Thursday, April 16, 2009

गजल- आशीष अनचिन्हार

गजल

मछगिद्ध जँ माछ छोड़ि दिअए त डर मानबाक चाही
लोक जँ नेता भए जाए त डर मानबाक चाही


रंडी खाली देहे टा बेचैत छैक अभिमान नहि
मनुख अस्वभिमानी हुअए त डर मानबाक चाही


अछि विदित शेर नहि खाएत घास भुखलों उत्तर
वीर अहिंसक बनए त डर मानबाक चाही


माएक रक्षा करैत जे मरथि सएह विजेता
माए बेचि जँ रण जितए त डर मानबाक चाही


सम्मानक रक्षा करब उद्येश्य अछि गजल केर
जँ उद्येश्य बिझाए त डर मानबाक चाही

२० टा बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर

२० टा बालकथा- गजेन्द्र ठाकुर

1.बगियाक गाछ


एकटा मसोमात छलीह आ’ हुनका एकेटा बेटा छलन्हि। ओ’ छल बड्ड चुस्त-चलाक।

एक दिनुका गप अछि। ओ’ स्त्री जे छलीह, अपना बेटाकेँ बगिया बना कए देलखिन्ह। ओहि बालककेँ बगिया बड्ड नीक लगैत छलैक। से ओ’ एहि बेर ओ’ एकटा बगिया बाड़ीमे रोपि देलक। ओतए गाछ निकलि आएल। बगियाक गाछ, नञि देखल ने सुनल।

माय बेटा ओहि बगियाक गाछक खूब सेवा करए लगलाह। कनेक दिनमे ओहि गाछमे खूब बगिया फड़य लागल। ओ’ बच्चा गाछ पर चढ़ि कए बगिया तोड़ि कए खाइत रहैत छल।

एक दिनुका गप अछि। एकटा डाइन बुढ़िया रस्तासँ जा’ रहल छल। ओकरा मनुक्खक मसुआइ बना कए खायमे बड्ड नीक लगैत रहैक। से ओ’ जे बच्चाकेँ गाछ पर चढ़ल देखलक, तँ ओकर मोन लुसफुस करए लगलैक। आब ओ’ बुढ़्या मोनसूबा बनबए लागल जे कोना कए ई बच्चाकेँ फुसियाबी आ’ एकरा घर ल’ जा कए एकर मसुआइ बना कए खाइ।

बच्चाकेँ असगर देखि ओ’ लग गेल आ’ बच्चाकेँ कहलक-

“ बौआ एकटा बगिया हमरा नहि देब। बड्ड भूख लागल अछि।

बच्चा ओकर हाथ पर बगिया देबय लागल।



“बौआ हम हाथसँ कोना लेब बगिया हथाइन भ’ जायत”।

बच्चा बगिया माथ पर राखए लागल।

“हँ हँ माथ पर नहि राखू। मथाइन भ’ जायत”।

बच्चो छल दस बुधियारक एक बुधियार। खोइछमे बगिया देबए लागल।

”ई की करैत छी बौआ। बगिया खोँछाइन भ’ जायत, अहाँ झुकि कए बोरामे दए दिअ”।

मुदा बच्चा तँ छल गोनू झाक बुझू जे गोनू झाक मूल-गोत्रेक।

बाजल-

“नञि गए बुढ़िया। तोँ हमरा बोरामे बन्द कए भागि जेमह। माय हमरा ठग सभसँ सहचेत रहबाक हेतु कहने अछि”।

मुदा बुढ़ियो छल ठगिन बुढ़िया। ठकि फिसिया कए बोली-बाली दए कए ओकरा मना लेलक। जखने बच्चा झुकल ओ’ ओकरा बोरामे कसि कए चलि देलक। बुढ़िया रस्तामे थाकि कए एकटा गाछक छहरिमे बैसि गेलि।

कनेक कालमे ओकरा आँखि लागि गेलैक। बच्चा मौका देखि कोनहुना कए ओहि बोरासँ बाहर बहरा गेल आ’ भीजल माटि, पाथर आ’ काँट-कूस बोरामे ध’ कए ओहिना बान्हि कए पड़ा गेल।

बुढ़िया जखन सूति कए उठल आ’ बोरा ल’ कए आगू बढ़ल तँ ओकरा बोरा भरिगर बुझएलैक। मोने-मोन प्रसन्न भ’ गेलि ई सोचि जे हृष्ट-पुष्ट मसुआइ खएबाक मौका बहुत दिन पर भेटल छैक ओकरा। रस्तामे भीजल माटिसँ पानि खसए लागल तँ ओकरा लगलैक जे बच्चा लगही कए रहल अछि। ओ’ कहलक जे-

”माथ पर लहुशंका कए रहल छह बौआ। कोनो बात नहि। घर पर तोहर मसुआइ बना कए खायब हम”।


कनेक कालक बाद काँट गरए लगलैक बुढ़ियाकेँ। कहलक-

”बौआ। बिट्ठू काटि रहल छी। कोनो बात नहि कतेक काल धरि काटब”।

बुढ़्याक एकटा बेटी छलैक। गाम पर पहुँचि कए बुढ़िया ओकरा कहलक, जे आइ एकटा मोट-सोट शिकार अछि बोरामे। माय बेटी जखन बोरा खोललक तँ निकलल माटि, काँट आ’ पाथर। कोनो बात नहि।

बुढ़िया भेष बदलि पहुँचल फेरसँ बगियाक गाछ तर।

एहि बेर बच्चा ओकरा नञि चीन्हि सकल। मुदा जखन ओ’ झुकि कए बगिया बोरामे देबाक गप कहलक तँ बच्चाकेँ आशंका भेलैक।

”गए बुढ़िया। तोँही छँ ठगिन बुढ़िया”।

मुदा बुढ़िया जखन सप्पत खएलक तँ ओ’ बच्चा झुकि कए बगिया बोरामे देबए लागल। आ’ फेर वैह बात।

एहि बेर बुढ़िया कतहु ठाढ़ नहि भेल। सोझे घर पहुँचल आ’ बेटी लग बोरा राखि नहाए-सोनाए चलि गेल।बेटी जे बोरा खोललक तँ एकटा झँटा बला बच्चाकेँ देखलक। ओ’ पुछलक-

”हमर केश नमगर नहि अछि किएक”।

”अहाँक माय अहाँक माथ ऊखड़िमे दए समाठसँ नहि कुटने होयतीह। तैँ”।बच्चा तँ छल दस होसियरक एक होसियार तैँ।



बुढ़ियाक बेटी अपन केश बढ़ेबाक हेतु अपन माथ ऊखड़िमे देलन्हि, आ’ ओ’ बच्चा ओकरा समाठसँ कॉटए लागल। ओकरा मारि ओकर मासु बनेलक। बुढ़िया जखन पोख्रिसँ नहा कए आयल तँ बुढ़ियाक आगू ओ’ मासु परसि देलक।

जखने ओ’ खेनाइ पर बैसलि तँ लगमे एकटा बिलाड़ि छल से बाजि उठल-

”म्याँऊ। अपन धीया अपने खाँऊ।म्याँऊ”।

”बेटी एकरा मासु नहि देलहुँ की।तँ बाजि रहल अछि”।

ओ’ बच्चा बिलाड़िक आँगा मासु राखि देलक मुदा बिलाड़ि मासु नहि खएलक।

आब बुढ़ियाक माथ घुमल। ओ’ बेटीकेँ सोर कएलक तँ ओ’ बच्चा समाठ ल’ कए आयल आ’ ओकरा मारि देलक।

फेरसँ बच्चा बगियाक गाछ पर चढ़ि बगिया खए लागल। बड्ड नीक लगैत छल ओकरा बगिया।




2.ज्योति पँजियार



ज्योति पँजियार छलाह सिद्ध।पम्पीपुर गामक। तंत्र-मंत्र जानएबला।धर्मराज रहथि हुनकर कुलदेवता। ज्योति पँजियारक पत्नी छलीह लखिमा।

एक बेर साधुक वेष धय धर्मराज भिक्षाक हेतु अएलाह। ज्योति पँजियार लखिमाक संग गहबर बना रहल छलाह। माय सूपमे अन्न लए क’ अयलीह। मुदा साधु कहलखिन्ह जे हम तँ भीख लेब ज्योति पँजियारक हाथेटा सँ। ज्योति पँजियार मना कए देलखिन्ह जे हम गहबर बनायब छोड़ि कए नहि आयब।साधु श्राप दए देलखिन्ह जे निर्धन भ’ जयताह ज्योति पँजियार, कुष्ठ फूटि जएतन्हि हुनका।

आस्ते-आस्ते ई घटित होमय लागल। ज्योति पँजियार बहिनिक ओहिठाम चलि गेलाह। मुदा ओतय अवहेलना भेटलन्हि। ज्योति ओतय सँ निकलि गेलाह। ओइटदल गाम पहुँचि गेलाह अपन संगी लगवारक लग। एकटा त्तंत्रिक अएलाह। कहल- बारह वर्ष धरि कदलीवनमे रहए पड़त। धर्मराजक आराधना करए पड़त। गहबड़ बनाए करची रोपी ओतए। बाँसक घर बनाऊ धर्मराजक हेतु। धर्मराज दर्शन देताह, अहाँ ठीक भ’ जायब। पँजियार चललाह, रस्तामे सैनी गाछ भेटलन्हि, ओकर छहमे सुस्तेलाह पँजियार, मुदा ओ’ गाछ सुखा गेल, अरड़ा कए खसि पड़ल।कोइलीकेँ कहलन्हि जे पानि आनि दिअ, ओ’ उड़ल तँ बिहाड़ आबि गेल। कोइली मरि गेल।पँजियार उड़ि कए पहुँचि गेलाह कदली वनमे। एकटा महिसबार कहलकन्हि जे अछ्मितपुर गाम जाऊ। महिसबार छलाह धर्मराज, बनि गेलाह भेम-भौरा। एकटा व्यक्त्ति भेटलन्हि। ओ’ कहलकन्हि जे आगू वरक गाछ भेटत, ओकर पात तोड़ू।ओहि पर अहाँक सभ प्रश्नक उत्तर रहत। ई कहि ओ’ परबा बनि गेल। वरक पात तोड़लन्हि ज्योति तँ ओहि पर लिखल छल, यैह छी अछ्मितपुर। ओतुक्का राजाकेँ बच्चा नहि छलन्हि। ज्योति आशीर्वाद देलन्हि। कहलन्हि, एकटा छगर ओहि दिन पोसब जाहि दिन गर्भ ठहरि जाय। हम कदली वनसँ आयब तँ ई छगर स्वयं खुट्ट्सँ खुजि जायत। 12 बरखक बाद ज्योति कदली वनसँ चललाह। कोइलीकेँ जीवित कए देलन्हि। सुखायल धारमे पानि आबि गेल। सैनीक गाछ हरियर कचोर भ’ जीबि उठल। अछ्मितपुर गाममे राजा कहलन्हि जे छागर आ’ पुत्र दुनू एकहि दिन मरि गेल। पँजियार पाठाकेँ जिआ देलन्हि, कहलन्हि जो तोँ कदलीवनक धारमे नाओ पर चढ़ि जो, मनुक्ख रूप भेटि जयतौक। तावत राजाक पुत्र सेहो कदलीवनसँ शिकार खेला’ कए घोड़ा पर चढ़ि कए आबि गेल। ज्योति पँजियार गाम पहुँचि गेलाह गमछामे गहबर लेने।


3.राजा सलहेस


राजा सलहेस सुन्दर आ’ वीर छलाह। मोरंग नेपालमे रहैत छलाह। ओ’ दुसाध जातिक छलाह आ’ दबना नामक मोरंग राजाक मालिन सलहेससँ प्रेम करैत छलि। राजक वैद्य ओकरासँ प्रेम करैत छलाह आ’ दबनाक अस्वीकृतिसँ ओ’ आत्महत्या कए लेलन्हि। सलहेस छलाह मोरंगक तालुकदार नौरंगी बहादुर थापाक सिपाही। सलेहस छलाह मोनक राजा। सभकेँ विपत्तिमे सहायता दैत रहथि। ताहि द्वारे दबना दिशि हुनकर कोनो ध्यान नहीं छलन्हि। सभ हुनका राजा कहैत छलन्हि, से ओ’ तालुकदारकेँ पसिन्न नहीं पड़ल। एक दिन दरबारमे ओ’ सलहेसकेँ पुछलक- अहाँक नाम की? सलहेस कहलन्हि- हमर नाम छी राजा सलहेस। तखन थापा कहलकन्हि, जे अहाँ अपन नाममे राजा नहीं लगाऊ। सलहेस कहल्न्हि, जे ई पदवी छी, जन द्वारा देल पदवी। कोना छोड़ब एकरा। हमारा चोड़ियो देब लोक तँ कहबे करत।तखन थापा कहलकन्हि जे लोककेँ मना क’ दियौक। सलहेस कहलन्हि जे लोककेँ कोना मना करबैक। लोकक मोन जे ओ’ ककरा की बजाओत। निकलि गेलाह सलहेस ओतयसँ। आब नहि निमहत ई नोकरी। आइ कहैत अछि नाम छोड़य लेल, काल्हि किछु आर कहत। पितियौत बहिन रहैत छलन्हि मुंगेरमे। बहिनोइ राज दरभंगाक नोकरीमे छलाह। एम्हर कुसमी दबनाकेँ कहि देलक जे सलहेस जा’ रहल अछि मोरंग छोड़ि कय। दबना छलि कमरू-कमख्यासँ तंत्र-मंत्र सिखने। कहलक ओ’ सलहेसकेँ जे हम राजाक दरबारमे सात सय सिपाहीक सरदार चूहड़मलकेँ हटबा क’ अहाँकेँ सरदार बना देब। सैह भेल। बड़का जलसा देलक दबना, गेलक गीत-

रौ सुरहा,

बारह बरस तोरा लेल आँचर बन्हलौँ।


मुदा, केलक चोरि चूहड़मल, चोरेलक नौ लाखक रानीक हार आ’ नुका देलक सलहेसक ओछैनमे। राजाकेँ कहलक चूहड़मल जे सलहेसक घरक तलासी लेल जाय।सलहेसक गेरुआक खोलसँ खसल हार।

दबना काली मन्दिरमे तंत्र साधना शुरू कएलक। भूत-प्रेतकेँ नोतलक। खून बोकरबेलक चूहड़मलसँ।

चूहड़मल सभटा बकि देलक।

सलहेसकेँ जेलसँ छोड़ि देल गेल आ’ ओकर ओहदा बढ़ा देल गेल। चूहड़मलकेँ भेलैक जेल।

दबना आ’ सलहेस विवाह कए खुशीसँ रहय लगलाह।


4.बहुरा गोढ़िन नटुआदयाल


एकटा छलि बहुरा गोढ़िन आ’ एकटा छलाह नटुआ दयाल।

बहुरा गोढ़िन नर्त्तकी छलि आ’ ओकरा जादू अबैत छलैक।

नटुआ दयाल बहुरा गोढ़िनक प्रशंसक छल किएक तँ ओ’ छल प्रेमी, बहुरा गोढ़िनक पुत्रीक।

छल ओहो तांत्रिक।


कमला-बलानक कातक केवटी छलि बहुरा, बखरी, बेगूसरायक रहनिहारि।

हकलि छलि ओ’ कमरू सँ सीखलक जादू।

दुलरा दयाल छल मिथिला राज्यक भरौड़क राजकुमार, ओकरे नाम छल नटुआ दयाल।

नृत्य जे ओ’ बहुरासँ सिखलक तँ सभ नामे राखि देलकैक ओकर नटुआ।

नटुआ दयालक गुरू छलाह मंगल।

सिद्ध पुरुष।

अकाशमे बिन खुट्टीक धोती टँगैत छलाह, सुखला पर उतारैत छलाह।

बहुरा गाछ हँकैत छलि, जकरासँ झगड़ा भेल ओकरा सुग्गा बना पोसि लैत छलीह।

कमला कातमे रहैत छलाह आ’ भजैत छलाह,


कमलेक आसन,ओहीमे बास हे कमला मैय्या।


बहुरा वरकेँ मारि सीखने छल जादू। राजकुमारक विवाहक प्रस्तावकेँ नहि ठुकरा सकलि मुदा। बरियाती दरबज्जा लागल तँ भ’ गेलैक कह सुनी आ’ सभकेँ बना देलक ओ’ बत्तु।

मंत्री मल्लक एक आँखिक रोश्नी खतम।आहि रे बा।

व्यापारी जयसिंह छल मोहित महुराक बेटी पर,ओकरे खड्यंत्र।आहि रे बा।

गुरू लग गेल राजकुमार आ’ आदेश भेलैक, जो कामाख्या, सीखय लेल

षट् नृत्य, आ’ जादू।

चण्डिका मंदिरमे योगिनीसँ षट्नृत्य सिखलक आ’ आदेश भेलैक संरया ग्रामक भुवन मोहिनीसँ षट् नृत्यक एक अंग सीखबाक।

ओहि गामक सिद्ध देवी रहथि वागेश्वरी।

नरबलि चढैत छल ओतय। दैत्य अबैत छल ओतय।

सिखलक राजकुमार सिद्ध नृत्य अनहद आ’ आज्ञा चक्र।

करिया जादूकेँ काटय बला मंत्रफुकलक राजकुमारक कानमे।

कमला बलानमे आयल राजकुमार।

बहुरा सुखेलक धारक पानि।

राजा पता लगेलक जूकियासँ, अनलक बहुराकेँ, मुदा ओ’ तँ लगा देलक दोष राजकुमार पर। यज्ञ भेल तैयो कमलामे पानि नहि आयल, नटुआ पठेलक सभटा पानिकेँ पताल?

नटुआकेँ पकड़ि कय आनल गेल। ओ’ अपन नृत्यसँ जलाजल केलक कमलाकेँ।मुदा कहलक बहुराकेँ माफी दियौक।

बहुरा कहलक आब तोँ भेलह हमर बेटीक योग्य।

आबह बरियाती ल’कय।

नटुआ बरियाती ल’ क’ पहुँचल।

तीटा पान अयलैक,एक कमलाक पानिक हेतु,दोसर बहुराकेँ माफ करबाक

हेतु।

आ’ तेसर ओकर बेटीसँ व्याह करबाक हेतु।

तीनूटा पान उठेलक नटुआ आ’ शुरू भेल गीत-नाद।

पियास लगलैक नटुआकेँ शिष्य झिलमिलकेँ पठेलक इनार पर।

डोरी छोट भय गेलैक। अपने गेल नटुआ डोरी पैघ भ’ गेलैक।

फूलमती छलि ओतय,पतिक प्रतिभासँ प्रसन्न छलि ओ’।

मल्लक आँखि ठीक कएलक बहुरा।

कमला पहुँचल कनियाँक संग नटुआ, मुदा आहि रेबा।

नटुआकेँ चक्कू मारलक बहुरासँ दूर भेल ओकर शिष्य।


मुदा नटुआ चढ़ेने छल पटोर कमला मैय्याकेँ।


कमलाक धार खूने-खूनामे।


मुदा कामाख्याक जदूगरनी अयलीह आ’ जीवति कएलन्हि नटुआकेँ।


दुश्मनक बलि चढ़ेलक कमलाकेँ।



5.महुआ घटवारिन



महुआ घटवारिन परी जेकाँ सुन्दरि छलीह,जेना गूथल आँटामे एक चुटकी केसर, मुदा सतवंती छलीह। बाप गँजेरी शराबी आ’ माय सतमाय,मैभा महतारी, नजरि चोर। घरमे सतमायक राज छल। सोलह बरखक भय गेल रहथि मुदा हुनकर बियाहक चिंता ककरो नहि रहैक। परमान नदीक पुरनका घाटक मलाह प्र्रर्थना करैत छथि जे महुआक नावकेँ किनार लगा दियौक।

साओन-भादवक, भरल धार,

कम वयसक महुआ नहि जाऊ,

एहि राति खेबय लेल नाव।

एहने साओन-भादवक रातिमे सतमाय घाट पर उतरल वणिक् केँ तेल लगेबाक हेतु महुआकेँ पठबय चाहैत अछि, आ’ ओ’ जाय नहि चाहैत अछि। अपन मायकेँ यादि करैत अछि,

नोन चटा केँ किए नहि मारलँह,

पोसलँह एहि दिन खातिर।

मुदा सतमाय साओन-भादवक रातिमे पथिककेँ घाट पार करबाबय लेल महुआकेँ पठा देलक। महुआ बिदा भेलि आ’ बीच रस्तामे अपन सखी-बहिनपा फूलमतीसँ भरि राति गप करैत रहल।

केहन माय अछि जे रातिमे घाट पार करेबाक लेल कहैत अछि। माय ईहो कहलक जे पथिक पाइबला होय आ’ बूढ़ होय तँ ओकरा तेल-मालिस करबामे कोनो हर्ज नहि। ओकर मोनमे जे होय भेल तँ ओ’ पिते समान, ओकरा जेबीसँ चारि पाइ निकालि लेल जाय, अहीमे बुधियारी अछि। फूलमती कहलक- घबरायब नहि। जरेने रहू प्रेमक आगि , ओकरा लेल जे मोरंगमे आँगुर पर दिन गानि रहल अछि।

मोरंगक नाम सुनि महुआ उदास भय गेलि। ओ’ फागुनमे आयत।

भोरहरबा ओ’ गामपर पहुँचल आ’ माय दस बात कहलकैक। बाप नशामे आयल तँ माय ओकरो लात मारि भगा देलकैक। तखने हरकारा आयल आ’ मायक कानमे संदेश देलक। महुआ मायकेँ कहलक जे अहाँ जे कहब से हम करब। वणिक् क आदमी आयल छल,ओकरा संग महुआ घाट पर पहुँचल। वणिक् दू सिपाहेक संग नावमे बैसल। महुआ नाव खेबय लागलि। मुदा ओकरा नहि बूझल रहय जे ओकरा बेचि देल गेल छैक। सिपाही ओकरासँ पतवारि छीनि लेलक। सौदागर ओकरा कोरामे बैसाबय चाहलक, तँ ओ’ छरपटाय लागलि। सिपाही कहलक जे सभटा पाइ चुका देल गेल अछि, अहाँकेँ कोनो मँगनीमे नहि लय जा रहल छथि। महुआ स्थिर भय गेलीह। ओ’ सभ बुझलक जे महुआ मानि गेल अछि। तखने महुआ धारमे कूदि पड़लि। उल्टा धारमे मोरंग दिशि निकलि जाय चाहलक महुआ, जतय ओकर प्रेमी अछि, ओकरा लेल सात पालक नाव लेने। सौदागरक छोटका सिपाही महुआकेँ प्रेम करय लागल छल, ओहो कूदि गेल कोशिकीक धारमे, दूनू डूबि गेल।

अखनो साओन-भादवक धारमे कोनो घटवारकेँ कखनो देखा पड़ैत छैक महुआ। कोनो खिस्सा वचनहारकेँ देखा जाइत अछि ओ’, आ’ शुरू भय जाइत अछि , एकटा छलीह महुआ घटवारिन..............................।




6.डाकूरौहिणेय

मगध देशमे अशोकक पिता बिम्बिसारक राज्य छल। संपूर्ण शांति व्याप्त छल मुदा एकटा डाकू रौहिणेयक आतंक छल।ओकर पिता रहय डाकू लौहखुर। मरैत-मरैत ओ’ कहि गेल जे महावीर स्वामीक प्रवचन नहि सुनय आ’ जौँ कतओ प्रवचन होय तँ अप्पन कान बन्द क’ लय, अन्यथा बर्बादी निश्चित होयत। रौहिणेय मात्र पाइ बला के लुटैत छल आ’ गरीबकेँ बँटैत छल,ताहि द्वारे गामक लोक ओकर मदति करैत रहय आ’ ओ’ पकड़ल नहि जा सकलछल। एक बेर तँ ओ’ अप्पन संगीक संग वाटिकामे पाटलिपुत्रक सभसँ पैघ सेठक पुतोहु मदनवतीक अपहरण कय लेलक, जखन ओकर पति फूल लेबाक हेतु गेल रहय। जखन ओकर पति आयल तँ रौहिणेयक संगी ओकरा गलत जानकारी दय भ्रममे दय देलकैक। ओकरा बाद सुभद्र सेठक पुत्रक विवाह रहय।बराती जखन लौटि रहल छल तखन रौहिणेय सेठानी मनोरमाक भेष बनेलक आ’ ओकर संगी नर्त्तक बनि गेल।नकली नर्त्तक जखन नाचय लागल, तखन रौहिणेय भीड़मे कपड़ाक साँप चूड़ि देलक। रौहिणेय गहनासँ लदल वरकेँ उठा निपत्ता भय गेल। राजा शहरक कोतवालकेँ बजेलक।ओ’ तँ रौहिणेयकेँ पकड़बामे असमर्थता व्यक्त कएलक,आ’ कोतवाली छोड़बाक बातो कएलक। मंत्री अभयकुमार पाँच दिनमे डाकू रौहिणेयकेँ पकड़ि कय अनबाक बात कहलक। राजा ततेक तामसमे छलाह जे पाँच दिनका बाद डाकू रौहिणेयकेँ नहि अनला उत्तर अभयकुमारकेँ गरदनि काटि लेबाक बात कहलन्हि।

डाकू रौहिणेयकेँ सभ बातक पता चलि गेल छलैक।अभयकुमार जासूस सभ लगेलक। रौहिणेयकेँ मोनमे अयलैक जे सेठ साहूकार बहुत भेल आब किए नहिराजमहलमे डकैती कएल जाय। ओ’ राजमहल रस्ता पर चलि पड़ल। रस्तामे वाटिकामे महावीरस्वामीक प्रवचन चलि रहल छल। रौहिणेय तुरत अपन कान बन्द कए लेलक। मुदा तखने ओकरा पैरमे काँट गरि गेलैक। महावीर स्वामी कहि रहल छलाह-“देवता लोकनिकेँ कहियो घाम नहि छुटैत छन्हि।हुनकर मालाक फूल मौलाइत नहि अछि,हुनकर पैर धरती पर नहि पड़ैत छन्हि आ’ हुनकर पिपनी नहि खसैत छन्हि। “

तावत रौहिणेय काँट निकालि कान फेर बन्न कए लेलक आ’ राजमहलक दिशि चलि पड़ल।राजमहलमे सभ पहड़ेदार सुतल बुझाइत छल।मुदा ई अभयकुमारक चालि रहय।ओकर जासूस बता रहल रहय जे डाकू नगर आ’ महल दिशि आबि रहल अछि।

जखने ओ’ महलमे घुसैत रहय तँ पहरेदार ललकारा देलक। ओ’ छड़पिकय कालीमंदिर मे चलि गेल। सिपाही सभ मंदिरकेँ घेरि लेलक। ओ’ जखन देखलक जे बाहरसँ सभ घेरने अछितँ सिपाहीक मध्यसँ मंदिरक चहारदिवारी छड़पि गेल।मुदा ओतहु सिपाही सभ छल आ’ ओ’ पकड़ल गेल। राजा ओकरा सूली पर चढ़ेबाक आदेश देलकैक।मुदा मंत्री कहलन्हि जे बिना चोरीक माल बरामद केने आ’ बिना चिन्हासीक एकरा कोना फाँसी देल जाय।रौहिणेय मौका देखि कय गुहार लगेलक जे ओ’ शालि

गामक दुर्गा किसान छी,ओकर घर परिवार ओहि गाममे छैक।ओ’तँ नगर मंदिर दर्शनक हेतु आयल छल,ततबेमे सिपाही घेरि लेलकैक। राजा ओहि गाममे हरकारा पठेलक,मुदा ग्रामीण सभ रौहिणेयसँ मिलल छल।सभ कहलकैक जे दुर्गा ओहि गाममे रहैत अछि मुद तखन कतहु बाहर गेल छल। अभयकुमार सोचलक जे एकरासँ गलती कोना स्वीकार करबाबी।से ओ’ डाकूकेँ नीक महलमे कैदी बनाकय रखलक।डाकू महाराज ऐश आराममे डूबि गेलाह।

अभयकुमार एक दि न डाकूकेँ खूब मदिरा पिया देलन्हि।ओ’जखन होशमे आयल तँ चारू कातगंधर्व-अप्सरा नाचि रहल छल।

ओ’ सभ कहलकैक जे ई स्वर्गपुरी थीक आ’ इन्द्र रौहिणेयसँ भेँट करबाक हेतु आबत बला रहथि। रौहिणेय सोचलक जे राजा हमरा सूली पर चढ़ा देलक।मुदा ओ’ सभतँ मंत्रीक पठाओल गबैया सभ छल। तखने इंद्रक दूत आयल आ’ कहलक जे रौहिणेयकेँ देवताक रूप मे अभिषेक होयतैक,मुदा ताहिसँ पहिने ओकरा अपन पृथवीलोक पर कएल नीक-अधलाह कार्यक विवरण देबय पड़तैक।तखन रौहिणेयकेँ भेलैक जे सभटा पाप स्वीकार कय लय।मुदा तखने ओ देखलक जे दैव लोकक जीव सभ घामे-पसीने अछि,माला मौलायल छैक,पैर धरती पर छैक आ’पिपनी उठि-खसि रहल छैक।ओ’ अपनपुण्यक गुणगाण शुरू कए देलक।अभयकुमार राजाकेँ कहलक जे अहाँ जौँ ओकरा अभयदान दय देबैक तँ ओ’ सभटा गप्प बता देत। सैह भेलैक। रौहिणेय नगरक बाहरक अपन जंगलक गुफाक पता बता देलकैक,जतय सभटा खजाना आ’ अपहृत व्यक्ति सभ छल। राजा कहलन्हि जे किएक तँ ओकरा अभयदान भेटि गेल छैक ताहि हेतु ओ’ सभ संपदा राखि सकैत अछि।मुदा रौहिणेय कोनोटा वस्तु नहि लेलक।ओ’ कहलक जे जाहि महावीरस्वामीक एकटा वचन सुनलासँ ओकर जान बचि गलैक,तकरदीक्षा लेत आ’ ओकर सभटा वचन सुनि जीवन धन्य करत।


7.मूर्खाधिराज

एकटा गोपालक छल। तकर एकटा बेटा छल। ओकर कनियाँ पुत्रक जन्मक समय मरि गेलीह। बा बच्चाक पालन कएलन्हि। मुदा ओऽ बच्चा छल महामूर्ख। जखन ओऽ बारह वर्षक भेल तखन ओकर विवाह भए गेल। मुदा ओऽ विवाहो बिसरि गेल।
बुढ़िया बाकेँ काज करएमे दिक्कत होइत छलन्हि। से ओऽ बुझा-सुझाकेँ ओकरा कनियाकेँ द्विरागमन करा कए अनबाक हेतु कहलन्हि। बा ओकरा गमछामे रस्ता लेल मुरही बान्हि देलन्हि। रस्तामे बच्चाकेँ भूख लगलैक। ओऽ गमछासँ मुरही निकालि कए जखने मुँहमे देबए चाहैत छल आकि मुरही उड़ि जाइत छल। बच्चा बाजए लागल- आऊ, आऊ उड़ि जाऊ।
लगमे बोनमे एकटा चिड़ीमार जाल पसारने छल, मुदा बच्चाक गप सुनि कए ओकरा बड्ड तामस उठलैक। ओकरा लगलैक जेना ई बच्चा ओकर चिड़ैकेँ उड़ाबए चाहैत अछि। चिड़ीमार बच्चाकेँ पकड़ि कए पुष्ट पिटान पिटलक। बच्चा पुछलक- हमर दोख तँ कहू? चिड़ीमार कहलक- एना नहि। एना बाजू। आबि जो। फँसि जो।
आब बच्चा सैह बजैत आगू जाए लागल। आब साँझ भए रहल छल। बोन खतम होएबला छल। ओतए चोर सभ चोरिक योजना बनाए रहल छलाह। ओऽ सभ सुनलन्हि जे ई बच्चा हमरा सभकेँ पकड़ाबए चाहैत अछि। से ओऽ लोकनि सेहो ओकरा पुष्ट पिटान पिटलन्हि। बच्चा फेर पुछलक- हम बाजी तँ की बाजी? चोरक सरदार कहलक- बाज जे एहन सभ घरमे होए।
आब बच्चा यैह कहैत आगाँ बढ़ए लागल। आब श्मसानभूमि आबि गेल। एकटा जमीन्दारक एकेटा बेटा छलैक। से मरि गेल छल आऽ सभ ओकरा डाहबाक लेल आबि रहल छलाह। ओऽ लोकनि बच्चाक गप पर बड़ कुपित भेलाह आऽ ओकरा पुष्ट पिटलन्हि। फेर जखन बच्चा पुछलक जे की बाजब उचित होएत तँ सभ गोटे कहलखिन्ह जे एना बाजू- एहन कोनो घरमे नहि होए। बच्चा यैह गप बाजए लागल। आब नगर आबि गेल छल आऽ राजाक बेटाक विवाहक बाजा-बत्ती सभ भए रहल छल। बरियाती लोकनि बच्चाकेँ कहैत सुनलन्हि जे एहन कोनो घरमे नहो होए तँ ओऽ लोकनि क्रोधित भए फेर ओहि बच्चाकेँ पिटपिटा देलखिन्ह। जखन बच्चा पुछलक जे की बजबाक चाही तँ सभ कहलकन्हि जे किछु नहि बाजू। मुँह बन्न राखू।
बच्चा सासुर आबि गेल। ओतए नहिये किछु बाजल नहिये किछु खएलक, कारण खएबामे मुँह खोलए पड़ितैक। भोरे सकाले सासुर बला सभ अपन बेटीकेँ ओहि बच्चाक संग बिदा कए देलन्हि। रस्तामे बड्ड प्रखर रौद छलैक। ओऽ सुस्ताए लागल। मुदा कलममे सेहो बड्ड गुमार छलैक। कनियाकेँ बड्ड घाम खसए लगलैक आऽ ताहिसँ ओकर सिन्दूर धोखरि गेलैक। बच्चाकेँ भेलैक जे सासुर बला ओकरासँ छल कएलक आऽ ओकरा भँगलाहा कपार बला कनियाँ दए जाइ गेल अछि। एहन कनियाँकेँ गाम पर लए जाय ओऽ की करत। ओऽ तखने एकटा हजामकेँ बकरी चरबैत देखलक। ओकरासँ अपन पेटक बात कहबाक लेल अपन मुँह खोललक आऽ सभटा कहि गेल। हजाम बुझि गेल जे ई बच्चा मूर्खाधिराज अछि। ओऽ ओकरा अपन दूध दए बाली बकड़ीक संग कनियाँक बदलेन करबाक हेतु कहलक। बच्चा सहर्ष तैयार भए गेल। आगू ओऽ बच्चा सुस्ताए लागल आऽ खुट्टीसँ बकड़ीकेँ बान्हि देलक। बकड़ी पाउज करए लागल तँ बच्चाकेँ भेलैक जे बकड़ी ओकर मुँह दूसि रहल अछि। ओऽ ओकरा हाट लए गेल आऽ कदीमाक संग ओकरो बदलेन कए लेलक। गाम पर जखन ओऽ पहुँचल तँ ओकर बा बड्ड प्रसन्न भेलीह। हुनका भेलन्हि जे कनियाँक नैहरसँ सनेसमे कदीमा आएल अछि। मुदा कनियाँकेँ नहि देखि तकर जिगेसा कएलन्हि तँ बच्चा सभटा खिस्सा सुना देलकन्हि। ओऽ माथ पीटि लेलन्हि। मुदा बच्चा ई कहैत खेलाए चलि गेल जे कदीमाक तरकारी बना कए राखू।


8.कौवा आ फुद्दी

एकटा छलि कौआ आऽ एकटा छल फुद्दी। दुनूक बीच भजार-सखी केर संबंध। एक बेर दुर्भिक्ष पड़ल। खेनाइक अभाव एहन भेल जे दुनू गोटे अपन-अपन बच्चाकेँ खएबाक निर्णय कएलन्हि। पहिने कोआक बेर आयल। फुद्दी आऽ कौआ दुनू मिलि कए कौआक बच्चाकेँ खाऽ गेल। आब फुद्दीक बेर आयल। मुदा फुद्दी सभ तँ होइते अछि धूर्त्त।
“अहाँ तँ अखाद्य पदार्थ खाइत छी। हमर बच्चा अशुद्ध भए जायत। से अहाँ गंगाजीमे मुँह धोबि कए आबि जाऊ”।
कौआ उड़ैत-उड़ैत जंगाजी लग गेल-
“हे गंगा माय, दिए पानि, धोबि कए ठोढ़, खाइ फुद्दीक बच्चा”।
गंगा माय पानिक लेल चुक्का अनबाक लेल कहलखिन्ह।
आब चुक्का अनबाक लेल कौआ गेल तँ ओतएसँ माटि अनबाक लेल कुम्हार महाराज पठा देलखिन्ह्। खेत पर माटिक लेल कौआ गेल तँ खेत ओकरा माटि खोदबाक लेल हिरणिक सिंघ अनबाक लेल विदा कए देलकन्हि। हिरण कहलकन्हि जे सिंहकेँ बजा कए आनू जाहिसँ ओऽ हमरा मारि कए अहाँकेँ हमर सिंघ दऽ दए। आब जे कौआ गेल सिंघ लग तँ ओऽ सिंह कहलक- “हम भेलहुँ शक्त्तिहीन, बूढ़। गाञक दूध आनू, ओकरा पीबि कए हमरामे ताकति आयत आऽ हम शिकार कए सकब”।
गाञक लग गेल कौआ तँ गाञ ओकरा घास अनबाक लेल पठा देलखिन्ह। घास कौआकेँ कहलक जे हाँसू आनि हमरा काटि लिअ।
कौआ गेल लोहार लग, बाजल-
“हे लोहार भाञ,
दिअ हाँसू, काटब घास, खुआयब गाय, पाबि दूध,
पिआयब सिंहकेँ, ओऽ मारत हरिण,
भेटत हरिणक सिंघ, ताहिसँ कोरब माटि,
माटिसँ कुम्हार बनओताह चुक्का, भरब गङ्गाजल,
धोब ठोर, आऽ खायब फुद्दीक बच्चा”।
लोहार कहलन्हि, “हमरा लग दू टा हाँसू अछि, एकटा कारी आऽ एकटा लाल। जे पसिन्न परए लए लिअ”।
कौआकेँ ललका हाँसू पसिन्न पड़लैक। ओऽ हाँसू धीपल छल, जहाँ कौआ ओकरा अपन लोलमे दबओलक, छरपटा कए मरि गेल।


9.नैका बनिजारा

शोभनायका छलाह एकटा वणिकपुत्र। हुनकर विवाह तिरहुतक कोनो स्थानमे बारी नाम्ना स्त्रीसँ भेल छलन्हि। शोभा द्विरागमन करबा कए कनियाँकेँ अनलन्हि, आऽ बिदा भए गेलाह मोरंगक हेतु व्यापार करबाक लेल। पत्नीक संग एको दिन नहि बिता सकल छलाह। रातिमे एकटा गाछक नीचाँमे जखन ओऽ राति बितेबाक लेल सुस्ता रहल छलाह, तखन हुनका एकटा ध्वनि सुनबामे अएलन्हि। एकटा डकहर अपन भार्याक संग ओहि गाछ पर रहैत छल। दुनू गोटे गप कए रहल छलाह, जे ओऽ राति बड़ शुभ छल आऽ ओहि दिन पत्नीक संग जे रहत तकरा बड्ड प्रतिभावान पुत्रक प्राप्ति होएतैक।
ई सुनतहि शोभा घर पहुँचि गेल भार्या लग। लोकोपवादसँ बचबाक लेल पत्नीकेँ अभिज्ञानस्वरूप एकटा औँठी दए देलन्हि आऽ चलि गेलाह मरंग। ओतए १२ बर्ख धरि व्यापार कएलन्हि, आऽ तेरहम बर्ख बिदा भेला घरक लेल।
एम्हर ओकर कनियाक बड़ दुर्गति भेलैक। ओऽ जखन गर्भवती भए गेलीह, सासु-ससुर घरसँ निकालि देलकन्हि हुनका। मुदा ओकर दिअर जकर नाम छल चतुरगन, ओकरा सभटा कथा बुझल छलैक। ओतए रहय लगलीह ओऽ। जखन शोभा घुरल तखन सभ रहस्य बुझलकैक आऽ सभ हँसी खुशी रहए लागल।
तब बारी रे कानय जार बेजारो कानै रे ना।
दुर्गा गे स्वामी के लैके कोहबर घर लेवा ने
केलही रे ना।
कोहबर घर से हमरो निकालियो देलकइ रे ना
दुर्गा गे केना बचबै अन्न-पानी बिन केना
रहबइ रे ना।


10.डोकी डोका

एक टा छल डोका आऽ एकटा छल डोकी।
दुनूमे बड्ड प्रेम। डोकी कहए तरेगण लए आऊ, तँ डोका तरेगण आनएमे सेकेण्डक देरी भए जाए तँ ठीक मुदा मिनटक देरी नञि होमय दैत छल।

सियारकेँ रहए ईर्ष्या दुनूसँ। से ओऽ कनही सियारिनसँ मिलि गेल आऽ एक दिन जख्नन डोका आऽ डोकी एक्के थारीमे भोजन कए रहल छल, तखन डोकाकेँ बजेलक। एम्हर-ओम्हरक गप कए ओकरा बिदा कए देलक। फेर डोकीकेँ बजेलक ओऽ सियरबा। पुछलक जे अहाँ दुनू गोटेमे बड़ प्रेम अछि, मुदा डोका जे कहलक ताहिसँ तँ हमरा बड़ दुःख भेल। लागए-ए जे ओकर मोन ककरो आन पर छैक। आर किछु पूछए लागल डोकी तावत ओऽ सियरबा पड़ा गेल।

आब डोकी घरमे हनहन-पटपट मचा देलक। डोका लकड़ी काटय बोन दिशि गेल। घुरल नहि। भोरमे एकटा जोगी आएल तँ ओकरासँ डोकी पुछलक जे ई की भेल? जोगिया कहलक जे ई अछि पूर्व जन्मक सराप। जखने अहाँ डोकी पर विश्वास छोड़ब डोका छोड़ि कए चलि जाएत मुदा सातम दिन भेटि जाएत।
मुदा डोकी निकलि गेलि डोकाकेँ ताकए। बगुला भेटलैक डोकीकेँ कहलकैकरुकि जाऊ एहि राति। फेर सियरबा, वटवृक्ष, मानसरोवरक रस्तामे बोनमे हाथी सभ कहलकैक जे एक एक राति रुकि कए जाऊ मुदा डोकी नहि रुकलि। फेर भेटल मूस। ओऽ कहलक जे हमरा संग चलू, हम महल लए जायब, खिस्सा सुनाएब छह रातिक बाद सातम राति बीतत आऽ डोका भेटत। खिस्सा सुनबैत महल दिशि विदा भेल दुनू गोटे। मूस कहलक जे अहाँ हँ-हँ कहैत रहब खिस्साक बीचमे। मूसक खिस्सा कनेक नमगर रहए। डोकी बीचमे हँ कहब बिसरि गेलि। आऽ तकर बाद मूस सेहो खिस्सा बिसरि गेल। कतबो मोन पाड़य चाहलक मुदा मोन नहि पड़लैक। फेर आगू बढ़ल दुनू गोटे। एकटा दीबारिमे भूर कए दुनू गोटे सुरंगमे पहुँचल, तँ दू राति धरि चलैत रहल तखन महल आयल। ओतए डोकी हलुआ बनबए लेल लोहियामे समान देलक आऽ कनेक पानि आनए लेल बाहर गेल तँ मूसकेँ रहल नञि गेलैक आऽ ओऽ लोहियामे मुँह दए देलक आऽ मरि गेल। डोकी घुरि कए ई देखलक तँ कुहड़ि उठल।
बगुला छोड़ल सियरबा छोड़ल
छोड़ल वटक वृक्ष
हाथी सन बलगर
पकड़ल ई मूस।
मूस भैयाक संग लेल बीतल छह राति,
सातम रातिमे ओऽ प्राण गमेलन्हि
आऽ ओकर साँस टुटए लगलैक, मुदा तखने दरबज्जा खुजल आऽ कुरहड़ि लेने डोका हाजिर।


11.रघुनी मरर

चित्र: ज्योति झा चौधरी
देवदत्त, काशीराम आऽ रघुनी मरर तीन भाँय। गाय चराबए जाथि। एक बेर अकाल आयल तँ रघुनी भागि कए सहरसाक बनमां प्रखण्डक बिदिया बरहमपुर गाममे अपन डेरा खसेलन्हि।एतए जमीन्दार रहथि जुगल आऽ कमला प्रसाद। जुगल प्रसाद एक बेर दंगल करेने छलाह, ओहि दंगलकेँ जितने छलाह रघुनी। रघुनी हुनके लग गेलाह। एक सय बीघा जमीन देलन्हि जुगल प्रसाद हुनका। सुगमां गाममे बथान बनओलन्हि रघुनी। खेती करथि आऽ परिवारसँ दूर सुगमा गाममे रहथि।

एम्हर जुगल प्रसादक घरमे कलह भेल आऽ अपन जमीन-जत्था ओऽ गागोरी राजकेँ बेचि देलन्हि। रघुनीकेँ जखन ई पता चललन्हि तँ हुनका बड्ड दुख भेलन्हि।

एक दिन संगीक संग रघुनी नाच देखबाक लेल सिमरी गामक चौधरीक दलान पर गेल। चौधरी नाचक बाद नटुआकेँ औँठी आऽ दुशाला देलखिन्ह। रघुनी नटुआकेँ कहलखिन्ह जे बथान परसँ अपन पसिन्नक एक जोड़ी गाय हाँकि लिअ। नटुआ खुशीसँ दू टा निकगर गाय हाँकि अनलक आऽ खुशीसँ चौधरीकेँ देखेलक। मुदा चौधरीकेँ बुझेलए जे रघुनी हुनका नीचाँ देखबए चाहैत छथि। मुदा सोझाँ-सोँझी भिरबाक हिम्मत तँ छलए नहि।

से चौधरी देवी उपासक जादूक कलाकार मकदूम जोगीसँ भेँट कएलक। ओऽ जोगीकेँ कहलक जे रघुनीकेँ हमर नोकर बना दिअ। जोगी सरिसओ फूकि छिटलक मुदा रघुनी छल देवी भक्त से जोगीक जादू नहि चललैक।

चण्डिकाक सिद्धि कएलक जोगी आऽ रघुनी पर जादू सँ सए टा बाघसँ घेरबा कए मारि देलक। मुदा भक्त छल रघुनी से चण्डिकाक बहिन कामाख्या आबि रघुनीकेँ जिया देलन्हि। दोसर जादू लेल जोगी सरिसओ मन्त्राबए लेल जे सरिसओ मुट्ठीमे लेलक तँ मुट्ठी बन्दक-बन्दे रहि गेलैक।
फेर चौधरीकेँ पता चललैक जे रघुनी गागोरी राजाक लगान नहि देने अछि। से ओऽ राजा लग गेल आऽ कहलक जे रघुनी ने तँ अपने लगान देने अछि आऽ उनटले लोक सभकेँ लगान देबासँ मना कए रहल अछि।

गाम पर रघुनी नहि रहए आऽ सिपाही सभ ओकर भाए देवदत्त मररकेँ लए विदा भए गेलाह। रस्तामे केजरीडीह लग देवदत्त रघुनीकेँ देखलन्हि, रघुनी सेहो देवदत्तकेँ देखलन्हि। मुदा सिपाही सभ रघुनीकेँ नहि देखि सकलाह। मुदा जखन राजा देवदत्तकेँ काल कोठरीमे दए सिपाही सभकेँ ओकरा मारबाक लेल कहलक तँ उनटे जे कोड़ा चलबय तकरे चोट लागए। फेर राजा देवदत्तसँ कहलक जे गलती भेल आब अहाँ जे कहब सैह हम करब। देवदत्तक कहला अनुसार जे रैयत लगान नहि भरलाक कारणसँ जहलमे रहथि से छोड़ि देल गेलाह आऽ राजा रघुनी मररसँ सेहो माफी मँगलन्हि।


12.जट-जटिन

महाराज सिव सिंह (१४१२-१४४६) मिथिलाक राजा छलाह। विद्यापति हुनके शासनकालमे भेल छलाह आऽ राजा शिव सिंह आऽ हुनकर रानी लखिमा रानी हुनकासँ बड़ प्रेम करैत रहथि। एक टा जयट वा जट नाम्ना बड़ पैघ संगीतकार सेहो छलाह ओहि समयमे। राजा शिव सिंह हुनकासँ विद्यापतिक गीतकेँ राग-रागिनीमे बन्हबाक लेल कहने रहथि। वैह जयट जट-जटिन नाटकक रचना कएलन्हि आऽ जटक भूमिका सेहो कएने छलाह। साओन-भादवक शुक्ल-पक्षक रातिमे ई नाटक स्त्रीगण द्वारा होइत अछि।
जट छथि पहिरने पुरुष-परिधान आऽ जटिन पहिरने छथि छिटगर नूआ। आऽ देखू दुनू गोटे अपना संग अपन-अपन संगीकेँ लए आबि गेल छथि।
बियाहक पहिल सालक साओन, जटिन जाए चाहैत छथि नैहर मुदा धारमे बाढ़ि छैक, हे माय कोनो नौआ-ठाकुर-ब्राह्मण आकि पैघ भाए केर बदलामे छोटका भायकेँ पठबिहँ बिदागरीक लेल नञि तँ सासुर बला सभ बिदागरी आपिस कए देत। जाहि नवकनियाँकेँ नैहर नहि जाय देल गेल ओऽ अपन पतिकेँ कहैत छथि जे जट-जटिनक नृत्यमे तँ भाग लेबए दिअ। मुदा वर झूमर खेलाएबसँ मना कए दैत छथि, तखन ओऽ घामक बहन्ना बनाए दूर भए जाइत छथि।
जट-जटिन बीचमे छथि आऽ दुनूक संगीमे बहस चलि रहल अछि।
-चलू झूमर खेलाए।
-कोन पातपर चढ़ि कए।
-पुरैनीक।
जट-जटिनमे विआह होए बला अछि, मुदा जट किछु बातपर अड़ि गेल, जेना धानक शीस जेकाँ लीबि कए चलत जटिन, किछु देखावटी विरोधक बाद जटिन सभटा मानि जाइत छथि। फेर दुनू गोटे विआह कए लैत छथि। फेर भोर होइत अछि, जटिन कहित छथि जे जाए दिअ, अँगना बहारबाक अछि, मुदा जटा कहैत छथि जे अँगना मए-बहिन बहाड़ि लेत।
फेर दिन बितैत अछि तँ जटिन कहैत छथि जे गहना किएक नहि बनबाए रहल छी हमरा लेल, आर बहन्ना करब तँ हम सोनारक घर चलि जाएब।
जटिन ततेक खरचा करबैत छन्हि जे जटाक हाथी तक बिकाऽ जाइत छन्हि आऽ हाथीक सिकड़ि मात्र बचल रहि जाइत छन्हि।
जटिन कहैत छथि जे हमरा नैहर जएबाक अछि, तँ जटा कहैत छथि जे धानक फसिल तैयार अछि, तकरा काटि कए जाऊ। जटिन नहि मानैत छथि कहैत छथि जे एहि बेर जे हम जाएब तँ घुरि कए नहि आएब। मुदा सौतिनक गप सुनि कए डेराए जाइत छथि। बीचमे स्वांग जेना कोनो रोगीक इलाज आदि सेहो होइत रहैत अछि।
जट मोरंग बिदा भए जाइत छथि कमाए। जटिनकेँ सोनार प्रलोभन दैत छन्हि गहनाक, मुदा जटिन जटाक सुन्दरताक वर्णन करैत छथि।
फेर जटा घुरि अबैत अछि। एक दिन दुनू गोटेमे कोनो गप लऽ कए झगड़ा भए जाइत छन्हि। जट छौँकीसँ जटिनकेँ छूबि दैत छथि। जटिन रूसि कए घर छोड़ि दैत छथि। जटा गोपी, मनिहारिन आऽ आन-आन रूप धरि ताकैत छथि हुनका। मुदा जटाक घरमे झोल-मकड़ा भरि जाइत छन्हि आऽ अंगनामे दूभि उगि जाइत छन्हि। तखन जटिन हुनका
लग आबि जाइत छथि। फेर स्त्रीगण लोकनि बेंगकेँ एकटा खद्धा खुनि कए ओहिमे दए दैत छथि आऽ ऊपरसँ ओकरा कूटैत छथि आऽ मरल बेंगकेँ झगराहि स्त्रीक दरबज्जपर फेकि अबैत छथि। ओऽ स्त्री भोरमे मरल बेंगकेँ देखला उत्तर जतेक गारि पढ़ैत छथि, ततेक बेशी बरखा होइत अछि।


13.बत्तू

एकटा बकड़ी छलि। ओकरा एकटा बच्चा भेलैक। मुदा ओऽ छागर मात्र ४ मासक छल आकि दुर्गापूजा आबि गेल। दुर्गापूजामे छागरक बलि देबाक कियो कबुला केने छलाह। से बकड़ीक मालिकक लग आबि छागरक दाम-दीगर केलन्हि। संगमे पाइ नहि अनने छलाह से अगिला दिन पाइ अनबाक आऽ चागर लए जएबाक गप कए चलि गेलाह। बकड़ी ई सभ सुनैत छलि ओऽ अपन बच्चाकेँ कहलन्हि जे भागि जाऊ जंगल दिस नहि तँ ई मलिकबा काल्हि अहाँकेँ बेचि देत आऽ किननहार दुर्गापूजामे अहाँक बलि दए देत। छागर राता-राती जंगल भागि गेल। २-३ साल ओऽ जंगलमे बितेलक, मोट-सोट बत्तू भए गेल, पैघ दाढ़ी आऽ सिंघ भए गेलैक ओकरा। एक दिन घुमैत-घुमैत ओऽ दोसर जंगलमे चलि गेल। ओतए एकटा बाघ छल, बत्तू बाघकेँ देखि कए घबड़ा गेल। बाघ सेहो एहन जानवर नहि देखने छल, से ओऽ अपने डरायल छल। ओऽ पुछलक-
नामी नामी दाढ़ी मोंछ भकुला,
कहू कतएसँ अबैत छी, नञि तँ देव ठकुरा।
बत्तू कहलक-
अर्चुन्नी खेलहुँ गरचुन्नी खेलहुँ, सिंह खेलहुँ सात।
आऽ जहिया दस बाघ नञि होए, तहिया परहुँ ठक दए उपास।

ई सुनि बाघ पड़ाएल। मुदा रस्तामे नढिया सियार ओकरा भेटलैक आऽ कहलकैक जे अहाँ अनेरे डरैत छी। चलू आइ तँ नीक मसुआइ होएत। ओऽ तँ बकड़ीक बच्चा अछि। बाघ डराएल छल से ओऽ सियारक पैरमे पैर बान्हि ओतए जएबा लेल तैयार भए गेल। आब बत्तू जे दुनूकेँ अबैत देखलक तँ बुझि गेल जे ई सियरबाक काज अछि। मुदा ओऽ बुद्धिसँ काज लेलक। कहलक-
“ऐँ हौ, तोरा दू टा बाघ आनए ले कहलियहु आऽ तोँ एकेटा अनलह”।

ई सुनैत देरी बाघ भागल आऽ सियरबा घिसिआइत मरि गेल।


14.भाट-भाटिन

एकटा छल भाट आऽ एकटा छलि भाटिन।
भाटिन एकटा मणिधारी गहुमनसँ प्रेम करैत छलि। ओऽ साँप लेल नीक निकुत बनबैत छलि आऽ भाटकेँ बसिया-खोसिया दैत चलि। भाट दुबर-पातर होइत गेल। मुदा भाटिन ओकरा जिबए नहि दए चाहैत छलि से ओऽ साँपकेँ कहलक भाटकेँ डसि लए लेल।
आब साँप भाटकेँ काटए लेल ताकिमे रहए लागल। एक दिन जखन भाट धारमे पएर धोबए लेल पनही खोलि कए रखलक तखने साँप ओकर पनहीमे नुका गेल। भाट आएल आऽ पहिरबाक पहिने पनही झारलक तँ ओऽ साँप खसि पड़ल। भाट पनहीसँ मारि-मारि कए साँपक जान लऽ लेलक आऽ ओकरा मारि कए वरक गाछपर लटका देलक।

भाट जखन गामपर पहुँचल तखन ओऽ अपन कनियाँकेँ सभटा खिस्सा सुनेलक। आब भाटिनक तँ प्राण सुखा गेलैक। ओऽ भाटक संग वरक गाछ लग गेल आऽ अपन प्रेमी साँपकेँ मरल देखि कए बेहोश भऽ गेल। भाट ओकरा गामपर अनलक। भाटिन दुखी भऽ असगरे वरक गाछपरसँ साँप उतारि ओकरा नौ टुकड़ा कए घर आनि लेलक। भाटिन साँपक चारि टा टुकड़ी चारू खाटक पाइसक नीचाँ, एकटा मचियाक नीचाँ, एकटा तेलमे, एकटा नूनमे, एकटा डाँरमे आऽ एकटा खोपामे राखि लेलक। फेर भाटकेँ कहलक जे खाट, मचिया, नून-तेल, डाँर आऽ खोपामे की अछि से बता नहि तँ भकसी झोका कए मारबौक। भाट नहि बता सकल आऽ ओऽ कहलक जे मरबाऽ सँ पहिने ओऽ बहिनसँ भेँट करए चाहैत अछि आऽ ताहि लेल दू दिनुका मोहलत ओकरा चाही। भाट अपन बहिन लग गेल तँ ओऽ अपन भाइक औरदा जोद्इ रहल छलि। सभ गप जखन ओकरा पता चललैक तखन ओऽ कहलक जे ओहो संग चलत ओकर। रस्तामे एकटा धर्मशालामे रातिमे दुनू भाइ-बहिन रुकल, मुदा बहिन चिन्ते सुति नहि सकल। तखने धर्मशालाक सभटा दीआ एक ठाम आबि कए गप करए लागल। भाटक बहिनक कोठलीक दीआ कहलक जे भाटिन अपन वर भाटकेँ मारए चाहैत अछि आऽ ओऽ जे फुसियाहीक प्रहेलिका बनेने अछि, से ओकर प्रेमी मरल गहुमनकेँ ओऽ टुकड़ी कए ठाम-ठाम राखि देने अछि आऽ तकरे प्रहेलिका बना देने अछि। आब भोरमे जखन दुनू भाइ बहिन गामपर पहुँचलि तँ बहिन अपन भौजीकेँ कहलक जे ओऽ सेहो प्रहेलिका सुनए चाहैत अछि। भाटिन कहलक जे जौँ ओऽ प्रहेलिका नञि बुझि सकल तखन ओकरो भकसी झोँका कऽ ओऽ मारि देत। तखन ननदि कहलक जे यदि ओऽ प्रहेलिकाक उत्तर दए देत तखन भौजीकेँ भकसी झोका कए मारि देत। आब जखने भाटिन प्रहेलिका कहलक तखने बहिन सभटा टुकड़ी निकालि-निकालि कऽ सोझाँ राखि देलक आऽ भौजीकेँ भकसी झोका कऽ मारि देलक।

15.गांगोदेवीक भगता

गांगोदेवी मलाहिन छलीह। एक दिन हुनकर साँय, अपन भाय आऽ पिताक संग माछ मारए लेल गेलाह। साओनक मेला चलि रहल छलैक आऽ मिथिलामे साओनमे माँ खाइ आकि बेचएपर तँ कोनो मनाही छैक नहि। गांगोदेवीक वर सोचलन्हि जे आइ माछ मारि हाटमे बेचब आऽ साओनक मेलासँ गांगो लेल चूड़ी-लहठी आनब।
धारमे तीनू गोटे जाल फेकलन्हि सरैया पाथलन्हि मुदा बेरू पहर धरि डोका, हराशंख आऽ सतुआ मात्र हाथ अएलन्हि। आब गांगोक वर कनियाँक नाम लए जाल फेकि कहलन्हि जे ई अन्तिम बेर छी गांगो। एहि बेर जे माँछ नहि आएल तँ हमरा क्षमा करब। आब भेल ई जे एहि बेर जाल माँछसँ भरि गेल। जाल घिंचने नहि घिंचाए। सभटा माँछ बेचि कए गांगो लेल लहठी-चूड़ीक संग नूआ सेहो कीनल गेल।
अगिला दिन गांगोक वर गांगोक नाम लए जाल फेंकलन्हि तँ फेर हुनकर जाल माँछसँ भरि गेलन्हि मुदा हुनकर भाइ आऽ बाबूक हिस्सा वैह डोका-काँकड़ु अएलन्हि। ओऽ लोकनि खोधिया कए एकर रहस्य बूझि गेलाह फेर ई रहस्य सौँसे मिथिलाक मलाह लोकनिक बीच पसरि गेल। गांगोदेवीक भगता एखनो मिथिलाक मलाह भैया लोकनिमे प्रचलित अछि। सभ जाल फेंकबासँ पहिने गांगोक स्मरण करैत छथि।


16.बड़ सख सार पाओल तुअ तीरे

मिथिलाक राजाक दरबारमे रहथि बोधि कायस्थ। राजा दरमाहा देथिन्ह ताहिसँ गुजर बसर होइत छलन्हि बोधि कायस्थक। दोसाराक प्रति हिंसा, दोसरक स्त्री वा धनक लालसा एहि सभसँ भरि जन्म दूर रहलाह बोधि कायस्थ। आजीविकासँ अतिरिक्त जे राशि भेटन्हि से दान-पुण्यमे खरचा भऽ जाइत छलन्हि। भोलाबाबाक भक्त छलाह।
जेना सभकेँ बुढ़ापा अबैत छैक तहिना बोधि कायस्थक मृत्यु सेहो हुनकर निकट अएलन्हि आऽ ओऽ घर-द्वार छोड़ि गंगा-लाभ करबाक लेल घरसँ निकलि गेलाह। जखन गंगा धार अदहा कोसपर छलीह तखन परीक्षाक लेल बोधि कायस्थ गंगाकेँ सम्बोधित कए अपनाकेँ पवित्र करबाक अनुरोध कएलन्हि। गंगा माय तट तोड़ि आबि बोधि कायस्थकेँ अपनामे समाहित कएलन्हि। बोधि कायस्थकेँ सोझे स्वर्ग भेटलन्हि।
बोधि कायस्थ विद्यापतिसँ पूर्व भेल छलाह कारण ई घटना विद्यापति रचित संस्कृत ग्रंथ पुरुष-परीक्षामे वर्णित अछि। फेर विद्यापति अपन मैथिली पद बड़ सुख सार पाओल तुअ तीरे लिखलन्हि- आऽ बोधि-कायस्थ जेकाँ गंगा लाभ कएलन्हि।

17.छेछन

डोम जातिक लोकदेवता छेछन महराज बड्ड बलगर छलाह। मुदा हुनकर संगी साथी सभ कहलकन्हि जे जखन ओ सभ सहिदापुर गेल छलाह, बाँसक टोकरी आऽ पटिया सभ बेचबाक लेल तखन ओतुक्का डोम सरदार मानिक चन्दक वीरता देखलन्हि। ओ एकटा अखराहा बनेने रहथि आऽ ओतए एकटा पैघ सन डंका राखल रहय। जे ओहि डंकापर छोट करैत छल ओकरा मानिकचन्दक पोसुआ सुग्गर, जकर नाम चटिया छल तकरासँ लड़ए पड़ैत छलैक। मानिकचन्द प्रण कएने रहथि कि जे क्यो चटियासँ जीत जाएत से मानिकचन्दसँ लड़बाक योग्य होएत आऽ जे मानिकचन्दकेँ हराएत से मानिकचन्दक बहिन पनमासँ विवाहक अधिकारी होयत। मुदा ई मौका आइ धरि नहि आएल रहए जे क्यो चटियाकेँ हराऽ कए मानिकचन्दसँ लड़ि सकितय।

दिन बितैत गेल आऽ एक दिन अपन पाँच पसेरीक कत्ता लए छेछन महराज सहिदापुर दिश विदा भेलाह। डंकापर चोट करबासँ पहिने छेछन महराज एकटा बुढ़ीसँ आगि माँगलन्हि आऽ अपन चिलममे आगि आऽ मेदनीफूल भरि सभटा पीबि गेलाह आऽ झुमैत डंकापर चोट कए देलन्हि। मानिकचन्द छेछनकेँ देखलन्हि आऽ चटियाकेँ शोर केलन्हि। चटिया दौगि कए आयल मुदा छेछनकेँ देखि पड़ा गेल। तखन पनमा आऽ मानिकचन्द ओकरा ललकारा देलन्हि तँ चटिया दौगि कय छेछनपर झपटल मुदा छेछन ओकर दुनू पएर पकड़ि चीरि देलखिन्ह। फेर मनिकचन्द आऽ छेछनमे दंगल भेल आऽ छेछन मानिकचन्दकेँ बजारि देलन्हि। तखन खुशी-खुशी मानिकचन्द पनमाक बियाह छेछनक संग करेलन्हि।
दिन बितैत गेल आऽ आब छेछन दोसराक बसबिट्टीसँ बाँस काटए लगलाह। एहिना एक बेर यादवक लोकदेवता कृष्णारामक बसबिट्टीसँ ओऽ बहुत रास बाँस काटि लेलन्हि। कृष्णाराम अपन सुबरन हाथीपर चढ़ि अएलाह आऽ आमक कलममे छेछनकेँ पनमा संग सुतल देखलन्हि। सुबरन पाँच पसेरीक कत्ताकेँ सूढ़सँ उठेलक आऽ छेछनक गरदनिपर राखि देलक आऽ अपन भरिगर पएर कत्तापर राखि देलक।


18.गरीबन बाबा

कमला कातक उधरा गाममे तीनटा संगी रहथि। पहिने गामे-गामे अखराहा रहए, ओतए ई तीनू संगी कुश्ती लड़थि आऽ पहलमानी करथि। बरहम ठाकुर रहथि ब्राह्मण, घासी रहथि यादव आऽ गरीबन रहथि धोबि। अखराहा लग कमला माइक पीड़ी छल। एक बेर गरीबनक पएर ओहि पीड़ीमे लागि गेलन्हि, जाहिसँ कमला मैय्या तमसा गेलीह आऽ इन्द्रक दरबारसँ एकटा बाघिन अनलन्हि आऽ ओकरासँ अखराहामे गरीबनक युद्ध भेल। गरीबन मारल गेलाह। गरीबनकेँ कमला धारमे फेंकि देल गेलन्हि आऽ हुनकर लहाश एकटा धोबिया घाटपर कपड़ा साफ करैत एकटा धोबि लग पहुँचल। हुनका कपड़ा साफ करएमे दिक्कत भेलन्हि से ओऽ लहाशकेँ सहटारि कए दोसर दिस बहा देलन्हि।


एम्हर गरीबनक कनियाँ गरीबनक मुइलाक समाचार सुनि दुखित मोने आर्तनाद कए भगवानकेँ सुमिरलन्हि। आब भगवानक कृपासँ गरीबनक आत्मा एक गोटेक शरीरमे पैसि गेल आऽ ओऽ भगता खेलाए लागल। भगता कहलन्हि जे एक गोटे धोबि हुनकर अपमान केलन्हि से ओऽ शाप दैत छथिन्ह जे सभ धोबि मिलि हुनकर लहाशकेँ कमला धारसँ निकालि कए दाह-संस्कार करथि नहि तँ धोबि सभक भट्ठीमे कपड़ा जरि जाएत। सभ गोटे ई सुनि धारमे कूदि लहाशकेँ निकालि दाह संस्कार केलन्हि। तकर बादसँ गरीबन बाबा भट्ठीक कपड़ाक रक्षा करैत आएल छथि।


19.लालमैनबाबा


नौहट्टामे दू टा संगी रहथि मनसाराम आऽ लालमैन बाबा। दुनू गोटे चमार जातिक रहथि आऽ संगे-संगे महीस चरबथि। ओहि समयमे नौहट्टामे बड्ड पैघ जंगल रहए, ओतहि एक दिन लालमैनक महीसकेँ बाघिनिया घेरि लेलकन्हि। लालमैन महीसकेँ बचबएमे बाघिनसँ लड़ए तँ लगलाह मुदा स्त्रीजातिक बाघिनपर अपन सम्पूर्ण शक्तिक प्रयोग नहि केलन्हि आऽ मारल गेलाह। मनसारामकेँ ओऽ मरैत-मरैत कहलन्हि जे मुइलाक बाद हुनकर दाह संस्कार नीकसँ कएल जाइन्हि। मुदा मनसाराम गामपर ककरो नहि ई गप कहलन्हि। एहिसँ लालमैन बाबाकेँ बड्ड तामस चढ़लन्हि आऽ ओऽ मनसारामकेँ बका कऽ मारि देलन्हि। फेर सभ गोटे मिलि कए लालमैन बबाक दाह संस्कार कएलन्हि आऽ हुनकर भगता मानल गेल, एखनो ओऽ भगताक देहमे पैसि मनता पूरा करैत छथि।


20.गोनू झा आ दस ठोप बाबा

मिथिला राज्यमे भयंकर सुखाड़ पड़ल। राजा ढ़ोलहो पिटबा देलन्हि, जे जे क्यो एकर तोड़ बताओत ओकरा पुरस्कार भेटत।
एकटा विशालकाय बाबा दस टा ठोप कएने राजाक दरबारमे ई कहैत अएलाह जे ओऽ सय वर्ष हिमालयमे तपस्या कएने छथि आऽ यज्ञसँ वर्षा कराऽ सकैत छथि। साँझमे हुनका स्थान आऽ सामग्री भेटि गेलन्हि। गोनू झा कतहु पहुनाइ करबाक लेल गेल रहथि। जखन साँझमे घुरलाह तखन कनिञाक मुँहसँ सभटा गप सुनि आश्चर्यचकित हुनका दर्शनार्थ विदा भेलाह।
एम्हर भोर भेलासँ पहिनहि सौँसे सोर भए गेल जे एकटा बीस ठोप बाबा सेहो पधारि चुकल छथि।
आब दस ठोप बाबाक भेँट हुनकासँ भेलन्हि तँ ओऽ कहलन्हि “अहाँ बीस ठोप बाबा छी तँ हम श्री श्री १०८ बीस ठोप बाबा छी। कहू अहाँ कोन विधिये वर्षा कराएब”।
“हम एकटा बाँस रखने छी जकरासँ मेघकेँ खोँचारब आऽ वर्षा होएत”।
“ओतेक टाक बाँस रखैत छी कतए”।
“अहाँ एहन ढोंगी साधुक मुँहमे”।
आब ओऽ दस ठोप बाबा शौचक बहन्ना कए विदा भेला।
“औऽ। अपन खराम आऽ कमण्डल तँ लए जाऊ”। मुदा ओऽ तँ भागल आऽ लोक सभ पछोड़ कए ओकर दाढ़ी पकरि घीचए चाहलक। मुदा ओऽ दाढ़ी छल नकली आऽ ताहि लेल ओऽ नोचा गेल। आऽ ओऽ ढ़ोंगी मौका पाबि भागि गेल। तखन गोनू झा सेहो अपन मोछ दाढ़ी हटा कए अपन रूपमे आबि गेलाह। राजा हुनकर चतुरताक सम्मान कएलन्हि।




समीक्षा श्रृंखला-६ : नचिकेताक नाटकपर गजेन्द्र ठाकुर

नचिकेताक नाटक
नो एण्ट्री: मा प्रविश
नाटकक कथानक: प्रथम कल्लोल: ई नाटक ज्योतिरीश्वरक परम्परामे कल्लोलमे (हुनकर वर्ण रत्नाकर कल्लोलमे विभक्त अछि जे नाटक नहि छी, धूर्त-समागम जे ज्योतिरीश्वर लिखित नाटक अछि- अंकमे विभक्त अछि) विभाजित अछि। चारि कल्लोलक विभाजनक प्रथम कल्लोल स्वर्ग (वा नरक) केर द्वारपर आरम्भ होइत अछि। ओतए बहुत रास मुइल लोक द्वारक भीतर प्रवेशक लेल पंक्तिबद्ध छथि। क्यो पथ दुर्घटनामे शिकार भेल बाजारी छथि तँ संगमे युद्दमे मृत भेल सैनिक आ चोरि करए काल मारल गेल चोर, उच्चक्का आ पॉकिटमार सेहो छथि। ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागममे जे अति आधुनिक अब्सर्डिटी अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो देखबामे अबैत अछि। प्रथम कल्लोलमे जे बाजारी छथि से, पंक्ति तोड़ि आगाँ बढ़ला उत्तर, चोर आ उचक्का दुनू गोटेकेँ, कॉलर पकड़ि पुनः हुनकर सभक मूल स्थानपर दए अबैत छथि। उचक्का जे बादमे पता चलैत अछि जे गुण्डा-दादा थिक मुदा बाजारी लग सञ्च-मञ्च रहैत अछि, हुनकासँ अंगा छोड़बाक लेल कहैत अछि। मुदा जखन पॉकेटमार बाजारी दिससँ चोरक विपक्षमे बजैत अछि तखन उचक्का चक्कू निकालि अपन असल रूपमे आबि जाइत अछि आ पॉकेटमारपर मारि-मारि कए उठैत अछि। मुदा जखन चोर कहैत छनि जे ई सेहो अपने बिरादरीक अछि जे छोट-छीन पॉकेटमार मात्र बनि सकल, ओकर जकाँ माँजल चोर नहि, आ उचक्का जेकाँ गुण्डा-बदमाश बनबाक तँ सोचिओ नञि सकल, तखन उचक्का महराज चोरक पाछाँ पड़ि जाइत छथि, जे बदमाश ककरा कहलँह। आब पॉकेटमार मौका देखि पक्ष बदलैत अछि आ उचक्काकेँ कहैत छन्हि जे अहाँकेँ नहि हमरा कहलक। संगे ईहो कहैत अछि जे चोरि तँ ई तेहन करए जनैत अछि, जे गिरहथक बेटा आ कुकुर सभ चोरि करैत काल पीटैत-पीटैत एतऽ पठा देलकए आ हमर खिधांश करैत अछि, बड़का चोर भेला हँ। भद्र व्यक्ति चोरक बगेबानी देखि ई विश्वास नहि कए पबैत छथि जे ओ चोर थिकाह। ताहिपर पॉकेटमार, चोर महाराजकेँ आर किचकिचबैत छन्हि। तखन ओ चोर महराज एहि गपपर दुख प्रकट करैत छथि जे नहि तँ ओहि राति एहि पॉकेटमारकेँ चोरिपर लए जएतथि आ ने ओ हुनका पिटैत देखि सकैत। एम्हर बजारी जे पहिने चोर आ उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ि घिसिया चुकल छलाह, गुम्म भेल सभटा सुनैत छथि आ दुख प्रकट करैत छथि जे एकरा सभक संग स्वर्गमे रहब, तँ स्वर्ग केहन होएत से नहि जानि। आब बजारी महराज गीतक एकटा टुकड़ी एहि विषयपर पढ़ैत छथि। जेना धूर्तसमागममे गीत अछि तहिना नो एण्ट्री: मा प्रविश मे सेहो, ई एहि स्थलपर प्रारम्भ होइत अछि जे एहि नाटककेँ संगीतक बना दैत अछि। ओम्हर पॉकेटमारजी सभक पॉकेट काटि लैत छथि आ बटुआ साफ कए दैत छथि। आब फेर गीतमय फकड़ा शुरू भए जाइत अछि मुदा तखने एकटा मृत रद्दीबला सभक तंद्राकेँ तोड़ि दैत छथि, ई कहि जे यमालयक बन्द दरबज्जाक ओहि पार, ई बटुआ आ पाइ-कौड़ी कोनो काजक नहि अछि। आब दुनू मृत भद्र व्यक्ति सेहो बजैत छथि, जे हँ दोसर देसमे दोसर देसक सिक्का कहाँ चलैत अछि। आब एकटा रमणीमोहन नाम्ना मृत रसिक भद्र व्यक्तिक दोसर देसक सिक्का नहि चलबाक विषयमे टीप दैत छथि, जे हँ ई तँ ओहिना अछि जेना प्रेयसीक दोसरक पत्नी बनब। आब एहि गपपर घमर्थन शुरू भए जाइत अछि। तखन रमणी मोहन गपक रुखि घुमा दैत छथि जे दरबज्जाक भीतर रम्भा-मेनका सभ हेतीह। भिखमंगनी जे तावत अपन कोरामे लेल एकटा पुतराकेँ दोसराक हाथमे दए बहसमे शामिल भऽ गेल छथि, ईर्ष्यावश रम्भा-मेनकाकेँ मुँहझड़की इत्यादि कहैत छथि। मुदा पॉकेटमार कहैत अछि जे भीतरमे सुख नहि दुखो भए सकैत अछि। एहिपर बीमा बाबू अपन कार्यक स्कोप देखि प्रसन्न भए जाइत छथि। आब पॉकेटमार इन्द्रक वज्र पर रुपैय्याक बोली शुरू करैत अछि। एहि बेर बजारी तन्द्रा भंग करैत अछि आ दुनू भद्र व्यक्ति हुनकर समर्थन करैत कहैत अछि, जे ई अद्भुत नीलामी अछि, जे करबा रहल अछि से पॉकेटमार आ ओहिमे शामिल अछि चोर आ भिखमंगनी, पहिले-पहिल सुनल अछि आ फेर संगीतमय फकड़ा सभ शुरू भए जाइत अछि। मुदा तखने नंदी-भृंगी शास्त्रीय संगीतपर नचैत प्रवेश करैत छथि। आब नंदी-भृंगीक ई पुछलापर जे दरबज्जाक भीतर की अछि, सभ गोटे अपना-अपना हिसाबसँ स्वर्ग-नरक आ अकास-पताल कहैत छथि। मुदा नंदी-भृंगी कहैत छथि जे सभ गोटे सत्य कहैत छी आ क्यो गोटे पूर्ण सत्य नहि बजलहुँ। फेर बजैत-बजैत ओ कहए लगैत छथि, क्यो चोरि काल मारल गेलाह (चोर ई सुनि भागए लगैत छथि तँ दु-तीन गोटे पकड़ि सोझाँ लए अनैत छन्हि!) तँ क्यो एक्सीडेन्टसँ, आ एहि तरहेँ सभटा गनबए लगैत छथि, मुदा बीमा-बाबू कोना बिन मृत्युक एतए आयल छथि से हुनकहु लोकनिकेँ नहि बुझल छन्हि ! बीमा बाबू कहैत छथि जे ओ नव मार्केटक अन्वेषणमे आएल छथि ! से बिन मरल सेहो एक गोटे ओतए छथि ! भृंगी नंदीकेँ ढ़ेर रास बीमा कम्पनीक आगमनसँ आएल कम्पीटिशनक विषयमे बुझबैत छथि ! एम्हर प्रेमी-प्रेमिकामे घोंघाउज शुरू होइत छन्हि, कारण प्रेमी आब घुरि जाए चाहैत छथि। रमणी मोहन प्रेमीक गमनसँ प्रसन्न होइत छथि जे प्रेमिका आब असगरे रहतीह आ हुनका लेल मौका छन्हि। मुदा भृंगी ई कहि जे एतएसँ गेनाइ तँ संभव नहि मुदा ई भऽ सकैत अछि जे दुनू जोड़ी माय-बाप (!) केँ एक्सीडेन्ट करबाए एतहि बजबा लेल जाए। मुदा अपना लेल माए-बापक बलि लेल प्रेमी-प्रेमिका तैयार नहि छथि। तखन नंदी भृंगी दुनू गोटेक विवाह गाजा-बाजाक संग करा दैत छथि आ कन्यादान करैत छथि बजारी।
दोसर कल्लोल: दोसर कल्लोलक आरम्भ होइत अछि एहि आभाससँ, जे क्यो नेता मरलाक बाद आबएबला छथि, हुनकर दुनू अनुचर मृत भए आबि चुकल छथि आ नेताजीक अएबाक सभ क्यो प्रतीक्षा कए रहल छथि, दुनू अनुचर छोट-मोट भाषण दए नेताजीक विलम्बसँ अएबाक (मृत्युक बादो !) क्षतिपूर्ति कए रहल छथि, गीतक योग दए। एकटा गीत चोर नहि बुझैत छथि मुदा भिखमंगनी आ रद्दीबला बुझि जाइत छथि, ताहि पर बहस शुरू होइत अछि। चोरकेँ अपनाकेँ चोर कहलापर आपत्ति अछि आ भिखमंगनीकेँ ओ भिख-मंग कहैत अछि तँ भिखमंगनी ओकरा रोकि कहैत छथि जे ओ सरिसवपाहीक अनसूया छथि, मिथिला-चित्रकार, मुदा दिल्लीक अशोकबस्ती आबि बुझलन्हि जे एहि नगरमे कला-वस्तु क्यो नहि किनैत अछि आ तखन चौबटियाक भिखमंगनी बनि रहि गेलीह। चोर कहैत अछि जे मात्र ओ बदनाम छथि, चोरि तँ सभ करैत अछि। नव बात कोनो नहि अछि, सभ अछि पुरनकाक चोरि। तकर बाद नेताजी पहुँचि जाइत छथि आ लोकक चोर, उचक्का आ पॉकेटमार होएबाक कारण समाजक स्थितिकेँ कहैत छथि। तखने एकटा वामपंथी अबैत छथि आ ओ ई देखि क्षुब्ध छथि जे नेताजी चोर, उचक्का आ पॉकेटमारसँ घिरल छथि। मुदा चोर अपन तर्क लए पुनः प्रस्तुत होइत अछि आ नेताजीक राखल “चोर-पुराण” नामक आधारपर बजारी जी गीत शुरू कए दैत छथि।
तेसर कल्लोल: आब नेताजी आ वामपंथीमे गठबंधन आ वामपंथी द्वारा सरकारक बाहरसँ देल समर्थनपर चरचा शुरू भए जाइत अछि। नेताजी फेर गीतमय होइत छथि आकि तखने स्टंट-सीन करैत एकटा मुइल अभिनेता विवेक कुमारक अएलासँ आकर्षण ओम्हर चलि जाइत अछि। टटका-ब्रेकिंग न्यूज देबाक मजबूरीपर नेताजी व्यंग्य करैत छथि। वामपंथी दू बेर दू गोट गप- नव गप कहि जाइत छथि, एक जे बिन अभिनेता बनने क्यो नेता नहि बनि सकैत अछि आ दोसर जे चोर नेता नहि बनि सकैछ (ई चोर कहैत अछि) मुदा नेता सभ तँ चोरि करबामे ककरोसँ पाछाँ नहि छथि। तखने एकटा उच्च वंशीय महिला अबैत छथि आ हुनकर प्रश्नोत्तरक बाद एकटा सामान्य क्यूक संग एकटा वी.आइ.पी.क्यू बनि जाइत अछि। अभिनेता, नेता आ वामपंथी सभ वी.आइ.पी.क्यूमे ठाढ़ भऽ जाइत छथि ! ई पुछलापर जे पंक्ति किएक बनल अछि (?) ताहिपर चोर-पॉकेटमार कहैत छथि जे हुनका लोकनिकेँ पंक्ति बनएबाक (आ तोड़बाक सेहो) अभ्यास छन्हि।
चतुर्थ कल्लोल: यमराज सभक खाता-खेसरा देखि लैत छथि आ चित्रगुप्त ई रहस्योद्घाटन करैत छथि जे एक युग छल जखन सोझाँक दरबज्जा खुजितो छल आ बन्न सेहो होइत छल। नंदी भृंगी पहिनहि सूचित कए देलन्हि जे सोझाँक दरबज्जा स्वप्न नहि, मात्र बुझबाक दोष छल। दरबज्जाक ओहि पार की अछि ताहि विषयमे सभ क्यो अपना-अपना हिसाबसँ उत्तर दैत छथि। चित्रगुप्त कहैत छथि जे सभक वर्णनक सभ वस्तु छै ओहिपार। नंदी-भृंगी सूचित करैत छथि जे एहि गेटमे प्रवेश निषेध छै, नो एण्ट्री केर बोर्ड लागल छै। आहि रे ब्बा! आब की होअए ! नेताजीकेँ पठाओल जाइत छन्हि यमराजक सोझाँ, मुदा हुनकर सरस्वती ओतए मन्द भए जाइत छन्हि। बदरी विशाल मिश्र प्रसिद्ध नेताजी, केर खिंचाई शुरू होइत छन्हि असली केर बदला सर्टिफिकेट बला कम कए लिखाओल उमरिपर। पचपन बरिख आयु आ शश योग कहैत अछि जे सत्तरि से ऊपर जीताह से ओ आ संगमे मृत चारू सैनिककेँ आपिस पठा देल जाइत अछि। दूटा सैनिक नेताजीक संग चलि जाइत छथि आ दू टा अनुचर सेहो जाए चाहैत अछि। मुदा नेताजीक अनुचर सभक अपराध बड़ भारी, से चित्रगुप्तक आदेशपर नंदी-भृंगी हुनका लए, कराहीमे भुजबाक लेल बाहर लए जाइत छथि तँ बाँचल दुनू सैनिक हुनका पकड़ि केँ लए जाइत छथि आ नंदी-भृंगी फेर मंचपर घुरि अबैत छथि। तहिना तर्कक बाद प्रेमी-प्रेमिका, दुनू भद्र पुरुष आ बजारीकेँ सेहो त्राण भेटैत छन्हि ढोल-पिपहीक संग हुनका बाहर लए गेल जाइत अछि। आब नन्दी जखन अभिनेताक नाम विवेक कुमार उर्फ...बजैत छथि तँ अभिनेता जी रोकि दैत छथि, जे कतेक मेहनतिसँ जाति हुनकर पाछाँ छोड़ि सकल अछि, से उर्फ तँ छोड़िए देल जाए। वामपंथी गोष्ठीकेँ अभिनेता द्वारा मदति केर विवरणपर वामपंथी प्रतिवाद करैत छथि। हुनको पठा देल जाइत छनि। वामपंथीक की हेतन्हि, हुनकर कथामे तँ ने स्वर्ग-नर्क अछि आ ने यमराज-चित्रगुप्त। हुनका अपन भविष्यक निर्णय स्वयं करबाक अवसर देल जाइत छन्हि। मुदा वामपंथी कहैत छथि जे हुनकर शिक्षा आन प्रकारक छलन्हि, मुदा एखन जे सोझाँ घटित भए रहल छन्हि ताहिपर कोना अविश्वास करथु? मुदा यमराज कहैत छथि जे- भऽ सकैत अछि, जे अहाँ देखि रहल छी से दुःस्वप्न होअए, जतए पैसैत जाएब ओतए लिखल अछि नो एण्ट्री। आब यमराज प्रश्न पुछैत छथि जे विषम के, मनुक्ख आकि प्रकृति ? वामपंथी कहैत छथि जे दुनू, मुदा प्रकृतिमे तँ नेचुरल जस्टिस कदाचित् होइतो छै मुदा मनुक्खक स्वभावमे से गुन्जाइश कतए ? मुदा वामपंथी राजनीति एकर (समानताक, सुधार केर) प्रयास करैत अछि। ताहिपर हुनका संग चोर-उचक्का आ पॉकेटमारकेँ पठाओल जाइत अछि, ई अवसर दैत जे हिनका सभकेँ बदलू। चोर कनेक जाएमे इतस्तः करैत अछि आ ई जिज्ञासा करैत अछि जे हम सभ तँ जाइए रहल छी मुदा एहिसँ आगाँ ? नंदी-चित्रगुप्त-यमराज समवेत स्वरमे कहैत छथि- नो एण्ट्री। भृंगी तखने अबैत छथि, अभिनेताकेँ छोड़ने। यमराज कहैत छथि - मा प्रविश। भृंगी नीचाँमे होइत चरचाक गप कहैत अछि, जे एतुक्का निअम बदलल जएबाक आ कतेक गोटेकेँ पृथ्वीपर घुरए देल जएबाक चरचा सर्वत्र भए रहल अछि। यमदूत सभ अनेरे कड़ाह लग ठाढ़ छथि क्यो भुजए लेल कहाँ भेटल छन्हि (मात्र दू टा अनुचर छोड़ि)। आब क्यो नहि आबए बला बचल अछि, से सभ कहैत छथि। चित्रगुप्त अपन नमहर दाढ़ी आ यमराज अपन मुकुट उतारि लैत छथि आ स्वाभाविक मनुक्ख रूपमे आबि जाइत छथि! मुदा चित्रगुप्तक मेकप बला नमहर दाढ़ी देखि भिखमंगनी जे ओतए छलीह, हँसि दैत छथि। भृंगी उद्घाटन करैत छथि जे भिखमंगनी हुनके सभ जेकाँ कलाकार छथि ! कोन अभिनय ! तकर विवरण मुहब्बत आ गुदगुदीपर खतम होइत अछि, तँ भिखमंगनी कहैत छथि जे नहि एहि तरहक अभिनय तँ ओतए (देखा कए) भऽ रहल अछि। ओत्तऽ रमणी मोहन आ उच्चवंशीय महिला निभाक रोमांस चलि रहल अछि। मुदा निभाजी तँ बजिते नहि छथि। भिखमंगनी यमराजसँ कहैत छथि जे ओ तखने बजतीह जखन एहि दरबज्जाक तालाक चाभी हुनका भेटतन्हि, बुझतीह जे अपसरा बनबामे यमराज मदति दए सकैत छथि, ई रमणीक हृदय थिक एतहु नो एण्ट्री ! यमराज खखसैत छथि, तँ चित्रगुप्त बुझि जाइत छथि जे यमराज “पंचशर”सँ ग्रसित भए गेल छथि ! चित्रगुप्तक कहला उत्तर सभ क्यो एक कात लए जाओल जाइत छथि मात्र यमराज आ निभा मंचपर रहि जाइत छथि। यमराज निभाक सोझाँ- सुनू ने निभा... कहि रुकि जाइत छथि। सभक उत्साहित कएलापर यमराज बड़का चाभी हुनका दैत छथि, मुदा निभा चाभी भेटलापर रमणी मोहनक संग तेना आगाँ बढ़ैत छथि जेना ककरो अनका चिन्हिते नहि होथि ! ओ चाभी रमणी मोहनकेँ दए दैत छथि मुदा ओ ताला नहि खोलि पबैत छथि। फेर निभा अपने प्रयास करए लेल आगाँ बढ़ैत छथि मुदा चित्रगुप्त कहैत छथि जे ई मोनक दरबज्जा थिक, ओना नहि खुजत। महिला ठकए लेल चाभी देबाक (!) गप कहैत छथि। सभ क्यो हँसी करैत छनि जे मोन कतए छोड़ि अएलहुँ ? ताहिपर एकबेर पुनः रमणी मोहन आ निभा मोन संजोगि कए ताला खोलबाक असफल प्रयास करैत छथि। नंदी-भृंगी-भिखमंगनी गीत गाबए लगैत छथि जकर तात्पर्य ईएह जे मोनक ताला अछि लागल, मुदा ओतए अछि नो एण्ट्री। मुदा ऋतु वसन्तमे प्रेम होइछ अनन्त आ करेज कहैत अछि मैना-मैना । तँ एतहि नो एण्ट्री दरबज्जापर धरना देल जाए।


विवेचन: भारत आ पाश्चात्य नाट्य सिद्धांतक तुलनात्मक अध्ययनसँ ई ज्ञात होइत अछि मानवक चिन्तन भौगोलिक दूरीकक अछैत कतेक समानता लेने रहैत अछि। भारतीय नाट्यशास्त्र मुख्यतः भरतक “नाट्यशास्त्र” आ धनंजयक दशरूपकपर आधारित अछि। पाश्चात्य नाट्यशास्त्रक प्रामाणिक ग्रंथ अछि अरस्तूक “काव्यशास्त्र”।
भरत नाट्यकेँ “कृतानुसार” “भावानुकार” कहैत छथि, धनंजय अवस्थाक अनुकृतिकेँ नाट्य कहैत छथि। भारतीय साहित्यशास्त्रमे अनुकरण नट कर्म अछि, कवि कर्म नहि। पश्चिममे अनुकरण कर्म थिक कवि कर्म, नटक कतहु चरचा नहि अछि।
अरस्तू नाटकमे कथानकपर विशेष बल दैत छथि। ट्रेजेडीमे कथानक केर संग चरित्र-चित्रण, पद-रचना, विचार तत्व, दृश्य विधान आ गीत रहैत अछि। भरत कहैत छथि जे नायकसँ संबंधित कथावस्तु आधिकारिक आ आधिकारिक कथावस्तुकेँ सहायता पहुँचाबएबला कथा प्रासंगिक कहल जाएत। मुदा सभ नाटकमे प्रासंगिक कथावस्तु होअए से आवश्यक नहि, नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि तँ कोनो तेहन आधिकारिक कथावस्तु अछि आ नहिए कोनो प्रासांगिक, कारण एहिमे नायक कोनो सर्वमान्य नायक नहि अछि। जे बजारी उच्क्काकेँ कॉलर पकड़ैत छथि से कनेक कालक बाद गौण पड़ि जाइत छथि। जाहि उच्क्काक सोझाँ चोर सकदम रहैत अछि से किछु कालक बाद, किछु नव नहि होइछ केर दर्शनपर गप करैत सोझाँ अबैत छथि। जे यमराज सभकेँ थर्रेने छथि, से स्वयं निभाक सोझाँमे अपन तेज मध्यम होइत देखैत छथि। भिखमंगनी हुनका दैवी स्वरूप उतारने देखैत हँसैत छथि तँ रमणी मोहन आ निभा सेहो हुनका आ चित्रगुप्तकेँ अन्तमे अपशब्द कहैत छथि। वामपंथीक आ अभिनेताक सएह हाल छन्हि। कोनो पात्र कमजोर नहि छथि आ समय-परिस्थितिपर रिबाउन्ड करैत छथि।
कथा इतिवृत्तिक दृष्टिसँ प्रख्यात, उत्पाद्य आ मिश्र तीन प्रकारक होइत अछि। प्रख्यात कथा इतिहास पुराणसँ लेल जाइत अछि आ उत्पाद्य कल्पित होइत अछि। मिश्रमे दुनूक मेल होइत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मिश्र इतिवृत्तिक होएबाक कोनो टा गुंजाइश तखने खतम भए जाइत अछि जखन चित्रगुप्त आ यमराज अपन नकली भेष उतारैत छथि आ भिखमंगनीक हँसलापर भृंगी कहैत छथि जे ई भिखमंगनी सेहो हमरे सभ जेकाँ कलाकार छथि ! मात्र यमराज आ चित्रगुप्त नामसँ कथा इतिहास-पुराण सम्बद्ध नहि अछि आ इतिवृत्ति पूर्णतः उत्पाद्य अछि। अरस्तू कथानककेँ सरल आ जटिल दू प्रकारक मानैत छथि। ताहि हिसाबसँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आकस्मिक घटना जाहि सरलताक संग फ्लोमे अबैत अछि, से ई नाटक सरल कथानक आधारित कहल जाएत। फेर अरस्तू इतिवृत्तकेँ दन्तकथा, कल्पना आ इतिहास एहि तीन प्रकारसँ सम्बन्धित मानैत छथि। नो एण्ट्री: मा प्रविश केँ काल्पनिक मूलक श्रेणीमे एहि हिसाबसँ राखल जाएत। अरस्तूक ट्रेजेडीक चरित्र य़शस्वी आ कुलीन छथि- सत् असत् केर मिश्रण। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे जे चरित्र सभ छथि ताहिमे सभ चरित्रमे सत् असत् केर मिश्रण अछि। निभा उच्चवंशीय छथि मुदा रमणी मोहन, जे बलात्कारक बादक भेल पिटानक बाद मृत भेल छथि, सँ हिलि-मिलि जाइत छथि। भिखमंगनी मिथिला चित्रकार अनसूया छथि। मुदा दुनू भद्रपुरुष, बजारी आ चारू सैनिक एहि प्रकारेँ बिन कलुषताक सोझाँ अबैत छथि। भरत नृत्य संगीतक प्रेमीकेँ धीरललित, शान्त प्रकृतिकेँ धीरप्रशान्त, क्षत्रिय प्रवृत्तिकेँ धीरोदत्त आ ईर्ष्यालूकेँ धीरोद्धत्त कहैत छथि। बजारी आ दुनू भद्रपुरुष संगीतक बेश प्रेमी छथि तँ रमणी मोहन प्रेमी-प्रेमिकाकेँ देखि कए ईर्ष्यालू। सैनिक सभ शान्त छथि क्षत्रियोचित गुण सेहो छन्हि से धीरोदत्त आ धीरप्रशान्त दुनू छथि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि प्रकारक विभाजन पूर्णतया सम्भव नहि अछि।
भारतीय सिद्धांत कार्यक आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति आ फलागम धरिक पाँच टा अवस्थाक वर्णन करैत अछि। प्राप्त्याशामे फल प्राप्तिक प्रति निराशा अबैत अछि तँ नियताप्तिमे फल प्राप्तिक आशा घुरि अबैत अछि। पाश्चात्य सिद्धांतमे अछि आरम्भ, कार्य-विकास, चरम घटना, निगति आ अन्तिम फल। प्रथम तीन अवस्थामे ओझराहटि अबैत अछि, अन्तिम दू मे सोझराहटि।
कार्यावस्थाक पंच विभाजन- बीया, बिन्दु, पताका, प्रकरी आ कार्य अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे बीया अछि एकटा द्वन्द - मृत्युक बादक लोकक, बीमा एजेन्ट एतए बिनु मृत्युक पहुँचि जाइत छथि। यमराज आ चित्रगुप्त मेकप आर्टिस्ट बहराइत छथि। विभिन्न बिन्दु द्वारा एकटा चरित्र ऊपर नीचाँ होइत रहैत अछि। पताका आ प्रकरी अवान्तर कथामे होइत अछि से नो एण्ट्री: मा प्रविश मे नहि अछि। बीआक विकसित रूप कार्य अछि मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे ओ धरणापर खतम भए जाइत अछि! अरस्तू एकरा बीआ, मध्य आ अवसान कहैत छथि। आब आऊ सन्धिपर, मुख-सन्धि भेल बीज आ आरम्भकेँ जोड़एबला, प्रतिमुख-सन्धि भेल बिन्दु आ प्रयत्नकेँ जोड़एबला, गर्भसन्धि भेल पताका आ प्राप्त्याशाकेँ जोड़एबला, विमर्श सन्धि भेल प्रकरी आ नियताप्तिकेँ जोड़एबला आ निर्वहण सन्धि भेल फलागम आ कार्यकेँ जोड़एबला। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे मुख/ प्रतिमुख आ निर्वहण सन्धि मात्र अछि, शेष दू टा सन्धि नहि अछि।
पाश्चात्य सिद्धांत स्थान, समय आ कार्यक केन्द्र तकैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे स्थान एकहि अछि, समय लगातार आ कार्य अछि द्वारक भीतर पैसबाक आकांक्षा। दू घण्टाक नाटकमे दुइये घण्टाक घटनाक्रम वर्णित अछि नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कार्य सेहो एकेटा अछि। अभिनवगुप्त सेहो कहैत छथि जे एक अंकमे एक दिनक कार्यसँ बेशीक समावेश नहि होअए आ दू अंकमे एक वर्षसँ बेशीक घटनाक समावेश नहि होअए। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे कल्लोलक विभाजन घटनाक निर्दिष्ट समयमे भेल कार्यक आ नव कार्यारम्भमे भेल विलम्बक कारण आनल गेल अछि। मुदा एहि त्रिकक विरोध ड्राइडन कएने छलाह आ शेक्सपिअरक नाटकक स्वच्छन्दताक ओ समर्थन कएलन्हि। मुदा नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एहि तरहक कोनो समस्या नहि अबैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे आपसी गपशपमे- जकरा फ्लैशबैक सेहो कहि सकैत छी- ककर मृत्यु कोना भेल से नीक जेकाँ दर्शित कएल गेल अछि।
भारतमे नाटकक दृश्यत्वक समर्थन कएल गेल मुदा अरस्तू आ प्लेटो एकर विरोध कएलन्हि। मुदा १६म शताब्दीमे लोडोविको कैस्टेलवेट्रो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि। डिटेटार्ट सेहो दृश्यत्वक समर्थन कएलन्हि तँ ड्राइडज नाटकक पठनीयताक समर्थन कएलन्हि। देसियर पठनीयता आ दृश्यत्व दुनूक समर्थन कएलन्हि। अभिनवगुप्त सेहो कहने छलाह जे पूर्ण रसास्वाद अभिनीत भेला उत्तर भेटैत अछि, मुदा पठनसँ सेहो रसास्वाद भेटैत अछि। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे पहिल कल्लोलक प्रारम्भमे ई स्पष्ट भऽ जाइत अछि जे एतए दृश्यत्वकेँ प्रधानता देल गेल अछि। पश्चिमी रंगमंचक नाट्यविधान वास्तविक अछि मुदा भारतीय रंगमंचपर सांकेतिक। जेना अभिज्ञानशाकुंतलम् मे कालिदास कहैत छथि- इति शरसंधानं नाटयति। नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भारतीय विधानकेँ अंगीकृत कएल गेल- जेना मृत्यु प्राप्त सभ गोटे द्वारा स्वर्ग प्रवेश द्वारक अदृश्य देबारक गपशप आ अभिनय कौशल द्वारा स्पष्टता। अंकिया नाटमे सेहो प्रदर्शन तत्वक प्रधानता छल। कीर्तनियाँ एक तरहेँ संगीतक छल आ एतहु अभिनय तत्वक प्रधानता छल। अंकीया नाटकक प्रारम्भ मृदंग वादनसँ होइत छल। नो एण्ट्री: मा प्रविश मैथिलीक परम्परासँ अपनाकेँ जोड़ने अछि मुदा संगहि इतिहास, पुराण आ समकालीन जीवनचक्रकेँ देखबाक एकटा नव दृष्टिकोण लए आएल अछि, सोचबा लए एकटा नव अंतर्दृष्टि दैत अछि।
ज्योतिरीश्वरक धूर्तसमागम, विद्यापतिक गोरक्षविजय, कीर्तनिञा नाटक, अंकीयानाट, मुंशी रघुनन्दन दासक मिथिला नाटक, जीवन झाक सुन्दर संयोग, ईशनाथ झाक चीनीक लड्डू, गोविन्द झाक बसात, मणिपद्मक तेसर कनियाँ, नचिकेताजीक “नायकक नाम जीवन, एक छल राजा”, श्रीशजीक पुरुषार्थ, सुधांशु शेखर चौधरीक भफाइत चाहक जिनगी, महेन्द्र मलंगियाक काठक लोक, राम भरोस कापड़ि भ्रमरक महिषासुर मुर्दाबाद, गंगेश गुंजनक बुधिबधिया केर परम्पराकेँ आगाँ बढ़बैत नचिकेताजीक नो एण्ट्री: मा प्रविश तार्किकता आ आधुनिकताक वस्तुनिष्टताकेँ ठाम-ठाम नकारैत अछि। वामपंथीकेँ यमराज ईहो कहैत छथिन्ह, जे वामपंथी देखि रहल छथि से सत्य नहि, सपनो भए सकैत अछि। विज्ञानक ज्ञानक सम्पूर्णतापर टीका अछि ई नाटक। सत्य-असत्य, सभ अपन-अपन दृष्टिकोणसँ तकर वर्णन करैत छथि। चोरक अपन तर्क छन्हि आ वामपंथी सेहो कहैत छथि जे चोर नेता नहि बनि सकैत छथि, मुदा नेताक चोरिपर उतरि अएलासँ चोरक वृति मारल जाए बला छन्हि। नाटकमे आत्म-केन्द्रित हास्यपूर्ण आ नीक-खराबक भावना रहि-रहि खतम होइत रहैत अछि। यमराज आ चित्रगुप्त धरि मुखौटामे रहि जीबि रहल छथि। उत्तर आधुनिकताक ई सभ लक्षणक संग नो एण्ट्री: मा प्रविश मे एके गोटेक कैक तरहक चरित्र निकलि बाहर अबैत अछि, जेना उच्चवंशीय महिलाक। कोनो घटनाक सम्पूर्ण अर्थ नहि लागि पबैत अछि, सत्य कखन असत्य भए जाएत तकर कोनो ठेकान नहि। उत्तर आधुनिकताक सतही चिन्तन आ तेहन चरित्र सभक नो एण्ट्री: मा प्रविश मे भरमार लागल अछि, आशावादिता तँ नहिए अछि मुदा निराशावादिता सेहो नहि अछि। जे अछि तँ से अछि बतहपनी, कोनो चीज एक तरहेँ नहि कैक तरहेँ सोचल जा सकैत अछि- ई दृष्टिकोण विद्यमान अछि। कारण, नियन्त्रण आ योजनाक उत्तर परिणामपर विश्वास नहि, वरन संयोगक उत्तर परिणामपर बेशी विश्वास दर्शाओल गेल अछि। गणतांत्रिक आ नारीवादी दृष्टिकोण आ लाल झंडा आदिक विचारधाराक संगे प्रतीकक रूपमे हास-परिहास सोझाँ अबैत अछि।
एहि तरहेँ नो एण्ट्री: मा प्रविश मे उत्तर आधुनिक दृष्टिकोण दर्शित होइत अछि, एतए पाठक कथानकक मध्य उठाओल विभिन्न समस्यासँ अपनाकेँ परिचित पबैत छथि। जे द्वन्द नाटकक अंतमे दर्शित भेल से उत्तर-आधुनिक युगक पाठककेँ आश्चर्यित नहि करैत छन्हि, किएक तँ ओ दैनिक जीवनमे एहि तरहक द्वन्दक नित्य सामना करैत छथि।

समीक्षा श्रृंखला-५: मायानन्द मिश्रपर गजेन्द्र ठाकुर

मायानन्द मिश्रक इतिहास बोध-प्रथमं शैल पुत्री च/ मंत्रपुत्र/ पुरोहित आ स्त्री-धन केर संदर्भमे
एहि प्रबन्धमे मायानन्दजीक स्त्रीधन, पुरोहित, मंत्र-पुत्र आ प्रथमं शैलपुत्री च- एहि चारि पोथीक जे कथा-विधान आ साहित्यिक विवेचन छल तकरा यथा संभव नञि छुअल गेल आ मात्र इतिहास-बोधक सन्दर्भमे विवेचना अछि।
प्रबंधमे मायानान्द जीक १.प्रथमं शैल पुत्री च २.मंत्रपुत्र ३.पुरोहित आ ४. स्त्री-धन एहि चारि ऐतिहासिक उपन्यास सभक आधार पर लेखक द्वारा लगभग दू दशकमे पूर्ण कएल गेल इतिहास यात्राक समीक्षा कएल गेल अछि। एहिमे प्रयुक्त पुस्तकमे, मंत्रपुत्र मैथिलीमे अछि आ शेष तीनू उपन्यास हिन्दीमे, तथापि यात्रा पूर्णताक दृष्ट्वा आ श्रृंखलाक तारतम्य आ समीक्षाक पूर्णताक हेतु चारू किताबक प्रयोग अनिवार्य छल।
कालक्रमक दृष्टिसँ प्रथमं शैल पुत्री च प्रथम अछि । एहिमे १५०० ई.पू.सँ पहिलुका इतिहासक आधार लेल गेल अछि। मंत्रपुत्रमे १५०० ई.पू. सँ १२०० ई.पू. धरिक इतिहास उपन्यासक आधार अछि। ई सभ आधार भारत युद्धक पहिलुका अछि। पुरोहितमे १२०० ई.पू.सँ १००० ई.पू. धरिक इतिहास अछि- एकरा ब्राह्मण साहित्यक युगक इतिहास कहि सकैत छी। स्त्रीधनक आधार अछि सूत्र-स्मृतिकालीन मिथिला।
मुदा रचना भेल मैथिली मंत्रपुत्रक पहिने -नवंबर १९८६ मे। प्रथमं शैल पुत्री च एकर दू सालक बाद रचित भेल आ ताहिमे मायानन्द जी चारू किताबक रचनाक रूपरेखा देलन्हि मुदा ई हिन्दीक संदर्भमे छल। एकर बाद सभटा किताब हिन्दी मे आएल। हिन्दी मंत्रपुत्र आएल जाहि कारणसँ तेसर पुस्तक पुरोहित किछु देरीसँ १९९९ मे प्रकाशित भेल। स्त्रीधन जे एहि श्रृंखलाक अंतिम पुस्तक अछि, २००७ ई. मे प्रकाशित भेल।
“प्रथमं शैल पुत्री च” केर प्रस्तावनाक नाम कवच छल।मंत्रपुत्रक प्रस्तावनाक नाम ऋचालोक छल आ ई पुस्तकक अंतमे राखल गेल, किएक तँ ई लेखकक प्रथम ऐतिहासिक रचना छल, प्रस्तावनाकेँ अंतमे राखि कय रहस्य आ रोमांचकेँ बनाओल राखल गेल । पुरोहितक प्रस्तावनाक नाम विनियोग छल आ एकरासँ पहिने दूर्वाक्षत मंत्र राखल गेल जे भारतक आ विश्वक प्रथम देशभक्ति गीत अछि। मिथिलामे एकरा आशीर्वादक मंत्रक रूपमे प्रयोग कएल जाइत अछि जकर पक्ष-विपक्षमे विस्तृत चरचा बादमे होएत।
स्त्रीधनक प्रस्तावनाक नाम लेखक पृष्ठभूमि रखने छथि जे उपन्यासक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि प्रदान करबाक कारण सर्वथा समीचीन अछि।
मायानन्दक इतिहास-बोधक समीक्षा हम श्रुति, परम्परा, तर्क आ भाषा-विज्ञानक आधार पर कएने छी। पाश्चात्य विद्वान सभक उच्छिष्ट भोज सँ निर्मित भारतीय इतिहास-लेखन सँ बचि कए इतिहासक समीक्षा भेल अछि आ मध्य एशिया आ यूरोपक कनियो प्रभाव समीक्षा पर नहि पड़ए से प्रयास कएल गेल अछि।
१. प्रथमं शैल पुत्री च- कवच रूपी प्रस्तावनाक बाद ई पुस्तक १. अग्ना, २.अग्न-शैला, ३. शैला- कराली, ४. कराली- महेष, ५. महेष- पारवती, ६. गणेष, ७. हरकिसन, ८. किसन, ९. हरप्पा : मोअन गाँव, १०. गणेष का श्रीगणेश, ११. किश्न, १२. महाजन, १३. मंडल, १४. किश्न मंडल, १५. मंडल : मंडली, १६. पतन: पुरंदर आ १७. उपसंहार : पलायन खंडमे विभक्त अछि।
१. अग्ना- २००० ई. पू. सँ आरम्भ होइत अछि ई उपन्यास। खोहमे रहएबला मनुष्यक विवरण शुरू होइत अछि। बा एकटा दलक सर्वाधिक बलिष्ठ मनुष्य अछि। पूर्वज बा सेहो बलिष्ठ छल। एतेक रास बच्चा सभक बा। एकटा छोट आ एकटा पैघ पाथरक आविष्कार कएने छलाह पूर्वज बा। अम् दलाग्राकेँ कहल जाइत छल। बा भयंकर गंधवला पशुक नाम सेहो छल। हाथक महत्व बढ़ल आ बढ़ल वृक्षसँ दूरी। सर्पकेँ मारि कए खाएल नहि जाइत अछि, से गप पूर्वजसँ ज्ञात छल। प्राचीन देव वृक्ष, दोसर नाग देव आ तेसर नदी देव छलाह। अम्बासँ बा संतान उत्पन्न करैत आएल छलाह। नव कुठार आ नव काताक आविष्कार भेल। अः आः अग अग्ग केर देखि कए वन्य पशुकेँ भागैत देखि एकर जानकारी भेल। मानुषी हुनकर संख्या वृद्धि करैत छलि। प्रथम मानुषीक नाम पड़ल अग्ना। ओकर मानुष-मित्र छलाह अग्ग। अग्ना दलाग्रा बनि गेलीह आ हुनकर नेतृत्वमे दल उत्तर दिशि बढ़ल। फेर लेखक लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्ठाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। ई दुनू दृष्टिकोण वैज्ञानिक दृष्टिकोणसँ देखलापर हास्यास्पद लगैत अछि।
अग्ना-शैलासँ शुरू होइत अछि दोसर भाग। १०००० ई.पू.। भाषाक आरंभक प्रारंभ मायानन्द मिश्र एहिमे प्रकट कएने छथि। एहिमे बड्ड नीक जेकाँ, संकेत भाषासँ ध्वनिक संबंध परिलक्षित कएल गेल अछि। चलंत सँ स्थिर जीवनक शुरुआत सेहो देखायल गेल अछि। तकर बाद शैला कराली अध्यायक प्रारंभ होइत अछि, ७५०० वर्ष पूर्वसँ। गौ पालनक चर्चा होइत अछि, गायक संख्यामे पर्याप्त वृद्धि भेल छल। सभ रहथि चरबाह, चर्मस्त्र्धारी। आ कटिमे पाथरक हथियार। भेड़, बकरी आ सुग्गर छल, किछु आन पोसिया जंतु जात सेहो रहए। घासक रस्सी, त्रिशूल आ नागदेवक चर्चा होइत अछि। बाक नाम आब भऽ जाइत अछि, ओजा। दलाग्राक नाम पड़ैत अछि शैला कराली। पशुक संख्या बढ़ल तँ पशुक चोरि सेहो शुरू भऽ गेल।पीपरक गाछक नीचाँ बैठकीक प्रारम्भ भेल। करालीक नाम अंबा पड़ल।
कराली-महेष अध्यायमे ५००० ई.पू. मे कृषिक प्रारम्भ देखाओल गेल अछि। महेष बीया बागु कए रहल छथि। जवकेँ पका कऽ खयबाक चर्चा होइत अछि। आब धारक नाम सेहो राखल जाए लागल। महेष कुल द्वारा पोस केर माँस खेनाइ तँ एकदम निषिद्ध भऽ गेल।ओजा लिंग स्थानमे बैसल रहैत छलाह।
तकर बाद महेष-पारवती अध्याय शुरु होइत अछि ४ सँ ५ हजार वर्ष पूर्व। धानक फसिलक प्रारंभ भेल। पारवती जहिया अएलीह तहिया ओतुक्का प्रथाक अनुसार लाल माटि माथमे लगा देल गेल। पुत्रक नाम गणेष पड़ल। एहिसँ पहिने संतानक परिचय नहि देल जाइत छल।
गणेष- ई अध्याय ४००० वर्ष पूर्वसँ शुरू होइत अछि। स्त्री-पुरुष संबंध आ पितृ कुलक आरंभक चर्चा शुरू भेल। नून अनबाक आ खेबाक प्रारंभ भेल। नून अनबासँ कुलक नाम नोनी पड़ल। जव आ गहूमक खेतीक प्रारंभ आ दूध दुहबाक आरंभ देखाओल गेल अछि। हाथीक पालनक प्रारंभ आ अदला-बदलीसँ विनिमयक प्रारंभ सेहो शुरू भेल। शिश्न देव पर जल आ पात चढ़ेबाक प्रारंभ सेहो भेल। यवकेँ कूटब आ बुकनी करबाक प्रारंभ भेल। गहूमकेँ चूरब आ पानिमे भिजा कए आगिमे पकाएब प्रारंभ भेल। पक्षिपालन करएबला एकटा भिन्न दल छल। मृतक-संस्कार आ मृत्यु पर कनबाक प्रारंभ सेहो भेल। लिपिक प्रारंभ सेहो भेल।
हर- एहि अध्यायक प्रारंभ ३५०० ई.पू. देखायल गेल अछि। नूनक व्यापार आ सुगढ़ नावक निर्माण प्रारंभ भेल। पइलीक कल्पना नपबाक हेतु भेल। हर आ बड़दक सम्मिलन प्रारंभ भेल। इनार खुनबाक प्रारंभ आ जनक लंबवत केर अतिरिक्त चौड़ाइमे बसबाक प्रारंभ सेहो भेल। घर बनएबाक प्रारंभ सेहो भेल।कारी, गोर आ ताम्रवर्णी कायाक बेरा-बेरी आगमन होइत रहल।
हरकिसन अध्यायक प्रारम्भ ३४०० वर्ष पूर्व होइत अछि। कृषि विकासक संग स्थायी निवासक प्रवृत्ति बढ़य लागल। तकरा बाद परिवारक रूप स्पष्ट होमय लागल। कृषि-विकाससँ वाणिज्य विस्तारक आवश्यकता बढ़ल। ऊनक वस्त्र, चक्की, भीतक घर आ इनारक घेराबा बनए लागल।
किसन अध्यायक प्रारम्भ ३३०० ई.पूर्व भेल। श्रम-बेचबाक प्रारम्भ भेल। पटौनीक प्रारम्भक संग कृषि-विकास गति पकड़लक। भूगोलक जानकारी भेलासँ वाणिज्य बढ़ल। अलंकारक प्रवृत्ति बढ़ल।
हड़प्पा: मोहनगाँव अध्याय ३२०० वर्ष पूर्व देखाओल गेल अछि।श्रम-बेचबाक हेतु काठक टोलक उदाहरण अबैत अछि। अलंकार प्रवृत्ति बढ़ल। गोलीक मालाक संग कुम्हारक चाक सेहो सम्मुख आयल। समाजमे वर्ग विभाजनक प्रारम्भ भेल।
गणेषक श्रीगणेष अध्याय ३१०० ई. पूर्व प्रारम्भ भेल। दक्षिणांचल लोकक आगमनक बाद हड़प्पा हुनका लोकनि द्वारा बनेबाक चर्च लेखक करैत छथि। मोहनजोदड़ो, लोथल आ चान्हूदोड़ोक विकास व्यापारिक केन्द्रक रूपमे भेल। लिपि, कटही गाड़ी आ मूर्त्तिकलाक आविष्कार भेल आ वस्तु विनिमयक हेतु हाट लागए लागल। मेसोपोटामियाक जलप्लावन आ सुमेरी आ असुरक आगमनक चर्चा लेखक करैत छथि।
किश्न अध्यायक प्रारम्भ ३००० ई.पू. सँ भेल। विदेश व्यापारक आरम्भ भेल। तामक आविष्कार भेल। कृषि दासत्वक सेहो प्रारम्भ भेल। बाढ़िसँ सुरक्षाक हेतु ऊँच डीह बनाओल जाए लागल।
महाजन अध्याय २८०० ई. पू. प्रारम्भ होइत अछि। नगरक प्रारम्भ वाणिज्यक हेतु भेल। नहरि पटौनीक हेतु बनाओल जाए लागल। डंडी तराजूक आविष्कार आवश्यकता स्वरूप भेल। प्रकाश-व्यवस्थाक ब्योँत लागल।
मंडल अध्यायमे चर्च २६०० ई.पू.क छै। संस्था निर्माण, विवाह व्यवस्था आ दूरगर यात्राक हेतु पाल बला नावक निर्माण प्रारम्भ भेल।
किश्न मंडल अध्याय २४०० ई.पू. केर कालखण्डसँ आरम्भ कएल गेल अछि। एहिमे वर्षाक अभावक चरचा अछि। आर्यक पूर्व दिशामे बढ़बाक चर्चासँ लोकमे भयक सेहो चर्चा अछि।
मंडल:मंडली अध्याय २२०० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल। आर्यक आगमनक आ वर्षाक अभाव दुनूकेँ देखैत लोथल वैकल्पिक रूपसँ विकसित होमए लागल।
पतन:पुरंदर: एहि अध्यायक कालखण्ड २००० ई.पू.सँ प्रारम्भ भेल अछि। आर्यक राजा द्वारा पुरकेँ तोड़ि महान केंद्र हड़प्पाकेँ ध्वस्त करबाक चर्चासँ मायानन्द जी अपन पहिल किताब ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ केर समापन करैत छथि। आर्य हड़प्पाकेँ हरियूपियासँ संबोधित कएल, आर्य बाहरसँ अएलाह प्रभृत्ति किछु सिद्धांतक आधार पर रचित ई उपन्यास ऐतिहासिक उपन्यास होएबाक दावा करैत अछि। आ एहिमे २०,००० ई.पू.सँ १८०० ई.पू. धरिक इतिहासोपाख्यानक चर्चा अछि। मुदा मौलिक ऐतिहासिक विचारधारा आ नवीन शोधक आधार पर एकर बहुतो बात समीचीन बुझना नहि जाइत अछि।
अग्नासँ शुरू भेल ई कथानक बड्ड आशा दिअओने छल। लेखक पहिल अध्यायमे लिखैत छथि जे पृथ्वीक उत्पत्ति लगभग २०० करोड़ वर्ष पूर्व भेल जे सर्वथा समीचीन अछि। कर्मकाण्डमे एक स्थान पर वर्णन अछि- “ब्राह्मणे द्वितीये परार्धे श्री स्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वंतरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे प्रथम चरणे” आ एहि आधार पर गणना कएला उत्तर १,९७,२९,४९,०३२ वर्ष पृथ्वीक आयु अबैत अछि। रेडियोएक्टिव विधि द्वारा सेहो ईएह उत्तर अबैत अछि। ई अनुमानित अछि जे यूरेनियमक १.६७ भाग १०,००,००,००० वर्षमे सीसामे बदलि जाइत अछि। विभिन्न प्रकारक पाथर आ चट्टानमे सीसाक मात्रा भिन्न रहैत अछि। एहि प्रकारसँ गणना कएला पर ई ज्ञात होइछ जे रेडियोएक्टिव पदार्थ १,५०,००,००,००० वर्ष पहिने विद्यमान छल। एहि प्रकारेँ कोनो शैलक आयु २,००,००,००,००० वर्षसँ अधिक नहि भऽ सकैछ। यूरोपमे सत्रहम शताब्दी धरि पृथ्वीक आयु ४००० वर्ष मानल जाइत रहल। ईरानक विद्वान १२०० वर्ष पहिने पृथ्वीक उत्पत्ति मानलन्हि। एहि तरहक पाश्चात्य शोधकेँ लेखक पहिल अध्यायमे तँ नकारि देलन्हि मुदा अंत धरि जाइत-जाइत ओ - आर्य लोकनि हड़प्पाकेँ हरियूपिया कहैत छथि - एहि प्रकारक पाश्चात्य दुराग्रहक प्रभावमे आबि गेलाह। पश्चिमी विद्वानक उच्छिष्ट भोजसँ बचि श्रुति परम्पराक परीक्षा तर्कसँ नहि कए सकलाह। एहि प्रकारे ‘प्रथमं शैल पुत्री च’ निम्न आधार पर अपन इतिहासोपाख्यान साहित्यिक रूपसँ नहि बना पओलक :-
पुरातात्विक, भाषावैज्ञानिक आ साहित्यिक साक्ष्य एहि पक्षमे अछि जे आर्य भारतक मूल निवासी छलाह। आर्य भाषा परिवारक नामकरण मैक्समूलर द्वारा कएल गेल छल। द्रविड़ परिवारक नामकरण पादरी रॉबर्ट काल्डवेल द्वारा कएल गेल छल।आर्यक आक्रमणक सिद्धांत आएल ग्रिफिथक ऋग्वेदक अनुवादमे देल गेल फूटनोटसँ। पहिने तँ ई नामकरण विदेशी विद्वान द्वारा कएल गेल छल ताहि द्वारे ओकर अपन उद्देश्य होएतैक।
सरस्वती नदी, जल-प्रलय, मनु आ महामत्स्यक कथा, गिल्गमेश कथा काव्य, प्राणवंतक देश गिल्गमेशक खोज, सृष्टिकथा आ देवतंत्रक विकास एहि सभटा समाजशास्त्रीय विकासक विश्लेषण आर्य लोकनिक भारतक मूल निवासी होएबाक साक्ष्य प्रस्तुत करैत अछि।
ऋग्वेदमे मातृसत्तात्मक व्यवस्थाक स्मृतिक रूपमे बहुवचन स्त्रीलिंगक प्रयोगक बहुलता अछि।
सघोष आ महाप्राण ऋग्वेदिक आ भारतीय भाषाक ध्वनिक प्रतिरूप, नहि तँ ईरानी आ नहिये यूरोपीय भाषा सभमे भेटैत अछि। सरस्वती आ सिन्धु धारक बीचक सभ्यता छल आर्यक सभ्यता। सरस्वती धारक तटवर्ती भरत, पुरु आ अन्य गण सभ मिलि कए ऋगवेदक रचना कएलन्हि। सरस्वतीमे जल-प्रलयक बाद ई सभ्यता सारस्वत प्रदेश सँ हटि कए कुरु-पांचाल आ ब्रह्मर्षि प्रदेश-मध्यदेश- पहुँचि गेल। इतिहासमे भरत लोकनिक महत्व समाप्त भऽ गेल। एहि जल प्रलयक बाद आर्यजन लोकनिक वंशज मोहनजोदड़ो आ हड़प्पा नगरक निर्माण कएने होएताह सेहो सम्भव। हड़प्पा सभ्यताक ८०० मे सँ ५३० सँ ऊपर स्थान एहि लुप्त सरस्वती धारक तट पर अवस्थित छल। सिन्धुक धार पर एहि स्थल सभक बड्ड कम निर्भरता छल आ जखन सरस्वतीमे पानिक प्रवाह घटल तँ एहि सभ केन्द्रक ह्रास प्रारम्भ भऽ गेल।
पहिने सरस्वतीमे जल-प्रलयसँ आर्यक पलायन भेल (ऋगवेद आ यजुर्वेदक रचनाक बाद) आ फेर सरस्वतीमे पानिक कमी भेलासँ दोसर बेर आर्यक पैघ पलायन भेल (अथर्ववेदक रचनाक पहिने)। अरा-युक्त रथक वर्णन वेदमे भेटैत अछि। नहि तँ ई पश्चिम एशियामे छल आ नहिये यूरोपमे। भारतीय देवनाम, शिल्प, कथा, अश्वविद्या, संगीत, भाषिक तत्व आ चिंतनक संग ई उद्घाटित होमए लागल पश्चिम एशिया, मिश्र आ यूनानमे। दोसर सहस्राब्दी ई.पूर्व अरायुक्त्त रथ, भारतीय देवनाम, भारतक धार, ऋगवेदिक तत्वचिंतन, अश्वविद्या, शिल्प-तकनीकी आ पुरातन् कथा भारतसँ पच्छिम एशिया, क्रीट-यूनान दिशि जाए लागल। कालक्रमसँ मिश्र, सुमेर-बेबीलोन, आदि सभ्यता आ मित्तनी आ हित्ती सभ्यतासँ बहुत पहिनहि ऋगवेदक अधिकांश मंडलक रचना भऽ गेल छल।

मायानन्दजीक एहि सीरीजक दोसर रचना मंत्रपुत्र अछि। एहिमे ऋगवैदिक आधार पर जीवन-दर्शनकेँ राखल गेल अछि।
ऋगवेद १० मंडलमे (आ आठ अष्टकमे सेहो) विभक्त्त अछि। मायानन्द मिश्रजी मंडलक आधार पर मंत्रपुत्रक विभाजन सेहो १० मण्डलमे कएने छथि। एहि पुस्तकक भूमिकाक नाम अछि ऋचालोक आ ई पुस्तकक अंतमे १०म मण्डलक बाद देल गेल अछि।
प्रथम मण्डलमे काक्षसेनी पुत्री ऋजिश्वाक चर्च अछि संगहि ऋतुर्वित पुत्री शाश्वतीक सेहो। जन सभा आ जन-समिति द्वारा राजाकेँ च्युत करबाक/ निर्वासन देबाक आ दोसर राजाक निर्वाचन करबाक चर्चा सेहो अछि। नेत्रक नील रंग रहबाक बदला श्यामल भऽ जएबाक चर्चा आ एकर कारण खास तरहक विवाहक होयबाक चर्चा सेहो भेल अछि।वितस्ता तटसँ कृष्ण सभक निरन्तर उपद्रवक चर्चा सेहो अछि। सुवास्तु तटसँ रक्त्त मिश्रणक प्रक्रियाक वर्णन अछि। गोमेधकेँ वर्जित कएल जाय, ई विचार विमर्श कएल जाए लागल। दासक चर्चा सेहो अछि। हरियूपिया पतन आ ओकर विभिन्न नगर सभक उजड़ि जएबाक चर्चा अछि आ पश्चात्, बल्बूथ द्वारा अनार्य सभक ध्वस्त वाणिज्य व्यवस्थाकेँ संगठित करबाक चर्चा अछि।
द्वितीय मण्डलमे राजाकें समिति द्वारा एहि गपक लेल पदच्युत कएल जएबाक चर्चा अछि, कि धेनुक चोरिक बादो गव्य-युद्ध ओ नहि कएलन्हि। अभिषेकक सङ्ग राजा सेहो प्रायः निश्चित होमए लगलाह आ कौलिक परम्परा चलि गेल। पहिने समितिक निर्णयक बादे क्यो समर्थन-याचनामे जाइत छलाह, राजदण्ड सम्हारैत छलाह। धेनुक हरण कएने छल अनास दस्यु सभ। सुवास्तु, क्रुमु, वितस्ता आ अक्खनीक तट पर श्रुति अभ्यास आ युद्ध-कार्य संगहि चलैत छल, एके संग ब्राह्मण, क्षत्रिय आ वैश्य कर्म करैत छथि। मुदा सरस्वतीक तट पर बात किछु दोसरे भऽ गेल, ऋषिग्राम फराक होमय लागल। सभटा अनास दस्यु दास बनि गेल आ दासीसँ आर्यगणक संतान उत्पन्न होमए लगलन्हि। दासीपुत्र लोकनिकेँ तँ गाममे घर बनेबाक अनुमति छलन्हि मुदा अनास दस्युकेँ ओ अनुमति नहि छलन्हि। एहि गपक चर्चा अछि, जे आर्य चर्म वस्त्र पहिरैत छलाह आ अनास दस्यु लोकनिक संपर्कसँ सूतक वस्त्र आ लवणक प्रयोग सिखलन्हि। एहि दुनू चीजक आपूर्त्ति एखनो अनास लोकनिक हाथमे छलन्हि। अनार्य लोकनिक संपर्कसँ अपन शब्द कोश बिसरबाक आ तकर संकलनक आवश्यकताक पूर्त्तिक हेतु निघण्टुक संकलनक चर्चा सेहो अछि। गंधर्व विवाहक सेहो चर्चा अछि।
तृतीय मण्डल
अग्निष्टोम यज्ञक चर्चा अछि। छागर आ महीसक बलि केर चर्च अछि।
माँस-भात महर्षि लोकनिकेँ प्रिय लगलन्हि, तकर चर्चा अछि मुदा भातक बदला गहूमक सोहारीक प्रचलन एखनो बेशी होएबाक चर्चा अछि।
चतुर्थ मण्डल
राजाक अभिषेक यज्ञक चर्चा आ ओहिमे अरिष्टनेमिक ब्रह्मा बनबाक चर्चा अछि। ग्रामणी, रथकार, कम्मरि, सूत, सेनानी सेहो यज्ञमे सम्मिलित छलाह।
“अति प्राचीन कालमे सृष्टि जलमय छल”! एकर चर्चा मायानन्द मिश्रजी नहि जानि ऋगवेदिक युगमे कोना कए देलन्हि।
पञ्चम मण्डल
अश्वारोहण प्रतियोगिताक चर्चा अछि। अनास दास-रंजक नाट्यवृत्तिक चर्चा सेहो अछि। राजा द्वारा एकर अभिषेक कार्यक्रममे स्वीकृति आ एकर भेल विरोधक सेहो चर्चा अछि। दासकेँ स्वतंत्र कृषि अधिकार आ एकरा हेतु विदथक अनुमति राजा द्वारा लेल जाए आकि नहि तकर चर्चा अछि।
षष्ठ मण्डल
महावैराजी यज्ञक चर्चा अछि। समस्त दस्यु-ग्रामक दास बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि आ ओ सभ पशुपालन आ पणि कार्य कऽ सकैत छथि। नग्नजितक प्रसंग लए मंत्र गायन केनिहार ब्राह्मण, गविष्ठि युद्ध कएनिहार क्षत्रिय आ एकर अतिरिक्त्त जे कृषि विकासमे बेशी ध्यान दैत छलाह से विश- सामान्य जन छलाह मुदा एहिमे मायानन्द जी वैश्य शब्द सेहो जोड़ि देने छथि।
सप्तम मण्डल
बर्बर उजरा आर्यक आक्रमणक चर्चा आब जा कए भेल अछि। प्रायः विदेशी विशेषज्ञक एक भागक संग मायानन्द जी सेहो पैशाची आक्रमणकेँ बादमे जा कए बूझि सकलाह आ एकरा सेहो आर्यक दोसर भाग बना देलन्हि। आर्य हरियूपियाकेँ डाहि कए नष्ट कए देने छलाह एकर फेर चर्च आबि गेल अछि। मोहनजोदड़ो आतंकसँ उजड़ि गेल फेर भूकम्पो आयल ताहूसँ नगर ध्वस्त भेल। आब मायानन्दजी ओझराएल बुझाइत छथि। वर्षा कम होएबाक सेहो चर्चा अछि।
अष्टम् मण्डल
ऋषिग्रामक चर्चा अछि। कुलमे दास आ दासी होएबाक संकेत अछि। वृषभ पालनक सेहो संकेत अछि। मंत्र-पुत्रक ग्रामांचल चलि जएबाक आ विशः-वैश्य बनि जएबाक सेहो चर्चा अछि। मुदा आगाँ मायानन्दजी ओझराइत जाइत छथि। कश्यप सागर तटसँ प्रस्थान-पूर्व द्यौस आ त्वराष्ट्री केर गौण देव भऽ जएबाक चर्चा अछि। ब्राह्मण आ क्षत्रियक विभाजन नहि होएबाक चर्च अछि आ क्यो कोनो कर्म करबाक हेतु स्वतंत्र छल। देवासुर संग्राम आ हेलमन्द तटक युद्ध आ पशुपालनक चर्चा अछि। पश्चात ब्रह्मण आ क्षत्रियक कर्मक फराक होएब प्रारम्भ भए गेल। पश्चात् मंत्र-द्रष्टा ऋषि द्वारा मंत्रमे देवक आ अपन नाम राखब प्रारम्भ भेल- एकर चर्चा अछि।श्रुति अभ्यासक प्रारम्भ होएबाक चर्चा अछि कारण मंत्रक संख्या बढ़ि गेल छल।
नवम् मण्डल
वस्तु विनमयक हेतु हाट व्यवस्थाक प्रारम्भ भेल। हाटमे मृत्तिका प्रभागमे दास-शिल्पी पात्रक उपस्थिति आ वस्त्र प्रभागक चर्चा अछि। मृत्तिका, हस्ति-दन्त, ताम्र सीपी आदिक बनल वस्तुजातक चर्चा अछि। शिशु-रंजनक वस्तुजात - जेना हस्ति, वृषभ आदिक मूर्त्तिक, लवणक, अन्नक, काष्ठक आ कम्बलक बिक्रीक चर्चा अछि।
दशम् मण्डल
श्वेत-जनक आगमनक -बर्बर श्वेत आर्य- सूचना नागजनकेँ भेटबाक चर्चा अछि। नाग जन द्वारा अपन दलपतिकेँ राजा कहल जाएब, नागक पूर्व-कालमे ससरि कए यमुना तट दिशि आएब आ ओतुक्का लोककेँ ठेल कए पाछाँ कए देबाक सेहो चर्चा अछि।कृष्ण जनक काष्ठ दुर्ग आ नागक संग हुनका लोकनिकेँ सेहो अनास कहल गेल अछि। मुदा ओ लोकनि दीर्घकाय छलाह आ नागजन कनेक छोट। एहि मण्डलमे दासक संग शूद्रक आ गंगा तटक सेहो चर्चा आबि गेल अछि। आर्य, दास आ शूद्रक बीचमे सहयोगक संकेत अछि।
अंतमे ऋचालोक नामसँ भूमिका लिखल गेल अछि। देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि, हित्ती मित्तानी चलल आ आर्य पूर्व दिशा दिशि बढ़ल- एहि सभ तथ्यक आधार पर लिखल ई मंत्रपुत्र ऐतिहासिकताक सभटा मानदण्ड नहि अपना सकल।
मायानन्द मिश्रजी साहित्यकारक दृष्टिकोण रखितथि आ पाश्चात्य इतिहासकारक एक भाग द्वारा पसारल गॉसिपसँ बचितथि तँ आर्य आक्रमणक सिद्धांतकेँ नकारि सकितथि। सरस्वतीक धार ऋगवेदक सभ मंडलमे अपन विशाल आ आह्लादकारी स्वरूपक संग विद्यमान अछि। सिन्धु आकि सरस्वती नदी घाटीक सभ्यता तखन खतम आकि ह्रासक स्थितिमे आएल जखन सरस्वती सुखा गेलीह। अथर्ववेदमे सेहो सरस्वती जलमय छथि। ऋगवेदमे जल-प्रलयक कोनो चर्च नहि अछि आ अथर्ववेदमे ताहि दिशि संकेत अछि। भरतवासी जखन पश्चिम दिशि गेलाह, तखन अपना संग जल-प्रलयक खिस्सा अपना संग लेने गेलाह। जल-प्रलयक बाद भरतवासी सारस्वत प्रदेशसँ पूब दिशि कुरु-पांचालक ब्रह्मर्षि प्रदेश दिशि आबि गेलाह।
सरस्वती रहितथि तँ बात किछु आर होइत मुदा सुखायल सरस्वती एकटा विभाजन रेखा बनि गेलीह, आर्य-आक्रमणकारी सिद्धांतवादी लोकनिकेँ ओहि सुखायल सरस्वतीकेँ लँघनाइ असंभव भऽ गेल।
सिन्धु लिपिक विवेचन सेहो बिना ब्राह्मीक सहायताक संभव नहि भऽ सकल अछि।
ग्रिफिथक ऋगवेदक अनुवादक पादटिप्पणीमे पहिल बेर ई आशंका व्यक्त्त कएल गेल जे आर्य आक्रमणकारी पश्चिमोत्तरसँ आबि कए मूल निवासीक दुर्ग तोड़लन्हि। दुर्गमे रहनिहार बेशी सभ्य रहथि। १९४७ मे ह्वीलर ई सिद्धांत लऽ कए अएलाह जे विभाजित पाकिस्तान सभ्यताक केन्द्र छल आ आर्य आक्रमणकारी विदेशी छलाह। एकटा भारतीय विद्वान रामप्रसाद चंद ताहिसँ पहिने ई कहि देने रहथि जे एहि नगर सभक निवासी ऋगवेदक पणि छलाह। मुदा मार्शल १९३१ ई मे ई नव गप कहने छलाह जे आर्यक भारतमे प्रवेश २००० ई.पूर्व भेल छल आ तावत हड़प्पा आ मोहनजोदड़ोक विनाश भऽ चुकल छल। १९३४ मे गॉर्डन चाइल्ड कहलनि जे आर्य संभवतः आक्रमणकारी भऽ सकैत छथि। १९३८ मे मकॉय मोहनजोदाड़ोक आक्रमणकेँ नकारलन्हि, किछु अस्थिपञ्जड़क आधार पर एकरा सिद्ध कएनाइ संभव नहि। डेल्स १९६४ मे एकटा निबन्ध लिखलन्हि ‘द मिथिकल मसेकर ऑफ मोहंजोदाड़ो’ आ आक्रमणक दंतकथाक उपहास कएलन्हि। तकर बाद ह्वीलर १९६६ मे किछु पाछाँ हटलाह मुदा मकॉयक कबायलीक बदलामे सभटा आक्रमणक जिम्मेदारी बाहरी आर्यगणक माथ पर पटकि देलन्हि। आब ओ कहए लगलाह जे आर्य आक्रमणकेँ सिद्ध नहि कएल जा सकैत अछि मुदा ज्योँ ई संभव नहि अछि तँ असंभव सेहो नहि अछि। स्टुआर्ट पिगॉट १९६२ धरि ह्वीलरक संग ई दुराग्रह करैत रहलाह। पिगॉट आर्यकेँ मितन्नीसँ आएल कहलन्हि। नॉर्मन ब्राउनकेँ सेहो पंजाब प्रदेशक शेष भारतक संग सांस्कृतिक संबंधक संबंधमे शंका रहलन्हि। संस्कृत आ द्रविड़ भाषाक अमेरिकी विशेषज्ञ एमेनो लिखलन्हि जे सिन्धु घाटी कखनो शेष भारतसँ तेना भऽ कए सांस्कृतिक रूपसँ जुड़ल नहि छल। जे आर्य ओतए अएलाह सेहो ईरानी सभ्यतासँ बेशी लग छलाह।
मुदा पॉर्जिटर १९२२ मे साहित्यिक परम्परासँ सिद्ध कएलन्हि जे भारत पर आर्यक आक्रमणक कोनो प्रमाण नहि अछि। ओ सिद्ध कएलन्हि जे भारतसँ आर्य पश्चिम दिशि गेलाह आ तकर साहित्यिक प्रमाण उपलब्ध अछि। लैंगडन सेहो कहलन्हि जे आर्य भारतक प्राचीनतम निवासी छलाह आ आर्यभाषा आ लिपिक प्रयोग करैत छलाह। ब्रिजेट आ रेमण्ड ऑलचिन आ कौलीन रेनफ्रीव आदि विद्वान प्राचीन भारतक इतिहासक प्रति पूर्वाग्रहक विश्लेषण कएने छथि।
मितन्नी शासक मित्र, वरुण, इन्द्र आ नासत्यक उपासक छलाह। हित्ती राज्यमे सेहो वैदिक देवता लोकनिक पूजा होइत छल।आलब्राइट आ लैंबडिन सेहो दू हजार साल पहिने दक्षिण-पश्चिम एशियामे इंडो आर्य भाषा बाजल जाइत छल आ संख्यासूचक शब्द सेहो भारतीय छल, एहि तथ्यकेँ मानलन्हि।
ई लोकनि भारतीय छलाह आ ऋगवेदक रचनाक बाद भारतसँ बाहर गेल छलाह। बहुवचन स्त्रीलिंग रूप, ऋगवेदक देवगणक विशिष्ट रूप अन्यत्र उपलब्ध नहि अछि। इंडो योरोपियन देवतंत्रमे भारतीय देवीगणक विरलता पूर्ववर्त्ती भारतीय मातृसत्तात्मक व्य्वस्थाक बादक योरोपीय परवर्त्ती पितृसत्तात्मक व्यवस्थाक परिचायक अछि।
आब आऊ सुमेरक जल प्रलयपर जेकि ३१०० ई.पू. मे मानल जाइत अछि। भारतीय कलि संवत ३१०२ ई.पू. मानल जाइत अछि। अतः एहि तिथिसँ पूर्व ऋगवेदक पूर्ण रचना भऽ गेल छल।
देवासुर संग्रामक बाद इन्द्र असुर उपाधि त्यागलन्हि आदि गप पोथीक समाप्ति पर ऋचालोकमे मायानन्द जी लिखैत छथि। किछु पाश्चात्य विद्वान सेहो ऋगवेदक दार्शनिक महत्वकेँ कम करबाक लेल ई गप कहैत छथि जे यूनानमे देवतंत्र पूर्ण रूपसँ पल्लवित छल मुदा ऋगवेदिक समाज घुमंतु छल आ देवतंत्र ताहि द्वारे विकसित नहि छल। ओ लोकनि ई सेहो कहैत छथि जे ऋगवेदक रचना अश्व पर घुमंतु जीवन यापित केनहार पश्चिमी आक्रमणकारी कएने छथि। ऋगवेदिक कवि लोकनि आरंभिक सामूहिक संपत्ति आ रक्त्त संबंध आधारित गणसमाज दुनूसँ परिचित छलाह मुदा स्वयं ओहिसँ बाहर आबि गेल छलाह आ व्यक्त्तिगत आ कुटुम्बक संपत्तिक आधार बला व्यवस्था शुरू कए देने छलाह। संपत्ति पुरुष केंद्रित आ परिवार पितृसत्तात्मक छल। मुदा मातृसत्तात्मक व्यवस्थाकेँ ओ बिसरल नहि छलाह कारण ओ आपः मातरः कहि बहुवचनमे जलदेवीक उपासना आ स्मरण करैत छथि, संगहि मरुतगण सदिखन गणक रूपमे स्मरण आ उपासना करैत छथि।
आब जा कए एंगेल्स कहैत छथि जे यूनानमे मातृसत्तासँ पितृसत्ता प्राचीन कालक सभसँ पैघ क्रान्ति छल। ई क्रान्ति ऋगवेदिक कालमे घटित भए गेल छल। श्रमक वैशिष्टीकरणसँ उत्पादनमे गोत्रक भूमिका घटि जाइत अछि आ कुटुम्बक बढ़ि जाइत अछि। गण, गोत्र, कुल आ कुटुम्बक क्रमशः विकास सामूहिक भूसंपत्तिक संगठनसँ होइत अछि। ऋगवेदमे कुम्भकार, कमार (काष्ठकार), लोहार आ धातु शिल्पक चर्च अछि। प्राचीन ईरानमे असुरक प्रतिरूप अहुरक प्रयोग भेल। ओ लोकनि एकर उपासक छलाह मुदा असुर-उपासक भारतीय जनक प्रभाव ईरान धरि सीमित छल, आगाँ एकर प्रसार नहि भेल। भारतमे असुर दुष्ट छथि मुदा ईरानमे देव दुष्ट छथि। असुरक गरिमा सम्पूर्ण ऋगवेदमे अछि। कोनो मण्डल एहन नहि अछि जाहिमे कोनो एक वा आन देवताकेँ असुर नहि कहल गेल होअए। मुदा एहनो असुर छथि जे देवक विरोधमे छथि आ इन्द्रसँ एहन अदेवाः असुराः केर नाशक हेतु आह्वाण कएल गेल अछि।इन्द्रक समान अग्नि सेहो असुरक नाश करैत छथि आ इन्द्र आ बृहस्पति दुनू गोटे स्वयं असुर छथि। असुर देवताक उपाधि छल। ऋगवेदमे देव आ असुरक सदृश असुर एकटा भिन्न वर्ग छल असुर श्वास लैत छलाह मुदा देव नहि। देवसँ असुर बेशी प्राचीन छथि ताहि द्वारे असुर वरुण देव आ मनुष्य दुहूक राजा छथि।
पैशाची त्वग् त्वचा भारतमे कहियो तेहन आह्लादसँ नहि देखल गेल । ओहिनो आर्य आक्रमण पोषक सिद्धान्तकार जे ई तथ्य उदाहरणार्थ देखथि जे दक्षिण भारतीय ब्राह्मण, कश्मीरी ब्राह्मण आ नेपालक ब्राह्मण मे त्वचा नहि वरण रूप सेहो भिन्न अछि, ई सिद्ध करैत अछि जे ई सभ स्थानीय जन छथि आ जाति-व्यवस्थामे ताहिरूपेँ सम्मिलित भेल छथि । कारण पाँच-सए आ हजार बरखमे मानवशास्त्रीय आ वैज्ञानिक रूपेँ ओतेक रूप-रंगक अन्तर सम्भव नहि। जे यूरोपवासी दक्षिण अमेरिका-अफ्रीकामे छथि तिनको, आ जे नीग्रो-रेड इन्डियन अमेरिका-अफ्रीका-यूरोपमे छथि तिनको रूप रंगमे कोनो परिवर्तन पाँच सए बरखमे नहि आएल छन्हि। ई लाख बरखक आवाससँ सम्भव होइत अछि जे गरम प्रदेशक निवासी कारी आ ठंढ प्रदेशक गोर होइत छथि ।
पुरोहित
पुरोहित हिन्दीमे अछि आ श्रृँखलाक तेसर पोथी थीक। दूर्वाक्षत जकरा मायानन्दजी सुविधारूपेँ आशीर्वचन सेहो कहि गेल छथि सँ एकर प्रारम्भ भेल अछि।
पुरोहित केर आरम्भ दूर्वाक्षत आशीर्वचन मंत्रसँ होइत अछि। शुक्ल यजुर्वेदक अध्याय २२ केर मंत्र २२ “ॐ आब्रह्मन…” सँ “नः कल्प्ताम्” धरि अछि। मिथिलामे एहि मंत्रक संग अन्तमे “ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव”। एकर सेहो मंत्रोच्चार होइत अछि आ एहि चारि पादसँ ई मंत्र आशीर्वचनक रूप लए लैत अछि।
यजुर्वेदीय २२/२२ मंत्र सौसेँ भारतमे देशभक्त्ति गीतक रूपमे मंत्रोच्चारित होइत अछि।
दूर्वाक्षत मंत्र(शुक्ल यजुर्वेद अध्याय २२, मंत्र २२)

आ ब्रह्मन्नित्यस्य प्रजापतिर्ॠषिः। लिंभोक्त्ता देवताः। स्वराडुत्कृतिश्छन्दः। षड्जः स्वरः॥

आ ब्रह्म॑न् ब्राह्म॒णो ब्र॑ह्मवर्च॒सी जा॑यता॒मा रा॒ष्ट्रे रा॑ज॒न्यः शुरे॑ऽइषव्यो॒ऽतिव्या॒धी म॑हार॒थो जा॑यतां॒ दोग्ध्रीं धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः सप्तिः॒ पुर॑न्धि॒र्योवा॑ जि॒ष्णू र॑थे॒ष्ठाः स॒भेयो॒ युवास्य यज॑मानस्य वी॒रो जा॒यतां निका॒मे-नि॑कामे नः प॒र्जन्यों वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ऽओष॑धयः पच्यन्तां योगेक्ष॒मो नः॑ कल्पताम्॥२२॥

मन्त्रार्थाः सिद्धयः सन्तु पूर्णाः सन्तु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव।

ॐ दीर्घायुर्भव। ॐ सौभाग्यवती भव।

हे भगवान्। अपन देशमे सुयोग्य आ सर्वज्ञ विद्यार्थी उत्पन्न होथि, आ शुत्रुकेँ नाश कएनिहार सैनिक उत्पन्न होथि। अपन देशक गाय खूब दूध दय बाली, बड़द भार वहन करएमे सक्षम होथि आ घोड़ा त्वरित रूपेँ दौगय बला होअए। स्त्रीगण नगरक नेतृत्व करबामे सक्षम होथि आ युवक सभामे ओजपूर्ण भाषण देबयबला आ नेतृत्व देबामे सक्षम होथि। अपन देशमे जखन आवश्यक होय वर्षा होए आ औषधिक-बूटी सर्वदा परिपक्व होइत रहए। एवं क्रमे सभ तरहेँ हमरा सभक कल्याण होए। शत्रुक बुद्धिक नाश होए आ मित्रक उदय होए॥

मनुष्यकें कोन वस्तुक इच्छा करबाक चाही तकर वर्णन एहि मंत्रमे कएल गेल अछि।

एहिमे वाचकलुप्तोपमालड़्कार अछि।

अन्वय-

ब्रह्म॑न् - विद्या आदि गुणसँ परिपूर्ण ब्रह्म

रा॒ष्ट्रे - देशमे

ब्र॑ह्मवर्च॒सी-ब्रह्म विद्याक तेजसँ युक्त्त

आ जा॑यतां॒- उत्पन्न होए

रा॑ज॒न्यः-राजा

शुरे॑ऽ–बिना डर बला

इषव्यो॒- बाण चलेबामे निपुण

ऽतिव्या॒धी-शत्रुकेँ तारण दय बला

म॑हार॒थो-पैघ रथ बला वीर

दोग्ध्रीं-कामना(दूध पूर्ण करए बाली)

धे॒नुर्वोढा॑न॒ड्वाना॒शुः धे॒नु-गौ वा वाणी र्वोढा॑न॒ड्वा- पैघ बड़द ना॒शुः-आशुः-त्वरित

सप्तिः॒-घोड़ा

पुर॑न्धि॒र्योवा॑- पुर॑न्धि॒- व्यवहारकेँ धारण करए बाली र्योवा॑-स्त्री

जि॒ष्णू-शत्रुकेँ जीतए बला

र॑थे॒ष्ठाः-रथ पर स्थिर

स॒भेयो॒-उत्तम सभामे

युवास्य-युवा जेहन

यज॑मानस्य-राजाक राज्यमे

वी॒रो-शत्रुकेँ पराजित करएबला

निका॒मे-नि॑कामे-निश्चययुक्त्त कार्यमे

नः-हमर सभक

प॒र्जन्यों-मेघ

वर्षतु॒-वर्षा होए

फल॑वत्यो-उत्तम फल बला

ओष॑धयः-औषधिः

पच्यन्तां- पाकए

योगेक्ष॒मो-अलभ्य लभ्य करेबाक हेतु कएल गेल योगक रक्षा

नः॑-हमरा सभक हेतु

कल्पताम्-समर्थ होए

ग्रिफिथक अनुवाद- हे ब्रह्मण, हमर राज्यमे ब्राह्मण नीक धार्मिक विद्या बला, राजन्य-वीर,तीरंदाज, दूध दए बाली गाय, दौगय बला जन्तु, उद्यमी नारी होथि। पार्जन्य आवश्यकता पड़ला पर वर्षा देथि, फल देय बला गाछ पाकए, हम सभ संपत्ति अर्जित/ संरक्षित करी।

तकर बाद लेखकीय प्रस्तावना जकरा पुरोहितमे विनियोगक नाम देल गेल अछि, केर प्रारम्भ होइत अछि। पुरोहित शतपथ ब्राह्मणकालीन समाज पर आधारित अछि।
विनियोगमे पूर्व आ उत्तर वैदिक युग, महाभारत काल इत्यादिक काल निर्धारण पर चरचा कएल गेल अछि। संन्यास आ मोक्ष धारणाक प्रवेश, सूत्र साहित्य, आरण्यक आ उपनिषद आ ब्राह्मण ग्रंथक रचनाक सेहो चरचा अछि।कर्मणा केर बदलामे जन्मना सिद्धांतक प्रारम्भ आ शूद्र शब्दक उद्भव, नगरक, आहत मुद्राक, उद्योगक सुदृढ़ीकरणक आ लोहाक प्रयोगक सेहो चरचा भेल अछि। फेर मायानन्द जी ई लिखि जाइत छथि जे दाशरज्ञ युद्ध ई.पू. १८०० मे भेल- भरत आ कुशिक-कस्साइटक सम्मिलित समूह सरस्वती तटसँ व्यास नदी पार करैत इलावृत पर्वत प्रदेश होइत ; आ ओ लोकनि कोशल मिथिलाक राजतंत्रक, कुरु-पांचालक संस्कृतिक विकसित होएबासँ पूर्वहि, स्थापना कएने छलाह।
पुरोहित तेरह टा सर्गमे विभक्त्त अछि आ एकर अन्त उपसंहारसँ होइत अछि। प्रथम सर्ग दक्षिण पांचालक कांपिल्य नगरसँ शुरू होइत अछि। अथर्वणपल्लीक पशुशालामे साँझ होइत देरी उठैत धुँआक चरचा अछि। मेधा आ कुशबिन्दुसँ कथा आगू बढ़ैत अछि। ऋषि गालबक आश्रममे ऋगवेदकेँ कंठाग्र कराएल जएबाक आ बादमे जा कए कृषि संबंधी शिक्षा देल जएबाक वर्णन अछि।
दोसर सर्गमे राजा प्रवाहण जैबालिक मूर्ख पुत्र द्वारा ब्राह्मणक अपमानक, प्रथम श्रोत्रिय आ दोसर पुरोहित ब्राह्मणक वर्णन अछि।
तेसर सर्गमे आचार्य चाक्रायणक अपमानक कारण पुरोहित वर्ग द्वारा पौरहित्य कर्म नहि करबाक निर्णयसँ प्रजाजनक दैनिक अग्निहोत्र कार्य आ बिना लग्नक कृषि आ वाणिज्य कार्यमे होअए बला भाङठक वर्णन अछि।
चतुर्थ सर्गमे व्यास कथा आ भारत युद्धक चर्चा अबैत अछि आ एतए मायानन्द जी पाश्चात्य दृष्टिकोणक अनुसरण करैत छथि। जय काव्यकेँ भारत युद्धकथाक रूप दए देल गेल- ई वक्त्तव्य अनायासहि दए रहल छथि मायानन्द मिश्र।
पाँचम सर्गमे वैश्य द्वारा उपनयन संस्कार छोड़बाक चरचा अछि मुदा क्षत्रिय पुत्र आ पुत्री दुनूक उपनयन करैत छलाह। वैश्य कन्या शिक्षासँ दूर जा रहल छलीह आ ब्राह्मण कन्या गुरुकुलक अतिरिक्त पितासँ शिक्षा लए रहल छलीह। ब्राह्मणकेँ पौरहित्यसँ कम समय भेटैत छलन्हि।
छठम सर्गमे ब्राह्मण पुरोहित द्वारा अथर्व वेदकेँ नहि मानबाक चरचा अछि।
सातम सर्गमे अथर्वनपल्लीमे अथर्ववेदीय संस्कारक शिक्षा आ प्रथम श्रेणीक ब्राह्मण द्वारा ओतए नहि जएबाक चरचा अछि।
आठम सर्गमे इद्रोत्सवमे रथदौड़, अश्वारोहण, मल्लयुद्ध, असिचालन, लक्ष्यभेद आ विलक्षण अनुकृतिक चरचा अछि आ व्यासपल्लीक लोक द्वारा अनुकृति करबाक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे व्रात्य करुष भारत युद्धक कथा कहि रहल छलाह। भारत युद्धक बहुत पूर्व भरत, त्रित्सु, किवी आ सृंजय मिश्रित जनक आर्यवर्तमे शूद्र नामसँ सुमेरियाक जियसूद्रक स्मृतिमे अपनाकेँ गौरव देबाक हेतु सूद्र कहबाक वर्णन अछि।
नवम सर्गमे तन्तुवाय द्वारा स्त्री निमित्त वस्त्रमे तटीयता देल जएबाक कारण भेल अन्तरक चरचा अछि, पहिने ई अन्तर नहि छल। अथर्वण आ याज्ञिक ब्राह्मणमे भेदक चरचा अछि।
दशम् सर्गमे शिश्नदेवक पूजा अनार्य द्वारा होएबाक आ अथर्वण पुरोहित द्वारा एकर अनभिज्ञताक चरचा अछि। व्यासपल्लीमे अक्षर लिपिक प्रयोग आ आचार्य गालबक श्रुति आश्रममे अंक लिपिक अतिरिक्त्त किछु अन्य देखब वर्जित होएबाक गप कहल गेल अछि।
एगारहम सर्गमे गालब आश्रममे दण्डनीति पर चरचा निषिद्ध होएबाक बादो दक्षिण पांचालक सभासदक आग्रह पर एतद संबंधी चरचा होएबाक गप अछि। राजा शिलाजित द्वारा राजपद प्रधान पुरोहितकेँ देबाक चरचा अछि।
बारहम सर्गमे भारत युद्धक बाद नियोग प्रथाक अमान्य भऽ बन्द भऽ जएबाक बात अछि। शिश्नदेवक शिवदेवसँ एकाकारक चरचा सेहो अछि।
तेरहम सर्गमे क्रैव्यराजक अभिषेक उत्सवक चरचा अछि। दूर्वाक्षत मंत्रमे
“ॐ मंत्रार्था सिद्धयः संतु मनोरथाः। शत्रूणां बुद्धिनाशोऽस्तु मित्राणामुदयस्तव” आ दीर्घायुर्भव केर मेल शुक्ल यजुर्वेदक २२/२२ मंत्रसँ कए दूबि अक्षत लए, विशेष लए ताल गति यति मे गएबाक वर्णन अछि। एकर अनुवाद सेहो मायानन्द जी देने छथि, जे ग्रिफिथक अनुवादसँ प्रेरित अछि:-
समस्त विश्वमे ब्राह्मण विद्याक तेजक वर्चस्व स्थापित करए बला, सर्वत्र, वाण चलएबामे निपुण, निरोगि, महारथी, शूर, यजमान राज्य सभक जन्म होए, सर्वत्र अधिकाधिक दूध दएबाली धेनु होए, शक्तिशाली वृषभ होए, तेजस्वी अश्व होए, रूपवती सध्वी युवती होथि, विजयकामी वीरपुत्र होथि, जखन हम कामना करी पर्जन्य वर्षा देथि, वनस्पतिक विकास होए, औषधि फलवती आ सभ प्राणी योगक्षेमसँ प्रसन्न रहथि।राजन शतंजीवी होथि।
क्रैव्यराजक अभिषेकक लेल ई मंत्र हाथमे अक्षत, अरबा, ब्रीहि आ दूर्वादल लए आ मंत्र समाप्ति पश्चात राजा पर एकरा छीटबाक आ फेर दहीक मटकूरीसँ दही लए महाराजक भाल पर एहिसँ तिलक लगएबाक वर्णन अछि। एहि प्रकरणमे मायानन्द जी लिखैत छथि जे एहि मंत्रक, जकरा मिथिलामे दूर्वाक्षत मंत्र कहल जाइत अछि, रचना याज्ञवल्क्य द्वारा वाजसनेयी संहिताक लेल कएल गेल। एहि मंत्रक उपयोग मिथिलामे उपनयनक अवसर पर बटुकक लेल आ विवाहक अवसर पर वर-वधुककेँ आशीर्वचनक रूपमे प्रयुक्त होअए लागल।
पुरोहितक अन्त होइत अछि उपसंहारसँ। एतय वर्णित अछि, जे काशीक रस्ताक अनार्य ग्रामक आर्यीकरण भेल आ व्रात्यष्टोम यज्ञ भेल। शिश्नदेवाः पर चरचा अछि, शुनःशेप आख्याण आ भारत कथाक कहबाक परम्पराक प्रारम्भ आ मगध द्वारा आर्य धर्मक प्रति वितृष्णाक चर्च सेहो अछि।
मायानन्दजी महाभारतक समस्याक समाधानमे सेहो पाश्चात्य विचारक लोकनिक अनुसरण करैत बुझना जाइत छथि। प्रोफेसर वेबर पहिल बेर एहि सिद्धांतकेँ लए कए आएल छलाह। ओ अपन विचार व्यक्त कएने छलाह जे ८८०० पद्यक जय संहिता छल आ पहिने युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) मात्र छल। ओकर आधार ओ बनेने छलाह एकटा श्लोककेँ-
अष्टौश्लोक सहस्राणि..... अहं वेद्मि शुको वेत्ति सञ्जयो वेत्ति वा न वा
संजय, व्यास आ शुक तीनू गोटे ८८००-८८०० प्रत्येक कए भारतक श्लोक मात्र स्मरण कए सकल छलाह। माने भारत एतेक विशाल छल जे प्रत्येक गोटे सम्पूर्ण स्मरण नहि कए सकल छलाह आ ताहि दृष्टिसँ भारत कहियो २६४०० श्लोकसँ कम नहि छल, जकरा व्यास लिखने छलाह। जय संहिता भारत आ महाभारत दुनूकेँ कहल जाइत छै। युद्ध पर्व (१८ पर्व मे चारि पर्व भीष्म, द्रोण, कर्ण आ शल्य पर्व) तेना ने परस्पर दोसर पर्व सभसँ जुड़ल अछि जे बिना पछिला पर्व पढ़ने अगिलाक कोनो भाँज नहि लगैत छै। इलियडक युद्ध १० साल धरि चलल छल मुदा इलियड मात्र ट्रॉयक घेरा धरि सीमित छल। मुदा महाभारत बहुत पहिने सँ १८ दिनुका युद्धक कारणसँ शुरु होइत अछि। भीष्म पर्व छठम पर्व अछि, द्रोण पर्व सातम, कर्ण पर्व आठम आ शल्य पर्व नवम। तकरा बाद ९ टा पर्व आर अछि।
किएक तँ कैक बैसारीमे महाभारत केर पाठ सुनाओल जाइत छल ताहि द्वारे ई स्वाभाविक अछि जे पुरान पाठ सभ जे भए चुकल छल केर फेरसँ पुनःस्मरण बेर-बेर कएल जाइत छल। ताहिसँ ई अर्थ निकालब जे ई क्षेपक अछि, अनर्गल होएत। तहिना गीता सेहो पाश्चात्य विद्वान लोकनिक लेल क्षेपक अछि कारण ओ लोकनि भारतीय संस्कृति, साहित्य आ कलाक अनुभव विदेशी मानसिकतासँ करबाक कारण गलती करैत छथि। विदेशी विद्वान ई मानबामे कष्ट अनुभव करैत छथि जे महाभारत ओतेक पुरान भेलाक बादो ओतेक वृहत् अछि आ इलियड ओकर सोझाँ किछु नहि अछि। से एक गोट पद्यक वेबर द्वारा कएल गेल मिथ्या व्याख्याक आधार पर जय संहिता केर संकल्पना आएल। मात्र भारत आ महाभारत केर रूपमे एहि महाकाव्यक विकासकेँ बिना कोनो कारणसँ जय संहिता, भारत आ महाभारत रूपी तीन चरणमे प्रस्तुत कएल गेल। महाभारत केर सभसँ छोट रूपमे सेहो २४६०० सँ कम श्लोक नहि छल आ जय संहिता भारत आ महाभारतकेँ सम्मिलित रूपसँ कहल जाइत छल।
स्त्रीधन
ई ग्रन्थ मायानन्द बाबूक इतिहास बोधक अन्तिम कड़ी अछि। प्रागैतिहासिक “प्रथम शैलपुत्री च”, ऋगवेदिक कालीन “मंत्रपुत्र”, उत्तरवैदिककालीन “पुरोहित” केर बाद ई पुस्तक सूत्र-स्मृतिकालीन अछि, ई ग्रंथ हिन्दीमे अछि। आ ई सूत्र-स्मृतिकालीन उपन्यास मिथिला पर आधारित अछि। ई पोथी प्रारम्भ होइत अछि मायानन्दजीक प्रस्तावनासँ जकर नाम एहि खण्डमे “पॄष्ठभूमि” अछि। एतए मायानन्दजी रामायण-महाभारत केर काल गणनाक बाद इतिहासकार लोकनिक एकमात्र साक्ष्य शतपथ ब्राह्मणक चर्च करैत छथि।
मिथिलाक प्राचीनतम नाम विदेह छल, जकर प्रथम वर्णन शतपथ ब्राह्मणमे आएल अछि। सार्थ-गमनक प्रक्रियाक विस्तृत वर्णन एहि ग्रन्थमे अछि, से मायानन्द जी कहैत छथि।
ई ग्रन्थ प्रथम आ द्वितीय दू अध्यायमे अछि आ अन्तमे उपसंहार अछि। प्रथम अध्यायमे प्रथमसँ नवम नौ टा सत्र अछि। द्वितीय अध्यायमे प्रथमसँ अष्टम ई आठ टा सर्ग अछि।

प्रथम अध्याय
प्रथम सत्र
एहिमे सृंजय द्वारा कएल जा रहल धर्म-पश्चात्ताप स्वरूप भिक्षाटनक, पत्नी-त्यागी होएबाक कारण छह मास धरि निरन्तर एकटा महाव्रत केर पालन करबाक चरचा अछि।
“द्वितीय वर” केर सेहो चरचा अछि।
द्वितीय सत्र
राजा बहुलाश्व जनकक ज्येष्ठ पुत्र कराल जनककेँ राजवंशक कौलिक परम्पराक अनुसार सिंहासन भेटलन्हि, तकर वर्णन अछि।
तृतीय सत्र
एतए पुरान आ नवक संघर्ष देखबामे अबैत अछि। वारुणी एक ठाम कहैत छथि जे जखन पूज्य तात हुनकर विधिवत उपनयन करबओलन्हि, ब्रह्मचर्य आश्रममे विधिवत प्राचीन कालक अनुसार श्रुतिक शिक्षा देलन्हि, तँ आब हमहूँ भद्रा कन्या बनि अपन वरपात्रक निर्वाचन स्वयं कए विवाह करए चाहैत छी।
चतुर्थ सत्र
एतए कराल जनकक विरुद्ध विद्रोहक सुगबुगाहटिक चरचा अछि। कृति जनक आ बहुलाश्व जनकक कालमे भेल न्यायपूर्ण आ प्रजाहितकारी कल्याणकारी कार्यक चरचा भेल अछि तँ संगहि सीरध्वज जनकक समयसँ भेल मिथिलाक राज्य-विस्तारक चरचा सेहो अछि। बहुलाश्व मरैत काल अपन पुत्र करालकेँ आचार्य वरेण्य अग्रामात्यखण्ड केर उपेक्षा-अवहेलना नहि करबाक लेल कहने छलखिन्ह मुदा कालान्तरमे वैह कराल जनक अग्रामात्यक उपेक्षा-अवहेलना करए लगलाह। आचार्य वरेण्य-खण्ड मिथिलासँ पलायन कए गेलाह।
पंचम सत्र
प्रणिपात, आशीर्वचन आ कुशल-क्षेमक औपचारिकताक वर्णन अछि आ स्त्रीधनक चरचा सेहो गप-शपक क्रममे आएल अछि। ईहो वर्णन आएल अछि जे वैशाली किछु दिन कौशलक अधीन छल आ भारत-युद्धमे ओ मिथिलाक अधीन छल। वन्य भूमिकेँ कृषि-योग्य बनेबाक उपरान्त पाँच बसन्त धरि कर-मुक्त करबाक परम्पराकेँ राजा कराल जनक द्वारा तोड़ि देबाक चरचा अछि।
षष्ठ सत्र
पांचाल-जन द्वारा अंधक वृष्णिक नायक वासुदेव कृष्णकेँ जय-काव्यक नायक मानल जएबाक चरचा अछि। जय-काव्य आ भारत-काव्यक पश्चिमक उच्छिष्ट भोज मायानन्दजीक मोनसँ नहि हटलन्हि आ जय-काव्यमे मुनि वैशम्पायन व्यास द्वारा बहुत रास श्लोक जोड़ि वृहतकाय भारत काव्य बनाओल जएबाक मिथ्या तथ्यक फेरसँ चरचा अछि। जयकाव्यक लेखक कृष्ण द्वैपायन व्यासकेँ बताओल गेल अछि। आ एकर बेर-बेर चरचा कएल गेल अछि जेना कोनो विशेष तथ्य होअए।
फेर देवत्वक विकासपर सेहो चरचा अछि। सरस्वती धारक अकस्मात् सूखि जएबाक सेहो चरचा अछि।
सरस्वतीक मूर्तिपूजनक प्रारम्भक आ मातृदेवीक सेहो चरचा भेल अछि।
सप्तम् सत्र
सरस्वतीकेँ मातृदेवी बनाकए काल्पनिक सरस्वती प्रतिमा-पूजनक चरचा अछि। मिथिलामे पतिक नाम नहि लेबाक परम्पराक सेहो चरचा भेल अछि।
अष्टम् सत्र
राजाक अत्याचार चरम पर पहुँचि गेल अछि। अपूर्वा द्वारा विवशतापूर्वक गार्हस्थ्य त्याग आ स्त्रीधन सेहो छोड़बाक चरचा भेल अछि।
नवम् सत्र
सएसँ बेशी ग्राम-प्रमुख द्वारा सम्मेलन-उपवेशनक चरचा अछि।
पाँच वसन्त धरि कर-मुक्ति आ ताहिसँ वन्यजन आ शूद्र जनक सम्भावित पलायनक चरचा अछि। सीरध्वज जनकक पश्चात् धेनु-हरण राज्याभिषेकक बाद मात्र एकटा परम्परा रहि गेल, तकर चरचा अछि। मुदा कराल द्वारा अपन सगोत्रीय शोणभद्रक धेनु नहि घुमेबाक चरचा अछि। कराल द्वारा बीचमे प्रधान पुरहितकेँ हटेबाक चरचा अछि। चिकित्साशास्त्रक नवोदित चिकित्सक बटुक कृतार्थकेँ राजकुमारीक चिकित्साक लेल बजाओल जाइत अछि, संगमे राजकुमारीक सखी आचार्य कृतक पुत्री वारुणीकेँ सेहो बजाओल जाइत अछि। ओ अपन अनुज बटुकक संग जाइत छथि आ कराल बलात् अपन कक्ष बन्द कए हुनकासँ गांधर्व-विवाह कए लैत छथि। प्रजा विद्रोह आ राजाक घोड़ा पर चढ़ि कए पलायनक संग प्रथम अध्यायक नवम आ अन्तिम सत्र खतम भए जाइत अछि।
द्वितीय अध्याय
प्रथम सर्ग
सित धारक चरचा अछि। वारुणिकेँ वरुण सार्थवाह सभक संग अंग जनपद चलबाक लेल कहैत छन्हि। आ संगे वरुण ईहो कहैत छथि जे अंग जनपदक आर्यीकरणक कार्य अखनो अपूर्ण अछि।
द्वितीय सर्ग
सार्थक संग धनुर्धर लोकनि चलैत छलाह, अपन श्वानक संग। सार्थक संग सामान्य जन सेहो जाइत छलाह।वरुण आ वारुणी हिनका सभक संग अंग दिशि बिदा भेलाह, एहि जनपदक राजधानी चम्पा कहल गेल अछि आ एकरा गंगाक उत्तरमे स्थित कहल गेल अछि।
तृतीय सर्ग
अंग क्षेत्रमे धानसँ सोझे अरबा नहि बनाओल जएबाक चरचा अछि, ओतए उसीन-सुखा कए ढेकीसँ बनाओल अरबाकेँ चाउर कहल जएबाक आ ब्रीहिकेँ धान कहबाक वर्णन भेल अछि। पूर्वकालक श्रेष्ठी द्विज वैश्य आ अद्विज नवीन वैश्यक चरचा भेल अछि।
चतुर्थ सर्ग
आर्यीकरणक बेर-बेर चरचा पाश्चात्य विद्वानक मायानन्दजी पर प्रभाव देखबैत अछि। आर्य आ द्रविड़ शब्द दुनू , पाश्चात्य लोकनि भारतमे अपन निहित स्वार्थक लेल अनने छलाह। कोशल आ विदेहक प्रसारक, देवत्वक विकासक सम्पूर्ण इतिहास एतए देल गेल अछि। मिथिलाक दही-चूड़ाक सेहो चर्च आएल अछि।
पञ्चम सर्ग
दिनमे एकभुक्त आ रातिमे दुग्धपान मिथिला आ पांचाल दुनू ठाम छल। तथाकथित आर्य आ स्थानीय लोकनिक बीच छोट-मोट जीवनशैलीक अन्तर- आ मायानन्दजी आर्यीकरण कहैत छथि ओकरा पाटब !
षष्ठ सर्ग
अंगक गृह आर्यग्राम जेकाँ सटि कए नञि वरन् हटि-हटि कए होएबाक वर्णन अछि। हुनका सभ द्वारा छोट-छोट वस्त्र आ पशु चर्म पहिरबाक सेहो वर्णन अछि। वन्यजनक बीचमे नरबलि देबाक परम्पराक संकेत आ निष्कासित वन्यजनसँ भाषाक आदान-प्रदान सेहो मायानन्दजी पाश्चात्य प्रभावसँ ग्रहण कए लेने छथि।
विक्रय-थान खोलबाक जाहिसँ भविष्यमे नगरक विकास संभव होएत, तकर चर्च अछि।
सप्तम सर्ग
उसना चाउरक अधिक सुपाच्य होएबाक आ ताहि द्वारे ओकर पथ्य देबाक गप कएल गेल अछि।लौह-सीताक लेल लौहकार, हरक लेल काष्ठकार, बर्तन-पात्रक लेल कुम्भकार इत्यादि शिल्पीक आवश्यकता आ ताहि लेल आवास-भूमि आ भोजनक सुविधा देबाक गप आएल अछि।
अष्टम सर्ग
कृषि उत्पादनक पश्चात् लोक अन्नक बदला सामग्री बदलेन कए सकैत छथि, वृषभ-गाड़ीसँ सामग्रीक संचरण, एक मास धरि चलएबला यज्ञक व्यवस्था भूदेवगण द्वारा कएल जएबाक प्रसंग सेहो आएल अछि। भाषा-शिक्षण क्रममे ब्राह्मणगामक अपभ्रंश बाभनगाम आ वनग्रामक वनगाम भए गेल। भाषा सिखा कए घुरैत काल वारुणीपर तीरसँ आक्रमण भेल आ फेर वारुणिक मृत्यु भए गेल।
उपसंहार
दोसर वसन्त अबैत मिथिलामे गणतंत्रक स्वरूपक स्थापना स्थिर भए गेल। वैशाली आ मिथिलाक बीच परस्पर सम्वाद एक गणतांत्रिक सूत्रमे जुड़बाक लेल होमए लागल। सितग्राम स्थित राजधानीमे पूर्वमे मिथिलाक सीमा-विस्तारक चरचा भेल। राजधानी सितग्राम आ पूर्वी मिथिलाक जितग्रामक बीच एकटा महावन छल। एकरा ब्राह्मणग्राम आ त्रिग्राम द्वारा मिलिकए जड़ाकए हटाओल गेल।

भाषा विज्ञान प्रसंग - ऋगवैदिक ऋचामे प्राकृतक किछु विशेष शब्द, ध्वनि, प्रत्यय आ वाक्य रचना भेटैत अछि। पाणिनी संस्कृतकेँ मानक भाषा आ प्रादेशिक तत्वसँ मुक्त भाषाक रूप देने छलाह। कर्णाटकमे पानिकेँ नीरू आ उत्तर भारतमे जल कहल जाइत अछि। पानिक ई दुनू रूप संस्कृतमे भेटत। प्राकृतिक तत्वसँ मुक्त भाषा बनेबाक लेल पाणिनी कोनो क्षेत्रक अवहेलना नहि कएने छलाह वरण सभ क्षेत्रक शब्दकोष लए उच्चारणक भेदकेँ खतम कएने छलाह। बहुत रास प्राकृत शब्द संस्कृतमे ध्वन्यात्मक संशोधन कए लेल गेल आ ताहिसँ बादमे ई धारणा भेल जे प्राकृतक शब्द सभ तद्भव छल। संस्कृतमे तद्भव ताहि कारणसँ नहि देखबामे अबैत अछि। तहिना अपभ्रंश आ प्राकृत भाषा सौँसे देशमे घुमए बलाक भाषा छल।
भारतमे देवतंत्रक विकास पानि संबंधी धारणासँ जुड़ल अछि। यावत विश्व अव्यक्त अछि तँ अन्धकारमय अछि, अकास अछि, व्यक्त भेलापर ओ जल बनि जाइत अछि। अकास आ जल दुनू भारतीय चिन्तनमे तत्व अछि। मूर्तिपूजनक जे चित्र मायानन्दजी चित्रित करैत छथि ओ सरलीकरण अछि। भाषा-प्रसारक जे विधि ओ स्त्रीधनमे देखबैत छथि सेहो अति सरलीकरण अछि।

श्रवण द्वारा परम्पराक निर्वहण साहित्यमे देखल गेल छल आ से महाभारतमे किछु ठाम बेर-बेर देखबामे अबैत अछि , से ताहि कारण कतेको पर्वकेँ क्षेपक कहल जाएब सम्भव नहि। वेदक प्रतिशाख्यकेँ ओना देखलापर ई ज्ञात होएत जे लिखबाक परम्पराक अछैत ई सम्भव नहि छल मुदा महाभारत अबैत-अबैत कट्टरता बढ़ल। महाभारतमे वर्णन अछि:
वेदविक्रयिणश्चैव वेदानांचैवदूषकः।
वेदानांलेखकश्चैव तेवै निरयगामिनः॥
(वेदक विक्रेता, गलत-व्याख्या कएनिहार आ लेखक, सभ नरकक पथपर गेनिहार छथि।)
कराल प्रसंग : कराल जनकक कुकृत्यक वर्णन अर्थशास्त्रमे एना आएल अछि:
(१.६ विनयाधिकारिकेप्रथमाधिकरणे षडोऽध्यायःइन्द्रियजये अरिषड्वर्गत्याग) : तद्विरुद्धवृत्तिरवश्येन्द्रियश्चातुरन्तोऽपिराजा सद्यो विनश्यति- यथा
दाण्डक्यो नाम भोजः कामाद् ब्राह्मणकन्यायमभिमन्यमानः सबन्धराष्ट्रोविननाश करालश्च वैदेहः,...।
भिक्षु प्रभामतीक जयमंगल भाष्य एहिमे जोड़ैत अछि जे कराल योगेश्वर तीर्थमे भीड़ दिशि देखैत काल एकटा सुन्दर ब्राह्मण-स्त्रीकेँ देखलक आ ओकरा अपन राज्य जबर्दस्ती लए गेल। ओ ब्राह्मण ओकर राजधानी गेल आ कानि खीजि कए कहलक जे ई धरती किएक नहि फटैत अछि जतए एहन कुकर्मी राजा रहैत अछि। धरती फाटल आ ओहिमे कराल परिवार समेत धसि कए मरि गेल।
एकटा ब्राह्मण स्त्रीक अपहरण करालक पतनक कारण छल ई चरचा अश्वघोषक बुद्धचरितमे सेहो आएल अछि जेना कौटिल्यक अर्थशास्त्रमे आएल अछि। मुदा दीपवंश कराल जनकक बाद ओकर पुत्र आ पौत्रक राजा होएबाक वर्णन करैत अछि। ब्राह्मण ग्रंथ सभ विदेहकेँ राजशाही आ बौद्ध ग्रन्थ सभ गणतंत्र (राजा समिति द्वारा चुनल) कहैत अछि आ मत विभिन्नताक से कारण।

एहि प्रकारें मायानन्द मिश्रजीक ऐतिहासिक यात्रा बहुत रास एहन तथ्य अनलक जे कोनो तरहेँ तर्कसँ पुष्ट नहि भए सकल।

'विदेह' २३२ म अंक १५ अगस्त २०१७ (वर्ष १० मास ११६ अंक २३२)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. जगदीश प्रसाद मण्‍डलक  दूटा लघु कथा   कोढ़िया सरधुआ  आ  त्रिकालदर ्शी २.२. नन...