Saturday, June 27, 2009

कविता-जननी-आशीष अनचिन्हार

जननी

एखन
लोकक आपकता बेसी घनहन भएगेलैक अछि
ओहू सँ बेसी
बेगरता
आब अहाँ जे बुझिऔ
जे कहिऔ
अहाँ कहि सकैत छिऐक
बेगरता अविष्कारक जननी थिक
मुदा हम नहि
हमर कहब अछि
अविष्कारक नहि
बेगरता
आपकताक जननी थिक.

नताशा 13 (चित्र-श्रृंखला पढ़बाक लेल नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...