Thursday, January 29, 2009

चारि टा पद्य


१.
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाइ

मुँह चोकटल नाम छन्हि हँसमुख भाइ,
बहुत दिनसँ छी आयल करू कोनो उपाय,
मारि तरहक डॉक्युमेंट देलन्हि देखाय,
पुनः-प्रात भऽ जायत देल नीक जेकाँ बुझाय,
शॉर्ट-कट रस्ता सुझाय देलन्हि मुस्काय,
मुँह चोकटल नाम हँसमुख भाय।

२.
काल्हि भोरे उठि ऑफिस जाइत छी,
आऽ साँझ घुरि खाय सुतैत छी।
कतेक रास काज अछि छुटैत,
अनठाबैत असकताइत मोन मसोसैत।
जखन जाइत छी छुट्टीमे गाम,
आत्ममंथनक भेटैत अछि विराम।
पबैत छी ढ़ेर रास उपराग,
तखन बनबैत छी एकटा प्रोग्राम।
कागजक पन्ना पर नव राग,
विलम्बक बादक हृदयक संग्राम।
चलैत छल बिना तारतम्यक,
बिना उद्देश्यक-विधेयक।
कनेक सोचि लेल,
छुट्टीमे जाय गाम।
विलम्बक अछि नहि कोनो स्थान,
फुर्तिगर, साकांक्ष भेलहुँ आइ,
जे सोचल कएल, नित चलल,
जीवनक सुर भेटल आब जाय।
३.
चित्रपतङ्ग
उड़ैत ई गुड्डी,
हमर मत्त्वाकांक्षा जेकाँ,
लागल मंझा बूकल शीसाक,
जेना प्रतियोगीक कागज-कलम।
कटल चित्रपतङ्ग,
देखबैत अछि वास्तविकताक धरा।
जतयसँ शुरू ओतहि खत्म,
मुदा बीच उड़ानक छोड़ैत अछि स्मृति,
उठैत काल स्वर्गक आऽ,
खसैत काल नरकक अनुभूति।


४.स्मृति-भय
शहरक नागरिक कोलाहलमे,
बिसरि गेलहुँ कतेक रास स्मृति,
आऽ एकरा संग लागल भय,
भयाक्रांत शिष्यत्व-समाजीकरणक।
समयाभाव,आऽ कि फूसियाहिंक व्यस्तता,
स्मृति भय आऽ कि हारि मानब,
समस्यासँ, आऽ भय जायब,
स्मृतिसँ दूर, भयसँ दूर,
सामाजिकरणसँ दूर - खाँटी पारिवारिक।

मुदा फेर भेटल अछि समय,युगक बाद,
बच्चा नहि, भऽ गेलहुँ पैघ;
फेरसँ उठेलहुँ करचीक कलम,
लिखबाक हेतु लिखना,मुदा
दवातमे सुखायल अछि रोशनाइ,
युग बीतल, स्मृति बिसरल, भेलहुँ एकाकी।


सहस्त्रबाढ़नि जेकाँ दानवाकार,
घटनाक्रमक जंजाल, फूलि गेल साँस,
हड़बड़ाकऽ उठलहुँ हम,
आबि गेल हँसी, स्वप्नानुशासन,
लटपटाकेँ खसलहुँ नहि, धपाक;
भ’ गेलहुँ अछि पैघ।
बच्चामे कहाँ छल स्वप्नानुशासन,
खसैत छलहुँ आऽ उठैत छलहुँ,
शोनितसँ शोनितामे भेल,
उठिकय होइत घामे-पसीने नहायल,
स्मृति-भयक छोड़ नहि भेटल,
ब्रह्मांडक कोलाहल, गुरुत्वसँ बान्हल,
चक्कर कटैत, करोड़क-करोड़मील दूर सूर्य,
आऽ तकर पार कैकटा सूर्य।
के छी सभक कर्ता-धर्ता,
आऽ जौं अछि क्यो, तऽ ओकर
निर्माता अछि के? ओह! नहि भेटल छोड़।
लेलहुँ निर्णय पढ़िकेँ दर्शन,
नहि करब चिन्तन, तोड़ल कलम,
करची आऽ दवात।

के छी ई सहस्त्रबाढ़नि,
घूमि रहल अछि एकटा परिधिमे,
शापित दानव आकि कोनो ऋषि,
ताकैत छोड़ समस्याक,
आऽ समस्यातँ वैह,
के ककर निर्माता आऽ तकर कतय अंतिम छोड़,
के ककड़ स्वामी आऽ सभक स्वामी के?
आऽ तकरो के अछि स्वामी!
भेटल स्वप्नानुशासन,
टूटल शब्दानुशासन,
तकबाक अछि समाधान,
फेर गेलहुँ स्वप्नमे लटपटाय,
खसब नहि धपाक,
तकबाक अछि छोड़।
शंका-समाधान लग,
डगमग होमय लागल अपना पर विश्वास।
जेना कोनो भय, कोनो अनिष्ट,
बढ़ा देलक छातीक धरधरी,
आकि नेनत्वक पुनरावृत्ति!
जन्म-जन्मांतरक रहस्य,
आत्माक डोरी? आकि किण्वन आऽ विज्ञान केलक सृष्टिक निर्माण!
पीयूष आऽ विषक संकल्पना,
स्वाद तीत, कषाय,
क्षार, अम्ल कटु की मधुर!
खाली बोनमे उठैत स्वर,
षडज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद!
खोजमे निकलि गेलथि अत्रि, अंगिरा, मरीचि, संग लेने पुलऋतु, पुलस्त्य आऽ वशिष्ठ।
प्राप्त करबा लेल अष्टसिद्धि अण्मिक, महिमाक, गरिमाक, लघिमाक, प्राप्तिक,
प्राकाम्यक, ईशित्व आकि वशित्व, सप्तऋषिक अष्टसिद्धि।
नौ निधिक खोज- पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुन्द, कुन्द, नील आऽ खर्व, बनल आधार दशावतारक। मत्स्यावतार बचेलन्हि वेद, सप्तर्षिकेँ, आऽ संगे मनुक परिवार।
कूर्मावतार संग मंदार-मेरु आऽ वासुक व्याल,
आनल सुधा-भंडार।
वाराहावतार आनल पृथ्वीकेँ बाहर,
चारि अंबुनिधिक कठोर छल जे पाश, मारल हिरण्याक्ष।
नरसिंह भगवान बचाओल प्रह्लाद, मारिकय हिरण्यकश्यप,
वामन मारल बालि नापल, दू पगमे पृथ्वी आऽ तेसरमे दैत्यराज।
परशुराम, राम आऽ कृष्ण;
केलन्हि असुरक संहार,
आऽ बुद्ध बदललन्हि तकर विचार।
तैं की जे हुनक प्रतिमा, खसौलक देवदत्तक संतान।
छिः। क्यो रोकि नहि सकल बामियान।
नहि कल्कि नहि मैत्रेय, जल्दीसँ आऊ श्वेत-सैंधव सवारि,
चौदह भुवन आऽ तेरह विश्वक, अनबा युग- कलधौत।
अर्णवक कोलाहलमे जाय छल, नेनत्व डराय।
मुदा अखन विज्ञान टोकलक मोन, ई तँ अछि किण्वनक सिद्धांत।
दशावतारे तँ छथि, उत्पत्तिक आधुनिक सिद्धांत।
मत्स्य, कूर्म, तखन वाराह, फेर नरसिंह, तखन वामन।
एकसँ दोसर कड़ी मनुष्यक रंग-रूपक,
ताकय लेल छल निकलल।
दऽ देलन्हि अवतारक नाम,
भरत-तनय रोकलन्हि वैज्ञानिक सोच,
कड़ी गेल टूटि, ताकयमे कल्कि,
ओऽ ताहि द्वारे तँ नहि एलाह मैत्रेय।
लागि रहल अछि भेटल सूत्रक ओर आर,
फूसिये छलहुँ डरायल करब षोडषोपचार।
वेद, पुराण, महाभारत,रामायण,अर्थशास्त्र ओ,
आर्यभट्टीय,लीलावती, भामती,राजनीति,गणित,भौतिकी केर समग्र चरित्र।
कर्मक शिक्षा गेल ऊधियाय, विहारिमे अंधविश्वासक।
दर्शन भेल जतय अनुत्तरित, आऽ विज्ञान देलक किछु समाधान,
तँ पकरब छोर एकर गुरुवर, जे केलक समस्या दूर।
एकर परिधि भने अछि छोट,यदि परिधि करब पैघ,
तँ फेर बदलताह दर्शनक कांट्रेक्टर, दर्शनकेँ धर्ममे आऽ धर्मकेँ
नरक-स्वर्गक प्रकार-प्रकारंतरमे।

भौतिकी आऽ एस्ट्रोनोमीकेँ बनेलथि एस्ट्रॉलोजी

विज्ञान बनल अंधविश्वास।

जखन नेति-नेति बनत उत्तर।
तखन भने रहय दियौक प्रश्ने अनुत्तरित।
सभ गेलथि आगू, मुदा भरत-तनय छथि पाछू।
लीलावतीयोमे, भानुमतीयोमे कोना तकताह जातिगत भेद,
एकलव्यक प्रशंसामे व्यासजीक लेख मुदा कार्य नहि क्यो बढ़ेलक आगू।
सहस्त्राब्दीक अंतराल देलक जातिगत करताल।
विज्ञान आऽ कला,भूख आऽ अन्न;
भेलाह जातिगत छोड़ताह की स्वाछन्न।
यादि पड़ल गामक भोज,
ब्राह्मण आऽ शोलहकन्हक फराक पाँति,
पहिल पाँतिमे खाजा-लड्डू परसन पर परसन,
दोसर पाँतिमे एक्के बेर देल।
रोकल कला-विज्ञानक भागीरथीक धार,
भेटल राहूक ग्रास। मोन पड़ैछ पिताक श्राद्धकर्म,
भरि दिन कंटाहा ब्राह्मणक अत्याचार,
आऽ साँझमे गरुड़ पुराणक मारि।
सौर-विज्ञानक रूपांतर आऽ ग्रहणक कलन,
दक्षिणाक हेतु भेल कलुषित।
रक्षा-विज्ञानक रामायणक पाठ,
कखन सिखेलक भीरुताक अध्यात्म।
ब्यासजीक कर्ण-एकलव्य-कृष्णक पाठ सामाजिक समरसताक;
अखनहु धरि अछि जीवंत, नहि भेल खतम;
दू-सहस्त्राब्दी पहिनेक उदारवादी सोच;
सुखायल किएक विद्या,
सरस्वती-धार जेकाँ भेल अदिन;
तखनहि जखन विद्या-देवी छोड़लन्हि,
सुखा गेलीह बिन पानिक बिन बुद्धिक।
फेर अओतीह कि घुरि कए बदलि भेष,
एतय, हम्मर भारत देश?
हजार बर्षक घोँघाउज, कि होयत बंद?
आकि एकलव्य-कर्ण-कृष्णक पाठ छोड़ि,
युधिष्ठिर-शकुनिक एक्का-दुक्का-पंजा-छक्काक पढ़ब पाठ।
कच्चा बारहकेँ शकुनि बदलताह पक्का बारहमे,
आऽ करताह अपन पौ-बारह।
तीनटा पासा आऽ चारि रंगक सोरे-भरि गोटी,
करत भाग्यक निर्माण?
चौपड़क चारि फड़ आऽ एक फड़मे चौबीस घर,
की ई फोड़त भारतक घर?
युधिष्ठिर जौं भेटताह तँ कहितियन्हि,
जे चारि लोकक सोझ खेला पासाक,
खेलयतहुँ जकर नियम होइछ हल्लुक।
दू व्यक्तिक रंगबाजी खेलकेँ अहाँ ओझरेलहुँ,
खेला खेलक संग नहि वरन खेलेलहुँ देश आऽ पत्नीक संग।
तैं दैत छी हम ई उपराग,
शकुनियोसँ पैघ कैल अहँ अपराध।
जकरे नाम लालछड़ी सैह चलि आबय ठोकर मारि पड़ाय,
सतघरिया; ती-ती –तीतार तार मेना बच्चा अंडा पार;
बच्चामे खेलाय छलहुँ आमक मासमे ई खेला;
पासाक खेल सेहो खेलेलहुँ द्विरागमनक बाद भड़फोड़ी तक कनियाक संग।
वासर-रैन हे युधिष्ठिर-रूपी भरत-तनय नहि खेलाऊ ई खेल,
सभकेँ दियऽ ई शिक्षा, दिअऊ संगीतक मेल;
स्मृति भय तोड़ल सुर,
दियह सुमति वर हे अय गोसाञुनि,
गाबि सकी हम गीत।
कज्जल रूप तुअ काली कहिअए,
मात्र ईएह नहि सत्य हे मीत,
उज्जल रूप तुअ वाणी कहिअए;
सएह होयत हमर परिणीत।
झम्पि बादर दूर भेल भय,
गगन गरजि उठेलक हुतासन कए,
हृदय मध्य बाउग कए,
मौलि-मउल छाउर दए।
शंख-फूकब वीर रससँ,
करब शुरु भय-भंजन;
स्मृति-स्वप्नक दंडसँ,
खनहि तोड़ब खन-खन,
करब मंथन।
सागर-द्वारि पर आनब भुजदंडसँ,
गामक दूटा पाँतिक भोजनक आस्वादन।
खोलब बंद बुद्धि-विवेक,
रुण्डमालमसानीसँ,
तोड़ब पाँति नहितँ करब नगरकेँ पलायन।
गाम गाम रहत नहितँ,
डुबायब भागीरथीक धारसँ;
जे रोकलथि एकर धार प्रलय-सन,
डूबताह-डूबेताह दू पाँतिबला गामकेँ अपन कुकर्मसँ।
भेल भूमि विलास कानन,
निविल बोन विहसि आनल;
कण्टक मध्य कुसुम विकल छल,
दर्शन-घोषनि-ब्राह्मण ओझरल।
धरणि विखिन छल,
गंगा-तनु झामर,
नहि कल-कल।
विज्ञान गणितक कोमल-गल,
अभाग्य तापिनि केलक छल।
बुद्धक नगर बसायब हम भल,
अहाँ देव रहब स्वर्ग करि-केलि,
गामक लोकहि बजायब ठाम,
सोंपलि गाम, पाँति तोहाऊ,
चलब दर्शन- अद्वैत मोहाऊ,
गामेमे रहब हम मीत,
गायब नव-दर्शनक गीत।
अपन दर्शनक लेल जे देलक,
अहाँकेँ गामक वनवास,
लेब तकर बदला हम जा कय,
कष्ट सहब देब अहाँकेँ निसास।
अपन दर्शनक लेल,
दुइ सहस्त्राब्दिक खेल खेलेलन्हि जे,
तनिकर गामक स्वरूप हम करब कानन,
बुद्धक नगर बनेलन्हि जे कण्टक,
कुसुम ततय आनब, हम आनब।
सयमे दूटा दर्शनलेल फाजिल,
पासा फेकब सहस्त्राब्दीक चौपड़ चारि युग पर,
जे अज्ञात तकरो ताकब हम तात,
परञ्च जे ज्ञात,
तकर तऽ करए दिअ हिसाब-किताब।

विद्यापतिक बिदेसिया (संकल्पित नाटिका)

भोजपुरीक साहित्य मैथिलीसँ कम समृद्ध अछि मुदा से अछि मात्र परिमाणमे, गुणवत्ताक दृष्टिमे ई कतेक क्षेत्रमे आगाँ अछि। भोजपुरीक भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक सन्दर्भमे हम ई कहि रहल छी। भिखाड़ी ठाकुर कलकत्तामे प्रवासी रहथि, घुरि कय अयलाह आऽ भोजपुर क्षेत्रमे अपन कष्टक वर्णन जाहि मर्मस्पर्शी रूपसँ गामे-गामे घुमि कय आऽ गाबि कय सुनओलन्हि से बनल बिदेसिया नाटक। मिथिलामे प्रवास आजुक घटना छी, गामक-गाम सुन्न भऽ गेल अछि। मिथिलाक बिदेसिया लोकनि देशक कोन-कोनमे पसरि गेल छथि। मुदा पहिने भोजपुर इलाका जेकाँ प्रवासक घटना मिथिलामे नहि छल। प्रवास मोरंग धरि सीमित छल जे नेपालक मिथिलांचल क्षेत्र अछि। आऽ ताहिसँ मैथिलीमे लोकगाथाक सूक्ष्म विवरणक बड़ अभाव, जे अछियो से लोकगाथा नायकक विवरण नहि वरन महाकाव्यक नायकक मैथिलीमे विवरण जेकाँ अछि आऽ बोझिल अछि, भिखाड़ी ठाकुरक बिदेसियाक जोड़ नहि। सलहेसक कथाक विवरण लिअ, क्षेत्रीय परिधि पार करिते सलहेस राजासँ चोर बनि जाइत छथि आऽ चोरसँ राजा। तहिना चूहड़मल क्षेत्रीय परिधि पार करिते जतए सलहेस राजा बनैत छथि ओतय चोर बनि जाइत छथि आऽ जतय सलहेस चोर कहल जाइत छथि ओतुक्का राजाक/ शक्तिशालीक रूपेँ जानल जाइत छथि। मुदा एहि सभपर कोनो शोध नहि भए सकल अछि। एहि क्रममे विद्यापतिक पदावलीक पद सभमे तकैत हमरा समक्ष विभिन्न प्रकारक गीत सभ सोझाँमे आयल। एहिमे जे अधिकांश छल से रहय प्रेमी-प्रेमिकाक विरहक विवरण करैत अछि आऽ बिदेसियाक जे मूल कनसेप्ट अछि- रोजी-रोटी आऽ आजीविका लेल मोन-मारि कय प्रवास, ताहिसँ फराक अछि। तखन जाऽ कय हमरा सात टा विशुद्ध बिदेसिया जकरा विद्यापति पिआ-देशाँतर कहैत छथि भेटल। एहिमे स्वाभाविक रूपेँ ६ टा विद्यापतिक नेपाल पदावलीसँ भेटल, आऽ एकटा नगेन्द्रनाथ गुप्तक संग्रीहीत पदावलीसँ।

विद्यापतिक पिआ देशाँतर
दृश्य १
स्टेजपर हमर बिदेसिया बिदेस नोकरीक लेल बिदा होइत छथि आऽ जुवती गबैत छथि- गीतक बीचमे एकटा पथिक अबैत छथि आऽ मंचक दोसर छोड़पर चोर लोकनि धपाइत नुकायल छथि। मंचक दोसर छोड़पर कोतवाल आऽ शुभ्र धोतीधारी पेटपर हाथ देने निफिकिर बैसल छथि।
धनछी रागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
हम जुवती, पति गेलाह बिदेस। लग नहि बसए पड़उसिहु लेस।
हम युवती छी आऽ हमर पति बिदेस गेल छथि। लगमे पड़ोसीक कोनो अवशेष नहि अछि।

सासु ननन्द किछुआओ नहि जान। आँखि रतौन्धी, सुनए न कान।
सास आऽ ननदि सेहो किछु नहि बुझैत छथि। हुनकर सभक आँखिमे रतौँधी छन्हि आऽ ओऽ सभ कानसँ सेहो किछु नहि सुनैत छथि।

जागह पथिक, जाह जनु भोर। राति अन्धार, गाम बड़ चोर।
हे पथिक! निन्नकेँ त्यागू। काल्हि भोरमे नहि आऊ। अन्हरिया राति अछि आऽ गाममे बड्ड चोर सभ अछि।

सपनेहु भाओर न देअ कोटबार। पओलेहु लोते न करए बिचार।
कोतबाल स्वनहुमे पहड़ा नहि दैत अछि आऽ नोत देलोपर विचार नहि करैत अछि।

नृप इथि काहु करथि नहि साति।
पुरख महत सब हमर सजाति॥
ताहि द्वारे राजा ककरो दण्ड नहि दैत छथि आऽ सभटा पैघ लोक एके रंग छथि।

विद्यापति कवि एह रस गाब। उकुतिहि भाव जनाब।
विद्यापति कवि ई रस गबैत छथि। उकतीसँ भाव जना रहलीह अछि।

विद्यापति कविक प्रवेश होइत छन्हि। कोतवालक लग शुभ्र-धोतीधारी आऽ एकटा गरीबक आगमन होइत अछि। कोतवाल आभाससँ धोतीधारीक पक्षमे निर्णय सुनबैत छथि आऽ मंचक दोसर कोनपर बैसलि जुवती माथ पिटैत छथि। गीतक अन्तिम चारि पाँती विद्यापति कवि गबैत छथि।

दृश्य २
जुवती एकटा दोकान खोलने छथि, सांकेतिक। मंचक दोसर छोरसँ सासु आऽ ननदिकेँ जएबाक आऽ क्रेता पथिकक अयबाक संग युवती गेनाई शुरू करैत छथि आऽ सभ पाँतिक बाद विद्यापति मंचपर अबैत छथि अर्थ कहैत छथि आऽ अंधकारमे विलीन भऽ जाइत छथि। मुदा अन्तिम पाँती विद्यापति गबैत छथि आऽ जुवती ओकर अर्थ बँचैत छथि।
मालवरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
बड़ि जुड़ि एहि तरुक छाहरि, ठामे ठामे बस गाम।
एहि गाछक छाह बड्ड शीतल अछि। ठामे-ठाम गाम बसल अछि।
हम एकसरि, पिआ देसाँतर, नहि दुरजन नाम।
हम असगरि छी, प्रिय परदेसमे छथि, कतहु दुर्जनक नाम नहि अछि।

पथिक हे, एथा लेह बिसराम। हे पथिक! एतय विश्राम करू।
जत बेसाहब किछु न महघ, सबे मिल एहि ठाम।
जे किछु कीनब, किछुओ महग नहि। सभ किछु एतय भेटत।
सासु नहि घर, पर परिजन ननन्द सहजे भोरि।
घरमे सासु नहि छथि, परिजन दूरमे छथि आऽ ननदि स्वभावसँ सरल छथि।
एतहु पथिक विमुख जाएब तबे अनाइति मोरि।
एतेक रहितो जे अहाँ विमुख भय जायब तँ आब हमर सक्क नहि अछि।
भन विद्यापति सुन तञे जुवती जे पुर परक आस।
विद्यापति कहैत छथि- हे युवती! सुनू जे अहाँ दोसराक आस पूरा करैत छी।

दृश्य ३
एहि गीतमे विद्यापति नहि छथि। जुवतीक ननदि पथिककेँ दबाड़ि रहल छथि, से देखि जुवतीकेँ अपन पिआ देशाँतर मोन परि जाइत छन्हि। ओ ननदि आऽ सखीकेँ सम्बोधित कय गीत गबैत छथि। गीतक अर्थ सखी कहैत छथि, सभ पाँतीक बाद।
धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-

परतह परदेस, परहिक आस। विमुख न करिअ, अबस दिस बास।
परदेसमे नित्य दोसराक आस रहैत अछि। से ककरो विमुख नहि करबाक चाही। अवश्य वास देबाक चाही।

एतहि जानिअ सखि पिअतम-कथा।
हे सखी! प्रियतमक लेल एतबी कथा बुझू।
भल मन्द नन्दन हे मने अनुमानि। पथिककेँ न बोलिअ टूटलि बानि।
हे ननदि! मोनमे नीक-अधलाहक अनुमान कऽ पथिककेँ टूटल गप नहि बाजू।

चरन-पखारन, आसन-दान। मधुरहु वचने करिअ समधान।
चरण पखारू, आसन दियौक आऽ मधुर वचन कहि सान्त्वना दियन्हि।

ए सखि अनुचित एते दुर जाए। आओर करिअ जत अधिक बड़ाइ।
हे सखी पथिक एतयसँ दूर जायत से अनुचित से ओकर आर बड़ाई करू।

दृश्य ४
जुवती आ ननदि नगर आबि ठौर धेने छथि। एकटा पथिक आबि आश्रय मँगैत छथि तँ जुवती गबैत छथि आऽ ननदि सभ पाँतीक बाद अर्थ कहैत छथि। बीचमे चारि पाँती बिना अर्थक नेपथ्यसँ अबैत अछि। फेर जुवती आगाँ गबैत छथि आ ननदि अर्थ बजैत छथि। अन्तमे अन्तिम दू पाँती विद्यापति आबि गबैत छथि। दृश्यक अन्तमे ननदि कहैत छथि जे हम जे ओहि दिन पथिककेँ दबाड़ि रहल छलहुँ से अहाँकेँ नीक नहि लागल रहए, मुदा आइ पथिककेँ आश्रय किएक नहि देलियैक।
कोलाररागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
हम एकसरि, पिअतम नहि गाम। तेँ मोहि तरतम देइते ठाम।
हम एकसरि छी आऽ प्रियतम गाममे नहि छथि। ताहि द्वारे राति बिताबए लेल कहाबामे हमरा तारतम्य भऽ रहल अछि।
अनतहु कतहु देअइतहुँ बास। दोसर न देखिअ पड़ओसिओ पास।
यदि क्यो लगमे रहितथि तँ दोसर ठाम कतहु बास देखा दैतहुँ।

छमह हे पथिक, करिअ हमे काह। बास नगर भमि अनतह चाह।
हे पथिक क्षमा करू आऽ जाऊ आऽ नगरमे कतहु बास ताकू।

आँतर पाँतर, साँझक बेरि। परदेस बसिअ अनाइति हेरि।
बीचमे प्रान्तर अछि सन्ध्याक समय अछि आऽ परदेसमे भविष्यकेँ सोचैत काज करबाक चाही।


मोरा मन हे खनहि खन भाँग। जौवन गोपब कत मनसिज जाग।
चल चल पथिक करिअ प... काह। वास नगर भमि अनतहु चाह।
सात पच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसान्तर आन्तर भेल।
बारह वर्ष अवधि कए गेल। चारि वर्ष तन्हि गेला भेल।

घोर पयोधर जामिनि भेद। जे करतब ता करह परिछेद।
भयाओन मेघ अछि, रतुका गप छी सोचि कए निर्णय करू।

भनइ विद्यापति नागरि-रीति। व्याज-वचने उपजाब पिरीति।
विद्यापति कहैत छथि, ई नगरक रीति अछि जे कटु वचनसँ प्रीति अनैत अछि।

दृश्य ५
अहू दृश्यमे विद्यापति नहि छथि। एकटा पथिक अबैत छथि मुदा सासु-ननदि ककरो नहि देखि बास करबासँ संकोचवश मना कय आगाँ बढ़ि जाइत छथि। जुवती गबैत छथि।
घनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
उचित बसए मोर मनमथ चोर। चेरिआ बुढ़िआ करए अगोर।
कामदेव रूपी चोरक लेल हमर अवस्था ठीक अछि। बुढ़िया चेरी पहरा दऽ रहल छथि।

बारह बरख अवधि कए गेल। चारि बरख तन्हि गेलाँ भेल।
बारहम बरखक रही तखन ओऽ गेलाह आऽ आब चारि बर्ख तकर भऽ गेल।

बास चाहैत होअ पथिकहु लाज। सासु ननन्द नहि अछए समाज।
सास आऽ ननदि क्यो संग नहि छथि आऽ पथिक सेहो डेरा देबासँ लजाइत छथि।

सात पाँच घर तन्हि सजि देल। पिआ देसाँतर आँतर भेल।
ओऽ कामदेव लेल घर सजा कय देशान्तर चलि गेलाह आऽ हमरा सभक बीचमे अन्तर आबि गेल।

पड़ेओस वास जोएनसत भेल। थाने थाने अवयव सबे गेल।
पड़ोसक बास जेना सय योजनक भऽ गेल सभ सर-सम्बन्धी जतय ततय चलि गेलाह।

नुकाबिअ तिमिरक सान्धि। पड़उसिनि देअए फड़की बान्धि।
लोकक समूह अन्हारमे विलीन भऽ गेल, पड़ोसिन फाटकि बन्न कय लेलन्हि।

मोरा मन हे खनहि खन भाग। गमन गोपब कत मनमथ जाग।
हमर मोन क्षण-क्षण भागि रहल अछि। कामदेव जागि रहल छथि गमनकेँ कतेक काल धरि नुकाएब।

दृश्य ६
एहि दृश्यमे सेहो नहि तँ ननदि छथि नहिये सासु आऽ नहिये विद्यापति। एकटा अतिथि अबैत छथि आकि तखने मेघ लाधि दैत अछि आऽ जुवती गबैत छथि।
धनछीरागे (नेपालसँ प्राप्त विद्यापति पदावली)-
अपना मन्दिर बैसलि अछलिहुँ, घर नहि दोसर केवा।
अपन घरमे बैसल छलहुँ, घरमे क्यो दोसर नहि छल,
तहिखने पहिआ पाहोन आएल बरिसए लागल देवा।
तखने पथिक अतिथि अएलाह आऽ बरखा लाधि देलक।

के जान कि बोलति पिसुन पड़ौसिनि वचनक भेल अवकासे।
की बजतीह ईर्ष्यालु पड़ोसिन से नहि जानि, बजबाक अवसर जे भेटि गेलन्हि।
घोर अन्धार, निरन्तर धारा दिवसहि रजनी भाने।
दिनहिमे रात्रि जेकाँ होमय लागल।
कञोने कहब हमे, के पतिआएत, जगत विदित पँचबाने।
हम ककरा कहब आऽ के पतियायत। कारण कामदेव ख्याति तँ जगत भरिमे अछि।

दृश्य ७
मंचक एक दिससँ सासुक मृत्युक बाद हुनकर लहाश निकलैत छन्हि आ मंचपर अन्हार होइत अछि। फेर इजोत भेलापर ननदिक वर हुनका सासुर लय जाइत छन्हि। पथिक रस्तापर छथि दर्शकगणक मध्य आऽ दर्शकगणकेँ इशारा करैत जुवती गीत गबैत छथि आऽ विद्यापति सभ पाँतिक बाद अर्थ कहैत छथि। अन्तिम दू पाँति विद्यापति गीत आ अर्थ दुनू बजैत छथि- विद्यापति अन्तिम दू पाँति आ ओकर अर्थ कैक बेर दोहराबैत छथि।
नगेन्द्रनाथ गुप्त सम्पादित पदावली-
सासु जरातुरि भेली। ननन्दि अछलि सेहो सासुर गेली।
सासु चलि बसलीह, ननदि सेहो सासुर गेलीह
तैसन न देखिअ कोई। रयनि जगाए सम्भासन होई।
क्यो नहि सम्भाषणक लेल पर्यन्त,
एहि पुर एहे बेबहारे। काहुक केओ नहि करए पुछारे।
एतुका एहन बेबहार, ककरो क्यो पुछारी नहि करैत अछि।
मोरि पिअतमकाँ कहबा। हमे एकसरि धनि कत दिन रहबा।
हमर पिअतमकेँ कहब, हम असगरे कतेक दिन रहब।
पथिक, कहब मोर कन्ता। हम सनि रमनि न तेज रसमन्ता।
पथिक हुनका कहबन्हि, हमरा सन रमणिक रसक तेज कखन धरि रहत।
भनइ विद्यापति गाबे। भमि-भमि विरहिनि पथुक बुझाबे।
विद्यापति गबैत छथि, विरहनि घूमि-घूमि कय पथिककेँ कहि रहल छथि।

विद्यापति गबैत-गबैत कनेक खसैत छथि- अन्हार पसरय लगैत अछि तँ एक गोटे जुवती दिस अन्हारसँ अबैत अस्पष्ट देखना जाइत छथि। की वैह छथि पिआ देसान्तर!! हँ, आकि नहि!!!

पिआ देसान्तरक घोल होइत अछि आ मंचपर संगीतक मध्य पटाक्षेप होइत अछि।

पिआ देसान्तरक ई कन्सेप्ट सुधीगणक समक्ष अछि आ बिदेसियाक वर्तमान दुर्दशाक बीच ई महाकवि विद्यापतिक प्रति ससम्मान अर्पित अछि।

'विदेह' २२८ म अंक १५ जून २०१७ (वर्ष १० मास ११४ अंक २२८)

ऐ  अंकमे अछि :- १. संपादकीय संदेश २. गद्य २.१. डॉ. कैलाश कुमार मिश्र -  गौरी चोरनी ,  गौरी डाईन आ गौरी छिनारि: मधुश्रावणी कथा केर ...