चाहे अहाँ केहनो परिस्थितिमे रहू, ओ आबिते अहाँक हाथ या कनहा धऽ लेत। ओकर एहि चालि पर ओकरा खौंत नेस दैत छैक। एक दिन ओ बिख सनक बात कहि देने रहै। ओ तइयो अपन चालि नहि छोड़लकै।
ई बुझितो जे चम्पीवला आबि रहल छैक ओ मटियेने रहल। पत्रिका पर आँखि गड़ौने सोचलक जे व्यस्त आ उदासीन देखि कऽ ओ चल जायत। लेकिन नहि। ओ आबि कऽ सोझा मे ठाढ़ भऽ गेलैक आ सिसकारी पाड़लकै--- 'शी-इ-इ!
आब अनठेनाइ असंभव छलै। ओ मूड़ी उठा कऽ चम्पीवला दिस तकलकै। चम्पीवला पुरान यार जकाँ रभसल दृष्टिएँ ताकि रहल छलैक आ नजरि मिलते नि:संकोच हाथ धऽ लेलकैक।
बेंच पर ओकर दुनू कात संभ्रान्त आ परिचित व्यतक्ति सभ बैसल रहैक। एहन अवस्थार में चम्पीपवलाक धृष्ट‍ता बहुत अशोभनीय आ फूहड़ छलैक। चम्पीवला पर ओकरा बड्ड तामस उठलैक।
'की कऽ रहल छेँ ?’— ओ टिरसलै।
चम्पीवला कोनो परवाह नहि केलकै आ ओ जे टांग पर टांग चढ़ेने बैसल रहय तकरा अलग करबाक जेना आदेश दैत जाँघ पर हाथ राखि देलकै। देहकेँ ढील छोड़ि देने चम्पी करबामे ओकरा सुविधा होइतैक। 'बेहूदा नहितन !’ – जाँघ पर राखल चम्पीवलाक हाथकेँ जेना ओ काछि कऽ फेकलकै।
ओकर एहि व्यवहारसँ चम्पीवला हतप्रभ नहि भेलै, बल्कि ढीठ जकाँ कहलकै—'एक बेर छूबल देहकेँ फेर छूबऽ मे कथीक संकोच ?'
चम्पीवला बहुत पैघ बात कहि देने रहैक जे साँच तऽ रहैक, किन्तु ओहिसँ ओ लजा आ खौंझा गेल। ओकरा बुझेलै जेना ओ स्त्री हो आ ई चम्पीवला ओकर पुरान यार। चम्पी आ मालिश करायब ओकरा बहुत अश्ली बुझेलै।
देखै नहि छिही, कतेक गरमी छैक !’— चम्पीवलाक बातमे जे धार छलैक तकरा भोथरेबाक लेल ओ एकटा बहाना बनेलक।
'हँ ठीके, गरमी तऽ बहुत छैक।’— अपन निराशाकेँ नुकेबाक लेल चम्पीवला बजलै।
चम्पीवलाक चलि गेला पर ओ अवग्रहसँ छूटल, मुदा चम्पीवलाक दीनताक लेल ओकरा अफसोस भेलैक। ठाम-कुठाम आ समय- कुसमय वला महीन समझ जँ चम्पीवला मे रहितिऐक तऽ एहनो गरमी मे ओ चम्पी करा सकैत रहय। लेकिन एहन बुधि सँ ओकर पेट नहि चलतैक।
ओ एहिना फेर कहियो गाड़ीमे या स्टेशन पर भेटि जेतैक आ सिसकारी पाड़ि कऽ चम्पी करेबाक इशारा करतैक—शी-इ-इ ! जेना पटेबाक लेल कोनो छौंड़ा कोनो छौंड़ीकेँ कनखी मारैत हो। ई सोचिते चम्पीवलाक प्रति ओकर वितृष्णा बढ़ि गेलैक।
कारबार
ओ सभ अचानक सड़क पर भेटि गेल छलाह। हम अपन होटल घुरैत रही, तखने हुनका सभ पर नजरि गेल। ओ सभ चारि गोटय छलाह। दू गोटय केँ हम चिन्हैत रही। ओ दुनू हमर परिचित रहथि। हुनका दुनू केँ एतेक दिनक बाद देखि कऽ हमरा आश्चर्य आ प्रसन्नता भेल। वर्मा सँ तऽ घनिष्ठता रहय, मुदा दोसर नवयुवक सँ मात्र परिचय।
हम वर्मा सँ पुछलिऐन—कहू-कहू , कुशल कि ने ?
वर्मा हमर प्रश्नसक कोनो जवाब नहि देलथि। कहलनि — अहाँ बढ़िया मौका पर भेटल छी। आउ, चलै छी।
हम पुछलिऐन – कत्तऽ ?
तऽ वर्मा कहलनि — चलू ने !
फेर डेग बढ़बैत कहलनि –हिनका सँ परिचय करू। ई छथि मिस्टर सिन्हा।
आ हिनका तऽ अहाँ जनिते हेबनि।
हम मिस्टर सिन्हा सँ हाथ मिलबैत ओहि चारिम व्यरक्तिक बारेमे सोचय लगलहुँ जे एकरा सँ कहिया आ कतय भेंट भेल छल; मुदा किछु मोन नहि पड़ल।
हम सभ फुटपाथ पर चलय लगलहुँ। हम छगुन्ता मे पड़ल ई जनबाक लेल व्यग्र छलहुँ जे हम सभ आखिर कतय जा रहल छी। हमर व्यग्रता जल्दिए खतम भऽ गेल। कनेक आगाँ बढ़ल रही कि देखलहुँ ओ सभ बार दिस घुमि गेल छथि। बारक गेट पर दरबान ठाढ़ छल आ भीतर जाइबला हरेक आदमीकेँ सलाम ठोकैत छल। ओकर सलामी हमरा अवढंगाह बुझायल। ओ बहुत जोरसँ सलाम ठोकैत छल।
बार एयरकंडीशंड छलैक। भीतर घुसिते शीतल बुझायल। पूरा हॉल मे हल्लुक नील इजोत पसरल छलैक। मद्धिम आवाज मे कोनो पॉप गीत बाजि रहल छलैक। बार मे बेसी मर्दे रहैक। कोन मे एकटा स्त्री अपन छोट बच्चा आ घरवलाक संग छलि आ आब उठि कऽ विदा होबऽ बला छलि। ओकर मुँह साफ साफ नहि देखाइत रहैक। अपन अपन टेबुल लग बैसल लोक खाइत पिबैत गपशप कऽ रहल छल। गपशप सुनाइत नहि रहैक। वेटर अबैत – जाइत रहैक। बुझाइत रहैक जेना ओ सभ धुंधमे चलि रहल हो।
हम सभ एकटा टेबुलक दुनू कात बैसि गेल रही आ शराब आ खेबा - पिबाक वस्तुक प्रतीक्षामे रही। हम अपना लेल बीयर आनय कहने छलिऐक। तखने वर्मा बजलाह — दस बिगिंस आवर बिजनेस डिनर।
ओ सभ नव कारबार शुरू कऽ रहल छलाह आ ओही खातिर एतय आयल छलाह। कारबारक ओरिआओन पूरा कऽ लेला पर ओ सभ प्रसन्न छलाह आ उछाह मे डिनर कऽ रहल छलाह। एक-एक पैग पिलाक बाद जखन हमरा सभ पर निशांक फुरफुरी शुरू भेल तऽ सिन्हा बाजल — भाइ, बिजनेस मिंस बिजनेस। बिजनेस अलग छै, दोस्ती अलग। दोस्तीक रूपमे हम अहाँक एक बेर मदति कऽ सकैत छी, दू बेर कऽ सकैत छी। लेकिन जँ अहाँ बिजनेस मे हमर समय लेब तऽ हमर समयक तऽ मोल अछि। आ ओ अहाँ केँ देबहि पड़त। हमर एकटा नव दोस्तछ रहय। एक दिन ओ आयल आ कहलक — यार, वाइफ केँ टी.भी. किनबाक बड़ सेहन्ता छैक। किछु पाइ अछि, किछु तों दऽ दे तऽ कीनि ली। हम ओकरा एकटा नव सेट बेसाहि देलिऐक। किछु दिनक बाद ओ फेर आयल। कहय लागल यार, वाइफ फ्रिज लेल कहि रहल अछि। हम कहलिऐ — नाउ दिस इज टू मच।
सिन्हा एक पैग और पीलक। सिगरेट धरेलक आ बाजय लागल — सभ चीजक मोल होइत छैक। एकटा खिस्सा सुनबैत छी। ध्यान सँ सुनबै आ कहब। एकटा स्त्री छलि। ओकर घरबला बेराम पड़ि गेलै। डॉक्टर लग लऽ गेलि। डॉक्टर कहलकै ऑपरेशन करय पड़तैक। ओहि स्त्री लग पाइ नहि छलैक आ डॉक्टर बिना पाइ लेने ऑपरेशन करक लेल तैयार नहि भेलै। ऑपरेशन नहि भेलासँ ओकर पति मरि जइतैक। ओ अपन पूर्व प्रेमी लग गेलि। ओकर पूर्व प्रेमी पाइ देबा लेल तैयार भऽ गेलै, मुदा ओकर एकटा शर्त्त रहै। शर्त्त ई रहै जे ओहि स्त्री केँ अपन पूर्व प्रेमी संगे एक राति बिताबय पड़तैक। हम सभ ई जनबाक लेल उत्सुक रही जे आब ओ स्त्री की करत। लेकिन तखने सिन्हा खिस्सा केँ ओत्तहि खतम करैत पुछलक — आब ई कहू जे गलती ककर रहै ? ओहि डॉक्टरक, पूर्व प्रेमीक या ओहि स्त्रीक ?
हम सभ, जे एकटा मनलग्गू खिस्साक आनंद लैत रही, एकाएक चिन्ता मे पड़ि गेलहुँ आ सोचय लगलहुँ। बड़ी काल धरि क्यो किछु नहि बाजल। सभ नैतिकताक फाँस मे ओझरायल रहय। सिन्हा हमर सभक दुविधा केँ बूझि गेल आ बाजल –गलती ककरो नहि रहै।
समस्याक एहि समाधान सँ हम सभ कने चौंकलहुँ, मुदा संतोषक अनुभव सेहो भेल।
सिन्हा मामला केँ और स्पष्ट करैत बाजल – देखू , डॉक्टर जँ पाइ नहि लेत तँ ओकर रोजगार मारल जेतै आ ओकर पूर्व प्रेमी बिना किछु लेने एतेक पाइ किएक देतै ? आ ओ स्त्री जँ ओकरा संगे राति नहि बितायत तँ ओकर घरवला मरि जेतै।
सिन्हाक स्पष्टीकरणक संगहि खिस्सा खतम भऽ गेल आ हमरा सभक भीतर चलैत उचित – अनुचितक उठा-पटक सेहो। हम सभ बार सँ निकलय लगलहुँ तँ दरबान फेर ओहिना जोर सँ सलाम ठोकलक। हमरा आब हरेक चीज मे पैसाक टनक सुनाय लागल, दरबानक सलामीयो मे। ओकर सलामी मे अवढँगपनी अखनो छलैक मुदा हम सभ ओकर अभ्यस्त भेल जाइत रही।
बाहर आबि एहि डिनर लेल हम कृतज्ञता प्रकट कयलहुँ आ नव कारबारी सभ सँ विदा लऽ कऽ अपन होटल दिस चलि पड़लहुँ। मन भारी रहय। ओ स्त्री आ ओकर बेमार घरबला दिमाग मे चक्कर कटैत रहय।
कुश्ती
भोर धरि पता नहि चलल। ओ रातिये भऽ गेल छल। उठलाक कनेक कालक पछाति लुंगी पर नजरि गेल। कहियो कहियो सपना देखलाक बाद भऽ जाइत छैक, तेहने लागल। लूंगी दू तीन ठामसँ सूखिकेँ कड़ा भऽ गेल छलैक। सपना पर गौर कयलाक बादो कोनो ओहन सपना मोन नहि पड़ल। ओहुना ओकरा भेलापर निन्न खुजि जाइत छैक। निन्न राति खन नहि खुजल छल। तँइ कनेक आश्चर्य तखन धरि बनल रहल जखन धरि ठेहुन पर नजरि नहि गेल। पहिलो बेर एहिना भेल छल। सियाह दाग उभरलाक बाद पानिक गिरब आ फेर एकटा पैघ सन घाव।
ओहि बेर दर्द नहि भेल छल। पपड़ीक कैक टा तह जमि कऽ उखड़ैत गेलैक आ करीब सप्ताहक भीतरे ठीक भऽ गेलैक।
लुंगी पर पड़ल दागकेँ हम नुकबैत रहलहुँ। हम नहि चाहैत छलहुँ लोक एहन – ओहन पूछि देअय।
दू-तीन बजे धरि हमर एकटा दोस्त आबि गेल। ओ हमरा संग लऽ कऽ हटिया जेबाक जिद करय लागल जे पछिला किछु दिनसँ हप्तामे दू बेर लगैत छलैक। ओहि ठाम ग्राम पंचायत दिससँ कुश्तीक आयोजन होइत छलैक। हटियाक प्रगतिक सभ टा दारोमदार कुश्तिये पर निर्भर करैत छलैक। लोकक एहन धारणा बनि गेल छलैक। ई बादमे मालूम भेल जे हटिया आरंभ करबा लेल गामक लोकक बीच खेतक गाछ लेल एकटा पैघ कुश्ती भऽ चुकल छलैक।
कुश्ती बड़ दिलचस्प आ मजेदार छलैक। कइएक टा जोड़ामे गोटक एहन निकलिये अबैत छलैक जकर कलाबाजी पर लोक थपड़ी पाड़ैत छल। जनी – जातियो के एकाध झुंड मर्द सभ सँ फराक रहबाक कोशिश करैत कुश्तीक मजा लऽ रहल छलैक। कुश्ती करैत-करैत एक टा जोड़ा आगाँ बैसल लोक सभ पर अचानक खसि पड़लैक। लोक पाछू दिस पड़ाय लागल। हमर ध्यान दोसर दिस छल। समय पर सावधान नहि भऽ सकलहुँ। ठेहुनपर जोरसँ चोट लागि गेल आ हम खसैत-खसैत बचलहुँ। हम चिकरिकऽ भीड़केँ गरियाबऽ लगलहुँ। कपड़ा खराप भऽ गेल छल। घावसँ खून बहैत छल। दोस्त सहानुभूति देखओलक आ हेल्थ सेंटर पर चलबाक सुझावदेलक।
'एखन क्यो हेतैक ?'— ई पुछैत हमर सभटा तामस हेल्थ सेंटर पर केन्द्रित भऽ गेल। ओ सेंटर बन्ने रहैत छलैक। दू टा कर्मचारी छलैक, जे सप्ताहमे कोनो एक दिन चल अबैत छलैक आ फेर अपन –अपन गाम। जरूरतमंद लोक केँ भरि सप्ताह हेल्थ सेंटरक चक्कर लगबऽ पड़ैत छलैक किएक तँ ओ सभ कहियो मिनिस्टरक आकस्मिक दौड़ा जकाँ आबि सकैत छलैक।
आइयो हम ओकर खुजल रहबाक उमेद लऽ कऽ नहि चलल छलहुँ। तँइ ताला देखि बेसी निराशा नहि भेल। सेंटरक उपयोगितापर गौर करैत क्यो लकड़ीक बोर्ड, जे सेंटरक अस्तित्वक प्रमाण छलैक , केँ उनटि देने छलैक।
हमसभ घुरि रहल छलहुँ तखने देबालक पाछुसँ कोनो चीज खसबाक आवाज आयल। एक टा छौड़ा घर लऽ जेबा लेल ईंट जमा कऽ रहल छल। छौंड़ा पहिने कनेक सकपकायल, फेर सम्हरि के दाँत चियारैत सफाइ देबऽ लागल।
घावसँ खूनक बहब बन्न भऽ गेल छलैक , मुदा नस फूलय लागल छल। साँझ धरि माथमे एकटा भारीपनक अनुभव हुअय लागल। देह टूटय लागल जेना बुखार अयबासँ पहिने होइत छैक। फेर कँपकँपी शुरू भऽ गेल। हम सीरक ओढ़ि बिछौनपर पसरि गेलहुँ। दोस्त अखनो घूर लग बैसले छल। फेर आरो लोकसभ आबि गेल छलैक। हुनका सभक बीच कोनहु गप्प कतहुसँ शुरू भऽ जाइत छलैक। कनेक पहिने हमर घावक बात शुरू भेल छलैक आ आब सेंटरक पछारी चलऽवला पालिटिक्सक पर्दाफास भऽ रहल छलैक। बेसी हल्ला-गुल्लाक कारणे हुनका सभपर हम खौंझाय लागल छलहुँ। हम अपन मूड़ी सीरक तर कऽ लेलहुँ आ काछसँ ऊपर बनल गिल्टी टोबऽ लगलहुँ।
भोरे उठलापर ताजगीक अनुभव भेल। घावपर कपड़ा सटि गेल छलैक। घाव काल्हिए सन ताजा छलैक। छोट भाय तकलीफ दिया पूछिकेँ चलि गेल। छोट भाय् मायसँ घावक मादे किछु नहि कहने छलै। बता देने रहितै तँ माय परेशान भऽ कइएक बेर हमरा लग आबि गेल रहैत। ओना हम घावकेँ लऽ कऽ कनेको चिन्तित नहि छलहुँ। सोचि नेने छलहुँ जे पहिल बेर जकाँ सहजे ठीक भऽ जेतैक। कपड़ापर दाग उभरि अबैत छलैक आ ओइपर माछी भिनकऽ लगैत छलैक। हम मात्र अहीसँ परेशान रही।
दुपहर धरि अड़ोस-पड़ोसक लोकसभ दाग देखि पूछताछ कयलक। हमरा क्रमिक रूपसँ घावक पूरा हुलिया दिअय पड़ल। लोकसभ एहने स्वभाववला घावक कइएक टा दृष्टान्त देलक। घावसँ सम्बद्ध व्यभक्ति सभक पूरा खिस्सा सुनौलक फेर अपन अपन अनुभवक अनुकूल आ प्रमाणित निदान बतौलक। किछु सहानुभूति प्रकट कयलक, किछु कँ घृणा भेलै आ किछु तटस्थ भाव लेने चलि गेल। अपनासँ छोट उमिरक कइएक गोटेकेँ हम टारि देलियै।
खाइत काल हमर छोट भाय संगहि बैसि गेल। एक तेहाइ हिस्सा खा लेबा धरि एक टा दाग फेर उभरि अयलैक आ माछी लागय लगलैक। छोट भायक नजरि प्रत्येक आध मिनटपर ओहीठाम चल जाइत छलैक। कनेक काल बाद ओकर खेबाक गति एकदम मंद पड़ि गेलै आ हमरा बुझायल जे ओकरा रद्द भऽ जेतै। हमरा पछतावा भेल जे ओ किएक हमरा संगे बैसि गेल। हम निर्णय लेलहुँ जे घाव रहबा धरि एहन समय संगे नहि बैसब। ओ बड्ड मुश्किलसँ ओहि भावकेँ मेटओलक। फेर ठंढ़ायल आत्मीय स्वरमे होमियोपैथ डाक्टर लग जेबा लेल कहलक। बहुत पहिने एकटा बीमारीक दौरान एलोपैथीपरसँ ओकर विश्वास खतम भऽ गेल छलै। ओना हमर एकटा मजकियल दोस्त ओकरे सोझाँ होमियोपैथीपर नमहर लेक्चर दैत कहने छलै जे एहि पैथीक पाउडरमे दबाइ कम पाइ बेसी चलैत छैक।
खाकऽ उठैत-उठैत हमर घावक मादे जननिहारक संख्या किछु आर बढ़लैक। किछु गोटे घाव देखाबऽ लेल कहलक। एहि काजमे हमरा सभसँ बेसी हिचकिचा - हटि होइत छल। मायकेँ जाहि समय सूचना भेटलै, तखने हमर छोट भाय ककरोसँ झगड़ा कऽ रहल छल। माय बेसी ध्यान नहि दऽ सकल। कर्पूर आ नारियरक तेल लगाबऽ लेल कहि जिम्हर भाय झगड़ा करैत छल, ओम्हरे जाय लगल। भाय आब गारिपर उतरि लायल छल—'सार, हटियाक सभ कुश्ती घुसाड़ि देब !’
हमहूँ तेजीसँ ओम्हरे दौड़लहुँ। मालूम भेल आरि छाँटि-छाँटि करीब बीत भरि खेत ओ अपन खेतमे मिला लेने छलैक आ आब नापियो मानय लेल तैयार नहि। हम भायकेँ शांत कयलहुँ। बहुत राति धरि एहि तरहक कतेको समस्या पर गप्प सप्पओ होइत रहलैक जाहिसँ हमरासभकेँ निपटबाक अछि। माय हमरासँ शिकाइत करैत रहल जे हम बहुत लापरवाह भऽ गेल छी।
बिछौनपर जाकऽ हमरा ध्यानमे आयल जे दुपहरियासँ एखनधरि सभ चर्च घावसँ हटिकऽ होइत रहलैक अछि आ एकाएक हम एक तरहक आरामक अबुभव करय लगलहुँ।
फेर सोचय लगलहुँ हम एहि कोठलीमे सभ कपड़ा उतारि नग्न भऽ जाइ, घावक सभटा चेन्ह मेटा जाइक, अंग-प्रत्यंग निर्विकार आ सुन्दसर देखाय लागय। मुदा तुरत्ते एहन हैब असंभव छलैक। आस्ते—आस्ते हम निन्नमे डूबैत गेलहुँ। हमरा लागल जेना हम कइएक गोटासँ लड़ि-झगड़ि रहल छी। ठेहुनपर ओहिठामसँ खून बेसी मात्रा मे निकलि रहल अछि।
भोरमे घाव फेर ओहिना छलैक। हम ठीक ढँगसँ किछु तय नहि कऽ पबैत अलहुँ जे पहिने गामक सभटा झगड़ासँ निपटि ली वा घावसँ। एहि अनिर्णयसँ उत्पन्न थकनीक कारण हम बहुत सुस्त भऽ केँ पड़ल छलहुँ। माय फुर्तिआह डेग उठौने हमरा लग आयल आ घाव ओहिना ताजा देखि तमसाय लागल। हम कहलियै—'गामक झगड़ा...’ वाक्य पूरा हेबासँ पहिने माय बाजव शुरू कऽ देलक –’बेराबेरी निपटि लेब ! तोँ पहिने घावक इलाज करा आबह।’
हम झपटि कऽ अंगा उठओलहुँ आ विदा भऽ गेलहुँ।
कैनरी आइलैण्डक लॉरेल
तुलसियाही बहुत दूरस्त छैक। ई सोचिते ओकरा आलस आबऽ लगैत छैक। ओतऽ जयबाक निर्णय गिरगिट जकाँ रंग बदलऽ लगैत छैक। ताकति छीन भऽ गेलैक अछि। पयरेँ चलब पहाड़ बुझाइत रहैत छैक। ओकरा दू दिन धरि साइकिलक बाट देखऽ पड़लैक अछि। उपिया एखन दस बजे लऽ कऽ आयल छैक। बैसाखक रौद झट दऽ कपार पर चढ़ि गेलैक अछि। रौद दिस तकिते ओकर साहस निपत्ता भऽ जाइत छैक। चौकी पर ओठंगि जाइत अछि। उपिया कहैत छैक—'आइ नहि जा सुभाष बाबू।’ ओ बाहर ताकऽ लगैत अछि — रौद...बाध ...मालजालक हेंज...।
सात बरस भऽ गेल छैक तुलसियाही गेना। ओकरा छगुन्ता नहि होइत छैक जे एतेक समय कोना बीति गेलैक। खाली समयक एकटा दूरीक अनुभव होइत छैक। दीदी कतेको बेर समाद पठौलकैक आबऽ लेल। दीदीक आग्रहमे ओकरा कहियो उत्कट गंभीरता नहि बुझयलैक। ओकर नहि जयबा मे तुलसियाहीक दूरस्त भेनाइ सेहो एकटा कारण रहल होयतैक।
ओ एक मास सँ किछु टाकाक जोगाड़मे अछि , नहि भऽ रहल छैक। पाँच दिन पहिने निर्णय लेलक। दीदी धनीक छैक। मँगतैक तँ टाका सहजेँ दऽ देतैक। जँ नहि दैक तखन ? ई प्रश्न ओकर दिमागक सैकड़ो फेरी लगौलकैक अछि। आ सभ् बेर ओ सोचलक अछि जे टाका नहि देतैक तँ ओकर एतेक दूर गेनाइ व्यर्थ भऽ जयतैक। एहन सोचैत काल ओ उदास होइत रहल अछि।
‘ममियौतक आवाज ओकर तल्लीनता तोड़ैत छैक—'मर हो सुबहास ! जेबह तँ जाह ,रौद भेल जाइत छह। नै तँ आइ छोड़िये दहक। अन्हरगरे उठिहऽ आ चलि दिहऽ।
ओ जयबा लेल तत्पर होइत अछि। उपिया हँसैत कहैत छैक—'जा ने, धारक ओइ कात बालु पर बुझियहक केहन होइत छैक मजा।’
ओकर निर्णय एकबेर फेर कोसीक धसना जकाँ खसऽ चाहैत छैक। एकटा निष्प्रा ण मुस्कीी ओकरा चेहरा पर अबैत छैक। ओ फेर चौकी पर बैसि जाइत अछि आ बाहर देखऽ लगैत अछि...रौद...दूरस्त... धार.... बालु आ रुपैया। ओकरा मे एकाएक स्फूर्त्ति आबि जाइत छैक। ओ बिहाड़ि जकाँ साइकिल उठबैत अछि आ चलि दैत अछि। उपिया कहैत रहि जाइत छैक—'नहि जा सुभाष बाबू हे हौ... औ !’
घाटक ठीकेदारक खोपड़ी लग ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि। खोपड़ीमे चारि –पाँच गोटे छैक। ठीकेदार गामक कोनो गंभीर घटनाक व्याख्या कऽ रहल छैक। ओकर मोन होइत छैक, खोपडीमे जा कऽ बैसय। फेर ई सोचि रूकि जाइत अछि जे कानमे झड़ पड़तैक। ओ ठीकेदारक नामे ममियौतक लिखल चिट्ठी हाथा—हाथी बढ़ा दैत छैक। ठीकेदार 'जाउ’ कहि भाषण चालू कऽ दैत छैक। ओ कटारि पर देने नाह दिस चलि दैत अछि। ओकरा कटारिक डर होइत छैक। कतहु खसि नहि पड़य। धारमे गेरूवा पानि आबि गेल छैक।
नाह छीट पर उतारि दैत छैक। छीटक बाद बहुत दूर धरि भरि जाँघ पानि छैक। ओ साइकिल कनहा पर उठा लैत अछि। अधे लग्गा टपैत साइकिल जानसँ ऊपर भारी लागऽ लगैत छैक। ओ साइकिल हेला दैत अछि।
बालु आगि जकाँ तबि गेल छैक। साइकिल ससरैत नहि छैक। डेग रखिते लगैत छैक, झरकि गेल। कपड़ाक जुत्ता हैंडिलमे बान्हल छैक। एहन धीपल बालु पर जुत्तो अगिया जाइत छैक। ओ जी-जान सँ साइकिलकेँ ठेलैत दौड़ऽ लगैत अछि। पाछाँ सँ एकटा मोसाफिर कहैत छैक—'साइकिल ससुरारि मे देलक-ए ? कने बड़द जकाँ टिटकार दियौक।’
ओ बान्ह टपि कऽ निर्मली बजार अबैत अछि। कंठ सूखि गेल छैक। घामसँ गंजी अंगा सभ भीजि गेल छैक। एकटा चाहक दोकानमे बैसि जिराय लगैत अछि। पीठपर फलिया बन्हने मोटिया सभ एहि गद्दी सँ ओहि गद्दी जाइत-अबैत छैक।
'रामेसर,चाह दहक दू टा।’- धोती-गंजी पहिरने एकटा दुब्बर-पातर आदमी कहैत छैक।
'उधार नहि हेतह।’
'अरे, हीयाँ नकदी माल है बाबू-ह।’
ओकर उत्तरसँ ओकरा प्रसन्नता होइत छैक। ओ अपनो लेल चाहक ऑर्डर दैत अछि।
थोड़े-थोड़े धुक्कड़ शुरू भऽ जाइत छैक। गरदासँ आँखि बचयबाक लेल ओ आँखि मूनि लैत अछि आ डेस्क पर माथ टिका दैत अछि। आँखि लागि जाइत छैक। किछु हड़हड़ाइत छैक। ओ हड़बड़ा कऽ तकैत अछि। बोरा जकाँ लोककेँ लदने एकटा मोटर मनक मन गरदा उड़बैत कुनौली दिस जा रहल छैक। भरिसक चारि सँ पहिने चलऽ वला समय नहि होयतैक। ओ प्रतीक्षा करैत रहैत अछि।
लोकपेरिया पर, लीखपर धुक्कड़क विरूद्ध ओकर साइकिलक पहिया फेर संघर्षरत होबऽ लगैत छैक। ओकरा कतेको बेर लगैत छैक , आब साइकिल नहि हाँकल जयतैक। जाँघ लोथ भऽ गेलैक अछि। ओ कतेको ठाम बिलमि कऽ पूछैत अछि—तुलसियाही कतेक दूर होयतैक। जेना ओ माउण्ट एवरेस्टक चढ़ाइ कऽ रहल होअय।
ओकरा जाइत –जाइत अन्हार भऽ जाइत छैक। ओ साइकिल ठाढ़ करैत अछि। ओकर पीसाक जेठका भाय पुछैत छैक— 'के छियह हौ ?’
ओ गोड़ लगैत कहैत छैक— 'हऽऽम सुभाष।’
'सुबहास?’- ओ मोन पाड़बाक प्रयास करैत छैक। फेर कहैत छैक 'आब चीन्हि गेलियह। हे ओइ चौकी पर बैसह। ’ ओ ओकर पिसियौतकेँ हाक पाड़ऽ लगैत ऐक –’रेऽऽ उगना ऽऽ... उगना रे ऽऽ।’
उगना आबऽ लगैत छैक तँ ओ कहैत छैक-'देखही के अयलौ। 'उगना' के छियै’ बुदबुदाइत ओकरा लग आबि जाइत छैक। आ ओकर मुँह निहारऽ लगैत छैक। सात बरस पहिने उगना बड़ छोट छलैक। ओ आत्मीय ढँग सँ परिचय देबाक प्रयत्न करैत अछि। उगनाक चेहरा निर्विकार बनल रहैत छैक। दीदी आ पीसा खाइत काल एतेक दिन नहि अयबा पर आश्चर्य व्य्क्तै करैत छैक। ओ कमजोर हँसी हँसैत रहैत अछि। बिआओन पर निन्न नहि अबैत छैक। लालटेम हेट कऽ एकटा किताब उनटाबऽ लगैत अछि। पीसाक जेठका भाय मसहरीक तरसँ बिगड़ैत ककरो सँ पुछैत छैक 'लालटेम किएक जरैत छैक रे-ए?’
भोरमे ओ अबेर कऽ उठैत अछि। दीदी कहैत छैक– ' उगना चल गेलौ-ए इसकूल। कहने गेलौ-ए, कहि दिहैक भइयाकेँ हमरो आबऽ दै ले। बड़की पोखरि जयबैक। जँ बेसी अबेर भऽ जाइ तँ कहि दिहैक भैयाकेँ नहा लै ले।’
उगनासँ लगाव अनुभव करैत ओकरा प्रसन्नता होइत छैक। मुदा ओ ओकरा संगे नहि नहा पबैत अछि। पीसा चाँरि लगा कऽ पठा दैत छैक।
खाइते काल टा ओकरा दीदी आ पीसासँ गप्प करबाक अवसर भेटैत छैक। आन समय ओ सभ व्यस्त रहैत छैक। दीदी पछिला सालक अपन बेटीक बियाहक चर्च विस्तारसँ करैत छैक जे कोना कोटक खातिर दू दिन धरि बियाह रूकि गेल छलैक। फेर प्रसंग बदलैत कहैत छैक ' आब नोकरी कऽले। बेसी पढ़ने आदमी बताह भऽ जाइत छैक। देखैत ने छीही मास्‍टरकेँ, बताह जकाँ करैत छैक।’ ओ चुपचाप सुनैत रहैत अछि।
दुआरि पर ओकर पीसाक जेठका भाय बैसल छैक। 'ओ ओकरासँ पितियौत देया पुछैत छैक ’अनूपा गाम गेलौ, भेंट भेल छलौ की-ई ?’ अनूपाकेँ ओकर पित्ती दीदीये लग पठा देने छलैक जे एतऽ पढ़तैक। गाममे खरचहर होइत छलैक। सात-आठ दिन पहिने ओ मायसँ भेंट करऽ चल गेलैक। दीदी कहैत छलैक, अनूपा आ उगनामे कखनो ने पटैत छैक।
पीसाक जेठका भाय फेर कहनाइ शुरू करैत छैक — 'छौंड़ा छलै तेज। मुदा तोहर दीदीये नहि पढ़ऽ दैत छैक। भैंसमे पठा देलक आ ताहूसँ नहि भेल तँ दुआरि परक ई टहल, ऊ टहल। तोहर पीसा कहबो करैत छैक जे 'पढ़ऽ दही, तँ ओ कहैत छैक, जे पढ़ऽ बेरमे पढ़तैक।'
ओ किछु नहि बजैत अछि। ओकरा अनूपाक प्रति दुख होइत छैक। ओ चौकी पर पड़ि रहैत अछि। ओकरा काकाक क्लान्त चेहरा मोन पड़ैत छैक। काकीक कनैत कनैत फूलल लाल चेहरा, पितियौत बहिन सभक आँखिक असहाज दयनीयता।
रातिमे ओ दीदीसँ कहैत अछि — 'हम भोरे चल जेबौ।' दीदीकेँ भरिसक प्रसन्नता अप्रसन्नता किछु नहि होइत छैक। टाका मँगबाक ओकर विचार नहि जानि कतऽ निपत्ता भऽ गेल छैक। दीदीक व्यवहार ओकरा धुंध जकाँ अस्पष्ट लगैत छैक। ओ चाहैत अछि बेसी सँ बेसी तटस्थ भऽ जाय। टाकाकेँ बीचमे ठाढ़ कऽ सम्बन्धक बारेमे नहि सोचय।
भोरोमे दीदीक व्यवहार ओहिना रहैत छैक। जलखै खाइत काल दीदी गमछामे दू गो टाका बन्हैत कहैत छैक—'आइकाल्हि एक्को टा पैसा हाथपर नहि रहैत छैक।’ फेर जेना दुलार करैत जीवित स्वरमे पूछैत छैक। - 'बौआ, रस्ता लेल कने चूड़ा बान्हि दियौक ?’ ओ मना कऽ दैत छैक।
'उगना ,जो भैयाकेँ एकपेरिया देने सड़क पकड़ा दिहैक। सुभीता हेतैक। आ तोँ घूरि अबिहें।'- दीदी कहैत छैक। उगना अस्वीकार कऽ दैत छैक। ओ खाइ ले मँगैत कहैत छैक जे ओकरा स्कूल जेबाक छैक। उगनाक इच्छा छलैक जे ओ आइ रहि जाय। काल्हि एकबेर आग्रह कयने छलैक। ओ तुरन्त बात टारि देने छलैक। नहि टारितैक तँ बादमे असुविधा भऽ सकैत छलैक। ओ बड़ तीब्रतासँ अपना पर उगनाक स्थिर दृष्टिक अनुभव करैत अछि। दीदी की कहि रहलि छैक, ओकरा नहि बुझाइत छैक। ओकर सम्पूर्ण चेतना पर उगना पसरि गेल छैक।
ओ पनिमरू चालिमे विदा भऽ जाइत अछि। गोहाली लग ओकरा अपना पाछाँ ककरो उपस्थितिक अनुभव होइत छैक। उगना थिकैक। 'जेबही सड़क धरि ?' ओ पुछैत छैक। किछु नहि पुछनाइ उगनाकेँ अप्रिय लागि सकैत छलैक।
ओ कोनो उत्तर नहि दैत छैक। दुनू संग-संग चलैत रहैत अछि। दीदी नमहरगर डेग दैत एकाएक आबि जाइत छैक। एकटा रुपैया दैत कहैत छैक — 'ईहो राखि ले। सकुन्ती धेने छलैक।’
ओकरा सभ वस्तु कुरूप आ अधलाह बुझाय लगैत छैक। मात्र उगनाक एसकर होयबाक कल्पना ओकरा नीक लगैत छैक।
दीदी उगनासँ पुछैत छैक — 'जेबही?’
ओ अपूर्ण आ अस्पष्ट शब्द—मे प्रश्नक औपचारिकता पर खौंझाइत छैक। दीदी कहैत छैक —'जाह, रौद भऽ जेतह।’
ओकरा लगैत छैक जेना उगना जिंजीर भऽ गेल होइक। उगनाक समस्त मनोभाव चुप्पी मे बदलि गेल छैक। ओकर चेहरा शांत आ उद्वेगहीन लगैत छैक। मुदा सोचला पर ओकर स्थिरता बड़ उदास लगैत छैक। ओकर साइकिल एकपेरियापर ससरऽ लगैत छैक। रौद... धार... बालु... माउण्ट एवरेस्ट ...।
दाना
मोहनकेँ इंटरभ्यू देबाक रहै। ओ लस्त-पस्त आ घबरायल बससँ उतरल। विद्यार्थीक छोट-छोट समूह जैंह-तैंह छिड़िआयल गप्पमे लागल ठाढ़ छलै। एकटा विद्यार्थी सँ ओहि जगह दिआ ओ पुछारि केलकै जतय ओकर इंटरभ्यू रहै। विद्यार्थी हाथसँ इशारा कऽ कऽ बतेलकै जे ओकरा कोन-कोन बाटे जेबाक चाही। लेकिन जे नक्शा ओ बतेलकै से ततेक घुमान आ घुरची-फन्ना वला रहै जे मोहन बिसरि गेल आ ओझरी मे पड़ि गेल। असहाय आ नचार सन ओ फेर विद्यार्थीक मुँह देखय लागल। ओकरा उमेद रहै विद्यार्थी फेरसँ ओकरा रस्ता बतेतै। लेकिन ओकर निवेदनक प्रति छात्र कोनो रुचि नहि देखेलकै आ अपन संगी सँ गप्प करैत रहल। मोहन कने काल ततमतायल ठाढ़ रहल आ निराश भऽ कऽ विदे होइ वला रहय कि तखने ओ दुनू ओम्हरे चलि देलकै जेम्हर मोहनकेँ जेबाक रहै। ओ चुपचाप ओहि दुनूक पाछू-पाछू चलय लागल। कातिक बीति रहल छलैक आ उदास करय वला पछिया हवा बहैत रहै।
ओहि दुनूक पाछू चलैत एक बेर ओकरा भेलै कतहु ओ सभ हँसी ने करैत हो। आशंका भेलै भटका ने दिअय। ओ थाकि गेल छल। ओ दुनू छात्र-आन्दोलन लऽ कऽ बहस करैत रहै। भरिसक गप्प खतम भऽ गेलै। ओ सभ पूछय लागलरहै जे ओ कतयसँ आयल अछि आ कथीक इंटरभ्यू छिऐ। फेर दुनू चुप भऽ गेलै आ चलैत रहलै। मोहन केँ ठीक – ठीक बुझा नहि रहल छलै ओ दुनू कतय जा रहल छै, ओकरा रस्ता बताबऽ या अपन कोनो गंतव्य दिस। एक ठाम आबि दुनू रूकि गेलै आ बतेलकै – इएह छिऐ। ओहि दुनूक एहि उदारता आ मदति सँ मोहन प्रसन्न भेल आ आभार व्य्क्तऽ केलक।
ओ सभ चल गेलैक तऽ मोहन चारूकात हियासलक। ओकरा पियास लागल रहै। एकटा कूलर अभरलै आ ओ ओम्हरे चलि देलक। जखन ओ कूलर लग पहुँचल तऽ एकटा अधवयसू आदमी जगमे पानि भरैत रहै। ओ गोर रंगक स्वस्थ आ सुंदर व्यभक्ति छलै। मोहनकेँ ठाढ़ देखि पुछलकै अपने जल पीब ? बस एक मिनट। गिलास अनैत छी। ओकर जग भरि गेल छलै। जग भरिते ओ तेजीसँ चलि देलकै आ अदृश्य होइसँ पहिने पलटि कऽ मोहन दिस देखलकै। मोहन केँ ओ व्य क्ति बहुत अस्थिर आ चंचल बुझेलै।
देर भऽ गेलै तँ मोहन केँ ओहि आदमी पर संदेह हुअय लगलै। लेकिन ओहि आदमीक स्वरमे जे विनम्र आग्रह छलै से पानि पीबयसँ मोहन केँ रोकैत रहलै। ओ आदमी कने कालमे आबि गेलै। ओ गिलास केँ खूब चिक्कन सँ धोलकै, पानि भरलकै आ पेनी पकड़ि कऽ मोहनक खिदमतमे पेश केलकै — लेल जाय।
ओकरा हाथसँ गिलास लऽ कऽ मोहन पानि पीबय लागल। ओ आदमी कूलरक टोंटी पकड़ने ठाढ़ छलै।
आर लेल जाय तीन गिलास पिलेलाक बाद ओ आदमी जेना सवाल आ आग्रह दुनू केलकै। लेकिन ओकरा आब पानि नहि पीबाक रहै। मोहन चिन्ता मे पड़ि गेल जे एहि आदमीक प्रति आभार कोना प्रकट करय। धन्यवाद। - एकर अलावे कहबाक लेल ओकरा किछु नहि सुझलै। और ? ओकर एहि छोट सन सवाल सँ मोहन केँ लगलै जे ओकरा चाह लेल जरूर कहल जाय।
चाह पीब ?-खाली धन्यवाद कहला पर जे कमी मोहनकेँ खटकल छलै से एहि प्रश्नज सँ पूरा होइत बुझेलै।
‘बस, एखने चलैत छी।’- कहैत ओ आदमी बगल वला कोठलीमे घुसि गेलै। ओकर चंचल हावभाव पर, जे चार्ली चैपलिनक स्मरण करबैत रहै, मोहन मुस्कायल।
बहुत देर धरि ओ नहि अयलै तऽ मोहनकेँ बेचैनी हुअय लगलै। ओ धीरे-धीरे कैंटीन दिस बढ़य लागल। कनेके आगाँ गेल हैत कि ओ आदमी नहि जानि कोम्हरसँ एलै आ 'तुरत' कहैत ओतने वेगसँ दोसर कोठली मे ढुकि कऽ अलोपित भऽ गेलै। मोहन फेर ओकर प्रतीक्षा करय लागल।
पाँच मिनट बीति गेलै। मोहन आब खिन्न भेल जाइत रहय। तखने ओ आबि गेलै। ओहि आदमीक घर संगरूर जिला रहै आ ओ पहिने सेनामे छल। बीच – बीचमे ओकरा ओहने अंगरेजी बोलबाक आदत रहै जेना दिल्लीक जनपथ पर सामान बेचैत स्त्री बजैत अछि — 'लुक सर ... गुड क्वालिटी ... चीपेस्ट एंड वेरी-वेरी नाइस सर !'
'एतय अहाँकेँ नौकरी साइते भेटत।'- ई कहि कऽ ओ आदमी मोहनकेँ निराश केलकै। फेर तुरंत जोड़लकै–‘देखियौ, चांस छिऐ। ओना बाहर वलाकेँ नहि लैत छै। जँ पी-एच.डी.क डिग्री रहैत तऽ संभावना छल।’ चपरासी होइतो ओकरा हरेक बातक खबरि रहै। ओ दुनू कैंटीन मे बैसि गेल छल आ मोहन चाह आनय कहि देने रहै।
'किछु और लेल जाय, सर। नमकीन, मिठाई-तिठाई।’- ओहि आदमीकेँ जेना मोहनक बहुत चिंता होइ।
'न।' ओ बाजल।
'एकटा बर्फी ?'
'न, किछुनहि।'
'लेकिन सर, किछु खेने बिना हम चाह नहि पिबैत छी।'—ओ आदमी बनावटी आ कुरूप हँसी हँसल।
'ठीक छै, अहाँ लिअऽ।'
'खाली हमहीं टा कोना लेबै, सर। अपनो लियौ ने। कम सँ कम एकोटा बर्फी।'
मोहनक जवाबक प्रतीक्षा केने बिना ओ आदमी नौकरकेँ बजेलकै आ मिठाई लाबऽ कहलकै।
अखन मोहन चाह पीबते रहय कि ओ आदमी उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेलै। ओ बहुत शीघ्रतासँ खा-पी कऽ तैयार भऽ गेल आ आब ओकरा लेट होइत रहै।
'अच्छा, तऽ आब हम चली ?'—विदा लैत काल ओकरा चेहरा पर कारोबारी उदासीनता पसरल छलै।
ओ आदमी कखनिए ने चल गेल रहै। मोहनक चाहो खतम भऽ गेल छलै। लेकिन ओ बैसल रहल। ओकरा सब चीज बीमार आ उदास लागि रहल छलै।
कैंटीनमे बहुत रास फुददी आ मैना आबि गेल रहै आ पावरोटीक छोट-छोट टुकड़ी पर चीं-चीं करैत झपटैत रहै; टेबुलक नीचा, टेबुल पर — सभतरि।
दृष्टि
रातिक दस बजल अछि। अन्दाज लगबैत छी डेरा पहुँचय मे कम सँ कम एक घंटा अबस्से लागि जायत। पाइ केँ जेबीये गनय लगैत छी। बड़ कम अछि। डेरा लग एकटा टुटपुजिया होटल छैक, जे सस्ते मे खुआबैत छैक। लेकिन ओतऽ जाइत-जाइत एगारह बाजि जेतैक। ताधरि ओ होटल बंद नहि भऽ जाय, ई सोचि एकटा होटलमे घोसिया जाइत छी। एकटा टिनहा बोर्ड टांगल छैक, जाहि पर सभ वस्तुक दर लिखल छैक। हम मनेमन पैसाक मोताबिक हिसाब बैसा लैत छी आ आधा प्लेटक आर्डर दऽ दैत छी। किछु पाइ बचि जाइत अछि। मोन सिगरेट पीबा लेल नुड़िआय लगैत अछि आ बचलाहा पाइक सिगरेट लऽ लैत छी। मोन हल्लुक जकाँ बुझाइत अछि आ चालि किछु स्थिर भऽ जाइत अछि।
रस्ता मे बहुत बात मोन पड़ैत रहैत अछि 'ई हाले मे एम. ए. कयने छथि, बेचारा बड्ड गरीब छथि। कतहु कोनो नोकरी दिया दियौक।’
आब बड्ड घृणा भऽ गेल अछि एहि सभसँ। भरि दिन एम. एल. ए., एम. पी. सभक खुशामद, अपन हीनता-बोध आ सर्विस होल्डरक मौन व्यंग्यसँ मन कुंठित भऽ जाइत अछि। दिन भरि नोकरीक चक्करमे बौआइत छी आ राति केँ झमान भेल डेरा घुरैत छी। जीवनक यैह क्रम बनि गेल अछि। कहिया निस्तार होयत, तकर ठेकान नहि।
कोठलीमे एकटा चिठ्टी फेकल अछि। चिठ्टी उठबैत छी। गामसँ आयल अछि। नोकरी भेटल कि नहि, से पूछल गेल अछि। मोन घोर भऽ जाइत अछि। बहुत उदास भऽ जाइत छी। चिठ्टी मे गाम अयबाक आग्रह सेहो अछि। गाम अयबाक बात मनकेँ सान्त्वना दैत अछि।
मन होइत रहैत अछि गाम भागि जाय। एहिठामक भूख-प्यास, अपमान, दुख, निराशा कखनो काल बताह बना दैत अछि। ई शहर काटय दौड़ैत अछि। बुझाय लगैत अछि जे नोकरी एकटा मृगतृष्णा थिक। ओकरा पाछू बौआइत-बौआइत जीवन अकारथ चल जायत। गाम जेबाक निर्णय करैत छी। निर्णय पर दृढ़ रहय चाहैत छी लेकिन से होइत नहि अछि। गौंआ—घरूआक व्यंग्य आ उपहासक कल्पना कलेजामे भूर करैत रहैत अछि। 'देखही रौ, फलनाक बेटा बुड़िआय गेलै। एतेक पढ़ियो—लिखि कऽ नोकरी नहि भेलै। आब गाम मे झाम गुड़ैत छै।'
'धौ, पढ़तै कि सुथनी। पढ़ितिऐक तँ यैह हाल रहितैक।'
'अरे अबरपनी कयने घुरैत हेतै।'
एहन-एहन बिक्ख सन बोल सुनि केँ मन होइत अछि लोकक मुँह नोचि ली। लेकिन मरमसि कऽ रहि जाइत छी।
नोकरी। पढ़बाक—लिखबाक उद्देश्य लोक एक्केटा बुझैत अछि-नोकरी। जे नोकरी नहि करैत अछि, गाममे रहय चाहैत अछि, तकरा लोक उछन्नर लगा दैत छैक। कियैक ? मन मे बेर-बेर ई सवाल उठैत अछि। लोकक व्यवहारक प्रति मनमे क्रोधकं धधरा उठैत अछि।
आइ भोर ओहि दक्षिण भारतीय पत्रकार सँ भेंट भेलाक बाद मन उद्वेगहीन आ शांत भऽ गेल अछि। सोचि लेने छी आब गामे मे रहब। खेती करब। पत्रकारक बात रहि-रहि कऽ मोन पड़ैत अछि- 'जँ आइ सभ पढ़ल-लिखल लोक नोकरिये करत तँ फेर खेतीक काज के करत। हमरा आश्चर्य होइत अछि जे आइ—काल्हिक शिक्षित वर्ग केँ खेती करबामे लाजक अनुभव होयत छैक। जीवनक कोनो क्षेत्र होअय-कृषि, उद्योग अथवा व्यापार, एकटा महान आदर्श उपस्थित करबाक चाही। जीवन प्राप्तिक उद्देश्य केवल पेटे टा भरब नहि, किछु आरो अछि। आ ई की जे बी. ए. वा एम. ए. पास करू आ तुरन्त पेट पोसबा लेल कोनो नोकरी पकड़ि लिअऽ। भूख पर विजय प्राप्त करू, तखनहि कोनो महत् आदर्श स्थापित कऽ सकैत छी नहि तँ भूखे मे ओझरा कऽ रहि जायब।'
लेकिन भूख पर कतेक दिन धरि विजय प्राप्त कयल जा सकैछ?' हम शंका राखलियैक।
ओ बहुत गर्वित होइत बाजल –'डू यू नो, डेथ केन नॉट कम ट्वाइस। आ जखन मृत्यु एक्के बेर भऽ सकैछ तँ हम सभ भूख सँ कहियो मरि सकैत छी?’ हमरा तखन बुझायल जेना इजोतक एकटा कपाट अचानक खुजि गेल हो। हम किछु आओर नहि सोचलहुँ आ गाम चल आयल छी।
गाम आबिते एकटा निराशा घेरि लेलक अछि। ओहि पत्रकारक प्रेरणा फीका आ बदरंग भेल जा रहल अछि। गामक जीवन, बहुत कठिन आ दुर्वह बुझाइत अछि। एहिठामक गरीबी, अशिक्षा, दंगा-फसादमे हम ठठि सकब ? हमरा सन सफेदपोश एहिठाम नहि रहि सकैछ। हमर निर्णय गलत रहय। हमर फैसला सुनिकेँ ककरो खुशी नहि भेलै। पत्नी पर तँ जेना वज्रपात भेलै। ओकर सभटा सपना चकनाचूर भऽ गेलैक। कतेक आस लगेने छल सब। पढ़त-लिखत, नोकरी करत, परिवार केँ सुख देत। लेकिन सब व्यर्थ। अपन अस्तित्व आब निरर्थक आ अप्रासंगिक बुझाय लागल अछि। की करी ? शहर घुरि जाय ? लेकिन ओतय करब की ? बस एत्तहि आबि कऽ अटकि जाइत छी। बुझाइत अछि शहर आ गाम हमरा लेल कतहु जगह नहि अछि। गाम अबैत छी तँ भागि कऽ शहर चल जयबाक मन होइत अछि आ शहरमे रहैत छी तँ भागि कऽ गाम चल अयबाक इच्छा होइत अछि। भरिसक हम चाहैत छी जे बैसले-बैसल सभ किछु भेटि जाय। लेकिन से कतहु भेलै—ए। उद्यम तँ करय पड़त। हमरा मे चारित्रिक दृढ़ता सेहो नहि अछि। छोट-छोट बात पर उखड़ि जाइत छी आ निर्णय बदलय लगैत छी। क्यो कहिये देलक जे 'पढ़ि-लिखि' कऽ गोबर भऽ गेलै, तँ की हेतैक। कहैत छैक तँ कहओ। एहि सँ दुखी भऽ कऽ शहर पड़ा जायब कोन बुद्धिमानी हेतैक। आइए एक गोटे 'हरबाह' कहलक तँ कुटकुटा कए लागल। मन भेल कतहु पड़ा जाय। एहि तरहक क्षणिक आवेश आ भावुकतामे गलब ठीक नहि अछि।
मनकेँ अनेक तरहेँ शांत आ स्थिर करबाक प्रयास करैत छी। लेकिन फेर कोनो एहन बात भऽ जाइत अछि जाहिसँ अन्हार आ निराशा पसरय लगैत अछि।
क्यो कहैत अछि 'खेती मे कोनो लस छैक। कहियो रौदी, कहियो दाही....’ आ हमर मन डूबय लगैत अछि। भविष्यक चिन्ता आ डर खेहारय लगैत अछि। ई नहि सोचय लगैत छी जे सब जँ एहि डरेँ खेती छोड़ि दैक तँ अन्न एतै कतयसँ आ लोक खायत की ? आखिर एतेक आदमी तँ खेतीये सँ जिबैत अछि। पता नहि कियैक, मनमे खाली निराशाजनक भावना आ विचार अबैत रहैत अछि। साइत सुविधाभोगी हेबाक कारणे। हम श्रम सँ भागय चाहैत छी, सुविधाकामी छी तेँ भविष्य असुरक्षित आ अंधकारमय बुझाइत अछि। हरबाह-चरबाह आ जन-बोनिहार भविष्य सँ डेराइत नहि अछि। श्रमे ओकर भविष्य होइत छैक। श्रम, जे ओकर अपन हाथमे छैक। फेर कथीक चिन्ता आ कोन असुरक्षा।
हम अचानक एकटा विचित्र तरहक आशा आ प्रसन्नताक अनुभव करय लगैत छी।
नदी
बिहारी परसू आयल रहय। एहि शहरमे गगनदेव केँ छोड़ि ओकर अओर क्यो परिचित नहि रहैक। तेँ ओ तत्काल गगनदेव लग टिक गेल छल। एहि शहरमे ओकरा एक साल रहय पड़तैक। एतेक दिन धरि गगनदेव लग टिकनाय व्यावहारिक दृष्टि सँ ठीक नहि रहै तेँ एतय अबिते बिहारी केँ किराया पर एकटा कोठली तकबाक चिन्ता लागि गेलै आ अगिले दिन ओ तलाशमे निकलि पड़ल। शहरसँ अपरिचित रहबाक कारणे ओ गगनदेवो केँ संग कऽ लेलक। दुनू काल्हिए सँ भटकि रहल छल आ अखनधरि कोनो ढँगगर कोठली नहि भेटल छलैक। पैदले एम्हर सँ ओम्हर भटकैत रहलाक कारणे ओ दुनू थाकि गेल छल आ मनमे निराशा पसरल रहैक। कनेक काल सुस्तयबाक लेल ओ दुनू चाहक दोकान दिस बढ़ि गेल।
ओ इलाका ऊँच आ गाछ बिरिछसँ भरल रहैक। एक घंटा पहिने भेल बरखामे हरेक चीज धोआ –पोछा कऽ साफ आ चमकदार भऽ गेल रहै आ पूरा प्रकृति आकर्षक आभामे दमकैत रहय। पीपरक विशाल गाछक नीचा सड़कक दुनू कात देहाती जनानी सभ ढकिया-पथियामे सामान लऽ कऽ बैसल छलै आ लोक सभ दैनिक वस्तुजात बेसाहयमे लागल छल।
ओ दुनू दोकान पर बैसल चाह पीबि रहल छल। तखने नौ-दस सालक एकटा लड़की गगनदेवक बगलसँ गुजरलै। दुनूक आँखि मिललै आ सरल जिज्ञासा मे एक-दोसर पर स्थिर भऽ गेलै। फेर ओ लड़की आगू बढ़ि गेलै। गगनदेव चाह पिबैत-पिबैत ओहि लड़कीकेँ बिसरि गेल। बिहारी चिन्तित आ उदास बुझाइत रहय। चाह पीलाक बादो ओ दुनू कने काल धरि दोकान पर बैसल थकनी मेटबैत रहल। फेर उठि कऽ पानक दोकान पर चलि गेल।
पानक दोकान पर आबि कऽ गगनदेवकेँ परम आश्चर्य भेलै। ओ लड़की ओत्तहि ठाढ़ छलै। लड़कियो गगनदेवकेँ देखलकै। दोकान पर भीड़ रहै। नहि जानि ओहि लड़की कें की लेबाक छलै। ओ दुब्बर-पातर छलै आ अन्तर्मुखी लागि रहल छलै। ओकर कोमल चेहरा पर बाल-सुलभ निश्छलता आ सहजता रहै। ओ गगनदेवकेँ एकटक तकैत चल जाइत रहै। गगनदेवक नजरि कतहु आओर छलैक लेकिन एहि बातक प्रति ओ सचेत छल जे लड़की ओकरा एकटक देखि रहल छैक। गगनदेव बूझि नहि पाबि रहल छल जे लड़की कियैक ओकरा देखि रहल छैक आ ओकरामे ऐहन की छैक जे ओ ताकि रहल छैक। ओकर तीक्ष्ण दृष्टिसँ गगनदेव आहत आ बेचैन छल। ओ बड़ी मुश्किल सँ लड़की दिस ताकलक। लड़की अखनो ओकरा पर नजरि टिकौने ठाढ़ रहैक। ओकर दृष्टिक रहस्य बूझब गगनदेवकेँ असंभव बुझा रहल छलै। भरिसक ओकर पूरा व्य क्तित्वझ लड़की लेल स्पृहणीय भऽ उठल होइ’। गगनदेव ओकर गाल छुलकै। लड़की विडुँसलै आ लाजेँ मूड़ी गोंति लेलकै।
ओहिठाम सँ विदा होइते गगनदेव केँ बुझयलै आब ओकरा सँ फेर कहियो भेंट नहि हेतैक। लेकिन एहि बातक लेल ओकरा दुख नहि भेलै। ओ उल्लास आ प्रेमक अनुभूति सँ भरि गेल रहय।
परलय
बुझाइत रहै जेना सतहिया लाधि देलकै। धाप परक पटियापर बैसल बौकू कखनसँ ने पानिक टिपकब देखि रहल छल। बैसल-बैसल ओकर डाँड़ दुखा गेलै। ओ नूआंक गेरूआकेँ सरिऔलक आ आँखि मूनि पड़ि रहल।
माल-जाल भूखे डिरिया रहल छलै। बुनछेक होइतैक तऽ कने टहला-बुला अबितिऐक। माल-जाल थाकि-हारि कऽ निंघेसमे मुँह मारि रहल छलै आ बीच-बीचमे एकाध टा घास टोंगैत रहै। काल्हि दुपहरेसँ पानि पड़ि रहल छलै। बेरूपहर घास नहि आनि भेलै, ने माल खोलि भेलै। दुनू बड़द आ गाय आफन तोड़ि रहल छलै आ खुराठि कऽ कादो कऽ देलकै।
थकनी आ चिंतामे डूबल-डूबल अचानक बौकूक भक टुटलै तऽ लागलै जेना बोह आबि गेलै। बोह एहने समयमे उठै छलै। साओन-भादोक एहने झाँटमे पानि बढ़य लगै आ जलामय कऽ दैक।
ओ हाक पाड़ि पड़ोसिया सँ पुछलकै जे पानि तऽ ने बढ़ि रहल छैक। 'धार उछाल भऽ गेलैक ’-पड़ोसिया कहलकै। ओकर मन आशंकित भऽ गेलै। धार उछाल भऽ गेलै, एकर मतलब जे आब पानि पलड़तै। बाध-वन, खेत-पथार, घर-दुआर सभ किछु डूबि जेतै। माल-जाल भासि जेतै। लोक-बेद मरतै। समय तेहन विकराल छैक जे लोककेँ प्राण बचायब कठिन भऽ जेतै। भोरे सँ कार कौवा टाँसि रहल छैक। पता नहि की हेतै।
'बाबू हौ, माय कोना-कोना ने करै छैक।'-बौकूक बेटी पलसिया घबरायल आ व्याकुल स्वरमे ओकरा हाक देलकै। बौकूक कलेजा धकसिन उठलै। भेलवावाली केँ भोर सँ
रद्द्-दस्त भऽ रहल छलै। बौकू धड़फड़ायल पानिमे तितैत आँगन गेल। भेलवा वालीक पेटमे आब किछु नहि छलैकजे मुँहसँ बाहर अबितिऐक। लेकिन जी फरिया रहल छलै
आ ओ-ओ करैत कालबुझाइ जेना पेटक सभटा अँतड़ी बहरा जेतै। औक बन्न भेलापर
ओ कहरय लगै। ओकर टाँग-हाथ सर्द भऽ गेल छलै।
'हाथ-गोरमे तेल औंस दही आ सलगी ओढ़ाय दही।’- भेलवा वालीक नाड़ी टेबैत बौकू पलसियाकेँ कहलकै। पलसिया मायक पैर ससारय लगलै आ बौकू चिंताक अथाह समुद्रमे डूबल बैसल रहलै। बौकूकेँ बुझेलै जेना ओकर घर आ बाहर दुनू छिड़िया गेलै आ ओकरा बूते आब कोनो चीज समटब पार नहि लगतै।
भेलवा वाली सूति रहलै। नट्टा आ ललबा भूखसँ लटुआ गेलै। तीतल धुँआइत जारनिसँ पलसिया मकइक फुटहा भूजऽ बैसलै। दुनू छौड़ा चूल्हि लग बैसल खापड़ि दिस ताकि रहल छलै आ नीचामे खसैत लावा बीछि-बीछि खाय लगलै। 'उतरबरियाबाधमे पानि भरि गेलै।'- बाध सँ घूरल देबुआ हल्ला कऽ रहल छलै।
सभ चीज नाश भऽ जेतै। बौकूकेँ एहि बेरूका लच्छन नीक नहि बुझाइत रहै। पछिया परक झाँट आ कोसीक बाढ़ि सभकेँ लऽ कऽ डूबि जेतै। एहि टोल कि पूरा गामेमे ककरो नाह नहि रहै \ माल-जाल, धीयापूता आ बिमरियाहि घरनीकेँ लऽ कऽ एहन विकराल समयमे ओ कतऽ जेतै ? बौकूकेँ किछु नहि फुराइ जेना ओकर अकिल हेरा गेल होइ।
माल-जाल डिकरैत रहै। बौकू गठुल्लामे ढुकलै आ किछु फुफड़ी पड़ल मटिआइन ठठेर बीछि कऽ ओगारि देलकै। तीनू टा माल कतहु-कतहु सँ पात नोचऽ लेल मूड़ी मारऽ लगलै आ डाँटकेँ खुरदानि देलकै।
पानि बढ़िते गेलै। बीच-बीचमे लोक सभ पानि बढ़बाक हल्ला करै। नाहक इंतजाम करबा लेल रामचन सभकेँ कहने फिरि रहल छलै। घरसँ निकलै वला समय नहि रहै। एहन समयमे के आ कतऽ नाहक इंतजाम करतै ? कखनो काल बौकूकेँ लगै जे रामचन बलौं लोककेँ चरिया रहल छैक। किछु नहि हेतै। धार खाली फूलि गेल छैक। थोड़ेक पानि अऔतै आ सटकि जेतै। रामचनक घरमे अनाज-पानि कनेक बेसी छैक तेँ ओकरा नाहक एतेक फिकिर छैक। लेकिन के कहलक-ए ! ओकर विश्वास कपूर जकाँ तुरन्ते उड़ि गेलै।
मेघ पतरेलै आ कने कालक लेल बुनछेक भऽ गेलै। बच्चासँ लऽ कऽ बूढ़ धरि गामक समस्त लोक पानि देखबा लेल घरसँ बाहर आबि गेलै। उत्तरभर सगरे पानिए-पानि देखाइत रहै। बस्ती दिस जे पानि दौड़ल आबि रहल छलै, तकरा धीयापूता सभ हाथ आ बाँहि सँ रोकैत रहै। पानिक धार कने काल धरि बिलमिकेँ जमा होइत रहै आ तकर बाद हाथ आ बाँहिकेँ टपैत आगू बढ़ि जाइक। छौंड़ा सब आगू जा कऽ फेर पानिकेँ घेरै। बान्ह-छेककेँ टपैत पानि फेर आगू बढ़ि जाइक। पानिक ताकतक सोझाँ छौंड़ा सभ हारि नहि मानय चाहैत रहय। पानि खरहू सभक लेल कौतुक आ खेलक वस्तु बनि गेल छलै, लेकिन सियानकेँ आतंकित कऽ रहल छलै।
'बाप रे ! वेग देखै छिही ? ई पानि जुलूम करतै।’- करमान लागल लोक दिस तकैत भल्लू बुढ़बा बजलै। कोसीक उग्र रूपकेँ लोक सभ अनिष्टक आशंका आ आश्चर्यक भाव सँ देखि रहल छल आ अपना-अपना हिसाबेँ टिप्पणी कऽ रहल छल।
बैकू माल खोलि दछिनबरिया बाध लऽ गेलै। थोड़बे कालमे बहुत चरबाह जुटि गेलै। बाढ़ि आबि गेलापर माल-जालक लेल कोन स्थान सुरक्षित हेतै, ओ सभ ताहि दिआ गप्प कऽ रहल छल। मुदा सभक नजरि उत्तर दिस जमल रहै, जेम्हहरसँ पानि आबि रहल छलै। बरखा फेर हुअय लगलै। आब बाढ़ि आबि कऽ रहतै। ओ सभ दुश्चिन्ताक बोझ तर दबल आ बरखामे तितैत चरबाहि करैत रहल। गामपर हल्ला होमय लगलै। एकर मतलब जे घर-आँगनमे पानि ढ़ुकि रहल छलै। ओ सभ मालकेँ गाम दिस रोमलक। आगू बढ़ला पर देखलक पानि बहुत वेगसँ दौड़ल अबैत रहए आ जल्दिए दछिनबरियो बाधकेँ पाटि देतै।
बौकू गाम पहुँचल तऽ देखलक दुआरि-अँगनामे भरि घुट्टी पानि लागि गेल छैक। छपछपाइत गोहालीमे मालकेँ जोड़ि ओ भेलवा वालीकेँ देखय आँगन गेल। साँझ पड़ि रहल छलै। झाँटमे अतिकाल रहलाक कारणे ओकर सौंसे देह भुटकल आ थरथराइत रहै। ओ धोती फेरलक आ चद्दरि ओढ़ि चूल्हि लग बैसि गेल। चूल्हि पर पलसिया मकइक खिचड़ी टभकाबैत रहै। घरमे धुइयाँ औनाइत रहै आ बाहर निकलऽ लेल अहुँछिया काटि रहल छलै। बौकूकेँ बुझेलै जेना कोसी तर मे रहनिहारो धुइयाँ छिऐ जे बाढ़िसँ घेरायल चकभाउर दैत रहैत छैक आ रस्ता नहि भेटला पर पानिमे बिला जाइत छैक। चूल्हि फुकैत-फुकैत पलसिया बेदम भऽ गेल छलै।
'आब की हेतै ?' भेलवा वाली पुछलकै। रद्द-दस्त बंद भऽ गेला सँ ओकर मन नीक भऽ गेल रहै। मगर कमजोरीक कारणे पड़लि छलि।
'आब की हेतै ?' कोनो जवाब नहि भेटला पर ओ फेर पुछलकै।
'जे सबहक हेतै, सैह हेतै, और की हेतै ? अखनि घर छोड़क कोनो बेगरता नहि छैक।’ पलसिया बाप दिस एकटक तकैत सुनि रहल छलै।
'सतबा सब परानीकेँ गोढ़ियारी लऽ गेलै।' भेलवा वालीक स्वरमे उलहन छलै।
'गोढ़िआरिए कोन ऊँच पर छैक।' बौकू खौंझाय गेलै।
'ओतय कटनियाँक डर तऽ नहि ने छैक।' भेलवा वाली फरिछाबैत कहलकै।
'भोर देखल जेतै।' चिंता करैत-करैत बौकूमे चिंतनीय निरपेक्षता आबि गेल छलै।
'पानि बढ़िए रहल छैक।' भेलवा वाली जेना अपनेसँ गप्प करैत बजलै।
आँगनमे आब भरि ठेहुन पानि भऽ गेलै। धीयापूता मचान पर सूति रहलै। तीतयवला सब वस्तुकेँ पलसिया सीक आ मचानपर राखि देलकै। माल-जाल पानि मे ठाढ़ भेल डिरिया रहल छलै। साँप-कीड़ाक बहुत डर रहै।
धार हहाइत रहै। निसबद रातिमे कोसीक गरजब विकराल आ डराओन लागि रहल छलै। ओकर एकपरतार हहासमे एकटा दोसरे सुर-ताल छलै। कखनो धैर्य आ कखनो बेचैनी संगे बौकू ई संगीत सुनि रहल छल। ओ तबाही आ मृत्युक संगीत रहै। ओकर निन्न उड़ि गेल रहै। ओ कखनो बढ़ैत पानिक अंदाज करैत रहय; कखनो आँखि निरारि माल-जालकेँ देखैत रहय। कखनो कान पाथि विनाशकारी हहास सुनैत रहय। ओकरा होइक जेना घर लऽ दऽ कऽ कखनो बैसि जेतै। ओ चेहाय कऽ उठय आ आँखि फाड़ि-फाड़िघरकेँ देखय।
'भागह हौ, बौकू भैया। घर कटि रहल छैक, भागह हौ।' कमल चिकरैत रहै।
बौकूकेँ हूक पैसि गेलै आ समूचा देह थरथराय लगलै। आब ओ कोना की करतै ? कोना सभक जान बचेतै ?
कमलक चिकरब सुनि भेलवा वाली हाकरोस कऽ उठलै—'हौ बाप ! ई घरेमे घेरिकऽ सभक जान मारि देतै। हे भगवान, रच्छा करह। हे कोसी माय, जान बचाबह। तोरा जीवक बदला जीव देबह। हे कोसी महरानी, बचाय लैह।’
बौकूकेँ भेलवा वालीक अगुताइ पर पित्त उठलै। लेकिन लगले भेलवा वाली आ धीयापूताक लेल ओकरा अफसोच आ दुख भेलै। भेलै जेना सभकेँ कन्हा पर लऽ कऽ उड़ि जाइ, ऊपर, बहुत ऊपर आकाशमे ठेकि जाइ आ धार आ समुद्र केँ ठिठुआ देखबैत रही। लेकिन ओकर देह सिहरि उठलैक। भेलै जेना खसि पड़ब।
कटनियाँ अखन ओकरा घरसँ दूर रहै; लेकिन पानि घर ढुकि गेलै। कच्छाछोप पानि भऽ गेलै। पानिमे बहुत वेग रहै। अखन जँ ओ सभ केँ लऽ कऽ निकलै तऽ एहि रेत आ अन्हारमे सभ दहाय-भसिया कऽ मरि जेतै। आब भोरसँ पहिने किछु नहि भऽ सकतै।
बौकूकेँ एको पलक लेल निन्न नहि भेलै। ओ दुनू ठेंगहुन केँ पजियाठने ओहि पर माथ टेकने बैसल रहय। उकस-पाकस आ कनेको हिलडोल करबाक कोनो इच्छा नहि भेलै। सभतरि मृत्यु आ विनाशक हाहाकार पसरल छलै। धीरे-धीरे ओकर आत्मामे विषण्ण शून्यता भरैत गेलै। मन पर उद्वेगरहित संवेदनशून्य शांति पसरि गेलै। आब ओकरा कोनो चीजक चिंता नहि रहलै \ भेलवा वाली, धीयापूता, मालजाल, कोसीक विध्वंस सभटा अर्थहीन भऽ गेलै। ओकर मोह टूटि गेल रहै। ओ कठोर पत्थर जकाँ अचल बैसल रहय।
बरखा रूकि गेलै। आसमान साफ भऽ गेलै। किरिन फुटलै। ओकर फुटैत लाली देखि भेलवा वालीकेँ बुझेलै जेना कोसी महारानी ओकर गोहारि सुनि लेलकइ। ओ आशा आ उत्साहसँ भरि गेलि। ओ बौकू केँ हाक पाड़लक। बौकू कोनो उत्तर नहि देलकै जेना ओ अगम—अथाह पानिमे डूबल हो आ हाक सुनि ऊपर हेबाक जतन कऽ रहल हो। भेलवा वालीक दोसर हाक सँ बौकूमे स्पन्दन भेलै। ओ अकचकाइत मूड़ी उठौलक आ भकुआयल सन सभ चीजकेँ चिन्हबाक आ स्मरण करबाक प्रयास करय लागल।
बनैत - बिगड़ैत
“हाह। हाह”।
टोकारा आ थपड़ी सँ नै उड़ै छै तऽ माला कार कौवा केँ सरापय लागै छै – “बज्जर खसौ, भागबो ने करै छै”।
कौवा कखनियें सँ ने काँव-काँव के टाहि लगेने छै। कौवाक टाहि सँ मालाक कलेजा धक सिन उठै छै। संतान सब परदेस रहै छै। नै जानि ककरा की भेलै! ने चिट्ठी-पतरी दै छै, ने कहियो खोज-पुछारि करै छै। कते दिन भऽ गेलै। कुशल समाचार लय जी औनाइत रहै छै। लेकिन ओकरा सब लेखे धन सन। माय-बाप मरलै की जीलै तै सँ कोनो मतलब नै।
“हे भगवान, तूहीं रच्छा करिहक। हाह। हाह”।– माला कौवा संगे मनक शंका आ बलाय भगाबय चाहै छै।
“धू, छोड़ू ने। कथी मे लागल छी। ओ अपन बेगरतेँ कर्रइत छै। अहाँक की लइए’- सत्तो बुझबै छै।
लेकिन मालाक मन नै मानै छै। अनिष्टक आशंका सँ डरायल ओ और जोर-जोर सँ होहकारा दै छै आ थपड़ी पाड़ै छै।
माला सब बेर एहिना करै छै। सत्तो लाख बुझेलक, बात भीतर जाइते नै छै। कतेक मामला मे तऽ सत्तो टोकितो नै छै। कोय परदेस जाय लागल तऽ माला लोटा मे पानि भरि देहरी पर राखि देलक। जाइ काल कोय छीक देलक तऽ गेनिहार केँ कनी काल रोकने रहल। अइ सब सँ माला केँ संतोख होइ छै, तैं सत्तो नै टोकै छै। ओकरा होइ छै टोकला सँ की फैदा? ई सब तऽ मालाक खून मे मिल गेल छै। संस्कार बनि गेल छै।
सत्तो केँ छगुन्ता होइ छै। यैह माला कहियो अपन बेटा-पुतौह आ पोती सँ तंग भऽ कऽ चाहैत रहै जे ओ सब कखैन ने चैल जाय। रटना लागल रहै जे मोटरी नीक, बच्चा नै नीक। सैह माला अखैन संतान खातिर कते चिंतित छै।
सत्तो सोचै अय अइ मे मालाक गलती नै छै। माला केँ सख लागले रैह गेलै जे नेहाय कऽ आयल छी तऽ पुतौह परैस कऽ खाइ ले देत आकि कहियो केशे झाड़ि देत या गोड़े हाथ दाबि देत। पोती केँ टांगैत-टांगैत तऽ छातीक हाड़ दुखाइत रहै। अपन कोखिक जनमल बेटो कहियो ई नै पुछलकै- माय केना छें?
कौवा उड़बै ले माला कखनो हाथ चमकाबैत अछि, कखनो मुँह चमकाबैत अछि। मगर ओकर धमकी-चमकी के कौवा पर कोनो असर नै भेलै। ओ ओहिना काँव-काँव करिते छै।
कौवाक टाहि सँ सत्तोक जी सेहो धक रहि जाइ छै। मन मे तरह-तरह के शंका आ डर पैस जाइ छै। लेकिन ओ कहुना अपना केँ बुझा लैत अछि। सत्तो संगे ई सब बेर होइ छै। कोनो अपसगुन भेला पर आशंकित भऽ जाइत अछि। आशंका केँ बुधि आ तर्क सँ ठेल कऽ बाहर करैक कोशिश करैत अछि। कखनो संस्कारक फान मे लटपटाइत अछि। कखनो सम्हरैत अछि। फेर फँसैत अछि। फेर छुटैत अछि। ई सब बड़ी काल चलैत रहै छै।
कार कौवा तेना एकपरतार टाहि लगेने जा रहल छै जे कान में झड़ पड़य लागलै।
“देखियौ, ई कौवा तऽ केना-केना ने करै छै। नीक नै लागैए”।– माला व्याकुल भऽ जाइ छै।
“ई अहाँक मनक भरम छी”।– सत्तो कहै छै आ एकटा रोड़ी जुमा कऽ कौवा दिस फेकै छै।
कौवा उड़ि गेलै। उड़ल जाइत कौवा केँ सुना कऽ माला कहै छै- “हम ककरो कुइछ नै बिगाड़लिऐ अय। जा, चैल जा”।
कौवा आगू वला छत पर बैठ रहै छै आ फेर कर्रय लागै छै।
सत्तो केँ मोन पड़ै छै एक दिन बड़ी राति केँ माला ओकरा जगेलकै- “सुनै छिऐ? कुत्ता बड़ी काल सँ कानै छै। हमर जी छन-छन करैत अछि”।
सत्तो अकानलक। ठीके ढेरी कुत्ता कानैत रहै। आशंका सँ ओकरो मन सिहरि गेलै।
लेकिन ओ बाजल- “अरे, भूख सँ कानैत हेतै। देखै नै छिऐ आइ काल्हि कोय एक्को कर दै छै।
“भूख सँ एगो दूगो ने कानितिऐ, आकि सब कानितिऐ”?- सत्तोक तर्क मानै ले माला तैयार नै रहै।
“और सब केँ देखाउँस लागल हेतै”।– सत्तो दोसर तर्क देलकै।
माला केँ सतोक तर्क नै सोहेलै। ओकरा झुझुआयल सन चुप बैठल देख सत्तो फेर बुझेलकै- “देखै नै छिऐ विदाइ बेर मे की होइ छै। जहाँ एगो मौगी कानल कि सभक आँखि मे नोर आबि गेल”।
माला कने काल चुप रहल। फेर मूल बात पकड़ैत बाजल- “पहिने तऽ सब करे कर दैत रहै तबो किए कानैत रहै”?
“कोनो कुत्ते मैर गेल हेतै, तकरे सोग मे कानैत हैत”। - सत्तोक बात सँ माला संतुष्ट तऽ नै भेल, मगर कुत्तो सब कते कनितय। एगो चुप भेल। दूगो चुप भेल। आस्ते-आस्ते कानब घटैत गेलै। फेर गोटेक आध कुत्ताक कानब कखनो कऽ सुनाइ। बाद मे ओहो बन्न भऽ गेलै। माला आ सत्तो सेहो कखनो निन्न पड़ि गेल।
माला केँ कौवाक गुनधुन मे पड़ल देख सत्तो पुछै छै- “अहाँ कौवाक बोली बुझै छिऐ”?
माला कने काल बात केँ ताड़ैत रहल। बातक मरम बूझि खुखुवा उठल- “दुनियांक काबिल अहीं टा तऽ छी। अहाँ सन बुझक्कड़ और कोय छै”!
मालाक कटाह बोल सँ सत्तो केँ चोट लागलै। ओ चुप आ उदास भऽ गेल। ओकरा लागलै जे चीज पसिन नै पड़ै छै, तकरा प्रति लोग निष्ठुर आ अन्यायी भऽ जाइत अछि। कारी रंग आ टाँस आवाजक चलते कौवा केँ अशुभ बना देलक।
सत्तो केँ अपन नौ मासक पोती मोन पड़ै छै- मुनियां। कौवा देख मुनियां चहैक उठै। आह-आह कहि ओकरा बोलाबै। मुनियां कानय लागै तऽ सत्तो कौवे केँ हाक दै- “कोने गेलही रे कौवा ऽ ऽ? मुनियाक कौवा ऽ ऽ ? कोने गेलही ई ई “? ई सुनिते मुनियां चुप भऽ जाइ आ मूड़ी घुमा-घुमा कौवा केँ ताकय लागै।
कौवा बिलायल जाइ छै। कुइछ दिनक बाद तऽ साफे अलोपित भऽ जेतै। अखैन ई बात ने माला जानै छै, ने मुनियां। कौवा मुनियांक जिनगी मे समा गेल छै। मुनियां केँ बेर-बेर कौवा मोन पड़ैत रहतै, दादा मोन पड़ैत रहतै। ने ओ कौवा केँ बिसैर सकैत अछि, ने दादा केँ। मुनियां कौवा केँ ताकैत रहत, दादा केँ ताकैत रहत। कहियो ने कौवा रहतै, ने दादा रहतै।
बात
हरेक बातक पाछू कोनो ने कोनो खिस्सा होइत छैक।लेकिन सब बात खिस्सा नहि होइत अछि। जे बात हम कहब से नहि जानि खिस्सा हैत कि नहि, तखन ई गप्प अबस्स जे खिस्सो मे कोनो ने कोनो बाते होइत छैक आ हमहूँ बाते कहब। सुनलाक बाद भऽ सकैत अछि अहाँ कही धुर ईहो कोनो बात भेलै !
अहाँ लेल ई कोनो बात नहि हो, मगर हमरा लेल तऽ बड़ भारी बात भऽ गेल रहय। जँ साँच कही तऽ ओहि बात सँ हम बहुत डेराय गेल रही। बात की रहत। कोनो बात नहि। बिन बातक बात। लेकिन ओ तेहन तूल पकड़ि लेलक जे ओकरा सँ पिंड छोड़ायब मोसकिल भऽ गेल आ हमरा अदंक समाय गेल।
कहियो काल एना होइत छैक, जे अनचोक्के अहाँ कोनो एहन बात बोलि दैत छी जइमे फँसि जाइ छी। फँसबाक अंदाज जँ पहिनहि सँ रहैत तँ अहाँ ओहन बात किन्नहुँ नहि बजितहुँ। हमरो संग एहिना भेल।
हम घरसँ खुशी-खुशी तरकारी बेसाहय निकलल छलहुँ। साँझ पड़ैत रहैक। दिनमे बरखा भेला सँ मौसम सोहाओन लगैत रहैक। हम नेयारने रही जे झटपट तरकारी कीनि कऽ घर घूरि जायब। मगर भाग्य देखू; या भाग्य की, परिस्थितिक संजोग कहू। ओहि दिन घर घुरबामे हमरा बड्ड देरी भऽ गेल। देरी जे भेल, से भेल। देरी तऽ कतेको बेर कतेको मामला मे भऽ जाइत अछि। रच्छ रहल जे हम बचि गेलहुँ। नहि तऽ पिटा जइतहुँ या हमर हत्यो भऽ सकैत रहय।
तऽ भेल ई जे हम साइकिलसँ जाइत रही। सब्जी बजार आबि गेल तऽ साइकिल पर सँ उतरि गेलहुँ। बरखा भेलासँ बजारमे थाले-थाल रहैक। थालमे चप्पल फँसि जाइ। साइकिल सम्हारैत, सम्हरि-सम्हरि पयर रखैत आ लोकबेद सँ बचैत जखन हम नेबोवला लग पहुँचल रही तऽ देखलहुँ जे ओ एकटा आदमीसँ बकझक कऽ रहल अछि।
नेबोवला चौदह-पन्द्रह सालक गोर आ सुन्दर लड़का छल। ओ बीच सड़क पर ठाढ़ छल। नीचाँ छिट्टामे एक दिस धनिया पत्ताक छोट-छोट मुठ्ठी आ दोसर दिस नेबो राखल छलैक। बगलमे आठ-नौ सालक एकटा आर लड़का रहैक जे ओही लड़काक संगी लगैत रहैक आ चुपचाप ठाढ़ रहैक। लड़का जकरा संग बकझक करैत रहैक से चालीस-पचास सालक अधेड़ आदमी छल। ओकर हाथमे फाइल रहैक आ किछु छोट-मोट सामान, जेना नेबो, गमछी इत्यादि।
लड़का कोन बात लऽ कऽ बकझक कऽ रहल अछि, ताहि पर ध्यान नहि दऽ कऽ हम ओकरा दू-तीन बेर जल्दी-जल्दी टोकलिऐक आ नेबोक भाव पुछलिऐक। लड़का हमरा देखलक, मुदा किछु बाजल नहि। हमरा तखने ओतयसँ चलि देबाक चाही छल। बाजारमे नेबोक कमी नहि रहैक। कतहु लऽ सकैत रही। लेकिन से भेल नहि। हम ओत्तहि ठमकल रहलहुँ। जानि ने किएक। आब सोचैत छी तऽ लगैत आछि आदमीक अन्दर जे जन्मजात जिज्ञासा होइत अछि, भरिसक तकरे कारणे ठमकि गेल होयब। फेर अपन एहि सोचलहा पर संदेह हुअय लगैत अछि। ई कोनो जरूरी नहि जे हम ओतए जिज्ञासावश रूकि गेल होइ। दोसरो कारण भऽ सकैत अछि। कैक बेर एहन होइत छैक जे ककरो वाक् चातुरी, ककरो सुधंगपनी, ककरो सुन्दरतासँ अहाँ बन्हा जाइत छी। साइत हमरो ओहि लड़काक सुन्दरता बान्हि लेने छल। ओकर चेहरा पर परेशानी आ चिन्ताक भाव रहै। भरिसक हम ओतय सहानुभूतिवश बिलमि गेल रही।
ओहि आदमीकेँ हम गौरसँ देखल आ ओकर गप्प सुनय लगलहुँ।आदमी ओहि लड़काकेँ कहि रहल छल—तोंही लेने छें।
- लेलिऐ तऽ कहाँ छै ? छै हमरा लग ?—लड़का बाजल।
- कतौ राखि देने हेबही।
- कतय राखबै ? एतय छै कोय हमर?
- नइँ छै तऽ कतय चलि गेलै ? बोल कतय छै ?
- हम लेलिऐ जे कहबह कतय छै ?
- नइँ लेलही तऽ ओतयसँ भागि किऐ एलही ?
- भागबै किऐ ? हम तऽ एतहि रहिऐ।
बस, इएह ओ क्षण रहै जखन हम बातकेँ लोकि लेने छलहुँ। गप्प तऽ बुझा गेल रहए, मुदा मामला पूरा स्पष्ट नहि भेल। पुछलिऐ भाइसाहेब, बात की छिऐ?
ओ आदमी बाजल- अरे, ई लड़का अखने दोसर ठाम छल। एकरा सँ हम नेबो किनलिऐ आ जेबी सँ पाइ निकाल ऽ लेल छत्ता नीचा राखि देलिऐ। पाइ दऽ कऽ हम चल गेलिऐ। छत्ता निच्चे रहि गेलै। तुरन्ते मन पड़ल आ घुरलिऐ तऽ देखै छी ई ओतयसँ गायब।
ओहि आदमीक गप्प सुनि कऽ हम कहलिऐ — ई सभ तऽ एहिना घूमि-घूमि कऽ सामान बेचैत अछि। हम तऽ रोजे देखै छिऐ। अहाँक छत्ता कतहु दोसर ठाम छूटल होयत।
ओ आदमी हमर गप्प सुनैत रहल आ जहिना हम चुप भेलहुँ, तहिना ओ ओहि लड़का सँ छत्ता मांगब शुरू कऽ देलक। जँ हम चाहितहुँ तऽ एहि लफड़ा सँ तखनहुँ छुट्टी छोड़ा लैतहुँ। की रहै ! ओतय सँ चलि दैतहुँ आ सामान किनैत घर घूरि अबितहुँ। लेकिन हमरो जिद देखू। हम नेबो कीनय चाहैत रही आ ओही लड़कासँ कीनय चाहैत रही। हमरा होइत रहय जे बस आब मामला खतमे होइ बला छैक। मगर ओ आदमी छत्ता मंगैत जा रहल छल आ ओ लड़का अपन दोकनदारी रोकने नासकार करैत जा रहल छल। आदमी लड़का पर दबाव बढ़ेने जाइत रहय। अनाड़ी आ अनुभवहीन हेबाक कारणे लड़काकेँ बुझाइत नहि रहै जे ओ की करय। ओ नचार आ बेबस देखाइत रहय।
ओहि आदमीक लक्षण हमरा नीक नहि बुझाइत रहय्। ओ नीक लोक नहि बुझाइत रहय। ओहि आदमी मे ने तऽ छत्ता हरेबाक दुख रहैक, ने ओहि लड़का पर तामस। ओकर चेहरा पर चलाकी आ धूर्त्तताक भाव रहैक आ स्वरमे कठोरता रहैक। फेर छत्ता भुइयाँ पर रखबाक ओकर बातो हमरा जँचल नहि रहय। निच्चाँ मे ततेक थाल रहैक जे कोनो चीज रखबाक बात सोचल नहि जा सकैत रहय।
देर हेबाक कारणे हम खौंझा गेल रही। हमर धैरज टूटि गेल। बमकि उठलहुँ — देखू, एकरा कमजोर बूझि केँ ठकिऔक नहि।
- हम एकरा ठकै छिऐ ? – ओ आदमी विरोध करैत बाजल — अहाँ कोना बुझै छिऐ जे हम एकरा ठकि रहल छिऐ ?
- हम ई नहि कहैत छी जे अहाँ एकरा ठकि रहल छिऐ। लेकिन जँ अहाँ एहन सोचैत होइ तऽ ई ठीक बात नहि अछि। ई सभ सीधा – साधा आ गरीब लोक अछि आ एहि सभक धंधा चोरी नहि छैक।
- आ हमर धंधा ठकपनी अछि ?
- हम कहाँ कहैत छी जे अहाँक धंधा ठकैती अछि।
- तखन ?
- तखन की ? किछु नहि।
- तऽ अहाँ बीचमे पड़ैत किएक छी ?
- हम बीचमे किएक पड़ब। हम तऽ एतने कहैत छी जे अहाँ एकरा तंग नहि करियौ।
- ई अहाँक के होयत ?
- हमर ? हमर के होयत ! कोय ने।
- तऽ अहाँ किएक नाक घोसियाबै छी ?
- एहि लेल जे हम एतय छी आ ई सब हमरा सोझा भऽ रहल अछि। अहाँ बाहरसँ आबि कऽ एकरा तंग कऽ रहल छिऐक। कतय घर भेल ?
- हम बाहरक छी ? कोना बुझलिऐ हम अनतौका छी ?
- किऐक तऽ अहाँ एतुक्का भाषा नहि बजैत छी।
- हम एत्तहि रहैत छी।
- कतऽ ? कोन ठाम ?
- चाँदनी चौक। चलू हमरा संग। देखा दैत छी।
- देखबाक कोनो बेगरता नहि अछि।
- नहि-नहि, चलू देखाइए दैत छी।
- हम देखि कऽ की करब ?
- देखऽ तऽ अहाँकेँ पड़बे करत – कहि कऽ ओ हमर साइकिल पकड़ि लेलक। हमरा लागल डेरा लऽ जा कऽ ओ अपन संगी सभसँ पिटबायत आ संगमे जे किछु अछि, छीनि लेत। विरोध कयला पर ओ हमर हत्यो कऽ सकैत अछि। ई सभ सोचि कऽ हम डरि गेलहुँ। मुदा ओ डर क्षणिक छल। लोक जखन संकट मे पड़ि जाइत अछि तऽ ओकर डर भागि जाइत छैक आ ओकरामे साहसक संचार होइत छैक। हमरो हिम्मत आबि गेल। हम कड़कि कऽ कहलिऐक—हमरा कोन गरज अछि घर देखबा के ?
- तऽ बीचमे टपकलहुँ किएक ?
- एहि लेल जे तों ओकरा संग अन्याय करैत छलह।
- न्याय करैत रही कि अन्याय, तों दखल दै बला के ?
- अच्छा ! तों ठकबहक, अपराध करबहक आ लोक चुप रहतैक ?
- ठीक छै। चलह घर देखि लएह। पता चलि जेतह, हम के छी !
- तोहर घर देखै के हमरा समय नहि अछि; ने कोनो बेगरता। साइकिल छोड़ह आ अपन रस्ता धरह।
- आ हमर छत्ता के देतै ?
- छत्ता हम देबह?
- तब के देतै ? तों रोकलहक किऐ ?
- ठीक छै, रोकलियह। लेकिन पकड़ने तऽ नहि छियह। छत्ता लेने छह, तऽ जा वसूलह गय। दिमाग नहि चाटह।
फेर पता नहि ओ की सोचलक। साइकिल छोड़ि देलक। कहुना जान छूटल। हम आगू बढ़ि गेलहुँ। हमरा लागल ओ घूरि कऽ लड़का लग जायत। लेकिन आश्चर्य! ओ लड़का लग नहि गेल। कने आगू जा एकटा तरकारी बालासँ जखन हंम मोल-मोलाय करैत रही तऽ देखलहुँ ओ हमरे दिस आबि रहल अछि। हमर जी सन्न सिन रहि गेल। पता नहि आब ओ की करय आबि रहल अछि। हम ओकरा पर नजर टिकेलहुँ। ओहो हमरे ठिकिऔने रहय। हमर मोनमे आशंका आ भय समा गेल। हम चौचंक भेल ओकरा देखलहुँ। ओकर चेहरा पर हमरा कठोरता आ घृणाक भाव देखायल। लागल हमरा जल्दीसँ निकलि जेबाक चाही।
बजार अबैत काल हम कतेक प्रसन्न रही ! आब घर घुरैत काल खिन्न आ दुखी छी। बात दुख के हो या सुख के, गुजरिए जाइत अछि। आदमी सुखबिसरि जाइत अछि, दुख मोन रहैत छैक। हमहुँ ओहि आदमी केँ बिसरि नहि पबैत छी। जखन कखनहुँ ओकर मोन पड़ैत अछि तऽ उदास आ खिन्न भऽ जाइत छी आ सोचय लगैत छी, की ओ ठीके ठक रहय ?
रंभा
एकटा सुंदर दीब स्त्री हमरे दिस आइब रहल ऐछ। हमर दुनू कात जगह छै। ऊ तकरे ठिकिएने आइब रहल ऐछ। ओकर गरहैन, ओकर रंग, ओकर कोमलता, माधुर्य आ स्मित अदभुत छै। स्त्री इंदरासनक परी लागै छै। की नाम हेतै ? उर्वशी, मेनका या रंभा ? पता नै। सुंदरताक देवी एहने होइत हेतै, जकरा एला सऽ इजोत भऽ जाइ छै आ हँसला पर फूल झड़ै छै। कोन फूल झड़ैत हेतै ? चम्पा-चमेली ? एहने कोनो फूल हेतै, जकर गंध सऽ लोग माइत जाइत हएत।
से डिब्बा मे बैठल लोग ओइ रंभाक रूप पर लोभा गेल। ओकर स्वागत मे हम एक कात घुसैक गेलौं आ हाथक इशारा सऽ बैठ जेबाक अनुरोध केलिऐ। ऊ बैठबे कएल कि एकटा नौ-दस सालक लड़का ओकरा आगू मे आइब कय ठाढ़ भऽ गेलै। ऊ हमरा दिस घुसैक गेल आ ओकरा बामा कात बैठा लेलकै। ओकर सुंदरताक जादू तेहन रहै जे ओइ लड़का पर और ध्यान नै गेल। सबहक नजैर ओइ स्त्री पर रहै।
ओइ सुंदरीक आगमन सऽ चतुर्दिक उल्लास पसैर गेल रहै, बुझाइ जेना वसंतोत्सव हो-प्रेमक विराट इजोत सऽ जगमगाइत। होइ ओकरा देखते रही। उत्सव कखनो खतम नै हो। हम जैहना ओकरा दिस ताकिऐ, ऊ बिहुँस दैत रहय। ओकर चेहरा पर मंद मधुर हास लहर जकाँ आबैत रहै। भुवनमोहनी मुस्की।
तखनिए कुइछ भेलै। ऊ लड़का दिस घुमल—ओइ लड़का पर आब फेर हमर ध्यान गेल जे ओकर संग लागल आयल रहै आ बामा कात बैठल रहै। नौ-दस सालक ऊ लड़का देखै-सुनै मे एकदम साधारण रहै। सुखायल सन। चमड़ी पर कोनो चमक नै। गुमसुम बैठल। हमरा भेल लड़का ओकर नौकर हेतै। लेकिन नै। ऊ ओकर बेटा रहै।
हमरा बिसबास नै होइत रहय जे इ ओकर बेटा हेतै। दुनू मे कोनो मिलान नै रहै। ने मुँह मिलैत रहै, ने रंग मिलैत रहै आ ने देहे-दशा एक रहै।
भऽ सकैए लड़का बाप पर गेल होइ। ज ऊ बाप पर गेल हैतै तऽ ओकर बाप केहनो नै हेतै। एतेक सुंदर स्त्री कय एहन घरवला ! ओइ स्त्री लय हमरा अपसोच भेल। संदेह भेल-ऊ घरवाला सऽ प्रेम करैत हेतै ? तन आ मन दुनू मिलैत हो, तबे प्रेम होइ छै। कोनो एकटा भेटला पर लोग भटकैत रहैत ऐछ। उहो भटकैत हएत ?
ओकरा सऽ रूइक-रूइक कऽ गप होइत रहल। हम पुछिऐ आ ऊ जवाब दिअय। ऊ कुइछ नै पुछलक। ई बात हमरा खटकल। भेल जे ओकरा रूप के घमंड छै। लेकिन एकटा बात और रहै। ओकर-हमर उमेर मिलानी मे नै रहै। दस-पनरह साल के फरक रहल हेतै। एना मे ऊ हमरा किए चाहत ?
लेकिन तब ओकर ओइ हँसीक की मतलब ? आँइख मे झिलमिलाइत सिनेह ककरा लेल ? हम ओकर मुँह दिस ताकलिए जेना ओकर चेहरा सबटा भेद नुकेने हो। हमरा पर नजैर पैड़ते मुस्की सऽ ओकर चेहरा खिल गेलै। खिलैत गुलाब सन ओकर चेहरा देखै लय हम नव-नव सवाल सोची। हमर सवालक कोनो अंत नै रहय, ने ओकर चेहरा सऽ फूटैत मोहनी मुस्कीक कोनो सीमा।
कतेको सुंदरी अपन रूपजाल मे फँसल लोग कय देख आनंदित होइतरहैत ऐछ। रूपक जादू देखब ओकर खेल होइ छै। ई रंभा हमरा संग वएह खेल तऽ ने खेला रहल ऐछ ? पता नै की रहस्य छै ! कतेक बेर स्त्रीक असली भावना बूझब बड़ कठिन होइ छै।
सुंदरी माय सऽ भेंट करय हाजीपुर गेल रहय। आब कटिहार जा रहल ऐछ। कटिहार सौसराइर छै। घरवाला दोकान करै छै।
''कटिहार मे और के-के ऐछ ?''- पुछलिऐ। कहलक ''बस ससुर ऐछ, अही सन। फौज मे रहय। आब रिटायर कऽ गेलै।''
ओकर जवाब सऽ हमरा धक्का लागल। हम ओकर ससुर नै हुअय चाहैत रही। ई बात ऊ किए कहलक ? हम देखै मे ओकर ससुरे सन छिऐ ? ओकर ससुर आ हमर सोभाव मिलै छै ? या उमेर एक छै ? नै जाइन ओकर इशारा कोन दिस रहै।
ओकर एगो और गप सऽ हमरा निराशा भेल। ऊ कहलक – ''हम कतेक बेर असकरे जाइ छी। अही सन कोय-ने-कोय भेट जाइ-ए। पते नै चलै-ए रस्ता केना कैट गेल।''
हमर बेगरता बस सफरे धैर छै। तकर बाद ऊ हमरा बिसैर जायत। हमरा मे कोन चीज छै, जकर ऊ हियास करत? ऊ टिकली ऐछ, उइड़ कऽ एतय, उइड़ कऽ ओतय। रूपवती क निष्ठास ओहुना संदिग्ध होइ छै।
देखलिए ऊ फुसफुसा कय बेटा कय कुइछ कहैत रहै। बेटा नै-नै करैत रहै। पुछलिए – “की भेलै ?” कहलक- “एकरा बाहर के कोनो चीज खाय लय नै दै छिऐ आ संग मे छै, से खाय नै चाहै-ए।”
“बाहर के तऽ हमहूं कुइछ नै खाय छी। भोर सऽ एक्को दाना मुँह मे नै गेल ऐछ। आब घरे जा कऽ खायब।” हम कहलिऐ।
“हमरा लग खाय वला ढ़ेरी चीज छै। निकाइल कय दै छी।'' ऊ बाजल। “नै-नै। की हैतै ? छोइड़ दिऔ।” हम मना केलिऐ। मगर ऊ नै मानलक। कहलक –''बुझबै जे एगो बेटी भेटल रहय।''
ऊ ऊपर सऽ झोड़ा उतारलक आ अखबार पर पूड़ी, भुजिया आ अँचार सजबय लागल। ऊ ततेक पूड़ी देने जाइत रहै जे हम ओकर हाथ पकैड़ लेलिऐ। ऊ पूड़ी देनाय छोइड़ देलक आ पलैट कय हमरा दिस ताकलक। फेर पाइन दैत कहलक – “खा लिअ।''
''बाद मे खा लेब।'' कहैत हम अखबार लपेट कय एक कात राइख देलिए। ओकर सिनेह सऽ मन भीज गेल। बेटी ! ओह ! ज ठीके ऊ हमर बेटी होइत !
आब ऊ उतैर जायत। बरौनी आइब रहल छै। ऊपर सऽ सामान उतारय लागल-ए। ओकर एकटा सामान हम उठा लै छिऐ। उतरैत काल कहै-ए “कहियो कटिहार आबी तऽ घर पर जरूर आयब।''
हमरा कुइछ बाइज नै होइ-ए। फेर कलेजा मे जेना हूक उठै-ए। कहै छिऐ- “पता नै अहाँ कय आब देख सकब कि नै।''
ऊ हमरा आश्चअर्य सऽ देखै-ए। हम सब प्लेएट फार्म पर उतैर गेल छी।
पएर छूबै लय ओ कने झुकै-ए। फेर नै जाइन किए अपना कय रोइक लै-ए आ सीधा भऽ जाइ-ए।
ओकर ई बेबहार हमरा नै बुझाइ-ए। हम बिरान छिऐ तैं की ? आकि हमरा पर अश्रद्धा भऽ गेलै तैं गोड़ नै लागलक ? लेकिन हम तऽ एहन कोनो बात नै कहलिऐ, ने एहन कुइछ केलिऐ जे अनसोहाँत हो। तब ऊ एना किए केलक ? जे होइ; मगर ओकर गोड़ नै लागब एक तरहें नीको लागल।
हम ओकर सामान पकड़ा देलिऐ। ऊ विदा भऽ गेल। हम ओकरा जाइत देखैत रहलिऐ। सीढ़ी लग पहुँच कय ऊ ठाढ़ भऽ गेल आ घुइम कय हमरा देखलक। हम हाथ हिलेलिऐ। उहो हिलेलक।

हमर गाम
बसंत रितु बीत गेल अछि। गरमी धबल जाइत छै। लेकिन भोरमे आ साँझमे शीतल आ सोहाओन बसात मंद-मंद चलैत रहैत छै तऽ लगैत छै बसंत अखन गेल नहि अछि, विदा होइत-होइत अपन झलक देखा रहल अछि।
एकटा एहने साँझ केँ हम गाम जा रहल छी। सुरूज एखन डूबल नहि छै। बुझाइत छै आध कोस जाइत-जाइत छिप जेतै। अखनुका रौदमे धाह नहि छै। सुरूज इजोतक विराट पिण्ड भरि लगैत छै, तापक प्रचंडतासँ रहित।
हमर गाम सुपौलसँ डेढ़ कोस पच्छिम कोसी बान्हक भीतर अछि। आरि-धूर, बालु आ धार टपय पड़ैत छैक; तइँ हमर गाम धरि कोनो सवारी नहि जाइत अछि। पाँव-पैदल। दोसर कोनो उपाय नहि। हिस्सक छूटि गेलासँ आब गाम जायब अबूह बुझाइत अछि। कोनो टंटा ठाढ़ भऽगेल तखने हम जाइत छी। नहि तऽ बाल-बच्चा जाइत अछि, पत्नी जाइ छथि। आइ दू सालक बाद हम जा रहल छी। दू बर्ख पहिनो जमीनक ओझरी रहय आ आइ फेर वैह स्थिति अछि।
गामक झंझट कहियो खतम नहि होइत अछि। हेबो नहि करत। सभ दिन किछु ने किछु लागले रहत। आइ क्यो जमीन धकिया लेलक तऽ काल्हि क्यो खढ़ काटि लेलक, परसू क्यो धान घेरि लेलक। एहि सभसँ हम कहियो पार नहि पाबि सकब। आइ धरि क्यो नहि पाबि सकल अछि। ई संसार एहिना चलैत आबि रहल छै। एहिना चलैत रहत। स्वार्थक क्षुद्रतामे डूबल। नाना प्रकारक छल-प्रपंच करैत, कखनो हँसैत, कखनो कनैत।
अनन्त विस्तारमे पसरल सूर्यक प्रकाशमे भासमान होइत ई पृथ्वीे अपन अनेकरूपता सँ हमर चित्तकेँ आकृष्ट करैत अछि। ग्राम्य दृश्यावलीक सुन्दरता हमर आत्मा केँ मुदित करैत अछि। किन्तु थोड़बे कालक लेल। मन भटकि कऽ अस्तप्राय सूर्य दिस चल जाइत अछि। गामक झमेलमे ओझराय लगैत अछि।
कोसीक पुबरिया बान्ह आबि गेल। बान्ह जे अपना भीतर लाखक लाख लोककेँ घेरि कऽ अहुँछिया कटबैत अछि। बान्ह पर एक पल ठाढ़ भऽ कऽ हम पच्छिम भर नजरि खिरबैत छी। दूर-दूर तक कोनो बस्ती नहि। कोनो गाछ नहि। खाली माल-जालक खूरसँ उड़ैत धूरा। बान्ह पर सँ हमर गाम नहि देखाइत अछि। गामक काली मंदिर देखाइत अछि। मंदिर आइ डेढ़-दू सय बर्ष सँ स्थिर अछि। अस्थिर अछि बान्ह परसँ मंदिर धरिक रस्ता। कोसी कोनो चीजकेँ थिर नहि रहय दैत छै। रस्ता-पेरा, आरि-धूर, खेत-पथार, घर-दुआर, लोक-वेद डगराक बैगन जकाँ गड़कैत रहैत अछि।
बान्ह पर पहुँचिते चिंता होइत अछि। कोन बाटे-जायब ? घाट कोन ठाम छै? नाह चलिते छै कि बंद भऽ गेलै ? बन्द भऽ गेलै तऽ कोन ठाम पार होयब? रस्ता हियासैत छी। दूर दू गोटय जा रहल छै। ओ दुनू निश्चिते धारक ओहि पार जायत। धारक एहि पार कोनो बस्ती नहि छै। हम ओहि दुनूक अनुगमन करय लगैत छी। चालि तेज भऽ गेल अछि। ध्यान झलफलाइत साँझ पर अछि।
धार लग पहुँचि कऽ ओ दुनू अढ़ ताकि लेलक अछि। नाह नहि छै। दू-तीन टा भैंस अखने टपि कऽ ओहि पार पहुँचल छै। पानि देखि कऽ हम अटकर लगा रहल छी जे कपड़ा खोलय पड़त कि नहि।
'कपड़ा-तपड़ा खोलह।'- बगलसँ आबि कऽ सिबननन कहैत अछि आ एकटा पुरान मैल तौलिया हमरा दिस बढ़बैत अछि। अपन धोती ओ तेना कऽ समेटि लैत अछि जे बुझाइत छै जेना ओ बुट्टा पहिरने हो। जेना-जेना पानि बढ़ैत छै, तेना-तेना हम तौलिया ऊपर उठौने जाइत छी। सिबननन आगू अछि तइँ हम नि:संकोच तौलिया उठा कऽ नांगट भऽ जाइत छी।
आब कने और आगू जा कऽ सटले-सटल तीन टा गाम छै – नरहैया, कदमटोल आ तकर पच्छिम हमर गाम मेनाही। हमरा पियास लागि गेल अछि आ हम ककरो ओहिठाम पानि पीबि लेबऽ चाहैत छी। मुदा सिबननन कहैत अछि- 'चलह, रामसरन ओतऽ पिबिहह। ' पता नहि कोन बात छै। रामसरन कनेक सुभ्यस्त अछि। कहियो सरपंच रहय। मुदा ओकर नाम सुनितहि हमरा पन्द्रह मन धान मोन पड़ि जाइत अछि जे ओकर पिता हमर पितासँ कर्ज लेने रहय आ कहियो घुरेलक नहि।
सिबननन एहि ठामसँ फुटि जायत; उत्तर चल जायत, जतय पछिला साल उपटि कऽ बसल अछि। मेनाहीक लोक कटनियाक कारणे चारि ठाम छिड़िया गेल छै। सिबनन अपने दहियारी करैत अछि आ धीया-पूता खेती करैत छै; दिल्ली-पंजाब कमाइत छै। सिबननन हमर किछु खेत बटिया करैत अछि। ओही मे सँ एकटा कोलाक गहूम कमल घेरि लेने छै। तीस साल पहिने ई कोला हमरा बदलेन मे भेटल रहय। कमलक आधा हिस्सेदार बासदेव ई बदलेन कयने रहय। कमलकेँ दोसर ठाम हिस्सा दऽ देल गेल रहैक, जे अखन धारमे छै। हमर बला कोला उपजैत छै, तइँ ओकरा लोभ भऽ गेल छैक।
'काल्हि गहूम काटि लएह।'- ई कहैत हम सिबननन केँ विदा करैत छी। मोनमे फसादक भय अछि।अनेक प्रकारक आशंका अछि। मुदा गहूम तऽ खेतमे ठाढ़ नहि रहत। ओकरा तऽ कटनाइए छैक। चाहे क्यो लिअय। पाही आदमीक जमीनकेँ लोक मसोमातक जमीन बुझैत अछि।
रघुनीक दुआर पर थ्रेसर चलि रहल छैक। रघुनी अपने मरि गेल। धीया-पूता छैक। दू टा बेटा दिल्ली मे छैक। तेसर जे गहूम तैयार कऽ रहल अछि, तकर नाम छिऐक नट्टा। नट्टा हमरा बैसय कहैत अछि। घरक एक कात दू टा चौकी लागल छै। चौकी पर मैल खट-खट भोटिया बिछाओल छै। चौकी सँ सटले दच्छिन गाय, भैंस, बकरी सब रहैत छै। नाकमे निरंतर गोबर आ गोंतक दुर्गन्ध अबैत रहैत अछि। कोसिकन्हाक अधिकांश लोक एहिना रहैत अछि। जानवरक संग। जानवरक समान। जानवरक हालतमे।
हम ओहि मैल बिछौन पर आ दुर्गन्ध मे कनेक काल बैसल रहैत छी। थ्रेसर सँ उड़ैत गरदा आ भूसी भौक मारि कऽ हमरा दिस आबि रहल अछि। सोचैत छी ता कमलसँ गप कऽ ली। उठि कऽ कमल कतऽ चल जाइत छी। कमल अड़ल अछि। आधा गहूम कटबा कऽ ओ अपना ओतय लऽ आनत।
हम क्षुब्ध भेल उठि कऽ नथुनी मुखिया ओहिठाम चल अबैत छी। नथुनिओ हमर बटेदार अछि। नौ कट्ठा मे तीन सेर मेथी हिस्सा दैत अछि। नथुनी अपन बेटीक खिस्सा सुनबैत अछि। एक मास पहिने कोना पाँच हजार कर्ज लऽ कऽ ओकर विवाह कयलक। दिल्लीमे दू मास रिक्शा चला कऽ कोना ओ कर्ज सधाओत। फेर ओ अचानक पुछैत अछि – 'खाना खेलहक?'
'न'। - हम कहैत छिऐ।
'कतऽ खेबहक ?'
'कतहु तऽ खेबे करबै।'
ओ बेटी कें हाक दऽ कऽ हमर खाना बनबऽ कहैत छै।
गाममे हमरा घर नहि अछि। अड़सठक बाढ़िमे घर जे कटल से फेर बनि नहि सकल। सभ बेर गाम अयला पर ई समस्या रहैत अछि जे कतऽ खायब, कतय रहब।
भोजन करबैत काल नथुनी आश्वस्त करैत अछि जे ओ हमरा खातिर मछबाहि करत। अपन छोट भाइ धुथराकेँ ओ चिड़ै बझाबऽ कहैत छै। हम माछ आ चिड़ैक सुखद कल्पनामे डूबल सुतबाक चेष्टा करैत छी। निन्न नहि भऽ रहल् अछि। निन्न पर कल्हुका चिंता सवार अछि। गहूम जँ कमल लऽ गेल तऽ भारी बेइज्जती – जाइत-जाइत सिबननन बाजल रहय। हमर देयाद बैजनाथ, कमल पर सन-सन कऽ रहल अछि।
धन आ स्त्री संसारक सर्वोपरि सुख अछि। लोक एहि दुनूक पाछू बेहाल रहैत अछि। धन आ स्त्रीक तृष्णा कहियो शांत नहि होइत छै। आदमी तइयो एहि मृगतृष्णाक फेरमे पडि. कऽ भटकैत अछि आ दुख उठबैत रहैत अछि।
हम अवधारि लैत छी जे दंगा-फसाद नहि करबाक अछि। कमल गहूम लऽ जायत तऽ लऽ जाउक। भोरमे निन्न टुटिते मोन पड़ैत अछि जे गहूम कटैत हएत। मुँह-हाथ धो कऽ खेत दिस जाइत छी। गहूम कटि रहल छै। कमल पहिनहि आबि जनकेँ कहि गेल छै जे गहूम ओकरे ओहिठाम जेतैक। जन सभ असमंजसमे अछि। हम कहैत छिऐक गहूम सिबननन ओतय जेतैक। बोझ उठबाक घड़ी संघर्षक घड़ी होयत।
हम घूरि कऽ टोल पर चल आयल छी। चाह पीबाक लेल रघुनाथकेँ तकैत छी। रघुनाथ दूधक जोगाड़मे गेल अछि। दूध आनत तखन चाह बनाओत। सिबननन अबैत अछि। ओ बहुत आशंकित आ बेचैन अछि। हमरा कमलसँ गप्प करय कहैत अछि।
हम कमल आ ओकर दुनू बेटाकेँ बुझबैत छिऐ जे बकवाद आ दंगा-फसाद कयला सँ कोनो फायदा नहि छै। जाधरि फैसला नहि भऽ जायत, ताधरि गहूम तैयार नहि हएत। रघुनाथ दूध लऽ कऽ कमले ओतय चल आयल अछि। ओत्तहि चाह बनैत छै आ कपक अभावमे हम सभ बेराबेरी चाह पीबैत छी। चाह खतम होइते कमल उठि कऽ खेत दिस विदा होइत अछि। हमहूँ विदा होइत छी। हम सभ चाह पीबिते रही, तखने चारि-पाँच टा बोझ सिबननन अपना ओतय पठबा देने रहै। किछु और कने दूर पर जा रहल छै। कमल ई सब देखि क्रुद्ध भऽ जाइत अछि। मुदा आब तऽ खेल खतम भऽ गेल छै।
हम जहिया कहियो गाम अबैत छी तऽ चाहैत छी धारमे नहाइ। हेलबाक मौका गामे मे भेटैत अछि। मेनाहीक पूब आ पच्छिम दुनू कात कोसी बहैत छै। पच्छिम कतका धारक पसार बहुत छै। पच्छिम, उत्तर दच्छिन जेम्हरे तकैत छी, तेम्हरे बालु आ धार। दूर-दूर धरि खाली दोखरा बालु जाहिमे पचासो बरखसँ किछु नहि उपजैत छै। मेनाही, परियाही आ भवानीपुर-एहि तीनू गामक लोक तबाह भऽ गेल अछि। पीढ़ी दर पीढ़ी हजारक हजार लोक कोसीक बालु फँकैत मेटा जाइत अछि।
हाँजक हाँज सिल्ली पानि पर बैसल छै। पच्चीस-तीस टा लालसर भित्ता पर टहलि रहल छै। आब चिड़ै कम अबैंत छै। बहुत पहिने जहिया झौआ, कास आ पटेरक जंगल रहै, तहिया अनेक तरहक जल आ थल-चिड़ै अबैत रहै। पूर्णियाक शिकारी चिड़ै बझबैत रहै आ सुपौलमे बेचैत रहै। आब झौआ उकनि गेल छै आ कास-पटेर उकनल जा रहल छै। पहिने लोक झौआ, कास, पटेर बेचि कऽ किछु कमा लैत छल। जंगलमे झुंडक झुंड गाय-महींस पोसि कऽ जीविका चलबैत छल। खढ़िया, हरिन, माछ, काछु आ डोका मारि कऽ खाइत छल। आब सभ किछु खतम भऽ गेल छै आ जीबाक साधन दुर्लभ भऽ गेल छै।
धारक बीचमे छीट पर एकटा मछवाह पड़ल अछि। बगलमे जाल आ डेली राखल छैक। हम हेलि कऽ छीट पर जाइत छी। फेकुआ अछि। नथुनी मुखियाक भाइ। डेलीमे पाव भरि रेवा छै। तीन घंटाक उपार्जन। समुद्रक कछेरमे जेना लोक पड़ल रहैत अछि, हम तहिना बालु पर पड़ि रहैत छी। एहि दुपहरियोमे धार कातक हवा ठंढ़ा छै। कोसीक पानि ठंडा छै। कनिको काल पानि मे रहला सँ जाड़ हुअय लगैत छै। दूर एक आदमी असकरे डेंगी लऽ कऽ मछबाहि कऽ रहल छै। और कतहु क्यो नहि छै। धार आ बालुक निर्जन विस्तार।
कोसिकन्हाक लोक साहस आ धैर्यपूर्वक कोसीक प्रचंडताक मोकाबिला करैत अछि आ अपन प्राण-रक्षामे लागल रहैत अछि। कोसीक उत्पात सहैत-सहैत ओ सभ पितमरू भऽ गेल अछि आ सब तरहक दुख सहबाक अभ्यस्त भऽ गेल अछि।
बेरियाँ मे हम सत्तो ओहिठाम चल अबैत छी। सत्तो हमर पाँच कट्ठा खेत करैत अछि। खेतमे दस बोझ गहूम भेल छैक जे तैयार करत। थ्रेसर अनलक अछि। सत्तोक माय अपन दुखनामा सुनबैत अछि। इलाजक अभावमे मरल बेटाक सोगमे ओ कनैत अछि। आब जे एकटा बेटा-पुतहु छैक तकर अभेलाक कथा सुनबैत अछि। दुख हम नहि बँटबैक, तइयो सुनबैत चल जाइत अछि। ओकर कथा के सुनत ? ककरो छुट्टी नहि छैक। तइँ हमरा सुनबैत रहैत अछि।
सॉझ मे हम पंचैतीक ओरियान करैत छी। पंचक बुझेलो पर कमल तैयार नहि होइत अछि। फैसला होइत छै-ई खेत ओ लऽ लेत, बदलामे दोसर खेत लिखि देत। बैजनाथ कहैत छै जाधरि कमल लिखत नहि, ताधरि ई खेत छोड़बाक काज नहि छै। बैजनाथ खेत हथियाबऽ चाहैत अछि। जँ हम कहि दिऐक तँ ओ लाठीक जोरसँ खेत खाइत रहत। खेत पर कमलकेँ नहि चढ़य देत। एहि बात लेल ओ अनेक तरहेँ हमरा पर दवाब दऽ रहल अछि। कहैत अछि-तोहर पच्छ लेबाक कारणे कमल हमरा मरबेबाक लेल एकटा पिस्तौल बलाकेँ ठीक केने रहय।
सत्तोक बकरी मरि गेल छैक। भोरमे निन्न टुटिते ओकर धरवालीक आवाज कानमे पड़ैत अछि। ओ सासुसँ पूछि रहल छै – बकरी कोना मरि गेलै ? ओकर सासु किछु बजैत नहि छै। चुपचाप बकरी लग जाइत छै। दुख आ आश्च र्य सँ बकरी कें देखैत रहैत छै। बकरी मुँह रगड़ि कऽ मरल छै। सत्तोक माय हमरा सुनाकऽ कहैत अछि-घुरघुरा काटि लेलकै की !
हम जाहि चौकी पर सूतल रही, बकरी ओकरे पौवामे बान्हल रहै। सत्तोक घरवाली ओकर गराक डोरी खोलि देने छै आ ऑगनमे जा कऽ सासु पर भनभना रहल छै-हद्दो घड़ी सरापैत रहै मरियो ने जाइत छैक !
सासु हमरा कहैत अछि-बहुत दिन पहिनहि बलि गछने रहै। कैक बेर पाठी भेलैक आ सब बेर बेचने गेलैक। अखनधरि चढ़ौलकै नहि।
धुरि कऽ अबैत छी तऽ पता लगैत अछि बकरी डोमरा लऽ गेल छै। खाएत। सभ चीज पर मृत्युक छाया पसरल छै। पठरू माय लेल औनाय रहल छै। एम्हर सँ ओम्हर भेमिआइत दौड़ि रहल छै। दूइए-चारि दिन पहिने खढ़ धेने छै।
सत्तो दुपहर मे दौन शुरू करैत अछि। पहिने अपन बोझ धरबैत अछि। आगू मे ओकरे बोझ राखल छैक। सत्तोक बेटी परमिलिया बोझ उठा-उठा थ्रेसर लग दैत छै। परमिलिया सतरह-अठारह सालक युवती अछि। स्वस्थ-सुगठित शरीर। ओकर जोबनक उभार पुरूष-सम्पर्कक साक्षी छै। ओ अखन सासुर नहि बसैत अछि। सूर्यास्त भऽ गेलाक बाद खुरपी-छिट्टा लऽ कऽ घास लेल जाइत अछि। संध्या-अभिसार।
भोर मे अकचकाइत उठैत छी। क्यो आधा गिलास पानि ढ़ारि चानि थपथपा रहल अछि। आइ जूड़शीतल छै। सात-आठ बजे धरि चानि पर पानि पड़ैत रहैत अछि। ढ़लाय अपन छागर तकने फिरैत अछि। राति मे क्यो चोरा लेलकै। सोचने रहय बेचि कऽ कर्जा सधाओत। आब हताश भऽ गेल अछि।
आइ धार मे मेला जकाँ लागल छै। लोक सभ मालजाल धो रहल अछि। छौड़ा सभ धारमे उमकैत अछि आ हो-हल्ला कऽ रहल अछि।
गाम मे आब हमरा कोनो काज नहि अछि। साढ़े तीन मन गहूम जे हिस्सा भेल अछि तकरा सुपौल लऽ जेबाक ब्योंत केनाइ अछि। साइकिल भेटितय तऽ डोमा दू खेप मे पहुँचा दैत। ने साइकिल भेटैत अछि, ने माथ पर लऽ जायवला कोनो आदमी। गहूम पितम्बर लग छोड़ि दैत छिऐ। पाँच-सात दिनमे ओकर गाड़ी सुपौल जेतै।
दुपहर मे नट्टा परबाक माउँस बनबैत अछि। माउँस सुकन राम ओहिठाम बनैत छै आ भात नट्टा ओहिठाम। नट्टा बजा कऽ लऽ जाइत अछि। पीढ़ा सुकनक धाप पर लागल छै। हमरा भीतर छूआछूतक कोनो भावना नहि अछि। लेकिन आइ अचानक गाममे सुकन रामक ओहिठाम खाइत पता नहि कोना पूर्व-संस्कार जाग्रत भऽ गेल अछि आ कनेक काल धरि विचित्र प्रकारक संकोचक अनुभव करैत रहैत छी। फेर संकोचसँ उबरैत बजैत छी – सुकन भाय! आइ तोरा जाति बना लेलिअह। सुकन कहैत अछि जे आब ओ माल-जाल नहि खालैत अछि। बादमे एक गोटय हँसीमे कहैत अछि- तोरा सभ भठि गेल छह। तोरा सभकेँ जातिसँ बारि देबाक चाही।
कोसी सभटा भेदभावकेँ पाटि देने छै। डोम, चमार, मुसहर, दुसाध, तेली, यादव सब एके कल सँ पानि भरैत अछि। एके पटिया पर बैसैत अछि।
आब सूर्यास्त भऽ जायत। हम गामसँ विदा होइत छी। संगमे नट्टा आ गनेस अछि। एकटा साइकिल पर थोड़े-थोड़े गहूम लादने ओ दुनू पुनर्वास जा रहल अछि। गामक विकट जीवन पाछू छूटि रहल अछि। संग जा रहल अछि अनेक तरहक स्मृति। ई स्मृति हमर अस्तित्वक अंश बनि जायत आ जीवनमे अनेक रूप-रंगमे प्रकट होइत रहत।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...