Monday, March 23, 2009

RECESSION यानि मंदी

RECESSION यानि मंदी
मंदी जे नए कराबे...सुनए में बर आसान शब्द लागे ये मुदा बर खतरनाक शब्द छी इ RECESSION.
अमेरिकी आर्थिक मंदी (US recession) के असर भारत पर भी भ गेल आ धीरे-धीरे जटिल भा रहल ये । अखबार, न्युज चैनल (हिन्दी, अंग्रेजी) सब में अए सा जुरल न्युज के भरमार ये। अही कारण कतेक रास कंपनी सब बंद भ रहल ये, सब सा बेस छेाट कंपनी के मंदी झटका लागल ये। कतेक युवा छन में रेाजगार साँ बेरेाजगार भ गेल आ भ रहल ये, कतेक चुल्हा बंद हेाए के कगार पर ये, कतेक लाखपति धरातल पर आबि गेल ये । देश के अरबपति के कमाई पर मंदी जबरदस्त सेंध लगालक ये आ लगभग सब के संपत्ति में करीब 61 परसेंट तक के गिरावट आएल ये। रेाज कुनु नए कुनु कंपनी पींक स्लीप या रिलेाकेशन थमा रहल ये । सच पुछु ता हमरेा डर लागे ये, आए के समय में किछ भी भा सके ये अखन तक ता बिरला ग्रुप आ किछ ढंग के कंपनी एहि तरह के एकसन ने ल रहल ये लेकिन भबिस्य के नए पता। एही मामले में सरकारी नेाकरी बाला बृन्द सब ठीक अैछ ।

हमर दू टा कविता 1.नाव आ जीवन 2.मौनक शब्द -सतीश चन्द्र झा

1.नाव आ जीवन


नाव नदी मे चलल सोचि क’
दूर नदी के अंत जतय छै।
देखब आई ठहरि क’ किछु छण
नदी समुद्रक मिलन कतय छै।
छै संघर्ष क्षणिक चलतै जौ
जल धारा विपरीत दिशा मे।
चलब धैर्य सँ भेटत निश्चय
छै आनंद मधुर आशा मे।
कखनो अपने पवन थाकि क’
मंद भेल चुपचाप पलटतै।
फेक देब पतबार अपन ई
जल धारा के दिशा बदलतै।
छोट नाव के एतेक घृष्टता
सुनि क’ भेल नदी के विश्मय।
नाचि रहल अछि जल मे तृणवत
बुझा रहल छै जीवन अभिनय।
की बुझतै ई नाव नदी मे
जीवन पथ धारा अवरोधक।
केना चीर क’ निकलि जाइत अछि
नहि छै भय ओकरा हिलकोरक।
तेज धार छै प्राण नाव के
जीवन छै सागर अथाह जल।
नदी किनारक छाँह मृत्यु छै
जल विहीन जीवन के प्रतिपल।
नहि होइ छै किछु भय जीवन मे
मृत्यु देखि सोझा मे प्रतिक्षण।
अपने चलि क’ नाव मनुख के
सिखा रहल छै जीवन दर्शन।
क्रुद्ध नदी के जल प्रवाह मे
उतरि गेल जे ‘तकरे जीवन’।
भय संघर्ष,निराश,कष्ट सँ
ठहरि गेल ओ ‘जड़वत जीवन’।


2. मौनक शब्द


हेरा गेल अछि शब्द अपन किछु
तैं बैसल छी मौन ओढ़ि क’।
वाणी जड़वत, जिह्वा व्याकुल
के आनत ग’ ह्नदय कोरि क’।
के बूझत ई बात होइत छै
मौन शब्द,वाणी सँ घातक।
राति अमावश के बितला सँ
जेना इजोत विलक्षण प्रातक।
अछि सशक्त जीवन मे एखनो
ई अभिव्यक्तिक सुन्दर साध्न।
एकर चोट छै प्रखर-उचय अग्नि सन
शीतलता चंदन के चानन।
नहि छै आदि -उचयअंत मे समटल
अंतर मे विश्राम वास छै।
आनंदक अतिरेक ह्नदय मे
नव अनुभूतिक महाकाश छै।
अछि अव्यक्त मौन अक्षर सँ
ज्ञान दीप के प्रभा प्रकाशित
दृष्टिबोध् सँ दूर मौन अछि
शब्द अर्थ सँ अपरिभाषित।
वाणी अछि ठहराव झील के
मौन नदी के निश्छल धार।
उठा देत हिलकोर हृदय मे
जखने बान्हब धार किनार।
छै संगीत मधुर स्वर झंकृत
नै छै अर्थ मौन के जड़ता।
कोलाहल सँ दूर मौन के
वाणी सँ छै तिव्र मुखरता।
कतेक विवस अछि शब्द जगत के
वर्तमान के व्यथा देखि क’।
असमर्थ अछि सत् चित्राण मे
की लिखू हम शब्द जोड़ि क’।

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

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