Friday, March 20, 2009

कुंडलिया- आशीष अनचिन्हार

कोनो समय मे हम कुंडलिया लिखैत रहियैक। गजलक फेर मे ओकरा बिसरि गेलियैक। आब मात्रा सही नहि बसि रहल छैक।मुदा तैओ हम दोहरा रहल छी। आशा अछि जे सुधी पाठक मात्राक गलती के बिसरि रसास्वादन करताह। हमर अन्य गजल के लेल देखू---anchinharakharkolkata.blogspot.com
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कुंडलिया

डेग-डेग पर छाल्ही भेटै डेग-डेग पर गूँह
लूझए बला लुझबे करतै जकर जेहन मूँह

जकर जेहन मूँह धोधि पोन बेसी अछि चतरल
प्राण मुदा अछि टूटल फूटल काटल कतरल

कह अनचिन्हार कविराय एहने छैक संसारक रीति
सगरो दुनिया बजि रहल स्वार्थक गीति

'विदेह' २२४ म अंक १५ अप्रैल २०१७ (वर्ष १० मास ११२ अंक २२४)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -    मैथिलानी केर उपराग राम सं आ समाज ...