Friday, August 28, 2009

ब्रजकिशोर वर्मा ‘मणिपद्म' - तखन कोन सोना केर मोल



सोना-बेटा कटए युद्धमे
तखन कोन सोना केर मोल?
रे ‘प्रताप’ जूझए ‘हल्दी’मे
भामाशाह! खजाना खोल
आइ विश्व भरि केर स्वतन्त्राता
माँगि रहल हमरेसँ मोल
दही लेपि क’ माँस चटा दे
उठ दधीचि, निज हड्डी तौल!
कंचनजंघा डगमग-डगमग
मानसरोवरमे तूफान
‘जय जय भैरवि असुर भयाउनि’
अधर-अधर पर गंूजए गान
हमरे गतिमे विश्वक गति छै
ताकि रहल अणु-हत भूगोल
सोना-बेटा कटए युद्धमे
तखन कोन सोना केर मोल?

वैद्यनाथ मिश्र "यात्री" -ओ ना मा सी धं!


ओ ना मा सी धं!
आहि रे बा, आहि रे बा,
ख्रुश्चेव खसला, चितंग!
क्रान्तिमे थूरल गेला शान्तिक दूत
लोककें लगलै अजगूत
उतारि क’ फेकि देल गेलनि फोटो
अपनो तँ एहिना
रहथिन कएने स्तालिन केर कपाल-क्रिया
सुनने रही कतहु की मुर्दाक ओहन दुर्गति?
आहि रे कप्पार!
दशो प्रतिशत क्षमा नहि पूर्वजक लेल
ऊपर अन्तरिक्षमे चलैत रहौ उड़ानक खेल
क्रेमलिनक मुदा कीदन भ’ गेल
कैक टा खु्रश्चेव ढहनेता मने उसिनल बेल
भारतीय थिकहुँ, सभकें तिल-जल देल...
‘येनास्ता पितरो जाताः, येन जाताः पितामहाः’
सएह गति होउन हिनको
ओं शान्तिः शान्तिः शान्ति !!

विवेकानन्द ठाकुर-गिद्ध बैसल मन्दिर




सौंसे इलाका गनगना गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
कोनो पुरखाक बनबाओल मन्दिर
बड्ड पुरान/ने छोट/ने पैघ/घुटमुटार

लखुरिया पजेबाक चारू देबाल
जाहि पर औन्हल गोल गुम्बर
बीच मे गाड़ल बीझ लागल त्रिशूल

शीत-ताप पानि पाथर
झक्कड़-धक्कड़ सहैत-सहैत/कारी सिआह भेल
जेना अगबे छाउरसँ/हो ढौरल

मन्दिर बनल रहल ओंगठन-छाहरि
अनेक लोक लेल अनेक बर्ख धरि
एक्केटा शहसँ मुदा, सभ भ’ गेल मात
मन्दिर पर भ’ गेल पैघ वज्रपात

पपिआहाक बात सभ पतिया गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
सौंसे इलाका गनगना गेल
गिद्ध बैसल मन्दिर छुआ गेल
मन्दिर छुआ गेल ओंगठन छुआ गेल
छाहरि छुआ गेल

देवता जे छलाह जागन्त
आब भ’ गेलाह आदंक
लोक सभ डेरा गेल पुजेगरी पड़ा गेल
चोरबा सभ कें फबलइ राता-राती
लोहक सिक्कड़ काटि चोरा लेलक
बड़का पितरिया घण्टा, दीप, घण्टी, घड़ी-घण्टा
सभकें बेच आएल ओजनसँ ठठेरी बजारमे
ने बेचनिहारके कोनो ग्लानि
ने किननिहारकें कोनो दुविधा

इलाका भरिक श्रद्धा आ विश्वास
ओजनसँ बिका गेल ठठेरी बजारमे
रहि गेला पाथरक देवता
हुनका नहि पुछलक चोरबा

अन्हार घुप्प मन्दिरमे आब भम पड़इए
केओ ओम्हर कखनो घूरि नहि तकइए
एकटा प्रश्नक मुदा, नहि भेटइए उत्तर
पाथरक देवता फेर भ’ गेला पाथर?
सत्ते भ’ गेला पाथर, सत्ते भ’ गेला पाथर


अमूल्य बात /- मदन कुमार ठाकुर


अमूल्य बात ----
बेकार नै जिनगी बैतित करू ,
नै समय भेटल अछि गमबैय क
जग में आयल छि अहाँ ,
और सब के कम बनाबैय क
कथनी बरनी से लाभ नै ,
करनी में ध्यान लगा राखू
करनी में शुख आनन्द भेटत ,
कथनी छि मन बहलाबई क
हुनकर जिनगी अछि बातक ,
छैथ जन्मल बात बनाबैय क
पोथी - पत्तरा के ग्ज्ञानी छैथि ,
फुशिये सम्मान क अभिमानी छैथि
नै अनुभव छैन रहन - सहन क ,
भरम में ओ अभिमान सं
जग क ओ मिथ्या कहिते ,
लिकिन जग में आश लगाबैत छैथि
अपन गप्प के शिध्य करै लेल ,
पाबैत नहीं छैथ ठोर- ठिकाना
कथनी से तेज करू करनी क ,
करनी सं बनाबू रहनी क
करनी से चैन मिले रहनी क ,
करनी छी जिनगी सवारै क
आस लगाबी करनी में ,
करनी छी भाव बढा बाई क
अमूल्य बातक ई ध्यान राखी ,
भेटत नहीं ई राज शिखाबई क
राजा रंक फकीरा चाहे ,
अपन जिनगी सफल बनाबाई क

The end

मदन कुमार ठाकुर
पट्टी टोल, कोठिया , भैरव स्थान , झांझर पुर ,मधुबनी , बिहार , ८४७४०४
ई मेल - madanjagdamba@yahoo.com

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...