Monday, April 27, 2009

कहिया धरि- कविता- रमानन्द रेणु

एकटा-चादरि  ओढै़ छी

हमरा सभ

आ नेरा दै छी

आ दोसर चादरि  ओढ़ि लै छी

सभ दिनसँ

 

बर्खक चादरि  ओढ़ि

आइयो

समयक प्रवाहमे

अपन नाह खेबने  जा रहल छी

जखन ओढ़ल चादरि  नेरबै छी

तँ देखै छी

अपन देह

सर्वत्रा लुधकल  घोड़न सदृश असंख्य जन्तु

चाहियो कनोचि नहि

फेकि पबै छी

आ पीड़ा सहैत  हमरा सभ

दोसर चादरि ओढ़ि

अपनाकें नुका लै छी

पूर्ववत्।

 

हमर नैतिक मूल्य

हमर आस्था

हमर आचरण

एक्के संग सभ  किछु भगेल अछि खाक

आ मनुष्यताक  गरदनिमे

बान्हल  दोष/ बेनिहाइत

पिटने जा रहल  छी/ अनवरत।

 

चादरि तँ एहिना  बदलैत रहत

आ हमरा सभ  एहिना देखैत रहब

किन्तु

कहिया धरि

हमरा सभ माँसु  एना गलबैत रहब

कहिया धरि? ... कहिया धरि? ...

कथा- कालरात्रिश्च दारुणा- साकेतानन्द.

“ की कहैत रही..? छोडू घरक माया_मोह...भागि चलू...?” हुनकर स्वर मे प्राण_भय भरल रहनि. ”ओह, तखनि तक तक त’ बौअनिक ट्रैक्टरो चलिते रहै...जरलाहा के अक्किल पर पाथर पडि गेल रहय...” ओ सिसक’ लागल रहथि. ”आब पछताइये क’ की हैत..? हे एना कानू नंई ! मोन आर घबडा जाइ छै.”

“ कानू नंइ त’ की करू यौ ? घर देने धार बहैयै...अहां कहै छी कानू नंहि ?” बंटू झाक हाथ मे एकटा हरवाही पैना रहनि. दू टा जोडल चौंकी, जाहि पर दुनू गोटे बैसल छला, तै पर स’ हाथ लटका क’ पैना पानि मे देलखिन ! कत्तौ नंहि ठेकलनि. ” सांझ स’ डेढ फीट बढि गेलै! निचला चौंकी बुझू डूबि गेल !” ” दैब हौ दैब ! आब हम कोन उपाय करबै ?” ओ विलाप कर’ लगै छथि. घौना करैत बांधक ठीकेदार, इंजीनियर के सराप’ लगै छथिन. बंटूझा नंहि रोकै छथिन. रोकैक आब एकदम इच्छा नंहि छनि.हुनकर पत्नी; बरसाम बालीक घौना आ अई कोठली, ओई कोठली देने बहैत कोसीक कलकल, एकटा अद्भुत स्वर_ श्रृष्टि क’ रहल छलै. जं’ जं’ सांझ गहराय लागल छलै___तौं_तौं कोसीक हाहाकार बढ’ लागल छलै. एत्ते तक जे बगल मे बैसल पत्नी स’ आब चिकडि क़’ गप्प’ कर’ पडै छलनि. ओ कानिये रहल छली__ ” कत्त’ पडेलें रे ठीकेदरबा सब ? कत्त’ छ’ हौ सरकार साहेब ? बान्ह तोडबाक छलौ त’ कहितें ने रे डकूबा सब...पडा क’ चल जैतौं डिल्ली ! अपन बौआ लग चल जैतौं...कहिते किने रे ... आब के बचेलकै हमरा सब के रौ दैब ?” ओ बच्चा सब जेकां भोकाडि पाडि क’ कान’ लागल रहथि. “ आइ तेसर राति छियै... आब की हेतै रौ दैब !” ” हे, कहने रही ने, कनै छी त’ मोन सुन्न भ’ जाइये.” ” कियैक ने भागि क’ वीरपुर चल गेलौं, किछु छियै त’ शहर छियै; ओइ ठाम स’ कत्तौ भागि सकै छलौं...माथपर कोन गिरगिटिया सवार भ’ गेल रहय यौ...गाम स’ कैक बेर ट्रैक्टर गेलै.” हुनका ई नहि बूझल छलनि जे वीरपुर आब वैह रहलै ? ओ आब सुन्न, मसान, भकोभन्न भ’ गेल छै. ओहि ठाम भरि छाती पानि बहि रहल छै. सब किछु के उपर देने, सब किछु के चपोडंड करैत कोसी बहि रहल छै. ओत्तुक्का लोक ? ओत्ते टा कस्बाक ओत्ते लोक कत’ गेलै ? कत’ गेल हेतै लोक सब हौ भोलेनाथ ? बंटूझा के किछु नहि बूझल छनि, किछु नहि. लोक त’ बेर पडला पर चिडैयो स’ बेसी उडान भरि सकैये...मखानक लाबा जकां छिडिया सकैये, देश्_विदेश पडा सकैत अछि.वीरपुर मे आब ध्वंस हेबाक प्रक्रिया मे सब किछु छै.
अही बीच लक्ष केलखिन त’ पत्नीक कपसनाइ बन्द बुझेलनि. शाइत सुति रहली की...जं सूति रहल होथि..त’ हुनका नल राज जकां छोडि क’ गेल हेतनि ? छिः छिः की सोचि रहल छथि ओ ? मुदा बात मोन मे घुमडैत रहै छनि जे ई नंहि रहितथि त’ बंटूझा के पडाइक कैक टा बाट रहनि. अगल_बगलक कैकटा उंच स्थान सब मोन पडलनि...नेपाले भागि जैतथि. डेढ_दू किलोमीटर दूर परहक कैक टा ऊंच डीह सब मोनमे चमकि उठलनि. असकर रहितथि त’ कैक टा उपाय रहै... तैं तीन दिन स’ यैह चौंकी भरि सुखायल स्थान पर लटकल छथि दुनू व्यक्ति ! सत्ते माया चंडाल होई छै. मुदा ककरो की पता रहै जे एत्ते भरबा क’ ऊंच पर बनल घरक ई गति हेतै ! हे एकरा क्यो बाढिक पानि नहि कहै जेबै कहियो, ई प्रलयक प्रबल प्रवाह छियै, बलौं स’ बान्हल बान्ह तोडि क’ निकलल पानि छियै कोसिक, सब के रिद्द_छिद्द कइयेक’ छोडतै, बेरबाद क’ देतै सबके, अइ बेर नहि छोडतै. बंटूझा के साफ
लागि रहल छलै जे कोसी अइ बेर नहि मानतै, बदला लइयेक’ रहतै .
“ सुनै छियै, कत्ती राति भेल हतै ? भूख नहि लागल अछि ?” ”लागल त’ अछि, त’ देब खाइलय ?” हुनकर स्वर खौंझायल रहनि, जेना चैलेंज क’ रहल होथिन. ” कने ज’ साहस करी, त’ भंसाघरक ताख पर चाउरक टिन धैल छै, ताख डूबल छै की ?” ”ओह, चुप रहूने, जँ नहियो डूबल छै त’ भंसाघर गेल हेतै, अइ अन्हार रातिमे जखन घर देने कोसी बहि रहल हो...” ”घर कहाँ रहलै यौ, अपन घर देने त’ कोसी बहैये आब.” ”बीच नदी मे यै ?” ”हँ यौ, नदीक गुंगुएनाइ नहि सुनै छियै ?” ”सब सुनै छियै, तखन कहै छी जाइ लए ?” ”चाउरक टिन ज’ नहि आनब... आइ तेसर दिन छियै. टिन टा आबि जाय ने कोनो तरहे, दैब हौ दैब !
वेगो बढल जा रहल छै... एहन ठोसगर पक्को घर के तोडि सकयै कोसी ?” ”किछु घंटा लगतै ओकरा, डीह पर घर नहि सौ दू सै ट्रक राबिश पडल रहत.” ई कहि ओ चुप भ’ गेला. दुनू वेकती बडी काल तक चुप छला. ”अच्छा, नहि आनब त’ खायब की ?”
“अहीं उतरू ने.” ”नै हौ बाप, वेग देखै छियै ? हम त’ एक्के डेग मे लटपटा_सटपटा क’ चपोडंड.... देखियौ, दरबज्जे_दरबज्जे, कोठलिये_कोठलिये कोना खलखला क’ बहि रहल छै !” ”नै उतरब त’ दुनु गोटे भूखे मरब!” ”मरि जायब, अही कोसी मे भांसि जायब! भांसि क’ कोपरिया कुर्सेला मे लहास लागत...गिध्ध_कौआ खायत!!”
“ओह, चुप रहू ने!” बंटूझा बडी कालक बाद चौंकी आ छतक बीच हवा के संबोधित करैत बजला_” आइ तेसर दिन छियै ! आइ तक पटनां_डिल्ली के हमरा सबहक सुधि नहि एलै ?”
“अहूं त’ हद करै छी...अहि बोह मे बौआ अबिते हमरा सबके बचबैलय ?” हुनका दिल्ली सुनिते अपन बेटा टा मोन पडै छनि, आर किछु नहि.सत्ते, हुनका लोकनि सनक हजार_दस हजार नहि लाखों लोक, आइ तीन__दिन स’ फंसल अछि, एकर खबरि ककरो नहि लगलैयै ? एहनो कत्तौ होई ? ओ जेना पत्नीक बात नहि सुनने होथि, भोर मे आंटा सानि क’ ओकर गोली खेने रहथि. आइ, तेसर बेर राति गहरा रहल छनि. हिनका दुनू व्यक्तिक अतिरिक्त कोनो चिडियो_चुनमुनीक आवाज़ कहां सुनै छियै ? एखन त’ कुसहा मे बान्ह तोडि क’ बहैत कोसियेक आवाज़ छै चारू भर...बान्ह, छहर, नहर, सडक, रेल, गाछी_बिरछी के मटियामेट करबाक स्वर ! सब किछु के ध्वस्त करबाक घुमडल मौन स्वर__गडर_गडर_गडर...ह’ ह’ ह’..हहा_हहा_हहा; विजयिनी कोसीक अट्टहास स’ हिनका दुनूक कान तीन दिन तीन राति स’ बहीर भेल छनि ! …मोबाइल. इंटरनेटक युगमे तीन दिन बीत गेल आ क्यो सुधि लै बला नंहि ? ..... काल्हि तक त’ दुनू व्यक्ति छत पर चादरि टांगि क’ रहथि . जखन सोपाने बरिस’ लगलनि, आ ओत्ते मेहनति स’ उपर आनल सब वस्तु जात भीज’ लगलनि; अपनो दुनू गोटे सनगिद्द भ’ गेला त’ भगि क’ कोठली मे एला त’ अपन कोठरी मे भरि जांघ रहनि.. चौंकिक ऊपर चौंकी धयलनि; त’ तखन स’ ओही पर बैसल छथि. आब त’ निचला चौंकी डूब’ लागल छलनि ! “दैब रौ दैब ! काल्हि मंचेनमाक नाव के की हाल भेलै हौ दैब...सत्तरि अस्सी गोटे, बाले बच्चा व्मिला क’ हेतै, नाव पलटिते कोना हाक्रोश करैत बेरा_बेरी डुबैत....हौ दैब, कोना हाथ उठाउठा जान बचेबाक गोहारि करैत रहै यौ !” ओ पुक्का फाडि क नेना सब जेकां कान’ लगली. पानिक हहास मे हुनकर रुदन बडा भयौन लगैत रहै. ” जुनि मोन पाडू यै... असहाय लोकके डुबबाक दृष्य नहि मोन पाडू !” ”मोन होति रहय ओत्तेटा कोनो रस्सा रहिते की आने कोनो ओत्तेटा वस्तु__त’ फेक दितियै...मुदा किछु नहि क’ भेल... ओत्ते लोक चल गेलै आ जा रहल छै, से छै ककरो परवाहि...बज्जर खसतौ रे पपियाहा सरकार बज्जर !” ”यै ई कयैक ने सोचै छी जे हमरा सब जीविते छी, जं मंचेनमाक नाव पर हमरो सब चढि गेल रहितौं त’ आइ कोन गति भेल रहिते ? अपना सब नहि चढलहुं त’ प्राण बांचि गेल ने !” ”देखैत रहियै, लोक कोना छटपटाइत रहै...? छत पर स’ त’ स्पष्ट देखाइ पडैत रहै!” ”सब टा देखैत रहियै ! बगल मे चुनौटी हैत दिय” त’ !” ”कत्ते खैनी खायब ?” ”भूख लागल यै.” ”तैं त’ कहैत रही... कनी साहस करू. भंसाघर मे घुसिते, सामने ताख पर चाउरक टिन छै; बगल मे नोनो छै.” ”अहां आयब पीठ पर ?” ”नै यौ, हमरा बड डर लगैये. हे ओ भीतर बला चौकठि के देखियौ त’... देवाल छोडने जाइ छै ?” ”हँ यै बरसामबाली! ई त’ देवाल छोडि देलक.” ”त’ आब घर खसतै की यौ ?” ..चुप्पी, संगहिं नदीक हहास! पानि मे कोनो जीव के कुदबाक छपाक ध्वनि ! ने त’ सगरे पसरल पानि... तै पर अन्धकार. ”किछु बजै कियैक ने छी ? सुनू , आब हमरो बड्ड भूख लागि गेल अछि...” ”देखै छियै, करेंट स’ आब चौंकीक पौआ सब दलकै छै; एखनो हम चाउरक टिन आनि सकैत छी. आयब हमर पीठ पर, उतरी हम ?” फेर चुप्पी. दुनू चुप छथि. बीच मे वैह अलगटेंट हरजाइ बाजि रहल अछि__कोसी बाजि नहि डिकरि रहल अछि !
“ठीक छै, हम उतरै छी...आब जे हुए, आब नहि सहल जाइये...!” ”नै यौ! हम अहांके ऐ अन्हार राति मे पानि मे नहि पैस’ देब. सांझ मे ओ सांप के देखने रहियै...मोन अछि कि नहि ?” ”ओ एत्तै हेतै ? नहि हम उतरै छी, किछु भेल हुए, आखिर अपने घर ने छियै यै ?” ”उतरबै ?”कहि बरसामबाली कनी काल चुप भ’ जाइ छथि; फेर कहै छथिन__”बुझलौं यौ, मोन होइयै गरम_गरम चाह पिबितौं; एकदम भफाइत.” “अच्छा, कत्ते राति भेल हेतै ?” ”देवाल पर घडी त’ लटकले छै, देखियौ ने.” ”एंह, ओहो साला बन्द भ गेल छै.” ”ठहरू, कने पानि के देखियै ! अरौ तोरी के, निचला चौंकी त’ डूबल बरसामबाली.” ”हे यौ, कने एम्हर आउ, हमरा डर लागि रहल अछि. हमरा लग आउ ने.” ”छीहे त’ ?” ”नै हमर लग आउ सब चिंता_फिकिर बिसरि क’ दुनू गोटे सूति रही. जे हेतै से परात देखल जेतै.!” ”भने कहै छी, दलकैत चौंकी आ भसकैत घर मे निश्चिंत भ’ क’ सुतै लए कहै छी...नीचा कोसी बहि रहल अछि ! भने कहैत छी.” ”खिडकी स’ देखियौ, भोरुकवा उगलै ? घडियो जरलाहा के बन्द भ’ गेलै....” ”कथी लए कचकचाइ छी, ई कालरात्रि छियै, अइ मे क्यो ने बचत...” ”ठीके कहै छियै यौ; ऐ बेर क्यो ने बचतै.” ”मारू गोली. जत्ते बजबाक हेतै, बाजल हेतै. सुनै छियै?सुति रहलियै ?” ”धुर जो, एहन परलय मे पल लगतै ? हम कहैत रही डिल्ली ठीक छै ने ? ओकरा खबरि भेल हेतै ? ओत्त’ बौआ अंगुनाइत हेतै...हे अइ बेर नहि अनठबियौ, अगिला सुद्ध मे करा दियौ. नहि करब आड्वाल; नहि गनायब. मुदा पुतहु चाही हमरा पढलि_लिखलि. एकदम स्मार्ट, अपन बौए जेकां.” बंटूझा के लगलनि जे एहन समय आ ताहि मे बियाहक गप, जरूर हिनकर दिमाग भांसि रहल छनि. कल्हुका भोर देखती की नहि तकर ठेकाने ने, चलली है बेटाक बियाह नेयार करै लए.मुदा बरसामबालीक त’ टाइम पास रहनि__बेटाक बियाहक प्लैन बनायब. हुनको मोन भेलनि जे ओ कथाक मादे कहथिन जे हाले मे यार अनने रहथिन. मुदा ओ चौंकी आ छतक दूरी के एकटक देखैत रहला. पानिक स्वर हुनकर कान के बहीर बना रहल छलनित त’ माथ मे कोनो धुंध, कोनो धुआं सन भरल बुझाइ छलनि. बरसामबालीक बुद्धि ठीके भांसि गेल छलनि, नहि त’ एहन मे बेटाक बियाहक नेयार करब ! ”से चाहे जे हुए, पुतहु हमरा सुन्नरि आ पढल चाही.” ”अहां के बड्ड भूख लागि रहल अछि की ?” ”हं यौ !” ”सुनू, अहां घबडायब नहि ! हम यैह चाउरक टिन नेने अबै छी ! ”नै जाउ यौ...नै उतरू यौ...नै जाउ यौ !”बरसामबाली अनघोल करिते रहली, जाबे तक हुनकर मुंह मे गर्दा नहि उडियाय लगलनि. मुदा बंटूझा फेर कोनो उतारा नहि देलखिन.

एक विलक्षण प्रतिभा जिनका हम सदिखन याद करैत छी( सातम कड़ी)



आय भोरे बाबुजी असगर चलि गेलाह। माँ s मोन नहि मानलन्हि जे हमरा कानैत छोरि s जैतथि बाबुजी s गेलाक बाद हमरा अफसोस होयत छलs जे माँ कs हमरा चलते रहय परि गेलैन्ह , आब बच्चा सब के s असगर जाय परतैन्ह


कॉलेज जयबाक खुशी एतबे दिन मे समाप्त s गेल, कियाक से नहि जानि। कॉलेज जाइ अवश्य मुदा जेना कतो आओर हेरायल रहैत छलहुँ।घर आबि s घर मे सेहो एकदम चुप चाप जा अपन कोठरी मे परि रहैत रही। माँ सब सोचथि हम थाकि जायत होयब सुतल छी, मुदा हम घंटो ओहिना परल रहैत रही। हमरा अपनहु आश्चर्य होयत छलs स्कूल गेनाई s हम मोन ख़राब मे सेहो नहि छोरैत रही , फेर हमरा एहि तरहे कियाक भेल जा रहल छलs। काल्हि बाबुजी चलि गेलाह से आओर घर सुन लागैत छलैक ताहि पर कॉलेज जयबाक से मोन नहि होयत छलs कहुना कॉलेज s गेलहुँ मुदा ओहियो ठाम नीक नहि लागल।कॉलेज s आपस अयलाक s बाद नहि जानि मोन जेना बेचैन लागैत छलs हमरा बुझय मे नहि अबैत छल जे एहि तरहे कियाक भs रहल अछि। जहिना हाथ पैर धो s अयलहुं मौसी (जे की हमर काकी सेहो छथि) जलखई s s ठाढ़ रहथि हमरा आगूक जलखई दैत बजलीह जल्दी s पहिने जलखई s लिय। अहाँ सब दिन बहाना s दैत छियैक जे भूख नहि अछि, एतबहि दिन मे केहेन दुब्बर s गेल छी। नीक s खाऊ पीबू नहि s ठाकुर जी अओताह s कहताह एतबहि दिन मे सब हमर कनियाँ के दुब्बर s देलैथ। ठाकुर जी नाम सुनतहि नहि जानि कतय s हमरा मुँह पर मुस्की आबि गेल। बुझि परल जेना फूर्ति आबि गेल हो। मौसी के एकटा नीक मौका भेंट गेलैंह तुंरत माँ के बजा कहय लागलिह "हे बहिन, अहाँ s किछु नय बुझैत छियैक, कुसुम थाकय ताकय किछु नय छथि रोज तीन चारि बेर ठाकुर जी s नाम s नय लेल करू, सब ठीक रहतैक" आब हमरा कोनो दोसर उपाय नहि बुझाइत छल, हम बिना किछु बजने चुप चाप मौसी के हाथ s जलखई s लेलियैन्ह।


सब राति हम काका विविध भारतिक हवा महल अवश्य सुनैत रही। हमरा दुनु गोटे s कार्यक्रम बड़ पसीन छलs सब सुति रहथि मुदा हम दुनु गोटे हवा महल के बाद सुतय लेल जाइत रही। हमरा कतबो पढ़ाई कियाक नहि हो सब दिन काका हमरा हवा महल काल अवश्य बजा लेत छलाह। आइयो हवा महल जहिना शुरू भेलैक मधु के भेजि s हमरा बजा पठेलथि। हवा महल सुनलाक बाद हम अपन कोठरी मे सुतय लेल चलि गेलहुँ काका अपन कोठरी मे।


जहिना कहने रहथि, तहिना सब दिन हिनकर चिट्ठी आबैन्ह ओकर जवाब सब दिन राति मे सुतय काल लिखय चाहि मुदा हिनका हम की सम्बोधन s चिट्ठी लिखियैन्ह हमरा बुझय मे नहि आबति छलs हम पुछबो किनका s करितहुँ हम अपन पहिल चिट्ठी जे हिनका बौआ सँग मुजफ्फरपुर पठौने रहियैन्ह ताहू दिन सोचैत- सोचैत जखैन्ह किछु नय फुरायल छलs s हम हिनका "ठाकुर जी" सम्बोधन s चिट्ठी लिखि पठा देने रहियैन्ह। चिट्ठी पता नहि कोना , हिनकर कोनो दोस्त देख लेने रहथि हिनका कहि देने रहथिन्ह जे अहाँक सारि चिट्ठी बड़ सुन्दर लिखति छथि।इ ओकर चर्च हमरा लग हँसैत हँसैत कयने रहथि। हमरा ओहि दिन अपना पर तामस अवश्य भेल छलs मुदा हमरा बुझले नय छलs जे लोग की संबोधन s घरवाला के चिट्ठी लिखैत छैक। आब s "ठाकुर जी "सम्बोधन s सेहो नहि लिखि सकैत छलहुँ जखैन्ह हम सुतय लेल अयलहुं s सोचिये s आयल छलहुँ जे, किछु s जाय आइ हम चिट्ठी लिखबे करबैन्ह।हमरा अपने बहुत खराप लागैत छलs जे हम एकोटा चिट्ठिक जवाब नहि देने रहियैन्ह। बहुत सोचलाक बाद जखैन्ह हमरा सम्बोधनक कोनो शब्द नहि फुरायल s हम ओहि भाग s छोरि चिठ्ठी लिखय लगलहुँ चिट्ठी में कैयाक ठाम हम लिखिये जे हमरा मोन नहि लागति अछि जल्दी चलि आऊ मुदा फेर हम काटि दियय खैर बिना सम्बोधन वाला चिट्ठी लिखि s हम एकटा किताब मे सोचि s राखि देलियैक जे भोर तक किछु नय किछु फुरा जयबे करत। तखैन्ह लिखि s कॉलेज जाय काल खसा देबैक। पोस्ट ऑफिस हमर घरक बगल मे छलैक।


चिट्ठी लिखलाक बाद हम सोचलहुँ सुति रही मुदा कथि लेल नींद होयत। बड़ी काल तक बिछौना पर परल परल जखैन्ह नींद नहि आयल s उठि s पानि पीबि लेलहुँ फेर बिछौना पर परि s हिनकर देल किताब "साहब बीबी और गुलाम पढ़य" लगलहुँ दू चारि पन्ना पढ़लाक बाद किताबो s मोन उचटि गेल जओं घड़ी दिस नजरि गेल s देखलियैक भोर के चारि बाजति छलs सोचलहुँ आब की सुतब, जाइत छी चिट्ठी पूरा s तैयार s जायब। सोचि जहिना उठि s कलम हाथ मे लेलहुँ कि बुझायल जे कियो केबार खट खटा रहल छथि। हमरा मोन मे जेना एक बेर आयल कहीं s नहि अयलाह। हम जल्दी s आगू बढ़ि s जहिना केबार खोलति छी s ठीके एकटा बैग लेने ठाढ़ छलथि। हम किछु क्षण ओहिना ठाढ़ s हिनकर मुँह ताकैत रही गेलहुँ अचानक मोन परल बिना हिनका s किछु पूछने वा कहने ओहि ठाम तुरन्त भागि गेलहुँ ता धरि काका के छी करैत ओहि ठाम पहुँच गेलाह हमरा भागैत देखि पुछलथि" के छथि"? हम बिना किछु कहने ओहि ठाम s भागि अपन कोठरी मे जा बैसि गेलहुँ। काका हिनका देखैत देरी हा हा ... ठाकुर जी आयल जाओ बैसल जाओ कहैत हिनका घर मे बैसा तुरंत ओहि ठाम s जोर जोर s भौजी भौजी करैत भीतर आबि सब के उठा देलथि। थोरबहि काल मे भरि घरक लोग उठि गेलथि। तुरंत मे चाह पानि सबहक ओरिओन होमय लागल।रांची में s हमर पितिऔत चारि भाई बहिन सेहो रहथि। जाहि महक तीन गोटे हिनका देखनेहो नहि रहथि, मधु टा विवाह मे छलिह। सब हिनका देखय लेल जमा s जाय गेलथि। मौसी s सेहो हिनका पहिल बेर भेंट भेल छलैन्ह। विवाह मे मौसी नहि रहथि नीलू दीदी s विवाह के बाद सोनूक (छोटका बेटा) मोन खराप s गेल छलैन्ह मौसी, सोनू, निक्की पप्पू के राँची छोरि आयल छलथि। हुनका एतबो समय नहि भेंटलैन्ह जे मौसी के फेर अनतथि।


हम अपन कोठरी मे चुप चाप बैसल रही, रतुका बेचैनी आब नहि छलs मुदा हमरा किछु काका नहि बुझाइत छलs जे हम की करी। सोचैत रही जे कॉलेज जाइ या नहि, जयबाक मोन s नहि होयत छलs, ताबैत मौसी हमरा कोठरी मे कुसुम कुसुम करैत हाथ मे चाह लेने घुसलीह। हमरा देखैत कहय लगलीह "अहाँ अहिना बैसल छी, जल्दी s चाह पीबि लिय तैयार s जाऊ। हमरा सुनतहि बड़ तामस भेल, हमरा मोन मे भेल कहू s अखैन्हे अयलाह अछि मौसी हमरा कॉलेज जाय लेल कहैत छथि हम धीरे s कहलियैन्ह हमर माथ बड़ जोर s दुखायत अछि। सुनतहि मौसी के मुँह पर मुस्की आबि गेलैन्ह कहलथि तैयार s जाऊ मोन अपनहि ठीक s जायत, आय कॉलेज नहि जयबाक अछि। सुनतहि हमरा भीतर s खुशी भेल, बुझायल जेना हम यैह s चाहैत रही, जे कियो हमरा कहथि अहाँ कॉलेज नहि जाऊ। हम जल्दी s चाह पीबि तैयार होमय लेल चलि गेलहुँ।


ओना s हमरा तैयार हेबा में बड़ समय लागैत छलs मुदा ओहि दिन जल्दी जल्दी तैयार s गेलहुँ। अपन कोठारी में पहुँचलहुं s मौसी हमरे कोठरी में रहथि किछु ठीक करैत छलिह। हमरा देखैत बाजि उठलिह "बाह आय s अहाँ बड़ फुर्ती s तैयार s गेलहुँ, आब माथक दर्द कम भेल"? हम हुनका दिस देखबो नही केलियैन्ह दोसर दिस मुँह घुमेनहि हाँ कही देलियैन्ह।


काका के विवाहे बेर s हिनका सँग खूब गप्प होयत छलैन्ह। हमर काका बड़ निक हंसमुख व्यक्ति, हिनका s कखनहु कखनहु s हँसी सेहो s लेत छलाह। हिनको काका s गप्प करय में बड़ निक लागैत छलैन्ह। हम तैयार s s पहुँचलहुं ता धरि सब गप्प करिते छलाह। मौसी हमरे कोठरी s काका के सोर पारि हुनका s कहलथि" ठाकुर जी s तैयार होमय लेल कहियोक नहि, थाकल होयताह "।किछुए कालक बाद हमर वाला कोठरी में अयलाह, हम चुप चाप ओहि ठाम बैसल रही। हिनका देखैत देरी हमरा की फुरायल नहि जानि झट दय गोर लागि लेलियैन्ह।गोर लगलाक बाद हम चुप चाप फेर आबि s बैसि रहलियैक। मोन में पचास तरहक प्रश्न उठैत छल।इहो आबि s हमरा लग बैसि रहलाह पुछ्लाह अहाँ कानैत कियाक रही, हमरा देखि s आजु भागि कियाक गेलहुँ। अहाँक बाबुजी जखैन्ह s कहलाह जे अहाँ s कनबाक चलते माँ रही गेलीह, आब एक मास बाद जयतीह, तखैन्ह s हमरो मोन बेचैन छलs अहाँ के बाबुजी के गाड़ी में बैसा सीधे हॉस्टल गेलहुँ ओहिठाम मात्र कपडा s जे पहिल बस भेंटल ओहि s सीधा आबि रहल छी। हिनकर गप्प सुनतहि हमर आँखि डबडबा गेल। हमरा अपनहु नहि बुझल छलs जे हम कियाक भागल रही नहि , जे हमरा कियाक कना जायत छल।

'विदेह' २३१ म अंक ०१ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३१)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक चारिटा लघु कथ ा २.२. रबिन्‍द्र नारायण मिश्रक चारिटा आलेख ...