Sunday, March 22, 2009

जागू आब -रूपेश कुमार झा 'त्योंथ'

एक दू दिस कें कहय,
चारू दिस अन्हार अछि ।
मूर्ख अछि गद्दी पर बैसल ,
पढ़ल-लिखल बेकार अछि ।
जतय देखू मारि - फसाद ,
होइत लूट - पाटक काज अछि ।
विकास त' सपनेहुँ नहि देखू ,
शैतानक भेल राज अछि ।
हिंसा आ बेईमानी केर ,
भेल सउँसे आधिपत्य अछि ।
आजुक गाँधी-नेहरू सभ,
बजैत खाली असत्य अछि ।
एम्हर, ओम्हर, जेम्हर देखू ,
दानव करैत किलोल अछि।
उजरा खादी कुरता पाछा,
दबल बहुत रस पोल अछि ।
बन्न पडल अछि बुद्धिक ताला,
मूर्खक शासन ई लोकतंत्र अछि।
फुइस फसाद अछि फुला रहल ,
ई लोकतंत्रक मूल मंत्र अछि ।
नवक्रान्तिक छथि मांग करैत भू ,
सबहक मति आइ मारल अछि ।
सत्य अहिंसा आइ काल्हि,
एहि समाज सं बारल अछि ।

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

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