Tuesday, April 07, 2009

गजल - आशीष अनचिन्हार



गजल

इहो अहाँक प्रेम छल पछाति जानल हम
खाली मूहँक छेम छल पछाति जानल हम


आगि लागल घर मे चिन्ताक गप्प नहि
कारण अपने टेम छल पछाति जानल हम


सड़ैत देखलिऐक किच्छो के कादो मे
अपने घरक हेम छल पछाति जानल हम


पिबैत रहलहुँ सदिखन विदेशी शीतल पानि
तैओ गरमी कम्म छल पछाति जानल हम


किछु तत्व कए दैत छैक अनचिन्हार सभ के
कथन मे दम्म छल पछाति जानल हम

कलाकारक स्वागत

मैलोरंग अपन अगिला प्रस्तुति
जल डमरू बाजे नामक नाटक
जून महीनामे क' रहल अछि ।
एहिमे अभिनय करबाक इच्छुक अभिनेता आ
अभिनेत्रीक स्वागत छनि ।
अपन इच्छा मेल वा फोन सँ कहि सकैत छी.
9811774106, mailorang@gmail.com

हर्जे की- अनुजक नाम, काज अहींक थिक - रामलोचन ठाकुर

हर्जे की

चलू तिरंगा कने उड़ा ली हर्जे की।
आजादी के रश्म पुरा ली हर्जे की॥
आजादी के अर्थ कोश मे जुनि ताकी।
आजादी के जश्न मना ली हर्जे की॥
शुल्क-मुक्त आयात स्कॉच-सैम्पेन होइछ।
शिक्षा स्वास्थ्यक शुल्क वृद्धि मे हर्जे की॥
देशक प्रगति विकास विदेशी पूँजी स।
संसद हैत निलाम होउक ने हर्जे की॥
सौ-हजार भसि गेल बाढ़ि मे भसए दिऔ।
राता-राती शेठ बनत किछु हर्जे की॥
रौदी-दाही सबदिना छै रहए दिऔ।
जनता बाढ़ि अकाल मरत किछु हर्जे की॥
गाम-देहातक बात बैकवार्डक लक्षण।
मेट्रो प्रगति निशान देश के हर्जे की॥
नेता जिन्दावाद रहओ आवाद सदा।
देश चलै छै एहिना चलतै हर्जे की॥



अनुजक नाम/ काज अहींक थिक


खएबामे जत्ते
किएक ने होउक तीत
औषध
फल होइते छैक नीक
रोगी कें
बुझा देब ई बात
काज अहींक थिक

मैथिली हैकू- क्षणिका- हाइकू- रामलोचन ठाकुर- गजेन्द्र ठाकुर

1. रामलोचन ठाकुर किछु क्षणिका (हाइकू)

 


१.भोजक पान
सासुरक सम्मान
पुनिमाक चान


२.हाथीक कान
नटुआक बतान
एक समान


३.दूरक चास
गामक कात बास
कोन विश्वास


४.बाँझीक फूल
महकारीक फल
के कहै भल


५.दादुर-गान
डोकाक अभियान
वेथे गुमान


६.हिजरा-नाच
ओकिल केर साँच
की ६ की पाँच




2.गजेन्द्र ठाकुर

१२ टा हैकू आ तकर बाद एकटा हैबून



१.वास मौसमी,
मोजर लुबधल
पल्लव लुप्ता


२.घोड़न छत्ता,
रेतल खुरचन

मोँछक झक्का


३. कोइली पिक्की,
गिदरक निरैठ
राकश थान


४.दुपहरिया
भुतही गाछीक
सधने श्वास


५.सरही फल
कलमी आम-गाछी,
ओगरबाही


६.कोलपति आऽ
चोकरक टाल,
गछपक्कू टा


७.लग्गा तोड़ल
गोरल उसरगि
बाबाक सारा


८.तीतीक खेल
सतघरिया चालि
अशोक-बीया


९.कनसुपती,
ओइधक गेन्द आऽ
जूड़िशीतल


१०.मारा अबाड़
डकहीक मछैड़
ओड़हा जारि


११.कबइ सन्ना
चाली बोकरि माटि,
कठफोड़बा


१२.शाहीक-मौस,
काँटो ओकर नहि
बिधक लेल


हैबून १

सोझाँ झंझारपुरक रेलवे-सड़क पुल। १९८७ सन्। झझा देलक कमला-बलानक पानिक धार, बाढ़िक दृश्य। फेर अबैत छी छहर लग। हमरा सोझाँमे एकठामसँ पानि उगडुम होइत झझात बाहर अछि अबैत। फेर ओतएसँ पानिक धार काटए लगैत अछि माटि। बढ़ए लगैत अछि पानिक प्रवाह, अबैत अछि बाढ़ि। घुरि गाम दिशि अबैत छी। हेलीकॉप्टरसँ खसैत अछि सामग्री। जतए आयल जलक प्रवाह ओतए सामग्रीक खसेबा लए सुखाएल उबेड़ भूमिखण्ड अछि बड़ थोड़। ओतए अछि जन- सम्मर्द। हेलीकॉप्टर देखि भए जाइत अछि घोल। अपघातक अछि डर हेलीकॉप्टर नहि खसबैत अछि ओतए खाद्यान्न। बढ़ि जाइत अछि आगाँ। खसबैत अछि सामग्री जतए पानि बिनु पड़ैत छल दुर्भिक्ष, बाढ़िसँ भेल अछि पटौनी। कारण एतए नहि अछि अपघातक डर। आँखिसँ हम ई देखल। १९८७ ई.।

पएरे पार
केने कमला धार,
आइ विशाल

आत्मप्रसंग - एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा- रे सॊना ! रे चानी ! -गगन अजिर घन आयल कारी- स्वर्गीय बबुआजी झा "अज्ञात"

आत्मप्रसंग स्वर्गीय बबुआजी झा अज्ञात

कोसी नदिक निकट अछि बसती बाथ

जन्मभूमि, जल जीवन नियतिक हाथ।

महिसिक पीठ पढ़ल किछ चित पित मारि

कविता एखन लिखै छी खेतक आरि।

कवि समाजसँ रहलहुँ सभ दिन कात

नाम अपन रखलहुँ तेँ अज्ञात

विकट प्रश्नमय जीवन रहलहुँ व्यस्त

शिवक जटामे सुरसरि सम हम अस्त।

विधिवश प्राप्त वसंतक किरण अमन्द

गाबि उठल पिक हृदयक अभिमत छन्द।

कोन वस्तु अछि जगतक नहि निङहेस

एक चमत्कृत चित्रण कवि-कर शेष।

चलत धरणितल तटिनिक जखन प्रवाह

आबि जुड़त किछ नीको किछ अधलाह।

जखन विरंचिक विरचित सृष्टि सदोष

हैत कोन विधि अनकर कृति निर्दोष।

सहज धर्म मधुमाछिक मधु लय अन्ध

माछिक अपन प्रकृति पुनि प्रिय दुर्गन्ध।

एक कहथि भल जकरा अनभल आन

मनक आँखि नहि सबहुक एक समान।

सर्वसुगम नहि हंसक घर अछि आइ

मुह दुसैत मुहदुस्सिक ध्वज उड़िआइ।

वन्य प्रसूनक की अछि विफल सुगन्ध?

व्यापक विभु यदुपूजा यदि मन बन्ध।

जानि न जानि कते कविवर्यक अर्थ

कृतिगत हैत, ऋणी हम तनिक तदर्थ।

कयलहुँ सक भरि सेवा अम्ब! अहाँक

अहिक दया पर आगुक कर्म विपाक।

-अज्ञात

 

 

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा

जतय जाँइ¸ जे करँइ¸ अपन छौ

सबल पाँखि उन्मुक्त गगन छौ

सुमधुर भाषा¸ प्रकॄति अहिंसक

अपन प्रदेश¸ अपन सभ जन छौ

 

मुदा कतहु रहि अर्जित जातिक

मान सुरक्षित रखिहेँ सूगा¸

एतबा धरि तॊं करिहेँ सूगा

 

उत्तम पद अधिकाधिक अर्थक

जाल पसारल छै कानन में

पिजड़ा बन्न प्रफुल्लित रहमे

राजा की रानिक आङन में

 

जन्म धरित्रिक मॊह मुदा तोँ

मन में सभ दिन रखिहेँ सूगा¸

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

 

पराधिन छौ कॊन अपन सक

बजिहेँ सिखि-सि‌खि नव-नव भाषा

की क्षति¸ अपन कलाकय प्रस्तुत

पबिहेँ प्रमुदित दूध बतासा

 

मातॄ सुखक वरदान मुदा नहिं

पहिलुक बॊल बिसरिहेँ सूगा¸

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

 

जननिक नेह स्वभूमिक ममता

रहतौ मॊन अपन यदि वाणी

देशक हैत उजागर आनन

रहत चिरन्तन तॊर पिहानी

 

मुदा पेट पर भऽर दै अनके

नहिं सभ बढ़ियाँ बुझिहेँ सूगा

एतबा धरि तॊँ करिहेँ सूगा ।

 

 

रे सॊना ! रे चानी !

सकल अनर्थक मूल एक तॊँ

एक अनीतिक खानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

जते महत्ता तॊर बढ़ै अछि

तते विश्व में सॊर बढ़ै अछि

डाकू चॊर मनुज बनि चाहय

पाइ कॊना हम तानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

तॊर पाछु पड़ि मनुज मत्त अछि

विधि-विधान सब किछु असत्त अछि

कॊनॊ पाप कर्म करबा में

नहिं किछु आनाकानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

लक्ष्य जीवनक एक पाइ अछि

मनुज गेल बनि तें कसाई अछि

दया धर्म सुविचार भेल अछि

गलि गलि संप्रति पानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

सॄष्टिक मूल धरातल नारी

यॊग जनिक मुद मंगलकारी

हत्या तनिक करै अछि

निर्मम पाइक लेल जुआनी

रे सॊना ! रे चानी !

 

देश दिशा दिस कॊनॊ ध्यान नहि

जन-आक्रॊशक लेल कान नहिं

काज तरहितर बनब कॊना हम

लगले राजा-रानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

अर्थक लेल अनर्थ करैये

पदक प्रतिष्ठा व्यर्थ करैये

सत्यक मुंह कय बंद पाइ सँ

करय अपन मनमानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

यश प्रतिपादक कॊनॊ काज नहिँ

अनुचित अर्जन, कॊनॊ लाज नहिँ

अर्थक महिमा तकर मंच पर

कीर्तिकथा सुनि कानी

रे सॊना ! रे चानी !

 

गगन अजिर घन आयल कारी


नभ पाटि कें प्रकृति कुमारी

पॊति-कचरि लेलनि कय कारी

वक समुदायक पथर खड़ी संऽ

लिखलनि वर्ण विल‌क्षण धारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

कतहु युद्ध दिनकर संऽ बजरल

पूब क्षितिज संऽ पश्चिम अविरल

अछि जाइत दौड़ल घन सैनिक

चढ़ि-चढ़ि नभ पथ पवन सवारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

लागल बरिसय मेघ झमाझम

बिजुरि भागय नाचि छमाछम

भेल गगन संऽ मिलन धरित्रिक

शॊक-शमन सभ विविध सुखकारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

कसगर वर्षा बड़ जल जूटल

बाधक आरि-धूर सभ टूटल

पॊखरि-झाखरि भरल लबालव

भरल कूप जल केर बखारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

दादुर वर्षा-गीत गवैये

झिंगुर-गण वीणा बजबैये

अंधकार मे खद्यॊतक दल

उड़ल फिरय जनु वारि दिवारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

मित्र मेघ संऽ मधुर समागम

भेल तते मन हर्षक आगम

चित्रित पंख पसारि नवैये

केकि केकारव उच्चारि

गगन अजिर घन आयल कारी

 

उपवन-कानन-तृण हरियायल

हरित खेत नव अंकुर आयल

हरित रंगसंऽ वसुधातल कें

रंङलक घन रंङरेज लगारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

थाल पानि संऽ पथ अछि पीड़ित

माल-मनुष्यक गॊबर मिश्रित

खद-खद पिलुआ गंध विगर्हित

गाम एखन नरकक अनुकारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

एखनहि रौद रहैय बड़ बढ़ियां

पसरल लगले घन ढन्ढनियां

एखनहिं झंझा उपसम लगले

पावस बड़ बहरुपिया भारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

काज न कॊनॊ बुलल फिरैये

मेघ अनेरे उड़ल फिरैये

मनुज-समाज जकां अछि पसरल

मेघहुं मे जनु बेकारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

एखनुक नेता जकां कतहु घन

झूठे किछु दै अछि आश्वासन

काजक जल नहि देत किसानक

निष्फल सभता काज-गुजारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

दूर क्षितिज घनश्याम सुझायल

इंद्र धनुष वनमाल बुझायल

विद्युत वल्लि नुकाइत राधा-

संग जेना छथि कृष्ण मुरारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

धूमिल नभ तल धूमिल आशा

सभतरि भाफक व्यापक वासा

उत्कट गुमकी गर्म भयंकर

व्याकुल-प्राण निखल नर-नारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

लागल टिपिर-टिपिर जल बरसय

कखनहुं झीसी कृश कण अतिशय

बदरी लधने मेघ कदाचित

रिमझिम-रिमझिम स्वर संचारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

कखनहुं सम्हरि जेना घन जूटल

बूझि पड़य नियरौने भूतल

बरिसय लागल अविरल धारा

गेला जेना बनि घन संहारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

निरवधि नीरद जल बरिसौलक

कृषक बंधु कें विकल बनौलक

खेत पथारक कॊन कथा बढ़ि

बाढ़ि डुबौलक घर घड़ारी

गगन अजिर घन आयल कारी

 

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...