Wednesday, July 08, 2009

मैथिली राम चरित मानस-मैथिली समालोचनाक विफलता

मैथिली साहित्यकेँ पढ़निहारक समक्ष मैथिलीमे रामचरित किंवा रामायण 1. श्री चंदा झा कृत मिथिला भाषा रामायण आऽ 2.श्री लालदासक रमेश्वर चरित मिथिला रामायण -एहि दू गोट ग्रंथक रूपमे प्राप्त होइत छन्हि।पाठ्यक्रमक अंतर्गत स्कूल,कॉलेज-विश्वविद्यालयक मैथिली विषयक पाठ हो किंवा सामान्य आलोचनग्रंथ आकि पत्र-पत्रिकामे छिड़ियायल लेख सभ एहि दू गोट रामायणक अतिरिक्त कोनो तेसर रामायणक अस्तित्वो धरि नहि स्वीकार कएल गेल अछि। एकर संग ईहो बुझि लियह जे जनमानस समालोचनाशास्त्रक आधार पर राखल विचारकेँ तखने स्वीकार करैत अछि जखन की ओऽ सत्यताक प्रतीक हो। आइयो मिथिलामे अखंड रामायण पाठ होइत अछि-बाल्मीकि रामायणक किंवा तुलसीक रामचरितमानसक। एकर कारण पर हम बहुत दिन धरि विचार करैत रहलहुँ।कैकटा चन्द्र रामायण आऽ लालदासकृत मिथिला रामायण रामायण अखंड पाठ केनिहार लोकनिकेँ बँटबो कएलहुँ, मुदा सबहक ईएह विचार छल, जे ई दुनू ग्रंथ मैथिली साहित्यक अमूल्य धरोहर अछि, मुदा अखंड पाठक सुर जे तुलसीक मानसमे अछि से दोसर भाषाक रहला उत्तरो संगीतमय अछि। शंकरदेव अपन मातृभाषा असमियाक बदला मैथिली भाषाक प्रयोग संगीतमय भाषा होयबाक द्वारे कएलन्हि ताहि भाषामे संगीतमय रामायणक रचना जे अखण्ड पाठमे प्रयोग भय सकय, केर निर्माण संभव नहि भय सकल अछि से हमर मोन मानबाक हेतु तैयार नहि छल। तखने एकटा लाइब्ररीमे हमरा श्री रामलोचनशरण-कृत यथासम्भव पूर्णभावरक्षित समश्लोकी मैथिली श्रीरामचरितमानसक दर्शन भेल । एहि ग्रंथकेँ पूर्णरूपेँ पढ़बाक मोह हम नहि त्यागि सकलहुँ आऽ



आब एहि पर एक गोट छोट-छीन समीक्षा लिखबाक पहिने हम समस्त मैथिल समाजसँ दुइ गोट प्रश्न पुछय चाहैत छी।
1.अपन समीक्षक लोकनि एहि मोतीकेँ चिन्हबामे सफल किएक नहि भय सकलाह,एकर चर्चो तक मैथिलीक उपरोक्त दुनू रामायणक समक्ष किएक नहि केल गेल। स्व.हरिमोहन झाक कोनो पोथी मैथिली अकादमी द्वारा हुनका जिबैत प्रकाशित नहि भेल आऽ साहित्य अकादमी पुरस्कार सेहो हुनका मृत्योपरांत देल गेलन्हि।आचार्य रामलोचन शरण मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक रचयिता छथि आऽ हमरा विचारे सभसँ संपूर्ण मैथिली रामायणक सेहो। जखन हम एहि महाकाव्यक फोटोकॉपी लाइब्ररियनक विशेष अनुकंपासँ लेबामे सफल भेलहुँ आऽ एकर पूर्वाँचल मिथिलाक रामायण- अखंड- पाठक संस्थाकेँ देलहुँ, तँ ओ ऽ लोकनि एकरा देखि कय आश्चर्यचकित रहि गेलाह आऽ अगिला साल एहि रामायणक अखंड पाठक निर्णय कएलन्हि। एकरा मैथिलीक समालोचनाशास्त्रक विफलता मानल जाय, किएक तँ ई महाकाव्य तँ विफल भैये नहि सकैत अछि। आचार्यक मनोहरपोथीक चर्चा हम अपन बाल्येवस्थासँ सुनैत रही।
2. मैथिलीक सभसँ पैघ महाकाव्यक चर्चा मात्र सीतायन पर आबि किएक खतम भय जाइत अछि।आचार्य श्री रामलोचनशरणक मैथिली श्री रामचरितमानस सभसँ पैघ महाकाव्य अछि ई एकटा तथ्य अछि आऽ से समालोचनाकार किंवा मैथिली भाषाक इतिहासकार लोकनिक कृपाक वशीभूत नहि अछि।
अपन ग्रंथक किञ्चित् पूर्ववृत्तम् मे आचार्य लिखैत छथि- मिथिलाभाषायाः मूर्द्धन्या लेखकाः श्रीहरिमोहनझामहोदया निशम्यैतद् वृत्तं परमाह्लादं गता भूयो भूयश्च मामुत्साहितवन्तः। आँगाँ ओऽ लिखैत छथि-प्राध्यापकस्य श्री सुरेन्द्रझा ‘सुमन’ तथा सम्पादनविभागस्थ पण्डित श्री शिवशंकरझा-महोदयस्य हृदयेनाहं कृतज़्ज्ञोऽस्मि।

आचार्यजीक सुन्दरकाण्डक पारंभ देखू-
जामवंत केर वचन सोहाओल। सुनि हनुमंत हृदय अति भाओल॥1॥ ता धारि बाट देखब सहि सूले।
खा कय बंधु कंद फल मूले॥2॥
जाधरि आबी सीतहिँ देखी। होयत काज मन हरख विसेखी॥3॥ ई कहि सबहिँ झुकाकय माथे। चलल हरषि हिय धय रघुनाथे॥4॥
सिंधु तीर एक सुंदर भूधर। कौतुक कूदि चढ़ल तेहि ऊपर॥5॥ पुनु पुनि रघुवीरहिँ उर धारी। फनला पवनतनय बल भारी॥6॥ जहि गिरि चरन देथि हनुमंते। से चल जाय पताल तुरंते॥7॥ सर अमोघ रघुपति केर जहिना। चलला हनूमान झट तहिना॥8॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। कह मैनाक हौ श्रम भारी॥9॥
आऽ आब देखू श्री रामचरित मानसक बानगी। तुलसी अकबरक समकालीन छलाह आऽ हुनकर भाषा आऽ अखुनका भाषामे किछु अंतर आबि गेल अछि, मुदा तुलसीक गेयता ओहिनाक ओहिना अछि। आचार्यजी तुलसीक गेयता उठओलन्हि अछि, आऽ दुरूहता खतम कय देने अछि। सभ काण्डक शुरूमे देल संस्कृत पद्य तुलसीक मानससँ लेलन्हि अछि। कवि चन्द्र आऽ लालदास दुनू गोटे अप्पन संस्कृत पद्य बनओलन्हि अछि। आचार्यजीक ई मैथिली रमचरितमानस तुलसीक मानसक रूपांतर तँ अछि,मुदा ई मैथिलीक मूल महाकाव्यक रूपमे परिगणित होयबाक अधिकारी अछि जेना कंबनक तमिल रामायण आऽ तुलसीक मानस अपन-अपन भाषामे केल जा रहल अछि। कंबन बाल्मीकी रामायणक रूपांतर तमिलमे कय रहल छलाह आऽ बाल्मीकि रामायणक विषयमे कहलन्हि जे- ई रामायण एकटा दूधक समुद्र छे आऽ हम छी एकटा बिलाड़ि जे मोनसूबा बना रहल अछि जे एहि सभटा दूधकेँ पीबि जाइ। ओना इइहो सत्य जे कंबन कहियो -आचार्यजी सेहो एहिना कएलन्हि- रामायण केँ अपन मौलिक कृति नहि कहलन्हि वरन बाल्मीकिक कृतिक रूपांतरे कहलन्हि,जखन कि ओ ऽ अपन कृतिमे रामकेँ भगवान बनाय देलन्हि।बाल्मीकि रामकेँ मर्यादा पुरुष अहि मानैत छलाह।बाल्मीकि सुग्रीवक विवाह बालीक पत्नीसँ बालीक मरबाक पश्चात होयबाक वर्णन करैत छथि मुदा कंबन बालीक पत्नीक आजीवन वैधव्यक वर्णन करैत छथि। आछर्यजीकेँ ई करबाक आवश्यकता नहि पड़लन्हि किएकतँ तुलसीक मानस लोकक कंठमे बसि गेल छल,आऽ ओऽ एकर निर्वाह कएलन्हि।
आब मानसक एकटा विवादास्पद पद्यक चर्चा करी। अर्थक अनर्थ कोना होइत अछि से देखू। आचार्यजी सुन्दरकाण्डक अंतमे लिखैत छथि जखन सिंधु (समुद्र)रामकेँ लंका जयबाक रस्ता नहि दैत छथि तखन राम कहैत छथि, लछुमन बान सरासन आनू। सोखब बारिधि बिसिख कृसानू॥1॥
तखन सिंधु कर जोरि बजैत छथि- ढोल गमार सुद्र पसु नारी। सब थिक ताड़न केर अधिकारी॥
एकर अर्थ ई सभ -ढोल गमार सुद्र पसु नारी- ई सभ शिक्षाकिंवा सबक देबा योग्य अछि,गमार सुद्र आऽ नारीमे शिक्षाक अभाव अछि तेँ आ ऽ पसुमे मनुष्यक अपेक्षा बुद्धि नहि छैक तेँ, ढोलक प्रयोग बिना शिक्षाक करब तँ संगीत नहि ध्वनि भय जायत। नीचाँ तुलसीक श्रीरामचरित मानसमे सेहो देखू-
फेर समुद्र ओहि स्थितिमे खलनायक बनि रहल छल आ ऽ ओकर वक्त्तव्य कविक आकि रचनाकारक वक्त्तव्य नहि भय सकैत अछि। रचनाकारक रचनामे नीक अधलाह सभ पात्र रहैत अछि, आ ऽ ओहि पात्रक मुँह सँ नीक आ ऽ अधलाह दुनू गप निकलत। रचनाकारक सफलता एहि पर निर्भर करैत अछि, जे ओ ऽ अपनाकेँ अपन पत्रसँ फराक कय पबैत अछि कि नहि।

एहि आलोचना निबंधक उद्देश्य चन्द्र कवि आकि कवि लालदासक रचनाकेँ छोट करब नहि अछि वरन् हुनकर रचनाक समकक्ष आचार्यक रचनाकेँ अनबा मात्र अछि जाहिसँ तुलसीक मानसक वर्चस्व आचार्यजीक रचना खतम कय सकय। तुलसीक प्रासंगिकता नहि वरण ओकर दुरूहताकेँ आचार्य खतम कएने छथि।

साक्षात्कार

रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि।
रामरगजीसँ गप शप। (६ जुलाई २००८)

गजेन्द्र ठाकुर: गोर लगैत छी। स्वास्थ्य केहन अछि।
रामरंग: ८० बरख पार केलहुँ। संगीतमे बहटरल रहैत छी।
गजेन्द्र ठाकुर: संगीतक तँ अपन फराक भाषा होइत छैक। मैथिली संगीत विद्यापति आऽ लोचन सँ शुरू भए अहाँ धरि अबैत अछि। मैथिलीमे अहाँ लिखनहिओ छी।
रामरंग: अपन मिथिलासँ सम्बन्धित हम तीन रागक रचना केलहुँ अछि, जकर नाम ऐ प्रकारसँ अच्हि।
१.राग तीरभुक्ति, राग विद्यापति कल्याण तथा राग वैदेही भैरव। ऐ तीनू रागमेसँ तीरभुक्ति आर विद्यापति कल्याणमे मैथिली भाषामे खयाल बनल अछि। हमर संगीत रामायणक बालकाण्डमे रागभूपाली आर बिलावलमे सेहो मैथिली भाषामे खयाल छैक। आर सन्गीत रामायणक पृष्ठ ३ पर बिलावलमे श्री गणेशजीक वन्दना तथा पृष्ठ २० पर राग भूपालीमे श्री शंकरजीक वन्दना अछि। पृष्ठ ८७ पर राग तीरभुक्तिमे मिथिला प्रदेशक वन्दना अछि आर पृष्ठ १२० पर राग वैदेही भैरवक (हिन्दीमे) रचना अछि। “अभिनव गीताञ्जलीक पंचम भागमे २६५ आर २६६ पृष्ठ पर विद्यापति कल्याण रागमे विलम्बित एवं द्रुत खयाल मैथिली भाषामे अछि। मिथिला आऽ मैथिलीमे हम उपरोक्त सामग्री बनओने छी।

गजेन्द्र ठाकुर: मुदा पूर्ण रागशास्त्र विद्यापति कल्याणक, तीरभुक्तिक वा वैदेही भैरवक नञि अछि। मैथिलीमे आरो रचना अहाँ...
रामरंग: बहुत रचना मोन अछि, मुदा के सीखत आऽ के लीखत। हाथ थरथराइत अछि आब हमर।
गजेन्द्र ठाकुर: कमसँ कम ओहि तीनू रागक रचना शास्त्र लिखि दैतियैक तँ हम पुस्तकाकार छापि सकितहुँ।
रामरंग: जे रचना सभ हम देने छी ओकरा छापि दिऔक। हाथ थरथराइत अछि , तैयो हम तीनूक विस्ट्रुत विवरण पठायब, लिखैत छी।
गजेन्द्र ठाकुर: प्रणाम।
रामरंग: निकेना रहू।
रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि।
राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित)

मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना।
स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान।
अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥

स्थायी
- - रेग॒म॑प ग॒रेसा
ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ

रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ - म॑
ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग

प प धनि॒ धप धनिसां - - रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा
ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ

अन्तरा

पप नि॒ध निसां सांरें
मिथि लाऽ ऽऽ कोकि

सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा
लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ

रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा
हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ

*गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध।
रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि।
राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित)

मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना।
स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान।
अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥

स्थायी
- - रेग॒म॑प ग॒रेसा
ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ

रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ - म॑
ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग

प प धनि॒ धप धनिसां - - रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा
ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ

अन्तरा

पप नि॒ध निसां सांरें
मिथि लाऽ ऽऽ कोकि

सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा
लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ

रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा
हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ

रामाश्रय झा “रामरग” (१९२८- ) विद्वान, वागयकार, शिक्षक आऽ मंच सम्पादक छथि।
२.राग विद्यापति कल्याण – त्रिताल (मध्य लय)

स्थाई- भगति वश भेला शिव जिनका घर एला शिव, डमरु त्रिशूल बसहा बिसरि उगना भेष करथि चाकरी।
अन्तरा- जननी जनक धन, “रामरंग” पावल पूत एहन, मिथिलाक केलन्हि ऊँच पागड़ी॥

स्थाई- रे

सा गम॑ प म॑ प - - म॑ग॒ - रे सा सारे नि सा -, नि
ग तिऽऽ व श ऽ ऽ भे ऽ ला ऽ शि ऽ व ऽ ऽ जि

ध़ नि सा रे सा नि॒ – प़ ध़ नि॒ ध़ प़ – नि सा - - सा
न का ऽ घ र ऽ ऽ ए ऽ ला ऽ शि व ऽ ऽ ड

रे ग॒ म॑ प प – प नि॒ ध प म॑ प धनि सां सां गं॒
म रु ऽ त्रि शू ऽ ल ब स हा ऽ बि सऽ ऽऽ रि उ

रें सां नि रें सां नि॒ ध प म॑ प पनि॒ ध प - -ग -- रे
ग ना ऽ ऽ भे ऽ ष क र थि चाऽ ऽ कऽ ऽरी ऽऽ, भ

अन्तरा प


प नि सां सां सां - - ध नि - ध नि नि सां रें सां -, नि
न नी ऽ ज न ऽ ऽ ऽ ऽ क ध न ध न ऽ, रा

नि सां – गं॒ रें सां सां नि – ध नि सां नि॒ ध प ग॒

म॑ प नि सां सां नि॒ ध प म॑ प पनि॒ ध प- -ग – रे
थि ला ऽ क के ल न्हि ऊँ ऽ च पाऽऽ गऽ ऽड़ी ऽऽ,भ
***गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दोनों व अन्य स्वर शुद्ध।

राग विद्यापति कल्याण- एकताल (विलम्बित)

मैथिली भाषामे श्री रामाश्रय झा “रामरंग” केर रचना।
स्थाई- कतेक कहब गुण अहांके सुवन गणेश विद्यापति विद्या गुण निधान।
अन्तरा- मिथिला कोकिला किर्ति पताका “रामरंग” अहां शिव भगत सुजान॥

स्थायी
- - रेग॒म॑प ग॒रेसा
ऽऽ क ते ऽऽ क क ऽ

रे सा (सा) नि॒ध निसा – रे नि॒ध प धनि सा सारे ग॒रे रेग॒म॑ओअ - म॑
ह ब ऽ ऽ ऽ गु न ऽ अ हां, ऽऽ के ऽ ऽ सुव नऽ ऽऽऽऽ ऽ ग

प प धनि॒ धप धनिसां - - रें सां नि धप (प)ग॒ रे सा रे ग॒म॑प ग॒ रेसा
ने स विऽ द्याप ति ऽऽ ऽ ऽवि द्या गुन निधा न, क ते ऽऽऽ क, कऽ

अन्तरा

पप नि॒ध निसां सांरें
मिथि लाऽ ऽऽ कोकि

सां – निसांरेंगं॒ रें सां रें नि सांरे नि॒ धप प (प) ग॒ रेसा
लाऽ की ऽऽऽ ति प ता ऽ ऽऽ का ऽऽ रा म रं ग अ

रे सासा धनि॒प ध निसा -सा रे ग॒म॑प -ग॒ सारे सा,सा रेग॒म॑प ग॒, रेसा
हां शिव भऽ, ग तऽ ऽसु जाऽऽऽ ऽ ऽ न ऽ, क ते ऽऽऽ क,कऽ

*गंधार कोमल, मध्यम तीव्र, निषाद दुनू आऽ अन्य स्वर शुद्ध।

३.श्री गणेश जीक वन्दना
राग बिलावल त्रिताल (मध्य लय)
स्थाई: विघन हरन गज बदन दया करु, हरु हमर दुःख-ताप-संताप।
अन्तरा: कतेक कहब हम अपन अवगुन, अधम आयल “रामरंग” अहाँ शरण।
आशुतोष सुत गण नायक बरदायक, सब विधि टारु पाप।

स्थाई
नि
ग प ध नि सा नि ध प ध नि॒ ध प म ग म रे
वि ध न ह र न ग ज ब द न द या ऽ क रु

ग ग म नि॒ ध प म ग ग प म ग म रे स सा
ग रु ऽ ह म र दु ख ता ऽ प सं ता ऽ प ऽ

अन्तरा
नि रें
प प ध नि सां सां सां सां सां गं गं मं गं रें सां –
क ते क क ह ब ह म अ प न अ व गु न ऽ
रे
सां सां सां सां ध नि॒ ध प ध ग प म ग ग प प
अ ध म आ य ल रा म रे ऽ ग अ हां श र ण

ध प म ग म रे सा सा सा सा ध - ध नि॒ ध प
आ ऽ शु तो ऽ ष सु त ग ण ना ऽ य क व र
धनि संरें नि सां ध नि॒ ध प पध नि॒ ध प म ग म रे
दाऽ ऽऽ य क स ब बि ध टाऽ ऽ रु ऽ पा ऽ ऽ प

४.मिथिलाक वन्दना
राग तीरभुक्ति झपताल

स्थाई: गंग बागमती कोशी के जहँ धार, एहेन भूमि कय नमन करूँ बार-बार।
अन्तरा: जनक याग्यवल्क जहँ सन्त विद्वान, “रामरंग” जय मिथिला नमन तोहे बार-बार॥

स्थाई

रे – ग म प म ग रे – सा
गं ऽ ग ऽ बा ऽ ग म ऽ ती


सा नि ध़ – प़ नि नि सा रे सा
को ऽ शी ऽ के ज हं धा ऽ र

सा
म ग रेग रे प ध म पनि सां सां
ए हे नऽ ऽ भू ऽ मि कऽ ऽ य


सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा
न म न क रुँ बा ऽ र बा र

अन्तरा
प पध म – प नि नि सां – सां
ज नऽ क ऽ ऽ या ग्य व ऽ ल्क

रें रें गं – मं मं गं रें – सां
ज हं सं ऽ त वि ऽ द्वा ऽ न
ध प
सां नि प ध म प नि सां सां सां
रा म रं ऽ ग ज य मि थि ला

सां नि प ध (ध) म ग रे सा सा
न म न तो हे बा ऽ र बा र
५.श्री शंकर जीक वन्दना
राग भूपाली त्रिताल (मध्य लय)

स्थाई: कतेक कहब दुःख अहाँ कय अपन शिव अहूँ रहब चुप साधि।
अन्तरा: चिंता विथा तरह तरह क अछि, तन लागल अछि व्याधि,
“रामरंग” कोन कोन गनब सब एक सय एक असाध्य॥

स्थाई
प ग ध प ग रे स रे स ध सा रे ग रे ग ग
क ते क क ह ब दुः ख अ हाँ कय अ प न शि व

ग ग – रे ग प ध सां पध सां ध प ग रे सा –
अ हूँ ऽ र ह ब चु प साऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ धि ऽ

अन्तरा

प ग प ध सां सां – सां सां ध सां सां सां रें सां सां
चिं ऽ ता ऽ वि था ऽ त र ह त र ह क अ छि

सां सां ध - सां सां रें रें सं रे गं रें सां – ध प
त न ला ऽ ग ल अ छि व्या ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ धि ऽ

सां – ध प ग रे स रे सा ध स रे ग रे ग ग
रा ऽ म रं ऽ ग को न को ऽ न ग न ब स ब

ग ग ग रे ग प ध सां पध सां ध प ग रे सा –
ए क स य ए ऽ क अ साऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ध्य ऽ
राजमोहन झासँ गजेन्द्र ठाकुरक साक्षात्कार
गजेन्द्र ठाकुर:मैथिलीक जन सामान्यसँ दूर भऽ मैथिली साहित्यकार सभ मैथिलीकेँ प्रदर्शनक वस्तु बना देलखिन्ह, साहित्यसँ लोक किएक दूर होइत गेल?
राजमोहन झा:एहि लेल अहाँ साहित्यकारकेँ कोना दोषी कहैत छियन्हि?
गजेन्द्र ठाकुर:ओ साहित्य धरि सीमित रहलाह? समाजसँ कोनो मतलब नहि रहलन्हि? अपन लिखलथि आ गोष्ठी आ कवि सम्मेलन धरि सीमित रहलाह? गाम-घर छोड़ि देलन्हि। मैथिली साहित्यकार समाज आ राजनीतिसँ दूर रहलाह। फैशन जेकाँ साहित्य लिखल गेलै, पढ़ल गेलै आ सुनल गेलै?
राजमोहन झा:से तँ आब भऽ रहल छै। पहिनुका साहित्यकार तँ एना नञि करथि।
गजेन्द्र ठाकुर: एकटा हरिमोहन झाकेँ छोड़ि कऽ गाममे लोक कोनो दोसरक रचनाकेँ नहि पढ़ने-सुनने छथि। मिथिला मिहिर गाम-गाम जाइत छलै , बन्द भऽ गेलै, । हरिमोहन झाकेँ छोड़ि कऽ गामक लोक कोनो दोसर साहित्यकारक नामो नहि सुनने छथि। दोसर साहित्यकार हरिमोहन झा जेकाँ काज किएक नहि कऽ सकलाह?
राजमोहन झा:ई तँ एकटा मिस्ट्री जेकाँ छैक। हरिमोहन झाक साहित्य एतेक पोपुलर कोन कारणसँ भेलन्हि आ दोसर साहित्यकारक किएक नहि भेलन्हि। ओ गुण दोसर साहित्यकार सभमे किएक नहि अओलन्हि। एकर ओनो रेडीमेड सोल्युशन नहि भेटल अछि। जखन कि हरिमोहन झाक साहित्यक सेहो आलोचना होइत छैक जे साहित्यमे जै समाजकेँ ओ पेन्ट केलन्हि से सम्पूर्ण समाज नहि छै।एकटा विशेष वर्गकेँ लऽ कए ओ साहित्य रचलन्हि। दलित समाज हुनकर साहित्यसँ वंचिते जेकाँ छन्हि। तकर बावजूद एतेक पोपुलर कोना रहथि आ छथि से एखनो धरि नीक जेकाँ एक्सप्लेन नहि भेल छैक। कहल जाइत छैक जे हुनके साहित्यसँ पाठक वर्ग तैयार भेलैक पाठक रूप मे जे वर्ग एग्जिसटेन्समे आएल से हुनके साहित्यसँ।
गजेन्द्र ठाकुर:साहित्य उद्देश्यपूर्ण होएबाक चाही वा एकर उद्देश्य मात्र मनोरंजन होएबाक चाही।
राजमोहन झा:सैह सेल्फ एनेलाइज करबाक छै। मनोरंजन तँ रहबाके चाही नहि तँ क्यो पढ़बे नहि करत मुदा अन्तिम उद्देश्य मनोरंजन नहि होएबाक चाही। विभिन्न स्तरक लोकक लेल विभिन्न स्तरक साहित्य, जकर जे आवश्यकता छै तकर पूर्ति होएबाक चाही।
गजेन्द्र ठाकुर:बेर-बेर सुनबामे आबए छै जे मैथिली भाषा मरि रहल अछि। माइग्रेशन नीक चीज छियैक मुदा एक जेनेरेशनमे जाहि समाजक नब्बे प्रतिशत जनसंख्या माइग्रेट कए गेल ओहिमे तँ एहि प्रकारक वस्तु तँ अवश्य आएत। भारतसँ बाहर जे जाइत छथि हुनकर भाषा अंग्रेजी आ जे भारतमे दोसर ठाम जाइत छथि अदहा गोटे हिन्दी बाजए लगैत छथि।
राजमोहन झा:लोक मे भाषा प्रेम घटल अछि। पहिने ई नहि रहैक।लोक मैथिली छोड़ि रहल अछि।
गजेन्द्र ठाकुर: ई भारतक मैथिली भाषी प्रदेशक विषयमे तँ सत्य अछि मुदा नेपालमे हिन्दी विरोधक कारण अप्रत्यक्ष रूपसँ मैथिलीकेँ लाभ भेल छै।
राजमोहन झा:भारतमे स्थिति खराप छै।पहिलुका लोक जेना समर्पण आब लोकमे नहि छै।
गजेन्द्र ठाकुर:बबुआ जी झा “अज्ञात”केँ साहित्य अकादमी पुरस्कार देबाक अहाँ विरोध कएने रहियन्हि...
राजमोहन झा:हम विरोध नहि कएने रहियन्हि। दिल्लीमे आन-आन सभ कएने रहथि।
गजेन्द्र ठाकुर:आरम्भक तीसम अंकमे अहाँक सामूहिक वक्तव्य आएल छल। ओहिमे २००१क साहित्य अकादमी पुरस्कार बबुआजी झा “अज्ञात”क “प्रतिज्ञा पाण्डव” आ अनुवाद पुरस्कार सुरेश्वर झाकेँ देल जएबाक विरोध भेल छल। आरम्भ तँ आब लगैए बन्द भऽ गेल अछि।
राजमोहन झा:हँ।.....आरम्भ बन्द नहि भेल अछि स्थगित अछि।
गजेन्द्र ठाकुर:भालचन्द्र झाक “बीछल बेराएल मराठी”एकांकी जे मूलभाषासँ सोझे अनूदित छल, सुभाष चन्द्र यादव जीक बिहाड़ि आउ (बंगला सँ मैथिली अनुवाद) सेहो एहि तरहक सोझे अनूदित कृति छल तकरा पुरस्कार नहि भेटल। ओहि समय मे कोनो विरोध नहि भेल। मुदा अनचोक्के सभ क्यो बबुआजी झा “अज्ञात”क पाछाँ पड़ि जाइ गेलाह, हुनका बिनु पढ़ने ककरो इशारापर आ क्षुद्र उद्देश्य पूर्तिक लेल तँ ई नहि कएल गेल? जखन कि मूल समस्या मैथिलीक अछिये, पाठक शून्यता आ साहित्यक जनसँ दूर होएब आ भाषाक मृत होएबाक खतरा, तकर विरोध किएक नहि कहियो भेल?
राजमोहन झा:शैलेन्द्र कुमार झाक अनूदित संस्कार सेहो सोझे अनुवाद छल तकरो पुरस्कार नहि भेटलैक। विरोध तँ होइत अछि, मुदा लोक परवाह नहि करैत छथि।
गजेन्द्र ठाकुर:तकर कारण पाठकक कमी तँ नहि अछि? जूरी आ साहित्यकारो जखन दोसराक अनूदित आ लिखित रचनाकेँ नहि पढ़ैत छथि? सिद्धार्थ राईक नेपाली कविता संग्रहक मैथिली अनुवाद “ओ लोकनि जे नहि घुरलाह” मेनका मल्लिक द्वारा कएल गेल, २००६ ई. मे प्रकाशित भेल, मनप्रसाद सुब्बाक नेपाली कविता संग्रहक अनुवाद“अक्षर आर्केष्ट्रा” नामसँ प्रदीप बिहारी कएलन्हि, ई २००७ ई.मे प्रकाशित भेल। मुदा जे जूरी एहि पोथी सभकेँ देखबे नहि करताह तँ फेर अपन लगुआ-भिरुआकेँ अनुवाद पुरस्कार दिअओताह, भने सोझे कएल अनुवाद रहए वा नहि। ओना अकादमी द्वारा२००७ मे अनन्त बिहारी लाल दास “इन्दु” (युद्ध आ योद्धा-अगम सिंह गिरि, नेपाली) केँ अनुवाद पुरस्कार देबाक प्रशंसा होएबाक चाही। मुदा चयन प्रक्रियामे नीक चीजक निरन्तरता किएक नहि रहैत अछि?
राजमोहन झा:नञि विरोध तँ होइत रहैत छैक, होएबाक चाही। सोझे अनुवाद कएल पोथी पुरस्कारक पात्र अछि।
गजेन्द्र ठाकुर:मुदा जूरीमे तँ सभटा पुरने लोक सभ छथि । पुरना लोकमे पहिल कथा, पहिल कविता, पहिल नाटक, पहिल पत्र-पत्रिका आदिक उपधि लेल घमासान होइत रहैत अछि। कोनो पत्र-पत्रिका जे छपलक सएह पढ़लक ताहिसँ कोनो मतलब नहि। पुरना लोकमे अहाँक हिसाबे भाषा प्रेम बेशी रहए।
राजमोहन झा:नञि एहि तरहक जूरीक विरोध होइत रहल छैक। आइ काल्हिक साहित्यकारमे गुटबन्दी बेशी भेल अछि। पहिने नहि रहए।
गजेन्द्र ठाकुर:एहि बेर फ्रेंच भाषाक जीन मेरी गुस्ताव ली क्लाजियोकेँ नोबल पुरस्कार भेटलन्हि। मेरिकाक न्यू जर्सीक फिलिप रॉथ पिछड़ि गेलाह। कहल गेल जे अमेरिकामे जे आत्ममुग्धताक स्थिति अछि ताहि कारणसँ ओतए अनुवादपर ध्यान नहि देल जाइत अछि आ ताहि कारणसँ ओकर साहित्य पाछाँ भए गेल अछि। ई आत्ममुग्धता मैथिलीक सम्दर्भमे कतेक अछि।
राजमोहन झा:टांशलेशन तँ बहुत जरूरी छैक। तखने तँ कम्पेरीजन कए सकब।जीवनानुभवसँ लोक लिखैत अछि, जरूरी छै, तकरा अनुवाद आर विस्तार प्रदान करत।

पोथी समीक्षा

सन्तोष कुमार मिश्र केर कथा संग्रह पोसपुत प्राप्त भेल अछि। नेपालक एहि कथाकारक सात गोट कथा पोसपुत, एकटा ब्यथा पत्रमे, जखन कनिञा भेलखिन बिमार, सिपाहि, डाक्टर, भाग्य अप्पन-अप्पन आ’ दाग एहिमे सम्मिलित अछि। कथावस्तु प्रस्तुत करबासँ पहिने एकर अन्य पक्ष पर चर्च करब आवश्यक।

पहिल गप जे एहि पुस्तकक समीक्षासँ एकर प्रारम्भ भेल अछि। श्री कालीकान्त ‘तृषित’, देपुरा रुपैठा, जनकपुर एकर सांगोपांग समीक्षा कएलन्हि अछि, आ’ ई कथाकारक उच्च मानसिकता अछि जे ओ’ एहि समीक्षाकेँ उचित रूपमे लेलन्हि, कारण जौँ से नहि रहैत तँ एकर एहि रूपमे स्थान पोथीमे नहि भेटैत।

दोसर गप जे ई पोथी एक दिशिसँ देखला उत्तर देवनागरीमे आ’ दोसर दिशिसँ देखला उत्तर मिथिलाक्षरमे लिखल बुझि पड़ैत अछि आ’ से अछियो। 21म शताब्दीक ई प्रायः एहि तरहक प्रथम प्रयास अछि, जे मैथिलीमे देखबामे आएल अछि।

आब पहिने तृषित जीक समालोचना देखैत छी। ओ’ लिखैत छथि, जे कथाकारक कथामे पलायनवादी सोचक प्रधानता रहैत अछि, संगहि ईहो गप उठबैत छथि जे साहित्य सृष्टाकेँ तटस्थ प्रस्तोता होयबाक चाही आकि पथ प्रदर्शक, पलायनवादे होयबाक चाही आकि संघर्षक प्रेरणाश्रोत?
‘पोसपुत’क विषयमे तृषित जी कहैत छथि, जे एहिमे तीनपुस्तक वर्णन अछि, आ’ राजा महेन्द्र आ’ राजा त्रिभुवनक समयमे भेल घटनाक वर्णन जोड़बाक अभिप्राय स्पष्ट नहि अछि।
’एकटा व्यथा पत्रमे’ केर विषयमे ऋषित कहैत छथि जे कालक गति , लोकक विवशता आ’ अनुभूतिक वर्णन अछि एहिमे।
तेसर कथा ‘ जखन कनिञा भेलखिन बिमार’ केँ तृषित जी बिमार कथा घोषित करैत छथि।
‘सिपाही’ कथामे ओहि पदक विवरण अछि जे विवाह दानमे प्राथमिकता पबैत छल आ’ आब त्याज्य भ’ गेल अछि।

‘डॉक्टर’ कथाकेँ तृषितजी पलायनवादी सोचक पराकाष्ठा कहैत छथि। तृषितजीक विचारेँ डॉक्टरकेँ मरैत दम तक रोगीकेँ बचेबाक प्रयास करबाक चाही।
’भाग्य अपन अपन’ भाग्य चक्र पर आधारित अछि। ‘दाग’मे क्षणिक आवेशमे उठाओल गेल डेग, अपरिपक्व उम्रमे भेल प्रेमविवाह फेर तकरा बाद दोसराक संग भागि जायब ई सभ पथभ्रष्टताक प्रतीक अछि।
पोसपुत आत्मकथात्मक शैलीमे लिखल गेल अछि, मुदा एकर समापन अकस्मात् होइत अछि, पोसपुतक किरदानीसँ आ’ मायक नैहरि जएबासँ।
दोसर कथा पत्र शैलीमे अछि, जतय पोस्पुत कथा जेकाँ पात्र संतोष छथि। एहि कथाक समापन सेहो बड्ड हड़बड़ीमे भेल अछि, आ’ घटनाक तारतम्य लेखकसँ पाठक धरि नहि पहुँचि सकल।
ओहिना जखन कनिञा भेलखिन बिमारमे लेखक अपन कथ्य स्पष्ट नहि कए सकलाह।
सिपाहि कथामे सेहो पात्रक नाम संतोष छन्हि, मुदा कथ्य आत्मकथात्मक नहि अछि। डॉक्टरकेँ देशमे सेवा करबाक पुरस्कार भेटलैक प्रमाण-पत्रक रद्द होयब आ’ से ओकरा हेतु प्राणघातक सिद्ध भेल।भाग्य अपन-अपन पुरान खिस्सा कहबाक शैलीमे अछि, जे राजा देशमे सर्वेक्षण करएबाक हेतु राजकुमारकेँ पठबैत छथि आ’ ई कथ नीक बनि पड़ल अछि। दाग कथा कथात्मक अछि आ’ हड़बड़ीमे लिखल भाषित होइत अछि।

एहि कथा संग्रहकेँ तृषित जी समीक्षाक संग भाषायी रूपसँ संपादित नहि कएलन्हि, कारण एहिमे मानकताक अभाव अछि। प्रूफ रीडिंग सेहो नीक जेँका नहि भेल अछि। मानकताक हेतु विदेह आ’ मिथिला मंथनसँ प्रयास शुरू भेल अछि, आ’ विदेहक रचना लेखन स्तंभमे एकरा स्थान देल गेल अछि।केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान, मैसूर द्वारा सेहो मैथिली स्टाइल मैनुअलक निर्माण भ’ रहल अछि, आवश्यकता अछि, जे नेपालक विद्वान लोकनि सेहो अपन मत मैथिली अकादमीक मानक निर्धारण शैलीक आधार पर बनाओल जा’ रहल शैली पर देथि, जाहिसँ ई सर्वग्राह्य होए।
समयकेँ अकानैत
पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण,( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंहक रचनाक पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि।।
पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत अछि। एहिमे युवा कविक ४८ गोट पद्यक संग्रह अछि। एहिमे कविक १९९६ केर ३ टा, १९९८ केर ६ टा १९९९ केर ६ टा, २००० केर ५ टा, २००१ केर ३ टा, २००२ केर ३ टा, २००३ केर ९ टा आऽ २००४ केर १३ टा पद्य संकलित अछि। कवि नहिये जोनापुरकेँ बिसरैत छथि. नहिये द्वारबंगकेँ, नहिये गणेसरकेँ नहिये देवसिंहकेँ। ५ टा पद्यमे ओऽ बुद्धकेँ सेहो सोझाँ अनैत छथि| मुदा एतए ई देखब सेहो उचित होयत जे महावीर विदेहमे छह टा बस्सावास बितेलन्हि मुदा बुद्ध एकोटा नहि। से कवि जैन महावीरक प्रसंग जौँ बिसरल छथि, तँ हमरा सभ आशा करैत छी जे ई प्रसंग सभ कविक दोसर पद्य संग्रहमे सम्मिलित कएल जएतन्हि, कवि ताहि तरहक रचना सेहो रचथु।
एहि संग्रहक ४८म पद्य थीक ’समयकेँ अकानैत’ जकर नाम पर एहि पोथीक नामकरण भेल अछि।

सोहरक धुन पर समदाओन गबैत
पिंडदानक मंत्रकेँ सुभाषितानि कहैत

फेर किसिम-किसिम के तांत्रिक सब
छंदमे दैत अछि बिक्कट-बिक्कट गारि

आऽ अकानैत कवि अन्तमे कहैत छथि

कतेक आश्चर्ययक थिक ई बात
कि एहि छन्दहीन समयमे
छन्देमे निकलैत अछि
ई सबटा आवाज।

१.कजरौटी

काजर बनेबा लेल सरिसबक तेलक दीप जराओल जाइत अछि। कवि कहैत छथि,

काजरक लेल सुन्न हमर आँखि
कतेक दिनसँ तकैए कजरौटी दिस अहर्निश
मुदा मैञाक स्मृति दोषक कारणेँ वा सरिसबक तेलक
अभावक कारणेँ
हमर आँखि जकाँ आब कजरौटीयो
सुखले रहैत अछि सभ दिन

कविक संवेदना मोनकेँ सुन्न आकि झुट्ठ कए दैत अछि, के एहन संवेदनाक अनुभव नहि करत, कविताक पाठक नहि बनत?

२.खबरि

ओहिना खबरि देखैत रहब प्रूफ
भीजल जारनि जेकाँ धुँआइत-धुँआइत
जरि जायब एहिना एक दिन

एकटा समय अबैत अछि सभक जीवननमे जखन अपन कार्यक्षेत्रक नीरसताक प्रति लोक सोचए लगैत अछि, जहिना कवि एहि पद्यमे कएने छथि।

३.महापात्र

अश्पृश्यता जकर प्राचीन ग्रंथमे कोनो चरचा नहि तकर वीभत्स रूपक वर्णन १७ शब्दमे (पंक्ति ओना १२ टा अछि) कवि कएने छथि। चमैन बच्चाक जन्मसँ छठिहारि धरि सेवा करैत अछि आऽ तकर बाद अश्पृश्य भए जाइत अछि।

४.प्रेममे पड़ल लोक

प्रेममे पड़ल लोकक वर्णन मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ कवि कएने छथि।

५.हमर गाम
कवि ९ टा शब्दकेँ १० टा पाँतीमे लिखने छथि, दोसर रूपेँ कही तँ ’मोनमे” ई एकटा शब्द अछि मुदा कवि मोन आऽ मे केँ दू पाँतिमे दए गामक दृश्य उपस्थित कए देने छथि।

६. माधव हम परिणाम निरासा

विद्यापतिक जोनापुर (दिल्ली) आगमनक प्रसंग लए कवि विद्यापतिक कविताक शस्त्रक बहन्ने अपन पद्यक शस्त्र सक्षम रूपेँ चला रहल छथि।

शक्तिहीन सत्ताक दृष्टिहीन-चारण टहंकारसँ उठबैत

७.काहुक केओ नहि करए पुछारे

विद्यापतिकेँ तुरंत कयल जाय
देशसँ बाहर...

सदावत्सले मातृभूमिक बदलामे
कामिनीक नांगट देहक आ
नव अनुगामिनी राधाक कोनो बाधा नहि मानबाक
करैत अछि रसपूर्ण वर्णन

८.बोधगया ९.पुनर्निष्कासन ११. वैशाली १२.स्थविर १३.सारनाथ बुद्धक प्रसंग लए उठाओल गेल अछि।

१०.सैनिकोपाख्यानमे सैनिकक मनोव्यथा एहि रूपमे आयल अछि

बिसफीयो वला पंडितजी तँ महाराजे टा प्र लिखलनि..

आऽ

कास-पटपटीक जंगलमे
हम आइयो कटैत छी अहुरिया

१४.जुत्ता
हरिमोहन झाक जमाय पर लिखल कथा मोन पाड़ि दैत अछि।

१५.छठिहारसँ पहिने
छठिहारक राति बिधना भाग्य लिखैत छथि, मुदा कवि कहैत छथि जे जे बिधना की लिखत से हमर चानी आ तरहत्थ चीन्हैत अछि।

१६.बनारस : किछु चित्र
काशीक विश्वनाथक चित्र सोझाँ अबैत अछि वाराणसीक नाम लेने, मुदा कवि बनारसक चित्र खेंचि दैत छथि,
बनारस
बेर-बेर गनैत अछि लहास
१७.मनियाडरक दूपतिया
डाकपीन दू टाका सैकड़ाक दरसँ कमीशन पहिने कटैए
टाका दैत पढ़ि कए सुनबैए-

मनियाडर पाइक संगे संदेश सेहो अनैत अछि, ओहिमे जे छोट स्थान देल रहैत अछि अंदेशक लेल ताहिमे दुइये पाँति लिखल जा सकैत अछि तेँ कवि लिखैत छथि,दूपतिया।

१८.आँखि

नोनछाह नोरक स्वाद बुझनेँ रही अनचोक्के
जखन सिरमा लग बैसल माय कनैत छलीह
गिरैत नोरसँ अनजान..
फेर-
असहाय आ बेबस नजरिसँ दुलार करैत माय
कोना ल’ सकैत छलीह कोरामे हमरा
सबहक सोझाँ
दादी आ दीदीक नजरिसँ बाँचि कए?

आपात चिकित्सा कक्षसँ घुरैत बेटाक मायक प्रति भावनाक स्फोट अछि ई पद्य।
श्री पंकज पराशर (१९७६- )। मोहनपुर, बलवाहाट चपराँव कोठी, सहरसा। प्रारम्भिक शिक्षासँ स्नातक धरि गाम आऽ सहरसामे। फेर पटना विश्वविद्यालयसँ एम.ए. हिन्दीमे प्रथम श्रेणीमे प्रथम स्थान। जे.एन.यू.,दिल्लीसँ एम.फिल.। जामिया मिलिया इस्लामियासँ टी.वी.पत्रकारितामे स्नातकोत्तर डिप्लोमा। मैथिली आऽ हिन्दीक प्रतिष्ठित पत्रिका सभमे कविता, समीक्षा आऽ आलोचनात्मक निबंध प्रकाशित। अंग्रेजीसँ हिन्दीमे क्लॉद लेवी स्ट्रॉस, एबहार्ड फिशर, हकु शाह आ ब्रूस चैटविन आदिक शोध निबन्धक अनुवाद। ’गोवध और अंग्रेज’ नामसँ एकटा स्वतंत्र पोथीक अंग्रेजीसँ अनुवाद। जनसत्तामे ’दुनिया मेरे आगे’ स्तंभमे लेखन। पराशरजी एखन हिन्दी पत्रिका ’कादम्बिनी’मे वरिष्ठ कॉपी सम्पादक छथि।
पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण,( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंहक रचनाक पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि।।
समयकेँ अकानैत


१९. रातिक तेसर पहरमे
गामसँ गेल लोक फेर नहि घुरल गाम
गाम आब दिनोमे लगैत अछि मसान

आऽ फेर असोथकित भेल ग्रामदेवता
टुकुर-टुकुर तकैत छथिन बाट

गामसँ भेल पलायनक टीस अछि ई पद्य।

२०.अन्हारक मुरुत

मुरुत ...
छोड़ि दैत अछि नियन्त्रण अपनो परसँ
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--------------------------------------
मूर्तिपूजक एहि देशमे
मूर्तिक ई इतिहास बड़ पुरान अछि।
हमरा बुझने एहि पद्य संग्रहक ई सभसँ गंभीर आऽ नीक पद्य अछि। मुरुतक स्वप्नक पोटरी देखायब आऽ बिनु प्रकाशक अन्तहीन अन्धकार दिशि बढ़ैत जाएब। मुरुत करैत अछि परम्पराक परिक्रमा आऽ फेर फेंकि देल जाइत अछि घिनाएल डबड़ामे।
२१.मृत्युक बोझ
चारि वर्षक आँखिमे खचित बाबाक नोराएल आँखि
गामक अबाल-वृद्ध सबहक अँतड़ी सुखाएल लहास
श्राद्धक, भोज खयबाक उत्साहोसँ नहि मेटाएल

म्त्युक तांडव विभिन्न कारणसँ कविक हृदय रसहीन भए गेलन्हि स कविताक नीरस हैब उचिते छन्हि से कवि कहैत छथि।

२२. हमर बाट (अग्रज अफसर कचि रमेशजी लेल)

पोथीक बात उद्वेलित करैए से नीक बात
मुदा सुविधाभोगी जीवन कए की करबै

आऽ फेर-
चलबै हमरा संग
हमर बाट पर मीता?

२३.मनोहर पोथी
जकर शिक्षा नहि बना सकतै
ओकरा जीवनकेँ मनोहर

आऽ

कि हम बचा सकबै एकरा दुनूकेँ
एहि उदारवादी आ बाजारवादी बिहाड़िसँ?

२४. हे हमर पिता!

हमरा दिक् लगलासँ भुतियाइयो जाइ


हम क’ सकी पूर्ण
अहाँ अपूर्ण यात्रा

२५.माटि

माटि चूल्हिक लेल होइ कि कोठीक लेल
आऽ
मैञा माटि चीन्हैत छथिन
हम माटि नहि चीन्ह पबैत छी

२६.माटिक गाड़ी

उसरल अछि दिवारी थान
कतय भेटत आब

२७.पूर्वज

इतिहासक कोन चक्कीमे पिसा गेलाह
हमर पूर्वज

२८.रखैल

ओ ककर तकैत अछि बाट

२९.सर्वनाम

ठीक अछि सबटा वस्तु जात

आऽ

खेत जोतबाक लेल ट्रैक्टर अछि
बड़द पोसबाक जरूरति नहि रहल आब
तखन

शहरमे संज्ञाक संकट
गाममे सर्वनाम सन हालति

३०.कान्ह पर सवार बैताल

कमलाक कथामे मिलैत बलानक कथा

आऽ
कान्ह पर लदने चलि रहल छी विशाल प्रश्नवाचक जकाँ

३१.सवयंसँ संवाद

यक्ष्मासँ जर्जरित छाती

स्वयंसँ स्वादक बात आब
टारल नहि जा सकैए बेशी दिन

३२. छोट-छोट चीजक मादे एकालाप

पोथीक बीचमे राखल मोरक पंख

पद्य पढ़नहारकेँ सेहो बहुत किछु मोर पाड़ि दैत छथिन्ह कवि।

३३. बीसम शताब्दीक श्वेतपत्र

पत्नी कहैत गेलि
वस्तु अबैत गेल

आऽ
हम पड़ल छी मृत्युशय्यापर
बीसम शताब्दी जकाँ

३४. द्विज

मूल ठामसँ उखड़ल लोक
कोना जमि जाइत अछि आन ठाम
बहिन गेल छलीह सासुर आ संग हमहूँ रही
सोचैत
कि बहीन रहि सकतीह एहि ठाम

३५.हम घर कोना घुरब

कुहरैत छी मुक्तिक लेल
के करत हमरा मुक्त

३६. कुरुक्षेत्र

नागा आ कूकीक संघर्ष बढ़ले जा रहल अछि

आऽ

टाकाक रिमोटसँ संचालित
अभिनेत्रीक देह

३७.प्रश्नकालमे

कालाहांडीक निवासीक भोजन आ मुसहरीक निवासीक
जलखै बेर-बेर नचैए आँखिक आगूमे

३८. तुलसी चौरा पर जरैत दीप

रोज साँझकेँ दीप जरबैत माय
दीप जरबैत छलीह आ कि स्वयंकेँ?

३९. मोसकिल भ’ गेल अछि

इजोरिया रातिक निःशब्दामे विरहा सुनब

४०.अभिशप्त
निज गामकेँ पिकनिक स्पॉट बुझि
ओ अबैत छथिन गाम कोनो काज निकाल’ वा
मोन बहटार’

मुदा आबतँ ताहू लेल लोक गाम नहि अबैत छथि। दुर्गा पूजामे छागरक बलि चढ़ेबाक कबुलाक पूर्तियो लेल कहाँ क्यो अबैत अछि आब।

४१. खुट्टी पर टाँगल झोरा

हरदम बोध करबैत छल पिताक उपस्थितिक।

४२.साँझ होइत गाममे
निरन्तर अस्पष्ट होइत जा रहल साँझक गाछ तर
साँझमे घुरल सुग्गा जकाँ

४३. मायक लेल किछु कविता

काँकोड़ सन होइत अछि माय
जकरा प्रसवक बाद ओकर बच्चे खा जैत छैक

४४. सप्पत

आबतँ साँचे लगैए झूठ सन
आ झूठे साँच सन
४५. प्राक् इतिहास

अदौ कालसँ दिमागक खोहमे नुड़िआइत
हमर असंख्य प्राक इतिहास

४६. रामभोग

आब चुनाव-नाथसँ शुरू करैए
अयोध्या नाच

४७.संबंध

हम कोना कहि सकब
अहाँ हमर किछु नहि लगैत छी मीता

४८.समयकेँ अकानैत

एहि संग्रहक टाइटिल पद्य अछि ई कविता।
जतए छल कलमदान
ओतए एतेक रास शालिग्राम
किछुए दिनक बाद
गायब भ’ जाइत अछि
हमर अपूर्णकविता अपूर्ण लेख
मेहनतिसँ ताकल किछु महत्वपूर्ण साक्ष्य
हिन्दी कवि मुक्तबोध मोन पड़ि जाइत छथि एहि पद्यसँ। एहि संग्रहक सभटा पद्य भावना आऽ स्मृतिसँ जुड़ल अछि। आब किछु तकनीकी विषय। एहि संग्रहमे मैथिलीक मानकताक विषय किछु पाछाँ रहि गेल अछि, जेना मैथिलीमे विभक्ति संगहि बाजल आऽ लिखल जाइत अछि, मुदा संग्रहक नामसँ लए सभटा पद्यमे कवि अपन हिन्दी शिक्षाक अनुरूपेँ विभक्ति हटा कए लिखने छथि। अगिला संस्करणमे ई भाषायी असुद्धि दूर होएबाक चाही। जेना सुभाषचन्द्रजीक लेखनीमे सेहो मानकता किछु दोसर रूपेँ आयल अछि। मुदा ध्वनि विज्ञानसँ ओऽ संबंधित अछि। श्री सुभाष जी ऐछ लिखैत छथि, मुदा मैथिलीमे “अछि” एकर उच्चारण होइत अछि “अ इ छ”, हिन्दीमे ह्रस्व इ लिखल पहिने जाइत अछि मुदा बाजल बादमे जाइत अछि, देवनागरी वर्णक जेना लिखल जाइत अछि, तहिना बाजल जाइत अछि, ह्रस्व इ एकर अपवाद अछि। मुदा मैथिलीमे से नहि अछि। तहिना छै केँ छैक वा छञि, नै केँ नञि लिकल जएबाक चाही। पराशर जी मैथिलीक मैञा केर प्रयोग कएने छथि, मायक जे उच्चारण माञ कहने लिखने अबैत अछि, तकर दृष्टिसँ ई प्रयास स्तुत्य अछि। मुदा श्री सुभाषजी ( हुनकर कथा “विदेह” क एहि अंकमे ई-प्रकाशित अछि) अपन लेखनीमे मैथिलीक असल स्वरूप अनबाक लेल किंचित् प्रयोग कएने छथि, तकर किछु उद्देश्य अछि, मुदा पराशरजीक विभक्ति हटा कए लिखब मात्र टाइप दोष बनि रहि गेल अछि।
फेर दोसर गप जे ई पद्य संग्रह भावना आऽ स्मृतिक विस्फोट अछि, मुदा कखनो काल कए लगैत अछि जे हमरा सभ पद्य नहि गद्य पढि रहल छी, जापानी “हैबून” जेकाँ। से अपन पहिल पद्य संग्रहमे एतेक प्रतिभाक प्रदर्शन देने छथि पंकजजी जे हमरा सभ आसमे छी जे दोसर संग्रहमे ओऽ अपन लयबद्ध पद्यसँ हमरा सभकेँ झमारि देथि।

तेसर गप जे एहि पोथीमे आइ एस बी एन नम्बर नहि अछि। मैथिली प्रकाशनक सूचीबद्धता नहि भए पाबि रहल अछि, मुदा ई प्रायशः एहि दू-चारि सालमे प्रकाशित सभ मैथिली ग्रंथ सभक संग अछि।

आशा अछि कविक नव रचना शीघ्रा आयत।पंकज पराशरक पहिल मैथिली पद्य संग्रह ’समयकेँ अकानैत’ मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत मुदा एकर कविता सभ श्रीकान्त वर्माक मगधक अनुकृति होएबाक कारण आ रमेशक प्रति आक्षेपक कारण,( पहिनहियो अरुण कमल आ बादमे डगलस केलनर, नोम चोम्स्की, इलारानी सिंहक रचनाक पंकज पराशर द्वारा चोरिक कारण) मैथिली कविताक इतिहासमे एकटा कलंक लगा जाइत अछि।।

बाँकी अछि हमर दूधक कर्ज- एहि नामसँ १० टा गीतक संग्रह लए श्री बिनीत ठाकुर- शिक्षक, प्रगति आदर्श ई. स्कूल, लगनखेल, ललितपुर प्रस्तुत भेल छथि। ई एहि सालक दोसर पोथी छी जे देवनागरीक संग मिथिलाक्षरमे सेहो आयल अछि, आऽ एकरा हम अंशुमन पाण्डेयकेँ पठा देलियन्हि, यूनीकोडक मैपिंगक लेल, कारण विनीतजी हमरा एहि पोथीकेँ ई-मेलसँ पठेबाक अनुमति देने छथि, ताहि लेल हुनका धन्यवाद।
“भरल नोरमे” शीर्षक पद्यमे की सुतलासँ भेटलै अछि ककरो अधिकार आऽ “गाम नगरमे”- लोकतंत्रमे अपन अधिकार लऽ कऽ रहत मधेसी, ई घोषणा छन्हि कविक तँ “कोरो आऽ पाढ़ि’मे गरीब छोड़िकऽ के बुझतै गरीबीके मारि- ई कहि कवि अपन आर्थिक चिन्तन सेहो सोझाँ रखैत छथि। चहुँदिश अमङ्गलमे जङ्गलक विनाशपर –मुश्किलेसँ सुनी चिड़ियाके चिहुं-चिहुं- कहि कवि अपन पर्यावरण चिन्तन सोझाँ रखैत छथि। “जे करथि घोटाला” मे भ्रष्टाचारपर आऽ “जाइतक टुकड़ी”मे जाति प्रथापर कवि निर्ममतासँ चोट करैत छथि तँ “बेटीक भाग्यविधान”मे कविक भावना उफानपर अछि। “कम्प्युटरक दुनिया” आऽ “अङ्गरेजिया”मे कवि सामयिकताकेँ नहि बिसरल छथि तँ अन्तिम पद्य “ताल मिसरी” मे वरक सासुर प्रेम कनेक व्यंग्यात्मक सुरमे कवि कहि अपन एहि क्षेत्रमे सेहो दक्ष होएबाक प्रमाण दैत छथि। ओना तँ कविक ई प्रथम प्रकाशित कृति छन्हि, मुदा कवि जाहि लए सँ कविता कएने छथि ओऽ अभूतपूर्व रूपेँ प्रशंसनीय अछि।

संतोषजीक ई पद्य संग्रह मैथिली पद्यक भविष्यक प्रति आश्वस्ति दैत अछि। एहिमे युवा कविक २० गोट पद्यक संग्रह अछि।
संतोषजीक कविता एना किए मे स्त्रीक समस्या तँ काल्पनीक सत्यमे जीवनक दर्शनक द्वन्द सोझाँ अनैत छथि। बिचित्र कविता सेहो द्वन्दे अछि आ अएना कविकेँ अपन बचहनक स्मृतिमे लऽ जाइत छन्हि। दुविधा कवितामे कवि एहि दुविधामे छथि जे अनुभवकेँ डुमा कए आ भावनाकेँ हेरा कए जे ओ प्रेममे पड़लाह से सामाजिक अपराध अछि ! भद्रक बलि मे सगरमाथा आ मकालुकेँ नहि छोड़बाक आ कोशी आ कर्णलीकेँ खा जएबाक बिम्ब कविताकेँ सार्थक करैत अछि। पहिने नुका कऽ मारैत छल आ आब देखा कऽ मारैत अछि, ओ राक्षस जकर हाथमे कानून छैक। हमर मायकेँ बुद्धिए नहि छैक मे आजुक समाजक सत्य उद्धाटित होइत अछि जतए नीक लोक ओ अछि जे पाइवला अछि; नीक पद प्राप्ति करबाक लेल घूस देमए पड़ैत छैक आ नमहर नेता बनबाक लेल जनताकेँ धोखा देल जाइत अछि। नामी बनिञाकेँ.. कवितामे कवि नीक गबैयाक स्वर सुनला उत्तर महाँ बेकार पबैत छथि। अन्नेसँ आनन्द कविता समाजक अंधविश्वासपर कटाक्ष अछि। टहटही इजोरियासँ कविक प्रश्न आ सौन्दर्यक परिभाषा इजोरिया कवितामे भेटैत अछि तँ मायकेँ प्रश्नमे सागरक पानिसँ बेशी नोर बहाबैत माएक दर्दकेँ कवि स्वर दैत छथि। मातृभूमि आ मिथिलाक जे छी तँ कविता मिथिला आ मैथिलीकेँ समर्पित अछि तँ हमर कनिञामे हास्यक संग दहेज आ अमेल विवाहक चर्चा होइत अछि। हमर आशमे बच्चाक आ नवीन शिक्षा पद्धति, डोनेशन आधारित एडमिशनक तँ हम आ हमरमे सेहो कवि सर-समाजक नीक-अधलाह वर्णन उठा कऽ कविता बना दैत छथि। मूल्य अभिबृद्धि कर अर्थव्यवस्थाक वर्णन करैत अछि। हमर मीत जीवन-मृत्युक तँ सभामे आब केओ नहि अछि निक लोक एतऽ कहि कवि अपन व्यथा सोझाँ रखैत छथि। बाटमे डेग-डेग पर गहुमन-धामन कवि देखैत छथि, मुदा जीबनमे कविक आशावादिता घुरि अबैत छन्हि।
एहि संग्रहक पद्य भावना आ स्मृतिसँ जुड़ल अछि आ एकटा आन्तरिक भूचाल अनैत अछि। अपन एहि पद्य संग्रहमे कवि प्रतिभाक जे प्रदर्शन देने छथि से हमरा सभ आसमे छी जे हुनकर आर संग्रह सेहो अओतन्हि जे हमरा सभकेँ झमारि देत।
- गजेन्द्र ठाकुर
दिल्ली ११ जुलाइ २००९

संगीत-शिक्षा

I.

पहिने कमसँ कम 37 ‘की’ बला कीबोर्ड लिय।
एहिमे 12-12 टाक तीन भाग करू। 13 आ’ 25 संख्या बला की सा,आ’ सां दुनूक बोध करबैत अछि। सभमेँ पाँचटा कारी आ’ सातटा उज्जर ‘की’ अछि। प्रथम 12 मंद्र सप्तक, बादक 12 मध्य सप्तक आ, सभसँ दहिन 12 तार सप्तक कहबैछ। 1 सँ 36 धरि मार्करसँ लिखि लिय। 1 आ तेरह सँ क्रमशः वाम आ’ दहिन हाथ चलत।

12 गोट ‘की’ केर सेटमे 5 टा कारी आ’ सात टा उज्जर ‘की’ अछि।
प्रथम अभ्यासमे मात्र उजरा ‘की’ केर अभ्यास करू। पहिल सात टा उजरा ‘की’ सा, रे, ग, म, प, ध, नि, अछि आ’ आठम उजरा की तीव्र सं अछि जे अगूलका दोसर सेटक स अछि।
वाम हाथक अनामिकासँ स, माध्यमिका सँ रे, इंडेक्स फिंगर सँ ग ,बुढ़बा आँगुरसँ म , फेर बुढ़बा आँगुरक नीचाँसँ अनामिका आनू आ’ प, फेर माध्यमिकासँ ध, इंडेक्स फिंगरसँ नि, आ’ बुढ़बा आँगुरसँ सां। दहिन हाथसँ 12 केरसेट पर पहिल’की’ पर बुढ़बा आँगुरसँ स, इंडेक्स फिंगरसँ रे, माध्यमिकासँ ग, अनामिकासँ म, फेर अनामिकाक नीचाँसँ बुढ़बा आँगुरकेँ आनू आ’ तख बुध्बा आँगुरसँ प, इंडेक्स फिंगरसँ ध, माध्यमिकासँ नि आ’ अनामिकसँ सां। दुनू हाथसँ सां दोसर 12 केर सेटक पहिल उज्जर ‘की’ अछि। आरोहमे पहिल सेटक सां अछि तँ दोसर सेटक प्रथम की रहबाक कारण सा।
दोसर गप जे की बोर्डसँ जखन आवज निकलयतँ अपन कंठक आवाजसँ एकर मिलान करू। कनियो नीच-ऊँच नहि होय। तेसर गप जे संगीतक वर्ण अछि सा,रे,ग,म,प,ध,नि,सां एकरा देवनागरीक वर्ण बुझबाक गलती नहि करब। आरोह आ’ अवरोहमे कतेक नीच-ऊँच होय तकरे टा ई बोध करबैत अछि। जेना कोनो आन ध्वनि जेनाकि क केँ लिय आ, की बोर्ड पर निकलल सा,रे...केर ध्वनिक अनुसार क ध्वनिक आरोह आ’ अवरोह करू।
ई जे सातो स्वरक वर्णन पिछला अंकमे देल गेल छल ओकरासँ आगू आऊ। एहि सातू स्वरमे षडज आ’ पंचम मने सा आ’ प अचल अछि, एकर सस्वर पाठमे ऊपर नीचाँ होयबाक गुंजाइस नहि छैक। सा अछि आश्रय आकि विश्राम आ’ प अछि उल्लासक भाव। शेष जे पाँचटा स्वर अछि से सभटा चल अछि, मने ऊपर नीचाँक अर्थात् विकृतिक गुंजाइस अछि एहिमे। सा आ’ प मात्र शुद्ध होइत अछि। आ’ आब विकृति भ’ सकैत अछि दू तरहेँ शुद्धसँ ऊपर स्वर जायत किंवा नीँचा। जदि ऊपर रहत स्वर तँ कहब ओकरा तीव्र आ’ नीचाँ रहत तँ कोमल कहायत। म कँ छोड़ि कय सभ अचल स्वरक विकृति होइत अछि नीचाँ, तखन बुझू जे “रे, ग,ध, नि” ई चारि टा स्वरक दू टा रूप भेल कोमल आ’ शुद्ध। ’म’ केर रूप सेहो दू तरहक अछि, शुद्ध आ’ तीव्र। रे दैत अछि उत्साह ग दैत अछि शांति म सँ होइत अछि भय ध सँ दुःख
आ’ नि सँ आदेश। शुद्ध स्वर तखन होइत अछि, जखन सातो स्वर अपन निश्चित स्थान पर रहैत अछि। एहि सातो पर कोनो चेन्ह नहि होइत अछि।
जखन शुद्ध स्वर अपन स्थानसँ नीचाँ रहैत अछि तँ कोमल कहल जाइत अछि, आ’ ई चारिटा होइत अछि एहिमे नीचाँ क्षैतिज चेन्ह देल जाइत अछि, यथा- रे॒, ग॒, ध॒, नि॒।

शुद्ध आ’ मध्यम स्वर जखन अपन स्थानसँ ऊपर जाइत अछि, तखन ई तीव्र स्वर कहाइत अछि, एहिमे ऊपर उर्ध्वाधर चेन्ह देल जाइत अछि। ई एकेटा अछि- म॑।
एवम प्रकारे सात टा शुद्ध यथा- सा,रे,ग, म, प, ध, नि, चारिटा शुद्ध यथा- रे॒,ग॒,ध॒,नि॒ आ’ एकटा तीव्र यथा म॑ सभ मिला कय १२ टा स्वर भेल।
एहिमे स्पष्ट अछि जे सा आ’ प अचल अछि, शेष चल किंवा विकृत।
आब फेर कीबोर्ड पर आऊ। 37 टा की बला कीबोर्ड हम एहि हेतु कहने चालहुँ,किएक तँ 12, 12, 12 केर तीन सेट आ, अंतिम 37म तीव्र सां केर हेतु।
सप्तक मे सातटा शुद्ध आ’ पाँचटा विकृत मिला कय 12 टा भेल!
वाम कातसँ 12 टा उजरा आ’ कारी की मंद्र सप्तक, बीच बला 12 टा की मध्य सप्तक आ, 25 सँ 36 धरि की तार सप्तक कहल जाइत अछि।

आरोह- नीचाँ सँ ऊपर गेनाइ, जेना मंद्र सप्तकसँ मध्य सप्तक आ’ मध्य सप्तकसँ तार सप्तक।
मंद्र सप्तकमे नीचाँ बिन्दु, मध्य सप्तक सामान्य आ’ तार सप्तकमे ऊपर बिन्दु देल जाइत अछि, यथा-
स़, ऱ,ग़,म़,प़,ध़,ऩ सा,रे,ग,म,प,ध,नी ‍ सां,रें,गं,मं,पं,धं,निं
अवरोह- तारसँ मध्य आ’ मध्यसँ मंद्र केँ अवरोह कहल जाइत अछि।

वादी स्वर- जाहि स्वरक सभसँ बेशी प्रयोग रागमे होइत अछि। समवादी स्वर- जकर प्रयोग वादीक बाद सभसँ बेशी होइत अछि। अनुवादी स्वर- वादी आ’ समवादी स्वरक बाद शेष स्वर। वर्ज्य स्वर- जाहि स्वरक प्रयोग कोनो विशेष रागमे नहि होइत अछि। पकड़- जाहि स्वरक समुदायसँ कोनो राग विशेषकेँ चिन्हैत छी।
गायन काल सेहो सभ राग-रागिनीक हेतु निश्चित रहैत अछि। 12 बजे दिनसँ 12 बजे राति धरि पूर्वांग आ’ 12 बजे रातिसँ 12 बजे दिन धरि उत्तरांग राग गाओल-बजाओल जाइत अछि।
पूर्वांग रागक वादी स्वर मे कोनो एक टा (सा, रे, ग, म, प ) होइत अछि। उत्तरांगक वादी स्वरमे (म,प,ध,नि,सा)मे सँ कोनो एक टा होइत अछि। सूर्योदय आ’ सूर्यास्तक समयमे गाओल ज्आय बला रागकेँ संधि प्रकाश राग कहल जाइत अछि।
रागक जाति
रागक आरोह आ’ अवरोहमे प्रयुक्त्त स्वरक संख्याक आधार पर रागक जातिक निर्धारण होइत अछि।
एकर प्रधान जाति तीन टा अछि। 1. संपूर्ण (7) 2.षाड़व(6) 3.औड़व(5) आ’ एहिमे सामान्य स्वर संख्या क्रमशः 7,6,5 रहैत अछि।
आब एहि आधार पर तीनूकेँ फेँटू।
संपूर्ण-औरव की भेल? हँ पहिल रहत आरोही आ’ दोसर रहत अवरोही। कहू आब। (7,5) एहिमे सात आरोही स्वर संख्या आ’ 5 अवरोही स्वर संख्या अछि। संपूर्णक सामान्य स्वर संख्या ऊपर लिखल अछि(7) आ’ औड़वक (5) । तखन संपूर्ण-औड़व भेल(7,5)। अहिना 9 तरहक राग जाति होयत। 1.संपूर्ण-संपूर्ण(7,7) 2.संपूर्ण-षाड़व(7,6) 3.संपूर्ण-औड़व(7,5)
4. षाड़व-संपूर्ण- (6,7)
5. षाड़व- षाड़व - (6,6)
6. षाड़व -औड़व (6,5)
7.औड़व-संपूर्ण(5,7)
8.औड़व- षाड़व(5,6)
9. औड़व- औड़व(5,5)

थाट:
थाट- एकटा सप्तकमे सात शुद्ध, चारिटा कोमल आ’ एकटा तीव्र स्वर (12 स्वर) होइत अछि। एहिमे सात स्वरक ओ’ समुदाय, जेकरासँ कोनो रागक उत्पत्ति होइत अछि, तकरा थाट वा मेल कहल जाइत अछि।
थाट रागक जनक अछि, थाटमे सात स्वर होइत छैक(संपूर्ण जाति)। थाटमे मात्र आरोही स्वर होइत अछि। थाटमे एकहि स्वरक शुद्ध आ’ विकृत स्वर संग-संग नहि रहैत अछि। विभिन्न रागक नाम पर थाट सभक नाम राखल गेल अछि। थाटक सातो टा स्वर क्रमानुसार होइत अछि आ’ एहिमे गेयता नहि होइत छैक।
थाटक 10 टा अछि।
1.आसावरी-सा रे ग॒ म प ध॒ नि॒
2.कल्याण-सा रे ग म॑ प ध नि
3.काफी-सा रे ग॒ म प ध नि॒
4.खमाज-सा रे ग म प ध नि॒
5.पूर्वी-सा रे॒ ग म॑ प ध॒ नि 6.बिलावल-सा रे ग म प ध नि 7.भैरव-सा रे॒ ग म प ध॒ नि 8.भैरवी-सा रे॒ ग॒ म प ध॒ नि॒ 9.मारवा-सा रे॒ ग म॑ प ध नि 10.तोड़ी-सा रे॒ ग॒ म॑ प ध॒ नि

वर्ण:
वर्णसँ रागक रूप-भाव प्रगट कएल जाइत छैक। एकर चारिटा प्रकार छैक।
1.स्थायी-जखन एकटा स्वर बेर-बेर अबैत अछि।ओकर अवृत्ति होइत अछि।
2.अवरोही- ऊपरसँ नीचाँ होइत स्वर समूह, एकरा अवरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
3.आरोही- नीचाँसँ ऊपर होइत स्वर समूह, एकरा आरोही वर्ण कहल जाइत अछि।
4.संचारी-जाहिमे ऊपरका तीनू रूप लयमे होय।

लक्षण गीत: रचना जाहिमे बादी, सम्बादी,जाति आ’ गायनक समय केर निर्देशक रागक लक्षण स्पष्ट भ’ जाय।

स्थायी: कोनो गीतक पहिल भाग, जे सभ अन्तराक बाद दोहराओल जाइत अछि।
अन्तरा: जकरा एकहि बेर स्थायीक बाद गाओल जाइत अछि।
अलंकार/पलटा: स्वर समुदायक नियमबद्ध गायन/वादन भेल अलंकार।
आलाप: कोनो विशेष रागक अन्तर्गत प्रयुक्त्त भेल स्वर समुदायक विस्तारपूर्ण गायन/वादन भेल आलाप।
तान: रागमे प्रयुक्त्त भेल स्वरक त्वरित गायन/वादन भेल तान।
तानक गति द्रुत होइत अछि आऽ ई दोबर गतिसँ गायन/वादन कएल जाइत अछि।

आब आउ ताल पर। संगीतक गतिक अनूरूपेँ ई झपताल- १० मात्रा, त्रिताल- १६ मात्रा, एक ताल- १२ मात्रा, कह्रवा- ८ मात्रा दादरा- ६ मात्रा होइत अछि।
गीत, वाद्य आऽ नृत्यक लेल आवश्यक समय भेल काल आऽ जाहि निश्चित गतिक ई अनुसरण करैत अछि, से भेल लय।जखन लय त्वरित अछि तँ भेल द्रुत, जखन आस्ते-आस्ते अछि, तँ भेल विलम्बित आऽ नञि आस्ते अछि आऽ नञि द्रुत तँ भेल मध्य लय।
मात्रा ताल केर युनिट अछि आऽ एहिसँ लय केर नापल जाइत अछि।
तालमे मात्रा संयुक्त रूपसँ उपस्थित रहला उत्तर ओकरा विभाग कहल जाइत अछि- जेना दादरामे तीन मात्रा संयुक्त्त रहला उत्तर २ विभाग।
तालक विभागक नियमबद्ध विन्यास अछि छन्द।आऽ तालक प्रथम विभागक प्रथम मात्रा भेल सम आऽ एकर चेन्ह भेल + वा x आऽ जतय बिना तालीक तालकेँ बुझाओल जाइत अछि से भेल खाली आऽ एकर चेन्ह अछि ०.
ओऽ सम्पूर्ण रचना जाहिसँ तालक बोल इंगित होइत अछि, जेना मात्रा, विभाग,ताली, खाली ई सभटा भेल ठेका।
चेन्ह-
तालीक स्थान पर ताल चेन्ह आऽ संख्या।
सम + वा x
खाली ०
ऽ अवग्रह/बिकारी
- एक मात्राक दू टा बोल
- एक मात्राक चारिटा बोल
एक मात्राक दूटा बोलकेँ धागे आऽ चारि टा बोलकेँ धागेतिट सेहो कहल जाइत अछि।

तालक परिचय
ताल कहरबा
४ टा मात्रा, एकटा विभाग, आऽ पहिल मात्रा पर सम।
धागि
नाति
नक
धिन।

तीन ताल त्रिताल

१६ टा मात्रा, ४-४ मात्राक ४ टा विभाग। १,५ आऽ १३ पर ताली आऽ ९ म मात्रा पर खाली रहैत अछि।
धा धिं धिं धिं
धा धिं धिं धा
धा तिं तिं ता
ता धिं धिं धा
झपताल
१० मात्रा। ४ विभाग, जे क्रमसँ २,३,२,३ मात्राक होइत अछि।
१ मात्रा पर सम, ६ पर खली, ३,८ पर ताली रहैत अछि।
धी ना
धी धी ना

ती ना
धी धी ना

ताल रूपक
७ मात्रा। ३,२,२ मात्राक विभाग।
पहिल विभाग खाली, बादक दू टा भरल होइत अछि।
पहिल मात्रा पर सम आऽ खाली, चारिम आऽ छठम पर ताली होइत अछि।
धी धा त्रक
धी धी
धा त्रक

पाबनिक कथा

मधुश्रावणी-
श्रावण मास कृष्ण-पक्षक पञ्चमीसँ शुक्लपक्ष तृतिया धरि नाग आऽ गौरीशंकरक अभ्यर्थना कएल जाइत अछि।
मौना पञ्चमी-श्रावन मास कृष्णपक्ष पञ्चमीकेँ साँपक माए बिसहराक बर्थडे मनाओल जाइत अछि। नवविवाहिताक प्रथम वर्षक मधुश्रावणीक ई प्रथम दिन थिक । धुरखुरपर गोबरक नाग-नागिनपर सिन्दूर-पिठार लगाओल जाइत अछि आऽ पञ्चमीक माटिक थुम्हा घरमे साँप कटला उत्तर झाड़ा-फूकी लए राखि देल जाइत अछि। गोसाउनिकेँ खीर-घोरजाउड़क पातरि आऽ बिसहराकेँ नेबो,झौआ,नीमक पातरि देल जाइत अछि। गोसाउनिक, गौरीक आऽ बिसहराक गीत होइत अछि, पूजा-पाठक बाद पाँच बीनी (फकड़ा-कवित्त) तीन-तीन बेर सुनलाक बाद कथा सुनल जाइत अछि, ई सभदिन कथाक बाद दोहराओल सेहो जाइत अछि।

प्रथम दिनक कथा-

एकटा बूढ़ीकेँ धारमे नहाए काल पुरैनी पात पर पाँचटा जीव देखाइ पड़ैत छन्हि आऽ ओऽ हुनका मौना-पञ्चमीक मोन पाड़ि गाममे लोकसभकेँ पूजा करबाक लेल कहैत छन्हि। किछु गोटे गप मानैत छथि, मुदा किछु गोटे ओकरा फूसि-फटक मानैत छथि। जे सभ पूजा नञि कएलन्हि से रातियेमे मरि गेलाह। सभ दौड़ि कए पाँचो बहिन बिसहरा लग जाइ गेलाह, आऽ हुनका कहलासँ बचल खीर-घोड़जाउड़ मृतकेँ चटा देलन्हि, ओऽ सभ जीबि गेलाह आऽ मरड़ए नाम पड़लन्हि।
पाँचो बिसहरा महादेव सन्तान छलीह। साँपक पोआकेँ देखि एकदिन तमसा कए गौरी हिनकासभकेँ थकुचि देलखिन्ह।
साँझमे साँझक आऽ कोबरक गीत होइत अछि।

दोसर दिनक-कथा

मनसा महादेवक पुत्री छलीह जे जनमितहि युवती भए गेलीह आऽ लाजक रक्षाक हेतु साँप हुनका देहमे लपटाए गेल। गौरी तमसा गेलीह से हुनका कैलास छोड़ि जाए पड़लन्हि आऽ मृत्युलोकमे सभसँ पैघ व्यापारी चन्नू-चन्द्रधर हुनकर पूजा करन्हि से ओऽ इच्छा कएलन्हि, मुदा ओऽ छल महादेवक भक्त से ओऽ वाम हाथे पूजा करबाक गप कहलन्हि। ओकर छओ बेटाकेँ साँप डसि लेलक, मरि जाइ गेल। बुढारीमे चन्नूकेँ बेटा भेलन्हि मुदा ज्योतिषि कहलकन्हि जे हुनका विवाहक दिन कोबरघरमे साँप डसि लेतन्हि। ओहि बच्चाक नाम लक्ष्मीधर-बाला-लखन्दर राखल गेल, छहे-मासमे ओकर विवाह चिर-सोहागनि योगक कान्याँसँ होएब निश्चित भेल। पहाड़पर कोठामे बिज्जी आऽ बिढ़नीक पहराक बीच कान्याँ बिहुलासँ विवाह भेल। मुदा कोहबरमे साँप आयल आऽ हुनका डसि लेलक। बिहुला पतिकसंग केराक थम्हपर गंगाधारमे चलि पड़लीह आऽ प्रयाग पहुँचि गेलीह। ओतए एकटा धोबिनकेँ ओकर बच्चा तंग कए रहल छल, ओऽ ओकरा मारि नुआसँ झाँपि देलन्हि आऽ कपड़ा खीचलाक बाद ओकरा जिआ देलन्हि। दोसर दिन जखन ओऽ अएलीह तखन बिहुला हुनकासँ अपन व्यथा सुनओलन्हि। फेर हुनका संग इन्द्रक दरबार गेलीह आऽ बिसहराक पैर पकड़ि कहलन्हि जे यदि हुनकर पति आऽ छबो भैंसुर जीबि जएताह तखन ओऽ बिसहरा पूजा करबो करतीह आऽ मृत्युलोकमे ओकर प्रचार सेहो करतीह। सभ जीबि गेल आऽ बिसहराक पूजा शुरू भेल।

बिसहरा कथा-कश्यप मुनिकेँ कद्रूसँ एक हजार साँप भेल आऽ कशप मुनि विष झारबाक मन्त्र बनओलन्हि, तपस्या कए मनसँ बिसहरा बनओलन्हि से भेलीह मनसा। ओऽ कैलास आऽ पुष्कर गेलीह फेर बूढ़ तपस्वीसँ हुनकर विवाह भेलन्हि, ताहिसँ आस्तीक नामक पुत्र भेलन्हि। राजा जनमेजयक सर्प-यज्ञमे जड़ल सर्पसभके आस्तीक बचा लेलन्हि। आषाढ़क संक्रान्तिसँ नाग-पंचमी धरि बिसहराक पूजा पसीझक डारिपर होइत अछि।
मंगला-गौरी कथा- श्रुतकीर्ति राजाकेँ बेटा नहि छलन्हि, भगवतीक उपासना कएल। भगवती कहलन्हि जे सर्वगुणी बेटा १६ वर्ष आयुक होएत आऽ महामूर्ख बेटा दीर्घायु होएत, से केहन वर चाही। राजा सर्वगुणी बेटाक वर मँगलन्हि।
मन्दिरक सोझाँक आमक गाछसँ आम तोड़ि ओऽ अपन पत्नीकेँ खुआ देलन्हि आऽ पुत्र जे प्राप्त भेल ओकर नाम चिरायु राखल। १६ वर्ष पूर्ण भेलापर रानीक भाए संगे राजकुमार चिरायु काशी चलि गेलाह। माम भागिन जे काशी लेल बिदा भेलाह तँ रस्तामे आनन्दनगर राज्यमे बीरसेन राजाक पुत्री मंगलागौरीक विवाह होमए बला छल। ओऽ सखी-बहिनपा संग फूल लोढ़ए लेल फुलवारीमे आयल छलीह तँ गपे-गपमे एकटा सखी हुनका राँड़ी कहि देलखिन्ह, तँ ओऽ कहलन्हि जे हम गौरकेँ तेना गोअहरने छी जे जाहि वरक माथपर हमर हाथक अक्षत पड़त से अल्पायु रहबो करत तँ दीर्घायु भए जाएत। ओहि राजकुमारेक विवाह बाह्लीक देशक राजा दृढ़वर्माक बेटा सुकेतुसँ हेबए बला रहए। ओही फुलबारीमे माम-भागिन रहथि, आऽ साँझमे बर-बरियाती सभ सेहो अएलाह। वर महामूर्ख आऽ बहीर छल से ओऽ लोकनि राति भरि लेल चिरायुकेँ वर बनबाक आग्रह कएलन्हि। चिरायु गौरी-शंकरक प्रतिमाक समक्ष सिन्दूर-दान कएलन्हि। कोहबरमे वर कनिआ अएलाह तँ ओही राति चिरायुक १६म वर्ष पुरि गेलन्हि आऽ तखने गहुमन साँप डसबाक लेल आबि गेल। राजकुमारी जगले छलीह आऽ ओऽ गहुमनक सोझाँ दूध राखि देलखिन्ह आऽ पतिकेँ नहि मारबाक आग्रह कएलन्हि। गहुमन दूध पीबि पुरहरमे पैसि गेल, राजकुमारी आँगीसँ पुरहरक मुँह बन्न कए देलन्हि। राजकुमारक निन्द खुजलन्हि तँ ओऽ किछु खाए लेल मँगलन्हि। राजकुमारी हुनका खीर-लड्डू देलन्हि, हाथ धोबाक काल राजकुमारक हाथसँ पञ्चरत्न औँठी खसि पड़लन्हि से राजकुमारी उठा लेलन्हि। वर पान-सुपारी खाए सुतलाह आऽ पुरहरिक साँप रत्नक हार बनि गेल आऽ से राजकुमारी गरामे पहिरि लेलन्हि। भोरमे माम भागिनकेँ लए गेलाह मुदा सुकेतुकेँ राजकुमारी कोबरमे नहि पैसए देलखिन्ह। साल भरिक बाद प्राय विन्ध्याचलसँ जे माम-भागिन घुरि रहल छलाह तँ राजकुमारी कोठापसँ हुनका चीन्हि गेलीह। धूमधामसँ सभ घर कनिआँ लए पहुँचलाह आऽ गौरी आऽ नाग पूजाक महत्व ज्ञात भेल।


तेसर दिनक कथा

पृथ्वीक जन्म- पापसँ पृथ्वी पाताल चलि गेलीह, तखन ब्रह्मा, विष्णु प्रार्थना कए हुनका ऊपर अनलन्हि, फेर ओऽ डगमगाइत छलीह, तखन विष्णु काछु बनि नीचाँ चलि गेलाह, अपन पीठपर राखि लेलन्हि, तैयो ओऽ जल-पर भँसैत छलीह, तखन आगस्त्यक जाँघ तरसँ माटि आनल गेल, विष्णु सेहो माछ बनि माटि अनलन्हि, तकर जोड़न दए पृथ्वीकेँ स्थिर कएल गेल, जे कमी छल से भगवान वराह बनि उत्तर माथसँ पृथ्वीकेँ ठोकि कए ठीक कए देलन्हि।

समुद्र-मन्थन- देवता-दानव सुमेरुपर एकत्र भए समुद्र-मन्थनक हेतु बासुकीनागकेँ मन्दार पर्वतमे लपटाए समुद्रमे उतारल।कूर्मराजकेँ आधार बनाए मूँह दिसनसँ दानव आऽ पुच्छी दिसनसँ देवता नागकेँ पकड़ि मन्दारक मथनीसँ मंथन शुरू कएलन्हि। रगरसँ पर्वतपर गाछ-वृक्षमे आगि लागि गेल। इन्द्र वर्षा कएलन्हि, समुद्रक नूनगर पानि दूध-घी भए गेल, लक्ष्मी, सुरा आऽ उच्चैःश्रवा घोड़ा निकलल से चन्द्रमा-लोकनि लए लेलन्हि। अमृत लेने धन्वन्तरि बहार भेलाह, विष निकलल से महादेव कण्डमे लेलन्हि। गौरी बिसहरा,साँप,बिढ़नी,चुट्टीक मदतिसँ विश महादेवक देहसँ निकाललन्हि। अमृत लेल झगड़ा बझल, विष्णु मोहिनी बनि गेलाह। दैत्य मोहित भए अमृत-कलश हुनकर हाथमे राखि देलन्हि आऽ देवतासँ लड़ए लगलाह। विष्णु सभ देवताकेँ अमृत पिआ देलन्हि। दैत्य राहु भेष बदलि अमृत पीबए चाहलक मुदा चन्द्रमा सूर्य हुनका चीन्हि गेलखिन्ह, अम्र्त मुँसँ कंठ धरि यावत जाइत तावत विष्णु ओकर गर्दने चक्रसँ काटि देलन्हि। मुदा अमृतक जे स्पर्श ओकरा भए गेल छल से ओऽ मरल नहि, मुण्ड भाग राहु आऽ शेष भाग केतु बनि गेल, एखनो कोनो अमावस्यामे सूर्यकेँ तँ कोनो पूर्णिमामे चन्द्रमाकेँ गीड़ैत अछि, मुदा कटल मुण्ड-धरक कारण दुनू गोटे किछु कालक बाद बहार भए जाइत छथि। बचल अमृत विश्वकर्माक रखबाड़िमे इन्द्रकेँ दए देल गेल।बासुकी नागकेँ माइक श्राप नहि लगबाक आऽ जनमेजयक यज्ञमे भागिन आस्तीक द्वारा सपरिवार प्राणरक्षा होएबाक वर भेटलन्हि।

चारिम दिनक कथा
सतीक कथा- ईश्वरकेँ विश्वक सृष्टि करबाक छलन्हि, से ओऽ पहिने विष्णु, फेर शिव आऽ तखन ब्रह्माक रूपमे अवतार लेलन्हि। ओऽ तखन देवता-ऋषि-मुनि, शतरूपास्त्री, स्वायंभुव मनु, दहिना आँखिसँ अत्रि, कान्हसँ मरीचि, दहिना पाँजरसँ दक्ष-प्रजापतिक रचना कएलन्हि। मरीचीसँकश्यप, अत्रिसँ चन्द्रमा, मनुक प्रियव्रत एवं उत्तानपाद बेटा आऽ आकृति, देवहूति आऽ प्रसूति बेटी भेलन्हि। प्रसूतिक विवाह दक्ष प्रजापतिसँ आऽ ताहिसँ साठि कन्या भेल। साठिमे आठक विवाह धर्म, एगारहक कश्यप, सत्ताइसक चन्द्रमा आऽ एक गोट जिनकर नाम सती छलन्हि हुनकर विवाह महादेवसँ भेलन्हि। चन्द्रमाकेँ जे सताइस टा पत्नी भेलन्हि ताहिमेसँ ओऽ रोहिणीकेँ सभसँ बेशी मानैत छलाह, से २६ टा बहिन अपन पिता दक्षकेँ कहलनि, ओऽ शाप देलकिन्ह आऽ चन्द्रमाक शरीर घटए लगलन्हि। तखन ओऽ महादेव लग गेलाह तँ ओऽ हुनका अपन कपार पर चढ़ा लेलन्हि। एहिसँ दक्ष महादेवकेँ बारि देलखिन्ह। फेर दक्ष एकटा यज्ञ कएलन्हि आऽ शंकरकेँ नोत नहि देलन्हि। सती नैहर जएबाक लेल जिद पकड़ि लेलन्हि तँ वीरभद्रक संग शिव हुनका पठा देलन्हि। सती चलि तँ गेलीह मुदा अपमान देखि यज्ञकुण्डमे कूदि पड़लीह। वीरभद्र ई देखि दक्षक गरदनि काटि लेलन्हि।महादेवकेँ तमसायल देखि कए देवता सभ प्रार्थना कएलन्हि जे बिना जिअओने यज्ञ पूर्ण नहि होएत से यज्ञक काटल छागरक मूरी दक्षक धरपर महादेव लगा देलन्हि, आऽ ओ जीबि कए बो-बो करए लगलाह, से माहादेव ई देखि प्रसन्न भेलाह। तहियेसँ महादेवक पूजाक अन्तमे बू कहल जाए लागल। महादेव सतीक मृत शरीर लए बताह भेल फिरथि से देखि विष्णु चक्रसँ सतीक टुकड़ा कए देलन्हि आऽ जतए-जतए ओऽ टुकड़ा खसल से सभटा सिद्धपीठ भए गेल। महादेव कैलाश छोड़ि जंगलमे तपस्या करए लगलाह।
पतिव्रताक कथा- एकटा राजा छालाह। हुनका दूटाबेटी छलन्हि- कुमरव्रता आऽ पतिव्रता। कुमरव्रता नन्दनवनमे कुटीमे रहए लगलीह आऽ पतिव्रता विवाह कए सासुर चलि गेलीह। एक दिन एकटा योगीक माथपर कौआ चटक कए देलकैक तँ ओऽ शाप दए ओकरा भसम कए देलक। नन्दनवनमे आगि लागल रहए। पतिव्रता अपन बहिन कुमरव्रताक कुटी बचेबाक लेल तुलसीक बेढ़ देलन्हि ताहिमे योगीकेँ भीख देबामे देरी भए गेलैक। योगी तमसाएल तँ पतिव्रता देरीक कारण कहलन्हि। योगी बोनमे गेल तँ देखलक जे सौँसे बोनमे आगि लागल अछि मुदा कुमरव्रताक कुटी बचल अछि। ओऽ कुमरव्रताकेँ एकर रहस्य बतेलक तँ ओहो निर्णय लेलन्हि जे हमहुँ विवाह कए पतिव्रता बनब। भोरमे एकटा कुष्ठरोगीकेँ ओऽ देखलन्हि तँ हुनकेसँ विवाह कए लेलन्हि। पति हुनका कहलखिन्ह जे हमरा तीर्थ कराए दिअ। ओऽ हुनका पथियामे लए बिदा भेलीह तँ रस्तामे जखन पथिया उतारि रहल छलीह तँ चोट लागि कए एक गोट सूली पर लटकल ऋषिकेँ चोट लागि गेलैक। ओऽ भोर होइते पतिक मृत्युक शाप हुनका दए देलन्हि। से सुनि बेचारी सूर्यक उपासना करए लगलीह से पति मृत्यु पाबि फेर जीबि उठलखिन्ह आऽ एहि बेर बिना रोग व्याधिक घुरि अएलन्हि। सती,सावित्री, अनुसूया आऽ बिहुला जेकाँ सतीक अनेक उदाहरण अछि।
पाँचम दिनक कथा

दक्षक पुनर्जन्म भेलन्हि हिमालयक रूपमे, आऽ एहि जन्ममे हुनका उमा, पार्वती, गंगा, गौरी आऽ सन्ध्या ई पाँचटा कन्या भेलन्हि। हिमालय आऽ मनाइनक बेटी उमा महादेवकेँ प्राप्त करबाक लेल तपस्या करए चलि गेलीह, माय उमा कए रोकलन्हि, से नाम उमा पड़ि गेलन्हि ओऽ वरक रूपमे महादेवकेँ प्राप्त कए लेलन्हि। दोसर पुत्री पार्वती एकदिन कनकशिखरपर गेलीह आऽ बसहापर चढ़ि हुनका संग चलि गेलीह। तेसर पुत्री गंगा रहथि। एक दिन महादेव भिक्षुक भेष धए अएलाह आऽ गंगाकेँ जटामे नुकाए चलि गेलाह।

छठम दिनक कथा

सगर राजाक पत्नी रहथि शैब्या आऽ हुनकासँ असमंजस नामक पुत्र भेलन्हि। दोसर पत्नी वैदर्भीसँ कोनो बच्चा नञि भेलन्हि। वैदर्भी महादेवक तपस्या केलन्हि तँ सए बरखक बाद एकटा लोथ जन्म लेलकन्हि। महादेव अएलाह आऽ लोथकेँ साठि हजार खण्डमे काटि ओतेक तौलामे राखि झाँपि देलनि। ई सभटा किछु दिनमे पुत्रक रूप लए लेलकन्हि। सगर राजाक सएम अश्वमेध यज्ञक इन्द्र व्रोधी भेलाह कारण तखन सगर शतक्रतु इन्द्र भए जएताह। इन्द्र यज्ञक घोड़ाकेँ लए भागि गेलाह आऽ कपिलक आश्रममे बान्हि देलखिन्ह। साठियो हजार पुत्र कपिलपर दौगलाह, ओ तपस्यालीन छलाह आऽ अपन क्रुद्ध आँखि खोलि सभकेँ जरा देलन्हि। वैकुण्डसँ गंगाकेँ अनबाक लेल असमंजस आऽ तकर बाद हुनकर पुत्र दिलीप आऽ तकर बाद तिनकर पुत्र अंशुमान तपस्या करैत-करैत मरि गेलाह। अंशुमानक पुत्र भगीरथक तपस्यासँ विष्णु प्रसन्न भेला आऽ गंगाकेँ मृत्युलोक लऽ जएबाक अनुमति दए देलन्हि। महादेव हिमालयपर जाए स्वर्गसँ उतरैत गंगाकेँ अपन जटामे राखि सम्हारि लेलन्हि, मुदा जे आगू बढ़लीह तँ जहु ऋषिक कुटी दहाए लागल। जहु ऋषि गंगाकेँ पीबि गेलाह। मुदा आग्रह कएलापर ओऽ गंगाकेँ छोड़ि देलन्हि आऽ तहियासँ गंगा हुनकर पुत्री जाह्नवीक रूपमे विख्यात भेलीह। आऽ फेर अन्तमे सगरक पुत्र लोकनि द्वारा, घोड़ाक खोजमे खुनल ओहि खाधिमे खसलीह जे आब सागर कहाबए लागल आऽ एहि तरहेँ सगरक पुत्रसभकेँ सद्गति भेटलन्हि।

गौरीक जन्म- सतीक मृत्युक बाद महादेवकेँ विरक्ति भए गेलन्हि। तखन ताड़कासुर ब्रह्माकेँ प्रसन्न कए महादेवक पुत्रक अतिरिक्त ककरो आनसँ नहि मरबाक वर लए लेलक, देवताकेँ स्वर्गसँ भगा देलकन्हि। तखन देवता लोकनि महामाया दुर्गाक आराधना कएलन्हि आऽ ओ हिमालयक घरमे जन्म लेलन्हि। ओऽ बड़ गोर-नार छलीह से हुनकर नाम पड़ल गौरी। नारद एकदिन हिमालयक ओहिठाम अएलाह आऽ गौरीक हाथ देखि कहलखिन्ह जे हिनकर विवाह महादेवसँ होएतन्हि। हिमालय गौरीकेँ दूटा सखीक संग महादेवक सेवामे पठा देलखिन्ह। देवतागण कामदेवकेँ मित्र वसन्त आऽ स्त्री रतिक संग ओतए पठेलन्हि। गौरी जखन पहुँचलीह तखन कामदेव वाण चलेलखिन्ह। महादेव आँखि खोलि गौरीकेँ देखल। गौरी पूजा कएलन्हि। महादेव हुन्का देखि उपमा देलन्हि,
मुँह चन्द्रसन, आँखि कमलसन, भोँह कामदेवक धणुषसन, ठोर पाकल तिलकोरसन, नाक सुग्गाक लोलसन, बोली कोइलीसन।
मुदा तखने हुनका होश अएलन्हि ओऽ झाँकुरमे कामदेवकेँ देखलन्हि तँ तेसर नेत्र क्रोधित भए खोलि देखल तँ ओऽ जरि गेलाह। रति मूर्छित भए गेलीह। रतिक विलाप देखि देवतागण अएलाह आऽ कहलन्हि जे ताड़कासुरक वध लेल ई सभटा रचल गेल। महादेव कहलन्हि जे रति समुद्रमे शम्बर दैत्य लग जाथि। कृष्णक पुत्र प्रद्युम्नकेँ ओऽ दैत्य उठा कए लए जायत। जखन प्रद्युम्न पैघ होएताह तखन ओऽ शम्बरकेँ मारि रतिकेँ बियाहि द्वारका लए जएताह। वैह प्रद्युम्न कामदेव होएताह।

सातम दिनुका कथा

गौरी कामदेवक दहन देखि डराए गेलीह। नारद गौरीकेँ तपस्या करए लेल कहलखिन्ह। तपस्याक लेल हिमालय अपन पत्नी मैनासँ पुछलन्हि। गौरी फेर पटोर खोलि देलन्हि आऽ कृष्णाजिन आऽ बल्फर पहिरि सखी संग गौरीशिखर चोटीपर चलि गेलीह। घोर तपस्या देखि ऋषि-मुनि संग नारद महादेव लग पहुँचलाह। महादेव गौरीक परीक्षा लेल भेष बनाए गौरीशिखर पहुँचलाह आऽ महादेवक ढेर-रास निन्दा कएलन्हि। गौरी तमसाए गेलीह तँ ओऽ सोझाँ आबि गेलाह आऽ विवाहक लेल तैयार भए गेलाह।

आठम दिनक कथा
काशीमे सप्तऋषि , वशिष्ठ आऽ वशिष्ठक स्त्री अरुन्धती अएलीह। महादेव हुनका लोकनिकेँ कथा लए हिमालयक ठाम पठओलन्हि। हिमालय आऽ मैनाक आँखिसँ खुशीसँ नोर झड़ए लगलन्हि। कथा स्थिर भए गेल। नारद देवता लोकनिकेँ हकार देलन्हि। चारिम दिन बरियाती लगल। गन्धर्वराजकेँ देखि मैनाकेँ नारदकेँ पुछलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि जे ई तँ देवताक गबैया छी। फेर धर्मराज, इन्द्र सभ अएलाह। नारद सभक परिचए देलन्हि। मैना सोचलन्हि जे ई सभ एतेक सुन्दर अछि तँ महादेव कतेक सुन्दर होएताह। महादेव मैनाक मोनक गप बुझि किछु तमाशा कएलन्हि। महादेव, हुनकर गण, भूत-पिशाचकेँ देखि मैना बेहोश भए गेलीह।

नवम दिनक कथा

मैनाकेँ जखन होश अएलन्हि तँ ओऽ नारद-गौरी सभकेँ बहुत रास बात कहलन्हि आऽ विवाहसँ मना कए देलन्हि। सभ मनबए अएलन्हि तैयो नहि मानलीह। तखन महादेव अपन भव्यरूप देखेलन्हि, तँ मैना देखिते रहि गेलीह। विवाहक कार्य शुरू भेल। परिछनि, अठोंगर, गोत्राध्यायक बद कन्यादान सम्पन्न भेल आऽ ताड़कासुरकेँ मारबाक बाट सोझाँ प्रतीत भेल।
दशम दिनुका कथा

महादेव आऽ गौरीक संभोगसँ जे बच्चा होएत ओऽ पृथ्वीक नाश कए देत, ब्रह्माक ई वचन सुनि देवता लोकनि हल्ला मचा देलन्हि आऽ महादेवक अंश पृथ्वीपर खसि पड़ल। गौरी देवताकेँ सरापलन्हि जे आइ दिनसँ हुनका लोकनिकेँ सम्भोगसँ सन्तान नहि होएतन्हि। पृथ्वी अंशकेँ आगिमे आऽ आगि सरपतवनमे भार सहन नहि होएबाक कारण दए देलन्हि। ओतए छह मुँहबला बच्चा भेल, ओकरा कृत्तिकसभ पोसलन्हि तेँ नाम कार्तिकेय पड़ि गेलन्हि। गणेशक जन्मक बाद महादेव हुनका बजा लेलन्हि, देवतालोकनि हुनकर अभिषेक कए अपन सेनाध्यक्ष बना लेलन्हि। ओऽ ताड़कासुरकेँ मारि इन्द्रकेँ राज्य घुरा देलन्हि आऽ साठिसँ विवाह कएलन्हि।
गणेशक जन्म- माघसूदि त्रयोदशी सुपुष्य विष्णुव्रत एक मासमे समाप्त कए कैलाशमे गौरी-महादेव रमण करए लगलाह। विष्णु तपस्वीक भेष बनाए अएलाह आऽ भूखसँ प्राण रक्षाक गप कहलन्हि। ओछाओनपर अंश खसि पड़ल आऽ गणेशक जन्म भए गेल। समारोहमे सभ अएलाह, शनिकेँ गौरी देखए लेल कहलन्हि, मुदा हुनका देखलासँ गणेशक गरदनि कटि कए खसि पड़ल। विष्णु एकटा हाथीक गरदनि काटि लगा देलन्हि आऽ अमृत छींटि जिआ देलन्हि। गणेशक विवाह दक्षप्रजापतिक बेटी पुष्टिसँ भेलन्हि।

गौरीक नागदन्त कथा-हिमालयक आऽ मनाइनक चारिम बेटी गौरीक विवाह महादेवसँ भेल। महादेव भाभट पसारि फेर हटा लेलनि।बेटी-जमाएकेँ पुष्ट भार साँठि बिदा कएलन्हि, से सठबे नहि करन्हि। भड़कनि छुलाहि जखन धुरखुर सटि ठाढ़ भेल, तखन सभटा भार बिलाएल। एकबेर गौरी कहलन्हि जे सभक ननदि अबैत छैक, भागिन अबैत छैक। महादेव बहिन अशावरीकेँ बजेलन्हि। हुनका बेमाय फाटल छलन्हि, बेमायमे गौरीकेँ नुका लेलन्हि। गौरी कानथि तँ क्यो सुनबे नहि करन्हि। म्हादेव पुछाड़ि कएलन्हि तँ ओऽ पैर झाड़लन्हि। गौरी भटसँ खसलीह। तहिना ननदि लेल माँछ रान्हलन्हि। सभटा माँछ ननदि खाऽ गेलखिन्ह। गौरी अकछ भए ननदिकेँ बिदा कएलन्हि। गौरी गंगा जल भरए गेलीह तँ पुरबा आऽ पछबा दुनू भागिन जोरसँ बहए लागल। गौरी हाथ जोड़ि हँसी बन्न करए लेल कहलन्हि।

गौरी छिनारि/चोरनी- गौरी कहलन्हि जे छिनारिकेँ माथपर सिंह आऽ चोरनीकेँ नाङरि दए दिऔक। महादेव तथास्तु कहलन्हि। गौरी माछ आनए गेलीह तँ धारक कातमे महादेव भेष बदलि माँछ बेचबाक लेल ठाढ़ भए गेलाह। गौरीकेँ माँछ बेचबासँ मना कए देलन्हि, कहलन्हि जे हँसी-ठट्ठा करब तखने हम अहाँकेँ माँछ देब। गौरीकेँ महादेव लेल माँछ लेब जरूरी छलन्हि से ओऽ हँसी कए माछ आनि, रान्हि महादेवकेँ खोआबए बैसलीह तँ माथपर सिंघ उगि गेलन्हि। दोसर दिन महादेव गौरीकेँ जल्दीसँ खेनाइ बनाबए लेल कहलन्हि, तखने गौरीकेँ दीर्घशंका लागि गेलन्हि। ओऽ जखन दीर्घशंका कए ओकरा पथियासँ झाँपि देलखिन्ह। जखन महादेव ओम्हर अएलाह आऽ पुछलखिन्ह तँ ओऽ लजा गेलीह आऽ गप चोरा लेलन्हि। जखन महादेवकेँ ई कहलन्हि तँ हुनका नाङरि भए गेलन्हि। गौरी छिनारि आऽ चोरनीक चेन्ह मेटएबाक अनुरोध कएलन्हि। तहियासँ ई चेन्ह मेटा गेल।
एगारहम दिनुका कथा

गौरीसँ छोट आऽ हिमालयक पाँचम बेटी संध्यासँ विवाहक लेल महादेव चोरा कए चलि गेलाह। गौरीकँ दहो-बहो नोर चुबए लगलन्हि। घामे-पसीने भए गेलीह। देहसँ मैल छुटए लगलन्हि तकरा ओऽ जमा केलन्हि आऽ साँप बनाए पथपर छोड़ि देलन्हि। महादेव जखन संध्याक संग विवाह कए अएलाह तखन ओहि साँपमे प्राण दए देलन्हि। गौरीकेँ कहलन्हि जे ई साँप, लीली, अहाँक बेटी छी आऽ एकरासँ खेलएबाक लेल संध्याकेँ अनने छी। गौरी भभा कए हँसि देलन्हि।
नाहर राजा आऽ ताँती रनिक सए बेटामे सभसँ पैघ् बेटा बैरसी महादेव लग नोकरी करए लेल गेलाह। महादेव हुनका कहलखिन्ह जे लीलीकेँ धर्मकुण्डमे स्नान कराए दियौन्ह आऽ सोहागकुण्डमे औँठा डुबा दियौन्ह। मुदा ओऽ उलटा कए देलन्हि। सोहाकुण्डमे डुबलाक कारण सोहाग बड़ पैघ भेलन्हि। मुदा धर्मकुण्डमे मात्र औँठा डुबलन्हि से ओकर लेशमात्र रहलन्हि। से ओऽ बेरसीसँ विवाह करबाक गप कहलन्हि आऽ हुनकेसँ हुनकर विवाह भेल।

रवि दिनुका पतिव्रता सुकन्याक कथा
एकटा राजा- आऽ चरिटा हुनकर रानी छलन्हि। छोटकी रानीटासँ एकटा बचिया सुकन्या भेलन्हि। एक दिन राजा सुकन्या संगे टहलैत छलाह तँ सुकन्या एकटा दिबड़ाक भीड़ देखलन्हि। ओहिमे दूटा चमकैत वस्तु सेहो छल। ओऽ ओहिमे कटकीसँ भूड़ करए चाहलन्हि, तँ ओहिमेसँ शोनित बहार भए गेल आऽ चीत्कार उठल। एकटा मुनि तपस्या कए रहल छलाह आऽ हुनकर दुनू आँखि फूटि गेल छलन्हि। राजा हाथ जोड़ि क्षमा माँगलन्हि तँ ओऽ सुकन्याकेँ सेवाक लेल माँगि लेलन्हि। राजा कुमोनसँ सुकन्याक विवाह ओहि बूढ़ ऋषिसँ करबाए देलन्हि। फेर एक दिन अश्विनीकुमार सुकन्याकेँ भेटलखिन्ह आऽ हुनका लोकनिक संग पतिकेँ गंगा स्नान करेबाक लेल कहलखिन्ह। जखने तीनू गोटे स्नान कए निकललाह तँ एके रंग-रूपक युवा आँखि सहित बाहर आबि गेलाह। आब सुकन्या हुनका चिन्हतथि कोना। तखने ओऽ देखलन्हि जे दुनू देवताक पिपनी तँ खसिते नहि छन्हि से ओऽ अपन पतिकेँ चीन्हि गेलीह। राजा बेटी-जमाएक खुशीमे भोज देलखिन्ह। देवता सभ सेहो अएलाह मुदा देवता सभ श्वनेकुमारकेँ पाँतीमे बैसि कए खाए नहि देमए चाहैत छलाह मुदा राजाक कहलापर हुनका सभकेँ एके पाँतीमे बैसए देलखिन्ह।

बारहम दिनुका कथा

एकटा ब्राह्मणीक सात टा बेटा छलन्हि। छोटकी पुतोहु गरीब घरक छलीह से ससु-ससुर नहि मानैत छलन्हि। हुनका गर्भ भेलन्हि तँ खीर पूरी खएबाक इच्छा पतिकेँ कहलखिन्ह। पति कहलखिन्ह जे माय हम खेत जाइत छी हमर पनपिआइमे आइ खीर-पूरी कनिआक हाथे पठा दिअ। मायकें बुझेलन्हि जे हो नञि हो, ई अपन कनिआकेँ खीर-पूरी खुआओत। से ओऽ पुतोहुक जीहपर लिखि कहलन्हि, जे घुरि कए आबी तँ ई लिखल रहबाक चाही। पुतोहु खीर-पूरी लए खेत पहुँचलीह तँ पति आधा-आधा खाए लेल कहलखिन्ह। मुदा ऒऽ जीह देखा देलखिन्ह। तखन ओऽ पीपरक धोधरिमे खीर-पूरी राखि कहलन्हि जे जाऊ, मायकेँ जीह देखा कए घुर्रि आऊ। जखन ओऽ घुरलीह तँ ओहि धोधरिक बीहड़िमे रहएबला बासुकी साँपक कनिआ, जे गर्भवती छलीह से सभटा खीर-पूरी खाऽ गेल छलीह। ओहि सापिनकेँ बाल आऽ बसन्त दूटा पोआ भेलैक। एक दिन चरबाहा सभ ओकरासभकेँ मारए लेल दौगल तँ छोटकी पुतोहू ओकरा बचेलक। फेर एकर उत्तरमे बाल-बसन्त हुनका वर मँगबाक लेल कहलखिन्ह। पुतोहू वर मँगलन्हि जे एहन कए दिअ जे हमरो नैहरक आस रहए। सैह भेल। बाल-बसन्त विदागरी करेबाक लेल पहुंचि गेलाह मनुष्यरूप धारण कए। सासुरमे बाल-बसन्त रूपमे परिचए दए कहलन्हि जे हमरा सभक जन्म बहिनक द्विरागमनक बाद भेल छल। बिदागरी कराए रस्तामे बीहरिमे पैसि कए जे निकललाह तँ पैघ घर आबि गेल। बासुकीनि स्वागत कए साँझमे सुआसिनक काज साँझमे दीअठिपर दीप जरेनाइ अछि- से कहलन्हि। बासुकीनागक फनपर ओऽ दीप जरबथि तँ ओऽ खौँझाकए पत्नीकेँ कहलन्हि जे एकरा हम डसि लेब। पत्नी मना कएलन्हि जे अजश होएत से बिदा करए दिअ। ससुर चलि जाएत तँ जे मोन होए से करब। बसुकिनी नूआ-लहठी दए बिदा करैत काल धरि ई केलन्हि जे साँप रक्षकमंत्र कनिआकेँ सिखा कए बाल-बसन्तक संग बिदा कए देलन्हि। कहलन्हि जे ई मंत्र सूतएकाल पढ़ि सूतब।

दीप-दीपहरा आगू हरा मोती मानिक भरू धरा।
नाग बड़थु, नागिन बढ़थु, पाँचो बहिन, विषहरा बढ़थु।
बाल बसन्त भैय्या बढ़थु, डाढ़ि-खोढ़ि मौसी बढ़थु।
आशावरी पीसी बढ़थु, खोना-मोना मामा बढ़थु।
राही शब्द लए सुती, काँसा शब्द लए उठी।
होइत प्रात सोना कटोरामे दूध-भात खाइ।
साँझ सुती, प्रात उठी, पटोर पहिरी कचोर ओढ़ी।
ब्रह्माक देल कोदारि, विष्णुक चाँछल बाट।
भाग-भाग रे कीड़ा-मकोड़ा, ताहि बाटे आओत।
ईश्वर महादेव, पड़ए गरुड़केँ ठाठ।
आस्तीक, आस्तीक, आस्तीक।

बासुकी डसए लए आबथि मुदा ई मंत्र सुनि घुरि जाथि। चारिमदिन सासुकेँ डसि तीन बेर नाङरि पटकि घर सोना-चानीसँ भरि देलखिन्ह।

गोसाउनिक कथा- मधस्थ राजाक एकसए एक बेटीक विवाह नाहर राजाक एकसए एक बेटासँ भेलन्हि।सभसँ पैघ भाए बैरसीक विवाह सभसँ पैघ कान्या गोसाउनीसँ भेलन्हि।विवाहकालमे बैरसीक पागसँ पहिल कनिआ महादेवक पुत्री लीली खसि पड़लन्हि। लीली लाबा बिछि खए लागलि।गोसाउनिक पिता मधस्थ सरापलन्हि जे बैरसी डेग पाछाँ पानक बिड़िया खएताह आऽ कोश पाछाँ तिरियासँ गप करताह तँ जीताह नहि तँ मरि जएताह। मुदा बैरसी लीलीकेँ मानथि। सासुरमे गोसाउनि अपन व्यथा दिअर चनाइकेँ कहलन्हि। ओऽ भाइकेँ कहलन्हि जे बाहर घुमि फिरि आऊ। तँ बैरसी ससुरक सरापक कथा कहलन्हि। मुदा चनाइ सभटा व्यवस्था कए भौजीकेँ कहलन्हि जे हम पाँच्-पाँच कोसपर ठरबाक व्यवस्था करब अहाँ भायसँगे भेष बदलि रहू आऽ संगमे पासाक गोटी लए लिअ आऽ तकरा प्रमाण रूपमे गाड़ैत जाएब। सैह भेल। पाँच विश्रामक बाद जखन सभ घुरि अएलाह, तखन गोसाउनिकेँ ओधु, कछु, महानाग, श्रीनाग, आऽ नग्नश्री नमक पाँचटा पुत्र भेलन्हि। लीली बैरसीकेँ कहलन्हि जे ई चनाइक सन्तान छी। मुदा गोसाउनि पासाक गोटी देखेलन्हि। तखन बैरसी लीलीकेँ मालभोग चौर आऽ खेड़हीक दालि आऽ गोसाउनिकेँ लोहाक चाउर आऽ पाथरक दालि सिद्ध करए कहलन्हि। मुदा तैयो लीली बुते सिद्ध नञि कएल भेलन्हि, मुदा गोसाउनि सुसिद्ध कए देलन्हि। ई देखि कए गोसाउनिक शरीर गौरवे फाटि गेलन्हि।

तेरहम दिनुका कथा

राजा श्रीकरक कन्याक टीपणिमे छाती लात, झोँटा हाथ आऽ सौतिनक पोखड़िमे अढ़ाइ झाक माटि उघब लिखल छल। हुनकर मुइलाक बाद हुनकर बेटा चन्द्रकर जंगलमे एकटा सोन्हि बना कए एकटा चेरीसंगमे दए राजकुमारीकेँ ओतए राखि देलन्हि। जंगलमे सुवर्ण राजाकेँ ओऽ भेँट भेलीह तँ दुनू गोटे जाए लगलाह तँ राजकुमारी साओन सूदि तृतियाकेँ मधुश्रावणी पाबनिक लेल सासुरक अन्न खएबाक आऽ वस्त्र पहिरबाक प्रथाक मोन पाड़ि कहलन्हि जे ई दुनू वस्तु अवश्य पठायब। राजा राज्य जाए कारीगरकेँ वस्त्रलेल कहलन्हि तँ बड़की रानी सुनि लेलन्हि आऽ वस्त्रमे छाती-लात आऽ झोँटा हाथ लिखि देबाक लेल कहलन्हि। कौआकेँ जखन ई वस्त्र पहुँचेबाक भार राज देलन्हि तँ ओऽ रस्तामे कतहु भोज-भात खए लागल आऽ सनेस पहुँचेनाइ बिसरि गेल। राजा सेहो सभटा बिसरि गेलाह। मधुश्रावणी दिन राजकुमारी गौरीक पूजन उज्जर चानन-फूलसँ कएलन्हि आऽ कहलन्हि जे जहिया राजा भेँटा होथि तहिआ हम बौक भए जाइ। जखन चन्द्रकरकेँ पता चलल जे राजकुमारी विवाह कए लेलन्हि तँ ओऽ खरचा बन्द कए देलन्हि। आब दुनू गोटे राजकुमारी अऽ चेरी सुवर्ण राजाक बड़की रानी द्वारा खुनाओल जाए रहल पोखड़िमे माटि उघए लगलीह। सुवर्ण एक दिन हिनका लोकनिकेँ देखलखिन्ह तँ हुनका सभटा मोन पड़ि गेलन्हि। ओऽ हुनका राज्य लए अनलन्हि। मुदा राजकुमारी बजबे नहि करथि। चेरी सभटा गप बुझेलन्हि तँ राजा कहलन्हि जे ई कौआक गलती अछि। तखन रानी अगिला मधुश्रावणीमे लाल चाननसँ गौर पुजलन्हि आऽ हुनकर बकार घुरि गेलन्हि आऽ सुखसँ जीवन बिताबए लगलीह।

श्रीगणेशजी मधुश्रावणी दिन मए गौरीसँ कहलन्हि जे आइ हम सोहाग मथब आऽ बाँटब। धान-धन्य, काठक तामा, नीम बेल आऽ आमक काठीसँ ओऽ सोहाग मथि सभकेँ बँटलन्हि।

झूलन

साओन मासक शुक्लपक्ष पुत्रदा एकादशीसँ प्रारम्भ भए पाँच दिनक बाद सलौनी पूर्णिमा धरि काठक झूला, आङी, टोपी, चद्दरि , रेशमी डोरीसँ सजावट कए झूला गाओल जाइत अछि।




भादवमास कृष्णपक्ष अष्टमी तिथिक १२ बजे रातिमे कृष्णक जन्म भेलन्हि।
सतयुगमे केदार नाम्ना राजा परम्परानुसार वृद्धावस्था प्राप्त भेलापर पुत्रकेँ राज्यभार दए तपस्याक लेल बोन चलि गेलाह। केदारक एकेटा पुत्री छलन्हि वृन्दा नाम्ना। ओऽ भरि जिनगी यमुना तटपर घोर तपस्या केलन्हि। अन्तमे भगवान प्रकट भए वर मँगबाक लेल कहलन्हि। वृन्दा कहलखिन्ह जे अहाँ हमर वर बनू। ओऽ बोन जतए बृन्दा तपस्या कएलन्हि वृन्दावनक नामसँ प्रसिद्ध भेल। ओतए यमुनाक नदीक निचुलका दक्षिण तटपर मधुपुरी नामक नगर बसेलक। शत्रुघन ओहि दैत्यकेँ मारि मधुपर (मथुरा) जितलन्हि। द्वापरमे ई शूरसेनक राजधानी बनल। यादव,अंधक भोज एतए राज केलन्हि। भोजराज उग्रसेनकेँ हुनकर बेटा कंस गद्दीपरसँ उतारि देलकन्हि। हुनकर बहिन यदुवंशी क्षत्रिय वासुदेवसँ बियाहल छलीह। एक दिन कंस देवकीकेँ सासुर पहुँचाबए जाऽ रहल छलाह मुदा आकाशवाणी भेल जे देवकीक आठम बच्चा कंसकेँ मारत से ओऽ अपन बहिन बहिनोईकेँ कारागारमे धऽ देलक। देवकीक सात टा सन्तानकेँ ओऽ मरबा देलक। भादव मासक रोहिणी नक्षत्रक कृष्णपक्षक अष्टमी तिथिक अन्हरियामे मूसलधार बरखामे कारागारमे प्रकाश भए गेल आऽ भगवान शंख-चक्र-गदा-पद्म लए ठाढ़ भए गेलाह, कहलन्हि जे हमरा जन्म होइत देरी वृन्दावन नन्दक घर दए आउ आऽ ओतए एकटा बचिया चण्डिका जन्म लेने अछि, ओकरा आनि कए कंसकेँ दए दिऔक। मायासँ सभ पहरेदार सूति जाएत, फाटक सभ अपने खुजि जाएत, यमुना मैय्या स्वयं रस्ता दए देतीह। वासुदेव सएह कएलन्हि। भोरमे कंस एकटा पाथरपर एकटा रजक द्वारा पटकबाय जखने ओहि बचियाकेँ मारए चाहलन्हि उड़ि गेलीह आऽ कहलन्हि जे हुनका मारए बला वृन्दावन पहुँचि गेल अछि। कंस कतेको राक्षसकेँ पठेलक कृष्णकेँ मारबाक लेल मुदा वैह सभ मारल गेल। पैघ भए कृष्ण मथुरा आबि कंसकेँ मारि माता-पिताकेँ कारागारसँ छोड़ाओल आऽ फेर किछु दिनका बाद गोपी-सखाकेँ छोड़ि द्वारका चलि गेलाह।
2.हरितालिका/ चौरचन्द्र/ अनंत चतुर्दशी- गजेन्द्र ठाकुर

हरितालिका पूजा व्रत (तीज)
तिथि भादव शुक्ल तृतियाकेँ कुमारि कन्या सोहागक लेल व्रत करैत छथि। कथा एहि प्रकारेँ अछि। सूतजी- पार्वती शिवसँ शिवसन वरप्राप्तिक व्रतक विषयमे पुछैत छथि तँ ओऽ उत्तर दैत छथि जे हिमवान पहाड़पर अहाँ भादव शुक्ल तृतियाकेँ ई व्रत कएने रही बारह वर्ष उल्टा टांग मात्र धुँआ पीबि कए, मघमे जलमे बैसि, श्रावनमासमे वर्षामे आऽ बैसाख दुपहरियामे पंचाग्निमे। तखन अहाँ पिता नारदकेँ कहलन्हि जे ओऽ पार्वतीक विवाह विष्णुसँ करओताह। ई सुनि अहाँ सखीक घरपर कानए लगलहुँ जे हम तँ पात्र शिवकेँ अपन पति बनाएब आऽ अपन सखेक संग गंगाकात खोहमे चलि गेलहुँ आऽ भादव शुक्ल तृतियाकेँ हमर बालूक प्रतिमाक पूजा कएलहुँ तखन हम आबि अहाँकेँ पति होएबाक वर देलहुँ। तखन अहाँ हमर बालुक प्रतिमाक विसर्जन कए पारण केलहुँ, तखने अहाँक पिता सेहो पहुँचि गेलाह आऽ अहाँकेँ घर अनलन्हि आऽ हमरासँ अहाँक विवाह भेल। अहाँक सखी अहाँकेँ हरिकए लए गेल छलीह तैँ एहि व्रतक नाम हरितालिका पड़ल।

चौरचनक कथा

सनत्कुमारकेँ नन्दिकेश्वर योगीन्द्र कथा सुनबैत छथि- कृष्ण मिथ्या आरोपसँ दुखित भए गणेश आऽ चन्द्रमाक पूजा कएलन्हि। पृथ्वीक भार उतारए लेल बलराम, कृष्ण आऽ कमलनाभ उत्पन्न भेलाह। कंसक वध कृष्ण कएलन्हि। मुदा कंसक ससुर जरासन्धक आक्रमण संकट देखि छप्पन करोड़ यदुवंशीक आऽ सोलह हजार आठ स्त्रीवर्गक संग द्वारका अएलाह।
संत्राजित सूर्यक उपासना द्वारका तटपर कए स्यामन्तक मणि- जे सभ दिन आठ भार सोना उत्पन्न करैत छल- पओलन्हि। ओऽ एकरा अपन भाइ प्रसेनकेँ दए देलन्हि। राजा उग्रक दुनू सन्तान छलाह- संत्राजित आऽ प्रसेन। एक दिन कृष्ण आऽ प्रसेन शिकार खेलाए लेल बोन गेलाह तँ एकटा सिह प्रसेन कए मारि मणि लए विदा भेल तँ जाम्बवान भालु ओहि सिंहकेँ मारि मणि अपन पुत्रकेँ खेलाए लेल दए देलन्हि। कृष्ण जख्न असगरे आपिस भेलाह तखन सभ हुनकापर प्रसेनक हत्या मणिक लोभमे करबाक आरोप लगओलक। तखन कृष्ण सभकेँ लए बोन गेलाह तँ सिंह आऽ प्रसेनकेँ मुइल देखलन्हि आऽ जाम्बवानक पुत्र सुकुमारक झूलामे लटकल मणि देखलन्हि। जाम्बवानक पुत्री कृष्णकेँ मणि लए भागए कहलन्हि, मुदा कृष्ण शंख फुकि सात दिन खोहमे भेल युद्धक बाद द्वारकावासी द्वारका घुरि कृष्णक अन्तिम संस्कार मृत बुझि कएल, मुदा २१ म दिन जाम्बवान हारि मानि पुत्रीक विवाह हुनकासँ कराए मणि उपहारमे देलन्हि। कष्ण ओहि मणिकेँ संत्राजितकेँ दए देलन्हि। संत्राजित हुनकापर मिथ्या आरोपसँदुखी भए अपन पुत्रीक विवाह कृष्णसँ कराओल आऽ स्यामन्तक मणि कृष्णकेँ देल मुदा कृष्ण नहि लेलन्हि।
फेर कृष्ण-बलराम जखन बाहर छलाह तखन शतधन्वा सत्राजितकेँ मारि मणि लए लेलक आऽ अक्रूर यादवकेँ दए अपने भागि गेल। सत्यभामाक कहलापर कृष्ण-बलराम ओकरा खेहारलन्हि, कृष्ण ओकरा मारल मुदा मणि नहि भेटल, ई कथा सुनिते बलरामकेँ ई शंका भेल जे कृष्ण कपट करैत छथि, से ओऽ कृष्ण द्वारका अएलाह मुदा बलराम विदर्भ चल गेलाह, अक्रूर तीर्थयात्रापर निकलि गेलाह, मणि धारण कए काशीमे सूर्यक उपासना करए लागल।
तखन नारद कृष्णकेँ भाद्र शुक्ल चौठमे चन्द्रमाक दर्शन कएलाक कारण ई कलंक लागल, से कहलनि, कारण रूपक गर्वमे चन्द्रमाकेँ गणेशजी श्राप देलन्हि जे एहि दिन हुनकर दर्शन करएबलाकेँ कलंक लागत।
ब्रह्मा-विष्णु-महेश निर्विघ्नदेवक अष्टसिद्धि पूजा कएल आऽ जखन ओऽ घुरि रहल छलाह तँ चन्द्रमा हुनकर हाथी बला मस्तक, पैघ पेट देखि कए हँसि देलन्हि आऽ ई श्राप पओलन्हि। तखन एहि चतुर्थी तिथिकेँ ब्रह्माक कहल अनुसार गणेशक पूजा भेल फेर चन्द्रमाक अनुनय-विनयपर ई वर देल जे जे क्यो भाद्र शुक्ल चौठमे हथमे फल-फूल लए मंत्रक संग अहाँ दर्शन करत ओकरा कलंक नहि लागत।
अनंत पूजा
अनन्त भादवमास शुक्ल पक्ष चतुर्दशीकेँ अनन्त पूजा होइत अछि। कथा- जुआमे हारल युधिष्ठिरकेँ बोनमे कृष्ण एहि व्रत करबाकलेल कहलन्हि आऽ कथा सुनओलन्हि। सत्ययुगमे सुमन्त नाम्ना ब्राह्मण भृगुक कन्या दीक्षासँ विवाह कएलन्हि। मुदाक शील जन्मक बाद दीक्षाक मृत्यु भए गेलन्हि। फेर सुमन्तक विवाह कर्कशासँ भेलन्हि ओऽ शीलाकेँ कष्ट देमए लागलि। फेर शीलाक विवाह कौण्डिन्यसँ भेलन्हि। दुनू गोटे अनन्त चतुर्दशीक दिन यमुना तटपर घुरैत कल जाइत छलाह तँ स्त्रीगण लोकनि हुनका बाँहिपर अनन्तक ताग बान्हि देलन्हि जाहिसँ हुनकर सभक घर गृहस्तीमे समृद्धि आयल। घरमे माणिक्य रहितहुँ ई ताग देखि एक दिन पति ओकरा तोड़ि आगिमे फेंकि देलन्हि। शील जरल डोरकेँ निकालि दूधमे राखि लेल। आब विपत्ति शुरू भए गेल आऽ घरमे आएल दरिद्रताकेँ देखि कौण्डिन्य बोन चलि गेलाह। ओतए अनन्त भगवान हुनका विष्णु लग लए गेलखिन्ह। ओऽ हुनका अनन्त व्रत १४ बरख धरि करबाक लेल कहलन्हि।

मिथिला आ संस्कृत

मिथिला आऽ संस्कृत- कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयक प्रासांगिकता
मिथिला आऽ संस्कृतक संबंध बड्ड पुरान अछि। षड् दर्शनमे चारि दर्शनक प्रारंभ एतयसँ भेल। वाजसनेयी आऽ छांदोग्यक रूपमे दू गोट वैदिक शाखा अखनो ओतय अछि, मुदा नामे मात्रेक। मिथिलामे कतोक लोक भेटताह जे मात्र विवाह कालमे वाचसनय आऽ छंदोग्यक नमसँ परिचय प्राप्त करैत छथि। बीच रातिमे पता चलैत छन्हि जे वर छांदोग्य छथि आऽ स्त्रीगणमे शोर उठैत अछि जे आबतँ दू विवाह होयत-बड्ड समय लागत। वाजसनेयी आऽ छांदोग्य क्रमशः शुक्ल यजुर्वेद आऽ सामवेदक शाखा अछि से हम सभ बिसरि गेल छी। कार्यालयक कार्यावशात्
हम इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर अऑफ आर्ट्स गेलहु तँ वेद पर एक गोट डी.वी.डी. देखबाक अवसर प्राप्त भेल।अखनो ओड़ीसा,महाराष्ट्र,केरल,कर्णाटक,आ ऽ तमिलनाडुमे वैदिक शाखा जीवित अछि, मुदा अपना अहिठाम शाखा रहितहुँ नामोसँ अर्थोसँ अनभिज्ञता।
कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालयक स्थापना प्रधानमंत्री नरसिम्हा रावक प्रयासेँ रामटेक,महाराष्ट्रमे खुजल। अल्पावधिमे ई वि.वि. संपूर्ण महाराष्ट्रमे वर्षावधि संस्कृत संभाषण शिविर चला रहल अछि। शिशुक हेतु 23 खंडमे किताब छपलक अछि,जखन की एकर भवन अखन बनिये रहल अछि।
का.सि.संस्कृत वि.वि. दरिभङ्गा बहुत रास संस्कृत-मैथिली काव्यक उद्धार कएलक मुदा आब जा कय एकर योगदान सालमे एकटा पतरा छपब धरि सीमित भय गेल छैक- आ ऽ ई विश्वविद्यालय पंचांग सेहो अपन गणनाक हेतु विवादमे पड़ि गेल अछि।
मुदा एहि अंकसँ हम एकर रचनात्मक कएल गेल कार्यक विवरण देब प्रारंभ कएल छी।

विश्वविद्यालय द्वारा 20 सालसँ ऊपर भेल जखन संस्कृत-प्राकृत देसिल बयना सँ युकत नाटक सभक आलोचनात्मक संस्करण प्रकाशित भेल,जे भाषा मिश्रणक कारणेँ जहिना ई संस्कृतक तहिना मैथिलीक रचनामे परिगणित होइत अछि।भावोद्रेकक लेल गीतराशिक रचना कोमलकांत मिथिलाभाषहिमे निबद्ध भेल। विश्वविद्यालय द्वारा पहिल संपादित ग्रंथ ज्योतिरीश्वर ठाकुरक धूर्त्तसमागम अछि।
धूर्त्तसमागम तेरहम शताब्दीमे ज्योतिरीश्वर ठाकुर द्वारा रचल गेल। ज्योतिरीश्वर ठाकुर धूर्त्तसमागममे मैथिली गीतक समावेश कएलन्हि। ई प्रहसनक कोटिमे अबैत अछि।मैथिलीक अधिकांश नाटक-नाटिका श्रीकृष्णक अथवा हुनकर वंश्धरक चरित पर अवलंबितएवं हरण आकि स्वयंबर कथा पर आधारित छल। मुदा धूर्त्तसमागममे साधु आऽ हुनकर शिष्य मुख्य पात्र अछि। धूर्त्तसमागम सभ पात्र एकसँ-एक ध्होर्त्त छथि।ताहि हेतु एकर नाम धूर्त्तसमागम सर्वथा उपयुक्त अछि।प्रहसनकेँ संगीतक सेहो कहल जाइछ,ताहि हेतु एहि मे मैथिली गीतक समावेश सर्वथा समीचीन अछि।एहिमे सूत्रधार,नटी स्नातक,विश्वनगर,मृतांगार,सुरतप्रिया,अनंगसेना,अस्ज्जाति मिश्र,बंधुवंचक,मूलनाशक आऽ नागरिक मुख्य पात्र छथि।सूत्रधार कर्णाट चूड़ामणि नरसिंहदेवक प्रशस्ति करैत अछि।फेर ज्योतिरीश्वरक प्रशस्ति होइत अछि। एहिमे एक प्रकारक एब्सर्डिटी अछि,जे नितांत आधुनिक अछि।जे लोच छैक से एकरा लोकनाट्य बनबैत छैक।

विश्वनगर स्त्रीक अभावमेब्रह्मचारी छथि।शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु मृतांगार ठाकुरक घर जाइत छथि तँ अशौचक बहाना भेटैत छन्हि। विश्वनगर शिष्य स्नातक संग भिक्षाक हेतु सुरतप्रियाक घर जाइत छथि। फेर अनंगसेना नामक वैश्याकेँ लय कय गुरु-शिष्यमे मारि बजरि जाइत छन्हि। फेर गुरु-शिष्य अनंगसेनाक संग असज्जाति मिश्रक लग जाइत छथि तँ ओतय मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।...
मिश्रजी लंपट निकलैत छथि।...जे जुआ खेलायब आ’ पांगना संगम ईएह दूटा केँ संसारक सार बुझैत छथि। असज्जति मिश्र पुछैत छथि जे के वादी आ’ के प्रतिवादी।स्नातक उत्तर दैत छथि-जे अभियोग कहबाक लेल हम वादी थिकहुँ आ’ शुल्क देबाक हेतु संन्यासी प्रतिवादी थिकाह। विश्वनगर अपन शुल्कमे स्नातकक गाजाक पोटरी प्रस्तुत करैत छथि। विदूषक असज्जाति मिश्रक कानमे अनंगसेनाक यौनक प्रशंसा करैत अछि। असज्जाति मिश्र अनंगसेनाकेँ बीचमे राखि दुनूक बदला अपना पक्षमे निर्णय लैत अछि। एम्हर विदूषक अनंगसेनाक कानमे कहैत अछि, जे ई संन्यासी दरिद्र अछि, स्नातक आवारा अछि आ’ ई मिश्र मूर्ख तेँ हमरा संग रहू। अनंगसेना चारूक दिशि देखि बजैछ , जे ई तँ असले धूर्तसमागम भय गेल।

विश्वनगर स्नातकक संग पुनः सुरतप्रियाक घर दिशि जाइत छथि।

एमहर मूलनाशक नौआ अनंगसेनासँ साल भरिक कमैनी मँगैछ। ओ’ हुनका असज्जातिमिश्रक लग पठबैत अछि। मूलनाशक असज्जातिमिश्रकेँ अनंसेनाक वर बुझैत अछि। गाजा शुल्कमे लय असज्जति मिश्रकेँ गतानि कए बान्हि तेना मालिश करैत अछि जे ओ’ बेहोश भय जाइत छथि। ओ’ हुनका मुइल बुझि कय भागि जाइत अछि।
विदूषक अबैत अछि, आ’ हुनकर बंधन खोलैत अछि आ’ पुछैत अछि जे हम अहाँक प्राणरक्षा कएल अछि, आ’ जे किछु आन प्रिय कार्य होय तँ से कहू। असज्जाति कहल जे छलसँ संपूर्ण देशकेँ खएलहुँ, धूर्त्तवृत्तिसँ ई प्रिया पाओल, सेहो अहाँ सन आज्ञाकारी शिष्य पओलक, एहिसँ प्रिय आब किछु नहि अछि। तथापि सर्वत्र सुखशांति हो तकर कामना करैत छी।

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मिथिलामे संस्कृतक स्थिति-
मिथिला क्षेत्रमे निम्न संस्थान कवि गुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय,रामटेकसँ मान्यताक आवेदन कएल अछि। जेना बिहार विद्यालय परीक्षा समितिक अस्तव्यस्तताक कारण केन्द्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्डक मान्यता प्राप्त स्कूलक संख्या बढ़ल तहिना दरभंगाक संस्कृत विश्वविद्यालयक अस्तव्यस्तताक कारण नीक संस्थान सभ मान्यताक लेल बाहरक दिशि देखलक अछि।
1.J.N.B. Sanskrit Vidyalaya Bihar Post Lagma (R.B.Pur) Via-Lohna Road, Dist. Darbhanga
2.Laxmiharikant Sanskrit Prathamik,Madhyamik Vidyalaya,Post. Jhanjharpur Bazar, Dist.Madhubani,
3.Ajitkumar Mehta Sanskrit Shikshan Sansthan Post Ladora, Dist. Samastipur.
4.Dr.Mandanmishra Sanskrit Mahavidyalaya,Post Sanjat, Dist.Begusarai
5.Saraswati Adarsha Sanskrit Mahavidyalaya,Begusarai
6.Dr.R.M.Adarsha Sanskrit Mahavidyalaya,P.O. Malighat, Mujaffarpur

एकर अतिरिक्त राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली निम्न विद्यालय सभकेँ ग्रांट दय जीवित रखने अछि।
1.J.N.B. Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya, PO. Lagma, Via - Lohna Road, Distt - Darbhanga.
2.Laxmi Devi Saraf Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya, Kali Rekha, Distt- Deoghar.
3.Rajkumari Ganesh Sharma Sanskrit Vidyapeetha, Kolahnta Patori,Distt - Darbhanga
4.Ramji Mehta Adarsh Sanskrit Mahavidyalaya,Malighat, Muzaffarpur.

एहिमे लगमाक विद्यालय कविकुलगुरु कालिदास संस्कृत विश्वविद्यालय सँ मान्यता मँगलक अछि, कियेकतँ दरभंगाक वि.वि. मे एहि तरहक कोनो परियोजनाक सर्वथा अभाव अछि।

तीस वर्ष पहिने हिन्दीमे डा. रामप्रकाश शर्म्मा लिखित मिथिलाक इतिहास सेहो प्रकाशित भेल रहय। आजुक दिन नहि तँ एकरा अपन वेबसाइट छैक नहिये दूर शिक्षाक कोनो परियोजना।
कामेश्वर सिंह संस्कृत विश्वविद्यालयसँ प्रकाशित दोसर नाटक अछि- महाकवि विद्यापतिक गोरक्षविजय नाटक। एहिसँ पहिने कृष्ण पर आधारित नाटक प्रचल छल। एहि अर्थमे ई एकटा क्रांतिकरी नाटक कहल जायत।
नाथ संप्रदाय किंवा गोरक्ष संप्रदायक प्रवर्त्तक योगी गोरक्षनाथक कथा ल’ कय एहि नाटकक कथावस्तु संगठित भेल अछि।गोरक्षनाथक गुरु मत्स्येन्द्रनाथ योग त्यागि कदलिपुरमे राजा 18 टा रानीक संग भए भोग कए रहल छथि। गोरक्ष आ’ काननीपादकेँ द्वारपाल रोकि दैत अछि।मंत्री ढोलहो पिटबा दैत अछि जे योगी सभक प्रवेश कतहु नहि हो आ’ रानी सभकेँ राजाक मोन मोहने रहबाक हेतु कहल जाइत अछि। गोरक्ष आ’ काननपाद नटुआक वेष धरैत छथि आ’ मोहक नृत्य राजाकेँ देखबैत छथि। एहि बीच राजाक एकमात्र पुत्र बौधनाथ खेलाइत-खेलाइत मरि जाइत अछि। राजाक शंका नट पर जाइत छैक तँ ओकरा मारबाक आदेश होइत छैक। नट बच्चाकेँ जिया दैत छैक। राजा हुनकर परिचय पुछैत छथि तखन ओ’ हुनका अपन पूर्व जन्मक सभटा गप बता दैत छन्हि, जे अहाँ तँ जोगी छी भोगी नहि।
एहि नातकक पात्रमे महामति(राजाक मंत्री) आ’ महादेवी- मत्स्येन्द्रनाथक ज्येष्ठ रानी सेहो छथि। मत्स्येन्द्रनाथ कदलीपुरक राजा आ’ पूर्व जन्मक योगी छथि। मत्स्येन्द्रनाथ अंतमे कहैत छथि जे गोरक्ष जेहन शिष्य हो आ’ महादेवी जेहन सभ नारी होथु। कामेश्वरसिंह दरभङ्गा संस्कृत विश्वविद्यालय द्वारा त्रैमासिकी संस्कृत पत्रिका ‘ विश्वमनीषा’ निकलैत छल। 1975 ई. सँ 1994 ई. धरि ई पत्रिका प्रकाशित होइत रहल, मुदा 14 वर्षसँ एकर प्रकाशन बंद अछि। हिन्दीमे मिथिलाक इतिहासक अतिरिक्त सात खण्डमे मैथिलीक परम्परागत नाटकक ( 1300 ई. सँ 1900ई. धरिक 16 टा नाटक)प्रकाशन कएल गेल छल। मैथिलीमे पं गोविन्द झा लिखित वातावरण नाटकक संस्कृत अनुवाद श्री पं शशिनाथ झा कएलन्हि आ’ तकरा विश्वविद्यालय प्रकाशित कएलक। ‘ स्मृति-साहस्री’ जे 20म शताब्दीक विद्वान्-साधकक जीवन पर आधारित प्रथम मैथिली महाकाव्य अछि, आ’ जकर रचयिता श्री बुद्धिधारी सिंह’रमाकर’ छथि केर प्रकाशन सेहो विश्वविद्यालय कएने अछि। रूपक समुच्चयः नामक पुस्तकमे चारि गोट रूपक अछि। एहि मे चारिम संस्कृत रूपक म.म.अमरेश्वर कृत धूर्त्तविडम्बन प्रहसनम् मैथिली अनुवादक संदेल गेल अछि। म.म. भवनाथ उपाध्यायक राजनीतिसारः सेहो मैथिली अनुवादक संग देल गेल अछि।

संप्रति विश्वविद्यालयक कार्य सालमे एकबेर पंचाङ बनेबा धरि सीमित बुझाइत अछि।

शब्द विचार

मैथिलीक मानक लेखन-शैली

१.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली।

१.मैथिली अकादमी, पटना द्वारा निर्धारित मैथिली लेखन-शैली

1. जे शब्द मैथिली-साहित्यक प्राचीन कालसँ आइ धरि जाहि वर्त्तनीमे प्रचलित अछि, से सामान्यतः ताहि वर्त्तनीमे लिखल जाय- उदाहरणार्थ-

ग्राह्य

एखन
ठाम
जकर,तकर
तनिकर
अछि

अग्राह्य
अखन,अखनि,एखेन,अखनी
ठिमा,ठिना,ठमा
जेकर, तेकर
तिनकर।(वैकल्पिक रूपेँ ग्राह्य)
ऐछ, अहि, ए।

2. निम्नलिखित तीन प्रकारक रूप वैक्लपिकतया अपनाओल जाय:भ गेल, भय गेल वा भए गेल। जा रहल अछि, जाय रहल अछि, जाए रहल अछि। कर’ गेलाह, वा करय गेलाह वा करए गेलाह।

3. प्राचीन मैथिलीक ‘न्ह’ ध्वनिक स्थानमे ‘न’ लिखल जाय सकैत अछि यथा कहलनि वा कहलन्हि।

4. ‘ऐ’ तथा ‘औ’ ततय लिखल जाय जत’ स्पष्टतः ‘अइ’ तथा ‘अउ’ सदृश उच्चारण इष्ट हो। यथा- देखैत, छलैक, बौआ, छौक इत्यादि।

5. मैथिलीक निम्नलिखित शब्द एहि रूपे प्रयुक्त होयत:जैह,सैह,इएह,ओऐह,लैह तथा दैह।

6. ह्र्स्व इकारांत शब्दमे ‘इ’ के लुप्त करब सामान्यतः अग्राह्य थिक। यथा- ग्राह्य देखि आबह, मालिनि गेलि (मनुष्य मात्रमे)।

7. स्वतंत्र ह्रस्व ‘ए’ वा ‘य’ प्राचीन मैथिलीक उद्धरण आदिमे तँ यथावत राखल जाय, किंतु आधुनिक प्रयोगमे वैकल्पिक रूपेँ ‘ए’ वा ‘य’ लिखल जाय। यथा:- कयल वा कएल, अयलाह वा अएलाह, जाय वा जाए इत्यादि।

8. उच्चारणमे दू स्वरक बीच जे ‘य’ ध्वनि स्वतः आबि जाइत अछि तकरा लेखमे स्थान वैकल्पिक रूपेँ देल जाय। यथा- धीआ, अढ़ैआ, विआह, वा धीया, अढ़ैया, बियाह।

9. सानुनासिक स्वतंत्र स्वरक स्थान यथासंभव ‘ञ’ लिखल जाय वा सानुनासिक स्वर। यथा:- मैञा, कनिञा, किरतनिञा वा मैआँ, कनिआँ, किरतनिआँ।

10. कारकक विभक्त्तिक निम्नलिखित रूप ग्राह्य:-हाथकेँ, हाथसँ, हाथेँ, हाथक, हाथमे। ’मे’ मे अनुस्वार सर्वथा त्याज्य थिक। ‘क’ क वैकल्पिक रूप ‘केर’ राखल जा सकैत अछि।

11. पूर्वकालिक क्रियापदक बाद ‘कय’ वा ‘कए’ अव्यय वैकल्पिक रूपेँ लगाओल जा सकैत अछि। यथा:- देखि कय वा देखि कए।

12. माँग, भाँग आदिक स्थानमे माङ, भाङ इत्यादि लिखल जाय।

13. अर्द्ध ‘न’ ओ अर्द्ध ‘म’ क बदला अनुसार नहि लिखल जाय, किंतु छापाक सुविधार्थ अर्द्ध ‘ङ’ , ‘ञ’, तथा ‘ण’ क बदला अनुस्वारो लिखल जा सकैत अछि। यथा:- अङ्क, वा अंक, अञ्चल वा अंचल, कण्ठ वा कंठ।

14. हलंत चिह्न नियमतः लगाओल जाय, किंतु विभक्तिक संग अकारांत प्रयोग कएल जाय। यथा:- श्रीमान्, किंतु श्रीमानक।

15. सभ एकल कारक चिह्न शब्दमे सटा क’ लिखल जाय, हटा क’ नहि, संयुक्त विभक्तिक हेतु फराक लिखल जाय, यथा घर परक।

16. अनुनासिककेँ चन्द्रबिन्दु द्वारा व्यक्त कयल जाय। परंतु मुद्रणक सुविधार्थ हि समान जटिल मात्रा पर अनुस्वारक प्रयोग चन्द्रबिन्दुक बदला कयल जा सकैत अछि। यथा- हिँ केर बदला हिं।

17. पूर्ण विराम पासीसँ ( । ) सूचित कयल जाय।

18. समस्त पद सटा क’ लिखल जाय, वा हाइफेनसँ जोड़ि क’ , हटा क’ नहि।

19. लिअ तथा दिअ शब्दमे बिकारी (ऽ) नहि लगाओल जाय।

20. अंक देवनागरी रूपमे राखल जाय।

21.किछु ध्वनिक लेल नवीन चिन्ह बनबाओल जाय। जा' ई नहि बनल अछि ताबत एहि दुनू ध्वनिक बदला पूर्ववत् अय/ आय/ अए/ आए/ आओ/ अओ लिखल जाय। आकि ऎ वा ऒ सँ व्यक्त कएल जाय।

ह./- गोविन्द झा ११/८/७६ श्रीकान्त ठाकुर ११/८/७६ सुरेन्द्र झा "सुमन" ११/०८/७६

२.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैली

मैथिलीमे उच्चारण तथा लेखन

१.पञ्चमाक्षर आ अनुस्वार: पञ्चमाक्षरान्तर्गत ङ, ञ, ण, न एवं म अबैत अछि। संस्कृत भाषाक अनुसार शब्दक अन्तमे जाहि वर्गक अक्षर रहैत अछि ओही वर्गक पञ्चमाक्षर अबैत अछि। जेना-
अङ्क (क वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ङ् आएल अछि।)
पञ्च (च वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ञ् आएल अछि।)
खण्ड (ट वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे ण् आएल अछि।)
सन्धि (त वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे न् आएल अछि।)
खम्भ (प वर्गक रहबाक कारणे अन्तमे म् आएल अछि।)
उपर्युक्त बात मैथिलीमे कम देखल जाइत अछि। पञ्चमाक्षरक बदलामे अधिकांश जगहपर अनुस्वारक प्रयोग देखल जाइछ। जेना- अंक, पंच, खंड, संधि, खंभ आदि। व्याकरणविद पण्डित गोविन्द झाक कहब छनि जे कवर्ग, चवर्ग आ टवर्गसँ पूर्व अनुस्वार लिखल जाए तथा तवर्ग आ पवर्गसँ पूर्व पञ्चमाक्षरे लिखल जाए। जेना- अंक, चंचल, अंडा, अन्त तथा कम्पन। मुदा हिन्दीक निकट रहल आधुनिक लेखक एहि बातकेँ नहि मानैत छथि। ओलोकनि अन्त आ कम्पनक जगहपर सेहो अंत आ कंपन लिखैत देखल जाइत छथि।
नवीन पद्धति किछु सुविधाजनक अवश्य छैक। किएक तँ एहिमे समय आ स्थानक बचत होइत छैक। मुदा कतोकबेर हस्तलेखन वा मुद्रणमे अनुस्वारक छोटसन बिन्दु स्पष्ट नहि भेलासँ अर्थक अनर्थ होइत सेहो देखल जाइत अछि। अनुस्वारक प्रयोगमे उच्चारण-दोषक सम्भावना सेहो ततबए देखल जाइत अछि। एतदर्थ कसँ लऽकऽ पवर्गधरि पञ्चमाक्षरेक प्रयोग करब उचित अछि। यसँ लऽकऽ ज्ञधरिक अक्षरक सङ्ग अनुस्वारक प्रयोग करबामे कतहु कोनो विवाद नहि देखल जाइछ।

२.ढ आ ढ़ : ढ़क उच्चारण “र् ह”जकाँ होइत अछि। अतः जतऽ “र् ह”क उच्चारण हो ओतऽ मात्र ढ़ लिखल जाए। आनठाम खालि ढ लिखल जएबाक चाही। जेना-
ढ = ढाकी, ढेकी, ढीठ, ढेउआ, ढङ्ग, ढेरी, ढाकनि, ढाठ आदि।
ढ़ = पढ़ाइ, बढ़ब, गढ़ब, मढ़ब, बुढ़बा, साँढ़, गाढ़, रीढ़, चाँढ़, सीढ़ी, पीढ़ी आदि।
उपर्युक्त शब्दसभकेँ देखलासँ ई स्पष्ट होइत अछि जे साधारणतया शब्दक शुरूमे ढ आ मध्य तथा अन्तमे ढ़ अबैत अछि। इएह नियम ड आ ड़क सन्दर्भ सेहो लागू होइत अछि।

३.व आ ब : मैथिलीमे “व”क उच्चारण ब कएल जाइत अछि, मुदा ओकरा ब रूपमे नहि लिखल जएबाक चाही। जेना- उच्चारण : बैद्यनाथ, बिद्या, नब, देबता, बिष्णु, बंश, बन्दना आदि। एहिसभक स्थानपर क्रमशः वैद्यनाथ, विद्या, नव, देवता, विष्णु, वंश, वन्दना लिखबाक चाही। सामान्यतया व उच्चारणक लेल ओ प्रयोग कएल जाइत अछि। जेना- ओकील, ओजह आदि।

४.य आ ज : कतहु-कतहु “य”क उच्चारण “ज”जकाँ करैत देखल जाइत अछि, मुदा ओकरा ज नहि लिखबाक चाही। उच्चारणमे यज्ञ, जदि, जमुना, जुग, जाबत, जोगी, जदु, जम आदि कहल जाएवला शब्दसभकेँ क्रमशः यज्ञ, यदि, यमुना, युग, याबत, योगी, यदु, यम लिखबाक चाही।

५.ए आ य : मैथिलीक वर्तनीमे ए आ य दुनू लिखल जाइत अछि।
प्राचीन वर्तनी- कएल, जाए, होएत, माए, भाए, गाए आदि।
नवीन वर्तनी- कयल, जाय, होयत, माय, भाय, गाय आदि।
सामान्यतया शब्दक शुरूमे ए मात्र अबैत अछि। जेना एहि, एना, एकर, एहन आदि। एहि शब्दसभक स्थानपर यहि, यना, यकर, यहन आदिक प्रयोग नहि करबाक चाही। यद्यपि मैथिलीभाषी थारूसहित किछु जातिमे शब्दक आरम्भोमे “ए”केँ य कहि उच्चारण कएल जाइत अछि।
ए आ “य”क प्रयोगक प्रयोगक सन्दर्भमे प्राचीने पद्धतिक अनुसरण करब उपयुक्त मानि एहि पुस्तकमे ओकरे प्रयोग कएल गेल अछि। किएक तँ दुनूक लेखनमे कोनो सहजता आ दुरूहताक बात नहि अछि। आ मैथिलीक सर्वसाधारणक उच्चारण-शैली यक अपेक्षा एसँ बेसी निकट छैक। खास कऽ कएल, हएब आदि कतिपय शब्दकेँ कैल, हैब आदि रूपमे कतहु-कतहु लिखल जाएब सेहो “ए”क प्रयोगकेँ बेसी समीचीन प्रमाणित करैत अछि।

६.हि, हु तथा एकार, ओकार : मैथिलीक प्राचीन लेखन-परम्परामे कोनो बातपर बल दैत काल शब्दक पाछाँ हि, हु लगाओल जाइत छैक। जेना- हुनकहि, अपनहु, ओकरहु, तत्कालहि, चोट्टहि, आनहु आदि। मुदा आधुनिक लेखनमे हिक स्थानपर एकार एवं हुक स्थानपर ओकारक प्रयोग करैत देखल जाइत अछि। जेना- हुनके, अपनो, तत्काले, चोट्टे, आनो आदि।

७.ष तथा ख : मैथिली भाषामे अधिकांशतः षक उच्चारण ख होइत अछि। जेना- षड्यन्त्र (खड़यन्त्र), षोडशी (खोड़शी), षट्कोण (खटकोण), वृषेश (वृखेश), सन्तोष (सन्तोख) आदि।

८.ध्वनि-लोप : निम्नलिखित अवस्थामे शब्दसँ ध्वनि-लोप भऽ जाइत अछि:
(क)क्रियान्वयी प्रत्यय अयमे य वा ए लुप्त भऽ जाइत अछि। ओहिमेसँ पहिने अक उच्चारण दीर्घ भऽ जाइत अछि। ओकर आगाँ लोप-सूचक चिह्न वा विकारी (’ / ऽ) लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ए (पढ़य) गेलाह, कए (कय) लेल, उठए (उठय) पड़तौक।
अपूर्ण रूप : पढ़’ गेलाह, क’ लेल, उठ’ पड़तौक।
पढ़ऽ गेलाह, कऽ लेल, उठऽ पड़तौक।
(ख)पूर्वकालिक कृत आय (आए) प्रत्ययमे य (ए) लुप्त भऽ जाइछ, मुदा लोप-सूचक विकारी नहि लगाओल जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : खाए (य) गेल, पठाय (ए) देब, नहाए (य) अएलाह।
अपूर्ण रूप : खा गेल, पठा देब, नहा अएलाह।
(ग)स्त्री प्रत्यय इक उच्चारण क्रियापद, संज्ञा, ओ विशेषण तीनूमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : दोसरि मालिनि चलि गेलि।
अपूर्ण रूप : दोसर मालिन चलि गेल।
(घ)वर्तमान कृदन्तक अन्तिम त लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप : पढ़ैत अछि, बजैत अछि, गबैत अछि।
अपूर्ण रूप : पढ़ै अछि, बजै अछि, गबै अछि।
(ङ)क्रियापदक अवसान इक, उक, ऐक तथा हीकमे लुप्त भऽ जाइत अछि। जेना-
पूर्ण रूप: छियौक, छियैक, छहीक, छौक, छैक, अबितैक, होइक।
अपूर्ण रूप : छियौ, छियै, छही, छौ, छै, अबितै, होइ।
(च)क्रियापदीय प्रत्यय न्ह, हु तथा हकारक लोप भऽ जाइछ। जेना-
पूर्ण रूप : छन्हि, कहलन्हि, कहलहुँ, गेलह, नहि।
अपूर्ण रूप : छनि, कहलनि, कहलौँ, गेलऽ, नइ, नञि, नै।

९.ध्वनि स्थानान्तरण : कोनो-कोनो स्वर-ध्वनि अपना जगहसँ हटिकऽ दोसरठाम चलि जाइत अछि। खास कऽ ह्रस्व इ आ उक सम्बन्धमे ई बात लागू होइत अछि। मैथिलीकरण भऽ गेल शब्दक मध्य वा अन्तमे जँ ह्रस्व इ वा उ आबए तँ ओकर ध्वनि स्थानान्तरित भऽ एक अक्षर आगाँ आबि जाइत अछि। जेना- शनि (शइन), पानि (पाइन), दालि ( दाइल), माटि (माइट), काछु (काउछ), मासु(माउस) आदि। मुदा तत्सम शब्दसभमे ई नियम लागू नहि होइत अछि। जेना- रश्मिकेँ रइश्म आ सुधांशुकेँ सुधाउंस नहि कहल जा सकैत अछि।

१०.हलन्त(्)क प्रयोग : मैथिली भाषामे सामान्यतया हलन्त (्)क आवश्यकता नहि होइत अछि। कारण जे शब्दक अन्तमे अ उच्चारण नहि होइत अछि। मुदा संस्कृत भाषासँ जहिनाक तहिना मैथिलीमे आएल (तत्सम) शब्दसभमे हलन्त प्रयोग कएल जाइत अछि। एहि पोथीमे सामान्यतया सम्पूर्ण शब्दकेँ मैथिली भाषासम्बन्धी नियमअनुसार हलन्तविहीन राखल गेल अछि। मुदा व्याकरणसम्बन्धी प्रयोजनक लेल अत्यावश्यक स्थानपर कतहु-कतहु हलन्त देल गेल अछि। प्रस्तुत पोथीमे मथिली लेखनक प्राचीन आ नवीन दुनू शैलीक सरल आ समीचीन पक्षसभकेँ समेटिकऽ वर्ण-विन्यास कएल गेल अछि। स्थान आ समयमे बचतक सङ्गहि हस्त-लेखन तथा तकनिकी दृष्टिसँ सेहो सरल होबऽवला हिसाबसँ वर्ण-विन्यास मिलाओल गेल अछि। वर्तमान समयमे मैथिली मातृभाषीपर्यन्तकेँ आन भाषाक माध्यमसँ मैथिलीक ज्ञान लेबऽ पड़िरहल परिप्रेक्ष्यमे लेखनमे सहजता तथा एकरूपतापर ध्यान देल गेल अछि। तखन मैथिली भाषाक मूल विशेषतासभ कुण्ठित नहि होइक, ताहूदिस लेखक-मण्डल सचेत अछि। प्रसिद्ध भाषाशास्त्री डा. रामावतार यादवक कहब छनि जे सरलताक अनुसन्धानमे एहन अवस्था किन्नहु ने आबऽ देबाक चाही जे भाषाक विशेषता छाँहमे पडि जाए। हमसभ हुनक धारणाकेँ पूर्ण रूपसँ सङ्ग लऽ चलबाक प्रयास कएलहुँ अछि।
पोथीक वर्णविन्यास कक्षा ९ क पोथीसँ किछु मात्रामे भिन्न अछि। निरन्तर अध्ययन, अनुसन्धान आ विश्लेषणक कारणे ई सुधारात्मक भिन्नता आएल अछि। भविष्यमे आनहु पोथीकेँ परिमार्जित करैत मैथिली पाठ्यपुस्तकक वर्णविन्यासमे पूर्णरूपेण एकरूपता अनबाक हमरासभक प्रयत्न रहत।

कक्षा १० मैथिली लेखन तथा परिमार्जन महेन्द्र मलंगिया/ धीरेन्द्र प्रेमर्षि संयोजन- गणेशप्रसाद भट्टराई
प्रकाशक शिक्षा तथा खेलकूद मन्त्रालय, पाठ्यक्रम विकास केन्द्र,सानोठिमी, भक्तपुर
सर्वाधिकार पाठ्यक्रम विकास केन्द्र एवं जनक शिक्षा सामग्री केन्द्र, सानोठिमी, भक्तपुर।
पहिल संस्करण २०५८ बैशाख (२००२ ई.)
योगदान: शिवप्रसाद सत्याल, जगन्नाथ अवा, गोरखबहादुर सिंह, गणेशप्रसाद भट्टराई, डा. रामावतार यादव, डा. राजेन्द्र विमल, डा. रामदयाल राकेश, धर्मेन्द्र विह्वल, रूपा धीरू, नीरज कर्ण, रमेश रञ्जन
भाषा सम्पादन- नीरज कर्ण, रूपा झा

आब १.मैथिली अकादमी, पटना आऽ २.नेपालक मैथिली भाषा वैज्ञानिक लोकनि द्वारा बनाओल मानक शैलीक अध्ययनक उपरान्त निम्न बिन्दु सभपर मनन कए निर्णय करू।
ग्राह्य/अग्राह्य
1.होयबला/ होबयबला/ होमयबला/ हेब’बला, हेम’बला/ होयबाक/ होएबाक
2. आ’/आऽ आ
3. क’ लेने/कऽ लेने/कए लेने/कय लेने/ल’/लऽ/लय/लए
4. भ’ गेल/भऽ गेल/भय गेल/भए गेल
5. कर’ गेलाह/करऽ गेलह/करए गेलाह/करय गेलाह
6. लिअ/दिअ लिय’,दिय’,लिअ’,दिय’
7. कर’ बला/करऽ बला/ करय बला करै बला/क’र’ बला
8. बला वला
9. आङ्ल आंग्ल
10. प्रायः प्रायह
11. दुःख दुख
12. चलि गेल चल गेल/चैल गेल
13. देलखिन्ह देलकिन्ह, देलखिन
14. देखलन्हि देखलनि/ देखलैन्ह
15. छथिन्ह/ छलन्हि छथिन/ छलैन/ छलनि
16. चलैत/दैत चलति/दैति
17. एखनो अखनो
18. बढ़न्हि बढन्हि
19. ओ’/ओऽ(सर्वनाम) ओ
20. ओ (संयोजक) ओ’/ओऽ
21. फाँगि/फाङ्गि फाइंग/फाइङ
22. जे जे’/जेऽ
23. ना-नुकुर ना-नुकर
24. केलन्हि/कएलन्हि/कयलन्हि
25. तखन तँ तखनतँ
26. जा’ रहल/जाय रहल/जाए रहल
27. निकलय/निकलए लागल बहराय/बहराए लागल निकल’/बहरै लागल
28. ओतय/जतय जत’/ओत’/जतए/ओतए
29. की फूड़ल जे कि फूड़ल जे
30. जे जे’/जेऽ
31. कूदि/यादि(मोन पारब) कूइद/याइद/कूद/याद
32. इहो/ओहो
33. हँसए/हँसय हँस’
34. नौ आकि दस/नौ किंवा दस/नौ वा दस
35. सासु-ससुर सास-ससुर
36. छह/सात छ/छः/सात
37. की की’/कीऽ(दीर्घीकारान्तमे वर्जित)
38. जबाब जवाब
39. करएताह/करयताह करेताह
40. दलान दिशि दलान दिश
41. गेलाह गएलाह/गयलाह
42. किछु आर किछु और
43. जाइत छल जाति छल/जैत छल
44. पहुँचि/भेटि जाइत छल पहुँच/भेट जाइत छल
45. जबान(युवा)/जवान(फौजी)
46. लय/लए क’/कऽ
47. ल’/लऽ कय/कए
48. एखन/अखने अखन/एखने
49. अहींकेँ अहीँकेँ
50. गहींर गहीँर
51. धार पार केनाइ धार पार केनाय/केनाए
52. जेकाँ जेँकाँ/जकाँ
53. तहिना तेहिना
54. एकर अकर
55. बहिनउ बहनोइ
56. बहिन बहिनि
57. बहिनि-बहिनोइ बहिन-बहनउ
58. नहि/नै
59. करबा’/करबाय/करबाए
60. त’/त ऽ तय/तए 61. भाय भै
62. भाँय
63. यावत जावत
64. माय मै
65. देन्हि/दएन्हि/दयन्हि दन्हि/दैन्हि
66. द’/द ऽ/दए
67. ओ (संयोजक) ओऽ (सर्वनाम)
68. तका’ कए तकाय तकाए
69. पैरे (on foot) पएरे
70. ताहुमे ताहूमे


71. पुत्रीक
72. बजा कय/ कए
73. बननाय
74. कोला
75. दिनुका दिनका
76. ततहिसँ
77. गरबओलन्हि गरबेलन्हि
78. बालु बालू
79. चेन्ह चिन्ह(अशुद्ध)
80. जे जे’
81. से/ के से’/के’
82. एखुनका अखनुका
83. भुमिहार भूमिहार
84. सुगर सूगर
85. झठहाक झटहाक
86. छूबि
87. करइयो/ओ करैयो
88. पुबारि पुबाइ
89. झगड़ा-झाँटी झगड़ा-झाँटि
90. पएरे-पएरे पैरे-पैरे
91. खेलएबाक खेलेबाक
92. खेलाएबाक
93. लगा’
94. होए- हो
95. बुझल बूझल
96. बूझल (संबोधन अर्थमे)
97. यैह यएह
98. तातिल
99. अयनाय- अयनाइ
100. निन्न- निन्द
101. बिनु बिन
102. जाए जाइ
103. जाइ(in different sense)-last word of sentence
104. छत पर आबि जाइ
105. ने
106. खेलाए (play) –खेलाइ
107. शिकाइत- शिकायत
108. ढप- ढ़प
109. पढ़- पढ
110. कनिए/ कनिये कनिञे
111. राकस- राकश
112. होए/ होय होइ
113. अउरदा- औरदा
114. बुझेलन्हि (different meaning- got understand)
115. बुझएलन्हि/ बुझयलन्हि (understood himself)
116. चलि- चल
117. खधाइ- खधाय
118. मोन पाड़लखिन्ह मोन पारलखिन्ह
119. कैक- कएक- कइएक
120. लग ल’ग
121. जरेनाइ
122. जरओनाइ- जरएनाइ/जरयनाइ
123. होइत
124. गड़बेलन्हि/ गड़बओलन्हि
125. चिखैत- (to test)चिखइत
126. करइयो(willing to do) करैयो
127. जेकरा- जकरा
128. तकरा- तेकरा
129. बिदेसर स्थानेमे/ बिदेसरे स्थानमे
130. करबयलहुँ/ करबएलहुँ/करबेलहुँ
131. हारिक (उच्चारण हाइरक)
132. ओजन वजन
133. आधे भाग/ आध-भागे
134. पिचा’/ पिचाय/पिचाए
135. नञ/ ने
136. बच्चा नञ (ने) पिचा जाय
137. तखन ने (नञ) कहैत अछि।
138. कतेक गोटे/ कताक गोटे
139. कमाइ- धमाइ कमाई- धमाई
140. लग ल’ग
141. खेलाइ (for playing)
142. छथिन्ह छथिन
143. होइत होइ
144. क्यो कियो
145. केश (hair)
146. केस (court-case)
147. बननाइ/ बननाय/ बननाए
148. जरेनाइ
149. कुरसी कुर्सी
150. चरचा चर्चा
151. कर्म करम
152. डुबाबय/ डुमाबय
153. एखुनका/ अखुनका
154. लय (वाक्यक अतिम शब्द)- ल’
155. कएलक केलक
156. गरमी गर्मी
157. बरदी वर्दी
158. सुना गेलाह सुना’/सुनाऽ
159. एनाइ-गेनाइ
160. तेनाने घेरलन्हि
161. नञ
162. डरो ड’रो
163. कतहु- कहीं
164. उमरिगर- उमरगर
165. भरिगर
166. धोल/धोअल धोएल
167. गप/गप्प
168. के के’
169. दरबज्जा/ दरबजा
170. ठाम
171. धरि तक
172. घूरि लौटि
173. थोरबेक
174. बड्ड
175. तोँ/ तूँ
176. तोँहि( पद्यमे ग्राह्य)
177. तोँही/तोँहि
178. करबाइए करबाइये
179. एकेटा
180. करितथि करतथि

181. पहुँचि पहुँच
182. राखलन्हि रखलन्हि
183. लगलन्हि लागलन्हि
184. सुनि (उच्चारण सुइन)
185. अछि (उच्चारण अइछ)
186. एलथि गेलथि
187. बितओने बितेने
188. करबओलन्हि/ करेलखिन्ह
189. करएलन्हि
190. आकि कि
191. पहुँचि पहुँच
192. जराय/ जराए जरा’ (आगि लगा)
193. से से’
194. हाँ मे हाँ (हाँमे हाँ विभक्त्तिमे हटा कए)
195. फेल फैल
196. फइल(spacious) फैल
197. होयतन्हि/ होएतन्हि हेतन्हि
198. हाथ मटिआयब/ हाथ मटियाबय
199. फेका फेंका
200. देखाए देखा’
201. देखाय देखा’
202. सत्तरि सत्तर
203. साहेब साहब
204.गेलैन्ह/ गेलन्हि
205.हेबाक/ होएबाक
206.केलो/ कएलो
207. किछु न किछु/ किछु ने किछु
208.घुमेलहुँ/ घुमओलहुँ
209. एलाक/ अएलाक
210. अः/ अह
211.लय/ लए (अर्थ-परिवर्त्तन)
212.कनीक/ कनेक
213.सबहक/ सभक
214.मिलाऽ/ मिला
215.कऽ/ क
216.जाऽ/जा
217.आऽ/ आ
218.भऽ/भ’ (’ फॉन्टक कमीक द्योतक)219.निअम/ नियम
220.हेक्टेअर/ हेक्टेयर
221.पहिल अक्षर ढ/ बादक/बीचक ढ़
222.तहिं/तहिँ/ तञि/ तैं
223.कहिं/कहीं
224.तँइ/ तइँ
225.नँइ/नइँ/ नञि
226.है/ हइ
227.छञि/ छै/ छैक/छइ
228.दृष्टिएँ/ दृष्टियेँ
229.आ (come)/ आऽ(conjunction)
230. आ (conjunction)/ आऽ(come)
231.कुनो/ कोनो


मैथिली भाषापाक (1)- गजेन्द्र ठाकुर

मूल्यांकन
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

1.अरिया-दुर्भिक्ष: क. दाही ख. रौदी. ग. आरिक एक दिशि अकाल एक दिशि नहि घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
2. कोलपति: क. चोकटल ख. फूलल ग. मसुआयल. घ. बसिया।
3. दकचब: क. यत्र-तत्र काटब ख. तोड़ब ग.फोड़ब घ. घँसब।
4. थकुचब: क. आघात पहुँचायब. ख.फेकब, ग. लोकब. घ. खसब।
5. निहुछल: क. फेकल. ख. राखल. ग. देवताकेँ पूजब. घ. देवताक प्रदानार्थ अलगसँ राखब।
6. ओड़हा: क. बदाम भूजल(घूरमे) ख. सुखायल दाना. ग. तरल दाना. घ. भीजल दाना।
7.खखड़ी: क. दानाविहीन धान ख.दाना सहित धान. ग. उसनल धान घ. भुस्सा।
8. गोजू: क. डंटाकेँ पानिमे भेसू. ख. डंटाकेँ जमीनमे भेसू. ग. डंटाकेँ हवामे भेसू. घ. डंटाकेँ आगिमे भेसू।
9. बर्जब: क. त्यागब. ख. आनब. ग. सहब. घ. हँसब।
10. सिटब: क. फेँकब ख. आनि कए राखब. ग. आनि कए फेंकब. घ. विन्यासयुक्त्त करब।
11. खुटब: क. लटकायब. ख. सुखायब. ग. खुट्टा गाड़ि नापब. घ.एहिमे सँ कोनो नहि।
12. गेँटब: क. एम्हर-ओम्हर एकत्र करब ख. तराउपड़ी एकत्र करब.ग. एक पंत्तिमे राखब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
13. डपटब: क. हँसब. ख. कानब. ग. तमसायब घ. दुलार करब।
14. खटब: क. आलस्य करब. ख. फुर्ती करब. ग. अनवरत कार्य करब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
15. हँटब: क. भागब. ख. दूर जायब. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब।
उत्तर
मैथिली भाषापाक (1) केर उत्तर:
1. ग. (खेतक आरिक एक दिशि नीक खेती एक दिशि नहि)।
2. क. चोकटल आम।
3. क. यत्र-तत्र काटब।
4. क. आघात पहुँचायब.
5. घ. देवताक प्रदानार्थ अलगसँ राखब।
6. क. बदाम भूजल(घूरमे)-खेतमे।
7. क. दानाविहीन धान(दुद्धा धान बाढ़िक पानिमे पूराडूबि गेलाक परिणाम)।
8. क. डंटाकेँ पानिमे भेसू।
9. क. त्यागब।
10. घ. विन्यासयुक्त्त करब।
11. ग. खुट्टा गाड़ि नापब।
12. ख. तराउपड़ी एकत्र करब।
13. ग. तमसायब।
14. ग. अनवरत कार्य करब।
15. ग. दबाड़ब।
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

1.गतानब: क. खाट तानब ख. खाट खोलब. ग. खाट तोड़ब घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
2. पलानिकेँ: क. कुमनसँ ख. यत्नपूर्बक ग. सोचि कए. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
3. टोनब: क. गाछ रोपब ख. गाछ जरायब ग.गाछ रोपब घ. डारि खण्ड करब।
4. अकानब: क. कान काटब. ख.कान लग बाजब. ग. ध्यान नहि देब. घ. कान पाथब ।
5. गुदानब: क. देखब. ख. ध्यान राखब. ग. उपेक्षा करब. घ. मोजर देब।
6. उसनब: क. पानिमे आगिसँ सिद्ध करब ख. भुजब. ग. सुखायब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।।
7.बिधुनब: क. सरियायब ख.फेंकब. ग. उनटब-पुनटब घ. गेंटब।
8. पटब: क. लड़ब. ख. झगड़ा होएब. ग. मिलान नहि होयब. घ. मिलान होयब।
9. बिनब: क. नुआ बीनब-बनाएब. ख. नुआ सुखायब. ग. नुआ जराएब. घ. नुआ धोब।
10. खुनब: क. कोड़ब ख. चास देब. ग. पटाएब. घ. जोतब।
11. तुनब: क. कपड़ा बीनब. ख. कपड़ा सीब. ग. तूर तुनब. घ.भाड़ घोंटब।
12. बुनब: क. बीआ बाउग करब ख. बीआ उखाड़ब.ग. बीआ दहाएब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
13. लुबधब: क. अरबधब. ख. सोहड़ि जाएब. ग. विहीन होएब घ. दुलार करब।
14. अरबधब: क. अवश्य करब. ख. फुर्ती करब. ग. अनवरत कार्य करब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
15. छपब: क. तिरोधान होएब. ख. दूर जायब. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब।
उत्तर
मैथिली भाषापाक (२) केर उत्तर:
1. क. खाट तानब ।
2. ख. यत्नपूर्बक ।
3. घ. डारि खण्ड करब।
4. घ. कान पाथब ।
5. ग. उपेक्षा करब ।
6. क. पानिमे आगिसँ सिद्ध करब ।
7. ग. उनटब-पुनटब ।
8. घ. मिलान होयब।
9. क. नुआ बीनब-बनाएब ।
10. क. कोड़ब ।
11. ग. तूर तुनब ।
12. क. बीआ बाउग करब ।
13. ख. सोहड़ि जाएब ।
14. क. अवश्य करब ।
15. क. तिरोधान होएब ।

मूल्यांकन
अत्युत्तम- 14-15
उत्तम- 12-13
बड़-बढ़िया- 09-11

1.तग्गर: क. खाट ख. बाट. ग. पेय पदार्थ घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
2. दोमब: क. हिलायब ख. यत्नपूर्बक सोचब ग. सोचि कए करब . घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
3. ओधि: क. बाँसक जड़ि ख. गाछ जरायब ग.गाछ रोपब घ. डारि खण्ड करब।
4. पेटाढ़: क. कान काटब. ख. गँहीर बासन. ग. ध्यान नहि देब. घ. कान पाथब ।
5. दौरा: क. देखब. ख. ध्यान राखब. ग. उपेक्षा करब. घ. उत्थर् पात्र।
6. मेघडम्बर: क. छाता ख. भुजब. ग. सुखायब. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।।
7.बँसबिट्टी: क. सरियायब ख.फेंकब. ग. बाँसक बोन घ. गेंटब।
8. जाबी: क. लड़ब. ख. झगड़ा होएब. ग. जालाकार पात्र. घ. मिलान होयब।
9. कनसुपती: क. नुआ बीनब-बनाएब. ख. नुआ सुखायब. ग. नुआ जराएब. घ. सुखायल बाँसक पात।
10. छिट्टा: क. कोड़ब ख. चास देब. ग. पथिया. घ. जोतब।
11. दाबि: क. कपड़ा बीनब. ख. पैघ कत्ता. ग. तूर तुनब. घ.भाड़ घोंटब।
12. बोनि: क. बीआ बाउग करब ख. बीआ उखाड़ब.ग. बीआ दहाएब. घ. मजदूरी।
13. छोँपब: क. अरबधब. ख. सोहड़ि जाएब. ग. ऊपरसँ काटब घ. दुलार करब।
14.करची: क. अवश्य करब. ख. ऊपरसँ काटब. ग. बाँसक पातर शाखा. घ. एहिमे सँ कोनो नहि।
15. भालरि: क. तिरोधान होएब. ख. केराक पात. ग. दबाड़ब. घ. हँसायब।
उत्तर
मैथिली भाषापाक (२) केर उत्तर:
1. ग. पेय पदार्थ ।
2. क. हिलायब ।
3. क. बाँसक जड़ि ।
4. ख. गँहीर बासन ।
5. उत्थर् पात्र।
6. क. छाता ।
7. ग. बाँसक बोन ।
8. ग. जालाकार पात्र ।
9. घ. सुखायल बाँसक पात।
10. ग. पथिया ।
11. ख. पैघ कत्ता ।
12. घ. मजदूरी ।
13. ग. ऊपरसँ काटब ।
14 . ग. बाँसक पातर शाखा ।
15. ख. केराक पात ।

गोविन्ददास शब्दावली

( ई शब्दावली 'विदेह' http://www.videha.co.in/ अंक १७ मे रचना लेखन स्तंभमे ई-प्रकाशित भेल छल। )
गोविन्ददास (१५७०-१६४०) शब्दावली (साभार-गोविन्ददास-भजनावली, सम्पादक गोविन्द झा)
अंगुलिवलय- औँठी
अंचल- आँचर;कोर
अकरुण- निर्दय
अकाज- विघटन
अगुसरि- आगाँ बढ़ि
अछोरब- त्यागब
अतनु- कामदेव
अतसी- तीसी
अनंग- कामदेव
अनत- अन्यत्र
अनल- आगि
अनुखन- हरदम
अनुगत- सेवक
अनुबन्ध- संगति
अनुसय- पश्चात्ताप
अनुसरब- पाछु चलब
अन्तराय- विघ्न
अपरूप- अपूर्व
अबगाह- पैसब
अवतंस- मनटीका
अवधान- होस
अवनत- झुकल
अवश- विवश, बाध्य
अविरत- लगातार
अविरल- घनगर
अविराम- निरन्तर
अबुध- बकलेल
अभागि- अभाग्य
अभिसार- प्रेमीसँ मिलए जाएब
अमरतरु- कल्पवृक्ष
अमिअ- अमृत
अम्बर- आकाश, वस्त्र
अरविन्द- कमल
अरुणिम- लाल, ललाओन
अरुण-लाल
अलक- लट
तिलक- पसाहिन
अलखित- अलक्षित, अनचोक
अलस- अलसाएल, शिथिल
अलि- भ्रमर
असार- आसार, वर्षा
अहनिस- दिनराति
अहेर- आखेटक, शिकारी
आकुर- ओझराएल; घबराएल
आगर- आकर, भंडार, खजाना
आतप- रौद
आनआन- अन्योन्य, परस्पर
आनन- मुख, चेहरा
आमोद- सौरभ
आरकत- आरत, आलता
आरति- आर्ति, आतुरता
आसोआस- आश्वास
इन्द्रफाँस- एक प्रकारक बन्धन
इन्दु- चन्द्रमा
इषदवलोकन- अझकहि देखब
उजागरि- जागरण
उजोल- प्रकाश
उतपत- उत्तप्त, धीपल
उतरोल- कोलाहल
उर- हृदय, छाती, स्तन
उरु- जाँघ
उरोज- स्तन
उलसित- उल्लसित
ऊजर- उज्जवल
कंज- कमल
कंटक- काँट
कटाख- कटाक्ष, कनखी
कनकाचल- सोनाक पर्वत
कनय- कनक, सोन
कपाट- केबाड़
कबरी- खोपा
कमान- धनुष
कम्बु- शंख
करहाथ- सूढ़, हाथ
करतल- तरहत्थी
करतँह- करैत छथि
करयुग- जोड़ल हाथ
कल- शान्ति; मधुर (ध्वनि)
कलप- कल्प
कलप तरु- पारिजात
कलरव- घोल
कलहंस- एक पक्षी
कलावती- रसिक रमणी
कल्पतरु- पारिजात
कहतहँ- कहैत छथि
कांचन- सोनाक
कातर- दीन
कान- कृष्ण; कार्ण
कानन- वन
काँबलि- साँगि
कामिनि- रमणी
कालिन्दी- यमुना नदी
कालिय- एक नाग जकरा कृष्ण नथलनि
काहिनी- कथा
किंकिर- चाकर, सेवक
किंकिणि- घुघरू
किसलय- नब पात, पल्लव
कुंकुम- सौन्दर्य प्रसाधनक लाल लेप वा चूर्ण
कंटक- काँट
कुंचित- संकुचल
कुंजर- हाथी
कुच- स्तन
कुन्दल- लट
कुन्दल- खराजल, सोधल
कुवलय- नील कमल
कुमुद- श्वेत कमल, भेँट
कुमुदिनि- श्वेत कमलक लता
कुसुम- फूल
कुसुमबान कामदेव
कुसुमसर- कामदेव
कुसुमसायक- कामदेव
कुहू- अमावस्या
कुल- तीर
केलि- काम-विलास
केसरि- सिंह
कोक- एक पक्षी, चकबा
खचित- खोँसल
खर- तेज, तीक्ष्ण
खरतर- तीक्ष्णतर
गंड- गाल; हाथीक मस्तक
गगन- आकाश
गज- हाथी
गजमोति- ओ मोति जे हाथीक मस्तिष्कमे रहैछ
गणक- जोतखी
गरगर- गद् गद, विह्वल
गरब- घमंड
गरल- विष
गरुअ- भारी
गलित- नमड़ल
गहन- नव
गहीन- गँहीर
गात- देह
गाहनी- प्रवेश कएनिहारि
गिम- ग्रीवा, गरदनि
गुनगाम- गुणग्राम, गुणावली
गुनि- बिचारि, सोचि
गुहक- ओझा-गुनी
गेह- घर
गैरिक- गेरु
गोए –छिपाए
गोचर- बाध
ग्रीम-ग्रीवा, गरदनि
धन- प्रबल,तेज ;अविरल, लगलग, लगले लागल
घनरस- जल; गाढ़ रस
घनसार- कर्पूर
घाघर- झाँप
घामकिरन- सूर्य
घुमाएब- सूतब
घूम- निद्रा
घोर- विकट
घोस- गोप
चकोर- एक पक्षी
चतुरानन- ब्रह्मा
चन्द्रक- मयूरक पाँखि
चरमाचल- अस्ताचल
चलतँह- चलैत अछि
चाँचर- चञ्चल
चारु- सुन्दर
चाह- निहारनाइ, अवलोकन
चाहनी- अवलोकन
चाहब- निहारब
चिबुक- दाढ़ी
चिर- दीर्घकाल
चीतपुतरि- चित्रमे लिखल मूर्ति
चूड़- शिखर, जूड़ा
चूड़क- पुरुषक खोपा
चेतन- चैतन्य, होस
चोआ- धूमनक तेल जे सुगन्धित होइत अछि
छन्द- गति, प्रवृत्ति, इच्छा; शोभा
छाँद- शोभा
जघन- जाँघ
जदुपति- कृष्ण
जर- ज्वर, सन्ताप
जलजात- कमल
जसु- जकर
जानु- ठेहुन
जाबक- आरत, आलता
जाम- याम, पहर
जामिनि- राति
जामुन- यमुना
जूथ- दल
जूथि- जूही फूल
जोर- युगल, जोड़ा
जौबति- युवती
झंक- दीन वचन, दुःख
झंझर- झटक, वृष्टि
झपान- खटुली
झष- माछ
झामर- श्यामल, कारी
झिल्ली- एक कीड़ा
झूर- विखिन्न
टलमल- अस्थिर
ठान- स्थान
डमक- डम्फा
डम्बर- आटोप
ढरढर- निरन्तर (प्रवाह)
ढलमल- डगमग
तटिनी- नदी
तड़ितलता- बिजुलोका
तन्त्री- वीणा
तपन- सूर्य
तमाल- एकवृक्ष
तरंगिनी- नदी
तरल- द्रुत
तरुकोर- गाछक स्तंभ
तरुन- टटका; युवा
तरुणी- युवती
ताटंक- तड़का, कानक एक गहना
ताड़- एक गहना
तापनि- यमुना
ताम्बूल- पान
तार- तारा
तिआस- पिपासा
तिमित- स्थिर
तिमित- अन्धकार
तिरिवध- नारीक हत्याक पाप
तिलतिल- छन-छन
तुंग- ऊँच
तमुल- तेज (ध्वनि)
तुषदह- भूसाक आगि
तुहिनकर- चन्द्रमा
तूण- तरकस
तोरित- तुरन्त, शीघ्र
त्रिवलि- नारीक पेटपरक सिकुड़न
त्रिभंग- नाचक एक मुद्रा
दन्ती- हाथी
दन्द- द्वन्द, भिड़न्त; झगड़ा; चिन्ता
दरस- दर्शन
दलितांजन- एक प्रकारक अंजन
दसन- दाँत
दसबान- दस बेर गलाए शुद्ध कएल सोन
दहन- आगि
दादुर- बेङ
दाम- डोरी
दामिनि- बिजुली
दारिद- दरिद्र
दारुन- भयानक
दिगम्बर- नाङट; शिव
दिठि- दृष्टि, नजरि
दिनमणि- सूर्य
दीगभरम- दिग् भ्रम
दीघ- दीर्घ, पैघ
दुरगह- दुर्धारणा, भ्रान्ति
दुरदिन- अधलाह दिन; वर्षाबाला दिन।
दुलह- दुर्लभ
दैव- जोतखी
दोषाकर- चन्द्रमा; अनेक दोषबाला (व्यक्ति)
द्विजराज- चन्द्रमा
धनि- धन्य; सजनी, नारीक शिष्ट सम्बोधन
छन्द- चिन्ता
धबल- उज्जर
धवलिम- उज्जर
धरनि- धरणी, पृथ्वी
धराधर- पर्वत
धाब- दौड़नाइ
धूसर- भुल रंग
नखपद- नखसँ स्तनपर कएल चिन्ह
नखर- नह
नखरंजनि- नहरनी
नखरेख- नखच्छद
नन्दन- पुत्र
नवल- नूतन
नबेलि- नवीना
नभ- आकाश
नयान- नयन, आँखि
नलिनी- कमल-लता
नागदमन- कालियनागकेँ नथनिहार (कृष्ण)
नागर- रसिक (पुरुष)
नाह- नाथ, पति
निअ- निज, अपन
निअर- निकट
निकर- समूह, बहुत्वसूचक
निकरुन- निष्करुण, निर्दय
निकुंज- लतावृक्षसँ घैरल स्थान
निकेतन- घर
निगमन- निमग्न, डूबल
निचोर- चोली
निछोरि- छीन (लेब)
निज- अपन
नितम्बिनि- पुष्ट नितम्ब वाली सुन्दरी
निदान- दुरवस्था, दुखद स्थिति
निधुवन- रति, सम्भोग
निनाद- ध्वनि
निविड़- घनगर, गहन
निभृत- छिपल
निमिष- छन
निरखब- निहारब
निरुपम- अनुपम, अपूर्व
निसान- ध्वनि
निसित- पिजाओल, तेज
नीति- नित्य
नीप- कदम्ब
नीवी- जारबन्द
नीलिम- नील रंगक
नीर- पानि
नीरद- मेघ
नीलमणि- नीलम
पउरब- हेलिकेँ पार करब
पखान- पाषाण, पाथर
पखावज- एक बाजा
पतनि- चादर
पद- पाएर
पदतल- तरबा
पदुमनि- कमललता; उत्कृष्ट,नायिका
पन- पण, पारिश्रमिक
पवार- प्रवाल, मूँगा
पय- पाएर
पयान- प्रयाण, प्रस्थान
पयोधर- मेघ;स्तन
परजंक- पर्यंक, पलंग
परतेक- प्रत्यक्ष
परबोधब- बौँसब
परमाद- प्रमाद, चूक
परमान- प्रमाण; साक्षी
परस- स्पर्श
परसंग- चर्चा
परिबादसि- आरोपह
परिमल- सौरभ
परिरम्भ- आलिंगन
परिहार- त्याग
पहु- प्रभू, स्वामी
पात- जयपत्र, डिक्री
पादुक- खड़ाओँ
पानि- हाथ
पिक- कोइली
पीछ- मयूरक पाँखि
पीन- पुष्ट
पुनफल- पुण्य़क सुपरिणाम
पुलक- रोमांच
पुलकायित- रोमांचित
पुलकित- रोमांचित
फटिक- स्फटिक, एक प्रकारक पाथर
फनिमनि- ओ मणि जे नागक फेँच मे उत्पन्न कहल जाइछ।
फागु- अबीर
फुलधनु- कामदेव
फुलसर- कामदेव
फूर- सत्य; मन मे आएब
फोइ- खोलिकेँ
बंजुल- एक लता
बकुल- एक फूल, भालसरी
बजर- वज्र
बदरिकोर- बैरक गाछक जड़ि
बदि- बूझिकेँ
बन्धुक- मधुरी
वयन- वचन, बोल
वलय- कगना, माठा, औँठी
बलाकिनी- बकक पाँती
वलित- वेष्टित
वल्लरि- लता
वसन- वस्त्र, परिधान
बहुवल्लभ- बहुत नारीसँ प्रेम कएनिहार
बाए- वायु
बात- हवा
वाद- झगड़ा
बादर- मेघ
बानि- वाणी
वारि- जल
वासित- सुरभित
विकच- विकसित, फुलाएल
विगलित- खसल, नमड़ल
बिछेद- वियोग
बिजन- बीअनि, पंखा
वितान- चनबा
बिथार- विस्तार
बिदग्ध- रसिक
विधु- चन्द्रमा
विधुन्तुद- राहु
विपथ- कुमार्ग
विपाक- कुफल
विपिन- वन
विलुलित- लटकल, डोलैत
विलोकन- नजरि
विशिख- बाण
विषम- विकट, दुखद
विहंग- पक्षी
बिहि- विधाता
बीजन- बीअनि, पंखा
बीजुरि- बिजलोका
बेणि- जूटी
बेल- तट
बेलि- बेर
बेश- सिङार, प्रसाधन
भंग- भंगिमा
भनतँह- कहैत छथि
भव- संसार
भमइ- भ्रमण करैछ
भाबिनि- कामिनी, भद्र महिलाक सम्बोधन
भाल- ललाट
भास- शोभा पाएब
भीतपुतरि- भित्तिमे बनाओल मूर्ति
भुज- बाँहि
भुजंग- साप
भुजमास- पाँज
भूरि- बहुत
भूषित- अलंकृत
भोर- भ्रान्ति; सुधिहीन
मंजुल- सुन्दर
मगन- मग्न, डूबल
मणि- बीचमे छेदबाला रत्न
मणिमन्त्र- जड़ी-बूटी आ झाड़फूक
मत- मत्त, आकुल
मधु- वसन्त
मधुकर- भ्रमर
मधुप- भ्रमर
मधुपुर- मथुरा
मधुरिपु- कृष्ण, मधूसूदन
मधुरिम- मधुर, मनोरम
मनमथ- कामदेव; मनकेँ मथनिहार
मनसिज- कामदेव
मनोभव- कामदेव
मन्थर- मन्द
मन्दिर- घर, निवासगृह
मरकत- एक रत्न
मरजाद- सीमा
मरम- हृदय, अन्तर्मन
मराल- हंस
मलयज- चन्दन
मल्लि- बेली फूल
मसृण- चिक्कन, कोमल
महि- पृथ्वी
महितल- धरती
महिपंक- कादो
मही- धरती
माधवि- एक फूल
मान- नारीक स्वाभिमान
मानि- मान्य
मानिनि- मानवती
मारग- मार्ग, बाट
मालति- एक फूल
मिछहि- फुसिए
मिहिरजा- यमुना
मीन- माछ
मुकुटमणि- श्रेष्ठ
मुकुर- दर्पण
मुकुलित- कोँढिआएल, संकुचित
मुखर- अधिक बजनिहार
मुदिर- मेघ
मुगुधि- मोहित, अल्पमति
मुन्दरी- मुद्रिका, औँठी
मृगयति- जोहब
मृदु- कोमल
मेह- मेघ
मोतिम- मोतिक बनल
मौलि- शिखर, सिर
रंग- केलिविलास
रंगिनि- विलासिनी
रजनीकर- चन्द्रमा
रणित- झमझम ध्वनि
रत- प्रेमासक्त
रति- सम्भोग; कामदेवक स्त्री
रव- शब्द
रबाब- एक बाजा
रभस- हठकेलि
रसना- जीह; मेखला
रसनारोचन- उत्कृष्ट रसक कारणेँ रुचिकर
रसबति- रसिक (रमणी)
रसायन- रसक भंडार; सुखद प्रभावबाला
रसाल- रसयुक्त, रसिक
राइ- राधिका
राग- आसक्ति, प्रेम
रातुल- लाल
राव- ध्वनि
राही- राधिका
रितुपति- वसन्त
रुचि- अनुराग
रुचिर- प्रिय, आनन्ददायक
रेणु- धूरा, गरदा
रेह- रेखा
रोचन- रुचिकर, प्रिय
रोमाबलि- नारीक नाभिलगक रोइआँ
रोष- तामस
ललित- सुन्दर
लाज- लाबा; लज्जा, संकोच
लाबनि- लावण्य
लालस- लालच लोभ
लोचन- आँखि
लोल- चंचल
संकेत- इशारा, इंगित
संघात- ढेर
संघाति- मेल
संवरु- समेटक
सचकित- विस्मित
सजल- नोराएल, भीजल
सति- सत्य
सन्धान- निशाना
सफरी- पोठी माछ
समागम- संगम
समाधि- ध्यान लगाएब
समीर- वायु
सयान- सज्ञान- बुधिआर
सरबस- सर्वस्व
सरम- श्रान्ति
सरसिज- कमल
सरूप- सत्य
सरोरुह- कमल
ससधर- चन्द्रमा
साखि- साक्षी, प्रत्यक्षद्रष्टा
साति- शास्ति, सजाए, कुपरिणाम
साद- शब्द, साध, मनोरथ
साध- मनोरथ, कामन
सामर- शामल, श्यामवर्ण
सारि- मएना
सारी- मएना
शिखंड- मयूरक पाँखि
शिखंडक- मयूरक पाँखि
शिखिचचन्द्रक- मयूरक पाँखि
सिरिस- सिरीष वृक्ष
सिसिर- शिशिर ऋतु
सुधाकर- चन्द्रमा
सुधीर- स्थिर, गम्भीर
सुरतरु- पारिजात वृक्ष
सुरपति- इन्द्र
सीकर- फुहार, जलकण
शेखर- शीर्ष स्थान
सेल- शल्य, आन्तरिक वेदना
सोहन- शोभन, सुरूप
सोहागि- सौभाग्य
स्रवन- कान
श्रमजल- धाम
श्रील- श्रीयुत
श्रुति- कान
हरि- सिंह, कृष्ण
हाम- हम
हिअ- हृदय, उर
हिमकर- चन्द्रमा
हुतास- अग्नि
हेम- सोन
हेमन्त- पाँचम ऋतु, अगहन-पूस

'विदेह' २२५ म अंक ०१ मई २०१७ (वर्ष १० मास ११३ अंक २२५)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. १. राजदेव मण्‍डल -  दूटा बीहैन क था २. रबीन्‍द्र नारायण मिश...