Monday, March 09, 2009

एही बेर फागुन मे

एही बेर फागुन में,
मचाऊ ऐहेन धमाल बउवा ,
पाबैन मोन रहे सबके,
किछ ऐहेन करू कमाल बउवा॥

छोडू रंग -भंग स परहेज़ ,
घोरि दियौ , पोखैर ताल बउवा,
युग बीतल नहीं खेल्लेलौं ,
अपने सब गोबर थाल बउवा॥

तोडू टेप रेकाडर, आ घेंट दबाऊ बाजा के,
एही बेर ता ठोकू जोगीरा के ताल बउवा
रंग-अबीर के छिट्टा सं भरी दियौ घर अंगना,
ततेक पक्का हुए रंग , मिटाई नै भैर साल बउवा॥

जोगी नाचत, जोगनिया नाचत,
मदमस्त भ का नचता लाल बउवा,
अहेन रंग से खेलु एही बेर,
सब कियो भ जाय नेहाल बउवा...

समस्त मिथिलांचल के फगुआ के शुभकामना, सत्ते अहाँ सब बड मोन पडैत छी

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...