Friday, May 29, 2009

गजल-आशीष अनचिन्हार

गजल

एना हमरा दिस किएक देखैत छी अहाँ

लाल टरेस आखिँए किएक गुम्हरैत छी अहाँ

कोन खराप जँ अहाकँ करेज पर लिखा गेल हमर नाम

जँ मेटा सकी तँ मेटा सकैत छी अहाँ

पीअर रौद मे नाचि रहल उज्जर बसात अनवरत

उदास सन गाम मे केकरा तकैत छी अहाँ

पानि जेना बचए तेना बचाउ एखन ,हरदम

जल-संकटक समय मे किएक कनैत छी अहाँ

धेआन सँ परिवर्तन देखू चोरबा बदलि लेलक समय

राति भरि जागि कए दिन मे सुतैत छी अहाँ

ऐना कियै छैक

भोर भेल,

ओ तैयार भेलाह.

दुपहरिया भेल,

ओ बिदा भेलाह.

सांझ भेल,

ओ पहुँच गेलाह.

राति भेल,

वो भेंट भेलाह.

भोर भेल,

ओ हेरा गेलाह.

सुनालियैक,

हमर बियाह भय गेल.



हमारा देखलक.

हमहूँ देखलियैक

अस्त-व्यस्त घर,

आओर ऐँठल लोक.

जेना तेना,

सामंजस भेल.



साउस रुस्लीह,

खिसिया गेलाह.

माये मुईल,

डपटि देलाह.

बेटा भेल

मुस्का देलाह.

बेटी भेल

खिसिया गेलाह.

नौकरी भेलन्हि,

हुनकर भाग.

गाय मुईल

हमर अभाग.



नहि बूझि सकल

की चाही हुनका.

हम चाहियन्हि

हमर बेटी नहि.

भोजन चाहियन्हि

बनौनिहार नहि.

सफाई चाहियन्हि

कयनिहार नहि.

घर चाहियन्हि

बसौनिहार नहि.



माए रहितैक

तऽ पूछितियैक.

की ओकरो

लागैत छलैक,

जीवन चाहियैक

मुदा एहन नहि?

सोचैत छी,

ओ रहिबो करितैक

तऽ की कहितैक

ओहो कहाँ भिन्न छल

हमर साउस सँ.

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...