Monday, May 04, 2009

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी(आठम कड़ी)

साँझ मे हम चाह s s जखैन्ह घर मे घुसलहुं s आराम करैत छलाह मुदा हमरा देखैत देरी उठि s केबार बंद s लेलथि हमरा लग आबि बैसैत कहलाह "अहाँ s हमरा किछु आवश्यक गप्प करबाक अछि" हम किछु बजलियैन्ह नहि मुदा मोन मे पचास तरहक प्रश्न उठैत छलs चाह पीबि कप राखैत कहलाह "अहाँ सच मे बड़ सुध छी, अहाँ हमर बुची दाई छी" हम तखनहु किछु नहि बुझलियैन्ह नय किछु बजलियैन्ह, मोने मोन सोचलहुं बुची दाई के छथि। हम सोचिते रही जे हिनका s पुछैत छियैन्ह, बुची दाई के छथि ताबैत धरि उठि s एकटा कागज s हमरा लग बैसि रहलाह। हमरा s पुछलाह हरिमोहन झा s नाम सुनने छी? हम सीधे मुडी हिला s नहि कहि देलियैन्ह, ठीके हमरा नहि बुझल छलs ठीक छैक हम अहाँ के बुची दाई हरी मोहन झाक विषय में दोसर दिन बतायब। पहिने कहू, अहाँ के s हमरा देखि s खुशी आशचर्य दूनू भेल होयत। हिनका देखि s हमरा खुशी आश्चर्य s ठीके भेल छलs मुदा हिनका कोना कहितियैन्ह हमरा कहय में लाज होयत छलs, तथापि पुछि देलथि s मुडी हिला s हाँ कहि देलियैन्ह। अपन हाथ महक कागज़ हमरा दिस आगू करैत कहलाह, अहाँ के लेल हम किछु सम्बोधानक शब्द लिखने छी, अहाँ के अहि मे s जे नीक लागय वा अहाँ जे संबोधन करय चाहि लिखी सकैत छी, मुदा आब चिट्ठी अवश्य लिखब। कोनो तरहक लाज, संकोच करबाक आवश्यकता नहि अछि। बादक गप्प के कहय हम s सुनतहि लाज s गरि गेलहुँ। हम सोचय लगलहुं हिनका हमर मोनक सबटा गप्प कोना बुझल s जायत छैन्ह। थोरबे काल बाद हमरा अपनहि कहय लगलाह हम अहाँक किताब देखैत छलहुँ s ओहि मे s हमरा चिट्ठी भेटल जे अहाँ हमरा लिखने छलहुँ। ओहि मे अहाँ हमरा संबोधन s नहि कयने छी मुदा हमरे लेल लिखल गेल अछि से हम बुझि गेलहुँ। कोनो कारण वश अहाँ नहि पठा सकल होयब सोचि हम पढि लेलहुँ। पढ़ला पर दू टा बात बुझय मे आयल, पहिल जे अहाँक मोन एकदम सुध निश्छल अछि, दोसर जे अहाँ मोन s चाहैत छलहुँ जे हम आबि, देखू हम पहुँची गेलहुँ। अहाँ हमरा चिट्ठी एहि द्वारे नहि लिखी पाबैत छी नय जे अहाँ के सम्बोधनक शब्द नहि बुझल अछि, कोनो बात नहि।एहि मे लाजक कोनो बात नहि छैक, अहाँ के जे किछु बुझय मे नहि आबय आजु s अहाँ हमरा s बिना संकोच कयने पुछि सकैत छी। ओहि दिन नहि जानि कियाक, हमरा बुझायल जे बेकारे लोक के घर वाला s डर होयत छैक। पहिल बेर हुनक जीवन मे हमर महत्व स्थान केर आभास भेल हमरा मोन मे संकोचक जे देबार छलs से ओहि दिन पूर्ण रूपेण हटि गेल। नहि जानि कियाक, बुझायल जेना एहि दुनिया में हमरा सब s बेसी बुझय वाला व्यक्ति भेंट गेलैथ।


जाहि दिन हमर विवाह भेल छलs ओहि समय हमर बडकी दियादिन केर सेहो द्विरागमन नहि भेल छलैन्ह। राँची अपन नैहर मे छलिह। दोसर दिन साँझ मे कहलाह जे काल्हि भौजी s भेंट करय लेल जयबाक अछि ओकर बाद परसु मुजफ्फरपुर चलि जायब। आजु चलु राँची(राँची केर मुख्य बाज़ार मेन रोड के लोग राँची कहैत छैक) दुनु गोटे घूमि s अबैत छी। बरसातक मास बादल सेहो लागल छलैक तथापि हम सब निकलि गेलहुँ। रिक्शा किछुएक दूर आगू गेला पर भेंट गेल। घर s मेन रोड जयबा मे करीब आधा घंटा लागैत छलैक। हम सब आगू बढ़लहुं ओकर १५ मिनट केर बाद s पानि भेनाइ आरम्भ s गेलैक। विष्णु सिनेमा हॉल s किछु पहिनहि हम दूनू गोटे पूरा भीजि गेलहुँ। सिनेमा हॉल लग पहुँची कहलाह, भीजि गयबे केलहुं,चलू सिनेमा देखि लैत छी s आपस घर जायब, कपड़ा सिनेमा हॉल में सुखा जायत।


राति में अचानक माथक दर्द प्यास s नींद खुजि गेल, बुझायल जेना हमर देह सेहो गरम अछि। उठि s पानि पीबि फेर सुति गेलहुँ भोर में मोन ठीक नहि लागैत छलs मुदा हम किनको s किछु कहलियैन्ह नहि, भेल कहबैक s बेकार में सब के चिंता s जयतैन्ह। मोन बेसी खराब लागल s जा s सुति रहलहुं। जखैन्ह आँखि खुजल s देखैत छी डॉक्टर हमरा सोंझा मे अपन आला लेने ठाढ़ छलथि। हमरा ततेक बुखार छल जे चादरि ओढ़ने रही तथापि कांपति छलहुँ।डॉक्टर की कहलैथ से हम किछु नहि बुझलियैक। हमरा थोर बहुत बुझय मे आयल जे कियो हमर तरवा सहराबति छलथि, कियो गोटे पानिक पट्टी s रहल छलथि , मुदा हम बुखारक चलते आँखि नहि खोलि पाबति छलहुँ, हम बुखार मे करीब करीब बेहोश रही। जखैन्ह हमरा होश आयल आँखि खुजल s प्यास s हमर ओठ सुखायत छल, मुदा साहस नहि छलs जे उठि s पानी पिबतहुं। जहिना करवट बदललहुं s हिनका पर नजरि गेल। हिनका हाथ मे एकटा रुमाल छलैन्ह बिना तकिया सुतल छलथि। हमरा बुझैत देरी नहि भेल जे हमरा रुमाल s पट्टी दैत दैत सुति रहल रहथि। हमरा हिम्मत s नहि छल तथापि हम चुप चाप उठि जहिना हिनकर माथ तर तकिया देबय चाहलियय उठि गेलाह। हमरा बैसल देखि तुंरत कहि उठलाह अहाँ कियाक उठलहुं अहाँ परल रहु। सुनतहि हम फेर तुंरत परि रहलहुं।


भोर मे उठलहुं कमजोरी s छलs मुदा बुखार बेसी नहि छल। मौसी s पता चलल जे चाय पिबय के लेल जखैन्ह मधु उठाबय गेलीह s हम बुखार s बेहोश रही। देखि तुंरत डॉक्टर के बजायल गेलैक। डॉक्टर के गेलाक बाद बड राति तक माँ दूनू गोटे बैसल रहथि ठंढा पानी s पट्टी s बुखार उतारबाक प्रयास मे लागल रहथि। माँ के बाद मे सुतय लेल पठा देलथि अपने भरि राति जागल रहथि कियाक s बुखार कम भेलाक बादो हम नींद में बड़ बड़ करैत छलियैक। दोसर दिन s हमर बुखार कम होमय लागल मुदा हमरा पूर्ण रूप s ठीक होयबा में एक सप्ताह लागि गेल। हिनका कतबो कहलियैन अहाँ चलि जाऊ, क्लास छूटैत अछि मुदा कहलाह, अहाँ ठीक s जाऊ तखैन्ह हम जायब।


एक सप्ताह कतहु नहि गेलाह हमरे कोठरी में बैसि s अपन पढ़ाई करथि। साँझ में काका लग बैसि s खूब गप्प होयत छलैन्ह। ओहि एक सप्ताह में काका सेहो हिनका s बहुत प्रभावित s गेलथि इहो काका के स्वभाव s परिचित भेलाह। साँझ में परिचित सब हिनका s भेंट करय लेल आबथि। एहि तरहे पूरा सप्ताह बीमार रहितहुँ हमरा खूब मोन लागल।


आइ भोर s हमरा एको बेर बुखार नहि भेल। काल्हि भोर मे हिनका मुजफ्फरपुर जयबाक छैन्ह भरि दिन हमरा सँग गप्प करैत रहलाह। साँझ मे काका ऑफिस s अयलाह s हुनका लग बैसि हुनका s गप्प करय लगलाह हम अपन कोठरी मे छलहुँ। माँ मौसी जलखई के ओरिआओन करैत छलिह बाकी भाई बहिन सब बाहर खेलाइत छलैथ। हमरा सोचि s एको रति नीक नहि लागैत छलs जे काल्हि चलि जेताह ओकर किछु दिनक बाद माँ सेहो चलि जयतीह।


राति मे सुतय काल कहलाह भोरे s हम जा रहल छी मुदा हमर ध्यान अहीं पर ता धरि रहत, जा धरि अहाँक चिट्ठी नही भेंटत जे अहाँ पूरा ठीक s गेलहुँ अछि। एहि बेर माँ के जाय काल नहि कानब, बड दूर रहति छथि हुनको अहिं पर ध्यान लागल रह्तैन्ह। अहि बेर रोज एकटा s चिट्ठी अवश्य लिखब, हमरा दिस देखैत मुस्की दैत कहलाह आब s अहाँ के चिट्ठी लिखय मे सेहो कोनो तरहक दिक्कत नहि हेबाक चाहि। हमहु हिनकर मुस्कीक जवाब मुस्की s s देलियैन्ह।


क्रमशः ......

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

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