Friday, May 01, 2009

सृजन- अंतिम खेप- सतीश चन्द्र झा

पैध होइते शिशु केना ओ
किछु बनै छै दुष्ट दानव।
अंध मोनक वासना में
होइत अछि पथ भ्रष्ट मानव।

बुझि सकल नहि गर्भ मे ओ
भावना नारी हृदय केँ।
बनि असुर निज आचरण सँ 
क’ देलक लज्जित समय कँे ।

होइत अछि नारी ‘बलत्कृत’
अछि पुरूष ओ के जगत कँे ?
गर्भ नारी सँ धरा में 
जन्म नहि लेलक कहू के ?

छी! घृणित कामी, कुकर्मी
छै पुरूष पाथर केहन ओ।
यंत्राणा दै छै केना क’ 
आइ ककरो देह कँे ओ।

भरि जेतै ओ घाव कहियो
देह नोचल , चेन्ह चोटक।
जन्म भरि बिसरत केनाक’, 
ओ मुदा किछु दंश मोनक।

मोन नहि भोगल बिसरतै, 
ज्वार पीड़ा के उमड़तै ।
लाल टुह टुह घाव बनिक 
जन्म भरि नहि आब भरतै।

पढ़ि लितय जौं भाग्य ममता
अछि अधर्मी ई जगत के।
नहि करत ओ प्राण रक्षा
पेट मे बैसल मनुख के ।

जन्म द’ क’ ओहि पुरुष के
अछि कहू के भेल दोषी ?
देव दोषी ? काल दोषी ?
गर्भ अथवा बीज दोषी ?

छै नियति नारी के एखनहुँ
हाथ बान्हल, ठोर साटल।
के देतै सम्मान ओकरा
छै कहाँ भव धर्म बाँचल।

ग्रन्थ के उपदेश ज्ञान क
अछि जतेक लीखल विगत मे।
भेल अछि निर्माण सभटा
मात्रा नारी लय जगत मे।

क’ सकत अवहेलना नहि
दृष्टि छै सदिखन समाजक।
नहि केलक विद्रोह कहियो
धर्म छै बंधन विवाहक।

जन्म सँ छै ज्ञान भेटल
धर्म पत्नी के निभायब।
स्वर्ग अछि पति के चरण मे
कष्ट जे भेटय उठायब।

ध्यान, तप, सेवा, समर्पण
जन्म भरि नहि बात बिसरब।
प्राण नहि निकलय जखन धरि
द्वारि के नहि नांघि उतरब।


नहि हेतै किछु आब कनने,
शक्ति चाही खूब जोड़क।
नोर मे सामथ्र्य रहितै...
नहि रहैत ओ ‘वस्तु भोगक’।

छीन क’ ओ ल’ सकत जँ
किछु अपन सम्मान कहियो।
चुप रहत भेटतै केना क’
दान मेे अधिकार कहियो ।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...