Saturday, March 14, 2009

मैथिल रंग बरसे (यू.एस. मे मैथिलक होली) - विद्या मिश्र



हमर सभक एहि बेरक होली हमर घरमे मनाओल गेल...25-30 टा परिवार रहथि। सभ मैथिल रहथि जाहिमे प्रोफेसर हरिमोहन झाक नाति आ डॉ. रमा झाक पुत्र प्रतीक झा सेहो रहथि, ओ हमरा सभक न्ईक मित्र सेहो छथि। हमर सभक प्रयास रहैत अछि पाबनि-तिहारकेँ पारम्परिक रूपमे मनेबाक जाहिसँ अगिला पीढ़ीक बच्चा एकर अनुकरण कए सकए, अनुभव क’ सकए आ अर्थ बुझि सकए।
पछिला साल सभ बच्चा सभ अपन लिखल नाटक हिरण्यकश्यप/ होलिकाक मंचन कएने रहथि। कमसँ कम हुनकासभकेँ होली पाबनि कोना आ किएक मनाओल जाइत अछि तकर पूर्ण ज्ञान छन्हि। किएक हम सभ रंग लगबैत छी आ गरा मिलै,प्त छी, पारम्परिक खानपान आ होली गीत..सभटा।
मैथिल लोकनि भाग लेबाक लेल न्यू जर्सी, विर्जिनिया, वासिंगटन डी.सी आ मेरीलेण्ड सँ अएलाह, से 4-5 गोट स्टेट्स मैथिल रहथि। एहि बेर सभसँ नीक उत्तर प्रतियोगिता रहए, सर्वोत्तम ड्रेस-समन्वय आ पार्सल देबाक प्रतियोगिता रहए आ एहि सभमे मिथिला संस्कृतिसँ सम्बन्धित गहन प्रश्न रहए।सर्वोत्तम उत्तरक लेल हम सभटा उत्तर पढ़लहुँ आ तखन वोट देलहुँ??? सभ गोटे एहि अवसरक लेल बड्ड उत्साहित रहथि आ एहि अवसरक प्रति उत्सुक सेहो। एतए यू.एस.ए. मे बसंतक छुट्टी रहैत अछि से स्कूल कॉलेजक बच्चा सभ अएलाह आ एहि पारम्परिक होली उत्सवमे भाग लेलन्हि...आ हुनका ई एतेक नीक लगलन्हि जे अगिला बरिख सेहो एहिमे सम्मिलित होएबाक सोचलन्हि.... आ अंतिममे होलीक आशीर्वचन हमर लिखल।

माय (कविता) -मनीष झा "बौआभाई"

माय (कविता)

मनीष झा "बौआभाई"

एक-एक क्षण जे बेटा के खातिर
कर जोड़ि विनती करैइयै माय
बिनु अन्न-जल ग्रहण केने बेटा लै
जितियाक व्रत राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


जिन्दगीक रौदा में तपि क'
बेटा के छाहड़ि दैइयै माय
बरखा-बिहाड़ि सन विषम समय में
आँचर स' झाँपि राखैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


घर में छोट-छिन बात पर में
बाप स' लड़ि लैइयै माय
बाप स' लड़ि बेटा के पक्ष में
फैसला करैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


बेटा नै जा धरि घर आबय
बाट टुकटुक ताकैइयै माय
ओठंगि के चौकठि लागि बैसल
राति भरि जागैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


वयस कियैक नै हुऐ पचासक
तहियो बौआ कहैइयै माय
अहू वयस में नज़रि ने लागय
तैं अपने स' निहुछैइयै माय
आ एहि तरहें माय हेबाक
कर्त्तव्य पूरा करैइयै माय


होय जानकी वा अम्बे के प्रतिमा
सभ रूप में झलकैइयै माय
तीर्थ-बर्थ सब मन के भ्रम छी
घर में जे' कुहरैइयै माय
कर्त्तव्य हमरो ई कहैइयै
घर में नै कलपय ई माय
आ एहि तरहें जन्म देल त'
माय के पद पाबय ई माय

ईक्कसवी सदीक फगुआ- दयाकान्त


ईक्कसवी सदीक फगुआ
ऋतु बसन्त के भेल प्रवेष
जाड़क नहि आब कोनो कलेष
मज्जर से गमकैत अछि आम
गाबै फगुआ सब बैस दलान
कियो मारै ढोल पर हाथ
किया दैत जोगिराक साथ
निकलैत जखन षिव के झांकी
बचैत नहि छल ककरो खांखी
मायक हाथक मलपुआक स्वाद
अबैत अखनो फगुआ मे याद
ब्रह्मस्थन में जमै छल टोली
भड़ल रहै छल भांगक झोली
भौजी हाथक रंग गुलाल
बजबैत जखन खुषीसॅ ’लाल’
सबकिया रंग में सराबोर
राग द्वेस सब भेल बिभोर
ईक्कसवी सदीक फगुआक हाल
केने अछि बड़ आई बबाल
नहि निकलैत आब रंगक झोली
एसएमएस से सब हैप्पी होली
आईटी में नव रंगक खेल
घरे से सब भेजैत ई-मेल
दु-चारि टा चित्र कट पेस्ट
नहि करैत छथि समय वेस्ट
नहि निकलैत भांगक डोल
दारू पी सब करै किलोल
बाजै सबतरि अस्लील सीडी
दुर भागै फगुआसॅ नव पीढी
आधुनिकताक दौर में हम
कयल महात्म फगुआक कम


दयाकान्त
ग्राम$पोस्ट ः नरूआर, झंझारपुर, मधुबनी (बिहार)

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...