Wednesday, July 22, 2009

सभ दिन रातिमे-अविनाश



सभ दिन रातिमे चारि टा लोक घरक देबाल
सभ दिन रातिमे ताशक कोटपीस
की कतहु किछु भ’ रहल छै गड़बड़
से के कहत?
सभ दिन रातिमे सजमनि सोहारी
सभ दिन रातिमे निन्नक खुमारी

विविध भारतीक छायागीतमे डूबल अछि लोक
ओ समय नहि जे
लोकमे डूबल अछि लोक
जीवनक पुरबा-पछबामे सदाबहार रेडियो
आ नेनपनक झिझिरकोना

बुचनूक घरमे क्यो नइं खेलकइ आइ
हम की क’ सकै छी भाइ?
क्यो की क’ सकैछ?
जखन देशक दुर्भाग्य
गाम-गाम
आत्मा बनि भटकि रहल हो
हम अपन सुखमे कते क’ सकैत छी बाँट-बखरा
हम अपन दुखकें कतेक पोसि सकै छी एकसर

हम एकसर पड़ल दुखी नागरिक
भयक बहन्ना छी बनौने
साँझमे बन्न क’ दै छी देशक दुर्दशाक विरुद्ध युद्ध
जेना युद्ध हो कोनो आॅफिसियल काज

सभ दिन रातिमे चकल्लस
सभ दिन रातिमे रंग-रभस

की हम सभ कोनो भोरक प्रतीक्षा क’ रहल छी?


बुधनी- सतीश चंद्र झा


घुरलै जीवन दीन - हीन कें
बनलै जहिया टोलक मुखिया।
नव- नव आशा मोन बान्हि क’
सगर राति छल नाचल दुखिया।

घास फूस कें चार आब नहि
बान्हब कर्जा नार आनि क’।
नहि नेन्ना सभ आब बितायत
बरखा मे भरि राति कानि क’।

माँगि लेब आवास इन्दिरा
काज गाम मे हमरो भेटत।
जाति - जाति कें बात कोना क’
ई ‘दीना’ मुखिया नहि मानत।

भेलै पूर्ण अभिलाषा मोनक
भेट गेलै आवास दान मे।
दुख मे अपने संग दैत छै
सोचि रहल छल ओ मकान मे।

की पौलक की अपन गमौलक
की बुझतै दुखिया भरि जीवन।
मुदा बिसरतै बुधनी कहिया
बीतल मोन पड़ै छै सदिखन।

पड़ल लोभ मे गेल सहटि क’
साँझ भोर मुखिया दलान मे।
होइत रहल भरि मास बलत्कृत
विवश देह निर्वस्त्रा दान मे।

जाति- धर्म, निज, आन व्यर्थ कें
छै बंधन जीवन मे झूठक।
जकरा अवसर भेटल जहिया
पीबि लेत ओ शोणित सबहक।

सबल कोना निर्बल कें कहियो
देत आबि क’ मान द्वारि पर।
कोना बदलतै भाग्य गरीबक
दौड़त खेतक अपन आरि पर।

भाग्यहीन निर्धन जन जीवन
बात उठाओत की अधिकारक।
नोचि रहल छै बैसल सभटा
छै दलाल पोसल सरकारक।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

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