Saturday, May 09, 2009

कनियाँ-पुतरा- सुभाष चन्द्र यादव

जेना टांग छानै छै, तहिना ऊ लड़की हमर पएर पाँज मे धऽ लेलक आ बादुर जकाँ लटैक गेल। ओकर हालत देख ममता लागल। ट्रेनक ओइ डिब्बा मे ठाढ़ भेल-भेल लड़की थाइक कय चूर भऽ गेल रहै। कनियें काल पहिने नीचे मे कहुना बैठल आ बैठलो नै गेलै तऽ लटैक गेल ।

 

 डिब्बा मे पएर रोपै के जगह नै छै। लोग रेड़ कय चढ़ै-ए, रेड़ कय उतरै-ए । धीया-पूता हवा लय औनाइ छै, पाइन लय कानै छै। सबहक जी व्याकुल छै। लोग छटपटा रहल-अय।

 

 हम अपने घंटो दू घंटा सऽ ठाढ़ रही । ठाढ़ भेल-भेल पएर मे दरद हुअय लागल। मन करय लुद सिन बैठ जाइ । तखैनिये दूटा सीट खाली भेलै, जइ पर तीन गोटय बैठल । तेसर हम रही जे बैठब की, बस कनेटा पोन रोपलौं। ऊ लड़की ससैर कय हमरा लग चैल आयल । पहिने ठाढ़ रहल, फेर बैठ गेल । फेर बैठले-बैठल हमर टांगमे लटैक गेल । जखैन ऊ ठाढ़ रहय तऽ बापक बाँहि मे लटकल रहय । ओकरा हम बड़ी काल लटकल देखने रहिऐ । ओकर बाप अखैनियों ठाढ़े छै। छोट बहीन आ भाय ओकरे बगल मे नीचे मे बैठल औंघा रहल छै ।

 

ऊ जे टांग छानने ऐछ, से हमरा बिदागरी जकाँ लाइग रहल-अय । जाइ काल बेटी जेना बापक टांग छाइन लै छै, तेहने सन । ने ऊ कानै-अय, ने हम कानै छी । लेकिन ओकर कष्ट, ओकर असहाय अवस्था उदास कऽ रहल-अय । हम निश्चल-निस्पंद बैठल छी । होइए हमर सुगबुगी सऽ ओकर बिसबास, ओकर असरा कतौ छिना नै जाय । हाथ ससैर जाइ छै तऽ ऊ फेर ठीक सँ टांग पकैड़ लै अय ।

लड़की दुबर-पातर आ पोरगर छै । हाथ मे घड़ी । प्लास्टिकक झोरा मे राखल मोबाइल । लागै छै नौ-दस सालक रहय । मगर कहलक जे बारह साल के ऐछ । सतमा मे पढ़ै-अय आ ममिऔत भाइक बियाह मे जा रहल-अय ।

 

बेर-बेर जे हाथ ससैर जाइत रहै से आब ऊ हमर ठेंगहुन पर मूड़ी राइख देलक-अय। जेना हम ओकर माय होइ अइ । ओकर माय संग मे नै छै । कतय छै ओकर माय? जकर कनहा पर, पीठ पर, जाँघ पर कतौ ऊ मूड़ी राइख सकैत रहय । हम ओकर माथ पर हाथ देलिऐ । ऊ और निचेन भऽ गेल जेना ।

 

एक बेर गाड़ीक धक्का सऽ ऊ ससैर गेल; सोझ भेल आ ऑंइख खोललक। एक गोटय कहलकै- दादा कय कसि कय पकड़ने रह ।

 

अंतिम टीशन आइब रहल छै । सब उतरै लय सुरफुरा लागल-अय। अपन-अपन जुत्ता-चप्पल, कच्चा-बच्चा आ सामान कय लोग ओरियाबय लागल-अय । राइत बहुत भऽ गेल छै। सब कय अपन-अपन जगह पर जायके चिन्ता छै। बहुत गोटय ठाढ़ भऽ गेल ऐछ । ऊ लड़कियो। हमहूँ ठाढ़ भऽ कऽ अपन झोरा उतारै छी । तखनियें नेबो सन कोनो कड़गर चीज बाँहि सऽ टकरायल। बुझा गेल ई लड़कीक छाती छिऐ । हमर बाँहि कने काल ओइ लड़कीक छाती सऽ सटल रहल। ओइ स्पर्श सऽ लड़की निर्विकार छल; जेना ऊ ककरो आन संगे नै, बाप-दादा या भाय-बहीन सऽ सटल हो ।

 

ओकर जोबन फूइट रहल छै । ओकरा दिस ताकैत हम कल्पना कऽ रहल छी। अइ लड़कीक अनमोल जोबनक की हेतै ? सीता बनत की दरोपदी ? ओकरा के बचेतै ? हमरा राबन आ दुरजोधनक आशंका घेरने जा रहल ऐछ ।

 

टीशन आइब गेलै। गाड़ी ठमैक रहल छै । लड़की हमरा देख बिहुँसैअय; जेना रुखसत माइंग रहल हो । ई केहन रोकसदी ऐछ! ने ऊ कानै छै, ने हम कानै छी । ऊ हँसै-अय, हमहँ हँसै छी।लेकिन हमर हॅसी मे उदासी अय| 

नताशा- 06 - देवांशु वत्स (नीचाँक चित्रकेँ क्लिक करू आ आनन्द उठाऊ।)

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...