Wednesday, April 29, 2009

नेताजी के हाल (कविता)-मनीष झा "बौआभाई"

जे मात्र अपन स्वार्थ के सिद्ध करय वास्ते चुनाव लड़ैत छथि हुनका लोकनि के सबक एहि भाषा में सिखाओल जा सकैत अछि I

चम-चम धोती चम-चम कुर्ता

देल लील आ टिनोपाल 
हाथ जोडि क' हाज़िर भेला 
पुरितहि पाँचम साल 

प्रथम निवेदन केलन्हि वृद्ध स' 
अपनेंक आशीर्वाद हम लेमय एलहुँ 
मोन स'दियौ ओहिना जहिना 
पहिल चुनाव में देने छलहुँ 

सुनि एतबहि गप्प बाबा कुदलाह 
भेलाह आगि बबुल्ला 
तमाकुलक सिट्ठी मुहँ स' फेकैत 
उगलय लगलाह विषगुल्ला 

हाथ जोडै छ'?की छल करै छ'? 
ऐँ हौ!लाज नै होई छ' गत्तर में 
पाँच साल धरि घुरि नै एलह 
जे गेलौं कोन निखत्तर में 

बाबाक क्रोध देखि सब ससरल आयल 
भेल एकत्रित संपूर्ण समाज 
तरे-तर विचारल सब केयो 
आउ एकजुट भय उठाबी आवाज़ 

हमरा लोकनि मताधिकार बूझि क' 
दै छी अहींके वोंट 
हम सब कछ्छर काटि रहल छी 
आ अहाँ छपै छी नोंट 

बंगला, गाड़ी सब सरकारी 
खूब करै छी भोग विलास 
बाढि सुखार स'त्रस्त हम जनता 
आब की करब कप्पार विकास 

मतदान करक हम करबे करब 
ओ थिक हम्मर फ़र्ज़ 
अहाँ ज' दल बदलि सकै छी त' 
हमरा नेता बदल' में की हर्ज़ 

हमरा चाही हमर अधिकार तैं 
सूझ-बूझ स' करब मतदान 
मूर्ख, गँवार बूझि बड़ दिन ठकलहुँ 
जुनि बूझू आब ककरो अज्ञान 

नेताजी गुम्मे रहि गेला 
प्रतिक्रया सुनि हक्का-बक्का 
आब कोना संबोधित करता 
कियो ने भैया कियो ने कक्का 

जनता केर आक्रोश देखि क' 
मूडी गोंतने ससरल चललाह 
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ज' नै लागय गप्प अधलाह

मनीष झा "बौआभाई"
http://jhamanish4u.blogspot.com/

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...