Wednesday, August 12, 2009

गजल-आशीष अनचिन्हार

गजल
अनका रोकबाक चक्कर मे अपने रुकि गेलहुँ
अनका बझएबाक चक्कर मे अपने बझि गेलहुँ

करेजक उत्फाल इ नहि छल बुझल हमरा
अनका बसएबाक चक्कर मे अपने बसि गेलहुँ

एतेक गँहीर हेतैक खाधि-खत्ता थाह नहि छल
अनका खसएबाक चक्कर मे अपने खसि गेलहुँ

माथक भोथ मुँहक चोख सभ दिनुका छी हम
अनकर कहैत-कहैत अपने कहि गेलहुँ

मिडिआक प्रभाव एतेक विस्तार मे नहि पूछू
अनका चिन्हा अपने अनचिन्हार रहि गेलहुँ

दू टा मैथिली अगड़म - बगड़म



माछ - भात तीत भेल,
दही- चिन्नी मिठ्ठ भेल,
खाकऽऽ टर्रर छी ।


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कारी मेघ ,
कादो थाल,
झर झर बुन्नी,
चुबैत चार ।



नारी

चाँद छि अहाँ तारा छि अहाँ
हमर मोनक सहारा छि अहाँ
रूपके वर्णन कहैत अछि
दुनिया के सितारा छि अहाँ !!
माँ कहै छैथ घरक लक्ष्मी छि अहाँ
आस - पास के लोग करै य चर्चा अहाँ के
जानकी नगरी क नारी छि अहाँ!!
कमल पुष्प सं सुशोभित अंग अहाँ के

कहैय म दुविधा नय वीणापाणी छि अहाँ!
अहल्या केर की बात करी,
द्रोपदी सं पंचाली छि अहाँ
सीता त उपमा मात्र छैथ,
अहि दुनिया के तारा छि अहाँ!!
भारती त शंकराचार्य के जितालैन
दुर्गा देवी के सामान छि अहाँ!
मुख सं निकलै स्वर अनमोल,
कोकिल कहबै छि अहाँ!!

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...